Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस की बैठक में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव नेहरू ने प्रस्तुत किया था



शेष नारायण सिंह
महात्मा गांधी की अगुवाई में देश ने १९४२ में अंग्रेजों भारत छोड़ा का नारा दिया था . उसके पहले क्रिप्प्स मिशन भारत आया था जो भारत को ब्रितानी साम्राज्य के अधीन किसी तरह का डामिनियन स्टेटस देने की पैरवी कर रहा था. देश की अगुवाई की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने स्टफोर्ड क्रिप्स को साफ़ मना कर दिया था. कांग्रेस ने १९२९ की लाहौर कांग्रेस में ही फैसला कर लिया था कि देश को पूर्ण स्वराज चाहिए . लाहौर में रावी नदी के किनारे हुए कांग्रेस के अधिवेशन में तय किया गया था कि पार्टी का लक्ष्य अब पूर्ण स्वराज हासिल करना है .१९३० से ही देश में २६ जनवरी के दिन स्वराज दिवस का जश्न मनाया जा  रहा  था. इसके पहले कांग्रेस का उद्देश्य होम रूल था लेकिन अब पूर्ण स्वराज चाहिए था . कांग्रेस के इसी अधिवेशन की परिणति थी की देश में १९३० का महान आन्दोलन सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ. नमक सत्याग्रह या गांधी जी का दांडी मार्च इसी कांग्रेस के इसी फैसले को लागू करने के लिए किए  गए थे .वास्तव में १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया थी क्योंकि जब १९३० के आन्दोलन के बाद अँगरेज़ सरकार ने भारतीयों को ज्यादा गंभीरता से लेना शुरू किया लेकिन वादा खिलाफी से बाज़ नहीं आये तो आन्दोलन लगातार चलता रहा . इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिस कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे उसी अधिवेशन में देश ने पूर्ण स्वराज की तरफ पहला क़दम उठाया था .

नौ अगस्त को भारत छोड़ा आन्दोलन  की शुरुआत के ७५ साल पूरे हुए . इस अवसर पर लोकसभा में ‘भारत छोडो ‘ आन्दोलन को याद किया गया .लेकिन एक अजीब बात देखने को मिली कि लोकसभा में अपने भाषणों में न तो प्रधानमंत्री और न ही लोकसभा की स्पीकर ने जवाहरल लाल नेहरू का नाम लिया . प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सन बयालीस के महात्मा गांधी के  नारे  करेंगें या मरेंगें ‘ के नारे की तर्ज़ पर ‘ करेंगें और करके रहेंगें’  का नया नारा दिया . उन्होंने गरीबीकुपोषण और निरक्षरता को देश के सामने मौजूद चुनौती बताया और सभी राजनीतिक दलों से अपील किया कि इस  चुनौती से मुकाबला करने के लिए सब को एकजुट होना पडेगा. उन्होंने इस बात पर दुःख जताया कि महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य का सपना भी अधूरा है .प्रधानमंत्री ने  सभी बहादुर नेताओं के बलिदान को याद किया. उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के सभी लोगों के एकजुट होने की बात की और कहा कि जब आज़ादी के नेता जेल चले गए थे तो कुछ नौजवान नेताओं ने आन्दोलन का काम संभाल लिया . इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने लाल बहादुर शास्त्रीराम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का नाम लिया . यह तीनों नेता सन बयालीस में नौजवान थे और सक्रिय थे . उन्होंने  लोकमान्य तिलकनेताजी सुभाष चन्द्र बोस ,भगत सिंह , सुखदेवचंद्रशेखर आज़ाद को भी याद किया जब कि इनमें  से कोई भी भारत छोडो आन्दोलन में शामिल  नहीं हुआ था का .उन्होंने यह ज़िक्र नहीं किया कि नौ अगस्त के दिन पूरी की पूरी कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों को गिरफ्तार  कर लिया गया था . महात्मा गांधी और महादेव  देसाई को पुणे के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार करके रखा गया था जबकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बाकी सदस्यों को अहमदनगर जेल भेज दिया गया था . प्रधानमंत्री ने इन नेताओं में से किसी का नाम नहीं लिया .अहमदनगर किले की जेल  में जो नेता बंद थे उनमें जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेलमौलाना अबुल कलाम आज़ाद ,आचार्य कृपलानी ,नरेंद्र देवआसिफ अलीगोविन्द वल्लभ पन्त आदि थे. प्रधानमंत्री ने इनमें से किसी का नाम नहीं लिया .इस आन्दोलन को प्रधानमंत्री ने  आज़ादी के आन्दोलन में अंतिम जनसंघर्ष बताया और कहा कि उसके पांच साल बाद ही अँगरेज़ भारत छोड़ कर चले गए.

लोकसभा में आयोजित  कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए स्पीकर सुमित्रा महाजन ने महात्मा गांधी की अगुवाई में शुरू हुए भारत छोडो आन्दोलन पर अपना वक्तव्य दिया . उन्होंने लोकमान्य तिलक ,वी डी सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लिया . हालांकि लोकमान्य तिलक की तब तक मृत्यु हो चुकी थी और दीन दयाल उपाध्याय सन ४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल नहीं हुए थे .

देखने में आया है कि जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है तब से देश के निर्माण और आज़ादी की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू के योगदान को नज़रंदाज़ करने का फैशन हो गया है . इसके पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज बांडुंग कान्फरेंस की याद में एक सम्मलेन में गयी थीं , वहां भी उन्होंने नेहरू  का नाम नहीं लिया जबकि चेकोस्लोवाकिया के टीटो और मिस्र के नासिर ने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर  बांडुंग सम्मेलन के बाद निर्गुट सम्मलेन को ताक़त दिया था . बाद में तो अमरीका और रूस के  सहयोगी देशों के अलावा लगभग पूरी  दुनिया ही उसमें शामिल हो गयी थी.

सवाल यह उठता है कि जवाहरलाल नेहरू के योगदान का उल्लेख किये बिना भारत के १९३० से १९६४ तक के इतिहास की बात कैसे की जा सकती है. जिस व्यक्ति को महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , जिस व्यक्ति की अगुवाई में देश की पहली सरकार बनी थी, जिस व्यक्ति ने मौजूदा संसदीय लोकतंत्र  की बुनियाद रखी, जिस व्यक्ति ने देश को संसाधनों के अभाव में भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की डगर पर डाल कर दुनिया में गौरव का मुकाम हासिल किया उसको अगर आज़ाद  भारत के राजनेता भुलाने का अभियान चलाते हैं तो यह उनके ही व्यक्तित्व पर  प्रकाश डालता है . आजकल कुछ  तथाकथित इतिहासकारों के सहारे  भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य चल रहा है जिसमें बच्चों के दिमाग से नेहरू सहित बहुत सारे लोगों के नाम गायब कर दिए जायेंगें जो बड़े होकर नेहरू के बारे में कुछ जानेंगें ही नहीं . लेकिन ऐसा संभव नहीं है क्योंकि गांधी और नेहरू विश्व इतिहास के विषय हैं और अगर हमें अपनी आने वाले पीढ़ियों को नेहरू के बारे में अज्ञानी रखा तो हमारा भी हाल उतर कोरिया जैसा होगा जहां के स्कूलों में मौजूदा  शासक के दादा किम इल सुंग को आदि पुरुष बताया जाता है . अब कोई उनसे पूछे कि क्या किम इल सुंग के पहले उत्तरी कोरिया में शून्य था .
महात्मा गांधी की अगुवाई में आज़ादी की  जो लड़ाई लड़ी गयी उसमें नेहरू रिपार्ट का अतुल्य योगदान है . यह रिपोर्ट २८-३० अगस्त  १९२८ के दिन हुयी आल पार्टी कान्फरेंस में तैयार की गयी थी . यही रिपोर्ट महात्मा गांधी की होम रुल की मांग को ताक़त देती थी. इसी के आधार पर डामिनियन स्टेटस की मांग की जानी थी  इस रिपोर्ट को एक कमेटी ने बनाया था जिसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे . इस कमेटी के सेक्रेटरी जवाहरलाल नेहरू थे .अन्य सदस्यों में अली इमाम , तेज बहादुर सप्रू, माधव श्रीहरि अणे ,मंगल सिंह ,सुहैब कुरेशी सुभाष चन्द्र बोस और जी आर प्रधान थे .सुहैब कुरेशी ने रिपोर्ट की सिफारिशों से असहमति जताई थी . इसके बारे में लिखने का मतलब केवल इतना है कि राहुल गांधी, राजीव गांधी और  संजय गांधी जैसे नाकाबिल लोगों को देश की राजनीति पर थोपने का अपराध तो जवाहरलाल की बेटी इंदिरा गांधी ने ज़रूर किया है  लेकिन इंदिरा गांधी की गलतियों के लिए क्या हम अपनी आज़ादी के लड़ाई के शिल्पी महात्मा गांधी और  उनके सबसे भरोसे के  साथी जवाहरलाल नेहरू को नज़रंदाज़ करने की गलती कर सकते हैं .एक बात और हमेशा ध्यान रखना होगा कि महात्मा गांधी के सन बयालीस के आन्दोलन के लिए  बम्बई में कांग्रेस कमेटी ने जो प्रस्ताव पास किया था अ, उसका डाफ्ट भी जवाहलाल नेहरू ने बनाया था और उसको विचार के लिए प्रस्तुत भी नेहरू ने ही किया था .

जवाहरलाल नेहरू को नकारने की कोशिश करने वालों को यह भी जान लेना चाहिए कि उनकी पार्टी के पूर्वजों ने जिन जेलों में जाने के डर से जंगे-आज़ादी में हिस्सा नहीं लिया था ,  उन्हीं जेलों में जवाहरलाल नेहरू अक्सर जाते रहते थे . जिस  भारत छोडो आन्दोलन के ७५ साल पूरे होने के बाद लोकसभा में विशेष कार्यक्रम किया गया उसी के दौरान जवाहरलाल १०४० दिन रहे जेलों में रहे थे .भारत छोडो आन्दोलन के दिन ९ अगस्त १९४२ को उनको मुंबई  से गिरफ्तार किया गया था और १५ जून १८४५ को रिहा किया गया था . यानी इस बार ३४ महीने से ज्यादा वे जेल में रहे थे. इसके पहले भी कभार जाते रहते थे .जो लोग उनको खलनायक बनाने की कोशिश कर रहे हैं ,ज़रा कोई उनसे पूछे कि उनके राजनीतिक पूर्वज  सावरकर , जिन्नाह आदि उन दिनों ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी के इनाम के रूप में वे कितने अच्छे दिन बिता रहे थे . सावरकर तो माफी मांग कर जेल से रिहा  हुए थे .अंडमान की जेल में वी. डी .सावरकर सजायाफ्ता कैदी नम्बर ३२७७८ के रूप में जाने जाते थे . उन्होंने अपने माफीनामे में साफ़ लिखा था कि अगर उन्हें रिहा कर दिया गया तो वे आगे से अंग्रेजों के हुक्म को मानकर ही काम करेंगें .और इम्पायर के हित में ही काम करेंगे. इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि वी डी सावरकर ने जेल से छूटने के बाद ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे  महात्मा गांधी के आन्दोलन को ताक़त मिलती हो .
भारत छोड़ो आन्दोलन की एक और  उपलब्धि है . अहमदनगर फोर्ट जेल में जब जवाहरलाल  बंद थे उसी दौर में उनकी किताब डिस्कवरी आफ इण्डिया लिखी गयी थी .जब अंगेजों को पता लगा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बारह सदस्य एक ही जगह रहते हैं और वहां राजनीतिक मीटिंग करते हैं तो सभी नेताओं को अपने राज्यों की जेलों में भेजा जाने लगा. मार्च १९४५ में गोविंद वल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और जवाहरलाल नेहरू को अहमदनगर से हटा दिया गया .बाकी  गिरफ्तारी का समय इन लोगों ने यू पी की जेलों ,बरेली , नैनी  अल्मोड़ा में काटीं . जब इन लोगों को गिरफ्तार किया गया  था तो किसी तरह की चिट्ठी  पत्री लिखने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई चिट्ठी आ सकती थी .बाद में नियम थोडा बदला . हर  हफ्ते  इन कैदियों को अपने परिवार के लोगों के लिए दो पत्र लिखने की अनुमति मिल गयी . परिवार के सदस्यों के चार पत्र अका सकते थे . लेकिन जवाहर लाल नेहरू को यह सुविधा नहीं मिल सकी क्योंकि उनके परिवार में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ही थे . वे लोग भी  यू पी की जेलों में बंद थे और वहां की जेलों में बंदियों को कोई भी चिट्ठी न मिल सकती थी और न ही वे लिख सकते थे.
इसलिए भारत  छोडो आन्दोलन का ज़िक्र होगा तो महात्मा  गांधी के साथ इन बारह कांग्रेसियों का ज़िक्र ज़रूर होगा . हां यह अलग बात  है कि जब भारत में इतिहास को पूरी तरह से दफना दिया जाएगा और शुर्तुर्मुगी सोच हावी हो जायेगी तो जवाहरलाल नेहरू को भुला देना संभव होगा और अहमदनगर के बाकी कैदियों को भी भुलाया जा सकेगा .लेकिन अभी तो यह संभव नहीं नज़र आता

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी पर एहसान नहीं है

  


शेष नारायण सिंह

आजकल देश के कुछ हिस्सों में गाय की रक्षा की राजनीति चल रही है. गौरक्षक सक्रिय हैं और गायों का आना जाना मुश्किल है . अगर को भी आदमी गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है तो वह जान जोखिम में डाल रहा होता है . ऐसी  कई घटनाएं हुयी हैं जिसमें गाय की रक्षा के हवाले से  एक ख़ास  तरह के लोगों ने आम आदमियों  का कत्ल किया है . कभी किसी के घर में गाय का  गोश्त होने के शक  में तो  कभी किसी को गाय को मार डालने के शक में मार डाला गया है . इस मसले पर संसद में  भी  बहस हुयी है लेकिन उस बहस के बाद धर्म निरपेक्षता के खिलाफ  हुंकार भर रही जमातों  को देखकर  डर लगने लगता है कि एक मुल्क के रूप में  हम जा  कहाँ रहे हैं . हमारी आज़ादी की  लड़ाई की बुनियादी  मान्यता सभी धर्मों के  लोगों के शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की रही है . जब बंटवारे  के बाद हमारे बुजुर्गों  ने  संविधान की रचना की तो उसमें भी राष्ट्र की   एकता की सबसे बड़ी  ज़रुरत  धर्म निरपेक्षता को बताया . लेकिन आजकल इसी धर्म निरपेक्षता के खिलाफ शक्ति संपन्न वर्गों  की  तरफ से बयान  आ रहे हैं  जो चिंता का विषय हैं .

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी भी समुदाय पर एहसान नहीं होता।  किसी भी देश के नेता जब राजनीतिक आचरण में धर्मनिरपेक्षता को महत्वपूर्ण मुक़ाम देते हैं तो वे अपने राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए काम कर रहे होते हैं।  धर्मनिरपेक्षता का साधारण अर्थ यह  है कि  धर्म के आधार पर किसी को लाभ या हानि न पंहुचाया जाए।  जब भी धर्म के आधार पर हानि या लाभ पंहुचाने की कोशिश शासक वर्ग करता है तो समाज को और राष्ट्र को भारी नुकसान  होता है।  भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों से आज़ादी एक ही साथ मिली थी  . लेकिन भारत दुनिया में आज एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर चुका है और अमरीका समेत सभी देश भारत को सम्मान की नज़र से देखते हैं लेकिन पाकिस्तान की हालत बिलकुल अलग है . वहाँ अगर चीन ,अमरीका और पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक मदद न मिले तो  बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी परेशानी पड़ सकती है.  ऐसा इसलिए है कि  आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिनाह की एक न  चली और पाकिस्तान धर्म पर आधारित राज्य बन  गया।  पाकिस्तान दुनिया के बाक़ी संपन्न देशों पर निर्भर हो गया।  अमरीकी और चीनी मदद का नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान की निर्भरता इन दोनों देशों पर बढ़ गयी है . पूरे पाकिस्तान में चीन ने सडकों बंदरगाहों और बिजली के उत्पादन केन्द्रों का ऐसा जाल बिछा दिया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढांचों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह से चीन की कृपा का मोहताज है . अब तो पूरी दुनिया में यह कहा जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद की नर्सरी है . जब अमरीका के शासकों को पाकिस्तानी आतंकवाद का इस्तेमाल पुराने सोवियत संघ और मौजूदा रूस के खिलाफ करना होता था तो वह आतंकवादियों को हर तरह की सहायता देता था . अमरीका को मुगालता था कि पाकिस्तान में वह जिस आतंकवाद को  बढ़ावा दे रहा था वह केवल एशिया में ही अमरीकी लाभ के लिए इस्तेमाल होगा लेकिन जब अमरीकी ज़मीन पर अल कायदा ने आतंकी हमला कर दिया तब अमरीका की समझ में आया कि आतंकवाद का कोई क्षेत्र नहीं होता और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता .
आज पाकिस्तान धार्मिक आधार पर आतंकवाद के मोबिलाइजेशन का सबसे बड़ा केन्द्र है . इसका कारण यह है कि  पाकिस्तान ने एक राष्ट्र के रूप में शुरुआत तो सेकुलर तरीके से की थी लेकिन उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की राजनीति को बाद के शासकों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया और इस्लाम पर आधारित राजनीति की शुरुआत कर दी .धर्मनिरपेक्षता को भुला कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के बाद पाकिस्तान को किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा है उसको जानने के लिए पाकिस्तान के पिछले पैंतीस वर्षों के इतिहास पर नज़र डालना ही काफी है . हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .
पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति के पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं हिंदूईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.

लेकिन असली धार्मिक कट्टरवाद की बुनियाद जनरल जियाउल हक़ ने डाली . उनको अपने पूर्ववर्ती शासक जुल्फिकार अली भुट्टो की हर बात को गलत साबित करना था लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान की सभी संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया . उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो की रोटी ,कपड़ा और मकान की राजनीति को साफ़ नकार दिया . उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना ही इस्लाम के कारण हुई थी ,यह मुसलमानों के लिए बनाया गया था . जनरल जिया ने २ दिसंबर १९७८ को इस्लामी नववर्ष के मौके पर पाकिस्तान में इस्लामी सिस्टम को लागू कर दिया. उन्होंने तब तक के सभी पाकिस्तानी सेकुलर कानूनों को खत्म कर दिया और ऐलान किया कि वे निजामे-मुस्तफा लागू कर रहे थे . उन्होंने शरिया अदालतें स्थापित करने का ऐलान कर दिया . लेकिन सभी कानून तो फ़ौरन बदले नहीं जा सकते थे लिहाजा जनरल जिया ने आर्डिनेंस लागू करके अपनी गद्दी की सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया. इस दिशा में पहला कानून था हुदूद आर्डिनेंस . इसके ज़रिये ताजिराते पाकिस्तान में बताए गए  संपत्ति कानूनों को बदलने की कोशिश की गयी . पूरी तरह बदल तो नहीं सके क्योंकि इस्लामी सबूत के नियमों  के आधार पर सज़ा दे पाना  असंभव था  . दूसरा बदलाव बलात्कार और व्यभिचार के कानून में किया गया इसके ज़रिए तो पूरे पाकिस्तान में औरतों को गुलाम से भी बदतर बना दिया गया .अपनी इसी इस्लामीकरण की योजना के तहत ही धार्मिक शिक्षण के केन्द्रों का बड़े पैमाने पर विकास किया गया. पाकिस्तानी समाज में  मदरसों के मालिकों का अधिकार और प्रभाव बहुत बढ़ गया . संगीत में भी  भारी बदलाव किया गया . पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न पर केवल देशभक्ति के गाने ही बजाये जाते थे.कुल मिलकर ऐसा पाकिस्तान बना दिया गया जिसमें धार्मिक कट्टरता और बहुमतवाद  का ही राज था . आज पाकिस्तान की जो दुर्दशा है उसमें जनरल जिया के उसी धर्मिक राज कायम करने के उत्साह को ज़िम्मेदार माना जा सकता है.

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमत वाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है . भारत की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते पाए जा रहे हैं . उनको भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है।
पाकिस्तान में जिस तरह से धर्म को  आधार बनाकर जनरल  जिया ने कट्टरता फैलाई उसी का नतीजा आज पकिस्तान भोग रहा है . अगर हम भी धार्मिक गोलबंदी के शिकार हुए तो  हमारे सामने भी  खतरा वही है . शासक वर्गों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिएय और देश की एकता को सुरक्षित रखना चाहिए .