Saturday, January 18, 2020

शाहीन बाग़ का सत्याग्रह महात्मा गांधी की परंपरा की नवीनतम कड़ी है



शेष नारायण सिंह

( देशबंधु के लिए )

दिल्ली के शाहीन बाग़ में  करीब एक महीने से कुछ औरतें धरने पर बैठी हैं .यमुना नदी के किनारे बसा  हुआ शाहीन बाग़ दिल्ली और नोयडा को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण  सड़क पर स्थित है . जामिया मिलिया इस्लामिया  इसी इलाके में है. नागरिकता एक्ट १९५५ में हुए संशोधन के खिलाफ दिसंबर २०१९ में केंद्र सरकार के खिलाफ जामिया विश्वविद्यालय में छात्रों का विरोध प्रदर्शन हुआ था . पुलिस ने कैम्पस और पुस्तकालय में घुसकर छात्रों पर हिंसक हमला किया था . पुलिस का आरोप है कि उस विरोध प्रदर्शन में बहुत सारे बाहरी लोग भी आ गए थे लेकिन मारपीट का शिकार मूल रूप से जामिया के छात्र ही हुए थे . उस सरकारी ज्यादती के खिलाफ देश भर में  विरोध हुआ था . जामिया के शाहीन बाग़ में भी कुछ महिलाएं  विरोध करने के लिए जमा हो गयी थीं . उनको शायद  उम्मीद थी कि सरकार उनसे बातचीत करेगी और  जामिया में पुलिस की ज्यादती के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ . वह धरना नागरिकता कानून १९५५ में ही संशोधन के  खिलाफ एक  आन्दोलन की शक्ल ले चुका है और आज पूरी दुनिया में  शाहीन बाग़ की औरतों के आन्दोलन का नाम जाना पहचाना जा रहा है .
शाहीन बाग़ का  आन्दोलन इस देश के इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना बन चुका है . महात्मा गांधी के सत्याग्रह के प्रयोग को शाहीन बाग़ के ज़रिये पूरी दुनिया में नए तरीके से फैलाया जा रहा है .यह अजीब   इत्तिफाक है कि जहाँ शाहीन बाग़ की बस्ती आबाद है वह   गांधी जी की याद से जुड़ा हुआ विश्वविद्यालय है .यहाँ  १९३५ तक यमुना के किनारे बसा हुआ एक बहुत ही छोटा सा गाँव ओखला हुआ करता था. महात्मा गांधी की प्रेरणा से स्थापित जामिया मिलिया को यहाँ डॉ जाकिर हुसैन १९३५ में लाये . उसके पहले जामिया मिलिया का कैम्पस दिल्ली के करोल  बाग़ में हुआ करता था .  वहां जगह बहुत कम थी इसलिए १९३५ में इसे ओखला  लाया गया.  यहाँ ज़मीन आसानी से  उपलब्ध हो गयी .महात्मा गांधी ने जब   १९२० के आन्दोलन के दौरान अंग्रेजों की शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार का आवाहन किया तो जामिया मिलिया इस्लामिया , काशी विद्यापीठ  ,गुजरात विद्यापीठ जैसी कुछ संस्थाओं की स्थापना हुई. जामिया की स्थापना तो मूल रूप से  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैम्पस में ही कर दी  गयी थी . देवबंद के मौलाना महमूद हसन ने महात्मा   गांधी के असहयोग आन्दोलन में बहुत ही बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. उस आन्दोलन का मुस्लिम लीग और जिन्ना ने विरोध किया था लेकिन मौलाना साहब के साथ होने के कारण  पूरे देश में बड़ी  संख्या में मुसलमानों ने  जिन्ना का  विरोध किया और गांधी के साथ हो लिए . उसी राष्ट्रप्रेम की आंधी में जामिया की  स्थापना की गयी थी . इसलिए जामिया को भारत की आज़ादी के आन्दोलन की एक पवित्र संस्था के रूप में याद किया जाता है क्योंकि यह आजादी की लड़ाई की  धरोहर  है .

जामिया मिलिया इस्लामिया की  स्थापना करने वालों में शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन  ,मौलाना मुहम्मद अली जौहर , हकीम अजमल खान , डॉ मुख़्तार अंसारी, ख्वाजा अब्दुल मजीद और डॉ जाकिर हुसैन  प्रमुख थे . जामिया की स्थापना १९२० में हो गयी थी लेकिन अपना कैम्पस नहीं था . १९२५ में हकीम अजमल खां के सौजन्य से जामिया को करोल बाग़ में जगह मिल गयी लेकिन वह बहुत छोटी जगह थी . जब डॉ जाकिर हुसैन साहब इस विश्वविद्यालय को उस वक़्त के ओखला गाँव में लाये तब खूब जगह मिली और आज यूनिवर्सिटी खासी बड़ी  जगह में है . शुरू में तो यहाँ जामिया के स्टाफ के लोगों ने ही घर आदि बनवाए लेकिन आज यह मुसलमानों की एक बड़ी आबादी है . उसी आबादी में  शाहीन बाग़ भी एक मोहल्ला है . इसलिए शाहीन बाग़ में जो महिलाएं आज इकठ्ठा हुई हैं वे महात्मा गांधी की आज़ादी के लड़ाई वाली उसी विरासत का हिस्सा हैं. डॉ जाकिर हुसैन कहा करते थे कि जामिया मिलिया  इस्लामिया वास्तव में शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के एक  संघर्ष का आन्दोलन है . उन्होंने दावा किया था कि यह  भारतीय मुसलमानों के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार करेगा जिसके केंद्र में तो इस्लाम होगा लेकिन वह सभी भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीय संस्कृति के विकास का मार्ग तय करेगा ." उसी राष्ट्रीय संस्कृति के केंद्र  में आज महात्मा गांधी के सत्याग्रह के तरीकों का  इस्तेमाल  करते हुए इतना बड़ा आन्दोलन खडा हो गया है कि स्थापित सत्ता  की समझ में नहीं आ रहा  है कि स्थिति को कैसे संभाला जाए .
शाहीन  बाग़ का  धरना शुरू हुए एक महीने से ऊपर हो गया है . उसी की प्रेरणा से देश के बहुत   सारे शहरों में नागरिकता संशोधन विधेयक ( सी ए ए )के खिलाफ औरतों के धरने शुरू हो चुके हैं .  मुख्यधारा के  मीडिया में सी ए ए के विरोध में चल रहे आन्दोलन को ख़ास  स्थान नहीं मिल रहा है लेकिन आन्दोलन बहुत ही अधिक जोर पकड चुका है .इलाहाबाद , मुंबई , कोटा , बेगूसराय, पटना , भोपाल ,  कोलकता आदि में शाहीन बाग़ की तर्ज पर लोग जमा हो रहे हैं और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं . सरकार की कोशिश  है कि आन्दोलन को अब शान्ति पूर्वक समाप्त किया जाये लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है . दिल्ली के जामा मस्जिद, सीलम पुर और जामिया में शुरू हुए सी ए ए के विरोध को ख़त्म करने के लिए बल प्रयोग करने और उसे मूल रूप से मुसलमानों  का आन्दोलन साबित करने की सरकार की कोशिश उल्टी पड़ चुकी है . अब यह साबित हो चुका है कि आन्दोलन केवल मुसलमानों का नहीं है बल्कि सभी धर्म और समुदाय के लोग इसमें शामिल हैं . सबसे दिलचस्प बात यह  है कि सी ए  ए के  विरोध में हुए आन्दोलन ने एक बार फिर पूरी ताक़त से स्थापित कर दिया है कि सत्ता का विरोध करने के लिए असहयोग और  सत्याग्रह नाम के जो हथियार महात्मा गांधी ने दिया था वे अभी भी उतने ही कारगर हैं जितने तब थे . सत्ता की तोप बन्दूक के  सामने  निहत्थे इंसान की ताकत का इस्तेमाल का गांधी जी का जो तरीका  था ,अब पूरी दुनिया में सफलता पूर्वक अपनाया जा रहा है . सत्ता की दौड़ में शामिल भारतीयों में एक तरह का शक  पैदा हो रहा था कि कहीं गांधी जी के हथियार भोथरे तो नहीं हो रहे हैं .  शाहीन बाग़ की निहत्थी औरतों  ने उसको एक बार फिर  सही  सन्दर्भ में रख दिया है .
जब सत्ता बहुत भारी बहुमत से राज करती  है तो उसके मुगालता हो  जाता है कि संसद का बहुमत उसको कुछ भी कर डालने की अनुमति दे देता है . लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा बहुमतवाद का समर्थन नहीं करती . संसद का बहुमत केवल सरकार बनाने की एक विधि है लेकिन  सरकार बनने के बाद उसका कर्त्तव्य है कि सभी विचारधाराओं को साथ लेकर चले , देश के हर इन्सान खासकर अंतिम  पायदान पर बैठे हुए इंसान के हित में काम  करे . यह भी संभव है कि  देश का  अंतिम व्यक्ति उस की सरकार का मतदाता न हो लेकिन उसके हित की चिंता करना सरकार का फ़र्ज़  है . अगर  सरकार अपने इस बुनियादी कर्त्तव्य से विमुख होती  है तो महात्मा गांधी का  सविनय अवज्ञा और असहयोग का हथियार अपने आप चल जाता है . वह कालखंड चाहे १९२० हो, १९७५  हो या २०१९ हो . आज शाहीन बाग़ में वही हो रहा है जो कभी महात्मा  गांधी के शिष्य  जयप्रकाश नारायण  ने १९७५ में किया था .देश की जनता की  बात दिल्ली के सत्ताधीशों को सुनाने के लिए अठारह मार्च १९७५ के दिन एक जुलूस पटना की सडकों पर निकला था .उस जुलूस में मुश्किल से हजार लोग रहे होंगे .हाथ पीछे बंधे थे और मुंह पर पट्टी बंधी थी .पटना शहर की मुख्य सड़कों से गुजर कर सभी लोग एक जगह जमा हुए . उस जुलूस में महान गांधीवादी कुमार प्रशांत और हिंदी के महान साहित्यकार  फणीश्वरनाथ रेणु भी शामिल थे . कुमार प्रशांत बताते हैं  कि जब मुंह से पट्टी हटी तो रेणु जी लंबे समय तक खामोश रहे . कुछ देर बाद  बोले: "  प्रशांतजीऐसा निनाद करता सन्नाटा तो मैंने पहली बार ही देखा और सुना! "
यह निनाद करता सन्नाटा ही महात्मा गांधी का सत्याग्रह  है . यही सन्नाटा , चौरी चौरा के बाद भी महसूस किया गया था ,यही सन्नाटा दांडी गाँव में जब एक मुट्ठी नमक उठाया  गया  थातब भी था . इस निनाद करते सन्नाटे को अमरीका में रंगभेद के खिलाफ  हुए संघर्ष में  बार  बार बार इस्तेमाल हुआ . अमरीका में रंगभेद के खिलाफ बहुत समय से आन्दोलन चलता रहा था  . आन्दोलन हिंसक हो जाता था और क्लू,क्लाक्सक्लान नाम के दक्षिणपंथी  श्वेतों के संगठन के गुंडे शोषित पीडित जनता के साथ बदमाशी करते थे . जवाब में  अफ्रीकी-अमरीकी भी हिंसक हो जाते थे . नतीजा यह होता था कि सत्ता के मालिक लोग आन्दोलन को हिंसा के नाम पर तोड़ देते थे .सरकार में श्वेत प्रभुता के चलते इनको हिंसक करार देकर सरकारी कार्रवाई का शिकार बना दिया जाता था . इस बीच भारत से  गांधी जी के विचारों का अध्ययन करके वापस  गए एक धर्मशास्त्र के अमरीकी  जेम्स मोरिस लॉसन  ने   आन्दोलन को पूरी तरह से गांधी के विचारों में रंग दिया . वे धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के सिलसिले में भारत आये थे लेकिन जब लौटकर गए तो पूरी तरह से महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा की ताक़त के जानकार बनकर लौटे थे  .उनके  अनुयायी  इन्हीं  छात्र छात्राओं ने १९५९
और ६० में टेनेसी राज्य  की दुकानों में नैशविल सिट-इन का आन्दोलन  चलाया  .   इन्हीं  छात्र नेताओं ने संयुक्त राज्य अमरीका के दक्षिण  में चले फ्रीडम राइडमिसीसिपी फ्रीडम समर,१९६३ के बर्मिंघम चिल्ड्रेन्स   क्रुसेड , १९६३ के सेल्मा वोटिंग राइट्स आन्दोलन१९६६ के वियतनाम युद्ध  विरोधी आन्दोलन आदि का नेतृत्व किया . इन छात्रों के  नेतृत्व  में हुए बहुत  ही महत्वपूर्ण आन्दोलनों में एक १९६३ का वाशिंगटन मार्च का आन्दोलन  है. इसी आन्दोलन में इन   छात्रों  ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर को आमंत्रित किया था उसके बाद वे आन्दोलन का सहयोग करते रहे .

शाहीन बाग़ के सिट-इन में भी नैशविल सिट-इन के गांधी के तरीके की अनुभूति होती है .सत्ता को देखना  होगा कि अपनी बात को शान्तिपूर्वक कहने की कोशिश कर रहे लोगों को नज़र अंदाज़ करने का जोखिम न उठायें  क्योंकि निहत्थे इंसान के पास अगर  गांधी का आत्मविश्वास आ जाये तो उसको पराजित करना असभव होता है .

अब शाहीन बाग़ में औरत के माथे का आँचल एक परचम बन चुका है



शेष नारायण सिंह
( उर्दू इन्किलाब के लिए )

बहुत अरसा हुआ मजाज़ लखनवी ने हिंदुस्तान की औरतों का आवाहन किया था कि तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन,तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था . बात आयी हो गयी . लेकिन आज उन औरतों ने बात को दिल पे ले लिया है . दिल्ली के शाहीन बाग़ में  करीब एक महीने से कुछ औरतें धरने पर बैठी हैं . नागरिकता एक्ट १९५५ में हुए संशोधन के खिलाफ दिसंबर २०१९ में केंद्र सरकार के खिलाफ जामिया विश्वविद्यालय में छात्रों का विरोध प्रदर्शन हुआ था . पुलिस ने कैम्पस और पुस्तकालय में घुसकर छात्रों पर हिंसक हमला किया था . उस सरकारी ज्यादती के खिलाफ देश भर में  विरोध हुआ  . जामिया के शाहीन बाग़ में भी कुछ महिलाएं  विरोध करने के लिए जमा हो गयी थीं . उनको शायद  उम्मीद थी कि सरकार उनसे बातचीत करेगी और  जामिया में पुलिस की ज्यादती के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ . वह धरना नागरिकता कानून १९५५ में ही संशोधन के  खिलाफ एक  आन्दोलन की शक्ल ले चुका है और आज पूरी दुनिया में  शाहीन बाग़ की औरतों के आन्दोलन का नाम जाना पहचाना जा रहा है  . वे पर्दानशीं ख़वातीन जो मजाज़ की अपील से आगे नहीं आई थीं , जो औरतें कैफ़ी  आज़मी के आवाहन को  कभी का नज़रंदाज़ कर चुकी थीं , वे आज मैदान ले चुकी हैं . कैफ़ी ने जंगे आज़ादी के दौरान ही अपील कर  दी थी कि
तोड़ ये अज़्म-शिकन, दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़
तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा था . लेकिन आज जब केंद्र सरकार ने भारतीय जनमानस के एकता को तोड़ने की गरज से उनकी नगरिकता के सवाल को बहस की ज़द में ला दिया है तो और उठ खडी हुई हैं . उनको माम्लूम हैं कि ,” औरतें उट्ठी नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जाएगा “ आज दिल्ली के  शाहीन बाग़ में औरतों की क़यादत में एक सियासी ताक़त ने कूच कर दिया है और उनकी अज्म को देखकर लगता है कि अब उनके डेरे मंजिल पर ही डाले जायेंगे.  शाहीन बाग़ में धरने पर बैठी औरतें इतिहास लिख रही हैं. पूरे देश में उनकी बात को समझने के लिए लोग तैयार बैठे हैं और अब लगता है कि सरकार की समझ में धीरे धीरे ही सही आने लगा है कि गरीब आदमी के अस्तित्व को सवालों को घेरे में लाने की उनकी गलती उनके लिए बहुत ही मुश्किल पैदाकर चुकी है . शाहीन बाग़ के महिलाओं का  आन्दोलन इस देश के इतिहास में एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना बन चुका है . महात्मा गांधी के सत्याग्रह के प्रयोग को शाहीन बाग़ के ज़रिये पूरी दुनिया में नए तरीके से फैलाया जा रहा है .यह अजीब   इत्तिफाक है कि जहाँ शाहीन बाग़ की बस्ती आबाद है वह   गांधी जी की याद से जुड़ा हुआ विश्वविद्यालय है .यहाँ  १९३५ तक यमुना के किनारे बसा हुआ एक बहुत ही छोटा सा गाँव ओखला हुआ करता था. महात्मा गांधी की प्रेरणा से स्थापित जामिया मिलिया को यहाँ डॉ जाकिर हुसैन १९३५ में लाये . उसके पहले जामिया मिलिया का कैम्पस दिल्ली के करोल  बाग़ में हुआ करता था .  वहां जगह बहुत कम थी इसलिए १९३५ में इसे ओखला  लाया गया.  यहाँ ज़मीन आसानी से  उपलब्ध हो गयी .महात्मा गांधी ने जब   १९२० के आन्दोलन के दौरान अंग्रेजों की शिक्षा संस्थाओं के बहिष्कार का आवाहन किया तो जामिया मिलिया इस्लामिया काशी विद्यापीठ  ,गुजरात विद्यापीठ जैसी कुछ संस्थाओं की स्थापना हुई. जामिया की स्थापना तो मूल रूप से  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैम्पस में ही कर दी  गयी थी . देवबंद के मौलाना महमूद हसन ने महात्मा   गांधी के असहयोग आन्दोलन में बहुत ही बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. उस आन्दोलन का मुस्लिम लीग और जिन्ना ने विरोध किया था लेकिन मौलाना साहब के साथ होने के कारण  पूरे देश में बड़ी  संख्या में मुसलमानों ने  जिन्ना का  विरोध किया और गांधी के साथ हो गए .आज़ादी की लड़ाई में इतने बड़े पैमाने पर मुसलमानों के शामिल होने के बाद ही अँगरेज़ हुक्मरान को लग गया था कि हिन्दू-मुस्लिम इत्तिहाद उनकी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए लामबंद हो चुका है . उसी  घबडाहट के दौर में अँगरेज़ ने अपने ख़ास लोगों की मदद से कुछ ऐसे  संगठन  तैयार किये जो हिन्दू और मुसलमान के बीच झगडे करवा सके . उसी राष्ट्रप्रेम की आंधी के दौर में में जामिया मिलिया इस्लामिया  की  स्थापना की गयी थी . इसलिए जामिया को भारत की आज़ादी के आन्दोलन की एक पवित्र संस्था के रूप में याद किया जाता है क्योंकि यह आजादी की लड़ाई की  धरोहर  है .

जामिया मिलिया इस्लामिया की  स्थापना करने वालों में शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन  ,मौलाना मुहम्मद अली जौहर हकीम अजमल खान डॉ मुख़्तार अंसारीख्वाजा अब्दुल मजीद और डॉ जाकिर हुसैन  प्रमुख थे . जामिया की स्थापना १९२० में हो गयी थी लेकिन अपना कैम्पस नहीं था . १९२५ में हकीम अजमल खां के सौजन्य से जामिया को करोल बाग़ में जगह मिल गयी लेकिन वह बहुत छोटी जगह थी . जब डॉ जाकिर हुसैन साहब इस विश्वविद्यालय को उस वक़्त के ओखला गाँव में लाये तब खूब जगह मिली और आज यूनिवर्सिटी खासी बड़ी  जगह में है . शुरू में तो यहाँ जामिया के स्टाफ के लोगों ने ही घर आदि बनवाए लेकिन आज यह मुसलमानों की एक बड़ी आबादी है . उसी आबादी में  शाहीन बाग़ भी एक मोहल्ला है . इसलिए शाहीन बाग़ में जो महिलाएं आज इकठ्ठा हुई हैं वे महात्मा गांधी की आज़ादी के लड़ाई वाली उसी विरासत का हिस्सा हैं. डॉ जाकिर हुसैन कहा करते थे कि जामिया मिलिया  इस्लामिया वास्तव में शिक्षा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के एक  संघर्ष का आन्दोलन है . उन्होंने दावा किया था कि यह  भारतीय मुसलमानों के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार करेगा जिसके केंद्र में तो इस्लाम होगा लेकिन वह सभी भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीय संस्कृति के विकास का मार्ग तय करेगा ." उसी राष्ट्रीय संस्कृति के केंद्र  में आज महात्मा गांधी के सत्याग्रह के तरीकों का  इस्तेमाल  करते हुए इतना बड़ा आन्दोलन खडा हो गया है कि स्थापित सत्ता  की समझ में नहीं आ रहा  है कि स्थिति को कैसे संभाला जाए .
शाहीन  बाग़ का  धरना शुरू हुए एक महीने से ऊपर हो गया है . उसी की प्रेरणा से देश के बहुत   सारे शहरों में नागरिकता संशोधन विधेयक ( सी ए ए )के खिलाफ औरतों के धरने शुरू हो चुके हैं .इलाहाबाद मुंबई कोटा बेगूसरायपटना भोपाल ,  कोलकता आदि में शाहीन बाग़ की तर्ज पर लोग जमा हो रहे हैं और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं . सरकार की कोशिश  है कि आन्दोलन को अब शान्ति पूर्वक समाप्त किया जाये लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है . दिल्ली के जामा मस्जिदसीलम पुर और जामिया में शुरू हुए सी ए ए के विरोध को ख़त्म करने के लिए बल प्रयोग करने और उसे मूल रूप से मुसलमानों  का आन्दोलन साबित करने की सरकार की कोशिश उल्टी पड़ चुकी है . अब यह साबित हो चुका है कि आन्दोलन केवल मुसलमानों का नहीं है बल्कि सभी धर्म और समुदाय के लोग इसमें शामिल हैं . सबसे दिलचस्प बात यह  है कि सी ए  ए के  विरोध में हुए आन्दोलन ने एक बार फिर पूरी ताक़त से स्थापित कर दिया है कि सत्ता का विरोध करने के लिए असहयोग और  सत्याग्रह नाम के जो हथियार महात्मा गांधी ने दिया था वे अभी भी उतने ही कारगर हैं जितने तब थे . सत्ता की तोप बन्दूक के  सामने  निहत्थे इंसान की ताकत का इस्तेमाल का गांधी जी का जो तरीका  था ,अब पूरी दुनिया में सफलता पूर्वक अपनाया जा रहा है . सत्ता की दौड़ में शामिल भारतीयों में एक तरह का शक  पैदा हो रहा था कि कहीं गांधी जी के हथियार भोथरे तो नहीं हो रहे हैं .  शाहीन बाग़ की निहत्थी औरतों  ने उसको एक बार फिर  सही  सन्दर्भ में रख दिया है .

Thursday, January 9, 2020

सबीहा हाशमी जिन्होंने मेरी ज़िंदगी बदल दी .


 ( विभा जी की प्रस्तावित किताब के लिए लिखा गया लेख )



शेष नारायण सिंह

इस बार मुंबई की यात्रा में साहित्यकार, रंगकर्मी, संस्कृति की संरक्षक ,संगीतकार विभा जी ने बताया कि एक किताब छाप रही हैं जिसमें कुछ लेखकों आदि के संस्मरण छापे जायेंगें .  आजकल मुझे  भी  संस्मरणों के लेखक के रूप में मेरे मित्रों के बीच में मान्यता मिलना शुरू हो गयी है .शायद इसीलिये उन्होंने मुझको भी उस किताब में कुछ लिखने के लिए आमंत्रित कर दिया और वही सन्देश जो सब को भेजा गया था ,मेरे पास भी भेज दिया .  अपने जीवन में सबसे अहम भूमिका निभाने वाली स्त्री के बारे में लिखना है . मेरे लिए बहुत आसान था क्योंकि अपनी माताजी के बारे में बात करते हुए उनकी महानता की बात करके  मैं कभी नहीं अघाता .लेकिन उन्होंने कहाकि माताजी के बारे में नहीं लिखना है क्योंकि सबकी माताजी महान  होती हैं . जो मेसेज उन्होंने लिखने  वालों के लिए भेजा था , उसको ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ :----------
" आप सबके जीवन में कोई एक ऐसी स्त्री आई होगी, जो आपकी जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर चली गई होगी। वह कौन थी, क्या थी, उसकी फितरत क्या थी? कैसे वह आपकी जिंदगी में आई? आपके जीवन में क्या बदलकर चली गई? क्या आपको देकर गई? क्या आपसे लेकर गई

मेरी स्त्री ! 

इसके तहत आप अपने जीवन की किसी एक स्त्री के बारे में 2000 से 2500 शब्दों में हमें लिखकर भेजें। बस, ध्यान यह रहे कि यह स्त्री आपकी सगा सम्बन्धी न हो। माने वह आपकी मां, बेटी, पत्नी, सास आदि न हो। समाज की स्त्री। समाज से ली गई स्त्री । यह स्त्री आपकी  नायिका भी हो सकती हैं या खलनायिका भी।
पंद्रह दिन के भीतर आपका आलेख मिल जाने से हम आपके आभारी होंगे। "


विभा जी  इस मेसेज के बाद यह तय हो गया कि अपनी बेटियों , बहनों  ,पत्नी या अन्य किसी संबंधी के बारे में नहीं लिखना है . माताजी के बारे में तो नहीं ही लिखना है .
उनके आदेश के बाद मैंने अपने बचपन से लेकर अब तक की महिलाओं के बारे में सोचना  शुरू किया . अपने घर की स्त्रियों के अलावा  किसी से कोई परिचय तक नहीं था. प्राइमरी स्कूल में तो शायद एकाध लडकियां पढ़ती थीं लेकिन हाई स्कूल और  इंटरमीडिएट की कक्षा में न ही कोई लडकी सहपाठी थी और न ही कोई  स्त्री शिक्षक  के रूप में तैनात  थी .  बी ए में महिला शिक्षक तो थीं लेकिन मेरे क्लास में जो एकाध लडकियां थीं , उनसे किसी तरह का कोई संवाद नहीं था . एम ए की क्लास में  कई  लडकियां सहपाठी थीं. उनमें से  कुछ से दोस्ती भी हुयी लेकिन करीब डेढ़ साल में ऐसी कोई घटना नहीं है जिसके बारे में कहा जा सके कि ," :----------" आप सबके जीवन में कोई एक ऐसी स्त्री आई होगी, जो आपकी जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर चली गई होगी " .  दिल्ली  आने  के बाद  ऐसी महिलाओं से मेरा परिचय होना शुरू हुआ जो सामान्य पारिचय की श्रेणी में रखा जा सकता है . जे एन यू की कई छात्राओं ने बहुत मदद की .  वह ऐसा विश्वविद्यालय  है जहां इंसानी  रिश्ते सम्मान पाते हैं .  अपने शुरुआती वर्षों में जे एन यू का स्तर  इतना ऊंचा था कि आई ए एस जैसी नौकरियों  का इम्तिहान देना उस कैम्पस में तौहीन माना जाता था .अस्सी के दशक में कुछ लड़कों ने चुपचाप आई ए एस की परीक्षा दी और लगभग सभी सफल हुए . उसके बाद वहां प्रवेश के लिए देश के उन इलाकों से आने  वाले छात्रों की भीड़ आने लगी जो आई ए एस या उसी स्तर की अन्य केंद्रीय नौकरियों में जाना अपने जीवन का उद्देश्य मानते थे . कुछ  लड़कों को प्रवेश मिल  जाता था , बहुतों को नहीं मिलता था . आज जो लोग जे एन यू के बारे में उल्टी सीधी बकवास करते पाए जाते हैं , उनमें बड़ी संख्या उन लोगों  की है जो कम से कम  एक बार जे एन  यू में प्रवेश की परीक्षा में शामिल हो चुके हैं  और फेल हो चुके हैं . उनमें से कई आई ए एस  आदि में भी हैं , कुछ नेता हैं और कुछ पत्रकार हैं . उनकी अपनी कुंठाएं  हैं और उनकी अपनी मजबूरियां जिसके चलते वे  जवाहारलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बारे में ऊल जलूल बातें करते रहते हैं . उनकी अपनी कुंठाएं उनको  अभी तक नहीं  छोड़ रही हैं जबकि उनमें से बहुत सारे तो अब चौथेपन को प्राप्त हो चुके  हैं.
इसी विश्वविद्यालय के सौजन्य से मुझे उस स्त्री से मुलाक़ात का सौभाग्य मिला जिसका मेरे ऊपर बहुत ही  एहसान है . मेरे एक बेहद  करीबी दोस्त की बड़ी  बहन हैं वे . उनकी अम्मा हमारे सभी दोस्तों की अम्मा थीं लेकिन पूरा परिवार  ऐसा है जिसने   किसी भी शोषित पीड़ित की मदद करने में हमेशा पहल की . दिल्ली के एक करखनदार परिवार में उसका जन्म हुआ था . मुल्क  के बंटवारे की तकलीफ को उनके  परिवार ने  बहुत करीब से झेला था. उनके परिवार के लोग जंगे-आज़ादी की अगली कतार में रहे थे. उनके पिता ने  हिन्दू कालेज के छात्र के रूप में बंटवारे के दौर में इंसानी बुलंदियों को रेखांकित किया था लेकिन बंटवारे के बाद  परिवार टूट गया . कोई पाकिस्तान चला गया और कोई हिन्दुस्तान में रह गया . उसके दादा मौलाना अहमद सईद ने पाकिस्तान के चक्कर में पड़ने से मुसलमानों को आगाह किया था और जिन्ना का विरोध किया था . मौलाना अहमद सईद देहलवी ने 1919 में अब्दुल मोहसिन सज्जाद , क़ाज़ी हुसैन अहमद , और अब्दुल बारी फिरंगीमहली के साथ मिल कर जमीअत उलमा -ए - हिंद की स्थापना की थी. जो लोग बीसवीं सदी के भारत के इतिहास को जानते हैं ,उन्हें मालूम है कि जमियत उलेमा ए हिंद ने महात्मा गाँधी के १९२० के असहयोग आन्दोलन को इतनी ताक़त दे दी थी कि अंग्रेज़ी साम्राज्य की बुनियाद हिल गयी थी .उसके बाद ही अंग्रेजों ने  हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालने के अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया था. 

जमीअत उस समय के उलेमा की संस्था थी . खिलाफत तहरीक के समर्थन का सवाल जमीअत और कांग्रेस को करीब लाया था . जमीअत ने हिंदुस्तान भर में मुसलमानों को आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और  बाद में जब मुहम्मद अली जिन्नाह ने पाकिस्तान की मांग की तो उसका ऐलानियाँ विरोध किया . मौलाना अहमद सईद साहेब भारत में ही रहे और परिवार का एक बड़ा हिस्सा भी यहीं रहा लेकिन कुछ लोगों के चले जाने से परिवार  तो बिखर गया ही था.

इसी परिवार में आठ नवम्बर ११९४९ को दिल्ली के  कश्मीरी गेट मोहल्ले में सबीहा हाशमी का जन्म  हुआ था. बंटवारे के बाद परिवार पर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा था लेकिन उनके माता  पिता ने हालात का बहुत ही बहादुरी से मुकाबला किया  अपनी पाँचों औलादों को इज्ज़त की ज़िंदगी देने की पूरी कोशिश की और कामयाब हुए. उनके सारे भाई बहन बहुत ही आदरणीय लोग हैं . १९४७ के बाद जब दिल्ली में कारोबार लगभग ख़त्म हो गया तो डॉ जाकिर हुसैन और प्रो नुरुल हसन की   प्रेरणा से उनके पिताजी अपने बच्चों के साथ अलीगढ़ शिफ्ट हो गए . बाद में उनकी माँ को  दिल्ली में नौकरी मिल गयी तो बड़े बच्चे अपनी माँ के पास दिल्ली में आकर पढाई लिखाई करने लगे . छोटे बच्चे अलीगढ में ही  रहे. कुछ साल तक परिवार  दिल्ली और  अलीगढ के बीच झूलता रहा . बाद में सभी दिल्ली आ  गए . इसी दिल्ली में आज से  चालीस साल  पहले मेरी उनसे मुलाक़ात हुयी थी.

जो लोग सबीहा को  जानते हैं उनमें से कोई भी बता देगा  कि उन्होंने सैकड़ों ऐसे लोगों की जिंदगियों को जीने लायक बनाने में योगदान किया है जो  अँधेरे भविष्य की ओर ताक  रहे  थे. वह किसी भी परेशान इंसान की  मददगार के रूप में अपने असली  स्वरुप में आ  जाती  हैं . लगता है कि  आर्थिक अभाव में बीते अपने बचपन ने उनको एक ऐसे इंसान के रूप में स्थापित कर दिया है जो किसी भी मुसीबतजदा इंसान को दूर से ही पहचान लेता है और वे फिर बिना उसको बताये उसकी मदद की योजना पर काम करना शुरू कर देती हैं .   सबीहा हाशमी ने  सैकड़ों लोगों पर एहसान किया है लेकिन उसको वे कभी किसी से बताती नहीं हैं . उनकी शख्सियत की यह खासियत मैंने पिछले चालीस  वर्षों में बार बार देखा  है . गांधी जी के प्रिय भजन , "  वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर पराई जाने रे, पर दुक्खे उपकार करे ,मन अभिमान न माने रे ."  वाली पंक्तियाँ उन पर बिलकुल सटीक बैठती हैं . उन्होंने कभी किसी से नहीं बताया कि किसी की उन्होंने मदद की है , कभी नहीं .
दिल्ली के एक बहुत ही विख्यात  पब्लिक  स्कूल में आप आर्ट पढ़ाती थींएक दिन उनको पता लगा कि बहुत ही कम उम्र के किसी बच्चे को कैंसर हो गया है . कैंसर की शुरुआती स्टेज थी . डाक्टर ने बताया कि अगर  बच्चे का इलाज तुरंत हो जाये तो उसकी ज़िंदगी बच सकती थी. अगले एक घंटे के अंदर आप अपने शुभचिंतकों से बात करके प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर चुकी थीं. बच्चे का इलाज हो गया . अस्पताल में ही जाकर जो भी करना होता था , किया . बच्चे की इस मदद को अपनी ट्राफी नहीं बनाया . यहाँ  तक कि उनको मालूम भी नहीं कि वह बच्चा कहाँ है . ऐसी अनगिनत मिसालें हैं . किसी की क्षमताओं को पहचान कर उसको बेहतरीन अवसर दिलवाना उनकी पहचान का हिस्सा है . उनके स्कूल में एक लड़का  उनके विभाग में चपरासी का काम करता था. पारिवारिक परेशानियों के कारण पढाई पूरी नहीं कर सका था . उसको  प्राइवेट फ़ार्म भरवाकर पढ़ाई पूरी करवाया और  बाद में वही लड़का बैंक के प्रोबेशनरी अफसर की परीक्षा में  बैठा और आज बड़े  पद पर  है .  उनके दफ्तर के  एक  अन्य सहयोगी की मृत्यु के बाद उसके घर गईं, आपने भांप लिया कि सहयोगी की विधवा को उस  परिवार में परेशानी ही परेशानी होगी. अपने दफ्तर में उसकी  नौकरी  लगवाई. उसकी आगे की पढ़ाई करवाई और आज वह महिला एक बहुत बड़े स्कूल में  शिक्षिका है . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं ,लिखना शुरू करें तो किताब बन जायेगी . आजकल आप बंगलौर के पास के जिले रामनगर के एक गाँव में विराजती हैं और वहां भी  कई लड़कियों को अपनी
ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं .   उस गाँव की कई बच्चियों के माता पिता  को हडका कर सब को शिक्षा पूरी करने का माहौल बनाती हैं और उनकी फीस  आदि का इंतज़ाम  करती रहती हैं . अपने लिए सबीहा ने कभी  किसी से कोई आर्थिक मदद नहीं ली लेकिन अगर किसी  मुसीबतज़दा को मदद करना हो तो अपने बच्चों , पुराने  छात्रों आदि से बेझिझक मदद लेती हैं .  
सबीहा अपनी औलादों के लिए कुछ भी कर सकती हैं , कुछ भी . दिल्ली के पास गुडगाँव में उनके बेटे ने अच्छा ख़ासा  घर बना दिया था लेकिन जब उनको लगा कि उनको बेटे के पास बंगलौर रहना ज़रूरी है तो उन्होंने यहाँ से सब कुछ ख़त्म करके बंगलोर शिफ्ट करना उचित   समझा लेकिन  बच्चों के सर  पर बोझ नहीं बनीं, उनके घर में रहना पसंद नहीं किया .अपना अलग घर बनाया और आराम से  रहती हैं. इस मामले में खुशकिस्मत हैं  कि उनकी सभी औलादें अब बंगलौर में ही हैं . सब को वहीं काम मिल गया है .आपने वहां एक ऐसे गाँव में ठिकाना  बनाया है जहां जाने  के लिए सड़क भी नहीं है.अब सत्तर साल की उम्र हो गयी है , उनके बाल सफ़ेद हैं ,गाँव का हर इंसान उनको अज्जी कहता है . मुख्य सड़क से  काफी दूर पर उनका घर है लेकिन वहां से हट नहीं सकतीं क्योंकि गाँव का हर परेशान परिवार अज्जी की तरफ उम्मीद की नज़र  से देखता है . अपने इस नए  गाँव की बच्चियों से हस्तशिल्प के आइटम बनवाती हैं , खुद  भी लगी रहती हैं और बंगलौर शहर में जहां भी कोई प्रदर्शनी लगती है उसमें बच्चों के काम को प्रदर्शित करती हैं , सामान की बिक्री से  जो भी आमदनी होती है उसको उनकी फीस के डिब्बे में डालती रहती  हैं . उसमें से  अपने लिए एक पैसा नहीं लेतीं .उनके तीनों ही बच्चे यह जानते हैं और अगर कोई ज़रूरत पड़ी तो हाज़िर रहते हैं.  
मेरे जीवन में उनकी भूमिका बहुत ही बड़ी है. मैं उनके भाई का दोस्त ही तो हूं लेकिन मुझे उन्होंने रास्ता दिखाया  और सिस्टम से ज़िंदगी जीने की तमीज सिखाई .मैं एक ऐसा आदमी था जो  रोज़गार की  तलाश में दिल्ली तो आ गया था लेकिन इस महानगर में पूरी तरह से कनफ्यूज़ था . छोटे शहर और गाँव से आया मैं दिल्ली में दिशाहीनता की तरफ बढ़ रहा था . रोज़गार  तो छोटा मोटा मिल गया था लेकिन परिवार गाँव में था. मैं अपनी पत्नी और दो  बच्चों को इसलिए दिल्ली नहीं ला रहा था कि रहेंगे कहाँ . सबीहा ने मुझे  डांट डपट कर इस बात पर राजी किया कि बच्चों और अपनी पत्नी को दिल्ली लेकर आऊँ . किराये के मकान में  रखवाया और बच्चों को  तुरंत स्कूलों में प्रवेश दिला दिया . दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में प्रवेश बहुत कठिन मंजिल होती है लेकिन वे दिल्ली के एक बहुत ही ठसकेदार पब्लिक स्कूल में  बाइज्ज़त  टीचर थीं इसलिए शहर के बहुत संपन्न लोगों के बच्चों के मातापिता भी उनका बहुत सम्मान करते थे . मेरी तीसरी औलाद बेटी है. जब वह दिल्ली में  पैदा हुई तो मेरी पत्नी इंदु की देखभाल का पूरा ज़िम्मा उन्होंने ले लिया . जिस दिन मेरी बेटी पैदा हुई, मेरी पत्नी को लेकर अस्पताल  गयीं और सारा इंतज़ाम किया . मेरे वही बच्चे अब उच्च शिक्षित हैं और अपनी ज़िन्दगी संभाल रहे  हैं, अच्छी पढाई लिखाई कर चुके हैं  . मैं सुल्तानपुर से डिग्री कालेज के लेक्चरर की नौकरी  छोड़कर आया  था. मुझे मुगालता था कि उसी स्तर का काम मिलेगा तो करूंगा . उन्होंने मुझे  समझाया कि जो भी काम मिले , कर लो . बंधी बंधाई तनख्वाह मिलेगी  तो गृहस्थी चल निकलेगी .आज सोचता हूँ कि अगर उनकी बात न मानी होती तो पता नहीं किस रूप में ज़िंदगी चल  रही होती .मैं आज पत्रकारिता के कई हल्कों  में पहचाना जाता हूँ लेकिन  रोज़ लिखने की प्रेरणा  मुझे सबीहा  हाशमी ने ही दिया था .

सबीहा में हिम्मत और हौसला बहुत ज्यादा है . आपने चालीस साल की उम्र में रॉक क्लाइम्बिंग सीखा और  बाकायदा एक्सपर्ट बनीं, अडतालीस साल की उम्र में कार चलाना सीखा .  चालीस की उम्र पार करने के बाद चीनी भाषा में  उच्च शिक्षा ली.  नई दिल्ली के नैशनल म्यूज़ियम इंस्टीच्यूट ( डीम्ड यूनिवर्सिटी ) से पचास साल की उम्र में पी एच डी किया . जब मैंने पूछा कि इतनी उम्र के बाद पी एच डी से क्या फायदा होगा आपने कहा कि ,"यह मेरी इमोशनल  यात्रा है . मेरे अब्बू की इच्छा थी कि मैं  पी एच डी करूं. उनके जीवनकाल में तो नहीं कर पाई लेकिन अब जब भी मैं उसके लिए पढ़ाई  करती हूँ तो लगता है उनको श्रद्धांजलि दे रही हूँ ." सबीहा कहती हैं कि उनके दिमाग में एक फ़िल्टर  लगा है जिसके कारण वे  उन  बातों को भूल जाती हैं  जो तकलीफ देने  वाली होती हैं . उनके साथ ज़िंदगी में बहुत सारे धोखे हुए  हैं  लेकिन  कभी किसी का उल्लेख नहीं करतीं.   उनकी किसी भी बात को मैं आज भी दरकिनार नहीं कर सकता .

जे एन यू से जवाब आया है कि सिर पर पड़ने वाली गुंडों की लाठी का जवाब बहस से देगें, खंडन मंडन से देंगे।




शेष नारायण सिंह 

याद आया, डॉ जयशंकर यही वह यूनिवर्सिटी है न जिसने हर हमले को बातचीत से भोथरा बनाया था। तुम्हारे छात्रजीवन में ही इन्हीं छात्रावासों के मेस में सारी रात चलने वाली बहसों से इंदिरा गांधी की इमरजेंसी निजाम को तहस नहस किया गया था। जब घायल सिर और हाथ पर पट्टी बांधे आइशी घोष ने ऐलान किया कि लाठी डंडे का जवाब अहिंसा से दिया जाएगा तो क्या आपको नहीं लगा कि वह आपके क्लास की कोई लड़की है जो एल-3 के कमरे में हो रही किसी बहस में अपने जज़्बे का ऐलान कर रही है और आपकी यूनिवर्सिटी का घोषणापत्र पढ़ रही है।
यह वही यूनिवर्सिटी है जिसने बहुत सारे गरीब और अमीर माँ बापों के बच्चों को इंसानी बुलंदियों की इज़्ज़त करने की तमीज़ सिखाई थी।
और निर्मला सीतारमण, यह वही यूनिवर्सिटी है जहां किसी से भी मतभेद को लाठी से नहीं बातचीत से सुलझाया जाता था। क्या आपको याद है कि जे एन यू का कैम्पस किसी भी लड़की के लिए मां की गोद से भी ज़्यादा सुरक्षित माना जाता था। क्या आपको याद है जब भी किसी ने किसी student, कर्मचारी या शिक्षक के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तो उसके खिलाफ पूरी यूनिवर्सिटी लामबंद हो जाती थी।
उसी कैम्पस में कल गुंडों ने आपके सेंटर के लड़के लड़कियों की हड्डियों का चूरमा बनाया और आप लोग मजबूर हैं और न्याय के लिए पहल नहीं कर पा रहे हैं।
जे एन यू की शान के लिए डेढ़ साल तक जेल में रहने वाले डी पी त्रिपाठी के शरीर को हम अभी कल अग्नि को समर्पित करके आए हैं और आज ही आपके कैम्पस में गुंडों ने तीन घंटे तक खूंरेजी की।
मन में तो आपके भी तकलीफ होगी ही।

यह सरकार तो अब दुआ के सहारे ही चल रही है क्योंकि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था अवाम को तबाह करने पर आमादा है



शेष नारायण सिंह

इस बार की मुंबई यात्रा संक्षिप्त रही . तीन चार दिन रहा. लगभग रोज़ ही  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफलता की दुआ करता रहा . मैंने अपने उन दोस्तों के साथ बैठकर दुआ की जो आज के छः साल पहले तक मुतमइन थे कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद संभालते ही देश में कारोबार करने वालों को ज़बरदस्त सफलता मिलेगीउद्योग जगत में बदलाव  आयेगा और अर्थव्यवस्था के मामले में भारत बड़ी सफलता हासिल करेगा . वही लोग अब निराश नज़र आ रहे हैं . और प्रार्थना कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था को  पटरी पर लाने में सफलता प्राप्त करें क्योंकि सभी व्यापारी हैं और  कारोबार बिलकुल ठप पड़े हैं . इसी मुंबई यात्रा के समय ही आर्थिक विकास और जीडीपी की विकास दर के ताज़ा आंकड़े भी आ गए .सब कुछ आर्थिक अखबारों की सुर्ख़ियों में था.  जो कुछ छपा था उससे पूरे देश में बहुत ही निराशा हो गयी.  मुम्बई के सेठ साहूकार दुखी हो गए . जीडीपी की वृद्धि में खेतीकारखाने का उत्पादन और निर्यात का बड़ा योगदान होता है . लेकिन इन तीनों ही क्षेत्रों में प्रगति बहुत ही निराशाजनक  है . रोज़गार की हालत पिछले ४५ साल में सबसे खराब मुकाम पर है . उसी दिन मुंबई में इंडियन एक्सप्रेस के एक्सप्रेस अड्डा कार्यक्रम में अर्थशास्त्र के इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता  डूफ्लो और अभिजीत बनर्जी भी थे . उन्होंने भी अर्थव्यवस्था के बारे में चेतावनी दे दी कि भारत आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है . उन्होंने  संभलने की सलाह दे दी .मुंबई देश की आर्थिक राजधानी हैं और वहां इस तरह की निराशा का माहौल निश्चित रूप से चिंताजनक था. इन मुलाकातों में  कुछ ऐसे लोगों से भी बातचीत हुई जो कह रहे थे कि मैंने तो पहले ही बता दिया था कि अर्थव्यवस्था का कुशल प्रबंधन नरेंद्र मोदी के बस की बात नहीं है .यह वे लोग थे जिनकी एक ख़ास किस्म की राजनीति है . मैं  जानता हूँ कि देश में  एक बड़े वर्ग के नेता और उनके समर्थक  नरेंद्र मोदी को हटाकर खुद सत्तासीन होना चाहते हैं . मुझे भी कोई एतराज नहीं है . कोई भी चुनाव जीतकर  आये और देश का कामकाज संभाल ले एक नागरिक को उसमें क्या दिक्क़त हो सकती है . लेकिन आज अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर  पंहुच गयी है ,उसमें यही दुआ की जानी चाहिए कि  जो भी हमारी  आर्थिक नैया का खेवैया है ,वह सफल हो वह हम सबको पार ले जाए  क्योंकि उसके डूबने का मतलब यह  है कि हम भी डूब जायेंगें . उन्होंने नीतियों को अपने हिसाब से डिजाइन किया है और उनकी रणनीति में  कोई ऐसी बात ज़रूर होगी जिससे वे चीज़ों को संभाल लेंगे लेकिन फ़िलहाल ऐसे कोई लच्छन तो नहीं दिख रहे है . साधारण आदमी को तो आर्थिक व्यवस्था की मंदी ही दिख रही है .  निराशा के इस माहौल में मेरी मुलाक़ात बीजेपी के कुछ महत्वपूर्ण नेताओं से भी हुई . उनका कहना था कि  चिंता की कोई बात नहीं है . मोदी जी सब संभाल लेंगें . मैं नरेंद्र मोदी का समर्थक नहीं हूँ लेकिन  जब कोई भी यह तसल्ली देता है कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के रूप में अर्थव्यवस्था को संभाल लेंगें तो  उम्मीद बनती है .इसका कारण यह है कि अगर नरेंद्र मोदी सफल न हुए तो देश बहुत पीछे चला जाएगा. वे कैसे संभालेंगे यह वे जानें लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हम अर्थव्यवस्था को डूबता नहीं देखना चाहते .
सच्चाई यह है कि  आज की सरकार ने अर्थव्यवस्था को ऐसे मुकाम पर लाकर  खड़ा कर दिया है जहां से उसके संभलने की संभावनाएं प्रतिदिन ही कमज़ोर पड़ती जा रही हैं . २०१४ में जब बीजेपी ने सत्ता संभाली थी तो देश में डॉ मनमोहन  सिंह की सरकार के खिलाफ इस तरह का माहौल बना दिया  गया था कि वह अब तक की सब से भ्रष्ट सरकार  है . उनके खिलाफ आर एस एस ने दिल्ली में बड़ा आन्दोलन करवाया . महाराष्ट्र से अन्ना हजारे नाम के एक पुराने फौजी को लाया गया . अन्ना के कैम्प में अपने लोगों को अहम रोल दिलवाकर आर एस एस/बीजेपी ने कोशिश की थी कि इस आन्दोलन को कांग्रेस के खिलाफ तूफ़ान के रूप में खड़ा कर दिया जाए. यह बिलकुल सही राजनीति थी और हर राजनीतिक पार्टी को अपने लाभ के लिए काम करना चाहिए . आर एस एस की कोशिश थी कि कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बनाकर पेश कर दिया जाए उसमें उन्हें सफालता भी मिली. वह योजना २०१४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पक्की जीत दिलवाने की रणनीति थी और उसमें सफलता भी मिली. यह अलग बात है कि उसी अन्ना के आन्दोलन  से एक ऐसी शाखा भी निकल पडी जो आज आम आदमी पार्टी के रूप में दिल्ली की सरकार पर काबिज़ है और बीजेपी के लिए बड़ी चिंता का कारण है. अन्ना हजारे के उसी आन्दोलन के बाद  नरेंद्र मोदी की जीत वाला २०१४ का  चुनाव हुआ. नतीजा सामने  है . बीजेपी सत्ता में विधिवत काबिज़ है .लेकिन यह सरकार अपने ज्यादातर वायदे पूरी करने में नाकाम रही है . यह अलग बात है कि बीजेपी वाले यह दावा करते रहते हैं कि उन्होंने अपने अस्सी प्रतिशत वायदे पूरे कर दिए  हैं .

भ्रष्टाचार का खात्मा करने और देश को अच्छे दिन के वायदे के साथ आई सरकार आज देश की आर्थिक राजधानी में चौतरफा निराशा का सबब  बनी हुई है .  देश को आर्थिक मंदी के मुहाने पर ले जाने वाली इस सरकार से देश को बहुत उम्मीद थी  लेकिन इस सरकार ने आर्थिक क्षेत्र के विद्वान व्यक्तियों को एक एक करके विदा कर दिया . रघुराम राजन , अरविन्द पनगढ़िया, अरविन्द सुब्रमण्यम , उर्जित पटेल जैसे लोग आज  देश की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन से बाहर हो चुके  हैं. जिन लोगों के पास देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने की ज़िम्मेदारी है वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि क्या करना है . पिछले बजट की सारी बातें सरकार पलट चुकी है . किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि जाना किधर है . जो भी स्कीमें  वित्त प्रबंधन के लिए लाई जाती हैं उनसे नुकसान ज़्यादा हो रहा है . रियल एस्टेट में आयी तबाही के कारण देश के मध्यवर्ग के बड़े लोगों के सपने टूट चुके हैं . हालांकि  नोटबंदी की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री ने साफ़ कहा था कि आम आदमी को घर खरीदने में सुविधा होगी  . ऐसा  नहीं हुआ .रियल एस्टेट के कारोबार के  बर्बाद के हो जाने के बाद उसमें  फिर से जान फूंकने के लिए सरकारी खजाने से  बहुत बड़ी रक़म देनी  पड़ रही है .

आज स्थिति यह है कि आर्थिक कमजोरी को ठीक करने के लिए कोई दवा काम नहीं आ रही है . सरकार आर्थिक मोर्चे पर फेल हो चुकी है . उस हालत में जब कोई भी दवा काम नहीं कर रही है तो दुआ के अलावा कोई रास्ता नहीं है . मेरे  बचपन में भी ऐसा ही होता था . गाँव में चारों तरफ खुशी का माहौल रहता था जब तक कोई बीमार न पड़ जाये. बीमार होने पर इलाज़ की सुविधा न के बराबर होती  थी. आजादी के बाद  विकास की इकाई के रूप में ब्लाक को स्थापित किया जा चुका था. नेहरू के विज़न का नतीजा  था कि हर ब्लाक में  छोटे  छोटे सरकारी अस्पताल खुल गए थे और उन अस्पतालों में मामूली बीमारियों का इलाज मुफ्त में ही हो  जाता था लेकिन अगर बीमारी वहां नहीं संभल सकती थी तो जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता था . वहां भी इलाज मुफ्त  ही होता था लेकिन जिला अस्पताल जाना ही लोगों के लिए पहाड़  होता था . ऐसी हालत में गाँव के बड़े बुज़ुर्ग कहते थे कि ,अब  इनकी सेहत दवा से नहीं दुआ से ठीक होगी . फिर दुआ ही का रास्ता बचता था . आज अपनी अर्थव्यवस्था की हालत वैसी ही हो गयी है . जब नरेंद्र मोदी ने २०१४ में सत्ता संभाली तो देश की आर्थिक स्थिति ढलान पर थी . माहौल ऐसा बना कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार की विदाई हो गयी . एक नई सरकार आ गयी . किसी भी सरकार का ज़िम्मा  आर्थिक स्थिति को सुधारना होता है लेकिन मौजूदा सरकार उस मोर्चे पर फेल हो गयी है . सरकारी प्रवक्ता और उनकी पार्टी के नेता कहते हैं कि सरकार ने काम भी किया लेकिन  आज छः साल बाद स्थिति  यह है कि देश की आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है . . 
अभी विश्व बैंक के आंकड़े आये हैं . विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2019-2020 में भारत के लिए पांच प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया है और भारत के जीडीपी विकास दर के अनुमान को घटा दिया है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष 2019-2020 में भारत की जीडीपी में विकास की दर फीसदी रह सकती है.विश्व बैंक का अनमान है कि भारत से तेज विकास दर बांग्लादेश की होगीजहां इस वित्त वर्ष जीडीपी में प्रतिशत रहेगी .  
हमारे अपने सरकारी आंकड़ों में भी देश के आर्थिक भविष्य की बहुत ही मुश्किल तस्वीर पेश की गयी है .केंद्र सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा जारी पूर्वानुमान में भी कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष 2019-2020 में देश की जीडीपी में  5 फीसदी का विकास होगा . सीएसओ के अनुसार  2019-20 में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पांच फीसदी रहेगी इतनी बीरी हालत  11 साल में पहली बार हुयी है .यह आंकड़े लगातार गिर रहे  हैं क्योंकि 2018-19 में जीडीपी की  विकास दर 6.8% उसके पहले वाले साल 2017-18 में जीडीपी की विकास  दर 7.2 प्रतिशत थी . 
भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान भी कोई बहुत अच्छे नहीं   हैं . आई एम  एफ की  मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जियोर्जिवा ने कहा कि भारत ने बुनियादी चीजों पर बेहतर काम किया है लेकिन अर्थव्यवस्था से जुड़ी कई ऐसी समस्याएं हैं जिसका हल करना जरूरी है. खास तौर पर नॉन-बैंकिंग क्षेत्र में हालात बेहतर करने की जरूरत है.
आर्थिक स्थिति की इस मंदी के बीच सरकार का कोई भी आदमी अर्थव्यवस्था की इस खस्ता हालत को स्वीकार करने के लिए तैयार  नहीं है . सत्ताधारी दल के किसी भी  कार्यकर्ता से बात करिए तो वह ऐसे मुद्दों की बात करने लगेगा जिसके कारण अर्थव्यवस्था में कोई लाभ नहीं होता लेकिन भावनात्मक मुद्दों को हवा मिलती है . सवाल यह है कि भावनातमक मुद्दों से कब तक देश चलेगा . अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए .

डी पी त्रिपाठी की याद उनके जाने के दो दिन बाद


शेष नारायण सिंह

१९७३ में सुल्तानपुर शहर में सबसे जीवंत जगह मुझे बस अड्डे के अन्दर मौजूद अखबार की दुकान लगती थी . उसी दुकान पर  इलाहाबाद से छपने वाली एक पत्रिका ,” आगामी कल “ का दर्शन हुआ था . उस  दुकान को चलाने वाले बुज़ुर्ग में बहुत ही  गंभीरता दिखती थी . . मेरे हाई स्कूल के सहपाठी , गया प्रसाद सिंह वकील बन चुके थे और सुल्तानपुर में वकालत करते थे . उनके घनिष्ठ मित्र राज खन्ना से वहीं मुलाक़ात हुयी जो आज तक बहुत ही भरोसे की दोस्ती है . ‘आगामी कल ‘ पत्रिका से राजेन्द्र अरुण, विभूति नारायण राय और देवी प्रसाद त्रिपाठी जुड़े हुए थे .उसी अखबार की दुकान पर देवी प्रसाद त्रिपाठी से पहली बार मुलाक़ात हुयी थी.  जहाँ तक मेरा सवाल है मैंने  किसी अख़बार आदि में पहली बार उसी ,’ आगामी कल ‘  में कुछ लिखा था . उन दिनों डिग्री कालेज में लेक्चरर होना इस बात का  संकेत माना जाता था कि बंदा पढ़ा लिखा होगा . मेरे बारे में भी यही मुगालता और लोगों को था . जिले के उस समय के बड़े समाजवादी नेता  त्रिभुवन  नाथ संडा  थे, वे राज नारायण के दोस्त थे , एस वाई एस के दिनों के हमारे नेता लेकिन १९७३ में सुल्तानपुर के दो बड़े नेता , कामरेड अब्दुल रहमान खान और कामरेड शीतला प्रसाद गुप्त हमारे नेता बन चुके थे. आगामी कल में धंवरुआ में किसानों की जागृति के बारे में कुछ लिख  दिया था मैंने . दर असल स्व अब्दुल रहमान खान किसानों के उस जागरण अभियान के हीरो थे .   उनकी ही बताई हुई  बातों को कलमबंद कर दिया था . देवी प्रसाद त्रिपाठी को वह बहुत पसंद आया था. हालांकि उन दिनों वे कम्युनिस्ट नहीं थे लेकिन आन्दोलन प्रिय तो थे . अब्दुल रहमान खान साहब ने किसानों के जागरण का जो  अभियान चलाया था वह शुद्ध रूप से वामपंथी था. त्रिपाठी जब मेरे कालेज  कादीपुर आये तो मुझसे बात की . लगभग मेरी की उम्र के थे लेकिन मुझसे बहुत ही ज्यादा जागरूक . बाद में जे एन यू गए ,  वहां छात्र संघ के अध्यक्ष हुए और इमरजेंसी में जेल गए . जब बाहर आए तो देश की दूसरी आज़ादी के लिए लड़ी गयी लड़ाई के हीरो थे . कादीपुर के मेरे छात्र रमाशंकर यादव और उनके दोस्त असरार खान त्रिपाठी के बहुत ही प्रिय लोग थे.  असरार खान तो कामरेड अब्दुल रहमान खान के बेटे भी हैं . 

डी पी त्रिपाठी अब चल गए , कैंसर ने उनको लील लिया .उनके अंतिम संस्कार के समय दिल्ली के लोधी रोड पर बहुत लोग आये थे . बड़ी  संख्या में वे लोग थे जिन्होंने १९७० के दशक को डी पी त्रिपाठी के साथ जे एन यू को देश की एक बुलंद संस्था बनने में योगदान किया था . सबकी आंखें नम थीं. सब अपने तरीके से उनको जानते थे . मैं भी जानता हूँ .  DPT के व्यक्तित्व की जो सबसे बड़ी बात मुझे समझ में आयी वह यह कि वह इंसान किसी के बारे में कुछ भी नेगेटिव बात नहीं करता था.लोधी शमशान पर खड़े हुए मुझको  फुटकर  यादें घुमड़ घुमड़ कर आती रहीं. जब अनिल चौधारी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो लगा कि बहुत बड़ा सहारा मिल गया है . कुलदीप कुमार को एकदम निराश देखा . इतनी तकलीफ उनके चेहरे पर मैंने कभी  नहीं देखी है . त्रिपाठी ने कुलदीप के बारे में पहली बार मुझे तब बताया था जब वे शिमला में थे . कहा कि ‘इतिहास की पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन बहुत ही कुशाग्रबुद्धि हैं ,हिंदी के बहुत अच्छे कवि हैं .‘ जब  कुलदीप कुमार  की बारे में सोचता हूँ , उनकी यह बात हमेशा याद आती रहती है . जब बलराम सिंह को जे एन यू में लाये तो  सबको बताया कि भविष्य को दिशा देगा .  सबके बारे में उनकी एक सकारात्मक राय हुआ करती थी. इमरजेंसी में जेल के दिनों में उनके साथी  हंसराज रहबर, मोहन धारिया, सुरेन्द्र मोहन और चन्द्र शेखर थे . उनके यहाँ मुझको और घनश्याम मिश्र को लेकर जाते थे .  सुरेन्द्र मोहन जी के यहाँ ही पता चला की हंसराज रहबर ने अपनी नज्म , ‘ महफ़िल में बार बार जाने को जी करे’ को  किस  तरह से तोड़ मरोड़ कर पेश किया था और अटल बिहारी वाजपेयी की फरमाइश को पूरी तो कर दिया था लेकिन उसके बाद उन्होंने फिर रहबर जी से कुछ सुनाने की फरमाइश नहीं की . 
जब मैं १९७६ में दिल्ली आया तो त्रिपाठी तिहाड़ जेल में बंद थे . घनश्याम मिश्र मुझको उनसे मिलवाने ले गए . उनकी तारीख थी . आजकल जहां संसद मार्ग  थाना है , वहीं कोर्ट हुआ करती थी. फरवरी का महीना था . लॉन में बैठकर बात हुयी . मुझसे पूछा कि क्या  सोचा है . मैंने कह दिया . कादीपुर की नौकरी  छूट चुकी है . शादी हो गयी है , एक बेटा है . कोई छोटी मोटी नौकरी करके गुज़र करना है . उन्होंने साफ़ कह दिया  कि भूल जाइए . कोई छोटी मोटी नौकरी नहीं मिलेगी .फिर से पढ़ाई कीजिये और इमरजेंसी ख़त्म होने का इंतज़ार कीजिये . उसके बाद ही कुछ सोचिये . उसके बाद जेल से जब भी तारीख पर आये, मुलाकातें होती  रहीं. जेल से बाहर आने के बाद प्रो पुष्पेश पन्त से बात करके मुझे उनके केंद्र में में ही दाखिला दिलवा दिया लेकिन मेरा मन नहीं था पढ़ाई का . मेरा बेटा दो साल का होने वाला था . मुझे तो कुछ कमाकर गहर भेजना था . 
जेल से आने के बाद  त्रिपाठी की राजनीतिक हैसियत बहुत बढ़  चुकी थी .जनता पार्टी सरकार के  कई मंत्री उनके  दोस्त थे . मोहन धारिया से कहकर मुझे उन्होंने एक  प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया लेकिन साथ ही यह वार्निंग भी दे दी थी कि कर नहीं पाओगे . लिखने पढ़ने का काम करो . उसी दौर में सर्वोदय एन्क्लेव में मिला हुआ मेरा घर उनका कैम्प कार्यालय भी हो गया था . ऐसी बहुत सी बातें हैं जो कल से आजतक घूम घूम कर  याद आती जा रही हैं . दिल्ली में मैंने बाद में पत्रकारिता आदि के क्षेत्र में जो भी किया उसके लिए मैं देवी  प्रसाद त्रिपाठी का आभारी रहूंगा . 
इमरजेंसी में जेल जाने के पहले डी पी टी ने जे एन यू यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था . वहां से रिहा होने के बाद भी   अध्यक्ष रहे लेकिन फरवरी में ही यूनियन का चुनाव करवाने के लिए अड़ गए और सीताराम येचुरी एस एफ आई के उम्मीदवार बने .  उस चुनाव का प्रचार भी क्या हंगामी था .उसी चुनाव में अनिल चौधरी को उन्होंने ज़िम्मा दिया कि शेष नारायण को सही तरीके से एजुकेट करना है . काफी सामंती तत्व इनके दिमाग में हैं . उनको  निकालना है . अनिल ने ही मुझे अवधी लहजे में शिक्षित किया .उस चुनाव के समय मैं जे एन यू में नहीं था. लेकिन चुनाव में काम किया . अशोक लता जैन, उषा मेनन और अनिल  चौधरी मुझे डिक्लास कर  रहे थे . चुनाव अभियान में मुझे सीढ़ी और एक  कनस्तर में लेई लेकर उन लोगों के साथ चलना होता था जो पोस्टर लगाते  थे . यह काम रात में होता था . घनश्याम मिश्र पोस्टर लेकर चलते थे . दिलीप उपाध्याय, साईनाथ आदि कैम्पस की  दीवालों पर पोस्टर लगाते थे .यह सभी लड़के   हमसे और घनश्याम से उम्र में कम थे लेकिन  हम सीढ़ी कंधे पर टाँगे चलते थे . डिक्लास होने के कोर्स में जाति , धर्म, उम्र , आदि के सभी बंधन तोड़ने पड़ते थे . उसी डिक्लास होने के चक्कर में बर्तन आदि  मांजने का काम भी करवाया गया . शादी के बाद प्रबीर और अशोकलता जैन  वसंत विहार के ए ब्लाक की कोठी नंबर १५ के स्टाफ क्वार्टर में किराए पर रहते थे . एक दिन अनिल चौधरी ने कहा कि उनके यहाँ दावत में जाना है . हम चले गए . पता लगा कि चौधरी साहब को वहां खाना बनाना भी है . हम उनके सहायक की भूमिका में थे . रात १२ बज गया . वापसी  पैदल ही हुयी.बाद में  त्रिपाठी ने बताया कि अब सब ठीक है , आप इंसान बन  गए हैं . उसी  दौर में जब मैंने एकाध बार अभिलाषा सिंह को राजकुमारी कह दिया तो बहुत खफा हुए और  समझाया कि ऐसा कहना अभिलाषा का अपमान है . वे  बहुत ही शालीन और वैज्ञानिक सोच वाली  हैं .  सामन्ती चोले को तिलांजलि दे चुकी हैं . 

लालचंद उनके बहुत ही प्रिय थे . हिंदी में एम ए करने आये थे और त्रिपाठी उनके लिए सबसे अच्छी बातें करते थे . मैंने पचास साल से ज्यादा की अपनी त्रिपाठी की दोस्ती में उनको कभी नेगेटिव बात करते नहीं देखा .  जे एन यू और सी पी एम की राजनीति में आला मुकाम हासिल करने के बाद दिल्ली छोड़कर इलाहाबाद  जाना और वहां विश्वविद्यालय में उनका शिक्षक होना एक ऐसी पहेली है जो बहुत दिनों तक समझ में नहीं आयी थी लेकिन जब वे राजीव गांधी के ख़ास सलाहकार बने तब उन्होंने उस गुत्थी को भी अर्थाया . राजीव के करीबी के रूप में मैंने उनके पंचशील एन्क्लेव और डिफेंस कालोनी के घरों में  उनकी दिनचर्या को देखा है . बड़े बड़े मंत्री उनके  यहाँ दरबार लगाया करते थे . उन दिनों घनशयाम मिश्र सुल्तानपुर में लेक्चरर हो कर जा चुके थे. मुझसे एक दिन कहा कि उसको कहो कि दिल्ली अक्सर आया करे लेकिन घनश्याम  वहीं मस्त थे. घनश्याम के जाने के बाद त्रिपाठी के सबसे करीबी और विश्वसनीय कुमार नरेंद्र सिंह रहे जो जीवन भर उनके साथी और सखा रहे .  
जब एक अखबार में काम करने के दौरान मुझे एडिट पेज पर काम करने का मौक़ा मिला तो त्रिपाठी कांग्रेसी थे लेकिन कहा कि विचारधारा के स्तर पर मार्क्सवादी सोच ही सुपीरियर है. राजेन्द्र शर्मा से संपर्क में रहो और आज का ( १९९३ )जो सर्वोच्च लेखन है उसको छापो उससे बड़ा नाम होगा . सी पी चंद्रशेखर , जयती घोष, प्रभात  पटनायक ,  राजेन्द्र शर्मा , सीताराम येचुरी उसी दौर में मेरे सम्पादकीय पृष्ठ पर विराजते थे . इन सबको बैलेंस करने के लिए मैंने इशर जज अहलुवालिया से भी लिखवाया . उन दिनों मुझसे बहुत खुश रहते थे . एक दिन मुझसे कहा कि मनमोहन का लेख ,” फैज़ की शायरी - गुरुरे इश्क का बांकपन “ पढ़ो. तब तक मैं  टेलिविज़न में चर्चावीर हो चुका था . मनमोहन का लेख उनको बहुत पसंद था .  अपने फीरोज़ शाह रोड वाले घर पर बैठकर मुझसे पढवाया . फैज़ से भी उनकी आत्मीयता रही होगी क्योंकि जब १९७८ में फैज़ दिल्ली आये थे तो उनकी एक बड़ी बैठकी जाकिर हुसेन मार्ग पर डॉ आई पी सिंह के घर पर हुयी थी . भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान-इरान-अफगानिस्तान डेस्क के इंचार्ज के रूप में डॉक्टर साहेब ने फैज़ की यात्रा को आसान  बनाया था. अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे और आई पी सिंह उनके खास थे , वे जौनपुर के थे और  मेरा भी उनके यहाँ आना जाना था. मैं त्रिपाठी के साथ वहां गया था  . डॉ आई पी सिंह के ४७ नंबर वाले घर के लॉन में मैंने डी पी त्रिपाठी को  फैज़ से  फैज़ की शायरी पर बात करते देखा है . फैज़  उनसे बात करके बहुत खुश हुए थे .
उनके गाँव के ही केदारनाथ सिंह इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री थे. कांग्रेस के बड़े  नेता भी थे . हमारे दोस्त , राजेन्द्र सिंह के बाबूजी थे तो हम लोग उनसे थोड़ी समानजनक दूरी बनाकर रखते थे लेकिन उनसे त्रिपाठी की बातचीत बिलकुल दोस्ताना माहौल में होती थी .  त्रिपाठी को मैंने राजीव गांधी फाउंडेशन के एक  कार्यक्रम में डेसमंड टूटू और नेल्सन मंडेला से भी बात करते देखा है . उनकी शख्सियत की जो  सबसे बड़ी बात थी वह यह वे  किसी भी इंसान से intimidate नहीं होते थे .केदारनाथ सिंह से बातचीत के दौरान ही उन्होंने प्रेरणा दी थी कि बच्चों को जे एन यू में भेजिए . उनके बेटे और अब राजनीतिक नेता , अशोक सिंह को जे एन यू में भर्ती करवाने में त्रिपाठी का योगदान था. अशोक उनको और मुझको अपना बड़ा भाई मानते हैं . 
बहुत सारी यादें हैं . लेकिन यह तय है कि उस इंसान के जाने के बाद अंदर से कुछ हिल गया है . सोच रहा हूँ कि  उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा से लिखूं तो शायद कुछ चैन पड़ेगा.

दिल्ली में भी अगर बीजेपी का रथ रुका तो केंद्र में विकल्प की चर्चा शुरू हो जायेगी


शेष नारायण  सिंह

झारखण्ड विधान सभा चुनाव के नतीजों ने निर्णायक रूप से साबित कर दिया है कि किसी भी  सत्ता को चुनौती दी जा सकती है ,बस राजनीतिक सूझबूझ और हौसला होना चाहिए . झारखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष  अमित शाह ने पूरी मेहनत से प्रचार किया , लगभग हर जिले में उन लोगों की औसत दो दो सभाएं  हुईं .  गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी झारखण्ड में बहुत ही अच्छा प्रभाव है. उन्होंने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी लेकिन उनकी पार्टी विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हार गयी.  अब वहां विपक्ष की सरकार है . पिछले पांच वर्षों में हुए ज्यादातर चुनावों की तरह झारखण्ड में भी भावनात्मक मुद्दों की खूब वर्षा की गयी. बालाकोट, पाकिस्तान ,तीन तलाक  आदि आजमाए  गए मुद्दों के अलावा , राम मंदिर , ३७०,  नागरिकता कानून और एन आर सी जैसे ताज़ा विभाजनकारी मुद्दे पर बहस के दायरे में  लाये. मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में कुछ अति वफादार टीवी चैनलों ने भी ज़रूरी सहयोग दिया . विपक्ष के नेता लोग आजकल टीवी चैनलों की बहस का बहिष्कार कर रहे हैं तो उनके समर्थक नाम की ' विचारकों ' की एक नई प्रजाति का आविष्कार  हो गया है .जिनको स्टूडियो में बुलाकर कांग्रेस , सपा, बसपा आदि की धुनाई की जाती है . फ़ारसी शब्दों के नाम वाले कुछ दाढ़ी टोपी धारी लोगों को बुला लिया जाता है जो  देश के  सभी मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करते हैं और उनकी  जहालत को देश के सभी मुसलमानों की जहालत बताकर  पूरी बिरादरी को राष्ट्रद्रोही साबित करने की कोशिश की जाती है . बीजेपी के  प्रवक्ता लोग तो खैर नियमित रूप से राहुल गांधी और उनके खानदान की कमियों को गिनाते ही रहते  हैं . जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक के उनके खानदान को लोगों को देशहित की  भावना के खिलाफ बताते हैं . राम  विलास पासवान, नीतीश कुमार ,सुदेश महतो और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टियों ने भी बीजेपी विरोधी वोटों को छिन्न भिन्न करने में भूमिका निभाई . इन  सारी चुनाव जिताने वाली तरकीबों का  प्रयोग  झारखण्ड के चुनाव में भी खूब किया गया .सारी कोशिशों के बाद भी  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को   राज्य विधानसभा में  बहुमत तो नहीं ही मिला, सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का तमगा भी हाथ  नहीं आया .  मतों की  गिनती चल  रही थी और बीजेपी के उम्मीदवार निर्णायक हार की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन  पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी जीत और सरकार दोबारा बनाने का दावा कर रहे थे . बहरहाल आज वहां हेमंत सोरेन की अगुवाई में  कांग्रेस और लालू यादव की पार्टी के सहयोग से  विपक्ष की सरकार बन गयी है .
झारखण्ड विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या केवल ८१ है . इसलिए संख्या के हिसाब से उसको  उतना महत्वपूर्ण न मानने की बीजेपी नेताओं की बात पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन  पिछले एक साल में हुए  विधानसभा चुनावों  में  बीजेपी को हो रहे नुक्सान को मिलाकर देखा जाये तो यह पार्टी के विजय रथ पर लगी एक ज़बरदस्त ब्रेक है . गौर करने की बात यह  है कि इसी कालखंड में लोकसभा के चुनाव भी हुए जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी को वह वाला बहुमत मिला जो प्रधानमंत्री की रूप में चुनाव लड़ने वाले जवाहरलाल नेहरू , राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के नाम दर्ज है . २०१४ और २०१९ में लगातार दो बार लोकसभा में  चुनाव जीतकर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आपको उस कतार में खड़ा करने की दिशा में क़दम बढ़ा  दिया है  जिसमें जवाहरलाल नेहरू विराजते हैं . नेहरू देश के अब तक के इकलौते प्रधानमंत्री हैं जिनके नाम पर देश  में  तीन लोकसभा चुनाव हुए और वे लगातार तीनों में विजयी  रहे. हाँ यह भी सच है कि नेहरू के समय में   हुए विधानसभा चुनावों में भी केरल के अलावा हर विधान सभा में उनकी पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ चुनाव  जीतती थी .लेकिन नरेंद्र मोदी की विजय यात्रा अब केवल लोकसभा चुनावों तक की सीमित हो गयी है .

बीजेपी की सहयोगी पार्टी ,जनता दल ( यू ) के महामंत्री और नीतीश के कुमार के भरोसेमंद नेता के सी त्यागी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व को गठबन्धन धर्म निभाना नहीं आता . बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी से गठबंधन धर्म निभाने की कला सीखनी  चाहिए . के सी त्यागी का यह बयान झारखण्ड विधानसभा के चुनाव नतीजों के बाद आया है . इसके राजनीतिक तत्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता . दिल्ली के सत्ता के गलियारों में चलने वाली गपबाजी की शास्वत  परम्परा पर नज़र डालें तो साफ नज़र आ जाएगा कि नीतीश कुमार की भावी रणनीति अब बहस की ज़द में आ गयी है. कई भरोसेमंद लोग कह  रहे हैं कि कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के कारण आयी स्थिरता के  कारण  कई  विपक्षी  पार्टियां अब कांग्रेस की तरफ  देखने लगी हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री जगन  रेड्डी ने  नागरिकता क़ानून के खिलाफ जो आवाज़ उठाई है उसमें भी सोनिया इफेक्ट को साफ़ देखा जा सकता है . दिल्ली में विराजने वाले कई नेताओं , पत्रकारों को पता है कि  तेलंगाना विधानसभा चुनाव के पहले  जगन रेड्डी ने कांग्रेस के सहयोग की पहल की थी लेकिन राहुल गांधी की अन्यमनस्कता के कारण बात बनी नहीं .उनके करीबी लोगों के कहना है कि सोनिया गांधी के प्रति उनकी वही भावना अब भी है जो उनके स्वर्गीय पिता के समय में हुआ करती थी.

झारखण्ड चुनाव में मिली हार को बीजेपी के नेता भी  गंभीरता से ले  रहे हैं .उनको मालूम है कि यह ८१ सीटों की विधानसभा की इकलौती हार ही नहीं  है यह , हार का एक सिलसिला है  . अब  बीजेपी का  भ्रष्टाचार विरोध का नारा  बैक बर्नर पर आ गया है. हरियाणा में जिस  अजय चौटाला  के भ्रष्टाचार के विरोध में भाषण करके भ्रष्टाचार विरोध का माहौल बनाया  गया था उन्हीं के बेटे  के सहयोग से आज हरियाणा में पार्टी की सत्ता है . महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में उनके सहयोगी उद्धव ठाकरे ने  कांगेस का दामन थाम लिया है और शरद पवार जैसा राजनीति का आचार्य महाराष्ट्र की बीजेपी विरोधी  सरकार की रक्षा का  बीड़ा उठाये हुए है. सही बात यह है कि त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में ज़बरदस्त जीत के बार बीजेपी को किसी विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है . अभी दो साल पहले देश के ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकारें हुआ करती थीं लेकिन आज कर्णाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश  जैसे बड़े राज्यों के अलावा उनकी सरकार या तो छोटे राज्यों में है, या पूर्वोत्तर के राज्यों में . वहां भी असम और त्रिपुरा के अलावा उनकी सरकारें उन राज्यों में हैं  जहां उनकी राजनीतिक   मौजूदगी कोई ख़ास नहीं है . जोड़तोड़ कर बनाई गयी सरकारें हैं . पूर्वोत्तर के नेताओं की राजनीति का स्थाई भाव यह है कि जो भी केंद्र सरकार में सत्ता में रहता है ,   वहां के नेता उसी के साथ हो लेते हैं .

झारखण्ड के बाद दिल्ली विधानसभा का महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला है . दिल्ली  प्रदेश की सभी सातों लोकसभा सीटें  बीजेपी के पास हैं . अगर कैंटोनमेंट और नई दिल्ली नगरपालिका को मिला दिया जाए तो  दिल्ली में  पांच नगरपालिकाएं हैं  और सभी पर बीजेपी का नियंत्रण है. इसलिए साधारण तर्क बुद्धि के  हिसाब  से तो पार्टी को विधानसभा चुनाव भी जीत जाना  चाहिए लेकिन ऐसा  है नहीं.  २०१५ के विधानसभा चुनावों में भी यही स्थिति थी लेकिन बीजेपी को ७० सीटों की विधानसभा में केवल तीन सीटें मिलीं . इस बार भी दिल्ली की गरीब बस्तियों में मुख्यमंत्री अरविन्द  केजरीवाल के काम की चर्चा है . उनके स्वास्थय और शिक्षा के क्षेत्र में किये गए काम दिल्ली के कई इलाकों में उनके पक्ष में माहौल बना रहे हैं . बिजली और पानी के बिलों में पिछले कई वर्षों से हुयी कमी भी उनकी लोकप्रियता  बढ़ा रही हैं . इसलिए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को अरविन्द केजरीवाल के रूप में एक मज़बूत चुनौती मिलने की बात सभी कर रहे  हैं .दूसरी बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई की अंदरूनी लडाइयां भी हैं . हालांकि अमित शाह  ने मनोज तिवारी को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दिल्ली के पुराने गुटों को बराबर की  हैसियत में रखने की कोशिश की है लेकिन दिल्ली के पुराने नेता मनोज को अपना नेता ही नहीं मानते .पुराने  दिल्ली  वालों में  पुरबियों के प्रति जो एक अजीब सा भाव अभी कुछ साल पहले तक हुआ करता था ,  बीजेपी के ए  नेता , मनोज तिवारी को उसी भाव से देखते   हैं .  जबकि सच्चाई यह है , मनोज तिवारी का पूरे  प्रदेश के  एक वर्ग में सम्मान है . ज्यादातर इलाकों में यह वही वर्ग है जहाँ अरविन्द केजरीवाल की जीत की संभावना बताई जा रही है .लेकिन दिल्ली के स्थापित नेता तो मनोज तिवारी का वही हाल करने पर  आमादा  नज़र आ आ रहे हैं , जो इन लोगों ने कभी किरण बेदी का किया था. इसलिए दिल्ली की लड़ाई बीजेपी के लिए मुश्किल मानी जा रही है
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अगर दिल्ली विधानसभा में भी बीजेपी का वही  हाल हुआ जो  झारखण्ड में हुआ है तो निश्चित रूप से केंद्र में बीजेपी के विकल्प की बात चल निकलेगी .२०१४ के लोकसभा चुनावों के पहले अन्ना हजारे के प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के बाद जब अन्ना के सबसे महत्वपूर्ण शिष्य अरविन्द केजरीवाल ने आन्दोलन के प्रायोजकों की मर्जी के खिलाफ अपनी पार्टी बना ली तो देश में कांग्रेस की निश्चित हार के मद्देनजर  विकल्प की बात  शुरू हो गयी थी. अन्ना हजारे की रामलीला मैदान वाली लीला का आयोजन जिन लोगों ने किया था , उनकी इच्छा थी कि २०१४ के चुनाव में उस आन्दोलन वाले भी वैसा ही काम करें जैसा रामदेव ने किया लेकिन अरविन्द केजरीवाल तो वाराणसी सीट पर ही चुनौती देने पंहुंच  गए . उसके बाद राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कांग्रेस और  बीजेपी के विकल्प के  रूप में अरविन्द केजरीवाल को देखना शुरू कर दिया था .अन्ना आन्दोलन में देश के बेहतरीन लोगों का जमावड़ा था .  बाद में उनमें से ज्यादातर एक कहते  पाए गए कि उनको मालूम ही नहीं था कि अन्ना किसकी शह पर काम  कर रहे थे वरना वे उनके साथ न जाते .बाद में एक एक करके सभी चले गए .लेकिन अरविन्द केजरीवाल  अपने क़रीबी दोस्तों के साथ पार्टी में जमे रहे और दिल्ली   और पंजाब  में सम्मानजनक मुकाम बनाया .
अगर दिल्ली में  इस बार फिर अरविन्द केजरीवाल दुबारा  सरकार बनाने में सफल हो जाते हैं तो बीजेपी की जीत का जो रथ हरियाणा ,  महाराष्ट्र , झारखण्ड आदि राज्यों में रोका  गया है वह केंद्र की राजनीति में विकल्प की चर्चा को अवसर देगा और उस चर्चा के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम होंगें .