Sunday, September 20, 2020

 

किसी के पक्ष में ट्वीट करने के लिए अमिताभ बच्चन पर दबाव डालना सरासर गलत

शेष नारायण सिंह

 

मैं दिल्ली में जब मैं संघर्ष कर रहा था तो मेरे सबसे करीबी दोस्त  राजेंद्र सिंह थे , अब वे अमरीका में विराजते हैं . छात्र के रूप में राजेंद्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इमरजेंसी के खिलाफ मैदान में उतर  गए थे और उनपर बाकायदा मुक़दमे भी  दायर हुए थे .लेकिन अब मनईधारा रहते हैं . अमरीका में बसने वाले अपने रिश्तेदारों और हम सबके बच्चों के बुज़ुर्ग हैं . ईश्वर की कृपा से वज़न भी खूब बढ़ा लिया है  ,तोंद भी सही हो गयी है .अट्ठावन इंच तो नहीं है लेकिन खासी घेरेदार है .उनको हर भारतीय चीज अपनी लगती  है . वे अमिताभ बच्चन और नरेंद्र मोदी को भी अपना मानते हैं.  भारतीय व्यक्तियों के उनके इस प्रेम ने  मुझे अपने बचपन की कुछ यादें ताज़ा कर दीं .जब लडकियां  गौने में विदा होकर जाती थीं तो उनको मालूम  रहता था कि यह गाँव, यह आंगन, यह दुआर अब सब पराया हो रहा है . चीख चीख कर  रोती  थी, शुरू में तो बाप , काका ,भाई ,भतीजे उनके ससुरे जाते  थे लेकिन धीरे धीरे वह भी कम हो जाता था. उन लड़कियों  के लिए हर वह  चीज अपनी  लगती थी जो उनके गाँव से सम्बंधित होती थी .उसी  तरह जो लोग अमरीका में रहते हैं उनको हर भारतीय चीज  बिलकुल अपने  नैहर की लगती है .  जब अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार को  ट्राल बिरादरी ने घेर लिया तो मेरे साथी और  दोस्त राजेंद्र सिंह को वही नैहर वाली चिंता हुई थी .

 

रात मुझे फोन करके उन्होंने कहा कि उनके कुछ फेसबुकिया दोस्तों ने एक अभियान चला रखा है जिसके तहत सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन पर मुसलसल हमले किये जा रहे हैं . राजेंद्र का मानना  है कि यह गलत बात है .  अमिताभ बच्चन से  यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि वे हर  विषय पर टिप्पणी करें . मैं भी यही मानता हूँ . अमिताभ बच्चन या किसी भी व्यक्ति को केवल उन्हीं विषयों पर टिप्पणी करनी  चाहिए जिसपर टिप्पणी करने की उसकी इच्छा हो . अमिताभ बच्चन तो खैर बहुत  बड़े आदमी हैं, सदी के महानायक जैसी उपाधियों से विभूषित किये जा चुके हैं . टिप्पणी की उम्मीद तो भाई लोग हर उस  इंसान से करते हैं जो टीवी पर नज़र आता हो या किसी तरह के लेखन आदि के काम में लगा  हुआ हो. मेरे जैसे मामूली आदमी से भी कई लोग यह कहते पाए  गए हैं कि आप फलां विषय पर क्यों नहीं लिखते ? आपने किसी एक्टर की मृत्यु पर क्यों कुछ नहीं लिखा, आपने किसी अभिनेत्री के घर ढहाने जैसी घटना पर क्यों नहीं लिखा या टीवी पर क्यों नहीं कुछ कहा  ? आम  तौर पर तो इस तरह की बातों को टाल देना ही उचित रहता है लेकिन कुछ अपने मित्रों के इस सवाल का जवाब मैं यह देता हूँ कि ,’ भाई मैं वही लिखता हूँ जो लिखने का मेरा मन कहता है . अखबार में या वेबसाइट पर उस विषय पर  लिखता हूँ जिस पर मेरे सम्पादक जी लिखने को कहते हैं . हां,  जो लिखता हूँ ,वह मेरे अपने विचार होते  हैं . लेकिन अगर सम्पादक जी  किसी ऐसी वैसी बात पर लिखने को कहते हैं तो बता  देता हूँ उस विषय में लिखने में मैं प्रवीण नहीं हूँ . “ मेरा ख्याल है कि यह बात अमिताभ बच्चन पर भी लागू होती है.

अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के बहुत बड़े कलाकार हैं . उनका हिंदी भाषा पर अधिकार है . संतुलित और शुद्ध हिंदी बोलते हैं . अवधी क्षेत्र के देशज  शब्दों का सही जगह पर प्रयोग करना उनको आता है . हिंदी  सिनेमा में बहुत सारे कलाकार हैं जो  आम बोलचाल में हिंदी नहीं अंग्रेज़ी में बात  करते हैं .अमिताभ बच्चन ने बुरे वक़्त में जिससे भी मदद ली ,क़र्ज़ लिया उसको वापस लौटाया .जिसने एहसान किया उसके साथ खड़े रहे . मुझे परेशानी तब होती  है जब कोई यह उम्मीद करने लगे कि एहसान के बदले अमिताभ बच्चन ज़िंदगी भर   एहसान करने वाले की बात मानते रहें . अपने घरेलू और पारिवारिक मसलों में  भी एहसान करने वाले का  हस्तक्षेप स्वीकार करते रहें . एहसानकर्ता को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए .जो लोग अमिताभ  बच्चन से उम्मीद कर रहे  हैं कि वे उनकी  पार्टी की लाइन के लठैत बन जाएँ , वे गलत हैं .   स्व. प्रधानमंत्री राजीव  गांधी के वे बालसखा हैं  . उनके पिताजी, डॉ हरिवंश राय बच्चन के घर में राजीव और सोनिया की शादी हुई थी . फिल्म कुली के दौरान जब उनको चोट लगी तो राजीव गांधी उनका हालचाल लेने असपताल भी गए थे . लेकिन एक समय ऐसा आया जब  उनकी राजीव गांधी के परिवार से उतनी अपनैती नहीं रही . अमर सिंह ने उनकी मदद की  थी . अमर सिंह के आग्रह  पर उन्होंने समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव से भी दोस्ती की . उनकी पत्नी आज भी उसी पार्टी के टिकट पर  राज्यसभा की सदस्य हैं . 2010 के आसपास उन्होंने  गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से निकटता बढ़ाई जो आज तक बनी हुई है .  उनकी  पत्नी समाजवादी  पार्टी की सदस्य हैं लेकिन अमिताभ बच्चन नरेंद्र मोदी के करीबी हैं . इसमें कोई भी विरोधाभास नहीं है . जब उन्होंने मुलायम सिंह यादव की पार्टी से दोस्ती बनाई थी तो समाजवादी पार्टी के कई  नेता उम्मीद करने लगे थे कि वे पार्टी की लाइन का प्रचार करें. आज फेसबुक और ट्विटर पर मौजूद बीजेपी के बहुत सारे लोग उनसे उम्मीद करते हैं कि अमिताभ बच्चन बीजेपी के  ट्विटर और फेसबुक अभियानों में शामिल हो जाएँ. यह गलत है . ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए .

इस बात में दो राय नहीं है कि वे एक गंभीर व्यक्ति हैं . सिनेमा की एक अभिनेत्री ने उनकी पत्नी , बेटी और बेटे के हवाले से अपनी बात कहने की कोशिश की . इस उकसाऊ कारस्तानी के बाद भी उन्होंने उस कलाकार के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की. अब यह उम्मीद करना सरासर गलत होगा  कि वे उस कलाकार के पक्ष में वे ट्वीट करें . ट्वीट करना उनकी अपनी मर्जी है ,उसके लिए उनपर दबाव बनाना ठीक नहीं है .अमिताभ बच्चन को उनकी फिल्मों के कारण जाना  जाता है . उनकी फिल्मों में उनका  काम हर बार उच्चकोटि का होता है .उसी के आधार पर उनका आकलन किया जाना  चाहिए . कलाकार लठैत  नहीं होता. और वह फरमाइशी काम भी नहीं करता .


जिन लोगों ने फिल्म तीसरी क़सम देखी है, उन्हें मालूम है कि ज़ालिम ज़मींदार की फरमाइश के आगे ,फणीश्वर नाथ रेणु की नौटंकी कलाकार क्यों नहीं झुकती.. उसे मालूम है कि ठाकुर तंगनज़र है , तंगदिल है और जिद्दी है लेकिन महिला कलाकार अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती. उसे यह भी मालूम है कि ठाकुर खतरनाक है लेकिन वह उसे सीमा में रहने को मजबूर कर देती है.  इसलिए आज जो लोग अमिताभ बच्चन से अपनी जिद पूरी करवाना चाहते हैं उनको यह फिल्म देखकर ही अमिताभ बच्चन पर दबाव डालना चाहिए . उनको यह पता होना चाहिए कि अमिताभ बच्चन अपनी मर्जी के मालिक हैं और वही करेंगे जो उनका करना है .


Monday, September 14, 2020

 

प्रो. अम्बरीश सक्सेना के कालेज में दिया गया मेरा  भाषण

शेष नारायण सिंह

  आपको मैं धन्यवाद कहना चाहता हूँ कि आपने मुझे आज अपने बीच आने का अवास्र्र दिया .इस बात की मुझे और अधिक खुशी   है  कि आज चर्चा के केंद्र में आज  भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं .मैं भारतेंदु को क्रांतिकारी  मानता हूँ जिन्होंने नाटक, गद्य, अनुवाद ,प्रहसन ,कविता आदि के माध्यम से जनजागरण का प्रयास किया . हिंदी साहित्य में उनका  प्रभाव अद्वितीय है . वैसे तो उन्होंने पांच वर्ष की आयु में ही कुछ न कुछ साहित्यिक बोलना शुरू कर दिया  था लेकिन पंद्रह वर्ष की आयु में विधिवत  साहित्य सेवा प्रारम्भ कर दी .। अठारह वर्ष की आयु यानी महात्मा गांधी के  जन्म के एक साल पहले  उन्होंने 'कविवचनसुधा' नामक पत्रिका निकालना  शुरू कर दिया था , जिसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं।  'कविवचनसुधा',के पांच साल बाद  1873 में 'हरिश्चन्द्र मैगजीन' और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए 'बाला बोधिनी' नामक पत्रिका निकालने लगे थे .बनारस की संस्कृति में  जो मानदंड उन्होंने स्थापित किया था उस पर आज तक के बनारसियों को गर्व है . भारतेंदु की अड़ी आज भी बनारस के अड़ी वालों को याद रहती है . उनका परिवार अंग्रेजों का भक्त था लेकिन वे खुद देशभक्त थे . देशभक्ति की भावना के कारण उन्हें अंग्रेजों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी .   भारतेन्दु जी ने हिंदी भाषा को समृद्ध बनाया लेकिन साहित्य को भी बहुत कुछ दिया .उन्होंने खड़ी बोली के उस रूप को प्रतिष्ठित किया जो उर्दू से अलग है और  हिन्दी क्षेत्र की बोलियों को साथ लेकर विकसित हुई है .यही भारतेंदु की भाषा है . उनके भाषाई संस्कारों पर राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द का निश्चित प्रभाव है क्योंकि उनको  भारतेंदु जी अपना गुरू मानते थे .वे अंग्रेज़ी राज को भारत की दुर्दशा  के लिए ज़िम्मेदार मानते थे . अपने लेखन  में उन्होंने  कई बार लिखा है कि अँग्रेज किस तरह भारत की संपत्ति को लूट रहे थे, भारतेन्दु स्त्री-पुरुष की समानता के पक्षधर थे . उनके पूरे साहित्य में यह सब साफ़ नज़र आता है .

 

मैं कई बार सोचता हूँ  कि उनको कहीं मालूम तो नहीं था कि उनके पास बहुत कम समय है क्योंकि 34 साल की  आयु में जितना कुछ उन्होंने लिखा है बहुत ही बड़ा  खज़ाना है .  १५ साल की उम्र में उन्होंने विधिवत लिखना शुरू किया था और 34 साल में चले गए यानी कुल बीस साल और इस बीस साल में क्या क्या नहीं लिखा .

 

मौलिक नाटक[4]

·         वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ,सत्य हरिश्चन्द्र विषस्य विषमौषधम् भारत दुर्दशा ,अंधेर नगरी ,प्रेमजोगिनी

·         अन्य भाषाओं से नाटकों का जो  अनुवाद उन्होंने किया ,काश बाद के लोगों भी वह काम  जारी रखा होता .

·          

·         अनूदित नाट्य रचनाएँ

·         विद्यासुन्दर (१८६८,नाटक, संस्कृत 'चौरपंचाशिकाके यतीन्द्रमोहन ठाकुर कृत बँगला संस्करण का हिंदी अनुवाद)

·         पाखण्ड विडम्बन (कृष्ण मिश्र कृत प्रबोधचंद्रोदयनाटक के तृतीय अंक का अनुवाद)

·         धनंजय विजय (१८७३, व्यायोग, कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक का अनुवाद)

·         कर्पूर मंजरी (१८७५, सट्टक, राजशेखर कवि कृत प्राकृत नाटक का अनुवाद)

·         भारत जननी (१८७७,नाट्यगीत, बंगला की 'भारतमाता'के हिंदी अनुवाद पर आधारित)

·         मुद्राराक्षस (१८७८, विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का अनुवाद)

·         दुर्लभ बंधु (१८८०, शेक्सपियर के मर्चेंट ऑफ वेनिसका अनुवाद)

 

 

 निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ,

बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल.

अंग्रेज़ी पढ़ी के जदपि सब गुन होत प्रवीण

पै निज भाषा ज्ञान बिनु  रहत हीन के हीन

 

हिंदी दिवस आज शाम तक बीत जाएगा . सरकारी विभागों में सरकारी कार्यक्रम होंगे  , शपथ ली जायेगी  और शाम होते-होते हिंदी का काम पूरा हो जाएगा . एक बात समझ लेने की ज़रूरत है कि सरकार की कृपा से  हिंदी नहीं चलती। वास्तव में वह जनभाषा है और महात्मा गांधी की विरासत है। वह अपने उसी  पाथेय के साथ बुलंदियों के मुकाम हासिल करती रहेगी। आज से करीब सौ साल पहले 1918  में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में महात्मा गांधी ने हिंदी को आजादी की लड़ाई के एजेंडे पर रख दिया था। उन्होंने कहा था किभारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को ही बनाया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी जनमानस की भाषा है। जब देश आजाद हुआ तो संविधानसभा ने 14  सितम्बर 1949 के दिन एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास करके तय किया कि हिंदी ही स्वतंत्र भारत की राजभाषा होगी। संविधान के अनुच्छेद 343 (1 ) में लिखा है- कि ,  ''संघ  यानी केंद्र सरकार की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा.'' 

महात्मा गांधी के 1918  वाले भाषण के बाद स्वत्रंतता की लड़ाई में हिंदी को महत्वपूर्ण स्थान मिलना शुरू  हो गया। इस सन्दर्भ में महान पत्रकारशहीद गणेश शंकर विद्यार्थी का वह भाषण बहुत ही जरूरी दस्तावेज है जो उन्होंने 1930 में हिंदी साहित्य सम्मलेन के गोरखपुर अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में दिया था। गौर करने की बात है कि 1930 में महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई के सर्वमान्य नेता  बन चुके थे, 1930 में कांग्रेस ने देश की पूर्ण स्वतंत्रता का ऐलान कर दिया था और दांडी मार्च के माध्यम से पूरी दुनिया में महात्मा गांधी की नेतृत्व शक्ति  का डंका बज चुका था।  वैसे  विश्वपटल पर जनमानस के नेता के रूप में तो महात्मा गांधी 1920 के आन्दोलन के बाद ही स्थापित हो चुके थे लेकिन सन 1930 तक महात्मा गांधी का लोहा  विंस्टन चर्चिल जैसा भारत की आज़ादी  का विरोधी भी मानने लगा था.  रूसी क्रांति के नेता लेनिन भी महात्मा गांधी को  महान मानने लगे थे . एक दिलचस्प वाकया कलकत्ता से छपने वाले उन दिनों के महत्वपूर्ण अखबार, ''मतवाला'' में छपा है कि जब भारत के  कम्युनिस्ट नेताएमएन रॉय ने दूसरी कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सम्मलेन में यह साबित  करने की कोशिश की कि 1920 का असहयोग आन्दोलन कोई खास महत्व नहीं रखता और गांधी एक मामूली राजनीतिक नेता हैं  तो लेनिन ने उनको डपट दिया था और कहा था कि, ''गांधी राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लाखों-लाख लोगों का विराट जन-आन्दोलन चला रहे हैंवह साम्राज्यवाद-विरोधी हैं।  वह क्रांतिकारी हैं?'' आशय यह है कि 1930 तक महात्मा गांधी दुनिया के बड़े क्रांतिकारी नेताओं में बहुत ही सम्मानित व्यक्ति बन चुके थे और उनके हस्तक्षेप के कारण  आजादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों में ही यह तय हो गया था कि हिंदी को स्वतंत्र भारत में सम्मान मिलने वाला है।

1930 के आन्दोलन के बाद तो कांग्रेस के अधिवेशनों में भी हिंदी को बहुत महत्व मिलने लगा था। इस सन्दर्भ में जब गणेश शंकर विद्यार्थी का भाषण देखते हैं तो बात ज्यादा साफ समझ में आ जाती है। अपने भाषण में स्व. विद्यार्थी जी ने एक तरह से भविष्य का खाका ही खींच दिया है। उन्होंने कहा  कि,

''हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य का भविष्य बहुत बड़ा है। उसके गर्भ में निहित भवितव्यताएं इस देश और उसकी भाषा द्वारा संसार भर के रंगमंच पर एक विशेष अभिनय कराने वाली हैं। मुझे तो ऐसा भासित होता है कि संसार की कोई भी भाषा मनुष्य-जाति को उतना ऊंचा उठानेमनुष्य को यथार्थ में मनुष्य बनाने और संसार को सुसभ्य और सद्भावनाओं से युक्त बनाने में उतनी सफल नहीं हुईजितनी कि आगे चलकर हिन्दी भाषा होने वाली है । ...मुझे तो वह दिन दूर नहीं दिखाई देताजब हिन्दी साहित्य अपने सौष्ठव के कारण जगत-साहित्य में अपना विशेष स्थान प्राप्त करेगा और हिन्दीभारतवर्ष-ऐसे विशाल देश की राष्ट्रभाषा की हैसियत से न केवल एशिया महाद्वीप के राष्ट्रों की पंचायत मेंकिन्तु संसार भर के देशों की पंचायत में एक  भाषा के समान न केवल बोली भर जाएगी किन्तु अपने बल से संसार की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भरपूर प्रभाव डालेगी और उसके कारण अनेक अन्तरराष्ट्रीय प्रश्न बिगड़ा और बना करेंगे।''

आज उनके भाषण के करीब नब्बे साल बाद उनकी भविष्यवाणी पर गौर करने से समझ में आ जाता  है कि हिंदी भाषाजिसको महात्मा गांधी ने जनभाषा कहा थावह  वास्तव में मानवता के एक बड़े हिस्से के लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली थी। महात्मा गांधी कोई भी विषय अधूरा नहीं छोड़ते थे। उन्होंने राजभाषा के सम्बन्ध में बाकायदा बहस चलवाई और आखिर में   सिद्धांत भी प्रतिपादित कर दिया। महात्मा गांधी  के अनुसार राष्ट्रभाषा बनने के लिए किसी भाषा में पांच बातें अहम हैं : पहला- उसे सरकारी अधिकारी आसानी से सीख सकें। दूसरा- वह समस्त भारत में धार्मिकआर्थिक और राजनीतिक संपर्क के माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम होतीसरा- वह अधिकांश भारतवासियों द्वारा बोली जाती होचौथा- सारे देश को उसे सीखने में आसानी हो,और पांचवां- ऐसी भाषा को चुनते समय फैसला करने वाले अपने क्षेत्रीय या फौरी हित से ऊपर उठकर फैसला करें।''  गांधी जी को विश्वास था कि हिन्दी इस कसौटी पर सही उतरती है।

देश के आज़ाद  होने पर संविधान सभा की जिस बैठक में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का फैसला हुआ उसमें सभी सदस्य मौजूद थे और एकमत से फैसला लिया गया। महात्मा गांधी तब जीवित नहीं थे लेकिन देश ने उनकी विरासत को सम्मान दिया और संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्थापित कर दिया। हालांकि यह भी सच है कि संविधान सभा की घोषणा और संविधान में स्थान पाने के बाद भी हिंदी उपेक्षित ही रही। सरकारी स्तर पर थोड़ी   गति तब आई जब जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में 1963 में राजभाषा अधिनियम संसद में पास कर लिया गया और राजभाषा के सम्बन्ध में एक नया कानून बन गया। उसके बाद ही शब्दावली आदि के  लिए समितियां बनीं। लेकिन समितियां भी सरकारी  ही थीं। ऐसे-ऐसे शब्द बना दिए गए जो सीधा संस्कृत से उठा लिए गए थे। उन्हीं सरकारी शब्दों की महिमा है कि कई बार तो हिंदी में आई सरकारी चिट्ठियों के भी हिंदी अनुवाद की जरूरत पड़ जाती है।

यह बात भी निर्विवाद है कि किसी भी भाषा के विकास के लिए ऐसे उच्च कोटि के साहित्य की जरूरत होती है जो जनमानस की जबान पर चढ़ सके। अपने यहां हिंदी भाषा के विकास में कबीरसूर और तुलसी का जितना योगदान है उतना किसी का नहीं। बाद में भी जिन महान साहित्यकारों ने हिंदी को जनभाषा  बनाने में योगदान किया है उनको भी हिंदी दिवस पर याद करना जरूरी होता है।  हमारा सिर उनके सम्मान में सदा ही झुका रहेगा। हिंदी को केवल खड़ी बोली मानने वालों को समझ लेना चाहिए कि अगर अंग्रेजों ने भी इसी तरह की शुद्धता के आग्रह रखे होते तो उनकी अंग्रेजी भाषा का विकास भी नहीं हुआ होता।  खड़ी बोली हिंदी की विकास यात्रा में एक अहम मुकाम जरूर है लेकिन खड़ी बोली ही हिंदी नहीं हैहिंदी उसके अलावा भी बहुत कुछ  है।

आजकल हिंदी के साथ तरह-तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं। अभी तीस साल पहले की बात है कि कुछ अखबारों ने हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर भाषा चलाने की कोशिश की और उसी को हिंदी मनवाने पर आमादा थे।  कहते थे कि अब हिंदी नहीं हिंगलिश का जमाना है। दावा करते थे कि अब यही भाषा चलेगी। लेकिन आज उन संपादकों का भी कहीं पता नहीं है और उस भाषा को भी अपमान की दृष्टि से देखा जाता है। आजकल टेलीविजन  में  नौकरी करने वालों को मुगालता है कि जो उल्टी-सीधी हिंदी वे लोग लिखते बोलते  हैंवही असली हिंदी है। समय से बड़ा कोई न्यायाधीश नहीं होता। इस  अभियान के कुछ पुरोधा तो  दिल्ली के टीवी दफ्तरों के आसपास नौकरी की तलाश करते पाए जाते हैं। और कुछ लोगों ने अन्य धंधे कर लिए हैं।   भाषा के नाम पर मनमर्जी करने वाले रास्ते से अपने आप हटते जा रहे हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। हिंदी सिनेमा में भी सड़क छाप लोगों का एक तरह  से कब्जा ही हो गया था। फ़िल्मी कहानी लिखने वालों को मुंशी कहा जाता था। मुंशी वह प्राणी होता था जो हीरो या फिल्म निर्माता की चापलूसी करता रहता था और कुछ भी कहानी के रूप में चला देता था।  उन मुंशियों के प्रभाव के दौर में प्रेमचंद और अमृतलाल नगर जैसे महान लेखकों की कहानियों पर बनी फिल्में भी व्यापारिक सफलता नहीं पा सकीं। उन दिनों ज़्यादातर फिल्मों में प्रेम त्रिकोण होता थाखलनायक होता था और लगभग सभी कहानियां एक जैसी ही होती थीं। लेकिन जब सिनेमा का विकास एक स्थिर मुकाम तक आ गया तो ख्वाजा अहमद अब्बास,श्याम बेनेगल जैसे लोग आए और सार्थक सिनेमा का दौर  शुरू हो गया . इस दौर में सही तरीके से लिखी गई हिंदी की कहानियां फिल्मों में इज्जत का मुकाम पा सकीं। और अब तो कहानी की गुणवत्ता पर भी चर्चा होती  है। सही हिंदी बोली जाती है और भाषा अपनी रवानी पकड़ चुकी है। ऐसा लगता है कि टेलीविजन की खबरों की भाषा में भी ऐसा ही कुछ होना शुरू हो गया है। वेलकम बैक बोलने वाले अब खिसक रहे  हैं।  हिंदी वाक्यों में अंग्रेजी  चपेकने  की जिद  करने वाले एक न्यूज चैनल के मालिक बुरी तरह  से कर्ज में डूब चुके हैं। सही हिंदी बोलने वाले समाचार वाचकों की स्वीकार्यता बढ़ रही है।

  इतिहास में भी हिंदी के साथ इस तरह के अन्याय हुए हैं। महात्मा तुलसी दास के ही समकालीन रामकथा  के एक रचयिता कवि केशवदास भी हुए हैं। उनके अलावा और भी बहुत सारे कवियों ने राम के चरित्र को अपने काव्य का विषय बनाया था ।  उनका कहीं पता नहीं.  केवल हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले ही उनको  जानते होंगे । केशवदास को तो बाद के विद्वानों ने ''कठिन काव्य का प्रेत'' तक कह डाला जबकि रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का मुकाम हिंदी साहित्य में अमर हैऔर रामकथा के गायकों में कोई भी उन जैसा  नहीं है। इसका कारण यह है कि तुलसी बाबा ने अपने समय की जनभाषा हिंदी में कविताई की और किसी राजा या सामंत की चापलूसी नहीं की।''हिंदी की विकास यात्रा चालू है और उसमें अपने तरीके से लोग अपनी-अपनी भूमिका भी निभा रहे  हैं और योगदान भी कर रहे हैं।

लेकिन हम पंहुचे कहाँ तक हैं . आज हिंदी दिवस है इस अवसर पर एक भाषाई बानगी देखिए एक श्रीमान जी ने कहा ," यू नोआई वेरी मच लाइक हिंदी लैंग्वेज। मैं हिंदी बोलने वालों को एप्रिसिएट करता हूँ।इस हिंदी को हिंदी भाषा के विकास का संकेत मानने  वाले वास्तव में भाषा की हत्या कर रहे हैं . सच्ची बात यह है कि इस  तरह की भाषा का  इस्तेमाल करके वे लोग अपनी धरोहर और भावी  पीढ़ियों के विकास पर ज़बरदस्त हमला कर रहे हैं . ऐसे लोगों के चलते ही बहुत बड़े पैमाने पर भाषा का भ्रम फैला हुआ  है.  आम धारणा फैला  दी गयी है कि भाषा सम्प्रेषण और संवाद का ही माध्यम है . इसका अर्थ यह हुआ कि यदि भाषा दो व्यक्तियों या समूहों के बीच संवाद स्थापित कर सकती है और जो कहा जा  रहा है उसको समूह समझ रहा है जिसको संबोधित किया जा रहा है तो भाषा का काम हो गया . लोग कहते  हैं कि भाषा का यही काम है  लेकिन यह बात सच्चाई से बिलकुल परे है . यदि भाषा केवल बोलने और समझने की  सीमा तक सीमित कर दी गयी तो पढने और लिखने का काम कौन करेगा . भाषा को यदि  लिखने के काम से मुक्त कर दिया गया तो   ज्ञान को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा . भाषा को जीवित रखने के लिए पढ़ना भी बहुत ज़रूरी है  और लिखना भी उससे ज्यादा ज़रूरी है . यह बात सही है कि  भाषा  सम्प्रेषण का माध्यम है लेकिन वह धरोहर और मेधा की वाहक भी  है .  इसलिए भाषा को बोलने ,समझने, लिखने और पढने की मर्यादा में ही रखना ठीक रहेगा . यह  भाषा की प्रगति और   सम्मान के लिए सबसे आवश्यक शर्त है . भाषा के लिए समझना और बोलना सबसे छोटी भूमिका है .  जब तक उसको पढ़ा  और लिखा नहीं जाएगा तब तक वह  भाषा  कहलाने की अधिकारी ही नहीं होगी. वह केवल बोली होकर रह जायेगी .  यह बातें सभी भाषाओं के लिए सही है  लेकिन हिंदी भाषा  के लिए ज्यादा सही  है. आज जिस तरह का विमर्श हिन्दी के बारे में देखा जा रहा है वह हिंदी के संकट की शुरुआत का संकेत माना जा सकता है. हिंदी  में अंग्रेज़ी शब्दों को डालकर उसको  भाषा के विकास की बात करना  अपनी हीनता को स्वीकार करना  है . हिंदी को एक वैज्ञानिक सोच की भाषा और सांस्कृतिक थाती  की वाहक बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे  भाषाविद, राहुल देव   का कहना  है  कि, "हिंदी  समाज वास्तव में एक आत्मलज्जित समाज है . उसको अपने आपको हिंदी वाला कहने में शर्म आती है  . वास्तव में अपने को दीन मानकर ,अपने दैन्य को छुपाने के लिए वह अपनी हिंदी में अंग्रेज़ी  शब्दों को ठूंसता है " इसी तर्क के आधार पर हिंदी की वर्तमान स्थिति को समझने का प्रयास किया  जाएगा.

 

 हिंदी के बारे में एक और भाषाभ्रम भी बहुत बड़े स्तर पर प्रचलित है .  कहा जाता है कि भारत में टेलिविज़न और सिनेमा  पूरे देश में हिंदी का विकास कर रहा है . इतना ही नहीं इन  माध्यमों के  कारण विदेशों में भी  हिंदी का विस्तार हो रहा है. लेकिन इस तर्क में दो  समस्याएं हैं. एक तो यह कि सिनेमा टेलिविज़न की हिंदी भी वही वाली है जिसका उदाहरण ऊपर दिया गया है  और दूसरी  समस्या  यह है कि बोलने या समझने से किसी भाषा का  विकास नहीं हो सकता . उसको  लिखना और बोलना बहुत ज़रूरी है , उसके बिना फौरी तौर पर संवाद तो  हो जाता है लेकिन उसका कोई  स्वरूप तय नहीं होता.  टेलिविज़न और सिनेमा में पटकथा या संवाद लिखने वाले बहुत से ऐसे  लोग हैं  जो हिंदी की सही समझ रखते हैं लेकिन शायद उनकी कोई मजबूरी होती है  जो उल्टी सीधी भाषा लिख देते हैं . हो   सकता है कि उनके अभिनेता या निर्माता उनसे वही मांग करते हैं .  इन लेखकों को प्रयास करना चाहिए कि निर्माता निदेशकों को यह समझाएं कि यदि सही भाषा लिखी गयी तो भी बात और अच्छी हो जायेगी . चाणक्य सीरियल और पिंजर जैसी  फिल्मों के रचयिता  डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी  की फिल्मों का उदाहरण  दिया जा सकता  है जो भाषा के बारे में बहुत ही सजग रहते हैं. अमिताभ बच्चन की भाषा भी एक अच्छा उदाहरण है .  सिनेमा के संवादों में उनकी हिंदी को सुनकर भाषा की क्षमता का अनुमान लगता  है .सही हिंदी बोलना असंभव नहीं है ,बहुत आसान  है. अधिकतर सिनेमा कलाकार निजी बातचीत में अंग्रेज़ी बोलते पाए जाते हैं जबकि उनके रोजी रोटी का साधन  हिंदी सिनेमा ही है. पिछले दिनों एक टेलिविज़न कार्यक्रम में फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौट की भाषा सुनने का अवसर मिला , जिस तरह से उन्होंने हिंदी शब्दों और मुहावरों का प्रयोग किया ,उसको टेलिविज़न और  सिनेमा वालों को  उदाहरण के रूप में प्रयोग करना चाहिए .  एक अन्य अभिनेत्री स्वरा भास्कर भी बहुत अच्छी भाषा बोलते देखी और सुनी गयी हैं . . डॉ  राही मासूम  रज़ा ने टेलिविज़न और सिनेमा के माध्यम से सही हिंदी को पूरी दुनिया में  पंहुचाने  का जो काम किया है ,उस पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता  है. कुछ दशक पहले  टेलिविज़न पर दिखाए गए उनके धारावाहिक , ' महाभारत ' के संवाद  हमारी भाषाई धरोहार का हिस्सा बन चुके हैं.  टेलिविज़न बहुत बड़ा माध्यम है , बहुत बड़ा उद्योग है . उसका समाज की भाषा चेतना पर बड़ा असर पड़ता है . लेकिन सही भाषा बोलने वालों की गिनती उँगलियों पर की जा सकती है .दुर्भाग्य की बात यह है कि  आज इस माध्यम के कारण  ही बच्चों के  भाषा संस्कार बिगड़ रहे  हैं. टेलिविज़न वालों से उम्मीद की जाती है कि वह भाषा को परिमार्जित करे और  भाषा का संस्कार देंगे लेकिन वे तो भाषा  को बिगाड़ रहे  हैं . हिंदी के अधिकतर टेलिविज़न चैनल  हिंदी और अन्य भाषाओं में विग्रह पैदा कर  रहे  हैं. हिंदी के अखबार भी हिंदी को बर्बाद कर रहे हैं  . यह  आवश्यक है कि औपचारिक मंचों से सही हिंदी बोली जाए अन्यथा हिंदी को बोली के स्तर तक सीमित कर दिया जाएगा ".

आज टेलिविज़न की कृपा से छोटे बच्चों की भाषा का  प्रदूषण हो रहा है .बच्चे  सोचते  हैं कि जो भाषा टीवी पर सुनायी पड़  रही है ,वही हिंदी है .माता पिता भी अंग्रेज़ी ही बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं क्योंकि स्कूलों का दबाव रहता है . देखा गया है कि बच्चों की पहली भाषा तो अंग्रेज़ी हो ही चुकी है .बहुत भारी फीस लेने वाले स्कूलों में  अंग्रेज़ी बोलना अनिवार्य है . अपनी भाषा में बोलने वाले बच्चों को दण्डित किया जाता है...बच्चों की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी हो जाने के संकट बहुत ही भयावह  हैं. साहित्य ,संगीत आदि की बात तो बाद में आयेगी ,अभी तो बड़ा संकट दादा-दादी, नाना-नानी से संवादहीनता की स्थिति   है. आपस में बच्चे अंग्रेज़ी में बात  करते हैं ,  स्कूल की भाषा अंग्रेज़ी हो ही चुकी है , उनके  माता पिता  भी आपस में और बच्चों से अंग्रेज़ी में बात करते हैं नतीजा यह होता है कि बच्चों को अपने  दादा-दादी से बात  करने के लिए हिंदी के शब्द तलाशने पड़ते हैं .  जिसके कारण संवाद में निश्चित रूप से कमी आती है  .यह स्पष्ट तरीके से नहीं दिखता लेकिन  बूढ़े लोगों को तकलीफ बहुत होती है.

 

एक समाज के रूप में हमें  इस स्थिति को संभालना पडेगा . बंगला, तमिल, कन्नड़ , तेलुगु . मराठी आदि भाषाओं के इलाके में रहने वालों को  अपनी भाषा की श्रेष्ठता पर गर्व होता है. वे अपनी भाषा में कहीं भी बात करने में लज्जित  नहीं  महसूस करते लेकिन हिंदी में यह संकट  है .  इससे हमें  अपने  भाषाई संस्कारों को मुक्त करना  पडेगा.  अपनी भाषा को बोलकर श्रेष्ठता का अनुभव करना भाषा के  विकास  की बहुत ही ज़रूरी शर्त  है.  इसके लिए  पूरे प्रयास से हिंदी को रोज़मर्रा की भाषा , बच्चों की भाषा  और बाज़ार की भाषा बनाना बहुत ही ज़रूरी है . आज देश में  बड़े व्यापार की भाषा अंग्रेज़ी है , वहां  हिंदी का प्रयोग किया जाना चाहिए . क्योंकि वहां भी अपनी मातृभाषा का प्रयोग किया जा सकता  था . चीन और जापान ने अपनी भाषाओं को ही बड़े  व्यापार का माध्यम बनाया और आज हमसे बेहतर आर्थिक विकास के उदाहरण बन चुके हैं . अंग्रेज़ी सीखना ज़रूरी है  तो वह  सीखी जानी चाहिए , उसका साहित्य पढ़ा जाना  चाहिए, अगर ज़रूरी है तो उसके माध्यम से वैज्ञानिक और जानकारी जुटाई जानी चाहिए लेकिन भाषा की श्रेष्ठता के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए . भारतेंदु हरिश्चंद्र की बात   सनातन सत्य है कि ' निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल '. भाषा की चेतना से ही पारिवारिक जीवन को और सुखमय बनाया जा सकता  है . हमारी परम्परा की वाहक भाषा ही होती है . संस्कृति,  साहित्य , संगीत सब कुछ भाषा के ज़रिये ही अभिव्यक्ति  पाता है ,इसलिए हिंदी भाषा को उसका गौरवशाली स्थान दिलाने के लिए हर स्तर से हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए .

 

 

Friday, September 11, 2020

कांग्रेस में फेरबदल लेकिन चौधरी नहीं बदलेगा

 


शेष नारायण सिंह

कांग्रेस में कुछ बदलाव किये गए हैं . संगठन  में  ठहराव की स्थिति झेल रही कांग्रेस के  23 नेताओं ने पिछले महीने कांग्रेस की  अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा था जिसमें सुझाव दिया गया था कि पार्टी पुनर्जीवित करने के लिए क्या क्या क़दम उठाये जाने चाहिए .उनके लिए फैज़ की एक नज्म में ज़रिये संकेत दे दिया  गया है , फैज़ ने फरमाया था कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले. आला कमान के मर्ज़ी के खिलाफ चिट्ठी  लिखने वालों को नए बदलाव में यही सन्देश दिया गया है .

 

23 नेताओं की चिट्ठी के  करीब तीन हफ्ते बाद शुक्रवार की रात पार्टी में बदलाव की घोषणा कर दी गयी . सरसरी तौर पर देखने से लगता  है कि सोनिया गांधी ने यह सुनिश्चित करने की योजना बनाई है कि राहुल गांधी के पास ही कांग्रेस के संचालन की चाभी सुरक्षित रहे . कार्यसमिति में फेरबदल किया  गया है .इसके अलावा  सोनिया गांधी ने पांच लोगों की एक कमेटी बनाई है जो पार्टी चलाने की  रोज़मर्रा की चिंताओं से उनको मुक्त कर देगी ,एक केंद्रीय चुनाव अथारिटी का गठन किया है ,  कांग्रेस के महामंत्री पद से कई ख़ास लोगों को हटा दिया है लेकिन जो भी बदलाव  किये गए हैं उनसे बहुत क्रांतिकारी नतीजे नहीं निकलने वाले हैं .

 

कांग्रेस के बड़े पदों पर हुए बदलाव को देखने से एक बाट स्पष्ट लगती है कि जो लोग महत्वपूर्ण पदों से हटाये गए हैं उनको हटाना पार्टी  के हित में बहुत ज़रूरी था . मसलन कांग्रेस कार्यसमिति ( CWC ) से जो आठ लोग हटाये गए हैं ,कांग्रेस  के हित में उनको हटाना ठीक था . उनमें से एकाध को छोड़कर किसी की हैसियत अपने राज्य में कांग्रेस का कुछ भी भला करने की नहीं है. मोतीलाल वोहरा, लुज़िनो फलेरियो , ताम्रध्वज साहू, आशा कुमारी ,गौरव गोगोई ,अनुग्रह नारायण सिंह ,रामचंद्र खूँटिया और अरुण यादव अब कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य नहीं रहेंगे.  इनमें से गौरव  गोगोई के अलावा  कोई भी अपने राज्य में चुनाव नहीं जीत सकता .  गौरव गोगोई को उम्मीद है कि कार्यसमिति से हटाकर उनको कोई और ज़िम्मेदारी दी जा सकती है . दिग्विजय सिंह को जब कांग्रेस कार्यसमिति से हटाया गया था तो ताम्रध्वज साहू को  उनकी जगह पर भर्ती कर  लिया  गया था. थोडा पूछताछ करने पर पता लगा था कि  दिग्विजय सिंह के प्रभाव को छतीसगढ़ और  मध्य प्रदेश में बैलेंस करने के लिए उनको लाया गया  है . यह अलग बात है कि उनको खुद भी और धमतरी रायपुर के क्षेत्र के उनके करीबी लोगों को  भी भारी ताज्जुब हुआ था . नई  कार्यसमिति में  कुछ पुराने लोगों को रख लिया गया है और कुछ नए चेहरे शामिल कर लिए गए हैं .जिन 22 लोगों को कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया है उनके नाम देखकर जो बात  समझ में आती है वह यह  कि राहुल गांधी का वफादार  होना तो स्थाई रूप से ज़रूरी है . जितेन्द्र सिंह , रणदीप सिंह सुरजेवाला ,तारिक अनवर  और रघुवीर सिंह मीणा अब कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं . कुछ मज़बूत नेताओं को कांग्रेस कार्यसमिति का बनाया  गया है . उस लिस्ट में दिग्विजय सिंह , मीरा कुमार , अधीर रंजन चौधरी , जयराम रमेश ,प्रमोद तिवारी पी एल पुनिया, शक्तिसिंह गोहिल, दिनेश गुंडूराव , भक्तचरण दास आदि शामिल हैं .लेकिन ज़्यादातर  ऐसे लोग हैं जिनकी  केवल एक योग्यता है और वह यह कि वे राहुल गांधी के वफादार हैं .

 

केंद्रीय चुनाव अथारिटी वाली लिस्ट देखकर साफ़  समझ में आ जाता  है कि आने वाला वक़्त कांग्रेस के लिए क्या लेकर आया है . उसके अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री हैं . उनकी अब तक की  राजनीतिक उपलब्धियों में जो सबसे चर्चित बात  है , वह यह कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ  वडोदरा से लोकसभा चुनाव  मैदान में थे और बिजली के खम्बे पर चढ़कर एक पोस्टर फाड़ा था . उत्तर प्रदेश में कई पिछड़ रही कांग्रेस को लोकसभा में  22 सीटें मिल गयी थीं और वह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से आगे निकल गयी थी लेकिन उसी बीच मधुसूदन मिस्त्री उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के इंचार्ज बना दिए गए . उन्होंने कांग्रेस को ऐसी राह पर डाल दिया कि वह प्रतिदिन  पिछड़ती ही गयी और आज हालत यह है कि उनका राष्ट्रीय अध्यक्ष अमेठी से चुनाव हार  चुका है और जिस रायबरेली को कांग्रेस का सबसे  मज़बूत किला माना  जाता है वहां की विधायक पार्टी से बगावत कर चुकी है .

कुल मिलाकर कांग्रेस में किये गए बदलाव के बाद बहुत कुछ क्रांतिकारी होने की  स्थिति तो नहीं बन रही है लेकिन  कुछ ज़मीन से जुड़े नेताओं को जोड़ने से सफलता की  कांग्रेस की उम्मीद को बल मिल सकता है .

Thursday, September 10, 2020

मेरी माई ने मज़बूत इच्छाशक्ति के बल पर ग्रामीण समाज की पुरातन पंथी सोच का मुकाबला किया था


शेष नारायण सिंह

सुल्तानपुर जिले के मेरे गाँव में दिसंबर 2005 की 23 तारीख को माई की तबियत खराब हुयी थी और उसी रात उनकी मृत्यु हो गयी . जब 24 दिसंबर की सुबह सूरज निकला तो माई कूच कर चुकी थीं. मेरे छोटे भाई , सूबेदार सिंह की गोद में उनकी मृत्यु हुई थी . माई सूबेदार को बहुत मानती थीं. बाबू भी अपने सबसे छोटे बेटे को महत्व देते थे . जब माई की मृत्यु की खबर आई तो मैं और उनकी बड़की दुलहिन दिल्ली में थे . अगले दिन घर पंहुचे . दिल्ली से लखनऊ तक की ट्रेन यात्रा और वहां से सड़क मार्ग से जब मैं घर पंहुचा तो रात हो चुकी थी. पूरी यात्रा में माई के दृढ़ निश्चय वाले व्यक्तित्व की यादें आती रहीं. उनकी सबसे ताज़ा याद मृत्यु के दस –बारह दिन पहले की है . वे धूप में बैठीं थीं . अगहन की धूप हमारे गाँव में बहुत अच्छी होती है. मेरे छोटे भाई सूबेदार उनकी पीठ में , हाथ पाँव में तेल की मालिश कर रहे थे . पास में हम भी बैठे थे . सूबेदार की बड़ी बेटी बिट्टू की शादी तय हो चुकी थी . हम लोगों को उसी का बरिच्छा करने जाना था. बरिच्छा का मतलब यह होता है कि शादी बिलकुल पक्की हो गयी है. उसके बाद से ही मुख्य आयोजन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . माई ने मुझसे कहा कि बहुत कमज़ोर हो गयी हूँ ,अब चलने फिरने में भी तकलीफ होती है . बस एक ही इच्छा है कि बेटी की शादी का तुम लोगों का यह यज्ञ पूरा हो जाय. उन्होंने मुझसे कहा कि बरिच्छा के बाद अगर उनकी मृत्यु भी हो जाए तो शादी की निश्चित तारीख पर बारात आये ज़रूर और बेटी इज्ज़त के साथ विदा हो. लडकी की शादी हम लोगों के यहाँ काफी खर्चीला काम होता है लेकिन हम पूरी तरह तैयार थे . अगले दिन हम बरिच्छा करने गए . ढेमा बाज़ार के पास के एक गाँव में मेरे भाई ने लड़का देखा था. हम वहां गए . वापस आये तो माई बहुत खुश थीं . लडका लखनऊ में वकालत करता था. उसके पिताजी का स्वर्गवास हो चुका था .बाबा उत्तर प्रदेश के राज्य सचिवालय के विभाग से रिटायर हुए थे . सब कुछ ठीक ठाक था. जब हम वहां से आये तो माई ने परिवार की हैसियत के बारे में पूछा . वे जानना चाहती थीं कि गाँव पवस्त में बाबू साहब की इज्ज़त कैसी है , किस तरह के लोग वहां आये थे . सब कुछ बता दिया गया ,संतुष्ट हो गयीं. मैं दो तीन दिन घर पर रहा . उनके साथ ही बैठा रहा . वे मुझसे अक्सर कहती रहती थीं कि सूबेदार का ख्याल रखना ,अभी बच्चे हैं , नादान हैं . हालांकि सूबेदार 48 साल के हो चुके थे लेकिन माई ने उनको हमेशा एक ऐसे बच्चे के रूप में ही देखा जो अभी अपना ख्याल नहीं रख सकता .अगहन की उसी दोपहर को माई ने मुझसे वचन लिया था कि सूबेदार के चारों बच्चों की शादी उनकी पसंद के परिवारों में करवाना , उनके बच्चों की पढ़ाई की फीस जितनी भी लगे, देना और यह पुराना घर अब खँडहर हो गया है , अपने परिवार के लिए एक नया घर बनवा लेना जिसमें दोनों भाई प्रेम से रहना . अपनी दोनों बहनों को यह कभी अहसास न होने देना कि उनके माई-बाबू नहीं हैं . नैहर में उनकी वही इज्ज़त रखना जो मेरे जिंदा रहते होती है .
उनके जाने के करीब पंद्रह साल बाद अब भी अकसर पीछे मुड़कर देखता हूं कि क्या मैं अपनी मां की बातों को सम्मान दे पा रहा हूं ? सूबेदार के चारों बच्चों की शादी उनकी पसंद के परिवारों में हो चुकी है . सभी बच्चे अपनी शादी से खुश हैं . उनकी दोनों लडकियां और दोनों बहुएं उच्च शिक्षित हैं , दोनों लड़के अपनी मर्जी की शिक्षा लेकर काम कर रहे हैं , नया घर बन गया है . दोनों बहनों की हर बात मानता हूँ और उनको नैहर में वही इज्ज़त मिलती है जो पहले मिलती थी. बहनें भी क्या हैं , बेजोड़ हैं . 63 साल के सूबेदार सिंह को अभी भी बच्चा मानती हैं जैसे माई मानती थीं. उनकी किसी बात में उनको कोई कमी नहीं नज़र आती . आज भी वे जो चाहें हम तीनों भाई बहनों से करवा लेते हैं . हालांकि अभी भी जिद करने से बाज नहीं आते . बहुत सारे लोगों की समझ में नहीं आता कि अभी भी मैं गाँव से इतना क्यों जुड़ा हुआ हूँ, क्यों अपना अंतिम समय उसी गाँव में चुपचाप बिताना चाहता हूँ लेकिन मुझे मालूम है कि हम सभी बच्चों ने अपनी माई को उसी घर में उसके आसपास अपने असंभव सपने देखते देखा है . उसी हवा में उनकी सांसे हैं , उसी गाँव में उन्होंने अपने बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए संघर्ष किया है. वे सारे पेड़ जो माई के जीवनकाल में लगाये गए थे , एक एक करके उपनी उम्र पूरी करके सूख रहे हैं. मेरा सपना है कि उस ज़मीन पर इतने पेड़ पौधे लगवा दूं कि दिन में ही लगे कि बादलों ने घेर लिया है .
मेरी माई का नैहर जौनपुर में हैं. जौनपुर सिटी स्टेशन के दक्षिण में उनका गाँव है . सिटी स्टेशन का कुछ हिस्सा उसी गाँव के खेतों में बना है ..उनके गाँव में मियाँ लोगों के ज़ैदी साहेबान का वह परिवार है जिसकी शाखें पूरी दुनिया में फैली हुयी हैं. मियाँ साहेबान बहुत ही शिक्षित लोग हैं . बगल में ही कायस्थों के परिवार हैं . वे लोग भी शिक्षित थे , गाँव में रहते थे , शहर से लगा गाँव था . सभी लोग शहर में काम करते थे. एक अलग तरह की ज़िंदगी थी उन लोगों की . शायद इसीलिये माई की इच्छा थी कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा पायें और लाला लोगों की तरह फैलसूफी की ज़िंदगी जियें .उनकी ससुराल में ज़मीन खूब थी लेकिन शिक्षा दीक्षा का कोई माहौल नहीं था. मेरी बड़ी बहन तो प्राइमरी स्कूल भी नहीं भेजी गयी . छोटी बहन को प्राइमरी पढने का मौक़ा मिल गया क्योंकि तब तक गाँव में ही प्राइमरी स्कूल खुल गया था .मुझे जो भी शिक्षा मिल सकी वह मेरी माँ की जिद का नतीजा है . पांचवें और छठवें दशक में गाँव में पैसे की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं पड़ती थी . कपडे ,मसाले,नमक आदि के लिए पैसे चाहिए होते थे ,वह अनाज बेचकर इकठ्ठा कर लिया जाता था.खरीद कर खाना अपमान माना जाता था . खेत में काम करने वालों को मजदूरी भी अनाज की शक्ल में दी जाती थी . जब मैं जौनपुर पढने के लिए गया तो कभी कभी पैसे की ज़रूरत पड़ने लगी. हमारे पुश्तैनी सेठ थे स्व राम नायक बरनवाल . वे मकसूदन में रहते थे कुछ अनाज बेचकर उनसे पैसा ले लिया जाता था . लेकिन वे रोज़ नहीं आते थे . कभी पैसे की ज़रूरत पड़ी तो और अगर राम नायक चाचा उपलब्ध नहीं हैं तो मेरी माई किसी से उधार ले लेती थीं . पैसे उन्हीं लोगों के घरों में होते थे जिनके घर का कोई आदमी कहीं नौकरी करता हो. मेरे गाँव में ज़्यादातर लोग क्लास फोर की ही नौकरी करते थे. कोई रेलवे में सबसे निचले पायदान पर था तो कोई फौज में सिपाही था . कोई मसोधा मिल में मजदूर था तो कोई वहीं चौकीदार था . मेरे गाँव में अपर क्लास नौकरी करने वालों में पहला नाम डॉ श्रीराज सिंह का है . वे तिलकधारी कालेज जौनपुर में लेक्चरर थे लेकिन वे गाँव में नहीं रहते थे . जब तक उनके बच्चे छोटे थे तब तक तो वे गंर्मी की छुट्टियों में गाँव आ जाते थे लेकिन बाद में वह भी नहीं. बेलहरी कालेज के लेक्चरर राम ओंकार सिंह गाँव में ही रहते थे . इन दोनों के परिवार संपन्न परिवार थे . तब तक बाहर का पैसा बहुत लोगों के घर आने लगा था . किसी शहर में दिन रात मजदूरी करके लोग अपने मातापिता के पास पैसे भेजते थे लेकिन हमारे घर में ऐसा नहीं था. खेती थी और उसी का सहारा था . मुझे जब भी अर्जेंट पैसे की ज़रूरत पड़ी , मेरी मां ने बेझिझक उधार लिया और मुझे दिया . अमिलिया तर और बडकी भौजी से उनको अवश्य उधार मिल जाता था. इसीलिये मैं आज भी अपने विकास में इन दो परिवारों का योगदान मानता हूँ और उनके हित के लिए चिंता करता रहता हूँ.
माई को गए पंद्रह साल होने को आये लेकिन आज भी उनकी हर बात हर मुकाम पर याद आती रहती है . किसी शोषित पीड़ित के पक्ष में खड़े होने की उनकी आदत मुझे आज भी प्रेरित करती रहती है . हालांकि मेरे घर में कोई नौकरी नहीं करता था लेकिन परिवार ज़मींदारों का था. लोग आते थे ,मेरे अधूरे घर ( क्योंकि आधा तो काका के हिस्से जा चुका था ) को कोट कहा जाता था. बाबू 1952 के चुनाव में निर्विरोध ग्राम प्रधान चुने गए थे और करीब चालीस साल तक निर्विरोध प्रधान रहे. उन दिनों गाँव पंचायतों में कोई भी सरकारी पैसा नहीं आता था . पैसे तो संविधान के 73 वें और 74वें संशोधन के बाद आने लगे . तब हमारे बाबू प्रधान नहीं थे .उसके बाद गाँव के प्रधान विकास के नाम पर आये पैसे के बल पर रिश्वत के रास्ते संपन्न होने लगे. हमारे बाबू के कार्यकाल में ऐसा नहीं था. ऐसी स्थिति में मेरी माई का जीवन अभावों में ही बीता . यह अलग बात है कि उनके जाने के दस साल बाद से ही सब कुछ बिलकुल अलग दिखता है . उनके चारों बच्चों के कुल तेरह बच्चे हैं . सबकी ज़िंदगी अच्छी है . ठीक उसी तरह की ज़िंदगी जैसा वे देखना चाहतीं .जब कोई अफसर मुझसे बात करते हुए राहुल को वकील साहब कहता है तो अच्छा लगता है. जब वरुण सिंह के पापा या प्रतिमा सिंह, रणंजय सिंह ,रणविजय सिंह ,उदय सिंह और संजय सिंह के मामा के रूप में कोई मुझे संबोधित करता है तो लगता है कि माई की इच्छा पूरी हो रही है. आज दुनिया के कई इलाकों में उनके बच्चों के बच्चे पहचाने जाते हैं , अगर आज जिन्दा होतीं तो बहुत खुश होतीं. उनकी मृत्यु पूस की नवमी कृष्णपक्ष के दिन हुई थी. पितरपख में गाँव के घर में उनकी पसंद का व्यंजन बना होगा लेकिन इस बार मैंने उनकी बड़की दुलहिन से आग्रह किया कि यहाँ भी माई की पसंद का कुछ बनाया जाय. मुझे मालूम है कि जब भी कोई बीमार होता था ,मेरी माई हमारे गाँव की ग्रामदेवी काली माई से प्रार्थना कारती थीं कि कोई विपत्ति न आये. आज उनके बच्चे लखनऊ, सुलतानपुर,प्रतापगढ़ ,बनारस, सूरत, मुम्बई,धनबाद ,बंगलोर, दिल्ली जैसे शहरों में रहते हैं. कोरोना के इस दौर में इन सभी शहरों में खतरे बहुत हैं . मैंने अपनी मां का बार बार आवाहन किया है कि जहां भी हों , इन बच्चों की सुरक्षा के लिए शास्वत दुआ करती रहें .आपकी याद ही अब मेरी सबसे बड़ी थाती है क्योंकि आपके सभी बेटे बेटियों के लिए मैं वह सब कर चुका हूँ जो आप की इच्छा थी .

अर्थव्यवस्था की बदहाली की तस्वीर कोरोना के घने संकट से निकलने के बाद साफ़ होगी .

 

शेष नारायण सिंह


आज देश आर्थिक  मंदी के भयानक दलदल में  फंस चुका है . कोरोना वायरस के चलते पूरी दुनिया के संपन्न देशों की जी डी पी  नेगेटिव में जा पंहुची है लेकिन  भारत की हालत बहुत खराब है . करीब 24 प्रतिशत नेगेटिव अर्थव्यवस्था को देश को कैसे संभाल पायेगा .अभी  तीन साल पहले तक  केंद्र सरकार और उसके  चेला अर्थशास्त्री शेखी बघारते रहते थे कि जी डी पी को  दहाई के आंकड़े में लाया जाएगा .कोरोना वायरस के प्रबंधन ने भी हमारी अर्थव्यवस्था को ज़बरदस्त चोट पंहुचाई है  हालांकि हमारी  अर्थव्यवस्था पर ग्रहण तो नोटबंदी और जी एस टी ए समय से ही लगना शुरू हो गया था.  पहले से ही मौजूद बेरोजगारों की फ़ौज में कोरोना के कारण करोड़ों लोग और जुड़ गए हैं . हालांकि कहीं कोई  रिकार्ड नहीं है लेकिन डकैती, छिनैती ,अपहरण, क़त्ल आदि की खबरों पर नज़र डालें तो लग जाएगा कि बेरोजगारों की बढ़ती फ़ौज इस सब के लिए किसी हद तक ज़िम्मेदार मानी जानी चाहिए .1991  में जब  पी वी नरसिम्हाराव  प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एक ऐसी अर्थव्यवस्था की विरासत मिली थी जो कि तबाह हो चुकी थी. देश की आर्थिक विश्वसनीयता ख़त्म थी . देश  का रिज़र्व सोना जहाज में लादकर विदेश ले  जाया  गया था और गिरवी रखा जा चुका था . पी वी नरसिम्हाराव के वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह पूंजीवादी आर्थिक चिंतन के खेमे के बड़े नाम थे .उन्होंने देश को आर्थिक विकास की ऐसी डगर पर डाल दिया जहां से हमारी अर्थव्यवस्था पर कोई भी कहीं से  भी हमला बोल सकता था . जब पी वी नरसिम्हाराव की सरकार ने मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था की बात शुरू की थी तो सही आर्थिक सोच वाले लोगों ने चेतावनी दी थी कि ऐसा करने से देश दुनिया भर के पैसे वालों के रहमो करम पर निर्भर हो  जाएगा और मध्य वर्ग को हर तरफ से पिसना पडेगा. सच्ची बात यह है कि जब बाज़ार पर आधारित अर्थव्यवस्था के विकास की योजना बना कर देश का आर्थिक विकास किया जा रहा हो तो कीमतों के बढ़ने पर सरकारी दखल की बात असंभव होती है.. एक तरह से पूंजीपति वर्ग की कृपा पर देश की जनता को छोड़ दिया गया है . अब उनकी जो भी इच्छा होगी उसे करने के लिए वे स्वतंत्र हैं .

इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि शहरी मध्यवर्ग के लिए हर चीज़ महंगी है लेकिन इसे पैदा करने वाले किसान को उसकी वाजिब कीमत नहीं मिल रही है . आज 24 %  नेगेटिव  जी डी पी की अर्थव्यवस्था में  खेती ही वह क्षेत्र हैं जहां जी डी पी की पाजिटिव ग्रोथ हुयी है . लेकिन सरकार खेती वालों के बारे में कुछ भी करने को तैयार  नहीं है . किसानों के कल्याण के लिए हरित क्रान्ति जैसी किसी क्रांतिकारी राजनीतिक और नीतिगत हस्तक्षेप की ज़रूरत है . सप्लाई चेन को भी सही किया जाना सरकारी  एजेंडा होना चाहिए . आज हालत यह है कि किसान से जो कुछ भी सरकार खरीद रही है उसका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है .. किसान को उसकी लागत नहीं मिल रही है और शहर का उपभोक्ता कई गुना ज्यादा कीमत दे रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि बिचौलिया मज़े ले रहा है . किसान और शहरी मध्यवर्ग की मेहनत का एक बाद हिस्सा वह हड़प रहा है.और यह बिचौलिया गल्लामंडी में बैठा कोई आढ़ती नहीं है . वह बड़ा पूंजीपति भी हो सकता है और किसी भी बड़े नेता का व्यापारिक पार्टनर भी .


महंगाई की  मुसीबत को समझने के लिए हमें इतिहास में थोडा पीछे जाकर आजादी की लड़ाई के तुरंत  बाद की स्थिति पर नज़र  डालनी चाहिए . क्योंकि इसकी बुनियाद  हमारे राजनेताओं ने उसी वक़्त डाल दी थी जब उन्होंने आज़ादी के बाद महात्मा गाँधी की सलाह को नज़र अंदाज़ कर दिया था. गाँधी जी ने ग्राम स्वराज्य में लिखा है कि  स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था . आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने कहा कि आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिससे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया जा सके.. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्म निर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें . उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते ,तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता ...


लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी . देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब ढाई साल बाद सरदार पटेल चले गए.. उस वक़्त के देश के  प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू एक ऐसे नेता थे जो महात्मा गांधी की हर बात मानते थे लेकिन आर्थिक नीति के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर वे चूक  गए . गांधी जी की बात को नज़रंदाज़ कर गए .उन्होंने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी और महात्मा गाँधी के बुनियादी सिद्धांत को ही छोड़ दिया..यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट मानने का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और आज ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन है जब 1991  में पी वी नरसिंह राव की सरकार आई तो आर्थिक और औद्योगिक विकास पूरी तरह से पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समझ पर आधारित हो गया . बाद की सरकारें उसी सोच को आगे बढाती रहीं और आज तो हालात यह हैं कि अगर दुनिया के संपन्न देशों में बैंक फेल होते हैं तो अपने देश में भी लोग तबाह होते हैं . तथाकथित खुली अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण के चक्कर में हमने अपने मुल्क को ऐसे मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया है जब हमारी राजनीतिक स्थिरता भी दुनिया के ताक़तवर पूंजीवादी देशों की मर्जी पर हो गयी है .

 देश में आर्थिक मुसीबत की एक दूसरी  समस्या है कि पिछले 40 वर्षों में राजनीति  ऐसे लोगों का ठिकाना हो चुकी है जो आमतौर पर राजनीति को एक व्यवसाय के रूप में अपनाते हैं .पहले  ऐसा नहीं था. आज़ादी की लड़ाई में   बड़े पैमाने पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल लोग राजनीति में शामिल हुए थे . १९२० से १९४२ तक भारतीय राजनीति में जो लोग शामिल हुए वे अपने क्षेत्र के बहुत ही सफल लोग थे .राजनीति में वे कुछ लाभ लेने के लिए नहीं आये थे  ,अपना सब कुछ कुर्बान  करके अपने देश की आर्थिकराजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को लोकशाही के हवाले करने का उनका जज्बा  उनको राजनीति में लाया था. बाद के समय में भी राजनीति में वे लोग सक्रिय थे जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल रह चुके थे और देश के हित में कुर्बानियां देकर आये थे . लेकिन जवाहरलाल नेहरू के जाने के  बाद जब से राजनीतिक नेताओं का नैतिक अधिकार कमज़ोर पड़ा तो राजनीति में ऐसे लोग आने लगे जिनको चापलूस कहा जा सकता है . इसी दौर में राजनीति में ‘ इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा ‘ का जयकारा लगाने वाले भी राजनीति के शिखर पर पंहुचे . वे राजनीतिक जमातें भी राजनीति में सम्मान की उम्मीद करने लगीं जिनके राजनीतिक पूर्वज या तो अंग्रेजों के साथ थे और या आज़ादी की लड़ाई में तमाशबीन की तरह शामिल हुए थे . उनको मान्यता मिली भी क्योंकि १९४७ के पहले राजनीतिक संघर्ष का जीवन जीने वाले नेता धीरे धीरे समाप्त हो रहे थे . आज दिल्ली में अगर नज़र दौडाई जाए तो साफ़ नज़र आ जाएगा कि राजनीति में ऐसे लोगों का बोलबाला है जो  राजनीति को एक पेशे के रूप में अपनाकर सत्ता के गलियारों में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं देश के उज्जवल भविष्य से उनका कोई लेना देना नहीं  है वे वर्तमान में जीने के शौक़ीन हैं और वर्तमान को राजाओं की तरह जी रहे हैं .

.यह लोग राजनीति को व्यापार समझते हैं और उसमें लाभ हानि के लिए किसी से भी समझौता कर लेते हैं . एक और बात समझ लेने की है कि दोनों ही बड़ी पार्टियों की अर्थनीति वही है डॉ मनमोहन सिंह को बेशक बीजेपी वाले दिन रात कोसते रहते  हैं लेकिन आर्थिक नीतियाँ उनकी ही लागू हो  रही है .राजनीति में सत्तर के दशक में ऐसे लोगों का आना बड़े पैमाने पर शुरू हुआ जो राजनीति को व्यापार समझते थे. यही वर्ग १९८० में सत्ता में आ गया और जब मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को विश्वबाजार के सामने पेश किया तो इस वर्ग के बहुत सारे नेता भाग्यविधाता बन  चुके थे. उन्हीं भाग्यविधाताओं ने आज देश  का यह हाल किया है और अपनी तरह के लोगों को ही राजनीति में  शामिल होने के लिए  प्रोत्साहित किया है .पिछले २० वर्षों की भारत की राजनीति ने यह साफ़ कर दिया है कि जब तक देशप्रेमी और आर्थिक भ्रष्टाचार के धुर विरोधी राजनीतिक पदों पर नहीं पंहुचते ,देश का कोई भला नहीं होने वाला है . इसी शून्य को भरने की कोशिश आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने की थी और जनता  ने उनको सर आँखों पर बिठाया लेकिन उद्योगपतियों की सभा में उन्होंने भी साफ़ कह दिया है कि वे पूंजीवादी राजनीति के समर्थक हैं . यानी उन्होंने भी ऐलान कर दिया कि अन्य पार्टियों की तरह वे भी चाकर पूंजी के लिए काम करेगें और कर रहे हैं .उसी तरह से देश का भला करेगें  जैसा बाकी सत्ताधारी पार्टियों ने किया है . केवल महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक प्रमुखता  के दौर में देश के आम आदमी के हित की राजनीति हुई है बाकी तो चाकर पूंजी की सेवा ही चल रही है .

 

आज हमारी अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर पंहुच चुकी है उसको अगर डॉ  धर्मवीर भारती के शब्दों को उधार लेकर कहें तो ‘बंद गली के आख़िरी मकान ‘ पर पंहुच गयी है . यहाँ से कैसे मुक्ति  मिलेगी और आम आदमी की खुशहाली कब अर्थव्यवस्था की बुनियाद बनेगी , मौजूदा हालात में कुछ  नहीं कहा  जा सकता है . कोरोना  के कारण आई अनिश्चितता के बाद जन  मुसीबत के घने बादल छंटेंगे ,तब तस्वीर साफ़ होगी .