Thursday, December 3, 2020

किसान आन्दोलन का दायरा बढ़ रहा है


 शेष नारायण सिंह 

सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार आठवें दिन भी जारी है।  किसानों ने तय कर रखा है कि पेशेवर राजनेताओं को आन्दोलन को हाइजैक नहीं करने   देंगे . लेकिन कुछ  राजनीतिक  पार्टियां  आंदोलन का समर्थन कर रही हैं . आज जो खबर आई है वह निश्चित रूप से सरकार की चिंता बढ़ा देगी . देश के सबसे  बुज़ुर्ग राजनेता और  शिरोमणि अकाली दल के सर्वेसर्वा प्रकाश सिंह बादल ने पद्म विभूषण सम्मान को  लौटा कर अपना विरोध दर्ज कर दिया है .  प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर बदल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल ने  भी  किसान क़ानून वाला बिल पास होने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. उस वक़्त राजनीतिक विश्लेषक उनके इस्तीफे को एक राजनीतिक स्टंट मान रहे थे और बताया जा रहा  था कि किसानों के आन्दोलन की आग ठंडी होने पर वे इस्तीफा वापस लेकर एन डी ए  सरकार में फिर मंत्री बन  जायेंगी  लेकिन लगता है कि अब बात आगे बढ़ गयी है . प्रकाश सिंह बदल का विरोध दर्ज करना मोदी सरकार के लिए बड़ी बात होगी. सीनियर बादल सिखों के बहुत बड़े वर्ग के सम्माननीय नेता हैं और बहुत दिनों से पंजाब के साथ  देश की राजनीति में भी अहम् भूमिका निभाते रहे हैं . बीजेपी के संस्थापकों अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी से उनके बहुत ही अच्छे सम्बन्ध रहे हैं . उनके  साथ के कारण ही  पंजाब में बीजेपी अभी तक सरकार का  हिस्सा रहती रही है . प्रकाश सिंह बादल की तरफ से किसान आंदोलन का समर्थन और कृषि कानूनों का विरोध बड़ी बात है .  सबको  मालूम है कि केंद्र सरकार इस घटना को गंभीरता से लेगी . उनका अवार्ड वापसी का फैसला एक बड़ा फैसला है जिसने साबित कर दिया है कि पंजाब की तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां , कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी अब केंद्र सरकार की किसान नीति के खिलाफ लामबंद हो गयी हैं और केंद्र सरकार को अब अपनी जिद पर अड़े रहने का कोई औचित्य नहीं है . अब  लगभग यह तय हो गया  है कि देश में किसान कानूनों के खिलाफ उठ रहे तूफ़ान के मद्देनज़र केंद्र सरकार को किसान बिलों में कुछ न कुछ बदलाव करना पडेगा . इस बीच किसान आन्दोलन से होने वाले राजनीतिक नुक्सान  को संभालने की ज़िम्मेदारी कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर संभाल रहे हैं और उनके मुख्य सहयोगी की भूमिका में मुंबई शहर के नेता और पार्टी के एक पूर्व खजांची के बेटे , केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल हैं . नेपथ्य में अमित शाह हैं जिनके दिशा निर्देश में सरकार की प्रतिक्रिया डिजाइन की जा रही है .

प्रकाश सिंह बादल को भी सत्ता की राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है . वे लगभग हमेशा से ही सत्ता के केंद्र में रहने वाली पार्टी के साथ पाए जाते हैं . उन्होंने अपना पद्मविभूषण सम्मान वापस करते हुए  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को  तीन पन्ने की चिट्ठी लिखी है उससे साफ़ है कि वे पंजाब के किसानों के साथ अपने को विधिवत स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं . चिट्ठी में उन्होंने  कृषि कानूनों का विरोध किया है,किसानों पर हुई पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है और उनपर ठण्ड के महीने में पानी की बौछार आदि डालने के काम को अमानवीय  बताया है . चिट्ठी में उन्होंने लिखा है कि,”  मैं जो भी हूं किसानों की वजह से हूं।“

खबर है कि कृषि कानूनों के सवाल पर जारी गतिरोध के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से  मुलाकात की. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गृह मंत्री से नए कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों के प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए जल्द समाधान निकालने का आग्रह किया .उन्होंने गृह मंत्री के साथ बैठक में अपना विरोध दोहराया और उनसे इस मुद्दे को हल करने का अनुरोध किया। अमरिंदर सिंह ने कहा कि यह तीनों क़ानून पंजाब की अर्थव्यवस्था को बहुत नुक्सान पंहुचायेंगे .साथ ही साथ  यह राष्ट्र की सुरक्षा को प्रभावित करता है। उनकी सरकार ने विधान सभा में बाकायदा केंद्र के  नए कृषि कानूनों के खिलाफ विधेयक भी पारित किया  है . इस आन्दोलन में जो किसान मारे गए थे उनके परिवारों को पंजाब सरकार ने पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है . अमित शाह से उनकी बात का केंद्र सरकार पर क्या असर पड़ा यह तो मालूम नहीं है लेकिन यह तय है की कृषिमंत्री नरेंद्र  सिंह तोमर और किसान नेताओं के बीच चल रही बातचीत पर उसक कुछ असर ज़रूरे पडेगा .

इस बीच टीवी मीडिया का रुख बहुत ही गैर ज़िम्मेदार है ,वह किसानों की समस्याओं को सही तरीके से पेश न करके  बीजेपी के भोंपू की  तरह  काम कर रहा है . टीवी चैनलों को  किसानों के आन्दोलन में केवल वही बात खबर लायक लगती है जिसके कारण अब शहरों में सब्जी और दूध की किल्लत हो जायेगी या कीमतें बढ़ जायेंगीं .  उसको पैदा करने वाले किसान पर क्या गुज़र रही है ,यह बात एकाध चैनलों को छोड़कर कहीं  भी चर्चा का विषय नहीं बन रही है. सरकारी अफसरमंत्री , सत्ताधारी पार्टियों के नेता जब न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात करते हैं तो उनकी शब्दावली बहुत ही तकलीफदेह होती है . उनकी बात इस तर्ज पर होती है कि हमने किसानों को  बहुत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य दे दिया है . कई बार तो ऐसे लगता है जैसे किसी अनाथ को या भिखारी को कुछ देने की बात की जा रही हो. यह किसान का अपमान है उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली के चारों तरफ चल रहे आन्दोलन से मीडिया भी कुछ सबक लेगा और ज़िम्मेदारी का आचरण करेगा

 

Wednesday, December 2, 2020

पत्रकारिता और सर्वोच्च इंसानी मान्यताओं के अजातशत्रु थे ललित सुरजन

 

शेष नारायण सिंह

 

ललित सुरजन जी  चले गए . 74 साल की उम्र भी जाने की कोई उम्र है लेकिन उन्होंने हमको अलविदा कह दिया . देशबंधु अखबार के प्रधान संपादक थे . वे एक सम्मानित कवि व लेखक थे .सामाजिक मुद्दों पर बेबाक राय रखते थे ,उनके लिए शामिल होते थे इसलिए  उनके जानने वाले उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता भी मानते हैं . वे साहित्यशिक्षापर्यावरणसांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित मुद्दों पर हमेशा बेबाक राय  रखते थे . दुनिया भर के देशों की संस्कृति और रीति रिवाजों की जानकारी रखने का भी उनको बहुत शौक़ था.  उनके स्तर का यात्रा वृत्तान्त लिखने वाला मैंने दूसरा नहीं देखा .ललित सुरजन एक आला और नफीस  इंसान थे. देशबन्धु अखबार के संस्थापक स्व मायाराम सुरजन के बड़े बेटे थे. मायाराम जी मध्यप्रदेश के नेताओं और पत्रकारों के बीच बाबू जी के रूप में पहचाने जाते थे .वे मध्यप्रदेश में पत्रकारिता के मार्गदर्शक माने जाते थे उन्होंने मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन को बहुत ही सम्मान दिलवाया .वे नए लेखकों के लिए खास शिविर आयोजित करते थे और उनको अवसर देते थे . बाद में उनमें से बहुत सारे लेखक बहुत बड़े साहित्यकार बनेउनमें से एक महान साहित्यकार प्रोफ़ेसर काशीनाथ सिंह भी हैं. ‘अपना मोर्चा ‘ जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक डॉ काशीनाथ सिंह ने मुझे एक बार बताया कि मायाराम जी ने उनको बहुत शुरुआती दौर में मंच  दिया था. महान लेखक हरिशंकर परसाई जी से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे . स्व मायाराम जी के सारे सद्गुण ललित जी में भी थी .उन्होंने 1961 में  देशबन्धु में एक जूनियर पत्रकार के रूप में काम शुरू किया .  उनको साफ़ बता दिया गया  था कि अखबार के संस्थापक के बेटे होने का कोई विशेष लाभ  नहीं होगाअपना रास्ता खुद तय करना होगाअपना सम्मान  कमाना होगा ,देशबंधु केवल एक अवसर  है ,उससे ज्यादा कुछ नहीं .ललित सुरजन ने वह सब काम किया जो एक नए रिपोर्टर को करना होता है.और अपने महान पिता के सही अर्थों में वारिस बने . पिछले साठ साल की मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की हर राजनीतिक गतिविधि को उन्होंने एक पत्रकार के रूप में देखाअपने स्वर्गीय पिता जी को आदर्श माना और कभी भी राजनीतिक नेताओं के सामने सर नहीं झुकाया.  द्वारिका प्रसाद मिश्र  और रविशंकर शुक्ल उनके पिता स्व मायाराम जी सुरजन के समकालीन थे,इस लिहाज़ से उनको वह सम्मान तो दिया लेकिन उनकी राजनीति का हथियार कभी  नहीं बनेअपने अखबार को किसी भी नेता के हित के लिए इस्तेमाल नहीं होने दिया .जब दिसंबर 1994 में मायाराम जी के स्वर्गवास हुआ तो अखबार की पूरी ज़िम्मेदारी उनके कन्धों पर आ गयी . दिल्ली,,रायपुर, बिलासपुरभोपालजबलपुर सतना और सागर से छपने अखबार को  मायाराम जी की मान्यताओं के हिसाब से निकालते रहे.

ललित जी बहुत ही  विनम्र और दृढ व्यक्ति थे अपनी सही मानयताओं से कभी समझौता नहीं किया .कई बार बड़ी कीमतें भी चुकाईं। अखबार चलाने में आर्थिक तंगी भी आई और अन्य परशानियाँ भी हुईं लेकिन यह अजातशत्रु कभी झुका नहीं .उन्होंने कभी  किसी से दुश्मनी नहीं की. जिन लोगों ने उनका नुकसान किया उनको भी हमेशा माफ़ करते रहे . ललित सुरजन के बारे में कहा  जाता  है कि उन्होंने कभी भी बदला लेने की भावना से काम नहीं किया .

 

 

ललित जी अपने भाइयों को बहुत प्यार करते  हैं. सभी भाइयों को देशबंधु के अलग अलग संस्करणों की ज़िम्मेदारी दे दी . आजकल वानप्रस्थ जीवन जी रहे थे लेकिन लेखन में एक दिन की भी चूक नहीं हुई. कोरोना के दौर में उनको कैंसर का पता लगा विमान और ट्रेन सेवाएँ ठप थीं लीकिन उनके बच्चों ने उनको विशेष विमान से दिल्ली में लाकर इलाज शुरू करवाया. वे  कैंसर से ठीक हो रहे थे . उनकी मृत्यु ब्रेन हैमरेज से हुई. कैंसर का इलाज सही चल रहा था लेकिन काल ने उनको ब्रेन हैमरेज देकर उठा लिया .

ललित जी का जाना मेरे लिए बहुत बड़ा व्यक्तिगत नुक्सान है . उनके साथ खान मार्किट के बाहरी संस की किताब की दुकान पर जाना एक ऐसा अनुभव है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता . वह मेरे लिए एक शिक्षा की यात्रा भी होती थी. जो भी किताब छपी उसको उन्होंने अवश्य पढ़ा . अभी राष्ट्रपति बराक ओबामा की किताब आई है उसका इंतज़ार वे बहुत बेसब्री से कर रहे थे  .  उनके जन्मदिन पर बधाई सन्देश का  मेसेज करने के बाद मैं उनके फोन का इंतज़ार करता रहता था कि अब फोन आने वाला है .हुआ  यह था उनके असली जन्मदिन और  फेसबुक पर लिखित जन्मदिन में थोडा अंतर था. अगर गलत वाले दिन  मेसेज लिख दिया  तो फोन करके बताते थे ,शेषजी आपसे गलती हो गयी . जब किसी साल सही वाले पर मेसेज दे दिया तो कहते थे कि इस बार आपने सही मेजेस भेजा .अब यह नौबत कभी नहीं आयेगी क्योंकि अब उनके जीवन में कराल काल ने एक पक्की तारीख  लिख दी है.,वह उनकी मृत्यु की तारीख है . इस मनहूस तारीख को उनका हर चाहने वाला कभी  नहीं भुला पायेगा . उनके अखबार में मैं काम करता हूँ लेकिन उन्होंने यह अहसास कभी नहीं होने दिया कि मैं कर्मचारी हूँ.  आज उनके जाने के बाद लगता है कि काल ने मेरा बड़ा भाई चीन लिया . आपको कभी नहीं भुला पाऊंगा ललित जी .

संयुक्त राष्ट्र में भारत का ऐलान - आतंकवाद दुनिया का सबसे बड़ा संकट


 

शेष नारायण सिंह

 

दूसरे विश्वयुद्ध के खात्मे के 75 साल पूरे हो गए .इस अवसर पर संयुक्त राष्‍ट्र में एक विशेष बैठक का आयोजन किया गया .  सदस्य देशों ने अपनी बातें रखीं .भारत की तरफ से कहा गया कि दूसरा विश्वयुद्ध वास्तव में  आतंकवाद का नतीजा था .भारत की तरफ से कहा गया कि आतंकवाद दुनिया के समक्ष एक बड़ा संकट है। इस संकट को हराने के लिए वैश्विक एकजुटता और इसके खिलाफ सख्‍त कार्रवाई की जरूरत है। समकालीन दुनिया में आतंकवाद युद्ध शुरू करने के एक प्रेरक और साधन के रूप में उभरा है। ज़रूरत इस बात की है कि सभी देश  संयुक्‍त राष्‍ट्र की मूल मान्यताओं के प्रति एक  बार फिर समर्पण करने का संकल्प लें .वास्तव में संयुक्‍त राष्‍ट्र का गठन ही युद्ध के खिलाफ विश्वजनमत का ऐलान था .संयुक्त राष्ट्र का एक प्रमुख लक्ष्य  यह भी था कि बाद  की पीढि़यों को युद्ध के संकट से बचाया जा सके। आतंकवाद आज की दुनिया में युद्ध छेड़ने का एक साधन है . इसको तबाह करने के  लिए सभी देशों को एकजुट होना पडेगा . 

 

 मानवता के इतिहास में इंसानी आतंक को समझने के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध एक अवसर देता है .जर्मनी के तानाशाह हिटलर और इटली के मुसोलिनी ने पूरे यूरोप में  ,उनके  सहयोगी जापान के शासक ने एशिया में आतंक का राज कायम करने की कोशिश की .थी  लेकिन विश्व की न्यायप्रिय जनता ने उनको पराजित किया . इंग्लैण्ड, फ्रांस सहित यूरोप के अन्य देशों में हिटलरी आतंक का डंका बज रहा था . उन दिनों यूरोप के ज्यादातर देशों में राजाओं का शासन था . अमरीका में लोकतंत्र की व्यवस्था थी . दूसरे विश्वयुद्ध में अमरीका  प्रमुख भूमिका अदा कर रहा था.  सब ने मिलकर आतंकवादी हिटलर की तानाशाही सोच को हराया और दुनिया को आतंक के राज से मुक्त किया . उसके बाद पूरी  दुनिया में लोकतंत्र की बयार बहने लगी थी . इंगलैंड के लोकतंत्र को ज़्यादातर देशों ने अपनाया . लिबरल डेमोक्रेटिक सोच और राजनीति का माहौल बना . दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बहुत सारे देशों  को आजादी नसीब हुई. एशिया और अफ्रीका के कई देश आज़ाद हुए और ज्यादातर देशों में लोकतंत्र की शासन प्रणाली कायम करने की कोशिश की गयी . किसी के एक व्यक्ति की तानाशाही की संस्कृति को तिरस्कार की नज़र से  देखा जाने लगा. लेकिन वह बहुत दिन नहीं चला . कुछ देशों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति बनने वाले लोगों ने अपने परिवार को ही सत्ता देने की कोशिश शुरू कर दिया . उनके परिवारों ने सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के तरह  तरह के हथकंडे अपनाए .. रूस में तो कम्युनिस्ट क्रान्ति 1917 में ही आ चुकी थी लेकिन चीन जैसे देशों में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सर्वहारा की सत्ता कायम हुई लेकिन देखा यह गया कि पार्टी का सर्वोच्च व्यक्ति इतनी ताकत इकट्ठी कर लेता था कि वह मनमानी करने लगता था . चीन में माओत्से तुंग ने यही किया . बाद के चीनी शासकों ने भी यही किया और उनके मौजूदा शासक का आलम तो यह  है कि उसने अपने आपको आजीवन राष्ट्रपति बना लिया  है . यही तानाशाही है , यही आतंकवाद है .  ऐसा इलसिए संभव हो सका क्योंकि विश्वजनमत कमज़ोर पड़ रहा था. विश्वयुद्ध ख़त्म  होने के कुछ अरसा  ही  में शीतयुद्ध शुरू हो गया . अमरीका अपना   प्रभाव क्षेत्र बढाने के लिए अपने विश्वासपात्र तानाशाहों को आगे बढाने लगा. अमरीका की इसी  प्रवृत्ति के कारण दुनिया के कई देशों में तानाशाही और आतंक की खेती होने लगी. पाकिस्तान, अल-कायदा, तालिबान, सद्दाम  हुसैन आदि अमरीकी स्वार्थों की सोच की उपज हैं .

 

आज लोकतन्त्र को सबसे खतरा  आतंकवादी संगठनों से है . जैश-ए-मोहम्म्द ,लश्कर-ए-तैयबा,  हिजबुल मुजाहिदीन , इंडियन मुजाहिदीन, अल कायदा ,हक्कानी नेटवर्क ,तहरीक-ए-तालिबान ,हरकत-उल-मुजाहिदीन ,इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन लोकतंत्र को ख़त्म करने की साज़िश हमेशा रचते रहते हैं . भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विशेष सत्र में आतंकवाद को ख़त्म करने की जो अपील की है ,वह इन जैसे संगठनों को निष्क्रिय करने की अपील है . यह सारे  संगठन पूरी  दुनिया में एक ख़ास तरह की हुकूमत कायम करना चाहते  हैं और  उनका धर्म इस तरह का निजामे-मुस्तफा  स्थापित कारने की  प्रेरणा देता  है . यह सारे  संगठन मूल रूप से आतंकवादी  हैं और अपने अलावा किसी की नहीं सुनते . जब यह ताक़तवर हो जाते हैं तो यह हिटलर भी बन सकते हैं और स्टालिन भी . यह सभी किसी न किसी आदर्श का चोगा ओढ़े रहते हैं लेकिन मूलरूप से लोकतंत्र के दुश्मन होते हैं . जब  ताकतवर हो जाते हैं तो पूरी दुनिया को कब्जे में लेना चाहते हैं . अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट का यही सपना है . ज़रूरत इस बात की है अपनी मनमानी करने वाले कहीं भी  हों उनका  विरोध किया जाए , उनको निष्क्रिय किया जाय.  हिटलर के आतंकवाद के नक्शे क़दम पर आजकल  तुर्की का शासक एर्दोगन भी चल  रहा है . वह भी खलीफा बनने  के सपने देख रहा है और दुनिया भर के  इस्लामी आतंकवादियों को समर्थन दे रहा है . उसपर भी लगाम लगाना ज़रूरी है .यह सारी जमाते लोकतन्त्र के काम करने वाली जमाते  हैं . संयुक्त राष्ट्र में हुए विशेष अधिवेशन का यही सन्देश है 

पाकिस्तान-चीन का सैनिक समझौता पाकिस्तान चीन की विस्तारवादी नीतियों को बढाने का साधन है .


 

शेष नारायण सिंह

 

 पिछले एक दशक में दुनिया की राजनीति में बहुत कुछ बदल गया  है . जो पाकिस्तान कभी  दक्षिण एशिया में अमरीका का ख़ास कारिन्दा  हुआ करता था अब वह उसी अमरीका के खिलाफ चीन का फर्माबरदार बन  गया ही . आज के पाकिस्तानी अखबारों में एक खबर प्रमुखता से छपी है कि चीन और पाकिस्तान के बीच  एक सैनिक समझौता हो गया है जिसके तहत दोनों देशों की सेनायें एक  दूसरे से सहयोग करेंगी .चीन के रक्षा मामलों के मंत्री जनरल वे फेंग आजकल पाकिस्तान में हैं .  पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा और जनरल वे के बीच जिस समझौते पर दस्तखत हुए हैं उसके मुताबिक दोनों देशों की सेनायें एक दूसरे के काम आयेंगी. यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आजकल  भारत और चीन के बीच  पूर्वी लदाख और उसके आसपास के इलाकों  में तनाव चल रहा है . चीन की कोशिश है कि अगर भारत के साथ किसी तरह के झगड़े  की नौबत आती  है तो भारत की पाकिस्तान से लगने वाली पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान की सेना को भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके . पाकिस्तान भी भारतीय सेना से  परेशान है . भारत के ऊरी और पुलवामा में उसके आतंकवादी हमलों के जवाब में भारत ने उसके इलाके में घुसकर उसपर हवाई हमले कर दिए  , सर्जिकल स्ट्राइक कर दी और पूरी दुनिया में पाकिस्तान को एक कमज़ोर देश के रूप में पेश कर दिया . पाकिस्तान के शासकों ,खासकर पाकिस्तानी सेना की इच्छा भारत को परेशान करने की रहती है .अपने बल पर तो वह उस मकसद को कभी हासिल नहीं कर सकता लेकिन उसको संतुष्टि  होगी अगर चीन की सेना भारत को परेशानी में डाल सके .  ऐसा लगता है कि उसी चक्कर में पाकिस्तानी डीप स्टेट चीन की जी हुजूरी कर रहा है . यह समझौता वास्तव में कुछ नहीं एक तरह से माहौल बनाने की कोशिश है जिससे पाकिस्तानी अवाम को बताया जा सके कि वे चीन के सहयोग से भारत को घेरने जा  रहे हैं .

 आज की राजनीतिक सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी सरकार अब चीन पर पूरी तरह से निर्भर है . विदेशनीति का  बहुत पुराना मंडल सिद्धांत है  कि दुश्मन का दुश्मन , दोस्त होता है.  पाकिस्तान की मौजूदा विदेश नीति भारत और चीन के बीच कथित दुश्मनी की बुनियाद पर ही टिकी है . अब पाकिस्तान के नेता  चीन की हर बात मानने के लिए अभिशप्त नज़र आते हैं . चीन से तो खैर भारत की समस्या चल ही रही है लेकिन पकिस्तान को भी उम्मीद रहती है कि वह  भारत के खिलाफ किसी अभियान में चीन की सेना  से मदद ले सकेगा. यह एक मुगालता है क्योंकि यह बार बार सिद्ध हो चुका है कि चीन के शासक पाकिस्तान को हथियार तो बेच सकते हैं क्योंकि वह उसका व्यापार है लेकिन वह अपनी सेना को पाकिस्तान क्या किसी भी देश की मदद के  लिये नहीं भेजेगा . दरअसल चीन की योजना  पाकिस्तान के उस इलाके र क़ब्ज़ा करने की है जो  पाकिस्तान ने धोखेबाजी करके बलोचिस्तान से हथिया रखा है .बलोचिस्तान के ग्वादर में चीनी मदद से एक  बंदरगाह बन रहा है . जिसको चीन ने पाकिस्तानी ज़मीन पर बन रही एक बहुत चौड़ी सड़क के ज़रिये जोड़ने की योजना बनाई हुयी है . यह काम अब अंतिम चरण में है .पाकिस्तान के ऊपर चीन का बहुत बड़ा क़र्ज़  है . चीनी मामलों के जानकार बताते हैं कि इस बंदरगाह और सड़क को चीन एक न एक दिन पाकिस्तान से उसी क़र्ज़ की आदायगी के बहाने हथिया  लेगा . ग्वादर बंदरगाह में विश्वस्तर की सुविधाएं बनाई जा  रही हैं और उन सब का इस्तेमाल चीन ही करेगा यह पक्का है .

लेकिन चीन के अदूरदर्शी शासकों को कुछ और दिख रहा  है . उनको  लगता  है कि वे भारत के खिलाफ अगर  कभी हमला करेंगे तो चीन का सहयोग उनको मिलेगा . लेकिन उनको चीन से ऐसी उम्मीद नहीं करना चाहिए .इसलिए पाकिस्तानी हुक्मरान ,खासकर फौज को वह बेवकूफी नहीं करनी चाहिए जो 1965 में उस वक़्त के तानाशाह जनरल अयूब ने की थी . १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पहले उनको लगता था कि जब वे भारत पर हमला कर देगें तो चीन भी भारत पर हमला कर देगा क्योंकि तीन साल पहले ही भारत और चीन केबीच सीमा पर संघर्ष हो चुका था. जनरल को उम्मीद थी कि उसके बाद  भारत कश्मीर उन्हें दे देगा. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और पाकिस्तानी फौज़ लगभग तबाह हो गयी. भारत के खिलाफ किसी भी देश से मदद मिलने की उम्मीद करना पाकिस्तानी फौज की बहुत बड़ी भूल होगी. पाकिस्तान-चीन संबंधों में सच्चाई केवल यह  है कि  चीन अपने व्यापारिक हितों के लिए  पाकिस्तान का इस्स्तेमाल कर रहा  है . हिन्द महासागर में अपनी सीधी पंहुंच बनाना चीन का  हमेशा से सपना रहा है और अब पाकिस्तान ने  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रास्ते ,अपने कब्जे वाले बलोचिस्तान तक सड़क बनाने और समुद्र पर ग्वादर बंदरगाह बनाने की अनुमति दे कर उसका वह सपना पूरा कर   दिया  है .

पाकिस्तानी अखबारों में इस बात पर भी चिंता  जताई जा रही है कि पाकिस्तान आर्थिक  मामलों में चीन पर बहुत ही अधिक निर्भर होता जा रहा है और उससे बहुत जयादा उम्मीदें पाल रखी  हैं . जबकि चीन पाकिस्तान में केवल लाभकारी  पूंजी निवेश कर रहा है और विश्व में अपने को ताक़तवर दिखाने के लिए पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति   का फायदा ले रहा है .कुल मिलाकर  कभी अमरीका का कारिन्दा रहा पाकिस्तान अब चीन के हुक्म का गुलाम बन चुका है .

Thursday, November 26, 2020

अलविदा राजीव

 

 


 

राजीव कटारा का जाना बहुत ही तकलीफदेह है. . मुझसे उम्र में करीब दस साल  छोटे थे. एक बार किसी दोस्त से मैंने उनका परिचय करवाया और कहा कि राजीव पढ़ते बहुत  हैं ,, लिखते बहुत अच्च्छा हैं, साहित्य , संगीत , स्पोर्ट्स,  विचारधारा ,राजनीतिक हलचल आदि के अच्छे जानकार  हैं . राजीव के  चेहरे पर उनका वही विनम्र स्मित हास्य वाला भाव बना रहा .   उन मित्र के जाने के बाद  मुझसे बोले ,भाई साहब यह कैसा परिचय आप दे रहे थे . पत्रकार हूं तो अधिक से अधिक विषयों की जानकारी होनी ही चाहिए और अगर पढूंगा नहीं तो पत्रकार काहे का . आपको मेरा  ऐसा परिचय नहीं देना चाहिए . मेरी शख्सियत में जो बात सबसे अलग हो वह बताते तो ठीक रहता  . उसके बाद मैंने सोचा और पाया कि राजीव कभी भी किसी पत्रकार या समकालीन के खिलाफ एक शब्द नहीं  बोलते थे. हर व्यक्ति के बारे में उसका पाजिटिव  पक्ष ढूंढ लेना राजीव के मिजाज का हिस्सा था. मैंने राजीव के खिलाफ  किसी को कभी भी कुछ बोलते नहीं सुना.

आज सुबह भाई वीरेन्द्र सेंगर की पोस्ट से पता चला कि  रात तीन बजे के आसपास राजीव की मृत्यु हो गयी थी.इस बात पर विश्वास नहीं हुआ. दिनेश तिवारी की मृत्यु का झटका अभी भारी था तब तक राजीव के जाने की खबर ने झकझोर दिया  है. किसी भी हाल में खुश रहना राजीव की फितरत थी. शानदार इंसान था .  कादम्बिनी  पत्रिका के बंद होने के बाद मेरी उनसे बात हुयी थी. आगे की बातें हुई थीं. किसी विदेशी विश्वविद्यालय में उनके लेक्चर की बात थी .कोरोना के बाद जाने की संभावना थी .कई विश्वविद्यालयों में भाषण देकर वापसी की बात थी . भारत की संस्कृति की जो नफासत है उसके जानकार राजीव के लिए मेधा से सम्बंधित कोई काम मुश्किल नहीं था.

1993 में जब  स्व. उदयन  शर्मा ने राष्ट्रीय सहारा अखबार  का ज़िम्मा लिया तो वहां उनके प्रति बहुत ही होस्टाइल माहौल था . वहां जमे हुए मठाधीश टाइप पत्रकार किसी को जमने नहीं देते थे .  जब सुब्रत रॉय ने उदयन शर्मा से बात की तो उन्होंने कहा कि अखबार को ढर्रे पर लाने का तरीका यह है कि  अच्छा लिखने वाले कुछ पत्रकारों को साथ लिया जाय. सुब्रत रॉय ने ओके कर दिया लेकिन जब पंडित जी ने अपनी पसंद के पत्रकारों को लाने की कोशिश शुरू की तो मठाधीशी वालों ने अडंगा लगा दिया .उसके बावजूद उदयन शर्मा ने राजीव कटारा और सुमिता को ज्वाइन करवा दिया . दिन भर दोनों कुछ न कुछ लिखते रहते थे . एडिट पेज  और ओप-एड पेज को भरने की ज़िम्मेदारी पंडित जी की टीम की थी. मुझे भी उसी में कुछ काम मिल जाता था.  पंडित जी के लिए  सबसे अच्छी बात यह हुई  कि  उन दिनों एडिट पेज पर जो सब एडिटरों की टीम थी वह बहुत ही काबिल थी.  नितिन प्रधान, मनीषा मिश्रा, सत्य प्रकाश और श्याम सारस्वत बहुत ही कुशल और विद्वान पत्रकार थे . उनके करियर का वह शुरुआती दौर था लेकिन  काम के मामले में सुपीरियर थे.   संजय श्रीवास्तव और गोविन्द दीक्षित भी पंडित जी के लिए लिखते थे .उस टीम के लोगों  ने कुछ ही दिनों बाद राजीव और  सुमिता  से दोस्ती कर ली. इन दोनों में किसी तरह का अहंकार था ही नहीं .

उसके बाद राजीव आजतक टीवी चैनल में भी गए . कमर वहीद नक़वी और राम कृपाल सिंह उनको बहुत पसंद  करते थे . लेकिन राजीव में फकीरी तत्व बहुत प्रबल था . कभी  किसी नौकरी से चिपकने की कोशिश नहीं की. आत्मविश्वास इतना था कि लिख पढ़कर आराम से ज़िंदगी गुज़ार लेने का   भरोसा  देखते ही बनता था . राजीव का जाना मुझे अन्दर तक विचलित कर गया है . कभी नहीं सोचता था कि राजीव की याद में कुछ लिखना पडेगा. राष्ट्रीय सहारा के दौरान 1994 में जब राजीव ने  संगीतकार राहुल देव  बर्मन का ओबिट लिखा तो मैंने कहा कि मेरे जाने पर भी ओबिट तुम्ही लिखना . वायदा किया और हँसते रहे. आज जब मैं यहाँ बैठ कर राजीव को  याद कर रहा हूँ तो मन में दुःख की  लहरें उठ रही हैं. अलिवदा  राजीव ,बहुत याद आओगे ..

मसूद अजहर और जैशे-मुहम्मद को तबाह करना दुनिया और भारत के लिए ज़रूरी काम है .


 

शेष नारायण सिंह

 

19 नवम्बर को जम्मू के पास नगरोटा में  भारत के सुरक्षाकर्मियों ने चार आतंकियों को मौत के घाट उतर दिया . वे चारों जम्मू-कश्मीर में चल रहे जिला  विकास परिषद के चुनाव में खलल पैदा करना चाहते थे . पता चला है कि वे  चारों हमलावर पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जैशे मुहम्मद से ताल्लुक रखते थे . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस बात की जानकारी दी और  विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने  दिल्ली में तैनात पाकिस्तानी उच्चायोग के एक बड़े अफसर को बुलाकर विरोध दर्ज  कराया और उसको सख्त भाषा में चेतावनी दी.  विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने खुद कमान संभल रखा है और दुनिया के बाकी देशों के राजदूतों को पाकिस्तान की इस करतूत की जानकारी दे रहे हैं . आतंकियों के पास से जो  हथियार,दवाएं और खाने पीने की चीज़ें बरामद हुई हैं वे सभी  पाकिस्तान की हैं .  दुनिया को यह बताने की कोशिश की जा रही है कि उन्नीस नवम्बर की घटना कोई इकलौती घटना नहीं है . पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों ,खासकर जैशे मुहम्मद ने इसी साल   जम्मू-कश्मीर में करीब दो सौ वारदातें की हैं . जैशे मुहम्मद का सरगना मसूद अजहर है  जो भारत को तबाह करने का संकल्प ले चुका है . उसके तालिबान और अल-कायदा से सम्बन्ध हैं और उसका संगठन संयुक्त राष्ट्र  द्वारा घोषित खतरनाक आतंकवादी संगठन है . हालाँकि  पाकिस्तान नहीं चाहता था कि उसको आतंकवादी घोषित किए जाए क्योंकि मसूद अजहर पाकिस्तानी विदेश के आतंकवादी   शाखा का बहुत ही महत्वपूर्ण सदस्य है . जब पूरी दुनिया के सभ्य  देश मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करना चाहते और संयुक्त राष्ट्र  सुरक्षा पारिषद में  एक प्रस्ताव लाया गया था तो  अमरीका , फ्रांस और ब्रिटेन ने इसकी पैरवी कर रहे थे लेकिन चीन ने पाकिस्तान के निवेदन के बाद प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया और मसूद अजहर एक बार फिर बच निकला था  . मसूद अजहर का संगठन जैशे-मुहम्मद  पहले  ही प्रतिबंधित संगठनों की लिस्ट में मौजूद है .

मसूद अजहर  बहुत ही खतरनाक आतंकवादी है .  वह मसूद अजहर ही है जिसने भारत की संसद  पर  आतंकवादी हमले की साज़िश रची थी . उरी ,पुलवामा और पठानकोट हमले  भी उसी ने करवाए थे . मसूद अजहर १९९४ में कश्मीर आया था जहां उसको गिरफ्तार कर लिया गया था .  उसको रिहा करवाने के लिए  अल फरान नाम के एक आतंकी  गिरोह ने कुछ सैलानियों का  अपहरण कर लिया था लेकिन नाकाम रहे. बाद में उसके भाई की अगुवाई  में आतंकवादियों ने नेपाल  से दिल्ली आ रहे   भारत की सरकारी विमान कंपनी इन्डियन  एयरलाइन्स के एक  विमान को हाइजैक करके कंदहार में उतारा और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को मजबूर कर दिया कि   उसको रिहा करें. उस दौर के विदेशमंत्री जसवंत सिंह मसूद अज़हर सहित कुछ और आतंकवादियों को लेकर कंदहार गए और विमान और यात्रियों को वापस लाये . और इस तरह मसूद अजहर जेल से छूटने में सफल रहा .

भारत की जेल से छूटने के बाद से ही मसूद अजहर भारत को  तबाह करने के  सपने पाले हुये है. जहां तक भारत को तबाह करने की बात  हैवह सपना तो कभी नहीं पूरा होगा लेकिन इस मुहिम में पाकिस्तान तबाही के कगार  पर  पंहुंच गया है .आज पाकिस्तान अपने ही पैदा किये हुए आतंकवाद का शिकार हो रहा  है.पाकिस्तान के शासकों ने उसको तबाही के रास्ते पर डाल दिया   है. आज बलोचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ ज़बरदस्त आन्दोलन चल रहा है .सिंध  में भी पंजाबी आधिपत्य वाली केंद्रीय हुकूमत और फौज से बड़ी नाराजगी  है. इन  हालात में पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वहां के सभ्य समाज और  जनतंत्र की पक्षधर जमातों की है. हालांकि इन दिनों पाकिस्तान में जनतंत्र की पक्षधर जमातें बहुत कमज़ोर पड़ गयी हैं . प्रधानमंत्री इमरान खान तो पूरी तरह फौज के कंट्रोल में है लेकिन उनके विरोध में  सक्रिय लोग भी जब भी सत्ता में रहे फौज की गुलामी ही करते रहे थे .नवाज़ शरीफ की पार्टी की कमान आजकल उनकी बेटी  मरियम संभाल रही हैं और भुट्टो परिवार की पार्टी की लगाम बेनजीर भुट्टो के   बेटे  बिलावल के हाथ में है . आज  पाकिस्तान की छवि बाकी दुनिया में एक असफल राष्ट्र की बन चुकी है . पाकिस्तान में लोकतंत्र तो खैर ख़त्म ही है लेकिन एक देश के रूप में उसका बचे रहना बहुत ज़रूरी है लेकिन  गैरजिम्मेदार पाकिस्तानी शासकों ने इसकी गुंजाइश बहुत कम छोडी है.

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान में आतंकवादियों का इतना दबदबा कैसे हुआ ,यह समझना कोई मुश्किल नहीं है . पाकिस्तान की आज़ादी के कई साल बाद तक वहां संविधान नहीं तैयार किया जा सका.  पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बहुत जल्दी मौत हो गयी और सहारनपुर से गए और नए देश प्रधानमंत्री लियाक़त अली को क़त्ल कर दिया गया . उसके बाद वहां धार्मिक और फौजी लोगों की  ताकत बढ़ने लगी .नतीजा यह हुआ कि आगे चलकर जब  संविधान बना  भी तो फौज देश की राजनीतिक सत्ता पर कंट्रोल कर चुकी थी. उसके साथ साथ धार्मिक जमातों का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था. पाकिस्तान के इतिहास में एक मुकाम यह भी आया कि सरकार के मुखिया को  नए देश  को इस्लामी राज्य घोषित करना  पड़ा. पाकिस्तान में अब तक चार फौजी तानाशाह हुकूमत कर चुके हैं लेकिन पाकिस्तानी समाज और राज्य का सबसे बड़ा  नुक्सान जनरल जिया-उल-हक  ने किया . उन्होंने पाकिस्तान में फौज और धार्मिक अतिवादी गठजोड़ कायम किया जिसका  खामियाजा पाकिस्तानी  समाज और राजनीति आजतक झेल रहा है . पाकिस्तान में सक्रिय सबसे बड़ा आतंकवादी हाफ़िज़ सईद जनरल जिया की ही पैदावार है . हाफ़िज़ सईद तो मिस्र के काहिरा विश्वविद्यालय में  दीनियात ( धार्मिक शिक्षा )  का   मास्टर था . उसको वहां से लाकर जिया ने अपना धार्मिक सलाहकार नियुक्त किया . धार्मिक जमातों और फौज के बीच उसी ने सारी जुगलबंदी करवाई और आज आलम यह है कि दुनिया में कहीं भी आतंकवादी हमला हो ,शक की सुई सबसे पहले पाकिस्तान पर ही  जाती है . आज पकिस्तान  एक दहशतगर्द और असफल देश  है और आने वाले वक़्त में उसके अस्तित्व पर सवाल बार बार उठेगा. आजकल  हाफ़िज़ सईद किसी पाकिस्तानी जेल में बंद है . ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि एफ ए टी एफ का दबाव  है कि आतंकवादी फंडिंग पर कंट्रोल करो वरना काली सूची में डाल दिए जाओगे. इसी सख्ती से बचने के लिए हाफ़िज़ सईद को जेल में डाला गया  है . लेकिन उसको जेल में भी ऐशो आराम की सारी सुविधा मिल रही है . मसूद अजहर बाहर  है और  उसने भारत के जम्मू-कशमीर में आतंक फैलाने के लिए अपनी और आई एस आई की सारी ताकत झोंक रखी है .काश भारत ने मसूद अजहर को रिहा न किया होता .

26/11 को दोहराने की पाकिस्तानी कोशिश का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए देश के मुसलमानों को साथ लेना बहुत ज़रूरी है .



शेष नारायण सिंह 

 

 

 इस बात में कोई दो राय नहीं है कि   पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र है . उसकी सारी संस्थाएं तबाह हो चुकी हैं ,नीति निर्धारण का सारा काम फ़ौज की एक शाखा ,आई एस आई के हवाले कर दिया गया  है .आई एस आई  के पास  इतना फ़ौजी साजो-सामान नहीं है कि वह सैनिक तरीके से किसी देश को अर्दब में ले सके . उस कमी को पूरा करने के लिए पाकिस्तानी डीप स्टेट ने धार्मिक  तरीकों के  सहारे पड़ोसी देश की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश शुरू कर दिया है . आई एस आई ने धर्म के नाम पर आतंक फ़ैलाने वालों के कई गिरोह बना रखे  हैं . उनमें से जैशे मुहम्मद और लश्करे तय्यबा प्रमुख हैं . यह दोनों ही संगठन संयुक्त राष्ट्र और स्वयं पाकिस्तान सहित कई  देशों की उस सूची में दर्ज  हैं जहां वैश्विक आतंकवादी  संगठनों का नाम  है . लेकिन इन्हीं संगठनों के सहारे वह भारत में अक्सर आतंकवादी हमले करता रहता है . जैश-ए-मुहम्मद  का सरगना मसूद अज़हर और लश्करे तय्यबा का करता धरता हाफ़िज़ सईद है .. जब पाकिस्तान मजबूरी वश इनके संगठनों को कागजी तौर पर प्रतिबंधित कर देता  है तो अपने आतंक के  तामझाम का ए  लोग कोई और नाम रख लेते हैं लेकिन धंधा वही चलता रहता है . आतंक के इसी सरंजाम के  अगुवा हाफ़िज़ सईद ने २६ नवम्बर २००८ को मुंबई के कई ठिकानों पर आत्मघाती हमले करवाए थे .उसी तारीख को हर साल कुछ न कुछ करने की पाकिस्तानी फौज की कोशिश को भारतीय सुरक्षा तंत्र अच्छी तरह जानता है . इस बार भी ऐसी कोशिश होने वाली थी . उसके लिए उसी तैयारी के साथ आत्मघाती दस्ता भेजा गया था लेकिन चौकन्ना सुरक्षा तंत्र ने उन आत्मघाती आतंकियों को नगरोटा में मार गिराया . हो सकता है कि इस तरह के और भी मोड्यूल कहीं और  हों लेकिन यह सच है कि  पाकिस्तान के फ़ौजी तंत्र को यह आभास देना  होता है कि वह भारत को अपने दबाव में रख रहा  है जिसके बाद उसके भारत में सक्रिय लोगों का मनोबल बढ़ा रहे .

पाकिस्तान के सत्ता  प्रतिष्ठान के पास ऐसे बहुत सारे  तरीके हैं जिससे वह भारत में अशांति का माहौल बनाने की कोशिश करता है . भारत के बेरोजगार अशिक्षित और गरीब मुसलमानों के लड़कों को धार्मिक रूप से खूंखार बनाने की कोशिश भी एक  तरीका है . देवबंद और उसके सहयोगी धार्मिक संगठन तबलीगी जमात के लोग ग्रामीण क्षेत्रों में मुसलमानों के घर जाकर उनको याद दिलाते हैं कि मुसलमानों ने ११९२ की तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को तलवार के बल पर  हराया था और मुस्लिम सत्ता कायम कर दी थी . १८५७ तक इस देश में मुसलमानों का  राज रहा . वे बताते  हैं कि जब करीब साढ़े छः सौ साल बाद १८५७ में अंग्रेजों ने दिल्ली के  मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार करके  म्यांमार में क़ैद कर लिया  तब इस देश से मुस्लिम शासन हटा . वे यह भी बताते हैं कि १९४७ में अंग्रेजों को सत्ता मुसलमानों को ही वापस देनी चाहिए थी क्योंकि उन्होंने जिससे सत्ता छीनी थी उसी को वापस करना चाहिए लेकिन उन्होंने मुसलमानों के संगठन मुस्लिम लीग और उनके नेता जिन्नाह को भारत का पूरा भूभाग न देकर केवल पाकिस्तान देकर  टरका दिया . ग्रामीण क्षेत्रों में घूम रहे यह कठमुल्ले उन लड़कों को बताते हैं कि उनके बुजुर्गों ने पूरे भारत को इस्लामी देश बनाने का जो काम अधूरा छोड़ दिया था ,उसको पूरा करने का ज़िम्मा अपने उन बेकार नौजवानों के कन्धों पर है . इस बार की अपने गाँव की यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पूरब के  तीन चार जिलों में जाने का अवसर मिला . वहां एक अजीब परिवर्तन देखने को मिला .वहां हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो परंपरागत बोलचाल की संस्कृति थी ,वह विलुप्त हो रही है . यह  बात मामूली तौर पर गौर करने पर भी दिख जाती है ,. साफ़ देखा जा सकता  है कि  गाँवों में मुस्लिम आइडेंटिटी को रेखांकित करने के बारे में बड़ा अभियान चल  रहा  है . गरीब से गरीब मुसलमान के घर पर भी एक झंडा लगा हुआ है जिसको वे लोग इस्लामी झंडा कहते हैं .इस झंडे में अरबी में कुछ लिखा हुआ है . साटन के कपडे पर बने यह  झंडे खासे महंगे हैं . जिन मुस्लिम परिवारों से मैंने बात की उनको उन झंडों की कीमत के बारे में कोई पता नहीं है . कुछ परिवारों में तो रोटी पानी का इंतजाम करने के लिए खासी जद्दो जहद करनी पड़ती  है लेकिन महँगा झंडा उनकी झोपडी पर लगा  हुआ है . कुछ झोपड़ियों  पर तो एक से अधिक झंडे लगे  हैं .भरोसे में लेने पर उनसे यह पता लगता  है कि  जान पहचान के  किसी आदमी के कहने पर वह झंडा लगा   हुआ है ,वह झंडा वही दे गया था . जब थोडा कुरेद कर बातचीत की जाए तो परतें खुलना शुरू हो जाती हैं . उनके  गिले शिकवे अजीब हैं . एक ने तो कहा कि इस देश में हमारी ही हुकूमत थी . अंग्रेजों को धोखा देकर गांधी जी ने हमारी  हुकूमत को  हिन्दुओं को दिलवा दिया . हिन्दुओं ने हिन्दू गरीबों के लिए  नौकरी में आरक्षण कर दिया और मुसलमानों को गरीबी में झोंक दिया  .इन्हीं भावानाओं की बुनियाद पर बहुत बड़े पैमाने पर मुसलमानों के  बीच भारत की सरकार और भारतीय नेताओं के प्रति नफरत के भाव पैदा किये जा रहे हैं.

सरकार को और समाज को समझना चाहिए कि पाकिस्तानी आई एस आई और वहां का कठमुल्ला तंत्र इन्हीं निराश , फटेहाल और गरीब नौजवानों में अपने बन्दे फिट कर रहा होता  है . किसी भी सामाजिक संगठन या सरकारी संगठन के राडार पर असंतोष के इस अंडर करेंट को समझने की कोशिश होती नहीं दिख रही है . मुसलमान नौजवानों को भारत के खिलाफ करने का जो धार्मिक प्रोजेक्ट चल  रहा है उसमें  ही नए जेहादी तलाशे जा रहे हैं लेकिन सरकारें बिलकुल बेखबर हैं . लव जेहाद के नाम पर ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रहे आर एस एस के संगठन भी इस समस्या से अनजान दिखते हैं. सही बात यह  है कि अगर समाज के इस बड़े वर्ग की  चिंताओं को सरकारी तौर पर ध्यान दिया जाय तो भारत के सभी मुसलमानों को भारत के खिलाफ करने की पाकिस्तान की  कोशिश को रोका जा सकता है . अगर इस प्रवृत्ति को न रोका गया तो  पाकिस्तानी आई एस आई और उनके आतंक की खेती करने वाले गिरोहों के सरगना मसूद अज़हर और  हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों को हिन्दुस्तान में वारदात करने के लिए पाकिस्तान से आतंकवादी भेजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. भारत में जिन वर्गों को वे भारत के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर   रहे हैं ,वे ही भारत के खिलाफ खड़े हो जायेंगें . यह स्थिति कश्मीर में धीरे धीरे विकसित हुयी  है . जिन कश्मीरियों ने भारत में विलय को   कश्मीर की आजादी  माना था ,उन्हीं कश्मीरियों की तीसरी पीढी के लोग आज भारत से अलग होने की बात कर रहे हैं.  भारत के कश्मीरी नौजवान आज पाकिस्तानी आतंकियों मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद के संगठनों के कमांडर बन  रहे हैं . इसलिए सरकार को  चाहिए कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में भारतीय राष्ट्र और समाज से अलग थलग पड़े रहे मुस्लिम  परिवारों की समस्याओं को समझें और पाकिस्तानी आतंकवादियों के मंसूबों को नाकाम करें .क्योंकि एक देश के रूप में 26/11 के गुनाहगार को हमें कभी नहीं  भूलना चाहिए