Saturday, August 12, 2017

कांग्रेस की बैठक में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रस्ताव नेहरू ने प्रस्तुत किया था



शेष नारायण सिंह
महात्मा गांधी की अगुवाई में देश ने १९४२ में अंग्रेजों भारत छोड़ा का नारा दिया था . उसके पहले क्रिप्प्स मिशन भारत आया था जो भारत को ब्रितानी साम्राज्य के अधीन किसी तरह का डामिनियन स्टेटस देने की पैरवी कर रहा था. देश की अगुवाई की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने स्टफोर्ड क्रिप्स को साफ़ मना कर दिया था. कांग्रेस ने १९२९ की लाहौर कांग्रेस में ही फैसला कर लिया था कि देश को पूर्ण स्वराज चाहिए . लाहौर में रावी नदी के किनारे हुए कांग्रेस के अधिवेशन में तय किया गया था कि पार्टी का लक्ष्य अब पूर्ण स्वराज हासिल करना है .१९३० से ही देश में २६ जनवरी के दिन स्वराज दिवस का जश्न मनाया जा  रहा  था. इसके पहले कांग्रेस का उद्देश्य होम रूल था लेकिन अब पूर्ण स्वराज चाहिए था . कांग्रेस के इसी अधिवेशन की परिणति थी की देश में १९३० का महान आन्दोलन सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ. नमक सत्याग्रह या गांधी जी का दांडी मार्च इसी कांग्रेस के इसी फैसले को लागू करने के लिए किए  गए थे .वास्तव में १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया थी क्योंकि जब १९३० के आन्दोलन के बाद अँगरेज़ सरकार ने भारतीयों को ज्यादा गंभीरता से लेना शुरू किया लेकिन वादा खिलाफी से बाज़ नहीं आये तो आन्दोलन लगातार चलता रहा . इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिस कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे उसी अधिवेशन में देश ने पूर्ण स्वराज की तरफ पहला क़दम उठाया था .

नौ अगस्त को भारत छोड़ा आन्दोलन  की शुरुआत के ७५ साल पूरे हुए . इस अवसर पर लोकसभा में ‘भारत छोडो ‘ आन्दोलन को याद किया गया .लेकिन एक अजीब बात देखने को मिली कि लोकसभा में अपने भाषणों में न तो प्रधानमंत्री और न ही लोकसभा की स्पीकर ने जवाहरल लाल नेहरू का नाम लिया . प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सन बयालीस के महात्मा गांधी के  नारे  करेंगें या मरेंगें ‘ के नारे की तर्ज़ पर ‘ करेंगें और करके रहेंगें’  का नया नारा दिया . उन्होंने गरीबीकुपोषण और निरक्षरता को देश के सामने मौजूद चुनौती बताया और सभी राजनीतिक दलों से अपील किया कि इस  चुनौती से मुकाबला करने के लिए सब को एकजुट होना पडेगा. उन्होंने इस बात पर दुःख जताया कि महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज्य का सपना भी अधूरा है .प्रधानमंत्री ने  सभी बहादुर नेताओं के बलिदान को याद किया. उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के सभी लोगों के एकजुट होने की बात की और कहा कि जब आज़ादी के नेता जेल चले गए थे तो कुछ नौजवान नेताओं ने आन्दोलन का काम संभाल लिया . इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने लाल बहादुर शास्त्रीराम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का नाम लिया . यह तीनों नेता सन बयालीस में नौजवान थे और सक्रिय थे . उन्होंने  लोकमान्य तिलकनेताजी सुभाष चन्द्र बोस ,भगत सिंह , सुखदेवचंद्रशेखर आज़ाद को भी याद किया जब कि इनमें  से कोई भी भारत छोडो आन्दोलन में शामिल  नहीं हुआ था का .उन्होंने यह ज़िक्र नहीं किया कि नौ अगस्त के दिन पूरी की पूरी कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्यों को गिरफ्तार  कर लिया गया था . महात्मा गांधी और महादेव  देसाई को पुणे के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार करके रखा गया था जबकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बाकी सदस्यों को अहमदनगर जेल भेज दिया गया था . प्रधानमंत्री ने इन नेताओं में से किसी का नाम नहीं लिया .अहमदनगर किले की जेल  में जो नेता बंद थे उनमें जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेलमौलाना अबुल कलाम आज़ाद ,आचार्य कृपलानी ,नरेंद्र देवआसिफ अलीगोविन्द वल्लभ पन्त आदि थे. प्रधानमंत्री ने इनमें से किसी का नाम नहीं लिया .इस आन्दोलन को प्रधानमंत्री ने  आज़ादी के आन्दोलन में अंतिम जनसंघर्ष बताया और कहा कि उसके पांच साल बाद ही अँगरेज़ भारत छोड़ कर चले गए.

लोकसभा में आयोजित  कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए स्पीकर सुमित्रा महाजन ने महात्मा गांधी की अगुवाई में शुरू हुए भारत छोडो आन्दोलन पर अपना वक्तव्य दिया . उन्होंने लोकमान्य तिलक ,वी डी सावरकर और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लिया . हालांकि लोकमान्य तिलक की तब तक मृत्यु हो चुकी थी और दीन दयाल उपाध्याय सन ४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल नहीं हुए थे .

देखने में आया है कि जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है तब से देश के निर्माण और आज़ादी की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू के योगदान को नज़रंदाज़ करने का फैशन हो गया है . इसके पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज बांडुंग कान्फरेंस की याद में एक सम्मलेन में गयी थीं , वहां भी उन्होंने नेहरू  का नाम नहीं लिया जबकि चेकोस्लोवाकिया के टीटो और मिस्र के नासिर ने जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर  बांडुंग सम्मेलन के बाद निर्गुट सम्मलेन को ताक़त दिया था . बाद में तो अमरीका और रूस के  सहयोगी देशों के अलावा लगभग पूरी  दुनिया ही उसमें शामिल हो गयी थी.

सवाल यह उठता है कि जवाहरलाल नेहरू के योगदान का उल्लेख किये बिना भारत के १९३० से १९६४ तक के इतिहास की बात कैसे की जा सकती है. जिस व्यक्ति को महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , जिस व्यक्ति की अगुवाई में देश की पहली सरकार बनी थी, जिस व्यक्ति ने मौजूदा संसदीय लोकतंत्र  की बुनियाद रखी, जिस व्यक्ति ने देश को संसाधनों के अभाव में भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की डगर पर डाल कर दुनिया में गौरव का मुकाम हासिल किया उसको अगर आज़ाद  भारत के राजनेता भुलाने का अभियान चलाते हैं तो यह उनके ही व्यक्तित्व पर  प्रकाश डालता है . आजकल कुछ  तथाकथित इतिहासकारों के सहारे  भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य चल रहा है जिसमें बच्चों के दिमाग से नेहरू सहित बहुत सारे लोगों के नाम गायब कर दिए जायेंगें जो बड़े होकर नेहरू के बारे में कुछ जानेंगें ही नहीं . लेकिन ऐसा संभव नहीं है क्योंकि गांधी और नेहरू विश्व इतिहास के विषय हैं और अगर हमें अपनी आने वाले पीढ़ियों को नेहरू के बारे में अज्ञानी रखा तो हमारा भी हाल उतर कोरिया जैसा होगा जहां के स्कूलों में मौजूदा  शासक के दादा किम इल सुंग को आदि पुरुष बताया जाता है . अब कोई उनसे पूछे कि क्या किम इल सुंग के पहले उत्तरी कोरिया में शून्य था .
महात्मा गांधी की अगुवाई में आज़ादी की  जो लड़ाई लड़ी गयी उसमें नेहरू रिपार्ट का अतुल्य योगदान है . यह रिपोर्ट २८-३० अगस्त  १९२८ के दिन हुयी आल पार्टी कान्फरेंस में तैयार की गयी थी . यही रिपोर्ट महात्मा गांधी की होम रुल की मांग को ताक़त देती थी. इसी के आधार पर डामिनियन स्टेटस की मांग की जानी थी  इस रिपोर्ट को एक कमेटी ने बनाया था जिसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे . इस कमेटी के सेक्रेटरी जवाहरलाल नेहरू थे .अन्य सदस्यों में अली इमाम , तेज बहादुर सप्रू, माधव श्रीहरि अणे ,मंगल सिंह ,सुहैब कुरेशी सुभाष चन्द्र बोस और जी आर प्रधान थे .सुहैब कुरेशी ने रिपोर्ट की सिफारिशों से असहमति जताई थी . इसके बारे में लिखने का मतलब केवल इतना है कि राहुल गांधी, राजीव गांधी और  संजय गांधी जैसे नाकाबिल लोगों को देश की राजनीति पर थोपने का अपराध तो जवाहरलाल की बेटी इंदिरा गांधी ने ज़रूर किया है  लेकिन इंदिरा गांधी की गलतियों के लिए क्या हम अपनी आज़ादी के लड़ाई के शिल्पी महात्मा गांधी और  उनके सबसे भरोसे के  साथी जवाहरलाल नेहरू को नज़रंदाज़ करने की गलती कर सकते हैं .एक बात और हमेशा ध्यान रखना होगा कि महात्मा गांधी के सन बयालीस के आन्दोलन के लिए  बम्बई में कांग्रेस कमेटी ने जो प्रस्ताव पास किया था अ, उसका डाफ्ट भी जवाहलाल नेहरू ने बनाया था और उसको विचार के लिए प्रस्तुत भी नेहरू ने ही किया था .

जवाहरलाल नेहरू को नकारने की कोशिश करने वालों को यह भी जान लेना चाहिए कि उनकी पार्टी के पूर्वजों ने जिन जेलों में जाने के डर से जंगे-आज़ादी में हिस्सा नहीं लिया था ,  उन्हीं जेलों में जवाहरलाल नेहरू अक्सर जाते रहते थे . जिस  भारत छोडो आन्दोलन के ७५ साल पूरे होने के बाद लोकसभा में विशेष कार्यक्रम किया गया उसी के दौरान जवाहरलाल १०४० दिन रहे जेलों में रहे थे .भारत छोडो आन्दोलन के दिन ९ अगस्त १९४२ को उनको मुंबई  से गिरफ्तार किया गया था और १५ जून १८४५ को रिहा किया गया था . यानी इस बार ३४ महीने से ज्यादा वे जेल में रहे थे. इसके पहले भी कभार जाते रहते थे .जो लोग उनको खलनायक बनाने की कोशिश कर रहे हैं ,ज़रा कोई उनसे पूछे कि उनके राजनीतिक पूर्वज  सावरकर , जिन्नाह आदि उन दिनों ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी के इनाम के रूप में वे कितने अच्छे दिन बिता रहे थे . सावरकर तो माफी मांग कर जेल से रिहा  हुए थे .अंडमान की जेल में वी. डी .सावरकर सजायाफ्ता कैदी नम्बर ३२७७८ के रूप में जाने जाते थे . उन्होंने अपने माफीनामे में साफ़ लिखा था कि अगर उन्हें रिहा कर दिया गया तो वे आगे से अंग्रेजों के हुक्म को मानकर ही काम करेंगें .और इम्पायर के हित में ही काम करेंगे. इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि वी डी सावरकर ने जेल से छूटने के बाद ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे  महात्मा गांधी के आन्दोलन को ताक़त मिलती हो .
भारत छोड़ो आन्दोलन की एक और  उपलब्धि है . अहमदनगर फोर्ट जेल में जब जवाहरलाल  बंद थे उसी दौर में उनकी किताब डिस्कवरी आफ इण्डिया लिखी गयी थी .जब अंगेजों को पता लगा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बारह सदस्य एक ही जगह रहते हैं और वहां राजनीतिक मीटिंग करते हैं तो सभी नेताओं को अपने राज्यों की जेलों में भेजा जाने लगा. मार्च १९४५ में गोविंद वल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और जवाहरलाल नेहरू को अहमदनगर से हटा दिया गया .बाकी  गिरफ्तारी का समय इन लोगों ने यू पी की जेलों ,बरेली , नैनी  अल्मोड़ा में काटीं . जब इन लोगों को गिरफ्तार किया गया  था तो किसी तरह की चिट्ठी  पत्री लिखने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई चिट्ठी आ सकती थी .बाद में नियम थोडा बदला . हर  हफ्ते  इन कैदियों को अपने परिवार के लोगों के लिए दो पत्र लिखने की अनुमति मिल गयी . परिवार के सदस्यों के चार पत्र अका सकते थे . लेकिन जवाहर लाल नेहरू को यह सुविधा नहीं मिल सकी क्योंकि उनके परिवार में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ही थे . वे लोग भी  यू पी की जेलों में बंद थे और वहां की जेलों में बंदियों को कोई भी चिट्ठी न मिल सकती थी और न ही वे लिख सकते थे.
इसलिए भारत  छोडो आन्दोलन का ज़िक्र होगा तो महात्मा  गांधी के साथ इन बारह कांग्रेसियों का ज़िक्र ज़रूर होगा . हां यह अलग बात  है कि जब भारत में इतिहास को पूरी तरह से दफना दिया जाएगा और शुर्तुर्मुगी सोच हावी हो जायेगी तो जवाहरलाल नेहरू को भुला देना संभव होगा और अहमदनगर के बाकी कैदियों को भी भुलाया जा सकेगा .लेकिन अभी तो यह संभव नहीं नज़र आता

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी पर एहसान नहीं है

  


शेष नारायण सिंह

आजकल देश के कुछ हिस्सों में गाय की रक्षा की राजनीति चल रही है. गौरक्षक सक्रिय हैं और गायों का आना जाना मुश्किल है . अगर को भी आदमी गाय को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है तो वह जान जोखिम में डाल रहा होता है . ऐसी  कई घटनाएं हुयी हैं जिसमें गाय की रक्षा के हवाले से  एक ख़ास  तरह के लोगों ने आम आदमियों  का कत्ल किया है . कभी किसी के घर में गाय का  गोश्त होने के शक  में तो  कभी किसी को गाय को मार डालने के शक में मार डाला गया है . इस मसले पर संसद में  भी  बहस हुयी है लेकिन उस बहस के बाद धर्म निरपेक्षता के खिलाफ  हुंकार भर रही जमातों  को देखकर  डर लगने लगता है कि एक मुल्क के रूप में  हम जा  कहाँ रहे हैं . हमारी आज़ादी की  लड़ाई की बुनियादी  मान्यता सभी धर्मों के  लोगों के शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की रही है . जब बंटवारे  के बाद हमारे बुजुर्गों  ने  संविधान की रचना की तो उसमें भी राष्ट्र की   एकता की सबसे बड़ी  ज़रुरत  धर्म निरपेक्षता को बताया . लेकिन आजकल इसी धर्म निरपेक्षता के खिलाफ शक्ति संपन्न वर्गों  की  तरफ से बयान  आ रहे हैं  जो चिंता का विषय हैं .

धर्मनिरपेक्षता की राजनीति किसी भी समुदाय पर एहसान नहीं होता।  किसी भी देश के नेता जब राजनीतिक आचरण में धर्मनिरपेक्षता को महत्वपूर्ण मुक़ाम देते हैं तो वे अपने राष्ट्र और समाज की भलाई के लिए काम कर रहे होते हैं।  धर्मनिरपेक्षता का साधारण अर्थ यह  है कि  धर्म के आधार पर किसी को लाभ या हानि न पंहुचाया जाए।  जब भी धर्म के आधार पर हानि या लाभ पंहुचाने की कोशिश शासक वर्ग करता है तो समाज को और राष्ट्र को भारी नुकसान  होता है।  भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों से आज़ादी एक ही साथ मिली थी  . लेकिन भारत दुनिया में आज एक बड़ी ताक़त के रूप में उभर चुका है और अमरीका समेत सभी देश भारत को सम्मान की नज़र से देखते हैं लेकिन पाकिस्तान की हालत बिलकुल अलग है . वहाँ अगर चीन ,अमरीका और पश्चिम एशिया के देशों से आर्थिक मदद न मिले तो  बुनियादी ज़रूरतों के लिए भी परेशानी पड़ सकती है.  ऐसा इसलिए है कि  आज़ादी के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया और पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिनाह की एक न  चली और पाकिस्तान धर्म पर आधारित राज्य बन  गया।  पाकिस्तान दुनिया के बाक़ी संपन्न देशों पर निर्भर हो गया।  अमरीकी और चीनी मदद का नतीजा यह हुआ है कि पाकिस्तान की निर्भरता इन दोनों देशों पर बढ़ गयी है . पूरे पाकिस्तान में चीन ने सडकों बंदरगाहों और बिजली के उत्पादन केन्द्रों का ऐसा जाल बिछा दिया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बुनियादी ढांचों का क्षेत्र लगभग पूरी तरह से चीन की कृपा का मोहताज है . अब तो पूरी दुनिया में यह कहा जाता है कि पाकिस्तान वास्तव में आतंकवाद की नर्सरी है . जब अमरीका के शासकों को पाकिस्तानी आतंकवाद का इस्तेमाल पुराने सोवियत संघ और मौजूदा रूस के खिलाफ करना होता था तो वह आतंकवादियों को हर तरह की सहायता देता था . अमरीका को मुगालता था कि पाकिस्तान में वह जिस आतंकवाद को  बढ़ावा दे रहा था वह केवल एशिया में ही अमरीकी लाभ के लिए इस्तेमाल होगा लेकिन जब अमरीकी ज़मीन पर अल कायदा ने आतंकी हमला कर दिया तब अमरीका की समझ में आया कि आतंकवाद का कोई क्षेत्र नहीं होता और आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता .
आज पाकिस्तान धार्मिक आधार पर आतंकवाद के मोबिलाइजेशन का सबसे बड़ा केन्द्र है . इसका कारण यह है कि  पाकिस्तान ने एक राष्ट्र के रूप में शुरुआत तो सेकुलर तरीके से की थी लेकिन उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह की राजनीति को बाद के शासकों ने पूरी तरह से तबाह कर दिया और इस्लाम पर आधारित राजनीति की शुरुआत कर दी .धर्मनिरपेक्षता को भुला कर इस्लामिक राज्य की स्थापना करने के बाद पाकिस्तान को किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ा है उसको जानने के लिए पाकिस्तान के पिछले पैंतीस वर्षों के इतिहास पर नज़र डालना ही काफी है . हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .
पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति के पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं हिंदूईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.

लेकिन असली धार्मिक कट्टरवाद की बुनियाद जनरल जियाउल हक़ ने डाली . उनको अपने पूर्ववर्ती शासक जुल्फिकार अली भुट्टो की हर बात को गलत साबित करना था लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान की सभी संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया . उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो की रोटी ,कपड़ा और मकान की राजनीति को साफ़ नकार दिया . उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना ही इस्लाम के कारण हुई थी ,यह मुसलमानों के लिए बनाया गया था . जनरल जिया ने २ दिसंबर १९७८ को इस्लामी नववर्ष के मौके पर पाकिस्तान में इस्लामी सिस्टम को लागू कर दिया. उन्होंने तब तक के सभी पाकिस्तानी सेकुलर कानूनों को खत्म कर दिया और ऐलान किया कि वे निजामे-मुस्तफा लागू कर रहे थे . उन्होंने शरिया अदालतें स्थापित करने का ऐलान कर दिया . लेकिन सभी कानून तो फ़ौरन बदले नहीं जा सकते थे लिहाजा जनरल जिया ने आर्डिनेंस लागू करके अपनी गद्दी की सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया. इस दिशा में पहला कानून था हुदूद आर्डिनेंस . इसके ज़रिये ताजिराते पाकिस्तान में बताए गए  संपत्ति कानूनों को बदलने की कोशिश की गयी . पूरी तरह बदल तो नहीं सके क्योंकि इस्लामी सबूत के नियमों  के आधार पर सज़ा दे पाना  असंभव था  . दूसरा बदलाव बलात्कार और व्यभिचार के कानून में किया गया इसके ज़रिए तो पूरे पाकिस्तान में औरतों को गुलाम से भी बदतर बना दिया गया .अपनी इसी इस्लामीकरण की योजना के तहत ही धार्मिक शिक्षण के केन्द्रों का बड़े पैमाने पर विकास किया गया. पाकिस्तानी समाज में  मदरसों के मालिकों का अधिकार और प्रभाव बहुत बढ़ गया . संगीत में भी  भारी बदलाव किया गया . पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविज़न पर केवल देशभक्ति के गाने ही बजाये जाते थे.कुल मिलकर ऐसा पाकिस्तान बना दिया गया जिसमें धार्मिक कट्टरता और बहुमतवाद  का ही राज था . आज पाकिस्तान की जो दुर्दशा है उसमें जनरल जिया के उसी धर्मिक राज कायम करने के उत्साह को ज़िम्मेदार माना जा सकता है.

आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमत वाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है . भारत की सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेता भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते पाए जा रहे हैं . उनको भी ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है।
पाकिस्तान में जिस तरह से धर्म को  आधार बनाकर जनरल  जिया ने कट्टरता फैलाई उसी का नतीजा आज पकिस्तान भोग रहा है . अगर हम भी धार्मिक गोलबंदी के शिकार हुए तो  हमारे सामने भी  खतरा वही है . शासक वर्गों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिएय और देश की एकता को सुरक्षित रखना चाहिए . 

Saturday, July 29, 2017

हेपेटाइटिस एक जानलेवा बीमारी है लेकिन बचाव संभव है



शेष नारायण सिंह 

2जुलाई विश्व हेपेटाइटिस दिवस है . लीवर की यह बीमारी पूरी दुनिया में बहुत ही खतरनाक रूप ले चुकी है . दुनिया में ऐसे ११ देश हैं जहां हेपेटाइटिस के मरीज़ सबसे ज़्यादा हैं . हेपेटाइटिस के मरीजों का ५० प्रतिशत ब्राजील,चीनमिस्रभारत इंडोनेशिया मंगोलिया,म्यांमारनाइजीरियापाकिस्तानउगांडा और वियतनाम में रहते हैं . ज़ाहिर है इन मुल्कों पर इस बीमारी से दुनिया  को मुक्त करने की बड़ी जिम्मेवारी है. २०१५ के आंकडे मौजूद हैं. करीब ३३ करोड़ लोग हेपेटाइटिस की बीमारी से पीड़ित थे. हेपेटाइटिस बी सबसे ज़्यादा खतरनाक है और इससे पीड़ित लोगों की संख्या भी २५ करोड़ के पार थी. ज़ाहिर है अब यह संख्या  और अधिक हो गयी होगी. २०१५ में हेपेटाइटिस से मरने वालों की संख्या १४ लाख  से  अधिक थी .चुपचाप आने वाली यह बीमारी टी बी और एड्स से ज्यादा लोगों की जान ले रही है . ज़ाहिर है कि इस बीमारी से युद्ध स्तर पर मुकाबला  करने की ज़रूरत  है और इस अभियान में जानकारी ही  सबसे बड़ा हथियार है . विज्ञान  को अभी तक पांच तरह के पीलिया हेपेटाइटिस के बारे में जानकारी है .  अभी  के बारे जानकारी 
हेपेटाइटिस एबी ,सी ,डी और ई . सभी खतरनाक हैं लेकिन बी से  खतरा बहुत ही ज्यादा   बताया जाता है .  विश्व स्वास्थ्य संगठन , हेपेटाइटिस को २०३० तक ख़त्म करने की योजना पर  काम भी कर रहा  है . भारत भी उन देशों में शुमार है जो इस  भयानक बीमारी के अधिक मरीजों वाली लिस्ट में  हैं इसलिए भारत की स्वास्थय प्रबंध व्यवस्था की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है .

इस वर्ग की बीमारियों में हेपेटाइटिस  बी का प्रकोप सबसे ज्यादा है और इसको ख़त्म करना सबसे अहम चुनौती है .इस बारे में जो सबसे अधिक चिंता की बात है वह यह है एक्यूट हेपेटाइटिस बी का कोई इलाज़ नहीं है .सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज़ है .  विश्व बैंक का सुझाव है कि संक्रमण हो जाने के बाद आरामखाने की ठीक व्यवस्था और  शरीर में ज़रूरी तरल पदार्थों का स्तर बनाये रखना ही बीमारी से बचने  का सही तरीका है .क्रानिक हेपेटाइटिस बी   का इलाज़ दवाइयों से संभव  है . ध्यान देने की बात यह है कि हेपेटाइटिस बी की बीमारी पूरी तरह से ख़त्म नहीं की जा सकती इसे केवल   दबाया जा सकता है .इसलिए जिसको एक बार संक्रामण हो गया उसको जीवन भर दवा लेनी चहिये . हेपेटाइटिस बी  से बचने का सबसे  सही तरीका टीकाकरण है .  विश्व स्वास्थ्य  संगठन का सुझाव है कि सभी बच्चों को जन्म के साथ ही हेपेटाइटिस बी का टीका दे दिया जाना  चाहिए .अगर सही तरीके से टीकाकरण  कर दिया जाय तो बच्चों में  ९५ प्रतिशत बीमारी की   संभावना ख़त्म हो जाती है  . बड़ों को भी  टीकाकरण से फायदा होता है .
पूरी दुनिया में हेपेटाइटिस को खत्म करने का अभियान चल रहा है .मई २०१६ में वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली ने ग्लोबल हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटेजी आन वाइरल हेपेटाइटिस २०१६-२०२०  का प्रस्ताव  पास किया  था. संयुक्त  राष्ट्र ने २५ सितम्बर को अपने प्रस्ताव संख्या  A/RES/70/1  में  इस प्रस्ताव को सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स को शामिल किया था . वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली का यह प्रस्ताव उन उद्देश्यों को शामिल करता है .इस प्रस्ताव का संकल्प यह  है कि हेपेटाइटिस को ख़त्म करना है . अब चूंकि भारत इन ग्यारह देशो में हैं जहां हेपेटाइटिस के आधे मरीज़ रहते हैं इसलिए भारत की ज़िम्मेदारी सबसे  ज़्यादा  है . जिन देशों का नाम है उनमें भारत और चीन अपेक्षाकृत संपन्न  देश माने जाते हैं इसलिए यह ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती   है . सरकार को चाहिए कि जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनका सही तरीके से इस्तेमाल करने की संस्कृति विकसित करें. बीमारी को बढ़ने से रोकें.रोक के बारे में इतनी  जानकारी फैलाएं कि लोग खुद ही  जांच आदि  के कार्य को प्राथमिकता दें और हेपेटाइटिस  को समाप्त करने को एक मिशन के रूप में अपनाएँ .
अपने देश में इस दिशा में  अहम कार्य हो रहा है . देश के लगभग सभी बड़े  मेडिकल शिक्षा  के संस्थानोंमेडिकल  कालेजों और बड़े अस्पतालों में लीवर की बीमारियों के इलाज और नियंत्रण के साथ साथ रिसर्च  का काम भी हो रहा   है . सरकार का रुख  इस सम्बन्ध में बहुत ही प्रो एक्टिव है . नई दिल्ली में लीवर और पित्त रोग के  बारे में रिसर्च के लिए एक संस्था की स्थापना ही कर दी गयी है. २००३ में शुरू हुयी इंस्टीटयूट आफ लीवर एंड  बिलियरी साइंसेस नाम की यह संस्था विश्व स्तर की है.  जब संस्था शुरू की गयी तो इसका मिशन लीवर की एक विश्व संस्था बनाना था  और वह लगभग पूरा कर लिया गया है .

इस संस्थान की प्रगती के पीछे इसके संस्थापक निदेशक डॉ शिव कुमार सरीन की शख्सियत को माना जाता  है . शान्ति स्वरुप भटनागर और पद्मम भूषण से   सम्मानित डॉ सरीन को विश्व में लीवर की बीमारियों के इलाज़ का सरताज माना जाता है . बताते हैं कि दिल्ली के जी बी पन्त अस्पताल में कार्यरत डॉ शिव  कुमार सरीन ने  जब उच्च शोध के लिए विदेश जाने का मन बनाया  तो तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उनसे पूछा  कि क्यों  विदेश जाना चाहते हैं उनका जवाब था कि  लीवर से   सम्बंधित बीमारियाँ देश में बहुत बढ़ रही हैं  और उनको कंट्रोल करने के लिए बहुत ज़रूरी है कि आधुनिक संस्थान में  रिसर्च किया जाए. तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव दिया  कि विश्वस्तर का शोध संस्थान  दिल्ली में ही स्थापित कर लिया जाए. वे तुरंत तैयार हो गए और आज उसी   फैसले के कारण  दिल्ली में लीवर की बीमारियों के लिए  दुनिया भर में  सम्मानित एक संस्थान मौजूद है  . इस संस्थान को  विश्वस्तर का बनाने में इसके संस्थापक  डॉ एस के सरीन का बहुत योगदान है . वे स्वयं भी बहुत ही उच्चकोटि के वैज्ञानिक हैं .  लीवर से सम्बंधित बीमारियों के इलाज के लिए १७ ऐसे प्रोटोकल  हैं जो दुनिया भर में उनके नाम से जाने जाते हैं . सरीन्स क्लासिफिकेशन आफ गैस्ट्रिक वैराइसेस को सारे विश्व के मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में इस्तेमाल किया जाता  है . उनके प्रयास से ही सरकारी स्तर पर दिल्ली में जो इलाज उपलब्ध है वह निजी क्षेत्र के  बड़े  से बड़े अस्पतालों में नहीं है . अच्छी बात यह है कि सरकारी संस्था होने के कारण  आई एल बी एस अस्पताल में गैर ज़रूरी खर्च बिलकुल नहीं होता .

इस साल भी   वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  के लिए पूरी  दुनिया के साथ साथ भारत में भी  पूरी तैयारी  है . खबर आई है कि पटना समेत देश के  सभी बड़े शहरों में सम्मलेन आदि आयोजित करके जानकारी बढ़ाई जा रही  है

विश्व स्वास्थ्य  संगठन की तरफ से हर साल २८ जुलाई को वर्ल्ड हेपेटाइटिस दिवस  मनाये जाने का एक मकसद है . इस जानलेवा बीमारी के बारे में पूरी दुनिया में जानकारी बढाने और उन सभी लोगों को एक मंच देने के उद्देश्य से यह आयोजनं  किया जाता है जो किसी न किसी तरह से इससे प्रभावित होते हैं . हर साल करेब १३ लाख लोग इस बीमारी से मरते हैं . इस लिहास से यह टीबी ,मलेरिया और एड्स से कम खतरनाक नहीं  है. हेपेटाइटिस के ९० प्रतिशत लोगों को पता भी नहीं होता कि उनके शरीर में यह जानलेवा विषाणु पल रहा  है . नतीजा  यह होता है कि वे किसी को बीमारी दे सकते हैं या लीवर की भयानक बीमारियों से खुद ही ग्रस्त हो सकते हैं , अगर लोगों को जानकारी हो तो इन बीमारियों से समय रहते मुक्ति पाई जा सकती है .

भ्रष्टाचार किसी भी नेता का अधिकार नहीं है


शेष नारायण सिंह

बंगलूरू की एक जेल में भ्रष्टाचार के आरोप  में सज़ा काट रही अन्नाद्रमुक  नेता वीके शशिकला को जेल में बहुत ही संपन्न जीवन जीने का अवसर मिल रहा है . जेल विभाग की एक बड़ी अफसर ने आरोप लगाया है कि जेल में शशिकला को  जेल मैनुअल के खिलाफ जाकर सुविधाएं दी जा रही हैं . अफसर का  आरोप है कि सुविधा पाने के लिए जेल विभाग के महानिदेशक को शशिकला ने एक करोड़ रूपया दिया है और बाकी कर्मचारियों ने भी एक करोड़ रूपये में बाँट लिया है . आरोप बहुत ही गंभीर  है लेकिन महानिदेशक महोदय  का कहना  है कि कि वो जांच के लिए तैयार हैं. हालांकि उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनको मालूम है कि जब जांच होगी तो कोई भी आरोप सिद्ध नहीं होगा क्योंकि जिस तरह से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप में जेल में बंद अन्नाद्रमुक नेता  शशिकला भ्रष्टाचार के रास्ते ही सज़ा को आरामदेह बनाने में सफल रही हैं , उसी तरह से जेल महकमे के महानिदेशक साहेब भी अपने खिलाफ जांच करने वाले अधिकारियों को संतुष्ट करने में सफल हो  जायेगें . 
देश की जेलों सज़ा काट रहे लोगों को आरामदेह ज़िंदगी बिताने के लिए जेल के अन्दर बहुत  खर्च करना  पड़ता है और वह सारा खर्च रिश्वत के रास्ते ही अफसरों  की जेब तक पंहुचता  है . वी के शशिकला के बहाने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरे देश में चर्चा फिर शुरू हो गयी है लेकिन यह चर्चा ही रहेगी  क्योंकि भ्रष्टाचार के नियंताओं के हाथ बहुत बड़े हैं . बिहार के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के खिलाफ आजकल भ्रष्टाचार के कारनामे मीडिया के फोकस में हैं . उनके बेटे बेटियों की  अरबों की संपत्ति , राजनीतिक चर्चा की मुख्य धारा में आ गयी है .  सवाल उठ रहे हैं कि  इनके पास यह संपत्ति आयी किस तरीके से लेकिन लालू प्रसाद यादव विपक्ष की राजनीतिक एकता के नाम  पर मुद्दे को भटकाने की कोशिश  में लगे हुए हैं.  उत्तर प्रदेश में भी आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ  मुहिम चल रही है लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में कहीं कोई ढील नहीं है . आजकल नोयडा में एक कालोनी में आस पास की झुग्गियों में रहने वाले लोगों की तरफ से पत्थरबाजी की घटना ख़बरों में  है . नोयडा जैसे महंगी ज़मीन  वाले इलाकों में भूमाफिया वाले  , इलाके के प्रशासन और पुलिस वालों की मदद से सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा  करते हैं . सरकारी ज़मीन पर बहुत ही गरीब लोगों को गैरकानूनी तरीके  से बसाते हैं. ज़ाहिर है इन लोगों के वोट बहुत ज्यादा होते हैं और राजनीतिक नेता वोट की लालच में अपने मुकामी लोगों के ज़रिये इन झुग्गियों को संरक्षण देते हैं . सरकारी जुगाड़ से इन झुग्गियों को  मंजूरी दिला दी जाती है जिसमें नेता, अफसर और अपराधी शामिल होते हैं . इसके बाद जो भूमाफिया इस ज़मीन का करता धरता होता है वह इस मान्यता प्राप्त ज़मीन को बहुत ही महंगे  दामों में बेचता है और वहां रहने वाले झुग्गी वालों को कुछ दे लेकर किसी और सरकारी ज़मीन पर बसा देता  है . नोयडा की मौजूदा घटना इसी बड़े   साजिशतंत्र का हिस्सा है . दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार का सरकारी ज़मीन से गैरकानूनी क़ब्ज़ा हटाने  का  बड़ा अभियान चल रहा  है और उस सबके बीच में इतना बड़ा घोटाला सामने आ  गया है . बताते है कि जब कानून व्यवस्था की हालत  को सामान्य बनाने  की कोशिश कर रहे नोयडा और जिले के आला अधिकारियों का ध्यान सरकारी ज़मीन पर अनधिकृत कब्जे की ओर दिलाया गया तो बड़े हाकिम लोग नाराज़ हो गए और कहा कि एक अलग मुद्दा उठाने की ज़रुरत नहीं  है . जब उनको ध्यान दिलाया गया कि मुख्य मंत्री जी के आदेश से राज्य में सरकारी ज़मीन को मुक्त कराने  का अभियान चल रहा है तो अफसरों ने कहा कानून-व्यवस्था प्राथमिकता है और अन्य किसी भी विषय पर बात नहीं की जायेगी .
नोयडा की घटना तो केवल एक घटना है . पूरे देश में इसी पैटर्न पर भ्रष्टाचार चल रहा  है , कई राज्यों में मुख्यमंत्री निजी तौर पर बहुत ईमानदार  हैं लेकिन भ्रष्टाचार का तंत्र चलाने वाले अधिकारियों का अपना एक सिस्टम है और उसको कोई भी नेता आम तौर पर तोड़ नहीं सकता . उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री के बारे में भी यही कहा जाता है . व्यक्तिगत रूप से उनकी इमानदारी  को सभी स्वीकार करते हैं और उनका उदाहरण दिया जाता है . लेकिन राज्य के भ्रष्टाचार को रोकने में वे नाकामयाब रहे हैं. सरकार के हर विभाग में भ्रष्टाचार   कम करने के दावे के साथ सरकार बनी थी लेकिन आजकल भ्रष्टाचार बढ़ा है .
यही हाल केंद्र में भी है .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २००१ में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी . उनके खिलाफ किसी तरह के आर्थिक भ्रष्टाचार की शिकायत उनके विरोधी भी नहीं करते लेकिन क्या गुजरात में या अब  केंद्र में आर्थिक भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है .  भ्रष्टाचार है और वह प्रधानमंत्री को मालूम है इसीलिये उन्होंने भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सरकारी विभागों को हिदायत दी है कि ऊंचे पदों पर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करें और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने में मदद करें। प्रधानमंत्री ने सरकारी अधिकारियों को बता दिया  कि छोटे पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के कारनामों को पकड़कर कोई वाहवाही नहीं लूटी जा सकतीहालांकि उस भ्रष्टाचार को रोकना भी ज़रूरी है लेकिन उससे समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं होगा। प्रधानमंत्री ने जो बात कही है वह बावन तोले पाव रत्ती सही है और ऐसा ही होना चाहिए।लेकिन भ्रष्टाचार के इस राज में यह कर पाना संभव नहीं है। अगर यह मान भी लिया जाय कि इस देश में भ्रष्टाचार की जांच करने वाले सभी अधिकारी ईमानदार हैं तो क्या बेईमान अफसरों की जांच करने के मामले में उन्हें पूरी छूट दी जायेगी लेकिन सरकारी अफसर ,नेता, अपराधी और भूमाफिया के बीच जो सांठ गाँठ है क्या उसको तोडा जा सकता है .

अक्सर देखा  गया है कि राजनीति में आने के पहले जो लोग मांग जांच कर अपना खर्च चलाते थेएक बार विधायक या सांसद बन जाने के बाद जब वे अपनी नंबर एक की  संपत्ति का ब्यौरा देते हैं तो वह करोड़ों में होती है। उनके द्वारा घोषित संपत्ति , उनकी सारी अधिकारिक कमाई के कुल जोड़ से बहुत ज्यादा होती है . इसके लिए जरूरी है बड़े पदों के स्तर पर ईमानदारी की बात की जाय . आज अपने  देश में भ्रष्टाचार और घूस की कमाई को आमदनी मानने की परंपरा शुरू हो चुकी हैवहां भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कोई अभियान चलाया जा सकेगा? और यह बंगलूरू में भी सच है और नोयडा में भी. 
इसको  दुरुस्त करना पड़ेगा और इसके  लिए आन्दोलन की ज़रुरत है . इस बात में कोई शक नहीं है कि किसी भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर आधारित लोकतांत्रिक देश में अगर भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नकेल न लगाई जाये तो देश तबाह हो जाते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में आर्थिक खुशहाली की पहली शर्त है कि देश में एक मजबूत उपभोक्ता आंदोलन हो और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से नियंत्रण हो। मीडिया की विश्वसनीयता पर कोई सवालिया निशान न लगा हो। अमरीकी और विकसित यूरोपीय देशों के समाज इसके प्रमुख उदाहरण हैं। यह मान लेना कि अमरीकी पूंजीपति वर्ग बहुत ईमानदार होते हैं,बिलकुल गलत होगा।लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ वहां मौजूद तंत्र ऐसा है कि बड़े-बड़े सूरमा कानून के इकबाल के सामने बौने हो जाते हैं। और इसलिए पूंजीवादी निजाम चलता है।
इसलिए राष्ट्रहित ,जनहित और  और  अर्थव्यवस्था के हित में यह ज़रूरी है कि भ्रष्टाचार को समूल नष्ट किया जाए .लेकिन यह इतना आसान नहीं है .सही बात यह है कि जब तक केवल बातों बातों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जायेगी तब तक कुछ नहीं होगा . इस आन्दोलन को अगर तेज़ करना है कि तो घूस के पैसे को तिरस्कार की नज़र से देखना पड़ेगा . क्योंकि सारी मुसीबत की जड़ यही है कि चोरबे-ईमान और घूसखोर अफसर और नेता रिश्वत के बल पर समाज में सम्मान पाते रहते हैं . 
अपने देश में पिछले कुछ  दशकों में घूसखोरी को सम्मान का दर्जा मिल गया है . वरना यहाँ पर दस हज़ार रूपये का घूस लेने के अपराध में जवाहर लाल नेहरू ने अपने एक मंत्री को बर्खास्त कर दिया था . लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं . इसी देश में जैन हवाला काण्ड हुआ था जिसमें मुख्य  धरा की सभी पार्टियों के नेता शामिल थे .आर्थिक उदारीकरण के बाद सरकारी कंपनियों में विनिवेश के नाम पर जो घूसखोरी इस देश में हुई है उसे पूरा देश जानता है . इस तरह के हज़ारों मामले हैं जिन पर लगाम लगाए बिना भ्रष्टाचार को खत्म कर सकना असंभव है . लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ र्राष्ट्रीय स्तर पर  जनांदोलन की ज़रुरत है और मीडिया समेत सभी ऐसे लोगों को सामने आना चाहिए जो पब्लिक ओपीनियन को दिशा देते हैं ताकि अपने देश और अपने लोक तंत्र को बचाया जा सके. हालांकि बहुत देर हो चुकी  है और शशिकला और  लालू यादव जैसे लोग राजनीति के नाम पर कुछ भी करके सफल हो रहे हैं . इसको रोका जाना चाहिए .

मेरी पहली मुहब्बत : मेरी नीम का पेड़



शेष नारायण सिंह

नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैंगाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थीतो चिर्री पड़ी ,  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में अजोर हो गया था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम का एक  ठासा टूट कर नीचे गिर गया था. मेरे बाबू वहीं पास में बने मड़हे में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . चिर्री वाले हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम के पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं .
 इस नीम के पेड़ की मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैंने और मेरे अज़ीज़ दोस्त बाबू बद्दू सिंह ने शरारतें  सीखीं और उनका अभ्यास भी किया . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. मेरे बाबू के काका थे यह दोनों लोग . बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के तपता में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे १९४४ में रिटायर हो गए थे और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो इनारे की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो भाइयों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें सीखीं थीं.
मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   धोपाप जाने वाले नहवनिया लोग जेठ की दशमी को थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .

 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है .
 एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में लड़कियों का झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .इस साल  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ बताया  नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ . 

Saturday, July 8, 2017

अमरीका अगर चूका तो जर्मनी विश्व नेता बन सकता है


शेष नारायण सिंह 

इजरायल की ऐतिहासिक यात्रा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी २० के शिखर सम्मलेन में भाग लेने  हैम्बर्ग  पंहुंच गए हैं. दुनिया के औद्यिगिक देशों और आर्थिक  क्षेत्र की उभरती हुयी शक्तियों का यह क्लब मूल रूप से आर्थिक प्रशासन के एजेंडा के साथ स्थापित किया है . लेकिन अन्य मुद्दे  भी इस का विषयवस्तु समय की तात्कालिक आवश्यकता के हिसाब से  बन जाते हैं .इसके सदस्यों में अमरीका तो है ही उसके अलावा  भारत ,चीन, रूस , अर्जेंटीना , आस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन, कनाडा , फ्रांस , जर्मनी , इंडोनेशिया ,इटली, जापान ,मेक्सिको,साउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और तुर्की हैं . यूरोपियन यूनियन को भी एक राष्ट्र सदस्य का दर्ज़ा दिया  गया है . जी २० में दुनिया  की आबादी का करीब दो तिहाई हिस्सा शामिल है और विश्व की अर्थव्यवस्था का ८० प्रतिशत इसके सदस्य देशों  में केन्द्रित है . १९९९ में शुरू हुए इस संगठन की ताक़त बहुत अधिक मानी जाती है . २००८ में पहली बार सदस्य देशों के नेताओं का शिखर सम्मलेन अमरीका की राजधानी वाशिंटन डी सी में हुआ था तब से अलग अलग देशों में यह सम्मलेन होता  रहा  है . जर्मनी में हो रहा मौजूदा सम्मलेन बहुत ही महत्वपूर्ण इस लिहाज़ से भी है कि मई में इटली में हुए जी ७ सम्मलेन के दौरान अमरीकी  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेरिस समझौते से अपने आपको अलग कर लिया था. उस सम्मलेन में उन्होंने भारत और चीन की आलोचना करके एक नया विवाद खड़ा कर दिया  था  जबकि जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने उनसे सार्वजनिक रूप से असहमति जताई थी.
.जी २० सम्मेलन में भी जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल और अमरीकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के बीच बड़े मतभेद की पूरी सम्भावना है क्योंकि जर्मनी ने साफ संकेत दे दिया है कि  वह जलवायु परिवर्तन,मुक्त व्यापार और  शरणार्थियों की समस्या को मुद्दा  बाने के लिए प्रतिबद्ध है जबकि अमरीका के नए नेतृत्व ने कह दिया है कि  वह अमरीकी तात्कालिक हित से पर ही ध्यान देने वाला है . वैश्विक मद्दे फिलहाल अमरीकी राष्ट्रपति की  प्राथमिकता सूची से बाहर  हैं. इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस सम्मेलन में अमरीका अलग थलग पड़  सकता है जबकि बाकी देशों में एकता के मज़बूत होने की सम्भावना है . अमरीका का राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप पहली बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से आमने सामने मिल रहे हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि बराक ओबामा जैसे सुलझे हुए राष्ट्रपति के बाद नए अमरिकी राष्ट्रपति का रूसी नेता के साथ आचरण किस तरह से दुनिया के सामने आता  है. अभी पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र के नए महासचिव अंतोनियो गुतरेस ने अमरीकी प्रशासन के नेताओं को चेतावनी दे दी थी कि अगर अमरीका अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी की समस्याओं में उपयुक्त रूचि नहीं दिखाता तो इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह विश्व के नेता के रूप  अपना मुकाम गंवा देगा . कूटनीतिक   हलकों में माना जा रहा है कि इस सम्मलेन के बाद एंजेला मर्केल का विश्व नेता के रूप में क़द बढ़ने वाला है क्योंकि शिखर सम्मलेन के  कुछ दिन पहले ही वे दो उभरती हुयी मज़बूत ताक़तों के नेताओं ,  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग से वे जर्मनी में मिल चुकी हैं और जी ७ के वक़्त अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत और चीन का नाम लेकर इन देशों को  जो तकलीफ दी थी उसपर मरहम लगाने  की अपनी मंशा का इज़हार भी कर दिया है . हालांकि यह सच है कि कार्बन के उत्सर्जन के मामले में चीन का नंबर एक है और भारत भी तीसरे नंबर पर  है लेकिन इनमे से किसी को भी डोनाल्ड ट्रंप हडका कर लाइन पर लाने की हैसियत नहीं रखते . ऐसी हालत में ट्रंप की अलोकप्रियता के मद्दे नज़र एंजेला मर्केल की पोजीशन बहुत ही मज़बूत है और पेरिस समझौते के  हैम्बर्ग में स्थाई भाव बन जाने से अमरीकी नेतृत्व शुरू से ही  रक्षात्मक खेल खेलने के लिए अभिशप्त है .

ऐसा लगता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति काल के दौरान अमरीका लिबरल स्पेस को रोज़ ही गँवा रहा है और यूरोप के नेता यूरोपीय गौरव को स्थापित करने के लिए तैयार लग रहे हैं . पेरिस समझौते से अमरीका के अलग होने  की जी ७  शिखर बैठक में उठाई गई बात को यूरोप में बहुत ही नाराजगी से लिया गया है .  आज के माहौल में यूरोप में लिबरल स्पेस में एंजेला मेकेल सबसे बड़ी  नेता हैं . जी २० के इस शिखर सम्मेलन में जर्मनी का उद्देश्य   है  कि वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था को सबके हित में इस्तेमाल किया जाय. इस सम्मलेन में विकास को प्रभावी और सम्भव बनाने के तरीकों पर  गंभीर चर्चा होगी. अफ्रीका की गरीबी को खत्म करने के लिए किये जाने वाले कार्यों से जो अवसर उपलब्ध  हैं,  उन  पर यूरोपीय देशों की नजर  है . महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और दुनिया भर में बढ़ रही बेकार नौजवानों की फौज के लिए रोज़गार के अवसर पैदा करना बड़ी प्राथमिकता है . बुनियादी ढाँचे के सुधार में पूंजी निवेश का बहुत ही संजीदगी से  यूरोप के देश उठा रहे हैं शिक्षा और कौशल विकास में बड़े लक्ष्य निर्धारित करना और उनको हासिल   करने की दिशा में  भी अहम चर्चा होगी .
हालांकि जर्मनी के नेता  इस बात से बार बार इनकार कर रहे हैं कि जर्मन नेता  अमरीकी  आधिपत्य  को चुनौती देना चाहती हैं लेकिन कूटनीति की दुनिया में इन बयानों का  शाब्दिक अर्थ न लेने की परम्परा है  और आने वाले समय में ही तय होगा कि ट्रंप के आने के बाद अमरीका की हैसियत में जो कमी आना शुरू हुयी थी वह और कहाँ तक गिरती है. जी२० का सम्मलेन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के गतिशास्त्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है . हैम्बर्ग के लिए जिस  तरह का एजेंडा तय करने में जर्मनी ने सफलता पाई है वह उनको पूंजीवादी दुनिया का नेतृत्व   करने के बड़े अवसर दे रहा है . अगर अमरीका विश्व नेता के अपने मुकाम से खिसकता है तो निश्चित रूप से जर्मनी ही स्वाभाविक नेता बनेगा . यह संकेत साफ दिख रहा है .
जलवायु परिवर्तन के अलावा मुक्त व्यापार भी इस सम्मेलन का बड़ा मुद्दा है .एंजेला मर्केल ने दावा किया है कि हैम्बर्ग में कोशिश की जायेगी कि मुक्त व्यापार के क्षेत्र में विस्तार से चर्चा हो और अधिकतम देशों के अधिकतम  हित में कोई फैसला लिया जाए. उन्होंने साफ़ कहा कि नए अमरीकी प्रसाशन के रवैय्ये के चलते यह बहुत कठिन काम होगा लेकिन जर्मनी  की तरफ से कोशिश पूरी की जाएगी .
 ऐसा लगता है कि अमरीका से रिश्तों  के बारे में पूंजीवादी देशों में बड़े पैमाने पर विचार विमर्श चल रहा है . पिछले अस्सी वर्षों से अमरीका और पूंजीवादी यूरोप के हित आपस में जुड़े हुए थे लेकिन अब उनकी फिर से व्याख्या की जा रही है . यूरोप के बाहर भी अमरीकी राष्ट्रपति की क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा की प्रवृत्ति अमरीका को  अलग थलग करने में भूमिका अदा कर रही  है . अमरीका का हर दृष्टि से सबसे करीबी देश  कनाडा भी अब नए अमरीकी नेतृत्व से खिंचता दिख रहा है . अभी पिछले हफ्ते वहां की संसद में विदेशमंत्री  क्रिस्टिया फ्रीलैंड ने बयान दिया कि अमरीका जिस तरह से खुद ही अपने विश्व नेता के कद को कम करने पर आमादा  है उस से तो साफ़ लगता है कि हमको ( कनाडा ) भी अपना स्पष्ट और संप्रभुता का रास्ता खुद ही तय करना होगा
. भारत का जी२० देशों में  बहुत महत्व  है . इसकी विकासमान अर्थव्यवस्था को दुनिया विकसित देशों की राजधानियों में पूंजीनिवेश के अच्छे मुकाम के रूप में देखा जाता है .पिछले साल सितम्बर  के शिखर सम्मलेन में भारत ने चीन को लगभग हर मुद्दे पर  समर्थन दिया था और यह उम्मीद  जताई थी कि चीन  भी उसी तरह से भारत को महत्व देगा लेकिन पिछले दस महीने की घटनाओं को देखा जाए तो  स्पष्ट हो जाएगा कि भारत ने भविष्य का जो  भी आकलन किया  था , वह  गड़बड़ा गया है . चीन का रुख भारत के प्रति दोस्ताना नहीं है. जबकि भारत के प्रधानमंत्री ने पूरी कोशिश की . चीन के सबसे बड़े नेता को भारत बुलाया, बहुत ही गर्मजोशी से उनका अतिथि सत्कार किया , हर तरह के व्यापारिक संबंधों को विकसित करने की कोशिश की लेकिन चीन की तरफ से वह गर्मजोशी देखने को नहीं मिली . बल्कि उलटा ही काम हो रहा है . पाकिस्तान स्थित आतंकवादी मसूद अजहर को जब संयुक्त राष्ट्र में अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का अवसर आया तो चीन ने वीटो कर दिया . भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कैलाश मानसरोवर यात्रा को बहुत ही असभ्य तरीके  से बंद करवाया, सिक्किम और भूटान के मुद्दों को लगभग रोज़ ही उठा रहा है. हिन्द महासागर में अपने विमान वाहक जहाज़ों को स्थापित करके  चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत चाहे जितना अपनापन दिखाए उसकी  कूटनीति उसके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रख कर ही  की जायेगी ,उसमें  व्यक्तिगत संबंधों की कोई भूमिका नहीं होती . इस हालत में भारत को हैम्बर्ग में अपने एजेंडे को नए   सिरे से तैयार करना पड़ा है ..जी २० के इस सम्मलेन में भारत की नई प्राथमिकता बिल्कुल स्पष्ट है . भारत चाहता है कि  बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश हो , सबके विकास के अवसर उपलब्ध कराये जाएँ, ऊर्जा कके विकास में बड़ा कार्यक्रम चले , आतंकवाद और काले धन पर लगाम लगाई जा सके. भारतीय टैक्स व्यवस्था में भारी सुधार की घोषणा करने के बाद भारत में विदेशी  निवेश के अवसर बढे हैं. उद्योग लगाने में अब यहाँ ज्यादा सहूलियत रहेगी , ऐसा भारत का दावा है लेकिन देश में जिस तरह से कानून को बार बार हाथ में  लेने और राज्य सरकारों की अपराधियों को न पकड़ पाने की घटनाएं दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गयीं हैं  , वह  चिंता का विषय है . गौरक्षा के नाम पर देश में फ़ैल रहे आतंक से  बाकी दुनिया में देश की छवि कोई बहुत  अच्छी नहीं बन रही  है . ज़ाहिर है  प्रधानमंत्री सारी दिक्क़तों को दरकिनार कर देश की एक बेहतरीन छवि पेश करने की कोशिश  करेंगें 

Thursday, July 6, 2017

मेरी पहली मुहब्बत : मेरी नीम का पेड़



शेष नारायण सिंह

नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैंगाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थीतो चिर्री पड़ी ,  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में अजोर हो गया था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम का एक  ठासा टूट कर नीचे गिर गया था. मेरे बाबू वहीं पास में बने मड़हे में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . चिर्री वाले हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम के पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं .
 इस नीम के पेड़ की मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैंने और मेरे अज़ीज़ दोस्त बाबू बद्दू सिंह ने शरारतें  सीखीं और उनका अभ्यास भी किया . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. मेरे बाबू के काका थे यह दोनों लोग . बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के तपता में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे १९४४ में रिटायर हो गए थे और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो इनारे की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो भाइयों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें सीखीं थीं.
मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   धोपाप जाने वाले नहवनिया लोग जेठ की दशमी को थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .

 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है .
 एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में लड़कियों का झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .इस साल  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ बताया  नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ .