Tuesday, May 7, 2019

यह यात्रा कुमार केतकर की पत्रकारिता को सलाम करने का अवसर भी है





शेष नारायण सिंह

 इलाहाबाद और  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा लेने के बाद एम आई टी से पी एच डी करके वहीं अमरीका  में  अकादमिक क्षेत्र में बुलंद मुकाम बनाने वाले एक प्रोफेसर और मुंबई के कुछ बहुत ही विद्वान एवं  सामाजिक रूप से जागरूक पत्रकारों के साथ चुनाव यात्रा एक बेहतरीन अनुभव है . आम तौर पर चुनाव यात्राओं के  दौरान कौन जीत रहा है या कौन कौन हार रहा है , यह बातें उठती रहती  हैं . या कितनी सीटें किस पार्टी को मिलने वाली हैं , यह बातें मुझे बोर करती हैं . हालांकि अपने ग्रुप में भी यह  चर्चा आती रहती है लेकिन हमारे साथियों की यात्रा का स्थाई भाव उत्तर प्रदेश की राजनीतिक विकास यात्रा को समझना है . देश के चोटी के पत्रकार कुमार केतकर और ब्राउन विश्वविद्यालय के विश्वविख्यात प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश की चुनाव यात्रा मुझे अब तक अभिभूत कर चुकी है. मैं  अपने को धन्य मानना  शुरू कर चुका हूँ. लोकसभा के चुनाव में जो जीतेगा वह सांसद बनेगा लेकिन लखनऊ से बनारस तक की हमारी यात्रा में हमारे साथी , कुमार केतकर सांसद हैं लेकिन पत्रकारिता के धर्म में अडचन न आने पाए इसलिए वे अपने इस परिचय को   पृष्ठभूमि में रख कर चल रहे हैं . हमें मालूम है कि अगर रायबरेली में हमने बता दिया होता कि केतकर जी संसद हैं तो हमको  बहुत ही सम्मान से ट्रैफिक  की चकरघिन्नी खाने से मुक्ति मिल जाती लेकिन हम रायबरेली में गोल गोल घुमते रहे और एक पत्रकार के लिए वह नायाब तजुर्बा हासिल करने में कामयाब रहे कि इतने दशकों से वी आई पी चुनाव क्षेत्र होने के बाद भी रायबरेली शहर विकास की यात्रा में पिछड़ गया  है. कुमार केतकर हमारे साथ सडक पर छप्पर में बनी चाय की दुकानों पर  बैठकर जिस तरह से श्रोता  भाव से सब कुछ सुनते रहते हैं ,वह बहुत ही दिलचस्प है .  जब अमेठी के रामनगर में संजय सिंह के महल के सामने झोपडी में चल  रही चाय की दुकान में हम बैठे थे तो मुझे लगा कि अगर  किसी अधिकारी को पता लग जाये कि टुटही कुर्सी बैठे यह श्रीमानजी संसदसदस्य हैं तो वह प्रोटोकाल का पालन करने की कोशिश  करेगा लेकिन कुमार को वह मंज़ूर नहीं क्योंकि उनको अपने अन्दर बैठे पत्रकार को पूरे शान और गुमान के साथ  जिंदा रखना है . मुझे लगता है कि अगर अपने मूल  धर्म के पालन में सभी लोग यही संकल्प रखें तो समाज का बहुत भला होगा .
हमारी पूरी यात्रा में दलितों को  केवल वोटर के रूप में पहचानने की कवायद से बार बार सामना हुआ . मुझे इसमें  दिक्क़त  होती है . मैं जानता हूँ कि दलित युवकों का शिक्षित वर्ग सामाजिक न्याय के सवालों को बहुत ही तरीके से समझता है और उसके राजनीतिक भावार्थ को जानता है . मेरी उत्तर प्रदेश यात्राएं होती तो बहुत हैं लेकिन कभी एक दिन के लिए तो कभी चार दिन के लिए . १९९४ के बाद से बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में नियमित रूप से एक महीना गाँव में रहना अब इतिहास है लेकिन मुझे पता चलता रहता  था कि मेरे गाँव में सही अर्थों में दलित विषयों की चेतना है  . ‘ हरिजन शब्द के प्रयोग की राजनीति को मैंने १९७३ में ही अपने गाँव के दलित लोगों के वरिष्ठ दलित लोगों को बताने की कोशिश की थी. अमरीका के ब्लैक पैंथर्स के बारे में दिनमान ने कुछ छापा था और उसके आधार पर और सूचना इकट्ठा करके मैंने गाँव के समझदार दलित , खेलई से बात की थी . उसके पहले इन लोगों ने बराबरी के छोटे ही सही लेकिन महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे .एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना के ज़रिये बात को रेखांकित करने की कोशिश की जायेगी . हमारे गाँव में सभी जातियों के बाल नाई काटते थे  . बाल काटने के पहले नाई लोग पानी से बाल को खूब भिगोते थे .इस तरह से सिर  में मालिश हो जाती थी . लेकिन दलित व्यक्ति जब बाल कटवाने जाते थे तो नाई का आदेश होता था कि बाल भिगोकर आओ , वह अपने ही   हाथ से पानी से बाल भिगोते थे ,उसके बाद  उनके बाल काटे जाते थे .  खेलई दादा ने मुझे एक दिन बताया कि  अब हम लोग अपने बाल खुद नहीं भिगोएंगे . जैसे बाभन ठाकुरों के बाल  नाई जी भिगोते  हैं ,वैसे ही हमारे भी बाल उनको भिगोना पडेगा . लेकिन नाई लोग सहमत नहीं हुए. बड़ी लम्बी कहानी है लेकिन इस समस्या की काट निकाल ली गयी . दलित बस्ती के कुछ लड़कों ने उस्तरा कैंची खरीद लिया और खुद ही बाल काटने की कोशिश की . धीरे धीरे वे  कुशल नाई हो गए . उस दलित लड़कों को उनकी अपनी बिरादरी के लोग  नाऊ ठाकुर ही कहने लगे . यह बहुत बड़ी बात थी . जन्म से नहीं कर्म से जाति के सिद्धांत का एक उदाहरण था .उसके बाद बहुत सारे विकास हुए . शिक्षा का महत्व, सरकारी नौकरी का महत्व ,मेरे गाँव के दलितों की राजनीतिक समझदारी में बड़ा कारक बना . बाद में जब दलित मुद्दा आन्दोलन का रूप लेने लगा तो कांशी राम के एक साथी मेरे गाँव में आये . यह १९८४ के चुनाव के बाद की बात है  . बहुजन समाज पार्टी का गठन नहीं हुआ था , डी एस 4 नाम के संगठन के ज़रिये दलित चेतना के विकास की बात हो रही थी. उन्होंने ही  लोगों को अपना कोई उद्यम लगाने की बात सबसे पहले समझाई थी . जब गाँव के चौराहे पर दलित लड़कों ने छोटी छोटी दुकानें खोलना शुरू किया तो मुझे स्पष्ट हो  गया कि अब यह कारवाँ चल पड़ा है , यह रुकने वाला नहीं है .अब तो मेरे गाँव के दलितों के लड़के लडकियां उच्च शिक्षा ले रहे  हैं . पिछली यात्रा में पता चला कि जिस सरकारी विभाग में मेरे काका का पौत्र सहायक इंजीनियर हुआ है ,उसी के साथ एक दलित नौजवान की नियुक्ति भी उसी विभाग में हुई है . दोनों राजपत्रित अधिकारी हैं . इस घटना का महत्व यह है कि उस दलित के पिता और बाबा मेरे काका के यहाँ हरवाही करते थे .लेकिन शिक्षा और संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी वास्तव में समतामूलक समाज की स्थापना की ज़रूरी शर्त है . इसी शिक्षा ने गरीबी पर मर्मान्तक प्रहार भी किया है .
बहरहाल मेरे सहयात्रियों को मेरे भाई, सूर्य नारायण सिंह ने  दलित नेताओं से मिलवाया . डॉ लोकनाथ  मेरे भाई के बहुत ही क़रीबी  हैं और मेरे परिवार के सभी लोग उनको अपना डाक्टर मानते हैं .  चौराहे पर उनकी क्लिनिक है .इन लोगों को मेरे भाई ने डाक्टर साहब से मिलवाया और उनके साथ यह दलित बस्ती में गए. वंचना ( Deprivation) के असली मुद्दों पर बात हुयी . शासक वर्गों की कोशिश रहती है कि दलितों को ब्राह्मण विरोधी साबित किया जाए और सारी बहस को जाति बनाम  जाति के विमर्श में लपेट दिया जाए . लेकिन वहां से लौटकर आने के बाद इन लोगों ने मुझे बताया कि सामाजिक मुद्दों के प्रति जो जागरूकता वहां देखने को मिली , वह अद्वितीय है .  दलित बस्ती के बाशिंदों  ने साफ़ बता दिया की हमारी लड़ाई किसी ब्राहमण से नहीं है , लड़ाई वास्तव में उस सोच से है जो एक ख़ास वर्ग के आधिपत्य की बात करती है .  सवर्ण सुप्रीमेसी की उस राजनीति को ब्राह्मणवाद भी कहा  जा सकता है . करीब घंटा भर चले इस वाद विवाद में सब खुलकर बोले और सारे सवालों पर आम्बेडकर के हवाले से अपना दृष्टिकोण रखा .  दलितों के इंसानी हुकूक का सबसे बड़ा दस्तावेज़ , भारत का संविधान है . उसके साथ हो रही छेड़छाड़ की कोशिशों से हमारे गाँव के दलित चौकन्ना हैं . उनको  जाति के  शिकंजे में लपेटना नामुमकिन है . वे  मायावती की राजनीति का समर्थन करते हैं तो उम्मीदवार किसी भी जाति का हो, उसकी  जाति की परवाह किये बिना उसको वोट देने में उनको कोई  संकोच  नहीं है . प्रो. आशुतोष वार्ष्णेय ने मुझसे साफ़  कहा कि इस चेतना के बाद सामाजिक परिवर्तन के रथ को रोक सकना  असंभव है. अब यह कारवाँ रुकने वाला  नहीं है . क्योंकि जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से नहीं टाले जा सकते और यह भी अब डेरे मंजिल पर ही डाले जांयेंगे और जब बराबरी  वाला समाज  स्थापित हो जाएगा तो भारतीय समाज की विकास यात्रा को कोई नहीं रोक  सकेगा .क्योंकि इन दलित नौजवानों ने तय कर रखा है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अगर उनके भविष्य को डॉ अम्बेडकर के राजनीतिक  दर्शन से हटकर लाने की कोशिश  करेगी तो वह उनको मंज़ूर नहीं है क्योंकि डॉ आंबेडकर की राजनीति में ही सामाजिक बदलाव का बीजक सुरक्षित है .
मेरे गाँव से बनारस की सड़क पर करीब २५ किलोमीटर चलने के बाद सिंगरामऊ पड़ता है .वहीं पर एक  नायाब इंसान रहता है .सिंगरामऊ रियासत के मौजूदा वारिस कुंवर जय सिंह से मुलाक़ात हुई. ग्रामीण उत्तर प्रदेश में शिक्षा के विकास के लिए उनके  पूर्वजों ने करीब एक सौ साल पहले एक पौधा लगाय था जो अब बड़ा हो गया है . राजा हरपाल सिंह पोस्ट  ग्रेजुएट कालेज , केवल जौनपुर का ही नहीं ,पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक प्रमुख शिक्षा संस्थान  है . कुंवर जय सिंह ,जिनको इस इलाके में सभी जय बाबा के  नाम से जानते हैं ,अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित इसी शिक्षा संस्थान का कार्यभार देखते हैं . उनके कोट में मट्ठा पीने को मिला , बेहतरीन  पेय लेकर हम उनके साथ ही , वहां चल पड़े जहां जाने के लिए दिल्ली ,मुंबई के बहुत सारे साथी अक्सर प्लान बनाते रहते हैं लेकिन  बहुत कम लोग अभी तह जा पाए हैं .ता. मेरी मुराद बी एच यू के छात्र संघ के चालीस साल पहले अध्यक्ष रहे , श्री चंचल से है. उन्होंने अपने पुरखों के गाँव ,पूरे लाल , में  समता घर बना रखा है जहां गरीबी और deprivation के शिकार लोगों के बच्चों को शिक्षा और हुनर की ट्रेनिंग देकर गरीबी के मुस्तकबिल को लगातार चुनौती  दी जाती है .  महानगर से जाकर जो लोग भी  समता घर में रहे हैं, उनके लिए ग्रामीण जीवन के अनुभव के बेहतरीन अवसर इस ठीहे पर उपलब्ध रहते हैं . और लोगों के लिए वहां जाकर चंचल जैसे नामी कलाकार ,पत्रकार,  राजनेता, लेखक से मिलना सही होता होगा  लेकिन  चंचल के गाँव में मेरे लिए  उनकी माई से मिलना एक जियारत होती है . माई से जब मैं मिलता हूँ तो मुझे अपनी माई की याद आ जाती  है . जब पूरे लाल की प्रथम  नागरिक  और चंचल की माई मुझे कलेजे से लगाकर आशीर्वाद देती हैं तो लगता है कि मेरा भविष्य बहुत ही उज्जवल है.   आने वाली मुसीबतों को अपनी निश्छल अपनैती से चुनौती देने वाली यह मां, मुझे किसी भी मुसीबत का मुकाबला करने का हौसला देती है. शायद इसीलिये “ कहते हैं कि मां के पाँव के नीचे बहिश्त  है “ पूरे लाल में राजनीतिक चर्चा भी हुयी , हालाते हाजेरह पर तबसरा हुआ . हमारे मुंबई से आये दोस्तों को बहुत मज़ा आया. उन्होंने मुंबई में रहने वाले जौनपुर मूल के भइया बिरादरी के लोगों की ज़मीन की मिट्टी की समृद्धि को करीब से देखा और अनुभव किया .उनको लगता होगा कि इतने संपन्न इलाके से खेती के मालिक ठाकुरों ब्राह्मणों के बच्चे मुंबई जाकर मजदूरी क्यों करते हैं . लेकिन इसका जवाब  है और कभी  मैं ही उसको लिखूंगा .
हमारा अगला पड़ाव जौनपुर था .जहां मेरे बी ए के  दर्शन शास्त्र के  शिक्षक डॉ अरुण कुमार सिंह के साथ  सत्संग की योजना थी . लेकिन उनसे वैसी बात नहीं हो  सकी जैसी उम्मीद थी क्योंकि उनको बोलने का मौक़ा ही नहीं मिला. उनके घर पर एक युवक से मुलाक़ात हुयी . इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त  यह नौजवान आजकल बीजेपी का जिम्मेवार कार्यकर्ता है . पिछड़ी जाति के परिवार में जन्म लेकर उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में एक उपलब्धि है .यह युवक कुशाग्र्बुद्द्धि है लेकिन पता नहीं क्यों हो गया था कि राजनीतिक विमर्श में अपनी पार्टी की घोषित लाइन को कुछ इस तरह से चलाने की कोशिश कर रहा था जैसे चुनाव प्रचार में किया जाता है . ज़ाहिर है मुलाक़ात बेमजा रही . हम में से कोई भी उस इलाके में  मतदाता नहीं है और जो लोग भी हमारे काफिले में शामिल थे लगभग सभी  लोकसभा २०१९ में वोट डाल चुके हैं .वहां से बेनी साहु की दिव्य जौनपुरी इमरती का प्रसाद खाकर हम अगली मंजिल के लिए  रवाना हो गए .  इस यात्रा में हमारे सबसे वरिष्ठ साथी कुमार केतकर संसद के सदस्य हैं लेकिन अपनी उस पहचान को  पूरी  तरह से आच्छादित करके चल रहे हैं . वे एक शुद्ध पत्रकार के रूप में यात्रा कर रहे हैं. मैं कई बार सोचता  हूं कि जिस संसद की सदस्यता लेने के लिए आज देश के अलग अलग कोने में अरबों खरबों रूपये बहाए जा रहे हैं  , उसी संसद के ऊपरी सदन के सदस्य कुमार केतकर इस यात्रा में इस तरह से रह रहे हैं जैसे एक साधारण पत्रकार  अपनी यात्रा करता है . सुल्तानपुर में जब वरुण गांधी की  चुनावी सभा में यह ख़तरा बाहुत ही अयां हो गया कि उनको वरुण गांधी पहचान लेंगे तो विकास नायक ने उनको तुरंत भीड़ के सबसे पीछे ले जाकर श्रोताओं के बीच छुपा दिया .  मैंने बहुत से पत्रकार देखे हैं , जौनपुर के बाद वाराणसी में बहुत  सारे  सेलिब्रिटी पत्रकारों से फिर सामना हुआ लेकिन बनारस की गलियों में पैदल चलते , सांड से बचकर रास्ता तलाशते   ,फर्श पर बैठकर बनारस के संतों की वाणी सुनते कुमार केतकर को देखना मेरे लिए वह वह उम्मीद की किरण है कि अगर   हाथ में कलम है तो ज़िंदगी को हमेशा एक मक़सद दिया  जा सकता है .  इस चुनाव की उनकी कवरेज देखकार मुझे लगता  है कि मैं भी जब बड़ा बनूंगा तो कुमार केतकर जैसा पत्रकार बनूंगा . वाराणसी के होटल में बहुत सारे फाइव  स्टार पत्रकारों के दर्शन हुए लेकिन उनमें से किसी को मैं काबिले  एहतराम नहीं मानता  . वाराणसी में जिस तरह से  कुमार केतकर ने ई रिक्शा की यात्रा की ,  पैदल घूमे और शहर के मिजाज़ को समझने की कोशिश की ,वह मेरे लिए  ,मेरी ज़िंदगी का अहम सबक है. चुनावी माहौल में एक साधारण रिपोर्टर की तरह काम करना बहुत ही कठिन तपस्या है , और यह तपस्वी साधारण से साधारण होटलों में रुक कर जिस तरह से  अपनी मिशन पत्रकारिता को  अंजाम दे रहा है ,वह मेरे श्रद्धा का सबसे बुलंद मुकाम है .

Sunday, May 5, 2019

लखनऊ से सुलतानपुर तक की चार और पांच मई की यात्रा रिपोर्ट


शेष नारायण सिंह

लखनऊ से सुल्तानपुर की  की यात्रा में पांच लोकसभा क्षेत्रों से गुजरने का मौक़ा लगा . आज सुल्तानपुर से चलकर आजमगढ़ और जौनपुर होते हुए शाम को वाराणसी में डेरा डालने की योजना है . लखनऊ संसदीय क्षेत्र के बारे में जो चर्चा दिल्ली में  सुनने को मिल रही थी , वही लखनऊ में भी है . इस चुनाव में गृहमंत्री राजनाथ सिंह को हराना नामुमकिन माना जा रहा है . वही हाल रायबरेली में सोनिया गांधी का भी है .
लोकसभा २०१९ भारत के संसदीय इतिहास में असाधारण चुनाव माना जा रहा है . पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली पहली गैरकांग्रेसी पार्टी भारतीय जनता पार्टी है . पहली बार कोई  गैर कांग्रेसी पार्टी अपने पांच साल के कामकाज पर जनादेश मांग रही है और चुनाव के मैदान में है . पहली बार उत्तर प्रदेश में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों का एक ऐसा गठबंधन सत्ताधारी पार्टी को चनौती दे रहा है जिसके सफल होने के बाद भारत में चुनावी राजनीति का नया व्याकरण लिखा जाने वाला है . बहुजन समाज पार्टी और  समाजवादी पार्टी का गठबंधन अगर सफल हुआ तो देश में एक दलीय लोकशाही का अंत होने वाला है . हमारे मित्र और बहुत आला मेयार के पत्रकार और इस यात्रा के हमसफ़र ,कुमार केतकर का कहना है कि ऐसा लगता है अब चुनाव में कई पार्टियों के गठबंधन की सरकारें बनाया  करेंगे . इसका एक माडल जर्मनी की क्रिश्चियान डेमोक्रेटिक यूनियन  Christian Democratic Union   में उपलब्ध है . हो सकता है कि आने वाले समय में यही माडल सबको स्वीकार्य हो जाए .

मई जून के महीने में लखनऊ शहर दोपहर में सो जाता है . बाज़ारों में बहुत कम लोग नज़र आते हैं . चुनाव प्रचार के अंतिम दिन भी शहर का मिजाज़ इससे अलग नहीं था. लखनऊ में  छः मई के चुनाव के लिए चार की शाम को प्रचार बंद  हो गया . चार तारीख की दोपहर को ही सन्नाटा साफ़ नज़र आ रहा था. लेकिन हम भाग्यशाली थे. शहर के शीर्ष पत्रकारों के साथ हमको शाम की चाय पीने का मौक़ा लागा. हमारी  टीम में भी एक से एक जानकार हैं  ब्राउन विश्वाविद्यालय के प्रोफ़ेसर आशुतोष वार्ष्णेय , मुंबई के सबसे आदरणीय मराठी पत्रकारों में से एक कुमार केतकर और उनके मित्र विकास नायक हमारे साथ हैं. मुंबई के ही एक सांख्यिकीविद भी हमारे काफिले में हैं जिनकी साहित्य और चुनावी राजनीति समझदारी में गहरी पैठ है . शाम को जब चाय पर दो घंटे की माथापच्ची के लिए हम बैठे तो उत्तर प्रदेश के हर जिले की तस्वीर परत दर परत खुलती  गयी. हम लखनऊ के करीब पन्द्रह उन  पत्रकारों से मुखातिब थे जिनको पूरे देश में बरास्ता टेलिविज़न की बहसों के जाना पहचाना जाता है . बहुत  दिन बाद मैं ऐसी किसी महफ़िल में शामिल था जिसमें मैं शुद्ध रूप से श्रोता था . मैंने किसी भी मुद्दे पर अपनी राय नहीं दी. चुपचाप सुनता रहा .  गंभीर बहस मुबाहसा होता रहा . मौजूद पत्रकारों में ज्यादातर लोग  उत्तर प्रदेश की अधिकतर संसदीय क्षेत्रों की की यात्रा कर चुके हैं . आम राय यह थी की बीजेपी के पक्ष में २०१४ वाली हवा तो कतई नहीं है . मौजूदा सरकार के पिछले पांच साल के काम से भारी नाराज़गी है लेकिन पुलवामा में आतंकवादी हमला और उसके खिलाफ बालाकोट में की गयी भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई के कारण एक बहुत बड़ा  वर्ग सरकार के पक्ष में है . राष्ट्र की रक्षा और घर में घुसकर मारने की बात लोगों पर निश्चित असर डाल चुकी है और उसका फायदा नरेंद्र मोदी  हो रहा है . भारतीय जनता पार्टी और मुकामी उम्मीदवार ज्यादातर सीटों पर चर्चा में आते ही नहीं . केवल लखनऊ , रायबरेली और अमेठी में मुकामी उम्मीदवारों के नाम पर या उनके विरोध में वोट की बात है . बाकी हर जगह नरेंद्र मोदी की सरकार को एक और अवसर देने के लिए ही वोट मांगे जा रहे  हैं और ऐसा लगता है कि मिलने भी वाले हैं . .आवारा जानवरों के कारण लगभग  तबाह हो चुकी फसल और सडकों , चौराहों पर बेरोजगार घूम  रहे , नौकरी की उम्मीद लगाए नौजवानों की भीड़ की नाराज़गी थी लेकिन उस सब को बालाकोट ने धो दिया है . अपनी मुसीबतों की परवाह किये बिना  लोग नरेंद्र मोदी को दुबारा मौक़ा देने के लिए  उद्यत हैं .
इस तस्वीर से यह भ्रम हो जाना लाजमी है कि नरेंद्र मोदी की लहर फिर वैसी ही है  जैसी २०१४ में थी लेकिन इसमें एक पेंच है . नरेंद्र मोदी के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार इन लोगों में वही लोग हैं जो परम्परागत तरीके से बीजेपी के ही वोटर हैं . वे नाराज़  हो गए थे , निराश थे क्योंकि सरकार ने २०१४ के वायदों को पूरा करने  के लिए कोई काम नहीं किया है . हर साल नौजवानों के लिए दो करोड़ नौकरियों का वायदा , किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वायदा ,विदेशों से कालाधन वापस लाने का वायदा, भ्रष्टाचार मुक्त समाज का सपना , भव्य राम मंदिर का निर्माण और आतंकवाद के खात्मे का संकल्प २०१४ के चुनाव की ख़ास बातें थीं , दिल्ली के बीजेपी नेताओं के आग्रह पर दिल्ली में रहने  वाले हम जैसे पत्रकार तो मान सकते हैं कि मोदी की सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है लेकिन लखनऊ के विद्वान पत्रकारों ने जिन इलाकों की यात्राएं कीं  उसका निचोड़ यह है कि सरकार अपने किसी भी वायदे को पूरा नहीं कर सकी है . नोटबंदी और जी एस टी   जैसे विवादित फैसले जनता ने पसंद नहीं किया था. इन लोगों का कहना था कि अगर बालाकोट न हुआ होता तो मोदी सरकार के खिलाफ ज़बरदस्त माहौल था . लेकिन बालाकोट के बाद  बीजेपी के परंपरागत वोटर फिर बीजेपी के साथ  हैं . इस सारी तस्वीर में बस एक व्यवधान  है .  समाजवादी  पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थक बालाकोट से प्रभावित नहीं दिख रहे हैं . वे उसी उत्साह से बीजेपी के खिलाफ वोट कर रहे हैं , जिस  उत्साह से बीजेपी के समर्थक नरेंद्र मोदी की सरकार को एक मौक़ा और देने की बात कर रहे  हैं.
इस तरह से बालाकोट की पूंजी लेकर चुनाव मैदान में उतरी बीजेपी के सामने उत्तर प्रदेश में ज़बरदस्त चुनौती है . बसपा और सपा के समर्थकों की संख्या खासी अधिक है . २०१४ के चुनावों को देखा जाए और वहां इनके हारे हुए उम्मीदवारों के वोटों को जोड़ दिया जाए तो  बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र मी जायेंगे जहां गठबंधन  बीजेपी से अधिक हो जाता है .वह मोदी से  उम्मीदों की लहर का चुनाव था . इस बार सभी मोदी लहर की मौजूदगी से इनकार करते हैं . बल्कि अगर ओबीसी , दलित और मुसलमानों से बात की जाए तो वे लोग तो  सरकार के खिलाफ लहर की बात करते हैं . अपने वायदों को भूल जाने का आरोप लगाते हैं और चुनावी गणित को नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा कर देते हैं .इस बार सभी क्षेत्रों में गठबंधन के उम्मीदवारों की कांटे के टक्कर की चर्चा है . जब बीजेपी का कार्यकर्ता और नेता कांटे की टक्कर की बात करने लगें तो इसका अनुवाद नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बहुत ही खुशगवार नहीं माना जाएगा .
इस  पृष्ठभूमि में शुरू हुई लखनऊ से वाराणसी यात्रा में कई पड़ाव आये .लखनऊ और रायबरेली के बीच की सड़क बहुत ही अच्छी है . दोनों हाई प्रोफाइल सीटों के बीच में पड़ने वाला सुरक्षित श्रेणी का मोहनलाल गंज संसदीय क्षेत्र आमतौर पर दिल्ली के पत्रकारों में चर्चा का विषय नहीं बनता लेकिन यह बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यहाँ दलित आबादी खासी  बड़ी है. दलितों में पासी  जाति के लोग मोहनलाल गंज में अधिक हैं . यहाँ से मौजूदा  सांसद बीजेपी के कौशल किशोर हैं . मोदी लहर में विजयी हुए थे लेकिन अब बहुत ही अलोकप्रिय हैं . उनके खिलाफ कांग्रेस के उम्मीदवार आर के चौधरी हैं . यह कभी मायावती के बहुत ही करीबी हुआ करते थे , बहुत ही पैसे कमाए हैं और आजकल कांग्रेस में हैं . लेकिन यहाँ मायावती का उम्मीदवार सी एल वर्मा  भारी पड़ रहा है . लगता है यह सीट बालाकोट के बावजूद भी  बीजेपी के लिए मुश्किल साबित होगी . उस  सीट  का क्षेत्र ख़त्म होते ही रायबरेली शूरू हो जाता है. वहां तो बीजेपी वालों का भी कहना है कि सोनिया गांधी की संभावना बहुत ही अच्छी है . असली मुकाबला अमेठी में नज़र आया हमने ज्यादा इस्तेमाल होने वाली फुरसतगंज ,जायस वाली सड़क नहीं ली. हां परसदेपुर,उदयपुर अठेहा होकर गौरीगंज पंहुचे . रायबरेली पार करते ही अमेठी क्षेत्र का पहला चौराहा , परसदेपुर पड़ता है . चौराहे पर मौर्य बिरादरी वाले भारी संख्या में थे . दावा किया गया कि वहां स्मृति इरानी मज़बूत चुनाव लड़ रही हैं . राहुल गांधी से लोगों में नाराजगी है. यह सीट गठबंधन ने छोड़ तो दिया है लेकिन अखिलेश यादव और मायवती ने  कोई अपील  नहीं किया है इसलिए उनकी पार्टी के वफादार लोग अपनी मर्जी से वोट देने का मन बना  चुके हैं .कई लोगों ने बताया कि अगर इन नेताओं की अपील हो जाए तो अब भी चुनाव राहुल गांधी के पक्ष में पलट सकता है. उस समय तक मायावती की वह अपील नहीं आयी थी जिसमें उन्होंने कहा  कि रायबरेली और अमेठी में उनके समर्थक कांग्रेस को जिताएंगें . यह सन्देश वहां बाद में पंहुंचा होगा . हम दिन भर अमेठी में रहे और साफ़ अनुमान लग रहा था कि स्मृति  इरानी के पक्ष में हवा है .इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि दलित और यादव वोटर बिलकुल अनमना बताया जा रहा  था. लेकिन शाम को जब मायावती ने सन्देश भेज दिया कि “ हमारे “ गठबंधन के लोग अमेठी और राय बरेली में कांग्रेस को जिताने के  लिए कोशिश करेंगे तो बीजेपी के कार्यकर्ताओं में मायूसी छा गयी . ज़ाहिर है स्मृति इरानी के पांच साल के काम पर मायावती की एक अपील भारी पड़ चुकी थी. अमेठी में लोगों से बातचीत के क्रम में हमारी टीम के एक सदस्य ने पूछा कि हम लोग जितने लोगों से भी बात कर रहे हैं वे ज्यादातर  कांग्रेस विरोधी ही  हैं तो अमेरिकी प्रोफ़ेसर ने कहा कि हम क्या करें ,कहाँ से कांग्रेस के समर्थक लायें . यानी चुनाव निश्चित रूप से कांग्रेस के पक्ष में नहीं था लेकिन अब सबको मालूम है कि मायावती के अपील ने खेल बदल दिया होगा  .हालांकि सरकार का पक्ष लेने वाले अखबारों ने इस खबर को गोल  कर दिया है , या कहीं कोने में छाप दिया है लेकिन सन्देश पंहुच चुका है और अब साफ़ लाग रहा  है कि अमेठी में “ कांटे “ की टक्कर हो गयी है .
सुल्तानपुर में वरुण गांधी अपनी मां मेनका  गांधी के लिए प्रचार कर रहे हैं , गठबंधन के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह उर्फ़ सोनू सिंह लोकसभा के २०१४ के चुनाव में उनके बहुत बड़े सहयोगी थे लेकिन अब उनकी मां के खिलाफ मैदान में हैं .  गठबंधन का  गणित सोनू के पक्ष में है लेकिन मेनका गांधी की सेलेब्रिटी हैसियत के कारण मुकाबला कांटे का हो गया है .  रात में सुल्तानपुर शहर के एक मोहल्ले में वरुण गांधी का भाषण सुना गया . उन्होंने हिंदुत्व की कोई बात नहीं की. पाकिस्तान का चुनावी राग अलापने के खिलाफ भी बात की . उन्होंने कहा कि हमको अपनी तुलना रूस, अमरीका और चीन से करनी चाहिए ,पाकिस्तान से नहीं . पाकिस्तान तो कचरा है ,उसके बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं . अच्छी भीड़ के बीच  वरुण गांधी का भाषण काफी प्रभावशाली  था,पिछली बार जब वे यहाँ से खुद उम्मीदवार थे तो वे नरेंद्र मोदी का नाम नहीं लेते थे लेकिन इस बार उन्होंने बा आवाज़े बुलंद  नरेंद्र मोदी का नाम लिया और उनकी सरकार के पांच साल के अच्छे काम की तारीफ़ की और अपील की कि मोदी जी के अच्छे काम को जारी रखने के लिए उनको पांच साल का मौक़ा और दिया जाना चाहिए . सुल्तानपुर में अगले दौर में १२ मई को मतदान  होगा .

Wednesday, May 1, 2019

शहीद हेमंत करकरे का अपमान करने वाली अपनी उम्मीदवार को बीजेपी क्या सज़ा देगी


शेष नारायण सिंह

मालेगांव में हुए बम विस्फोट में प्रज्ञा सिंह  ठाकुर मुख्य अभियुक्त  हैं .उस विस्फोट में बहुत सारे  निर्दोष लोगों की जान गयी थी .  एन आई ए की तरफ से दाखिल की गयी चार्जशीट के आधार पर उनके ऊपर आरोप  २०१८ में तय कर दिए गए थे .जब आरोप तय हुए तब दिल्ली में नरेंद्र मोदी की सरकार थी .प्रज्ञा ठाकुर आजकल जमानत पर जेल से  बाहर हैं . उनको बीजेपी ने भोपाल से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है .हालांकि  प्रज्ञा ठाकुर मुलजिम हैं लेकिन वे चुनाव लड़ सकती हैं. कानून इसकी अनुमति देता है. अभी चंद रोज़ पहले उन्होंने बीजेपी की  सदस्यता ली थी . तब से ही वे लगातार हिंदुत्व की अलमबरदार के रूप में आक्रामक बयान दे रही हैं . उनकी उम्मीदवारी  की राजनीति को समझने के लिए वर्तमान सरकार के बारे में जानकारी लेना ज़रूरी है. शुरू में लग रहा था कि  बीजेपी  राष्टवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी थी . लेकिन राष्ट्रवाद  के मुद्दे पर बड़े पैमाने पर लामबंदी नहीं हो सकी . सरकार में रहते हुए अपने काम पर वोट माँगा जाता है. यहाँ वह भी संभव नहीं है . आम तौर पर ऐसा माना जा रहा  है कि सरकार पिछले पांच साल  में ऐसा कोई काम नहीं कर सकी है जिसके बल पर चुनाव जीता जा सके.लेकिन ऐसा कोई काम ही नहीं है . इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी की ही मानी जायेगी . जब डॉ जोशी से पूछा गया कि आप मोदी सरकार को दस में से कितने नम्बर  देंगें  तो उन्होंने कहा कि जब कापी में कुछ लिखा ही नहीं है तो क्या नंबर दूं. इन हालात में यह बात बिलकुल साफ़ हो गयी है कि  पार्टी को चुनाव जीतने के लिए नए मुद्दे चाहिए थे .  मुद्दों की तलाश में बीजेपी चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व को मुद्दा बनाने की रणनीति पर  काम कर रही है . इसी  कोशिश में भोपाल से कांग्रेस के उम्मीदवार और " संघी आतंकवाद " के प्रबल विरोधी दिग्विजय सिंह के खिलाफ प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी का उम्मीदवार बनाया  गया है . प्रज्ञा ठाकुर अभी जमानत पर हैं उनके ऊपर आतंकवाद विरोधी कानून मकोका  के तहत मुक़दमा चल  रहा है . वे मध्यप्रदेश के बीजेपी नेता सुनील जोशी की हत्या के केस में भी अभियुक्त थीं . २०१४ में सरकार आने के बाद कुछ मामलों में उनके केस बंद कर दिए गए थे लेकिन अभी मालेगांव धमाके में वे अभियुक्त हैं ..
प्रज्ञा ठाकुर ने बीजेपी की सदस्यता लेने के  साथ ही आक्राकता दिखाना शुरू कर दिया . उन्होंने अपने ऊपर हुए अत्याचार के लिए भोपाल से कांग्रेस के प्रत्याशी , दिग्विजय सिंह की सोच को   परोक्ष रूप से ज़िम्मेदार बताने लगीं .  बहुत बढ़ बढ़ कर बोलने लगीं और उसी रौ में उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते के तात्कालीन प्रमुख , शहीद हेमंत करकरे के बारे में बहुत ही आपत्तिजनक और अपमानजनक बातें बोल गईं. उन्होंने उनको कुटिल कहा , पापी कहा और देशद्रोही तक कह  डाला . उन्होंने यह भी कहा कि शहीद करकरे की मृत्यु इसलिए हुयी कि इन मोहतरमा ने उनको बद्दुआ  दे दी थी.  यह कहना था कि पूरा देश उनके खिलाफ टूट पड़ा .  जो बहादुर पुलिस अफसर मुंबई को आतंकवादी हमले से बचाने के लिए शहीद हुआ था , जिसने पाकिस्तान से आये आतंकवादियों को सामने से  चुनौती दी थी , जिसके सीने पर अंधेरे में छुपे हुए आतंकवादियों ने गोली मारी थी , उसका आपमान सहन करने के लिए देश तैयार नहीं था. कुछ वक़्त के लिए तो ऐसा लगा कि सोशल मीडिया पर पूरा देश उतर आया है और शहीद करकरे को अपमानित करने वाली बीजेपी उम्मीदवार ,प्रज्ञा ठाकुर की निंदा  कर रहा है. कांग्रेस ने भी मौक़ा देख , मोर्चा संभाल लिया और शहीद का अपमान करने वाली पार्टी के रूप में बीजेपी को पेश करने में कोई समय नहीं गंवाया .
बीजेपी को भी लगा कि गलती हो गयी लेकिन लेकिन प्रज्ञा ठाकुर अपने को पीड़ित बताकर सहानुभूति लेने के चक्कर में डटी रहीं . जब  बीजेपी ने  शहीद हेमंत करकरे के बारे में दिए गए उनके बयान को उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड लिया तब भी वे अपनी राग अलापती रहीं . लेकिन कुछ टीवी चैनलों और अखबारों ने प्रज्ञा ठाकुर के असंतुलित बयान को जिस तरह से हाईलाईट किया उससे बीजेपी को लग  गया कि  बात  बिगड़ गयी हैं . उनको भोपाल से  उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस को तथाकथित " हिन्दू आतंकवाद " के घेरे में लेने की कोशिश उल्टी पड़ चुकी थी. जो  बीजेपी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और भारतीय पुलिस और सेना के वीरों की शहादत को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है उसकी एक महत्वपूर्ण प्रत्याशी पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा लेने वाले सबसे बहादुर योद्धा को अपमानित कर रही थी . ज़ाहिर है कि बीजेपी जिस मोहरे को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी , वही उसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका  है . पार्टी के नेताओं की समझ में साफ़ तौर पर आया गया कि प्रज्ञा ठाकुर की बदजुबानी को सही  ठहराने की कोशिश में उनका  भारी नुक्सान होने वाला है . शायद इसीलिये प्रज्ञा  ठाकुर को पार्टी की तरफ से फटकारा गया और उन्होंने शहीद करकरे की शान में की गयी बदतमीजी के लिए माफी मांग ली. लेकिन माफी भी ऐसी माँगी जिससे पार्टी को नुक्सान होने का ख़तरा बना हुआ है . माफी की भाषा ऐसी है जिसको पढने पर लग जाता  है कि वे माफी तो मांग रही हैं लेकिन अभी भी वे शहीद हेमंत करकरे को गुनहगार साबित करने से बाज़ नहीं आ रही हैं . उन्होंने लिखकर माफी नहीं माँगी है . संवाददाताओं से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि, " 'जो मैंने कहा था वह मेरी व्यक्तिगत पीड़ा थीजो मैंने सुनाई थी। मेरे बयान से किसी को ठेस पहुंची है तो मैं अपना बयान वापस लेती हूंऔर माफी मांगती हूं'देश के दुश्मन इससे खुश हो रहे हैंइसलिए मैं अपने बयान को वापस ले रही हूं और माफी भी मांगती हूं।." बताते हैं इसके बाद बीजेपी के बड़े नताओं ने उन्हें डांटा और शहीद हेमंत करकरे की तारीफ़ करने का निर्देश दिया . उसके बाद उन्होंने कहा कि, " हेमंत करकरे आतंकवादियों की गोली से शहीद हुए थे. जो बात मैंने उनके बारे में कही , वह नहीं कहना चाहिए  था . मैं खेद प्रकट करती हूँ " लेकिन लगता है कि बात अभी बनी नहीं है . महाराष्ट्र के कुछ संगठनों ने मांग की है कि प्रज्ञा ठाकुर और बीजेपी ने शहीद करकरे के बच्चों को जो पीड़ा पंहुचाई है उसके लिए भी माफी मांगें .

 अब लगता है कि प्रज्ञा ठाकुर बीजेपी के चुनाव अभियान में दिग्विजय सिंह और  उनकी पार्टी पर कालिख पोतने के लिए काम नहीं आने वाली हैं .भोपाल में तीन  हफ्ते बाद चुनाव होना है . तब तक उनकी लानत मलानत का सिलसिला चलता रहेगा और  उनकी पार्टी उस पर सफाई देने के लिए मजबूर होती रहेगी .तब तक चुनाव हो जाएगा . अब तो साफ़ लगने लगा है कि वे  दिग्विजय सिंह को भी चुनौती नहीं दे पाएंगीं क्योंकि वे जहाँ भी जायेंगी उनसे शहीद हेमंत करकरे के बारे में सवाल तो पूछे जायेगे वरना योजना यह थी कि दिग्विजय सिंह पर यह आरोप चस्पा किया जाए कि वे सभी हिन्दुओं को आतंकवादी मानते हैं . और उसी आड़ में बीजेपी का चुनाव  प्रचार केन्द्रित किया जाए . अब इस बात पर भी सवाल उठना शुरू हो गए हैं . क्योंकि दिग्विजय सिंह को हिन्दू विरोधी साबित करने की कोशिश तो उसी दिन दफ़न हो गयी थी जब उन्होंने हिन्दू धर्म की सबसे कठिन तीर्थयात्रा , नर्मदा परिक्रमा को विधि विधान से पूरी की थी .   टीवी की बहसों में जो विश्लेषक  एंकरों द्वारा की जा रही दिग्विजय सिंह की निंदा के बीच चुप बैठे रहते थे वे अब कहने लगे हैं कि दिग्विजय सिंह ने कभी भी हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग  नहीं किया है . वे हमेशा " संघी आतंकवाद " शब्द का प्रयोग करते हैं . मीडिया के सहयोग से आर एस एस और बीजेपी के नेता उनको हिन्दू विरोधी साबित करने के लिए दिन रात लगे रहते हैं .प्रज्ञा ठाकुर को उनके खिलाफ उम्मीदवार बनाकर इसी बात को रेखांकित किया जाना था .प्रज्ञा ठाकुर उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा थीं लेकिन अब शहीद को अपमानित करके वे बीजेपी के राष्टवाद वाले प्रोजेक्ट को भी नुक्सान पंहुचा रही हैं . अब साफ़ नज़र आने लगा  है कि उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है . बीजेपी की  उम्मीदवार के रूप में तो शायद वे बनी रहें लेकिन दिग्विजय सिंह और कांग्रेस को हिन्दू विरोधी साबित करने में अब उनकी उपयोगिता ख़त्म हो चुकी है . हो सकता है कि अभी चुनाव के पांच चरण बाकी हैं , बीजेपी कोई और  तरीका लेकर आये क्योंकि शुरू के  दो चरणों की सूचना के मुताबिक़ पार्टी को उत्तर प्रदेश और बिहार में  बीजेपी को बड़ा नुक्सान हो चुका है.

Saturday, April 13, 2019

जलियांवाला बाग़



शेष नारायण सिंह

जलियांवाला बाग़ का नाम हर उस चर्चा में लिया जायेगा जहां  सरकारी मनमानी के खिलाफ जनता के प्रतिरोध का ज़िक्र होगा. आज से  ठीक सौ साल पहले बैशाखी के दिन अमृतसर में  स्वर्ण मंदिर के क्षेत्र में स्थिति  इस बाग़ में पंजाब के हिन्दू, मुसलमान ,सिख और ईसाई इकठ्ठा हुए थे और ब्रिटिश सरकार के  तथाकथित  " अराजकता और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम १९१९ " का विरोध कर रहे थे. इस अधिनियम को आम बोलचाल की भाषा में रौलेट एक्ट या काला क़ानून कहा  जाता था . इस कानून के  लेखक एक अंग्रेज़ जज , सिडनी आर्थर रौलेट थे , उन्हीं के नाम पर इसको रौलेट एक्ट नाम दिया गया . यह कानून फरवरी में दिल्ली की काउन्सिल में पेश हुआ और भारी विरोध के बावजूद पास करवा लिया  गया . भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी की आमद तब तक हो चुकी थी और उन्होने अहिंसक तरीके से इसके विरोध  का आवाहन किया . ६ अप्रैल को दिल्ली में  इसके विरोध में सफल हड़ताल रही , कहीं कोई काम पर नहीं निकला, बंबई में महात्मा जी खुद भी विरोध में शामिल हए . पूरे देश में इस काले क़ानून का विरोध हुआ . लेकिन  विरोध का आन्दोलन अहिंसक नहीं रह सका ,  पंजाब में हिंसा शुरू हो  गयी तो महात्मा गांधी ने आन्दोलन वापस लेने की घोषणा की . पंजाब में सरकार ने फौज बुला लिया था .  अंग्रेजों ने नेताओं की धरपकड शुरू कर दिया था  . इसी काले क़ानून के तहत   पंजाब के स्वतंत्रता संगाम सेनानी और कांग्रेस के बड़े नेता, डॉ सत्यपाल और डॉ सैफुद्दीन किचलू को १० अप्रैल १९१९ को गिरफ्तार कर लिया गया था . पंजाब के इन लोकप्रिय नेताओं की गिरफ्तारी से पूरे पंजाब में गमो-गुस्से का  माहौल था .  १३ अप्रैल को बैशाखी के पर्व के अवसर पर अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में आम लोग इकठ्ठा हुए . यह बड़ा सा बाग़ था लेकिन आम तौर पर खाली पड़ा रहता था .  तत्कालीन पंजाब सरकार ने हालात पर काबू रखने के लिए ब्रिटिश इन्डियन आर्मी के एक  कर्नल, रेजिनाल्ड   डायर की ड्यूटी लगाई लेकिन उस अपराधी ने वहां मौजूद लोगों पर गोलियां चलवा दीं . हज़ारों की संख्या में लोगों की मृत्यु हो गयी . उस   संगत में बच्चे भी थे  , औरतें भी थीं और बुज़ुर्ग भी थे. बाग़ से निकलने का एक ही दरवाज़ा था , उसी दरवाज़े पर फौज खड़ी थी और लगातार बंदूकें चल रही थीं.  गोलियों से बचने के लिए बहुत सारे लोग बाग़ में बने हुए एक कुएं में कूद गए थे .

 रौलेट एक्ट  इसलिए लाया गया था कि प्रेस को कंट्रोल किया जा सके, किसी को भी बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सके , बिना कोई मुक़दमा चलाये अनंत काल तक जेलों में बंद रखा  जा सके और बिना  किसी वकील और दलील के मनमाने तरीके से मुक़दमा चलाया  जा सके . जलियांवाला बाग़ के नरसंहार के बाद इस एक्ट का पूरे देश में  ज़बरदस्त विरोध  शुरू हो गया . कांग्रेस कमेटी ने  जलियांवाला बाग़ के नरसंहार के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए एक समिति बनाई . मोतीलाल  नेहरू उसके अध्यक्ष थे और मोहनदास करमचंद गांधी उस समिति के सचिव थे. समिति के सचिव के रूप में महात्मा गांधी ने रिपोर्ट लिखी  . उसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया .  अंग्रेज़ी सीखने वालों को पहले के ज़माने में शिक्षक यह बात ज़रूर बताते थे कि अच्छी अंग्रेज़ी लिखने के लिए कांग्रेस की जलियांवाला बाग़ की रिपोर्ट ज़रूर पढ़ लो. अंग्रेज़ी गद्य के लेखकों में महात्मा गांधी का नाम बहुत ही  सम्मन से लिया जाता है और यह रिपोर्ट गांधी जी के गद्य लेखन का प्रतिनिधि नमूना है . उनकी रिपोर्ट के बाद अंग्रेजों ने एक कमेटी बनाई जिसका नाम , " रिप्रेसिव लॉज़ कमेटी " था. मार्च  १९२२ में इस कमेटी की रिपोर्ट को  भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया और रौलेट एक्ट वापस ले लिया  गया .
लेकिन रौलेट एक्ट की आत्मा जिंदा रही . ५३ साल बाद जून १९७५  में जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो उसमें भी वही प्रावधान थे जो रौलट एक्ट में थे . तीन साल तक रौलेट एक्ट जिंदा रहा था और  दो साल के अंदर ही रौलेट एक्ट की स्थाई भावना को ध्यान में रखकर लगाई गयी इमरजेंसी को दफन कर दिया गया था . इसके साथ ही  एक बार फिर साबित  हो गया था कि आतताई  चाहे जितना ताक़तवर हो ,जनता के खाली हाथ से किये गए विरोध के सामने उसको झुकना ही पड़ता है .
रौलेट एक्ट का विरोध और जलियांवालाबाग़ के नरसंहार की कोई बात तब तक पूरी नहीं मानी जायेगी जब तक उस नरसंहार को अंजाम देने वाले नरपिशाच , कर्नल रेजिनाल्ड  डायर की बात न कर ली जाए . इसी  राक्षस ने निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलवाई थीं .  वह गोरखा राइफल्स, सिख रेजिमेंट और सिंध रेजिमेंट से चुनकर पचास सिपाही लेकर आया था . इन लोगों के पास  ' ली इनफील्ड की थ्री नॉट थ्री ' राइफलें थीं जिससे निहत्थे लोगों पर निशाना लगाकर मारा गया था . सरकारी तौर पर तो बताया गया था कि चार सौ से कम लोग मरे थे लेकिन महात्मा गांधी की रिपोर्ट और अमृतसर के सिविल सर्जन के अनुसार करीब  १५ सौ लोगों को गोलियां मारी गयी थीं.  कुएं में कूदकर मरने वालों की कोई गिनती नहीं की गयी . बाद में कर्नल डायर ( अप्रैल १९१९  में उसके पास अस्थाई तौर पर  ब्रिगेडियर का चार्ज  था  ) लेकिन रिटायर वह कर्नल ही हुआ . वह अविभाजित पंजाब के हिल स्टेशन मरी में पैदा हुआ था और लारेंस स्कूल और शिमला के बिशप काटन स्कूल का छात्र भी रहा था. उसके पिताजी की बियर की ब्रुअरी थी . डायर-मीकिन ब्रुअरी शिमला के पास सोलन में अभी भी है लेकिन अब उसका नाम मोहन मीकिन ब्रुअरी हो गया  है .एक शिक्षित पृष्ठभूमि से आने वाला यह फौजी बहुत ही  बड़ा अत्याचारी थी. जब जलियांवाला बैग में नरसंहार हुआ तो विरोध में सारे शहर की दुकाने बंद हो गयीं . उसके बाद कर्नल डायर ने एक धमकी भरा पर्चा बंटवाया जिसमें लिखा  था कि ,'  मेरा हुकुम मानना ज़रूरी है . सब लोग मेरा हुकुम मानें और अपनी अपनी दुकाने खोलें वरना दुकानें राइफलों के जोर से खोल ली जायेंगी. अगर कोई दूकान बंद करने को कहे  तो उस बदमाश के बारे में मुझे बताओ . मैं  उसको शूट कर दूंगा "
 डायर के काम की  भारत में तो निंदा हुयी ही ब्रिटेन में भी उसका विरोध हुआ .  वह १९२० में रिटायर हो गया लेकिन उसके आतंक के बाद  सारे भारतवासी एक हो गए और महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में जुट गए . इस तरह से  जलियांवाला बाग़ में जो लोग शहीद हुए उन्होंने ही भारत की आजादी के लिए शुरू हुए आन्दोलन को प्रेरणा दी और भावी आतताई शासकों को सन्देश भी दे दिया .

Thursday, April 11, 2019

कश्मीर से आतंक का सफाया करने के लिए नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाना होगा



शेष नारायण सिंह


कश्मीर के बारे में वहां के कुछ नेताओं के अजीबोगरीब बयानों के बाद कश्मीर फिर चर्चा में हैं .. देश की हर समस्या के लिए जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराने वालों के सामने भी दुविधा  है . जब जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के सामने कश्मीर समस्या आई थी तो देश की आर्थिक और सैनिक  तैयारी बिलकुल नहीं थी. इंग्लैण्ड और अमरीका  भारत का विरोध कर रहे थे .अंग्रेजों से वफादारी  के इनाम के रूप में मुहम्मद अली जिन्नाह को पाकिस्तान की  बख्शीश मिल चुकी थी , जिन्ना किसी भी कीमत पर जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करने के चक्कर में थे और जम्मू-कशमीर के तत्कालीन राजा पाकिस्तान के साथ जाने के बारे में विचार कर रहे थे . लेकिन सरदार पटेल ने न केवल जम्मू-कश्मीर का भारत में बिना  शर्त विलय करवाया ,बल्कि अमरीका और इंग्लैण्ड की मर्जी के खिलाफ पाकिस्तान को भी उसकी औकात दिखा दी .  आज  भारत दुनिया में एक बड़ी अर्थशक्ति ,सैन्य शक्ति, परमाणु शक्ति और अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है .अमरीका और ब्रिटेन से भारत की दोस्ती है लेकिन फिर भी कश्मीर में एक बड़ी समस्या पैदा हो गयी  है. अलगाववादी नेताओं की जमात ,हुर्रियत कान्फरेन्स के लोग तो पाकिस्तान का जयकारा लगाते ही रहते थे ,अब भारत के साथ रहने की बात करने वाले नेता भी भारत से अलग होने की धमकी देने लगे  हैं . जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों. महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के ताज़ा बयान बहुत ही निराशाजनक हैं .  यह तीनों ही नेता बीजेपी के साथ कई अवसरों पर सरकार में  शामिल रह चुके  हैं . संविधान के अनुच्छेद 35 ए के मामले ने इतना  तूल पकड लिया है कि जम्मू-कश्मीर के होशमंद नेता भी अलग होने की बात करने लगे  हैं. इसके लिए काफी हद तक मौजूदा सत्ताधारी पार्टी और उसके नेता ज़िम्मेदार हैं. बीजेपी के नेता  चुनावों के समय कश्मीर को मुद्दा बनाते हैं, उसके कारण उनको पाकिस्तान और मुसलमान को निशाने पर लेने में आसानी होती है . बाद में उसका ज़िक्र उतनी शिद्दत से नहीं करते .लगता  है कि इस बार भी कोशिश  वही थी लेकिन मामला बहुत आगे बढ़ गया . जम्मू-कश्मीर के वे नेता भी भारत विरोधी बयान देने लगे जो कल तक राज्य में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे थे . देश की हर समस्या के लिये जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार बताने वाले नेताओं को अब यह समझ लेने की ज़रूरत है कि कश्मीर में अगर   हालात सामान्य करना  है तो नेहरू की किताब के पन्ने  ही पढ़ने पड़ेंगें . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी  जब भी विपक्ष में रही है कश्मीर में संविधान के आर्टिकिल ३७० का  विरोध करती रही है लेकिन जब भी सत्ता में आई  है अलग बात करती  है . इस  बार मामला थोड़ा अटक गया है . बीजेपी केंद्र में सत्ता में है और राज्य में भी राष्ट्रपति शासन के  रास्ते उसी की सत्ता है . चुनाव के चक्कर में कश्मीर के नाजुक मसलों को उठा दिया और अब कश्मीर की राजनीति एक बहुत ही संवेदनशील मुकाम पर पंहुच गयी  है . कश्मीर को भारत का अखंड हिस्सा मानने वाले कश्मीरी नेता भी अब अपना प्रधानमंत्री बनाने और  आज़ादी की बात करने लगे हैं .हालत इतनी चिंताजनक है कि फ़ौरन से पेशतर केंद्र सरकार को ज़रूरी क़दम उठाने पड़ेंगे. कहीं ऐसा न हो कि हर भाषण में कश्मीर की बात करके और प्रेस कान्फरेन्स करके ध्रुवीकरण तो हो जाये लेकिन कश्मीर की हालात बद से बदतर हो जाएँ .


इन हालात में ज़रूरी यह  है कि कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए जवाहरलाल नेहरू की राह को अपनाया जाय जिन्होंने २७ मई १९६४ को अपने मृत्यु के दिन भी कश्मीर  समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास किया था . हालांकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला को १९५३ में गिरफ्तार कर लिया था लेकिन उनको मामूल था कि कश्मीर की समस्या के हल के लिए कश्मीर के सबसे बड़े नेता को शामिल करना ज़रूरी होगा . इसी सोच के तहत उन्होंने  शेख अब्दुल्ला को रिहा किया और पाकिस्तान जाकर समाधान की संभावना तलाशने का काम सौंपा था.  शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर गए और वहां लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू किया . २७ मई १९६४ के ,दिन जब मुमुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थेजवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आ गयी . सब किया धरा बर्बाद हो गया ,.उसके बाद कश्मीर के हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .
सवाल यह है कि  कश्मीर का मसला  इस मुकाम तक कैसे पंहुचा . जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया थाऔर भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी , आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले ३० साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओंमहात्मा गाँधी , जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था.इसको समझने के लिए थोड़े पीछे के इतिहास में जाना पडेगा  .भारत-पाक विभाजन के वक़्त ,जम्मू-कश्मीर के महाराजा ,हरि सिंह ने पाकिस्तान के सामने  स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की  जाए ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने नेहरू की बात को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया . पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडेपेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे .कबायली हमला हुआ और राजा अपनी मनमानी पर अड़ा रहा . राजा की गलतियों के कारण ही कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता और वे भारत के साथ थे . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं. राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता थाने हालात को बहुत बिगाड़ा . उसके बाद इंदिरा गांधी के दौर में भी बात बिगाड़ी गयी. १९८० में जब वे दोबारा  सत्ता में आईं तो अपने परिवार के ही  अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, . अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो . उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया . हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया .और अरुण नेहरू नाराज़ हो गए . अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया . इतना ही नहीं . कांग्रेस ने घोषित मुस्लिम दुश्मन , जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया . उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए. उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे. उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया . बची खुची बात उस वक़्त बिगड़ गयी . जब १९९० में तत्कालीन गृह मंत्रीमुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब  कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ . और आज हालात जहां तक पंहुच गए हैं किसी के समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी.
ज़रूरत इस बात की है कि नेहरू जैसी बड़ी सोच अपनाई जाय और  कश्मीर से आतंक को खतम करने की कोशिश गंभीरता से की जाए.

क्या वैकल्पिक मीडिया के कारण २०१९ का चुनाव असली मुद्दों पर हो पायेगा ?



शेष नारायण सिंह

लोकसभा २०१९ का चुनाव आभियान शुरू हो गया है . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब बाकायदा प्रचार में शामिल हो गए हैं . पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले दौर के मतदान वाले क्षेत्रों में वे सघन प्रचार कर रहे हैं . पश्चिमी उत्तर प्रदेश में २०१४ के चुनाव में नरेंद्र मोदी को जो ज़बरदस्त बढ़त मिली थी ,वह आगे के हर दौर में और घनीभूत होती  गयी थी . २०१४ का चुनाव मुज़फ्फरनगर के २०१३ के दंगों के तुरंत बाद हो रहा  था. इलाके के असामाजिक तत्वों   ने तरह तरह के वीडियो आदि जारी करके माहौल  बहुत ही ज़हरीला बना दिया था . चुनाव में मुसलमानों के खिलाफ इलाके के  हिन्दुओं को एकजुट कर दिया गया था . नतीजा दुनिया के सामने  है . मुज़फ्फर नगर के दंगों में मुसलमान गुंडे और हिन्दू गुंडे एक दूसरे से  लड़ रहे थे .  राजनीतिक नेताओं ने माहौल को बहुत ही गरम कर दिया था . मुसलमान  भी हर घटना पर  प्रतिक्रिया दे रहे थे . जिसको मीडिया अपने मसाले के साथ पेश कर रहा था .नतीजा यह हुआ कि चुनाव के समय किसी को कुछ करना ही नहीं पड़ा . बहुसंख्यक लोग हिन्दू पार्टी को जिताने के लिए तैयार थे  . बीजेपी की पहचान पिछले  तीस   साल में एक हिन्दू पार्टी की हो चुकी है लिहाज़ा जब चुनाव आया तो जनता ने अपना फैसला दे दिया .उम्मीदवार कोई  हो हिन्दू जनता का वोट कमल पर लगा गया . उस वक़्त की सरकार की नाकामियों को  बीजेपी के नेता और   प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार , नरेंद्र मोदी  ने बहुत ही करीने से हाईलाईट किया . उन्होंने गुजरात माडल के विकास और दो करोड़ नौकरियाँ प्रति वर्ष देने का वायदा करके चुनाव को बहुत ही ऊंची पिच पर ले जाकर खड़ा कर दिया .डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के भ्रष्टाचार को, उनके ऊपर रिमोट कंट्रोल की मौजूदगी और बेरोजगारी को मुद्दा  बनाया और वायदा किया कि बेरोजगारी  भी खतम कर देंगे, भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद कर देंगें और देश की आर्थिक प्रगति को ज़रूरी रफ़्तार देंगे. जनता ने विश्वास किया और बम्पर  बहुमत नरेंद्र मोदी को थमा दिया . लेकिन इस बार बात अलग  है . नरेंद्र मोदी को वायदा नहीं करना है . वह काम तो वे पांच साल पहले कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि पांच साल बाद जब दोबारा जनादेश लेने आऊंगा तो अपने काम का हिसाब दूंगा .इस  हिसाब से अब लेखाजोखा देने का समय आया है लेकिन अब हालात बदल गए हैं . जनता सवाल तो पूछ रही है लेकिन मीडिया में उनपर चर्चा नहीं हो रही है.

पांच साल पहले  किये गए वायदों पर तो अब कोई बात ही नहीं हो रही है . नए मुद्दे बनाने की कोशिश  सत्ताधारी पार्टी बड़े पैमाने पर कर रही है . पाकिस्तान को दुश्मन नंबर एक बनाकर चुनावी बिसात बिछाई जा रही है . इस्लाम और पाकिस्तान को केंद्र में रखकर चुनाव  संचालित करने की कोशिश चल रही है . पुलवामा में सी आर पी एफ के सैनिको पर आतंकवादी हमला और बालाकोट   में  भारतीय वायुसेना की बमबारी ने देश में पाकिस्तान विरोध के नाम पर बीजेपी के पक्ष में ज़बरदस्त माहौल बनाया  था लेकिन विपक्ष ने उस पर भी शंका के बादल घेर दिया  . नतीजा यह हुआ कि मार्च के पहले हफ्ते में जो माहौल बना था अब वह   नहीं है .  जहां तक पांच साल में किए गए काम की बात है , उसमें मौजूदा सरकार के बहुत ही बड़े कामों में नोटबंदी और जी एस टी हैं लेकिन बीजेपी के नेता उसका ज़िक्र ही  नहीं कर रहे हैं . ज़ाहिर है यह मुद्दे बीजेपी को नुक्सान पंहुचाने की ताक़त रखते हैं. दो करोड़ नौकरियाँ और किसानों की आमदनी दुगुनी  करने वाले वायदों को  भी भुलाने की कोशिश की जा रही है  . अंतरिक्ष में मिसाइल दागे जाने को भी राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की कोशिश चल रही है . अगले दो चार दिन में इसका भी असर स्पष्ट होने लगेगा . सौ बात की एक बात यह कि बीजेपी के पास २०१४ जैसे ज़बरदस्त असर वाले मुद्दे नहीं हैं . सरकार में होने की वजह से हमला करने का विकल्प भी  जा चुका  है . अब तो अपने काम का हिसाब देना है .  बीजेपी के नेता गिनाते तो बहुत सारे काम हैं लेकिन मीडिया के साथ साथ उनकी विश्वसनीयता पर भी  संकट है .
मुद्दों की कमी के संकट के वक़्त बीजेपी की चुनावी मशीनरी १९८९ से ही हिन्दू मुस्लिम झगड़ों को इस्तेमाल करती रही है लेकिन उसके लिए ज़रूरी है कि मुसलमानों के नेता भी बढ़ चढ़कर आक्रामक बयान दें .उन बयानों के जवाब में आक्रामक भाषा बहुत काम आती है .. लेकिन इस बार वैसा माहौल नहीं है. सबसे ताज़ा वाकये का ज़िक्र करके बात को समझा जा सकता है .दिल्ली के पास के हरियाणा के  गुडगाँव जिले के एक गाँव में कुछ गुंडों ने  एक मुस्लिम परिवार के घर में  घुसकर लाठी डंडों से परिवार के लोगों को बेरहमी से मारा और उनको घायल कर दिया . उनका घर लूटा बच्चों को मारा . इस गुंडागर्दी का शिकार एक चार साल का एक बच्चा भी हुआएक दुधमुंही बच्ची को भी उठाकर फेंक दिया गया .आस पड़ोस का कोई भी आदमी उनको बचाने नहीं आया . अभी तीस साल पहले तक अगर कहीं कोई गुंडा गाँव में किसी को मारता पीटता था तो  पूरा गाँव साथ खड़ा हो जाता था. जहां यह वारदात हुई है वहां बहुत सारी  कालोनियां  हैं जिनमें दिल्ली के लोग रहते हैं और बहुत सारे ऐसे लोग भी रहते हैं   जो रोज़ दिल्ली काम करने के लिए जाते हैं . जिस मुहम्मद साजिद को गुंडों ने मारा  पीटा वह  किसी गेटेड सोसाइटी में नहीं एक गाँव में रहता है . रोज़गार की तलाश में करीब पन्द्रह साल पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से वह यहाँ आया था . किसी मामूली विवाद पर पड़ोस के गाँव के दो लड़कों ने उनके भतीजे को झापड़ मार दिया और जब उसने विरोध किया तो दस मिनट बात कुछ गुंडे  हथियारों के साथ आये और घर में घुसकर साजिद को मारा पीटा बच्चों को मारा औरतों को मारा और घर में तोड़फोड़ किया . इस  सारे अपराध को करने के बाद वे लोग आराम से चले गए . घर के छत पर छुपे परिवार के लोगों ने अपने फोन के कैमरे से अपराध  का वीडियो बना लिया. वारदात के बाद कहीं कोई कार्रवाई नहीं की गयी पुलिस ने कोई  एक्शन नहीं लिया . लेकिन जब हिंसा का वह वीडियो वायरल हो गया पूरे देश में चर्चा शुरू हो गयी ,राहुल गांधीअखिलेश यादव आदि नेताओं ने तो इस  शर्मनाक घटना पर बयान दिया लेकिन किसी मुसलमान नेता ने कोई भी आक्रामक  बयान  नहीं दिया .नतीजा यह हुआ कि बात आगे नहीं बढ़ सकी .   इस वारदात के बाद कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ. राजनीति चमकाने के लिए दंगों का आविष्कार  तब शुरू हुआ जब १९२० के असहयोग आन्दोलन के दौरान महात्मा  गांधी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक हैं . अंग्रेजों के खिलाफ पूरा देश एकजुट खड़ा हो गया तब अँगरेज़ ने दंगों की योजना पर काम शुरू किया . उसके बाद से ही दंगे राजनीतिक ध्रुवीकरण के हथियार के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं .चुनावों में इनका इस्तेमाल भी कोई नया नहीं है . लेकिन इस बार लगता है कि मुसलमान नेताओं ने तय कर लिया है कि चाहे जितनी उत्तेजना फैलाई जाए लेकिन वे चुप रहेंगे . अगर साम्प्रदायिक तनाव न  फैला तो दंगे होना असंभव होगा .
ऐसी हालात में लगता है  कि लोकसभा चुनाव २०१९ असली मुद्दों पर ही लड़ा जाएगा . जनता की तरफ से भी सवाल पूछे जा रहे हैं . कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को महत्वपूर्ण राजनीतिक ज़िम्मेदारी दे दी है . प्रियंका गांधी को मीडिया भी कवर कर रहा है और वे असली सवालों को बार बार पूछ रही हैं.कांग्रेस के बडबोले प्रवक्ताओं और लुटियन की दिल्ली में  रहकर का पिछले तीस-चालीस साल से कांग्रेसी  राजनीति का मालपुआ  काट रहे नेताओं से बिलकुल अलग हटकर उन्होने दो करोड़ नौकरियों , किसानों की मुसीबतों , अर्थव्यवस्था की बदहाली को राजनीतिक विमर्श में  लाने में आंशिक ही सही ,सफलता पायी  है . विपक्ष के कुछ और नेताओं से बात करने से अनुमान लगना शुरू हो गया है कि वे अब बीजेपी और  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से तय किए गए एजेंडे पर बहस नहीं करेंगे. वे नरेंद्र मोदी से  उन्हीं मुद्दों को  फोकस में रहने के लिए कह रहे हैं जो २०१४ में बीजेपी के चुनाव अभियान के केंद्र में थे .अभी पिछले हफ्ते जिस तरह से पुलवामा और बालाकोट के मुद्दे को चुनावी बहस से बाहर लाने का काम राम गोपाल यादव, सैम पित्रोदा और ममता बनर्जी ने किया है,उससे जानकारों को यह उम्मीद हो गयी है कि देशहित के असली मुद्दों पर चुनाव फिर लौट सकता है .हालांकि बीजेपी के नेता तो यही कोशिश करते रहेंगे कि चुनाव , देशप्रेम , भारतमाता, पाकिस्तान और हिंदुत्व के इर्दगिर्द ही केन्द्रित रखा जाए लेकिन संचार क्रान्ति के कारण अब सूचना पर प्रीमियम नहीं है . वह  आसानी से आमजन के लिए भी उपलब्ध है .  एक बात और हुयी है . टेलिविज़न और अखबारों में  बहुत सारे ऐसे लोग काम करने आ गए हैं जिनकी प्रतिबद्धता किसी न किसी विचारधारा से रहती है. नतीजतन मीडिया की विश्वनीयता बहुत ही कम हो गयी है . टेलिविज़न और अखबार चलाने में बहुत ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत होती है जिसके चलते  खबरों के रुझान मालिकों के हित को ध्यान में रखकर किया जाता है .विश्वास के इस संकट के वक़्त  खबरों के लिए लोग सीधे इंटरनेट पर भरोसा कर रहे हैं . यह बात शहरी  इलाकों में तो है ही ,गाँवों में  भी इंटरनेट की सघनता है . नतीजा सामने है . सरकार और मीडिया घरानों की कोशिश के बावजूद भी सचाई आसानी से पब्लिक डोमेन में है. जिसके चलते लोकसभा २०१९ का चुनाव असली मुद्दों पर तय होने की सम्भावना बढ़ गयी है.

अगर अवाम की हिफाज़त नहीं कर सके तो हुकूमत करना मुश्किल हो जाएगा


शेष नारायण सिंह

गुडगाँव जिले के एक गाँव में कुछ गुंडों ने  एक मुस्लिम परिवार के घर में  घुसकर लाठी डंडों से परिवार के लोगों को बेरहमी से मारा और उनको घायल कर दिया . उनका घर लूटा , बच्चों को मारा . इस गुंडागर्दी का शिकार एक चार साल का एक बच्चा भी हुआ, एक दुधमुंही बच्ची को भी उठाकर फेंक दिया गया .आस पड़ोस का कोई भी आदमी उनको बचाने नहीं आया . अभी तीस साल पहले तक अगर कहीं कोई गुंडा गाँव में किसी को मारता पीटता था तो  पूरा गाँव साथ खड़ा हो जाता था.  शहरों में अलग बात थी . लेकिन गाँव में हिन्दू-मुसलमान के बीच आज जैसी नफरत नहीं थी.  बाबरी मस्जिद के खिलाफ अभियान चलाने वाली राजनीति ने हिन्दू और मुसलमान के बीच इतनी गहरी खाईं बना दी है कि अब कोई नहीं आता . हरियाणा का गुडगाँव जिला दिल्ली से सटा हुआ है . जहां यह वारदात हुई है वहां बहुत सारी  कालोनियां  हैं , जिनमें दिल्ली के लोग रहते हैं और बहुत सारे ऐसे लोग भी रहते हैं   जो रोज़ दिल्ली काम करने के लिए जाते हैं . जिस मुहम्मद साजिद को गुंडों ने मारा  पीटा वह  किसी गेटेड सोसाइटी में नहीं , एक गाँव में रहता है . रोज़गार की तलाश में करीब पन्द्रह साल पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से वह यहाँ आया था .पुराने फर्नीचर की मरम्मत और गैस के चूल्हों की मरम्मत का काम करता था. अभी तीन साल पहले उसने यहाँ अपना  घर बना लिया था. सारा परिवार मेहनत करता था और अपनी छत के नीचे गुज़र बसर करता था. किसी मामूली विवाद पर पड़ोस के गाँव के दो लड़कों ने उनके भतीजे को झापड़ मार दिया और जब उसने विरोध किया तो दस मिनट बात कुछ गुंडे  हथियारों के साथ आये और घर में घुसकर साजिद को मारा पीटा , बच्चों को मारा , औरतों को मारा और घर में तोड़फोड़ किया . इस  सारे अपराध को करने के बाद वे लोग आराम से चले गए . घर के छत पर छुपे परिवार के लोगों ने अपने फोन के कैमरे से   अपराध  का वीडियो बना लिया. वारदात के बाद कहीं कोई कार्रवाई नहीं की गयी , पुलिस ने कोई  एक्शन नहीं लिया . लेकिन जब हिंसा का वह वीडियो वायरल हो गया , पूरे देश में चर्चा शुरू हो गयी ,राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविन्द केजरीवाल के बयान आने लगे तो शायद हरियाणा सरकार को लगा  कि कुछ करना चाहिए . नतीजतन पुलिस ने  पड़ोस के गाँव के एक लड़के को पकड़ लिया और बयान दे दिया कि कार्रवाई हो रही है .  हरियाणा के एक बीजेपी प्रवक्ता का बयान आ  गया कि दो पक्षों की मारपीट को कम्युनल रंग दिया जा रहा है . उस प्रवक्ता महोदय को वीडियों में यह नहीं दिख रहा है कि छः सात गुंडे एक आदमी को बुरी तरह से लाठियों से पीट रहे हैं और उसके बचाव में उसके परिवार की जो एक महिला आयी है उसके साथ भी धक्कामुक्की हो रही है . बीजेपी के बड़े नेता जो आम तौर पर हर किसी घटना पर ट्वीट करते रहते हैं ,इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं . शायद ऐसा इसलिए हो कि चुनाव के मौसम में अपने हिन्दू कार्यकर्ताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते हों .
यह शर्मनाक है , यह हमारी आज़ादी के बुनियादी उसूलों पर हमला है और इसकी निंदा की जानी चाहिए . पुलिस को सरकार के सर्वोच्च स्तर से याद दिलाया जाना चाहिए कि  कानून व्यवस्था को लागू करना उनका प्राथमिक कर्तव्य है. उनको अपना काम करना चाहिए .लेकिन .आज हम देखते हैं कि दंगे भड़काने के लिए सत्ताधारी पार्टी के लोग तरह तरह की कोशिश करते पाये जा रहे  हैं . आम तौर पर माना जाता  है कि जब दंगे होते हैं तो सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण होता है और बीजेपी को चुनाव में लाभ होता है . यह ट्रेंड १९८९ के आम चुनाव के बाद से देखा जा रहा है . इस बात में दो राय नहीं है कि साम्प्रदायिक हिंसा का उद्देश्य चुनाव में लाभ लेना होता है .  राजनीति चमकाने के लिए दंगों का आविष्कार  तब शुरू हुआ जब १९२० के असहयोग आन्दोलन के दौरान महात्मा  गांधी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक हैं . अंग्रेजों के खिलाफ पूरा देश एकजुट खड़ा हो गया तब अँगरेज़ ने दंगों की योजना पर काम शुरू किया . उसके बाद से ही अंग्रेजों ने दंगों के बारे में एक विस्तृत रणनीति बनाई और संगठित तरीके से देश में दंगों का आयोजन होने लगा .प्रायोजित साम्प्रदायिक हिंसा तो १९२७ में शुरू हो गयी थी लेकिन स्वार्थी राजनेताओं ने 1940 के दशक में धर्म आधारित खूनी संघर्ष की बुनियाद रख दी । जब अंग्रेजों की समझ में आ गया कि अब इस देश में उनकी हुकूमत के अंतिम दिन आ गए हैं तो उन्होंने मुल्क को तोड़ देने की अपनी प्लान बी पर काम शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अगस्त 1947 में जब आजादी मिली तो एक नहीं दो आजादियां मिलींभारत के दो टुकड़े हो चुके थेसाम्राज्यवादी ताकतों के मंसूबे पूरे हो चुके थे लेकिन सीमा के दोनों तरफ ऐसे लाखों परिवार थे जिनका सब कुछ लुट चुका था.  जो हिंसक अभियान शुरू हुआ उसको अब बाकायदा  संस्थागत रूप दिया  जा चुका है। भारत की आजादी के पहले हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसने हिन्दू और मुसलमान के बीच अविश्वास का ऐसा बीज बो दिया था जो आज बड़ा पेड़ बन चुका है और अब उसके जहर से समाज के कई स्तरों पर नासूर विकसित हो रहा है। भारत की राजनीतिकसामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी में अब दंगे स्थायी भाव बन चुके हैं।
अब भारत में दंगे नहीं होते. पहले के समय में जब  केंद्र में सेकुलर पार्टी की सरकारें होती थीं तो मुसलमान भी मारपीट का जवाब मारपीट से देता था जिसके कारण दंगे होते थे . अब मुसलमान दहशत में है , चुप रहता  है . इसलिए अब राजनीतिक संरक्षण प्राप्त  गुंडे छिटपुट मुसलमानों को  उनके घर में घुसकर मारते हैं और घटना का वीडियो बनाकर पूरे देश में वायरल करते हैं . जिसके बाद मुसलमानों में दहशत फ़ैलाने में सफलता पाते हैं . जब दंगे होते थे तो अधिकतर दंगों के आयोजकों का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए सम्प्रदायों का ध्रुवीकरण होता था .  देखा यह गया है कि भारत में अधिकतर दंगे चुनावों के कुछ पहले सत्ता को ध्यान में रख कर करवाए जाते हैं। विख्यात भारतविद् प्रोफेसर पॉल ब्रास ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ''द प्रोडक्शन ऑफ हिन्दू-मुस्लिम वायलेंस इन कंटेम्परेरी इण्डिया" में दंगों का बहुत ही विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है। उन्होंने साफ कहा है कि हर दंगे में जो मुकामी नेता सक्रिय होता हैदोनों ही समुदायों में उसकी इच्छा राजनीतिक शक्ति हासिल करने की होती है लेकिन उसको जो ताकत मिलती है वह स्थानीय स्तर पर ही होती है।  उसके ऊपर भी राजनेता होते हैं जो साफ नज़र नहीं आते लेकिन वे बड़ा खेल कर रहे होते हैं। अपनी किताब में पॉल ब्रास ने यह बात बार-बार साबित करने की कोशिश की है कि भारत में दंगे राजनीतिक कारणों से होते हैंहालांकि उसका असर आर्थिक भी होता है लेकिन हर दंगे में मूलरूप से राजनेताओं का हाथ होता है।  अब दंगों की जगह मुसलमानों में दहशत फैलाकर राजनीतिक  मकसद हासिल किया जाता  है .इसकी शुरुआत दादरी में अखलाक के घर में गोश्त पकडकर की गयी थी . तब तक मुसलमानों को मुगालता था कि  हुकूमत उनकी मदद करेगी .इसलिए थोडा हल्ला गुल्ला भी हुआ था लेकिन उसके बाद से पहलू खान समेत ऐसे तमाम वारदात हुयी हैं जिसमें सरकारें अपराधियों के साथ ही देखी गयी हैं . गुडगाँव की घटना उसी सिलसिले की सबसे ताज़ा कड़ी है .  लेकिन सरकार को खबरदार रहना पडेगा क्योंकि अगर अवाम की  हिफाज़त की  गारंटी नहीं दे सके तो हुकूमत का अधिकार ही नहीं रहेगा .