Friday, September 21, 2018

उत्तराखंड के वीरान गाँवों को फिर से आबाद करने की अनूठी पहल


शेष नारायण सिंह

राज्य सभा में इस साल पत्रकार अनिल बलूनी सदस्य के रूप में आये हैं . उन्होंने उत्तराखंड की एक बड़ी समस्या को हल करने का बीड़ा उठाया है . उन्होंने उत्तराखंड के एक घोस्ट विलेज को गोद ले लिया है जहां कोई नहीं रहता,  गाँव की पूरी आबादी अपना घर छोड़कर शहरों में बस चुकी है और गाँव वीरान पडा है . अनिल बलूनी ने एक बयान जारी करके कहा है कि," पलायन रोकने के लिए एक सामाजिक पहल प्रारंभ करते हुए मैंने आज पौड़ी जिले के दूगड्डा विकासखंड के बौरगांव को अंगीकृत किया है। मेरा प्रयास होगा कि गांव को मूलभूत सुविधाओं बिजलीपानीस्वास्थ्यसड़क और रोजगार के विकल्प तलाश कर पूरी तरह निर्जन हो चुके इस गांव को पुनर्जीवित किया जाय।यह एक सामाजिक अभियान हैआइये हम सब मिलकर पलायन के खिलाफ एकजुट होंअपने गांव से जुड़ेंस्वयं मेरे परिवार ने भी वर्षों पूर्व अपना गांव छोड़ दिया थामैं इस पीड़ा को निकट से जानता हूँ।गांव छोड़ना, अपनी जड़ों से अलग होना है अगर हमें अपनी महान संस्कृति को बचाना है तो गांव को बचाना होगा।इस अभियान में आप सबके सहयोग से हम उत्तराखंड के उन वीरान निर्जन गांवों को पुनः आबाद करेंगे और 'घोस्ट विलेजके कलंक से उन्हें उबारेंगे।" उन्होंने कहा कि इस गाँव के  जो लोग दिल्ली के आस पास या अन्य शहरों में रहते हैं उनसे  संपर्क किया जाएगा और उनको अपने गाँव वापस जाकर वहां बसने के लिए तैयार किया जाएगा . उनकी जो भी मांगें होंगी सब को पूरा किया जाएगा .  जब से गाँव को गोद लेने की प्रथा शुरू हुई है , यह पहला ऐसा  मौक़ा है जब किसी सांसद ने एक वीरान गाँव को गोद ले लिया हो .
मैं  आम तौर पर नेताओं के बयानों को गंभीरता से नहीं लेता लेकिन अनिल के बयान पर मुझे भरोसा है . पिछले पचीस वर्षों के अपने परिचय के दौरान मैंने देखा है कि वे  वही कहते हैं , जो कर सकते हैं . उम्मीद की जानी चाहिए कि  उत्तराखंड के इन वीरान गाँवों में उनके मूल निवासी वापस आयेंगें और अपनी ज़मीन से  जुड़ेंगे.उत्तराखंड में घोस्ट विलेज की बढ़ती संख्या , एक बड़ी समस्या  हैं . यह ऐसे गाँव हैं ,जहां अब कोई नहीं रहता ,गांव के सारे लोग मैदानी इलाकों में काम की तलाश में जा कर बस चुके  हैं , वहीं रहते हैं , वहीं काम करते हैं और वहीं के हो कर रह गए हैं .सरकारें समय समय पर इसके बारे में बयान आदि देती रहती हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. इस साल स्वतन्त्रता दिवस के दिन उत्तराखंड के के मुख्यमंत्री ,त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी एक सरकारी घोषणा की थी कि इन वीरान गाँवों को फिर से आबाद किया जाएगा और उन लोगों को वापस बुलाया जाएगा जो गाँव छोड़कर पूरी तरह से जा  चुके हैं . राज्य सरकार ने घोषणा में बताया  कि करीब सात सौ वीरान गाँवों को  फिर से बसाने की योजना पर  काम किया जाएगा .
यह समस्या अभी तो पहाड़ों में  है लेकिन मैदानी इलाकों में भी लोग और दूर नहीं जा सकते  तो अपने जिला मुख्यालय के शहर में ही बसना पसंद कर रहे  हैं . सीधा कारण है . गाँवों में   स्वास्थ्य सुविधाओं का कोई बंदोबस्त नहीं  है . मेरे अपने मित्रों में जो लोग गाँवों में प्राइमरी या मिडिल स्कूलों में शिक्षक   आदि के पदों पर काम कर रहे  हैं वे भी अपने गाँव के घर में न रहकर शहरों में रहते हैं . चाहे  अपनी नौकरी की ड्यूटी करने  के लिए उनको रोज़ वापस वहीं अपने गाँव में ही आना पड़े  .रिटायर होने के बाद तो लगभग सभी पेंशनधारी शहरों में ही बस रहे  हैं.  अगर सरकार ने गाँवों में स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा की तुरंत व्यवस्था न की तो उत्तर प्रदेश के गाँवों में यह बड़ी समस्या होने वाली है .
उत्तराखंड के मामला बहुत बिगड़ चुका है .  देश के बहुत बड़े अधिकारी उत्तराखंड के पहाड़ों से आते हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल, सेना प्रमुख बिपिन रावत , रॉ के प्रमुख अनिल धस्माना सब इसी इलाके से हैं . अनिल धस्माना के गाँव टोली में जब कुछ पत्रकारों ने दौरा किया तो पता लगा लगा कि चालीस साल पहले उनके जिस घर  में उनके परिवार के करीब तीस लोग रहते थे अब वहां केवल तीन लोग रहते हैं .
सरकारों का अलगर्ज़ रवैया हिमालयी गाँवों को वीरान करने  के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार है . संतोष की बात यह  है कि समस्या को समझने की कोशिश शुरू हो गयी है . सरकार ने कुछ घोषणा तो  की है . मुख्यमंत्री ने बड़े बड़े वायदे किये हैं . उन्होंने कहा है कि उन गाँवों में ज़मीन का अधिग्रहण करके उसमें उद्यमियों को कारोबार शुरू करने के लिए उत्साहित किया जाएगा . हिमालय में अगर  जड़ी बूटियों की खेती व्यापारिक तरीके से की जाय तो बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन होगा और लोगों को वापस अपने गाँव में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा . स्कूलों को को भी बच्चों को आधुनिक और उपयोगी शिक्षा देने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा . उत्तराखंड के मूल निवासी दुनिय में कई देशों में उच्च पदों पर हैं उनको भी अपने गाँव के विकास में भागीदार होने के लिए प्रेरित किया जा सकता है . सरकारें तो  घोषणायें करती रहती  हैं और उनमें से ज्यादातर केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं . ज़रूरी यह है कि  मीडिया और जन प्रतिनिधि सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों  पर दबाव बनाएं कि वे अपने वायदे को पूरा करें. अनिल बलूनी एक प्रभावशाली सांसद हैं ,  उन्होंने खुद ही एक वीरान गाँव को अंगीकृत करके इस दिशा में ज़रूरी पहल कर दी है . उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी सम्बद्ध लोग इस दिशा में अपनी  क्षमतानुसार प्रयास करें और पहाड़ों को वीरान होने से बचाएं .
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Thursday, September 20, 2018

मुल्क के बंटवारे के दर्द को सआदत हसन मंटो ने भोगा और उसको लिख दिया , वह हमारे साहित्य की थाती है



शेष नारायण सिंह 


उन दिनों फिल्मों में काम करने के लिए पंजाबी लड़के ज्यादातर लाहौर जाते थे। लेकिन उनको तो फिल्मी अखबारों में काम करना था लिहाजा वे अमृतसर से मुंबई आ गए। फिल्मी रिपोर्टिंग के साथ-साथ फिल्मों की कहानियां लिखने का काम भी पकड़ लिया फिल्म लेखक के रूप में सफल नहीं हुए। शायद उनको मालूम भी था कि फिल्मी लेखक के रूप में वे सफल नहीं होने वाले हैं। जब असफल होने लगे तो फिल्मी लोगों ने उनसे कहानी लिखवाना बंद कर दिया। आज की मुम्बैया जबान में कहें तो वे फ्लाप लेखक थे लेकिन उस दौर के बंबई के सबसे बड़े सितारों, श्याम और अशोक कुमार से उनकी गहरी दोस्ती थी। मुसीबतों को कभी भी अड़चन न मानने वाले महान कहानीकार ने कभी हार नहीं मानी। उनके नाम की एक नई फिल्म आई है जिस में एक ऐसा संवाद है जो उनकी सारी बात को कह देता है और वह संवाद है, जब उनका किरदार अपनी बीवी से कहता है कि, ''मैं आग बेचता हूं सफया, आग। उसकी चिंगारियां दूसरों की राख में नहीं झोंक सकता।'' मेरी मुराद सआदत हसन मंटो से है जिनकी तुलना कभी फ्रेंच लेखक मोपासां से की जाती है तो कभी, रूसी लेखकों ताल्स्तॉय और चेखव से।
फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास ने 'मंटो' नाम की एक फिल्म बनाई है। यह फिल्म इसी हफ्ते बाजार में होगी और पिछली सदी के महान कथाकार को दुनिया मुखातिब करेगी। यह वही कथाकार है जिसकी उर्दू किताबें अभी थोड़े दिनों पहले तक पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के शरीफ घरों के बच्चों के हाथों में दिखने की मनाही थी। मैं मंटो को हिन्दुस्तानी कहानीकार मानता हूं, हां, गरीबी में झुलसने, पागल होने और मरने के लिए वे पाकिस्तान चले गए थे। अपनी जान से प्यारी बंबई को छोड़कर वे लाहौर इसलिए चले गए थे क्योंकि मुंबई शहर से उनके सारे मुस्लिम दोस्त पाकिस्तान जा चुके थे। वे जाना नहीं चाहते थे, लेकिन एक दिन उनके एक हिन्दू दोस्त ने कह दिया कि तुमको यहां कोई $खतरा नहीं है, यहीं रहो लेकिन अगर तुम मेरे दोस्त न होते तो मैंने ही तुमको मार डाला होता। इस बातचीत के बाद वे घर आये, अपनी बीवी और लड़कियों को साथ लिया और लाहौर चले गए।
रोमांटिक और इंसानी रिश्तों की कहानियां लिखने वाला मंटो बंटवारे के दर्द को देखने के बाद एक ऐसा इंसान बन गया जो बंटवारे की खूंरेजी के बाद तहस-नहस हो रहे इंसानी रिश्तों का सबसे बड़ा कहानीकार है। बंटवारे की जो तफसील सरकारी किताबों में है, वह तो सरकारी आंकड़ेबाजी है, अखबारों में बंटवारे की भयानक सच्चाई भी मिल जायेगी लेकिन मंटो के यहां हमें बंटवारे के दर्द की परतें एक के बाद एक खुलती जाती हैं, हैवानियत बेपर्दा होती रहती है और समझ में आने लगता है कि इंसान किस हद तक हैवान हो सकता है। उनके साहित्य को पढ़ने से सा$फ नजर आ जाता है कि बंटवारे की नीचता को मंटो की कलम ने घेर रखा है और उसको वह आने वाली नस्लों के लिए एक विरासत के रूप में छोड़कर जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
नंदिता दास की फिल्म 'मंटो' इसी महान कहानीकार की जीवनी का किस्सा बताने की कोशिश करती है। कहानी को इस तरह से बुना गया है कि उसमें मंटो की कुछ कहानियों के किरदार भी शामिल होते हैं क्योंकि मंटो की जींदगी को उनकी कहानियों के बिना समझना नामुमकिन है। मंटो केवल 43 साल जिंदा रहे और इस जींदगी में उन्होंने जो लिखा वह 22 कहानी संग्रह, एक उपन्यास, तीन निबंध संग्रह, कुछ रेडियो नाटक, कुछ फिल्मी कहानियां, दो जिल्दों में आत्मकथा के रूप में उपलब्ध है। नंदिता दास की फिल्म में मंटो का रोल नवाजाद्दीन सिद्दीकी कर रहे हैं।
मंटो के काम को भारत और पाकिस्तान क्या पूरी दुनिया में सराहा गया है। इस फिल्म के बहाने मंटों के काम को एक बार फिर परखा जाएगा, समझा जाएगा और नए सिरे से मंटों 'फैशन' में आ जायेंगे। उनके काम को एक बार फिर से समझने की जरूरत है। मंटो ने अपनी पहली कहानी 1931 में लिखी थी उसके बाद से 23 साल तक लिखते रहे। वे पाकिस्तान तो चले गए थे लेकिन अपने दूसरे वतन मुंबई को कभी भी अपने से बाहर नहीं निकलने दिया। वे जींदगी भर खुद को 'चलता-फिरता बंबई' कहते रहे। बंबई में उन्होंने 'चंद रुपयों से लेकर हजारों और लाखों कमाए और खर्च किए' लेकिन अपने नए मुल्क लाहौर में, उनकी हालत खस्ता थी। मंटो लिखते हैं कि ''दिन रात मशक्कत के बाद मुश्किल से इतना कमाता हूं जो मेरी रोजमर्रा की जरूरियात के लिए पूरा हो सके। ये तकलीफदेह एहसास हर वक्त मुझे दीमक की तरह चाटता रहता है कि अगर आज मैंने आंखें मींच लीं तो मेरी बीवी और तीन कमसिन बच्चियों की देखभाल कौन करेगा।''
पाकिस्तान ने मंटो को बहुत ही दर्द दिया। वे विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। विभाजन के दर्द को इस विषय पर लिखी मंटो की कहानियां ही बिलकुल साफ बयान करती हैं। बहुत ही भारी मन से वे दो राष्ट्रों के सिद्धांत पर तंज करते हैं और कहते हैं कि, ''मुल्क के बंटवारे से जो इंकलाब बरपा हुआ, उससे मैं एक अरसे तक बागी रहा और अब भी हूं। लेकिन बाद में उस खौफनाक हकीकत को मैंने तस्लीम कर लियाटट। लेकिन लगता है कि मंटो ने मुल्क के बंटवारे की हकीकत को कभी भी तस्लीम नहीं किया। तस्लीम करने वाले इकबालिया बयान के बाद के उनके लेखन में इंसानी तकलीफों के जो झुण्ड के झुण्ड नजार आते हैं वे इस बात को नकारते हैं। उनका कृतित्व विभाजन की त्रासदी की अनुभूति की तल्खी को कभी भी कम नहीं होने देगा। वे कहते तो हैं कि बंटवारे को तस्लीम कर लिया लेकिन 'तस्लीम करने' के दावे के तुरंत बाद, अपने ''सियाह हाशिएटट के वाक्यांशों में विभाजन की खौफनाक हकीकत को फिर सामने ला देते हैं। सियाह हाशिये दहशत को एकदम सामने लाकर खड़ा कर देने वाली रचना है। जब कुएं में लूटी हुई चीनी फेंकने गया भी आदमी चीनी के बोरे के साथ कुएं में गिर जाता है और बाद में उसकी लाश निकाली जाती है तो जाहिर है कि कुएं का पानी मीठा हो गया था। लेकिन वहां क्या होता है। मीठे पानी के कारण उस आदमी की मजार पर दीये जलने लगे, यह अपने आप में दहशत का साधारणीकरण है लेकिन दर्द के दायरे को बहुत ही विस्तृत बना देता है, करामात, गलती का सुधार, घाटे का सौदा, रियायत, हैवानियत, मिस्टेक, सफाई पसंद, साम्यवाद, हलाल और झटका, ऐसे दस्तावे•ा हैं जो केवल और केवल मंटो की कलम से ही निकल सकते थे। यह छोटी कहानियां 'टोबा टेक सिंह' से कम अहम नहीं हैं, हालांकि ''टोबा टेक सिंह'' भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन के साहित्य का सबसे बड़े क्लासिक है। मंटो तकसीम के पागलपन को पहचानते हैं। लेकिन वे इस बात के भी गवाह हैं कि यह पागलपन $खत्म होगा और उस बात को उनकी कहानी 'यजाद' में महसूस किया जा सकता है।
मंटो तीस के दशक में मुंबई आये थे। फिल्मी सपनों के शहर में अपनी रोटी कमाने के लिए उन्होंने संघर्ष किया। इस प्रक्रिया में वे स्वतंत्र पत्रकारिता के सिम्बल भी बन गए। बाद के वर्षों में जिसे संविधान के मौलिक अधिकारों वाले खंड में अभिव्यक्ति की आजादी कहा गया, उसको उन्होंने पूरी तरह से जिया। इसमें दो राय नहीं कि मंटो उर्दू कहानी के सबसे जबरदस्त हस्ताक्षर हैं लेकिन उनकी फिल्मी पत्रकार के रूप में लिखी गयीं रिपोर्टें भी हमेशा ही मीडिया की स्वतन्त्रता की मिसाल के रूप में याद की जायेंगी। अपने समय के महानतम लोगों के बारे में मंटो ने जो लिखा है वह उस दौर में तो फिल्मी खबरें या डायरी आइटम रहे होंगे लेकिन आज वह हमारी विरासत का हिस्सा है। अशोक कुमार और श्याम से उनकी बहुत ही अच्छी दोस्ती थी। अशोक कुमार अक्सर मंटो को अपनी कार में उनके घर तक छोड़ भी आते थे। एक बार मुंबई में दंगा हुआ था। मुसलमानों के इलाके से गाड़ी जा रही थी।
मंटो लिखते हैं कि एकाएक कुछ दंगाई सामने आ गए। दादा मोनी भी डर गए, मंटो तो खैर दहशत में थे ही। जब उन लोगों ने अशोक कुमार को देखा तो बिना कोई नुकसान पंहुचाये जाने दिया क्योंकि अशोक कुमार को मुसलमान अपना आदमी मानते थे। नरगिस के बारे में उनका वर्णन बहुत ही दिलचस्प है। उनकी पत्नी रफिया ने ऐसे ही नरगिस को फोन मिला दिया था, दोस्ती हो गई। एक दिन नरगिस ने जिद की कि अपनी सहेलियों से मिलने जाना है, नरगिस की मां, जद्दन बाई ने अकेले नहीं जाने दिया। खुद साथ आईं लेकिन जब उनको पता चला कि यह तो मंटो का घर है तो उन्होंने कहा कि अगर मुझे मालूम होता कि बेबी तुम्हारे घर आ रही है'' इस के बाद का जुमला मंटो ने पूरा किया और कहा ''तो आप न नाजाल होतीं।'' लाहौर से आई सितारा देवी की घुमक्कड़ी का भी ऐसा वर्णन है कि अगर वह आज होतीं तो शर्म से पानी-पानी हो जातीं। मंटो की जबानी ही हम जानते हैं कि प्राण नाम का एक खूबसूरत नौजवान सितारा देवी के साथ ही लाहौर से आया था, वह उनके साथ ही रहता था। बंबई आने के बाद में सितारा देवी के बहुत लोगों से सम्बन्ध हुए। उनको मंटो आदमखोर कहते थे। श्याम मंटो के अजाज दोस्त थे, शायद इसीलिये उनको असल जींदगी में भी बतौर हीरो ही पेश किया गया है।
इतनी अजीबोगरीब शख्सियत के मालिक मंटो के बारे में नंदिता दास ने जीवनीनुमा फिल्म बनाने की कोशिश की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को किस तरह से स्वीकार किया जाता है लेकिन इतना तो तय है कि इस फिल्म के बहाने एक बार फिर सआदत हसन मंटो जैसे महान साहित्यकार के बारे में चर्चा शुरू हो जायेगी।

Monday, September 17, 2018

स्वामी ओमा द अक् और अध्यात्म





शेष नारायण सिंह

एक दिन के लिए बनारस गया ,मित्र और सीनियर अम्बिकानंद सहाय के आदेश पर . हुआ यों कि उनको वहां सम्मानित होना था लेकिन कार्यक्रम के पहले ही उनको चिकनगुनिया हो गया . उन्होंने मुझसे कहा कि चले जाओ और हम चले गए .आयोजकों का कार्यक्रम तय था . वे जा नहीं सकते थे ,किसी और पत्रकार की तलाश थी जिसको अम्बिकानंद की मंजूरी दे दें. उन्होंने मुझसे कहा कि इतवार का कार्यक्रम है ,चले जाओ . सोमवार को सुबह दिल्ली  वापस आ जाना . इस तरह मैं अम्बिकानंद जी  का सम्मान लेने बनारस पंहुच गया . बाकायदा मंच पर बैठाया गया और मुझसे भी भाषण  दिलवाया गया . मैं सम्मान वम्मान नहीं लेता . दिल्ली में बयालीस साल से रहता हूँ और सम्मान देने दिलाने वाले रैकेट को सही तरीके से समझता हूँ इसलिए जब भी इस तरह के मौक़े आये कि कोई संस्था मुझे सम्मानित करना चाहती थी तो मैं  दिल्ली में सम्मान याचकों और सम्मान के धंधे में लगे हुए सत्ता के दलालों के प्रोफाइल पर बात करके मना कर दिया करता था .  बहरहाल इस बार मैं बनारस गया . एक लालच यह भी थी कि अपनी छोटी बहन से मिल लूँगा जो  वहीं अपने बेटे के पास  बनारस में ही थी और बीमार हो गयी थी . भाई से मिले कई महीने हो गए थे . उनको भी वहीं बुला लिया . सबसे भेंट मुलाक़ात हो गयी . हाँ  वहां जिस सम्मलेन में मैं गया था , वहां जाकर बहुत अच्छा लगा . मुझे लगता है कि वहां जाने का फैसला करके  बहुत अच्छा किया .

बनारस के एक आध्यात्मिक संगठन का आयोजन था,   स्वामी ओमा द अक्  नाम के सन्यासी  की विचारधारा को केंद्र में रखकर यह संगठन बनाया गया है . जाने के पहले मैंने  यू ट्यूब पर उनके भाषण आदि सुने. इतनी बात मुक़म्मल हो गयी कि स्वामी जी बहुत ही कुशल वक्ता  हैं . वहां जाकर मैं मशीनी तरीके से कार्यक्रम में पंहुच गया . वहां मौजूद विद्वानों का जो लाइन अप था, उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ . बनारस के शायर स्व सुलेमान आसिफ को समर्पित कार्यक्रम में एक से एक विद्वान लोगों के भाषण हुए , सभी धर्मों के लोग वहां मौजूद थे . कई विद्वानों को सम्मानित किया गया . सबके भाषण हुए , मैं प्रभावित होना शुरू  हो गया . और जब स्वामी ओमा द  अक् का भाषण हुआ तो मैं बहुत प्रभावित हो गया .
उन्होंने साफ़ कहा कि वे हिन्दू धर्म नहीं सनातन धर्म मानते  हैं, ईश्वर का जो रूप अलग अलग धर्मों में वर्णित है उसपर चर्चा की . ईश्वर को एक सांचे में बांध देने की बात को चुनौती दी. उन्होंने इस्लाम के ईश्वर पर चर्चा की, ईसाई धर्म ग्रन्थ, बाइबिल वाले  ईश्वर की चर्चा की और पूछा कि हम क्यों आपकी आज्ञा से ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार करूं? ईशनिंदा के कानून के सहारे अपने अपने ईश्वर को स्थापित करने और ज़बरदस्ती उसको सम्मान दिलाने की बात पर एतराज़ किया और धर्म की जो धर्म दर्शन पर आधारित व्याख्या है उसको ही तार्किक और वैज्ञानिक सोच  बताया. मुझे लगा कि यह स्वामी लीक से हटकर है . सच सको सच कहने की शक्ति से मैं बहुत प्रभावित हुआ . बिना किसी लाग लपेट के सच के तत्व को कह देने की कला में स्वामी जी पारंगत हैं .. एक घंटे तक उनका भाषण  चला .  धर्मं ,अध्यात्म और नीतिशास्त्र की बहुत सारी मान्यताएँ सवालों की ज़द  में  ले ली गयीं . अब मैं पूरी तरह से प्रभावित हो चुका था. मैंने तय किया है कि अगली बार जब स्वामी जी से मिलने जाऊंगा तो अपने दर्शनशास्त्र के शिक्षक डॉ अरुण कुमार सिंह को लेकर जाऊँगा . उनकी उपस्थिति में स्वामी जी से चर्चा करूंगा  तो आनंद और उपयोगी हो जाएगा .
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर स्वामी ओमा की जानकारी से मैं बहुत प्रभावित हुआ . उन्होंने कहा कि हज़रत मूसा के समय से यह सोच राजाओं के लिए एक उपयोगी हथियार बना हुआ है . राष्ट्रवाद के बारे में उनकी इनसाइट से मैं बहुत प्रभावित हुआ .उन्होंने साफ़ कहा कि राजा के हाथ में धर्म का सञ्चालन नहीं होना चाहिए लेकिन धर्म  को सर्वोच्च साबित करने  के लिए धर्म के  ठेकेदार राजा का इस्तेमाल करते रहे हैं . उन्होंने बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध के बारे में वैज्ञानिक तरीके से बात की . स्वतंत्र मनुष्य को धम्मम शरणम् गच्छामि के दायरे में लपेट लेने की बात को बहुत ही अच्छी तरह समझाया . महात्मा बुद्ध के धर्म का बाद के राजाओं द्वारा किस तरह से दुरुपयोग किया गया ,इस पर भी एकदम  सटीक बात की . उन्होंने सम्राट अशोक द्वारा बुद्ध धर्म में किये गए व्यावहारिक   विषयांतर को भी  विधिवत समझाया .
करीब एक  घंटे तक चले उनके प्रवचन के बाद भी और अधिक सुनने की इच्छा बनी ही रही . इसलिए तय किया है कि फिर जाउंगा और इस बार अपने गुरु को भी लेकर जाऊँगा . उस गुरु को जिसने मुझे मूर्तिभंजक बनना  सिखाया . उसके बाद मन में हैं कि स्वामी ओमा द  अक् के  बारे में विस्तार से लिखूंगा .


मौजूदा कानूनों से चुनाव में कालेधन को रोक पाना बहुत मुश्किल है : मुख्य चुनाव आयुक्त



शेष नारायण सिंह  


जब से आशुतोष  वार्ष्णेय की किताब" भारत का अप्रत्याशित लोकतंत्र : अधूरी जीत " प्रकाशित हुई है ,  अपने देश में लोकतंत्र पर कहीं न कहीं  लोकतंत्र पर बहस होती ही रहती है .  प्रोफ़ेसर वार्ष्णेय की यह किताब १९४७ से अब तक के महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम का  विश्लेषण है . इस दौर में जो चुनौतियां आयी हैं उन सबको बहुत ही गंभीरता से  समझाने की कोशिश की गयी है और पश्चिमी देशों के उस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है जिसमें वे भारत  की आज़ादी के बाद यह दावे करते पाए जाते थे कि भारत अपने लोकतंत्र को संभाल नहीं पायेगा. किताब में यह सिद्ध कर दिया गया है कि सत्तर साल में समस्याएं तो बहुत आयीं  लेकिन भारत का लोकत्रंत्र पूरी तरह से सफल है और आने वाले समय में भी रहेगा..इस विषय पर अमरीका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में अकादमिक चर्चा होती रहती है  . भारत में भी  अपने लोकतंत्र के बारे में चर्चा आम है . इसी विषय पर एक  सम्मलेन नई दिल्ली में भी आयोजित हुआ. जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त , ओ पी रावत शामिल हुए. उन्होंने साफ़ कहा कि  लोकतंत्र भावनाओं पर नहीं चलता ,किसी एक इंसान की पसंद नापसंद को कभी भी लोकशाही की बुनियाद नहीं बनाया  सकता . लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए साहस, चरित्र , ईमानदारी और ज्ञान की ज़रूरत होती है .यह ऐसे सद्गुण  हैं जो धीरे  धीरे कम होते जा रहे हैं . उन्होंने साफ़ कहा कि मौजूदा कानूनों के बल पर चुनाव में काला धन को रोक पाना संभव नहीं है. चुनाव प्रक्रिया में आ गयी अन्य बीमारियों  को रोकने के लिए भी मौजूदा कानून नाकाफी हैं .  चुनावों को साफ़ सुथरे तरीके से संपन्न कर  पाना बहुत ही कठिन होता जा रहा है. हालांकि अभी चुनाव प्रक्रिया को साफ रखने में चुनाव  आयोग सफल रहा है . लेकिन फेक न्यूज़, जैसी नई परेशानियों के कारण चुनाव  को सही सलामत करवा पाना दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा  है. सोशल  मीडिया के ज़रिये उलटे सीधे और गलत प्रचार के कारण जनता के निर्णय को प्रभावित करने की  कोशिश भी अब आम बात हो चली  है. अगर जनता नक़ली तर्क के आधार पर  हुए प्रचार के कारणों से गलत नेता चुन लेगी तो लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं माना जाएगा . क्योंकि अगर इस तरह के लोग चुन लिए गए तो उनसे स्वस्थ छवि और प्रशासन की उम्मीद नहीं रहेगी और यह खतरा दुनिया के हरेक लोकतंत्र के सामने है . अभी तक तो चुनाव आयोग इससे चौकन्ना है और हर तरह की मुसीबत से निपटने के लिए सक्षम है .
संतोष की बात यह   है  कि भारत का चुनाव आयोग इस तरह के खतरों से सावधान है . मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि हम अपने डेटा को पूरी तरह से सुरक्षित  रखने में पूरी तरह से सफल रहे हैं क्योंकि हमको मालूम है कैम्ब्रिज एनालिटिका  जैसे संगठन गोपनीय  आंकड़े चुराकर लाभ में लिए उसको बेचने के लिए हरदम प्रयास करते रहते हैं .

चुनावों में कालेधन का इस्तेमाल बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है . मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि कालेधन को रोकने के लिए कुछ और  कानून बनाने पड़ेंगे क्योंकि अभी जो कानून हैं , उनके सहारे काले धन पर पूरी तरह से काबू नहीं पाया जा सकता .  अपने  देश में  चुनाव बहुत ही  खर्चीले  हो गये हैं और यह  सभी के लिए चिंता का विषय है .चुनावों  में जनमत प्रभावित करने के लिए भी धन का दुरुपयोग हो रहा है और चुनाव आयोग इस समस्या से पूरी तरह से वाकिफ है .  चुनावी चंदे को लेकर भी चुनाव आयोग चिंतित है . कई बार तो  उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार के लिए सरकारी धन की व्यवस्था की बात की जाती है लेकिन जब चौतरफा धन का इस्तेमाल करने के अवसर  रहेंगे तो  सरकारी पैसे को राजनीतिक पार्टियों या उम्मीदवारों के प्रचार के लिए देने का कोई औचित्य नहीं  है .. चुनाव सुधार  अपने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अब बहुत ही  ज़रूरी ही गए  हैं .  
लोकतंत्र के सामने  एक बहुत बड़ी चुनौती संचार क्रान्ति के बाद आ गयी है . जहां सूचना अब कहीं भी कभी भी उपलब्ध है ,वहीं यह भी देखा  जा रहा है कि सूचना को तोड़ मरोड़ कर जन भावनाएं भड़काने के लिए भी  इस्तेमाल किया जा  रहा  है . मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि प्रेस की आजादी के नाम पर बहुत सारे मीडिया  संगठन  दृष्टिकोण को समाचार बनाकर पेश कर रहे  हैं . आज जो मीडिया का स्पेस है वह बहुत ही संकुचित हो गया  है . मुख्य चुनाव आयुक्त ने मीडिया के स्वामित्व के सवाल पर भी चर्चा की और कहा कि हमारी प्रेस की आज़ादी की अवधारणा को मीडिया की मिलकियत  के सवाल के संदर्भ में देखने की ज़रूरत है .  आज सारे मीडिया को एक ही तरह से समझने की ज़रूरत  नहीं है . मीडिया में जो  असली तत्व हैं उनको तो प्रेस की आज़ादी की श्रेणी में रखा जाना  चाहिए लेकिन मीडिया के जो तरह तरह के आयाम हैं  उनसे संभल कर रहने की ज़रूरत है .मुख्य चुनाव  आयुक्त ने वोटर लिस्ट के बारे में एक बात कही जो सभी जानते हैं .   बहुत सारे ऐसे लोग  भी  हैं जो एक से अधिक स्थानों पर मतदाता सूची में नाम लिखवा लेते हैं.  इस तरह की वोटर लिस्ट चुनाव प्रक्रिया में बाधा पंहुचाती है . उन्होंने बंगलूरू का  उदाहरण दिया कि वहां मतदान का प्रतिशत बहुत कम था . आयोग ने जांच किया तो पता लगा  कि ऐसे बहुत सारे लोग थे जिनके नाम तो वोटर लिस्ट में मौजूद थे  लेकिन वे बहुत पहले शहर छोड़कर जा चुके थे . इस तरह की  समस्याओं को भी चुनाव सुधार के बुनियादी सवालों के साथ जोड़कर देखना होगा .
अपना लोकतंत्र सजीव  है , सक्रिय है और उर्ध्वगामी है लेकिन अब वक़्त आ  गया है कि चुनाव सुधारों को  गंभीरता से लिया जाए और अपने लोकतंत्र पर भावी पीढ़ियों के लिए एक मज़बूत विरासत के रूप में गर्व करने के अवसर दिए जाएँ .

Saturday, September 15, 2018

हमें रवीश कुमार पर गर्व है

.Ab Fb Comment written on 15 September 2017

आजकल टेलिविज़न दर्शकों और इंटरनेट मीडिया के ज़रिये सक्रिय लोगों में रवीश कुमार को गाली देने का फैशन चल पड़ा है. समाज के एक असहिष्णु वर्ग को रवीश कुमार सही आदमी नहीं लगते . लेकिन वही रवीश कुमार जब पुराने शासक दल की धज्जियां उड़ाते थे तो आज उनको गरियाने वाले उनकी तारीफों के पुल बांधा करते थे .
चारणपंथी चापलूसी को पत्रकारिता कहने वाले इन वर्गों को रवीश कुमार को समझने के लिए पत्रकारिता के उस गौरवशाली इतिहास  को समझना पड़ेगा जिसमें बड़े से बड़े हुक्मरानों से पंगा लेना स्वधर्म मना जाता था. हमें मालूम है कि चंद बरदाई ने पृथ्वीराज का जो गुणगान किया है वह गलत है , हम जानते हैं कि परमाल रासो के कवि जगनिक ने पेट के वास्ते आल्हा ऊदल को महान बताया था . हर दौर में इस तरह के लोग होते हैं . आज भी एक बड़ा वर्ग पेट  के वास्ते पत्रकारिता की राह पर चलता है . हम यह भी जानते हैं कि उस दौर में भी बागी कवि थे जिनको सत्ता की तलवारों ने मौत के घाट उतार दिया था. हम जानते हैं जब स्थापित सत्ता के खिलाफ गोस्वामी तुलसीदास ने मैदान लिया था तो हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने उनको काशी से भगाया था क्योंकि वे शासक वर्गों की भाषा में नहीं लिखते थे , वे आम आदमी की बोलचाल की भाषा की पक्षधरता करते थे . हमें मालूम है कि संत तुलसीदास को भगवान राम की अयोध्या से दुकानदार रामभक्तों ने इसलिए भगाया था कि वे रामचरित को साधारण तरीके से आम आदमी तक पंहुचाते थे और पंडों की बिचौलिया तानाशाही को नुक्सान पंहुंचा रहे  थे.  आज वही संत तुलसीदास  भगवान राम और उनकी कथा के सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं .
सच्ची बात कहने वाले  को सत्ता का दलाल कभी बर्दाश्त नहीं करते . रवीश कुमार एक कबीरपंथी पत्रकार  हैं . उस निर्गुण ,जिसे ईमानदार पत्रकारिता कहते हैं , के साधक हैं . मुझे गर्व है कि एन डी टी वी में एक मामूली नौकर के रूप में  मैं काम करता था जब रवीश कुमार अपनी पत्रकारिता को धार दे रहे थे. मैंने  रवीश कुमार के उस दौर को देखा है जब रवीश नाम की यह फौलाद एक  शक्ल अख्तियार कर रही थी . मैंने रवीश कुमार को इतिहास की उन बारीकियों को समझते  देखा है जिनके कारण वह अजेय हो जाता है .

रवीश मैं तुम्हारे साथ हूँ . तुम्हारी लाश को कंधा देने नहीं आऊँगा , मेरी इच्छा है कि अगर यह सत्ता के दीवाने तुम्हें कभी शहीद करें तो वहीं आसपास मेरी भी लाश कहीं पडी मिले. रवीश हमें तुम पर  गर्व है . हमने इतिहास की किताबों में देखा है कि किस तरह से मुग़ल सम्राट अकबर के चमचों ने महाराणा प्रताप को घास की रोटियाँ खाने के लिए मजबूर कर दिया था, हमने देखा है कि किस तरह अंग्रेजों  के चमचों ने महात्मा गांधी को अदालत में देशद्रोही साबित कर दिया था .इनकी ताक़त अपरम्पार होती है . इनसे बचकर रहने की ज़रुरत नहीं है . इनको यह बताने की ज़रुरत है कि जब एक गांधी का अपमान होता  है तो पूरा देश गांधी के साथ खड़ा होता  है.
 मुझे गर्व है की मैंने और तुमने एक ही डेस्क शेयर किया था कभी. रवीश कुमार का दोस्त होकर मैं अपने को धन्य महसूस करता हूँ .

Friday, September 14, 2018

हिंदी दिवस के बाद भी हिंदी पर ध्यान देने की ज़रूरत है.


शेष नारायण सिंह


एक हिंदी दिवस और बीत गया। सरकारी विभागों में सरकारी कार्यक्रम हुए , शपथ ली गयी  और शाम होते-होते हिंदी का काम पूरा हो गया लेकिन सरकार की कृपा से  हिंदी नहीं चलती। वह जनभाषा और महात्मा गांधी की विरासत है। वह उसी  पाथेय के साथ बुलंदियों के मुकाम हासिल करती रहेगी। आज से ठीक सौ साल पहले 1918  में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में महात्मा गांधी ने हिंदी को आजादी की लड़ाई के एजेंडे पर रख दिया था। उन्होंने कहा था किभारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को ही बनाया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी जनमानस की भाषा है। जब देश आजाद हुआ तो संविधानसभा ने 14  सितम्बर 1949 के दिन एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास करके तय किया कि हिंदी ही स्वतंत्र भारत की राजभाषा होगी। संविधान के अनुच्छेद 343 (1 ) में लिखा है- कि ,  ''संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।
संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा'' महात्मा गांधी के भाषण के बाद स्वत्रंतता की लड़ाई में हिंदी को महत्वपूर्ण स्थान मिलना शुरू  हो गया। इस सन्दर्भ में महान पत्रकारशहीद गणेश शंकर विद्यार्थी का वह भाषण बहुत ही जरूरी दस्तावेज है जो उन्होंने 1930 में हिंदी साहित्य सम्मलेन के गोरखपुर अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में दिया था। गौर करने की बात है कि 1930 में महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई के सर्वमान्य नेता  बन चुके थे, 1930 में कांग्रेस ने देश की पूर्ण स्वतंत्रता का ऐलान कर दिया था और दांडी मार्च के माध्यम से पूरी दुनिया में महात्मा गांधी की नेतृत्व शक्ति  का डंका बज चुका था।  वैसे  विश्वपटल पर जनमानस के नेता के रूप में तो महात्मा गांधी 1920 के आन्दोलन के बाद ही स्थापित हो चुके थे।
कलकत्ता से छपने वाले महत्वपूर्ण अखबार, ''मतवाला'' के तस्दीक है कि जब भारत के  कम्युनिस्ट नेताएमएन रॉय ने दूसरी कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में सिद्धान्त  प्रतिपादित करने की कोशिश की कि 1920  का आन्दोलन कोई खास महत्व नहीं रखता और गांधी एक मामूली राजनीतिक नेता हैं  तो लेनिन ने उनको डपट दिया था और कहा था कि, ''गांधी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लाखों-लाखों लोगों का विराट जन-आन्दोलन चला रहे हैंवह साम्राज्यवाद-विरोधी हैं।  वह क्रांतिकारी हैं?'' आशय यह है कि 1930 तक महात्मा गांधी दुनिया के बड़े क्रांतिकारी नेताओं में बहुत ही सम्मानित व्यक्ति बन चुके थे और उनके हस्तक्षेप के कारण  आजाादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों में ही यह तय हो गया था कि हिंदी को स्वतंत्र भारत में सम्मान मिलने वाला है।
1930 के बाद तो कांग्रेस के अधिवेशनों में भी हिंदी को बहुत महत्व मिलने लगा था। इस सन्दर्भ में जब गणेश शंकर विद्यार्थी का भाषण देखते हैं तो बात ज्यादा साफ समझ में आ जाती है। अपने भाषण में स्व. विद्यार्थी जी ने एक तरह से भविष्य का खाका ही खींच दिया है। उन्होंने कहा  कि,
''हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य का भविष्य बहुत बड़ा है। उसके गर्भ में निहित भवितव्यताएं इस देश और उसकी भाषा द्वारा संसारभर के रंगमंच पर एक विशेष अभिनय कराने वाली हैं। मुझे तो ऐसा भासित होता है कि संसार की कोई भी भाषा मनुष्य-जाति को उतना ऊंचा उठानेमनुष्य को यथार्थ में मनुष्य बनाने और संसार को सुसभ्य और सद्भावनाओं से युक्त बनाने में उतनी सफल नहीं हुईजितनी कि आगे चलकर हिन्दी भाषा होने वाली है । ...मुझे तो वह दिन दूर नहीं दिखाई देताजब हिन्दी साहित्य अपने सौष्ठव के कारण जगत-साहित्य में अपना विशेष स्थान प्राप्त करेगा और हिन्दीभारतवर्ष-ऐसे विशाल देश की राष्ट्रभाषा की हैसियत से न केवल एशिया महाद्वीप के राष्ट्रों की पंचायत मेंकिन्तु संसारभर के देशों की पंचायत में एक साधारण भाषा के समान न केवल बोली भर जाएगी किन्तु अपने बल से संसार की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भरपूर प्रभाव डालेगी और उसके कारण अनेक अन्तरराष्ट्रीय प्रश्न बिगड़ा और बना करेंगे।''
आज उनके भाषण के करीब नब्बे साल बाद उनकी भविष्यवाणी पर गौर करने से समझ में आ जाता  है कि हिंदी भाषाजिसको महात्मा गांधी ने जनभाषा कहा थावह  वास्तव में मानवता के एक बड़े हिस्से के लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी। महात्मा गांधी कोई भी विषय अधूरा नहीं छोड़ते थे। उन्होंने राजभाषा के सम्बन्ध में बाकायदा बहस चलवाई और आखिर में   सिद्धांत भी प्रतिपादित कर दिया। महात्मा गांधी  के अनुसार राष्ट्रभाषा बनने के लिए किसी भाषा में पांच बातें अहम हैं : पहला- उसे सरकारी अधिकारी आसानी से सीख सकें। दूसरा- वह समस्त भारत में धार्मिकआर्थिक और राजनीतिक संपर्क के माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम होतीसरा- वह अधिकांश भारतवासियों द्वारा बोली जाती होचौथा- सारे देश को उसे सीखने में आसानी हो,और पांचवां- ऐसी भाषा को चुनते समय फैसला करने वाले अपने क्षेत्रीय या फौरी हित से ऊपर उठकर फैसला करें।''  गांधी जी को विश्वास था कि हिन्दी इस कसौटी पर सही उतरती है।
देश के आााद होने पर संविधान सभा की जिस बैठक में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का हुआ उसमें सभी सदस्य मौजूद थे और एकमत से फैसला लिया गया। महात्मा गांधी तब जीवित नहीं थे लेकिन देश ने उनकी विरासत को सम्मान दिया और संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित कर दिया। हालांकि यह भी सच है कि संविधान सभा की घोषणा और संविधान में स्थान पाने के बाद भी हिंदी उपेक्षित ही रही। सरकारी स्तर पर  गति तब आई जब जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में 1963 में राजभाषा अधिनियम संसद में पास कर लिया गया और राजभाषा के सम्बन्ध में एक नया कानून बन गया। उसके बाद ही शब्दावली आदि के  लिए समितियां बनीं। लेकिन समितियां भी सरकारी  ही थीं। ऐसे-ऐसे शब्द बना दिए गए जो सीधा संस्कृत से उठा लिए गए थे। उन्हीं सरकारी शब्दों की महिमा है कि कई बार तो हिंदी में आई सरकारी चि_ियों के भी हिंदी अनुवाद की जरूरत पड़ जाती है।
यह बात भी निर्विवाद है कि किसी भी भाषा के विकास के लिए ऐसे उच्च कोटि के साहित्य की जरूरत होती है जो जनमानस की जबान पर चढ़ सके। अपने यहां हिंदी भाषा के विकास में कबीरसूर और तुलसी का जितना योगदान है उतना किसी का नहीं। बाद में भी जिन महान साहित्यकारों ने हिंदी को जनभाषा  बनाने में योगदान किया है उनको भी हिंदी दिवस पर याद करना जरूरी होता है।  हमारा सर उनके सम्मान में सदा ही झुका रहेगा। हिंदी को खड़ी बोली मानने वालों को समझ लेना चाहिए कि अगर अंग्रेजों ने भी इसी तरह की शुद्धता के आग्रह रखे होते तो उनकी अंग्रेजी भाषा का विकास भी नहीं हुआ होता।  खड़ी बोली हिंदी की विकास यात्रा में एक अहम मुकाम जरूर है लेकिन खड़ी बोली ही हिंदी नहीं हैहिंदी उसके अलावा भी बहुत कुछ  है।
आजकल हिंदी के साथ तरह-तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं। अभी तीस साल पहले की बात है कि कुछ अखबारों ने हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर भाषा चलाने की कोशिश की और उसी को हिंदी मनवाने पर आमादा थे।  कहते थे कि अब हिंदी नहीं हिंगलिश का जमाना है। दावा करते थे कि अब यही भाषा चलेगी। लेकिन आज उन संपादकों का भी कहीं पता नहीं है और उस भाषा को भी अपमान की दृष्टि से देखा जाता है। आजकल टेलीविान में  नौकरी करने वालों को मुगालता है कि जो उल्टी-सीधी हिंदी वे लोग लिखते बोलते  हैंवही हिंदी है। समय से बड़ा कोई जज नहीं होता। करीब पन्द्रह साल पहले हिंदी के साथ खिलवाड़ करने का यह सिलसिला शुरू हुआ था। इस अभियान के कुछ पुरोधा तो आजकल दिल्ली के टीवी दफ्तरों के आसपास नौकरी की तलाश करते पाए जाते हैं। और कुछ लोगों ने अन्य धंधे कर लिए हैं।  टेलीविज़न समाचारों में भी हिंदी जनभाषा के रूप में अपनी स्वीकार्यता सुनिश्चित कर रही है। और भाषा के नाम पर मनमर्जी करने वाले रास्ते से अपने आप हटते जा रहे हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हिंदी सिनेमा में भी सड़क छाप लोगों का एक तरह  से कब्जा ही हो गया था। फ़िल्मी कहानी लिखने वालों को मुंशी कहा जाता था। मुंशी वह प्राणी होता था जो हीरो या फिल्म निर्माता की चापलूसी करता रहता था और कुछ भी कहानी के रूप में चला देता था।  उन मुंशियों के प्रभाव के दौर में प्रेमचंद और अमृतलाल नगर जैसे महान लेखकों की कहानियों पर बनी फिल्में भी व्यापारिक सफलता नहीं पा सकीं। उन दिनों ज़्यादातर फिल्मों में प्रेम त्रिकोण होता थाखलनायक होता था और लगभग सभी कहानियां एक जैसी ही होती थीं। लेकिन जब सिनेमा का विकास एक स्थिर मुकाम तक आ गया तो ख्वाजा अहमद अब्बास,श्याम बेनेगल जैसे लोग आए और सार्थक सिनेमा का दौर  आया। इस दौर में सही तरीके से लिखी गई हिंदी की कहानियां फिल्मों में इज्जत का मुकाम पा सकीं। और अब तो कहानी की गुणवत्ता पर भी चर्चा होती  है। सही हिंदी बोली जाती है और भाषा अपनी रवानी पकड़ चुकी है। ऐसा लगता है कि टेलीविजन की खबरों की भाषा में भी ऐसा ही कुछ होना शुरू हो गया है। वेलकम बैक बोलने वाले अब खिसक रहे  हैं।  हिंदी वाक्यों में अंग्रेजी  चपेकने  की जिद  करने वाले एक न्यूज चैनल के मालिक बुरी तरह  से कर्ज में डूब चुके हैं। सही हिंदी बोलने वाले समाचार वाचकों की स्वीकार्यता बढ़ रही है।
 ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इतिहास में भी हिंदी के साथ इस तरह के अन्याय हुए हैं। तुलसी दास के ही समकालीन रामचरित के एक रचयिता कवि केशवदास भी हुए हैं। उनके अलावा और भी बहुत सारे कवियों ने राम के चरित्र को अपने काव्य का विषय बनाया।  उनका कहीं पता नहीं। केशवदास को तो बाद के विद्वानों ने ''कठिन काव्य का प्रेत'' कह डाला जबकि रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसी दास का मुकाम हिंदी साहित्य में अमर हैऔर रामकथा के गायकों में कोई भी उन जैसा  नहीं है। इसका कारण यह है कि तुलसी बाबा ने अपने समय की जनभाषा हिंदी में कविताई की और किसी राजा या सामंत की चापलूसी नहीं की।''हिंदी की विकास यात्रा चालू है और उसमें अपने तरीके से लोग अपनी-अपनी भूमिका भी निभा रहे  हैं और योगदान भी कर रहे हैं। बहादुरशाह जफर ने फरमाया
 है-
ए चमन यूं ही रहेगा और हजारों बुलबुलें,

अपनी-अपनी बोलियां सब बोल कर उड़  जायेंगे। 

Tuesday, September 11, 2018

जिसने भी अमरीका से दोस्ती की , बाद में पछताया ज़रूर इसलिए ज़रा संबल के सरकार

  

शेष नारायण सिंह


भारत और अमरीका के बीच दोस्ती बढ़ रही है .  दोस्ती बढ़ने का कारण एक ही है . भारत और अमरीका चीन की बढ़ती ताक़त से चिंता में हैं . भारत के पड़ोस में चीन का प्रभाव रोज़ ही बढ़ रहा है . दक्षिण एशिया के कई देशों में चीन ने बंदरगाह बनाने का काम बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है . नेपाल भारत का पुराना और पारंपरिक दोस्त हुआ करता था लेकिन अब वहां भी ऐसी विचारधारा की सरकार बन गयी है जिसके बाद नेपाल की चीन  से दोस्ती बढ़ गयी है .मालदीव एक ऐसा देश था  जो भारत का बहुत ही अपना माना जाता था , वहां से भी जो ख़बरें आ रही हैं उसके अनुसार अब मालदीव भी चीन का ज़्यादा करीबी हो गया है. बंगलादेश और भूटान से भारत के अच्छे सम्बन्ध अभी भी बने हुए हैं  लेकिन वे भी ऐलानियाँ चीन के खिलाफ भारत के साथ  नहीं आयेंगे.  डोकलाम विवाद पर भूटान की तरफ से कुछ एडजस्टमेंट के संकेत पहले से ही मिल चुके  हैं . पाकिस्तान अब  चीन का सबसे भरोसेमंद सहयोगी बन गया है . कश्मीर में जिस हिस्से पर पाकिस्तान का  गैर कानूनी  क़ब्ज़ा है , उसमें उसने चीन को सड़क बनाने की  अनुमति देकर भारत को कमज़ोर  करने की  कोशिश की है. पाकिस्तान के कब्जे वाले बलोचिस्तान में चीन बहुत बड़ा बंदरगाह बना रहा है .  पाकिस्तान और मालदीव में बन  रहे चीनी बंदरगाह घोषित रूप से व्यापारिक उद्देश्य से बनाए जा रहे  हैं लेकिन अगर ज़रूरत पड़ी तो उनको सैनिक इस्तेमाल में लेने  से कौन रोक सकता  है . जिन देशों में भी चीन के बंदरगाह बन रहे हैं उनको उसने बहुत ही ज़्यादा क़र्ज़ दे रखा  है . अफ्रीका के ज्यादातर देशों में भी चीन के बहुत सारे  प्रोजेक्ट हैं . कुछ  देशों की तो पूरी अर्थव्यवस्था ही चीन की मदद से चल रही है . रवांडा आदि कुछ ऐसे देश हैं जिनकी सरकार के बहुत से दफ्तर तक चीन द्वारा बनाई हुयी और चीन की मालिकाना अधिकार वाली इमारतों में है . आज चीन हिन्द महासागर क्षेत्र के  बहुत सारे देशों को आर्थिक  सहायता देकर उनको अपने प्रभाव क्षेत्र में ले चुका है .
भारत से चीन के रिश्ते १९६२ के युद्ध के बाद बहुत ज़्यादा बिगड़ गए थे. १९८८ में  राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व के समय थोड़ा बहुत आवाजाही शुरू हुई लेकिन अभी भी  दोस्ती के सम्बन्ध नहीं हैं . प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने कई बार चीन की यात्रा आदि करके रिश्तों को सुधारने की कोशिश की है लेकिन दो देशों के बीच रिश्ते निजी संबंधों से नहीं सुधरते ,वहां तो सभी देश अपने अपने राष्ट्रहित के हिसाब से काम करते हैं . एशिया प्रशांत और  हिन्द महासगार के क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से भारत  तो चिंतित है ही, अमरीका में भी बहुत चिंता है . अमरीका की कोशिश है कि  इस इलाके में चीन के प्रभाव पर लगाम  लगाने के लिए भारत को इस्तेमाल किया जाए . उसको मालूम है कि चीन के दबदबे को कम करने के लिए भारत भी अमरीका से  दोस्ती को और अधिक बढ़ाएगा ,  व्यापारिक और सामरिक रिश्ते बढ़ाएगा और इस इलाके में अमरीकी हितों की रक्षा करने के लिए भी तैयार हो सकता है .
इसी सोच के तहत कई महीनों से भारत और अमरीका के बीच विदेशमंत्री और रक्षामंत्री के स्तर पर बातचीत की कोशिश चल रही  है.  दो+दो नाम से चर्चित यह बैठक  पहले अमरीकी राजधानी  वाशिंगटन में होने वाली थी लेकिन किन्हीं कारणों से नहीं हो पाई  थी . अब जाकर सितम्बर के पहले हफ्ते में यह  बैठक दिल्ली में हुयी जिसमें दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री शामिल हुए .बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैनिक  संबंधों को मजबूती देना था . समझौते पर दस्तखत भी हो गए .Communication Compatibility and Security Agreement नाम के समझौते के तहत अमरीका भारत के लिए हाईटेक संचार प्लेटफार्म उपलब्ध कराएगा. अभी तक दोनों देशों के बीच  रेडियो चैनलों के ज़रिये ही   संवाद होता था . भारत की रक्षामंत्री  निर्मला सीतारमण ने अमरीका के रक्षामंत्री और विदेशमंत्री की मौजूदगी में बताया कि रक्षा के  क्षेत्र में सहयोग दोनों देशों के बीच सामरिक साझेदारी का ऐसा मंच है जिसके सहारे आपसी  सहयोग बढेगा और रक्षा समझौता दोनों देशों के बीच  संबंधों का मुख्य ड्राइवर बनेगा . यह भी वायदा किया गया  है कि दोनों  देशों की  नेवी, एयर फ़ोर्स और आर्मी के बीच अगले साल दोस्ताना सैनिक आभ्यास भी किये जायेंगें .

समझौता वगैरह तो ठीक है लेकिन दोनों ही देश अभी एक  दूसरे पर पूरा विश्वास नहीं कर पा रहे हैं . अमरीका को  यह चिंता है कि भारत इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने में अमरीका के कितने काम आयेगा . अमरीका में इस बात से भी नाराज़गी है कि भारत की इरान से  जो व्यापारिक दोस्ती है उसको कितना कम करेगा . भारत में भी अमरीका को हमेशा शक की नज़र से देखा जाता है. अमरीका की समस्या यह है कि वह  जिस देश से भी दोस्ती करता है उसको अपने ऊपर पूरी तरह से निर्भर बनाना चाहता है . पड़ोस के पाकिस्तान का  उदाहरण सबके सामने है . अमरीका को भारत से उम्मीद है कि उसने  रूस से जो मिसाइल और हवाई डिफेंस सिस्टम की खरीद का एस-४०० नाम का सौदा किया है उसको भी ख़त्म कर दे . अमरीका की  संसद ने उन देशों पर आर्थिक पाबंदी लगा रखी है जो रूस से सैनिक साजो-सामान खरीदते हैं . भारत ने साफ़ कर दिया है कि वह सौदा तो हो चुका है और उसमें कोई बदलाव  नहीं किया जाएगा . ज़ाहिर है  कि अमरीका को भारत से  दोस्ती बढ़ाना है तो इस पाबंदी को अमरीकी राष्ट्रपति को माफ़ करना पडेगा . अमरीका की यह भी मांग है कि भारत आगे से इरान से पेट्रोलियम की खरीद बंद कर दे . अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इरान से एक परमाणु  समझौता कर रखा था . डोनाल्ड  ट्रम्प ने उसको रद्द कर दिया . अब नाराज़ ट्रंप  इरान की आर्थिक नाकेबंदी करना चाहते हैं . उन्होंने ऐलान का रखा है कि जो इरान से कच्चा तेल खरीदेगा उस देश पर पाबंदी लगा दी जायेगी . लेकिन भारत ने साफ़ कर दिया है कि हमारे यहाँ कुछ ऐसी रिफाइनरी हैं जिनमें केवल इरान से आया हुआ तेल ही इस्तेमाल किया जा सकता है . दर असल भारत के डिप्लोमैट बहुत ही कुशल अधिकारी हैं . उनको मालूम है कि पकिस्तान से अमरीका के रिश्ते खराब होने के बाद इस इलाके में उसको भारत के अलावा और किसी का सहयोग नहीं मिलेगा . इसलिए वह अमरीका की उन कोशिशों को  ज़्यादा महत्व नहीं देगा जिसके तहत अमरीका भारत को उसी तरह अपने ऊपर निर्भर करना चाहता है जिस तरह से उसने  पाकिस्तान को अपने अधीन ही कर लिया था.
नई दिल्ली आने के पहले अमरीकी विदेश मंत्री  पाम्पियो  पांच घंटे के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद भी   गए थे. अभी कुछ दिन पहले अमरीका ने ऐलान किया था कि वह पाकिस्तान को मिलने  वाले  ३० करोड़ डालर के सैनिक सहयोग को मुल्तवी कर रहा है. पाकिस्तान में इस बात को लेकर बहुत गुस्सा है क्योंकि इसी साल अमरीका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली एक अन्य मदद को भी रोक दिया था . वहां के नेता और पत्रकार इस बात को खूब तूल दे रहे हैं और आम तौर पर अमरीका के खिलाफ माहौल बना रहे हैं लेकिन  अमरीकी विदेशमंत्री की यात्रा के दौरान इस विषय पर कोई  चर्चा नहीं हुयी .अब पाकिस्तान में माना जाता  है कि अमरीका एक  तरह से दादागीरी करता है और  अब वह भारत को ज़्यादा महत्व देता है . पाकिस्तान में अमरीका के प्रति नाराज़गी है  लेकिन प्रधानमंत्री इमरान खान ने ऐसा माहौल बनाया कि विदेशमंत्री  पोम्पियो की यात्रा के दौरान कोई भी अप्रिय माहौल न  बनने पाए .
पाकिस्तान कभी अमरीका का एक तरह से गुलाम देश हुआ करता था लेकिन अब वह चीन के खेमे में हैं . अमरीका को इस इलाके में एक वफादार मुल्क की ज़रूरत है जो  पाकिस्तान से रिश्ते खराब होने की भरपाई कर सके. भारत को बहुत ही सावधान रहना पडेगा कि कहीं वह अमरीका का वैसा दोस्त न बन जाये जैसा कभी पाकिस्तान हुआ करता है . हमारे हुक्मरानों पर लाजिम  है कि वे भारत की हैसियत अमरीका के चेला जैसी न होने दें .