Tuesday, November 13, 2018

भारत छोड़ो आन्दोलन का ड्राफ्ट भी जवाहरलाल नेहरू ने लिखा था और पेश भी उन्होंने किया था .




शेष नारायण सिंह
महात्मा गांधी की अगुवाई में देश ने १९४२ में ' अंग्रेजों भारत छोड़ो ' का नारा दिया था . उसके पहले क्रिप्स मिशन भारत आया था जो भारत को ब्रितानी साम्राज्य के अधीन किसी तरह का डामिनियन स्टेटस देने की पैरवी कर रहा था. देश की अगुवाई की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने स्टफोर्ड क्रिप्स को साफ़ मना कर दिया था. कांग्रेस ने १९२९ की लाहौर कांग्रेस में ही फैसला कर लिया था कि देश को पूर्ण स्वराज चाहिए . लाहौर में रावी नदी के किनारे हुए कांग्रेस के अधिवेशन में तय किया गया था कि पार्टी का लक्ष्य अब पूर्ण स्वराज हासिल करना है .उस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे . १९३० से ही देश में २६ जनवरी के दिन स्वराज दिवस का जश्न मनाया जा  रहा  था. इसके पहले कांग्रेस का उद्देश्य होम रूल था लेकिन अब पूर्ण स्वराज चाहिए था . कांग्रेस के इसी अधिवेशन की परिणति थी की देश में १९३० का महान आन्दोलन , सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ. नमक सत्याग्रह या गांधी जी का दांडी मार्च इसी कांग्रेस के इसी फैसले को लागू करने के लिए किए  गए थे .वास्तव में १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन एक सतत प्रक्रिया थी जो १९३० में शुरू हो गयी थी. जब १९३० के आन्दोलन के बाद अँगरेज़ सरकार ने भारतीयों को ज्यादा गंभीरता से लेना शुरू किया लेकिन वादाखिलाफी से बाज़ नहीं आये तो आन्दोलन लगातार चलता रहा . इतिहास के विद्यार्थी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिस कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे उसी अधिवेशन में देश ने पूर्ण स्वराज की तरफ पहला क़दम उठाया था .


आजकल एक दिलचस्प बात देखी जा रही है . जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है तब से देश के निर्माण और आज़ादी की लड़ाई में जवाहरलाल नेहरू के योगदान को नज़रंदाज़ करने का फैशन हो गया है . सवाल उठता है कि जवाहरलाल नेहरू के योगदान का उल्लेख किये बिना भारत के १९३० से १९६४ तक के इतिहास की बात कैसे की जा सकती है. जिस व्यक्ति को महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , जिस व्यक्ति की अगुवाई में देश की पहली सरकार बनी थी, जिस व्यक्ति ने मौजूदा संसदीय लोकतंत्र  की बुनियाद रखी, जिस व्यक्ति ने संसाधनों के अभाव में भी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की डगर पर डाल कर दुनिया में गौरव का मुकाम हासिल किया उसको अगर आज़ाद  भारत के राजनेता भुलाने का अभियान चलाते हैं तो यह उनके ही व्यक्तित्व पर  प्रकाश डालता है . आजकल कुछ  तथाकथित इतिहासकारों के सहारे  भारत के इतिहास के पुनर्लेखन का कार्य चल रहा है जिसमें बच्चों के दिमाग से नेहरू सहित बहुत सारे लोगों के नाम गायब कर दिए जायेंगें जो बड़े होकर नेहरू के बारे में कुछ जानेंगें ही नहीं . लेकिन ऐसा संभव नहीं है क्योंकि गांधी और नेहरू विश्व इतिहास के विषय हैं और अगर हमें अपनी आने वाले पीढ़ियों को नेहरू के बारे में अज्ञानी रखा तो हमारा भी हाल उतर कोरिया जैसा होगा जहां के स्कूलों में मौजूदा  शासक के दादा किम इल सुंग को आदि पुरुष बताया जाता है . अब कोई उनसे पूछे कि क्या किम इल सुंग के पहले उत्तरी कोरिया में शून्य था .दुनिया जानती है कि उत्तरी कोरिया के शासकों की इसी बेवकूफी के कारण आज वह देश दुनिया सबसे गरीब देश है, वहां के लोग भूखों तड़पने को अभिशप्त हैं .

महात्मा गांधी की अगुवाई में आज़ादी की  जो लड़ाई लड़ी गयी उसमें नेहरू रिपार्ट का अतुल्य योगदान है . यह रिपोर्ट २८-३० अगस्त  १९२८ के दिन हुयी आल पार्टी कान्फरेंस में तैयार की गयी थी . यही रिपोर्ट महात्मा गांधी की होम रुल की मांग को ताक़त देती थी. इसी के आधार पर डामिनियन स्टेटस की मांग की जानी थी  इस रिपोर्ट को एक कमेटी ने बनाया था जिसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे . इस कमेटी के सेक्रेटरी जवाहरलाल नेहरू थे .अन्य सदस्यों में अली इमाम , तेज बहादुर सप्रू, , माधव श्रीहरि अणे ,मंगल सिंह ,सुहैब कुरेशी , सुभाष चन्द्र बोस और जी आर प्रधान थे .सुहैब कुरेशी ने रिपोर्ट की सिफारिशों से असहमति जताई थी . इसके बारे में लिखने का मतलब केवल इतना है कि राहुल गांधी, राजीव गांधी और  संजय गांधी जैसे नाकाबिल लोगों को देश की राजनीति पर थोपने का अपराध तो जवाहरलाल की बेटी इंदिरा गांधी ने ज़रूर किया है  लेकिन इंदिरा गांधी की गलतियों के लिए क्या हम अपनी आज़ादी के लड़ाई के शिल्पी महात्मा गांधी और  उनके सबसे भरोसे के  साथी जवाहरलाल नेहरू को नज़रंदाज़ करने की गलती कर सकते हैं .एक बात और हमेशा ध्यान रखना होगा कि महात्मा गांधी के सन बयालीस के आन्दोलन के लिए  बम्बई में कांग्रेस कमेटी ने जो प्रस्ताव पास किया था , उसका डाफ्ट भी जवाहलाल नेहरू ने बनाया था और उसको विचार के लिए प्रस्तुत भी नेहरू ने ही किया था .

जवाहरलाल नेहरू को नकारने की कोशिश करने वालों को यह भी जान लेना चाहिए कि उनकी पार्टी के पूर्वजों ने जिन जेलों में जाने के डर से जंगे-आज़ादी में हिस्सा नहीं लिया था ,  आज़ादी की लड़ाई में उन्हीं जेलों में जवाहरलाल नेहरू १०४० दिन रहे थे. .भारत छोडो आन्दोलन के दिन ९ अगस्त १९४२ को उनको मुंबई  से गिरफ्तार किया गया था और १५ जून १८४५ को रिहा किया गया था . यानी उस आन्दोलं में भी  ३४ महीने से ज्यादा वे जेल में रहे थे. इसके पहले भी अक्सर  जाते रहते थे .जो लोग उनको खलनायक बनाने की कोशिश कर रहे हैं ,ज़रा कोई उनसे पूछे कि उनके राजनीतिक पूर्वज  सावरकर , जिन्नाह आदि उन दिनों ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी के इनाम के रूप में  कितने अच्छे दिन बिता रहे थे . सावरकर तो माफी मांग कर जेल से रिहा  हुए थे .अंडमान की जेल में वी. डी .सावरकर सजायाफ्ता कैदी नम्बर ३२७७८ के रूप में जाने जाते थे . उन्होंने अपने माफीनामे में साफ़ लिखा था कि अगर उन्हें रिहा कर दिया गया तो वे आगे से अंग्रेजों के हुक्म को मानकर ही काम करेंगें .और इम्पायर के हित में ही काम करेंगे. इतिहास का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि वी डी सावरकर ने जेल से छूटने के बाद ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे  महात्मा गांधी के आन्दोलन को ताक़त मिलती हो . बल्कि हिन्दू  महासभा के नेता के रूप में अंग्रेजों के हित में ही काम किया .
भारत छोड़ो आन्दोलन की एक और  उपलब्धि है . अहमदनगर फोर्ट जेल में जब जवाहरलाल  बंद थे उसी दौर में उनकी किताब ' डिस्कवरी आफ इण्डिया ' लिखी गयी थी .जब अंग्रेज हुक्मरान को पता लगा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के बारह सदस्य एक ही जगह रहते हैं और वहां राजनीतिक मीटिंग करते हैं तो सभी नेताओं को अपने राज्यों की जेलों में भेजा जाने लगा. मार्च १९४५ में गोविंद वल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और जवाहरलाल नेहरू को अहमदनगर से हटा दिया गया .बाकी  गिरफ्तारी का समय इन लोगों ने यू पी की जेलों ,बरेली , नैनी  अल्मोड़ा में काटीं . जब इन लोगों को गिरफ्तार किया गया  था तो किसी तरह की चिट्ठी  पत्री लिखने की अनुमति नहीं थी और न ही कोई चिट्ठी आ सकती थी .बाद में नियम थोडा बदला . हर  हफ्ते  इन कैदियों को अपने परिवार के लोगों के लिए दो पत्र लिखने की अनुमति मिल गयी . परिवार के सदस्यों के चार पत्र आ सकते थे . लेकिन जवाहर लाल नेहरू को यह सुविधा नहीं मिल सकी क्योंकि उनके परिवार में उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित और बेटी इंदिरा गांधी ही थे . वे लोग भी  यू पी की जेलों में बंद थे और वहां की जेलों में बंदियों को कोई भी चिट्ठी न मिल सकती थी और न ही वे लिख सकते थे.
इसलिए भारत  छोडो आन्दोलन का ज़िक्र होगा तो महात्मा  गांधी के साथ इन बारह कांग्रेसियों का ज़िक्र ज़रूर होगा . हां यह अलग बात  है कि जब भारत में इतिहास को पूरी तरह से दफना दिया जाएगा और शुर्तुर्मुगी सोच हावी हो जायेगी तो जवाहरलाल नेहरू को भुला देना संभव होगा और अहमदनगर के बाकी कैदियों को भी भुलाया जा सकेगा .लेकिन अभी तो यह संभव नहीं नज़र है .

Friday, November 9, 2018

9 नवम्बर , हुमायूँ के मक़बरे की यात्रा ,अगस्त्य के साथ

मैंने अकेले फिल्म कभी नहीं देखा. इनके पाँव में तकलीफ हो गयी तो कहीं आना जाना ही बंद हो गया . फ़िल्में देखना ही बंद हो गया . फिर इसी मई में बेटी ने दोनों घुटने बदलवा दिए , सर्जरी हुयी , फिज़ियोथिरैपी चली और अब फिर से घूमना फिरना चालू हुआ है . आज बेटे जी सपरिवार दिल्ली में थे उनके साथ दिल्ली पर्यटन पर निकलीं . और हुमायूं के मकबरे की यात्रा की . लगता है कि अब फिर से ज़िंदगी नार्मल ढर्रे पर चलने वाली है . १९७९ में यह दिल्ली आयी थीं ,तब दो ही बच्चे थे . उनको उंगली पकड़ाकर हम दोनों घूमने निकल पड़ते थे. घुटना बदलने के बाद पहली यात्रा थी आज . हमारी ज़िंदगी में कपडे लत्ते, घर के सामान आदि की बहुत सारी हमारी दमित इच्छाएं थीं जिनका हम ज़िक्र नहीं करते थे लेकिन हमारे बच्चों को अंदाज़ था . वे हर मामूली आमदनी वाले इंसान के सपने होते हैं. औरों की तरह हमारे भी बहुत सारे सपने अधूरे रह गए थे जिनको अब हमारे चुन चुन कर पूरा कर रहे हैं. पहली बार जब 1999 में मेरी बेटी ने नौकरी लगने पर अपनी पहली तनखाह से मेरे लिए पैंट-कमीज़ बनवाई थी तो हम दोनों खुशी से फूले नहीं समाये थे अब तो हमें वे चीजें मिल जाती हैं जो अपनी कमाई में कभी संभव नहीं थीं. जब छोटी बेटी इनके लिए बढ़िया साड़ी लेती है तो वह दिन याद आ जाते हैं जब अच्छे लाल की दूकान से पंजी खरीदकर लाया था. जब बेटा मेरे लिये महँगा जूता लेता है तो उसकी मां की आँख में खुशी के आंसू चालक पड़ते हैं . जब बड़ी बेटी घर का सारा सामान लाती है तो हमें लगता है कि बच्चे आपकी ज़िंदगी भर की म्हणत का इनाम हैं. मेरी दुआ है कि हमारी औलादों के बच्चे उनका उसी तरह से ख्याल रखें जैसा यह मेरा रख रहे हैं.
इनके पाँव की तकलीफ के बाद लगता था ज़िंदगी रुक जायेगी लेकिन अब खुशी है कि अपने पाँव से चल रही हैं . माई होतीं तो कहतीं चौंड़रा मार रही हैं . ज़ाहिर हैं उनको भी बहुत खुशी होती.

Thursday, November 8, 2018

अमरीका में नए चुनाव के नतीजे ,राष्ट्रपति ट्रंप की मनमानी पर लगाम



शेष नारायण  सिंह

 अमरीका में तो खेल हो गया. डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी  अमरीकी संसद के निचले  सदन में अल्पमत में आ गयी .  पिछले दो वर्षों में अमरीकी राष्ट्रपति की  नौटंकी से परेशान लोग  गुस्से में थे और उसी गुस्से को विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने हवा दी और राष्ट्रपति डोनाल्ड  ट्रंप की मनमानी का युग  ख़त्म हो गया . अमरीकी सेनेट में हालांकि  रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत बना रहेगा लेकिन अब राष्ट्रपति अपने अहमकाना फैसले नहीं लागू कर पायेंगें . निचले सदन की हैसियत  राष्ट्रपति पर लगाम लगाने की ही होती है . इस बार जो लोग प्रतिनधि सभा में पंहुचे हैं ,उनकी  पृष्ठभूमि ऐसी है जो सही अर्थों में अमरीकी समाज की विविधता की अगुवाई करते हैं . जीतने वालों में महिलायें हैं ,अल्पसंख्यक हैं , राजनीतिक नौसिखिये हैं और वे सभी ऐसे लोग हैं जो मीडिया की चहल पहल से दूर नौजवानों  में ट्रंप के प्रति बढ़ रहे  गुस्से को हवा दे रहे थे .नतीजा हुआ कि प्रतिनिधि सभा में तो लिबरल ताकतें जीत सकीं जिसका इस्तेमाल ट्रंप की  तानाशाही प्रवृत्तियों को रोकने के लिए किया जाएगा लेकिन अभी अमरीकी समाज में वह ज़हर ख़त्म नहीं हुआ है जिसको  डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनाव में  बिखेरा था. ट्रंप  के प्रति अमरीकी समाज के एक बड़े हिस्से में लगभग नफरत का भाव है लेकिन तथाकथित अमरीकी गौरव के चक्कर में  कम पढ़े लिखे अमरीकियों की एक बहुत बड़ी आबादी अभी भी उनको वही सम्मान देती है जो किसी भी बददिमाग राष्ट्रपति को मिलता है . शायद इसी वजह से कई ऐसे लोग चुनाव हार गए जिनकी जीत में अमरीका की उदारवादी जनता की रूचि थी . डेमोक्रेटिक माइनारिटी नेता नैन्सी पेलोसी ने  ट्रंप की कुछ इलाकों में लोकप्रियता के मद्दे-नज़र ही जीत के साथ साथ यह ऐलान कर दिया कि ट्रंप पर महाभियोग चलाने की कोई योजना नहीं है .
अमरीका में सभी मानते हैं कि ट्रंप को काबू करने के लिए ज़रूरी था कि संसद में उनकी मनमानी वाले फैसलों को रोका जाये और अब उम्मीद की जानी चाहिए कि अमरीकी अवाम को एक खुलीपारदर्शी  और जवाबदेह सरकार मिलेगी और ट्रंपपंथी से निजात मिलेगी . संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत का यह सन्देश है कि अमरीकी जनता यह चाहती है कि जो दो साल ट्रंप के बचे हैं उसमें उनकी जिद्दी सोच पर आधारित नीतियों पर रोक लगाई जा सके.   अभी राबर्ट स्वान मलर की जांच चल ही रही है जिसके लपेट में डोनाल्ड ट्रंप के आने की पूरी संभावना है . उनकी जांच का विषय बहुत ही गंभीर है जिसमें आरोप है कि रूस की सरकार ने अमरीकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में दखलंदाजी की थी और ट्रंप की विरोधी उम्मीदवार हिलरी क्लिंटन को हराने के लिये  काम किया था . बॉब मलर कोई  लल्लू पंजू इंसान नहीं हैं .वे अमरीका की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी , एफ बी आई के बारह साल तक निदेशक रह चुके  हैं . प्रिंसटन  विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और डिप्टी अटार्नी जनरल रह चुके हैं . वे जो जांच कर रहे हैं  उससे ट्रंप के प्रभावित होने की पक्की संभावना है . ट्रंप की घबडाहट नतीजों के बाद  हुई उनकी प्रेस कान्फरेंस में साफ़ देखी जा सकती थी.  वे पत्रकारों से भिड़ गए और कहा कि वे चाहें तो राबर्ट मलर को बर्खास्त कर सकते हैं लेकिन अभी करेंगे नहीं  हालांकि उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि वे रूस की दखलंदाजी वाली जांच को सफल नहीं होने देंगें . नतीजे आने के तुरंत बाद राष्ट्रपति के रूप में जो पहला काम डोनाल्ड ट्रंप ने किया वह यह कि उन्होंने अटार्नी जनरल जेफ़ सेशंस को हटा दिया और दावा किया कि अगर डेमोक्रेट बहुमत वाली अमरीकी संसद, कांग्रेस उनके खिलाफ कोई जांच शुरू करेगी तो उसका मुकाबला करेंगें . जेफ़ सेशंस को हटाने का कारण समझ में नहीं आया .  वे राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थक माने जाते  हैं , उन्होंने रूस की दखल वाली जाँच से खुद को अलग कर लिया था  लेकिन नतीजे आते ही व्हाइट हाउस के चीफ आफ स्टाफ , जॉन केली ने उनको फोन करके उनका इस्तीफा मांग लिया . डेमोक्रेटिक पार्टी की सदन में नेता, नैन्सी पेलोसी ने आरोप  लगाया कि जेफ़ सेशंस का हटाया जाना इस बात का संकेत है कि  ट्रंप रूसी दखल वाली जाँच को नाकाम  करने के लिए कटिबद्ध हैं .राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि सेनेट और गवर्नर पद  के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों की जीत में उनका ही योगदान सबसे ज़्यादा  है . पत्रकारों के सवालों के जवाब में उन्होंने बताया कि अगर  डेमोक्रेटिक पार्टी ने जांच करने की कोशिश  की तो वाशिंटन में युद्ध जैसी हालात बन जायेंगें .
हालांकि सच्चाई यह  है कि  सदन की समितियों की अध्यक्षता अब डेमोकेटिक पार्टी वाले  ही करेंगे . इन कमेटियों को ही राष्ट्रपति महोदय की कथित टैक्स चोरी की जांच करनी है . इसके अलावा रूस की दखल वाली जाँच भी अब डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों की निगरानी में  ही होगी. अभी इसकी जांच राबर्ट मलर कर रहे हैं लेकिन राष्ट्रपति  ने उनके बॉस के  बॉस जेफ़ सेशंस को हटाकर यह संकेत दे दिया  है कि वे जाँच को अपने खिलाफ किसी भी हालत में नहीं जाने देंगे, . उन्होंने प्रेस कान्फरेस में कहा कि वे डेमोक्रेट नेताओं से मिलकर काम करने को तैयार हैं लेकिन उनके खिलाफ जांच होने से सद्भाव की भावना को ठेस लगेगी .अब अमरीकी राजनीति में सत्ता पर ट्रंप का एकाधिकार नहीं है और वे अपने को सर्वाधिकार संपन्न मानने के लिए अभिशप्त हैं . ऐसी हालत में  इस बात की पूरी संभावना है कि ट्रंप के कार्यकाल के अगले दो साल बहुत ही संघर्ष के दौर से गुजरने वाले   हैं .
इन नतीजों के बाद अब ट्रंप की मनमानी पर तो ब्रेक लग ही जायेगी. अभी जो मेक्सिको की सीमा पर वे बहुत बड़ी रक़म खर्च करके दीवाल बनाने की  बात कर रहे हैं , वह तो रुक ही जायगी .इसके अलावा वे अजीबो गरीब शर्तों पर जापान और यूरोपीय यूनियन से व्यापारिक समझौते करने की जो योजना बना रहे हैं वह भी अब संभव नहीं लगता . कांग्रेस के निचले सदन की संभावित अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी ने बताया कि यह नतीजे , डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टी के बारे में उतना नहीं हैं जितना संविधान की रक्षा के  लिए हैं.  उनका आरोप है कि ट्रंप लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान नहीं करते . एक  उदाहरण काफी होगा.  उन्होंने अपनी रिपब्लिकन पार्टी की एक नेता का मखौल उड़ाया और कहा कि सेनेटर बारबरा  वर्जीनिया से इसलिए हार गयीं  क्योंकि उन्होंने ट्रंप की नीतियों का विरोध किया था. उन्होंने डींग मारी की कि उनका विरोध करने वाले उनकी पार्टी के लोग ही हार गए . 

ट्रंप की मनमानी का शिकार अमरीकी अर्तव्यवस्था भी हो रही थी. जब चुनाव नतीजों के बाद  निचले सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत की खबर आयी तो शेयर बाज़ार ने उसका स्वागत किया . डाव  जोन्स और एस एंड पी ,दोनों ही इंडेक्स में करीब २ प्रतिशत का उछाल बुधवार को ही  दर्ज हो गया. अब अमरीकी शेयर बाज़ार को भरोसा है कि ट्रंप के सनकीपन के  फैसलों पर विधिवत नियंत्रण स्थापित हो जाएगा . जानकार बता रहे  हैं  सदन में  विपक्ष के बहुमत के बाद सत्ता का विकेंद्रीकरण हो गया है . आम तौर पर जब सत्ता एक ही जगह केन्द्रित नहीं रहती तो शेयर बाज़ार में माहौल अच्छा रहता है .
अमरीकी राजनीति में इस बदलाव का विदेशनीति पर भी असर पडेगा . अब सबको मालूम है कि डोनाल्ड  ट्रंप की रूस्सी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ख़ास दोस्ती  है  आरोप तो यहाँ तक लग चुके  हैं कि डोनाल्ड ट्रंप अपने प्रापर्टी  डीलरी के धंधे के दौरान, सोवियत यूनियन की जासूसी संस्था केजीबी के लिये काम करते थे. कुछ अखबारों में छपा था कि जब डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति के रूप में रूस गए थे और रूसी राष्ट्रपति से मिले थे तो  दो राष्ट्रपतियों के बीच औपचारिक मुलाक़ात तो हो ही रही थी , पुराने साथियों के बीच भी मुलाक़ात थी क्योंकि अखबार के मुताबिक़  जब पुतिन केजीबी में काम करते थे तो अमरीकी असेट , डोनाल्ड ट्रंप के वे ही हैंडलर  हुआ करते  थे. ज़ाहिर है कि वे  रूस के साथ नरमी  का दृष्टिकोण रखते  हैं  .अमरीकी विदेशनीति पर नज़र रखने वाले उम्मीद कर रहे हैं कि रूस के साथ संबंधों में अमरीकी हितों को सर्वोपरि रखा जाएगा अब साउदी अरब और उत्तर कोरिया के साथ भी शुद्ध राजनय के हिसाब से बातचीत की जायेगी. विदेशनीति में ट्रंप का रवैया निहायत ही बचकाना रहा है . मसलन उन्होंने बिना किसी कारण या औचित्य के पारंपरिक साथी कनाडा को नाराज़ कर दिया . उनकी एक अजीब बात यह भी रही है कि जो देश अमरीकी हितों के मुकाबिल खड़े हैं उनसे  भी दोस्ती के चक्कर में रहते हैं . यहाँ तक की अमरीका के घोर विरोधियों से भी हाथ मिलाने के लिए लालायित रहते  हैं .  
इन मध्यावधि चुनावों में सेनेट में रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति मज़बूत हुयी है. रिप्बलिकन टिकट से कुछ गवर्नर भी ज़्यादा चुने गए हैं लेकिन अमरीकी राजनीति में राष्ट्रपति की मनमानी पर लगाम लगाने का काम निचला सदन ही करता है . अमरीकी राजनीति का मिजाज़ ऐसा  है कि अगर को समझदार आदमी राष्ट्रपति बन जाए तो सेनेट या प्रतिनधि सभा को साथ लेकर चलने में बहुत दिक्क़त नहीं आती . बराक ओबामा ने अपनी विपक्षी पार्टी के बहुमत के बावजूद अपनी नीतियों को लागू किया ही . लेकिन उनकी खासियत यह थी कि वे सब को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे. जबकि राष्ट्रपति ट्रंप को मनमानी की आदत  है . और इस  चुनाव के नतीजे डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी से परेशान दुनिया के लिए ताज़ी हवा का एक झोंका साबित होंगे .

Wednesday, November 7, 2018

पत्रकारिता भारत में एक खतरनाक काम है .





शेष नारायण सिंह

पत्रकारों के लिए भारत एक खतरनाक देश है. संविधान के मौलिक अधिकारों के सेक्शन में अभिव्यक्ति की आज़ादी को गारंटी दी गयी है . संविधान के अनुच्छेद १९ (१) में जो अभिव्यक्ति की आजादी  है उसी के तहत प्रेस और मीडिया  को अपनी बात और सही ख़बरें  बिना  किसी रोक टोक के कहने की स्वतन्त्रता है . लेकिन यह बात केवल संविधान में ही सिमट कर रह गयी है.  प्रेस की आज़ादी  की  गारंटी के मद्दे-नज़र ही इसको लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है और उम्मीद की जाती है कि लोकतंत्र के  अन्य तीन खम्भों - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका- पर प्रेस और मीडिया की नज़र रहेगी . लेकिन  व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा है . हमारा दुर्भाग्य है  कि दुनिया भर के १८० देशों का जो विश्व प्रेस फ्रीडम  इंडेक्स  इस साल जारी हुआ है , उसमें भारत का नाम १३८ नंबर पर है . हालांकि इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि पाकिस्तान की स्थिति हमसे भी खराब है . वह १३९ पर है लेकिन पाकिस्तान में लोकतंत्र वास्तव में एक ढोंग है , वहां तो सब कुछ सेना के कंट्रोल में हैं . पाकिस्तान से एक  पायदान ऊपर रहना ही अपने आप में बहुत ही अपमानजनक   है.  इतना अपमान ही काफी नहीं था , अभी एक और रिपोर्ट आई है  जो हमारी  मीडिया की आज़ादी पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर देती है . इंटरनैशनल प्रेस इंस्टीटयूट की  डेथ वाच  रिपोर्ट आई है . उसमें बताया गया  है कि पिछले साल भारत में  घात लागाकर १२ पत्रकारों की ह्त्या की गयी लेकिन अभी  हत्यारों के बारे में कोई  पक्का पता नहीं है . जांच चल  रही है और अभी तक केवल छः गिरफ्तारियां हुयी हैं . वैसे भी भारत में  जाँच और  न्याय में  देरी की  कहानियां पूरी दुनिया में  सुनी जा  सकती  हैं लेकिन  पत्रकारों के बारे में यह आंकड़े बहुत ही तकलीफदेह और निराशाजनक हैं .
 देश के हर कोने से पत्रकारों को धमकाए जाने की ख़बरें आती रहती  हैं . अभी सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की स्थिति की   रिपोर्ट कर रही  इण्डिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह को भी मार डालने की  कोशिश की गयी . गुंडों ने उसको मारा पीटा, उसको  अपमानित किया और उसके  कैमरे आदि को नुक्सान पंहुचाया .   छतीसगढ़ में  दूरदर्शन के पत्रकार अच्युतानंद साहू को मार डाला गया और उसके सहायक ने हमले की जो रिपोर्ट भेजी है ,वह दिल दहला देने वाली है . पूरी दुनिया में युद्ध की रिपोर्ट करते हुए पत्रकारों की मृत्यु की ख़बरें आती रहती  हैं लेकिन राजनीतिक खबरों को कवर  करने वाले पत्रकारों के मामले में भारत दुनिया के उन घटिया देशों की श्रेणी में आ जाता है जहां  प्रेस की आजादी नाम की कोई चीज़ ही नहीं है . अपने यहाँ भी हालात उन देशों के जैसे होना चिंता की बात है . स्थानीय स्तर पर तो ख़बरों का गला घोंटने के लिए हर जिले में तैयार नेता मिल जायेंगे, पत्रकारों को धमका कर अपने मन माफिक ख़बरें लिखवाना तो लगभग सामान्य बात हो गयी   है . जब कहीं कोई पत्रकार मुकामी नेता की बात  नहीं मानते तो उन पत्रकारों का  गला  ही घोंट दिया जाता है .
पत्रकारों के ऊपर हो रही हिंसा  का उद्देश्य सही ख़बरों को जनता तक पंहुचने से रोकना होता है . ज्यादातर तो मालिकों को ही डरा धमका कर   राजनीतिक आका लोग मनमाफिक ख़बरें चलवाते हैं .पिछले एक साल में  ऐसे   सैकड़ों मामले सामने आये हैं जिसमें विज्ञापनदाताओं की मर्जी से हटकर  खबर चलाने वाले पत्रकारों के मालिकों के विज्ञापन रोककर  और दबाव बनाकर पत्रकारों की नौकरियाँ ली गयी हैं . हालांकि आम तौर पर बात उस मुकाम तक नहीं पंहुचती . मालिक लोग ऐसे  ही पत्रकारों   से काम लेते हैं जो पत्रकारिता के मानदंडों के बारे में बहुत चिंतित नहीं रहते हैं , और  पापी पेट के वास्ते कुछ भी करने को तैयार हो  जाते हैं .लेकिन कई बार ऐसे पत्रकार भी होते हैं जो  सच्चाई सामने लाने के लिए समझौते नहीं करते . ऐसा ही एक मामला गौरी लंकेश का है . कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरू से गौरी लंकेश अखबार    छापती थीं. बीजेपी के  खिलाफ खूब ख़बरें  लिखती थीं  एक दिन शाम को कुछ बदमाशों ने उनको घर के सामने ही गोली मार दी और उनको हमेशा के लिए चुप कर दिया .   

पिछले तीस पैंतीस साल में देश की राजनीति में एक अजीब विकास हुआ  है . जिताऊ उम्मीदवार के नाम पर हर  इलाके का माफिया, गुंडा, मवाली  राजनेता बन  गया है . कर्नाटक में  बेल्लारी के रेड्डी ब्रदर्स का केस पूरी दुनिया में जाना  जाता  है . आज भी खनिज माफिया की ज़रायम की दुनिया में रेड्डी परिवार की दहशत है . कोर्ट के आदेश से वे जिला बदर कर दिए गए हैं ,अपने जिले में घुस नहीं सकते लेकिन वहां की सभी राजनीतिक पार्टियां उनको साथ लेने के लिए प्रयास करती रहती  हैं .  कर्नाटक के विधान सभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी का दामन पकड़ लिया था .  हालांकि बाकी पार्टियां भी उनको साथ लेने की कोशिश कर रही थीं लेकिन बीजेपी ने उनको साथ लेने  में सफलता  पाई थी . अभी लोकसभा के उपचुनाव  में भी उन्होंने तडीपार होने के बावजूद धन बल से बीजेपी उमीदवार का साथ दिया .
जब से माफिया  का कब्जा राजनीतिक प्रक्रिया पर हुआ है तब से पत्रकारों की   सुरक्षा पर तरह तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं . इस सबको दुरुस्त करने का ज़िम्मा जनता  का ही हैं .  अगर बदमाशों को वोट न देकर राजनीति से ही  बाहर कर दें तो पत्रकारों की सुरक्षा भी रहेगी और देश के नागरिक भी सुरक्षित महसूस करेंगें .

नक़ली विवादों नहीं ,अवाम के मुद्दों पर चुनाव होना चाहिए



शेष नारायण सिंह

आर एस एस ने राम मंदिर के नाम पर देश जी सियासत को टाप गियर में डाल दिया है . अभी पिछले महीने पत्रकार , हेमंत शर्मा की दो किताबों के विमोचन के अवसर पर आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत , बीजेपी के प्रमुख अमित शाह और केंद्र सरकार के उप प्रमुख राजनाथ सिंह एक ही मंच पर मौजूद थे . जिन किताबों का विमोचन  हुआ ,वे भी आर एस एस और अन्य हिंदुत्व  संगठनों के मुद्दों के लिहाज़ से दिलचस्प किताबें थीं . उस अवसर पर अपने भाषण में आर एस एस के प्रमुख ने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ी तो अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए महाभारत भी किया जा सकता है. इस बात को अखबारों ने प्रमुखता से रिपोर्ट किया लेकिन माना यह जा रहा था कि मौजूदा सरकार राम मंदिर के निर्माण को चुनावी मुद्दा नहीं बनायेगी . सत्ताधारी पार्टी की ओर से पिछले पांच वर्षों से दावा किया जा रहा था कि सरकार ने विकास का लक्ष्य और भ्रष्टाचार  के खात्मे का वायदा करके चुनाव लड़ा था . उसी के परफार्मेंस के आधार पर वोट माँगा जाएगा . ज्यादातर बीजेपी नेता कह रहे  थे कि इस राज में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है. लेकिन सचाई कुछ और है  और वह यह कि  भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ  है. भ्रष्टाचार की जांच करने वाली दो प्रमुख एजेंसियों , सी बी आई और  ई डी के आला अफसरों के ऊपर आर्थिक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप सी बी आई के  बहुत बड़े अधिकारियों की तरफ से ही लगाए गए हैं . सी बी आई के दो सबसे बड़े अफसर भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद बाहर बैठा दिए गए हैं.  आरोप इतने गंभीर हैं कि अब्जंच सुप्रीम कोर्ट की नज़र में है.  रिज़र्व बैंक के  बड़े अफसरों ने भी सरकार के अलग अलग स्तरों पर आर्थिक अनियमितता के आरोप लगाए हैं . बैंकों में भ्रष्टाचार की कहानी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुयी  है . लाखों करोड़ रूपये हजम कर जाने वाले आर्थिक अपराधियों को सरकारी संरक्षण की ख़बरें भी सत्ता के गलियारों में  सुनी जा रही  हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राफेल जहाज़ के सौदे पर सरकार से कठिन सवाल पूछ कर सरकार के  भ्रष्टाचार मुक्त होने के दावे को पंचर कर दिया है .  स्थिति यह बन गयी है कि भ्रष्टाचार मुक्त होने की बात तो अब सरकार के लिए सही विशेषण नहीं है. जहां हर सेंसिटिव महकमे के अफसर भ्रष्टाचार की जांच की ज़द में हों वहां भ्रष्टाचार विहीन सरकार का नारा एक कामेडी तो हो सकता है , चुनाव जीतने का नारा किसी भी हाल में  नहीं बन सकता . बीजेपी के २०१४ के विकास के दावे को भी सरकारी नीतियों की विफलताओं ने  बिलकुल बेदम कर दिया है . केंद्र सरकार ने जब ८ नवम्बर २०१६ को नोटबंदी का ऐलान किया था तो ऐसी तस्वीर खींची गयी थी कि उसके बाद  भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा , काला धन ख़त्म हो जाएगा और आतंकवाद ख़त्म हो जाएगा .  आज  सब को मालूम है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ . नोट बंदी के बाद आर्थिक गतिविधियों में जो मंदी आयी वह अब तक बनी हुई है . मकान बनाने वाली ज़्यादातर कम्पनियां  डिफाल्टर हो चुकी हैं लेकिन उनका कोई आर्थिक नुक्सान नहीं हुआ है. उन्होंने मध्यवर्ग के जिन मकान के खरीदारों से मकान देने के लिए पैसा लिया था उनका नुक्सान हुआ है . सुप्रीम कोर्ट किसी न किसी तरीके से  फ़्लैट खरीदारों को मकान दिलवाने की कोशिश कर रहा है . ज़ाहिर है इससे मध्य वर्ग में बहुत नाराज़गी  है . चुनावी वायदों में नौजवानों को हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वायदा किया गया था , उसका कहीं कोई अता पता नहीं है . सरकारी तौर पर  नौकरियों की परिभाषा बदल कर बीजेपी के नेता लोग काम चला रहे हैं . बेरोज़गार नौजवानों में भारी नाराज़गी है .  खेती  किसानी की हालत भी खस्ता है. २०१४ के चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने वायदा किया था कि  किसानों की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी . वह कहीं नहीं हुई . बल्कि गौरक्षा के नाम पर एक नया माहौल बना दिया गया . खेती के अलावा सभी किसानों  के यहाँ एकाध गाय भैंस रहती थी. उसके बछड़ों को किसान  बेच लेता था , उससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी . अब बछड़े नहीं बेचे जा सकते . बछड़ों या बैलों का अब खेती में कोई उपयोग नहीं होता . बैलों का काम अब ट्रैक्टर से होता है . ज़ाहिर है कि ऐसे जानवरों को चारा दे पाना किसान के ऊपर  भारी बोझ है . नतीजा  यह है कि ज़्यादातर लोग अपने अनुपयोगी बछड़ों को चुपचाप छोड़ दे रहे  हैं . और वे बछड़े खुली फसल को चर जा रहे हैं . खेती की पैदावार को भारी नुक्सान हो रहा है . कुल मिलाकर गाँवों में किसानों की हालत बहुत खराब है .
इस तरह हम देखते हैं कि बेरोजगारी , खस्ताहाल अर्थव्यवस्था , किसानों की नाराज़गी ,नौजवानों की निराशा और भ्रष्टाचार के माहौल में २०१४ के चुनावी वायदों का ज़िक्र करके तो सत्ताधारी पार्टी का नुक्सान ही होगा .शयद इसीलिये हर चुनाव के पहले की तरह इस बार भी आर एस एस और बीजेपी ने अयोध्या में राम मंदिर को मुद्दा बनाने की ज़बरदस्त कोशिश शुरू कर दी है . इसके लिए बीजेपी और आर एस एस के नेता सुप्रीम कोर्ट  जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ भी बयान दे  रहे  हैं.  छुटभैया नेता लोग तो मुसलमानों के खिलाफ बयान देते ही रहते थे अब शीर्ष नेतृत्व से भी वही बातें होने लगी हैं . चारों तरफ  माहौल बनाया  जा रहा है कि देश में एक तरफ हिन्दू  हैं तो  दूसरी तरफ मुसलमान . अब तक तो कुछ कट्टर हिंदुत्व प्रवक्ता लोग मुसलमानों के खिलाफ ज़हरीले बयान देकर माहौल को गरमा रहे थे , अब बड़े नेताओं को भी   ऐलानियाँ मुसलिम  विरोधी बयान देते देखा जा सकता है . मुस्लिम विरोध का माहौल ऐसा बन गया  है कि कांग्रेस के नेता  भी  अपने को शिवभक्त और जनेऊधारी हिन्दू साबित करने के लिए एडी चोटी की ताक़त लगा  रहे हैं. पूरे देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाया जा रहा है जिससे हिन्दुओं के वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके और बहुमतवाद की राजनीति का फायदा लेने के लिए हिन्दुओं को एकमुश्त किया जा सके. अयोध्या विवाद को बहुत ही गर्म कर देने की योजना पर दिन  रात काम  हो रहा है . इस काम में अखबारों की भी भूमिका है लेकिन चुनावी माहौल को हिन्दू-मुस्लिम करने में  न्यूज़ चैनलों की भूमिका सबसे प्रमुख है . बहुत सारे टीवी चैनलों की राजनीतिक बहस में हिन्दू -मुस्लिम  विवाद को मुद्दा बनाया जा रहा है .   इन बहसों में कुछ मौलाना टाइप लोगों को बैठाकर  उनको सारे मुसलमानों का नुमाइंदा बताने की कोशिश होती  है . कई बार यह मौलाना लोग ऐसी बातें बोल जाते हैं जिसके नतीजे से वे खुद भी वाकिफ नहीं होते . उनकी बात को पूरे मुस्लिम समुदाय की बात की तरह पेश करके मुसलमानों को कई बार तो देशद्रोही तक कह दिया जाता है .लेकिन वे मौलाना लोग बार बार  बहस में शामिल होते हैं और गाली तक खाते हैं . एक बार तो एक मौलाना साहब को एक महिला ने टीवी बहस के दौरान पीट भी दिया था.  वे जेल भी गए लेकिन टीवी पर नज़र आने की तलब इतनी ज़बरदस्त है कि बार बार  वहां आते रहते हैं .  
ज़ाहिर है कि अगला लोकसभा चुनाव आम आदमी की समस्याओं और मुसीबतों के खात्मे को मुद्दा बनाकर  लड़ पाने की सत्ताधारी पार्टी की हिम्मत नहीं है . ऐसा लगता है कि इस बार भी मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम मतभेद की कोशिश ही होगी . इसकी काट यह है कि अवाम एकजुट रहे और  सियासतदानों के भड़काऊ भाषणों को नज़रंदाज़ करे . उनको मजबूर करे कि वे आम आदमी को सवालों को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए मजबूर हों . 

Wednesday, October 31, 2018

सरदार पटेल के जाने के बाद नेहरू ने उनके दोनों बच्चों को लोकसभा का सदस्य बनाया

शेष नारायण सिंह 

सरदार पटेल के दो बच्चे थे. मणिबहन पटेल उनकी बेटी थीं. और डाह्याभाई उनके बेटे थे. सरदार पटेल की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उनके दोनों ही बच्चों को संसद में भेजा .मणिबहन पटेल दक्षिण कैरा लोकसभा सीट से १९५२ में और आनंद सीट से १९५७ में कांग्रेस के टिकट पर चुनी गयीं . १९६२ में गैप हो गया तो जवाहरलाल ने उनको छः साल के लिए राज्य सभा की सदस्य के रूप में निर्वाचित करवाया . अपनी बेटी इंदिरा गांधी को उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भी चुनाव लड़ने का टिकट नहीं मिलने दिया जबकि इंदिरा गांधी बहुत उत्सुक रहती थीं. जवाहरलाल की मृत्यु के बाद ही उनको संसद के दर्शन हुए . कामराज आदि भजनमंडली वालों ने इंतज़ाम किया .मणिबहन ने इमरजेंसी का विरोध किया और जनता पार्टी की टिकट पर मेहसाना से १९७७ में चुनाव जीतीं , वह बहुत ही परिपक्व राजनीतिक कार्यकर्ता थीं. उन्होंने १९३० में सरदार की सहायक की भूमिका स्वीकार की और जीवन भर अपने पिता के साथ ही रहीं .यह बात जवाहरलाल ने एक से अधिक अवसरों पर कहा और लिखा है .मणिबहन के नाम पर ही वह शहर बसा है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विधानसभा क्षेत्र हुआ करता था. .
सरदार पटेल की दूसरी औलाद डाह्याभाई पटेल थे जो बंबई में एक बीमा कंपनी में काम करते थे . वे मणिबहन से तीन साल छोटे थे . जब सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री बने तो उनके सेठ ने डाह्याभाई को किसी काम से दिल्ली भेजा . सरदार पटेल ने शाम को खाने के समय अपने बेटे डाह्याभाई को समझाया कि जब तक मैं यहाँ काम कर रहा हूँ , तुम दिल्ली मत आना . वे भी कांग्रेस की टिकट पर १९५७ और १९६२ में लोक सभा के सदस्य रहे . बाद में १९७० में राज्य सभा के सदस्य बने और मृत्युपर्यंत रहे .
यह सूचना उन लोगों के लिए है जो अक्सर कहते पाए जाते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल के बच्चों को अपमानित किया था या उनको ज़रूरी महत्व नहीं दिया था .

३१ अक्टूबर आचार्य नरेंद्र देव का जन्मदिन है

आज आचार्य नरेंद्र देव का जन्मदिन है . ३१ अक्टूबर १८८९ के दिन उनका जन्म उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था. उनका बचपन का नाम अविनाशी लाल था .उनकी माता जी का नाम जवाहर देवी था और पिता का नाम था बलदेव प्रसाद .महामना मदन मोहन मालवीय, माधव प्रसाद मिश्र , डॉ गंगानाथ झा और बाल गंगाधर तिलक ने उनकी किशोरावस्था में उनको बहुत प्रभावित किया .उन्होंने १९११ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी ए पास किया और बनारस में क्वींस कालेज में नाम लिखा लिया . बाद में क्वींस कालेज का नाम बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय रख दिया गया था. वहां से १९१३ में एम ए किया और १९१५ में इलाहाबाद से कानून की पढाई की . फिर फैजाबाद में वकालत शुरू कर दिया .वे १९०६ में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में शामिल हुए थे जिसकी अध्यक्षता दादाभाई नौरोजी ने की थी.उसके बाद वे कांग्रेस में सक्रिय हो गए और बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य हुए .
देश की राजनीति में आचार्य जी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने कभी भी कोई गलत काम नहीं किया . आचार्य नरेंद्र देव् की जयन्ती पर उनकी स्मृति को प्रणाम .