Tuesday, April 17, 2018

देशबंधु के साठ साल



शेष नारायण सिंह 

मेरी ज़िंदगी में बहुत सारे गलत फैसले हुए हैं , इसकी वजह से मुझे बार बार पछताना पड़ा है लेकिन बहुत सारे ऐसे फैसले हुए हैं जिन्होंने मेरी ज़िंदगी को एक सार्थकता दी है . देशबंधु के स्टाफ का सदस्य बनना मेरे जीवन का एक ऐसा ही फैसला है . यहाँ आकर मुझे लगता है कि मैंने इस अखबार को १९७८ में क्यों नहीं ज्वाइन कर लिया था जब मेरे ऊपर हर तरह के दबाव थे. देर से ही सही लेकिन फैसला सही लिया क्योंकि बहुत देर से मैं देशबंधु का सदस्य बना . आज इतने वर्षों बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि परिवार में आ गया हूँ . छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जहां कहीं भी लोगों को पता लगता है कि मैं देशबंधु में काम करता हूँ, मुझे फ़ौरन सम्मान मिलता है . इस अख़बार में काम करने की शर्तें थोड़ी मुश्किल हैं .मुझे इस अखबार से छुट्टी नहीं मिलती , चौबीसों घंटे की नौकरी है . मैं कहीं भी रहूँ ड्यूटी पर ही माना जाता हूँ . मैं यहाँ से इस्तीफा नहीं दे सकता . मेरे सम्पादक ने मुझे चेतावनी दे रखी है कि मेरे पास अखबार छोड़ने का विकल्प नहीं हैं .
पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी संगठन के सदस्य के रूप में लगता है कि जीवन यहीं बिताया जाए. ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि जब भी कुछ अच्छा लिखता हूँ तो संस्था के सबसे बड़े सदस्य ललित सुरजन फोन करके बताते हैं कि शेषजी बहुत अच्छा लिखा है . यह मुझे अच्छा लगता है . लेकिन उससे भी अच्छा तब लगता है जब मैं कोई बेकार आलेख लिखता हूँ तो मुझे किसी भी सम्पादक से यह सन्देश नहीं मिलता कि क्या बकवास लिखी है. ललित सुरजन की तारीफ़ का मतलब क्या होता है यह वही लोग जानते हैं जो ललित जी से वाकिफ हैं . ललित जी की बेटियां विदुषी और विनम्र हैं ,मेरे ग्रुप सम्पादक राजीव रंजन श्रीवास्तव ज़रूरत से ज्यादा भले आदमी हैं. मैं कई बार सोचता हूँ कि बिना सच से समझौता किये , बिना किसी राजनीतिक पार्टी की जयजयकार किये , बिना किसी सेठ साहूकार से मदद लिए यह अखबार कैसे चलता है लेकिन समझ में आ जाता है कि देशबंधु के संस्थापक स्वर्गीय मायाराम सुरजन ने पत्रकारिता के बुलंद मानकों का जो गुम्बद बना दिया है ,उसी की रोशनी में यह आज भी चमक रहा है , आगे भी चमकता रहेगा . मायाराम सुरजन ने कभी भी पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों से समझौता नहीं किया . १९९३ -२००३ के बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने कहीं लिखा है कि वे एक बार स्व मायाराम सुरजन को राज्य सभा का सदस्य बनाने का प्रस्ताव लेकर गए थे लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया और कहा कि मुझे मेरा काम करने दो , राजनीति में जाना पत्रकार को शोभा नहीं देता. जब आज के बड़े पत्रकारों को दिल्ली के राजाधिराजों के दरबारों में सरकारी सुविधाओं के लिए जुगाड़ करते देखता हूँ तो लगता है कि मेरे अखबार के सम्पादक वास्तव में पत्रकारिता के मानदंड थे. आज देशबंधु की स्थापना के साठ साल पूरे हुए और इस पूरे दौर में यह कभी झुका नहीं .
बहुत बहुत बधाई देशबंधु परिवार के हर सदस्य को जो यहाँ कर्मचारी नहीं ,पार्टनर होता है

Sunday, April 8, 2018

नर्मदा परिक्रमा के बाद की राजनीति--दिग्विजय सिंह हिन्दू भी हैं और धर्म निरपेक्ष भी



शेष नारायण सिंह
देश की राजनीति को  हिंदू केन्द्रित  करने की आर एस एस की कोशिश बाबरी मस्स्जिद-रामजन्मभूमि विवाद के साथ शुरू हो गयी थी. धीरे धीरे ही सही उनको सफलता मिल रही थी. दो सीट वाली बीजेपी १९८९ में वी पी सिंह की सरकार बनवाने में सफल हो गयी और आज २२ राज्यों में बीजेपी या उनके साथियों की सरकार है . केंद्र में भी पूर्ण बहुमत वाली  सरकार बन चुकी है .  बीजेपी की इस उन्नति में उनकी हिंदूवादी राजनीति का भारी योगदान है . जब बाबरी मस्जिद- रामजन्मभूमि विवाद शुरू हुआ तो हिन्दू धर्म के सबसे बड़े प्रतीक, भगवान राम को अपना बनाकर कांग्रेस को राम विरोधी पार्टी के रूप में पेश करने में बीजेपी और विश्व हिन्दू परिषद् ने   बड़ी सफलता पाई . उस वक़्त के कांग्रेस के नेताओं में ने बीजेपी/आर एस एस को  उनकी इस मंशा में  कामयाब होने की पूरी छूट दे रखी थी. यह अलग बात है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने  बाबरी मस्जिद का ताला भी खुलवाया और वहां शिलान्यास भी करवाया  लेकिन इसका श्रेय वी एच पी और आर एस एस ने  झटक लिया . दावा किया गया कि आर एस एस के दबाव में राजीव  गांधी ने काम किया है. इस बीच लगातार कांग्रेस को हिन्दू विरोधी पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा. जब से चौबीस घन्टों के टीवी  समाचार शुरू हुआ  तब  से एक नया खेल शुरू हो गया है . हर डिबेट में  दो तीन दाढी वाले मौलाना बैठाकर उनके हवाले से मुसलमानों को ही हिन्दू विरोधी  बताने की साज़िश चल रही है . अब तक कांग्रेस की लीडरशिप ने  इसको रोकने की कोशिश नहीं की . यह सब चलता रहा और कांग्रेस हिन्दू विरोधी पार्टी के रूप में रंगी जाती रही . एक ऐसा मुकाम भी आया जब बीजेपी,आर एस एस और कुछ वफादार पत्रकारों की कोशिश से ऐसा माहौल बना दिया गया कि जो बीजेपी के विरोध में होगा वह देशद्रोही  भी होगा और हिन्दू विरोधी भी . नतीजा सामने  है . हिन्दू पार्टी के रूप में बीजेपी दबादब चुनाव जीतती जा रही है और कांग्रेस के नेताओं ने यह बताने की कोशिश भी नहीं की कि  जो बीजेपी विरोधी है वह हिन्दू  भी हो सकता है और  सेकुलर भी होता है . कांग्रेस में जिस एकाध नेता ने यह बात स्थापित करने की  कोशिश की कि धर्म निरापेक्ष होने के साथ साथ  साम्प्रदायिकता विरोधी और सनातनी  हिन्दू भी हुआ जा सकता है ,आर एस एस का विरोद्ध हिन्दू विरोध   नहीं है ,उसको कांगेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के आसपास जमे लोगों ने हूट कर लिया और कहा कि यह उस नेता के निजी विचार हैं . बात बदलना तब शुरू  हुई जब  कांग्रेस के बड़े नेता, ए के अंटनी ने एक रिपोर्ट दी जिसमें कहा   गया  कि कांग्रेस के बारे में यह मशहूर हो  चुका  है कि वह अल्पसंख्यकों की पार्टी है और हिन्दू विरोधी है .लेकिन इस रिपोर्ट के आने तक बहुत  नुक्सान हो चुका था. कांगेस के अन्दर मौजूद धर्मनिरपेक्ष नेताओं को २४ अकबर रोड में विराजने वाली चौकड़ी हाशिये पर पंहुचा चुकी थी और यहाँ मौजूद नेता लोग जिन राज्यों  में कांग्रेस की सरकारें बच गयी थीं ,वहां के मुख्यमंत्रियों का आर्थिक शोषण कर रहे थे. धर्म निरपेक्षता की बात करने वालों को उनके निजी विचार वाले खांचे में फिट किया जा चुका था. कांग्रेस के महासचिव् दिग्विजय सिंह को हाशिये पर लाने की कोशिश को इस कसौटी पर कसा जा सकता है . ऐसे  और भी लोग थे .
जब उत्तर प्रदेश के २०१७ के विधानसभा चुनावों में  कांग्रेस पार्टी का सफाया हो गया तो  सोनिया गांधी ने दखल दिया  और कहा कि उनकी पार्टी को मुसलमानों की पार्टी के रूप में चित्रित कर दिया  गया है . उसके बाद की कांग्रेसी रणनीति में बदलाव नज़र आने लगा. गुजरात चुनाव में राहुल गांधी मंदिरों में जाने लगे. बीजेपी/आर एस एस वालों ने खूब हल्ला मचाया कि राहुल  गांधी कभी मंदिरों में नहीं जाते आज वोट के लिए जा रहे हैं . टीवी डिबेट  में मौजूद इन नेताओं  की चिंताओं को करीब से देखने का मौक़ा मिला तो दर्द समझ में आया लेकिन कांग्रेस अपने आपको हिन्दू विरोधी पार्टी के  सांचे ने निकालने की कोशिश करती रही.  कांग्रेस  के नेतृत्व ने एक बार फिर साबित कर दिया हिन्दू होने की साथ साथ सेकुलर भी हुआ जा सकता है . गुजरात चुनाव में बीजेपी के प्रवक्ता और उनके पत्रकार  कांग्रेस को हिन्दू  विरोधी पार्टी नहीं साबित कर सके. नतीजा यह हुआ कि अन्य मुद्दे चुनाव में   बहस में आये और गुजरात  चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा . कर्नाटक के चुनाव में भी राहुल गांधी मंदिरों के फेरे लगा रहे हैं और बीजेपी वाले उनको हिन्दू विरोधी साबित करने में अब तक नाकाम रहे  हैं. कांग्रेस की  किस्मत में अच्छी बात यह है कि  बीजेपी प्रवक्ताओं की तरफ से राहुल गांधी को मुस्लिम विरोधी साबित करने की  कोशिश भी अब तक सफल नहीं हुई . मुसलमानों ने स्वीकार कर लिया है कि उनके धार्मिक मसाइल से नेता दूर ही रहें तो अच्छा है . उनको चैन से रहने दें और धर्म निरपेक्ष राजनीति को  महत्व देते रहें ,यही काफी है . क्योंकि यह सबको मालूम है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति से  देश और समाज की तरक्की होती है और साम्प्रदायिक राजनीति से देश को नुक्सान होता है . महात्मा गांधी और नेहरू की कांग्रेस की यही सीख  है और जब जब कांग्रेस इस सीख से विचलित हुई है ,पार्टी चुनाव हार गयी है.   देश के सत्तर साल के इतिहास में जो भी नेता मुसलमानों का   शुभचिंतक हुआ  है , वह  हिन्दू भी था और  साम्प्रदायिकता विरोधी भी रहा है . इस सन्दर्भ में जवाहार लाल नेहरू,हेमवती नंदन बहुगुणा और मुलायम सिंह का नाम लिया जा सकता है .
देश के मौजूदा नेताओं में इस श्रेणी में  दिग्विजय सिंह का नाम लिया जा सकता  है .उनको  आर एस एस ने हिन्दू विरोधी सिद्ध करने के लिए  कोई कसर नहीं छोडी है लेकिन उन्होंने सारा खेल पलट दिया है . ३३०० किलोमीटर की नर्मदा  परिक्रमा करके उन्होंने सिद्ध कर दिया  है वे आर एस  एस के हर नेता से ज्यादा हिन्दू हैं और धर्मनिरपेक्ष तो हैं ही.  अपनी नर्मदा परिक्रमा के दौरान दिग्विजय सिंह ने किसी भी राजनीतिक विषय पर बात करने से परहेज किया  है लेकिन धर्म के दर्शन पर बेझिझक बात कर रहे थे. उनका कहना है कि हिंदू धर्म भारत का प्राचीन धर्म है जबकि हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है जिसका प्रतिपादन 1924 में वीडी सावरकर ने अपनी किताब 'हिंदुत्व में किया था। सावरकर ने  हिंदुत्व को  राजनीतिक अभियान का मंच बनाने की कोशिश की थी।सावरकर ने हिंदुत्व की परिभाषा भी दी। उनके अनुसार -''हिंदू वह है जो सिंधु नदी से समुद्र तक के भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि माने। इस विचारधारा को ही हिंदुत्व नाम दिया गया है। ज़ाहिर है हिंदुत्व को हिंदू धर्म से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन हिंदू धर्म और हिंदुत्व में शाब्दिक समानता के चलते पर्यायवाची होने का बोध होता है। इसी भ्रम के चलते कई बार सांप्रदायिकता के खतरे भी पैदा हो जाते हैं। धर्म को सम्प्रदाय मानने की गलती से ही संघर्ष और दंगे फसाद के हालात पैदा होते हैं और अगर हमारी आजादी की लड़ाई के असली मकसद को हासिल करना है तो उदारवादी राजनीति के नेताओं को चाहिए वे आम आदमी को धर्म के असली अर्थ के बारे में जानकारी देने का अभियान चलाएं और लोगों को जागरूक करें। ऐसा करने से आजादी की लड़ाई का एक अहम लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा .
दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा को जो लोग करीब से देख रहे हैं उनका  दावा  है कि वे राजनीति और धर्म को घालमेल करने की कोशिशों को सफल नहीं होने देंगे . यात्रा आज खतम हो रही है लेकिन मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री दहशत में हैं क्योंकि दिग्विजय सिंह ने कह दिया है कि अब वे राजनीतिक यात्रा शुरू करेंगे.अपनी नर्मदा परिक्रमा यात्रा शुरू करने के पहले सितम्बर २०१७ में दिग्विजय सिंह ने इस रिपोर्टर से एक बातचीत में बताया था कि उनकी यात्रा पूरी तरह से आध्यात्मिक है ,और उन्होंने अपनी पार्टी  को लिखकर दे दिया है कि अप्रैल २०१८ तक उनको कांग्रेस के किसी भी  कार्य की ज़िम्मेदारी से  मुक्त रखा जाए. उन्होंने बताया था कि वर्षों पहले  उनके  आध्यात्मिक गुरु ने उनसे कहा था कि समय निकालकर माँ नर्मदा की परिक्रमा करोइसलिए उन्होने अपनी पत्नी के साथ इस यात्रा पर जाने का निर्णय लिया है.
दिग्विजय सिंह अब अपने आपको एक बड़े हिन्दू के रूप में स्थापित कर   चुके हैं .अगर अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान वे पहले जैसे ही धर्मनिरपेक्ष बने रहते हैं तो उनको हिन्दू विरोधी साबित कार पाना बीजेपी के लिए बहुत मुश्किल होगा. और यह देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति को ताकत देगा 

मध्यप्रदेश की राजनीति में नर्मदा नदी की बदहाली मुद्दा बनने वाली है .



शेष नारायण सिंह


कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा की धमक भोपाल में महसूस की जा रही है . हालांकि दिल्ली के मीडिया ने इस यात्रा को आम तौर पर नज़रंदाज़ ही किया है लेकिन भोपाल के वल्लभ भवन के अधिष्ठाता को इस यात्रा का महत्व मालूम है . मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मालूम है कि उन्होंने नमामि देवि नर्मदे यात्रा करके जो मीडिया में  माहौल बनाया था उसकी सच्चाई सामने आने वाली है क्योंकि दिग्विजय सिंह ने ऐलान कर दिया  है कि जब नौ अप्रैल को उनकी आध्यात्मिक यात्रा का संकल्प पूरा होगा ,उसके बाद वे ओंकारेश्वर महादेव में जलाभिषेक करके राजनीतिक यात्रा पर निकल जायेगें .अपनी नर्मदा परिक्रमा यात्रा शुरू करने के पहले सितम्बर २०१७ में दिग्विजय सिंह ने देशबन्धु से एक बातचीत में बताया था कि उनकी यात्रा पूरी तरह से आध्यात्मिक है ,और उन्होंने अपनी पार्टी  को लिखकर दे दिया है कि अप्रैल २०१८ तक उनको कांग्रेस के किसी भी  कार्य की ज़िम्मेदारी से  मुक्त रखा जाए. उन्होंने कहा था कि इस यात्रा में कोई भी राजनीतिक बयान नहीं दिया जायेगा ,किसी तरह की बाईट नहीं दी जायेगी और किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम पर टिप्पणी नहीं की जायेगी . उन्होंने बताया था कि वर्षों पहले  उनके  आध्यात्मिक गुरु ने उनसे कहा था कि समय निकालकर माँ नर्मदा की परिक्रमा करोइसलिए उन्होने अपनी पत्नी के साथ इस यात्रा पर जाने का निर्णय लिया है .
यात्रा अब पूरी होने वाली है . इस यात्रा के बारे में दिल्ली में भी बहुत उत्सुकता है. जब भी किसी पत्रकार साथी ने वरिष्ठ पत्रकार और दिग्विजय सिंह की पत्नी ,अमृता  राय से पूछा कि यात्रा के अब तक के क्या अनुभव हैं तो उन्होंने कहा  कि वर्णन नहीं किया जा सकताअनुभव करके ही देखा जा सकता है. कुछ पत्रकारों ने यह चुनौती स्वीकार की और एकाध दिन उनकी यात्रा में शामिल होकर देखा . कुछ उम्रदराज़ पत्रकारों ने भी इस चुनौती को स्वीकार किया और दो दिन नर्मदा परिक्रमा में  शामिल हुए . तीसरे दिन पाँव में फफोले लेकर वापस  दिल्ली आ गए . लेकिन यह सच है कि उस यात्रा में शामिल होना किसी भी  पत्रकार के लिए अच्छा अनुभव  था.  बिना किसी ताम झाम के सिवनी जिले में परिक्रमा करते दिग्विजय सिंह के साथ राह चलते लोग जुड़ रहे थे. बातें कर रहे थेअपनी समस्याएं बता रहे थे और उनकी पत्रकार पत्नी उसको  याद करती चल रही  थीं. तीन हज़ार किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी हो चुकी थी और इस दौरान बहुत सारी सच्चाई पब्लिक डोमेन में  आ चुकी थी . इसी बात को शिवराज सिंह की सरकार ने महसूस किया और दिग्विजय सिंह की नौ अप्रैल के बाद किसी तारीख को संभावित राजनीतिक यात्रा की धार को कम करने के लिए पेशबंदी शुरू कर दी.

यह जानना दिलचस्प होगा कि मध्यप्रदेश के  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने भी नर्मदा यात्रा किया था . हेलीकाप्टर से जगह जगह गए थे लाखों रूपये खर्च करके बनाए गये पंडालों में सरकारी तामझाम के साथ स्वागत हुआ था और दावा किया गया था कि नर्मदा नदी के किनारे  छः करोड़ पौधे लगा दिए गए हैंबालू की अवैध खुदाई रोक दी गयी है और नर्मदा का पुराना  गौरव बहाल कर दिया गया है . रेत माफिया पर काबू कर लिया गया है .लेकिन दिग्विजय सिंह की यात्रा ने मध्यप्रदेश सरकार के इस दावे की पोल खोल दी . कहीं कोई पेड़ नहीं लगाया गया है . अवैध खनन पूरी तरह से चल रहा है और नर्मदा की रेत के ज़ालिम डाकू पूरी तरह से अपने काम पर लगे हुए  हैं.  नर्मदा को तबाह करने वाले ज़्यादातर लोग माफिया हैं और निर्द्वंद घूम रहे हैं .
यह सच्चाई  हर उस  व्यक्ति को मालूम है जो नर्मदा के बारे में जानने के लिए उत्सुक है . यह जानकारी स्वामी नामदेव त्यागी उर्फ़ कम्यूटर बाबा और योगेन्द्र महंत के पास भी थी. इन दोनों ने नर्मदा घोटाला रथ यात्रा की योजना बनाई थी . इस यात्रा का उद्देश्य था कि नर्मदा  नदी के किनारे पौधे लगाने का जो दावा राज्य सरकार ने किया था ,वह गलत था और उसमे भारी घोटाला हुआ था . यह  दोनों ही संत इसको उजागर करना चाहते थे . नर्मदा जी में बेहिसाब   बालू की खुदाई से  नर्मदा और पर्यावरण को हो रहे नुक्सान के बारे में देश और दुनिया को जानकारी देना भी इन संतों का लक्ष्य था. इसकी बाकायदा योजना बन गयी थी और यात्रा शुरू ही होने वाली थी . लेकिन  सरकार ने ज़बरदस्त हस्तक्षेप किया जिसके कारण प्रस्तावित   घोटाला यात्रा को  इस दोनों ही महात्माओं ने रद्द कर दिया है. यात्रा रद्द इसलिए कर दी गयी है कि यह दोनों ही महात्मा अब मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह की सरकार का हिस्सा हैं. नर्मदा के कल्याण के लिए सरकार के काम की तारीफ़ करना इनकी ड्यूटी बन गयी है.  कम्यूटर बाबा ने बताया कि अब यात्रा नहीं निकाली जायेगी क्योंकि शिवराज सिंह ने संत समुदाय को सम्मान दे दिया है . इन स्वामी जी के अलावा और भी साधू हैं जो नर्मदा के घोटालों को उजागर करने वाले थे . लेकिन उन लोगों ने भी सरकार की कमियों को पब्लिक डोमेन में लाने का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है  क्योंकि उनको भी शिवराज सिंह की सरकार ने सम्मानित कर दिया है .
आखबारों में खबर है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने पांच बाबाओं को अपनी सरकार के राज्यमंत्री का दर्ज़ा दे दिया  है. सरकार ने दावा किया है कि समाज के हर वर्ग के लोगों को राज्य के हित में काम करने के  अवसर देने के लिए ऐसा किया गया है .जिन  संतों को राज्यमंत्री पद का दर्ज़ा दिया गया है वे सभी किसी न किसी रूप में नर्मदा नदी को उजाड़ने की सरकार की  कोशिश से जुड़े बताये जाते हैं. राज्यमंत्री का दर्ज़ा पाने वालों  में कम्यूटर बाबा,भैय्यूजी महराज,नर्मदानंद जी ,हरिहरानन्द जीऔर पंडित योगेन्द्र महंत शामिल हैं . इन पाँचों संतों को एक कमेटी का सदस्य बनाया गया है जिसका गठन नर्मदा के संरक्षणस्वच्छता और वानिकी के लिए किया गया है . इस कमेटी के सदस्यों को राज्यमंत्री का दर्ज़ा दे दिया गया है.  इसी साल के अंत  में चुनाव होने हैं  और वे चुनाव मध्यप्रदेश की गाँवों और कस्बों में  ही लडे जायेंगे. दिल्ली के मीडिया  संस्थानों का उन गाँवों में कोई नाम भी नहीं जानता लेकिन दावा किया गया है कि इन  बाबाओं को लोग वहां जानते हैं ,इनका आम जन पर थोड़ा बहुत प्रभाव है . शिवराज सिंह चौहान को मालूम है कि दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा यात्रा ने उनके नामामि देवि नर्मदे यात्रा से संभावित चुनावी लाभ को कम कर दिया है . अब इन पांच संतों को नर्मदा क्षेत्र के एक सौ से  अधिक चुनाव क्षेत्रों में भेजकर दिग्विजय सिंह की प्रस्तावित राजनीतिक यात्रा से शिवराज सिंह की राजनीति को संभावित नुक्सान को कंट्रोल करने की कोशिश की जायेगी .  

इन संतों का प्रभाव समझने के लिए इनके बारे में कुछ जानकारी लेना उपयोगी होगा. स्वामी नामदेव उर्फ़ कम्यूटर बाबा हमेशा एक लैपटाप के साथ देखे जाते हैं. इन्होने अभी कुछ दिन पहले घोषणा की थी कि वे मध्यप्रदेश में नर्मदा के किनारे यात्रा करेंगे और सरकार की नाकामियों और घोटालों को उजागर करेंगे. इनके अभियान से सम्बंधित एक वीडियो आजकल खूब प्रचारित हो रहा है जिसमें यह बाबा जी और योगेन्द्र महंत के बयान भी हैं .दर्ज़ा प्राप्त मंत्री होने के बाद उन्होंने अपनी नर्मदा यात्रा की योजना को रद्द कर दिया  है. दर्ज़ा प्राप्त मंत्रियों में एक अन्य हैं ,भैय्यूजी महराज . इनका असली नाम उदयसिंह देशमुख है .आप एक संपन्न ज़मींदार परिवार से हैंखूबसूरत हैं,   पहले माडलिंग भी कर चुके हैं, . इंदौर के एक आलीशान आश्रम में रहते हैं मर्सिडीज़ कार में चलते हैं  . एक कुशल कम्युनिकेटर हैं  . एक और दर्जाप्राप्त  हैं, स्वामी हरिहरानंद जी . इन्होने  दिसंबर २०१६ में नमामि देवि नर्मदे सेवा यात्रा किया था . अमरकंटक से अलीराजपुर पैदल गए थे .जगह जगह भाषण भी दिया था. इस इलाके में इनका अच्छा प्रभाव बताया जाता है . पंडित योगेन्द्र महंत को भी राज्यमंत्री का दर्ज़ा दे दिया गया है .यह भी कम्यूटर बाबा के साथ शिवराज सरकार के कथित घोटालों का पर्दाफ़ाश करने वाले थे लेकिन अब दर्ज़ा प्राप्त वाले खेल में लपेट लिए गए हैं . इनका आरोप था कि शिवराज सिंह चौहान खनन माफिया को सहयोग देकर मां नर्मदा को तबाह कर  रहे हैं .पांचवें संत हैं नर्मदानंद जी महराज. यह हनुमान जयन्ती और राम नवमी के दिन जूलूस निकालने के  विशेषज्ञ हैं .

राजनीतिक सवाल यह है कि क्या यह लोग दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा के बाद बनी उनकी राजनीतिक हैसियत को छोटा कर पायेंगें . इसके बारे में पड़ताल की कोशिश बड़े दिलचस्प तथ्य  तक  पंहुचाती है. भोपाल स्थित वरिष्ठ पत्रकार अरुण दीक्षित से इस बारे में जानकारी लेने की कोशिश की . उन्होंने बताया कि इसी विषय पर उनकी लोकसभा के सदस्य और नर्मदा संस्कृति के मर्मज्ञ , प्रहलाद पटेल से बात हुई थी.  उन्होंने कहा कि दर्ज़ा प्राप्त इन बाबाओं को नर्मदा के सन्दर्भ में तो कोई नहीं जानता .उनका कहना है कि अगर दिग्विजय सिंह इस यात्रा के बाद भी राजनीति में सक्रिय होते हैं तो वे बिकुल अलग तरह के राजनेता होंगे . भोपाल के ही वरिष्ठ पत्रकार और टेलीग्राफ के रेज़ीडेंट एडिटर रशीद किदवई का कहना है कि अब मध्य प्रदेश के सभी कांग्रेसी नेता मानते हैं कि नई राजनीतिक परिस्थिति में कांग्रेस की राजनीति का बिलकुल नया सन्दर्भ देखना होगा. हालांकि इस बात के कोई संकेत  नहीं हैं कि दिग्विजय सिंह  मुख्यमंत्री  के उम्मीदवार होंगें लेकिन मुख्यमंत्री कौन होगा यह तय करने में उनकी राय महत्वपूर्ण होगी. पांच नए बाबाओं के माध्यम से उनको रोकने की शिवराज सिंह चौहान की कोशिश  को भोपाल का कोई भी नेता या पत्रकार गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है . दिल्ली के कुछ गंभीर पत्रकारों से  भी मध्य प्रदेश की राजनीति को समझने  का प्रयास किया गया . एक बहुत ही आदरणीय पत्रकार ने भरोसे के साथ बताया कि दिग्विजय सिंह को तो कांग्रेस मध्य प्रदेश में चुनाव के प्रचार के काम में भी नहीं लगाने वाली है . जाहिर है राजनीति की नफीस गलियों की सही व्याख्या उपलब्ध सूचना के आधार पर ही की जा  सकती है और दिल्ली में मध्य प्रदेश की ताज़ा राजनीतिक स्थिति के बदलते रंग की सही जानकारी बहुत कम पत्रकारों के पास है .

गांधी की सीख है कि राष्ट्रवाद में नफरत और संकीर्णता की कोई जगह नहीं



शेष नारायण सिंह

भारत में राजनीतिक विवाद और प्रचार की तरकीब में  बड़ा बदलाव आया है . पारंपरिक मीडिया तो था ही ,कुछ दिनों  से सोशल मीडिया की भूमिका बहुत बढ़ गयी है . इंग्लैण्ड की एक कंपनी ने फेसबुक से आंकड़े निकाल कर संवाद का नया व्याकरण प्रस्तुत किया है और इस विषय पर आजकल देश भर में चर्चा है . अजीब बात यह है कि इस माध्यम  का प्रयोग नफरत फैलाने के लिए ज्यादा हो रहा है . मुजफ्फरनगर के २०१३ के दंगों में इस तरकीब  का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया था. पिछले दिनों नफरत  के  काम में लगे लोगों ने इंसानों को जिंदा जलाया ,उनका वीडियो बनाया और उसको सोशल मीडिया के ज़रिये पूरी दुनिया में प्रचारित किया . अभी खबर आयी है कि इसी तरह के एक नरपिशाच को हीरो के रूप में पेश करने की  कोशिश की गयी और उस कोशिश का पता भी मीडिया के ज़रिये ही बाकी दुनिया को लगा .
नफरत और कट्टरता का आलम यह है कि इस तरह की हरकतों को आबादी का एक बड़ा वर्ग सही ठहरता है . संतोष की बात यह है कि देश में  लिबरल राजनीति और चिंतन का दायरा सिकुड़ तो गया है लेकिन ख़त्म बिलकुल नहीं हुआ है . हाँ यह भी सच है कि लिबरल बुद्धिजीवी भी अपनी बात बहुत संभल कर कह रहे हैं . सार्वजनिक जीवन में उदारता के घटते स्थान पर आजकल देश में एक बहस चल रही है. बात मुसलमानों के हवाले से कही जा रही है  .नेता तो इन मुद्दों को अपने तरीके से कहते ही रहते हैं. अब देश के गंभीर बुद्धिजीवी भी इस बहस में शामिल हो गए हैं . राष्ट्रवाद , राष्ट्रप्रेम  ,देशप्रेम पर चर्चा हो रही है . और मुसलमानों  का देश के राजनीतिक और सामजिक जीवन में जो मुकाम है वह जेरे बहस है .इसमें दो राय नहीं कि  राजनीति का दखल हर विषय में होता है . स्वाभाविक भी है . नफरत को राजनीति का संचारी भाव बनाने की कोशिश बहुत  वर्षों से चल रही थी अब लगता है कि वह मकसद हासिल कर लिया गया  है. देखा यह गया है कि जब भी सरकार की कोई नाकामी से पर्दा उठता है तो कोई दुश्मन तलाश लिया जाता है . और सरकारी राष्ट्रवाद उसको हवा देने लगता है . दुश्मन के खिलाफ लोगों को लामबंद करना बहुत आसान होता है. इस तरह का राष्ट्रवाद हर उस व्यक्ति या संगठन को शत्रु के रूप में पेश कर देता है जिसके बारे में शक हो जाय  कि वह स्थापित सत्ता को किसी रूप में चुनौती दे सकता है . वह कोई  ट्रेड यूनियन , कोई छात्र संगठन ,कोई एन जी ओ ,जनांदोलन या कोई अन्य संगठन हो सकता है.
इसी खांचे में मुसलमानों को सरकारी राष्ट्रवादी जमातों ने फिट कर दिया है .  टीवी  चैनलों पर होने वाली बहसों में यह बात लगभग रोज़ ही रेखांकित हो रही है . साफ नज़र आ  जाता  है कि लक्ष्य की पहचान करके चांदमारी की जा रही है जिसके कारण मुसलमान होना और चैन से रहना मुश्किल होता जा रहा है . इस सन्दर्भ में हर्ष मंदर के एक लेख का ज़िक्र करना उपयोगी होगा .लिखते हैं कि एक  दलित राजनेता ने मुसलमानों से कहा कि आप मेरी सभा में ज़रूर आइये लेकिन एक ख़ास किस्म की  टोपी यह बुर्का  पहनकर मत आइये . रामचंद्र गुहा इस बात से असहमत हैं .उनका तर्क है कि कि यह ठीक नहीं है. यह मुसलमानों को इक कोने में धकेल देने की एक कोशिश है ,उनके विकल्प छीन लेने की साज़िश है जबकि मुकुल केशवन कहते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को बुर्के का त्याग करने का सुझाव देकर  वह नेता उनको प्रगतिशील एजेंडा में शामिल होने का न्योता दे रहा है . यह  तीनों ही बुद्धिजीवी विद्वान् लोग हैं ,उनकी मेधा पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं है लेकिन यह भी बिलकुल सही है कि इनकी बातें पूरा सच नहीं हैं . सच्चाई यह है कि सामजिक स्तर पर मुसलमानों से मिलने जुलने से या उनकी बस्तियों में कुछ समय बिता लेने से मुसलिम मनोदशा और सामाजिक बंदिशों की परतों को समझ पाना थोडा टेढा काम  होता है . सच्चाई यह भी है कि राष्ट्रवाद और  देशप्रेम को समानार्थी शब्द बताकर मुसलमानों को देशप्रेम का सर्टिफिकेट देने की कोशिश की जा रही है .उसका सन्दर्भ लिए बिना इस बात को समझा नहीं  जा सकता .
अखबार में चल रही इस बहस में नई इंट्री ब्राउन विश्वविद्यालया के प्रोफ़ेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने ली है . उन्होंने राष्ट्रवाद को समझने के लिए भौगोलिक और धार्मिक या जातीय सीमाओं का ज़िक्र किया है और बात को एक सन्दर्भ में रखने की कोशिश की है . लेकिन यह विषय बहुत ही पेचीदा है और इसी से मुसलमानों की अस्मिता का सवाल आज नहीं तो कल बड़े पैमाने पार जुड़ने वाला है . इसलिए इसको बहुत ही गंभीरता से लेने की ज़रूरत है . हमको मालूम  है कि जब राष्ट्र और मानवता के किसी मुद्दे को बहुत ही सावधानी से समझने की ज़रूरत  पड़ती है तो एक इन्सान ऐसा है जिसकी बातें खरा सोना होती हैं . इस बात की पड़ताल करना ज़रूरी होगा कि राष्टवाद, देशप्रेम और मानवता के बारे में महात्मा गांधी क्या कहते हैं .'मेरे सपनों का भारत ' में महात्मा गांधी ने लिखा है
' मेरे लिए देशप्रेम और मानव-प्रेम में कोई भेद नहीं हैदोनों एक ही हैं। मैं देशप्रेमी हूँक्‍योंकि मैं मानव-प्रेमी हूँ। देशप्रेम की जीवन-नीति किसी कुल या कबीले के अधिपति की जीवन-नीति से भिन्‍न नहीं है। और यदि कोई देशप्रेमी उतना ही उग्र मानव-प्रेमी नहीं हैतो कहना चाहिए कि उसके देशप्रेम में उतनी न्‍यूनता है.जिस तरह देशप्रेम का धर्म हमें आज यह सिखाता है कि व्‍यक्ति को परिवार के लिएपरिवार को ग्राम के लिएग्राम को जनपद के लिए और जनपद को प्रदेश के लिए मरना सीखना चाहिएउसी तरह किसी देश को स्‍वतंत्र इसलिए होना चाहिए कि वह आवश्‍यकता होने पर संसार के कल्‍याण के लिए अपना बलिदान दे सके। इसलिए राष्‍ट्रवाद की मेरी कल्‍पना यह है कि मेरा देश इसलिए स्‍वाधीन हो कि प्रयोजन उपस्थित होने पर सारी ही देश मानव-जाति की प्राणरक्षा के लिए स्‍वेच्‍छापूर्वक मृत्‍यु का आलिंगन करे। उसमें जातिद्वेष के लिए कोई स्‍थान नहीं है। मेरी कामना है कि हमारा राष्‍ट्रप्रेम ऐसा ही हो।
हमारा राष्‍ट्रवाद दूसरे देशों के लिए संकट का कारण नहीं हो सकता क्‍योंकि जिस तरह हम किसी को अपना शोषण नहीं करने देंगेउसी तरह हम भी किसी का शोषण नहीं करेंगे। स्‍वराज्‍य के द्वारा हम सारी मानव-जाति की सेवा करेंगे।'
महात्मा गांधी की बात की राष्ट्रवाद की अवधारणा उसको संकीर्णता से बहुत दूर ले जाती है और सही मायनों में यही राष्ट्रवाद की सही तस्वीर है.  राष्ट्रवाद के उनके विचारों में कहीं भी धर्म या जाति को कोई भी स्थान नहीं दिया गया है .

क्या बीजेपी का लिंगायत वोटबैंक कांग्रेसी सिद्दरमैया की झोली में जाएगा



शेष नारायण सिंह


कर्णाटक की राजनीति लिंगायत धर्म को अल्पसंख्यक दर्ज़ा देने के मुद्दे पर केन्द्रित हो गयी है . लिंगायत लोग पहले कांग्रेस के समर्थक हुआ करते थे लेकिन जब राजीव गांधी ने १९९० में  कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेन्द्र पाटिल को अपमानित करके हटा दिया ,तो लिंगायतों में कांग्रेस के प्रति घोर नाराज़गी पैदा हो गयी . वीरेन्द्र पाटिल कर्नाटक के बहुत ही आदरणीय नेता  थे और लिंगायत समुदाय से सम्बंधित थे. १९५७ में पहली बार एम एल ए बने थे और रामकृष्ण हेगड़े की साथ कर्नाटक के उस दौर के सबसे बड़े नेताएस निजलिंगप्पा के प्रिय पात्र  थे. जनता पार्टी राज में मुख्यमंत्री भी बने थे .चिकमगलूर लोकसभा के १९७८ के विख्यात उपचुनाव में जब इंदिरा गांधी जीत गईं तो तो जनता पार्टी ने उनको अपमानित किया . नाराज़ वीरेन्द्र पाटिल ने कुछ समय बाद  इंदिरा कांग्रेस की सदस्यता ले ली . १९८९ में जब राजीव गांधी  के नेतृत्व में कांग्रेस केंद्र में चुनाव हार गई थीतो वीरेन्द्र पाटिल के नेतृत्व में  कांग्रेस को कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत मिली थी. २२४ सीटों में से कांग्रेस को १७८ सीट मिली थी. वे मुख्यमंत्री और शराब माफिया के दखल को राज्य की राजनीति में कंट्रोल करने में कामयाब रहे थे लेकिन न्यस्त स्वार्थों ने एक दंगा करवा कर और राजीव गांधी का कान भर कर उनको मुख्यमंत्री पद से हटवा दिया . उसके बाद वे बहुत दुखी इंसान थे. इस बीच बीजेपी ने लिंगायतों में काम शुरू कर दिया और लिंगायत पूरी तरह से बीजेपी के साथ हो गए और जब १९९४ में विधान सभा चुनाव हुए तो कांग्रेस मुख्य  विपक्षी पार्टी भी नहीं बन सकी .   
लिंगायतों के आन्दोलन को समर्थन देकर सिद्दारमैया ने कांग्रेस के उसी वोट बैंक को फिर से कांग्रेस के पक्ष में करने की कोशिश की है और जानकार बताते हैं कि पिछले साल जून से पूरे राज्य में ज़बरदस्त  तरीके  से चल रहे आन्दोलन के बारे में बीजेपी और आर एस एस  गाफिल रह गए हैं और ऐन चुनाव के वक़्त लिंगायतों की बहुत पुरानी मांग के साथ खड़े होकर और उसको राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन देकर कर्णाटक के मुख्यमंत्री ने राज्य की  राजनीति को ज़ोरदार तरीके से प्रभावित किया है .
एक अल्पसंख्यक और अलग धर्म के रूप में मान्यता के लिए लिंगायत समुदाय  के लोग बहुत वर्षों से प्रयास कर रहे  हैं . पिछले  दो वर्षों में यह आन्दोलन  का  रूप ले चुका है और एक भावनात्मक मुद्दा बन चुका है . पिछले साल कर्नाटक के बीदर,गुलबर्गा,और कलबुर्गी में अलग धर्म की मांग करते हुए बड़ी रैलियाँ की  गयी थीं. महाराष्ट्र के लातूर में भी लिंगायतों को बड़ी सभा हुई थी . उनकी मांग थी कि बारहवीं शताब्दी के समाज सुधारक और दार्शनिक बासवन्ना  के आनुयायियों को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता दी जाए. उनका तर्क है कि बासवन्ना के बाद के महान संत, गुरु नानक देव के अनुयायी एक अलग धर्म के रूप में मान्यता पा चुके हैं ,उसके पहले गौतम बुद्ध और महावीर जैन के अनुयायी भी अलग धर्म में आते  हैं इसलिए लिंगायतों को भी  वैसी ही मान्यता दी जानी चाहिए . वे अपने को वैदिक धर्म से बिकुल अलग बताते हैं और अपने को हिन्दू धर्म का अनुयाई मानने को बिलकुल तैयार नहीं हैं .
लिंगायत सम्प्रदाय को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिलवाने के आन्दोलन के कई आयाम हैं . कई बार  कोशिश की जाती है कि  लिंगायतों को वीरशैव सम्प्रदाय से जोड़कर हिन्दू धर्म के  शैव मत में शामिल कर लिया जाए  लेकिन लिंगायत नेताओं  का कहना है कि वीरशैव वास्तव में हिन्दू धर्म का  ही  हिस्सा हैं . वे पंचपीठ के अनुयाई हैं  ,पांच आचार्यों की बात मानते हैं स्वर्ग नरक की अवाधारणा में  विश्वास करते हैं लेकिन लिंगायत ऐसा नहीं मानते हैं . वे वर्णाश्रम  व्यवस्था के विरोधी  हैं,मंदिर नहीं जानते किसी  देवी देवता की पूजा नहीं करते अपने शरीर को ही मन्दिर मानते हैं  और  जाति की ब्राहमण व्यवस्था का  विरोध  करते हैं .  हिन्दू धर्म के नेताओं की कोशिश  हमेशा  से रही है कि लिंगायतों को शैव मत की एक शाखा के रूप में ही मान्यता दी जाए .इसीलिये वीरशैव और  लिंगायत को एक  दूसरे का समानार्थक  शब्द भी बताया जाता है .
इस मान्यता को लिंगायत नेता गलत बताते हैं . उनका कहना है कि लिंगायत बासवन्ना के वचन को मानने वालों का  धर्म है जबकि वीरशैव सम्प्रदाय का मूल पंचार्यों के विचार में है. जिनके आदि पुरुष रेणुकाचार्य हैं  .इनका मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिखामणि है जो मूल रूप से संस्कृत में है , वह वेदों और उपनिषदों के हवाले से अपनी बात  कहता है.इसके बरक्स बासवान्ना के  अनुयायी पंचार्यों की मान्यताओं को निंदा करते हैं और आरोप लगाते हैं कि यह सब लिंगायतों की मांग को विवाद में लाने के लिए किया जा रहा है . लिंगायतों का दावा है कि वीरशैव पूरी तरह से बासवन्ना  की बात नहीं मानते हैं. वे वैदिक  ग्रंथों में विश्वास करते हैंशिव की मूर्तियों की पूजा करते हैं  और धार्मिक मठों में विश्वास करते हैं जबकि लिंगायत अपने गुरु के अलावा किसी भी सत्ता को स्वीकार नहीं करते.  
 लिंगायतों का आन्दोलन नया  है लेकिन विवाद बहुत ही पुराना है .   ब्रिटिश काल  में हुई १८७१ और १८८१ की जनगणना में लिंगायतों को शूद्र  के रूप में रिकार्ड किया गया है . उस समय के  लिंगायतों ने इसका बुरा माना था और अपने को ब्राह्मण का दर्ज़ा देने की मांग की थी  . १९२६  में बाम्बे हाई कोर्ट ने  आदेश दिया कि वीरशैव शूद्र नहीं हैं . उन दिनों वीरशैव और लिंगायत को एक ही मानने की बात लगभग स्वीकार कर ली गयी थी.लेकिन लगभग इसी समय में लिंगायतों के नेता इस बात पार जोर देने लगे कि वे एक अलग धर्म  के अनुयाई हैं  जो हिन्दू धर्म से बिलकुल अलग  है. १९०४ में एक प्रस्ताव पास किया गया था कि लिंगायत और वीरशैव हिन्दू हैं लेकिन १९४०  आते आते बात इसके एकदम उलट हो गयी . १९४० में वीरशैव महासभा ने कहना शुरू कर दिया  कि लिंगायत धर्म अलग है  और वह हिन्दू धर्म से अलग है . सन २००० आते आते लिंगायतों को अलग धर्म के रूप में सरकारी मान्यता देने की बात ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था और अब वह  एक आन्दोलन का रूप ले चुका है . कहते हैं कि  बी एस येदुरप्पा को उनके राजनीतिक शिखर तक पंहुचाने में में लिंगायतों के इस आन्दोलन की बड़ी भूमिका है .लिंगायतों की मांग है कि उनको गैर हिन्दू धर्म घोषित किया जाए और जनगणना में उनको हिन्दू धर्म से अलग मानकर रिकार्ड किया जाए . उनका दावा है कि हिन्दू धर्म में वर्णाश्रम  व्यवस्था के कारण भेदभाव को महत्व दिया जाता  है जबकि लिंगायत जातपांत के भेद को नहीं मानते .
इतिहास के गलियारों से गुज़रते हुए २०१७  आते आते यह मांग एक आन्दोलन के रूप में स्थापित हो गयी . बी एस येदुरप्पा लिंगायतों के सबसे बड़े नेता थे और  वह भी इस मांग का समर्थन कर रहे थे .बीजेपी से अलग होने के बाद उनका भी आर एस  एस की लाइन से कोई लेना देना नहीं था हालांकि आर एस एस की हमेशा से कोशिश रही है कि लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग न होने दिया जाए. इस बीच लिंगायत सम्प्रदाय को अलग धर्म बनवाने की कवायद में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दरमैया  जी जान से जुट गए . उन्होंने सभी शिक्षा संस्थाओं को आदेश दिया कि वे अपने  यहाँ बासवन्ना की फोटो अवश्य लगाएं . उन्होंने लिंगायत धर्म की संत अक्का महादेवी ने नाम पर महिला विश्वविद्यालय का नाम रख दिया है. अक्का महादेवी को लिंगायतों में वही मुकाम हासिल है जो वैष्णवों में मीराबाई को है .
 दिसंबर २०१७ में कर्णाटक सरकार ने नागमोहन दास की अध्यक्षता में एक कमेटी  बना दी जिसने अभी कुछ दिन पहले सिफारिश कर दिया कि लिंगायत समुदाय को अलग  धर्म के रूप में मान्यता दे दी जाए मुख्यमंत्री सिद्दरमैया ने तुरंत ही केंद्र सरकार को चिट्ठी लिख दिया कि लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक मान लिया जाए . कांग्रेस की इस चाल के सामने बीजेपी अपने को असहाय मान रही है क्योंकि कर्नाटक विधान सभा के चुनाव जीतने की बीजेपी की  सारी रणनीति लिंगायतों को अपना वोट मानकर चलने की थी. इसी प्रयास में अध्यक्ष अमित शाह ने  येदुरप्पा को दुबारा  पार्टी में शामिल किया था और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था  . आज येदुरप्पा भारी दुविधा में हैं . लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की सरकारी मान्यता वाली बाज़ी सिद्दरमैया ने अपने नाम कर ली है . इसके अलावा भी वे पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों में पिछले पांच साल से चुनाव को ध्यान में रख कर काम कर रहे हैं .
अब बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव  किया है . पार्टी के नेता अब टीपू सुलतान पर ध्यान दे रहे हैं जिसने अपने शासनकाल में लिंगायतों पर बहुत अत्याचार किया था . अब वे सिद्दरमैया पर आरोप लगा रहे हैं कि वे और राहुल  गांधी हिन्दू धर्म को बांट रहे हैं जबकि बीजेपी वाले वृहत हिन्दू समाज को एक करने की कोशिश कर रहे हैं .  अभी चुनाव अभियान तो एक शकल ले रूप ले रहा है . यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले पांच   हफ्ते में कर्णाटक का चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा.

संसद में शोरगुल करना संसद की गरिमा के अनुकूल नहीं है


शेष नारायण सिंह

संसद के मौजूदा सत्र में अभी तक कोई ख़ास काम नहीं हो सका है . कुछ बहुत ज़रूरी काम हंगामे के बीच कार लिए गए हैं . बजट भी पास हो गया है .लेकिन संसद में बहस के माहौल नहीं है. जो भी दो चार मिनट संसद की कार्यवाही चलती है उसको देख कर लगता है कि आजकल यह रिवाज़ हो गया है के कुछ सदस्य हर उस मसले को हल्ला गुल्ला करके ही सरकार की नज़र में ला सकते हैं जिस से वे चिंतित हैं . इस सत्र में कभी टीडीपी,कभी कभी वाई एस आर कांग्रेस ,कभी ए आई ए डी एम के अपने  मुद्दों पर संसद का काम शुरू होते ही हल्ला गुल्ला शुरू कर देते हैं . यह बात समझ में नहीं आती कि जब संसद के सदस्य के रूप में राजनीतिक नेताओं के सामने सरकार को घेरने के बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं तो सदन की कार्यवाही में बाधा डालने के तरीके को अपनाने का औचित्य क्या है .देखा यह जा रहा है कि संसद में हल्ला गुल्ला करके सदस्यगण अपनी बात कहने के बहुमूल्य अवसर गँवा रहे हैं .

कुछ संसद सदस्यों से बातचीत हुई तो लगा कि वे सरकार की मनमानी से दुखी होकर संसद का काम नहीं चलने दे रहे हैं . यह बात बिलकुल तर्कसंगत नहीं है . अगर संसद सदस्य चाहे तो उसके पास सरकार को घेरने के इतने साधन हैं कि कोई भी सरकार मनमानी नहीं कर सकती. इसके बावजूद भी विपक्ष हल्ला करके अपनी बात को जनता तक पंहुचाने की कोशिश कर रहा है . हो सकता है आज का विपक्ष उसी को सही मानता हो लेकिन इसी लोकसभा में विपक्ष ने ऐसे ऐसे काम किये हैं कि दुनिया की कोई भी संसद उनसे प्रेरणा ले सकती है . १९७१ के लोकसभा चुनावों के बाद इंदिरा गाँधी की सरकार बनी थी . उनके पास बहुत ही मज़बूत बहुमत था. तो तिहाई से ज्यादा बहुमत वाली सरकारें कुछ भी कर सकती हैं ,संविधान में संशोधन तक कर सकती हैं लेकिन पांचवीं लोक सभा के आधा दर्जन सदस्यों ने इंदिरा गांधी की सरकार को सदन में हमेशा घेर कर रखा. इन कुछ सदस्यों के काम के तरीके को आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा के रूप में लेना चाहिए.  मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ज्योतिर्मय बसु,संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के मधु लिमये और मधु दंडवतेजनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी ,कम्युनिस्ट पार्टी के इन्द्रजीत गुप्त,भारतीय लोक दल के पीलू मोदी और कांग्रेस ( ओ ) के श्याम नंदन मिश्र की सदन में मौजूदगी में इंदिरा गाँधी की सरकार का हर वह फैसला चुनौती के रास्ते से गुज़रता था जिसे इन सदस्यों ने जनहित की अनदेखी का फैसला माना . आज तो लोकसभा की कार्यवाही लाइव दिखाई जाती है हर पल की जानकारी देश के कोने कोने में पंहुचती है . चौबीस घंटों का टेलिविज़न समाचार है ,बहुत सारे अखबार हैं जो नेताओं की हर अच्छाई को जनता तक दिन रात पंहुचा रहे हैं लेकिन उन दिनों ऐसा नहीं था. समाचार के श्रोत के रूप में टेलिविज़न का विकास नहीं हुआ था रेडियो सरकारी था . जनता को ख़बरों के लिए कुछ अखबारों पर निर्भर रहना पड़ता था. आज तो हर बड़े शहर से अखबार छपते हैं उन दिनों ऐसा नहीं था. इतने अखबार भी नहीं छपते थे लेकिन संसद की इन विभूतियों के काम की हनक पूरे देश में महसूस की जाती थी. बहुत साल बाद जब मधु लिमये से इसके कारणों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उन दिनों संसद सदस्य बहुत सारा वक़्त संसद की लाइब्रेरी में बिताते थे जिसके कारण उनके पास हर तरह की सूचना होती थी. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज ऐसा नहीं है .

संसद के सदस्य के रूप में नेताओं के पास ऐसे बहुत सारे साधन हैं कि वे सरकार को किसी भी फैसले में मनमानी से रोक सकते हैं . आजकल तो लोकसभा की कार्यवाही लाइव दिखाई जाती है जिसके कारण सदस्यों की प्रतिभा को पूरा देश देख सकता है और राजनीतिक बिरादरी के बारे में ऊंची राय बन सकती है . अगर सरकार को जनविरोधी मानते हैं तो उसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार की छुट्टी करने तक का प्रावधान संसद के नियमों में है लेकिन उसके लिए सदस्यों पूरी तैयारी के साथ ही सदन में आना पड़ेगा. संसद के सदस्य के रूप में नेताओं के पास जो अवसर उपलब्ध हैं उन पर एक नज़र डालना दिलचस्प होगा. 
सबसे महत्वपूर्ण तो प्रश्न काल ही है .लोकसभा की कार्यवाही के लिए जो नियम बनाए गए हैं उनमें नियम ३२ से लेकर ५४ तक प्रश्नों के बारे में हैं . सदन की कार्यवाही का पहला घंटा प्रश्न काल के रूप में जाना जाता है और इसमें हर तरह के सवाल कर सकते हैं . कुछ सवाल तो मौखिक उत्तर के लिए होते हैं सदन के अंदर सम्बंधित मंत्री को सदस्यों के सवालों का जवाब देना पड़ता है . मंत्री से बाकायदा पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं हर सदस्य किसी भी सवाल पर स्पष्टीकरण मांग सकता है और सरकार के सामने गोल मोल जवाब देने के विकल्प बहुत कम होते हैं ..मौखिक प्रशनों के अलावा बहुत सारे पश्न ऐसे होते हैं जिनका जवाब लिखित रूप में सरकार की तरफ से दिया जाता है . अगर सरकार की ओर से लिखित जवाब में कोई बात स्पष्ट नहीं होती तो सदस्य के पास नियम ५५ के तहत आधे घंटे की चर्चा के लिए नोटिस देने का अधिकार होता है . अध्यक्ष महोदय की अनुमति से आधे घंटे की चर्चा में सरकार से स्पष्टीकरण माँगा जा सकता है .सरकार की नीयत पर लगाम लगाए रखने के लिए विपक्ष के पास नियम ५६ से ६३ के तहत काम रोको प्रस्ताव का रास्ता खुला होता है . अगर कोई मामला अर्जेंट है और जनहित में है तो अध्यक्ष महोदय की अनुमति से काम रोको प्रस्ताव लाया जा सकता है . इस प्रस्ताव पर बहस के बाद वोट डाले जाते हैं और अगर सरकार के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव पास हो जाता है तो इसे सरकार के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव माना जाता है . देखा यह गया है कि सरकारें काम रोको प्रस्ताव से बचना चाहती हैं इसलिए इस प्रस्ताव के रास्ते में बहुत सारी अड़चन रहती है . बहरहाल सरकार के काम काज पर नज़र रखने के लिए काम रोको प्रस्ताव विपक्ष के हाथ में सबसे मज़बूत हथियार है . इसके अलावा नियम १७१ के तहत सदन के विचार के लिए एक प्रस्ताव लाया जा सकता है जो सदस्य की राय हो सकती है ,कोई सुझाव हो सकता है या सरकार की किसी नीति या किसी काम की आलोचना हो सकती है . इसके ज़रिये सरकार को सही काम करने के लिए सुझाव दिया जा सकता है ,उस से आग्रह किया जा सकता है . ध्यान आकर्षण करने लिए बनाए गए लोक सभा के नियम १७० से १८३ के अंतर्गत जनहित के लगभग सभी मामले उठाये जा सकते हैं .
विपक्ष के हाथ में लोक सभा के नियम १८४ से लेकर १९२ तक की ताक़त भी है . इन नियमों के अनुसार कोई भी सदस्य किसी राष्ट्रीय हित के मसले पर सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पेश कर सकता है . नियम १८६ में उन मुद्दों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो बहस के लिए उठाये जा सकते हैं . इन नियमों के तहत होने वाली चर्चा के अंत में वोट डाले जाते हैं इसलिए यह सरकार के लिए खासी मुश्किल पैदा कर सकते हैं . लोकसभा में अध्यक्ष की अनुमति के बिना कोई भी बहस नहीं हो सकती वह नियम इस बहस में भी लागू होते हैं . इसके अलावा लोकसभा के नियम १९३ से १९६ के तहत जनहित के किसी मुद्दे पर लघु अवधि की चर्चा की नोटिस दी जा सकती है . इस नियम के तहत होने वाली बहस के बाद वोट नहीं डाले जाते लेकिन जब सब कुछ पूरा देश टेलिविज़न के ज़रिये लाइव देख रहा है तो सरकार और सांसदों की मंशा तो जनता की अदालत में साफ़ नज़र आती ही रहती है .नियम १९७ के अंतर्गत संसद सदस्य सरकार या किसी मंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ला सकते हैं . पहले ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की चर्चा आखबारों में खूब पढी जाती थी लेकिन आजकल ऐसा बहुत कम होता है .
विपक्ष के पास लोकसभा में सबसे बड़ा हथियार नियम १९८ के तहत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव है . इस प्रस्ताव के तहत सरकारें गिराई जा सकती हैं . विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार इसी प्रस्ताव के बाद गिरी थी.इस तरह से हम देखते हैं कि संसद सदस्यों के पास सरकार से जनहित और राष्ट्रहित के काम कवाने के लिए बहुत सारे तरीके उपलब्ध हैं लेकिन उसके बाद भी जब इस देश की एक अरब से ज़्यादा आबादी के प्रतिनधि शोरगुल के ज़रिये अपनी ड्यूटी करने को प्राथमिकता देते हैं तो निराशा होती है.

Monday, March 26, 2018

नरेंद्र मोदी को २०१९ में किसी एक नेता से चुनौती नहीं मिलेगी

   
शेष नारायण सिंह
कांग्रेस का एक और अधिवेशन समाप्त हो गया . अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी का यह पहला अधिवेशन था .उनके परिवार में कांग्रेस  का अध्यक्ष होने की परम्परा रही है . आज से करीब एक सौ साल पहले उनके  पूर्वज मोतीलाल नेहरू को १९१९ में अमृतसर में  हुए कांग्रेस अधिवेशन में अध्यक्ष बनाया गया था .  वह भारतीय राजनीति का बहुत ही महत्वपूर्ण दौर है . महात्मा गांधी का भारतीय राजनीति में आगमन  हो चुका था.  उन दिनों कभी कभी साल में दो बार कांग्रेस का अधिवेशन होता था .मसलन १९१८ और १९२० में कांग्रेस का सत्र दो बार बुलाया  गया . १९२९ औत १९३० में जवाहरलाल नेहरू लगातार कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए  गए थे. इसी अधिवेशन में पूर्ण स्वराज और दांडी मार्च के फैसले लिए गए थे.
लेकिन तब से अब तक यमुना में बहुत पानी बह चुका है. गांधी-नेहरू-पटेल की कांग्रेस का पूरा कायाकल्प हो चुका  है. जब १९६९ में कांग्रेस में पहली टूट हुयी थी,तो इंदिरा गांधी के युग की शुरुआत हो गयी थी. उसके बाद तो उन्होंने कांग्रेस को अपने नाम से ही चलाया . इंदिरा कांग्रेस  बनने तक कांग्रेस अध्यक्ष बनना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी.  इंदिरा जी के बाद तो उनकी मर्जी का कोई नेता या उनके परिवार का कोई सदस्य कांग्रेस अध्यक्ष बनता रहा. कांग्रेस का मौजूदा अधिवेशन भी करीब आठ साल बाद बुलाया   गया है .  राहुल गांधी अध्यक्ष बन गए और उन्होने ज़ोरदार भाषण दिया . लोग उम्मीद कर रहे हैं कि उनका कार्यकर्ता इसके बाद बहुत उत्साहित होगा . उत्साहित होगा भी ,जहाँ कांग्रेस एक मज़बूत राजनीतिक पार्टी के रूप में पहचानी जाती है लेकिन कई राज्यों में तो कांग्रेस बहुत ही कमज़ोर राजनीतिक दल के रूप में पहचानी जाती है . इसलिए उन राज्यों में कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साहित कहाँ होगा  . इन राज्यों में  कांग्रेस कार्यकर्ता  हर गली मोहल्ले में मौजूद ही नहीं है . उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से तो कांग्रेस कार्यकर्ता गायब ही है .पूर्वोत्तर भारत में कभी हर राज्य में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी लेकिन अब एकाध राज्य के अलावा कहीं नहीं है .आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी कांग्रेस हाशिये पर है .इसलिए राहुल गांधी वाली कांग्रेस वर्तमान सत्ताधारी पार्टी ,बीजेपी को चुनौती नहीं दे सकती है . लेकिन अजीब बात है कि राहुल गांधी अभी भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में आचरण करते पाए जाते हैं. यही नहीं बीजेपी भी उनको मुख्य विपक्षी मानकर कांग्रेस को ही लक्ष्य बनाकर हमला कर रही है . हालांकि  यह भी सच है कि राहुल गांधी के भाषणों में आजकल बीजेपी को प्रभावशाली तरीके से निशाना बनाया जाता है . बीजेपी  सरकार के चार साल के कामकाज पर जब राहुल गांधी हिसाब मांगते हैं तो सरकारी पार्टी में चिंता साफ देखी जा सकती है .कांग्रेस अधिवेशन में उठाये गये उनके सवालों का जवाब देना बीजेपी के लिए बहुत ही मुश्किल पड़ रहा है.  अक्सर देखा गया  है कि राहुल गांधी के सवालों का जवाब देने के लिए कई कई मंत्रियों को उतारा जाता है और मीडिया में बाकायदा अभियान चलाया जाता है लेकिन महंगाईहर साल दो करोड़ नौकरियाँ , राफेल सौदा  आदि ऐसे सवाल हैं जिनपर बीजेपी किंकर्तव्यविमूढ़ नज़र आ रही है . इस सब के बावजूद  भी यह तय  है कि राहुल गांधी की  कांग्रेस सत्ताधारी बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती नहीं दे सकती .
इसका मतलब  यह कतई नहीं  है कि बीजेपी को २०१९ में चुनौती नहीं मिलेगी . २७२ का लक्ष्य हासिल करने के लिए पार्टी को उत्तर प्रदेश ,बिहारमध्य प्रदेशराजस्थानमहाराष्ट्र  आदि ज़्यादा एम पी भेजने वाले राज्यों में कठिन मेहनत करनी पड़ेगी . लेकिन फूलपुर और गोरखपुर उपचुनावों एक बाद जो संकेत मिल रहे हैंवह भारतीय जनता पार्टी के लिए  बहुत ही चिंताजनक हैं. गोरखपुर में बीजेपी का उम्मीदवार नहीं हारा है , वहां  शुद्ध रूप से  राज्य का मुख्यमंत्री हारा है. बीजेपी उम्मीदवार का तो नाम भी बहुत कम लोगों को मालूम था . फूलपुर में भी हारने वाला कोई कार्यकर्ता या छुटभैया नेता नहीं , राज्य का उपमुख्यमंत्री है. दोनों ही उपचुनावों में सत्ताधारी पार्टी की सारी ताक़त लगी हुयी थी. संकेत साफ़ है कि अगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी  एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेगें तो उत्तर प्रदेश से बीजेपी के उतने सांसद नहीं जीतेंगें जितने २०१९ में जीते थे. . एक बात और सच है कि इन दोनों ही चुनावों में कांग्रेस की औकात रेखांकित हो गयी है . यह तय है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी हैसियत  नगण्य है. जिस फारमूले से यह दोनों उपचुनाव  विपक्ष ने जीता है , अगर वही तरीका २०१९ में भी अपना लिया गया तो  बीजेपी के लिए अपनी मौजूदा  ७३ सीटों की  संख्या तक पंहुचना मुश्किल होगा. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अगर सीटों का तालमेल कर लिया तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा घाटा हो सकता है . यही हाल बिहार का भी है . बिहार में भी बीजेपी को कांग्रेस से कोई चुनौती नहीं मिलने वाली है . कांग्रेस की वहां भी स्थिति उत्तर प्रदेश जैसी ही है . लालू यादव के जेल में होने के बाद हुए उपचुनावों में उनकी पार्टी ने जिस  तरह से अपनी सीटें बरक़रार  रखा है ,उससे साफ  है कि नीतीश कुमार को तोड़कर बीजेपी राज्य सरकार में शामिल तो भले ही हो गयी हो  लेकिन २०१९ में यह साथ बहुत फायदा नहीं पंहुचाने वाला है . ओडीशा में  भी बीजेपी का मुकाबला वहाँ के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से होगा . वहां कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल के रूप में चुनाव लड़ना पडेगा .ज़ाहिर  है , वहां से  भारतीय जनता पार्टी को बहुत उम्मीद रखना अति आशावाद ही माना जाएगा . कर्णाटक में बीजेपी ने  पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा को कमान सौंपी है लेकिन वहां भी राजनीतिक खेल बहुत उलझ गया है .  उन्होंने पिछले चुनावों में  बीजेपी से  अलग होकर चुनाव लड़ा था और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों को हराने में योगदान किया था . इसी वजह से  उनके प्रति बीजेपी के कार्यकर्ताओं में  खासी नाराज़गी   है . येदुरप्पा पर आरोप लग रहे हैं  कि वे उन बीजेपी कार्यकर्ताओं को टिकट आदि में ज्यादा महत्व दे सकते हैं  जो उनके  साथ बीजेपी छोड़कर चले गए थे और येदुरप्पा की जेबी पार्टी से चुनाव लड़ गए थे .उनके मुकाबले कांग्रेस के सिद्दरमैया हैं जो चुनावी  गणित के उस्ताद हैं . ताज़ा जानकारी यह है कि उन्होंने बीजेपी के  सबसे मज़बूत वोट बैंक लिंगायत समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए  ज़बरदस्त शतरंजी चाल चल दी  है . लिंगायत उनके साथ आते  हैं कि नहीं ,यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन यह तय है कुछ न कुछ उठापटक तो होगी ही और बीजेपी की मुश्किलें बढेंगी .  अभी तक कर्णाटक में बी एस येदुरप्पा लिंगायतों के सबसे बड़े राजनीतिक नेता हैं. माना जाता है कि लिंगायतों के चक्कर में ही बीजेपी आलाकमान ने उनको दोबारा पार्टी में लाकर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बना दिया था .  येदुरप्पा आजकल बहुत ही चिंतित व्यक्ति हैं . लिंगायतों की बहुत पुरानी मांग को ऐन चुनाव के पहले मुद्दा बनाकर सिद्दरमैया ने  उनकी मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं. बीजेपी की कर्णाटक में संभावित जीत के लिए पार्टी को लिंगायतों का एक मुश्त वोट मिलना चाहिए लेकिन सिद्दरमैया  ने लिंगायतों को अल्पसंख्यक धर्म बनाने के पासा  फेंककर खेल  को जटिल बना दिया है .
लिंगायत धर्म के मानने वाले अपने धर्म को विकसित और वैज्ञानिक  धर्म कहते  हैं . पारंपरिक  हिंदू धर्म में  वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था है . जिसमें उंच नीच का भाव समाहित है .  ब्राह्मण , क्षत्रिय ,वैश्य  और शूद्र में बंटा हिन्दू समाज एक नहीं रह गया था . इस  समाज व्यवस्था में लिंगायतों के बारहवीं सदी के ऋषि  बसवेश्वर ने बदल दिया और वर्गीकरण की व्यवस्था को  हटा दिया। उनके अनुयायियों को ही लिंगायत मना जाता है . इस तरह जातियों की राजनीति के ज़रिये सिद्दरमैया करनाटक में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं . अगर ऐसा हुआ तो कर्नाटक से भी बीजेपी को मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है .करनाटक के अलावा बीजेपी को मध्य प्रदेशराजस्थान ,पंजाब , महाराष्ट्र ,गुजरात और कश्मीर में कांग्रेस से चुनौती मिल सकती है. जबकि उत्तर प्रदेश ,बिहारआंध्र प्रदेश ,तेलंगानामें  क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को दिल्ली की सत्ता तक पंहुचने से रोकने की कोशिश करेंगीं.इसलिए यह साफ़ तरीके से कहा जा सकता है  कि २०१९ में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस की भूमिका एक राष्ट्रीय दल की नहीं क्षेत्रीय दल की होगी. हालांकि राहुल गांधी अभी भी अपने चेलों को मुख्य भूमिका देने के चक्कर में रहते देखे जा रहे हैं लेकिन अब सोनिया गांधी ने रणनीतिक दखल देनी शुरू कर दिया है और इस बात का अंदाज़  लगने लगा  है  कि सत्ताधारी पार्टी को अलग अलग इलाकों में अलग अलग पार्टियों और अलग तरीकों से  चुनौती  मिलने वाली है . कुछ भी हो फूलपुर और गोरखपुर उपचुनावों ने २०१९ के लिए राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल दी है . और अब दिल्ली में विपक्ष की राजनीति के पुरोधा यह बात मंद मंद ही सही लेकिन कहने लगे हैं  कि अलग अलग राज्यों में  वहां की मज़बूत पार्टियां बीजेपी को घेरेंगी और सत्ता की तिकड़मबाज़ी नतीजे आने के बाद होगी . पी वी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व में  कांग्रेस की चुनावी हार के बाद जिस तरह से देवेगौड़ा जैसे नेता को प्रधानमंत्री बाण दिया गया था , उस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता . जहां तक नरेंद्र मोदी की बात है ,कांग्रेस के कमज़ोर और सिमट जाने के बाद यह लगभग तय है कि उनको  पूरे भारत में कोई एक नेता चुनौती नहीं दे सकता .