Thursday, July 4, 2019

गरीबी के खिलाफ लड़ाई के एक योद्धा की छवि ने दिलाई है नरेंद्र मोदी को जीत



शेष नारायण सिंह

लोकसभा के ताज़ा चुनाव ने भारतीय राजनीति के कई मिथकों को तोडा है . नतीजों के विश्लेषण से समझ में आ रहा है कि मतदाता जातियों के सांचे से बाहर आने की कोशिश कर रहा है .जहाँ तक  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की २०१९ की जीत की बात है ,वह निश्चित रूप से असाधारण है . उन्होंने अपने २०१४ के रिकार्ड में  भी सुधार किया है . उस जीत के परिणामस्वरूप अब सरकार भी  बन गयी है. इमकान है कि वर्तमान सरकार वे काम भी करेगी जो बीजेपी के २०१४ के संकल्प पत्र में लिखा हुआ है .उनकी जीत अब चुनावी बहस का नहीं  अकादमिक चर्चा का विषय बन गयी है . तरह तरह के लोग उसका विश्लेषण कर रहे हैं. चुनाव के पहले जिन लोगों ने ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा किया था उनको अनुमान लग गया था कि  गाँव में लोग अलग तरह से वोट देने के बारे में विचार कर रहे थे. इन पंक्तियों के लेखक ने जब मार्च २०१९ में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ गाँवों का दौरा किया था तो जो संकेत ज़मीन पर दिख रहे थे ,उनसे अनुमान लगना स्वाभाविक था . २० मार्च २०१९ की अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि ," लगता है कि मायावती की राजनीति में कुछ बदलने वाला है . दलितों के घर के सामने बने हुए इज्ज़त घर , दलित परिवारों के लिए बनाये गए .ईंट के छोटे मकान उनके पक्के वोट बैंक में नक़ब लगा सकते हैं . अगर किसी बाबू साहब ने किसी दलित के नाम से थोडा बहुत गेहूं सरकारी खरीद केंद्र पर जमा करा दिया था तो उस दलित के नाम भी दो हज़ार रूपये डीबीटी के ज़रिये बैंक में जमा हो चुके हैं. दलितों के नेताओं और बीजेपी का विरोध कर रहे नेताओं का दावा है कि इससे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है लेकिन इज्ज़त घर ( शौचालय ) का प्रभाव गरीब दलितों के वोट पर पडेगा ,यह बात साफ़ नज़र आती है .हालांकि यह भी सच है कि आज से चालीस साल पहले जिन दलित बस्तियों में मैंने काम किया था उनमें बड़ा बदलाव आया है. बड़ी संख्या में दलित नौजवान सरकारी कर्मचारी हैं , कुछ लडकियां जिले के सरकारी इंजीनियरिंग कालेज से बी टेक की पढ़ाई कर रही हैं . दलितों में शिक्षा के प्रति जागरूकता है और वे सरकारी नौकरी के लिए प्रयास करते हैं जबकि बाबू साहब लोगों के बच्चे दसवीं या बारहवीं फेल होने के बाद चौराहे की रौनक बढाने में योगदान कर रहे हैं . अपेक्षाकृत जागरूक और संपन्न दलितों में मायावती के प्रति पूरा समर्पण है लेकिन जिनको पिछले दो साल में शौचालय और मकान  जैसी सुविधाएं मिली हैं वे नरेंद्र मोदी की तरफ मुखातिब हो रहे हैं "
जो लोग उत्तर प्रदेश की जातिव्यवस्था को समझते हैं उनको मालूम है कि इस तरह के संकेत अगर ज़मीन से उठ रहे थे तो उसका मतलब बड़ा था. आज नतीजे आने के बाद आसानी से कहा जा सकता है कि दलित जातियों के वोटों पर मायावती का एकाधिकार टूट चुका है . दलितों के अलावा एक और संकेत भी उसी दौरे में साफ़ नज़र आ रहा था . २२ मार्च की अपनी पोस्ट में लिखा था कि  ," ओबीसी जातियों के एक वर्ग में नरेंद्र मोदी को पिछड़ी जाति का नेता माना जा रहा है . हर चौराहे पर बीजेपी की जीत की बात की जा रही है .एयर स्ट्राइक के कारण भी खाली बैठे नौजवान लड़कों में वीरता की धारा देखी जा सकती है . मोदी के आधी बांह के कुरते और अजीबो गरीब रंग की जाकिट पहने बहुत सारे लोग देखे जा सकते हैं .अब आप ही बताइये कि चुनाव किस तरफ जा सकता है ? मेरे वे दोस्त जो मोदी को हर कीमत पर हराना चाहते हैं , उनसे निवेदन है कि वे इसे मेरी राय न मानें . यह ज़मीनी सच्चाई है ."
यह सारा माहौल एक दिन में नहीं बना . २०१३-१४ के अपने चुनाव अभियान में नरेंद्र मोदी ने अपने आपको पिछड़ी जाति के एक गरीब आदमी के रूप में पेश किया था और यह सिद्ध करने की कोशिश की थी कि उनका परिवार स्टेशन पर चाय बेचकर गुज़ारा करता था . उनके इन दावों का मजाक भी उड़ाया गया ,उनको गलत भी साबित करने की कोशिश की गयी लेकिन उस सबका नतीजा यह हुआ कि कई कई दिन मीडिया में  मोदी की जाति चर्चा में बनी रही . २०१४ के चुनाव में तो उनकी जीत का सेहरा इस बात के जिम्मे किया जा सकता है कि लोग उस वक़्त की कांग्रेस की  सरकार को अति भ्रष्ट मान रहे थे अन्ना हजारे के आन्दोलन को हवा देकर एक  कांग्रेस विरोधी संगठन और मीडिया ने पूरे देश में माहौल बना दिया था सी ए जी पद पर बैठे एक अफसर ने टूजी के  काम में करीब पौने दो लाख करोड़ के घोटाले की बात लिख कर माहौल को गरम कर दिया था. अब पता चला है कि  सी ए जी का टूजी स्पेक्ट्रम वाला घोटाला काल्पनिक था लेकिन चुनाव २०१४  में वह अपना काम कर गया . मोदी की जीत में उन सारी बातों ने योगदान दिया था . नरेंद्र मोदी की बात पर जनता ने विश्वास किया और उनको सपष्ट बहुमत दे दिया . लेकिन २०१९ के चुनाव में बात अलग थी . बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को एक कुशल और ईमानदार प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया और जनता ने उनपर विश्वास  किया . इस विश्वास की बारीकी को समझकर ही मौजूदा चुनाव नतीजों की बारीकी को समझा जा सकता है .
२०१९ के नतीजों में जानकारों का एक वर्ग लगातार ईवीएम की कारस्तानी की बात कर रहा है . इस श्रेणी में अपने बहुत से मित्र भी हैं .लेकिन उस बात को मानने के सबूत नहीं हैं इसलिए ईवीएम वाली बात  को अभी नहीं माना जा सकता है . हां अगर आगे चलकर कोई सबूत आ गया तो मान लेने में कोई परेशानी नहीं होगी . अभी तो फिलहाल नरेंद्र मोदी की चुनाव की रणनीति और उनकी प्रचार शैली पर ही बात की जायेगी . इस चुनाव में उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण है कि उन्होंने समाज के सबसे करीब इंसान को संबोधित किया और उसके मन में यह विचार पैदा करने में सफलता  पाई कि यह प्रधानमंत्री हमारे लिए कुछ करने वाला है . यह विश्वास जीतने के लिए उन्होंने पिछले पांच साल में  योजनाबद्ध तरीके से काम किया . पिछले पांच वर्षों में नरेंद्र मोदी अपने अधिकतर भाषणों में गरीबशब्द का बार बार  प्रयोग करते थे . कई बार यह बात अजीब लगती थी . लेकिन वास्तविकता यह थी कि वे  समाज के सबसे गरीब  लोगों के लिए कुछ कर रहे थे . ज्यादातर स्कीमें पुरानी थीं . मसलन दलितों के लिए पक्के मकान और उनके लिए शौचालय की स्कीम डॉ मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में शुरू किया था . पीवी नरसिम्हाराव की सरकार के वित्त मंत्री के रूप में भी उन्होंने इसका उल्लेख किया था .प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस मद के लिए धन का आवंटन भी किया था . लेकिन यह  योजनाएं ज़मीन पर लागू नहीं हो सकीं. ग्राम प्रधानग्राम पंचायत अधिकारी बीडीओ और जिला विकास अधिकारी सारी रक़म रिश्वत के रूप में हड़प कर रहे थे .२०१४ के बाद  जिन  राज्यों में बीजेपी की सरकारें थीं ,वहां यह स्कीमें मजबूती से लागू की गईं. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद लगभग हर दलित बस्ती में यह स्कीमें  युद्ध सत्र पर लागू की गयीं और जो भी  हुआ उसके बारे में बाकायदा बताया गया कि यह प्रधानमंत्री की कृपा से हुआ  है . घरों आदि पर कई जगह तो  प्रधानमंत्री की फोटो भी लगी हुयी  देखी गयी.
समकालीन इतिहास पार नज़र डालें तो एक तस्वीर उभरती है .ऐसा लगता है कि गाँव में गरीबी हटाने की बात जिस पार्टी ने भी की और  जनता ने उसका विश्वास कर लिया तो उसको सत्ता सौंप दी . आज़ादी लड़ाई के बाद सबको मालूम था कि कांग्रेस अंग्रेजोंज़मींदारोंसाहूकारों से मुक्ति दिलाने के लिए ही महात्मा गांधी की अगुवाई में  काम कर रही है . इसलिए आज़ादी के बीस साल बाद तक  कांग्रेस को इस देश की गरीब जनता का समर्थन मिलता रहा . लेकिन जब सोशलिस्ट पार्टी के नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने गरीबों के एक वर्ग को समझा दिया कि कांग्रेस उनको बेवकूफ बनाकर  वोट ले रही है और वह पूंजीपतियों और समाज के ऊपरी वर्ग की पार्टी है तो १९६७ में हुए आम चुनाव में जनता ने कई राज्यों में कांग्रेस को हरा दिया और गरीबों के रहनुमा के रूप में  समाजवादियों और संविद के उनके साथियों को स्वीकार कर लिया .  अब तक इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बन चुकी थीं और शुरू में ही उनको राजनीतिक चुनौती मिल रही थी . उन्होंने १९६७  में पी एन हक्सर को अपना सचिव बनाया .वे विदेश सेवा के एक कुशाग्रबुद्धि अधिकारी थे  लेकिन उसके पहले नागपुर में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता भी रहे थे . जनजागरण और गरीबी के समाजशास्त्र के प्रकांड पंडित थे . उन्होंने इंदिरा गांधी  को आगाह किया  था  कि ,"कांग्रेस की छवि एक ऐसी पार्टी की बनती जा रही है जो बड़े उद्योगपतियों और बड़े भूस्वामियों की चेरी है .अगर कांग्रेस अपनी छवि एक ऐसी पार्टी के रूप में बनाने में सफल न हुयी जो गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर की पार्टी है तो गरीब आदमी कांग्रेस को वोट देना बंद कर देगा ."( Intertwined Lives by Jairam Ramesh . पृष्ठ 130"). इस सलाह के बाद ही इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे को  विकसित करना शुरू किया और १९७१ में बहुत बड़े  बहुमत से सरकार बनाया  लेकिन उन्होंने गरीबी  को हटाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया . संजय गांधी के प्रभाव के चलते उन्होंने पी एन हक्सर को भी अपने सचिव पद से हटा दिया और उसी प्रभाव के चक्कर में बड़े उद्योगपतियों और बड़े भूस्वामियों की मददगार बनती गईं. और १९७७ में चुनाव हार गईं.१९८० की उनकी जीत में उनका योगदान बहुत ज़्यादा नहीं था वह जनता पार्टी की  नाकामी के कारण उनको मिली थी .
लगता है कि नरेंद्र मोदी गरीबी के बारे में पी एन हक्सर  जैसी सोच के मालिक हैं और  गरीबी के खिलाफ अभियान चलाकर चुनाव जीतने का अमोघ अस्त्र उनके हाथ लग चुका है .हालांकि किसी को कुछ दे देने से गरीबी का हटना टिकाऊ नहीं होता.  उसके लिए तो हर हाथ को काम देना पड़ता  है . यह भी सच है कि ग्रामीण भारत में हर गरीब का सपना होता है कि उसको पक्का घर मिल जाए,  शौचालय बन जायबिजली लग जाय और रसोई गैस मिल जाय. वे सारी चीज़ें लोग जीवन भर कमाकर इकट्ठा करते हैं लेकिन नरेंद्र मोदी ने एक बड़ी आबादी को यह सब उपलब्ध करा दिया है और जिनको नहीं मिला  है उनके मन में उम्मीद जगा दिया है. इस तरह से उन्होंने अपनी छवि गरीबी के खिलाफ एक योद्धा की बना ली है .२०१९ के चुनाव की जीत में गरीबी के खिलाफ उनके अभियान का सबसे बड़ा योगदान है  .

रोज़गार और आर्थिक विकास की दिशा में असली काम शुरू



शेष नारायण सिंह  


प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सरकार ने दो कमेटियों का गठन किया है  जिनका ज़िम्मा यह है कि देश में अधिक से अधिक रोज़गार सृजित किये  जाएँ और आर्थिक विकास को रफ़्तार दी जाए .२०१४ में नरेंद्र मोदी की जीत का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने देश के नौजवानों से वायदा किया था कि प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियों का सृजन किया जाएगा और देश से बेरोजगारी ख़त्म हो जायेगी . लेकिन मोदी की पहली सरकार के कार्यकाल में इस दिशा में कोई सफलता नहीं मिली.  शायद इसीलिये  इस बार , सरकार की शपथ होते ही उन्होंने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है . सर्वशक्तिमान कमेटियों में रोज़गार वाली कमेटी में प्रधानमंत्री के अलावा गृहमंत्री अमित शाहवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ,रेलमंत्री पीयूष गोयलनरेंद्र सिंह तोमररमेश पोखरियाल निश्शंक ,धर्मेन्द्र प्रधानमहेंद्र नाथ पाण्डेयसंतोष कुमार गंगवार और हरदीप पुरी को शामिल किया गया है .पूंजी निवेश और आर्थिक विकास वाली कमेटी में पांच सदस्य हैं, इसमें अमित शाहनिर्मला सीतारमननितिन गडकरी और पीयूष गोयल हैं . शपथ ग्रहण के एक हफ्ते के अन्दर इस  तरह की पहल करना इस बात का साफ़ संकेत हैं कि प्रधानमंत्री २०१४ के  वायदों को अपने  दूसरे कार्यकाल में मुकम्मल तरीके से पूरा करना चाहते हैं . पहले कार्यकाल में वे अपने मूल चुनावी वायदों को अंजाम तक नहीं पंहुचा पाए थे . शायद इसीलिए २०१९ के चुनाव प्रचार के दौरान उनको बहुत से भावनात्मक और लोकलुभावन मुद्दे लाने पड़े और मीडिया के सहयोग से ऐसा माहौल बनाना पडा जिसमें विपक्ष  भी दो करोड़ नौकरियों जैसे उन वायदों को बहस का मुद्दा न बना सके.  लगता है कि इस बार वे असली काम करके २०२४ का चुनाव जीतने की योजना बना रहे हैं . उनकी २०१९ की  जीत में पुलवामा और बालाकोट पर फोकस के अलावा  'घर में घुसकर मारने ' वाली बात का बहुत योगदान है लेकिन यह भी सच है कि  गरीबों के लिए किये गए उनके काम का भी योगदान कम नहीं है . ग्रामीण इलाकों में शहरी मध्यवर्ग की सम्पन्नता की निशानी को  उनके गाँव में ही उपलब्ध करवा देना नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में एक महत्वपूर्ण कारक है . गाँव के   गरीबों को टायलेट, रसोई गैस, बिजली और पक्के मकान देना गरीबी पर एक ज़बरदस्त हमला था. हालांकि यह भी सच है इन स्कीमों में जो ही धन लगा उसका आर्थिक और औद्योगिक विकास में कोई योगदान नहीं है . इन योजनाओं  में बहुत बड़ी सरकारी रक़म लगी है जिसे आर्थिक विकास की योजनाओं में लगाया जा सकता था . उस हालत में देश में आर्थिक विकास होता और  सपन्नता भी बढ़ती लेकिन सरकार ने गरीबी को हटाने का डायरेक्ट  रास्ता चुना .यह सभी काम शुद्ध रूप से वेलफेयर स्टेट के काम हैं . इनकी वजह से कोई रोज़गार भी नहीं सृजित हुआ है . लेकिन इस काम के कारण मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अपनी जातीय वफादारी को छोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना शुभचिंतक मानने लगा है . उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के गाँवों में घूमते हुए यह बात बिलकुल साफ़ नज़र आ रही थी कि जिस जाति के मतदाताओं को मायावती अपनी जागीर मानती थीं वह धीरे से नरेंद्र मोदी का मतदाता बन गया था. अगर मायावती का समाजवादी पार्टी से समझौता न होता तो उनकी हार २०१४ से भी ज्यादा  तकलीफदेह होती . उत्तर प्रदेश में मायावती को शून्य से बढकर दस लोकसभा सीटें मिलने के पीछे मुख्य कारण यह है कि उनको  समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के कारण मुसलमानों के वोट तो एकमुश्त मिले ही , यादवों ने  भी बड़ी संख्या में वोट दिया . नरेंद्र मोदी के गरीब ग्रामीणों के लिए किये काम ने बड़ी संख्या में दलित मतदाताओं को मायावती से दूर खींच लिया .

गरीबों को लाभ पंहुचाने वाली  योजना से जनसमर्थन तो जुटा लिया गया लेकिन देश  औद्योगिक क्षमता में कोई शक्ति नहीं जुडी .प्रधानमंत्री ने देश में औद्योगिकीकरण के ज़रिये रोज़गार बढ़ाने और सम्पन्नता की बात अपने २०१३-१४ के चुनावी अभियान में की थी . सरकार में आने के बाद उन्होने इस काम को पूरा करने के लिए कई तरह की पहल भी की . मेक इन इण्डियास्टार्ट अप इण्डिया ,कौशल विकासमुद्रा लोन ,सौ स्मार्ट शहर आदि योजनायें  इसी लक्ष्य को हासिल  करने के लिए घोषित की गईं थीं . लेकिन इनमें से कोई भी योजना परवान नहीं चढ़ सकी . २०१४ के चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने देश में आर्थिक विकास लाने के बहुत बड़े बड़े वायदे किये थे .बेरोजगारी से जूझ रहे देश के ग्रामीण इलाकों के नौजवानों को उन्होंने रोज़गार का वायदा किया था . नरेंद्र मोदी के अभियान की ताक़त इतनी थी कि उनकी बात देश के दूर दराज़ के गाँवों तक पंहुंची और उनकी बात का विश्वास किया गया . शहरी गरीब और मध्यवर्ग को भी नरेंद्र मोदी ने प्रभावशाली तरीके से संबोधित किया था . उन्होने कहा कि वह बेतहाशा बढ़ रही कीमतों पर लगाम लगा देगें .रोज़ रोज़ की महंगाई के कारण मुसीबत का शिकार बन चुके शहरी मध्यवर्ग और गरीब आदमी को भी लगा कि अगर मोदी की राजनीति के चलते महंगाई से निजात पाई जा सकती है  तो इनको भी आजमा लेना चाहिए . पूरे देश के गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को नरेंद्र मोदी के भाषणों की उस बात पर भी विश्वास हो गया जिसमें वे कहते थे की देश का बहुत सारा धन विदेशों में जमा है जिसको वापस लाया जाना चाहिए. मोदी जी ने बहुत ही भरोसे से लोगों को विश्वास दिला दिया था कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापस आ गया तो हर भारतीय के हिस्से १५ से २० लाख रूपये अपने आप आ जायेगें . उनकी इस बात का भी विश्वास जनता ने किया .हालांकि यह भी सच्चाई है  कि उन्होंने यह कभी नहीं कहा था कि सबके बैंक खाते में  १५-१५ लाख रूपये जमा कर दिए जायेंगे.  
२०१४ के चुनाव अभियान के दौरान प्रधान मंत्री ने आर्थिक विकास को मुख्य मुद्दा  बनाया था. उसी के सहारे बेरोजगारी ख़त्म करने की बात भी की थी. सरकार में आने पर पता चला कि उनकी आर्थिक विकास की दृष्टि में देश को मैनुफैक्चरिंग हब बनाना बुनियादी कार्यक्रम है . प्रधानमंत्री की योजना थी  कि देश भर में कारखानों और  फैक्टरियों में का जाल बिछा दिया जाए . अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि यह बिलकुल सही सोच है . प्रधानमंत्री को उम्मीद थी कि विदेशी कम्पनियां भारत में बड़े पैमाने पर  निवेश करेगीं और चीन की तरह अपना देश भी पूरी  दुनिया में कारखानों के देश के रूप में  स्वीकार कर लिया जाएगा . उनकी इस योजना में देश में कारखाने लगाने का माहौल बनाने की बात सबसे प्रमुख है .  सभी जानते हैं कि जहां कारखाने लगाए जाने हैं ,उस राज्य की कानून व्यवस्था सबसे अहम पहलू है .  महाराष्ट्र और गुजरात में तो कानून व्यवस्था ऐसी है जिसके आधार पर कोई विदेशी कंपनी वहां पूंजी निवेश की बात सोच सकती है लेकिन दिल्ली के आसपास के राज्यों की कानून व्यवस्था ऐसी बिलकुल नहीं है कि वहां कोई विदेशी कंपनी चैन से कारोबार कर सके.कानून व्यवस्था के अलावा उद्योगपतियों की एक मांग रही है कि श्रम कानूनों में बड़े बदलाव किये जाएं .उनको भारत के श्रम कानूनों से बहुत परेशानी होती है . उनकी हमेशा से ही इच्छा रही है कि श्रम कानून ऐसे हों कि वे जब चाहें कारखाने में काम करने वाले लोगों  को नौकरी से हटा सकें . अभी के कानून ऐसे हैं कि पक्के कर्मचारी को हटा पाना बहुत ही मुश्किल होता  है . किसी भी सरकार के लिए  उद्योग लॉबी  की इस मांग को पूरा कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है  . नरेंद्र मोदी की पहली सरकार भी इस दिशा में उद्योग लॉबी को संतुष्ट नहीं कर सकी . अभी गठित कमेटियों से उम्मीद की जा रही है कि वह ऐसी हालात पैदा करने में मदद करे .उद्योगपतियों  की दूसरी मांग रहती है कि जहां भी उनके कारखाने लगाए जाएँ वहां उनको ज़मीन सस्ती , बिना  किसी झंझट और इफरात  मात्रा में मिल जाए. अंग्रेजों के ज़माने का पुराना भूमि  अधिग्रहण कानून इसी तरह का था लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते डॉ मनमोहन सिंह की सरकार ने उसमें ज़रूरी बदलाव किया था. उस बदलाव में बीजेपी की भी सहमति थी . उद्योगपति लॉबी ने इन बदलावों को नापसंद  किया था . आर्थिक विकास को रफ़्तार देने के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने उसको बदलने के मन बना लिया लेकिन संसद से मंजूरी की संभावना नहीं थी क्योंकि किसी भी  राजनीतिक पार्टी के लिए किसी भी किसान विरोधी कानून को समर्थन दे पाना बिलकुल असंभव है . इसलिए सरकार ने अध्यादेश के ज़रिये पूंजीपति लॉबी की यह इच्छा पूरी कर दी है .   उसमें विदेशी कम्पनियों को ज़यादा सुविधा और अधिकार देने का प्रावधान था . सरकार को उम्मीद थी कि इन  कानूनों के बाद सब कुछ बदल जायेगा और विदेशी पूंजीपति भारत में उसी तरह से जुट पडेगा जिस तरह से चीन में जुट पडा है .लेकिन ऐसा हुआ नहीं .नरेंद्र मोदी सरकार का आर्थिक विकास  का जो माडल देश के सामने पेश किया गया है उसमें विदेशी पूंजी का बहुत महत्व  है . विदेशी पूंजी  के सहारे देश में आद्योगिक मजबूती लाकर  बेरोजगारी ख़त्म करने का प्रधानमंत्री का चुनावी वायदा इसी बुनियाद पर आधारित है .
कुल मिलाकर यह भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि महंगाईबेरोजगारी और काला धन के बुनियादी नारे को लागू करने की प्रधानमंत्री की इच्छा पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता लेकिन यह भी सच है कि  नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ऐसा कोई क़दम नहीं उठाया है जिससे यह नज़र आये कि महंगाई और बेरोजगारी को ख़त्म करने की दिशा में कोई ज़रूरी पहल भी हुई . यह बात सरकार को भी मालूम है .प्रधानमत्री को मालूम है कि अब जनता को भावनात्मक मुद्दों और लोकलुभावन स्कीमों के सहारे वोट देने के लिए तैयार करना  मुश्किल होगा .शायद इसी सोच के कारण नई सरकार के पदारूढ़ होते ही नई कमेटियों का गठन करके तुरंत काम शुरू कर दिया गया है .

Tuesday, May 7, 2019

यह यात्रा कुमार केतकर की पत्रकारिता को सलाम करने का अवसर भी है





शेष नारायण सिंह

 इलाहाबाद और  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा लेने के बाद एम आई टी से पी एच डी करके वहीं अमरीका  में  अकादमिक क्षेत्र में बुलंद मुकाम बनाने वाले एक प्रोफेसर और मुंबई के कुछ बहुत ही विद्वान एवं  सामाजिक रूप से जागरूक पत्रकारों के साथ चुनाव यात्रा एक बेहतरीन अनुभव है . आम तौर पर चुनाव यात्राओं के  दौरान कौन जीत रहा है या कौन कौन हार रहा है , यह बातें उठती रहती  हैं . या कितनी सीटें किस पार्टी को मिलने वाली हैं , यह बातें मुझे बोर करती हैं . हालांकि अपने ग्रुप में भी यह  चर्चा आती रहती है लेकिन हमारे साथियों की यात्रा का स्थाई भाव उत्तर प्रदेश की राजनीतिक विकास यात्रा को समझना है . देश के चोटी के पत्रकार कुमार केतकर और ब्राउन विश्वविद्यालय के विश्वविख्यात प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की चुनाव यात्रा मुझे अब तक अभिभूत कर चुकी है. मैं  अपने को धन्य मानना  शुरू कर चुका हूँ. लोकसभा के चुनाव में जो जीतेगा वह सांसद बनेगा लेकिन लखनऊ से बनारस तक की हमारी यात्रा में हमारे साथी , कुमार केतकर सांसद हैं लेकिन पत्रकारिता के धर्म में अडचन न आने पाए इसलिए वे अपने इस परिचय को   पृष्ठभूमि में रख कर चल रहे हैं . हमें मालूम है कि अगर रायबरेली में हमने बता दिया होता कि केतकर जी संसद हैं तो हमको  बहुत ही सम्मान से ट्रैफिक  की चकरघिन्नी खाने से मुक्ति मिल जाती लेकिन हम रायबरेली में गोल गोल घुमते रहे और एक पत्रकार के लिए वह नायाब तजुर्बा हासिल करने में कामयाब रहे कि इतने दशकों से वी आई पी चुनाव क्षेत्र होने के बाद भी रायबरेली शहर विकास की यात्रा में पिछड़ गया  है. कुमार केतकर हमारे साथ सडक पर छप्पर में बनी चाय की दुकानों पर  बैठकर जिस तरह से श्रोता  भाव से सब कुछ सुनते रहते हैं ,वह बहुत ही दिलचस्प है .  जब अमेठी के रामनगर में संजय सिंह के महल के सामने झोपडी में चल  रही चाय की दुकान में हम बैठे थे तो मुझे लगा कि अगर  किसी अधिकारी को पता लग जाये कि टुटही कुर्सी बैठे यह श्रीमानजी संसदसदस्य हैं तो वह प्रोटोकाल का पालन करने की कोशिश  करेगा लेकिन कुमार को वह मंज़ूर नहीं क्योंकि उनको अपने अन्दर बैठे पत्रकार को पूरे शान और गुमान के साथ  जिंदा रखना है . मुझे लगता है कि अगर अपने मूल  धर्म के पालन में सभी लोग यही संकल्प रखें तो समाज का बहुत भला होगा .
हमारी पूरी यात्रा में दलितों को  केवल वोटर के रूप में पहचानने की कवायद से बार बार सामना हुआ . मुझे इसमें  दिक्क़त  होती है . मैं जानता हूँ कि दलित युवकों का शिक्षित वर्ग सामाजिक न्याय के सवालों को बहुत ही तरीके से समझता है और उसके राजनीतिक भावार्थ को जानता है . मेरी उत्तर प्रदेश यात्राएं होती तो बहुत हैं लेकिन कभी एक दिन के लिए तो कभी चार दिन के लिए . १९९४ के बाद से बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में नियमित रूप से एक महीना गाँव में रहना अब इतिहास है लेकिन मुझे पता चलता रहता  था कि मेरे गाँव में सही अर्थों में दलित विषयों की चेतना है  . ‘ हरिजन शब्द के प्रयोग की राजनीति को मैंने १९७३ में ही अपने गाँव के दलित लोगों के वरिष्ठ दलित लोगों को बताने की कोशिश की थी. अमरीका के ब्लैक पैंथर्स के बारे में दिनमान ने कुछ छापा था और उसके आधार पर और सूचना इकट्ठा करके मैंने गाँव के समझदार दलित , खेलई से बात की थी . उसके पहले इन लोगों ने बराबरी के छोटे ही सही लेकिन महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे .एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना के ज़रिये बात को रेखांकित करने की कोशिश की जायेगी . हमारे गाँव में सभी जातियों के बाल नाई काटते थे  . बाल काटने के पहले नाई लोग पानी से बाल को खूब भिगोते थे .इस तरह से सिर  में मालिश हो जाती थी . लेकिन दलित व्यक्ति जब बाल कटवाने जाते थे तो नाई का आदेश होता था कि बाल भिगोकर आओ , वह अपने ही   हाथ से पानी से बाल भिगोते थे ,उसके बाद  उनके बाल काटे जाते थे .  खेलई दादा ने मुझे एक दिन बताया कि  अब हम लोग अपने बाल खुद नहीं भिगोएंगे . जैसे बाभन ठाकुरों के बाल  नाई जी भिगोते  हैं ,वैसे ही हमारे भी बाल उनको भिगोना पडेगा . लेकिन नाई लोग सहमत नहीं हुए. बड़ी लम्बी कहानी है लेकिन इस समस्या की काट निकाल ली गयी . दलित बस्ती के कुछ लड़कों ने उस्तरा कैंची खरीद लिया और खुद ही बाल काटने की कोशिश की . धीरे धीरे वे  कुशल नाई हो गए . उस दलित लड़कों को उनकी अपनी बिरादरी के लोग  नाऊ ठाकुर ही कहने लगे . यह बहुत बड़ी बात थी . जन्म से नहीं कर्म से जाति के सिद्धांत का एक उदाहरण था .उसके बाद बहुत सारे विकास हुए . शिक्षा का महत्व, सरकारी नौकरी का महत्व ,मेरे गाँव के दलितों की राजनीतिक समझदारी में बड़ा कारक बना . बाद में जब दलित मुद्दा आन्दोलन का रूप लेने लगा तो कांशी राम के एक साथी मेरे गाँव में आये . यह १९८४ के चुनाव के बाद की बात है  . बहुजन समाज पार्टी का गठन नहीं हुआ था , डी एस 4 नाम के संगठन के ज़रिये दलित चेतना के विकास की बात हो रही थी. उन्होंने ही  लोगों को अपना कोई उद्यम लगाने की बात सबसे पहले समझाई थी . जब गाँव के चौराहे पर दलित लड़कों ने छोटी छोटी दुकानें खोलना शुरू किया तो मुझे स्पष्ट हो  गया कि अब यह कारवाँ चल पड़ा है , यह रुकने वाला नहीं है .अब तो मेरे गाँव के दलितों के लड़के लडकियां उच्च शिक्षा ले रहे  हैं . पिछली यात्रा में पता चला कि जिस सरकारी विभाग में मेरे काका का पौत्र सहायक इंजीनियर हुआ है ,उसी के साथ एक दलित नौजवान की नियुक्ति भी उसी विभाग में हुई है . दोनों राजपत्रित अधिकारी हैं . इस घटना का महत्व यह है कि उस दलित के पिता और बाबा मेरे काका के यहाँ हरवाही करते थे .लेकिन शिक्षा और संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी वास्तव में समतामूलक समाज की स्थापना की ज़रूरी शर्त है . इसी शिक्षा ने गरीबी पर मर्मान्तक प्रहार भी किया है .
बहरहाल मेरे सहयात्रियों को मेरे भाई, सूर्य नारायण सिंह ने  दलित नेताओं से मिलवाया . डॉ लोकनाथ  मेरे भाई के बहुत ही क़रीबी  हैं और मेरे परिवार के सभी लोग उनको अपना डाक्टर मानते हैं .  चौराहे पर उनकी क्लिनिक है .इन लोगों को मेरे भाई ने डाक्टर साहब से मिलवाया और उनके साथ यह दलित बस्ती में गए. वंचना ( Deprivation) के असली मुद्दों पर बात हुयी . शासक वर्गों की कोशिश रहती है कि दलितों को ब्राह्मण विरोधी साबित किया जाए और सारी बहस को जाति बनाम  जाति के विमर्श में लपेट दिया जाए . लेकिन वहां से लौटकर आने के बाद इन लोगों ने मुझे बताया कि सामाजिक मुद्दों के प्रति जो जागरूकता वहां देखने को मिली , वह अद्वितीय है .  दलित बस्ती के बाशिंदों  ने साफ़ बता दिया की हमारी लड़ाई किसी ब्राहमण से नहीं है , लड़ाई वास्तव में उस सोच से है जो एक ख़ास वर्ग के आधिपत्य की बात करती है .  सवर्ण सुप्रीमेसी की उस राजनीति को ब्राह्मणवाद भी कहा  जा सकता है . करीब घंटा भर चले इस वाद विवाद में सब खुलकर बोले और सारे सवालों पर आम्बेडकर के हवाले से अपना दृष्टिकोण रखा .  दलितों के इंसानी हुकूक का सबसे बड़ा दस्तावेज़ , भारत का संविधान है . उसके साथ हो रही छेड़छाड़ की कोशिशों से हमारे गाँव के दलित चौकन्ना हैं . उनको  जाति के  शिकंजे में लपेटना नामुमकिन है . वे  मायावती की राजनीति का समर्थन करते हैं तो उम्मीदवार किसी भी जाति का हो, उसकी  जाति की परवाह किये बिना उसको वोट देने में उनको कोई  संकोच  नहीं है . प्रो. आशुतोष वार्ष्णेय ने मुझसे साफ़  कहा कि इस चेतना के बाद सामाजिक परिवर्तन के रथ को रोक सकना  असंभव है. अब यह कारवाँ रुकने वाला  नहीं है . क्योंकि जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से नहीं टाले जा सकते और यह भी अब डेरे मंजिल पर ही डाले जांयेंगे और जब बराबरी  वाला समाज  स्थापित हो जाएगा तो भारतीय समाज की विकास यात्रा को कोई नहीं रोक  सकेगा .क्योंकि इन दलित नौजवानों ने तय कर रखा है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अगर उनके भविष्य को डॉ अम्बेडकर के राजनीतिक  दर्शन से हटकर लाने की कोशिश  करेगी तो वह उनको मंज़ूर नहीं है क्योंकि डॉ आंबेडकर की राजनीति में ही सामाजिक बदलाव का बीजक सुरक्षित है .
मेरे गाँव से बनारस की सड़क पर करीब २५ किलोमीटर चलने के बाद सिंगरामऊ पड़ता है .वहीं पर एक  नायाब इंसान रहता है .सिंगरामऊ रियासत के मौजूदा वारिस कुंवर जय सिंह से मुलाक़ात हुई. ग्रामीण उत्तर प्रदेश में शिक्षा के विकास के लिए उनके  पूर्वजों ने करीब एक सौ साल पहले एक पौधा लगाय था जो अब बड़ा हो गया है . राजा हरपाल सिंह पोस्ट  ग्रेजुएट कालेज , केवल जौनपुर का ही नहीं ,पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शिक्षा संस्थान  है . कुंवर जय सिंह ,जिनको इस इलाके में सभी जय बाबा के  नाम से जानते हैं ,अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित इसी शिक्षा संस्थान का कार्यभार देखते हैं . उनके कोट में मट्ठा पीने को मिला , बेहतरीन  पेय लेकर हम उनके साथ ही , वहां चल पड़े जहां जाने के लिए दिल्ली ,मुंबई के बहुत सारे साथी अक्सर प्लान बनाते रहते हैं लेकिन  बहुत कम लोग अभी तह जा पाए हैं .ता. मेरी मुराद बी एच यू के छात्र संघ के चालीस साल पहले अध्यक्ष रहे , श्री चंचल से है. उन्होंने अपने पुरखों के गाँव ,पूरे लाल , में  समता घर बना रखा है जहां गरीबी और deprivation के शिकार लोगों के बच्चों को शिक्षा और हुनर की ट्रेनिंग देकर गरीबी के मुस्तकबिल को लगातार चुनौती  दी जाती है .  महानगर से जाकर जो लोग भी  समता घर में रहे हैं, उनके लिए ग्रामीण जीवन के अनुभव के बेहतरीन अवसर इस ठीहे पर उपलब्ध रहते हैं . और लोगों के लिए वहां जाकर चंचल जैसे नामी कलाकार ,पत्रकार,  राजनेता, लेखक से मिलना सही होता होगा  लेकिन  चंचल के गाँव में मेरे लिए  उनकी माई से मिलना एक जियारत होती है . माई से जब मैं मिलता हूँ तो मुझे अपनी माई की याद आ जाती  है . जब पूरे लाल की प्रथम  नागरिक  और चंचल की माई मुझे कलेजे से लगाकर आशीर्वाद देती हैं तो लगता है कि मेरा भविष्य बहुत ही उज्जवल है.   आने वाली मुसीबतों को अपनी निश्छल अपनैती से चुनौती देने वाली यह मां, मुझे किसी भी मुसीबत का मुकाबला करने का हौसला देती है. शायद इसीलिये “ कहते हैं कि मां के पाँव के नीचे बहिश्त  है “ पूरे लाल में राजनीतिक चर्चा भी हुयी , हालाते हाजेरह पर तबसरा हुआ . हमारे मुंबई से आये दोस्तों को बहुत मज़ा आया. उन्होंने मुंबई में रहने वाले जौनपुर मूल के भइया बिरादरी के लोगों की ज़मीन की मिट्टी की समृद्धि को करीब से देखा और अनुभव किया .उनको लगता होगा कि इतने संपन्न इलाके से खेती के मालिक ठाकुरों ब्राह्मणों के बच्चे मुंबई जाकर मजदूरी क्यों करते हैं . लेकिन इसका जवाब  है और कभी  मैं ही उसको लिखूंगा .
हमारा अगला पड़ाव जौनपुर था .जहां मेरे बी ए के  दर्शन शास्त्र के  शिक्षक डॉ अरुण कुमार सिंह के साथ  सत्संग की योजना थी . लेकिन उनसे वैसी बात नहीं हो  सकी जैसी उम्मीद थी क्योंकि उनको बोलने का मौक़ा ही नहीं मिला. उनके घर पर एक युवक से मुलाक़ात हुयी . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त  यह नौजवान आजकल बीजेपी का जिम्मेवार कार्यकर्ता है . पिछड़ी जाति के परिवार में जन्म लेकर उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में एक उपलब्धि है .यह युवक कुशाग्र्बुद्द्धि है लेकिन पता नहीं क्यों हो गया था कि राजनीतिक विमर्श में अपनी पार्टी की घोषित लाइन को कुछ इस तरह से चलाने की कोशिश कर रहा था जैसे चुनाव प्रचार में किया जाता है . ज़ाहिर है मुलाक़ात बेमजा रही . हम में से कोई भी उस इलाके में  मतदाता नहीं है और जो लोग भी हमारे काफिले में शामिल थे लगभग सभी  लोकसभा २०१९ में वोट डाल चुके हैं .वहां से बेनी साहु की दिव्य जौनपुरी इमरती का प्रसाद खाकर हम अगली मंजिल के लिए  रवाना हो गए .  इस यात्रा में हमारे सबसे वरिष्ठ साथी कुमार केतकर संसद के सदस्य हैं लेकिन अपनी उस पहचान को  पूरी  तरह से आच्छादित करके चल रहे हैं . वे एक शुद्ध पत्रकार के रूप में यात्रा कर रहे हैं. मैं कई बार सोचता  हूं कि जिस संसद की सदस्यता लेने के लिए आज देश के अलग अलग कोने में अरबों खरबों रूपये बहाए जा रहे हैं  , उसी संसद के ऊपरी सदन के सदस्य कुमार केतकर इस यात्रा में इस तरह से रह रहे हैं जैसे एक साधारण पत्रकार  अपनी यात्रा करता है . सुल्तानपुर में जब वरुण गांधी की  चुनावी सभा में यह ख़तरा बाहुत ही अयां हो गया कि उनको वरुण गांधी पहचान लेंगे तो विकास नायक ने उनको तुरंत भीड़ के सबसे पीछे ले जाकर श्रोताओं के बीच छुपा दिया .  मैंने बहुत से पत्रकार देखे हैं , जौनपुर के बाद वाराणसी में बहुत  सारे  सेलिब्रिटी पत्रकारों से फिर सामना हुआ लेकिन बनारस की गलियों में पैदल चलते , सांड से बचकर रास्ता तलाशते   ,फर्श पर बैठकर बनारस के संतों की वाणी सुनते कुमार केतकर को देखना मेरे लिए वह वह उम्मीद की किरण है कि अगर   हाथ में कलम है तो ज़िंदगी को हमेशा एक मक़सद दिया  जा सकता है .  इस चुनाव की उनकी कवरेज देखकार मुझे लगता  है कि मैं भी जब बड़ा बनूंगा तो कुमार केतकर जैसा पत्रकार बनूंगा . वाराणसी के होटल में बहुत सारे फाइव  स्टार पत्रकारों के दर्शन हुए लेकिन उनमें से किसी को मैं काबिले  एहतराम नहीं मानता  . वाराणसी में जिस तरह से  कुमार केतकर ने ई रिक्शा की यात्रा की ,  पैदल घूमे और शहर के मिजाज़ को समझने की कोशिश की ,वह मेरे लिए  ,मेरी ज़िंदगी का अहम सबक है. चुनावी माहौल में एक साधारण रिपोर्टर की तरह काम करना बहुत ही कठिन तपस्या है , और यह तपस्वी साधारण से साधारण होटलों में रुक कर जिस तरह से  अपनी मिशन पत्रकारिता को  अंजाम दे रहा है ,वह मेरे श्रद्धा का सबसे बुलंद मुकाम है .

Sunday, May 5, 2019

लखनऊ से सुलतानपुर तक की चार और पांच मई की यात्रा रिपोर्ट


शेष नारायण सिंह

लखनऊ से सुल्तानपुर की  की यात्रा में पांच लोकसभा क्षेत्रों से गुजरने का मौक़ा लगा . आज सुल्तानपुर से चलकर आजमगढ़ और जौनपुर होते हुए शाम को वाराणसी में डेरा डालने की योजना है . लखनऊ संसदीय क्षेत्र के बारे में जो चर्चा दिल्ली में  सुनने को मिल रही थी , वही लखनऊ में भी है . इस चुनाव में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को हराना नामुमकिन माना जा रहा है . वही हाल रायबरेली में सोनिया गांधी का भी है .
लोकसभा २०१९ भारत के संसदीय इतिहास में असाधारण चुनाव माना जा रहा है . पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली पहली गैरकांग्रेसी पार्टी भारतीय जनता पार्टी है . पहली बार कोई  गैर कांग्रेसी पार्टी अपने पांच साल के कामकाज पर जनादेश मांग रही है और चुनाव के मैदान में है . पहली बार उत्तर प्रदेश में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों का एक ऐसा गठबंधन सत्ताधारी पार्टी को चनौती दे रहा है जिसके सफल होने के बाद भारत में चुनावी राजनीति का नया व्याकरण लिखा जाने वाला है . बहुजन समाज पार्टी और  समाजवादी पार्टी का गठबंधन अगर सफल हुआ तो देश में एक दलीय लोकशाही का अंत होने वाला है . हमारे मित्र और बहुत आला मेयार के पत्रकार और इस यात्रा के हमसफ़र ,कुमार केतकर का कहना है कि ऐसा लगता है अब चुनाव में कई पार्टियों के गठबंधन की सरकारें बनाया  करेंगे . इसका एक माडल जर्मनी की क्रिश्चियान डेमोक्रेटिक यूनियन  Christian Democratic Union   में उपलब्ध है . हो सकता है कि आने वाले समय में यही माडल सबको स्वीकार्य हो जाए .

मई जून के महीने में लखनऊ शहर दोपहर में सो जाता है . बाज़ारों में बहुत कम लोग नज़र आते हैं . चुनाव प्रचार के अंतिम दिन भी शहर का मिजाज़ इससे अलग नहीं था. लखनऊ में  छः मई के चुनाव के लिए चार की शाम को प्रचार बंद  हो गया . चार तारीख की दोपहर को ही सन्नाटा साफ़ नज़र आ रहा था. लेकिन हम भाग्यशाली थे. शहर के शीर्ष पत्रकारों के साथ हमको शाम की चाय पीने का मौक़ा लागा. हमारी  टीम में भी एक से एक जानकार हैं  ब्राउन विश्वाविद्यालय के प्रोफ़ेसर आशुतोष वार्ष्णेय , मुंबई के सबसे आदरणीय मराठी पत्रकारों में से एक कुमार केतकर और उनके मित्र विकास नायक हमारे साथ हैं. मुंबई के ही एक सांख्यिकीविद भी हमारे काफिले में हैं जिनकी साहित्य और चुनावी राजनीति समझदारी में गहरी पैठ है . शाम को जब चाय पर दो घंटे की माथापच्ची के लिए हम बैठे तो उत्तर प्रदेश के हर जिले की तस्वीर परत दर परत खुलती  गयी. हम लखनऊ के करीब पन्द्रह उन  पत्रकारों से मुखातिब थे जिनको पूरे देश में बरास्ता टेलिविज़न की बहसों के जाना पहचाना जाता है . बहुत  दिन बाद मैं ऐसी किसी महफ़िल में शामिल था जिसमें मैं शुद्ध रूप से श्रोता था . मैंने किसी भी मुद्दे पर अपनी राय नहीं दी. चुपचाप सुनता रहा .  गंभीर बहस मुबाहसा होता रहा . मौजूद पत्रकारों में ज्यादातर लोग  उत्तर प्रदेश की अधिकतर संसदीय क्षेत्रों की की यात्रा कर चुके हैं . आम राय यह थी की बीजेपी के पक्ष में २०१४ वाली हवा तो कतई नहीं है . मौजूदा सरकार के पिछले पांच साल के काम से भारी नाराज़गी है लेकिन पुलवामा में आतंकवादी हमला और उसके खिलाफ बालाकोट में की गयी भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई के कारण एक बहुत बड़ा  वर्ग सरकार के पक्ष में है . राष्ट्र की रक्षा और घर में घुसकर मारने की बात लोगों पर निश्चित असर डाल चुकी है और उसका फायदा नरेंद्र मोदी  हो रहा है . भारतीय जनता पार्टी और मुकामी उम्मीदवार ज्यादातर सीटों पर चर्चा में आते ही नहीं . केवल लखनऊ , रायबरेली और अमेठी में मुकामी उम्मीदवारों के नाम पर या उनके विरोध में वोट की बात है . बाकी हर जगह नरेंद्र मोदी की सरकार को एक और अवसर देने के लिए ही वोट मांगे जा रहे  हैं और ऐसा लगता है कि मिलने भी वाले हैं . .आवारा जानवरों के कारण लगभग  तबाह हो चुकी फसल और सडकों , चौराहों पर बेरोजगार घूम  रहे , नौकरी की उम्मीद लगाए नौजवानों की भीड़ की नाराज़गी थी लेकिन उस सब को बालाकोट ने धो दिया है . अपनी मुसीबतों की परवाह किये बिना  लोग नरेंद्र मोदी को दुबारा मौक़ा देने के लिए  उद्यत हैं .
इस तस्वीर से यह भ्रम हो जाना लाजमी है कि नरेंद्र मोदी की लहर फिर वैसी ही है  जैसी २०१४ में थी लेकिन इसमें एक पेंच है . नरेंद्र मोदी के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार इन लोगों में वही लोग हैं जो परम्परागत तरीके से बीजेपी के ही वोटर हैं . वे नाराज़  हो गए थे , निराश थे क्योंकि सरकार ने २०१४ के वायदों को पूरा करने  के लिए कोई काम नहीं किया है . हर साल नौजवानों के लिए दो करोड़ नौकरियों का वायदा , किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वायदा ,विदेशों से कालाधन वापस लाने का वायदा, भ्रष्टाचार मुक्त समाज का सपना , भव्य राम मंदिर का निर्माण और आतंकवाद के खात्मे का संकल्प २०१४ के चुनाव की ख़ास बातें थीं , दिल्ली के बीजेपी नेताओं के आग्रह पर दिल्ली में रहने  वाले हम जैसे पत्रकार तो मान सकते हैं कि मोदी की सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है लेकिन लखनऊ के विद्वान पत्रकारों ने जिन इलाकों की यात्राएं कीं  उसका निचोड़ यह है कि सरकार अपने किसी भी वायदे को पूरा नहीं कर सकी है . नोटबंदी और जी एस टी   जैसे विवादित फैसले जनता ने पसंद नहीं किया था. इन लोगों का कहना था कि अगर बालाकोट न हुआ होता तो मोदी सरकार के खिलाफ ज़बरदस्त माहौल था . लेकिन बालाकोट के बाद  बीजेपी के परंपरागत वोटर फिर बीजेपी के साथ  हैं . इस सारी तस्वीर में बस एक व्यवधान  है .  समाजवादी  पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थक बालाकोट से प्रभावित नहीं दिख रहे हैं . वे उसी उत्साह से बीजेपी के खिलाफ वोट कर रहे हैं , जिस  उत्साह से बीजेपी के समर्थक नरेंद्र मोदी की सरकार को एक मौक़ा और देने की बात कर रहे  हैं.
इस तरह से बालाकोट की पूंजी लेकर चुनाव मैदान में उतरी बीजेपी के सामने उत्तर प्रदेश में ज़बरदस्त चुनौती है . बसपा और सपा के समर्थकों की संख्या खासी अधिक है . २०१४ के चुनावों को देखा जाए और वहां इनके हारे हुए उम्मीदवारों के वोटों को जोड़ दिया जाए तो  बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र मी जायेंगे जहां गठबंधन  बीजेपी से अधिक हो जाता है .वह मोदी से  उम्मीदों की लहर का चुनाव था . इस बार सभी मोदी लहर की मौजूदगी से इनकार करते हैं . बल्कि अगर ओबीसी , दलित और मुसलमानों से बात की जाए तो वे लोग तो  सरकार के खिलाफ लहर की बात करते हैं . अपने वायदों को भूल जाने का आरोप लगाते हैं और चुनावी गणित को नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा कर देते हैं .इस बार सभी क्षेत्रों में गठबंधन के उम्मीदवारों की कांटे के टक्कर की चर्चा है . जब बीजेपी का कार्यकर्ता और नेता कांटे की टक्कर की बात करने लगें तो इसका अनुवाद नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बहुत ही खुशगवार नहीं माना जाएगा .
इस  पृष्ठभूमि में शुरू हुई लखनऊ से वाराणसी यात्रा में कई पड़ाव आये .लखनऊ और रायबरेली के बीच की सड़क बहुत ही अच्छी है . दोनों हाई प्रोफाइल सीटों के बीच में पड़ने वाला सुरक्षित श्रेणी का मोहनलाल गंज संसदीय क्षेत्र आमतौर पर दिल्ली के पत्रकारों में चर्चा का विषय नहीं बनता लेकिन यह बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यहाँ दलित आबादी खासी  बड़ी है. दलितों में पासी  जाति के लोग मोहनलाल गंज में अधिक हैं . यहाँ से मौजूदा  सांसद बीजेपी के कौशल किशोर हैं . मोदी लहर में विजयी हुए थे लेकिन अब बहुत ही अलोकप्रिय हैं . उनके खिलाफ कांग्रेस के उम्मीदवार आर के चौधरी हैं . यह कभी मायावती के बहुत ही करीबी हुआ करते थे , बहुत ही पैसे कमाए हैं और आजकल कांग्रेस में हैं . लेकिन यहाँ मायावती का उम्मीदवार सी एल वर्मा  भारी पड़ रहा है . लगता है यह सीट बालाकोट के बावजूद भी  बीजेपी के लिए मुश्किल साबित होगी . उस  सीट  का क्षेत्र ख़त्म होते ही रायबरेली शूरू हो जाता है. वहां तो बीजेपी वालों का भी कहना है कि सोनिया गांधी की संभावना बहुत ही अच्छी है . असली मुकाबला अमेठी में नज़र आया हमने ज्यादा इस्तेमाल होने वाली फुरसतगंज ,जायस वाली सड़क नहीं ली. हां परसदेपुर,उदयपुर अठेहा होकर गौरीगंज पंहुचे . रायबरेली पार करते ही अमेठी क्षेत्र का पहला चौराहा , परसदेपुर पड़ता है . चौराहे पर मौर्य बिरादरी वाले भारी संख्या में थे . दावा किया गया कि वहां स्मृति इरानी मज़बूत चुनाव लड़ रही हैं . राहुल गांधी से लोगों में नाराजगी है. यह सीट गठबंधन ने छोड़ तो दिया है लेकिन अखिलेश यादव और मायवती ने  कोई अपील  नहीं किया है इसलिए उनकी पार्टी के वफादार लोग अपनी मर्जी से वोट देने का मन बना  चुके हैं .कई लोगों ने बताया कि अगर इन नेताओं की अपील हो जाए तो अब भी चुनाव राहुल गांधी के पक्ष में पलट सकता है. उस समय तक मायावती की वह अपील नहीं आयी थी जिसमें उन्होंने कहा  कि रायबरेली और अमेठी में उनके समर्थक कांग्रेस को जिताएंगें . यह सन्देश वहां बाद में पंहुंचा होगा . हम दिन भर अमेठी में रहे और साफ़ अनुमान लग रहा था कि स्मृति  इरानी के पक्ष में हवा है .इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि दलित और यादव वोटर बिलकुल अनमना बताया जा रहा  था. लेकिन शाम को जब मायावती ने सन्देश भेज दिया कि “ हमारे “ गठबंधन के लोग अमेठी और राय बरेली में कांग्रेस को जिताने के  लिए कोशिश करेंगे तो बीजेपी के कार्यकर्ताओं में मायूसी छा गयी . ज़ाहिर है स्मृति इरानी के पांच साल के काम पर मायावती की एक अपील भारी पड़ चुकी थी. अमेठी में लोगों से बातचीत के क्रम में हमारी टीम के एक सदस्य ने पूछा कि हम लोग जितने लोगों से भी बात कर रहे हैं वे ज्यादातर  कांग्रेस विरोधी ही  हैं तो अमेरिकी प्रोफ़ेसर ने कहा कि हम क्या करें ,कहाँ से कांग्रेस के समर्थक लायें . यानी चुनाव निश्चित रूप से कांग्रेस के पक्ष में नहीं था लेकिन अब सबको मालूम है कि मायावती के अपील ने खेल बदल दिया होगा  .हालांकि सरकार का पक्ष लेने वाले अखबारों ने इस खबर को गोल  कर दिया है , या कहीं कोने में छाप दिया है लेकिन सन्देश पंहुच चुका है और अब साफ़ लाग रहा  है कि अमेठी में “ कांटे “ की टक्कर हो गयी है .
सुल्तानपुर में वरुण गांधी अपनी मां मेनका  गांधी के लिए प्रचार कर रहे हैं , गठबंधन के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ़ सोनू सिंह लोकसभा के २०१४ के चुनाव में उनके बहुत बड़े सहयोगी थे लेकिन अब उनकी मां के खिलाफ मैदान में हैं .  गठबंधन का  गणित सोनू के पक्ष में है लेकिन मेनका गांधी की सेलेब्रिटी हैसियत के कारण मुकाबला कांटे का हो गया है .  रात में सुल्तानपुर शहर के एक मोहल्ले में वरुण गांधी का भाषण सुना गया . उन्होंने हिंदुत्व की कोई बात नहीं की. पाकिस्तान का चुनावी राग अलापने के खिलाफ भी बात की . उन्होंने कहा कि हमको अपनी तुलना रूस, अमरीका और चीन से करनी चाहिए ,पाकिस्तान से नहीं . पाकिस्तान तो कचरा है ,उसके बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं . अच्छी भीड़ के बीच  वरुण गांधी का भाषण काफी प्रभावशाली  था,पिछली बार जब वे यहाँ से खुद उम्मीदवार थे तो वे नरेंद्र मोदी का नाम नहीं लेते थे लेकिन इस बार उन्होंने बा आवाज़े बुलंद  नरेंद्र मोदी का नाम लिया और उनकी सरकार के पांच साल के अच्छे काम की तारीफ़ की और अपील की कि मोदी जी के अच्छे काम को जारी रखने के लिए उनको पांच साल का मौक़ा और दिया जाना चाहिए . सुल्तानपुर में अगले दौर में १२ मई को मतदान  होगा .

Wednesday, May 1, 2019

शहीद हेमंत करकरे का अपमान करने वाली अपनी उम्मीदवार को बीजेपी क्या सज़ा देगी


शेष नारायण सिंह

मालेगांव में हुए बम विस्फोट में प्रज्ञा सिंह  ठाकुर मुख्य अभियुक्त  हैं .उस विस्फोट में बहुत सारे  निर्दोष लोगों की जान गयी थी .  एन आई ए की तरफ से दाखिल की गयी चार्जशीट के आधार पर उनके ऊपर आरोप  २०१८ में तय कर दिए गए थे .जब आरोप तय हुए तब दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार थी .प्रज्ञा ठाकुर आजकल जमानत पर जेल से  बाहर हैं . उनको बीजेपी ने भोपाल से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है .हालांकि  प्रज्ञा ठाकुर मुलजिम हैं लेकिन वे चुनाव लड़ सकती हैं. कानून इसकी अनुमति देता है. अभी चंद रोज़ पहले उन्होंने बीजेपी की  सदस्यता ली थी . तब से ही वे लगातार हिंदुत्व की अलमबरदार के रूप में आक्रामक बयान दे रही हैं . उनकी उम्मीदवारी  की राजनीति को समझने के लिए वर्तमान सरकार के बारे में जानकारी लेना ज़रूरी है. शुरू में लग रहा था कि  बीजेपी  राष्टवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी थी . लेकिन राष्ट्रवाद  के मुद्दे पर बड़े पैमाने पर लामबंदी नहीं हो सकी . सरकार में रहते हुए अपने काम पर वोट माँगा जाता है. यहाँ वह भी संभव नहीं है . आम तौर पर ऐसा माना जा रहा  है कि सरकार पिछले पांच साल  में ऐसा कोई काम नहीं कर सकी है जिसके बल पर चुनाव जीता जा सके.लेकिन ऐसा कोई काम ही नहीं है . इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी की ही मानी जायेगी . जब डॉ जोशी से पूछा गया कि आप मोदी सरकार को दस में से कितने नम्बर  देंगें  तो उन्होंने कहा कि जब कापी में कुछ लिखा ही नहीं है तो क्या नंबर दूं. इन हालात में यह बात बिलकुल साफ़ हो गयी है कि  पार्टी को चुनाव जीतने के लिए नए मुद्दे चाहिए थे .  मुद्दों की तलाश में बीजेपी चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व को मुद्दा बनाने की रणनीति पर  काम कर रही है . इसी  कोशिश में भोपाल से कांग्रेस के उम्मीदवार और " संघी आतंकवाद " के प्रबल विरोधी दिग्विजय सिंह के खिलाफ प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी का उम्मीदवार बनाया  गया है . प्रज्ञा ठाकुर अभी जमानत पर हैं उनके ऊपर आतंकवाद विरोधी कानून मकोका  के तहत मुक़दमा चल  रहा है . वे मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता सुनील जोशी की हत्या के केस में भी अभियुक्त थीं . २०१४ में सरकार आने के बाद कुछ मामलों में उनके केस बंद कर दिए गए थे लेकिन अभी मालेगांव धमाके में वे अभियुक्त हैं ..
प्रज्ञा ठाकुर ने बीजेपी की सदस्यता लेने के  साथ ही आक्राकता दिखाना शुरू कर दिया . उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार के लिए भोपाल से कांग्रेस के प्रत्याशी , दिग्विजय सिंह की सोच को   परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार बताने लगीं .  बहुत बढ़ बढ़ कर बोलने लगीं और उसी रौ में उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते के तात्कालीन प्रमुख , शहीद हेमंत करकरे के बारे में बहुत ही आपत्तिजनक और अपमानजनक बातें बोल गईं. उन्होंने उनको कुटिल कहा , पापी कहा और देशद्रोही तक कह  डाला . उन्होंने यह भी कहा कि शहीद करकरे की मृत्यु इसलिए हुयी कि इन मोहतरमा ने उनको बद्दुआ  दे दी थी.  यह कहना था कि पूरा देश उनके खिलाफ टूट पड़ा .  जो बहादुर पुलिस अफसर मुंबई को आतंकवादी हमले से बचाने के लिए शहीद हुआ था , जिसने पाकिस्तान से आये आतंकवादियों को सामने से  चुनौती दी थी , जिसके सीने पर अंधेरे में छुपे हुए आतंकवादियों ने गोली मारी थी , उसका आपमान सहन करने के लिए देश तैयार नहीं था. कुछ वक़्त के लिए तो ऐसा लगा कि सोशल मीडिया पर पूरा देश उतर आया है और शहीद करकरे को अपमानित करने वाली बीजेपी उम्मीदवार ,प्रज्ञा ठाकुर की निंदा  कर रहा है. कांग्रेस ने भी मौक़ा देख , मोर्चा संभाल लिया और शहीद का अपमान करने वाली पार्टी के रूप में बीजेपी को पेश करने में कोई समय नहीं गंवाया .
बीजेपी को भी लगा कि गलती हो गयी लेकिन लेकिन प्रज्ञा ठाकुर अपने को पीड़ित बताकर सहानुभूति लेने के चक्कर में डटी रहीं . जब  बीजेपी ने  शहीद हेमंत करकरे के बारे में दिए गए उनके बयान को उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड लिया तब भी वे अपनी राग अलापती रहीं . लेकिन कुछ टीवी चैनलों और अखबारों ने प्रज्ञा ठाकुर के असंतुलित बयान को जिस तरह से हाईलाईट किया उससे बीजेपी को लग  गया कि  बात  बिगड़ गयी हैं . उनको भोपाल से  उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को तथाकथित " हिन्दू आतंकवाद " के घेरे में लेने की कोशिश उल्टी पड़ चुकी थी. जो  बीजेपी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और भारतीय पुलिस और सेना के वीरों की शहादत को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है उसकी एक महत्वपूर्ण प्रत्याशी पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा लेने वाले सबसे बहादुर योद्धा को अपमानित कर रही थी . ज़ाहिर है कि बीजेपी जिस मोहरे को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी , वही उसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका  है . पार्टी के नेताओं की समझ में साफ़ तौर पर आया गया कि प्रज्ञा ठाकुर की बदजुबानी को सही  ठहराने की कोशिश में उनका  भारी नुक्सान होने वाला है . शायद इसीलिये प्रज्ञा  ठाकुर को पार्टी की तरफ से फटकारा गया और उन्होंने शहीद करकरे की शान में की गयी बदतमीजी के लिए माफी मांग ली. लेकिन माफी भी ऐसी माँगी जिससे पार्टी को नुक्सान होने का ख़तरा बना हुआ है . माफी की भाषा ऐसी है जिसको पढने पर लग जाता  है कि वे माफी तो मांग रही हैं लेकिन अभी भी वे शहीद हेमंत करकरे को गुनहगार साबित करने से बाज़ नहीं आ रही हैं . उन्होंने लिखकर माफी नहीं माँगी है . संवाददाताओं से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि, " 'जो मैंने कहा था वह मेरी व्यक्तिगत पीड़ा थीजो मैंने सुनाई थी। मेरे बयान से किसी को ठेस पहुंची है तो मैं अपना बयान वापस लेती हूंऔर माफी मांगती हूं'देश के दुश्मन इससे खुश हो रहे हैंइसलिए मैं अपने बयान को वापस ले रही हूं और माफी भी मांगती हूं।." बताते हैं इसके बाद बीजेपी के बड़े नताओं ने उन्हें डांटा और शहीद हेमंत करकरे की तारीफ़ करने का निर्देश दिया . उसके बाद उन्होंने कहा कि, " हेमंत करकरे आतंकवादियों की गोली से शहीद हुए थे. जो बात मैंने उनके बारे में कही , वह नहीं कहना चाहिए  था . मैं खेद प्रकट करती हूँ " लेकिन लगता है कि बात अभी बनी नहीं है . महाराष्ट्र के कुछ संगठनों ने मांग की है कि प्रज्ञा ठाकुर और बीजेपी ने शहीद करकरे के बच्चों को जो पीड़ा पंहुचाई है उसके लिए भी माफी मांगें .

 अब लगता है कि प्रज्ञा ठाकुर बीजेपी के चुनाव अभियान में दिग्विजय सिंह और  उनकी पार्टी पर कालिख पोतने के लिए काम नहीं आने वाली हैं .भोपाल में तीन  हफ्ते बाद चुनाव होना है . तब तक उनकी लानत मलानत का सिलसिला चलता रहेगा और  उनकी पार्टी उस पर सफाई देने के लिए मजबूर होती रहेगी .तब तक चुनाव हो जाएगा . अब तो साफ़ लगने लगा है कि वे  दिग्विजय सिंह को भी चुनौती नहीं दे पाएंगीं क्योंकि वे जहाँ भी जायेंगी उनसे शहीद हेमंत करकरे के बारे में सवाल तो पूछे जायेगे वरना योजना यह थी कि दिग्विजय सिंह पर यह आरोप चस्पा किया जाए कि वे सभी हिन्दुओं को आतंकवादी मानते हैं . और उसी आड़ में बीजेपी का चुनाव  प्रचार केन्द्रित किया जाए . अब इस बात पर भी सवाल उठना शुरू हो गए हैं . क्योंकि दिग्विजय सिंह को हिन्दू विरोधी साबित करने की कोशिश तो उसी दिन दफ़न हो गयी थी जब उन्होंने हिन्दू धर्म की सबसे कठिन तीर्थयात्रा , नर्मदा परिक्रमा को विधि विधान से पूरी की थी .   टीवी की बहसों में जो विश्लेषक  एंकरों द्वारा की जा रही दिग्विजय सिंह की निंदा के बीच चुप बैठे रहते थे वे अब कहने लगे हैं कि दिग्विजय सिंह ने कभी भी हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग  नहीं किया है . वे हमेशा " संघी आतंकवाद " शब्द का प्रयोग करते हैं . मीडिया के सहयोग से आर एस एस और बीजेपी के नेता उनको हिन्दू विरोधी साबित करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं .प्रज्ञा ठाकुर को उनके खिलाफ उम्मीदवार बनाकर इसी बात को रेखांकित किया जाना था .प्रज्ञा ठाकुर उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा थीं लेकिन अब शहीद को अपमानित करके वे बीजेपी के राष्टवाद वाले प्रोजेक्ट को भी नुक्सान पंहुचा रही हैं . अब साफ़ नज़र आने लगा  है कि उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है . बीजेपी की  उम्मीदवार के रूप में तो शायद वे बनी रहें लेकिन दिग्विजय सिंह और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी साबित करने में अब उनकी उपयोगिता ख़त्म हो चुकी है . हो सकता है कि अभी चुनाव के पांच चरण बाकी हैं , बीजेपी कोई और  तरीका लेकर आये क्योंकि शुरू के  दो चरणों की सूचना के मुताबिक़ पार्टी को उत्तर प्रदेश और बिहार में  बीजेपी को बड़ा नुक्सान हो चुका है.

Saturday, April 13, 2019

जलियांवाला बाग़



शेष नारायण सिंह

जलियांवाला बाग़ का नाम हर उस चर्चा में लिया जायेगा जहां  सरकारी मनमानी के खिलाफ जनता के प्रतिरोध का ज़िक्र होगा. आज से  ठीक सौ साल पहले बैशाखी के दिन अमृतसर में  स्वर्ण मंदिर के क्षेत्र में स्थिति  इस बाग़ में पंजाब के हिन्दू, मुसलमान ,सिख और ईसाई इकठ्ठा हुए थे और ब्रिटिश सरकार के  तथाकथित  " अराजकता और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम १९१९ " का विरोध कर रहे थे. इस अधिनियम को आम बोलचाल की भाषा में रौलेट एक्ट या काला क़ानून कहा  जाता था . इस कानून के  लेखक एक अंग्रेज़ जज , सिडनी आर्थर रौलेट थे , उन्हीं के नाम पर इसको रौलेट एक्ट नाम दिया गया . यह कानून फरवरी में दिल्ली की काउन्सिल में पेश हुआ और भारी विरोध के बावजूद पास करवा लिया  गया . भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी की आमद तब तक हो चुकी थी और उन्होने अहिंसक तरीके से इसके विरोध  का आवाहन किया . ६ अप्रैल को दिल्ली में  इसके विरोध में सफल हड़ताल रही , कहीं कोई काम पर नहीं निकला, बंबई में महात्मा जी खुद भी विरोध में शामिल हए . पूरे देश में इस काले क़ानून का विरोध हुआ . लेकिन  विरोध का आन्दोलन अहिंसक नहीं रह सका ,  पंजाब में हिंसा शुरू हो  गयी तो महात्मा गांधी ने आन्दोलन वापस लेने की घोषणा की . पंजाब में सरकार ने फौज बुला लिया था .  अंग्रेजों ने नेताओं की धरपकड शुरू कर दिया था  . इसी काले क़ानून के तहत   पंजाब के स्वतंत्रता संगाम सेनानी और कांग्रेस के बड़े नेता, डॉ सत्यपाल और डॉ सैफुद्दीन किचलू को १० अप्रैल १९१९ को गिरफ्तार कर लिया गया था . पंजाब के इन लोकप्रिय नेताओं की गिरफ्तारी से पूरे पंजाब में गमो-गुस्से का  माहौल था .  १३ अप्रैल को बैशाखी के पर्व के अवसर पर अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में आम लोग इकठ्ठा हुए . यह बड़ा सा बाग़ था लेकिन आम तौर पर खाली पड़ा रहता था .  तत्कालीन पंजाब सरकार ने हालात पर काबू रखने के लिए ब्रिटिश इन्डियन आर्मी के एक  कर्नल, रेजिनाल्ड   डायर की ड्यूटी लगाई लेकिन उस अपराधी ने वहां मौजूद लोगों पर गोलियां चलवा दीं . हज़ारों की संख्या में लोगों की मृत्यु हो गयी . उस   संगत में बच्चे भी थे  , औरतें भी थीं और बुज़ुर्ग भी थे. बाग़ से निकलने का एक ही दरवाज़ा था , उसी दरवाज़े पर फौज खड़ी थी और लगातार बंदूकें चल रही थीं.  गोलियों से बचने के लिए बहुत सारे लोग बाग़ में बने हुए एक कुएं में कूद गए थे .

 रौलेट एक्ट  इसलिए लाया गया था कि प्रेस को कंट्रोल किया जा सके, किसी को भी बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सके , बिना कोई मुक़दमा चलाये अनंत काल तक जेलों में बंद रखा  जा सके और बिना  किसी वकील और दलील के मनमाने तरीके से मुक़दमा चलाया  जा सके . जलियांवाला बाग़ के नरसंहार के बाद इस एक्ट का पूरे देश में  ज़बरदस्त विरोध  शुरू हो गया . कांग्रेस कमेटी ने  जलियांवाला बाग़ के नरसंहार के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए एक समिति बनाई . मोतीलाल  नेहरू उसके अध्यक्ष थे और मोहनदास करमचंद गांधी उस समिति के सचिव थे. समिति के सचिव के रूप में महात्मा गांधी ने रिपोर्ट लिखी  . उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया .  अंग्रेज़ी सीखने वालों को पहले के ज़माने में शिक्षक यह बात ज़रूर बताते थे कि अच्छी अंग्रेज़ी लिखने के लिए कांग्रेस की जलियांवाला बाग़ की रिपोर्ट ज़रूर पढ़ लो. अंग्रेज़ी गद्य के लेखकों में महात्मा गांधी का नाम बहुत ही  सम्मन से लिया जाता है और यह रिपोर्ट गांधी जी के गद्य लेखन का प्रतिनिधि नमूना है . उनकी रिपोर्ट के बाद अंग्रेजों ने एक कमेटी बनाई जिसका नाम , " रिप्रेसिव लॉज़ कमेटी " था. मार्च  १९२२ में इस कमेटी की रिपोर्ट को  भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया और रौलेट एक्ट वापस ले लिया  गया .
लेकिन रौलेट एक्ट की आत्मा जिंदा रही . ५३ साल बाद जून १९७५  में जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो उसमें भी वही प्रावधान थे जो रौलट एक्ट में थे . तीन साल तक रौलेट एक्ट जिंदा रहा था और  दो साल के अंदर ही रौलेट एक्ट की स्थाई भावना को ध्यान में रखकर लगाई गयी इमरजेंसी को दफन कर दिया गया था . इसके साथ ही  एक बार फिर साबित  हो गया था कि आतताई  चाहे जितना ताक़तवर हो ,जनता के खाली हाथ से किये गए विरोध के सामने उसको झुकना ही पड़ता है .
रौलेट एक्ट का विरोध और जलियांवालाबाग़ के नरसंहार की कोई बात तब तक पूरी नहीं मानी जायेगी जब तक उस नरसंहार को अंजाम देने वाले नरपिशाच , कर्नल रेजिनाल्ड  डायर की बात न कर ली जाए . इसी  राक्षस ने निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलवाई थीं .  वह गोरखा राइफल्स, सिख रेजिमेंट और सिंध रेजिमेंट से चुनकर पचास सिपाही लेकर आया था . इन लोगों के पास  ' ली इनफील्ड की थ्री नॉट थ्री ' राइफलें थीं जिससे निहत्थे लोगों पर निशाना लगाकर मारा गया था . सरकारी तौर पर तो बताया गया था कि चार सौ से कम लोग मरे थे लेकिन महात्मा गांधी की रिपोर्ट और अमृतसर के सिविल सर्जन के अनुसार करीब  १५ सौ लोगों को गोलियां मारी गयी थीं.  कुएं में कूदकर मरने वालों की कोई गिनती नहीं की गयी . बाद में कर्नल डायर ( अप्रैल १९१९  में उसके पास अस्थाई तौर पर  ब्रिगेडियर का चार्ज  था  ) लेकिन रिटायर वह कर्नल ही हुआ . वह अविभाजित पंजाब के हिल स्टेशन मरी में पैदा हुआ था और लारेंस स्कूल और शिमला के बिशप काटन स्कूल का छात्र भी रहा था. उसके पिताजी की बियर की ब्रुअरी थी . डायर-मीकिन ब्रुअरी शिमला के पास सोलन में अभी भी है लेकिन अब उसका नाम मोहन मीकिन ब्रुअरी हो गया  है .एक शिक्षित पृष्ठभूमि से आने वाला यह फौजी बहुत ही  बड़ा अत्याचारी थी. जब जलियांवाला बैग में नरसंहार हुआ तो विरोध में सारे शहर की दुकाने बंद हो गयीं . उसके बाद कर्नल डायर ने एक धमकी भरा पर्चा बंटवाया जिसमें लिखा  था कि ,'  मेरा हुकुम मानना ज़रूरी है . सब लोग मेरा हुकुम मानें और अपनी अपनी दुकाने खोलें वरना दुकानें राइफलों के जोर से खोल ली जायेंगी. अगर कोई दूकान बंद करने को कहे  तो उस बदमाश के बारे में मुझे बताओ . मैं  उसको शूट कर दूंगा "
 डायर के काम की  भारत में तो निंदा हुयी ही ब्रिटेन में भी उसका विरोध हुआ .  वह १९२० में रिटायर हो गया लेकिन उसके आतंक के बाद  सारे भारतवासी एक हो गए और महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में जुट गए . इस तरह से  जलियांवाला बाग़ में जो लोग शहीद हुए उन्होंने ही भारत की आजादी के लिए शुरू हुए आन्दोलन को प्रेरणा दी और भावी आतताई शासकों को सन्देश भी दे दिया .

Thursday, April 11, 2019

कश्मीर से आतंक का सफाया करने के लिए नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाना होगा



शेष नारायण सिंह


कश्मीर के बारे में वहां के कुछ नेताओं के अजीबोगरीब बयानों के बाद कश्मीर फिर चर्चा में हैं .. देश की हर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराने वालों के सामने भी दुविधा  है . जब जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के सामने कश्मीर समस्या आई थी तो देश की आर्थिक और सैनिक  तैयारी बिलकुल नहीं थी. इंग्लैण्ड और अमरीका  भारत का विरोध कर रहे थे .अंग्रेजों से वफादारी  के इनाम के रूप में मुहम्मद अली जिन्नाह को पाकिस्तान की  बख्शीश मिल चुकी थी , जिन्ना किसी भी कीमत पर जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने के चक्कर में थे और जम्मू-कशमीर के तत्कालीन राजा पाकिस्तान के साथ जाने के बारे में विचार कर रहे थे . लेकिन सरदार पटेल ने न केवल जम्मू-कश्मीर का भारत में बिना  शर्त विलय करवाया ,बल्कि अमरीका और इंग्लैण्ड की मर्जी के खिलाफ पाकिस्तान को भी उसकी औकात दिखा दी .  आज  भारत दुनिया में एक बड़ी अर्थशक्ति ,सैन्य शक्ति, परमाणु शक्ति और अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है .अमरीका और ब्रिटेन से भारत की दोस्ती है लेकिन फिर भी कश्मीर में एक बड़ी समस्या पैदा हो गयी  है. अलगाववादी नेताओं की जमात ,हुर्रियत कान्फरेन्स के लोग तो पाकिस्तान का जयकारा लगाते ही रहते थे ,अब भारत के साथ रहने की बात करने वाले नेता भी भारत से अलग होने की धमकी देने लगे  हैं . जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों. महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के ताज़ा बयान बहुत ही निराशाजनक हैं .  यह तीनों ही नेता बीजेपी के साथ कई अवसरों पर सरकार में  शामिल रह चुके  हैं . संविधान के अनुच्छेद 35 ए के मामले ने इतना  तूल पकड लिया है कि जम्मू-कश्मीर के होशमंद नेता भी अलग होने की बात करने लगे  हैं. इसके लिए काफी हद तक मौजूदा सत्ताधारी पार्टी और उसके नेता ज़िम्मेदार हैं. बीजेपी के नेता  चुनावों के समय कश्मीर को मुद्दा बनाते हैं, उसके कारण उनको पाकिस्तान और मुसलमान को निशाने पर लेने में आसानी होती है . बाद में उसका ज़िक्र उतनी शिद्दत से नहीं करते .लगता  है कि इस बार भी कोशिश  वही थी लेकिन मामला बहुत आगे बढ़ गया . जम्मू-कश्मीर के वे नेता भी भारत विरोधी बयान देने लगे जो कल तक राज्य में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे थे . देश की हर समस्या के लिये जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार बताने वाले नेताओं को अब यह समझ लेने की ज़रूरत है कि कश्मीर में अगर   हालात सामान्य करना  है तो नेहरू की किताब के पन्ने  ही पढ़ने पड़ेंगें . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी  जब भी विपक्ष में रही है कश्मीर में संविधान के आर्टिकिल ३७० का  विरोध करती रही है लेकिन जब भी सत्ता में आई  है अलग बात करती  है . इस  बार मामला थोड़ा अटक गया है . बीजेपी केंद्र में सत्ता में है और राज्य में भी राष्ट्रपति शासन के  रास्ते उसी की सत्ता है . चुनाव के चक्कर में कश्मीर के नाजुक मसलों को उठा दिया और अब कश्मीर की राजनीति एक बहुत ही संवेदनशील मुकाम पर पंहुच गयी  है . कश्मीर को भारत का अखंड हिस्सा मानने वाले कश्मीरी नेता भी अब अपना प्रधानमंत्री बनाने और  आज़ादी की बात करने लगे हैं .हालत इतनी चिंताजनक है कि फ़ौरन से पेशतर केंद्र सरकार को ज़रूरी क़दम उठाने पड़ेंगे. कहीं ऐसा न हो कि हर भाषण में कश्मीर की बात करके और प्रेस कान्फरेन्स करके ध्रुवीकरण तो हो जाये लेकिन कश्मीर की हालात बद से बदतर हो जाएँ .


इन हालात में ज़रूरी यह  है कि कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए जवाहरलाल नेहरू की राह को अपनाया जाय जिन्होंने २७ मई १९६४ को अपने मृत्यु के दिन भी कश्मीर  समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास किया था . हालांकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला को १९५३ में गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उनको मामूल था कि कश्मीर की समस्या के हल के लिए कश्मीर के सबसे बड़े नेता को शामिल करना ज़रूरी होगा . इसी सोच के तहत उन्होंने  शेख अब्दुल्ला को रिहा किया और पाकिस्तान जाकर समाधान की संभावना तलाशने का काम सौंपा था.  शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर गए और वहां लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू किया . २७ मई १९६४ के ,दिन जब मुमुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थेजवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आ गयी . सब किया धरा बर्बाद हो गया ,.उसके बाद कश्मीर के हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .
सवाल यह है कि  कश्मीर का मसला  इस मुकाम तक कैसे पंहुचा . जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया थाऔर भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी , आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले ३० साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओंमहात्मा गाँधी , जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था.इसको समझने के लिए थोड़े पीछे के इतिहास में जाना पडेगा  .भारत-पाक विभाजन के वक़्त ,जम्मू-कश्मीर के महाराजा ,हरि सिंह ने पाकिस्तान के सामने  स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की  जाए ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने नेहरू की बात को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया . पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडेपेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे .कबायली हमला हुआ और राजा अपनी मनमानी पर अड़ा रहा . राजा की गलतियों के कारण ही कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता और वे भारत के साथ थे . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं. राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता थाने हालात को बहुत बिगाड़ा . उसके बाद इंदिरा गांधी के दौर में भी बात बिगाड़ी गयी. १९८० में जब वे दोबारा  सत्ता में आईं तो अपने परिवार के ही  अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, . अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो . उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया . हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया .और अरुण नेहरू नाराज़ हो गए . अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया . इतना ही नहीं . कांग्रेस ने घोषित मुस्लिम दुश्मन , जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया . उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए. उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे. उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया . बची खुची बात उस वक़्त बिगड़ गयी . जब १९९० में तत्कालीन गृह मंत्रीमुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब  कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ . और आज हालात जहां तक पंहुच गए हैं किसी के समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी.
ज़रूरत इस बात की है कि नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाई जाय और  कश्मीर से आतंक को खतम करने की कोशिश गंभीरता से की जाए.