Tuesday, November 14, 2017

गुजरात में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर दे रही है लेकिन सर्वे के कहते हैं जीत बीजेपी की ही होगी



शेष नारायण सिंह 

अहमदाबाद १२ नवम्बर . हिमाचल प्रदेश में मतदान पूरा हो जाने के बाद अब सारा राजनीतिक ध्यान गुजरात चुनाव पर है .  बीजेपी ने  सारी ताकत इस चुनाव को जीतने के लिए झोंक दी है . कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई  कसर नहीं छोड़ रखी है . उनको  इस चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं , बीजेपी से माहौल में  जो नाराजगी है उसके हिसाब से राहुल गांधी की उम्मीद जायज़ लगती है  लेकिन गुजरात की सडकों में मिलने वाला हर शख्स कहता मिल जाता है कि इस  साल चुनाव में  भाजप की हालत बहुत खराब है लेकिन जीत अंत में सत्ताधारी पार्टी की ही  होगी क्योंकि बीजेपी  अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात विधानसभा के चुनाव में हार किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए वे हर हाल में जीतेंगें . उसके लिए कुछ भी करना पड़े. बीजेपी के कार्यकर्ता कहते हैं कि अभी भले कांग्रेस का प्रचार भारी नज़र आता हो लेकिन जब प्रधानमंत्री मनीला की विदेश यात्रा से वापस आयेगें और अपने  चुनावी प्रचार शुरू करेंगे तो कांग्रेस वाले कहीं नहीं  दिखेंगे.  उनका दावा है कि पिछले २५ वर्षों में नरेंद्र मोदी ने गुजरात में गंभीर राजनीतिक  कार्य किया है और हर गली मोहल्ले और गाँव को अच्छी तरह जानते हैं .   
गुजरात चुनाव का मौजूदा प्रचार देखकर १९८० के दशक में अमेठी में होने वाले   प्रचार की याद  ताज़ा हो गयी. उन दिनों कांग्रेस नेताओं संजय गांधी और  उनकी मृत्यु के बाद राजीव  गांधी को खुश करने के लिए किसी भी चुनाव के दौरान ,कांग्रेस का  हर बड़ा नेता अमेठी  क्षेत्र के गाँवों में घूमता मिल जाता था. आजकल गुजरात में केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्य कहीं  न कहीं मिल जा रहे हैं .
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन,  अहमदाबाद की मणिनगर में मतदाताओं के बीच पैदल घूमती नज़र आयीं . मणिनगर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र कहा जाता है . अहमदाबाद नगर का पूर्वी  इलाका मणिनगर विनसभा क्षेत्र है  . अहमदाबाद तमिल संगम के खजांची , आर राजा  का दावा है कि इस क्षेत्र में करीब पचास हज़ार तमिल परिवार  रहते हैं .  मुख्य रूप से उनकी आबादी खोखरा  और अमराई वाडी में है . शायद इसीलिये यहाँ पर तमिलनाडु की मूल निवासी रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन को घर घर जाकर प्रचार करने को कहा गया है. १९९० से इस सीट पर भाजप का क़ब्ज़ा है .२००१ में राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद इसी सीट से नरेंद्र मोदी ने विधान सभा की सदस्यता ली थी . उस वक़्त  कमलेश पटेल विधायक थे . उन्होंने नरेंद र्मोदी के लिए सीट खाली की थी. नरेंद्र मोदी २००२, २००७ और २०१२ में यहाँ से चुने गए थे .
मणिनगर विधान सभा बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है लेकिन  यहाँ भी उसके विरोध के सुर साफ़ नज़र आये .  हालांकि हर जगह बीजेपी के कार्यकर्ता रक्षामंत्री का खूब जोर शोर से स्वागत करते नज़र आये लेकिन एक  व्यक्ति उनको काला कपडा दिखाने में सफल रहा.. बाद में महेश पटेल नाम के उस व्यक्ति ने  बताया कि ,”मैं पाटीदार  हूँ ,और पिछले बीस साल से भाजप का  सदस्य हूँ . लेकिन अब मैं निराश हूँ . पार्टी के नेता लोग सरकारी पैसे को लूट रहे हैं और अपनी जेबें भर रहे हैं .सडकों के निर्माण में बहुत ही  घटिया माल लगाया गया है . मैं कई बार इन लोगों से शिकायत कर चुका हूँ लेकिन कोई सुनता ही नहीं “. पाटीदार ( पटेल )  बिरादरी में बीजेपी से नाराज़गी है .  सरदार पटेल और महात्मा गांधी के  समय से ही पटेल लोग कांग्रेस को वोट देते  रहे थे लेकिन लाल कृष्ण आडवानी की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के बाद से पटेल लगभग पूरी तरह से बीजेपी  को वोट देते  रहे हैं . पहली बार हार्दिक पटेल के  आन्दोलन के बाद आजकल वे बीजेपी से दूर जाते नज़र आ रहे हैं . हालांकि जानकार इस बात को भी पक्का बता रहे हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की यात्राओं के बाद बड़ी संख्या में पटेल वोट हार्दिक को छोड़ देंगें  इस बात में दो राय नहीं है कि पटेल समुदाय इस बार पूरी तरह से बीजेपी के साथ नहीं होगा . ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर तो  कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल ही  गए हैं , दलितों के नेता जिग्नेश भी  कांग्रेस की तरफ झुक चुके हैं . बीजेपी को अगर कोई नुक्सान होगा तो उसमें   इन  तीनों नौजवान नेताओं के अलावा  बहुत ही ख़ास योगदान राज्य भर में फैले हुए  छोटे व्यापारियों का होगा . वे अभी चुप  हैं लेकिन थोड़ी देर बात करने पर साफ़ समझ में आ जाता है कि वे बीजेपी के जी एस टी वाले  काम से बहुत परेशान हैं .इन्हीं कारणों  से शायद  प्रचार में अभी कांग्रेस का माहौल दिख रहा है .
प्रचार में कांग्रेस की हवा को चुनाव सर्वे सही नहीं मानते . लोकनीति सी एस डी एस के   सर्वे के अनुसार  बीजेपी को इस बार भी गुजरात में सत्ता मिलेगी . सर्वे के अनुसार जीत तो होगी लेकिन २०१२ से कम सीटें आने की उम्मीद है .बीजेपी के मतदान प्रतिशत में भी मामूली कमी आ सकती है.२०१२ में ४७.९ प्रतिशत मिला था जो इस साल ४७ प्रतिशत  रहने की संभावना है .कांग्रेस को पिछली बार ३८ प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार ४१ प्रतिशत तक बढ़ जाने  का आकलन सर्वे में किया  गया है . . सौराष्ट्र क्षेत्र में कांग्रेस को फिलहाल बढ़त है . सर्वे के अनुसार बीजेपी और कांग्रेस  दोनों को ही सौराष्ट्र में ४२-४२ प्रतिशत वोट मिल सकते हैं . अगर इसी में किसी  को थोडा तल विचल हुआ तो नतीजे भारी बदलाव का कारण बन सकते हैं . दक्षिण और मध्य गुजरात में बीजेपी की  मजबूती बनी हुयी  है. क्योंकि वहां उसको ५१ प्रतिशत वोट मिल  सकते हैं जिसके कारण बड़ी संख्या में सीटें मिल सकती हैं .
मतदान के लिए गुजरात में अभी करीब महीना भर बाकी है . नतीजा जो भी ,चुनाव बहुत ही दिलचस्प हो गया है .

Tuesday, November 7, 2017

एक बेहतरीन इंसान का जन्मदिन है आज , मुबारक हो सबीहा



दिल्ली के एक करखनदार परिवार में उसका जन्म हुआ था . मुल्क  के बंटवारे की तकलीफ को उसके  परिवार ने  बहुत करीब से झेला था. उसके परिवार के लोग जंगे-आज़ादी की अगली सफ़ में रहे थे. उनके पिता ने  हिन्दू कालेज के छात्र के रूप में बंटवारे के दौर में इंसानी बुलंदियों को रेखांकित किया था लेकिन बंटवारे के बाद  परिवार टूट गया था. कोई पाकिस्तान चला गया और कोई हिन्दुस्तान में रह गया . उसके दादा मौलाना अहमद सईद ने पाकिस्तान के चक्कर में पड़ने से मुसलमानों को आगाह किया था और जिन्ना का विरोध किया था . मौलाना अहमद सईद देहलवी ने 1919 में अब्दुल मोहसिन सज्जाद , क़ाज़ी हुसैन अहमद , और अब्दुल बारी फिरंगीमहली के साथ मिल कर जमीअत उलमा -ए - हिंद की स्थापना की थी. जो लोग बीसवीं सदी भारत के इतिहास को जानते हैं ,उन्हें मालूम है की जमियत उलेमा ए हिंद ने महात्मा गाँधी के १९२० के आन्दोलन को इतनी ताक़त दे दी थी की अंग्रेज़ी साम्राज्य के बुनियाद हिल गयी थी .उसके बाद ही अंग्रेजों ने  हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालने के अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया था. 
जमीअत उस समय के उलमा की संस्था थी . खिलाफत तहरीक के समर्थन का सवाल जमीअत और कांग्रेस को करीब लाया . जमीअत ने हिंदुस्तान भर में मुसलमानों को आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और खुले रूप से पाकिस्तान की मांग का विरोध किया . मौलाना साहेब भारत में ही रहे और परिवार का एक बड़ा हिस्सा भी यहीं रहा लेकिन कुछ लोगों के चले जाने से परिवार  तो बिखर गया ही था.
आठ नवम्बर ११९४९ को दिल्ली के  कश्मीरी गेट मोहल्ले में उसका जन्म  हुआ था. परिवार पर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा था लेकिन उसके माता  पिता ने हालात का बहुत ही बहादुरी से मुकाबला किया  अपनी पाँचों औलादों को इज्ज़त की ज़िंदगी देने की पूरी कोशिश की और कामयाब हुए. उसके सारे भाई बहन बहुत ही आदरणीय लोग हैं . जब दिल्ली में कारोबार लगभग ख़त्म हो गया तो डॉ जाकिर हुसैन और प्रो नुरुल हसन की   प्रेरणा से परिवार अलीगढ़ शिफ्ट हो गया . बाद में उसकी माँ को  दिल्ली में नौकरी मिल गयी तो बड़े बच्चे अपनी माँ के पास दिल्ली में आकर पढाई लिखाई करने लगे . छोटे अलीगढ में ही  रहे ' कुछ साल तक परिवार  दिल्ली और  अलीगढ के बीच झूलता रहा . बाद में सभी दिल्ली में आ  गए . इसी दिल्ली में आज से  चालीस साल  पहले मेरी उससे मुलाक़ात हुयी .

बंटवारे के बाद जन्मी  यह लडकी आज ( आठ नवम्बर )  अडसठ साल की हो गयी. जो लोग सबीहा को  जानते हैं उनमे से कोई भी बता देगा  कि उन्होंने सैकड़ों ऐसे लोगों की जिंदगियों को जीने लायक बनाने में योगदान किया है जो  अँधेरे भविष्य की और ताक  रहे  थे. वह किसी भी परेशान इंसान के मददगार के रूप में अपने असली  स्वरुप में आ  जाती  हैं . लगता है कि  आर्थिक अभाव में बीते अपने बचपन ने उनको एक ऐसे इंसान के रूप में स्थापित कर दिया जो किसी भी मुसीबतजदा इंसान को दूर से ही पहचान लेता है और वे फिर बिना उसको बताये उसकी मदद की योजना पर काम करना शुरू कर देती हैं .यह खासियत उनकी छोटी बहन में भी है . उनकी शख्सियत की यह खासियत मैंने पिछले चालीस  वर्षों में बार बार देखा .
दिल्ली के एक बहुत ही आदरणीय पब्लिक  स्कूल में आप आर्ट पढ़ाती थीं,  एक दिन उनको पता लगा कि बहुत ही कम उम्र के किसी बच्चे को कैंसर हो गया है . कैंसर की शुरुआती स्टेज थी . डाक्टर ने बताया कि अगर उस बच्चे का इलाज हो जाये तो उसकी ज़िंदगी बच सकती थी. अगले एक घंटे के अंदर आप अपने शुभचिंतकों से बात करके प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर चुकी थीं. बच्चे का इलाज हो गया . अस्पताल में ही जाकर जो भी करना होता था , किया . बच्चे की इस मदद को अपनी ट्राफी नहीं बनाया . यहाँ  तक कि उनको मालूम भी नहीं कि वह बच्चा कहाँ है . ऐसी अनगिनत मिसालें हैं . किसी की क्षमताओं को पहचान कर उसको बेहतरीन अवसर दिलवाना उनकी पहचान का हिस्सा है . उनके स्कूल में एक लड़का  उनके विभाग में चपरासी का काम करता था. पारिवारिक परेशानियों के कारण पढाई पूरी नहीं कर सका था . उसको  प्राइवेट फ़ार्म भरवाकर पढ़ाई पूरी करवाया और  बाद में वही लड़का बैंक के प्रोबेशनरी अफसर की परीक्षा में  बैठा और आज बड़े  पद पर  है .  उनके दफ्तर के  एक  अन्य सहयोगी की मृत्यु के बाद उसके घर गईं, आपने भांप लिया कि उसकी विधवा को उस  परिवार में परेशानी ही परेशानी होगी. अपने दफ्तर में उसकी  नौकरी  लगवाई. उसकी आगे की पढ़ाई करवाई और आज वह महिला स्कूल में  शिक्षिका है . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं ,लिखना शुरू करें तो किताब बन जायेगी . आजकल आप बंगलौर के पास के जिले रामनगर के एक गाँव में विराजती हैं और वहां भी  कई लड़कियों को अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं .   उस गाँव की कई बच्चियों के माता पिता  को हडका कर सब को शिक्षा पूरी करने का माहौल बनाती हैं और उनकी फीस  आदि का इंतज़ाम  करती हैं .  
सबीहा अपनी औलादों के लिए कुछ भी कर सकती हैं , कुछ भी . दिल्ली के पास गुडगाँव में उनके बेटे ने अच्छा ख़ासा  घर बना दिया था लेकिन जब उनको लगा कि उनको बेटे के पास बंगलौर रहना ज़रूरी है तो उन्होंने यहाँ से सब कुछ ख़त्म करके बंगलोर शिफ्ट करना उचित   समझा लेकिन  बच्चों के सर  पर बोझ नहीं बनीं, उनके घर में रहना पसंद नहीं किया .अपना अलग घर बनाया और आराम से  रहती हैं. इस मामले में खुशकिस्मत हैं  कि उनकी तीनों औलादें अब बंगलौर में ही हैं . सब को वहीं काम मिल गया है .आपने वहां एक ऐसे गाँव में ठिकाना  बनाया जहां जाने  के लिए सड़क भी नहीं है.. मुख्य सड़क से  काफी दूर पर उनका घर है लेकिन वहां से हट नहीं सकतीं क्योंकि गाँव का हर परेशान परिवार अज्जी की तरफ उम्मीद की नज़र  से देखता है . सबीहा ने अपने लिए किसी से कभी कुछ नहीं माँगा लेकिन  जब उनको किसी की मदद करनी होती है तो बेझिझक मित्रों , शुभचिंतकों से  योगदान करवाती हैं . अपने  गाँव की बच्चियों से हस्तशिल्प के आइटम बनवाती हैं , खुद  भी लगी रहती हैं और बंगलौर शहर में जहां भी कोई प्रदर्शनी लगती है उसमें बच्चों के काम को प्रदर्शित करती हैं , सामान की बिक्री से  जो भी आमदनी होती है उसको उनकी फीस के डिब्बे में डालती रहती  हैं . उसमें से  अपने लिए एक पैसा नहीं लेतीं .उनके तीनों ही बच्चे यह जानते हैं और अगर कोई ज़रूरत पड़ी तो हाज़िर रहते हैं.  
 अपने भाई के एक  ऐसे दोस्त को उन्होंने रास्ता दिखाया  और सिस्टम से ज़िंदगी जीने की तमीज सिखाई जो दिल्ली महानगर में पूरी तरह से कनफ्यूज़ था . छोट शहर और गाँव से आया यह नौजवान दिल्ली में दिशाहीनता की तरफ बढ़ रहा था . रोज़गार के सिलसिले में दिल्ली आया था , काम तो छोटा मोटा मिल गया था लेकिन परिवार गाँव में था. वह अपनी पत्नी और दो  बच्चों को इसलिए नहीं ला रहा था कि रहेंगे कहाँ . आपने डांट डपट कर बच्चों और उसकी पत्नी को दिल्ली बुलवाया, किराये के मकान में  रखवाया और आज वही बच्चे अपनी ज़िन्दगी संभाल रहे  हैं, अच्छी पढाई लिखाई कर चुके हैं  . वह दिशाहीन  नौजवान भी  अब बूढा हो गया है और शहर में कई हल्कों  में पहचाना जाता है .
सबीहा में हिम्मत और हौसला बहुत ज्यादा है . आपने चालीस साल की उम्र में रॉक क्लाइम्बिंग सीखा और  बाकायदा एक्सपर्ट बनीं, अडतालीस साल की उम्र में कार चलाना सीखा .  चालीस की उम्र पार करने के बाद चीनी भाषा में  उच्च शिक्षा ली.  नई दिल्ली के नैशनल म्यूज़ियम इंस्टीच्यूट ( डीम्ड यूनिवर्सिटी ) से पचास साल की उम्र में पी एच डी किया . जब मैंने पूछा कि इतनी उम्र के बाद पी एच डी से क्या फायदा होगा ?  आपने कहा कि ,"यह मेरी इमोशनल  यात्रा है . मेरे अब्बू की इच्छा थी कि मैं  पी एच डी करूं. उनके जीवनकाल में तो नहीं कर पाई लेकिन अब जब भी मैं उसके लिए पढ़ाई  करती हूँ तो लगता है उनको श्रद्धांजलि दे रही हूँ ."
आज उसी बुलंद इन्सान का जन्मदिन है .जन्मदिन मुबारक हो सबीहा .



पाकिस्तान:जो शाखे-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ,नापायेदार होगा

शेष नारायण सिंह

पाकिस्तानी आतंकवादी और जैशे मुहम्मद के सरगना ,मौलाना मसूद अजहर को पूरी दुनिया के सभ्य देश ग्लोबल आतंकवादी घोषित करना चाहते थे . सुरक्षा पारिषद के एक प्रस्ताव में ऐसी मंशा ज़ाहिर की गयी थी . अमरीका फ्रांस और ब्रिटेन ने इसकी पैरवी भी की लेकिन चीन ने प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया और मसूद अजहर एक बार फिर बच निकला . मसूद अजहर का संगठन जैशे-मुहम्मद  पहले  ही प्रतिबंधित संगठनों की लिस्ट में मौजूद है . चीन ने जब इस प्रस्ताव पर वीटो लगाया तो उसका तर्क था  कि अभी मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करने के लिए देशों  में आम  राय नहीं बन पाई है जबकि सच्चाई यह है कि  पाकिस्तान के अलावा कोई भी देश उसको  बचाना नहीं चाहता .
चीन के इस रुख पर भारत ने गहरी निराशा जताई है . विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने एक  बयान  में कहा है कि ," हमें इस बात से बहुत निराशा हुयी है कि केवल एक देश ने  पूरी दुनिया के देशों  की आम राय को ब्लाक कर दिया है जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबंधित एक संगठन के मुखिया,  मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित किया जाना  था. यह दूरदर्शिता बहुत ही नुकसानदेह साबित हो सकती  है ." मसूद अजहर भारत की संसद  पर हुए आतंकवादी हमले का मुख्य साज़िशकर्ता तो है ही पठानकोट हमले  में भी उसका हाथ रहा  है . मसूद अजहर १९९४ में कश्मीर आया था जहां उसको गिरफ्तार कर लिया गया था .  उसको रिहा करवाने के लिए  अल फरान नाम के एक आतंकी  गिरोह ने कुछ सैलानियों का  अपहरण कर लिया था लेकिन नाकाम रहे. बाद में उसके भाई की अगुवाई  में आतंकवादियों ने नेपाल  से दिल्ली आ रहे  एक विमान को हाइजैक करके कंदहार में उतारा और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को मजबूर कर दिया कि   उसको रिहा करें. उस दौर के विदेशमंत्री जसवंत सिंह मसूद अज़हर सहित कुछ और आतंकवादियों को लेकर कंदहार गए और विमान और यात्रियों को वापस लाये . और इस तरह मसूद अजहर जेल से छूटने में सफल रहा .
भारत की जेल से छोटने के बाद से ही मसूद अजहर भारत को  तबाह करने के  सपने पाले हुये है. जहां तक भारत को तबाह करने की बात  हैवह सपना तो कभी नहीं पूरा होगा लेकिन इस मुहिम में पाकिस्तान तबाही के कगार  पर  पंहुंच गया है .आज पाकिस्तान अपने ही पैदा किये हुए आतंकवाद का शिकार हो रहा  है.
पाकिस्तान अपने ७० साल के इतिहास में सबसे भयानक मुसीबत के दौर से गुज़र रहा है. आतंकवाद का भस्मासुर उसे निगल जाने की तैयारी में है. देश के हर बड़े शहर को आतंकवादी अपने हमले का निशाना बना चुके हैं . पाकिस्तान को विखंडन हुआ तो उसके इतिहास में  बांग्लादेश की स्थापना के बाद यह सबसे बड़ा झटका माना जाएगा. अजीब बात यह है कि पड़ोसी देशों में आतंकवाद को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के चक्कर में पाकिस्तान खुद आतंकवाद का शिकार हो गया है और अपने अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया है. पाकिस्तानी हुक्मरान को बहुत दिन तक मुगालता था कि आसपास के देशों में आतंक फैला कर वे अपनी राजनीतिक ताक़त बढा सकते थे. जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाहजनरल जिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि आतंकवाद की आग उनके देश को ही लपेट सकती है . लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जो पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मनअल कायदा अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे . बाद में उन्होंने ही अमरीका पर आतंकवादी हमला करवाया और  पाकिस्तान की  हिफाज़त में आ गए जहाँ उनको अमरीका ने पाकिस्तानी  फौज की नाक के नीचे से पकड़ा और मार डाला .ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अमरीका की विदेशनीति में पाकिस्तान  के प्रति रुख में ख़ासा बदलाव आया है .
आज  हालात यह हैं कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई में इतनी  बुरी तरह से उलझ चुका है कि उसके पास और किसी काम के लिए फुर्सत ही नहीं है. आर्थिक विकास के बारे में अब पाकिस्तान में बात ही नहीं होती .यह याद करना दिलचस्प होगा कि भारत जैसे बड़े देश से पाकिस्तान की दुश्मनी का आधारकश्मीर है. वह कश्मीर को अपना बनाना चाहता है लेकिन आज वह इतिहास के उस मोड़ पर खडा है जहां से उसको कश्मीर पर कब्जा तो दूर अपने चार राज्यों को बचा कर रख पाना ही टेढी खीर नज़र आ रही है.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है .

पाकिस्तान की मदद करके अब अमरीका भी पछता रहा है . जब से पाकिस्तान बना है अमरीका उसे करीब पचास अरब डालर से ज्यादा का दान दे चुका है. यह शुद्ध रूप से खैरात है .अमरीका अब ऐलानियाँ कहता है कि पाकिस्तानी सेना आतंकवाद की प्रायोजक है और उसी ने हक्कानी गिरोह जैशे-मुहम्मद और लश्कर-ए-तय्यबा को हर तरह की मदद की है . यह सभी  गिरोह अफगानिस्तान और भारत में आतंक फैला रहे हैं .  पिछले करीब  ४० वर्षों से भारत आई एस आई प्रायोजित आतंकवाद को झेल रहा  है . पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आई एस आई प्रायोजित आतंक का सामना किया गया है . लेकिन जब भी अमरीका से कहा गया कि जो भी मदद पाकिस्तान को अमरीका तरफ से मिलती है ,उसका बड़ा हिस्सा भारत के खिलाफ इस्तेमाल होता है तो अमरीका ने उसे हंस कर टाल दिया . अब जब अमरीकी हितों पर हमला हो रहा है तो पाकिस्तान में अमरीका को कमी नज़र आने लगी है .
 पाकिस्तान का नया मददगार चीन है लेकिन वह  नक़द मदद नहीं देता . वह पाकिस्तान में बहुत सारी ढांचागत सुविधाओं की स्थापना कर रहा है ,जिससे आने वाले वक़्त में पाकिस्तानी राष्ट्र को लाभ मिल सकता है . लेकिन इन ढांचागत संस्थाओं की मालिक चीन की कम्पनियां ही रहेंगी . यानी अगर पाकिस्तान ने चीन के साथ वही किया जो उसने अमरीका के साथ  किया है तो चीन पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग पर कब्जा भी कर सकता है .


पाकिस्तानी शासक अब अमरीका से परेशान हैं लेकिन खुले आम अमरीका के खिलाफ भी नहीं  जा सकते .सच्ची बात यह है कि  पाकिस्तान के आतंरिक मामलों में अमरीका की खुली दखलंदाजी है और पाकिस्तान के शासक इस हस्तक्षेप को झेलने के लिए मजबूर हैं .एक संप्रभु देश के अंदरूनी मामलों में अमरीका की दखलंदाजी को जनतंत्र के समर्थक कभी भी सही नहीं मानते लेकिन आज पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है, उन हालात में पाकिस्तान से किसी को हमदर्दी नहीं है . उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए तो ज़रूरी है ही बाकी दुनिया के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. अमरीका पाकिस्तान कोइस हालत में पंहुचाने के लिए आंशिक रूप से ज़ेम्मेदार है और चिंतित है . शायद इसीलिये जब भी कोई अमरीकी अधिकारी या मंत्री चाहता है पाकिस्तान को हडका देता है . पिछले दिनों जब अमरीकी विदेशमंत्री रेक्स टिलरसन इस्लामाबाद गए थे तो उन्होंने साफ  फरमान जारी कर दिया कि आतंकवाद पर काबू करो वरना अमरीका खुद ही कुछ करेगा . सीधी ज़बान में इसको हमले की धमकी माना  जाएगा लेकिन अमरीकी विदेशमंत्री के सामने  पाकिस्तानी केयरटेकर प्रधानमंत्री और फौज के मुखिया जनरल बाजवा की घिग्घी बांध गयी . उनके  विदा होने के बाद अखबारों में बयान वगैरह देकर इज्ज़त बचाने की कोशिश की गयी .

पाकिस्तान के शासकों ने उसको तबाही के रास्ते पर डाल दिया   है. आज बलोचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ ज़बरदस्त आन्दोलन चल रहा है .सिंध  में भी पंजाबी आधिपत्य वाली केंद्रीय हुकूमत और फौज से बड़ी नाराजगी  है. इन  हालात में पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वहां के सभ्य समाज और  जनतंत्र की पक्षधर जमातों की है. हालांकि इतने दिनों उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है . मसूद अजहर,   हाफ़िज़ सईद और सैय्यद सलाहुद्दीन जैसे लोगों के चलते पाकिस्तान की छवि बाकी दुनिया में एक असफल राष्ट्र की बन चुकी है .लेकिन पाकिस्तान का बचना बहुत ज़रूरी है क्योंकि कुछ फौजियों और सियासतदानों के चक्कर में पाकिस्तानी कौम को तबाह नहीं होने देना चाहिए . इसलिए इस बात में दो राय नहीं कि पाकिस्तान को एक जनतांत्रिक राज्य के रूप में बनाए रखना पूरी दुनिया के हित में है.. यह अलग बात है कि अब तक के गैरजिम्मेदार पाकिस्तानी शासकों ने इसकी गुंजाइश बहुत कम छोडी है.
अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान में आतंकवादियों का इतना दबदबा कैसे हुआ ,यह समझना कोई मुश्किल नहीं है . पाकिस्तान की आज़ादी के कई साल बाद तक वहां संविधान नहीं तैयार किया जा सका.  पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बहुत जल्दी मौत हो गयी और सहारनपुर से गए और नए देश प्रधानमंत्री लियाक़त अली को क़त्ल कर दिया गया . उसके बाद वहां धार्मिक और फौजी लोगों की  ताकत बढ़ने लगी .नतीजा यह हुआ कि आगे चलकर जब  संविधान बना  भी तो फौज देश की राजनीतिक सत्ता पर कंट्रोल कर चुकी थी. उसके साथ साथ धार्मिक जमातों का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था. पाकिस्तान के इतिहास में एक मुकाम यह भी आया कि सरकार के मुखिया को  नए देश  को इस्लामी राज्य घोषित करना  पड़ा. पाकिस्तान में अब तक चार फौजी तानाशाह हुकूमत कर चुके हैं लेकिन पाकिस्तानी समाज और राज्य का सबसे बड़ा  नुक्सान जनरल जिया-उल-हक  ने किया . उन्होंने पाकिस्तान में फौज और धार्मिक अतिवादी गठजोड़ कायम किया जिसका  खामियाजा पाकिस्तानी  समाज और राजनीति आजतक झेल रहा है . पाकिस्तान में सक्रिय सबसे बड़ा आतंकवादी हाफ़िज़ सईद जनरल जिया की ही पैदावार है . हाफ़िज़ सईद तो मिस्र के काहिरा विश्वविद्यालय में  दीनियात का   मास्टर था . उसको वहां से लाकर जिया ने अपना धार्मिक सलाहकार नियुक्त किया . धार्मिक जमातों और फौज के बीच उसी ने सारी जुगलबंदी करवाई और आज आलम यह है कि दुनिया में कहीं भी आतंकवादी हमला हो ,शक की सुई सबसे पहले पाकिस्तान पर ही  जाती है . आज पकिस्तान  एक दहशतगर्द और असफल कौम है और आने वाले वक़्त में उसके अस्तित्व पर सवाल बार बार उठेगा

Thursday, November 2, 2017

महात्मा गांधी ने कहा- सरदार और जवाहर देश की गाड़ी को मिलकर चलाएंगे


शेष नारायण सिंह  

सरदार पटेल की जयंती पर इस बार बहुत सक्रियता रही . सरकारी तौर पर बहुत सारे आयोजन हुए . स्वतंत्रता सेनानी पूर्वजों की किल्लत झेल  रही सत्ताधारी  पार्टी  ने सरदार को अपनाने की ऐसी मुहिम  चलाई कि  कुछ लोगों को शक होने लगा कि कहीं सरदार पटेल ने बीजेपी की सदस्यता तो   नहीं ले ली है . नेहरू के परिवार पर हमला हुआ और सरदार पटेल को अपनाने की ज़बरदस्त योजना पर काम हुआ .यह भी प्रचारित किया गया कि सरदार को जवाहरलाल नेहरू  ने प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था  . यह सरासर गलत है .  सरदार पटेल को जिन दो व्यक्तियों ने प्रधानंत्री नहीं बनने दिया उनके नाम हैं , मोहनदास करमचंद गांधी और सरदार वल्लभ भाई पटेल .इस बात  की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि सरदार पटेल के मन में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रही होगी  लेकिन उन्होंने किसी से कहा  नहीं था . जवाहरलाल नेहरू  के प्रधानमंत्री बनने और सरदार पटेल की भूमिका को लेकर बहुत सारे सवाल उछाले जाते रहते हैं . सरदार  पटेल की राजनीति के एक मामूली विद्यार्थी के रूप में मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ कि सच्चाई को एक बार फिर लिख देने की ज़रूरत है . जब   अंतरिम सरकार के  गठन की  बात, वाइसरॉय लार्ड वावेल,  कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच में तय हो गयी और यह तय  हो गया कि २२ जुलाई १९४६ को लार्ड वावेल कांग्रेस अध्यक्ष को  अंतरिम सरकार की अगुवाई करने के लिए आमंत्रित करेंगें तो नए कांग्रेस अध्यक्ष का निर्वाचन   ज़रूरी  हो गया . हालांकि सरकार के अगुआ के पद का नाम वाइसरॉय की इक्जीक्युटिव काउन्सिल का वाइस प्रेसिडेंट था लेकिन वास्तव में वह  प्रधानमंत्री ही  था. इस  समझौते के वक़्त  कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे . वे भारत छोड़ो आन्दोलन के समय से ही चले आ रहे थे क्योंकि सन बयालीस  में पूरी कांग्रेस वर्किंग कमेटी को अहमदनगर किले में बंद कर दिया गया था . रिहाई के बाद नया कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाना था . मौलाना खुद को ही निर्वाचित करवाना चाहते थे . ऐसा किसी अखबार में छप भी गया .  महात्मा गांधी को जब यह पता लगा तो उन्होंने मौलाना आज़ाद को  अखबार की कतरन  भेजी और उसके साथ जो पत्र लिखा उसमें साफ़ लिख दिया कि वे  एक ऐसा बयान दें जिस से साफ़  हो जाए कि वे  खुद को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव से अलग कर चुके हैं. महात्मा जी के सुझाव के बाद मौलाना आज़ाद मैदान से बाहर हो गए .
 कांग्रेस  अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गयी . २९ अप्रैल १९४६ को नामांकन दाखिल करने का अंतिम दिन था . २० अप्रैल को ही महात्मा गांधी ने कुछ लोगों को बता दिया था कि वे जवाहरलाल  को अगला कांग्रेस  अध्यक्ष देखना चाहते हैं . लेकिन देश में मौजूद कुल पन्द्रह  प्रदेश कांग्रेस   कमेटियों में से बारह की की तरफ से सरदार  पटेल के पक्ष में नामांकन आ चुके थे . आचार्य कृपलानी भी उम्मीदवार थे. उनका नाम भी  प्रस्तावित था. उधर महात्मा गांधी नेहरू के पक्ष में  अब खुलकर आ गए थे. उन्होंने संकेत दिया कि अंग्रेजों से सत्ता ली जा रही है तो ऐसा व्यक्ति चाहिए जो अंग्रेजों से उनकी तरह ही बात कर सके . जवाहरलाल इसके  लिए उपयुक्त थे क्योंकि वे इंग्लैंड के नामी पब्लिक स्कूल  हैरो में पढ़े थे , कैम्ब्रिज गए थे और  बैरिस्टर थे. महात्मा गांधी ने यह भी संकेत  दिया कि जवाहरलाल को विदेशों में भी लोग जानते हैं और वे अंतरराष्ट्रीय मामलों के  जानकार  हैं .महात्मा गांधी को यह भी मालूम था कि जवाहरलाल  कैबिनेट में दूसरे स्थान पर कभी नहीं जायेंगे जबकि अगर उनको नम्बर एक  पोजीशन मिल गयी तो सरदार पटेल  सरकार में शामिल हो जांएगे और इस तरह से दोनों मिलकर काम कर लेंगें. वे दोनों  सरकार रूपी बैलगाड़ी में जुड़े दो बैलों की तरह देश को संभाल लेगें .  महात्मा गांधी के पूरे समर्थन के बाद भी जवाहरलाल नेहरू की तैयारी बिलकुल नहीं थी. उनका नाम किसी भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी से प्रस्तावित   नहीं हुआ था. अंतिम तारीख २९ अप्रैल थी लेकिन औपचारिक रूप से   नेहरू के नाम का प्रस्ताव नहीं हुआ था . आचार्य  कृपलानी ने लिखा है कि महात्मा गांधी की इच्छा का सम्मान  करते हुए उन्होंने ही कार्य समिति की बैठक में जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव किया और कार्यसमिति के सदस्यों से उस पर दस्तख़त करवा लिया .इमकान है कि सरदार पटेल ने भी उस प्रस्ताव पर दस्तख़त किया था .जब जवाहरलाल के नाम का प्रस्ताव हो गया तो कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और सरदार पटेल को भी नाम वापसी का  कागज़ दे दिया जिससे नेहरू को निर्विरोध निर्वाचित किया जा सके. सरदार पटेल ने वहां मौजूद महात्मा गांधी को वह कागज़ दिखाया . महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरु से कहा  कि किसी भी  प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने  आपके नाम का प्रस्ताव नहीं किया है केवल कांग्रेस वर्किंग कमेटी  ने ही आपके नाम का प्रस्ताव किया है . जवाहरलाल चुप रहे. महात्मा जी ने सरदार पटेल को नाम वापसी के कागज़ पर दस्तखत करने का इशारा कर दिया . सरदार ने तुरंत दस्तखत कर दिया और इस तरह जवाहरलाल का  कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में निर्विरोध निर्वाचन  पक्का हो गया . महात्मा गांधी की बात मान कर सरदार इसके पहले भी जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए  नाम वापस ले चुके थे , १९२९ में लाहौर में आम राय सरदार के पक्ष में थी लेकिन महात्मा गांधी ने सरदार से नाम वापस  करवा दिया था .
महात्मा गांधी की इच्छा का सम्मान करते हुए सरदार ने जवाहरलाल के पक्ष में मैदान ले लिया . हालांकि यह भी सच है कि उस वक़्त के महात्मा गांधी के इस फैसले पर डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने  बाद में अपनी बात बहुत ही तकलीफ के साथ कही. उन्होंने कहा कि "गांधी ने एक बार और ग्लैमरस नेहरु के लिए अपने भरोसेमंद  लेफ्टीनेंट को कुर्बान कर   दिया ." लेकिन सरदार पटेल ने कोई भी नाराजगी नहीं जताई,  वे कांग्रेस के काम में जुट गए .   सरदार की महानता ही है कि इतने बड़े पद से एकाएक महरूम किये जाने के बाद भी मन में कोई तल्खी नहीं पाली. यह अलग बात है  कि जवाहरलाल के तरीकों से वे बहुत खुश नहीं थे . उन्होंने  मध्य प्रदेश के नेता डी पी मिश्र को २९ जुलाई को जो चिट्ठी लिखी वह जवाहरलाल के प्रति उनके स्नेह की एक झलक  देती  है. लिखते  हैं कि " हालांकि  नेहरू चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं लेकिन लेकिन वे कई बार बाल   सुलभ सरलता  के साथ  आचरण करते हैं . लेकिन अनजानी गल्त्तियों के बावजूद उनका उत्साह बेजोड़ है . आप निश्चिन्त रहें जब तक हम लोग  उस ग्रुप में हैं जो  कांग्रेस की नीतियों को चला रहा है, तब तक इस जहाज़ की गति को कोई नहीं रोक सकता "
एक बार सरदार पटेल ने महात्मा   गांधी के कहने के बाद  जवाहरलाल को अपना नेता मान लिया तो मान लिया . इसके बाद उस मार्ग से बिलकुल डिगे नहीं .जब जिन्नाह ने  डाइरेक्ट एक्शन का आवाहन किया तो मुस्लिम बहुत इलाकों में खून खराबा मच गया . हालात बिगड़ने लगे तो सरदार ने   ही नेहरू को संभाला  . महात्मा  गांधी के जीवनकाल में तो वे नेहरू की अति उत्साह में  की गयी गलतियों की शिकायत महात्मा गांधी से  गाहे बगाहे करते भी थे लेकिन महात्मा गांधी के जाने के बाद उन्होंने नेहरू को   हमेशा समर्थन दिया और गार्जियन की तरह  रहे. नेहरू साठ साल के हुए तो १४ नवम्बर १९४९ को डॉ राजेन्द्र प्रसाद, डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन और पुरुषोत्तम दास टंडन ने एक किताब प्रकाशित किया . “ नेहरु :अभिनन्दन ग्रंथ “ नाम की इस किताब में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल का एक लेख है . लेख बड़ा है . कुछ अंश उन लोगों को सही जवाब दे देते हैं जो इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि दोनों नेताओं में वैमनस्य था .जवाहरलाल नेहरु के बारे में सरदार लिखते हैं कि “ लोगों के लिए यह अनुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है जब कुछ दिनों के लिए एक दूसरे से दूर होते हैं और समस्याओं और कठिनाइयों को हल करने के लिए एक दूसरे की सलाह नहीं ले पाते तो हम एक दूसरे को कितना याद करते हैं . . यह अपनत्व ,निकटता ,दोस्ती और दो भाइयों के बीच प्रेम को कुछ शब्दों में कह पाना मुश्किल है . राष्ट्र के  हीरोदेश के लोगों के नेता ,देश के प्रधानमंत्री जिनका महान कार्य और जिनकी उपलब्धियां एक खुली किताब हैं , उनको मेरी तारीफ़ की ज़रूरत नहीं है .
देश में कुछ ऐसे लोगों का एक वर्ग पैदा हो गया है जो यह कहते नहीं अघाता कि प्रधानमंत्री पद के बारे में दोनों नेताओं के बीच भारी मतभेद था. कुछ लोग तो यहाँ तक कह देते हैं कि सरदार पटेल खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे . लेकिन इस बात को उनकी बेटी मणिबेन पटेल ने बार बार गलत बताया है . वे उन दिनों सारदार पटेल के साथ ही रहती थीं. स्वयं सरदार पटेल ने लिखा है कि ,” यह बहुत ज़रूरी था कि हमारी आज़ादी के ठीक पहले के धुन्धलके में वे ( जवाहरलाल ) ही  हमारे  प्रकाशस्तम्भ होते और जब आजादी के बाद भारत एक संकट के बाद दूसरे संकट का सामना कर रहा था , तो उनको ही हमारे विश्वास और हमारी एकता का निगहबान होना चाहिए था . मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता कि आज़ादी के दो वर्षों में उन्होंने हमारे अस्तित्व को चुनौती देने वाली शक्तियों के खिलाफ कितना संघर्ष किया है . मैं उनसे उम्र में बड़ा हूँ . मुझे इस बाद की खुशी है कि हम लोगों के  सामने प्रशासन और संगठन से सम्बंधित जो भी समस्याएं आती  हैंउनके बारे में उन्होंने मेरी हर सलाह को माना है .मैने देखा है कि वे ( नेहरु) हर समस्या के बारे में मेरी सलाह मांगते हैं और उसको स्वीकार कारते हैं .
सरदार पटेल ने जोर देकर कहा कि “ कुछ निहित स्वार्थ वाले यह प्रचार करते हैं कि हम लोगों में मतभेद है .इस कुप्रचार को कुछ लोग आगे भी बढाते हैं .लेकिन यह सरासर गलत है .हम दोनों जीवन भर दोस्त रहे हैं . हमने हमेशा ही एक  दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान किया है और जैसी भी समय की मांग रही होजैसा भी  ज़रूरी हुआ एक  दूसरे की बात को माना है  . ऐसा  तभी संभव हुआ क्योंकि हम दोनों को एक दूसरे पर पूरा भरोसा है 
सरदार पटेल और नेहरु के बीच  मतभेद  बताने वालों को इतिहास का सही ज्ञान  नहीं है . इस बात में दो   राय नहीं  है कि उनके  राय  बहुत से मामलों में हमेशा  एक नहीं होती थी लेकिन पार्टी की बैठकों  में ,  कैबिनेट की बैठकों में उनके बीच के मतभेद  एक राय में बदल जाते थे .ज्यादातर  मामलों में सरदार की राय को ही जवाहरलाल स्वीकार कर लेते थे . जवाहरलाल नेहरू को यह बात  हमेशा मालूम रहती थी कि वे प्रधानमंत्री महात्मा गांधी के आशीर्वाद और सरदार पटेल के सहयोग से ही  बने  हैं.

Friday, October 27, 2017

अमरीकी हितों का चौकीदार नहीं अपने राष्ट्रहित का निगहबान बनने की ज़रूरत है


शेष नारायण सिंह


डोनाल्ड ट्रंप के राष्टपति बनने के बाद अमरीकी विदेशनीति में भारत के प्रति एक नया नजरिया साफ़ नज़र आने लगा है . एशिया में उनकी प्राथमिकताएं कई स्तर पर बदल रही हैं . आजकल अमरीकी राष्ट्रपति को उत्तर कोरिया के तानाशाह से ख़ास दिक्क़त है . उसको कमज़ोर करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप तरह तरह की तरकीबें तलाश रहे हैं . उत्तर कोरिया ने ऐलानियाँ अमरीका के खिलाफ ज़बानी जंग का मोर्चा खोल रखा है. उसके पास परमाणु बम साहित अन्य बहुत से घातक हथियार हैं जिनको वह अमरीका, दक्षिण कोरिया और जापान के खिलाफ इस्तेमाल करने की धमकी देता रहता है . उसको रोकने के लिए अमरीका को इस क्षेत्र में सैनिक सहयोगी चाहिए. भारत की यात्रा पर  आये  अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने विदेशमंत्री सुषमा स्वराज से इस बारे में बात की . लेकिन सुषमा स्वराज ने अमरीकी हितों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर कोरिया से संवाद बनाये रखने के लिए अमरीका को चाहिए कि अपने मित्र देशों को वहां दूतावास आदि बनाए रखने दे.
इस इलाके में अमरीकी विदेशनीति को ईरान से भी परेशानी है क्योंकि वह उसकी मनमानी को स्वीकार नहीं करता लेकिन ट्रंप को इरान से वह दिक्क़त नहीं है जो उत्तर कोरिया से है . लिहाजा उस मुद्दे पार वह उतनी सख्ती से बात नहीं कर रहा है . उत्तर कोरिया के  खिलाफ  भारत को नया रंगरूट बनाने की कोशिश में अमरीका भारत को तरह तरह के लालच दे रहा है . भारत की  मौजूदा सरकार के अधिक से अधिक आधुनिक हथियार हासिल करने के शौक़ को भी अमरीका संबोधित कर रहा है . अब तक तो केवल हथियार बेचने की बात होती थी लेकिन भारतीय विदेशमंत्री  सुषमा स्वराज से बातचीत के दौरान इस बार रेक्स टिलरसन ने  वायदा किया कि वह भारत को हथियार बनाने की टेक्नालोजी  भी देने को तैयार है . यह एक बड़ा परिवर्तन है . अमरीकी विदेशमंत्री नई दिल्ली पंहुचने के पहले इस्लामाबाद  भी एक दिन के लिए गए थे . वहां उन्होंने आतंकवादियों को पाकिस्तान में सुरक्षित ठिकाने देने के मुद्दे को उठाया था लेकिन पाकिस्तानी सरकार ने उनकी हर बात मानने से इनकार कर दिया .बातचीत के बारे में पाकिस्तानी विदेशमंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपनी सेनेट को बताया कि  ' अगर अमरीका चाहता  है कि पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान में अमरीकी प्राक्सी के रूप में काम करे तो यह पाकिस्तान को मंज़ूर नहीं है.हम ( पाकिस्तान ) अपनी संप्रभुता और गरिमा पर समझौता नहीं करेंगें .अमरीका से पकिस्तान के रिश्ते आत्मसम्मान के आधार पर ही  रहेंगे ' . कूटनीति की इस भाषा का मतलब  यह  है कि  पाकिस्तान, जो पिछले पचास साल से इस क्षेत्र में  अमरीका का कारिन्दा हुआ करता था ,  अब अपने को उस भूमिका से साफ़ साफ़ अलग कर चुका  है . पाकिस्तान-चीन-इरान की नई धुरी का विकास हो रहा  है . इस बात की   संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह दोस्ती अमरीका के खिलाफ भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस्तेमाल हो सकेगी .
क्प्प्तनीतिक भाषा में अमरीका अभी भी पाकिस्तान को अपना करीबी सहयोगी बताता  है लेकिन भारत से बढ़ रही दोस्ती के  मद्दे-नज़र यह  असंभव है कि अब पाकिस्तान में अमरीका का वह मुकाम होगा जो पहले हुआ  करता था. पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिया उल हक के दौर में तो अमरीका ने  अफगानिस्तान में मौजूद सोवियत सेना से लड़ाई ही पाकिस्तानी  सरज़मीन से उसके कंधे पर बन्दूक रख कर लड़ी  थी. लेकिन अब वह बात नहीं है . अब  पाकिस्तान में अमरीका-भारत दोस्ती को शक की नज़र से  देखा जाता है और भारत के किसी भी दोस्त से  पाकिस्तान  गंभीर सम्बन्ध बनाने के बारे में कभी नहीं  सोचता .
ताज़ा स्थिति यह है कि एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि में अमरीका भारत से सैनिक और आर्थिक सहयोग  बढाने के चक्कर में है . सुषमा स्वराज  से बातचीत के बाद अमरीकी विदेशमंत्री ने कहा कि  अमरीका एक अग्रणी शक्ति के रूप में भारत के उदय को समर्थन करता है और इस क्षेत्र में  भारत की सुरक्षा क्षमताओं की वृद्धि में सहयोग करता रहेगा ." इसी सन्दर्भ में हथियारों के लिए   आधुनिक टेक्नोलाजी देने की बात की गयी है . पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों को लगाम लगाने की बात अमरीका बहुत पहले से करता रहा  है . इस बार भी इस्लामाबाद में अमरीकी विदेशमंत्री ने यह बातें दुहराई . अमरीका की यह बात भारत के लिए किसी संगीत से कम नहीं है . पाकिस्तान के विदेशमंत्री  के बयान और पाकिस्तानी अखबारों में छपी  रेक्स टिलरसन की यात्रा की ख़बरों से साफ़ जाहिर है कि अमरीका अब पाकिस्तान से दूरी बनाने की कोशीश कर रहा  है . लेकिन इस सारे घटनाक्रम का एक नतीजा यह भी है कि शीत युद्ध का नया संस्करण भारत के बिलकुल  पड़ोस में आ गया है और अमरीका अब नई शक्ति चीन के खिलाफ नई धुरी बनने की कोशिश कर रहा है . हालांकि यह भी सच है कि अमरीका  अभी तक चीन को एक मज़बूत क्षेत्रीय शक्ति से ज्यादा की मान्यता नहीं देता है
 साफ़ ज़ाहिर है कि अमरीका अब इस इलाके में नए दोस्त तलाश रहा है . भारत की तारफ अमरीका के बढ़ रहे  हाथ को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए .भारत को अमरीका का सामरिक सहयोगी बनाने  के गंभीर प्रयास बराक ओबामा के कार्यकाल में ही शुरू हो गये थे .उनकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने बार बार दावा  किया था कि भारत के साथ जो परमाणु समझौता हुआ है वह एक सामरिक संधि की दिशा में अहम् क़दम है .अमरीकी विदेश नीति के एकाधिकारवादी मिजाज की वजह से हमेशा ही अमरीका को दुनिया के हर इलाके में कोई न कोई कारिन्दा चाहिए होता है.अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए अमरीकी प्रशासन किसी भी हद तक जा सकता है .शुरू से लेकर अब तक अमरीकी विदेश विभाग की कोशिश रही है कि भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में तौलें. यह काम भारत को औकात बताने के उद्देश्य से किया जाता था लेकिन पाकिस्तान में पिछले ६० साल से चल रहे पतन के सिलसिले की वजह से अमरीका का वह सपना तो साकार नहीं हो सका लेकिन अब उनकी कोशिश है कि भारत को ही इस इलाके में अपना लठैत बना कर पेश करें.भारत में भी आजकल ऐसी राजनीतिक ताक़तें सत्ता और विपक्ष में शोभायमान हैं जो अमरीका का दोस्त बनने के लिये किसी भी हद तक जा सकती हैं.इस लिए अमरीका को एशिया में अपनी हनक कायम करने में भारत का इस्तेमाल करने में कोई दिक्क़त नहीं होगी.
अब जब यह लगभग पक्का हो चुका है कि एशिया में अमरीकी खेल के नायक के रूप में भारत को प्रमुख भूमिका मिलने वाली है तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद के अमरीकी एकाधिकारवादी रुख की पड़ताल करना दिलचस्प होगा. शीत युद्ध के दिनों में जब माना जाता था कि सोवियत संघ और अमरीका के बीच दुनिया के हर इलाके में अपना दबदबा बढाने की होड़ चल रही थी तो अमरीका ने एशिया के कई मुल्कों के कन्धों पर रख कर अपनी बंदूकें चलायी थीं. यह समझना दिलचस्प होगा कि इराक से जिस सद्दाम हुसैन को हटाने के के लिए अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र तक को ब्लैकमेल किया वह सद्दाम हुसैन अमरीका की कृपा से ही पश्चिम एशिया में इतने ताक़तवर बने थे . उन दिनों सद्दाम हुसैन का इस्तेमाल इरान पर हमला करने के लिए किया जाता था . सद्दाम हुसैन अमरीकी विदेशनीति के बहुत ही प्रिय कारिंदे हुआ करते थे . बाद में उनका जो हस्र अमरीका की सेना ने किया वह टेलिविज़न स्क्रीन पर दुनिया ने देखा है .और जिस इरान को तबाह करने के लिए सद्दाम हुसैन का इस्तेमाल किया जा रहा था उसी इरान और अमरीका में एक दौर में दांत काटी रोटी का रिश्ता था. इरान के शाहरजा पहलवी ,पश्चिम एशिया में अमरीकी विदेशनीति के लठैतों के सरदार के रूप में काम करते थे .जिस ओसामा बिन लादेन को तबाह करने के लिए अमरीका ने अफगानिस्तान को रौंद डाला वहीं ओसामा बिन लादेन अमरीका के सबसे बड़े सहयोगी थे और उनका कहीं भी इस्तेमाल होता रहता था. जिस तालिबान को आज अमरीका अपना दुश्मन नंबर एक मानता है उसी के बल पर अमरीकी विदेशनीति ने अफगानिस्तान में कभी विजय का डंका बजाया था . अपने हितों को सर्वोपरि रखने के लिए अमरीका किस्सी का भी कहीं भी इस्तेमाल कर सकता है. जब सोवियत संघ के एक मित्र देश के रूप में भारत आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा था तो एक के बाद एक अमरीकी राष्ट्रपतियों ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल किया था . बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में उस वक़्त के अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत के खिलाफ अपने परमाणु सैन्य शक्ति से लैस सातवें बेडे के विमानवाहक पोत इंटरप्राइज़से हमला करने की धमकी तक दे डाली थी. उन दिनों यही पाकिस्तान अमरीकी विदेशनीति का ख़ास चहेता हुआ करता था. बाद में भी पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ होता रहा था. पंजाब में दिग्भ्रमित सिखों के ज़रिये पाकिस्तानी खुफिया तंत्र ने जो आतंकवाद चलायाउसे भी अमरीका का आर्शीवाद प्राप्त था . 
वर्तमान कूटनीतिक हालात ऐसे हैं अमरीका की छवि एक इसलाम विरोधी देश की बन गई है. अमरीका को अब किसी भी इस्लामी देश में इज्ज़त की नज़र से नहीं देखा जाता . यहाँ  तक कि पाकिस्तानी अवाम भी अमरीका को पसंद नहीं करता जबकि पाकिस्तान की रोटी पानी भी अमरीकी मदद से चलती है. इस पृष्ठभूमि में अमरीकी विदेशनीति के नियंता भारत को अपना बना लेने के खेल में जुट गए हैं . अमरीकी सरकार में इस क्षेत्र अमरीका में चीन की बढ़ रही ताक़त से चिंता है. जिसे बैलेंस करने के लिए ,अमरीका की नज़र में भारत सही देश है. पाकिस्तान में भी बढ़ रहे अमरीका विरोध के मद्देनज़र ,अगर वहां से भागना पड़े तो भारत में शरण मिल सकती है . भारत में राजनीतिक माहौल आजकल अमरीका प्रेमी ही है. सत्ता पक्ष तो है ही कांग्रेस  का अमरीका प्रेम जग ज़ाहिर है. ऐसे माहौल में भारत से दोस्ती अमरीका के हित में है .लेकिन भारत के लिए यह कितना सही होगा यह वक़्त ही बताएगा . अमरीका की दोस्ती के अब तक के इतिहास पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि अमरीका किसी से दोस्ती नहीं करतावह तो बस देशों को अपने राष्ट्रहित में इस्तेमाल करता है. इसलिए भारत के नीति निर्धारकों को चाहिए कि अमरीकी राष्ट्रहित के बजाय अपने राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर  काम करें और एशिया में अमरीकी हितों के चौकीदार बनने से बचे. दुनिया जानती है कि अमरीका से दोस्ती करने वाले हमेशा अमरीका के हाथों अपमानित होते रहे हैं . इसलिए अमरीकी सामरिक सहयोगी बनने के साथ साथ  भारत सरकार को अपने राष्ट्र हित  का ध्यान अवश्य रखना चाहिए .

Sunday, October 22, 2017

राजस्थान में प्रेस की आज़ादी को सीमित करने की तैयारी


शेष नारायण सिंह


राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की तरफ से एक अध्यादेश जारी हुआ है , जो अगस्त १९८२ में बिहार के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री  डॉ जगन्नाथ मिश्र के उस काले कानून की याद दिला देता  है जो उन्होंने प्रेस की आज़ादी को रौंद देने के लिए कानून की किताबों में दर्ज करवाने की साज़िश की थी . डॉ जगन्नाथ मिश्र ने उस बिल में ऐसा इंतज़ाम किया था कि पत्रकारों को ऐसी सज़ा दी जाए जो एक हत्यारे को भी नहीं दी जा सकती थी. अपराध संहिता और दंड प्रक्रिया में संशोधन कर दिया गया था . पत्रकार के खिलाफ अगर एफ आई आर दर्ज हो जाए तो उसके तथाकथित अपराध को गैरज़मानती बना दिया गया था . पुलिस के पास यह अधिकार आ गया था कि वह किसी भी पत्रकार को पकड़कर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करके उसको सख्त से सख्त सज़ा दिलवा सकती थी . उस बिल को काला बिल कहा गया , पूरे देश के पत्रकार सड़क पर आ गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री और डॉ जगन्नाथ मिश्र की आका इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप किया और उस काले कानून को वापस लेना पड़ा . इंदिरा गांधी पांच साल पहले प्रेस की आज़ादी को  रौंदने का नतीजा भोग चुकी थीं. उनके बेटे और उनके  सलाहकारों ने सेंसरशिप लगा दी थी और १९७७ का चुनाव बुरी तरह से हार चुकी थीं. डॉ मिश्र ने अपने कुछ ख़ास चेला टाइप अफसरों की सलाह से यह कानून बनाया था लेकिन मीडिया और जनता की प्रतिरोध की आवाज़ इतनी तेज़ हो गयी कि इस काले कानून को वापस लेकर अपनी कुर्सी बचाना ही  उनको सही फैसला लगा . डॉ मिश्र ने भी हद कर दी थी. पत्रकार को अपराधी की श्रेणी में बैठाने  का पूरा बंदोबस्त कर दिया था. ताजीरात हिन्द की दफा २९२  और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन ४५५ को बदल दिया था  अपनी इस कारस्तानी को उन्होंने बिहार विधानसभा में पारित भी करवा लिया था .
बिहार के इस काले कानून को दफ़न हुए ३५ साल हो गए हैं . इस बीच कई  राज्य सरकारों ने इसी तरह का दुस्साहस  किया लेकिन शुरुआती कोशिशें ही नाकाम कर दी गयीं . बिहार वाले काले बिल की तरह का ही एक अध्यादेश इस बार राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लेकार आयी हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके इस अध्यादेश के सार्वजनिक बहस के दायरे में आ जाने के बाद केंद्र सरकार और उनकी  पार्टी क्या रुख अपनाती है .जहां तक वसुंधरा राजे की बात है उन्होंने तो यह पेशबंदी मुकम्मल तरीके से कर ली है कि अगले साल होने वाले चुनावों के मद्दे-नज़र उनकी सरकार की पिछले पांच साल की  गलतियाँ उनकी पार्टी के नेताओं और आम जनता तक मीडिया के ज़रिये न पंहुचें ...

राजस्थान सरकार के आर्डिनेंस में जो प्रावधान हैं वे निश्चित रूप से लोकशाही पर सीधा हमला हैं .राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश मूल रूप से भ्रष्ट जजोंमैजिस्ट्रेटों और सरकारी अफसरों को बचाने के लिए लाया  गया  है लेकिन इसी में यह व्यवस्था भी है कि मीडिया उन  आरोपों के बारे में कोई रिपार्ट नहीं करेगा जब तक कि सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ मुक़दमा चलाने की अनुमति सरकार की तरफ से नहीं मिल जायेगी. क्रिमिनल लाज ( राजस्थान अमेंडमेंट ) अध्यादेश २०१७ नाम के इस आर्डिनेंस को पिछले महीने  जारी किया गया था और अब सरकार इसको कानून का रूप देने के लिए बिल के साथ तैयार है .

 इस बिल को देखते ही लगता है कि जिस तरह से राजे महराजे अपने लोगों को  किसी भी अपराध से मुक्त करने के लिए सदा तैयार रहते थे ,उसी तरह राजस्थान की राजशाही परम्परा की वारिस मुख्यमंत्री ने अपने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों पर पर्दा  डालने के लिए जल्दी में  यह सारा कार्यक्रम रचा  है . इस अध्यादेश में यह प्रावधान है कि सरकार की मंजूरी के बिना जज,मैजिस्ट्रेट,और अन्य सरकारी कर्मचारियों के उन कामों की जांच नहीं की जा सकती जो उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते समय किया हो. सबको मालूम है कि सरकारी बाबू सारे भ्रष्टाचार ड्यूटी  के समय ही करते हैं. ऐसा लगता है कि उनके उन्हीं कारनामों की भ्रष्टाचार से सम्बंधित जांच में अडंगा डालने के लिए यह कानून लाया जा  रहा है .  इसके लपेटे में मीडिया को भी ले लिया गया है. कानून में व्यवस्था दी गयी है कि जब तक भ्रष्टाचार की जांच के लिए  सरकार की मंजूरी नहीं मिल जाती तब तक मीडिया भी आरोपों के बारे में रिपोर्ट नहीं कर सकता. इस मंजूरी में छः महीने लग सकते हैं .
अभी तक ऐसा होता रहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अगर कोई व्यक्ति शिकायत करता था और जांच एजेंसी जांच करने से इनकार कर देती थी  तो पीड़ित पक्ष मुक़दमा करके कोर्ट से जांच का आदेश करवा लेता था . जांच एजेंसी को एफ आई आर दर्ज करके जांच की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती थी . लेकिन अब राजस्थान में ऐसा नहीं हो सकेगा . प्रस्तावित कानून में इस पर भी रोक लगा दी गयी है . लिखा है ," कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ किसी जांच का आदेश नहीं देगा जो वर्तमान या भूतकाल में जजमैजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी रह चुका हो ". हाँ अगर सरकार जांच एजेंसी की अनुमति मांगने वाली दरखास्त पर १८० दिन तक कोई कार्रवाई नहीं करती तो जांच एजेंसी को जांच करनी की स्वतंत्रता होगी . प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में भी परिवर्तन किया  गया है . इसके कानून बन जाने के बाद भ्रष्ट  सरकारी कर्मचारी का नाम ,पता फोटोऔर उसके परिवार के बारे में कोई भी जानकारी न तो छापी जा सकती है और न ही किसी अन्य रूप में प्रकाशित की जा सकती है . अगर किसी ने इस नियम का उन्ल्लंघन किया उसको दो साल की सज़ा हो सकती है . .
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प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन १५६ ( ३) और १९०(१) में भीबद्लाव  किया जाएगा जिसमें प्रावधान है कि कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान ले सकता है और जांच का आदेश दे सकता है .अब इसमें  संशोधन किया जा रहा है  अब इस सेक्शन के तहत कोई भी मैजिस्ट्रेट  किसी भी सरकारी कर्मचारीजज या मैजिस्ट्रेट के खिलाफ  किसी जांच का आदेश नहीं दे सकता जब तक की सरकार से जांच की अनुमति न ले ली गयी हो.. अगर कथित अपराध उसकी ड्यूटी के दौरान किया  गया है . यह नियम भूतपूर्व कर्मचारियों पर भी लागू होगा.
 सभी सरकारी कर्मचारियों को निर्देश जारी कर दिया गया है कि वे किसी भी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ प्रेस या सोशल मीडिया के ज़रिये कोई भी आरोप न लगाएं और  न ही कोई कमेन्ट करें .  सरकार के नियमों की किताब के हवाले से चेतावनी दी गयी है कि अगर किसी ने ऐसा नहीं किया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी. वसुंधरा राजे की सरकार अपराध की जांच के नियमों  में इतना मूलभूत बदलाव करके राजस्थान में  भ्रष्टाचार को खुली छूट देने की  कोशिश  कर रही है . साथ ही प्रेस की आज़ादी पर भी ऐलानियाँ हमला कर रही है . राजस्थान की मुख्यमंत्री को पता होना चाहिए कि भारत में प्रेस की आज़ादी किसी नेता की तरफ से मिली हुयी खैरात नहीं है . यह भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद १९ (१)(ए) में गारंटी के रूप में मिला हुआ अधिकार है  और उसको बदलने की कोशिश जिसने भी किया उसने उसकी सज़ा भुगती है. इंदिरा  गांधी  को जो सज़ा मिली थी उसको पूरी दुनिया जानती है . प्रेस की आज़ादी कुचलने के कारण ही उनको १९७७ में चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था.
 संविधान के मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद १९(१) ( ए) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी देश के हर नागरिक को उपलब्ध है . संविधान इसकी गारंटी देता है . मीडिया की आज़ादी संविधान के इसी अनुच्छेद से मिलती है . लेकिन यह आज़ादी निरंकुश नहीं है . अनुच्छेद १९ (२) के तहत कुछ पाबंदियां भी हैं. संविधान के अनुसार ' सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी है .इस अधिकार में यह भी शामिल है कि सभी व्यक्ति बिना किसी बाहरी दखलन्दाजी के स्वतंत्र राय रख सकते हैं ,किसी भी माध्यम से सूचना ग्रहण कर सकते हैं , किसी को भी सूचना दे सकते हैं "
सभी सरकारों ने प्रेस की इस स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बार बार कोशिश की है लेकिन संविधान को पालन करवाने का ज़िम्मा सुप्रीम कोर्ट के पास है . सुप्रीम कोर्ट संविधान के उन प्रावधानों की सही व्याख्या भी करता है जिन पर कोई विवाद हो . सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में यह भी है कि अगर कोई संविधान की मनमानी व्याख्या करने की कोशिश करे तो उसको नियंत्रित करे. कई बार सरकारें यह कहती भी पाई गयी हैं कि संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता जैसी किसी भी बात की गारंटी नहीं दी गयी है. सरकारों के ऐसे आग्रह  सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा ही दुरुस्त किया है . संविधान के लागू होने के कुछ दिन बाद ही यह नौबत आ गयी थी . उस समय सुप्रीम कोर्ट ने  रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के मुक़दमे में आदेश दिया था कि " अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी लोकतांत्रिक संगठनों की बुनियाद है " इन्डियन एक्सप्रेस बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में कोर्ट ने कहा कि हालांकि  संविधान के अनुच्छेद १९ में  कहीं भी ' फ्रीडम आफ प्रेस ' शब्दों  का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन यह अनुच्छेद १९(१) ( ए) में समाहित है .इसी तरह से बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में सरकार के कहा था कि अखबार की पृष्ठ संख्या कम कर दी जाए . टाइम्स आफ इण्डिया ग्रुप की कंपनी बेनेट कोलमैन ने न्यूजप्रिंट कंट्रोल आर्डर को चुनौती देते हुए मुक़दमा कर दिया और कोर्ट ने आदेश दिया कि अख़बार की पेज संख्या कम करने संबंधी आदेश संविधान के अनुच्छेद १९(१)(ए ) का उन्ल्लंघन करता है .
इस बात की पूरी संभावना है कि जनमत के दबाव के चलते वसुंधरा राजे सरकार को अपने विवादित कानून को ख़त्म करना पड़ेगा लेकिन अगर वे जिद पर अड़ी रहीं तो सुप्रीम कोर्ट से तो प्रेस की आज़ादी की हिफाज़त की उम्मीद हमेशा ही बनी हुयी है 

Thursday, October 19, 2017

दीवाली , गरीबी , मेरा गाँव और बिरजू फुआ.




शेष नारायण सिंह


दीवाली के दिन जब मुझे अपने गाँव की याद आती है तो उसके साथ ही  बिरजू फुआ की याद आती है. दीवाली के दिन उनके घर खाना पंहुचाना मेरे बचपन का एक ज़रूरी काम हुआ करता था. बाद में मेरी छोटी बहन मुन्नी ने यह काम संभाल लिया. बिरजू फुआ के घर आस पड़ोस के कई घरों से खाना  जाता था. उनका पूरा नाम बृजराज कुंवर थासन पैंतीस के आस पास उनकी शादी उनके पिता जी ने बहुत ही शान शौकत से सरुआर में कर दिया था. सरुआर उस इलाके को कहते थे जो अयोध्या से सरयू नदी को पार करने के बाद पड़ता है. यह गोंडा जिले का लकड़मंडी के बाद का इलाका है. उसको सम्पन्नता का क्षेत्र माना जाता था. बिरजू फुआ के पिता जी गाँव के संपन्न ठाकुर साहेब थे वे उनकी इकलौती बेटी थीं, उन्होंने काफी मेहनत से  योग्य वर ढूंढ कर बेटी की शादी की थी. लेकिन ससुराल में उनकी बनी नहीं और वे नाराज़ होकर वापस अपने माता पिता के पास चली आयीं.  बाप ने बेटी को गले लगाया और वे यहीं रहने लगीं . लेकिन कुछ ही वर्षों के बाद उनके पिता जी की मृत्यु हो गयी . उसके बाद तो अकेली माँ को छोड़कर जाने के बारे में वे सोच भी नहीं सकती थीं. यहीं की हो कर रह गयीं. अगर पढी लिखी होतीं, अपने अधिकार के प्रति सजग होतीं तो बहुत फर्क  नहीं पड़ने वाला था लेकिन  अवध के ग्रामीण इलाकों में निरक्षर बेटी को उसके बाप के भाई भतीजे फालतू  की चीज़ समझते हैं. बेटी को ज़मीन में उसका हक देने को तैयार नहीं  होते .  उनके पिता जी की मृत्यु के बाद उनके खानदान वालों ने तिकड़म करके उनकी ज़मीन अपने नाम करवा लिया . थोड़ी बहुत ज़मीन उनकी विधवा यानी  बिरजू की माई  को मिली  .उसको भी  १९७४ में चकबंदी के दौरान हड़प लिया गया . अब संपत्ति के नाम पर उनके पास उनका पुराना घर बचा था जो गिरते पड़ते एक झोपडीनुमा हो गया था. मां बेटी अपनी झोपडी में रहती थीं.  जब तक ज़मीन थी तब तक किसी से हल बैल मांग कर कुछ पैदा हो जाता था लेकिन ज़मीन चली जाने के बाद उन्होंने  बकरियां पालीं, उनके यहाँ कई बकरियां होती थीं, उन दिनों बकरी पालने के लिए खेत होना ज़रूरी नहीं होता था. पेड़ की झलासी, जंगली पेड़ पौधों की पत्तियाँ आदि खाकर बकरियां पल जाती थीं. उन्हीं बकरियों का दूध  बेचकर उनका रोज़मर्रा का काम चलता था. बकरी के बच्चे बेचकर कपडे लत्ते ले लिए जाते थे.  
जब उनकी माई मर गयीं तो बिरजू फुआ पर वज्र टूट पड़ा. उसके साथ साथ ही बकरियां भी सब खत्म हो गयीं. हालांकि उस समय उनकी उम्र साठ साल से कम नहीं रही होगी लेकिन अपनी माई पर भावनात्मक रूप से पूरी तरह निर्भर थीं. माँ के जाने के बाद  उनको दिलासा देने वाली बड़ी बूढ़ी  महिलाओं ने समझाया कि परेशान मत होइए , गॉंव है, सब अपने ही तो हैं ,ज़िन्दगी की नाव पार  हो जायेगी .

उसके बाद से गाँव के परिवारों के सहारे ही उनकी ज़िंदगी कटने वाली थी.  हमारे गाँवों में साल भर किसी न किसी के यहाँ कोई न कोई प्रयोजन पड़ता ही रहता है. अपने सगे भतीजों के  यहाँ तो वे कभी नहीं गयीं लेकिन पड़ोस के कुछ परिवारों  ने उनको संभाल लिया . अपने घर में तो अन्न का कोई साधन नहीं था लेकिन उन्होंने मजदूरी नहीं की. ठाकुर की बेटी थीं ,मजदूरी कैसे करतीं. सामंती संस्कार कूट कूट कर भरे हुए थे  .लेकिन पड़ोस के  ठाकुरों के जिन घरों में उनसे इज़्ज़त से बात की जाती थी, उनके यहाँ  चली जाती थीं. जो भी काम हो रहा हो ,उसमें हाथ लगा देती थीं. घर की मालकिन समेत सभी फुआ, फुआ करते रहते थे. जो भी खाना घर में बना होता था , वे भी उसी में शामिल हो जाती थीं.  फिर अगले दिन किसी और के यहाँ . शादी ब्याह में मंगल गीत गाये जाते थे . ढोलक बिरजू फुआ के हाथ से ही  बजता था.   बाद की पीढ़ियों के कुछ लड़के लडकियां उनको झिड़क भी देते थे तो कुछ बोलती नहीं थीं. लेकिन उनके चेहरे पर दर्द का जो मजमून दर्ज होता था, वह  मैंने कई बार देखा है . उस इबारत का अर्थ मुझे अन्दर तक झकझोर देता था. लेकिन ऐसे बदतमीज बहुत कम थे जो उनकी गरीबी के कारण  उनको अपमानित करते थे . हर त्यौहार में उनके चाहने वाले परिवारों से चुपके से खाना उनकी झोपडी तक पंहुचता था. बचपन के सामंती संस्कार ऐसे थे कि परजा पवन का कोई आदमी या औरत अगर उनके घर त्यौहार के बाद आ जाए तो उसको भी कुछ खाने को देती थीं क्योंकि उनके यहाँ कई परिवारों से कुछ न कुछ आया  रहता था . उनके सबसे करीबी पड़ोसी और मेरे मित्र तेज  बहादुर सिंह उनको हमेशा " साहेब" कहकर ही संबोधित करते थे. अपने अंतिम दिनों में वे चल फिर सकने लायक भी नहीं रह गयी थीं लेकिन अपनी मृत्यु के बाद लावारिस नहीं रहीं . पड़ोस के परिवारों के लोगों ने वहीं पर उनका अंतिम संस्कार किया जहां जवार के राजा रंक फ़कीर सब जाते थे. ग्रामीण जीवन में अपनेपन के जो बुनियादी संस्कार भरे पड़े हैं, शायद महात्मा गांधी ने उनके महत्व को समझा था और इसीलिये आग्रह किया था कि आज़ादी के बाद देश के विकास का जो भी माडल अपनाया जाए उसमें गाँव की केंद्रीय भूमिका  होनी चाहिए, गाँव को ही विकास की इकाई माना जाना  चाहिए . लेकिन  जवाहरलाल नेहरू ने ब्लाक को विकास की इकई बनाया और ग्रामीण विकास की नौकरशाही का एक बहुत बड़ा नया ढांचा तैयार कर दिया .  सोचता हूँ कि अगर विकास का गांधीवादी मन्त्र माना गया होता तो आज हमारे गाँवों की वह दुर्दशा न  होती जो आज हो रही है.