Wednesday, October 21, 2020

पाकिस्तान में गृहयुद्ध के हालात बन रहे हैं


 

शेष नारायण सिंह

 

पाकिस्तान की हालात दिन ब दिन खराब होते जा रहे हैं . लगने लगा है कि वहां गृह युद्ध  जैसी स्थिति पैदा होने वाली है .18 अक्टूबर के दिन  सेना ने कराची पुलिस के आई जी, मुश्ताक महार  को अगवा करके जिस तरह से परेशान किया उसके बाद तो ऐसा लगा कि सेना और  पुलिस आमने सामने आ गए हैं .कराची पुलिस ने आरोप लगाया कि  पाकिस्तानी फौज के अफसरों ने उनके आई जी को गिरफ्तार किया और पता नहीं कहाँ ले गए . बाद में पता चला कि उनके ऊपर तरह तरह के दबाव डाले गए कि कराची शहर में प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ होने वाली रैली में शामिल हो रही नवाज़ शरीफ की पार्टी की उपधाक्ष मरियम नवाज़ को  गिरफ्तार कर लिया जाए.  पाकिस्तान में वहां की फौज का हुक्म न मानने वाला बहुत बड़ी मुसीबत में पड़ सकता  है . पुलिस के आला अफसर के साथ वही हुआ. नाराज़ होकर उन्होंने छुट्टी की दरखास्त  दे दी . उनके साथ ही पुलिस के कई बड़े  अफसरों ने छुट्टी की लिए अर्जी लगा दी . कराची  देश का सबसे बड़ा व्यापारिक शहर है  .वह सिंध की राजधानी भी है . सिंध में पिछले दस साल से इमरान खान की विरोधी पार्टी  पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पी पी पी ) की सरकार है .यह पार्टी पाकिस्तान के  पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली  भुट्टो के खानदान की राजनीतिक मिलकियत है . इसी पार्टी के बैनर  तले वे खुद प्रधानमंत्री बने थे . बाद में उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो भी प्रधानमंत्री बनीं . उनके पति भी कुछ समय तक  सत्ता के मालिक रहे . आजकल पार्टी पर बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल ज़रदारी का  क़ब्ज़ा है .

पी पी पी और नवाज़ शरीफ की खानदानी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़ ) एक  दूसरे के राजनीतिक विरोधी हैं लेकिन इमरान खान जिस तरह से फौज के हुक्म के गुलाम बन गए हैं उससे पाकिस्तानी अवाम में बहुत नाराजगी है . उसी नाराज़गी को भुनाने की गरज से बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ की खानदानी पार्टियां एक मंच पर हैं . उनके साथ ही पाकिस्तानी मुल्ला तंत्र की कुछ पार्टियां भी शामिल हैं . इमरान खां सरकार ने मुल्क की जो आर्थिक हालत बना  रखी है ,उसके चलते देश में बहुत नाराज़गी है . अब पाकिस्तान को  किसी देश से क़र्ज़ मिलने की उम्मीद बहुत कम हो गयी है . चीन से  दोस्ती के चक्कर में अमरीका से भी रिश्ते खराब हो गये हैं . नतीजा यह हुआ है कि एकजुट विपक्ष ने पाकिस्तान की सडकों को आबाद कर दिया है लेकिन प्रधानमंत्री इमरान खान भी जमे हुए हैं क्योंकि उनको फौज का पूरा सहयोग मिल रहा है .  विपक्ष की पार्टियों ने इकट्ठा होकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट ( पी डी एम ) नाम का एक  फ्रंट बना लिया है जिसमे देश की दोनों बड़ी विपक्षी पार्टियों की मुख्य भूमिका है लेकिन उसका अध्यक्ष जमियत उलेमा ए  इस्लाम ( एफ ) के मुखिया मौलाना फ़ज़लुर्रहमान को बनाया  गया  है . पी डी एम का उद्देश्य इमरान खान की भ्रष्ट सरकार को  उखाड़ फेंकना  है . उसके बाद सभी पार्टियां चुनाव लड़ेंगी .कराची की विशाल सभा में पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़ ) की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ ने ऐलान किया कि जब भी चुनाव  होगा तो पी डी एम में शामिल पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ मैदान में होंगी.

पी डी एम ने पाकिस्तानी शहर गुजरांवाला और कराची में ज़बरदस्त सभाएं करके अपने उद्देश्य का ज़बरदस्त तरीके से ऐलान कर दिया है . 25 अक्टूबर को क्वेटा में उनकी अगली रैली है. खबरें आ रही हैं कि फौज का धीरज अब जवाब देने लगा  है . कराची में पुलिस के आई जी मुश्ताक महार को अगवा करके फौज ने साफ़ सन्देश दे दिया है कि वह किसी भी हद तक जा सकती है . खबरें आ रही हैं कि क्वेटा की रैली में पी डी एम की सबसे  प्रभावशाली नेता और  पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ पर जानलेवा हमला भी किया  जा सकता है . फौज को भरोसा  है कि जिस तरह उस दौर की विपक्षी नेता बेनजीर भुट्टों को मारकर उन्होंने अपने तत्कालीन चेले नवाज़ शरीफ के लिए रास्ता साफ़ कर लिया था , उसी तरह  विपक्ष की सबसे मज़बूत नेता  और नवाज़ शरीफ की बेटी , मरियम नवाज़ को मार कर अपने कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान को बचा लेंगे . बेनजीर भुट्टो को मारकर  फौज ने उस वक़्त की विपक्ष की योजना को कमज़ोर कर दिया था . इस बार भी सूत्रों का दावा है कि मरियम नवाज़ की ह्त्या करके भारत को ज़िम्मेदार ठहराने की कोशिश की जायेगी .बलूचिस्तान में चल  रहे आज़ादी के आन्दोलन को भी लपेटने की योजना है .

नवाज़ शरीफ ने गुजरांवाला की  रैली को संबोधित किया था लेकिन कराची में उनका भाषण नहीं  कराया गया . वे लंदन में फरारी का जीवन काट रहे हैं  पाकिस्तान में उनकी गिरफ्तारी का  डर है इसलिए वे खुद पाकिस्तान नहीं आ सकते इसलिए उनका भाषण  वर्चुअल तरीके से कराया जाता है . इमकान है कि क्वेटा की रैली में भी नवाज़ शरीफ  की तक़रीर होगी और इमरान खान की पी टी आई सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील कौम से की जायेगी .अजीब बात यह  है  विपक्ष को सरकार इमरान खान की हटानी है लेकिन नवाज़ शरीफ के वर्चुअल भाषण के हमले के निशाने पर पाकिस्तानी फ़ौज के मौजूदा प्रमुख कमर जावेद बाजवा थे . ऐसा पहली बार हो रहा है कि  पाकिस्तान में किसी सर्विंग आर्मी चीफ के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोला गया  है . इसके पहले उन जनरलों को निशाना बनाया जाता था जो  सत्ता पर सिविलियन सरकार को बेदखल करके कब्ज़ा जमाये रहते थे .इसका कारण शायद यह है कि अब पाकिस्तान में बच्चे बच्चे को मालूम है कि सिविलियन प्रधानमंत्री तो जनरल बाजवा के हुक्म की तामील करने के लिए सत्ता पर काबिज़ है .सेना प्रमुख को सीधे निशाने पर लेने की कीमत भी ज़्यादा होगी . अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए  पाकिस्तानी फौज किसी भी नेता को कुर्बान कर सकती है .नवाज़ शरीफ के इस रवैये से  पी डी एम में शामिल अन्य  राजनीतिक पार्टियों को दिक्क़त हो सकती है क्योंकि  वहां सभी राजनीतिक पार्टियां फौज को खुश रखना चाहती हैं . नवाज़ शरीफ खुद भी फौज की कृपा से प्रधानमंत्री बने थे . जनरल जियाउल हक ने ही उनको राजनीति में महत्व दिलवाया था . अभी  पाकिस्तान में फौज का विरोध करना बहुत ही आसान नहीं माना जाता . वैसे भी पी डी एम की  रैलियों में भीड़ तो खूब हो रही है लेकिन उसको अभी राजनीतिक रूप से इतना सक्षम नहीं माना जा सकता कि वे देश को फौज के खिलाफ खड़ा कर दे . इस बीच भारत वहां हर राजनीतिक विमर्श में शामिल हो चुका है . पाकिस्तान में भारत के खिलाफ ज़हर उगलकर सत्ता हासिल करने की पुरानी परम्परा है . प्रधानमंत्री इमरान खान ने मरियम नवाज़ पर आरोप लगा दिया है कि वे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज़बान बोलती हैं . मरियम नवाज़ ने भी  उनको जवाब दे दिया है कि नरेंद्र मोदी के वे ज्यादा करीबी  हैं . उधर भारत विरोध को हवा देने का  माहौल सेना प्रमुख जनरल बाजवा भी बना रहे हैं. उन्होंने एल ओ सी का दौरा किया और लौटकर पाकिस्तानी अखबारों में छपवाया कि सेना पूरी तरह से तैयार है .पाकिस्तानी प्रधानमंत्री  इमरान खान एक हारे हुए सिपाही जैसे दिखने लगे  हैं . उनको सबसे बड़ा भरोसा  फौज पर था . उनको लगता था कि किसी तरह की राजनीतिक आंधी को वे फौज  की मदद से पार कर लेंगे .शायद इसीलिये वे अभी भी धमकी की भाषा का प्रयोग कर  रहे  हैं . जिस पंजाब को वे अपनी ज़मीन मानते हैं ,वहीं उनके खिलाफ माहौल बन गया है . पंजाब प्रांत में इमरान खान की पार्टी की सरकार है . पंजाब नवाज़ शरीफ का गढ़ भी माना जाता है लेकिन पंजाब में इमरान खान बहुत कमज़ोर पड़ गए हैं . एक नालायक नेता को उन्होंने मुख्यमंत्री बना रखा है . नौकरशाही पहले से ही नाराज़ है . कराची में सिविलियन  पुलिस के आई जी मुशताक के साथ जो हुआ उससे नाराजगी और बड़ी है . ऐसे माहौल में सिंध , बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वाँ में तो विरोध हो ही रहा है ,जब मरियम नवाज़ पंजाब में मोर्चा संभालेंगी तो फौज के लिए भी इमरान खान को संभाल पाना  मुश्किल होगा .सारी हालात को देखकर लगता है कि पाकिस्तान अराजकता और सिविल वार की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है .

चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम तेजस्वी यादव होगा या अगड़ा बनाम पिछड़ा


शेष नारायण सिंह

 

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए अभियान ज़ोरों पर है . तरह तरह की  संभावनाओं पर बात की जा रही है लेकिन तस्वीर धुंधली है. हालाँकि कुछ बातें बिलकुल साफ़ हैं. एक तो यह कि सत्ताधारी गठबन्धन ,एन डी ए का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है . एन डी ए के एक सहयोगी दल , लोकजनशक्ति पार्टी का  एजेंडा ही नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करना है.  वह बीजेपी के समर्थन में है और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के खिलाफ है . बिहार में मौजूद ज़्यादातर राजनीतिक लोग मानते हैं कि चिराग पासवान को बीजेपी का आशीर्वाद प्राप्त है . उनकी सभाओं में नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के  नारे लग रहे  हैं. उन्होंने अधिकतर उन्हीं सीटों से अपने   उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है जो नीतीश कुमार की पार्टी जे डी ( यू ) के हिस्से में आई हैं . उनके उम्मीदवारों की लिस्ट में भी बीजेपी छोडकर आये लोगों की बहुतायत है . इन उम्मीदवारों के  कार्यकर्ताओं से बात करके पता चलता है कि उनकी नाराजगी  केंद्रीय नेतृत्व से नहीं है . वे मुकामी बीजेपी नेताओंसुशील मोदी मंगल पाण्डेय राधा मोहन सिंह आदि से नाराज़ हैं. और चिराग पासवान के साथ हैं. चिराग पासवान के लोग  बीजेपी के  हिस्से वाली सीटों पर खुले आम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि बिहार में इस चुनाव के बाद जे डी यू को बीजेपी से छोटी पार्टी की  भूमिका निभाने के लिए बाध्य होना पडेगा . नीतीश कुमार को मालूम है कि इस बार राज्य में उनसे नाराज़गी बहुत ज्यादा है लेकिन उन्होंने बीजेपी आलाकमान को समझाने में सफलता पा ली है कि नाम  के लिए ही सही उनकी पार्टी को बंटवारे में ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए . नतीजतन बीजेपी ने उनको अपने से एक सीट ज़्यादा दे दिया .इसके बावजूद भी चुनाव अभियान के जोर पकड़ने के साथ जो स्थिति बन रही है उसमें साफ़ समझ में आ रहा है कि बिहार का चुनाव बीजेपी बनाम  आर जे डी हो चुका है . कांग्रेस ,जे डी यू चिराग पासवान की पार्टी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी उपेन्द्र  कुशवाहा की पार्टीजीतनराम मांझी की पार्टी इन्हीं दो पार्टियों में किसी न किसी को प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन दे रहे हैं .

बिहार में २०१५ के विधानसभा चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने जोर आजमाया था. उन दिनों भी चर्चा थी कि ओवैसी साहब चुनाव मैदान में बीजीपी की मदद करने के उद्देश्य से आये  हैं. बीजेपी में उनके  शुभचिंतकों ने उनको 36 सीटों से चुनाव लडवाना चाहा था लेकिन वे उतने  उम्मीदवार नहीं जुटा पाए . करीब छः सीटों पर ही चुनाव लड़ पाए .  2015 के बाद कई चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने बीजेपी को परोक्ष रूप से मदद पंहुचाया है . उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में उनकी भूमिका का ख़ास तौर से ज़िक्र किया जा सकता है . इस बार उन्होंने बिहार में कोइरी  जाति के बड़े नेता उपेन्द्र कुशवाहा के साथ गठबंधन कर लिया है .उपेन्द्र कुशवाहा २०१८ तक नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री थे२०१४ में उनको एन डी ए में शामिल किया गया था और लोकसभा की तीन सीटें मिली थीं. तीनों जीत  गए थे और दावा किया था कि उनकी बिरादरी के सभी वोट उनके कारण ही एन डी ए उम्मीदवारों को मिले थे .अपने इस आत्मविश्वास के कारण ही   २०१९ के लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने यह आरोप लगाकर कि मोदी सरकार सामाजिक न्याय की शक्तियों को कम महत्व दे रही है एन डी ए से अपने को अलग कर लिया था . २०१९ में उनको एक भी सीट नहीं मिली . अभी कुछ दिन पहले तक उपेन्द्र  कुशवाहा तेजस्वी यादव के साथ थे लेकिन वहां से अलग हो गए . चर्चा तो यह भी थी कि वे वापस एन डी  ए में जाना चाहते हैं लेकिन बात नहीं बनी. अनुमान के मुताबिक उनकी जाति के मतदाताओं की संख्या बिहार में करीब आठ  प्रतिशत है . २०१९ के चुनावों के पहले माना जाता था कि अपनी जाति के वोटरों पर उनका खासा प्रभाव है लेकिन तेजस्वी यादव का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं है. शायद इसीलिए तेजस्वी यादव  ने उनको अपने गठबंधन से बाहर जाने के लिए प्रेरित किया .  वे महागठबंधन में बड़ी संख्या में सीटों की मांग कर रहे थे . आर जे डी का  मानना है की उपेन्द्र कुशवाहा को ज़्यादा सीटें देने के कोई फायदा नहीं है क्योंकि वे अपनी जाति के वोट ट्रांसफर नहीं करवा पाते . अब वे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं .

 

बिहार चुनाव में राजनीतिक बारीकियों की परतें इतनी ज्यादा हैं कि किसी के लिए साफ़ भविष्यवाणी कर पाना असंभव है . कुछ चुनाव पूर्व सर्वे आये  हैं जो अपने हिसाब से सीटों की संख्या आदि बता रही हैं लेकिन टीवी चैनलों द्वारा कराये  गए सर्वेक्षणों की विश्वनीयता बहुत कम हो गयी है इसलिए उनके आधार पर कुछ भी कह पाना ठीक नहीं होगा  . देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यह चुनाव पूर्व सर्वे पार्टियों के प्रचार का साधन मात्र होते हैं ,उनका चुनाव की गहाराई से कोई मतलब नहीं होता .कुछ आंकडे साफ़ संकेत देते हैं . एक सर्वे के मुताबिक करीब 84 प्रतिशत मतदाता नीतीश कुमार की सरकार से नाराज़ हैं .इनमे से करीब 54 चाहते  हैं कि इस बार नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाना चाहिए करीब 30 प्रतिशत नाराज़ होने के बावजूद नीतीश कुमार को हटाने की बात नहीं कर रहे  हैं , नीतीश कुमार से केवल 15 प्रतिशत मतदाता  संतुष्ट हैं . यह आंकड़ा बिहार चुनाव की मौजूदा  समझ को एक दिशा देता है .चिराग पासवान की पार्टी के रुख को इस आंकड़े की  रोशनी में समझने से बात  आसान हो जायगी . माना यह जा रहा है कि 84 प्रतिशत नाराज़ लोगों में ज़्यादातर बीजेपी , चिराग पासवान की एल जे पी के अधिकतर मतदाता हैं . मुख्यमंत्री के इतने बड़े विरोध के बाद तो तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले गठबंधन को अवसर का लाभ ले लेना चाहिए था लेकिन उस गठबन्धन में भी तस्वीर कतई साफ़ नहीं है . 2015 में आर जे  डी की सफलता में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व का बड़ा योगदान था. लोगों को साथ लेकर चलने की लालू प्रसाद की योग्यता उनके बेटे में नहीं है .महागठबंधन की दूसरी पार्टी कांग्रेस है . कांग्रेस में भी नेतृत्व को लेकर जो विवाद है उसके कारण चारों तरफ दुविधा का माहौल है . मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी , उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी पहले ही गठबंधन छोड़ चुके हैं . उनके वोटों में पप्पू यादव की पार्टी भी कुछ वोट ले  जायेगी . ऐसी हालत में बातें जलेबी की तरह घुमावदार ही बनी हुयी हैं . बीजेपी के प्रति सहानुभूति रखने वाले  सर्वे में भी जनता ने जिन मुद्दों को सबसे महत्वपूर्ण बताया है , वे मुद्दे  वास्तव में  सच हैं लेकिन महागठबंधन के नेता उन मुद्दों पर जनता को लामबंद करने में सफल  नहीं  हो पा  रहे हैं . बेरोजगारी जनता के मन में सबसे भारी मुद्दा है .करीब पचास प्रतिशत मतदाता नौकरियों को सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं . लॉकडाउन के दौरान देश के बड़े नगरों से भागकर आये मजदूरों की दुर्दशा भी बड़ा मुद्दा है . बिहार सरकार ने कोविड की महामारी को जिस तरह से सम्भाला था उसकी भी खूब आलोचना हुयी थी . बिहार में बाढ़ तो हर साल आती है .  लेकिन  नीतीश कुमार के वर्तमान कार्यकाल में बाढ़ के प्रति उनके रवैये की  चौतरफा आलोचना हुई थी .पटना शहर जिस तरह से बाढ़ के पानी से  परेशान हुआ था , वह सब कुछ लोगों के दिमाग में ताज़ा है लेकिन  महागठबंधन की पार्टियां इन ज्वलंत मुद्दों पर सरकार को घेरने में अब तक नाकामयाब रही हैं .

एन डी ए को भी यह सच्चाई पता है इसलिए वे लोग चुनाव अभियान में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नाम को ही आगे रख रहे हैं . उनको विश्वास है कि नरेंद्र मोदी का नाम ही नैया पार लगायेगा. अप्रैल में एक सर्वे हुआ था जिसमें बताया गया था कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता 70 प्रतिशत थी . ताज़ा सर्वे में यह 44 प्रतिशत बताई जा रही है लेकिन विपक्ष इस गिरते ग्राफ पर फोकस नहीं कर पा रहा है .नीतीश कुमार ने चिराग पासवान को गंभीरता से लेने से साफ़ मना कर दिया था लेकिन इस बीच उनके पिता राम विलास पासवान की मृत्यु के कारण उनके पक्ष में सहानुभूति का माहौल भी है . बिहार की राजनीति में कोई भी पार्टी  या गठबंधन 45 से ज़्यादा वोट नहीं पाता.

1952  से लेकर अब तक रिकार्ड देखने से एक बात साफ़ समझ में आ जाती है.  201 0 के चुनाव में बिहार में नीतीश कुमार की आंधी थी . 243 में से 206 सीटें उनके गठबंधन को मिली थीं. उसी  आत्मविश्वास के चलते उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर  नामित करने के बीजेपी के फैसले को चुनौती दी थी लेकिन उस चुनाव में भी  बीजेपी के साथ हुए उनके गठबंधन को केवल 39 प्रतिशत वोट ही मिले थे . 2015 में नीतीश कुमार ,लालू प्रसाद यादव  और कांग्रेस एक साथ थे . उस बार  महागठबंधन को 44 प्रतिशत वोट मिले  थे. इस बार कई सर्वे एन डी ए को ज्यादा प्रतिशत वोट बता रहे  हैं . अगर ऐसा हुआ तो विपक्ष की एकदम से धुलाई हो जायेगी लेकिन बिहार में  हमेशा एक और एक मिलाकर दो ही नहीं होते , कई बार जोड़ बदल भी जाता है.

एक बात तय है कि बिहार के चुनाव में विपक्ष में लालू यादव के जेल में होने के कारण उन जैसा कोई मज़बूत नेता नहीं है और नीतीश कुमार अपनी सरकार की असफलताओं के चलते रक्षात्मक मुद्रा में हैं .उनको नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का सहारा है . महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव हैं .  चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम तेजस्वी यादव हो सकता है . अगर ऐसा हुआ तो सबको मालूम है कि नतीजा नरेंद्र मोदी के पक्ष में जायेगा लेकिन अगर चुनाव अगड़ा बनाम पिछड़ा हो गया तो एन डी ए में शामिल कई बड़े पिछड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भी  एन डी ए को  अगड़ों के प्रभुत्व वाली पार्टी ही  माना जाता है ,उस स्थिति में नीतीश कुमार की सरकार बनने की संभावना के  लिए खासी मुश्किल पेश आ सकती है

Wednesday, October 7, 2020

अमरीकी उपराष्ट्रपति पद के दावेदारों में ज़बरदस्त बहस , डोनाल्ड ट्रंप के झूठ पूरी बहस में छाए रहे

 


शेष नारायण सिंह

अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में राष्ट्रपति के डिबेट का बड़ा महत्व होता है .  उपराष्ट्रपति पद के डिबेट का उतना महत्व नहीं माना जाता लेकिन इस बार पूरे देश का ध्यान  उपराष्ट्रपति के डिबेट पर भी था . शायद इसका कारण यह  है कि राष्ट्रपति के पद के दोनों ही उम्मीदवारों की उम्र बहुत ज़्यादा  है . जो बाइडेन तो 77 साल के  हैं जबकि डोनाल्ड ट्रंप 74 साल के हैं .  राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों का पहला डिबेट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के  बीच बीच में बोलते रहने के काण काफी निराशाजनक  रहा था. उसके बाद वे कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए. पूरे प्रचार अभियान में उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों  का डिबेट केवल एक बार होता है . आज साल्ट लेक सिटी में हुए डिबेट में मौजूदा उपराष्ट्रपति माइक पेंस और डेमोक्रेटिक  उम्मीदवार  कमला हैरिस के बीच खासी दिलचस्प बहस हुई. बहस के केंद्र में कोरोना वायरस और उसके प्रबंधन को ही  रहा . उपराष्ट्रपति माइक पेंस इस बार भी डोनाल्ड ट्रंप के साथ उम्मीदवार हैं .

बहस की शुरुआत में  ही कमला हैरिस ने  ट्रंप  प्रशासन के कोरोनावायरस महामारी से निपटने के तरीकों को आड़े हाथों लिया . उन्होंने कहा कि  दो लाख दस हज़ार से अधिक अमरीकी लोग इस बीमाई से मर चुके हैं  और करीब 75 लाख लोग कोरोनावायरस  से पीड़ित हैं . अमरीकी अवाम ने देख लिया है कि मौजूदा प्रशासन इतनी भयानक बीमारी से लड़ने में नाकाम रहा है .इस बीमारी से मुकाबला करने वाली जमातों के अगले  दस्ते के लोगों को इस सरकार ने मरने के लिए छोड़ दिया था उनकी रक्षा का कोई भी इंतजाम नहीं किया  गया था ..ट्रंप ने कोरोनावायरस की महामारी को कम करके आंका और लोगों को मास्क पहनने के मामले में निरुत्साहित किया ..उन्होंने आरोप लगाया कि इतनी भयानक बीमारी   से मुकाबला करने में ट्रंप बुरी तरह से नाकाम रहे हैं और  कोरोनावायरस को लेकर लगातार झूठ बोला है .उन्होंने आरोप लगाया कि उनके गैरजिम्मेदार रवैये के कारण ही कोरोना की बीमारी व्हाइट हाउस में भी फैल गयी . डोनाल्ड ट्रंप खुद संक्रमित जो गए .ट्रंप के बार बार  बोले गए झूठ का बचाव कर पाना उपराष्ट्रपति माइक पेंस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था क्योंकि वे खुद ही व्हाइट हाउस के कोरोनावायरस टास्क फ़ोर्स के प्रमुख हैं .  ऐसे माहौल में कोरोनावायरस अमरीकी चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया है . कमला हैरिस ने यह बात बार  बार दोहराई और रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक पेंस को मुश्किल में डालती रहीं .

अब अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए मतदान के लिए एक महीने से कम का समय  है . कोरोनावायरस मुख्य चुनावी मुद्दा है , ट्रंप के लाख कोशिश करने के बाद भी इस बीमारी से हो रहे नुक्सान के लिए उनको ही ज़िम्मेदार माना जा रहा है . डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले के राष्ट्रपति ओबामा के स्वास्थ्य कार्यक्रम ओबामाकेयर का  मजाक उड़ाया था और उसको खतम कर दिया था वह भी अमरीकी लोगों के दिमाग में हैं . अपने  कार्यकाल के अंतिम साल में ओबामा ने देश को  आगाह किया था कि अगर कहीं 1918 के स्पैनिश फ़्लू जैसी किसी  बीमारी  का  प्रकोप हो जाए तो उसके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल शोध के क्षेत्र में देश को तैयार रहना पडेगा .उसके लिए उन्होंने काम भी शुरू कर दिया था लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने उसको बंद कर दिया .  आज के उपराष्ट्रपति पद की बहस में कमला हैरिस ने इस मुद्दे को समझाया .बीमारी के प्रबंधन में डोनाल्ड ट्रंप की नाकाबिलियत को भी कमला हैरिस ने रेखांकित  किया . माइक पेंस ने उनको  यह कहकर घेरने की  कोशिश की कि कोरोना की वैक्सीन के विकास में  जो बाइडेन अडंगा लगा रहे हैं लेकिन अमरीकी अवाम को मालूम है कि यह सच  नहीं है .बीमारी के फैलने को  को लेकर माइक पेंस ने जब यह बताने की कोशिश की कि जब केवल पांच लोग कोरोनावायरस से बीमार  थे तभी  राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन से अमरीका की यात्रा पर रोक लगा  दी थी लेकिन सच्चाई इससे अलग है . सी एन एन की टीम ने बहस खतम होने  के तुरंत बाद बता दिया कि ट्रंप ओर माइकेल पेंस झूठ बोल रहे  हैं . आंकड़े कोई और कहानी कह रहे हैं .

आज की बहस के पहले हुए चुनाव पूर्व  सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति ट्रंप  करीब  १६ अंक पीछे थे . जो बाइडेन ५७ प्रतिशत का समर्थन पा रहे थे जबकि डोनाल्ड ट्रंप केवल ४१ प्रतिशत पर थे . ज़ाहिर  है आज के डिबेट में उनके उपराष्ट्रपति की निरुत्तरता उनकी लोकप्रियता को और कम करेगी . आज हालांकि कोरोनावायरस का मुद्दा  छाया रहा  लेकिन अमरीकी जनता की निगाह में सबसे बड़ी मुसीबत बेरोजगारी है .अमरीकी अर्थव्यवस्था की  तबाही के लिए ट्रंप के लगातार  बोले जा रहे झूठ सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने सच्चाई को  देश और उद्योग के सामने नहीं रखा जिसका नतीजा  यह है कि कोरोनावायरस के हमले से बचने के लिए सही तैयारी नहीं हो सकी . व्यापार के समझौतों को लेकर भी  माइक पेंस को बहुत कठिन सवालों के जवाब देने पड़े . उन जवाबों को सुनकर तो  ऐसा  लगा जैसे वे खुद भी अपने जवाब से संतुष्ट नहीं  हैं . चीन के साथ व्यापार के संतुलन पर भी कमला  हैरिस ने अपने  प्रतिद्वंदी को तबीयत से घेरा . अमरीका में लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं और यह पूरे देश में  चिंता का विषय है . माइक पेंस इस विषय पर बात से बचना चाहते थे लेकिन  डेमोक्रेटिक उम्मीदवार उनको बार बार घेरकर  वहीं ला रही थीं . उन्होंने  डोनाल्ड ट्रंप के टैक्स वाले कारनामे  को भी उठाया . डोनाल्ड ट्रंप अमरीका में एक बड़े उद्योगपति हैं लेकिन  पिछले कई वर्षों से केवल 750 डालर का इनकम टैक्स दे रहे हैं . यह बात अमरीका में अब सभी जानते हैं . इस विषय पर भी कमला हैरिस ने उनको जवाब देने के लिए मजबूर कर दिया लेकिन जब कोई जवाब है  ही नहीं तो  क्या जवाब देंगे . उपराष्ट्रपति माइक पेंस बगले झांकते देखे गए .

माइकेल पेंस के लिए भी कुछ ऐसे मौके मिले जब वे   डेमोक्रेटिक पार्टी को घेरने में सफल हुए . जब कमला हैरिस ने कहा कि ट्रंप का प्रशासन चीन से व्यापार युद्ध हार गया है . आपकी नीतियों के चलते तीन लाख कारखाना मजदूरों की नौकरियाँ खतम हुई हैं और किसानों को भारी नुकसान हुआ है और वे दिवालिया होने को बाध्य हो गए हैं .इस बात का  माइक पेंस ने  ऐसा जवाब दिया कि कमला हैरिस की बोलती बंद हो गयी . पेंस ने कहा कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन ने उस बिल के पक्ष में वोट दिया था जिसके बाद चीन का अमरीका से परमानेंट व्यापारिक सम्बन्ध कायम हो गया था .उसी  कानून के कारण ही चीन विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने में कामयाब रहा और उसकी अर्थव्यवस्था इतनी मज़बूत  हो गयी कि वह आज अमरीका से मुकाबला कर रहा है . पेंस ने आरोप लगाया कि चीन की व्यापारिक सफलता में बाइडेन की  भूमिका एक चीयरलीडर की रही है और चीन की व्यापारिक सफलता में जो बाइडेन का बड़ा योगदान है .लेकिन यहीं वे एक लूज़ बाल दे  बैठे . उन्होंने कहा कि मैं अमरीकी अवाम की तरफ से बोल रहा हूँ क्योंकि उनका सम्मान करता हूँ  .अब कठिन  जवाब लेने की उनकी बारी थी . कमला हैरिस ने कहा  कि आप लोगों  का सम्मान तब कर रहे होते हैं जब आप सच बोलते हैं. डोनाल्ड ट्रंप के झूठ का बचाव करने के चक्कर में माइक पेंस  को भी कई बार झूठ बोलना पड़ा. सबसे बड़ा झूठ उन्होंने तब बोला जब उन्होंने दावा किया कि कोरोनावायरस के बारे  में राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा ही सच बोलते रहे हैं . सी एन एन के डैनियल डेल का  दावा  है कि यह तो झूठ का पहाड़ है क्योंकि कोरोनावायरस महामारी के दौरान ट्रंप ने सैकड़ों बार झूठे दावे किये  हैं . उन्होंने यात्रा पर रोक के बारे में , बीमारी की जाँच के बारे में हाइड्रोक्लोरोक्विन के असर के बारे में , देश में  उपलब्ध वेंटिलेटर के बारे में उन्होंने झूठ बोला .  एक बार तो उन्होंने खुद ही कहा था कि मैं इसको कम करके पेश कर्ता रहा था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि अवाम में घबडाहट पैदा हो जाय.

  आनन फानन में  सुप्रीम कोर्ट की एक जज की तैनाती को भी कमला हैरिस ने मुद्दा बनाया . देश की सबसे बड़ी अदालत की एक जज जस्टिस रुथ  गिन्सबर्ग की बीते 18 सितम्बर को मृत्यु हो गयी थी . अमरीकी  सुप्रीम कोर्ट में जजों के नियुक्ति जीवनभर के  लिए होती है वे रिटायर नहीं होतीं . रुथ की जगह पर उन्होंने अपनी एक समर्थक एमी  बारेट को जज बना दिया .आम तौर पर माना जाता है कि अगर चुनाव आसन्न  हों तो राष्ट्रपति को इस तरह की हडबडी नहीं करनी चाहिए लेकिन ट्रंप के बारे में अमरीकी जनमानस में यह चर्चा है कि  वे चुनाव के बाद भी सत्ता से चिपकने की कोशिश करेंगे. अगर बहुत बड़े  अंतर से हार गए तब तो शायद नहीं लेकिन अगर उनकी हार का अंतर कम रहा तो वे आसानी से हार नहीं मानेंगे .  इमकान है कि वे सुप्रीम कोर्ट जायेंगे और वहां अगर अपनी भक्त कोई जज हो तो उनके पक्ष में फैसला होने की संभावना ज़्यादा रहेगी .   जब जज की जल्दबाजी में की गयी  नियुक्ति पर कमला हैरिस ने सवाल उठाया तो माइक  पेंस ने कहा कि इतना ज़रूरी पद खाली रखना ठीक नहीं होगा. हैरिस ने उनको याद दिलाया कि आज डोनाल्ड ट्रंप की  सरकार अपने अंतिम दौर में है . जस व्यक्ति को  जीवन भर के लिए जज बनाया जा रहा है उसके लिए इतनी जल्दबाजी की कोई ज़रूरत नहीं थी . माइक पेंस  अपनी ट्रंप लाइन पर चलते रहे तो उनको  डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ने याद दिलाया कि  इतिहास में  कई बार  हुआ है , उनको याद दिलाया गया कि अमरीका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन  सन 1864 में जब दुबारा राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे  थे तो चुनाव के 27 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के एक जज की मृत्यु हो गयी . जब उनसे नई नियुक्ति के बारे में बात की गयी तो उन्होंने बताया कि अमरीकी अवाम  27 दिन बाद अपना नया  राष्ट्रपति चुनने वाली है . अगर मैं चुना गया तो मैं इस बात पर विचार करुंगा . अमरीका  जनता की इच्छा का सम्मान होना ज़रूरी है,” इस जवाब के बाद माइक पेंस की हालत देखने लायक थी .

अमरीकी  चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप का झूठ केंद्रीय भाव है . मीडिया से लेकर राजनेता तह , सभी उसी विषय पर बात कर रहे हैं . अगले चार  हफ़्तों में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा . फिलहाल तो जो बाइडेन और  कमला हैरिस का पलड़ा भारी दिख रहा है .

 

 

Friday, October 2, 2020

‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे

शेष नारायण सिंह
नरसी मेहता गुजरात के शिखर संत कवि हैं . पंद्रहवीं शताब्दी में उन्होंने गुजरात के लोगों का दुःख दर्द साझा किया था . उनका एक भजन महात्मा गांधी को बहुत प्रिय था। यह भजन महात्माजी की दैनिक प्रार्थना का एक हिस्सा हुआ करता था. भजन गुजराती में है लेकिन मुझे लगता है कि इसे पूरे भारत में इतनी बार लोगों ने पढ़ा और गाया है कि यह भाषा की सीमा पार कर गया है .. इसका शुरू का छंद ही इंसान को जीने की एक निश्चित दिशा दे सकता है . भजन का पहला पद है :
‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे।’
‘पर दु:खे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे॥
‘सकल लोक मां सहुने वन्दे, निंदा न करे केनी रे।’
‘वाच काछ मन निश्छल राखे, धन धन जननी तेनी रे॥
नरसी मेहता कहते हैं कि असली वैष्णव जन वही है, जो दूसरों की पीड़ा को समझता हो ,उसकी तकलीफ को का करने के लिए उपाय करे ,उसपर उपकार करे लेकिन शर्त यह है कि अपने मन में भी कोई अभिमान ना आने दे. सच्चा वैष्णव सभी का सम्मान करता है और किसी की निंदा नहीं करता .वह अपनी बोली,करम और मन में कोई छल नहीं रखता . ऐसे व्यक्ति की मां उसको जन्म देकर धन्य हो जाती है . इसके अर्थ में वैष्णव जन की जगह अगर भला आदमी लिख दिया जाय तो हम जैसे लोगों के लिए यह बहुत ही उपयोगी हो जाता है . महात्मा गांधी की जन्मशती के दौरान सन 1969 में मेरे कालेज में बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया था. साल भर चले आयोजन में कई गांधीवादी विद्वानों के दर्शन हुए ,उनके सत्संग का लाभ भी मिला. मैंने देखा कि उस कालेज में दो शिक्षक ऐसे थे जो वास्तव में नरसी मेहता के इस भजन को अपने जीवन में उतारे हुए थे. सैन्य विज्ञान के अध्यक्ष , प्रो, एस सी श्रीवास्तव और दर्शनशास्त्र के प्रो. अरुण कुमार सिंह किसी पर उपकार करते थे तो उसक ज़िक्र तक नहीं करते थे . बी ए के छात्र के रूप में मैंने इन संत पुरुषों को करीब से देखा . तब से ही कोशिश शुरू कर दी कि इनकी सोच को जीवन में उतारना है. आज पचास साल बाद अपने आप को देखता हूँ तो लगता है कि इनकी जीवनशैली को पूरा तो नहीं लेकिन कुछ हद तक जीवन में उतारने में सफल रहा हूं.
शायद इसीलिये मैं उन लोगों को बिलकुल नहीं पसंद करता जो किसी के ऊपर ज़रा सा उपकार करने के बाद पूरी दुनिया में उसका प्रचार करते हैं. महात्मा गांधी और संत नरसी मेहता का कौल है कि भले आदमी को दूसरे की तकलीफ को जान लेना चाहिए , उसकी मदद करनी चाहिए लेकिन अपने मन भी भी अभिमान नहीं आने देना चाहिए . यह कठिन काम है लेकिन कोशिश करने से आंशिक सफलता की गारंटी है . अगर पूरी सफलता नहीं मिलती तो भी कोशिश करने का जो सुख है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता . हर बात में मैं मैं करते रहने वालों को महात्मा गांधी भला आदमी की श्रेणी में नहीं रखते थे

Thursday, October 1, 2020

महात्मा गांधी की राजनीतिक और सामाजिक सोच का आइना है उनकी किताब ‘ हिंद स्वराज ‘


शेष नारायण सिंह

 

बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों ने राजनीति और समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है उनमें  महात्मा गांधी की किताब ‘ हिंद स्वराज ‘ का नाम  सरे-फेहरिस्त  है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैंभीमराव अंबेडकर की ‘ जाति का विनाश ‘  मार्क्‍स और एंगेल्स की ‘ कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो,’  ज्योतिराव फुले की ‘ गुलामगिरी ‘और वीडी सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व ‘। अंबेडकरमार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी कासावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। हालांकि सच्चाई यह  है कि डॉ आंबेडकर भी ज्योतिराव गोविंदराव फुले की क्रांतिकारी सोच से प्रभावित थे . ज्योतिबा फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। 

 आज से डेढ़ सौर साल से अधिक समय पहले महात्मा गांधी का जन्म को  सौराष्ट्र में हुआ था. परिवार की महत्वाकांक्षाएं वही थीं जो तत्कालीन गुजरात के संपन्न परिवारों में होती थीं। गांधी जी वकालत पढने  इंगलैंड गए और जब लौटकर आए तो अच्छे पैसे की उम्मीद में घर वालों ने दक्षिण अफ्रीका में बसे गुजराती व्यापारियों का मुकदमा लडऩे के लिए भेज दिया। दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिसकी वजह से सब कुछ बदल गया। एटार्नी एम.के. गांधी की अजेय यात्रा की शुरूआत वहीं हुई और उनका पाथेय था सत्याग्रह। सत्याग्रह के इस महान योद्धा ने अकेले ही अपनी यात्रा शुरू की। लोग साथ  जुड़ते गए और परिवर्तन के व्याकरण की रचना उनके हर काम से होती रही .इस यात्रा में उनके जीवन में बहुत सारे मुकाम आए। गांधीजी का हर पड़ाव भावी इतिहास को दिशा देने की क्षमता रखता है।
चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराजकी रचना की। 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं। आज एक शताब्दी से अधिक वर्ष बाद  भी यह किताब उतनी ही उपयोगी है जितना आजादी की लड़ाई के दौरान थी  इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था। उनका उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का था। उन्होंने भूमिका में ही लिख दिया था कि अगर उनके विचार गलत साबित होंतो उन्हें पकड़ कर रखना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक आचरण करें। उनकी भावना थी कि ऐसा करना देश के भले के लिए होगा।
अपने प्रकाशन के समय से ही हिंद स्वराज की देश निर्माण और सामाजिक उत्थान के कार्यकर्ताओं के लिए एक बीजक की तरह इस्तेमाल हो रही है। इसमें बताए गए सिद्धांतों को विकसित करके ही 1920 और 1930 के महात्मा गांधी के  आंदोलनों का संचालन किया गया था । 1921 में यह सिद्धांत सफल नहीं हुए थे लेकिन 1930 में पूरी तरह सफल रहे। ‘ हिंद स्वराज ‘के आलोचक भी बहुत सारे थे। उनमें सबसे बड़ा नाम तो  गोपाल कृष्ण गोखले का ही है। गोखले जी 1912 में जब दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने मूल गुजराती किताब का अंग्रेजी अनुवाद देखा था। उन्हें उसका मजमून इतना अनगढ़ लगा कि उन्होंने भविष्यवाणी कर दी  कि गांधी जी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही उस पुस्तक को नकार देंगे। महादेव भाई देसाई ने लिखा है कि गोखले जी की वह भविष्यवाणी सही नहीं निकली। 1921 में किताब फिर छपी और महात्मा गांधी ने पुस्तक के बारे में लिखा कि "वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती हैहिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती हैपशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। उसमें से मैंने सिर्फ एक शब्द रद्द किया है। उसे छोड़कर कुछ भी फेरबदल नहीं किया है। यह किताब 1909 में लिखी गई थी। इसमें जो मैंने मान्यता प्रकट की हैवह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है।"महादेव भाई देसाई ने किताब की 1938 की भूमिका में लिखा है कि '1938 में भी गांधी जी को कुछ जगहों पर भाषा बदलने के सिवा और कुछ फेरबदल करने जैसा नहीं लगा ‘। हिंद स्वराज एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की शुरुआती रचना है जिसे आगे चलकर भारत की आजादी को सुनिश्चित करना था और सत्य और अहिंसा जैसे दो औजार मानवता को देना था जो भविष्य की सभ्यताओं को संभाल सकेंगे। किताब की 1921 की प्रस्तावना में महात्मा गांधी ने साफ लिख दिया था कि 'ऐसा न मान लें कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की हैवैसा स्वराज्य कायम करने के लिए मेरी कोशिशें चल रही हैंमैं जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है।..... लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज की मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पालियामेंटरी ढंग का स्वराज्य पाना है।"
इसका मतलब यह हुआ कि 1921 तक महात्मा गांधी इस बात के लिए मन बना चुके थे कि भारत को संसदीय ढंग का स्वराज्य हासिल करना है . इसमें दो राय नहीं कि 1909 वाली किताब में महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बांझ और बेसवा कहा था (हिंद स्वराज पृष्ठ 13)। लेकिन यह संदर्भ ब्रिटेन की पार्लियामेंट के उस वक्त के नकारापन के हवाले से कहा गया था। बाद के पृष्ठों में पार्लियामेंट के असली कर्तव्य के बारे में बात करके महात्मा जी ने बात को सही परिप्रेक्ष्य में रख दिया था और 1921 में तो साफ कह दिया था कि उनका प्रयास संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर आजादी हासिल करने का है। यहां महात्मा गांधी के 30 अप्रैल 1933 के हरिजन बंधु के अंक में लिखे गए लेख का उल्लेख करना जरूरी है। लिखा है, ''सत्य की अपनी खोज में मैंने बहुत से विचारों को छोड़ा है और अनेक नई बातें सीखा भी हूं। उमर में भले ही मैं बूढ़ा हो गया हूंलेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आतंरिक विकास होना बंद हो गया है।.... इसलिए जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगेतब अगर उसे मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।" इसका मतलब यह हुआ कि महात्मा जी ने अपने विचार में किसी सांचाबद्ध सोच को स्थान देने की सारी संभावनाओं को शुरू में ही समाप्त कर दिया था।उन्होंने सुनिश्चित कर लिया था कि उनका दर्शन एक सतत विकासमान विचार है और उसे हमेशा मानवता के हित में संदर्भ के साथ विकसित किया जाता रहेगा।

 

महात्मा गांधी के पूरे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास। चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था। इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थें। उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगावह सही नहीं है। महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यहां हिंद स्वराज का स्थाई भाव है। लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में हैउतना ही साधन और साध्य के बीच में है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है। उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खड्ग बिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे।
हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने भारत की भावी राजनीति की बुनियाद के रूप में हिंदू और मुसलमान की एकता को स्थापित कर दिया था। उन्होंने साफ कह दिया कि, ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिएतो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए।.... मुझे झगड़ा न करना होतो मुसलमान क्या करेगाऔर मुसलमान को झगड़ा न करना होतो मैं क्या कर सकता हूंहवा में हाथ उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों व मुल्लाओं को बीच में न आने देंतो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला रहेगा। (हिंद स्वराजपृष्ठ 31 और 35) यानी अगर स्वार्थी तत्वों की बात न मानकर इस देश के हिंदू मुसलमान अपने धर्म की मूल भावनाओं को समझें और पालन करें तो आज भी देश में अमन चैन कायम रह सकता है और प्रगति का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
इस तरह हम देखते है कि आज से ठीक सौ वर्ष पहले राजनीतिक और सामाजिक आचरण का जो मंत्र  महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज के रूप में लिखा थावह आने वाली सभ्यताओं को अमन चैन की जिंदगी जीने की प्रेरणा देता रहेगा।

Wednesday, September 30, 2020

बाबरी मस्जिद के विध्वंस की साज़िश के आरोप से बीजेपी के बड़े नेताओं सहित सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया गया

 

शेष नारायण सिंह

 

अयोध्या की बाबरी मस्जिद के विध्वंस के मुक़दमे में सी बी आई की विशेष अदालत ने सभी अभियुक्तों को बाइज्ज़त बरी कर दिया है . अपने रिटायर होने के एक दिन पहले दिए गए फैसले में जज साहब ने लिखा है कि अभियुक्तों पर साज़िश के जो आरोप लगे थे  वे गलत पाए गए क्योंकि उनको सही साबित करने के लिए जज साहब की  नज़र में  ज़रूरी साक्ष्य नहीं मिल सके . इसलिए बरी कर दिया गया  . जज साहब ने कहा कि  इस मुक़द्दमे के अभियुक्त तो लोगों को मस्जिद गिराने से रोक रहे थे .  जज साहब को यह इलहाम कहाँ से हुआ यह पता नहीं है . इस केस में कुल 48 अभियुक्त थे उनमें से 17 की तो मौत हो चुकी  है . लाल कृष्ण आडवानी ,मुरली मनोहर जोशी ,उमा भारती सहित बाकी लोग आरोप मुक्त हो गए हैं . उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्याय की जीत बताया है. उन्होंने सी बी आई की विशेष अदालत द्वारा फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सत्यमेव जयते के अनुरूप सत्य की जीत हुई है.  उनके बयान में यह भी कहा गया कि ,” यह फैसला स्पष्ट करता है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर वोट बैंक की राजनीति के लिए देश के पूज्य संतों भारतीय जनता पार्टी के नेताओंविश्व हिंदू परिषद से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं समाज से जुड़े विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों को बदनाम करने की नीयत से से उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर बदनाम किया गया.” मुख्यमंत्री योगी ने कहाइस षड्यंत्र के लिए जिम्मेदार देश की जनता से माफी मांगे. मुक़दमे के सभी अभियुक्तों ने भी फैसले का स्वागत किया है .

इस बात में दो राय नहीं है कि बाबरी मस्जिद का  विध्वंस राजनीतिक कारणों से किया गया था . धर्म के नाम पर हिन्दुओं को  वोट बैंक बनाने की आर एस एस की राजनीति में अयोध्या की पांच सौ साल पुरानी मस्जिद को ढहाना के राजनीतिक एजेंडे का  हिस्सा था.  जिसके नतीजे भी साफ़ नज़र आ रहे हैं . जब बाबरी मस्जिद के खिलाफ आन्दोलन शुरू हुआ था तो बीजेपी की लोकसभा में दो सीटें थीं .आज देश में उनके स्पष्ट बहुमत से बनी हुई सरकार है . हिंदुत्व की राजनीति के पैरोकारों के लिए उस मस्जिद को मुसलमानों के सम्मान से जोड़कर उसको ज़मींदोज़ करने का  कार्यक्रम हिंदू मात्र को सर्वोपरि साबित करना था जिसका राजनीतिक लाभ मिला.  सी बी आई के विशेष जज के  इस फैसले के साथ ही रामजन्मभूमि के लिए 35 साल से चल रहे विवाद का  पटाक्षेप हो गया है .हालांकि  इस केस की अभियोक्ता सी बी आई के पास ऊपरी अदालत में अपील करने का रास्ता है . देखना यह होगा कि वह अपील करते हैं कि नहीं .फैसले पर टीका टिप्पणी करने का कोई मतलब नहीं है लेकिन उसके बाद की राजनीति को समझना राजनीतिशास्त्र के किसी विद्यार्थी के  लिए  ज़रूरी है .

 

इस विवाद की शुरुआत तब हुयी थी जब १९९२ में अयोध्या की  मध्ययुगीन मसजिद को ज़मींदोज़ किया गया  था . ६ दिसंबर १९९२ के दिन वहां बहुत बड़ी संख्या में पूरे देश से कारसेवक आये थे . उनके नेताओं और विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने वचन दिया था कि जो लोग वहां आ रहे थे उनका उद्देश्य केवल कारसेवा करना था.  उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि अयोध्या के विवादित ढाँचे को कोई नुक्सान नहीं होने दिया जाएगा लेकिन वहां आई भीड़ ने बाबरी मस्जिद को ज़मींदोज़ कर दिया . 30 सितम्बर को आये फैसले में सी बी आई की विशेष अदालत में कहा गया है कि उस ढाँचे को ढहाने के लिए कोई योजना नहीं बनी थी और किसी ने कोई साज़िश नहीं की थी .वहां आई  हुयी भीड़ ने एकाएक उसको गिरा दिया . उसके लिए किसी से कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया था. यह बात आज फैसला आने के बाद साफ हो गयी है लेकिन 6  दिसंबर के बाद की भारत की राजनीति दोबारा वही नहीं रही ,वह बिलकुल बदल गयी .

 

अयोध्या के उस दिन के विध्वंस के साथ साथ भारतीय राजनीति को एक नई दिशा में डाल दिया गया था . तब तक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की बात सभी राजनीतिक पार्टियाँ करती थीं लेकिन उसके बाद  हिन्दुत्ववादियों ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ भी अभियान शुरू कर दिया था . हालांकि वे लोग महात्मा गांधी को सम्मान देने की बात करते रहे थे लेकिन महात्मा गांधी के आन्दोलन के केंद्रीय भाव,धर्मनिरपेक्षता का विरोध बड़े पैमाने पर शुरू हो गया था .महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता को आज़ादी के आंदोलन में बहुत ही अधिक महत्व दिया था .धर्मनिरपेक्षता भारत की आज़ादी  के संघर्ष का इथास थी. बाबरी मसजिद के विध्वंस  के बाद की राजनीति और पत्रकारिता दोनों ही बदल  गए थे .हिंदी मीडिया में पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग आर एस एस की राजनीति के प्रचारक के रूप में काम करने लगा था . वे मसजिद ढहाने के काम को वीरता बता रहे थे . उस वक़्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव को अर्जुन सिंह की चुनौती मिल रही थी लेकिन कुछ भी करने के पहले १०० बार सोचने के लिए विख्यात अर्जुन सिंह ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा नहीं दिया .  अटल बिहारी वाजपेयी दुखी होने की बात की थी लेकिन ढहाने वालों के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया था . लाल कृष्ण आडवानीकल्याण सिंह , उमा  भारती ,   साध्वी ऋतंभरा , अशोक सिंघल आदि जश्न मना रहे थे . कांग्रेस में हताशा का माहौल था. २४ घंटे का टेलिविज़न नहीं था. ख़बरें बहुत धीरे धीरे आ रही थीं लेकिन जो भी ख़बरें आ रही थीं वे अपने सर्वधर्म समभाव  की  बुनियाद को हिला देने वाली थीं . दिल्ली में महात्मा गांधी की समाधि पर जब मदर टेरेसा  के साथ देश भर से आये धर्मनिरपेक्ष लोगों ने  माथा टेका तो लगता था कि अब अपना देश तबाह होने से बच जाएगा . बिना किसी तैयारी के  शांतिप्रेमी लोग वहाँ इकठ्ठा हुए और समवेत स्वर में  रघुपति  राघव राजाराम की  टेर लगाते रहे. मेरी नज़र में महात्मा गांधी के  दर्शन की उपयोगिता का यह प्रैक्टिकल  सबूत था .  

बाबरी मसजिद को  ढहाने के बाद आर एस एस ने कट्टर हिन्दूवाद को एक राजनीतिक विचारधारा के रूपमें स्थापित कर दिया था . आर एस एस के लोग इस योजना पर बहुत पहले से  काम कर  रहे थे .दुनिया जानती है कि आज़ादी की लड़ाई में आर एस एस के लोग शामिल नहीं हुए थे .  आज़ादी  के बाद जब महात्मा गांधी की हत्या हुई तो आर एस एस के सरसंघचालक एम एस गोवलकर भी गिरफ्तार गये थे और उनके संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक के ऊपर प्रतिबन्ध लगा था .बाद में १९७५ में भी इन पर पाबंदी लगी थी  लेकिन इनका काम कभी रुका नहीं . आर एस  एस के लोग पूरी तरह से अपने मिशन में  लगे  रहे. डॉ  लोहिया  ने गैर कांग्रेसवाद की राजनीति के सहारे इन लोगों को राजनीतिक सम्मान  दिलवाया था. जब १९६७ में संविद सरकारों का प्रयोग हुआ तो आर एस एस  की पार्टी  भारतीय जनसंघ थी . उस पार्टी के लोग कई राज्य सरकारों में मंत्री बने . बाद में जब जनता पार्टी बनी तो जनसंघ घटक के लोग उसमें सबसे ज्यादा संख्या में थे. उसके साथ ही आर एस एस की राजनीति मुख्यधारा में आ चुकी थी . १९७७ में जब लाल कृष्ण आडवानी सूचना और प्रसारण मंत्री बने तो बड़े पैमाने पर संघ के  कार्यकर्ताओं को अखबारों में भर्ती करवाया गया . १९९२ में  बाबरी मसजिद के विध्वंस के बाद  उत्तर भारत के अधिकतर अखबारों में आर एस एस के लोग भरे हुए थे . उन्हीं लोगों ने ऐसा माहौल बनाया जैसे कि जैसे बाबरी मसजिद को ढहाने  वालों ने  कोई बहुत भारी वीरता का काम किया हो . कुल मिलाकर  माहौल ऐसा बन गया कि देश में धर्मनिरपेक्ष होना किसी अपराध जैसा लगने लगा था.  

 

1980 में जनता पार्टी को तोड़कर भारतीय जनता पार्टी बनी थी .शुरू में इस पार्टी ने उदारतावादी राजनीतिक सोच को अपनाने की कोशिश की . दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और गांधीवादी समाजवाद जैसे राजनीतिक शब्दों को अपनी बुनियादी सोच का आधार बनाने की कोशिश की . लेकिन जब १९८४ के लोकसभा चुनाव में ५४२ सीटों वाली लोकसभा में बीजेपी को केवल दो सीटें मिलीं तो उदार राजनीतिक संगठन बनने का विचार हमेशा के लिए दफन कर दिया गया . जनवरी १९८५ में कलकत्ता में आर एस एस के टाप नेताओं की बैठक हुई जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को भी बुलाया गया और साफ़ बता दिया गया कि अब हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को चलाया जाएगा . वहीं तय कर लिया गया कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि के पुराने विवाद को एक बार ज़िंदा करके उसके इर्दगिर्द बीजेपी की चुनावी राजनीति को केन्द्रित किया जाय . आर एस एस के दो संगठनोंविश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को इस प्रोजेक्ट को चलाने का जिम्मा दिया गया. विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना १९६६ में हो चुकी थी लेकिन वह सक्रिय नहीं था. १९८५ के बाद उसे सक्रिय किया गया और कई बार तो यह भी लगने लगा कि आर एस एस वाले बीजेपी को पीछे धकेल कर वी एच पी से ही राजनीतिक काम करवाने की सोच रहे थे . लेकिन ऐसा नहीं हुआ और चुनाव लड़ने का काम बीजेपी के जिम्मे ही रहा . १९८५ से अब तक बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को ही अपना स्थायी भाव मानकर चल रही है ..कांग्रेस और अन्य सेकुलर पार्टियों ने अपना राजनीतिक काम ठीक से नहीं किया  इसलिए देश में हिन्दू राष्ट्रवाद का खूब प्रचार प्रसार हो गया . जब बीजेपी ने हिन्दू राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया तो उस विचारधारा को मानने वाले बड़ी संख्या में उसके साथ जुड़ गए .वही लोग १९९१ में अयोध्या आये थे जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी . बाबरी मस्जिद को तबाह करने पर आमादा इन लोगों के ऊपर गोलियां भी चली थीं .वही लोग १९९२ में अयोध्या आये थे जिनकी मौजूदगी में बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ , वही लोग साबरमती एक्सप्रेस में सवार थे जब गोधरा रेलवे स्टेशन पर उन्हें जिंदा जला दिया गया . जिसके बाद गुजरात में बहुत बड़ा दंगा  हुआ था.  उसके बाद से लगभग हर चुनाव में बीजेपी के लोग रामजन्मभूमि के मुद्दे को केंद्र में रखते रहे.

आज केंद्र सहित बहुत सारे राज्यों में आर एस एस के सहयोगी संगठन बीजेपी की सरकारें हैं . `1984 में जिस बीजेपी को लोकसभा में दो सीटें मिली थीं आज वह देश के अधिकतर हिस्सों में सत्ता के केंद्र में है . आज बीजेपी की राजनीति की बुलंदी में बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि के विवाद का बड़ा योगदान है .

 

बेटियों की शान को याद दिलाने का दिन ---daughters’ day


शेष नारायण सिंह

आज daughters’ day है ,बेटियों का दिन . सितम्बर के चौथे रविवार को मनाया जाता है .इसकी शुरुआत भारत से ही हुयी और अब पूरी दुनिया में मनाया जाता है . मुझे बचपन से ही कुछ ऐसे संस्कार मिले थे कि बेटियों को पराया धन वगैरह कभी नहीं माना. हालांकि मेरे गाँव में बेटियों की शिक्षा को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती थी . गाँव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पश्चिम में नरेन्द्रपुर का प्राइमरी स्कूल था और गाँव के दक्खिन करीब तीन किलोमीटर दूर लम्भुआ का मिडिल स्कूल था . नरेन्द्रपुर तो जिले के सबसे पुराने स्कूलों में एक है , शायद 1885 के पहले खुला रहा होगा. उस स्कूल में हमारे आसपास के गाँवों के लगभग सभी सवर्ण परिवारों के लड़के पढ़ने गए थे . हमारे गाँव में हमारी पीढ़ी के पहले के ठाकुर साहबान ज्यादातर लम्भुआ तक ही पढ़े थे , पास फेल की बात नहीं करूंगा क्योंकि मिडिल में पास बहुत कम लोग हुए थे. हमारे काका स्व भानु प्रताप सिंह और उनके हमउम्र राम ओंकार सिंह और लालता सिंह ने हाई स्कूल की पढ़ाई की जहमत उठाई थी ,बाकी सब लम्भुआ की पढ़ाई के दौरान ही शादी के बंधन में बांध दिए गए और पढाई छोड़ दी . हमारे गाँव में लड़कियों के स्कूल जाने का रिवाज़ नहीं था. हमारी पीढ़ी की लडकियां प्राइमरी स्कूल में भी नहीं गईं. मेरे बाद की पीढ़ी की कुछ लडकियां नरेन्द्रपुर गईं . उसके बाद ही गाँव में स्कूल खुल गया . फिर लडकियां प्राइमरी में जाने लगीं . यह घटना साठ साल पहले की है . अब तो मेरे गाँव की सडक पर सुबह स्कूल जाने वाली बच्चियों का तांता लगा रहता है सभी लडकियां साइकिलों पर सवार होकर जाती हैं . अब हमारे गाँव की लडकियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं . शादी ब्याह भी अब 12-13 साल की उम्र में नहीं होता . बीस साल की उम्र के बाद ही शादियां होती हैं . गाँव में रहकर पढ़ाई करने वाली एकाध लड़कियों के प्रेमविवाह भी हुए हैं , हालांकि अभी ग्रामीण माहौल में अंतरजातीय विवाह का चलन नहीं शुरू हुआ है . सब बदल रहा है . हमारी अपनी सभी बेटियों ने स्नातकोत्तर शिक्षा पाई है , मेरे भाई बहनों की कुल छः बेटियों में सभी उच्चशिक्षित हैं , दो ने पी एच डी भी कर लिया है .
मेरे बचपन में ऐसा नहीं था. मेरी बड़ी बहन की कोई भी सहेली प्राइमरी में पढने नहीं गयी. मेरी छोटी बहन ने प्राइमरी बहुत ही अच्छे नंबरों से पास किया था लेकिन बाबू ने लम्भुआ नहीं जाने दिया . उस माहौल में मेरी मां ने मुझे यह प्रेरणा दी थी कि सभी बच्चों को उच्च शिक्षा देना ज़रूरी है . माहौल भी बदल रहा था और दृढ़ संकल्प भी था .इसलिए बच्चियों की उच्चशिक्षा के लिए दिनरात कोशिश की . अब सभी लड़कियां अपना जीवन अपने तरीके से जी रही हैं . उनकी कुछ सहेलियां भी मेरी बेटियाँ ही हैं . गोपाल दादा और लल्लन दादा की बेटियाँ भी मेरी अपनी बेटियाँ है. गुड्डी , टीनी चा , बुलबुल , म्याऊँ ,डीबी ,डॉ नीता ,शिखा ,प्रीति, गंगा, मनीषा ,मेघना, मोहिता, मौसमी, गोलू,मुन्नी, नीलू,नेहा, निमिषा , बिट्टू, पिंकी,निशा, प्रतिमा यह सारी तो ऐसी बेटियाँ हैं जिनको मेरी खैरियत की चिंता रहती ही रहती है .इसके अलावा मेरे साथ काम कर चुकी बहुत सारी छोटी बच्चियां भी मुझे पितातुल्य मानती हैं . मेरी कुछ स्टूडेंट्स मुझे पिता जैसा मानती हैं . बच्चियों के इमोशनल संकट के दौरान अगर ज़रा सा भी मदद कर दो तो वे आपको अपने बाप जैसा मानने लगती हैं. इस सभी बेटियों को आज दिल की गहराइयों से आशीर्वाद देता हूं और दुआ करता हूँ कि यह लडकियां ज़िंदगी में हमेशा फतहयाब रहें .
बेटियों के महत्व का पता तब चलता है जब आप के ऊपर कोई संकट आता है . 2016 में मैं बहुत बुरी तरह से बीमार पड़ गया था . करीब डेढ़ महीने अस्पताल में रहा . मेरी सबसे छोटी वाली बिटिया ने चार्ज ले लिया . अस्पताल में सैकड़ों टेस्ट हुए , सभी टेस्ट में उनकी मौजूदगी साफ़ देखी जा सकती थी . मंझली ने सारा लाजिस्टिक्स संभाला .उसके बाद चार साल हो गए लेकिन मेरे स्वास्थ्य की हर घटना पर लड़कियों की नज़र रहती है . उनकी मां के पाँव में दर्द था , घुटने बेकार हो चुके थे . यह तय था कि सर्जरी के अलावा कोई रास्ता नहीं है लेकिन सर्जरी टल रही थी . एक दिन मेरे एक पड़ोसी वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि कोई हड्डियों के डाक्टर हैं जो सुई लगा दें तो दो तीन महीने के लिए दर्द ख़त्म हो जाता है . मैंने सुई लगवा दी . हमारी टीनी चा लंदन में थीं, उनको जैसे ही पता लगा कि सुई लगी है, उन्होंने अपना लंदन का कार्यक्रम रद्द किया और सीधे बंगलौर पंहुचीं , दिल्ली में रहने वाली अपनी बड़ी बहन को अम्मा को लेकर बंगलोर पंहुचने की हिदायत दी और तीन दिन के अन्दर सर्जरी हो गयी. बाद में मुझे बताया कि अम्मा ने अगर अपने दर्द का इजहार कर दिया है इसका मतलब वे बहुत परेशान हैं . वहां उनकी अम्मा की तीमारदारी में आपकी सहेलियां साथ थीं . इस तस्वीर में अम्मा के साथ वे सारी बच्चियां देखी जा सकती हैं . मेरे यहां जो पुत्रवधू भी आई , वह भी मेरी बेटी है , daughters day पर उसी रुतबे से रहती है जैसे बाकी सभी बेटियाँ . वह हमारे सीनियर पत्रकार की बेटी है . कोरोना के इस दौर में मुंबई में रहने वाली यह बेटी खुद भी वायरस की चपेट में आ गयी थी , उसके पति भी कोरोना से बीमार हो गए थे .सब संभाल लिया .मां की भी देखभाल पूरी तरह से किया . अब सब ठीक हैं . सबका ख्याल रखा , मेरे स्वास्थ्य के बारे में रोज़ चिंता रखी.
कोरोना के सिलसिले में मार्च से शुरू होने वाले लॉकडाउन में मेरी पत्नी बंगलोर में छोटी बिटिया के यहां थीं, पूरा लॉकडाउन वहीं बिताया और स्वस्थ रहीं .मेरी मंझली बेटी दिल्ली में रहती है, उसने यहाँ मेरी पूरी चौकीदारी रखी. हमारी सभी बेटियाँ यह मान कर चलती हैं कि अम्मा-पापा को कुछ नहीं मालूम. हमारी सारी ज़रूरतों पर वे हेडमास्टर भाव से निगरानी रखती हैं . उनको यह भी पता रहता है कि मुझे या उनकी अम्मा को कब जाँच के लिए जाना है .मेरे डॉ सरीन ,डॉ सुमन लता , डॉ पी के नायक , डॉ अनुपम भार्गव ,डॉ एस बी सिंह और डॉ वी पी सिंह सबसे उनकी जान पहचान है .एक खुशी की बात यह है कि सारी बेटियाँ यह मानती हैं कि मुझे जब तक काम मिलता है , काम करते रहना चाहिए क्योंकि खाली बैठने पर मैं बीमार हो जाउंगा .
आज अपनी बेटियों के सम्मान में सर झुकाते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि सभी बेटियाँ शान और इज्ज़त की ज़िंदगी जिएं और अपने मातापिता की दरोगा बनी रहें .

Wednesday, September 23, 2020

धर्म का उद्देश्य ' दूसरों के सुख में संतोष' है

 

 


 

शेष नारायण सिंह

 

नवरात्र शुरू होने वाले हैं . उसके बाद देश में त्योहारों का  सीज़न   शुरू हो जाएगा .पूरा भारत धर्ममय हो जाएगा .यही समय है जब  समाज के नेताओं को आगे आकर धर्म के वास्तविक स्वरूप पर बहस का माहौल बनाना चाहिए . असली धर्म के किसी भी कार्य में संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं होती . जब घोषित रूप से धर्म का उद्देश्य ' दूसरों के सुख में संतोष' ही है तो धर्म के नाम पर हिंसा तो किसी तरह से धर्म का काम हो ही नहीं सकती . इसलिए वर्तमान धार्मिक नेताओं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले राजनीतिक नेताओं को यह तय करना पडेगा कि जब धर्म में ' मैत्रीकरुणा एवं मुदिता' सबसे ज़रूरी शर्त है तो अपने समर्थकों को हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के लिए क्यों उकसाते हैं ?  यह बात सबरीमाला में भी लागू होनी चाहिए और अयोध्या में भी . मेरी जो भी धार्मिक चेतना है उसके केंद्र में संत तुलसीदास ही विराजते  हैं. उन्होंने रामचरितमानस में स्पष्ट कह दिया है कि ,”' परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई “ . इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरान शरीफ में भी मुख्य बात ' मैत्रीकरुणा एवं मुदिता'  के इर्दगिर्द ही केन्द्रित है इसलिए इस्लाम में भी किसी तरह की हिंसा की गुंजाइश नहीं है लेकिन अजीब बात है कि विदेशों में ,खासकर पाकिस्तान में बैठे लोग धर्म के नाम पर भारत  की एक बड़ी आबादी को  अधार्मिक काम करने को प्रेरित कर रहे हैं . उनकी किसी भी चाल का विरोध किया जाना चाहिए.  धार्मिक रूप से अशिक्षित हिन्दुओं को राजनीतिक लाभ के लिए भड़काने वालों को भी उनके मंसूबों में नाकामयाब करने की ज़रूरत है .  

 

धर्म का अर्थ वास्तव में मानव जीवन में आनंद की स्थिति उत्पन्न करना है . नास्तिक और अधार्मिक होते ही भी आप अपने बच्चों के साथ अपने सामाजिक परिवेश में ,खासकर नवरात्र के दौरान धार्मिक माहौल का आनंद लेते हैं . धर्म के और भी बहुत सारे उद्देश्य होंगें लेकिन यह भी एक महत्वपूर्ण  उद्देश्य है.  अपने देश में बहुत सारे ऐसे दर्शन हैं जिनमें ईश्वर की अवधारणा ही  नहीं है . ज़ाहिर है उन दर्शनों पर  आधारित धर्मों  में ईश्वर की पूजा का कोई विधान नहीं होगा. देश में नास्तिकों की भी बहुत बड़ी संख्या है . उनके लिए भी किसी देवी देवता का पूजन बेमतलब है . लेकिन सामाजिक स्तर पर धार्मिक गतिविधियां होती रहती हैं और  नास्तिक भी उसमें शामिल होते हैं .  ऐसा इसलिए होता  है कि अपनी मूल डिजाइन में कोई भी धर्म समावेशी होता है , वह अधिकतम संख्या को अपने आप में शामिल करने में विश्वास करता है .

धर्म के सम्बन्ध में बहस राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में भी चली थी. उस बहस का केंद्र महात्मा गांधी के व्यक्तित्व के इर्दगिर्द ही था .उस दौर में राष्ट्रीय आन्दोलन के अंदर जो प्रगतिशील आन्दोलन की धारा थी उसके लिए धर्म की  मार्क्सवादी व्याख्या को भारतीय   सन्दर्भ में समायोजित करने की  चुनौती थी . आखिर में  तय हुआ कि धर्म का जो सांगठनिक पक्ष है वह तो कर्मकांडी लोगों का ही क्षेत्र है लेकिन धर्म से  जुडी जो  सांस्कृतिक गतिविधियाँ हैं उनका धर्म के कर्मकांड से कोई लेना देना नहीं है .वह वास्तव में जनसंस्कृति का हिस्सा है . ऐसा इसलिए भी  है कि पूजा पद्धति में वर्णित पूजा विधियां तो लगभग सभी जगह  एक ही होती हैं और उनका निष्पादन धार्मिक कार्य करने वाले करते हैं . यह सभी धर्मों में  अपने अपने तरह से संपादित किया जाता  है लेकिन उसके साथ वे कार्य जिसमें आम जनता पहल करती है और शामिल होती है वह जनभावना होती है .उसमें मुकामी संस्कृति अपने  रूप में प्रकट होती है .बंगाल में दुर्गापूजा तो धार्मिक जीवन का हिस्सा है लेकिन उसी स्तर पर वह लोकजीवन का भी  हिस्सा है . पूजा पंडालों  में देश-काल के हवाले से हमेशा ही बदलाव होते रहते हैं . उसी तरह से पूजा के अवसर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी  हालाँकि धार्मिक होते हैं लेकिन उनका  संचारी भाव लोकजीवन और क्षेत्रीय संस्कृति से  जुड़ा हुआ होता  है .

पश्चिम बंगाल में जब १९७७ में लेफ्ट फ्रंट की सरकार बनी तो  विचारधारा के स्तर पर यह चर्चा एक बार फिर शुरू हुयी और यही सही पाया गया कि संस्कृति की रक्षा अगर करनी है तो उससे जुड़े  आम आदमी के काम को महत्व देना ही होगा .जहां तक धर्म के शुद्ध रूप की बात है उसमें भी किसी तरह के झगड़े का स्पेस नहीं होता .दर्शन शास्त्र के लगभग सभी विद्वानों ने धर्म को परिभाषित करने का प्रयास किया है। धर्म दर्शन के बड़े ज्ञाता गैलोबे की परिभाषा लगभग सभी ईश्वरवादी धर्मों पर लागू होती है। उनका कहना है कि -''धर्म अपने से परे किसी शक्ति में श्रद्धा है जिसके द्वारा वह अपनी भावात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और जीवन में स्थिरता प्राप्त करना है और जिसे वह उपासना और सेवा में व्यक्त करता है। इसी से मिलती जुलती परिभाषा ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी दी गयी है जिसके अनुसार ''धर्म व्यक्ति का ऐसा उच्चतर अदृश्य शक्ति पर विश्वास है जो उसके भविष्य का नियंत्रण करती है जो उसकी आज्ञाकारिताशीलसम्मान और आराधना का विषय है।"


भारत में भी कुछ ऐसे धर्म हैं जो सैद्धांतिक रूप से ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। जैन धर्म में तो ईश्वर की सत्ता के विरुद्ध तर्क भी दिए गये हैं। बौद्ध धर्म में प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत को माना गया है जिसके अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है और यह संसार कार्य-कारण की अनन्त श्रंखला है। इसी के आधार पर दुख के कारण स्वरूप बारह कडिय़ों की व्याख्या की गयी है। जिन्हें द्वादश निदान का नाम दिया गया है।इसीलिए धर्म वह अभिवृत्ति है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र कोप्रत्येक क्रिया को प्रभावित करती है। इस अभिवृत्ति का आधार एक सर्वव्यापक विषय के प्रति आस्था है। यह विषय जैन धर्म का कर्म-नियमबौद्धों का प्रतीत्य समुत्पाद का सिद्धांत  या वैष्णवोंईसाइयों और मुसलमानों का ईश्वर हो सकता है। आस्था और विश्वास में अंतर है। विश्वास तर्क और सामान्य प्रेक्षण पर आधारित होता है लेकिन आस्था तर्क से परे की स्थिति है। पाश्चात्य  दार्शनिक इमैनुअल  कांट ने आस्था की परिभाषा की है। उनके अनुसार ''आस्था वह है जिसमें आत्मनिष्ठ रूप से पर्याप्त लेकिन वस्तुनिष्ठ रूप से अपर्याप्त ज्ञान हो।"आस्था का विषय बुद्धि  या तर्क के बिल्कुल विपरीत नहीं होता लेकिन उसे तर्क की कसौटी पर कसने की कोशिश भी नहीं की जानी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि जो धार्मिक मान्यताएं बुद्धि के विपरीत होंवे स्वीकार्य नहीं। धार्मिक आस्था तर्कातीत है तर्क विपरीत नहीं। सच्चाई यह है कि धार्मिक आस्था का आधार अनुभूति है। यह अनुभूति सामान्य अनुभूतियों से भिन्न है। इसी अनुभूति को रहस्यात्मक अनुभूति या समाधिजन्य अनुभूति कहा सा सकता  है। धार्मिक मान्यता है कि यह अनुभूति सबको नहीं होती केवल उनको ही होती है जो अपने आपको इसके लिए तैयार करते हैं।


इस अनुभूति को प्राप्त करने के लिए धर्म में साधना का मार्ग बताया गया है। इस साधना की पहली शर्त है अहंकार का त्याग करना। जब तक व्यक्ति तेरे-मेरे के भाव से मुक्त नहीं होगातब तक चित्त निर्मल नहीं होगा और दिव्य अनुभूति प्राप्त नहीं होगी। इस अनुभूति का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि इस अनुभूति के वक्त ज्ञाताज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुरी नहीं रहती। कोई भी साधक जब इस अनुभूति का वर्णन करता है तो वह वर्णन अपूर्ण रहता है। इसीलिए संतों और साधकों ने इसके वर्णन के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीक उसी परिवेश के लिए जाते हैंजिसमें साधक रहता है इसीलिए अलग-अलग साधकों के वर्णन अलग-अलग होते हैंअनुभूति की एकरूपता नहीं रहती।
लेकिन इस बात में बहस नहीं है कि इस दिव्य अनुभूति का प्रभाव सभी देशों में रहने वाले साधकों पर एक सा पड़ता है। यही नहीं यह सर्वकालिक भी है .

आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि सन्त चरित्र है। सभी धर्मों के संतों का चरित्र एक सा रहता है। सन्तों का जीवन के प्रति दृष्टिïकोण बदल जाता हैऐसे सन्तों की भाषा सदैव प्रतीकात्मक होती है। इसका उद्देश्य किसी वस्तुसत्ता का वर्णन करना न होकरजिज्ञासुओं तथा साधकों में ऊंची भावनाएं जागृत करना होता है। सन्तों में भौतिक सुखों के प्रति उदासीनता का भाव पाया जाता है। लेकिन यह उदासीनता नकारात्मक नहीं होती। पतंजलि ने साफ साफ कहा है कि योग साधक के मन में मैत्रीकरुणा एवं मुदिता अर्थात दूसरों के सुख में संतोष के गुण होने चाहिये।
धर्म की बुलंदी यह  है कि जो वास्तव में धार्मिक होते हैं वे मानवीय तकलीफों के प्रति उदासीन नहीं होते। रामचरित मानस के अरण्यकांड के अंत मे संत तुलसीदास ने सन्तों के स्वभाव की विवेचना की है। कहते हैं-संत सबके सहज मित्र होते हैं-श्रदधा , क्षमामैत्री और करुणा उनके स्वाभाविक गुण होते हैं। मैत्रीकरुणामुदिता और सांसारिक भावों के प्रति उपेक्षा ही संत का लक्षण है .किसी भी धर्म की सर्वोच्च उपलब्धि सन्त का चरित्र ही है।

 

खेती के कारपोरेटीकरण का विधेयक अब देश का कानून बन गया है .


 

शेष नारायण सिंह

 

सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बाद भी  खेती से सम्बंधित विधेयक पास  कर दिया . लोकसभा में तो सरकार के पास अपनी ही पार्टी के सदस्यों का स्पष्ट बहुमत था ,वहां पास होना ही था. लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के कई नेताओं ने मतविभाजन के बाद बिल को रोकना चाहा लेकिन उपाध्यक्ष ने ध्वनिमत से  पास करवा कर लोकसभा में पास  हुए दोनों विधेयकों को  राज्यसभा की हरी झंडी दे दी और राष्ट्रपति भवन का रास्ता दिखा दिया . राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वह विधेयक क़ानून बन गया . ऐसा लगता   है कि ध्वनिमत का सहारा इसलिए लेना पडा क्योंकि सरकार को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर रही पार्टियों ने भी इन विधेयकों का विरोध किया है . बहरहाल अब तो क़ानून बन गया  है .इस  कानून के बन जाने के बाद खेती  किसानी वही नहीं रहेगी जो अब तक रहती  रही है . हमेशा से ही इस देश का किसान खेती की उपज के ज़रिये  सम्पन्नता के सपने देखता रहा है . हर स्तर से मांग होती रही है कि  खेती में सरकारी निवेश  बढाया जाय , भण्डारण और विपणन की सुविधाओं के ढांचागत निवेश का बंदोबस्त किया जाय जिससे कि किसान को अपने उत्पादन को कुछ दिन तक मंडी में भेजने से रोकने की ताकत आये  जिससे वह अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर न हो. एक बात बिलकुल अजीब लगती  है कि शहरी मध्यवर्ग के लिए हर चीज़ महंगी मिल रही है जिसको किसान ने पैदा किया है . उस चीज़ को   पैदा करने वाले किसान को उसकी वाजिब कीमत नहीं मिल रही है . किसान से जो कुछ भी सरकार खरीद रही है उसका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है .. किसान को उसकी लागत नहीं मिल रही है और शहर का उपभोक्ता कई गुना ज्यादा कीमत दे रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि बिचौलिया मज़े ले रहा है . किसान और शहरी मध्यवर्ग की मेहनत का एक बड़ा हिस्सा वह हड़प रहा है.और यह बिचौलिया गल्लामंडी में बैठा कोई आढ़ती नहीं है . वह  आवश्यक वस्तुओं के क्षेत्र में सक्रिय कोई पूंजीपति भी हो सकता है और किसी भी बड़े नेता का व्यापारिक पार्टनर भी .इस हालत को संभालने का एक ही तरीका है कि जनता अपनी लड़ाई खुद ही लड़े. उसके लिए उसे मैदान लेना पड़ेगा और सरकार की पूंजीपति परस्त नीतियों का हर मोड़ पर विरोध करना पड़ेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता.  आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी है . उसकी सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल है . उसको मालूम है कि पंजाब का किसान मौजूदा बिलों का भारी विरोध करेगा इसलिए उनके पार्टी के मालिकों की घर की बहू ने केंद्र सरकार के मंत्री  पद से इस्तीफा दे दिया . लेकिन अभी भी बीजेपी सरकार को अकाली दल का  समर्थन मिल रहा है .अकाली दल के नेता सुखबीर  सिंह बादल आवाजें तो तरह तरह की निकाल रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं .उन्होंने किसानों के बारे में पारित विधेयकों को एहसान फरामोशी के बिल कहा है . आम तौर पर बीजेपी को संसद में समर्थन देने वाली पार्टियों बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने भी  इन विधेयकों का विरोध किया है .

 

खेती में सरकारी  निवेश की बात हमेशा से होती रही  है.१९६५ के बाद जो हरित क्रान्ति आयी थी ,वह भी बहुत बड़े पैमाने पर सरकारी निवेश का नतीजा थी.  सरकार ने  रासायनिक खाद, सिंचाई के साधन ,बीज जैसी ज़रूरी चीजों को सब्सिडी के रास्ते सस्ता कर दिया था . सरकारी खरीद की व्यवस्था की गयी थी . न्यूनतम मूल्य की गारंटी की गयी थी  यानी आढ़ती या किसी ज़खीरेबाज़ की मर्जी से अपनी फसल बेचने के लिए किसान मजबूर नहीं था. अपने उत्पादन का कंट्रोल उसके पास ही था .पिछले चालीस साल से सरकार से उसी तरह की एक क्रान्ति की बात की जाती रही है .उम्मीद की जा रही थी कि कृषि उपज के भंडारण और विपणन में बड़े पैमाने पर सरकारी पूंजी का   निवेश कर दिया जाए , अमूल जैसी  कंपनियों की व्यवस्था कर दी जाये और किसान को अधिक उत्पादन के अवसर उपलब्ध कराये जाएँ . अगर ऐसा हुआ होता तो किसान की सम्पन्नता बढ़ती और  देश में तेज़ी से बढ़ रहे मध्यवर्ग के परिवारों में किसान भी बड़ी संख्या में शामिल  होते . लेकिन सरकार ने सरकारी पूंजी  निवेश नहीं किया . उससे पलट कारपोरेट क्षेत्र को खेती किसानों के उत्पादन पर नियंत्रण की खुली छूट दे दी. सरकारी मंडियां ख़त्म कर दी गयीं , किसान को निजी पूंजी के मालिकों के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया.  इसका मतलब यह नहीं है कि मुख्य विपक्षी पार्टी ,कांग्रेस  कोई बहुत बड़ी किसान हितैषी पार्टी है . जब सरकार में थी तो वह भी यही करना चाहती थी . इसलिए इस बिल का विरोध असली मुद्दों पर  नहीं किया जा रहा था .सारा फोकस न्यूनतम समर्थन मूल्य ( एम एस पी ) पर केन्द्रित कर दिया गया  है . सरकार का कहना है कि एम एस पी तो रहेगा . लेकिन सरकार अब कोई खरीद नहीं करेगी . यानी जो कारपोरेट  खेती की उपज खरीदेगा उसके लिए दिशा निर्देश के तौर  पर एम एस पी घोषित कर दिया  जाएगा लेकिन खरीद वह अपनी मर्जी से करेगा . सैद्धांतिक रूप से  उसकी खरीद की कीमत एम एस पी से ज्यादा भी हो सकती है लेकिन अगर सरकारी खरीद का ढांचा ख़त्म हो गया तो उसको मनमानी करने से कौन रोक पायेगा. जनता दल यू केंद्र सरकार का एक बड़ा सहयोगी दल है .इसके नेता के सी त्यागी ने एक लेख लिखकर  बताया है कि प्रधानमंत्री से वायदा किया  है कि एम एस पी रहेगा . केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने भी कहा है कि एम एस पी रहेगा लेकिन वह क़ानून का   हिस्सा कभी नहीं रहा .

पहले भी जब सरकारी अफसरमंत्री , सत्ताधारी पार्टियों के नेता  न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात करते हैं थे तो लगता था कि वे किसानों को कुछ खैरात में दे रहे हैं .. कई बार तो ऐसे लगता है जैसे किसी अनाथ को या भिखारी को कुछ देने की बात की जा रही हो. यह किसान का अपमान है और उसकी गरीबी  का मजाक है . वह अपने को दाता समझते थे और  किसान को प्रजा ..  राजनीतिक नेता और मंत्री जनता के वोट  की मदद से सत्ता पाते हैं . अजीब बात है कि जिस देश में सत्तर प्रतिशत आबादी   किसानों की है वहां यह  सत्ताधीश सबसे ज़्यादा उसी किसान को बेचारा बना देते हैं .

किसानों के हित के लिए सरकार में जो भी योजनायें बनती  हैं वे किसानों को अनाज और खाद्य पदार्थों के उत्पादक के रूप में मानकर चलती  हैं . नेता लोग किसान को सम्पन्न नहीं बनने देना चाहते. इस मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत है.  किसानों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह  है कि कि लागत का मूल्य नहीं मिलता . इसका कारण यह है कि किसान के लिए बनी हुयी संस्थाएं  उसको प्रजा समझती हैं . न्यूनतम मूल्य देने के लिए बने संगठन कृषि लागत और मूल्य आयोग का तरीका वैज्ञानिक नहीं है .वह पुराने लागत के आंकड़ों की मदद से आज की फसल की कीमत तय करते हैं जिसकी वजह से किसान ठगा रह जाता है .फसल बीमा भी बीमा कंपनियों के लाभ के लिए डिजाइन किया गया है .. खेती की लागत की चीज़ों की कीमत लगातार बढ़ रही है लेकिन किसान की बात को कोई भी सही तरीके से नहीं सोच रहा है जिसके कारण इस देश में किसान तबाह होता जा रहा है .सरकारी आंकड़ों में जी डी पी में तो वृद्धि हो रही है जबकि खेती की विकास दर  बहुत कम हैं ,कभी कभी तो नकारात्मक हो जाती हैं . किसानों को जो सरकारी समर्थन मूल्य मिलता है वह भी लागत मूल्य से कम होता है .सरकारी खरीद होती  नहीं और निजी हाथों में फसल बेचने पर जो दाम  मिलता है बहुत कम होता है

अब सरकार ने कानून तो पास करवा लिया है लेकिन उस पर दबाव पूरा है . 25 सितम्बर को कुछ राज्यों में किसानों ने बंद का आवाहन किया है . देशव्यापी आन्दोलन भी चल रहा है . किसानों पर सरकार ने एक और फैसला आनन फानन में कर लिया  है . संसद के सत्र के आख़िरी दिन आयी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की एक रिपोर्ट में आयोग ने सीधे किसानों को सब्सिडी देने की सिफारिश करते हुए सालाना हजार रुपये देने की सिफारिश कर दी है आयोग के मुताबिककिसानों को 2,500 रुपये की दो किस्तों में भुगतान किया जाए। पहली किस्त खरीफ की फसल शुरू होने से पहले और दूसरा भुगतान रबी की शुरुआत में किया जाएताकि किसानों को बुआई में धन की कमी न हो। अगर सरकार इन सिफारिशों को मंजूर करती हैतो अभी कंपनियों को दी जाने वाली सब्सिडी प्रक्रिया समाप्त कर दी जाएगी। किसान अभी यूरियापोटाश और फॉस्फेट को बाजार खाद कंपनियों को दी गयी सब्सिडी पर खरीदते हैं।इन कंपनियों को खाद की बिक्री के बाद सरकार सब्सिडी का भुगतान करती है। नई प्रक्रिया के तहत किसानों को उर्वरक बाजार मूल्य पर मिलेंगे और सब्सिडी सीधे उनके खाते में आएगी और किसान को कंपनी की  तरफ से तय किये गए दाम पर खाद खरीदनी  पड़ेगी . यहाँ भी खाद कंपनी को मनमानी की छूट दे दी गयी है .

अब सरकार ने  खेती से सम्बंधित सारी पहल निजी हाथों में सौंप दिया है . ठेके पर खेती की बात भी की जा रही है . नए कानून में यह व्यवस्था  है कि कोई भी कंपनी किसान से बुवाई के पहले ही उसकी उपज का दाम तय करके उससे  समझौता कर लेगी . सरकार इस को बहुत बड़ी उपलब्धि बता रही है .जबकि इसकी सचाई यह है कि किसान को अपनी उपज की कीमत पर कोई कंट्रोल नहीं रहेगा . जिस दाम पर भी समझौता हुआ है ,उससे ज़्यादा दम अगर कहीं मिल रहा है तो वह नहीं बेच सकेगा. इस देश के कारपोरेट संस्कृति ऐसी है कि किसान को खूब दबाकर दाम तय कर लिया जाएगा .कुल मिलाकर नए कानून के बाद जो स्थितियां बनेगीं उसमें किसान की पैदावार की लगाम उसके हाथ में नहीं , कारपोरेट कंपनी के हाथ में होगी.  और अगर ठेके की खेती करने वाली कोई कंपनी आ जायेगी तो किसान को उसकी ज़मीन का किराया ही हाथ आयेगा , उपज से उसका कोई  नहीं रहेगा .इस कानून ने खेती किसानी  को कारपोरेट हाथों में सौंप दिया है .