Friday, July 6, 2018

न्यूनतम समर्थन मूल्य को आंकड़ों की बाजीगरी नहीं बनाना चाहिए

  

 शेष नारायण सिंह 

खरीफ फसल के  लिए सरकारी खरीद का दाम तय कर दिया गया है . गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रेस कान्फरेंस में बाकायदा  मंत्रिमंडल के फैसलों का ऐलान किया . देश  भर में  किसानों के आन्दोलन  चल रहे हैं लेकिन मीडिया में वह मुकाम नहीं पा रहे हैं जो उनको मिलना चाहिए और इसीलिए बाकी दुनिया  को अंदाज़ा नहीं है कि किसानों में भारी हाहाकार है. लेकिन सरकार को मालूम है कि देश का  किसान बहुत नाराज़ है . खरीफ की फसलों की सरकारी  खरीद के मूल्यों में जिस तरह से वृद्धि की गयी है उसको देखकर लगता है कि सरकार में सर्वोच्च स्तर पर भी इस बात की चिंता है और चुनावी साल में किसान की नाराजगी का   पाथेय लेकर बीजेपी चुनावी मैदान में नहीं जाना चाहेगी . इसलिए घोषित सरकारी मूल्यों का राजनीतिक कारण सबसे अहम है . बीजेपी ने अपने 2014 के चुनावी घोषणापत्र में यह वायदा किया था कि अगर बीजेपी की सरकार बनी तो वह स्वामीनाथन आयोग की उस सिफारिश को लागू करेगीजिसमें  कहा  गया है कि किसानों को सी-2  लागत के ऊपर 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए . फसल पर हुए खर्च के मद की लागत को जोड़कर जो कीमत आती है उसको सी-२ कहा जाता है . सरकार ने चार साल तक इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दिया . बल्कि इस  बीच किसानों की क़र्ज़ माफी आदि के मुद्दों पर हास्यास्पद तरह  के तर्क दिए जाते रहे . लेकिन अब सरकार की समझ में आ गया  है कि चुनावी साल में  नाराज़ किसान बहुत कुछ  नुक्सान कर सकता है .

अब  तक सरकारें  जो घोषणा करती रहीं हैं  उसको देखा जाय तो लगता है कि सी-लागत के ऊपर 10-12 प्रतिशत जोड़कर ही न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया  जाता रहा है . स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट इस  मामले में बहुत ही महत्वपूर्ण संगमील  मानी जाती थी . २०१४ में  बीजेपी का घोषणा पत्र बनाने वालों ने इस  अवसर को भांपा और उसको अपने चुनावी वायदों में शामिल  कर दिया .  सबको मालूम है कि मोदी सरकार बनवाने में  देश भर  के किसानों का बड़ा योगदान है लेकिन सरकार में आने के बाद  स्वाभाविक दबावों के चलते सरकार ने अपने इस वायदे को पूरी तरह से भुला दिया . इस साल की  शुरुआत से ही साफ़ नज़र आ रहा है कि सरकार के खिलाफ मैदान ले चुका है  तो यह घोषणा की गयी है . हमको मालूम है कि अब चुनाव तक सरकार और बीजेपी के प्रवक्ता सरकारी खरीद के दाम को मुद्दा बनाने  की  कोशिश करेंगे लेकिन कुछ  ऐसी बातें हैं जिनको वे ढांकतोप  कर बात करना चाहेंगे. मसलन वे इस बात को पब्लिक डोमेन में नहीं आने देंगे कि इस सरकार ने  स्वामीनाथन कमीशन में बताये गई सी-२ की  परिभाषा ही बदल दी है .एक बात और सच है कि इस बार का घोषित मूल्य नई परिभाषा के हिसाब से भी खरा नहीं उतरता है .

  पिछले चार वर्षों में  सरकार ने हर  साल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है. समर्थन मूल्य का उद्देश्य यह माना जाता है कि अगर बाजार में सरकारी कीमत के नीचे किसी अनाज की कीमत जाती हैतो सरकार  एम एस पी के आधार पर किसानों  से अनाज खरीदेगी। आम तौर पर उम्मीद की जाती है कि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा कीमत मिलती रहेगी लेकिन पिछले चार वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ जब गेहूं और धान को छोड़कर किसी भी उत्पादन का बाज़ार भाव एम एस पी के बराबर भी पंहुचा हो . .एम एस पी की अवधारणा ही यही  है कि किसान की फसल की  कीमत एक मुकाम के नीचे न जाने पाए . लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अब तक तो ऐसा हुआ नहीं है . ज़ाहिर है नया घोषित हुआ यह समर्थन मूल्य भी किसान का बहुत हित  करने वाला नहीं  है. किसान अपनी  पैदावार को  होल्ड नहीं कर सकता , उसको फसल तैयार होने के बाद बेचना ज़रूरी  हो जाता  है .इसका मुख्य कारण तो यही है कि उसकी पास इतना धन नहीं होता कि वह बाज़ार भाव के अच्छे होने का इंतज़ार करे और अपनी ही फसल को बहुत दिन तक रखा नहीं जा सकता, उसपर कानूनी कार्रवाई का खतरा रहता है .इसलिए जब देरी या धांधली  होने लगती है तो वह औने पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हो जाता  है. किसान की इस कमजोरी का फायदा वे लोग उठाते हैं जो खाद्य सामग्री के वायदा कारोबार में बड़ी रक़म बना रहे होते हैं . नतीजा यह होता है कि किसान को जिस चीज़ की कीमत एक रूपये मिल रही होती है ,वही जब  शहरी मध्यवर्ग के पास पंहुचती है तो वह करीब एक सौ रूपये की हो चुकी होती  है . इस प्रकार से राजनीतिक पार्टियों के समर्थकों  के दो बड़े समूह  बिचौलियों के शिकार हो चुके होते हैं . एक तो किसान जिसकी आबादी सबसे ज्यादा  है और दूसरा शहरी मध्यवर्ग जिसकी भी आबादी  दूसरे नंबर पर है. सरकार को इस  हालत को सुधारने के लिए मौलिक और बुनियादी क़दम उठाना चाहिए लेकिन कोई भी सरकार ऐसा  करती नहीं है .  

नई एम एस पी घोषित होने के साथ साथ यह प्रचार शुरू हो गया है कि सरकार ने अपना एक महत्वपूर्ण वायदा पूरा कर दिया है लेकिन  लगता  है कि यह सब एक योजना के तहत किया जा रहा  है जिससे किसान को सही  बात का पता ही न लग पाये. न्यूनतम समर्थन मूल्य के दर्शनशास्त्र का आधार  यह  था कि किसान को यह गारंटी दी जा सके कि उसकी फसल की एक कीमत सरकार की तरफ से तय जिसके ऊपर के दाम पर वह बाज़ार में अपना माल बेच सकता है आम तौर पर एम एस पी के ऊपर उसको करीब बीस प्रतिशत ज्यादा कीमत बाज़ार से मिल सकती था. पहले ऐसा होता भी था लेकिन अब नहीं हो रहा  है. मनमोहन सिंह ने  वित्त मंत्री के रूप  में जिस उदारीकरण और   भूमंडलीकरण का आगाज़ किया था उसका सबसे ज्यादा नुक्सान किसान को ही हो रहा   है. तथाकथित सुधारों के नाम पर  उद्योगपति, शेयर बाज़ार वाले, अंतरराष्ट्रीय  ठग आदि तो मौज कर रहे   हैं , बैंकों का धन लूटने वाले लोगों को संभालने के लिए सरकार एक लाख करोड़ से ज्यादा के एन पी ए यानी बेकार हो चुके बैंकों के क़र्ज़ को माफ़ कर रही है लेकिन किसान सरकार की  प्राथमिकता नहीं हैं . उदारीकरण और वैश्वीकरण के तमाम सुधारों के नाम पर किसानों को बाकी दुनिया के किसानों के साथ मुकाबला करने के  लिए छोड़ दिया गया है , किसानों के उत्पादन के मुकाबले अमरीका आदि से अनाज का आयात कर लिया जाता है और  किसान बाज़ार से खुद ही लड़ने के लिए अभिशप्त है. देश के अन्दर भी  किसान के ऊपर  प्रतिबंध लगे हुए हैं। वे एक राज्य से दूसरे राज्य तक  अनाज नहीं ले जा सकतेतय मात्रा से अधिक जमा नहीं कर सकतेयहाँ तक कि निर्यात भी नहीं कर सकते। इसलिए एम  एस पी की घोषणा मात्र कर लेने से सरकार के कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती .देश की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए ज़रूरी है कि  सरकार अपने आपको किसानों की सही हित रक्षक  रूप  में प्रस्तुत करे , केवल मतदाता के रूप में ही नहीं .

इस सन्दर्भ में  मीडिया की ज़िम्मेदारी का उल्लेख करना भी ज़रूरी है . देखा गया है कि  लगभग सभी खबरों में तोता रटन्त स्टाइल में वही लिख दिया जाता  जो सरकारी तौर पर बताया जाता है .सारी खबरें सरकारी पक्ष को उजागर करने के लिए लिखी जाती हैं. यह सच है। लेकिन एक सच और है जो आजकल अखबारों के पन्नों तक आना बंद हो चुका है। यह सच है कि किसान किस  तरह से अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को जीता है , किस तरह से वह ज़मीन छोड़कर शहर भाग जाने के लिए तडपता है , देश के गाँवों में कम खेत वाले या भूमिहीन खेतिहर मजदूर पर क्या  गुजरती  है , किस तरह से वह भूख और अकाल का शिकार होता है.  भूख के तरह-तरह के रूप देश के सूखा ग्रस्त गांवों में देखे जाते हैं  लेकिन वे खबर नहीं बन पाते . खबर तब  बनती है  जब कोई भूख से तड़प तड़प कर मर जाता है ,या कोई अपने बच्चे बेच देता है या  खुद को गिरवी रख देता है . भूख से मरना बहुत बड़ी बात हैदुर्दिन की इंतहा है। लेकिन भूख की वजह से मौत होने के पहले इंसान पर तरह-तरह की मुसीबतें आती हैंभूख से मौत तो उन मुसीबतों की अंतिम कड़ी है .कहीं भी नहीं लिखा जाता कि किसानी का एक ज़रूरी हिस्सा  यह भी है कि साल दर साल  फसल चौपट हो जाती  है . फसल  बर्बाद हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच  करता  है  क्योंकि गांव का गरीब और इज्जतदार आदमी मांग कर नहीं खाता। गांव का गरीबसरकारी लापरवाही के चलते और मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषिव्यवस्था नए शासकों को मिली थीवह लगभग आदिम काल की थी। उसको दुरुस्त करने के लिए लाल बहादुर   शास्त्री ने  हरित क्रान्ति की पहल की थी लेकिन उसके बाद  किसी सरकार ने अब अब तक कोई  पहल नहीं की है .
इसलिए मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सच्चाई को देश और समाज के सामने लाये, मीडिया का फ़र्ज़ है कि इन आंकड़ाबाज नेताओं को यह बताने की जरूरत को समझे कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करेंइसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता हैतभी इस देश का नेता और पत्रकार जागता है। गांव का किसानजिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती हैवह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता। इसलिए किसान की समस्या को लगातार केंद्र में रखना सरकार का भी ज़िम्मा है और मीडिया का भी . दोनों को ही अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना चाहिए .

अमरीका से दोस्ती किसी देश के राष्ट्रहित में कभी नहीं रही



शेष नारायण सिंह


विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को अमरीका यात्रा पर जाना था . वे वहां के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से मुलाक़ात करके आपसी  संबंधों के बारे में विस्तृत विचार विमर्श करने वाली थीं लेकिन अमरीका ने अनुरोध कर दिया कि कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि इस यात्रा को रोक देना ही ठीक रहेगा. इस बातचीत के कार्यक्रम की घोषणा पिछले साल अगस्त में की गयी थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से  फोन पर बात हुयी थी और तय पाया गया था कि सामरिक,सुरक्षा और सैनिक सहयोग को मज़बूत करने के लिए  दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बातचीत होगी. यह बातचीत पहले भी  टाली जा चुकी है लेकिन उस बार  टलने का कारण पता  था. क्योंकि उस बार डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मंत्री रेक्स टिलरसन को बर्खास्त कर दिया था. इस बार बातचीत के टाले जाने का कारण शायद यह है  कि भारत ने रूस से एस-४०० मिसाइल खरीदने की पेशकश कर दी है जो अमरीका के राष्ट्रपति जी को पसंद नहीं आया है .   अमरीका चीन के बढ़ते प्रभाव के चलते इस इलाके में ऐसे दोस्त की   तलाश में है जो उसके अलावा   किसी से रिश्ते न रखे . अब तक पाकिस्तान इसी काम आता था अब भारत का वही इस्तेमाल करना अमरीकी विदेशनीति का अहम हिस्सा है .

उधर अमरीकी रक्षा मंत्री जिम मेटिस चीन की यात्रा पर हैं . उन्हें जापान और  दक्षिण कोरिया भी जाना है . अमरीकी अखबार न्यू यार्क टाइम्स में  छपा है कि वे अपनी यात्रा की  शुरुआत में ही वे चीनी राष्ट्रपति  शी जिनपिंग से मिले और उनका मन भांपने के लिए दक्षिण चीन सागर की चर्चा कर दी .चीन के राष्ट्रपति ने दो टूक लहजे में जवाब दिया कि " हमारे पुरखों  ने जो ज़मीन हमारे लिए छोडी है ,हम उसका एक इंच भी किसी के लिए नहीं छोड़ेंगे. किसी और की ज़मीन को हम बिलकुल नहीं चाहते." अमरीकी  रक्षामंत्री  इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम  करने के लिए अमरीकी विदेशनीति को ताक़त देने के लिए इस यात्रा पर हैं .
इस खबर का ज़िक्र करने का उद्देश्य केवल  यह  है कि  अमरीका से सही रिश्ते रखने के लिए उससे इसी भाषा में बात करना  पड़ता है .  उससे बहुत अपनापा नहीं दिखाना चाहिए .इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो अमरीकी  राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने उनको बहुत भारी भारी वायदे किये थे . उनको उम्मीद थी कि जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शात्री जैसे अमरीका विरोधी राजनेताओं के जाने के बाद राजनीति में अपेक्षाकृत कम  तजुर्बेकार इंदिरा गांधी को अमरीकी सम्पन्नता के मायाजाल में  फंसाया जा सकता  था लेकिन  इंदिरा गांधी ने उनको कोई खास महत्व नहीं दिया था. उसके बाद तो निक्सन के राष्ट्रपति पद पर रहते बंगलादेश की स्थापना भी हुयी और अमरीकी राजनीति में सक्रिय हर इंसान को लगने लगा कि इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले भारत से दोस्ती से अच्छी दुश्मनी ही  ठीक रहेगी और वह काम उसने किया भी . यहाँ तक कि पाकिस्तान के समर्थन में १९७१ में बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े का युद्धपोत इंटरप्राइज़ भी भेज दिया था . लेकिन अमरीका कुछ नहीं कर सका और बंगलादेश की स्थापना हो गयी.  उसके बाद भी कई बार अमरीका ने भारत से  दोस्ती का हाथ बढ़ाया . सोवियत रूस के विघटन के बाद अमरीका को इकलौते सुपर पावर का दर्ज़ा मिल गया उसके बाद तो हालात बदल गए . भारत भी आर्थिक संकट के भयानक दौर से गुज़र रहा  था. पी वी नरसिम्हाराव की सरकार थी और डॉ मनोहन सिंह  वित्त मंत्री थे. अमरीकी दाबाव उस बार  बरास्ता, आई एम एफ और विश्व बैंक आया और भारत अमरीका  के आर्थिक दबाव में आ गया .उसके बाद जो हुआ उसे दुनिया जानती है. .आम तौर पर  भारत की  सरकारें कमज़ोर थीं क्योंकि गठबंधन की सरकारें होती थीं लेकिन अमरीका से सैनिक और सामरिक जुगलबंदी के प्रस्तावों को टाला जाता रहा . अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जसवंत सिंह विदेशमंत्री बने तो उन्होंने अमरीका से कूटनीतिक संबंधों को ताकत देना शुरू किया . लेकिन पूरी तरह से अमरीका के सहयोगी देश की स्थिति भारत की कभी  नहीं बनी.
तीस साल  बाद  भारत में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार आई है और इस सरकार ने  अमरीका के सामरिक सहयोगी की भूमिका को स्वीकार करने का मन बना लिया है . लेकिन अमरीका में राष्ट्रपति की निजी इच्छाएं क़ानून नहीं बन  जातीं, इस बात का ध्यान रखना चाहिए . अमरीका की  दोस्ती के चक्कर में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता और निजी सम्मान को कभी नहीं  भूलना चाहिए . अमरीका के पूर्व विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर की बात हमेशा याद रखनी चाहिए . उन्होंने कहा था कि ," अमरीका से दुश्मनी खतरनाक है लेकिन उससे दोस्ती में तो  और भी खतरनाक है "  .उनके इस पैमाने पर सद्दाम हुसैन,  ईरान के शाह  रज़ा पहलवी ,चिली के तानाशाह  पिनोशे और पाकिस्तानी तानाशाह परवेज़ मुशर्राफ  को देखा जा सकता है . इसलिए किसी  भी राष्ट्राध्यक्ष को अमरीका से दोस्ती करने में बहुत संभल कर रहना चाहिए .
बहरहाल  अमरीका से भारत के रिश्ते सुधारने की कोशिश चल रही है. लेकिन ज़रूरी यह है कि इस बात की जानकारी रखी जाय कि अमरीका कभी भी भारत के बुरे वक़्त में काम नहीं आया है . भारत के ऊपर जब १९६२ में चीन का हमला हुआ था तो वह नवस्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी . उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका से मदद माँगी भी थी लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी ने कोई भी सहारा नहीं दिया और नेहरू की चिट्ठियों का जवाब तक नहीं दिया था . इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के बाद लिंडन जॉनसन ने भारत का अमरीकी कूटनीति के हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपने राष्ट्रहित को महत्व दिया और अमरीका के हित से ज्यादा महत्व अपने हित को दिया और गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नेता के रूप में भारत की इज़्ज़त बढ़ाई . हालांकि अमरीका की यह हमेशा से कोशिश रही है कि वह एशिया की राजनीति में भारत का इस्तेमाल अमरीकी हित साधना के लिए करे लेकिन भारतीय विदेशनीति के नियामक अमरीकी राष्ट्रहित के प्रोजेक्ट में अपने आप को पुर्जा बनाने को तैयार नहीं थे . यह अलग बात है कि भारत के सत्ता प्रतिष्टान में ऐसे लोगों का एक वर्ग हमेशा से ही सक्रिय रहा है जो अमरीका की शरण में जाने के लिए व्याकुल रहा करता था. पी वी नरसिम्हा राव की सरकार आने के पहले तक इस वर्ग की कुछ चल नहीं पायी. नरसिम्हा राव की सरकार आने के बाद हालात बदल गए थे. सोवियत रूस का विघटन हो चुका था और अमरीका अकेला सुपरपावर रह गया . ऐसी स्थिति में भारतीय राजनीति और नौकरशाही में जमी हुई अमरीकी लॉबी ने काम करना शुरू किया और भारत को अमरीकी हितों के लिए आगे बढ़ाना शुरू कर दिया . जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जसवंत सिंह विदेशमंत्री बने तो अमरीकी विदेश विभाग के लोगों से उन्होंने बिलकुल घरेलू सम्बन्ध बना लिए . डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होने के बाद तो अमरीका से घनिष्ठ आर्थिक  सम्बन्ध बन गए थे.  एशिया में बढ़ते हुए चीन के प्रभाव को कम करना अमरीकी विदेशनीति का अहम हिस्सा है और इस मकसद को हासिल करने के लिए वह भारत का इस्तेमाल कर रहा है .हालांकि चीन को बैलेंस करना भारत के हित में भी है लेकिन यह भी ध्यान रखने की ज़रुरत है कि कहीं भारत के राष्ट्रहित को अमरीकी फायदे के लिए कुरबान न करना पड़े.

पिछले सत्तर वर्षों के इतिहास पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि अमरीका ने भारत को हमेशा की नीचा दिखाने की कोशिश की है . १९४८ में जब कश्मीर मामला संयुक्तराष्ट्र में गया था तो तेज़ी से सुपर पावर बन रहे अमरीका ने भारत के खिलाफ काम किया था . १९६५ में जब कश्मीर में घुसपैठ कराके उस वक़्त के पाकिस्तानी तानाशाह जनरल अय्यूब ने भारत पर हमला किया था तो उनकी सेना के पास जो भी हथियार थे सब अमरीका ने ही उपलब्ध करवाया था . उस लड़ाई में जिन पैटन टैंकों को भारतीय सेना ने रौंदा थावे सभी अमरीका की खैरात के रूप में पाकिस्तान की झोली में आये थे. पाकिस्तानी सेना के हार जाने के बाद अमरीका ने भारत पर दबाव बनाया था कि वह अपने कब्जे वाले पाकिस्तानी इलाकों को छोड़ दे . १९७१ की बंगलादेश की मुक्ति की लड़ाई में भी अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तानी तानाशाह याहया खां के बड़े भाई के रूप में काम किया था .उस वक़्त के अमरीकी विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर ने उस दौर में पाकिस्तान की तरफ से पूरी दुनिया में पैरवी की थी. संयुक्त राष्ट्र में भी भारत के खिलाफ काम किया था . जब भी भारत ने परमाणु परीक्षण किया अमरीका को तकलीफ हुई . भारत ने बार बार पूरी दुनिया से अपील की कि बिजली पैदा करने के लिए उसे परमाणु शक्ति का विकास करने दिया जाय लेकिन अमरीका ने शान्ति पूर्ण परमाणु के प्रयोग की कोशिश के बाद भारत के ऊपर तरह तरह की पाबंदियां लगाईं. उसकी हमेशा कोशिश रही कि वह भारत और पाकिस्तान को बराबर की हैसियत वाला मुल्क बना कर रखे लेकिन ऐसा करने में वह सफल नहीं रहा .आज भारत के जिन इलाकों में भी अशांति है वह सब अमरीकी दखलंदाजी की वजह से ही है . कश्मीर में जो कुछ भी पाकिस्तान कर रहा है उसके पीछे पूरी तरह से अमरीका का पैसा लगा है . पंजाब में भी आतंकवाद पाकिस्तानी फौज की कृपा से ही शुरू हुआ था . पूर्वोत्तर भारत में जो आतंकवादी पाकिस्तान की कृपा से सक्रिय हैं उन सबको को पाकिस्तान उसी पैसे से मदद करता  था  जो उसे अमरीका से अफगानिस्तान में काम करने के लिए मिलता था . ऐसी हालत में अमरीका से बहुत ज्यादा दोस्ती कायम करने के पहले मौजूदा हुक्मरान को पिछले साठ वर्षों के इतिहास पर नज़र डाल लेनी चाहिए . और अमरीका से दोस्ती की पींग बढाने के पहले यह जान लेना चाहिए कि जो अमरीका भारत के बुरे वक़्त में काम कभी नहीं आया . इसलिए अमरीका की दोस्ती को एक बार फिर से समझ लेने की ज़रूरत है .

Monday, July 2, 2018

बलात्कारी के धर्म से देश को बांटना खतरनाक राजनीति है


शेष नारायण सिंह

मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक छोटी लडकी के साथ बलाकार हुआ है . बलात्कार के आरोप में जिसको गिरफ्तार किया गया है ,वह मुसलमान है  .उसके बाद धार्मिक आधार पर देश को बांटने की कोशिश कर रही जमातें बहुत ही सक्रिय हो गयी हैं . बात को इस तरह से पेश किया जा रहा है ,गोया देश का हर मुसलमान इस बलात्कार के लिए ज़िम्मेदार है. मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है . मंदसौर के बलात्कार की तुलना कठुआ की वारदात से की जा रही है जहां एक मुसलिम बच्ची से  बलात्कार हुआ था. उस केस में बलात्कारी हिन्दू था.  हम इन दोनों ही आपराधों में बलात्कारियों की निंदा करते हैं . लेकिन तकलीफ तब होती है जब एक अपराधी के काम  के लिए पूरे समाज को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है . कठुआ के मामले में बलात्कारी हिन्दू था . देश भर में हिन्दुओं ने उस पर ग़म-ओ-गुस्से  का इज़हार किया था ,उसकी निंदा की थी लेकिन बलाकारियों के कुछ खैरख्वाह   उनके समर्थन में  खड़े हो गए थे. हिन्दू एकता के नाम पर चंदा इकठ्ठा कर रहे थे . जब कि मंदसौर में मुसलमानों  ने सड़क पर आकर  बलात्कारी के खिलाफ जुलूस निकाला , उसको सज़ा-ए-मौत की मांग की और कोई भी मौलवी उस बलात्कारी के लिए  नमाज़-ए-जनाजा पढवाने को तैयार नहीं है , उसको अपने कब्रिस्तान में दफ़न तक करने से मुसलमानों ने मना कर दिया है . पूरे समाज में उसके खिलाफ माहौल बन गया है .  ऐसी हालत में मंदसौर और कठुआ की तुलना ठीक नहीं है .धार्मिक आधार पर बलात्कारी का साथ देना बहुत ही घटिया हरकत है और उसकी निंदा की जानी चाहिए .
टेलिविज़न पर मंदसौर के बलात्कार के हवाले से  देश के सभी मुसलमानों को घेरने की कोशिश कर रहे सरकारी  पार्टी के प्रवक्ताओं को वे बातें नहीं करनी चाहिए जिस  तरह की बात वे कर  रहे  हैं . सरकार और बीजेपी की ज़िम्मेदारी है कि  इन प्रवक्ताओं पर लगाम लगाए . धार्मिक आधार पर देश की आबादी को खेमों में  बांटना सत्ताधारी पार्टी को  भारी नुक्सान पंहुचा सकता है . जब भी  धार्मिक भावनाओं के सहारे राजनीति करने की बी जे पी ने  कोशिश की ,देश का बहुत नुकसान हुआ है . इस बार भी लगता है कि उनकी कोशिश है  झगडा झंझट का माहौल पैदा किया जाये  . यह ठीक नहीं है . यह सच है कि   आर एस एस का आज़ादी की लड़ाई और आज़ादी हासिल करने में कोई योगदान नहीं है लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि भारत की आज़ादी की लड़ाई जिन मूल्यों पर लड़ी गयी थीउनमें धर्म निरपेक्षता एक अहम मूल्य था .देश में जो माहौल बनाया जा रहा है उसमें  धर्मनिरपेक्षता के अहम पहलुओं पर एक बार फिर से गौर करने की ज़रूरत है .धर्मनिरपेक्षता  भारत के संविधान का स्थायी भाव हैउसकी मुख्यधारा है। धर्मनिरपेक्ष राजनीति किसी के खिलाफ कोई नकारात्मक प्रक्रिया नहीं है। वह एक सकारात्मक गतिविधि है। देश के मौजूदा नेतृत्व को इस बात पर विचार करना पड़ेगा और धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्र निर्माण और संविधान की सर्वोच्चता के जरूरी हथियार के रूप में संचालित करना पड़ेगा। आज भी धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व वही है जो 1909 में महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में लिख दिया था..

धर्मनिरपेक्ष होना हमारे गणतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी है। इस देश में जो भी संविधान की शपथ लेकर सरकारी पदों पर बैठता है वह स्वीकार करता है कि भारत के संविधान की हर बात उसे मंज़ूर है यानी उसके पास धर्मनिरपेक्षता छोड़ देने का विकल्प नहीं रह जाता। जहां तक आजादी की लड़ाई का सवाल है उसका तो उद्देश्य ही धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय का राज कायम करना था।  आज के शासकों को यह ध्यान रखना होगा कि कांग्रेस इस देश  में इतने वर्षों तक राज इसलिए कर पाई कि उसने धर्मनिरपेक्षता को अपनी राजनीति की बुनियाद बना रखा  था. 60 के दशक तक तो कांग्रेस उसी रास्ते पर चलती नजर आई लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद भटकाव शुरू हो गया था और जब कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी सिद्धांत पर कमजोरी दिखाई तो जनता ने और विकल्प ढूंढना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराजमें पहली बार देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। 1909 में छपी इस किताब को छपे सौ साल से ज्यादा हो गए हैं . गांधी जी एक महान कम्युनिकेटर थेजटिल सी जटिल बात को बहुत साधारण तरीके से कह देते थे। हिंद स्वराज में उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिएतो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहेंतो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदूमुसलमानपारसीईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैंएक देशीएक-मुल्की हैंवे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।"

महात्मा जी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत कीउससे अंग्रेजी राज्य की चूलें हिल गईं। आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। शौकत अलीसरदार पटेलमौलाना अबुल कलाम आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने इस सोच को आजादी की लड़ाई का स्थाई भाव बनाया।लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने जिन्ना टाइप लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुए।लेकिन देश का सौभाग्य था कि महात्मा गाँधी के उत्तराधिकारी और कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू थे। उनकी धर्मनिरपेक्षता की कहानियां चारों तरफ सुनी जा सकती हैं। उन्होंने लोकतंत्र की जो संस्थाएं विकसित कींसभी में सामाजिक बराबरी और सामाजिक सद्भाव की बातें विद्यमान रहती थीं। प्रेस से उनके रिश्ते हमेशा अच्छे रहे इसलिए उनके धर्मनिरपेक्ष चिंतन को सभी जानते हैं और उस पर कभी कोई सवाल नहीं उठता। लेकिन इनके जाने के बाद कांग्रेस की राजनीति ऐसे लोगों के कब्जे में आ गई जिन्हें महात्मा जी के साथ काम करने का सौभाग्य नहीं मिला था।

कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)। सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं। सरदार पटेल अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और उनकी बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, ''इसी शहर के जलियांवाला बाग की माटी में आज़ादी हासिल करने के लिए हिंदुओंसिखों और मुसलमानों का खून एक दूसरे से मिला था। ............... मैं आपके पास एक ख़ास अपील लेकर आया हूं। इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ............ एक हफ्ते तक अपने हाथ बांधे रहिए और देखिए क्या होता है।मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।"  सरदार वल्लभ भाई पटेल की धर्मनिरपेक्षता सीधे महात्मा गांधी वाली थी।

इसलिए  आज के सत्ताधीशों का यह  फ़र्ज़ है कि वे अपने समर्थकों को आगाह कर दें कि सेकुलर शब्द को गाली के रूप में इस्तेमाल करने से बाज  आयें क्योंकि कांग्रेस ने भी जब सेकुलरिज्म का दामन छोड़ा तो सत्ता हाथ से निकल गयी ,१९७७ में भी और १९८९ में भी . इस देश का  सत्ताधीश सेकुलर ही रहेगा ,यह संविधान की भावना है . किसी बलात्कारी के जन्म के धर्म से देश को बांटना बहुत ही खतरनाक खेल है .

Sunday, July 1, 2018

अमरीका से दोस्ती किसी देश के राष्ट्रहित में कभी नहीं रही



शेष नारायण सिंह


विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को अमरीका यात्रा पर जाना था . वे वहां के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से मुलाक़ात करके आपसी  संबंधों के बारे में विस्तृत विचार विमर्श करने वाली थीं लेकिन अमरीका ने अनुरोध कर दिया कि कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि इस यात्रा को रोक देना ही ठीक रहेगा. इस बातचीत के कार्यक्रम की घोषणा पिछले साल अगस्त में की गयी थी जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से  फोन पर बात हुयी थी और तय पाया गया था कि सामरिक,सुरक्षा और सैनिक सहयोग को मज़बूत करने के लिए  दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों की बातचीत होगी. यह बातचीत पहले भी  टाली जा चुकी है लेकिन उस बार  टलने का कारण पता  था. क्योंकि उस बार डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मंत्री रेक्स टिलरसन को बर्खास्त कर दिया था. इस बार बातचीत के टाले जाने का कारण शायद यह है  कि भारत ने रूस से एस-४०० मिसाइल खरीदने की पेशकश कर दी है जो अमरीका के राष्ट्रपति जी को पसंद नहीं आया है .   अमरीका चीन के बढ़ते प्रभाव के चलते इस इलाके में ऐसे दोस्त की   तलाश में है जो उसके अलावा   किसी से रिश्ते न रखे . अब तक पाकिस्तान इसी काम आता था अब भारत का वही इस्तेमाल करना अमरीकी विदेशनीति का अहम हिस्सा है .

उधर अमरीकी रक्षा मंत्री जिम मेटिस चीन की यात्रा पर हैं . उन्हें जापान और  दक्षिण कोरिया भी जाना है . अमरीकी अखबार न्यू यार्क टाइम्स में  छपा है कि वे अपनी यात्रा की  शुरुआत में ही वे चीनी राष्ट्रपति  शी जिनपिंग से मिले और उनका मन भांपने के लिए दक्षिण चीन सागर की चर्चा कर दी .चीन के राष्ट्रपति ने दो टूक लहजे में जवाब दिया कि " हमारे पुरखों  ने जो ज़मीन हमारे लिए छोडी है ,हम उसका एक इंच भी किसी के लिए नहीं छोड़ेंगे. किसी और की ज़मीन को हम बिलकुल नहीं चाहते." अमरीकी  रक्षामंत्री  इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम  करने के लिए अमरीकी विदेशनीति को ताक़त देने के लिए इस यात्रा पर हैं .
इस खबर का ज़िक्र करने का उद्देश्य केवल  यह  है कि  अमरीका से सही रिश्ते रखने के लिए उससे इसी भाषा में बात करना  पड़ता है .  उससे बहुत अपनापा नहीं दिखाना चाहिए .इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो अमरीकी  राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने उनको बहुत भारी भारी वायदे किये थे . उनको उम्मीद थी कि जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शात्री जैसे अमरीका विरोधी राजनेताओं के जाने के बाद राजनीति में अपेक्षाकृत कम  तजुर्बेकार इंदिरा गांधी को अमरीकी सम्पन्नता के मायाजाल में  फंसाया जा सकता  था लेकिन  इंदिरा गांधी ने उनको कोई खास महत्व नहीं दिया था. उसके बाद तो निक्सन के राष्ट्रपति पद पर रहते बंगलादेश की स्थापना भी हुयी और अमरीकी राजनीति में सक्रिय हर इंसान को लगने लगा कि इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले भारत से दोस्ती से अच्छी दुश्मनी ही  ठीक रहेगी और वह काम उसने किया भी . यहाँ तक कि पाकिस्तान के समर्थन में १९७१ में बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े का युद्धपोत इंटरप्राइज़ भी भेज दिया था . लेकिन अमरीका कुछ नहीं कर सका और बंगलादेश की स्थापना हो गयी.  उसके बाद भी कई बार अमरीका ने भारत से  दोस्ती का हाथ बढ़ाया . सोवियत रूस के विघटन के बाद अमरीका को इकलौते सुपर पावर का दर्ज़ा मिल गया उसके बाद तो हालात बदल गए . भारत भी आर्थिक संकट के भयानक दौर से गुज़र रहा  था. पी वी नरसिम्हाराव की सरकार थी और डॉ मनोहन सिंह  वित्त मंत्री थे. अमरीकी दाबाव उस बार  बरास्ता, आई एम एफ और विश्व बैंक आया और भारत अमरीका  के आर्थिक दबाव में आ गया .उसके बाद जो हुआ उसे दुनिया जानती है. .आम तौर पर  भारत की  सरकारें कमज़ोर थीं क्योंकि गठबंधन की सरकारें होती थीं लेकिन अमरीका से सैनिक और सामरिक जुगलबंदी के प्रस्तावों को टाला जाता रहा . अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जसवंत सिंह विदेशमंत्री बने तो उन्होंने अमरीका से कूटनीतिक संबंधों को ताकत देना शुरू किया . लेकिन पूरी तरह से अमरीका के सहयोगी देश की स्थिति भारत की कभी  नहीं बनी.
तीस साल  बाद  भारत में स्पष्ट बहुमत वाली सरकार आई है और इस सरकार ने  अमरीका के सामरिक सहयोगी की भूमिका को स्वीकार करने का मन बना लिया है . लेकिन अमरीका में राष्ट्रपति की निजी इच्छाएं क़ानून नहीं बन  जातीं, इस बात का ध्यान रखना चाहिए . अमरीका की  दोस्ती के चक्कर में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता और निजी सम्मान को कभी नहीं  भूलना चाहिए . अमरीका के पूर्व विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर की बात हमेशा याद रखनी चाहिए . उन्होंने कहा था कि ," अमरीका से दुश्मनी खतरनाक है लेकिन उससे दोस्ती में तो  और भी खतरनाक है "  .उनके इस पैमाने पर सद्दाम हुसैन,  ईरान के शाह  रज़ा पहलवी ,चिली के तानाशाह  पिनोशे और पाकिस्तानी तानाशाह परवेज़ मुशर्राफ  को देखा जा सकता है . इसलिए किसी  भी राष्ट्राध्यक्ष को अमरीका से दोस्ती करने में बहुत संभल कर रहना चाहिए .


बहरहाल  अमरीका से भारत के रिश्ते सुधारने की कोशिश चल रही है. लेकिन ज़रूरी यह है कि इस बात की जानकारी रखी जाय कि अमरीका कभी भी भारत के बुरे वक़्त में काम नहीं आया है . भारत के ऊपर जब १९६२ में चीन का हमला हुआ था तो वह नवस्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी मुसीबत थी . उस वक़्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अमरीका से मदद माँगी भी थी लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन केनेडी ने कोई भी सहारा नहीं दिया और नेहरू की चिट्ठियों का जवाब तक नहीं दिया था . इसके बाद इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के बाद लिंडन जॉनसन ने भारत का अमरीकी कूटनीति के हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी लेकिन इंदिरा गाँधी ने अपने राष्ट्रहित को महत्व दिया और अमरीका के हित से ज्यादा महत्व अपने हित को दिया और गुट निरपेक्ष आन्दोलन की नेता के रूप में भारत की इज़्ज़त बढ़ाई . हालांकि अमरीका की यह हमेशा से कोशिश रही है कि वह एशिया की राजनीति में भारत का इस्तेमाल अमरीकी हित साधना के लिए करे लेकिन भारतीय विदेशनीति के नियामक अमरीकी राष्ट्रहित के प्रोजेक्ट में अपने आप को पुर्जा बनाने को तैयार नहीं थे . यह अलग बात है कि भारत के सत्ता प्रतिष्टान में ऐसे लोगों का एक वर्ग हमेशा से ही सक्रिय रहा है जो अमरीका की शरण में जाने के लिए व्याकुल रहा करता था. पी वी नरसिम्हा राव की सरकार आने के पहले तक इस वर्ग की कुछ चल नहीं पायी. नरसिम्हा राव की सरकार आने के बाद हालात बदल गए थे. सोवियत रूस का विघटन हो चुका था और अमरीका अकेला सुपरपावर रह गया . ऐसी स्थिति में भारतीय राजनीति और नौकरशाही में जमी हुई अमरीकी लॉबी ने काम करना शुरू किया और भारत को अमरीकी हितों के लिए आगे बढ़ाना शुरू कर दिया . जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जसवंत सिंह विदेशमंत्री बने तो अमरीकी विदेश विभाग के लोगों से उन्होंने बिलकुल घरेलू सम्बन्ध बना लिए . डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होने के बाद तो अमरीका से घनिष्ठ आर्थिक  सम्बन्ध बन गए थे.  एशिया में बढ़ते हुए चीन के प्रभाव को कम करना अमरीकी विदेशनीति का अहम हिस्सा है और इस मकसद को हासिल करने के लिए वह भारत का इस्तेमाल कर रहा है .हालांकि चीन को बैलेंस करना भारत के हित में भी है लेकिन यह भी ध्यान रखने की ज़रुरत है कि कहीं भारत के राष्ट्रहित को अमरीकी फायदे के लिए कुरबान न करना पड़े.

पिछले सत्तर वर्षों के इतिहास पर नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि अमरीका ने भारत को हमेशा की नीचा दिखाने की कोशिश की है . १९४८ में जब कश्मीर मामला संयुक्तराष्ट्र में गया था तो तेज़ी से सुपर पावर बन रहे अमरीका ने भारत के खिलाफ काम किया था . १९६५ में जब कश्मीर में घुसपैठ कराके उस वक़्त के पाकिस्तानी तानाशाह , जनरल अय्यूब ने भारत पर हमला किया था तो उनकी सेना के पास जो भी हथियार थे सब अमरीका ने ही उपलब्ध करवाया था . उस लड़ाई में जिन पैटन टैंकों को भारतीय सेना ने रौंदा था, वे सभी अमरीका की खैरात के रूप में पाकिस्तान की झोली में आये थे. पाकिस्तानी सेना के हार जाने के बाद अमरीका ने भारत पर दबाव बनाया था कि वह अपने कब्जे वाले पाकिस्तानी इलाकों को छोड़ दे . १९७१ की बंगलादेश की मुक्ति की लड़ाई में भी अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तानी तानाशाह याहया खां के बड़े भाई के रूप में काम किया था .उस वक़्त के अमरीकी विदेशमंत्री हेनरी कीसिंजर ने उस दौर में पाकिस्तान की तरफ से पूरी दुनिया में पैरवी की थी. संयुक्त राष्ट्र में भी भारत के खिलाफ काम किया था . जब भी भारत ने परमाणु परीक्षण किया अमरीका को तकलीफ हुई . भारत ने बार बार पूरी दुनिया से अपील की कि बिजली पैदा करने के लिए उसे परमाणु शक्ति का विकास करने दिया जाय लेकिन अमरीका ने शान्ति पूर्ण परमाणु के प्रयोग की कोशिश के बाद भारत के ऊपर तरह तरह की पाबंदियां लगाईं. उसकी हमेशा कोशिश रही कि वह भारत और पाकिस्तान को बराबर की हैसियत वाला मुल्क बना कर रखे लेकिन ऐसा करने में वह सफल नहीं रहा .आज भारत के जिन इलाकों में भी अशांति है , वह सब अमरीकी दखलंदाजी की वजह से ही है . कश्मीर में जो कुछ भी पाकिस्तान कर रहा है उसके पीछे पूरी तरह से अमरीका का पैसा लगा है . पंजाब में भी आतंकवाद पाकिस्तानी फौज की कृपा से ही शुरू हुआ था . पूर्वोत्तर भारत में जो आतंकवादी पाकिस्तान की कृपा से सक्रिय हैं , उन सबको को पाकिस्तान उसी पैसे से मदद करता  था  जो उसे अमरीका से अफगानिस्तान में काम करने के लिए मिलता था . ऐसी हालत में अमरीका से बहुत ज्यादा दोस्ती कायम करने के पहले मौजूदा हुक्मरान को पिछले साठ वर्षों के इतिहास पर नज़र डाल लेनी चाहिए . और अमरीका से दोस्ती की पींग बढाने के पहले यह जान लेना चाहिए कि जो अमरीका भारत के बुरे वक़्त में काम कभी नहीं आया . इसलिए अमरीका की दोस्ती को एक बार फिर से समझ लेने की ज़रूरत है .

Friday, June 22, 2018

कश्मीर को सियासी तिकड़म के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए




शेष नारायण सिंह


जम्मू और कश्मीर की  गिर गयी है . महबूबा मुफ्ती अब पूर्व मुख्यमंत्री हो  गयी हैं . इस सरकार को वहां होना ही नहीं चाहिए था क्योंकि भारत के संविधान की क़सम खाकर मुख्यमंत्री बनी महबूबा मुफ्ती वास्तव में एक अलगवावादी नेता है और उनकी सहानुभूतियाँ ऐलानियाँ पाकिस्तान के साथ हैं .  इस सरकार को स्थापित करने के लिए सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार बीजेपी के नेता ,राम माधव हैं . जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह के हुकुम के बाद जम्मू-कश्मीर के बीजेपी  विधायकों ने समर्थन वापसी का फैसला लिया तो इन्हीं राम माधव को प्रेस के सामने पेश किया गया . उन्होंने जो भी तर्क दिए वे सारे देश को मालूम हैं . मुफ्ती सरकार फेल हो गयी है ,यह सबको पता है लेकिन लेकिन उस असफलता के लिए जितना महबूबा मुफ्ती ज़िम्मेदार हैं उतना ही राम माधव भी ज़िम्मेदार हैं.

दर असल कश्मीर एक ऐसा मसला है जिसमें किसी  एक पार्टी की मनमानी नहीं चलती .जब भी मनमानी होती है ,मामला बिगड़ जाता है . कश्मीर के मामले में सारे देश की राजनीतिक पार्टियों की आम राय से ही बातें  बनती हैं . कश्मीर की समस्या भी कोई  नई समस्या नहीं है . कश्मीर में आज़ादी के  मायने भी बाकी दुनिया की आज़ादी से अलग हैं . कश्मीरी  अवाम ने अपने आपको तब गुलाम माना था जब  मुग़ल सम्राट अकबर ने १५८६ में कश्मीर को अपने राज्य में मिला लिया था . उसी दिन से कश्मीरी अपने को गुलाम मानता था. और गाहे बगाहे आज़ादी की बात होती रहती थी. जब ३६१ साल बाद कश्मीर का भारत में अक्टूबर १९४७ में विलय हुआ तो मुसलमान और हिन्दू कश्मीरियों ने अपने आपको आज़ाद माना. इस बीच मुसलमानोंसिखों और डोगरा राजाओं का कश्मीर में शासन रहा लेकिन कश्मीरी उन सबको विदेशी शासक मानता रहा.अंतिम हिन्दू राजाहरी सिंह के खिलाफ आज़ादी की जो लड़ाई शुरू हुयी उसके नेताशेख अब्दुल्ला थे. शेख ने आज़ादी के पहले कश्मीर छोडो का नारा दिया.इस आन्दोलन को पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने गुंडों का आन्दोलन कहा था क्योंकि वे राजा के बड़े खैरख्वाह थे . जब सरदार पटेल ने राजा को साफ़ बता दिया कि जब तक विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत नहीं कर देंगे तब तक भारतीय सेना  तुम्हारी मदद नहीं करेगी.  कबायलियों के पोशाक में आई पाकिस्तानी सेना से सरदार  पटेल ने कश्मीर को बचा लिया था . और शेख अब्दुल्ला को देश की एक राय से वहां का वजीरे-आज़म बना दिया गया था.

तब से ही कश्मीर में देश की आम राय चलती है .जब भी कोई अरुण नेहरू या कोई जगमोहन या कोई राम माधव अपनी मर्जी चलाने की कोशिश करता है ,गड़बड़ होती है . जम्मू-कश्मीर की जब भी बात होगी ,  जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला  को भारत के पक्षधर के रूप में याद किया जाएगा .लेकिन देश में नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जवाहरलाल नेहरू को बिलकुल गैर ज़िम्मेदार राजनेता मानता  है . मौजूदा सरकार में इस तरह के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है .  नेहरु की नीतियों की हर स्तर पर निंदा की जा रही है . जवाहरलाल ने तय कर रखा था कि कश्मीर को भारत से अलग कभी नहीं होने देगें लेकिन अदूरदर्शी नेताओं को नेहरू अच्छे नहीं लगते थे . जम्मू-कश्मीर की अभी  अभी गिरी सरकार में भी ऐसे लोग थे जो  भारत के संविधान की बात तो करते हैं लेकिन भारत की एकता और अखण्डता के नेहरूवादी ढांचे को नामंजूर कर देते थे  . मुख्यमंत्री ऐसी थीं   जो पाकिस्तान परस्त अलगाव वादियों से दोस्ती के रिश्ते रखती थीं.  उस सरकार में कुछ ऐसे लोग भी थे जो १९४६-४७ में कश्मीर के राजा हरि सिंह के समर्थकों के राजनीतिक  वारिस हैं . इस  सरकार ने थोक में गलतियाँ कीं और जब मामला हाथ से निकल गया तो केंद्र सरकार से फ़रियाद की कि  जम्मू-कश्मीर के मामलों में दख़ल दो. लेकिन केंद्रीय हस्तक्षेप तभी कारगर होता  है जब  मुकामी नेता मज़बूत हो. हमने देखा है जब भी जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री कमज़ोर रहा है और केंद्रीय हस्तक्षेप से सहारे राज करने की कोशिश करता है तो  नतीजे भयानक हुए हैं . शेख अब्दुल्ला की १९५३ की सरकार हो या फारूक अब्दुल्ला को हटाकर गुल शाह को मुख्यमंत्री बनाने की बेवकूफीकेंद्र की गैर ज़रूरी दखलंदाजी के बाद कश्मीर में हालात खराब होते रहे हैं . कश्मीर में केन्द्रीय दखल के नतीजों के इतिहास पर नज़र डालने से तस्वीर और साफ़ हो जायेगी. सच्ची बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की जनता हमेशा से ही बाहरी दखल को गैरज़रूरी मानती रही है .

यह  भी समझने की कोशिश की जानी चाहिए कि जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया थाऔर भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी , आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले २५ साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओंमहात्मा गाँधी , जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था. पिछले ७०  साल के इतिहास पर एक नज़र डाल लेने से तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जायेगी.
देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडेपेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.
उस दौर में शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयीऔर शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. . अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया .उन्होंने  कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था . वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे.. नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा.. शेख गए . लेकिन और २७ मई १९६४ के ,दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थेजवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई.और कोशिश स्थगित कर  दी गयी 

कश्मीर की समस्या में इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया , शेख साहेब को रिहा किया और उन्हें सत्ता दी. . उसके बाद जब १९७७ का चुनाव हुआ तो शेख अब्दुला फिर मुख्य मंत्री बने . उनकी मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को मुख्य मंत्री बनाया गया. लेकिन अब तक इंदिरा गाँधी बहुत कमज़ोर हो गयी थीं ,. अपने परिवार के करीबी , अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, . अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो . उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया . यह कश्मीर में केंद्रीय दखल का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है . हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया .और अरुण नेहरू नाराज़ हो गए . अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया .
ऐसा बार बार हुआ है लेकिन आज बात बहुत ही संजीदा है.आज फिर कश्मीर का मामला एक दोराहे पर आ गया है . केंद्र सरकार पर ज़िम्मा है कि मामले को संभाले . इस मामले पर किसी को राजनीतिक  तिकड़म नहीं करना चाहिए और कश्मीर में भारत की शान को बनाये रखने के लिए  कोशिश की जानी चाहिए .

Sunday, June 17, 2018

जब जब महंगाई को गंभीरता से नहीं लिया गया तब तब सरकारें बदल दी गयी हैं .



शेष नारायण सिंह 
जब राजनीतिक दल  विपक्ष में होते हैं तो उनको चारों तरफ महंगाई ही दिखती है लेकिन सत्ता में आने के बाद जब उनके नेता सरकार बन जाते हैं तो महंगाई की बात अकादमिक  तरीकों से करने लगते हैं . यह नियम  अपने देश में हमेशा से ही लागू है. जब आज की सरकारी पार्टी को संसद में मुख्य  विपक्षी पार्टी होने का  रूतबा हासिल था तो इसके नेताओं के महंगाई को  फोकस में रखकर दिए गए  भाषण बहुत ही आकर्षक शब्दावली और बहुत ही सही आंकड़ों से भरपूर होते थे . लेकिन सरकार में आने के बाद वे नेता महंगाई की बात नहीं करते. उन नेताओं की कृपा से  दिल्ली के जीवन को सुर्खरू बना रहे पत्रकार भी आजकल महंगाई की बात उस तरह से नहीं करते  जैसे उस समय किया करते थे. अब अगर किसी कारण से सरकारी पार्टी के नेताओं को पत्रकार वार्ता या संसद में महंगाई पर बात करने के  लिए मजबूर होना पड़ा तो  वे महंगाई के अर्थशास्त्र की व्याख्या करने लगते हैं और  यह साबित करने की कोशिश करते  हैं कि पिछली सरकार में भी महंगाई थी और कुछ अति उत्साही नेता और उनके समर्थक पत्रकार तो यहाँ तक साबित करने की कोशिश करते हैं कि मंहगाई के मूल कारण को तलाशने के लिए जवाहरलाल  नेहरू की गलत नीतियों  को ज़िम्मेदार ठहराना पडेगा . यह देश  और समाज का दुर्भाग्य है कि राजनेता गरीब और साधारण वर्ग के लोगों की परेशानी को तर्क की शक्ति से रफा दफा करने की विलासिता करते रहते हैं .

आम तौर पर सरकारें  महंगाई पर बात करने से बचती हैं . मौजूदा सरकार भी महंगाई को गंभीरता से नहीं ले रही है. जो सरकारें गरीब आदमी की मजबूरियों को दरकिनार करती हैं ,वे चुक जाती हैं . यह गलती पिछले ज़माने में कई सरकारें कर चुकी हैं और नतीजा भोग चुकी हैं . जनता पार्टी १९७७ में सत्ता में आई थी . पार्टी क्या थी ,पूरी शंकर जी की बारात थी. भांति भांति के नेता शामिल हुए थे उसमें. इसमें दो राय नहीं कि इंदिरा गाँधी के कुशासन के खिलाफ जनता पार्टी को चुनकर  आम आदमी ने अपना राजनीतिक जवाब दिया था . लोकशाही पर मंडरा रहे खतरे को जनता ने उस वक़्त तो निर्णायक शिकस्त दी थी लेकिन सरकार से और भी बहुत सारी उम्मीदें की जाती हैं . जनता पार्टी के मंत्री लोग यह मान कर चल रहे थे कि अब इंदिरा गाँधी की दुबारा वापसी नहीं होने वाली है इसलिए वे आपसी झगड़ों में तल्लीन हो गए. उसमें शामिल समाजवादियों ने सोचा कि जनता पार्टी में भर्ती हुए जनसंघ( आज की भारतीय जनता पार्टी ) के नेताओं को मजबूर किया जाए कि वे आर एस एस से अलग हो जाएँ जबकि जनसंघ वाले सोच रहे थे कि गाँधी हत्या में फंस जाने के कारण लगे कलंक को साफ़ कर लिया जाए . हालांकि सरकारी जाँच और बाद की अदालती कार्यवाही के बाद साफ हो गया था कि महात्मा गांधी की हत्या में आर एस एस का डाइरेक्ट इन्वाल्वमेंट नहीं था लेकिन उसके सबसे बड़े नेता, एम एस गोलवलकर की गिरफ्तारी तो हुयी ही थी और उसके चलते देश की अवाम में उस संगठन के  पार्टी एक राय तो बन ही  चुकी थी. जनसंघ को आर एस एस की राजनीतिक शाखा माना जाता था . बताते हैं कि उस दौर के आर एस  एस और जनसंघ के नेताओं की इच्छा थी कि जनता पार्टी की जनमानस में स्वीकार्यता के सहारे अपने को फिर से मुख्यधारा में लाया जाए. उस वक़्त के प्रधानमंत्री , मोरारजी देसाई ने ऐलान कर दिया था कि इंदिरा राज के कूड़े को साफ़ करने के लिए उन्हें १० साल चाहिए और समाजवादी नेता लोग अपनी स्टाइल में लड़ने झगड़ने लगे थे . व्यापारी वर्ग बेलगाम हो गया . दिल्ली में तो ज्यादातर व्यापारी जनसंघ के समर्थक होते थे और कहते हैं कि उसकी  सत्ता में भागीदारी  की वजह से वे खुद ही सरकार बन गए थे और खूब मुनाफ़ा कमा रहे थे . महंगाई आसमान पर पंहुच गयी . इंदिरा गाँधी के सलाहकारों ने माहौल को ताड़ लिया और १९७९ में जब जनता पार्टी टूटी तो महंगाई को ही मुद्दा बना दिया . उस साल प्याज की कीमतें बहुत बढ़ गयी थीं और इंदिरा गांधी के चुनाव प्रबंधकों ने १९७७ के फरवरी माह और १९७९ के नवम्बर माह के प्याज के दामों को एक चार्ट में डालकर पोस्टर बनाया और चुनाव में झोंक दिया . महंगाई जनता की दुखती रग थी और उसने नौकर बदल दिया . जनता पार्टी वाले निकाल बाहर किये गए और इंदिरा गाँधी की सत्ता में वापसी हो गयी. १९८० में चुनाव हार कर लौटे जनता पार्टी के नेता कहते पाए जाते थे कि नयी कांग्रेसी सरकार प्याज के छिलकों के सहारे बनी है और प्याज के छिलकों जैसे ही ख़त्म हो जायेगी. ऐसा कुछ नहीं हुआ और सरकार चलती रही जबकि जनता पार्टी के नेता लोग तरह तरह की पार्टियां बनाते रहे और सब जीरो होने के कगार पर पंहुच गए. 

उसके बाद की सरकारों ने भी महंगाई को सही तरीके से हल करने की कोशिश नहीं की.  जब इंदिरा गांधी की वापसी के बाद सरकार ने काम सम्भाला तो उनके  कुछ मूर्ख मंत्री और नेता कहते पाए जाते थे कि महंगाई अच्छी बात है. इससे पता लगता है कि देश तरक्की कर रहा है. बाद की ज़्यादातर सरकारें महंगाई को तर्कशक्ति से ठीक करने पर ही अमादा रहीं और आम जन  बढ़ती कीमतों की चक्की के नीचे पिसता रहा ,पिसता रहा .
डॉ मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यू पी ए  सरकारें भी महंगाई को काबू करने में नाकाम रही हैं .लेकिन एक फर्क है . जनता पार्टी के वक़्त में महंगाई इसलिए बढ़ी थी कि सरकार में आला दर्जे पर बैठे नेता लोग गैरजिम्मेदार थे.उनकी बेवकूफी की नीतियों की वजह से महंगाई बढ़ी थी लेकिन यू पी एम के दौर में  मामला बहुत गंभीर था. उस  सरकार में बहुत सारे ऐसे मंत्री थे जिनपर महंगाई बढाने वाले औद्योगिक घरानों के लिए काम करने का आरोप लगता रहता था. महंगाई के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार ईंधन की कीमतों में हो रही वृद्धि होती है . आम आदमी के लिए सबसे दुखद बात यह है कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से जिन वर्गों को सबसे ज्यादा लाभ होता है उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत न तो कांग्रेस के किसी मंत्री में थी और  न ही  उस वक़्त की मुख्य  विपक्षी पार्टी के किसी नेता में . आज भी स्थिति वही है . राहुल गांधी तो ऐलानियाँ आरोप लगाते  हैं कि कुछ औद्योगिक समूहों को  लाभ पंहुचाने के लिए सरकार की हर नीति को बनाया जा रहा  है . हालांकि यह भी सच है कि उनकी पार्टी की अगुवाई वाली सरकारों के समय भी उन्हीं औद्योगिक घरानों को लाभ पंहुचाने के लिए  सारे उपक्रम किये जाते थे लेकिन आज की सरकार के सामने उस इतिहास के पीछे छुपने का विकल्प नहीं है .महंगाई को  कम करने के लिए फ़ौरन से पेशतर कोशिश करनी पड़ेगी वर्ना देश के गरीब और मध्य वर्ग की त्योरियों में बल साफ़  नज़र आने लगे  हैं . अगर आज के सत्ताधीशों को  सत्ता में २०१९ के  बाद भी आना  है तो महंगाई को काबू करने की ईमानदार कोशिश करनी पड़ेगी .
आज की स्थिति यह है कि महंगाई कमरतोड़ है और उस से निजात दिलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है . अगर ऐसा तुरंत न किया गया तो मौजूदा सरकार का भी वही हाल होगा जो १९७९ में जनता पार्टी की सरकार का हुआ था.देश का दुर्भाग्य यह भी है कि निजी लाभ के चक्कर में रहने वाले नेताओं से ठुंसे हुए राजनीतिक स्पेस में जनता की पक्षधर कोई जमात नहीं है . महंगाई के खिलाफ राजनीतिक आन्दोलन ही नहीं है . २००९ से लेकर २०१४ तक महंगाई के खिलाफ आन्दोलन की अगुवाई कर रही बी जे पी के लगभग सभी बड़े नेता आज सरकार में हैं.  बीजेपी के नेताओं को चाहिए वे उन्हीं पूंजीपतियों की हित साधना न करें हीं जिनकी हित साधना में लगकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक हैसियत गँवा दी है . गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस राजनीति के नाम पर १९८९ से  तीसरे मोर्चे के नाम पर गाहे ब गाहे संगठित होकर  क्षेत्रीय पार्टियों के नेता भी केंद्र की सत्ता में आते रहे हैं . उनके बारे में तो आम धारणा यह है कि वे शुद्ध रूप से लूट मचाने की नीयत से ही दिल्ली आते हैं . वे कभी कांग्रेस के साथ होते हैं तो कभी बी जे पी के साथ लेकिन एजेंडा वही लूट खसोट का ही होता है . स्पेक्ट्रम वाली लूट जिस पार्टी के नेता ने की थी उसकी पार्टी उन दिनों कांग्रेस के साथ थी  लेकिन कभी यही लोग बी जे पी के ख़ासम ख़ास हुआ करते थे. अभी कुछ  साल पहले जिन नेताओं के पास रोटी के पैसे नहीं होते थे वे आज अरबों के मालिक हैं . अफ़सोस की बात यह है कि इन बे-ईमान नेताओं के बारे में कोई निजी बातचीत में भी दुःख नहीं जताता . इस तरह के नेता दिल्ली के लुटियन बंगलो ज़ोन की हर सड़क पर विराजते हैं.  नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालने के बाद कहा  था कि वे दिल्ली को नहीं जानते थे . क्या वे इन लोगों को जान पाए हैं कि नहीं और अगर जान पाए हैं तो इनकी लालच भरी हित साधना पर काबू करके आम जनता को मुंह बाए खडी महंगाई से कब मुक्ति दिलाएंगे. महंगाई पर काबू करना बहुत ही ज़रूरी है .

Wednesday, June 13, 2018

अखिलेश यादव का ' त्याग ' उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मुश्किल बढ़ा सकता है .



शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली ,१२ जून .समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने २०१९ में बीजेपी की जीत के सपने को एक ज़बरदस्त झटका दिया है . पिछले कुछ हफ़्तों में उत्तर प्रदेश में चार महत्वपूर्ण उपचुनाव हुए हैं . सभी चुनावों में बीजेपी को अखिलेश यादव की रणनीति के सामने हार का मुंह देखना पड़ा है . चारों ही उपचुनाव महत्वपूर्ण माने जाते हैं . गोरखपुर और फूलपुर में तो राज्य के मुख्यमंत्री ,योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की हार ही मानी जा रही है जबकि कैराना और नूरपुर में हिंदुत्व की राजनीति के कमज़ोर पड़ने के संकेत आ रहे हैं . उन उपचुनावों में हार के बाद बीजेपी के आला नेता इस उम्मीद में थे कि यह झटका अस्थाई है, २०१९ में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का समझौता नहीं होगा . इमकान था कि मायावती और अखिलेश यादव के बीच सीटों की संख्या को लेकर विवाद हो जाएगा और दोनों पार्टियां एकजुट होकर बीजेपी का मुकाबला नहीं करेंगी. अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी विरोधी वोटों के बिखराव से नरेंद्र मोदी के अभियान को फायदा होगा और बेडा पार हो जाएगा .

अखिलेश यादव के बयान के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी विरोधी वोटों के बिखराव की सम्भावना अब बहुत ही कम हो गयी है . मैनपुरी की एक सभा में अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो कुछ सीटों का त्याग करके भी सपा-बसपा की एकता को बनाए रखा जाएगा. और २०१९ में राज्य में बीजेपी की हार सुनिश्चित की जायेगी .अखिलेश यादव के इस बयान के साथ ही उत्तर प्रदेश में संयुक्त विपक्ष की सम्भावना बहुत बढ़ गयी है .

बीजेपी विरोधी ताक़तों की एकता में कमजोरी तलाश रही सत्ताधारी पार्टी को मायावती के उस बयान से कुछ उम्मीद बढ़ी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि बहुजन समाज पार्टी किसी भी अन्य पार्टी से उसी हालत में सीटों का तालमेल करेगी जब उसके हिस्से में आने वाली सीटों की संख्या सम्मानजनक हो. मायावती के इस बयान के बाद बीजेपी वैकल्पिक रणनीति पर काम करने लगी थी .पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में बीजेपी के कार्यकर्ता बसपा सुप्रीमो के बयान की प्रतियां बांटते देखे भी गए थे लेकिन अखिलेश यादव ने अपने हिस्से की सीटों की कुर्बानी की बात करके बीजेपी के हलकों में फिर से निराशा के भाव जगा दिए हैं.

अखिलेश यादव ने यह कहकर कि राज्य की जनता एकजुट हो गयी है और राजनीतिक पार्टियों के पास एक साथ होकर चुनाव लड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. एक राजनीतिक सन्देश भी दिया है . अखिलेश यादव ने निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद को अपने साथ कर लिया है और उनके बेटे को गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा उम्मीदवार बनाकर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के घर में उनको शिकस्त दी थी. अब खबर यह है कि संजय निषाद के साथ सपा गठबंधन बना रहेगा और निषाद पार्टी के अध्यक्ष ने तो यहाँ तक कह दिया है कि उनकी पार्टी को जौनपुर से भी टिकट चाहिए . उन्होंने जौनपुर से अपनी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में धनञ्जय सिंह के नाम की घोषणा भी कर दी है .

अखिलेश यादव ने निषाद पार्टी के अलावा , कांग्रेस और अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल को भी साथ ले लिया है . कैराना उपचुनाव में हालांकि उमीदवार मायावती की पसंद की थी लेकिन उसको राष्ट्रीय लोक दल के चुनाव निशान दिया गया था . इस तरह अगर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में ,अपना दल और ओम प्रकश राजभर की पार्टी के साथ गठबंधन कर चुकी बीजेपी को अखिलेश-मायावती गठबंधन से मुश्किलें पेश आ सकती हैं . पिछले दिनों ओम प्रकाश राजभर भी बीजेपी से नाराज़ देखे गए हैं. उनकी नाराज़गी का कारण ऐसा है जिसके गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया था . उन्होंने कहा था कि अगर पिछड़ी जाति के नेता, केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री बनाया गया होता तो बीजेपी के हाथों फूलपुर और गोरखपुर में उतनी अपमानजनक हार न लगी होती. उनका यह तर्क अगर आगे बढ़ाया गया तो बीजेपी को ज़बरदस्त नुकसान हो सकता है .

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में २०१९ के लोकसभा के चुनाव के लिए जो मोर्चेबंदी तैयार हो रही है उसने सताधारी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं . पार्टी के छुटभैया नेताओं के पार्टी की कमियाँ गिनाने वाले छिटपुट बयानों के मद्दे नजर मोदी के जादू के कमज़ोर होने की संभावना जोर पकड़ रही है . बीजेपी के लिए जीत की संभावना का एक ही सहारा है . ज्यादातर नेता कहते हैं कि उनके पास जीत की निश्चित योजना है और बीजेपी के तत्कालीन महामंत्री और वर्तमान अध्यक्ष , अमित शाह ने जिस तरह से 2014 में उत्तर प्रदेश में जीत का झंडा फहराया था,उसी तरह इस बार भी सफलता उनकी पार्टी की ही होगी.