Thursday, January 9, 2020

जे एन यू से जवाब आया है कि सिर पर पड़ने वाली गुंडों की लाठी का जवाब बहस से देगें, खंडन मंडन से देंगे।




शेष नारायण सिंह 

याद आया, डॉ जयशंकर यही वह यूनिवर्सिटी है न जिसने हर हमले को बातचीत से भोथरा बनाया था। तुम्हारे छात्रजीवन में ही इन्हीं छात्रावासों के मेस में सारी रात चलने वाली बहसों से इंदिरा गांधी की इमरजेंसी निजाम को तहस नहस किया गया था। जब घायल सिर और हाथ पर पट्टी बांधे आइशी घोष ने ऐलान किया कि लाठी डंडे का जवाब अहिंसा से दिया जाएगा तो क्या आपको नहीं लगा कि वह आपके क्लास की कोई लड़की है जो एल-3 के कमरे में हो रही किसी बहस में अपने जज़्बे का ऐलान कर रही है और आपकी यूनिवर्सिटी का घोषणापत्र पढ़ रही है।
यह वही यूनिवर्सिटी है जिसने बहुत सारे गरीब और अमीर माँ बापों के बच्चों को इंसानी बुलंदियों की इज़्ज़त करने की तमीज़ सिखाई थी।
और निर्मला सीतारमण, यह वही यूनिवर्सिटी है जहां किसी से भी मतभेद को लाठी से नहीं बातचीत से सुलझाया जाता था। क्या आपको याद है कि जे एन यू का कैम्पस किसी भी लड़की के लिए मां की गोद से भी ज़्यादा सुरक्षित माना जाता था। क्या आपको याद है जब भी किसी ने किसी student, कर्मचारी या शिक्षक के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तो उसके खिलाफ पूरी यूनिवर्सिटी लामबंद हो जाती थी।
उसी कैम्पस में कल गुंडों ने आपके सेंटर के लड़के लड़कियों की हड्डियों का चूरमा बनाया और आप लोग मजबूर हैं और न्याय के लिए पहल नहीं कर पा रहे हैं।
जे एन यू की शान के लिए डेढ़ साल तक जेल में रहने वाले डी पी त्रिपाठी के शरीर को हम अभी कल अग्नि को समर्पित करके आए हैं और आज ही आपके कैम्पस में गुंडों ने तीन घंटे तक खूंरेजी की।
मन में तो आपके भी तकलीफ होगी ही।

यह सरकार तो अब दुआ के सहारे ही चल रही है क्योंकि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था अवाम को तबाह करने पर आमादा है



शेष नारायण सिंह

इस बार की मुंबई यात्रा संक्षिप्त रही . तीन चार दिन रहा. लगभग रोज़ ही  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफलता की दुआ करता रहा . मैंने अपने उन दोस्तों के साथ बैठकर दुआ की जो आज के छः साल पहले तक मुतमइन थे कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद संभालते ही देश में कारोबार करने वालों को ज़बरदस्त सफलता मिलेगीउद्योग जगत में बदलाव  आयेगा और अर्थव्यवस्था के मामले में भारत बड़ी सफलता हासिल करेगा . वही लोग अब निराश नज़र आ रहे हैं . और प्रार्थना कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था को  पटरी पर लाने में सफलता प्राप्त करें क्योंकि सभी व्यापारी हैं और  कारोबार बिलकुल ठप पड़े हैं . इसी मुंबई यात्रा के समय ही आर्थिक विकास और जीडीपी की विकास दर के ताज़ा आंकड़े भी आ गए .सब कुछ आर्थिक अखबारों की सुर्ख़ियों में था.  जो कुछ छपा था उससे पूरे देश में बहुत ही निराशा हो गयी.  मुम्बई के सेठ साहूकार दुखी हो गए . जीडीपी की वृद्धि में खेतीकारखाने का उत्पादन और निर्यात का बड़ा योगदान होता है . लेकिन इन तीनों ही क्षेत्रों में प्रगति बहुत ही निराशाजनक  है . रोज़गार की हालत पिछले ४५ साल में सबसे खराब मुकाम पर है . उसी दिन मुंबई में इंडियन एक्सप्रेस के एक्सप्रेस अड्डा कार्यक्रम में अर्थशास्त्र के इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता  डूफ्लो और अभिजीत बनर्जी भी थे . उन्होंने भी अर्थव्यवस्था के बारे में चेतावनी दे दी कि भारत आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है . उन्होंने  संभलने की सलाह दे दी .मुंबई देश की आर्थिक राजधानी हैं और वहां इस तरह की निराशा का माहौल निश्चित रूप से चिंताजनक था. इन मुलाकातों में  कुछ ऐसे लोगों से भी बातचीत हुई जो कह रहे थे कि मैंने तो पहले ही बता दिया था कि अर्थव्यवस्था का कुशल प्रबंधन नरेंद्र मोदी के बस की बात नहीं है .यह वे लोग थे जिनकी एक ख़ास किस्म की राजनीति है . मैं  जानता हूँ कि देश में  एक बड़े वर्ग के नेता और उनके समर्थक  नरेंद्र मोदी को हटाकर खुद सत्तासीन होना चाहते हैं . मुझे भी कोई एतराज नहीं है . कोई भी चुनाव जीतकर  आये और देश का कामकाज संभाल ले एक नागरिक को उसमें क्या दिक्क़त हो सकती है . लेकिन आज अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर  पंहुच गयी है ,उसमें यही दुआ की जानी चाहिए कि  जो भी हमारी  आर्थिक नैया का खेवैया है ,वह सफल हो वह हम सबको पार ले जाए  क्योंकि उसके डूबने का मतलब यह  है कि हम भी डूब जायेंगें . उन्होंने नीतियों को अपने हिसाब से डिजाइन किया है और उनकी रणनीति में  कोई ऐसी बात ज़रूर होगी जिससे वे चीज़ों को संभाल लेंगे लेकिन फ़िलहाल ऐसे कोई लच्छन तो नहीं दिख रहे है . साधारण आदमी को तो आर्थिक व्यवस्था की मंदी ही दिख रही है .  निराशा के इस माहौल में मेरी मुलाक़ात बीजेपी के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं से भी हुई . उनका कहना था कि  चिंता की कोई बात नहीं है . मोदी जी सब संभाल लेंगें . मैं नरेंद्र मोदी का समर्थक नहीं हूँ लेकिन  जब कोई भी यह तसल्ली देता है कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के रूप में अर्थव्यवस्था को संभाल लेंगें तो  उम्मीद बनती है .इसका कारण यह है कि अगर नरेंद्र मोदी सफल न हुए तो देश बहुत पीछे चला जाएगा. वे कैसे संभालेंगे यह वे जानें लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हम अर्थव्यवस्था को डूबता नहीं देखना चाहते .
सच्चाई यह है कि  आज की सरकार ने अर्थव्यवस्था को ऐसे मुकाम पर लाकर  खड़ा कर दिया है जहां से उसके संभलने की संभावनाएं प्रतिदिन ही कमज़ोर पड़ती जा रही हैं . २०१४ में जब बीजेपी ने सत्ता संभाली थी तो देश में डॉ मनमोहन  सिंह की सरकार के खिलाफ इस तरह का माहौल बना दिया  गया था कि वह अब तक की सब से भ्रष्ट सरकार  है . उनके खिलाफ आर एस एस ने दिल्ली में बड़ा आन्दोलन करवाया . महाराष्ट्र से अन्ना हजारे नाम के एक पुराने फौजी को लाया गया . अन्ना के कैम्प में अपने लोगों को अहम रोल दिलवाकर आर एस एस/बीजेपी ने कोशिश की थी कि इस आन्दोलन को कांग्रेस के खिलाफ तूफ़ान के रूप में खड़ा कर दिया जाए. यह बिलकुल सही राजनीति थी और हर राजनीतिक पार्टी को अपने लाभ के लिए काम करना चाहिए . आर एस एस की कोशिश थी कि कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बनाकर पेश कर दिया जाए उसमें उन्हें सफालता भी मिली. वह योजना २०१४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पक्की जीत दिलवाने की रणनीति थी और उसमें सफलता भी मिली. यह अलग बात है कि उसी अन्ना के आन्दोलन  से एक ऐसी शाखा भी निकल पडी जो आज आम आदमी पार्टी के रूप में दिल्ली की सरकार पर काबिज़ है और बीजेपी के लिए बड़ी चिंता का कारण है. अन्ना हजारे के उसी आन्दोलन के बाद  नरेंद्र मोदी की जीत वाला २०१४ का  चुनाव हुआ. नतीजा सामने  है . बीजेपी सत्ता में विधिवत काबिज़ है .लेकिन यह सरकार अपने ज्यादातर वायदे पूरी करने में नाकाम रही है . यह अलग बात है कि बीजेपी वाले यह दावा करते रहते हैं कि उन्होंने अपने अस्सी प्रतिशत वायदे पूरे कर दिए  हैं .

भ्रष्टाचार का खात्मा करने और देश को अच्छे दिन के वायदे के साथ आई सरकार आज देश की आर्थिक राजधानी में चौतरफा निराशा का सबब  बनी हुई है .  देश को आर्थिक मंदी के मुहाने पर ले जाने वाली इस सरकार से देश को बहुत उम्मीद थी  लेकिन इस सरकार ने आर्थिक क्षेत्र के विद्वान व्यक्तियों को एक एक करके विदा कर दिया . रघुराम राजन , अरविन्द पनगढ़िया, अरविन्द सुब्रमण्यम , उर्जित पटेल जैसे लोग आज  देश की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन से बाहर हो चुके  हैं. जिन लोगों के पास देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने की ज़िम्मेदारी है वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि क्या करना है . पिछले बजट की सारी बातें सरकार पलट चुकी है . किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि जाना किधर है . जो भी स्कीमें  वित्त प्रबंधन के लिए लाई जाती हैं उनसे नुकसान ज़्यादा हो रहा है . रियल एस्टेट में आयी तबाही के कारण देश के मध्यवर्ग के बड़े लोगों के सपने टूट चुके हैं . हालांकि  नोटबंदी की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री ने साफ़ कहा था कि आम आदमी को घर खरीदने में सुविधा होगी  . ऐसा  नहीं हुआ .रियल एस्टेट के कारोबार के  बर्बाद के हो जाने के बाद उसमें  फिर से जान फूंकने के लिए सरकारी खजाने से  बहुत बड़ी रक़म देनी  पड़ रही है .

आज स्थिति यह है कि आर्थिक कमजोरी को ठीक करने के लिए कोई दवा काम नहीं आ रही है . सरकार आर्थिक मोर्चे पर फेल हो चुकी है . उस हालत में जब कोई भी दवा काम नहीं कर रही है तो दुआ के अलावा कोई रास्ता नहीं है . मेरे  बचपन में भी ऐसा ही होता था . गाँव में चारों तरफ खुशी का माहौल रहता था जब तक कोई बीमार न पड़ जाये. बीमार होने पर इलाज़ की सुविधा न के बराबर होती  थी. आजादी के बाद  विकास की इकाई के रूप में ब्लाक को स्थापित किया जा चुका था. नेहरू के विज़न का नतीजा  था कि हर ब्लाक में  छोटे  छोटे सरकारी अस्पताल खुल गए थे और उन अस्पतालों में मामूली बीमारियों का इलाज मुफ्त में ही हो  जाता था लेकिन अगर बीमारी वहां नहीं संभल सकती थी तो जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता था . वहां भी इलाज मुफ्त  ही होता था लेकिन जिला अस्पताल जाना ही लोगों के लिए पहाड़  होता था . ऐसी हालत में गाँव के बड़े बुज़ुर्ग कहते थे कि ,अब  इनकी सेहत दवा से नहीं दुआ से ठीक होगी . फिर दुआ ही का रास्ता बचता था . आज अपनी अर्थव्यवस्था की हालत वैसी ही हो गयी है . जब नरेंद्र मोदी ने २०१४ में सत्ता संभाली तो देश की आर्थिक स्थिति ढलान पर थी . माहौल ऐसा बना कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार की विदाई हो गयी . एक नई सरकार आ गयी . किसी भी सरकार का ज़िम्मा  आर्थिक स्थिति को सुधारना होता है लेकिन मौजूदा सरकार उस मोर्चे पर फेल हो गयी है . सरकारी प्रवक्ता और उनकी पार्टी के नेता कहते हैं कि सरकार ने काम भी किया लेकिन  आज छः साल बाद स्थिति  यह है कि देश की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है . . 
अभी विश्व बैंक के आंकड़े आये हैं . विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2019-2020 में भारत के लिए पांच प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया है और भारत के जीडीपी विकास दर के अनुमान को घटा दिया है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष 2019-2020 में भारत की जीडीपी में विकास की दर फीसदी रह सकती है.विश्व बैंक का अनमान है कि भारत से तेज विकास दर बांग्लादेश की होगीजहां इस वित्त वर्ष जीडीपी में प्रतिशत रहेगी .  
हमारे अपने सरकारी आंकड़ों में भी देश के आर्थिक भविष्य की बहुत ही मुश्किल तस्वीर पेश की गयी है .केंद्र सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा जारी पूर्वानुमान में भी कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष 2019-2020 में देश की जीडीपी में  5 फीसदी का विकास होगा . सीएसओ के अनुसार  2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पांच फीसदी रहेगी इतनी बीरी हालत  11 साल में पहली बार हुयी है .यह आंकड़े लगातार गिर रहे  हैं क्योंकि 2018-19 में जीडीपी की  विकास दर 6.8% उसके पहले वाले साल 2017-18 में जीडीपी की विकास  दर 7.2 प्रतिशत थी . 
भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान भी कोई बहुत अच्छे नहीं   हैं . आई एम  एफ की  मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जियोर्जिवा ने कहा कि भारत ने बुनियादी चीजों पर बेहतर काम किया है लेकिन अर्थव्यवस्था से जुड़ी कई ऐसी समस्याएं हैं जिसका हल करना जरूरी है. खास तौर पर नॉन-बैंकिंग क्षेत्र में हालात बेहतर करने की जरूरत है.
आर्थिक स्थिति की इस मंदी के बीच सरकार का कोई भी आदमी अर्थव्यवस्था की इस खस्ता हालत को स्वीकार करने के लिए तैयार  नहीं है . सत्ताधारी दल के किसी भी  कार्यकर्ता से बात करिए तो वह ऐसे मुद्दों की बात करने लगेगा जिसके कारण अर्थव्यवस्था में कोई लाभ नहीं होता लेकिन भावनात्मक मुद्दों को हवा मिलती है . सवाल यह है कि भावनातमक मुद्दों से कब तक देश चलेगा . अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए .

डी पी त्रिपाठी की याद उनके जाने के दो दिन बाद


शेष नारायण सिंह

१९७३ में सुल्तानपुर शहर में सबसे जीवंत जगह मुझे बस अड्डे के अन्दर मौजूद अखबार की दुकान लगती थी . उसी दुकान पर  इलाहाबाद से छपने वाली एक पत्रिका ,” आगामी कल “ का दर्शन हुआ था . उस  दुकान को चलाने वाले बुज़ुर्ग में बहुत ही  गंभीरता दिखती थी . . मेरे हाई स्कूल के सहपाठी , गया प्रसाद सिंह वकील बन चुके थे और सुल्तानपुर में वकालत करते थे . उनके घनिष्ठ मित्र राज खन्ना से वहीं मुलाक़ात हुयी जो आज तक बहुत ही भरोसे की दोस्ती है . ‘आगामी कल ‘ पत्रिका से राजेन्द्र अरुण, विभूति नारायण राय और देवी प्रसाद त्रिपाठी जुड़े हुए थे .उसी अखबार की दुकान पर देवी प्रसाद त्रिपाठी से पहली बार मुलाक़ात हुयी थी.  जहाँ तक मेरा सवाल है मैंने  किसी अख़बार आदि में पहली बार उसी ,’ आगामी कल ‘  में कुछ लिखा था . उन दिनों डिग्री कालेज में लेक्चरर होना इस बात का  संकेत माना जाता था कि बंदा पढ़ा लिखा होगा . मेरे बारे में भी यही मुगालता और लोगों को था . जिले के उस समय के बड़े समाजवादी नेता  त्रिभुवन  नाथ संडा  थे, वे राज नारायण के दोस्त थे , एस वाई एस के दिनों के हमारे नेता लेकिन १९७३ में सुल्तानपुर के दो बड़े नेता , कामरेड अब्दुल रहमान खान और कामरेड शीतला प्रसाद गुप्त हमारे नेता बन चुके थे. आगामी कल में धंवरुआ में किसानों की जागृति के बारे में कुछ लिख  दिया था मैंने . दर असल स्व अब्दुल रहमान खान किसानों के उस जागरण अभियान के हीरो थे .   उनकी ही बताई हुई  बातों को कलमबंद कर दिया था . देवी प्रसाद त्रिपाठी को वह बहुत पसंद आया था. हालांकि उन दिनों वे कम्युनिस्ट नहीं थे लेकिन आन्दोलन प्रिय तो थे . अब्दुल रहमान खान साहब ने किसानों के जागरण का जो  अभियान चलाया था वह शुद्ध रूप से वामपंथी था. त्रिपाठी जब मेरे कालेज  कादीपुर आये तो मुझसे बात की . लगभग मेरी की उम्र के थे लेकिन मुझसे बहुत ही ज्यादा जागरूक . बाद में जे एन यू गए ,  वहां छात्र संघ के अध्यक्ष हुए और इमरजेंसी में जेल गए . जब बाहर आए तो देश की दूसरी आज़ादी के लिए लड़ी गयी लड़ाई के हीरो थे . कादीपुर के मेरे छात्र रमाशंकर यादव और उनके दोस्त असरार खान त्रिपाठी के बहुत ही प्रिय लोग थे.  असरार खान तो कामरेड अब्दुल रहमान खान के बेटे भी हैं . 

डी पी त्रिपाठी अब चल गए , कैंसर ने उनको लील लिया .उनके अंतिम संस्कार के समय दिल्ली के लोधी रोड पर बहुत लोग आये थे . बड़ी  संख्या में वे लोग थे जिन्होंने १९७० के दशक को डी पी त्रिपाठी के साथ जे एन यू को देश की एक बुलंद संस्था बनने में योगदान किया था . सबकी आंखें नम थीं. सब अपने तरीके से उनको जानते थे . मैं भी जानता हूँ .  DPT के व्यक्तित्व की जो सबसे बड़ी बात मुझे समझ में आयी वह यह कि वह इंसान किसी के बारे में कुछ भी नेगेटिव बात नहीं करता था.लोधी शमशान पर खड़े हुए मुझको  फुटकर  यादें घुमड़ घुमड़ कर आती रहीं. जब अनिल चौधारी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो लगा कि बहुत बड़ा सहारा मिल गया है . कुलदीप कुमार को एकदम निराश देखा . इतनी तकलीफ उनके चेहरे पर मैंने कभी  नहीं देखी है . त्रिपाठी ने कुलदीप के बारे में पहली बार मुझे तब बताया था जब वे शिमला में थे . कहा कि ‘इतिहास की पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन बहुत ही कुशाग्रबुद्धि हैं ,हिंदी के बहुत अच्छे कवि हैं .‘ जब  कुलदीप कुमार  की बारे में सोचता हूँ , उनकी यह बात हमेशा याद आती रहती है . जब बलराम सिंह को जे एन यू में लाये तो  सबको बताया कि भविष्य को दिशा देगा .  सबके बारे में उनकी एक सकारात्मक राय हुआ करती थी. इमरजेंसी में जेल के दिनों में उनके साथी  हंसराज रहबर, मोहन धारिया, सुरेन्द्र मोहन और चन्द्र शेखर थे . उनके यहाँ मुझको और घनश्याम मिश्र को लेकर जाते थे .  सुरेन्द्र मोहन जी के यहाँ ही पता चला की हंसराज रहबर ने अपनी नज्म , ‘ महफ़िल में बार बार जाने को जी करे’ को  किस  तरह से तोड़ मरोड़ कर पेश किया था और अटल बिहारी वाजपेयी की फरमाइश को पूरी तो कर दिया था लेकिन उसके बाद उन्होंने फिर रहबर जी से कुछ सुनाने की फरमाइश नहीं की . 
जब मैं १९७६ में दिल्ली आया तो त्रिपाठी तिहाड़ जेल में बंद थे . घनश्याम मिश्र मुझको उनसे मिलवाने ले गए . उनकी तारीख थी . आजकल जहां संसद मार्ग  थाना है , वहीं कोर्ट हुआ करती थी. फरवरी का महीना था . लॉन में बैठकर बात हुयी . मुझसे पूछा कि क्या  सोचा है . मैंने कह दिया . कादीपुर की नौकरी  छूट चुकी है . शादी हो गयी है , एक बेटा है . कोई छोटी मोटी नौकरी करके गुज़र करना है . उन्होंने साफ़ कह दिया  कि भूल जाइए . कोई छोटी मोटी नौकरी नहीं मिलेगी .फिर से पढ़ाई कीजिये और इमरजेंसी ख़त्म होने का इंतज़ार कीजिये . उसके बाद ही कुछ सोचिये . उसके बाद जेल से जब भी तारीख पर आये, मुलाकातें होती  रहीं. जेल से बाहर आने के बाद प्रो पुष्पेश पन्त से बात करके मुझे उनके केंद्र में में ही दाखिला दिलवा दिया लेकिन मेरा मन नहीं था पढ़ाई का . मेरा बेटा दो साल का होने वाला था . मुझे तो कुछ कमाकर गहर भेजना था . 
जेल से आने के बाद  त्रिपाठी की राजनीतिक हैसियत बहुत बढ़  चुकी थी .जनता पार्टी सरकार के  कई मंत्री उनके  दोस्त थे . मोहन धारिया से कहकर मुझे उन्होंने एक  प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया लेकिन साथ ही यह वार्निंग भी दे दी थी कि कर नहीं पाओगे . लिखने पढ़ने का काम करो . उसी दौर में सर्वोदय एन्क्लेव में मिला हुआ मेरा घर उनका कैम्प कार्यालय भी हो गया था . ऐसी बहुत सी बातें हैं जो कल से आजतक घूम घूम कर  याद आती जा रही हैं . दिल्ली में मैंने बाद में पत्रकारिता आदि के क्षेत्र में जो भी किया उसके लिए मैं देवी  प्रसाद त्रिपाठी का आभारी रहूंगा . 
इमरजेंसी में जेल जाने के पहले डी पी टी ने जे एन यू यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था . वहां से रिहा होने के बाद भी   अध्यक्ष रहे लेकिन फरवरी में ही यूनियन का चुनाव करवाने के लिए अड़ गए और सीताराम येचुरी एस एफ आई के उम्मीदवार बने .  उस चुनाव का प्रचार भी क्या हंगामी था .उसी चुनाव में अनिल चौधरी को उन्होंने ज़िम्मा दिया कि शेष नारायण को सही तरीके से एजुकेट करना है . काफी सामंती तत्व इनके दिमाग में हैं . उनको  निकालना है . अनिल ने ही मुझे अवधी लहजे में शिक्षित किया .उस चुनाव के समय मैं जे एन यू में नहीं था. लेकिन चुनाव में काम किया . अशोक लता जैन, उषा मेनन और अनिल  चौधरी मुझे डिक्लास कर  रहे थे . चुनाव अभियान में मुझे सीढ़ी और एक  कनस्तर में लेई लेकर उन लोगों के साथ चलना होता था जो पोस्टर लगाते  थे . यह काम रात में होता था . घनश्याम मिश्र पोस्टर लेकर चलते थे . दिलीप उपाध्याय, साईनाथ आदि कैम्पस की  दीवालों पर पोस्टर लगाते थे .यह सभी लड़के   हमसे और घनश्याम से उम्र में कम थे लेकिन  हम सीढ़ी कंधे पर टाँगे चलते थे . डिक्लास होने के कोर्स में जाति , धर्म, उम्र , आदि के सभी बंधन तोड़ने पड़ते थे . उसी डिक्लास होने के चक्कर में बर्तन आदि  मांजने का काम भी करवाया गया . शादी के बाद प्रबीर और अशोकलता जैन  वसंत विहार के ए ब्लाक की कोठी नंबर १५ के स्टाफ क्वार्टर में किराए पर रहते थे . एक दिन अनिल चौधरी ने कहा कि उनके यहाँ दावत में जाना है . हम चले गए . पता लगा कि चौधरी साहब को वहां खाना बनाना भी है . हम उनके सहायक की भूमिका में थे . रात १२ बज गया . वापसी  पैदल ही हुयी.बाद में  त्रिपाठी ने बताया कि अब सब ठीक है , आप इंसान बन  गए हैं . उसी  दौर में जब मैंने एकाध बार अभिलाषा सिंह को राजकुमारी कह दिया तो बहुत खफा हुए और  समझाया कि ऐसा कहना अभिलाषा का अपमान है . वे  बहुत ही शालीन और वैज्ञानिक सोच वाली  हैं .  सामन्ती चोले को तिलांजलि दे चुकी हैं . 

लालचंद उनके बहुत ही प्रिय थे . हिंदी में एम ए करने आये थे और त्रिपाठी उनके लिए सबसे अच्छी बातें करते थे . मैंने पचास साल से ज्यादा की अपनी त्रिपाठी की दोस्ती में उनको कभी नेगेटिव बात करते नहीं देखा .  जे एन यू और सी पी एम की राजनीति में आला मुकाम हासिल करने के बाद दिल्ली छोड़कर इलाहाबाद  जाना और वहां विश्वविद्यालय में उनका शिक्षक होना एक ऐसी पहेली है जो बहुत दिनों तक समझ में नहीं आयी थी लेकिन जब वे राजीव गांधी के ख़ास सलाहकार बने तब उन्होंने उस गुत्थी को भी अर्थाया . राजीव के करीबी के रूप में मैंने उनके पंचशील एन्क्लेव और डिफेंस कालोनी के घरों में  उनकी दिनचर्या को देखा है . बड़े बड़े मंत्री उनके  यहाँ दरबार लगाया करते थे . उन दिनों घनशयाम मिश्र सुल्तानपुर में लेक्चरर हो कर जा चुके थे. मुझसे एक दिन कहा कि उसको कहो कि दिल्ली अक्सर आया करे लेकिन घनश्याम  वहीं मस्त थे. घनश्याम के जाने के बाद त्रिपाठी के सबसे करीबी और विश्वसनीय कुमार नरेंद्र सिंह रहे जो जीवन भर उनके साथी और सखा रहे .  
जब एक अखबार में काम करने के दौरान मुझे एडिट पेज पर काम करने का मौक़ा मिला तो त्रिपाठी कांग्रेसी थे लेकिन कहा कि विचारधारा के स्तर पर मार्क्सवादी सोच ही सुपीरियर है. राजेन्द्र शर्मा से संपर्क में रहो और आज का ( १९९३ )जो सर्वोच्च लेखन है उसको छापो उससे बड़ा नाम होगा . सी पी चंद्रशेखर , जयती घोष, प्रभात  पटनायक ,  राजेन्द्र शर्मा , सीताराम येचुरी उसी दौर में मेरे सम्पादकीय पृष्ठ पर विराजते थे . इन सबको बैलेंस करने के लिए मैंने इशर जज अहलुवालिया से भी लिखवाया . उन दिनों मुझसे बहुत खुश रहते थे . एक दिन मुझसे कहा कि मनमोहन का लेख ,” फैज़ की शायरी - गुरुरे इश्क का बांकपन “ पढ़ो. तब तक मैं  टेलिविज़न में चर्चावीर हो चुका था . मनमोहन का लेख उनको बहुत पसंद था .  अपने फीरोज़ शाह रोड वाले घर पर बैठकर मुझसे पढवाया . फैज़ से भी उनकी आत्मीयता रही होगी क्योंकि जब १९७८ में फैज़ दिल्ली आये थे तो उनकी एक बड़ी बैठकी जाकिर हुसेन मार्ग पर डॉ आई पी सिंह के घर पर हुयी थी . भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान-इरान-अफगानिस्तान डेस्क के इंचार्ज के रूप में डॉक्टर साहेब ने फैज़ की यात्रा को आसान  बनाया था. अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे और आई पी सिंह उनके खास थे , वे जौनपुर के थे और  मेरा भी उनके यहाँ आना जाना था. मैं त्रिपाठी के साथ वहां गया था  . डॉ आई पी सिंह के ४७ नंबर वाले घर के लॉन में मैंने डी पी त्रिपाठी को  फैज़ से  फैज़ की शायरी पर बात करते देखा है . फैज़  उनसे बात करके बहुत खुश हुए थे .
उनके गाँव के ही केदारनाथ सिंह इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री थे. कांग्रेस के बड़े  नेता भी थे . हमारे दोस्त , राजेन्द्र सिंह के बाबूजी थे तो हम लोग उनसे थोड़ी समानजनक दूरी बनाकर रखते थे लेकिन उनसे त्रिपाठी की बातचीत बिलकुल दोस्ताना माहौल में होती थी .  त्रिपाठी को मैंने राजीव गांधी फाउंडेशन के एक  कार्यक्रम में डेसमंड टूटू और नेल्सन मंडेला से भी बात करते देखा है . उनकी शख्सियत की जो  सबसे बड़ी बात थी वह यह वे  किसी भी इंसान से intimidate नहीं होते थे .केदारनाथ सिंह से बातचीत के दौरान ही उन्होंने प्रेरणा दी थी कि बच्चों को जे एन यू में भेजिए . उनके बेटे और अब राजनीतिक नेता , अशोक सिंह को जे एन यू में भर्ती करवाने में त्रिपाठी का योगदान था. अशोक उनको और मुझको अपना बड़ा भाई मानते हैं . 
बहुत सारी यादें हैं . लेकिन यह तय है कि उस इंसान के जाने के बाद अंदर से कुछ हिल गया है . सोच रहा हूँ कि  उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा से लिखूं तो शायद कुछ चैन पड़ेगा.

दिल्ली में भी अगर बीजेपी का रथ रुका तो केंद्र में विकल्प की चर्चा शुरू हो जायेगी


शेष नारायण  सिंह

झारखण्ड विधान सभा चुनाव के नतीजों ने निर्णायक रूप से साबित कर दिया है कि किसी भी  सत्ता को चुनौती दी जा सकती है ,बस राजनीतिक सूझबूझ और हौसला होना चाहिए . झारखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष  अमित शाह ने पूरी मेहनत से प्रचार किया , लगभग हर जिले में उन लोगों की औसत दो दो सभाएं  हुईं .  गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी झारखण्ड में बहुत ही अच्छा प्रभाव है. उन्होंने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी लेकिन उनकी पार्टी विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हार गयी.  अब वहां विपक्ष की सरकार है . पिछले पांच वर्षों में हुए ज्यादातर चुनावों की तरह झारखण्ड में भी भावनात्मक मुद्दों की खूब वर्षा की गयी. बालाकोट, पाकिस्तान ,तीन तलाक  आदि आजमाए  गए मुद्दों के अलावा , राम मंदिर , ३७०,  नागरिकता कानून और एन आर सी जैसे ताज़ा विभाजनकारी मुद्दे पर बहस के दायरे में  लाये. मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में कुछ अति वफादार टीवी चैनलों ने भी ज़रूरी सहयोग दिया . विपक्ष के नेता लोग आजकल टीवी चैनलों की बहस का बहिष्कार कर रहे हैं तो उनके समर्थक नाम की ' विचारकों ' की एक नई प्रजाति का आविष्कार  हो गया है .जिनको स्टूडियो में बुलाकर कांग्रेस , सपा, बसपा आदि की धुनाई की जाती है . फ़ारसी शब्दों के नाम वाले कुछ दाढ़ी टोपी धारी लोगों को बुला लिया जाता है जो  देश के  सभी मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करते हैं और उनकी  जहालत को देश के सभी मुसलमानों की जहालत बताकर  पूरी बिरादरी को राष्ट्रद्रोही साबित करने की कोशिश की जाती है . बीजेपी के  प्रवक्ता लोग तो खैर नियमित रूप से राहुल गांधी और उनके खानदान की कमियों को गिनाते ही रहते  हैं . जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक के उनके खानदान को लोगों को देशहित की  भावना के खिलाफ बताते हैं . राम  विलास पासवान, नीतीश कुमार ,सुदेश महतो और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टियों ने भी बीजेपी विरोधी वोटों को छिन्न भिन्न करने में भूमिका निभाई . इन  सारी चुनाव जिताने वाली तरकीबों का  प्रयोग  झारखण्ड के चुनाव में भी खूब किया गया .सारी कोशिशों के बाद भी  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को   राज्य विधानसभा में  बहुमत तो नहीं ही मिला, सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का तमगा भी हाथ  नहीं आया .  मतों की  गिनती चल  रही थी और बीजेपी के उम्मीदवार निर्णायक हार की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन  पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी जीत और सरकार दोबारा बनाने का दावा कर रहे थे . बहरहाल आज वहां हेमंत सोरेन की अगुवाई में  कांग्रेस और लालू यादव की पार्टी के सहयोग से  विपक्ष की सरकार बन गयी है .
झारखण्ड विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या केवल ८१ है . इसलिए संख्या के हिसाब से उसको  उतना महत्वपूर्ण न मानने की बीजेपी नेताओं की बात पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन  पिछले एक साल में हुए  विधानसभा चुनावों  में  बीजेपी को हो रहे नुक्सान को मिलाकर देखा जाये तो यह पार्टी के विजय रथ पर लगी एक ज़बरदस्त ब्रेक है . गौर करने की बात यह  है कि इसी कालखंड में लोकसभा के चुनाव भी हुए जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी को वह वाला बहुमत मिला जो प्रधानमंत्री की रूप में चुनाव लड़ने वाले जवाहरलाल नेहरू , राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के नाम दर्ज है . २०१४ और २०१९ में लगातार दो बार लोकसभा में  चुनाव जीतकर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आपको उस कतार में खड़ा करने की दिशा में क़दम बढ़ा  दिया है  जिसमें जवाहरलाल नेहरू विराजते हैं . नेहरू देश के अब तक के इकलौते प्रधानमंत्री हैं जिनके नाम पर देश  में  तीन लोकसभा चुनाव हुए और वे लगातार तीनों में विजयी  रहे. हाँ यह भी सच है कि नेहरू के समय में   हुए विधानसभा चुनावों में भी केरल के अलावा हर विधान सभा में उनकी पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ चुनाव  जीतती थी .लेकिन नरेंद्र मोदी की विजय यात्रा अब केवल लोकसभा चुनावों तक की सीमित हो गयी है .

बीजेपी की सहयोगी पार्टी ,जनता दल ( यू ) के महामंत्री और नीतीश के कुमार के भरोसेमंद नेता के सी त्यागी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व को गठबन्धन धर्म निभाना नहीं आता . बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी से गठबंधन धर्म निभाने की कला सीखनी  चाहिए . के सी त्यागी का यह बयान झारखण्ड विधानसभा के चुनाव नतीजों के बाद आया है . इसके राजनीतिक तत्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता . दिल्ली के सत्ता के गलियारों में चलने वाली गपबाजी की शास्वत  परम्परा पर नज़र डालें तो साफ नज़र आ जाएगा कि नीतीश कुमार की भावी रणनीति अब बहस की ज़द में आ गयी है. कई भरोसेमंद लोग कह  रहे हैं कि कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के कारण आयी स्थिरता के  कारण  कई  विपक्षी  पार्टियां अब कांग्रेस की तरफ  देखने लगी हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री जगन  रेड्डी ने  नागरिकता क़ानून के खिलाफ जो आवाज़ उठाई है उसमें भी सोनिया इफेक्ट को साफ़ देखा जा सकता है . दिल्ली में विराजने वाले कई नेताओं , पत्रकारों को पता है कि  तेलंगाना विधानसभा चुनाव के पहले  जगन रेड्डी ने कांग्रेस के सहयोग की पहल की थी लेकिन राहुल गांधी की अन्यमनस्कता के कारण बात बनी नहीं .उनके करीबी लोगों के कहना है कि सोनिया गांधी के प्रति उनकी वही भावना अब भी है जो उनके स्वर्गीय पिता के समय में हुआ करती थी.

झारखण्ड चुनाव में मिली हार को बीजेपी के नेता भी  गंभीरता से ले  रहे हैं .उनको मालूम है कि यह ८१ सीटों की विधानसभा की इकलौती हार ही नहीं  है यह , हार का एक सिलसिला है  . अब  बीजेपी का  भ्रष्टाचार विरोध का नारा  बैक बर्नर पर आ गया है. हरियाणा में जिस  अजय चौटाला  के भ्रष्टाचार के विरोध में भाषण करके भ्रष्टाचार विरोध का माहौल बनाया  गया था उन्हीं के बेटे  के सहयोग से आज हरियाणा में पार्टी की सत्ता है . महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में उनके सहयोगी उद्धव ठाकरे ने  कांगेस का दामन थाम लिया है और शरद पवार जैसा राजनीति का आचार्य महाराष्ट्र की बीजेपी विरोधी  सरकार की रक्षा का  बीड़ा उठाये हुए है. सही बात यह है कि त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में ज़बरदस्त जीत के बार बीजेपी को किसी विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है . अभी दो साल पहले देश के ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकारें हुआ करती थीं लेकिन आज कर्णाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश  जैसे बड़े राज्यों के अलावा उनकी सरकार या तो छोटे राज्यों में है, या पूर्वोत्तर के राज्यों में . वहां भी असम और त्रिपुरा के अलावा उनकी सरकारें उन राज्यों में हैं  जहां उनकी राजनीतिक   मौजूदगी कोई ख़ास नहीं है . जोड़तोड़ कर बनाई गयी सरकारें हैं . पूर्वोत्तर के नेताओं की राजनीति का स्थाई भाव यह है कि जो भी केंद्र सरकार में सत्ता में रहता है ,   वहां के नेता उसी के साथ हो लेते हैं .

झारखण्ड के बाद दिल्ली विधानसभा का महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला है . दिल्ली  प्रदेश की सभी सातों लोकसभा सीटें  बीजेपी के पास हैं . अगर कैंटोनमेंट और नई दिल्ली नगरपालिका को मिला दिया जाए तो  दिल्ली में  पांच नगरपालिकाएं हैं  और सभी पर बीजेपी का नियंत्रण है. इसलिए साधारण तर्क बुद्धि के  हिसाब  से तो पार्टी को विधानसभा चुनाव भी जीत जाना  चाहिए लेकिन ऐसा  है नहीं.  २०१५ के विधानसभा चुनावों में भी यही स्थिति थी लेकिन बीजेपी को ७० सीटों की विधानसभा में केवल तीन सीटें मिलीं . इस बार भी दिल्ली की गरीब बस्तियों में मुख्यमंत्री अरविन्द  केजरीवाल के काम की चर्चा है . उनके स्वास्थय और शिक्षा के क्षेत्र में किये गए काम दिल्ली के कई इलाकों में उनके पक्ष में माहौल बना रहे हैं . बिजली और पानी के बिलों में पिछले कई वर्षों से हुयी कमी भी उनकी लोकप्रियता  बढ़ा रही हैं . इसलिए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को अरविन्द केजरीवाल के रूप में एक मज़बूत चुनौती मिलने की बात सभी कर रहे  हैं .दूसरी बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई की अंदरूनी लडाइयां भी हैं . हालांकि अमित शाह  ने मनोज तिवारी को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दिल्ली के पुराने गुटों को बराबर की  हैसियत में रखने की कोशिश की है लेकिन दिल्ली के पुराने नेता मनोज को अपना नेता ही नहीं मानते .पुराने  दिल्ली  वालों में  पुरबियों के प्रति जो एक अजीब सा भाव अभी कुछ साल पहले तक हुआ करता था ,  बीजेपी के ए  नेता , मनोज तिवारी को उसी भाव से देखते   हैं .  जबकि सच्चाई यह है , मनोज तिवारी का पूरे  प्रदेश के  एक वर्ग में सम्मान है . ज्यादातर इलाकों में यह वही वर्ग है जहाँ अरविन्द केजरीवाल की जीत की संभावना बताई जा रही है .लेकिन दिल्ली के स्थापित नेता तो मनोज तिवारी का वही हाल करने पर  आमादा  नज़र आ आ रहे हैं , जो इन लोगों ने कभी किरण बेदी का किया था. इसलिए दिल्ली की लड़ाई बीजेपी के लिए मुश्किल मानी जा रही है
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अगर दिल्ली विधानसभा में भी बीजेपी का वही  हाल हुआ जो  झारखण्ड में हुआ है तो निश्चित रूप से केंद्र में बीजेपी के विकल्प की बात चल निकलेगी .२०१४ के लोकसभा चुनावों के पहले अन्ना हजारे के प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के बाद जब अन्ना के सबसे महत्वपूर्ण शिष्य अरविन्द केजरीवाल ने आन्दोलन के प्रायोजकों की मर्जी के खिलाफ अपनी पार्टी बना ली तो देश में कांग्रेस की निश्चित हार के मद्देनजर  विकल्प की बात  शुरू हो गयी थी. अन्ना हजारे की रामलीला मैदान वाली लीला का आयोजन जिन लोगों ने किया था , उनकी इच्छा थी कि २०१४ के चुनाव में उस आन्दोलन वाले भी वैसा ही काम करें जैसा रामदेव ने किया लेकिन अरविन्द केजरीवाल तो वाराणसी सीट पर ही चुनौती देने पंहुंच  गए . उसके बाद राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कांग्रेस और  बीजेपी के विकल्प के  रूप में अरविन्द केजरीवाल को देखना शुरू कर दिया था .अन्ना आन्दोलन में देश के बेहतरीन लोगों का जमावड़ा था .  बाद में उनमें से ज्यादातर एक कहते  पाए गए कि उनको मालूम ही नहीं था कि अन्ना किसकी शह पर काम  कर रहे थे वरना वे उनके साथ न जाते .बाद में एक एक करके सभी चले गए .लेकिन अरविन्द केजरीवाल  अपने क़रीबी दोस्तों के साथ पार्टी में जमे रहे और दिल्ली   और पंजाब  में सम्मानजनक मुकाम बनाया .
अगर दिल्ली में  इस बार फिर अरविन्द केजरीवाल दुबारा  सरकार बनाने में सफल हो जाते हैं तो बीजेपी की जीत का जो रथ हरियाणा ,  महाराष्ट्र , झारखण्ड आदि राज्यों में रोका  गया है वह केंद्र की राजनीति में विकल्प की चर्चा को अवसर देगा और उस चर्चा के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम होंगें . 

बंटवारा एक दर्द है जिसको सियासत चमकाने के लिए नहीं कुरेदा जाना चाहिए



शेष नारायण सिंह

नागरिकता संशोधन एक्ट २०१९ पास हो गया , राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी , गज़ट में भी छप गया और अब वह कानून बन गया . लेकिन उसके बाद देश के  पूर्वोत्तर राज्यों में भारी उथल पुथल है . इस कानून से नाराज़गी है.  असम में आबादी का एक बड़ा हिस्सा बगावत की राह पर है . त्रिपुरा में इंटरनेट बंद कर दिया गया है और पूरे राज्य में निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी है.  विदेशों में भी चर्चा है . मौजूदा सरकार के दोस्त समझे जाने वाले अमरीका के धार्मिक आजादी से सम्बंधित कमीशन ने बयान जारी किया है  जिसके अनुसार ” नागरिकता संशोशन विधेयक गलत दिशा में एक खतरनाक मोड़ है . यह भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के बहुलतावाद के खिलाफ है . उस संविधान में धर्म के परवाह किये बिना सब को कानून की नज़र में बराबरी की गारंटी दी गयी है ."  अपने विदेश मंत्रालय  ने अमरीका से आये इस बयान  को गलत बताया है .भारत के पड़ोसी और दोस्त बंगलादेश की सरकार ने भी इस कानून पर एतराज किया है और अपना विरोध दर्ज कराने के लिए उनके दो मंत्रियों ने अपनी भारत यात्रा को रद्द कर दिया है . इस विधेयक में जो खामियां हैं उनपर तो संसद में और पूरे देश में बहस चल ही रही है लेकिन जो  असम और अन्य राज्यों में  विरोध है , लगता है कि सरकार को उसका अनुमान नहीं था.
  
इस कानून को पास करवाने  के लिए लोकसभा में हुयी बहस के दौरान भारत के १९४७ में हुए बंटवारे पर भी खूब  चर्चा हुयी . संसद में दोनों सदनों में गृहमंत्री पर गलतबयानी का आरोप लगाया गया.  जब उन्होंने लोकसभा में कहा कि ,' आपको मालूम है कि यह बिल लाना क्यों ज़रूरी है ? " उन्होंने जवाब भी खुद ही दिया और कहा कि ,' अगर कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा न  किया होता ,तो इस बिल को लाने की ज़रूरत ही न पड़ती . कांग्रेस ने देश को धार्मिक आधार पर विभाजित किया "  सदन में मौजूद कांग्रेस के शशि थरूर ने उनके इस दावे का ज़बरदस्त विरोध किया . उन्होंने कहा कि धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे का समर्थन जिन्नाह ने किया था . धार्मिक आधार पर  देश की स्थापना आइडिया ऑफ़ पाकिस्तान है जबकि आइडिया ऑफ़ इण्डिया में एक  ऐसे मुल्क का तसव्वुर किया गया था जिसका स्थाई भाव धार्मिक बहुलता होगी . इतिहास को मालूम है कि तत्कालीन  हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर ने  भी उसी टू नेशन सिद्धांत  का ज़बरदस्त समर्थन किया था . सावरकर ने अंग्रेजों की वफादारी के चक्कर में  १९३७ में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में पार्टी के अहमदाबाद अधिवेशन में  जोर देकर कहा था कि हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग अलग राष्ट्र ( Nation ) हैं .इसलिए अगर किसी को धार्मिक आधार पर बंटवारे  के लिए गुनहगार माना जाएगा तो उसमें मुहम्मद अली  जिन्ना और विनायक दामोदर सावरकर के नाम ही सरे-फेहरिस्त होंगे .यह भी सच है  कि कांग्रेस ने कभी भी धार्मिक आधार पर बंटवारे का समर्थन नहीं किया . पाकिस्तान की स्थापना का आधार धार्मिक था लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्षता ही राज्य का धर्म स्वीकार की गयी . संविधान की प्रस्तावना में साफ़ साफ़ लिखा  है कि  ," हमभारत के लोगभारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्नसमाजवादी ,पंथनिरपेक्ष , लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिएतथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक न्यायविचारअभिव्यक्तिविश्वासधर्म और उपासना की स्वतंत्रताप्रतिष्ठा और अवसर की समताप्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में,व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वालीबन्धुता बढ़ाने के लिए,दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमीसंवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृतअधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।भारत की  आज़ादी की लड़ाई की यही विरासत है ..
  
धार्मिक आधार पर बंटवारे के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराने की गृहमंत्री अमित शाह की  बात को उनकी पार्टी के सबसे बुज़ुर्ग नेता ,लाल कृष्ण आडवाणी के सहयोगी सुधीन्द्र  कुलकर्णी ने भी गलत बताया है .  उन्होंने तो बहुत ही आक्रामक भाषा में  ट्वीट किया और कहा कि संसद के इतिहास में किसी मंत्री ने इतना बड़ा सफ़ेद झूठ कभी नहीं बोला क्योंकि कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे की बात तो दूर इस विचार को स्वीकार भी नहीं किया . डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी लिखा है कि जिस जनसंघ ( बीजेपी का पूर्व अवतार ) के लोग अखंड भारत के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं उनके पूर्वजों ने मुस्लिम लीग और ब्रिटेन को भारत का बंटवारा करने में मदद पंहुचाई है . डॉ बी आर आंबेडकर ने भी कहा था कि जिन्नाह और सावरकर एक  दूसरे के खिलाफ बोलते हैं लेकिन दो राष्ट्र सिद्धांत के मामले में दोनों एक दूसरे के साथ हैं . इसलिए कांग्रेस को किसी कीमत पर  धार्मिक आधार पर बंटवारे का दोषी नहीं माना जा सकता है .

पता नहीं क्यों हमारे हुक्मरान  मुल्क के बंटवारे की बात को राजनीतिक स्वार्थ के लिए आज 72 साल बाद भी छेड़ते रहते हैं . पाकिस्तान की स्थापना भारत की एक बड़ी आबादी के लिए दर्द की एक तकलीफदेह कहानी  भी है . जहां तक  दक्षिण एशिया के मुसलमानों की बात है उनेक साथ तो हर  स्तर पर धोखा  हुआ है.  1947 के पहले के अविभाजित भारत में रहने वाले मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी. आखिर तकमुहम्मद अली जिन्ना ने यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान की सीमा कहाँ होगी. क्योंकि अगर वे सच्चाई बता देते तो अवध और पंजाब के ज़मींदार मुसलमान अपनी खेती बारी छोड़ने को तैयार न होते और पाकिस्तान की अवधारणा ही खटाई में पड़ जाती. पाकिस्तान का बनना एक ऐसी राजनीतिक चाल थी जिसने आम आदमी को हक्का-बक्का छोड़ दिया था. इसके पहले कि उस वक़्त के भारत की जनता यह तय कर पाती कि उसके साथ क्या हुआ हैअंग्रेजों की शातिराना राजनीति और कांग्रेस और जिन्नाह वाली मुस्लिम लीग के  नेताओं की अदूरदर्शिता का नतीजा था कि अंग्रेजों की पसंद के हिसाब से मुल्क बँट गया.  मुसलामनों ने बंटवारे का दर्द सबसे ज़्यादा झेला है क्योंकि  हिन्दू और  सिख तो अपने परिवारों के साथ भारत आ गए लेकिन मुसलमानों के तो परिवार ही बंट गए .इस मजमून का उद्देश्य उस दर्द को और बढ़ाना नहीं है. हाँ यह याद करना ज़रूरी है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चाहे जो हो, 1947 के बाद सरहद के इस पार बहुत सारे मुसलमानों के घरों के आँगन में पाकिस्तान बन गया है और वह अभी तक तकलीफ देता है . दुनिया मानती है कि 1947 में भारत का विभाजन एक गलत फैसला था . बाद में तो बँटवारे के सबसे बड़े मसीहामुहम्मद अली जिन्ना भी मानने लगे थे कि पाकिस्तान बनवाकर उन्होंने गलती की ..विख्यात इतिहासकार अलेक्स वोन टुंजेलमान ने अपनी किताब , " इन्डियन समर, : द सीक्रेट हिस्टरी ऑफ़ द एंड ऑफ़ ऐन एम्पायर (Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire.) "  में लिखा  है कि अपने आखिरी वक्त में जिन्ना ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से कहा था कि पाकिस्तान बनाना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी है। अगर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल से कह दूंगा कि गलतियां भूल जाओ और हम फिर से दोस्तों की तरह रहें.  लेकिन यह मौक़ा कभी नहीं मिला . वैसे भी पछताने से इतिहास के फैसले नहीं बदलते ..

जब जिन्नाह ने आवाहन किया कि पाकिस्तान में मुसलमानों को नौकरी दी जायेगी तो नौकरी की लालच में उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों से नौजवान कराची चले गए थे .यहाँ उनका भरा पूरा परिवार था लेकिन बंटवारे के पूरी तरह से लागू हो जाने के बाद वे लोग वहां से कभी लौट नहीं पाए . उनके घर वालों ने वर्षों के इंतज़ार के बाद अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया लेकिन उसकी तकलीफ अब तक है..आज भी जब कोई बेटीजो पाकिस्तान में बसे अपने परिवार के लोगों में ब्याह दी जाती है जब भारत मायके आती है तो उसकी माँ उसके घर आने की खुशी का इस डर के मारे नहीं इज़हार कर पाती कि बच्ची एक दिन चली जायेगी. और वह बीमार हो जाती है . उसी बीमार माँ की बात वास्तव में असली बात है . नेताओं को शौक़ है तो वे भारत और पाकिस्तान बनाए रखेंराज करें ,सार्वजनिक संपत्ति की लूट करेंजो चाहे करें लेकिन दोनों ही मुल्कों के आम आदमी को आपस में मिलने जुलने की आज़ादी तो दें. अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान और हिन्दुतान सरहद पर तो होगा संयुक्त राष्ट्र में होगाकामनवेल्थ में होगा लेकिन हमारे मुल्क के बहुत सारे आंगनों में जो पाकिस्तान बन गया है वह ध्वस्त हो जाएगा.फिर कोई माँ इसलिए नहीं बीमार होगी कि उसकी पाकिस्तान में ब्याही बेटी वापस चली जायेगी . वह माँ जब चाहेगी ,अपनी बेटी से मिल सकेगी. इसलिए  राजनेताओं से गुजारिश की जानी चाहिए कि राजनीतिक प्वाइंट बनाने के लिए  बंटवारे के घाव को बार बार न  कुरेदें .

Wednesday, December 25, 2019

दिलीप कुमार , एक ऐसा दोस्त जिसका जाना अब भी तकलीफ का अम्बार है .




शेष नारायण सिंह

दिसंबर का दूसरा पाख . साल का यह समय १९९७ तक तो ठीक रहता था लेकिन उसके बाद एक अजीब सी दहशत पैदा कर जाता है .अभी कल एक खगोलविद से बात हो रही थी. वे सड़क छाप ज्योतिषी नहीं हैं, विद्वान व्यक्ति हैं . आसमान के तारों के बारे में खगोलशास्त्रीय वैज्ञानिक जानकारी रखते हैं . उस आधार पर बता रहे थे कि इस साल दिसंबर के अंत में दुनिया में कहीं न कहीं अनहोनी घटनाएँ हो सकती हैं .  २७  दिसंबर के सूर्यास्त के दिन जो होगा वह तारों और  ब्रह्माण्ड का अध्ययन करने वालों को अजीब स्थिति में डाल चुका है क्योंकि विज्ञान के अब तक के ज्ञात इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ  है . २७ दिसंबर को ही तो मेरे बहुत अज़ीज़ दोस्त , दिलीप कुमार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. इसी  तारीख को १९९७ में  एक ऐसे ही  दिसंबर में मैंने अपना बहुत करीबी दोस्त खो दिया था . उसके छः साल बाद २३  दिसंबर को मेरी माँ चली गयी थीं. इसलिए दिसम्बर की किसी अनहोनी भविष्यवाणी से मैं डर जाता हूँ . हालांकि मैं ज्योतिष की भविष्यवाणी का विश्वास नहीं करता लेकिन जबसे मृत्युंजय शर्मा की कुछ भविष्यवाणियां बिलकुल सही पाई गयी  हैं तब से उनकी बातों को मैं बहुत ही गंभीरता से लेने लगा  हूँ.
१९९७ में मैंने NDTV नामक टीवी ख़बरों के लिए  समाचार बनाने वाले संगठन में काम शुरू कर दिया था . रिपोर्टिंग की दुनिया से बाहर हो गया था क्योंकि वहां मेरा काम डेस्क का था. इसलिए प्रेस क्लब , आईएनएस बिल्डिंग, पार्लियामेंट, कांग्रेस या अन्य पार्टियों के मुख्यालयों में जाना  बंद हो चुका था . आठ-दस घंटे टेलिविज़न के न्यूजरूम में खटने के बाद कहीं और जाने का मन नहीं कहता था .  कोई ज़रूरत भी नहीं थी.  २७ दिसम्बर १९९७ को शनिवार था  लिहाजा घर पर आराम कर रहा था . उस वक़्त के हम लोगों के दोस्त अली साहब का फोन आया और जो कुछ उन्होंने फोन पर बताया उसके बाद मेरी  आँखों के सामने  अँधेरा छा गया .उन्होंने बताया कि हमारे दोस्त दिलीप कुमार नहीं रहे. मैं सन्नाटे में आ गया . समझ में नहीं आ रहा था कि  क्या हो गया . बहरहाल अपनी पत्नी को बताया और यह निवेदन करके कि अभी बच्चों को न बताएं ,   मैं दिलीप के घर  के लिए रवाना हो गया .पुष्प विहार की सरकारी कालोनी से मुनीरका डीडीए फ्लैट की दूरी यही कोई आठ किलोमीटर की होगी लेकिन मुझे लगा कि इतनी लम्बी दूरी मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं तय की .  वहां पंहुंच कर देखा तो कोहराम मचा हुआ था .  वहां से हम दिलीप कुमार के शरीर को लेकर लोधी रोड के श्मशान पंहुचे . वहां पर भी जो भी था सब सन्नाटे में ही था . अपनी मृत्यु के पहले काफी समय से दिलीप कुमार किसी अखबार आदि में नहीं थे इसलिए जो लोग किसी के अंतिम संस्कार में  हाजिरी लगाने आते है , वे वहां नहीं थे. जो भी वहां आया था ,दिलीप का दोस्त था और गुमसुम था .किसी अपने ख़ास के चले जाने की  जो तकलीफ होती है , वह सब के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी.
दिलीप कुमार का जाना मेरे लिए बहुत बड़ा हादसा था  लेकिन मैं उसको स्वीकार नहीं कर पा रहा था , आज भी नहीं स्वीकार कर पाया हूं.. उनके परिवार पर वह दिन वज्रपात जैसा था. अपने भाई अनूप को दिलीप जान से बढ़कर मानते थे. उनकी बहन आशा तो उनकी बेटी ही थी. जब दिल्ली में दिलीप कुमार से मेरी मुलाक़ात हुई थी तो उनके घर एक बेटी का जन्म हुआ था . कई बार मुझे लगता है कि अपनी नवजात बेटी से ज़्यादा वे  बहन आशा को मानते थे . उत्तर प्रदेश के बहराइच  शहर में उनका बचपन बीता था.  जब बहुत ही छोटे थे तभी माता पिता , एक के बाद एक  स्वर्गवासी हो गए . दोनों छोटे भाई बहनों को संभालने का ज़िम्मा दिलीप पर आ गया और उसको उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी  से निभाया .  खुद भी पढाई करते रहे और अनूप और आशा को भी पढ़ाते रहे .  भाई ने बी कॉम किया , बाद में एल एल बी भी किया . आजकल हिंदी में कानूनी पत्रकारिता का चोटी का जानकार है .बहन आशा ने दिल्ली के विख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम ए  किया .दोनों का शादी व्याह दिलीप कुमार ने जिस तरह से किया उससे लगता था कि कोई बाप अपने बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य की  तजवीज कर रहा है . बहरहाल भाई बहन  अपने अपने घरों में अपनी ज़िंदगी अपने अपने तरीके से जी रहे हैं.

जब  दिलीप की मृत्यु हुई तो उनके अपने दोनों बच्चे साकेत स्थित ज्ञान भारती स्कूल में बारहवीं में पढ़ते थे .उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद ही उनके दोनों बच्चों के प्री बोर्ड इम्तिहान होने वाले थे .  उन बच्चों पर क्या गुज़र रही थी , उसका अनुमान लगा सकना मेरे लिए बिलकुल मुमकिन नहीं है.  उनके भाई अनूप भटनागर  को देखकर लगता था कि उसका सब कुछ लुट  चुका था.  दिलीप के शरीर को जब वाहन पर रखा गया तो उनकी पत्नी ने जिस तरह से उनको  अंतिम विदा दी , वह  दृश्य मुझे हमेशा ही याद रहता है. शरीर गाडी में रखा जा चुका था और उन्होंने कुछ काले ,कुछ सफ़ेद हो रहे घने बालों  को जिस तरह से चूमा था, वह एक ऐसा मंज़र था जिसको देखकर सर्वस्व लुट जाने के किसी दर्दनाक   सच्चाई का तसव्वुर किया जा सकता है . .इस बात में दो राय नहीं है कि अभाव में जीते हुए अपने भाई-बहन और बच्चों उन्होंने एक शानदार ज़िंदगी देने की कोशिश की थी . आज के ज़माने में इस तरह का अपनापन देखने को मिलता तो  है लेकिन बहुत कम ऐसे लोग हैं .
हिंदी और रामचरित मानस के बड़े विद्वान स्व. लल्लन प्रसाद व्यास की बेटी मंजू व्यास से दिलीप कुमार ने प्रेम विवाह किया था . उत्तर प्रदेश के बनारस में गुजराती ब्राह्मणों की ठीक ठाक आबादी है . कुछ बहराइच में भी थी . वर्ण व्यवस्था के ऊपरी पायदान पर विराजने वाले इन गुजराती ब्राह्मणों में उन दिनों  गुजराती मूल के ही लोगों में शादी व्याह का रिवाज़ था . दिलीप कुमार ब्राह्मण नहीं थे लेकिन उन्होंने जाति और वर्ण प्रथा की फौलादी दीवार को तोडा . अपनी प्रियतमा को  पत्नी के रूप में स्थापित करने के  लिए खासी मशक्क़त की ,पापड़ बेले और शादी की .  

दिलीप कुमार को गुस्सा नहीं आता था या  आता रहा  होगा तो मैंने नहीं देखा . मुझसे उनका रिश्ता बहुत ही बराबरी का था . हिंदी के कई बड़े अखबारों में उन्होंने काम किया था. दैनिक जागरण और अमर उजाला के दिल्ली संवाददाता के रूप में इज्ज़त  कमाई थी . १९८९ में जब उदयन शर्मा ने हिंदी ऑब्ज़र्वर को नए सिरे से शुरू किया तो हिंदी के कुछ बहुत अच्छे पत्रकारों की टीम बनाई थी . उसमें दिलीप कुमार भी थे.  राजनीतिक संवाददाता के रूप में उन्होंने बहुत ही नाम कमाया . दिलीप के साथ ही दिल्ली के सत्ता के गलियारों में काम कारने वाले कई सूरमा पत्रकार आज बड़ी संपत्ति के मालिक हैं  लेकिन  बहराइच से आया हुआ यह फकीर  कम से कम में ही  ज़िंदगी जीता रहा . अपने ऊपर और अपनी पत्नी के ऊपर पड़ने वाली तकलीफों को कभी अपनी सधुक्कड़ी में रोड़ा नहीं बनने दिया . मेरे जिले की अमेठी  तहसील ( अब जिला ) के सांसद और देश के प्रधानमंत्री ,स्व राजीव गांधी से बहुत ही गंभीरता से बात करते मैंने दिलीप को कई बार देखा  है . लेकिन उसने उनसे कभी कोई लाभ नहीं लिया . करीब छियालीस  साल की उम्र में उनका देहान्त हुआ लेकिन तब तक उनके पास पूरे देश में कहीं कोई घर या ठिकाना नहीं था. उनके भाई अनूप भटनागर की शादी  १९९५ में हुई थी. उसके बाद दिलीप ने उनको अपनी पत्नी के साथ कम्प्लीट ज़िंदगी जीने का  स्पेस देने की बात मुझसे कई बार की थी . तब तक अनूप के पास अच्छी नौकरी थी . दिलीप खुद भी एक अच्छे अखबार में काम करते थे . भाई को  किराये के अच्छे फ़्लैट में शिफ्ट करने के बाद उसके  चेहरे पर जो संतुष्टि का भाव था , वह मुझे हमेशा याद रहेगा . भाई का बेटा,  अक्षत जब  पैदा हुआ तो ऐसा लगता था दिलीप कुमार को जैसे दुनिया मिल गयी हो.
मेरे लिए दिलीप का जाना एक ऐसी खाली जगह है जो मैं अभी तक नहीं भर पाया हूं. दिलीप की मृत्यु के कुछ दिन बाद तक मुझे  समझ में ही नहीं आता था कि क्या करूं. उनकी प्रेस क्लब में आयोजित शोक सभा में मैं नहीं गया . मैं दिलीप का  शोक मानाने के लिए तैयार नहीं था . मैंने अनूप , उनकी भाभी ,उनके बच्चों से मिलने की हिम्मत जुटाने में  बहुत समय लगा दिया . जिस समय वे  गए थे , वह समय हम जैसे सभी लोगों के लिए अपने बच्चों  और रोज़गार को संभाले रखने के लिहाज से कठिन दौर था . हमारी मुलाकातें बहुत कम होती थीं . लेकिन अपनापन था , खूब था . जब  कई महीने मैं अनूप से नहीं मिला तो अनूप कुमार एक दिन मेरे घर आये और मुझसे कहा कि , " भइया  आप यह बताइए कि मैं कैसे  संभला हुआ   हूं. अब तो वे गए और आपको यह बात स्वीकार करना पडेगा कि आपके दोस्त अब दुनिया में नहीं है " . उसके बाद से दिलीप कुमार की मृत्यु मेरे लिए एक   वास्तविकता है और उनके बच्चे , उनका भाई , उनका परिवार मेरा अपना परिवार जैसा है .  हालांकि यह भी सच है कि एक दोस्त के लिए अपने स्वर्गीय दोस्त की बात कर पाना बहुत मुश्किल है लेकिन जिस तरह से उनकी पत्नी ने दिन रात मेहनत करके ,  ट्यूशन करके  , अनुवाद का काम करके अपने बच्चों को सफलता के मुकाम तक पंहुचने के अवसर दिए ,वह बहुत ही सम्मान और गर्व का विषय है . उनकी बेटी बहुत छोटी थी लेकिन उसने अपनी मां को कभी अकेला नहीं महसूस होने दिया . बेटा दिन रात काम करके अपनी मां को वही रूतबा देता है जो  दिलीप के  होने पर मिलता. दिलीप की मृत्यु के बाद नोयडा में किश्तों पर एक एल आई जी फ़्लैट एलाट हो गया  था , उसी को बेचकर बेटे और मां ने एक उच्च मध्यवर्गीय सोसाइटी में  फ़्लैट ले लिया है . दोनों बच्चों में मां को साथ रखने को लेकर कभी कभी  लड़ाई भी हो जाती है . बिटिया लंदन  में रहती है . उसकी ज़िंदगी बहुत ही पुरसुकून है . बीबीसी के पत्रकार के रूप में उसका बहुत नाम है . बेटा एक विदेशी कंपनी में प्रबंधक है . उनकी मां नोयडा और लन्दन के बीच में आती जाती रहती हैं .
अब सब कुछ  ठीक है लेकिन पता नहीं क्यों हर साल  दिसम्बर के अंतिम दिनों में दिलीप कुमार की याद मुझे अकेला छोड़ देती है . दिलीप की याद मेरे लिए भलमनसाहत की एक थाती है .


झारखण्ड के नतीजे बीजेपी के लिए खतरे की घंटी , कांग्रेस के लिए आशा की किरण




शेष नारायण सिंह


झारखण्ड विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति की  दिशा बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दिशा दे दी है .सत्ताधारी बीजेपी के लिए झारखण्ड में मिली हार का भावार्थ बहुत ही अहम  है . हालांकि इसी साल हुए लोकसभा चुनावों में इसी झारखण्ड राज्य से बीजेपी को ज़बरदस्त सफलता मिली थी लेकिन विधानसभा चुनाव में उसकी हार उससे भी ज्यादा ज़बरदस्त है .मुख्यमंत्री , विधानसभा  अध्यक्ष और पार्टी के अध्यक्ष को उनकी अपनी सीट पर बड़ी हार का सामना करना पड़ा है .हालांकि पार्टी के शुभचिन्तक यह दावा करते पाए जा रहे हैं कि विजयी गठबंधन की तुलना में  उनके मत प्रतिशत में कोई ख़ास  कमी नहीं आयी है . सबको मालूम है कि दिल को  बहलाने को यह ख्याल अच्छा हो सकता  है लेकिन यह  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के लिए यह बहुत ही दुखद सन्देश है . सबको मालूम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपने  नए चुनावजीतू हथियार, कश्मीर में  अनुच्छेद ३७० का खात्मा और नागरिकता संशोधन कानून लेकर उतरे थे . खूब जमकर प्रचार किया था . दोनों बड़े नेताओं ने मिलकर करीब २० सभाएं की थीं, चुनाव आयोग की तरफ से भी कृपा बरसी थी क्योंकि झारखण्ड जैसे छोटे राज्य में लगभग आधे दर्जन चरणों में चुनाव की घोषणा करके प्रधानमंत्री की हर सभा को वफादार टीवी चैनलों पर लाइव प्रसारित किये जाने का अवसर दिया  गया था . मुराद यह कि प्रधानमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष का सन्देश राज्य ही नहीं देश के कोने कोने तक पंहुचाया गया था . इतना ही नहीं , बीजेपी विरोधी वोटों को तितर बितर करने के लिए अपने वफादार सहयोगियों , राम विलास पासवान , सुदेश महतो , नीतीश कुमार और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टियों को बीजेपी उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा गया था . पन्ना प्रमुखों की फ़ौज को पूरी तरह से सक्रिय किया गया था .  मुस्लिम विरोधी विमर्श को  प्रमुखता से   मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक बहस में लाया  गया था . चाकर पत्रकारों की मदद से  टीवी चैनलों के डिबेट के ज़रिये भी एजेंडा  को सेट करने की कोशिश की  गयी थी . कुछ जाहिल किस्म के मुसलमानों को टीवी डिबेट में गाली खाने के लिए तैयार करके चुनाव को  हिन्दू-मुस्लिम बनाने की भी पूरी कोशिश की गयी थी. यानी झारखण्ड चुनाव जीतने के लिए हर तिकड़म अपनाई गयी थी लेकिन बीजेपी को झारखण्ड विधानसभा चुनाव में  निर्णायक हार का सामना करना पड़ा . झारखण्ड की हार का  सन्देश बहुत दूर तक जाने वाला है . २०१९ में नरेंद्र मोदी की  भारी जीत के बाद  राज्यों के चुनावों में यह बीजेपी की करारी हार है . हालांकि  लगभग साल भर पहले , उड़ीसा, तेलंगाना ,आंध्र प्रदेश ,मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी पार्टी की हार हुयी थी लेकिन पार्टी के प्रवक्ता उसको उतनी बड़ी हार  मानाने को तैयार नहीं होते थे क्योंकि उसके बाद ही हुए लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को उन्हीं राज्यों में ज़बरदस्त सफलता मिली थी . अन्य बातों के अलावा बालाकोट के असर ने चौतरफा जीत का डंका बजा दिया था. लेकिन २०१९ की मोदी की जीत के बाद महाराष्ट्र में सरकार गंवाना , हरियाणा में चौटाला परिवार के सामने घुटने टेकना जैसे कारनामों से पार्टी के   नेतृत्व को बहुत खुशी नहीं हुयी है  .सब के ऊपर झारखण्ड में अपमानजनक हार ने  बीजेपी को वह आइना दिखा दिया है जिसको पार्टी  कभी नहीं देखना चाहती. हालांकि पार्टी के सबसे बड़े नेताओं ने हार स्वीकार कर ली है और हेमंत सोरेन को बधाई भी दे  दी है लेकिन मीडिया में मौजूद बीजेपी के वफादार कारिंदे अभी भी मत प्रतिशत और कांग्रेस की घटती चुनावी हैसियत के ज़रिये दिलासा देने के काम में लगे हुए  हैं .
झारखंड चुनाव में बीजेपी की हार के बहुत  सारे कारण होंगे लेकिन उनके सबसे बड़े मददगार का चुनावी सीन से  गैरहाजिर रहना भी एक बड़ा फैक्टर है .राहुल गांधी का बीजेपी के चुनावी विमर्श को धार देने में पिछले छः वर्षों में बड़ा योगदान रहा है . जयपुर चिंतन बैठक के दौरान २४ अकबर रोड के उस वक़्त के प्रभावशाली और चाटुकार कांग्रेसियों ने उनको पार्टी का उपाध्यक्ष बनवाया था . उसके बाद से उनके सुभाषितों को बीजेपी के प्रवक्ता और नेता इस्तेमाल करते रहे हैं . तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने 'शहजादे' शब्द का जितना उपयोग किया वह राजनीतिशास्त्र के विद्याथियों के लिए  सन्दर्भ का  विषय है . उसके बाद से वे बीजेपी की तरफ से आयी हर गुगली पर शॉट लगाते रहे और अपनी पार्टी को लगातार कमज़ोर करते रहे .  हर बात पर प्रतिक्रिया देना और उलटे सीधे चुनावी समझौते करना , अजीबोगरीब लोगों को हरियाणा  और मुंबई शहर में पार्टी का इंचार्ज बनाना उनके कुछ ऐसे  कारनामे हैं जो कांग्रेस को बड़ी चोट दे  गए हैं . जिस आदमी को उन्होंने हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया था ,बाद में वही उनकी पार्टी का  दुश्मन बना . अपने कार्यकाल में उसने राज्य के बड़े  कांग्रेसी नेता , भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को अपमानित करने की कई बार कोशिश की . जानकार बताते हैं कि अगर सोनिया गांधी ने हुड्डा को कांग्रेस का  चार्ज न दिया होता तो वह राहुल गांधी वाला पहलवान तो खट्टर सरकार को कांग्रेस में रहते हुए भारी बहुमत से जिताता .  यह भी कहा जाता है कि  अगर हुड्डा को छः महीने का और समय मिला होता तो आज  हरियाणा की तस्वीर कुछ और होती . राहुल गांधी के मुंबई कांग्रेस वाले चेलों ने महानगर से उत्तर भारतीयों, दलितों और अल्पसंख्यकों को कांग्रेस से  दूर कर दिया . सभी जानते हैं कि मुंबई में कांग्रेस की जीत में इन्हीं तीन वर्गों का योगदान ऐतिहासिक रूप  से हुआ कारता था. इन वर्गों के किनारा करने के बाद का नतीजा दुनिया के सामने है . दरअसल हर बात पर कुछ न कुछ टिप्पणी करके राहुल  गांधी ने कांग्रेस का बहुत नुक्सान पंहुचाया है . जबकि सोनिया गांधी उतना ही बोलती हैं जो ज़रूरी होता है . लोकसभा चुनावों में  हार के बाद जब राहुल गांधी ने  पार्टी के अध्यक्ष पद से तौबा की तो सोनिया  गांधी ने एक बार फिर नेतृव संभाला . उसके बाद हरियाणा में पार्टी का नेतृत्व मज़बूत हुआ ,  बड़े समझौते किए गए और  महाराष्ट्र जैसे  महत्वपूर्ण राज्य से बीजेपी को सरकार से दूर रखने में सफल हुईं . उन्होंने  झारखण्ड में बीजेपी की पराजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .

झारखण्ड में कांग्रेस के बेहतर नतीजों के लिए केवल सोनिया गांधी की राजनीतिक सूझबूझ को ही ज़िम्मेदार माना जाएगा . उन्होंने आर पी एन सिंह को झारखण्ड में अपना प्रतिनिधि तय किया और उनको अधिकार दिया .  आरपी एन  सिंह ने भी चुनाव  प्रबंधन की अमित शाह शैली को अपनाया . वहीं झारखण्ड में जाकर चालीस दिनों के लिए अपने आपको स्थापित कर दिया . अमित शाह की भी यही शैली है .२०१४ के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदश के प्रभारी महासचिव  के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई शहरों में अपना घर बना लिया था. बीजेपी के तमाम बड़े नेता दरकिनार कर दिए गए थे और नए नेता सामने आये थे  . वे  नए नेता आज  संसद और विधानसभाओं में विराजते हैं. उसी तरह आर पी एन सिंह ने भी झारखण्ड की कमान संभालने के बाद वहां के  मीडिया में चचित कांग्रेसियों को एक कोने में कर दिया और मुकामी प्रभावशाली नेताओं को साथ लिया . सबसे बड़ा काम जो उन्होंने किया वह आर जे डी और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बीच ताल मेल बैठाये रहे . कांग्रेस को वहां १६ सीटें मिली हैं . इतनी सीटें  पार्टी को १९ वर्षों में कभी नहीं मिली थीं.  ज़ाहिर है सोनिया गांधी की राजनीतिक कुशलता के कारण ही आज बीजेपी को  झारखण्ड में पैदल होना  पड़ा है .
सोनिया गांधी को हमने १९९८ में कांग्रेस पार्टी का काम सँभालते देखा है. सीताराम केसरी पार्टी के   अध्यक्ष थे , हटने के लिए तैयार नहीं  थे लेकिन प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में एक योजना बनाई गयी और केसरी जी को कांग्रेस  मुख्यालय से  बाहर का  रास्ता दिखा  दिया गया . उसके बाद सोनिया गांधी ने लगातार काम किया .   तरह तरह के गठबन्धन बनाए और अटल बिहारी   वाजपेयी और उनके मुख्य रणनीतिकार प्रमोद महाजन के इण्डिया शाइनिंग के सपने को सत्ता से  बेदखल करके डॉ मनमोहन  सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया . देश की खस्ताहाल हो चुकी अर्थव्यवस्था को डॉ मनमोहन सिंह पटरी पर लाये  और देश में खुशहाली का माहौल पैदा हुआ .अज उन्हीं सोनिया गांधी के हाथ में कांग्रेस की सत्ता की कमान है . जानकार बताते हैं कि अगर आज राहुल गांधी कांग्रेस के फैसले कर रहे होते तो शिवसेना के साथ कभी न जाते और महाराष्ट्र में  उनकी पार्टी के विधायकों की मदद से ही बीजेपी की  सरकार बन गयी होती. जिस तरह से टीवी चैनलों की  बहसों में कांग्रेस के ऊपर धर्मनिरपेक्षता को भूल जाने के  आरोप लग रहे थे  और नेहरू की राजनीति को भिला देने के ताने मारे जा रहे थे ,वह राहुल गांधी को कभी बर्दाश्त न होते  और वे शिवसेना से गठबंधन के विचार को अपनी पार्टी में न  आने देते . झारखण्ड में भी दिल्ली में  बैठे उनके सलाहकार  संभालते और आज वहां कांग्रेस एकाध सीट जीतकर उत्तर प्रदेश की दुर्दशा को प्राप्त हो चुकी होती . लेकिन सोनिया गांधी ने तिनका तिनका जोड़कर कांग्रेस को फिर से ताकत देने की  कोशिश शुरू कर दी है . अगर अगले कुछ चुनावों तक राहुल गांधी ने उनको फैसले लेने दिया तो कांग्रेस को भविष्य में भी चुनावी लाभ मिलता रह सकता  है .