Wednesday, January 13, 2021

आज ( 14 जनवरी ) आर एन द्विवेदी की पुण्यतिथि है

 

लोकतंत्र को पत्रकारिता की ज़रूरत है

शेष नारायण सिंह

अमरीकी इतिहास में डोनाल्ड ट्रंप पहले ऐसे राष्ट्रपति होने का अपमान हासिल करने में कामयाब हो  गए हैं जिन पर दो बार महाभियोग चलाया गया . बुधवार को जब प्रतिनिधि सभा ने उनपर महाभियोग चलाने के पक्ष में मतदान किया तो उनकी रिपब्लिकन पार्टी के भी दस सदस्यों ने भी उनके खिलाफ वोट दिया . उसके तुरंत बाद उन्होंने एक वीडियो जारी करके अपना बचाव करने की कोशिश की लेकिन अमरीकी मीडिया ने उनके बयान में दिए  गए एक एक झूठ का नीर क्षीर विवेचन कर दिया . छः जनवरी को ही उन्होंने अपने समर्थकों को उकसाकर अमरीकी संसद भवन, कैपिटल , पर हमला करने के लिए भेज दिया था.  महाभियोग के बाद जारी बयान में उन्होंने अपने आपको पीड़ित साबित करने की कोशिश की . पिछले एक हफ्ते  में लोकतंत्र के खिलाफ जितना काम अमरीका के निवर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप ने किया है  उसकी एक एक बात की जानकारी पूरी दुनिया को मिल चुकी है . ऐसा संभव इसलिए हुआ कि अमरीकी संविधान में पहले संशोधन के बाद से ही यह व्यवस्था है कि अमरीका में  अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी होगी और अमरीकी मीडिया इस प्रावधान का पूरा लाभ उठाता है और अमरीकी  लोकतंत्र के निगहबान के रूप में मौजूद रहता है . अमरीकी मीडिया में सत्य के प्रति प्रतिबद्धता हर मुकाम पर देखी जा सकती है .नतीजा यह  है कि ट्रंप के बावजूद अमरीकी  राष्ट्र जितना सुरक्षित था ,आज भी उतना ही सुरक्षित है .  छः जनवरी के पहले और बाद में अमरीकी पत्रकारिता ने जो बुलंदियां स्थापित की हैं उनपर दुनिया के हर निष्पक्ष पत्रकार को  गर्व होना  चाहिए .

इस बात में दो राय  नहीं हो सकती कि लोकतंत्र के लिए पत्रकारिता एक जीवनदायिनी शक्ति है . जिन देशों में भी  लोकतंत्रीय व्यवस्था कायम है वहां की पत्रकारिता काफी हद तक उस व्यवस्था को जारी रखने के लिए ज़िम्मेदार है . अपने यहाँ भी  प्रेस की ज़िम्मेदारी भरी आजादी की अवधारणा संविधान में हुए पहले संसोधन  से ही आती है .आज़ादी के बाद  हमारे  संस्थापकों ने प्रेस की आज़ादी का प्रावधान  संविधान में ही कर दिया लेकिन जब उसका ट्रंप की तरह दंगे भड़काने के लिए इस्तेमाल होने लगा तो संविधान में पहले संशोधन के ज़रिये उसको  और ज़िम्मेदार बना दिया गया . . संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता की जो व्यवस्था दी गयी है,उसपर कुछ पाबंदी लगा दी गयी .और  प्रेस की  आज़ादी को निर्बाध ( अब्सोल्युट ) होने से रोक दिया गया . संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उसकी सीमाएं तय कर दी  गयीं .  संविधान में लिख दिया गया  कि  अभिव्यक्ति की आज़ादी के "अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडताराज्य की सुरक्षाविदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधोंलोक व्यवस्थाशिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमानमानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी"  यह भाषा सरकारी है लेकिन बात समझ में आ जाती है .

संविधान के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की ज़िम्मेदारी  है . अगर सरकार के खिलाफ मीडिया कोई ज़रूरी बात उजागर करता है तो सरकार का कर्तव्य है कि मीडिया की सुरक्षा करें . हमने देखा है कि कई बार असुविधाजनक लेख लिखने के कारण सत्ताधारी पार्टियों की शह पर पत्रकारों की हत्याएं भी होती हैं .असुविधाजनक लेख लिखने के लिए अगर लोगों की हत्या की जायेगी तो बहुत ही मुश्किल होगी . लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही  सवालिया निशान  लग जाएगा.  इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया  गया है और उतनी ही मुश्किल से इसको संवारा गया है . स्वतंत्र मीडिया सरारों की रक्षा करता है ,असत्य आचरण करने वाला चापलूस मीडिया सरकारी पक्ष का ज़्यादा नुक्सान करता है .इसलिए सरकारों को मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए .तत्कालीन प्रधानमंत्री  इंदिरा  गांधी ने यह गलती 1975 में की थी. इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दिया था . सरकार के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकती थी. टीवी और रेडियो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थे , इंदिरा जी  के पास  तक  सूचना पंहुचा सकने वालों में सभी चापलूस होते थेइसलिए उनको  सही ख़बरों का पता  ही नहीं लगता था . उनको  बता दिया गया कि देश में उनके पक्ष में बहुत भारी माहौल है और वे दुबारा भी बहुत ही आराम से चुनाव जीत जायेंगीं . उन्होंने उसी सूचना के आधार पर  चुनाव करवा दिया और १९७७ में चुनाव हार गयीं . लेकिन यह हार एक दिन में नहीं हुई . उसकी तह में जाने पर समझ में आयेगा कि  इंदिरा गांधी के भक्त और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रेस सेंसरशिप के दौरान नारा दिया था कि  ' इंदिरा इज इण्डिया ,इण्डिया इज  इंदिरा ,' इसी .तरह से जर्मनी के तानाशाह हिटलर के तानाशाह बनने के पहले उसके एक चापलूस रूडोल्फ हेस ने नारा दिया था कि  ,' जर्मनी इस हिटलर , हिटलर इज जर्मनी '.   रूडोल्फ हेस नाजी पार्टी में बड़े पद पर था .मौजूदा शासकों को इस तरह की प्रवृत्तियों से बच कर रहना चाहिए  क्योंकि मीडिया का चरित्र बहुत ही अजीब होता  है . इमरजेंसी के दौरान पत्रकारों का एक वर्ग किसी को भी आर एस एस का  सदस्य  बताकर गिरफ्तार करवाने की फ़िराक में रहता था . जैसे आजकल किसी को अर्बन नक्सल पह देने  का फैशन हो गया है .उस दौर में भी बहुत सारे पत्रकारों ने आर्थिक लाभ के लिए सत्ता की चापलूसी में चारण शैली में पत्रकारिता की . गौर करने की बात यह है कि इंदिरा गांधी  जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं जिन्होंने अपने खिलाफ लिखने  वालों को खूब उत्साहित किया था . एक बार उन्होंने कहा था कि मुझे पीत पत्रकारिता से नफरत  है लेकिन मैं किसी पत्रकार के पीत पत्रकारिता करने के अधिकार की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करूंगा . नेहरू ने पत्रकारिता और लोकशाही को जिन बुलंदियों तक पंहुचाया था ,सत्तर के दशक में उन मूल्यों में बहुत अधिक क्षरण हो गया था . पत्रकारिता में क्षरण का ख़तरा आज भी बना हुआ है . चारण पत्रकारिता  सत्ताधारी पार्टियों  की सबसे  बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें गलत फैसला लेती हैं . ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे  . चापलूस पत्रकारों से पिंड छुडाये .  एक आफ द रिकार्ड बातचीत में बीजेपी के मीडिया से जुड़े एक नेता ने बताया कि जो पत्रकार टीवी पर हमारे पक्ष में नारे लगाते रहते है , वे हमारी पार्टी का बहुत नुक्सान करते हैं . भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं में इस तरह की सोच एक  अच्छा संकेत है . सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के  अधिकार और आज़ादी को सुनिश्चित करे . साथ ही संविधान के अनुच्छेद १९(२) की सीमा में  रहते हुए कुछ भी लिखने की  आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे . इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा.  ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय  कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करें वालों को हतोत्साहित करे.

आज ( 14 जनवरी ) ऐसे ही एक पत्रकार की पुण्यतिथि है .  उस वक़्त की सबसे आदरणीय समाचार एजेंसी , यू एन आई के लखनऊ ब्यूरो चीफ , आर एन द्विवेदी का  1999 में इंतकाल हो गया था . करीब चौथाई शताब्दी तक उन्होंने लखनऊ की राजनीतिक घटनाओं को बहुत करीब से देखा था . उन  दिनों चौबीस घंटे टीवी पर ख़बरें नहीं आती  थी. इसलिए हर सत्ताधीश एजेंसी के ब्यूरो चीफ के करीब होने की कोशिश करता था .  उस दौर में बहुत सारे पत्रकारों ने सत्ताधारी पार्टी की जयजयकार करके बहुत सारी संपत्ति भी बनाई लेकिन लखनऊ में विराजने वाले इस फ़कीर ने केवल सम्मान  अर्जित किया . पक्ष विपक्ष की सभी ख़बरों को जस की तस ,कबीर साहेब की शैली में प्रस्तुत करते रहे और जब इस दुनिया से विदा हुए तो  अपने पेशे के प्रति ईमानदारी का परचम  लहराकर गए . उन्हीं की बुलंदी के एक पत्रकार ललित सुरजन को पिछले महीने हमने खोया है . यह लोग सत्तर के दशक की पत्रकारिता के  गवाह  हैं. मैं मानता हूँ कि भारत के राजनीतिक इतिहास में जितना महत्व 1920 से  1947 का  है , उतना ही महत्व 1970 से   2000 तक कभी है . जितना परिवर्तन उस दौर में हुआ उसने आने वाले दशकों या शताब्दियों की दिशा तय की. आज़ादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों से ही उत्तर प्रदेश की राजनीतिक .घटनाएं इतिहास को प्रभावित करती रही हैं . इन तीस  वर्षों में भी उत्तर प्रदेश में जो भी हुआ उसका असर  पूरे देश की राजनीति पर पड़ा. कांग्रेस का  विघटन, इमरजेंसी का लगना , वंशवादी राजनीति की स्थापना , जनता पार्टी का गठन और उसका विघटन  , भारतीय जनता पार्टी की स्थापना , बाबरी मस्जिद के खिलाफ आन्दोलन , उसका विध्वंस , दलित राजनीति का उत्थान,  समाजवादी सोच के साथ राजनीति  में भर्ती हुए लोगों के लालच की घटनाएँ , केंद्र में गठबंधन सरकार की स्थापना , मंडल कमीशन लागू होना , केंद्र में बीजेपी की अगुवाई  में सरकार की स्थापना अदि ऐसे विषय हैं जिन्होंने देश के भावी इतिहास की दिशा तय की है . इन राजनीतिक गतिविधियों में इंदिरा गांधी , संजय  गांधी, राजीव गांधी ,चौ चरण सिंह, चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी ,अशोक सिंघल,विश्वनाथ प्रताप सिंह , मुलायम सिंह यादव , कल्याण सिंह , कांशीराम ,मायावती और राजनाथ सिंह की भूमिका से कोई भी इनकार नहीं कर सकता . इन सबको बहुत करीब से  देखते और रिपोर्ट करते हुए आर एन द्विवेदी ने देश और दुनिया को बाखबर रखा  और पत्रकारिता का सर्वोच्च मानदंडों को  जीवित रखा .इसलिए उनको जानने वाले उनकी तरह की पत्रकारिता को बहुत ही अधिक महत्व देते हैं .

हम जानते हैं कि देश के लोकतंत्र की रक्षा  में राजनीतिक पार्टियों , विधायिका , न्यायपालिका, कार्यपालिका का मुकाम बहुत ऊंचा है लेकिन पत्रकारिता का स्थान भी  लोकतंत्र के पक्षकारों को बाखबर रखने में बहुत ज्यादा  है . इसलिए लोकतंत्र को हमेशा ही निष्पक्ष पत्रकारिता की ज़रूरत बनी  रहेगी .

 

Wednesday, January 6, 2021

अमरीका की संसद पर गुंडों से हमला करवाकर डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र की अवधारणा का भारी नुक्सान किया है


शेष नारायण सिंह

 

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लगातार लोकतन्त्र को शर्मशार  किया है . दुनिया के सबसे मज़बूत लोकतंत्र को उनके समर्थकों ने जो नुकसान पंहुचाया है ,आने वाले बहुत समय तक इतिहास इसको याद रखेगा . अमरीका में छः जनवरी को जो हुआ है उसको अमरीकी लोग बहुत दिनों तक तकलीफ का पर्याय बताते रहेंगे. डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद का चुनाव हार चुके हैं . लेकिन अपनी हार को वे स्वीकार नहीं कर रहे हैं . अमरीका में अलग अलग राज्यों में अलग तरह के चुनाव क़ानून हैं . उन्हीं कानूनों के आधार पर अब तक अमरीकी लोकतंत्र चल रहा है .  ट्रंप ने उन राज्यों के चुनाव कानूनों को चुनौती दी जहां वे चुनाव हार गए हैं . पहले तो अधिकारियों को ही हड़का कर अपने  पक्ष में फैसला देने के लिए दबाव बनाया . उनमें से बहुत से अधिकारी उनके अपने लोग थे लेकिन  सभी ने नियम क़ानून का हवाला देकर उनकी बात मानने से इनकार कर दिया . उसके बाद कोर्ट में मुक़दमे किये गए. सभी अदालतों ने ट्रंप के दावों को गलत बताया . उसके बाद उन्होंने अपने साथ चुनाव लड़ने वाले उपराष्ट्रपति ,माइकेल पेंस को धमकाया कि वे उनके  पक्ष में फैसला सुना दें लेकिन उन्होंने भी  बहुत ही साफ शब्दों में मना कर दिया . अमरीका में भी हमारी तरह से ही देश के उपराष्ट्रपति ऊपरी सदन के पीठासीन अधिकारी होते हैं .  उसी नियम के तहत माइकेल पेंस अमरीकी सेनेट के पीठासीन अधिकारी हैं लेकिन उन्होंने कुछ भी  गैरकानूनी करने से मना कर दिया . कहीं से भी नियमों के अधीन रहकर हेराफेरी करने में असफल रहने के बाद ट्रंप ने अमरीकी कांग्रेस के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में मतों के की गिनती की प्रक्रिया को ही नुक्सान पंहुचने की कोशिश शुरू कर दी . उनके इस काम से अमरीका सहित पूरी  दुनिया में उनकी थू थू हो  रही है . अमरीकी सेनेट में उनकी  रिपब्लिकन पार्टी के पचास सदस्य हैं जिनमें से 43 ने उनकी इस  कारस्तानी का विरोध किया है . उनकी पत्नी की चीफ आफ स्टाफ ने ट्रंप के कारनामे से नाराज़ होकर इस्तीफा दे दिया  है . व्हाइट हाउस के प्रेस सेक्रेटरी ने भी इस्तीफा दे दिया  है. उनका कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप के गैर्ज़िमीदार फैसलों को सही ठहराना उनके लिए असंभव है. हो सकता  है कि अभी और भी इस्तीफे हो जायं .

राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों के लिए पड़े मतदान की पहले तो गिनती राज्यों की राजधानियों में होती  है . राज्य की तरह से प्रमाणित वोटों की  गिनती अमरीकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र में छः जनवरी को की जाती  है .  उसके बाद ही अमरीकी राष्ट्रपति पद के चुनाव की पुष्टि होती है और 20 जनवरी को नए राष्ट्रपति की पदस्थापना होती है .अमरीका की संसद को  कांग्रेस कहते हैं . जब वोटों को सही ठहराने की प्रक्रिया चल रही थी और कांग्रेस का संयुक्त अधिवेशन चल रहा था ,उसी दौरान  सदन के अंदर सैकड़ों को गुंडे घुस आये . वे सभी डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक थे .संयुक्त अधिवेशन में प्रत्येक राज्य की सरकार ने सत्यापित वोटों को सदन की मंजूरी के लिए रखा जाता है .अगर कोई सेनेटर और कुछ प्रतिनिधि एतराज करते हैं तो उसपर बाकायदा  बहस होती  है और वोट पड़ता   है. उस वोट के बाद ही राज्य से आये वोटों को मंजूरी दी जाती है .यही प्रक्रिया चल  रही थी जब सैकड़ों की संख्या में लोग सदन में घुस आये . लाठी डंडों से लैस यह लोग तोड़फोड़ करने लगे. सेनेटर और प्रतिनिधियों को मारने लगे . संसद की सुरक्षा के लिए तैनात कैपिटल हिल की पुलिस को भी मारा  पीटा . राष्ट्रपति ने केंद्रीय सुरक्षा  बल  को तैनात नहीं किया . ऐसा लगता है कि वे अपने बदमाशों को खुली छूट देना चाहते थे . उसके बाद उपराष्ट्रपति माइकेल पेंस ने पड़ोसी राज्य वर्जीनिया से नैशनल गार्ड को बुलाया . सेनेटरों और प्रतिनिधियों को  बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाया  गया तब जाकर उनकी  जान बची . इस हमले में सदन के अन्दर चार लोगों की मौत हो गयी . ऐसा अमरीकी सिस्टम में अकल्पनीय है .

अमरीकी सदन की घटनाओं के बाद डोनाल्ड ट्रंप अपनी पार्टी में भी अकेले पड़  गए  हैं . उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप के जो विभिन्न बयान आये हैं उससे लगता है कि वे भी अपने  पति की हरकतों से नाराज़ हैं . पार्टी में उनकी  निंदा करने वालों की संख्या बढ़ रही है . बात को समझने  के लिए सेनेट का उदाहरण ही पर्याप्त है . जब संयुक्त बैठक में अरिजोना के नतीजों को चुनौती दी गयी तो 15  सेनेटरों ने  ट्रंप की बात का समर्थन किया था लेकिन जब संसद पर हमला हो गया और यह साफ हो गया कि सब ट्रंप ने ही करवाया है तो समर्थकों की संख्या घटकर छः रह गयी .पेंसिलवानिया के वोट को चुनौती देने पर पूरे सदन में केवल सात लोग ट्रंप के साथ बचे थे . उनकी पार्टी के ही 43 लोग उनका साथ छोड़ चुके थे .

अमरीकी राजधानी में इस वक़्त जो माहौल है उसको देखकर लगता है कि बहुत  सारे लोग ट्रंप का साथ छोड़ने वाले हैं . वहां इस बात की चर्चा चल चुकी है कि अमरीकी संविधान के 25 वें संशोधन का इस्तेमाल करके  दोनों सदनों में यह प्रस्ताव पास कर दिया जाए कि डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति के  रूप में अब काम करने लायक नहीं हैं.और उनके कार्यकाल के जो दो हफ्ते बचे हैं उससे भी उनको हटा दिया जाय. जिस तरह से अमरीकी जनमत उनके खिलाफ हो गया है ,उसके मद्देनज़र इस बात की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनपर महाभियोग भी चला दिया जायेगा  और उनको हमेशा के लिए चुनाव लड़ने से रोक दिया  जाय. महाभियोग को चलाने के लिए दोनों सदनों के दो तिहाई सदस्यों के बहुमत की ज़रूरत होती है . शुरू में तो ट्रंप पर किसी महाभियोग की संभावना  का कोई सवाल ही नहीं था लेकिन जिस तरह से पिछले एक महीने में उन्होंने अपनी ही पार्टी के लोगों के विश्वास के साथ धोखा किया है ,उसके बाद सेनेट में केवल सात लोग बचे हैं जो उनकी हर सनक का साथ देने के लिए तैयार नज़र आ रहे हैं .बाकी उनके अपने ही लोग उनके खिलाफ मैदान ले चुके  हैं .

राष्ट्रपति ट्रंप यह  तर्क दे रहे हैं कि उनको सात करोड़ अमरीकियों ने वोट दिया है . और जोसेफ  बाइडेन की जीत से उन सात करोड़ अमरीकियों के हितों का नुक्सान हुआ है . ट्रंपवादी लोग समझ नहीं पा रहे हैं  कि जिन जो बाइडेन ने ट्रंप को हराया है उनको तो सात करोड़ चालीस लाख से भी ज़्यादा  वोट मिले  हैं . ट्रंप नतीजों के दिन से ही प्रलाप कर रहे हैं कि चुनाव उन्होंने  जीता था  जिसको उनसे चुरा लिया गया है जबकि सच्चाई यह है कि ट्रंप चुनाव हार चुके हैं और वे उस हारे हुए चुनाव को गुंडई के बल पर फिर जीत लेना चाहते हैं . उनके समर्थकों में ऐसे बहुत लोग  हैं जो अमरीका में श्वेत लोगों के आधिपत्य के समर्थक हैं . जब अमरीका में मानवाधिकारों के आन्दोलन ने जोर पकड़ा और ब्राउन का फैसला आने के बाद काले बच्चों को भी स्कूलों में दाखिला देना अनिवार्य कर दिया गया  तो  संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिण के राज्यों में  श्वेत  अधिनायकवादियों के कई गिरोह बन  गए थे . उन हथियारबंद बदमाशों के गिरोह को क्लू क्लैक्स क्लान के नाम से जाना जाता है . बाद में तो महिलाओं और काले लोगों के मताधिकार के क़ानून भी बन  गए . साठ के दशक में  राष्ट्रपति केनेडी और उनके भाई बॉब केनेडी ने मानवाधिकारों के लिए बहुत काम किया . उसके बाद क्लू क्लैक्स क्लान वाले धीरे धीरे तिरोहित हो  रहे थे लेकिन जब रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति चुनाव में  रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उम्मीदवार बने तो उन्होंने भी इन क्लू क्लैक्स क्लान वाले चांडालों को आगे किया और काले लोगों  औकात दिखाने के नाम पर चुनाव जीत लिया .  रिचर्ड निक्सन का जो हश्र हुआ वह दुनिया को मालूम है . महाभियोग की चपेट में आये और  अपमानित होकर उनको  गद्दी छोडनी पडी. उसी तरह के श्वेत अधिनायकवाद का सहारा लेकर डोनाल्ड ट्रंप इस बार का चुनाव जीतना चाहते थे . उन्होंने अपने पूरे चुनाव में ओबामा के कार्यकाल की निंदा को अपना प्रमुख एजेंडा बनाया और अश्वेत ,अफ्रीकी-भारतीय-अमरीकी कमला हैरिस के खिलाफ लगातार ज़हर उगलते रहे . चुनाव प्रचार के घटियापन का आलम यह था कि वे लगातार कहते रहे कि जो बाइडेन की उम्र ज़्यादा है और अगर उनको जीत मिली तो  चार साल जिंदा नहीं रहेंगे और कमला हैरिस राष्ट्रपति बन जायेंगी . इतने अमानवीय तरीके से चुनाव प्रचार में ट्रंप लगातार हर इलाके के श्वेत गुंडों को बढ़ावा देते रहे. जब  मतदान के बाद वोटों की  गिनती हो रही थी ,तब भी यह बदमाश लोग वहां भी तोड़फोड़ कर रहे थे. और अब बाकायदा संसद पर ही हमला कर दिया .

डोनाल्ड ट्रंप के लिए शर्म की बात यह  है कि  जो बदमाश आये थे वे वहीं व्हाइट हाउस के पास बने हुए डोनाल्ड  ट्रंप के होटल में ही ठिकाना बनाये हुए थे .इस बात में कोई दो राय नहीं है कि डोनाल्ड  ट्रंप ने अपने आपको अमरीका की बहुत बड़ी आबादी की  नज़र में घटिया इंसान साबित कर लिया है .उनकी इस कारस्तानी का नुक्सान लोकतंत्र को झेलना  पडेगा.  दुनिया के बहुत सारे देशों में कई तानाशाह चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज़ हैं . लेकिन कई बार वे चुनाव हारने के बाद सत्ता छोड़ देते हैं . डोनाल्ड ट्रंप के इस उदाहरण के बाद इस बात के  संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनमें से बहुत सारे तानाशाह अब ट्रंप के तरीकों से ही सत्ता से चिपके रहना चाहेंगे. यह लोकशाही की अवधारणा का बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है .

 

 

 

 

Wednesday, December 30, 2020

कोरोना के बाद तर्जे-हुकूमत में बदलाव की सम्भावना और उसकी दिशा

 

 

 


शेष नारायण सिंह

 

2020 बीत गया . इतना बुरा साल मैंने अपने जीवन में कभी  नहीं देखा था .दुनिया भर में कोरोना वायरस का  आतंक था . भारत में इस महामारी से बचाव की तैयारी थोडा विलम्ब  से शुरू हुई. जब अमरीका में कोरोना बढ़ चुका था तब तक भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री मानने को तैयार नहीं थे  कि अपने देश में कोई ख़तरा है .  11 मार्च 2020 को स्वास्थ्यमंत्री डॉ हर्षवर्धन ने  बयान दिया कि देश में कोई मेडिकल इमरजेंसी नहीं है . हालांकि उसी हफ्ते प्रधानमंत्री ने जनता कर्फ्यू की घोषणा की थी . बाद में 21 दिन का पूर्ण लॉक डाउन घोषित किया गया .आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि काश सरकार समय रहते चेत गयी होती तो कोरोना से जो तबाही आई है उसको कम किया जा सकता था . बाद में तो सरकार ने चेतावनी और सावधानी की अपील करना शुरू कर दिया .  स्कूल कालेज बंद किये गए .ट्रेनें रद्द  की गईं . लेकिन सत्ताधारी पार्टी के कुछ लोग तरह तरह की  मूर्खताओं के ज़रिये दुनिया भर में देश के शासक वर्ग की खिल्ली  उड़वाते  रहे . सत्ताधारी  दल के समर्थक एक बाबा ने गौमूत्र की एक पार्टी आयोजित की . उसमें बहुत सारे लोग शामिल हुए और  कैमरों के सामने गौमूत्र पिया लेकिन उसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई. अब तो साल बीत चुका है लेकिन कोरोना की चिंता बरकरार है , आर्थिक मोर्चे पर  भारी नुकसान हो  चुका है ,, स्वास्थ्य सेवाओं की कठिन  परीक्षा हो रही है . घर में बंद लोगों और बच्चों को तरह तरह की मानसिक प्रताडनाओं से गुजरना पड़ रहा है . ब्रिटेन से चलकर कोरोना का एक नया स्ट्रेन आ गया है . चौतरफा डर और दहशत का  आलम है .कोरोना के कारण किसी न  किसी प्रियजन की मृत्यु हो चुकी है . मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह साल बहुत ही बुरा रहा है . मेरे शुभचिंतक ललित सुरजन की मृत्यु मेरे लिए एक निजी आघात है . पिछले सात आठ वर्षों में मैंने जो भी अच्छी किताबें पढी हैं उनका ज़िक्र ललित जी ने ही किया था . मुझसे करीब चार साल  बड़े थे लेकिन सही अर्थों में बड़े भाई की भूमिका थी उनकी.  मैं उनके अखबार में काम करता हूँ लेकिन एक कर्मचारी के रूप में उन्होंने मुझे कभी नहीं देखा . उनकी विचारधारा लिबरल और डेमोक्रेटिक थी . सबको अवसर देने के पक्षधर थे . सामाजिक  पारिवारिक संबंधों को निभाने के जो सबसे बड़े मुकाम हैं ,ललित जी वहां विराजते थे . कोरोना काल में जब उनके कैंसर का पता चला तो विमान सेवाएँ बंद थीं. रायपुर में  कैंसर के इलाज की  वह व्यवस्था नहीं थी जो दिल्ली या मुंबई में उपलब्ध है  . उनके बच्चे उनको चार्टर्ड विमान से दिल्ली लाये. बीमारी की हालत में भी वे लगातार अपना काम करते रहे, लिखते रहे और पोडकास्ट के ज़रिये अपनी कवितायें देश को सुनाते रहे . कैंसर से मुक्त होने की दिशा में चल पड़े थे . उम्मीद हो गयी थी कि फिर सब कुछ पहले जैसा ही हो जाएगा  लेकिन  एकाएक  ब्रेन स्ट्रोक हुआ और बीती दो दिसंबर को चले गए . ललित सुरजन की मृत्यु का घाव 2020 का वह  घाव है  जो अगर भर भी गया तो निशान गहरे छोड़ जाएगा . मेरे मित्रों में राजीव  कटारा, दिनेश तिवारी , मगलेश डबराल कुछ ऐसे लोग इस मनहूस साल में छोड़ गए जिनकी कमी हमेशा खलेगी .

 

ग्रेटर नोयडा की अपनी कॉलोनी  से मैंने हज़ारों  मजदूरों को पैदल अपने  गाँव जाते देखा है . उन लोगों के दर्द को बयान करने की मैंने कई बार कोशिश की  है लेकिन बयान नहीं कर पाया . उन मजदूरों के पलायन के कुछ बिम्ब तो ऐसे हैं  जिनके बारे में अगर रात में याद आ जाये तो नींद नहीं  आती.  जिन तकलीफों से लोग घर गए हैं उसमें सरकारी गैरजिम्मेदारी साफ़ नज़र आती  है. अगर सरकार ने थोडा दिमाग लगाकर योजना बनाई होती तो शायद उतना बुरा न होता ,जितना हुआ . जो लोग  अपने घर नहीं गए , यहीं  रह गए उनके खाने पीने की जो तकलीफें हैं उनकी भी याद शायद ही  भुलाई जा सके . सरकारी राशन का इंतजार करते लोग, एकाध दर्ज़न केला देकर उनके साथ फोटो खिंचवाते असहिष्णु नेता , गरीबों के लिए आये राशन से चोरी करते छुटभैया नेता इस साल के कुछ ऐसे दृश्य हैं जो किसी को भी  विचलित कर  देगें .

 

कुछ बातें सकारात्मक भी हुई हैं .कोरोना के संकट के दौर में डरे हुए लोगों ने कुछ ऐसे काम भी किये हैं जिनको अगर जीवन की पद्धति में ढाल लें तो उनका अपना और समाज का बहुत भला होगा .  खामखाह बाज़ारों में घूमना बंद हुआ  है, शादी ब्याह के नाम पर फालतू के खर्च पर भी नियंत्रण देखा गया है . धार्मिक आयोजनों में जो भीड़  जुटाई जाती थी उसपर भी लगाम लगी  है . और भी बहुत सी सामाजिक आर्थिक बुराइयों से लोगों किनारा किया है .अगर लोग इसी को अपनी जीवन शैली के रूप में अपना लें तो चीजें सुधरेंगी .इस कोरोना काल में  जो सबसे ज़रूरी बात हुई  है वह यह कि स्वस्थ रहने को प्राथमिकता देने की जो तमीज कोरोना ने सिखाई है उसको अगर लोग अपनी आदत में शामिल कर  लें उसको स्थाई करने की ज़रूरत है . कोरोना की दहशत का नतीजा यह था कि लोग संभलकर रहे , ऊलजलूल चीज़ें नहीं खाईं और बहुत  लोगों से मिलना जुलना नहीं रखा . शायद इसी वजह से  इस साल वे  तथाकतित सीज़नल  बीमारियाँ नहीं हुईं.  खाने पीने में भी लोगों ने किफ़ायत बरती , फालतू की खरीदारी नहीं हुई शापिंग के शौक़ पर भी लगाम लगी रही . कोरोना के संकट के दौरान  मजबूरी में  सीखी गयी इन बातों का पालन करने से बहुत फायदा हो सकता है .

  वैश्विक स्तर पर 2020 में लोकतांत्रिक मूल्यों का जो ह्रास हुआ है वह अपना स्थाई प्रभाव छोड़ने वाला है .  दुनिया भर में तानाशाही ताकतें मज़बूत हुई हैं .  आज दुनिया में कम से कम पचास देश  ऐसे हैं जहां सत्ता पर  तानाशाहों का क़ब्ज़ा है. बहुत सारे शासकों के बीच तानाशाही प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं. साफ़ नज़र आ रहा है कि चुनाव  के वर्तमान तरीके लिबरल डेमोक्रेसी की स्थापना में नाकाम हो रहे  हैं . तुर्की का  उदाहरण दिया जा सकता  है .  वहां का शासक बाकायदा चुनाव जीतकर आया है लेकिन काम तानाशाहों वाला कर रहा है . ब्राजील में भी यही हाल है . असली या काल्पनिक संकट के नाम पर तानाशाही प्रवित्ति वाले सात्ताधीश मनमानी  करने लगते  हैं. कहने का मतलब यह है कि मौजूदा चुनाव पद्धति  सही अर्थों में लोकशाही निज़ाम  कायम करने में असफल साबित हो रही है .

 

राजनीतिक इतिहास पर  डालने पर पता चलता है कि  किसी भी राजनीतिक विचारधारा पर आधारित कोई भी शासन पद्धति  सत्तर साल के आसपास ही चल पाती है .1917 में लेनिन की अगुवाई में रूसी क्रान्ति हुयी थी लेकिन सत्तर साल बीतते बीतते वह सत्ता और राजनीति की एक कारगर विचारधारा के रूप में फेल हो गयी .बोल्शेविक क्रान्ति की विचारधारा पेरेस्त्रोइका और ग्लैसनास्त की बलि चढ़ गयी . जो वामपंथी विचारधारा आधे यूरोप और एशिया के एक हिस्से में राजकाज की विचारधारा थी ,वह खतम हो गयी . आज कहने को तो चीन में वामपंथी विचारधारा है लेकिन वह मार्क्सवाद के बुनियादी   सिद्धांतों से परे है.    शी जिनपिंग अपने को आजीवन तानाशाह पद पर स्थापित कर लिया है . आज जो  भी शासन व्यवस्था चीन में है वह आम आदमी के लिए तानाशाही  व्यवस्था ही है . सर्वहारा का अधिनायकत्व उसमें कहीं नहीं है .रूसी क्रान्ति के बाद लोकतंत्र के ज़रिये  सत्ता पाने का सिलसिला दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू  हुआ . दुनिया भर फैले राजशाही , तानाशाही और उपनिवेशवादी सत्ताधीशों के खात्मे का दौर शुरू हो गया . एशिया और अफ्रीका में गुलाम देशों की आजादी की बाढ़ सी आ गयी थी .आज की जो चुनाव पद्धति है वह बहुत  सारे  देशों ने उसी कालखंड में अपनाई और उसी के ज़रिये लोकतंत्र की स्थापना की . लेकिन अब सब कुछ बदल रहा है .लोकप्रिय चुनाव के बाद भी बहुत सारे शासक तानाशाह बन रहे हैं .  इसका मतलब यह हुआ कि वर्तमान चुनाव  पद्धति लोकशाही स्थापित करने में नाकाम साबित हो रही है .  इतिहास को मालूम है कि  फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद यूरोप में सामंती व्यवस्था पर कुठाराघात हुआ था  और औद्योगिक क्रान्ति का प्रादुर्भाव हुआ था , लोगों में बराबरी की संस्कृति का विकास हुआ लेकिन शताब्दी बीतने के साथ साथ राजनीतिक परिवर्तन की बातें माहौल में आना  शुरू हो गयी थीं. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भी बड़े बदलाव हुए थे . कोरोना ने भी  दुनिया भर की आर्थिक हालात पर ज़बरदस्त असर डाला है , इसके बाद भी बड़े बदलाव की   आहट साफ़ सुनाई पड़ रही है . शुरुआती दौर में चुनकर आये सत्ताधीशों की प्राथमिकता  जनकल्याण हुआ करती थी . लेकिन कोरोना काल में देखा जा रहा है कि चाहे तुर्की का अर्दोगन हो या चीन का शी  जिनपिंग  , सभी अपने आपको  शासन पद्धति  के केंद्र में रखने की  कोशिश कर रहे हैं .  यहाँ तक कि अमरीका में भी शासक में स्थाई  होने की बीमारी जोर पकड चुकी है .डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार चुके हैं लेकिन सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं . ज़ाहिर है बदलाव होगा .  बड़ा बदलाव होगा .  आगामी बदलाव दुनिया को किस दिशा में ले जाएगा उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता . उम्मीद की जानी चाहिए कि निर्वाचित शासकों में जो तानाशाही की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं ,अगला बदलाव उसको नाकाम करेगा और कोई अन्य बेहतर व्यवस्था  लागू होगी जिसका स्थाई भाव  लिबरल डेमोक्रेसी ही होगा  .

 

 

 

  

 

Monday, December 28, 2020

कांग्रेस नेता के रूप में राहुल गांधी अक्सर गैरजिम्मेदार काम करते रहते हैं

 

 


शेष नारायण सिंह

कांग्रेस के  आला नेता   राहुल गांधी फिर विदेश यात्रा पर चले गए . अक्सर जाते रहते हैं लेकिन इस  बार उनकी विदेश यात्रा बहुत बड़ी उत्सुकता का विषय बनी हुयी है . कांग्रेस की  स्थापना के 135 साल पूरे होने पर   कांग्रेस पार्टी ने एक  बड़े आयोजन की योजना बनाई थी लेकिन कार्यक्रम के ठीक एक दिन पहले राहुल गांधी विदेश निकल लिए . कांग्रेस ने इस बार  स्थापना दिवस को बड़े पैमाने पर मनाने का फैसला इसलिए किया था  कि  दिल्ली की सीमा पर आन्दोलन कर रहे किसानों की समस्याओं को बड़ा मुद्दा बनाना चाहती थी लेकिन पार्टी की योजना धरी की धरी रह गयी और कांग्रेस का आला अफसर यूरोप निकल गया .आज स्थिति यह है कि किसानों का मुद्दा तो पीछे चला गया और आज छोटे बड़े सभी कांग्रेसियों के एक ही सवाल पूछा  जा रहा है कि उनका सबसे बड़ा नेता कहाँ है. कुछ  कांग्रेसियों के अलावा साधारण कांग्रेसी चुप रहने  में ही भलाई समझ रहा है . दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में आज जब झंडा फहराया जा रहा था तो प्रियंका गांधी से जब पत्रकारों ने उनके  भाई और आला नेता , राहुल गांधी के बारे में पूछा तो उनके पास कोई जवाब नहीं था . बेचारी चुपचाप चली गयीं क्योंकि इस सवाल का क्या जवाब देतीं कि  कांग्रेस के कैलेण्डर में सबसे मह्त्वपूर्ण तारीख के ठीक एक दिन पहले उनके भाई साहब कहाँ  चले  गए हैं . राहुल गांधी के क़रीबी और कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला अपनी शैली में सवालों के जवाब दे रहे हैं कि राहुल गांधी किसी निजी यात्रा पर विदेश चले  गए हैं .

 कांग्रेस ने नई कृषि नीति के खिलाफ आन्दोलन कर रहे  किसानों के साथ अपने आपको जोड़ने की पूरी कोशिश की है . राहुल खुद राष्ट्रपति के यहाँ गए , दो करोड़ किसानों से दस्तखत करवाकर ट्रक में लादे हुए कागजों को मीडिया के सामने पेश किया . हमेशा ही किसानों के साथ सहानुभूति के बयान दिए लेकिन जब किसानों की एक बार फिर केंद्र सरकार से 29 दिसंबर को बात होने वाली  है तो   कांग्रेस पार्टी फिर से रक्षात्मक मुद्रा में आने के लिए मज़बूत कर दी गयी  है . अब कोई भी कांगेसी नेता कोई भी बात करने की कोशिश करेगा तो उससे राहुल गांधी के बारे में ही सवाल पूछा जाएगा . ज़ाहिर है कांग्रेस के सामने अपने कार्यकर्ताओं को मोबिलाइज करने का एक अवसर था  और उसको राहुल  गांधी के विदेश यात्रा के मोह की बलिबेदी पर कुर्बान करना पडा है .

2004 में राहुल गांधी  कांग्रेस पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल हुए थे .2013 में कांगेस के जयपुर चिंतन शिविर में कांग्रेस की दरबारी संस्कृति  के मठाधीशों ने उनको पार्टी का उपाध्यक्ष बनवा लिया था . उसी के साथ ही चुनावों में कांग्रेस  पार्टी के  कमज़ोर पड़ने का सिलसिला शुरू  हो गया था . उसके बाद से पार्टी  में उन नेताओं का वर्चस्व बढना शुरू हो गया  जो लुटियन बंगलो ज़ोन की शोभा बढाते हैं  . इनमें से ज्यादातर ज़मीनी मजबूती के कारण नेता नहीं बने हैं . इन सब पर इंदिरा गांधी परिवार की कृपा बरसती रही है और  उसी के इनाम के रूप में यह लोग राजनीतिक सत्ता का लाभ  उठाते  रहते हैं. उसी के साथ ज़मीनी नेताओं को  दरकिनार किये जाने का सिलसिला भी  शुरू हो गया .राहुल गांधी के  नेतृत्व में  कांग्रेस पार्टी में ऐसे लोग बड़े नेता बने बैठे हैं जिसमें कभी पूरे भारत के गाँवों और शहरों से आये  जनाधार वाले नेता कांग्रेस के नीतिगत फैसले लिया करते  थे. .2013 में  संपन्न हुये  जयपुर की चिन्तन शिविर में जब राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया  उसी दिन से जनाधार वाले नेताओं का  पत्ता कटना शुरू हो गया था .यह अलग बात है कि राहुल गांधी ने उस शिविर में जो बातें कहीं थीं अगर वे लागू हो  गई होतीं तो  कांग्रेस की दिशा  ही बदल गयी  होती. कांग्रेस के उपाध्यक्ष रूप में राहुल गांधी के नाम की घोषणा होने के बाद उन्होंने जयपुर  चिंतन शिविर की समापन सभा में कहा था कि “ हम टिकट की बात करते हैंजमीन पे हमारा कार्यकर्ता काम करता है यहां हमारे डिस्ट्रिक्ट प्रेसिडेंट बैठे हैंब्लॉक प्रेसिडेंट्स हैं ब्लॉक कमेटीज हैं डिस्ट्रिक्ट कमेटीज हैं उनसे पूछा नहीं जाता  हैं .टिकट के समय उनसे नहीं पूछा जातासंगठन से नहीं पूछा जाताऊपर से डिसीजन लिया जाता है .भइया इसको टिकट मिलना चाहिएहोता क्या है दूसरे दलों के लोग आ जाते हैं चुनाव के पहले आ जाते हैं,  चुनाव हार जाते हैं और फिर चले जाते हैं और हमारा कार्यकर्ता कहता है भइयावो ऊपर देखता है चुनाव से पहले ऊपर देखता हैऊपर से पैराशूट गिरता है धड़ाक! नेता आता हैदूसरी पार्टी से आता है चुनाव लड़ता है फिर हवाई जहाज में उड़ के चला जाता है।

यह भावपूर्ण भाषण देने के बाद राहुल गांधी ने वही काम शुरू कर दिया जिसकी उन्होंने भरपूर शिकायत की थी . उनके जयपुर भाषण से कांग्रेसियों में उम्मीद बंधी थी कि कांग्रेस को एक ऐसा नेता मिल गया  है जो अगर  सत्ता में रहा तो कांग्रेस पार्टी के  आम कार्यकर्ता  को पहचान दिलवाएगा .और  अगर  विपक्ष में रहा तो  ज़मीनी सच्चाइयां बाहर आयेंगीं. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ .राहुल गांधी ने जो फैसले लिए उनसे कांग्रेस को  बहुत नुक्सान ही हुआ . पंजाब में अमरिंदर सिंह की मर्जी के खिलाफ किसी बाजवा जी को अध्यक्ष बनाया , हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के खिलाफ अशोक तंवर को चार्ज दे दिया . वे बाद में बीजेपी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करते पाए गए . मध्यप्रदेश में सोनिया गांधी की पसंद दिग्विजय सिंह को दरकिनार करने के  चक्कर में  ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे किया , वही सिंधिया  मध्यप्रदेश में कांग्रेस की  सरकार के पतन के कारण बने . मुंबई कांग्रेस के मुख्य मतदाता  उत्तर भारतीय , दलित और अल्पसंख्यक हुआ करते थे लेकिन वहां पूर्व शिवसैनिक संजय निरुपम को  अध्यक्ष बनाकर पार्टी को बहुत  पीछे धकेल दिया . उत्तर प्रदेश का चार्ज किन्हीं मधुसूदन मिस्त्री को दे दिया जिनके जीवन का  सबसे बड़ा राजनीतिक काम यह था कि वे वडोदरा में एक बार किसी बिजली के खम्बे पर चढ़कर वे नरेंद्र मोदी का कोई पोस्टर सफलता पूर्वक उतार चुके थे .नैशनल हेराल्ड जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन के अखबार को ख़त्म करके निजी संपत्ति बनाने की कोशिश की . सबसे बड़ी बात यह कि उनके उपाध्यक्ष बनने के साथ ही  नरेंद्र मोदी गुजरात को छोड़कर  राष्ट्रीय राजनीति में आये . कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी के प्रचार में सबसे बड़ा योगदान राहुल गांधी का ही रहता रहा है क्यंकि वे ऐसा कुछ ज़रूर  बोलते या करते रहे हैं जिससे  बीजेपी को  कांग्रेस की धुनाई करने का अवसर  मिल जाता है .

आज कांग्रेस के स्थापना दिवस पर विदेश के लिए उड़नछू हो कर  जो काम राहुल गांधी ने किया है ,वह उनके लिए कोई नई बात नहीं है .जब से वे कांग्रेस के कर्ताधर्ता बने हैं तब से यही कर रहे हैं. लेकिन दिल्ली में उनके परिवार की गणेश परिक्रमा करने वाले नेता उनके काम को सही  ठहराते रहते  हैं . प्रियंका गांधी से लेकर मल्लिकार्जुन खड्गे तक सभी नेता राहुल गांधी के स्थापना दिवस पर गायब रहने की बात से  शर्मिंदा नज़र आये . लेकिन यह सच्चाई है कि राहुल गांधी ऐसे काम करते रहते हैं जिससे उनकी पार्टी के बड़े नताओं से कोई जवाब देते नहीं बनता .

 

 

Thursday, December 24, 2020

जम्मू-कश्मीर में डी डी सी के सफल चुनावों के बाद पाकिस्तानी सत्तातंत्र में हडकंप

 

 शेष नारायण सिंह

 जम्मू-कश्मीर में सफलता पूर्वक चुनाव आयोजित करके भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वहां पाकिस्तान की भूमिका केवल आतंकवाद फैलाने की  ही है. जिस  बड़े पैमाने पर कश्मीरी अवाम ने जिला विकास परिषद ( डी डी सी ) के चुनावों में हिस्सा लिया उससे पाकिस्तानी शासकों की वह बात एक बार फिर पंक्चर हो गयी जिसमें  कहा  जाता था कि कश्मीर के लोग भारत के साथ नहीं हैं . जम्मू-कश्मीर के चुनावों में लोगों ने मतदान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया वह इस बात की  सनद है कि जम्मू-कशमीर में पाकिस्तान की लाइन को मानने वाले कुछ आतंकी  संगठन हैं और पाकिस्तान से पैसा लेकर वहां सियासत करने वाले कुछ लोग  हैं.बाकी  कश्मीरी अवाम पूरी तरह से भारत के साथ है .नरेंद्र मोदी की कश्मीर नीति में नई पहल की सफलता के बाद पाकिस्तानी सत्तातंत्र  खिसिया गया है और उसी की प्रतिक्रिया में भारत की तरफ से सर्जिकल स्ट्राइक की आशंका को लेकर दहशत फैलाई जा रही है . हालांकि भारत की ओर से इस तरह का कोई संकेत नहीं दिया गया है लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख लगातार भारत की संभावित सर्जिकल स्ट्राइक की ख़बरें अखबारों में छपवा रहे हैं . 24 अगस्त को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की और से जारी एक बयान में बताया गया कि अगर भारत से किसी तरह का हमला हुआ तो उसको जवाब दिया जाएगा .

 

 सवाल यह उठता है कि जब भारत की सेना किसी हमले की योजना ही नहीं बना रही है तो इस तरह से युद्ध का माहौल बनाकर अपने खिलाफ उठ रहे पाकिस्तानी अवाम के जनांदोलन को दबाने की यह कोई कोशिश तो नहीं है .पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ( पी पी पी ) और नवाज़ शरीफ की खानदानी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़ ) एक  दूसरे के राजनीतिक विरोधी हैं लेकिन इमरान खान जिस तरह से फौज के हुक्म के गुलाम बन गए हैं उससे पाकिस्तानी अवाम में बहुत नाराजगी है . उसी नाराज़गी को भुनाने की गरज से बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ की खानदानी पार्टियां एक मंच पर हैं . उनके साथ ही पाकिस्तानी मुल्लातंत्र की कुछ पार्टियां भी शामिल हैं. विपक्ष की पार्टियों ने इकट्ठा होकर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट ( पी डी एम ) नाम का एक  फ्रंट बना लिया है जिसमे देश की दोनों बड़ी विपक्षी पार्टियों की मुख्य भूमिका है लेकिन उसका अध्यक्ष जमियत उलेमा ए  इस्लाम ( एफ ) के मुखिया मौलाना फ़ज़लुर्रहमान को बनाया  गया  है . पी डी एम का उद्देश्य इमरान खान की भ्रष्ट सरकार को  उखाड़ फेंकना  है . उसके बाद सभी पार्टियां चुनाव लड़ेंगी .कराची की विशाल सभा में पाकिस्तान मुस्लिम लीग ( नवाज़ ) की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ ने ऐलान किया कि जब भी चुनाव  होगा तो पी डी एम में शामिल पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ मैदान में होंगी. अभी फिलहाल  पी डी एम  ने पाकिस्तानी शहरों सभाएं करके साफ बता दिया  है कि इमरान खान और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के हटने तक उनका आन्दोलन मुसलसल जारी रहेगा .पाकिस्तानी   सत्ताधीश  विपक्ष के आन्दोलन से इतना डर गए हैं कि खबरें आ रही हैं कि पी डी एम की सबसे  प्रभावशाली नेता और  पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ पर जानलेवा हमला भी किया  जा सकता है . कठपुतली प्रधानमंत्री इमरान खान बुरी तरह से डरे हुए  हैं. कोरोना से मुकाबले के मैदान में भी  पाकिस्तान पूरी तरह से नाकाम है . देश की आर्थिक  स्थिति बहुत ही खराब है . इन सब कारणों से पाकिस्तानी जनता में बहुत ही गुस्सा है .

 

अपनी इस दुर्दशा से जनता का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तानी सरकार भारत के संभावित हमले की बोगी चला रही है .देश के नामी अंग्रेज़ी अखबार डॉन में छपी खबर के अनुसार इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री की घर पर सेना प्रमुख जनरल बाजवा और आई एस आई के  डाइरेक्टर जनरल ले. जनरल फैज़ हमीद की  एक बैठक में भारत से संभावित हमले को मुद्दा बनाने  का फैसला किया गया .इसके पहले दुबई की यात्रा पर गए पाकिस्तानी विदेशमंत्री शाह महमूद कुरेशी ने दावा किया था कि भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का फैसला कर लिया   है और कभी भी पाकिस्तान को निशाना बनाया जा सकता है .यही नहीं  इस हफ्ते की  शुरुआत में जनरल बाजवा ने नियंत्रण रेखा के पाकिस्तानी साइड में तैनात सैनिकों से बात कर ते हुए भी भारत से संभावित हमले की बात  की थी और डींग मारी थी कि भारत के किसी हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा .पाकिस्तानी  विदेशनीति और आंतरिक सुरक्षा की सभी नीतियों में कश्मीर का ज़िक्र प्रमुख रूप से होता है . वह उनका स्थाई भाव है .पाकिस्तान में भारत के संभावित हमले की बोगी हर सरकारी मंच से चलाई जा रही है . उनके विदेशी मामलों के दफ्तर के प्रवक्ता , ज़ाहिद हफीज़ चौधरी ने सारी दुनिया से अपील कर डाली कि विश्व के नेताओं को चाहिए कि भारत को  पाकिस्तान पर हमला करने से रोके .

जम्मू-कश्मीर में डी डी सी चुनावों में बड़े पैमाने पर कश्मीरी अवाम और राजनीतिक दलों की शिरकत के बाद पाकिस्तान के शासक वर्ग में चिंता बहुत बढ़   गयी है . अब तक हर मोर्चे पर कश्मीर की बोगी चलाकर अपनी जनता और अपने विदेशी  मित्रों को भटकाने की कोशिश करने वाली  पाकिस्तान सरकार को अपनी नाकामियाँ छुपाने के लिए और कोई रास्ता नहीं दिख रहा है. ऐसी हालत में भारत के हमले का ज़िक्र करके अपनी  खिसियाहट छुपाने की कोशिश के अलावा इसको कुछ और नहीं मना जा सकता क्योंकि भारत की तरफ से  पाकिस्तान पर कोई हमला नहीं होने वाला है . हां, यह तय है कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों की लाख कोशिश के बाद जिला स्तर पर राजनीतिक नेताओं की जो फैज़ खडी हो गयी है ,वह आने वाले दिनों में पाकिस्तान के हर झूठ का जवाब देने के लिए तैयार है .

Wednesday, December 23, 2020

गद्दी से चिपके रहने के चक्कर में डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र का भारी नुकसान किया

 

शेष नारायण सिंह

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव में बुरी  तरह से  हार चुके  हैं लेकिन उन्होंने अभी उम्मीद नहीं  छोड़ी है . उन्होंने अमरीका  के पांच बैटिलग्राउंड राज्यों में चुनावी  धांधली के मुक़दमे दायर करवाए थे लेकिन उनके पक्ष में कहीं  से  फैसला नहीं आया .विस्कसिन राज्य का  फैसला आज ही आया है . न्यायपालिका से बहुत उम्मीद थी क्योंकि उन्होंने फेडरल सुप्रीम कोर्ट में एक जज हड़बड़ी  में इसी योजना के तहत भर्ती किया था कि ज़रूरत पड़ने पर उनके पक्ष में  फैसला आ जाएगा लेकिन उन्हें वहां भी हार  ही मिली. अमरीका में सभी राज्यों के अलग अलग चुनावी क़ानून होते हैं और अलग तरह की न्याय प्रणाली  होती है . मसलन अमरीका के पचास राज्यों में से 37 राज्यों में जज भी चुनाव लड़कर पदासीन होते हैं . वे बाकायदा पार्टी के टिकट पर चुनकर आते हैं . ट्रंप की नवीनतम हार विस्कासिन राज्य में हुई है .  वहां के जिस जज ने उनके खिलाफ फैसला दिया है वह ट्रंप की पार्टी ,रिपब्लिकन पार्टी के टिकट पर चुनकर आया था . जब उसने कानून के हिसाब से सही फैसला दे दिया तो ट्रम्प महोदय उसको भी गाली देने लगे. उसके खिलाफ ट्वीट किया और उनके अंधभक्तों ने उसके खिलाफ ट्रोल अभियान शुरू कर दिया . अब लगता है कि वे अपनी हार को न्यायपालिका की मदद से जीत में बदलवाने की उम्मीद छोड़ चुके हैं . लेकिन अभी भी जुटे हुए हैं.  14 दिसंबर को  विभिन्न राज्यों के निर्वाचकों ने वोट डाले  जिसमें नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनकी साथी कमला हैरिस को 306 वोट मिले जबकि डोनाल्ड ट्रंप और उनके साथी माइक पेंस को 232 वोट मिले. उसके बाद ज़्यादातर अमरीकियों ने यह मान लिया कि डोनाल्ड ट्रंप  हार चुके हैं लेकिन ट्रंप ने  कोर्ट के फैसलों के सहारे चुनावी नतीजों को पलट देने की उम्मीद को जिंदा रखा . अब सब गड़बड़ हो गयी  है .न्यायपालिका ने उनको साफ़ बता दिया है कि उनकी सनक के आधार पर फैसला नहीं दिया  जा सकता , कानून ही  किसी भी फैसले की बुनियाद होता है .

चारों तरफ से निराश होने के बाद अब  ट्रंप को उम्मीद है कि जब 6 जनवरी को अमरीकी संसद में वोटों  की गिनती होगी तो उनके पक्ष में फैसला आ जाएगा . उनकी इस उम्मीद का भी कोई आधार  नहीं है क्योंकि उनकी पार्टी के ही सदस्य मिच मैकानिल सेनेट  के मेजारिटी लीडर हैं.उन्होंने 14  दिसम्बर के वोट के बाद जो बाइडेन को बधाई दे दी .इसका मतलब यह हुआ कि उन्होंने ट्रंप को हराने वाले जो बाइडेन को नया राष्ट्रपति स्वीकार कर लिया है . ज़ाहिर है वे 6  जनवरी को सेनेट में ट्रंप के समर्थकों के साथ नहीं खड़े होंगे . अमरीका में इस बात की बड़ी चर्चा है कि ट्रंप सेनेट में हल्ला गुल्ला करवाकर चुनाव की प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश करेंगे.  लेकिन उन्हीं की पार्टी के ताक़तवर नेता और मेजारिटी लीडर मिच मैकानिल के साथ न होने से वहां भी किसी ख़ास सफलता की उम्मीद नहीं  है . सेनेट में गिनती के बाद ट्रंप के एक और सहयोगी के उनके खिलाफ जाने की उम्मीद जताई जा रही है . अमरीकी  सेनेट की  बैठकों के पीठासीन अधिकारी देश के उपराष्ट्रपति होते हैं . अपने भारत में भी उपराष्ट्रपति ही राज्य सभा के अध्यक्ष होते हैं. जब 6 जनवरी को सेनेट में वोटों की गिनती होगी तो अपने  संवैधानिक दायित्व का निर्वाह करते हुए , उपराष्ट्रपति माइक पेंस नतीजों की घोषणा करेंगे . उसके बाद ट्रंप के पास कोई रास्ता नहीं  बचेगा . लेकिन इस सब के बाद भी  20 जनवरी  2021 को  अगर वे व्हाइट हाउस को खाली नहीं कर देते  तो उनको मार्शल ज़बरदस्ती वहां से निकाल देगा . उसके बाद उनको वहीं व्हाइट हाउस के पड़ोस में बने ट्रंप होटल में जाकर सामान रखने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा .

डोनाल्ड ट्रंप के इस रवैये के बाद बाकी दुनिया में लोकतंत्र के अस्तित्व के बारे में शक होने  लगा है . सवाल यह  है कि अगर अमरीका जैसे देश में जहां पब्लिक ओपिनियन पूरी तरह से जागरूक है , मीडिया निष्पक्ष है , सरकार की संस्थाएं न्याय की  सीमा में रहकर काम  कर रही हैं , सेना में राजनीति का  दखल बिलकुल नहीं है और वहां का राष्ट्रपति चुनाव हार जाने के बाद भी गद्दी से चिपके रहने की जिद पर  अड़ा हुआ है  तो एशिया और अफ्रीका के उन देशों का क्या होगा जहां  अभी भी ज़्यादातर शासक सत्ता में बने रहने के लिए तरह तरह के  तिकड़म करते रहते हैं . जहाँ तक ट्रंप की बात है  उनको तो जाना  ही पडेगा लेकिन एशिया और अफ्रीका के देशों में लोकतंत्र के अस्तित्व पर शंका के बादल घूमने  लगे हैं. अभी यह बात भी  समझ में नहीं आ रही है कि जिन सात करोड़ लोगों ने ट्रंप को चुनाव में वोट दिया था, वे अभी भी उनको जीता हुआ क्यों मानते हैं और ट्रंप के उस प्रलाप को गंभीरता से ले रहे हैं जिसमें वे कहते हैं कि  राष्ट्रपति पद उनका  ही थी लेकिन  विपक्ष ने उसको चुरा लिया है . वे लोग हर उस व्यक्ति के खिलाफ बोलना या  लिखना शुरू कर देते हैं जो अमरीकी  राष्ट्रपति चुनाव में निष्पक्ष होने की कोशिश करता है . इस सिलसिले में डेमोक्रेटिक पार्टी, अमरीकी न्यायपालिका, विभिन्न राज्यों की सरकारें , सच्चाई बोलने वाले  रिपब्लिकन तो  ट्रंप के भक्तों के निशाने पर थे ही, मीडिया के खिलाफ भी विधिवत अभियान चलाया जा रहा है . एक अमरीकी भक्त की फेसबुक वाल पर यह लिखा है .लिखते हैं , ” अगर  देशद्रोही मीडिया ट्रम्प के दावे को निराधार मानता  है तो  उनके दावों को रिपोर्ट क्यों कर रहे हैं ? ऐसा लगता है कि बहुत से पत्रकार अगर जेल जाने से बच गए तो उनको फिर से पत्रकारिता पढने के लिए स्कूल में दाखिल होना पड़ेगा “ ट्रंप के भक्तों के यह दावे बहुत ही डरावने  हैं लेकिन साथ ही यह साफ़ कर देते हैं कि भक्त चाहे जहां हों, उतने ही मूर्ख होते  हैं.

इस बीच ट्रंप के कुछ काम  ऐसे संकेत देने लगे हैं कि वे राष्ट्रपति पद छोड़ने के बारे में विचार कर रहे हैं. अमरीका में यह रिवाज़ है कि राष्ट्रपति अपराधियों को माफी दे देता है .जिसको माफी मिल जाती है उसके ऊपर उसी केस में  दोबारा मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता है . रिचर्ड निक्सन सत्तर के दशक में अमरीका के राष्ट्रपति थे . उन्होंने तरह तरह के अपराध किये थे . उनके ऊपर वाटरगेट स्कैंडल के कारण महाभियोग की तैयारी हो चुकी थी . लेकिन उन्होंने अपने उपराष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड से सौदा किया कि वे इस्तीफ़ा दे देंगें और अमरीका के संविधान के अनुसार फोर्ड बिना कोई चुनाव लडे राष्ट्रपति बन जायेगें . उसके बदले में उनको  राष्ट्रपति के रूप में रिचर्ड  निक्सन के अपराधों के लिए माफी देनी पड़ेगी. ऐसा ही हुआ और फोर्ड अगस्त 1974 से जनवरी 1977 तक राष्ट्रपति रहे . अब ट्रंप ने भी अपने ख़ास लोगों को माफी देने का सिलसिला शुरू कर दिया है . अंधाधुंध माफी देने के चक्कर में वे ऐसे अपराधियों को भी माफी दे रहे हैं जिनके अपराध जघन्य हैं और कुछ मामलों में तो अपराधी ने अपने जुर्म को कोर्ट के सामने कबूल भी कर लिया है .

इन माफियों के सिलसिले में सबसे ज़रूरी बिंदु है कि क्या राष्ट्रपति ऐसे अपराधों के  लिए भी माफी दे सकते हैं जो अपराध हुए ही न हों. जानकर बताते हैं कि ट्रंप और उनके क़रीबी लोगों ने इतने अपराध किए हैं कि उनके ऊपर मुक़दमा चलना तो तय  है . इमकान  है कि कानून अपना काम करेगा और अगर कानून इमानदारी से काम करता है तो ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप  ,दामाद और उनके सबसे करीबी वकील रूडी जुलियानी पर मुक़दमा ज़रूर चलेगा. अभी इन लोगों पर मुकदमा दायर नहीं हुआ है . बहस इसी विषय पर हो रही है कि क्या राष्ट्रपति एडवांस में  किसी को माफी दे सकते हैं . एक कानूनी चर्चा और भी हो रही है कि क्या राष्ट्रपति अपने आपको माफ़ कर सकते हैं . उनके ऊपर तो कई केस दर्ज भी हैं . रिचर्ड  निक्सन ने तो अपने आप को माफ़ नहीं किया था क्योंकि माफी लेने के लिए उन्होंने अपने उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति बनाकर माफी  हासिल की थी. बहरहाल राष्ट्रपति ट्रंप की माफी देने की कारस्तानी के बाद लोगों को लग रहा है कि लगता है कि ट्रंप को  भी इस बात का एहसास हो चुका है कि उनको अब तो जाना ही पडेगा और पद से हटने के बाद उनको मुक़दमों का सामना भी करना पड़ेगा . अगर उनकी खुद को दी गयी माफी को जायज़ भी  मान लिया जाएगा तो भी राष्ट्रपति की माफी केवल उन्हीं मामलों के  लिए होती है जो  फेडरल न्याय क्षेत्र में होते हों. राज्यों के  मामलों के लिए राष्ट्रपति किसी को माफी नहीं दे सकते . डोनाल्ड ट्रंप के ऊपर न्यूयॉर्क राज्य में टैक्स चोरी के  कुछ मामले दर्ज हैं . उनमें किसी माफी का प्रावधान नहीं है. जी भी हो बीस जनवरी के बाद तो ट्रंप को जाना ही होगा लेकिन उसके  पहले उन्होंने बेशर्मी की सभी सीमाएं पार कर ली हैं .

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Monday, December 21, 2020

माँ तो चली गयीं ,अब यादें ही हैं

 

 


शेष नारायण सिंह

 

हमारी माई की पुण्यतिथि २३ दिसंबर को पड़ती  है . वैसे तो उनकी याद हमेशा आती रहती है लेकिन  दिसंबर में कुछ ज़्यादा ही आती है . आज १५ साल हो गए उनको विदा हुए . किस्मत में नहीं था,वरना २० से २२  दिसंबर २००५ को मैं कानपुर था. उन दिनों गाँव में फोन नहीं था .जब मां का बी पी बहुत ज़्यादा बढ़ गया तो लम्भुआ पी सी ओ से मेरा  भतीजा उज्जवल फोन करने की कोशिश कर रहा था लेकिन आवाज़ ही नहीं आई. अगर बात हो गयी होती तो मैं चार घंटे के अन्दर गाँव पंहुच गया होता. लेकिन बात नहीं हुई. दिल्ली आने के  लिए उसी  शाम ट्रेन ले ली. जब दिल्ली पंहुचा तब  पता लगा कि मां नहीं रहीं . पछतावा हुआ ,आज तक है .बहरहाल हम तुरंत चल पड़े और  अगले दिन घर पंहुच गया .माई के बालगोपाल सब इकठ्ठा हुए और उनके अंतिम संस्कार की सारी विधियां पूरी हुईं . मेरी मां की मृत्यु उनकी प्रिय  संतान ,मेरे छोटे भाई सूबेदार सिंह की गोद में हुई. भरा पूरा परिवार था उनका . चार संताने हैं उनकी और सब के बच्चे उच्च शिक्षित  हैं , सब अपना काम कर रहे हैं .  लेकिन मेरी मां का जीवन अभावों में ही बीता. हालांकि ज़मींदारों के यहाँ  ब्याहकर आई थीं लेकिन सम्पन्नता नहीं थी. अपने हौसले के बल पर जिंदा रहीं, किसी के सामने सर नहीं झुकाया , उनकी अपनी ज़िंदगी में बहुत मुसीबतें आईं लेकिन कभी किसी के सामने झुकी नहीं . ज़मींदारी उन्मूलन के बाद गाँव के कुछ परिवारों में नौकरी चाकरी के कारण मामूली सम्पन्नता आ गयी लेकिन मूल रूप से गाँव गरीबों का ही रहा . आज स्थिति यह है कि एकाध परिवार को छोड़कर किसी के पास एक एकड़  से ज्यादा ज़मीन नहीं है यानी हमारा गाँव , सीमान्त किसानों का गाँव है . उसी गाँव में रहते हुए सबके दुखदर्द में  शामिल होते हुए उन्होंने अपनी उम्र के ८२ साल पूरे किये और चली गयीं .

इस बार माई की पुण्यतिथि पर अपने दो दोस्तों की माताओं का सन्दर्भ भी बार बार याद आ रहा है . इसी साल दीवाली के आसपास चंचल सिंह की माई की भी मृत्यु हुयी. दीवाली के  बाद उनसे मेरी मुलाक़ात की तारीख तय थी लेकिन उसके पहले ही चली गयीं. मैं नियत समय पर गया लेकिन उनसे मिल नहीं सका .उनकी तेरहवीं में शामिल हुआ. उनकी भी वही पृष्ठभूमि थी जो मेरी माई की थी. दोनों ही १९२४ की जन्मी थीं .जब भी मैं उनसे मिला तो मुझे  अपनी ही माई की याद आ गयी. शानदार शख्सियत , आस पड़ोस के लोगों की संकट मोचक ,अपने  बच्चों की  बुलंदी के सपने देखती और उनको पूरा  होते उन्होंने भी देखा था . हालांकि उनके जीवन में भी एकाध वज्रपात ऐसे हैं जिनको सोचकर सिहर जाता हूँ लेकिन जब भी उन्होंने मुझे अपनी गोद में लिया लगा कि सारी दुनिया की ममता और वात्सल्य वहीं केन्द्रित हो गया है . उनकी तेरहवीं से अपने दोस्त  शीतल सिंह की कार में  वापस आना था. उनके साथ रात उनके फार्म पर सूरापुर के पास तौकलपुर गया . रात वहां सो गए और सुबह उनके पैतृक गाँव , महमदाबाद आया . कादीपुर तहसील मुख्यालय के करीब गोमती नदी की उपजाऊ ज़मीन में बसा हुआ गाँव . गाँव में जहां शीतल का पुराना घर है ,उसके साथ ही एक मंदिर है.  उसी मंदिर के साथ ,चबूतरे के ठीक बाहर शीतल सिंह ने मां की एक मूर्ति लगा दी है . जब उनके घर पंहुचा तो धक से रह गया . शीतल के गाँव पहली बार गया था लेकिन ऐसा लगा कि वह जगह तो मेरी जानी पहचानी है .उनकी मां  ने उनके घर के चारों तरफ जिस तरह की हरियाली कर रखा है वह बिलकुल स्नेह की छाया लगती है. सरकारी सेवा से छुट्टी मिलने पर वे अपने गाँव आ गयी थीं . वहां उन्होंने जिस तरह के पेड़ पौधे लगाए उनको देखकर वहां से आने  का मन ही नहीं कहता. बहुत गझिन अपनापा था उस ज़मीन पर , पाजिटिव शक्ति का पुंज लगा उनका पुराना घर .उसी महमदाबाद गाँव में उनकी  मां राजकुमार ठाकुरों के एक सम्पन्न परिवार में ब्याहकर आयी थीं , कई हल की खेती थी लेकिन परिवार बढ़ता गया और खेती बंटती गयी . माँ की बड़ी इच्छा थी कि उतनी ही ज़मीन  रहती तो अच्छा था .  भाग्यशाली थीं क्योंकि उनकी बच्चे उनकी हर इच्छा को ईश्वरीय कानून मानते हैं .शीतल और उनके भाई ने जितनी बड़ी ज़मीन वाले घर में वे आई थीं ,लगभग उतनी  ही ज़मीन खरीद लिया  है . परिवार के कई टुकड़ों के अलग होने के बाद उन्होंने अपने और अपने बच्चों के लिए जो घर बनवाया था उसी घर को विकसित कर एक शानदार आधुनिक सुविधाओं से लैस घर बन रहा है . माँ की बहू वहीं शिफ्ट कर गयी हैं और घर बनवा रही हैं . उम्मीद है कि  शिवरात्रि तक घर बन जाएगा .

जिन तीन माताओं का मैंने  ज़िक्र किया  है उनमें से अब कोई इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी छाया ,उनका आशीर्वाद उन हवाओं में देखा जा सकता  है जहाँ वे सब दुलहिन के रूप में आई  थीं और आज उनकी दुलहिनें और उनकी संतानें उनकी विरासत हो संभालने में लगी हुई हैं .  ( दुलहिन यानी बहू ). इन तीन माताओं जैसी  ही रतनलाल शरशार की माँ रही होगी जब उन्होंने कहा कि , “ कहते हैं , माँ के पाँव के नीचे बहिश्त है “.