Monday, September 18, 2017

राहुल गांधी ने खुद को अहंकारी बताकर बीजेपी को चिंतित कर दिया .



शेष नारायण सिंह

अमरीका के बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में दिया गया राहुल गांधी का भाषण अमरीका  में तो बहुत  चर्चा में नहीं आया  होगा  लेकिन अपने देश में सत्ताधारी पार्टी का ध्यान खींचने में सफल रहा है .  भारतीय समय के अनुसार सुबह सात बजे राहुल गांधी ने बोलना शुरू किया . ज़ाहिर है एकाध घंटे तो सवाल जवाब आदि में बीत ही गया होगा . और भारत की सत्ताधारी पार्टी ने उसको नोटिस किया और १२ बजे बीजेपी की बहुत ही  सशक्त प्रवक्ता रह चुकी स्मृति इरानी राहुल गांधी के भाषण पर बीजेपी मुख्यालय में टिप्पणी कर रही थीं. उसके बाद भी बीजेपी वालों ने राहुल गांधी को हलके में नहीं लिया .अगले दिन भी कई मंत्रियों ने राहुल गांधी के बर्कले संवाद की खिल्लियाँ उड़ाईं . बीजेपी में आम तौर पर राहुल गांधी  गंभीरता से नहीं लिया जाता है . वैसे आडवानी युग में भी ऐसा हुआ था .  बीजेपी के बड़े नेता सोनिया  गांधी को भी गंभीरता से नहीं लेते थे. अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी सोनिया गांधी की  किसी बात पर टिप्पणी नहीं करते थे. सुषमा स्वराज और उमा भारती को ही सोनिया  गांधी को जवाब देने का ज़िम्मा दिया जाता था .  जब २००४ में सोनिया  गांधी के प्रधानमंत्री   बनने की सम्भावना साफ़  नज़र आने लगी तो उनको रोकने के लिए सुषमा स्वराज ने सिर मुंडवाने की योजना बना  ली थी . १९९८ में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद जब सोनिया गांधी कर्णाटक के बेल्लारी से लोकसभा का चुनाव लड़ने गयीं तो  उनके खिलाफ बीजेपी ने सुषमा स्वराज को ही उतारा था२००४  तक सोनिया  को औकात बताने का काम सुषमा स्वराज ही करती थीं.लेकिन २००४ में जब उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को बेदखल कर दिया तो बीजेपी को लगा  कि खेल बदल गया है . राहुल गांधी को भी इसी तरह से हलके में लिया जा रहा था ,लेकिन बर्कले वाले भाषण के बाद नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में  उनको गंभीरता से लेने की हवा साफ़  महसूस की जा सकती है .

राहुल गांधी के भाषण में मौजूदा सरकार और  प्रधानमंत्री मोदी के बारे में बहुत सी पाजिटिव बातें भी कही गयीं . राहुल गांधी ने कहा कि हमारे देश के आई   आई टी से पढ़कर निकले लोग दुनिया भर में टेक्नालोजी के लीडर हैं .. कैलिफोर्निया में ही  सिलिकान वैली है  . राहुल गांधी ने कहा कि वहां भी आई आई टी वालों का बहुत ही सम्मानजनक स्थान है . उन्होंने कहा की हमें गर्व  है कि हमने करोड़ों लोगों को गरीबी की मुसीबत से बाहर निकाला है . दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई भी लोकतांत्रिक  देश नहीं है जिसने इतने कम समय में इतने ज्यादा लोगों  को गरीबी से बाहर निकाला हो. इतिहास में पहली बार ऐसा नज़र आ रहा है कि भारत गरीबी को हमेशा के लिए ख़त्म कर देगा और अगर हम  ऐसा कर सके तो मानवता को भारत पर गर्व होगा . उन्होंने कहा कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को क्रांतिकारी बदलाव ,की दिशा में डाल दिया   गया  है. हमारे यहाँ जितने मोतियाबिंद और हृदय के आपरेशन होते हैं उतने दुनिया भर में कहीं नहीं होते . हमारे पास जानकारी का जो ज़खीरा है उससे पूरी दुनिया को लाभ मिलेगा . हमारी आबादी में जो विविधता है उसके ज़रिये हम हर तरह के डी एन ए की विविधता का अध्ययन कर रहे हैं .जो इक्कीसवीं सदी की बीमारियों को खत्म करने में बहुत काम आयेगा .भारत एक ऐसे  रस्ते पर चल पड़ा है जहां असफल होने का विकल्प नहीं है उसको हर हाल में सफल होना  है. भारत , अपने एक सौ तीस करोड़ लोगों को दुनिया की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश कर रहा  है. यह काम  बहुत ही शान्ति प्रिय तरीके से किया जा रहा  है  क्योंकि अगर यह प्रक्रिया टूट गयी तो बहुत बुरा होगा. भाषण का यह अंश सुनकर लग रहा  था कि राहुल गांधी भारतउसकी सरकार और उसके प्रधानमंत्री की तारीफ़ के पुल   बांधे जा रहे हैं  .
लेकिन भाषण शुरू होने के करीब दस मिनट  बाद उन्होंने ऐलान किया कि अब तक वे पाजिटिव बातें कर रहे थे ,अब नेगेटिव शुरू करेंगे . और वहीं से बीजेपी वालों  को गुस्सा लगना शुरू हो गया . उन्होंने  कहा कि हमारी विकास की रफ़्तार  को नकारात्मक उर्जा बर्बाद कर सकती है . नफ़रत,क्रोधहिंसा  और ध्रुवीकरण की राजनीति भारत में आज नज़र आने लगे  हैं . हिंसा और नफरत  लोगों को सही दिशा में काम नहीं करने दे रहे  हैं.  उदार पत्रकार मारे जा रहे हैं दलित और मुसलमान मारे जा रहे हैं अगर किसी के बारे में यह शक हो गया कि उसने बीफ खा लिया है तो उसकी भी खैर   नहीं है .  राहुल ने जोर देकर कहा कि यह सब भारत का बहुत नुक्सान कर रहा है . सरकार की नोटबंदी की नीति ने अर्थव्यवस्था का  भारी नुक्सान किया है .जीडीपी में दो प्रतिशत का नुक्सान हो गया है . इसी तरह की बातें बीजेपी को नागवार  गुज़री हैं .
राहुल गांधी  का भाषण पहले से तैयार किया गया रहा  होगा , लेकिन सवालों के जवाब में जो बातें उन्होंने कहीं वह उनकी राजनीति और भारत की स्थिति के बारे में उनके दृष्टिकोण को प्रमुखता से रेखांकित करती हैं  . बातचीत में राहुल गांधी ने जो बातें कहीं वे बीजेपी के नेतृत्व के लिए अनुचित जान पडीं. भारत की विदेशनीति के बारे में उन्होंने कहा कि यू पी  ए की डिजाइन ऐसी थी जिसमें  रूस, इरान, चीन आदि पड़ोसी देशों से अच्छे  सम्बन्ध बनाने की बात थी लेकिन मौजूदा  बैलेंस भारत को कमज़ोर कर सकता है .शायद उनका इशारा अमरीका और इजरायल से बढ़ रही दोस्ती की तरफ था  . प्रधानमंत्री  मोदी की   भाषण  देने की योग्यता की राहुल गांधी ने तारीफ़ की लेकिन साथ ही उन पर हमला भी कर  दिया . उन्होंने कहा कि " नरेंद्र मोदी मेरे प्रधानमंत्री हैं , वे भाषण अच्छा देते हैं लेकिन लोगों से बात नहीं करते . मैंने संसद सदस्यों से सुना है कि वे अपने लोगों से भी संवाद नहीं स्थापित करते ."  राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि कश्मीर में सरकार बनाने के लिए पीडीपी से  समझौता करके देश ने बहुत बड़ी रणनीतिक कीमत चुकाई और और वह राष्ट्र का नुक्सान है . उन्होंने दावा किया कि २०१३ तक उनकी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ दी थी , यह काम पंचायती राज चुनाव, माहिलाओं के आत्म सहायता संगठनों और राज्य के नौजवानों को रोज़गार देकर  किया गया था . २००४ में जब हमारी सरकार आई तो कश्मीर में आतंकवाद का बोलबाला था और जब हमारी पार्टी ने सत्ता छोडी तो वहां शान्ति थी .  राहुल गांधी की इस बात ने दिल्ली के सत्ता के केन्द्रों में ज़बरदस्त असर डाला है और  शायद इसलिए जम्मू-कश्मीर के नेता और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री  जितेन्द्र सिंह ने नाराजगी जताई है .पीडीपी से समझौते के मुख्य सूत्रधार बीजेपी महासचिव राम माधव ने भी राहुल गांधी के कश्मीर वाले बयान की कठोर आलोचना की है . एक सवाल के जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि हमारी पार्टी में २०१२ में बहुत ही अहंकार आ गया और हमने लोगों से बातचीत  करना बंद कर दिया . पार्टी का संगठन बहुत ही महत्वपूर्ण है और हमने दंभ के कारण उसको नज़रंदाज़ किया . राहुल गांधी की यह बात उनके कैलीफ़ोर्निया  संवाद को बहुत ही अहम बना देती है . दिल्ली के  हर राजनीतिक विश्लेषक को मालूम था कि कांग्रेस  का नेतृत्व , खासकर राहुल गांधी और उनके आसपास मौजूद लोग बहुत ही दम्भी हो  गए थे और पार्टी के आम कार्यकर्ता  से तो संवाद की  स्थिति बहुत पहले ही ख़त्म हो गयी  थी, २०१२ के बाद पार्टी के बड़े नेता भी याचक की तरह पेश किये जाने लगे थे. . उनकी बात को सुनकर बिना कोई जवाब दिए आगे बढ़ जाना राहुल गांधी की शख्सियत का हिस्सा बन गया था  . इसी  का एक प्रमुख उदाहरण दिल्ली के प्रेस क्लब में मनमोहन सरकार के एक बिल को फाड़कर फेंक देना  भी शामिल है. बिल फाड़ने के वक़्त उनके साथ दिल्ली के कांग्रेस नेता अजय माकन मौजूद थे . अजय माकन उस वक़्त मीडिया के इंचार्ज थे. श्री माकन को मीडिया का इंचार्ज बनाना भी  राहुल गांधी के अहंकार का एक नमूना था .  जयपुर चिंतन शिविर  के पहले कांग्रेस  ने तय किया था कि कांग्रेस पार्टी   मीडिया के ज़रिये  जनता  से संवाद का एक वैज्ञानिक तरीका अपनायेगी . जयपुर चिंतन शिविर में मूल रूप से पांच विषयों पर चर्चा की योजना थी . यह विषय बहुत पहले तय कर दिए गए थे।  इन विषयों पर पार्टी के  शीर्ष नेताओं और कुछ नौजवान नेताओं के बीच में गहन चर्चा  भी हो चुकी थी   जो पांच विषय चुने  गए हैं उनमें सामाजिक आर्थिक चुनौतियांसंगठन को ठीक करनाराजनीतिक प्रस्ताव विदेश नीति से संबंधित ग्रुप और महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दे थे.  जयपुर की चर्चा के आधार पर आगामी  कार्यक्रम बनाया जाना था . २०१४ के  लोकसभा चुनाव  का मैनिफेस्टो भी जयपुर चिंतन के आधार पर ही बनाने की बात थी .. हर विषय की कमेटी थी और सोनिया गांधी की  सलाह से  सब कार्य हो रहा था. उम्मीद की जा रही थी कि मीडिया से अच्छे सम्बन्धों के लिए चर्चित  एक बड़े नेता को मीडिया का इंचार्ज बनाया जायेगा क्योंकि उन्होंने कई महीने तक सभी सभी पक्षों से बात करके एक योजना बनाई थी . जयपुर से रिपोर्ट कर रहे हम जैसे पत्रकारों को सब मालूम था लेकिन जब मीडिया इंचार्ज की घोषणा हुई तो अजय माकन का नाम घोषित कर दिया गया .  श्री माकन का राजनीतिक कैरियर दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास परवान चढ़ा है. यूनिवर्सिटी बीट के रिपोर्टरों से उनके बहुत अच्छे  सम्बन्ध हैं लेकिन  राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार उनको अच्छी तरह नहीं जानते . नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस और मीडिया के बीच भारी  डिस्कनेक्ट हो गया और कांग्रेस ने जो अच्छे काम भी किये वह जनता  तक नहीं पंहुच सके . जयपुर चिंतन की चर्चा चल ही रही थी कि बीजेपी के गोवा  अधिवेशन में बीजेपी के तत्कालीन  अध्यक्ष राजनाथ सिंह  ने नरेंद्र मोदी को बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया . उसके बाद तो बीजेपी ने मीडिया में हर स्तर पर अभियान शुरू कर दिया . उसके जवाब में कांग्रेस पार्टी की एक ब्रीफिंग  होती थी जिसमें अजय माकन से भी जूनियर कोई नेता  होता था जबकि बीजेपी की तरफ से  रविशंकर प्रसाद के नेतृत्व में  पार्टी के  बड़े  नेता मीडिया से मुखातिब   होते  थे, और   सूचना  पंहुचा सकने के मामले  में बीजेपी बहुत आगे निकल गयी.
यह केवल एक उदाहरण है . ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिसमें राहुल गान्धी का दंभ आड़े आया  और उनकी पार्टी पिछड़ती गयी. तात्पर्य यह है कि कैलिफोर्निया में राहुल गांधी ने अपनी भी कमजोरियों को जिस बेबाकी से स्वीकार किया  वह उनकी पार्टी के लिए खुशखबरी हो सकती है . जो बातें  उन्होंने स्वीकार कीं वह उनकी पार्टी के हर नेता को मालूम है लेकिन किसी की बोलने  की हिम्मत नहीं थी. अब जब उन्होंने खुद ही स्वीकार कर लिया है तो इसका मतलब यह है कि वे उसको ठीक करने की कोशिश करेंगे. लगता है कि बीजेपी की  चिंता का कारण यह भी  है कि अगर कांग्रेस ने अपने आपको ठीक कर लिया और नोटबंदी, बेरोजगारी, जी एस टी  आदि के मोर्चों पैर मौजूदा सरकार की कमियों को जनता तक पंहुचा दिया तो  कहीं मौजूदा सरकार का भी वही हश्र न हो जो शाइनिंग इण्डिया वाली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का  हुआ था .

Monday, September 11, 2017

भयानक बीमारी के एक साल बाद, बिलकुल निजी बात

शेष नारायण सिंह 


आज सुबह से मन बेचैन है . ठीक एक साल पहले ११ सितम्बर २०१६ के दिन ही मेरे बच्चे मुझे ग्रेटर नोयडा के एक कसाई अस्पताल से निकाल कर वंसत कुञ्ज, नई दिल्ली  के Institute of Lever and Biliary Sciences  लेकर गए थे . ३१ अगस्त को मुझे बुखार हो गया था . पड़ोस के एक नामी अस्पताल में दाखिल हो गया . दो दिन बाद ही वहां से छुट्टी मिल गयी . बाद में पता चला कि मुहे चिकनगुनिया था लेकिन उस अस्पताल  के डाक्टर ने वाइरल बुखार  बताकर , अच्छा पैसा लेकर मुझे विदा कर दिया . घर आया तो हालत फिर बिगड़ गयी . एक दूसरे अस्पताल में भर्ती हो गया . चिकनगुनिया की पहचान हो गयी लेकिन इलाज में भारी  लापरवाही शुरू हो गयी. हालत बिगडती गयी . उसके बाद तो पूरे परिवार पर मुसीबतों की बयार बहने लगी. मेरी बड़ी बेटी दिल्ली के अपने घर से अपने सास ससुर और पति के साथ मुझे देखने आ रही थी. कार का एक्सीडेंट हो गया . उसके ससुर जी के हाथ में बड़ा फ्रैक्चर हो गया . वह भी उसी अस्पताल में  भर्ती  हो गए.   जो भी मुझे देखने आता था उसका चेहरा देख कर मुझे शक होने लगा कि मेरी हालत  ठीक  नहीं है .मेरी बेटी  ने अपने भाई को मुंबई में बता दिया कि पापा बहुत बीमार हैं. बेटा अपनी बहू के साथ आ गया . बहू का बहनोई भी मुझे देखने आया था  . उसने भी उन लोगों को फोन पर बिगड़ते हालात की जानकारी दे दी थी. मेरी बहू ने मुझे  देखते ही इस अस्पताल से हटाने की जिद पकड़ ली. लेकिन मैं किसी अपोलो टाइप अस्पताल में जाने को  तैयार नहीं था . इस कसाई अस्पताल वाले इतने गैरज़िम्मेदार थे कि मेरे विजिटर्स को बताना शुरू कर चुके थे कि इनको सेप्टोसेमिया का शक है लेकिन मेरे बच्चों को  नहीं बता रहे थे . मेरी  दूर की एक बहन के पति ने मेरी सेवा के लिए  दो कर्मचारी तैनात कर दिया था . जब उनको पता चला कि मेरी हालत बिगडती जा रही  है तो उन्होंने मुझसे धीरे से कहा कि 'भाई साहब बच्चों की बात मान लीजिये '. इसी बीच मेरे एक बहुत बड़े नेता मित्र का फोन आया . उनको मैं बता नहीं पा रहा था  . फिर मेरे बेटे से उनकी बात हुयी और उन्होने फ़ौरन इंतज़ाम कर दिया. वसंत कुञ्ज वाले अस्पताल के निदेशक डाक्टर एस के सरीन उनके मित्र थे . रविवार का दिन था लेकिन जाते  ही भर्ती हो गयी .  फिर इलाज़ शुरू   हो गया . तीन दिन बाद डॉ सरीन ने कहा  कि अब आप खतरे से बाहर हैं . तब मुझे अंदाज़ लगा कि  मैं खतरे  में था, मेरी हालत बहुत खराब थी .  मेरी छोटी बेटी अपनी नौकरी की परवाह किये बिना  बंगलोर से आ गयी . मेरे भाई  और बहन गाँव से आ गए. मुझसे  छः साल छोटा मेरा भाई  बस जम गया . मेरे और अपनी भाभी के साथ हमेशा खड़ा  रहा. मेरी बहन ने सारा ज़िम्मा उठा लिया . मेरी छोटी बेटी ने अपने छोटे बेटे को अपनी बड़ी बहन के यहाँ दिन में छोड़कर लगभग पूरा समय अस्पताल में बिताया . बड़ी   बेटी के परिवार ने पूरा साथ दिया . मेरी बहू ने इलाज़ और बीमारी का हर स्तर पर मूल्यांकन किया  . ग्रेटर नोयडा के अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही के चलते   बीमारी बहुत बिगड़ गयी थी . सोडियम, किडनी, लिवर , यू टी  आई आदि   भांति भांति की बीमारियाँ हो गयी थीं.  पाँव और कमर की मांशपेशियाँ शिथिल हो गयी थीं, उठकर बैठ पाना असंभव हो गया था. सैकड़ों टेस्ट हुए. डॉ सरीन सब कुछ रूल आउट कर देना चाहते थे . मेरी छोटी बेटी इस बीमारी में मेरी मां बन गयी, बड़ी बेटी सब की गार्जियन बन गयी. हर शुक्रवार को मेरा बेटा मुंबई से दिल्ली आता  रहा  और मेरी बहू इसी बीमारी  में  तीसरी  बेटी बन गयी. सब कुछ रूल आउट करने के चक्कर में डॉ सरीन और डॉ  सुमन लता मेरी रीढ़ की  बायोप्सी  कराना चाहते थे. मेरे बच्चों के बीच  मतभेद हो गया और काफी विवाद  हो गया . शुरू में  मैने भी मना कर दिया था लेकिन डॉ सरीन के आग्रह के बाद वह  भी हो गया . उन्होंने कैंसर और टीबी के भी सारे टेस्ट करवा लिए  और रूल आउट किया . मैं ठीक होकर आ गया .  तीन महीने घर पर रहकर फिजियोथिरेपी करवाई तब चलना फिरना  शुरू हुआ. इस बीच चिंता  रहती थी  कि  जहां काम कर रहा था , वहां कोई  नुक्सान न हो जाए लेकिन देशबंधु और टीवी 18 के अधिकारियों ने  लगातार भरोसा दिलाया कि आप स्वास्थ्य ठीक करिए , सब ठीक हो जाएगा . मेरे खाते में नियमित रूप से  मेरा वेतन आता रहा .
आज एक साल बाद उन घटनाओं को याद करता हूँ तो डर लग जाता है. इस बीमारी के  दौरान  मैंने  सब के चेहरे देखे और मुझे साफ़ लगता था कि  वे लोग  घबडाए हुए थे लेकिन मेरी पत्नी  चौबीसों घंटे अस्पताल में मेरे साथ रहते हुए  कहती रहीं कि सब ठीक  हो जाएगा . आज जो यह ज़िंदगी है यह इन्हीं लोगों की है जिन्होंने इसको बचाया . इंदु , पप्पू, गुड्डी,  टीनीचा, बुलबुल, लालन ,सूबेदार, मुन्नी आज एक साल बाद मन कह रहा है कि तुम सबको एक साथ बैठाकर देखूं . तुम लोगों  ने मुझे बचाया .  वरना आज मैं न होता 

Sunday, September 10, 2017

गौरी लंकेश की शहादत ने पत्रकारिता के लिए बहुत सारे सवाल छोड़े हैं .



शेष नारायण सिंह

कर्नाटक की राजधानी बंगलूरू में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गयी . ज़ाहिर है उनके  दुश्मनों ने उनको मार डाला.  कौन   हो सकते हैं यह दुश्मन ? कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तुरंत आरोप लगा दिया कि आर एस एस और बीजेपी वालों का हाथ हो सकता  है . इस बात में दो राय नहीं  है कि गौरी लंकेश  बीजेपी और  दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ खूब लिखती थीं . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी खूब लिखती थीं लेकिन इसका मतलब यह कत्तई नहीं है कि प्रधानमंत्री की पार्टी के  लोग किसी पत्रकार की हत्या कर देंगें . राहुल गांधी के बयान के बाद केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने  टिप्पणी की है कि जब राहुल गांधी ने ऐलानियाँ बीजेपी और आर एस एस पर आरोप लगा दिया  है तो उनकी पार्टी की सरकार के लिए निष्पक्ष जांच कर पाना बहुत मुश्किल है . लिहाजा जांच किसी  निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जानी चाहिए . एक बात साफ़ हो गयी है कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद उस पर राजनीति शुरू हो गयी है . राजनीतिक रोटी सेंकने से लोगों को बाज आना चाहिए क्योंकि  अगर  जांच के बाद यह पाया गया कि  गौरी लंकेश की  हत्या उनके लेखन के कारण हुयी  है तो यह बहुत ही गंभीर  मामला है और इसका मतलब सीधे प्रेस और अभिव्यक्ति  की आज़ादी के सवाल से जुड़ जाता है . इसके अलावा उनकी हत्या के बाद  बहुत सारे सवाल एक बार फिर बहस के दायरे में आ  गए हैं .  गौरी लंकेश आर एस एस और बीजेपी के विचारों की धुर विरोधी थीं उसके खिलाफ खूब जमकर लिखती थीं. उनकी हत्या के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गयी है कि आर एस एस के लोगों ने ही उनकी हत्या की है एक दूसरा वर्ग भी है जो उनकी हत्या के लिए वामपंथी विचारों के टकराव को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है . इस वर्ग में लोग उनके भाई को भी शामिल कर रहे  हैं. इसी वर्ग से यह बात भी कही जा रही है कि कर्नाटक के पड़ोसी राज्य केरल में  आर एस एस के कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर राजनीतिक हत्या  हो रही है और उस पर भी रोक लगाई जानी चाहिए. आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह हत्याएं बाएं बाजू की राजनीति  के लोग ही कर रहे हैं . गौरी लंकेश को न्याय मिले इसके लिए ज़रूरी है कि अभी किसी को ज़िम्मेदार ठहराने की जल्दी  नहीं की जानी चाहिए  क्योंकि उस से जांच के काम में बाधा पड़ सकती  है.

अपने देश में प्रेस की आज़ादी की  व्यवस्था  संविधान में ही निहित ही . संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता की व्यवस्था दी गयी हैप्रेस की आज़ादी उसी से निकलती  है . इस आज़ादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है . १९५० के  बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य  और १९६२ के सकाळ पेपर्स  प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसलों में  प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मौलिक अधिकार के  श्रेणी में रख दिया  गया है . प्रेस की यह आज़ादी निर्बाध ( अब्सोल्युट ) नहीं है . संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 19(2) में ही उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं.  संविधान में लिखा है  कि  अभिव्यक्ति की आज़ादी के "अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडताराज्य की सुरक्षाविदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधोंलोक व्यवस्थाशिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमानमानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी"  यानी प्रेस की आज़ादी तो मौलिक अधिकारों के तहत कुछ भी लिखने की आज़ादी  नहीं है . शायद  संविधान के अनुच्छेद १९ (२)  के उन्लंघन के आरोप में ही  गौरी  लंकेश को मानहानि के एक मुक़दमे में सजा भी हो चुकी है और मामला  ऊंची अदालत में अपील में लंबित है.

लेकिन इसके साथ ही  और भी सवाल  उठ रहे  हैं  कि यदि किसी के लेखन से किसी को एतराज़ है और वह मानता है पत्रकार ने 19(2) का उन्लंघन किया  है तो क्या उसको मार डालना  सही है ? . इस तर्क की परिणति बहुत ही खतरनाक है और इसी तर्क से लोकशाही को ख़तरा  है . गौरी लंकेश की हत्या के बाद उनके पुराने लेखों का ज़िक्र किया जा  रहा है जिसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी थीं जो एक वर्ग को स्वीकार नहीं हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय यह वर्ग उनके चरित्र हनन का प्रयास भी कर रहा है और जो कुछ भी उस वर्ग से आ रहा है उसका सन्देश यह है कि गौरी की  हत्या ज़रूरी था और जो हुआ वह ठीक ही हुआ.  आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की प्रवृत्तियों की निंदा की जाये .निंदा हो भी  रही है.  गौरी लंकेश की हत्या के अगले ही दिन देश भर में पत्रकारों ने सभाएं कीं , जूलूस निकाले  , सरकारों से हत्या  जांच की मांग की और तय किया कि मीडिया को निडर रहना है . दिल्ली के  प्रेस क्लब में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग सभी बड़े पत्रकार शामिल हुए और गौरी लंकेश की ह्त्या करने वालों को फासिस्ट ताक़तों का प्रतिनिधि बताया. कोलकाता प्रेस क्लब के तत्वावधान में प्रेस क्लब से गांधी जी की मूर्ति तक एक जुलूस निकाला . मुंबई में सामाजिक कार्यकर्ता ,पत्रकारफिल्मकार ,अभिनेत्ता इकठ्ठा हुए और असहमत होने के अधिकार को लोकशाही का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बताया और  गौरी लंकेश की  हत्या को प्रेस की आज़ादी की हत्या बताया .
असुविधाजनक लेख लिखने के लिए अगर लोगों की हत्या को सही  ठहराया जाएगा तो बहुत ही मुश्किल होगी . लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही  सवालिया निशान  लग जाएगा.  इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया  गया है और उतनी ही मुश्किल इसको संवारा गया है . अगर मीडिया जनता को सही बातें और वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पंहुचाएगा तो सत्ता पक्ष के  लिए भी मुश्किल होगी. इंदिरा  गांधी ने यह गलती १९७५ में की थी. इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दिया था . सरकार के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकती थी. टीवी और रेडियो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थे , उन के पास  तक  जा सकने वालों में सभी चापलूस होते थेउनकी जयजयकार करते रहते थे इसलिए उनको  सही ख़बरों का पता  ही नहीं लगता था . उनको  बता दिया गया कि देश में उनके पक्ष में बहुत भारी माहौल है और वे दुबारा भी बहुत ही आराम से चुनाव जीत जायेंगीं .  चुनाव करवा दिया और उनकी राजनीति में १९७७ जुड़ गया  .

प्रेस की आज़ादी सत्ता पक्ष के लिए बहुत ज़रूरी है . सत्ताधारी जमातों को अगर वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं  मिलेंगे तो चापलूस नौकरशाह  और  स्वार्थी नेता  सच को ढांक कर राजा से उलटे सीधे  काम करवाते रहेंगें . भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह बात बहुत ही   अच्छी तरह  मालूम थी इसीलिए उन्होंने कहा था ," मैं पीत पत्रकारिता से नफरत करता हूँ , लेकिन आपके पीत पत्रकारिता करने के अधिकार की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करूंगा ".लोकतंत्र को अगर जनता के लिए उपयोगी बनाना है  तो सत्ताधारी जमातों  को निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता  को व्यावहारिकता के साथ लागू करने के उपाय करने होंगे .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से  यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए  कि वे वह गलतियाँ न करें जो इंदिरा गांधी  ने की थी. इंदिरा गांधी के भक्त और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रेस सेंसरशिप के दौरान नारा दिया था कि  इंदिरा इज इण्डिया ,इण्डिया इज  इंदिरा ,' इसी .तरह से जर्मनी के तानाशाह हिटलर के तानाशाह बनने के पहले उसके एक चापलूस रूडोल्फ हेस ने नारा दिया था कि  ,' जर्मनी इस हिटलर , हिटलर इज जर्मनी '.   रूडोल्फ हेस नाजी पार्टी में बड़े पद पर था .मौजूदा शासकों को इस तरह की प्रवृत्तियों से बच कर रहना चाहिए  क्योंकि मीडिया का चरित्र बहुत ही अजीब होता  है . जब इंदिरा गांधी बहुत सारे लोगों को जेलों में बंद कर रही थीं जिसमें पत्रकार भी शामिल थे तो चापलूसों और पत्रकारों का एक वर्ग किसी को भी आर एस एस या कम्युनिस्ट  पार्टी का सदस्य  बताकर गिरफ्तार करवाने की फ़िराक में रहता था . उस दौर में भी बहुत सारे पत्रकारों ने आर्थिक लाभ के लिए सत्ता की चापलूसी में चारण शैली में पत्रकारिता की . वह ख़तरा आज भी ख़तरा बना हुआ है . चारण पत्रकारिता  सत्ताधारी पार्टियों  की सबसे  बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें गलत फैसला लेती हैं . ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे  . चापलूस पत्रकारों से पिंड छुडाये . इसके संकेत दिखने लगे हैं . एक आफ द रिकार्ड बातचीत में बीजेपी के मीडिया से जुड़े एक नेता ने बताया कि जो पत्रकार टीवी पर हमारे पक्ष में नारे लगाते रहते है वे उनकी पार्टी का बहुत नुक्सान करते हैं . भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में इस तरह की सोच एक  अच्छा संकेत है . गौरी लंकेश की हत्या की जांच पर अगर सच को  ढंकने की कोशिश करने वालों से बचा लिया गया तो यह देश की  पत्रकारिता  के लिए बहुत  ही अच्छा होगा  .  सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के  अधिकार और आज़ादी को सुनिश्चित करे . साथ ही संविधान के अनुच्छेद १९(२) की सीमा में  रहते हुए कुछ भी लिखने की  आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे . इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा.  ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय  कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करें वालों को हतोत्साहित करे.

Sunday, September 3, 2017

हरियाणा के जन्म की कहानी, आला हाकिम की ज़ुबानी



शेष नारायण सिंह

हरियाणा के विकास में तीन लालों का बहुत अहम योगदान है . देवी लाल, बंसी लाल और  भजन लाल  ने हरियाण को जो स्वरुप दिया , उसी से  हरियाणा की पहचान बनी है .१९६६ के पहले  हरियाणा पंजाब  का हिस्सा था  और  हरियाणा में रहने वाले लोग नहीं चाहते थे कि वे पंजाब से  अलग हों. हरियाणा की स्थापना के लिए किसी ने कोशिश नहीं की थी , बल्कि हरियाणा बन जाने के बाद इस राज्य के लोगों को नया राज्य मिलने से कोई खुशी नहीं हुयी थी, बस लोगों ने नियति मानकर इसको स्वीकार कर लिया था .पंजाबी सूबे की मांग को लेकर मास्टर तारा सिंह और संत फ़तेह सिंह ने जो आन्दोलन चलाया उसी के नतीजे में उनको पंजाब का पंजाबी भाषा के बहुमत वाला इलाका  मिल गया , जो  बच गया उसी में हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बन गया .  नये राज्य की राजनीति में शुरू से ही देवी लाल का दबदबा रहा  है . शुरू  से ही हरियाणा की नई विधान सभा के हर सत्र के पहले वहां दल बदल का मौसम आ जाता था, दल बदल की स्वार्थी राजनीति के आदि पुरुष गया लाल की कथा भी बहुत दिलचस्प है. देवी लाल ने राव बीरेंद्र सिंह की सरकार को  गिराने के लिए  १९६७ में दल बदल की ललित कला का सफल प्रयोग किया था .उसी दौर में विधायक हीरा नन्द आर्य ने पांच बार दल बदला, उन दिनों के केंद्रीय गृहमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चह्वाण ने संसद में बताया कि राज्यपाल की रिपोर्ट के अनुसार दल बदल बहुत ही घटिया रूप में प्रकट हुआ था. एक विधायक की कीमत बीस हज़ार से चालीस हज़ार रूपये के बीच कुछ भी हो सकती थी. गौर करने की बात यह है कि उन दिनों के चालीस हज़ार रूपये की कीमत आज से बहुत ज्यादा होगी . १९६७ में सोना १०२ रूपये प्रति दस ग्राम था यानी चालीस हज़ार रूपये में उन दिनों करीब ३९२० ग्राम सोना खरीदा जा   सकता था . आज  इतने सोने की कीमत अगर तीस हज़ार प्रति दस ग्राम मानें तो यह रक़म एक करोड़ बीस लाख रूपये के आस पास बैठती है . हालांकि आजकल विधायकों के रेट बहुत ज्यादा हैं  लेकिन चालीस हज़ार  रूपये  १९६७ में के बहुत बड़ी रक़म मानी जाती थी . इस दौर में गया लाल ऐतिहासिक पुरुष बने थे . गया लाल ने मुख्य मंत्री राव बीरेंद्र सिंह का साथ ३० अक्टूबर, १९६७ को छोड़ा था . कुछ ही घंटों में राव बीरेंद्र  सिंह ने उनको चंडीगढ़  प्रेस के सामने पेश किया और कहा कि ," गया लाल अब आया राम हो गए हैं " लेकिन जब तक गृहमंत्री वाई बी चाहवाण संसद में  भाषण देते तब  तक  गया लाल फिर दल बदल चुके थे . गृहमंत्री ने संसद में  कहा कि " अब तो गया लाल भी गया " इसी  भाषण में उन्होंने कालजयी अभिव्यक्ति, ' आया राम ,गया  राम ' की रचना की थी . उस दौर में  दल बदल  का स्कोर भी रिकार्ड किया गया . हीरा नन्द आर्य का स्कोर सबसे अच्छा था. उन्होंने पांच बार दल बदला, दो  विधायकों ने चार बार, तीन विधायकों ने तीन बार और ३४ विधायकों ने एक बार दल बदल का कार्य किया . इन्हीं लोगों की कृपा से हरियाणा को 'आया राम , गया राम ' राजनीति का केंद्र बताया गया .
यह सारी बातें एक नई किताब में दर्ज है .इस किताब में  हरियाणा के जन्म के दौर की कहानी भी है और यह भी कि किस तरह  देश के सबसे पिछड़े राज्य को बंसी लाल के कठिन परिश्रम के कारण देश के शीर्ष राज्य का  दर्जा मिला . देवी लाल और भजन लाल के राजनीतिक उत्थान पतन की कहानी भी है .वास्तव में यह एक आई ए एस अधिकारी की अपनी कहानी है जिनको हरियाणा के अब तक के तीन सबसे महत्वपूर्ण नेताओं के साथ काम करने  का अवसर मिला है . राम वर्मा की किताब  ," Life in  the IAS  , My Encounters With the Three Lals of Haryana " इन तीनों ही नेताओं की अच्छाई बुराई को कबीरपंथी  इमानदारी से बताने की कोशिश इस किताब का निश्चित रूप से स्थाई  भाव  है. बंसीलाल के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी है. इमरजेंसी में संजय गांधी के अनुयायी के रूप में चर्चित हो चुके बंसीलाल की छवि अधिकतर लोगों की नज़र में अलग तरह की है .लेकिन जब उन्होंने सत्ता पाई थी तो एक अलग इंसान थे. तीनों लालों में केवल उन्होंने ही औपचारिक शिक्षा पाई थी. कानून की पढाई की थी , देवीलाल और भजनलाल को तो ज़िंदगी की हालात ने ही जो पढ़ा दिया ,वही शिक्षा थी उन दोनों के पास . जो भी हो हरियाणा के उतार  चढ़ाव में इन लोगों का अहम योगदान है .

तीनों  ही लालों में सबसे पहले बंसीलाल मुख्यमंत्री बने. देवीलाल अविभाजित पंजाब के नेता थे, देश के बंटवारे के  बाद जब प्रताप सिंह कैरों मुख्यमंत्री बने तो देवीलाल उनके बहुत ही करीबी थे . हरियाणा की  स्थापना के बाद वे नए राज्य के ताक़तवर नेता बन गए .  जब बी डी शर्मा और  राव बीरेंद्र सिंह के बीच मुख्यमंत्री के पद को लेकर उठापटक शुरू हुयी तो देवीलाल की अहम भूमिका थी. कभी इस  पार और कभी उस पार सक्रिय रहे . मुराद यह कि उनको मुख्यमंत्री की गद्दी तो नहीं मिली लेकिन मुख्यमंत्री बनाने  बिगाड़ने में वे बहुत सक्रिय भूमिका निभाते रहे. बंसीलाल को मुख्यमंत्री बी डी शर्मा गुट ने बनवाया था क्योंकि उनको उम्मीद थी कि  बंसीलाल एक कठपुतली के रूप में रहेंगें लेकिन वक़्त ने ऐसा नहीं होने दिया . बंसीलाल ने किस तरह से  नए राज्य को सिंचाई के मामले में आत्मनिर्भर बनाया  , यह  कहानी  अच्छी तरीके से किताब में  दर्ज है . हुआ  यह कि  बंसी लाल एक बार हिमाचल प्रदेश के सुन्दर नगर में बन रहे बाँध को देखने गए थे . वहां तैनात उनको एक इंजीनियर ,के एस पाठक मिले जिन्होंने कभी अमरीका के टेनेसी वैली अथारिटी में काम किया था. बंसीलाल ने उनसे कहा कि मैं यमुना के पानी को हिसार के रेगिस्तानी और ऊंचे इलाके में ले जाना चाहता हूँ. पाठक ने कहा कि बिलकुल हो जायेगा  और साहेब काम शुरू हो गया . लिफ्ट सिंचाई की योजनायें बाद में और राज्यों में भी शुरू हुईं लेकिन बंसीलाल ने इसको अच्छी तरह से राज्य के हित में चलाया . इन्हीं लिफ्ट  सिंचाई योजनाओं के कारण ही हरियाणा के सूखे इलाकों में पानी आया .हरियाणा में हर गाँव को सड़कों से  जोड़ने  का श्रेय भी बंसीलाल को जाता है .  हरियाणा में चिड़ियों के नाम पर हर सड़क पर बने पर्यटक स्थलों का काम भी बंसीलाल के प्रमुख सचिव एस के मिश्र ने किया . एक बार मुख्यमंत्री को शिकायत मिली कि  हरित क्रान्ति का फायदा गाँवों तक नहीं पंहुच रहा है क्योंकि नियम ऐसे हैं कि  गाँव तक तार खींचने का पैसा  किसान को देना पड़ता था.  बंसीलाल ने  नियम बदल दिया और हर गाँव में बिजली पंहुचाने वाला हरियाणा देश का पहला राज्य बना  गया .
किताब में राम वर्मा की दिल को छू जाने वाली वह कहानी भी  है  कि किस तरह से वे मेडिकल कारणों से आई ए एस में चुने जाने के बावजूद रिजेक्ट होने से बाल बाल बचे . आई ए अकेडमी ,मसूरी में अपने साथियों को भी बहुत ही अपनेपन से याद किया गया है . अपने पहले बॉस एस के मिश्र के बारे में भी उनकी यादें बहुत ही मधुर हैं . अपनी शादी की कहानी भी बहुत ही दिलचस्प तरीके से बताया है लेखक ने . आजकल तो आई ए एस  के रिज़ल्ट  आते ही लोग करोडपति हो जाते हैं लेकिन अपना वाला आई ए एस सचिवालय में   डिप्टी सेक्रेटरी तैनात होने के बाद  सिटी बस से दफ्तर जाता था. उन्होंने बस में जाने के इरादे  को इसलिए बदला क्योंकि उसी बस में उनके दफ्तर के अधीनस्थ कर्मचारी भी होते थे  जो उनको देखकर असहज हो जाते थे . उन्होंने आफिस से लोन लेकर वेस्पा स्कूटर खरीदा और उस पर सवार होने पर जो अलौकिक आनंद मिला उसका भी बहुत  अच्छे गद्य में वर्णन  है . चार साल की सर्विस के बाद मुख्य सचिव की  मर्जी के खिलाफ उनको सूचना निदेशक बना दिया गया . और  फिर तो वे जीवन भर मीडिया से संपर्क में बने रहे.  बाद में मुख्य सचिव भी हुए .
अपनी बच्चियों के जन्म को जिस मुहब्बत से याद किया है वह  मार्मिक है . पहली बच्ची जब पैदा हुयी तो वे एस डी एम थे ,सब कुछ सरकारी तौर पर हो गया .  लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म के समय की जो दर्द भरी कहानी है , वह भी  मर्म  पर चोट करती  है. उनको उम्मीद थी कि अभी कुछ समय है . वे संपादकों से मिलने जालंधर जा रहे थे, लंच पर सबको बुलाया  था . पत्नी ने रोका लेकिन रुके नहीं . और जब  लौट कर आये तो पता लगा कि पी जी आई चंडीगढ़ में तुरंत भर्ती होना पड़ा और  बेटी पैदा हो गयी  है . पुस्तक  उनकी पत्नी सावित्री को समर्पित है , जिन्होंने घोंसला बनाया और बच्चियों को पाला पोसा और जब चहचहाती चिड़ियों ने घोसला छोड़कर अपना  घर बनाया तो छोड़कर चली गयीं .
हरियाणा के शुरुआती विकास की बारीकी को समझने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थी के लिए यह एक उपयोगी किताब है .    

Friday, September 1, 2017

देश में खस्ता स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना बहुत ज़रूरी है



शेष नारायण सिंह

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बहुत खराब है . गोरखपुर में बच्चे मर  रहे हैं और राजनीति करने वाले अपना काम कर रहे  हैं. पता चला है कि वहां के मेडिकल कालेज के अफसरों ने घूस की मात्रा कम होने पर नाराज़ होकर आक्सीजन सप्लाई करने वाले ठेकेदार का भुगतान रोक दिया था . उसने इन लोगों  को बार बार चिट्ठी लिखी लेकिन पैसा नहीं मिला इसलिए सप्लाई को नियमित नहीं किया गया . सरकार की भूमिका भी संदेह के  घेरे में है , उस पर चर्चा बाद में की जायेगी अभी तो डाक्टरी के पेश इसे जुडी  नैतिकता पर चर्चा करना ही ठीक रहेगा . मेडिकल नैतिकता की धज्जियां  उड़ाता एक वाकया और अखबारों में छपा है . जोधपुर में डाक्टरों ने जो कुछ किया उसके लिए उनको कड़ी से कड़ी सज़ा  दी जानी चाहिए . एक महिला उनके सामने आपरेशन की मेज़ पर पडी कराह रही थी  और डाकटर लोग आपस में लड़ रहे थे. उनकी लापरवाही से महिला की नवजात बच्ची की मृत्यु हो गयी . बाद में सरकार ने वहां भी कार्रवाई की लेकिन उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता . मरीज़ की तो जान ही चली गयी. इन दोनों  ही मामलों में डाक्टरों ने अपना काम सही तरीके से नहीं  किया वरना यह हालत नहीं होती.
सवाल यह उठता है कि इतने  अच्छे काम के लिए शिक्षा लेने के बाद यह लोग ऐसा करते क्यों हैं . इस पवित्र पेशे में प्रवेश के समय प्रत्येक डाक्टर को एक  घोषणा करनी होती  है जिसमें साफ़ साफ़ लिखा है कि मैं अपने आप को मानवता की सेवा के लिए समर्पित करता हूँ. हर खतरे का सामना करूंगी/करूंगा लेकिन मानवता के कानून के खिलाफ अपने मेडिकल ज्ञान का उपयोग कभी नहीं करूंगी/करूँगा . मैं मानव जीवन का सदैव सर्वोच्च सम्मान करूंगी /करूँगा . मेरे मरीज़ और मेरे कर्त्तव्य के बीच कभी भी धर्म, राष्ट्रीयता,जाति , राजनीति, या सामाजिक  हैसियत को नहीं आने दिया जाएगा . मैं अपना काम गरिमा के साथ निभाउंगी/निभाऊंगा. मेरे मरीज़ का  स्वास्थ्य मेरे लिए  सर्वोच्च प्राथमिकता होगा. अपने काम के दौरान मरीज़ के बारे में जो भी जानकारी या  रहस्य मुझे पता लगेंगें उनको मैं पूर्ण सम्मान दूंगी/दूंगा. मेरे शिक्षकों को मेरी तरफ से पूरा सम्मान मिलेगा . मेरी पूरी शक्ति से मेडिकल पेशे की पवित्र परम्परा और गरिमा के साथ सम्मान किया जाएगा . मैं अपने साथ काम करने वाले डाक्टरों का सम्मान करुँगी/करूँगा और उनकी गरिमा को अक्षुण रखूंगी/रखूँगा .

इस शपथ के साथ डाकटर अपना काम शुरू करते हैं और जब हम  गोरखपुर और जोधपुर के काण्ड को देखते हैं तो सर शर्म से झुक जाता है .अपने व्यक्तिगत अनुभव से  भी हर व्यक्ति कुछ न कुछ ज़रूर जानता  होगा जहां इस  मेडिकल प्रोफेशन की बुलंदियां भी होंगी तो कहीं न कहीं डाक्टरों का कमीनापन भी होगा . मेरा अपना अनुभव भी है . ठीक एक साल पहले मैं चिकनगुनिया का शिकार हुआ था. ग्रेटर नोयडा के एक नामी प्राइवेट अस्पताल में दिखाने गया तो भर्ती कर लिया गया .दो दिन के अन्दर मुझसे ज़रूरी पैसे लेकर डिस्चार्ज कर दिया गया . हालत और बिगड़ गयी तो एक  दूसरे अस्पताल में दाखिल हो गया .  सोचा था मामूली  बुखार है , तब तक चिकनगुनिया का पता   नहीं चला था . एक  हफ्ते वहाँ रहा , तो यह तो पता लग गया कि चिकनगुनिया है . उसका  इलाज शुरू हो गया लेकिन अस्पताल के डाक्टरों का रवैया अजीब था. तरह तरह के टेस्ट कर रहे थे  लेकिन उनको पता नहीं लगा कि चिकनगुनिया के चलते सोडियम, किडनी और लीवर की बीमारियाँ भी शुरू हो  रही हैं. तीन चार दिन बाद वहां के बड़े  डाक्टर ने मेरे एक दोस्त को बताया कि लगता  है  कि इनको सेप्टोसेमिया हो रहा है . यानी मेरे  शरीर की हालत बिगड़ रही थी और वे लोग लाइफ सपोर्ट सिस्टम लगा कर  बिल बढाने के काम में लग गए थे . बहरहाल जब मेरे बच्चों को पता चला तो एक राजनेता मित्र की कृपा से  मुझे वसंत कुञ्ज के लीवर संस्थान में भर्ती करा दिया गया . करीब  दो हफ्ते वहां रहा और मैंने अपनी आँखों से मेडिकल एथिक्स को देखा . जब मैं भर्ती हुआ तो मैं   वहां के  किसी डाक्टर से परिचित नहीं था , लेकिन जिस तरह से मेरी देखभाल शुरू हुयी उसके बाद मुझे पता लगा कि मेडिकल एथिक्स का पालन करने वाले डाक्टर कैसे  होते हैं . संस्थान के निदेशक डॉ एस के सरीन दुनिया के बहुत बड़े डाक्टर हैं .उनके नाम से गैस्ट्रो इंटाइटिस के इलाज का ' सरीन प्रोटोकल'  है जिसका पूरी दुनिया में प्रचलन है .  उनको दिखाने के लिए तीन महीने का इंतजार करना पड़ता है लेकिन मुझे  रोज़ दो बार देखने आते थे . डॉ सरीन के बारे में अब तो दन्त कथाएं प्रचलित हो गयी हैं . वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिश्र की पत्नी की बहन की हालत बहुत खराब थी . लोग उम्मीद छोड़ चुके थे . लीवर ख़त्म होने के कगार पर था , पेट में बहुत पानी भर गया था . उन्होंने डॉ सरीन से बात की तब वे जी बी पन्त अस्पताल में थे . उन्होंने स्टेशन से सीधे अस्पताल आने को कहा . जगह नहीं थी तो वहां बरामदे में ही इलाज शुरू कर दिया और वे बिलकुल स्वस्थ हो कर अपने घर गयीं. इसी तरह का मामला वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार  के भाई  का है . उनका लीवर बिल्कुल खराब था , ट्रांसप्लांट के लिए भर्ती किए गए  लेकिन डॉ सरीन ने  सरीन प्रोटोकल से इलाज किया . लीवर सही  हो गया , कोई सर्जरी नहीं हुयी . और  मरीज़ बिल्लुल स्वस्थ होकर अमरीका चला गया . बी एच यू मेडिकल कालेज के डॉ ए के सिंह की कहानी भी ऐसी ही है . वे तब तक ओ पी डी में बैठे  रहते थे जब तक सारे मरीजों को देख न लें .

मेडिकल एथिक्स में लिखा है कि अपने मरीज़ को फालतू टेस्ट या अन्य  डाक्टरों से सलाह लेने के लिए रेफर न किया लेकिन हमने लखनऊ में देखा है कि डॉ लोग हर तरह के टेस्ट की सलाह दे देते हैं क्योंकि उनके पर्चे  पर उनको कट मिलता  है .  मेरी डॉ सुमन लता ने हमेशा फालतू के टेस्ट का विरोध किया . एक बार किसी जूनियर डॉ ने एहतियातन सी टी स्कैन के लिए लिख दिया , डॉ सुमन ने साफ़ कह दिया कि कोई ज़रुरत नहीं है. मुराद यह है कि जोधपुर और गोरखपुर के बेईमान डाक्टरों की दुनिया से अलग भले डाक्टर भी हैं और बड़ी संख्या में हैं . सच्ची बात यह है कि जब आदमी बीमार होता है तो वह डाक्टर को ईश्वर के समकक्ष मान कर चलता है लेकिन रास्ते में  बैठे लुटेरे उसको कहीं का नहीं छोड़ते .अभी एक लड़के का मुंबई  से फोन आया कि उसको डाक्टर ने टीबी   बताया है और सर्जरी की सलाह दी है . उसने कहा कि बस पंद्रह हज़ार  रूपये का खर्च होगा. यानी कम खर्च बताकर मरीज़ को सर्जरी की मेज़ पर लिटा देगा और उसके बाद उससे  बाकी खर्च माँगना  शुरू करेगा . यह भी आजकल बहुत हो रहा है . इस माहौल में ज़रूरी है कि देश की जनता भी मेडिकल एथिक्स के बारे में पूरी तरह से अवगत रहे .
मेडिकल एथिक्स की कुछ बुनियादी  बातें आम आदमी को भी पता होनी चाहिए. डाक्टर के लिए हर मरीज़ को देख पाना संभव नहीं है और न ही वह लाजिम है लेकिन  हर मरीज़ या घायल इंसान की काल पर कार्रवाई  करनी चाहिए, और अपने पवित्र काम की गरिमा को बनाए रखना चाहिए . इलाज के दौरान यह बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि मरीज़ के जीवन की रक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है और मरीज़ अपने डाक्टर पर पूरा भरोसा करके वहां आया है .मेडिकल एथिक्स में साफ़ लिखा है कि अगर इमरजेंसी हो तो किसी को रेफर न करके शुरुआती इलाज अवश्य करना चाहिए . हाँ यदि किसी बीमारी के बारे में डाक्टर का अनुभव और शिक्षा उपयुक्त नहीं  है तो मरीज़ को सही सलाह देकर  उपयुक्त सन्दर्भ देकर भेजना चाहिए .ऐसी हालत में डाक्टर को मरीज़  का इलाज नहीं करना चाहिए और सही जगह रेफर करना चाहिए .  डाक्टर के व्यक्तित्व में धैर्य और शालीन आचरण पूरी तरह से समाहित होना चाहिए . अगर मरीज़ ने अपनी कुछ  कमजोरियों के बारे में डाक्टर से बताया  है तो उसको किसी भी हालात में किसी और को नहीं बताना चाहिए.  ऐसी बीमारियों के बारे में ज़रूर बताना चाहिए जो कि संभावित हों और उनके इलाज का उपाय किया जाना चाहिए . मरीज़ की बीमारी को कभी घटा या बढ़ा कर नहीं बताना चाहिए . जो भी बीमारी हो मरीज़ के दोस्तों और   रिश्तेदारों को उसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए .हालांकि डाक्टर को इस बात की आजादी है कि वह अपना मरीज़ खुद चुने या किसका इलाज करे लेकिन  इमरजेंसी में उसको हर हाल में मदद करने के लिए आगे  आना चाहिए .अपने मरीज़ के स्वास्थ्य और उसके हित के लिए डाक्टर को तत्पर रहना चाहिए.

जहां तक  डाक्टरों के कर्तव्य की बात है उसके बारे में तो मेडिकल काउन्सिल ने सारे नियमबना रखे  हैं  लेकिन देश की  जनता का  स्वास्थ्य   निश्चित रूप से सरकारों की ज़िम्मेदारी कीश्रेणी में आता है . प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही नरेंद्र मोदी ने जनता के स्वास्थ्य के बारे में अपनी  प्राथमिकता स्पष्ट कर दिया था. अक्टूबर २०१४ में मुंबई में अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि " यह शर्म की बात है  जब हम अपने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की तुलना विकसित देशों  से करते हैं.  नवजात शिशुओं और मां के स्वस्थ्य के बारे में हमारी प्रगति बहुत ही चिंता की बात है." जब बच्चों की प्राथमिकता के बारे में हम  प्रधानमंत्री की बात के बरक्स गोरखपुर में आक्सीजन की कमी और डाक्टरों के व्यवहार को देखते हैं तो साफ़ लग जाता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के जिले में प्रधानमंत्री की बात को उनके सन्देश के तीन साल बाद भी गंभीरता से नहीं लिया गया है .उसी भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि " कई बार जच्चा-बच्चा दोनों  ही  बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की कमी के कारण मर जाते हैं ." और गोरखपुर में सरकारी डाक्टरों और अस्पताल की कुव्यवस्था के कारण मरने वाले बच्चों के बारे में उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री यह कहकर सरकार को दोष मुक्त करने की कोशिश करते हैं कि अगस्त के महीने में तो बच्चे  मरते ही रहते हैं. एक तरफ देश के प्रधानमंत्री कह रहे होते हैं कि हमको सबके  जीवन का सम्मान करना चाहिए और सफाई को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिए दूसरी तरफ उनकी पार्टी के ही सदस्य मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री घोषणा करते हैं कि गोरखपुर के बच्चों की मृत्यु में अस्पताल में सफाई की कमी  भी एक कारण थी . सवाल यह  है कि जब प्रधानमंत्री से स्वच्छता को देश के मिशन के रूप में आगे बढाने की बात की है तो उनकी बात को उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों के मंत्री क्यों नहीं मानते .इसलिए स्वास्थ्य सेवा  को उसी तरह से प्राथमिकता देना होगा जैसा कि  पश्चिमी देशों  में है या क्यूबा जैसे देश  में है . प्रधानमंत्री की इच्छा का आदर करते हुए सबको इस मिशन में जुटना पड़ेगा .

Wednesday, August 30, 2017

धर्म आधारित राजनीति देश की एकता के लिए ख़तरा है.



शेष नारायण सिंह  

 सिरसा के गुरमीत राम रहीम को पंचकुला की विशेष सी बी आई अदालत ने बलात्कार का दोषी माना है. अदालत के फैसले के आने  के तुरंत बाद उसके चेलों ने  पंचकुला में  तबाही मचाने  का काम शुरू कर दिया .लूट ,हत्याआगजनी की वारदात को बेख़ौफ़ होकर अंजाम दिया .  शुरू में समझ में नहीं आया कि जब सरकार को पहले से मालूम था और हज़ारों की संख्या में बाबा के समर्थक पंचकुला में इकठ्ठा हो रहे थे ,सरकार ने बड़े पैमाने पर सुरक्षाबल की तैनाती कर रखी थीसेना की टुकड़ियां भी मौजूद थीं तो इतनी बड़ी वारदात कैसे हो गयी . लेकिन अब समझ में आ गया है कि सरकार की मिलीभगत थी. पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री को इस हालत के लिए जिम्मेवार ठहराया है. हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार के वकील बलदेवराज महाजन  को फटकार लगाई और कहा कि आप सच्चाई को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे और कोर्ट को गुमराह कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि जिस हिंसा में बड़े पैमाने पर आगजनी हुयी तोड़फोड़ हुयी ,उसके लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ज़िम्मेदार हैं . कोर्ट ने सरकारी वकील से बताया कि मुख्यमंत्री खट्टर खुद डेरा सच्चा सौदा को बचाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. . अदालत ने कहा कि प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों में बहुत बड़ा अंतर है .राजनीतिक फैसलों के कारण प्रशासन अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर सका और सरकारी व्यवस्था को
लकवा मार गया . इस सारी घटना के लिए सरकार ने पुलिस के एक डिप्टी सुपरिंटेंडेंट को मुअत्तल किया है . कोर्ट ने पूछा कि  सवाल है कि क्या वही अफसर अकेले ज़िम्मेदार था.?कोर्ट ने कहा  मुख्यमंत्री स्वयं ही गृहमंत्री भी हैं. सात दिन से पंचकुला में लोग इकट्ठा हो रहे थे और मुख्यमंत्री उनको  सुरक्षा दे रहे थे . . पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट की टिप्पणी हरियाणा सरकार की नाकामी को बहुत ही सही परिप्रेक्ष्य में रख देती  है . सवाल यह है कि स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री एक अपराधी और उसके गिरोह से इतना डरता क्यों है /? प्रधानमंत्री ने भी अपने रेडियो कार्यक्रम , ' मन की बात  ' में डेरा सच्चा सौदा का नाम लिए बिना साफ़ कहा कि कि धर्म के नाम पर हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती है . ज़ाहिर है बीजेपी में भी और सरकार में भी धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से चिंता के संकेत नज़र आने लगे हैं . प्रधानमंत्री ने कहा कि यह महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी . प्रधानमंत्री ने रेडियो कार्यक्रम में सरदार पटेल को याद किया और कहा कि सरदार ने देश की एकता के लिए पूरा जीवन ही लगा दिया .

धार्मिक सहिष्णुता और देश की एकता के हवाले से सरदार पटेल को याद करना एक महत्वपूर्ण  संकेत है . इसका सीधा मतलब यह है कि अब सरकार के सर्वोच्च स्तर पर यह बात मान ली गयी है कि धार्मिक झगडे देश की एकता के लिए चुनौती हैं . हालांकि प्रधानमंत्री ने धर्म के नाम  पर हिंसा न करने की बात कई बार कही है , लाल किले की प्राचीर से भी कही थी लेकिन  अभी तक निचले स्तर पर बीजेपी के नेता और मंत्री उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे . उनके बार बार कहने के बाद भी हिंसा की वारदातें , मुसलमानों को  गौरक्षा के बहाने मार डालने की बातें बदस्तूर चल रही थीं . लेकिन ' मन की बात ' में प्रधानमंत्री ने देश की एकता से धार्मिक आधार पर हो रही असहिष्णुता को जोड़कर एक बड़ी बात कही है . उम्मीद की जानी  चाहिए कि बीजेपी के छुटभैया नेता, राज्यों के मुख्यमंत्री , सरकारी तंत्र और अफसर प्रधानमंत्री की बातों को गंभीरता से लेंगें और देश की एकता और सरदार पटेल के मिशन को ध्यान में रखते  हुए  धार्मिक हिंसा पर फ़ौरन से पेशतर लगाम लगायेंगें .
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की एकता के लिए ज़रूरी धार्मिक  सहिष्णुता की जो बात कही है वास्तव में वही संविधान की धर्मनिरपेक्षता की  अवधारणा है . यह अलग बात है कि उनकी पार्टी और उसके कार्यकर्ता धर्मनिरपेक्षता की निंदा करते रहे हैं . उनके दिमाग में कहीं से यह बात भरी रहती  थी कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की विरासत है . लेकिन वह गलत हैं . धर्मनिरपेक्षता किसी  पार्टी की विरासत नहीं है . वह देश की विरासत है .इसी विचार धारा की बुनियाद पर इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी. अंग्रेजों की सोच थी कि इस देश के हिन्दू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं खड़े होंगें लेकिन जब १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन शुरू हुआ तो हिन्दू और मुसलमान न केवल साथ साथ थे बल्कि मुसलमानों के सभी फिरके महात्मा गांधी के साथ हो गए थे . उसके बाद ही अंग्रेजों ने  दोनों धर्मो  में  गांधी विरोधी तबका तैयार किया और उसी हिसाब से राजनीतिक संगठन खड़े किये . लेकिन महात्मा गांधी के आन्दोलन का  स्थाई भाव सभी  धर्मों का साथ ही बना रहा और आजादी की लड़ाई उसी बुनियाद पर जीती गयी. जाते जाते अंग्रेजों ने अपने वफादार जिन्ना को पाकिस्तान तो बख्श दिया लेकिन भारत की एकता को तोड़ने में नाकाम रहे . धर्मनिरपेक्षता की विरोधी ताक़तों ने महात्मा गांधी की  ह्त्या भी कर दी लेकिन देश की एकता बनी रही .

राष्ट्र की एकता के लिए ज़रूरी  सर्व धर्म   समभाव  की बात को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तो आगे बढाया  ही, इस मिशन में  सरदार पटेल का योगदान  किसी से कम नहीं है .यह सच है कि जब तक कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की  राजनीति को अपनी  बुनियादी सोच का हिस्सा बना कर  रखा , तब तक कांग्रेस अजेय रही लेकिन जब साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपनाने की कोशिश की , इमरजेंसी के दौरान  दिल्ली और अन्य इलाकों में मुसलमानों को चुन चुन कर मारा तो देश की जनता कांग्रेस के खिलाफ  खड़ी हो गयी और पार्टी  १९७७ का चुनाव हार गयी .  जो काम वहां से शुरू हुआ था ,उसका नतीजा कांग्रेस के सामने है .  

कांग्रेस के इंदिरा गांधी युग में धर्मनिरपेक्षता के विकल्प की तलाश शुरू हो गई थी। उनके बेटे और उस वक्त के उत्तराधिकारी संजय गांधी ने 1975 के बाद से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करना शुरू कर दिया था। खासतौर पर मुस्लिम बहुल इलाकों में इमारतें ढहाना और नसबंदी अभियान में उनको घेरना ऐसे उदाहरण हैं जो सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ इशारा करते हैं। 1977 के चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद से ही कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत होने लगी। १९७७ की हार के बाद ही इंदिरा गांधी ने असम में छात्र असंतोष को हवा दी और पंजाब में अपने ख़ास भक्त ज्ञानी जैल सिंह की मदद से जनरैल सिंह भिंडरावाला को दी गयी कांग्रेसी शह इसी राजनीति का नतीजा है।
हमारे अपने देश में सेकुलर राजनीति का विरोध करने वाले और हिन्दुराष्ट्र की स्थापना का सपना देखें वालों को पाकिस्तान की धार्मिक राजनीति से हुई तबाही पर भी नज़र डाल लेनी चाहिए .
पकिस्तान की आज़ादी के वक़्त उसके संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने  साफ़ ऐलान कर दिया था कि पाकिस्तान एक सेकुलर देश होगा .ऐसा शायद इसलिए था कि १९२० तक जिन्नाह मूल रूप से एक सेकुलर राजनीति का पैरोकार थे . उन्होंने १९२० के आंदोलन में खिलाफत के धार्मिक नारे के आधार पर मुसलमानों को साथ लेने का विरोध भी किया था लेकिन बाद में अंग्रेजों  की चाल में फंस गए और लियाकत अली ने उनको मुसलमानों का नेता बना दिया .नतीजा यह हुआ कि १९३६ से १९४७ तक हम मुहम्मद अली जिन्नाह को मुस्लिम लीग के नेता के रूप में देखते हैं जो कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी साबित करने के चक्कर में रहते थे . लेकिन  कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के पास था और उन्होंने कांग्रेस को किसी एक धर्म की पार्टी नहीं बनने दिया . लेकिन जब पाकिस्तान की स्थापना हो गयी तब जिन्नाह ने ऐलान किया कि हालांकि पाकिस्तान की स्थापना इस्लाम के अनुयायियों के नाम पर हुई है लेकिन वह एक सेकुलर देश बनेगा .अपने बहुचर्चित ११ अगस्त १९४७ के भाषण में पाकिस्तानी संविधान सभा के अध्यक्षता करते हुए जिन्नाह ने सभी पाकिस्तानियों से कहा कि ,” आप अब आज़ाद हैं . आप अपने मंदिरों में जाइए या अपनी मस्जिदों में जाइए . आप का धर्म या जाति कुछ भी हो उसका  पाकिस्तान के  राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं है .अब हम सभी एक ही देश के स्वतन्त्र नागरिक हैं . ऐसे नागरिक , जो सभी एक दूसरे के बराबर हैं . इसी बात को उन्होंने फरवरी १९४८ में भी जोर देकर दोहराया . उन्होंने कहा कि कि, “ किसी भी हालत में पाकिस्तान  धार्मिक राज्य नहीं बनेगा . हमारे यहाँ बहुत सारे गैर मुस्लिम हैं –हिंदूईसाई और पारसी हैं लेकिन वे सभी पाकिस्तानी हैं . उनको भी वही अधिकार मिलेगें जो अन्य पाकिस्तानियों को और वे सब पाकिस्तान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें .” लेकिन पाकिस्तान के  संस्थापक का यह सपना धरा का धरा रह गया और पाकिस्तान का पूरी तरह से इस्लामीकरण हो गया . पहले चुनाव के बाद ही  वहाँ बहुमतवादी राजनीति कायम हो चुकी थी और उसी में एक असफल राज्य के रूप में पाकिस्तान की बुनियाद पड़ चुकी थी. १९७१ आते आते तो  नमूने के लिए पाकिस्तानी संसद में एकाध हिंदू मिल जाता था  वर्ना पाकिस्तान पूरी तरह से इस्लामी राज्य बन चुका था. अलोकतांत्रिक  धार्मिक नेता राजकाज के हर क्षेत्र में हावी हो चुके थे.


आजकल भारत में भी धार्मिक बहुमतवाद की राजनीति को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है .लेकिन उनको ध्यान रखना पडेगा कि धार्मिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र का धर्म नहीं बन सकती . अपने पड़ोसी के उदाहरण से अगर सीखा न गया तो किसी को भी अंदाज़ नहीं है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को किस तरह का भारत देने जा रहे हैं .  लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना पडेगा कि  धार्मिक समूहों को वोट की लालच में आगे भी न बढ़ाया जाये. जवाहरलाल नेहरू के युग तक तो किसी की हिम्मत नहीं पडी कि  धार्मिक समूहों का विरोध करे या पक्षपात करे लेकिन उनके जाने के बाद धार्मिक पहचान की राजनीति ने अपने देश में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ी और आज राजनीतिक प्रचार में वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पक्षधरता की बात करना राजनीति की प्रमुख धारा बन चुकी है।  कहीं मुसलमानों को  अपनी तरफ मिलाने की कोशिश की जाती है तो दूसरी तरफ हिन्दुओं का नेता बनने की होड़ लगी हुयी है।  इससे बचना पडेगा।  अगर न बच सके तो राष्ट्र और देश के सामने मुश्किल पेश आ सकती है। 

आरक्षण में आरक्षण की राजनीति और भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं



शेष नारायण सिंह

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके बाद एक ऐसे आयोग का गठन किया जायेगा जो केंद्र सरकार की  नौकरियों में  पिछड़ी जाति के कोटे से मिलने वाले आरक्षण की समीक्षा करेगा . कोशिश यह होगी कि ओबीसी आरक्षण का फायदा उन् सभी पिछड़ी जातियों तक पंहुचे जो अभी तक भी हाशिये पर हैं. सरकार ने दावा किया है कि यह आयोग ओबीसी लिस्ट में शामिल जातियों को आरक्षण से मिलने वाले लाभ का न्यायपूर्ण वितरण उन जातियों को नहीं मिल पा रहा है जिनकी संख्या कम है .इस आयोग  से यह भी अपेक्षा की जायेगी कि वह अब तक नज़रंदाज़ की गयी पिछड़ी जातियों को न्याय दिलाने के तरीके भी सुझाए . केंद्रीय सूची में मौजूद सभी ओबीसी जातियों की नए सिरे से समीक्षा करने के लिए बनाए जा रहे इस आयोग के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम  होंगें . मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बताया कि अभी तक  होता यह रहा  है कि संख्या में अधिक और राजनीतिक रूप से सक्षम जातियां अति पिछड़ों को नज़रंदाज़ करती रही हैं लेकिन उसको दुरुस्त करना ज़रूरी हो गया था इसलिए सरकार को यह फैसला करना पड़ा .
२०१५ में हुए बिहार विधान सभा के चुनाव के दौरान आर एस एस के प्रमुख ,मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण नीति की समीक्षा की जानी चाहिए . लालू प्रसाद यादव और उनके तब के चुनाव के सहयोगी  नीतीश कुमार ने मोहन भागवत के इस बयान को इतना बड़ा मुद्दा बना दिया था कि पिछड़ी जातियों की भारी संख्या वाले बिहार में बीजेपी बुरी तरह से चुनाव हार गयी  . मंत्रिमंडल की बैठक के बाद फैसलों की जानकारी देने आये अरुण जेटली से जब पूछा गया की क्या केंद्र सरकार मोहन भागवत की बात को ही अमली जामा पंहुचाने की दिशा में चल रही है तो उन्होंने साफ़ कहा कि ' सरकार के पास इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही भविष्य में ऐसा प्रस्ताव होगा यानी उन्होंने मोहन भागवत की बात को लागू करने की किसी संभावना से साफ़ इनकार कार दिया . प्रस्तावित आयोग का सीमित उद्देश्य केवल मंडल कमीशन की जातियों की योग्यता की  श्रेणी का पुनार्विभाजन ही है और कुछ नहीं . केंद्रीय मंत्री की बात अपनी जगह है लेकिन यह तय है कि ओबीसी लिस्ट में संशोधन की बात पर ताक़तवर जातियों के नेता राजनीतिक स्तर पर हल्ला गुल्ला ज़रूर करेंगे . लगता  है कि लालू प्रसाद यादव की  २७ अगस्त की प्रस्तावित  रैली के लिए केंद्र सरकार और बीजेपी ने  बड़ा मुद्दा दे दिया है . यह भी संभव  है कि केंद्र सरकार लालू यादव और उनके साथ आने वाली पार्टियों की ताकत को भी इसी फैसले की कसौटी पर कसना चाह रही हो . ओबीसी की राजनीति के बड़े पैरोकार नीतीश कुमार शरणागत होने के बाद केंद्र सरकार को लालू यादव को चिढाने का भी एक अवसर हाथ आया है जिसका राजनीतिक लाभ होगा और केंद्र सरकार उसको लेने की कोशिश अवश्य करेगी .

मीडिया से मुखातिब अरुण जेटली ने बताया कि ग्यारह राज्यों में इस तरह की सूची पहले से  ही है जिसमे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखण्ड ,पश्चिम बंगाल, जम्मू, आदि शामिल हैं . ओबीसी   वर्ग में आरक्षण लेने के लिए क्रीमी लेयर की बात भी हुयी . अब तक सालाना आमदनी छः लाख रूपये वाले लोगों के बच्चे आरक्षण के लिए योग्य होते थे. अब वह सीमा बढाकर आठ लाख कर दी गयी है .
बिहार और उत्तर प्रदेश दलित और ओबीसी राजनीति का एक प्रमुख केंद्र है . दक्षिण भारत में तो यह राजनीति स्थिर हो चुकी है बिहार और उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की सबसे ताक़तवर जातियों यादव और कुर्मी का दबदबा  है . बीजेपी प्रमुख अमित शाह लोकसभा २०१४ चुनाव के दौरान उत्तर प्रद्देश के प्रभारी थे और विधानसभा २०१७ के दौरान तो वे पार्टी के  अध्यक्ष ही थे . इन दोनों चुनावों में उन्होंने गौर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ लेने का बड़ा राजनीतिक प्रयास किया . केशव प्रसाद मौर्य को राज्य की राजनीति में महत्व देना इसी रणनीति का हिस्सा था . यादव जाति को अलग थलग  करके समाजवादी पार्टी को  पराजित करने की  योजना की सफलता के बाद से ही ओबीसी जातियों को फिर से समायोजित करने की बात चल रही थी. ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार को पिछड़ी जातियों के बारे में प्रस्तावित आयोग इसी राजनीति का हिस्सा है .

आरक्षण की राजनीति को  डॉ राम मनोहर लोहिया ने अफर्मेटिव एक्शन यानी सकारात्मक हस्तक्षेप नाम दिया था  . उनका दावा था कि  अमरीका में भी  इस तरह की राजनीतिक योजना पर काम किया गया था . अपने देश में सकारात्मक हस्तक्षेप के पुरोधा डॉ भीमराव आंबेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया माने जाते हैं . इन नेताओं की सोच को कांग्रेस ने भी अपनाया और संविधान में ऐसी व्यवस्था की गयी कि दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया. संविधान के लागू होने के इतने  साल बाद सकारात्मक हस्तक्षेप के राजनीतिक दर्शन में अब कुछ सुधार की ज़रुरत महसूस की जा रही है . हालांकि आज के नेताओं में किसी की वह ताक़त नहीं है कि वह आज़ादी की लड़ाई में शामिल नेताओं की तरह वे तरीके भी अपना सकें जो चुनाव के गणित के हिसाब से अलोकप्रिय हों . लेकिन इतना तय है कि चुनावी लाभ हानि को ध्यान में रख कर ही सही सामाजिक बराबरी के बारे में चर्चा हो रही है . उस समय  दलितों को आरक्षण दिया  गया था. पिछड़ी जातियों को तो आरक्षण विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री रहते दिया गया .
उत्तर प्रदेश में  ओबीसी की राजनीति में सही तरीके से आरक्षण की बात हमेशा उठती रही है . ताक़तवर यादव और कुर्मी जाति के लोग बड़ी संख्या में  सरकारी नौकरियों पर मंडल कमीशन लागू होने के बाद से ही काबिज़ हो रहे थे और अति पिछड़ी जातियों में बड़ा असंतोष था .बीजेपी की ओर से जब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए तो उन्होंने राज्य की भावी राजनीति की इस दस्तक को पहचान लिया था .पिछड़ों की राजनीति के मामले में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की ताक़त बहुत ज्यादा थी. पिछड़े और दलित वोट बैंक को छिन्न भिन्न करके अपनी पार्टी की स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए राजनाथ सिंह ने वही करने की कोशिश की जिसे बाद में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार ने अपनाया . नीतीश अपनी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं इसलिए वे अपनी योजना को लागू करने में सफल हुए लेकिन राजनाथ सिंह की किस्मत वैसी नहीं थी. उनकी टांग खींचने के लिए तो उत्तर प्रदेश में ही बहुत लोग मौजूद थे और उन लोगों को दिल्ली के नेताओं का आशीर्वाद भी मिलता रहता था .उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह ने सामाजिक न्याय समिति बनायी थी जिसने अति पिछड़ों के लिए आरक्षण के अन्दर आरक्षण की सिफारिश की थी . राजनाथ सिंह ने कहा था कि पिछड़ों के लिए तय आरक्षण में कुछ जातियां ही आरक्षण का पूरा लाभ ले लेती हैं जबकि अन्य पिछड़ी जातियां वंचित रह जाती हैं। समिति की सिफारिशें के आधार पर काम शुरू भी हो गया था . बहुत ही शुरुआती दौर था . यह योजना परवान चढ़ पाती कि आम चुनाव हो गए और भाजपा सत्ता में लौटी ही नहीं। मायावती ने बाद में इस श्रेणी को ख़त्म कर दिया . इसके बाद भाजपा ने भी समिति की रिपोर्ट को भुला दिया। बाद में तो बीजेपी में भी सामाजिक न्याय और आरक्षण के मामले पर गंभीर आन्तरिक चिंतन हुआ और अमित शाह ने २०१४ में उस चिंतन का  लाभ उठाया . चल रहा है . ज़ाहिर है आरक्षण से जुड़े मुद्दों की राजनीति करवट ले रही है .

संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को सामाजिक  बराबरी के एक हथियार के रूप में लागू किया था लेकिन आरक्षण से उम्मीद के मुताबिक़ नतीजे नहीं मिले इसलिए उसे और संशोधित भी किया गया लेकिन आजकल एक अजीब बात देखने में आ रही है . वे जातियां जिनकी वजह से देश और समाज में दलितों को शोषित पीड़ित रखा गया था वही आरक्षण की बात करने लगी हैं . पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए बनी काका कालेलकर और मंडल कमीशन की सिफारिशों में क्रीमी लेयर की बात की गयी थी . इसका मतलब यह था कि जो लोग आरक्षण के लाभ को लेकर आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नहीं रह गए हैंउनके घर के बच्चों को आरक्षण के लाभ से अलग कर दिया जाना चाहिए लेकिन बहुत दिनों तक ऐसा नहीं हुआ. 
सामाजिक बराबरी के दर्शन शास्त्र के आदिपुरुष महात्मा फुले ने इसे एक बहुत ही गंभीर राजनीतिक परिवर्तन का हथियार माना है . उनका मानना था कि दबे कुचले वर्गों को अगर बेहतर अवसर दिए जाएँ तो सब कुछ बदल सकता है ... महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। महात्मा फुले ने समझाया कि जाति की संस्था समाज के प्रभुता संपन्न वर्गों के आधिपत्य को स्थापित करने का एक हथियार है.उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा,बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़िक्र किया है। स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये,जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया,ऋग्वेद के पुरुष सूक्त काजिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थीको फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
एक लम्बा इतिहास है सकारात्मक हस्तक्षेप का और इसे हमेशा ही ऐसा राजनीतिक विमर्श माना जाता रहा है जो मुल्क और कौम के मुस्तकबिल को प्रभावित करता है .
केंद्रीय मंत्रिमडल की ओबीसी जातियों के फिर से वर्गीकरण की नीति का महत्व है और यह निश्चित रूप से उन  वर्गों को कष्ट देगी जो जन्म से तो ओबीसी हैं लेकिन कर्म से महात्मा फुले के प्रभुता संपन्न वर्ग में शामिल हो चुके हैं . हो सकता है कि बीजेपी ने राजनीतिक लाभ लेने और विरोधी को कमज़ोर करने के लिए ही यह कदम उठाया हो लेकिन इसके नतीजे महत्वपूर्ण होंगें .