Tuesday, March 1, 2016

उर्दू को विदेशी भाषा बताना अज्ञानता है



शेष नारायण सिंह­­­



पिछले दिनों एक खबर आई थी कि दिल्ली की मेट्रो ट्रेन में एक आदमी उर्दू किताब पढ़ रहा था। जिसे देखकर पास ही खड़े कुछ लोगों ने उससे बात करनी शुरू कर दी। इन लोगों की आँखों में उस व्यक्ति के लिए नफरत साफ दिखाई दे रही थी। इतना ही नहींये लोग उसे देखकर कह रहे थे कि उर्दू पढनेवाले सभी पाकिस्तानी है। इन लोगों को पकिस्तान भेज देना चाहिए।’   ज़माना बदल गया है . इतनी बड़ी बात पर कहीं कोई हंगामा नहीं हुआ . उर्दू अखबारों के अलावा कहीं ज़िक्र तक नहीं हुआ . लेकिन आज से करीब तीस साल पहले था तक होता था . १९७८ में देश के गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कहीं कह दिया था कि उर्दू तो विदेशी भाषा है . उस वक़्त के अखबारों में इस बात की खूब चर्चा हुयी थी और कई सम्पादकीय लेखकों ने चौधरी साहेब को आगाह किया था कि उर्दू विदेशी तो कतई नहीं है , वह उनके अपने जन्मस्थान के आसपास के इलाकों  में ही पैदा हुयी और इसी खड़ी बोली के इलाके में परवान चढ़ी. उन दिनों राजनीति में  सरे फेहरिस्त ऐसे लोग होते थे जिनमें से ज़्यादातर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो चुके थे . उन्होंने अपनी आँखों से देखा था कि उर्दू बोलने और लिखने वालों की भारत की जंगे- आज़ादी में कितनी बड़ी भूमिका हुआ करती थी . चौधरी चरण सिंह भी भले आदमी थे और उन्होंने अपनी  गलती को स्वीकार कर लिया और बात आई गयी हो गयी.

दिल्ली मेट्रो की घटना को अगर पैमाना माना जाए तो यह मानना पडेगा कि हालात बिगड़ चुके हैं , बहुत बिगड़ चुके हैं . दिल्ली के आसपास जन्मी  और पलीबढी उर्दू ज़बान को अब गैर ज़िम्मेदार लोगों की नज़र में खतरनाक  भाषा माना जाने लगा है . किसी भी  भाषा और उसमें लिखा साहित्य अगर खतरनाक माना जाने लगे तो यह समाज में मनमानी की ताकतों के बढ़ने का संकेत माना जाता है . इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लगाई थी तो किसी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस वाले उसके घर से या झोले से मार्क्सवादी साहित्य की बरामदगी दिखा देते थे . बस उसको खूंखार आतंकवादी मान लिया जाता था. १९८६ में जब से बाबरी मस्जिद के खिलाफ आन्दोलन शुरू हुआ तब से उर्दू को भी खतरनाक  घोषित करने की साज़िश पर काम चल रहा है . हालांकि सरकारी तौर  पर तो ऐसा  नहीं हुआ है लेकिन सड़कों पर जो लोग किसी को भी अपमानित करने के लिए घूम रहे हैं , उन ठगों के लिए उर्दू पाकिस्तानी हो चुकी है जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू भारतीय भाषा है और पाकिस्तान ने उसको अपनी सरकारी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया है .  भारतीय के रूप में हमें इस पर गर्व होना चाहिए कि हमारी भाषा किसी और देश की राजभाषा है . तकलीफ तब होती है जब ऐसे कुछ नेता मिलते हैं जो हिंदुत्व की राजनीति के अलंबरदारों की बात को काटना तो चाहते हैं लेकिन उनको मालूम ही नहीं है कि देश के इतिहास में उर्दू का योगदान कितना है . वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है। इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था। इस लेख उन उर्दू प्रेमियों को संबोधित है जो इस ज़बान के खिलाफ हो रहे हमलों से तकलीफ महसूस  करते हैं .

आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। इसके विकास में दोस्ती का पैगाम लेकर आये सूफी फकीरों की खानकाहों का भी बहुत ज़्यादा  योगदान है .सूफियों के दरवाज़ों पर अमीर गरीब सभी आते थे .सब अपनी अपनी जबान में कुछ कहते। इस बातचीत से जो जबान पैदा हो रही थी वही जम्हूरी जबान आने वाली सदियों में इस देश की सबसे महत्वपूर्ण जबान बनने वाली थी। इस तरह की संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र महरौली में कुतुब साहब की खानकाह थी। उनके चिश्तिया सिलसिले के सबसे बड़े बुजुर्ग ख़्वाजा गऱीब नवाज के दरबार में अमीर गरीब हिन्दूमुसलमान सभी आते थे और आशीर्वाद की जो भाषा लेकर जाते थेआने वाले वक्त में उसी का नाम उर्दू होने वाला था। सूफी संतों की खानकाहों पर एक नई ज़बान परवान चढ़ रही थी। मुकामी बोलियों में फारसी और अरबी के शब्द मिल रहे थे और हिंदुस्तान को एक सूत्र में पिरोने वाली ज़बान की बुनियाद पड़ रही थी।इस ज़बान को अब हिंदवी कहा जाने लगा था। बाबा फरीद गंजे शकर ने इसी ज़बान में अपनी बात कही। बाबा फरीद के कलाम को गुरूग्रंथ साहिब में भी शामिल किया गया। दिल्ली और पंजाब में विकसित हो रही इस भाषा को दक्षिण में पहुंचाने का काम ख्वाजा गेसूदराज ने किया। जब वे गुलबर्गा गए और वहीं उनका आस्ताना बना। इस बीच दिल्ली में हिंदवी के सबसे बड़े शायर हज़रत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में बैठकर हिंदवी जबान को छापा तिलक से विभूषित कर रहे थे।


हज़रत अमीर खुसरो की शायरी हमारी  बेहतरीन अदब और विरासत का हिस्सा है . उनसे महबूब-ए-इलाही, हज़रत निजामुद्दीन औलिया  ने ही फरमाया था कि हिंदवी में शायरी करो और इस महान जीनियस ने हिंदवी में वह सब लिखा जो जिंदगी को छूता है। हजरत निजामुद्दीन औलिया के आशीर्वाद से दिल्ली की यह जबान आम आदमी की जबान बनती जा रही थी।

जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने का फैसला लिया तो दिल्ली की जनता पर तो पहाड़ टूट पड़ा लेकिन जो लोग वहां गए वे अपने साथ संगीतसाहित्यवास्तु और भाषा की जो परंपरा लेकर गए वह आज भी उस इलाके की थाती है। इस तरह दक्षिण में  भी उर्दू भाषा पूरी शान की भाषा बनी .  1526 में जहीरुद्दीन बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुग़ल साम्राज्य की बुनियाद डाली। 17 मुगल बादशाह हुए जिनमें मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर सबसे ज्यादा प्रभावशाली हुए। उनके दौर में एक मुकम्मल तहज़ीब विकसित हुई। अकबर ने इंसानी मुहब्बत और रवादारी को हुकूमत का बुनियादी सिद्घांत बनाया। दो तहजीबें इसी दौर में मिलना शुरू हुईं। और हिंदुस्तान की मुश्तरका तहजीब की बुनियाद पड़ी। अकबर की राजधानी आगरा में थी जो ब्रज भाषा का केंद्र था और अकबर के दरबार में उस दौर के सबसे बड़े विद्वान हुआ करते थे।वहां अबुलफजल भी थेतो फैजी भी थेअब्दुर्रहीम खानखाना थे तो बीरबल भी थे। इस दौर में ब्रजभाषा और अवधी भाषाओं का खूब विकास हुआ। यह दौर वह है जब सूफी संतों और भक्ति आंदोलन के संतों ने आम बोलचाल की भाषा में अपनी बात कही। सारी भाषाओं का आपस में मेलजोल बढ़ रहा था और उर्दू जबान की बुनियाद मजबूत हो रही थी। बाबर के समकालीन थे सिखों के गुरू नानक देव। उन्होंने नामदेवबाबा फरीद और कबीर के कलाम को सम्मान दिया और अपने पवित्र ग्रंथ में शामिल किया। इसी दौर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावत की रचना की जो अवधी भाषा का महाकाव्य है लेकिन इसका रस्मुल खत फारसी ही है .


उर्दू भारत की आज़ादी की लडाई के भी भाषा  है .कांग्रेस के अधिवेशन में 1916 में लखनऊ में होम रूल का जो प्रस्ताव पास हुआ वह उर्दू में है। 1919 में जब जलियां वाला बाग में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून दिया तो उस गम और गुस्से का इज़हार पं. बृज नारायण चकबस्त और अकबर इलाहाबादी ने उर्दू में ही किया था। इस मौके पर लिखा गया मौलाना अबुल कलाम आजाद का लेख आने वाली कई पीढिय़ां याद रखेंगी। हसरत मोहानी ने 1921 के आंदोलन में इकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था जो आज न्याय की लड़ाई का निशान बन गया है।आज़ादी के बाद सीमा के दोनों पार जो क़त्लो ग़ारद हुआ था उसको भी उर्दू जबान ने संभालने की पूरी को कोशिश की। हमारी मुश्तरका तबाही के खिलाफ अवाम को फिर से लामबंद करने में उर्दू का बहुत योगदान है। आज यह सियासत के घेर में है  लेकिन उम्मीद बनाए रखने की ज़रूरत है क्योंकि इतनी संपन्न भाषा को राजनीति का कोई भी कारिन्दा दफ़न नहीं का सकता ,चाहे जितना ताक़तवर हो जाए . उर्दू भारत की भाषा है और इसको विदेशी कहना अपनी जहालत का परिचय देना ही है 

Tuesday, December 8, 2015

रमाशंकर यादव ' विद्रोही ' मर गए, हारे नहीं




शेष नारायण सिंह

रमा शंकर यादव ' विद्रोही ' नहीं रहे . बड़े कवि थे रमाशंकर . मुझसे उनकी मुलाक़ात १९७४ में हुयी थी. कादीपुर के संत तुलसीदास डिग्री ( अब पोस्ट ग्रेजुएट ) कालेज में वे बी ए  के  छात्र थे . मैं वहीं प्राचीन इतिहास पढाता था.   जिले के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता , शीतला प्रसाद गुप्त ने मुझे उनके बारे में बताया था.  बताया था कि कस्बे  में  बाएं बाजू की पार्टियों का कोई छात्र संगठन नहीं  था इसलिए किसान सभा के काम में रमा शंकर उनको सहयोग करते थे.  साथ यह भी बताया था कि नौजवान लड़का क्रांतिकारी तो है लेकिन  विचारधारा के स्तर पर सीखने की प्रक्रिया अभी चल  रही है .  उन दिनों कादीपुर का यह कालेज गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था.  ऐसा लगता था कि इतिहास का पाठ्यक्रम सीधे मैकाले के दफ्तर से डिजाइन होकर आया था. मेरे क्लास में नियम था कि किसी को मेरे लेक्चर के नोट लेने की अनुमति नहीं थी. सबको लेक्चर सुनना पड़ता था और साथ साथ बहस का माहौल बनाने की कोशिश की जाती थी. उन इलाके में उन दिनों  बी ए के किसी छात्र से इतिहास की समझ की बहुत उम्मीद नहीं की जाती थी .  सबसे आसान विषय मानकर लोग इतिहास पढ़ते थे . बी ए के बाद किसी नौकरी की उम्मीद में इकठ्ठा हुए उस क्लास में रमा शंकर यादव अक्सर बुनियादी सवाल उठाते थे . साम्राज्यवादी शोषण के हथियार के रूप में राज्य और सरकार ,  शोषक और शासक वर्ग की पार्टियों का वर्ग चरित्र , उस वक़्त की  सत्ताधारी पार्टी, कांग्रेस और अमरीकी पार्टियों में शोषित पीड़ित जनता  के खिलाफ एका आदि ऐसे मुद्दे वे क्लास में उठाते थे ,जो बहुत सारे अन्य छात्रों की समझ से बहुत दूर के होते थे. रमा  शंकर उन दिनों भी कवितायें लिखते थे लेकिन शायद उपनाम विद्रोही नहीं धारण किया था.  इमरजेंसी लगने पर मेरी नौकरी छूट गई और मैं दिल्ली में रोज़गार की तलाश में ठोकर खाने लगा. फिर उनसे बहुत दिनों तक मुलाक़ात नहीं हुयी .
बी ए के बाद रमाशंकर जिला मुख्यालय , सुलतानपुर चले गए जहां  उनके असली दोस्त असरार खान ने उनको अपने साथ ले लिया . असरार ने छात्र राजनीति में एक मुकाम बना लिया था और उन्होंने ही रमाशंकर को वहां खूब सक्रिय किया . बहुत काम किया इन लोगों ने . बाद में जब असरार  जे एन यू आये  तो रमाशंकर को भी साथ लाये . अपने साथ रखते थे , क्रांतिकारी तेवर दोनों के थे लेकिन बीच में कहीं रमाशंकर ऐसे लोगों की संगत में पड़ गए जिसके बाद वे अन्दर से बार बार टूटे लेकिन हारे नहीं . जितनी बार धोखा खाया  उतने  ही मज़बूत होकर बाहर आये . दिल्ली में कई बार उनसे मुलाक़ात होती थी . आखिरी बार तब मिला जब अपनी बेटी से मिलने मैं और मेरी पत्नी जे एन यू कैम्पस गए. मेरी पत्नी उनको बहुत मानती थीं  . तब तक  विद्रोही  वहां के स्थाई निवासी बन चुके थे ,छात्रों में लोकप्रिय , और फक्कड़ तबियत .  मैंने कहा कि कोई स्थाई व्यवस्था करो , तो जवाब सपाट था . मिडिल क्लास की उन चिंताओं से मुक्त हूँ जिसके लिए आपने अनंत समझौते किये हैं . जे एन यू कैम्पस में यह व्यवस्था स्थाई ही है . भूख से तिलमिलाना तो बहुत पहले छोड़ दिया था , बाकी इस विश्वविद्यालय में कपडे    लत्ते से इज्ज़त मिलने का रिवाज़ तो कभी नहीं था
आज रमाशंकर के जाने से मुझे बहुत तकलीफ हो रही है .   साम्राज्यों के खिलाफ उनकी कवितायें बहुत  सशक्त होती थीं. मुझे यह वाली बहुत प्रभावशाली लगी थी , अन्दर तक कुछ कह गयी थी . बड़ी कविता है यह. इसको सुनाकर मुझसे कहा था १९७४-७५ में आप जो बकवास क्लास में ...... करते थे ,वह सब दिमाग में भरी रहती है , वह  यूनान ,मिस्र ,रोमा  के  मिटने का जो रुदन आप करते थे उसी का गुस्सा है मेरे दिमाग में. लेकिन यार टीचर तुम बढ़िया थे सेस नरायन .


और ये इंसान की बिखरी हुई हड्डियाँ
रोमन के गुलामों की भी हो सकती हैं और
बंगाल के जुलाहों की भी या फ़िर
वियतनामी, फ़िलिस्तीनी, बच्चों की
साम्राज्य आख़िर साम्राज्य होता है

चाहे रोमन साम्राज्य हो, ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अत्याधुनिक अमरीकी साम्राज्य
जिसका यही काम होता है कि
पहाड़ों पर पठारों पर नदी किनारे
सागर तीरे इंसानों की हड्डियाँ बिखेरना.

किसी भी साम्राज्य के प्रति उनका जो गुस्सा था वह मुझे धारदार लगता था. कविता मैं नहीं समझता लेकिन कविता पढ़ते हुए मैं रमाशंकर यादव  विद्रोही के चेहरे को समझता ज़रूर था . यह दूसरी कविता सुनाते हुए , जे  एन यू की चट्टानों पर वे बहुत गुस्से में थे.

नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

Saturday, November 28, 2015

ज्योतिबा फुले की किताब ,' गुलामगीरी ' शोषित पीड़ित आबादी का हथियार



शेष नारायण सिंह 


दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है।
1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने 1848 में ही मार्क्‍स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया। 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया।
महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है। इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है। न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है। महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया। उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया। कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए। उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी। ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे। वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे।
महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्धांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है। उनका कहना था कि यह सोच जातिव्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए। फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है। यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है।
महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा। उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है। ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे।
स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।
महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।
स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया।
महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है। आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है।

Thursday, November 5, 2015

सरदार पटेल ने महात्मा गांधी के आजादी ले सपने को सही रूप दिया था



शेष नारायण सिंह 

आज गोधरा को एक अलग सन्दर्भ में याद किया जाता है लेकिन पंचमहल जिले के इस कस्बे में भारत की आज़ादी के इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानी भी शुरू हुयी थी जब १९१७ में यहाँ गुजरात सभा  का राजनीतिक सम्मलेन हुआ था. सरदार तो उनको बाद में कहा  गया लेकिन १९१७ में वे बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल थे जो अपने बड़े भाई विट्ठलभाई को वचन दे चुके थे कि वे राजनीति से दूर रहेगें. लेकिन अहमदाबाद में म्युनिसिपल चुनावों की राजनीति में दोस्तों के कहने से थोडा रूचि ले रहे थे .राजनीति से इस क़दर दूर थे कि जब महात्मा गांधी अहमदाबाद के गुजरात क्लब गए तो वल्लभभाई पटेल उनसे मिलने तक नहीं गए. लेकिन १९१७ में सरदार पटेल बिलकुल राजनीति में क़दम रखने के लिए तैयार थे . अहमदाबाद नगरपालिका की राजनीति के अलावा वे महात्मा गांधी की राजनीति से इतना प्रभावित हो चुके थे कि अपनी वकालत के साथ साथ भाषण वगैरह भी देने लगे थे .वे सितंबर १९१७ में महात्मा गांधी के स्वराज अभियान के लिए जनमत तैयार कर रहे थे . यह लग बात हिया कि तब तक वे महात्मा गांधी से मिले नहीं थी. उनकी मुलाक़ात अक्टूबर १९१७ में हुयी जब महात्मा गांधी गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मलेन के लिए गोधरा पधारे .यहीं पर सरदार पटेल को गुजरात सभा का सचिव बनाया गया .बाद में इसी गुजरात सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गुजरात इकाई यानी गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नाम दे दिया गया. इसी गोधरा में महात्मा गांधी ने देश की आज़ादी की लड़ाई की कई नई शुरुआतें कीं . इसके पहले  भारत में जितने भी राजनीतिक सम्मलेन होते थे ब्रिटेन के सम्राट के प्रति वफादारी का प्रस्ताव पास किया जाता था . महात्मा गांधी ने उस प्रस्ताव को फाड़कर फेंक दिया  और कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है . इसी गोधरा सम्मलेन में महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज तब तक नहीं आएगा जब तक कि किसानों को साथ नहीं लिया जाएगा इसलिए ज़रूरी है कि सभी लोग भारतीय भाषाओं में भाषण करें . लोकमान्य बाल  गंगाधर तिलक तो मराठी में बोले लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता मुहम्मद अली जिन्ना अंग्रेज़ी के अलावा किसी भाषा में बोलने को तैयार नहीं थी. महात्मा गांधी ने उनको  उनकी मातृभाषा  गुजराती में भाषण देने के लिए मजबूर कर दिया . जिन्ना की महात्मा गांधी से बहुत सारी नाराजगियों में एक नाराज़गी यह भी है क्योंकि बिलकुल अंग्रेज़ी परस्त बन चुके जिन्ना गुजराती में ठीक से  बोल नहीं पाते  थे. यह बात १९४४ में महात्मा गांधी ने अपने साथ बैठे लोगों को  बताई थी.  भारत की आज़ादी की लडाई में गोधरा का एक और महत्व है . वल्लभभाई पटेल के अलावा यहीं एक और राजनीतिक स्तम्भ को महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया . १९१७ में ही एक  बेहतरीन वकील और लेखक महादेव देसाई को भी महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया . सरदार पटेल और महादेवभाई देसाई की दोस्ती का भारत की आज़ादी में बहुत योगदान है .यह दोस्ती इसी गोधरा में गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मेलन में शुरू हुयी थी और महादेव भाई देसाई के अंतिम समय १९४२ तक चली. महादेवभाई  महात्मा गांधी के साथ पूना के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार किये गए थे और वहीं महात्मा जी की मौजूद्गी में उनकी मृत्यु हुयी थी . अहमदनगर जेल में बंद सरदार पटेल को जब यह खबर मिली तो  उन्हें बहुत तकलीफ हुयी थी.
गोधरा से महात्मा गांधी का साथ सरदारश्री को मिला और उसके बाद  वे रुके नहीं . जब गुजरात सभा को गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी बना दिया गया तो वल्लभभाई उसके पहले अध्यक्ष हुए .सारे देश में उनकी राजनीतिक पहचान महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से बनी . इस आन्दोलन के शुरू होते ही वल्लभभाई ने गुजरात के लगभग सभी गाँवों की यात्रा की कांग्रेस के करीब ३ लाख सदस्य भर्ती किया और करीब १५ लाख रूपया इकट्ठा किया . सन १९२० के १५ लाख रूपये का मतलब आज की भाषा में बहुत ज़्यादा होता है. और यह सारा धन गुजरात के किसानों से इकठ्ठा किया गया था.  सरदारश्री के जीवन का वह दौर शुरू हो चुका था जिसके बाद उन्होंने गांधी जी की किसी बात का विरोध नहीं किया . कई मुद्दों पर असहमति ज़रूर दिखाई लेकिन जब फैसला हो गया तो वे महात्मा जी के फैसले के साथ रहे. असहयोग आन्दोलन के दौर में जब  गोरखपुर के चौरी चौरा में  किसानों ने पुलिस थाने में आग लगा दी तो महात्मा गांधी ने आन्दोलन वापस ले लिया. उनको  आशंका थी कि उसके बाद अंग्रेज़ी राज का दमनचक्र उसी तरह से चल पडेगा जैसे १८५७ के समय में हुआ था . कांग्रेस के बाकी बड़े नेता आन्दोलन  वापस लेने का विरोध करते रहे लेकिन वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी का पूरा समर्थन किया. राजनीतिक कार्य के साथ उन्होने अपने एजेंडे में शराब, छुआछूत और जाती प्रथा के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया . गुजरात के तत्कालीन विकास में सरदार पटेल के इस कार्यक्रम का बड़ा योगदान माना जाता है .
१९२८ में गुजरात के कई जिलों में भयानक अकाल पड़ा लेकिन अंग्रेज़ी सरकार किसी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं थी.  बारडोली में यह अकाल सबसे अधिक खौफनाक था .महात्मा गांधी का अहिंसा पर आधारित राजनीति का सिद्धांत असहयोग आन्दोलन के दौरान जांचा परखा जा चुका था. सरदार पटेल ने अहिंसा पर आधारित असहयोग आन्दोलन चलाकर अकालग्रस्त बारडोली में  एक स्थानीय असहयोग आन्दोलन शुरू किया . किसानों ने खेत का लगान देने से मना कर दिया . मूल असहयोग बारडोली में हुआ लेकिन गुजरात के कई इलाकों में सहानुभूति में आन्दोलन तैयार हो गया . सरकार भी जनता को कुचल देने पर आमादा थी . गिरफ्तारियां हुईं, ज़ब्ती हुयी लेकिन वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में आन्दोलन जोर पकड़ता गया . एक मुकाम ऐसा आया जब सरकार को मजबूर कर दिया गया कि वह आन्दोलन को समझौते के आधार पर ख़त्म करे. किसाओं की ज़मीन आदि सब वापस मिल गयी . इसी आन्दोलन में उनके साथियों ने वल्लभ भाई पटेल को  सरदार कहना शुरू कर दिया था . इसी आन्दोलन ने  भारत को  आज़ादी की लडाई का सरदार जिसने जिसने महात्मा गांधी को हमेशा समर्थन किया और जवाहरलाल नेहरू को वह सब करने का मौक़ा दिया जिससे वे महान बने. यहाँ यह ध्यान रखना पडेगा कि सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरु में बहुत अच्छी दोस्ती थी और जवाहरलाल अपने बड़े भाई सरदार पटेल की हर बात मानते थे . केवल एक बार नहीं माना जब नेहरू ने माउंटबेटन के चक्कर में आकर कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया . दुनिया जानती है कि नेहरू की वह गलती देश आज तक भोग रहा है .
महात्मा गांधी के सही मायनों में वारिस सरदार पटेल ही थे . १९२० से ३० जनवरी १९४८ तक सरदार पटेल ने महात्मा  गांधी की हर बात को स्वीकार किया था . यहाँ तक कि जब १९४६ में मौलाना आज़ाद के बाद कांग्रेस अध्यक्ष चुनने की बात आयी तो सब की इच्छा थी कि सरदार पटेल ही अध्यक्ष बनें क्योंकि १९४६ का अध्यक्ष ही आज़ाद भारत की सरकार का प्रधान मंत्री होता. कांग्रेस कार्यकारिणी में २६ सदस्य थे जिनमें २३ सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे . केवल जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद और रफ़ी अहमद किदवई उनके खिलाफ थे . चुनाव होना था .  सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच चुनाव होना था . बैठक शुरू हो गयी थी . लेकिन उसी बीच सरदार पटेल की बेटी  मणिबेन ने महात्मा गांधी की एक चिट्ठी लाकर सरदार को दे दी. सरदार ने  चिट्ठी पर एक नज़र डाली और उसको कुरते की जेब डाल लिया. उसके बाद उन्होने जवाहरलाल नेहरू का नाम प्रस्तावित कर दिया,  अपना नाम वापस ले लिया . जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष और बाद में वाइसराय के काउन्सिल के उपाध्यक्ष बने . समाजवादी  चिन्तक मधु लिमये अक्सर कहा करते थे कि अगर सरदार पटेल का पूर्ण सहयोग जवाहरलाल को न मिला होता तो  भारत वह न होता जो बन पाया . आज़ादी के बाद सरदार पटेल केवल सवा दो साल जीवित रहे लेकिन जो काम उन्होंने उस कालखंड में कर दिया वह बहुत सारे लोग कई  जिंदगियों में न कर पाते. देशी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल ही के बस की बात  थी , जिसको उन्होंने बखूबी पूरा किया . हैदराबाद के निजाम को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को कई बार नज़रंदाज़ भी किया लेकिन निजाम को बदमाशी नहीं करने दिया . कश्मीर के मामले में भी सरदार पटेल ने वहां के राजा को साफ़ बता दिया कि जब तक भारत में विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत नहीं करोगे कबायली और पाकिस्तानी फौज के हमले से नहीं बचाएगें . वही हुआ. 
 आज़ादी के बाद से ही नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सरदार पटेल मुस्लिम विरोधी और आर एस एस का हमदर्द बताता रहा है . उन लोगों की जानकारी के लिए यह बताना ज़रूरी है कि आर एस एस पर प्रतिबन्ध तो कई बार लगा लेकिन भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल ने आर एस एस का संविधान लिखने के लिए उनके नेताओं को मजबूर किया था और उनके  सरसंघचालक को गिरफ्तार किया था . इतिहास सरदार पटेल को मुस्लिम दोस्त के रूप में भी याद रखेगा .जब भी सरदार का आकलन होगा उनको मुसलमानों सहित सभी भारतीयों  के  शुभचिंतक के रूप में याद किया जाएगा . सरदार पटेल महात्मा गांधी की धर्मनिरपेक्षता की समझ के असली वारिस थे .महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में  देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।"
महात्मा गांधी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी शासकों को भारत के आम आदमी की ताक़त का अंदाज़ लग गया । आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने कांग्रेस से नाराज़ जिन्ना जैसे  लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। बाद में कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 16दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)।
सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं।सरदार अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और सरदार पटेल की बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, "इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ............ मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।" सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ.

आज उन्हीं सरदार पटेल का जन्म दिन है . सरदार आज होते तो १४० साल के होते.

Thursday, October 1, 2015

महात्मा गांधी की राजनीति और हिन्द स्वराज

शेष नारायण सिंह

 हिंद स्वराज एक ऐसी किताब हैजिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान हैहिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैंभीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश, मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टोज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकरमार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी कासावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है . ज्योतिबा फुले की किताब ' गुलामगीरी' ने बहुत सारे दार्शनिकों और चिंतकों को प्रभावित किया है .


चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराजकी रचना की। 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं। अपनी रचना के सौ साल बाद भी यह उतना ही उपयोगी है जितना कि आजादी की लड़ाई के दौरान था। इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था। उनका उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का था। उन्होंने भूमिका में ही लिख दिया था कि अगर उनके विचार गलत साबित होंतो उन्हें पकड़ कर रखना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक आचरण करें। उनकी भावना थी कि ऐसा करना देश के भले के लिए होगा।
अपने प्रकाशन के समय से ही हिंद स्वराज की देश निर्माण और सामाजिक उत्थान के कार्यकर्ताओं के लिए एक बीजक की तरह इस्तेमाल हो रही है। इसमें बताए गए सिद्धांतों को विकसित करके ही 1920 और 1930 के स्वतंत्रता के आंदोलनों का संचालन किया गया। 1921 में यह सिद्घांत सफल नहीं हुए थे लेकिन 1930 में पूरी तरह सफल रहे। हिंद स्वराज के आलोचक भी बहुत सारे थे। उनमें सबसे आदरणीय नाम गोपाल कृष्ण गोखले का है। गोखले जी 1912 में जब दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने मूल गुजराती किताब का अंग्रेजी अनुवाद देखा था। उन्हें उसका मजमून इतना अनगढ़ लगा कि उन्होंने भविष्यवाणी की कि गांधी जी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही उस पुस्तक का नाश कर देंगे। महादेव भाई देसाई ने लिखा है कि गोखले जी की वह भविष्यवाणी सही नहीं निकली। 1921 में किताब फिर छपी और महात्मा गांधी ने पुस्तक के बारे में लिखा कि "वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती हैहिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती हैपशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। उसमें से मैंने सिर्फ एक शब्द रद्द किया है। उसे छोड़कर कुछ भी फेरबदल नहीं किया है। यह किताब 1909 में लिखी गई थी। इसमें जो मैंने मान्यता प्रकट की हैवह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है।"
महादेव भाई देसाई ने किताब की 1938 की भूमिका में लिखा है कि '1938 में भी गांधी जी को कुछ जगहों पर भाषा बदलने के सिवा और कुछ फेरबदल करने जैसा नहीं लगा। हिंद स्वराज एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की शुरुआती रचना है जिसे आगे चलकर भारत की आजादी को सुनिश्चित करना था और सत्य और अहिंसा जैसे दो औजार मानवता को देना था जो भविष्य की सभ्यताओं को संभाल सकेंगे। किताब की 1921 की प्रस्तावना में महात्मा गांधी ने साफ लिख दिया था कि 'ऐसा न मान लें कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की हैवैसा स्वराज्य कायम करने के लिए मेरी कोशिशें चल रही हैंमैं जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है।..... लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज की मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पालियामेंटरी ढंग का स्वराज्य पाना है।"
इसका मतलब यह हुआ कि 1921 तक महात्मा गांधी इस बात के लिए मन बना चुके थे कि भारत को संसदीय ढंग का स्वराज्य हासिल करना है। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि आजकल देश में एक नई तरह की तानाशाही सोच के कुछ राजनेता यह साबित करने के चक्कर में हैं कि महात्मा गांधी तो संसदीय जनतंत्र की अवधारणा के खिलाफ थे। इसमें दो राय नहीं कि 1909 वाली किताब में महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बांझ और बेसवा कहा था (हिंद स्वराज पृष्ठ 13)। लेकिन यह संदर्भ ब्रिटेन की पार्लियामेंट के उस वक्त के नकारापन के हवाले से कहा गया था। बाद के पृष्ठों में पार्लियामेंट के असली कर्तव्य के बारे में बात करके महात्मा जी ने बात को सही परिप्रेक्ष्य में रख दिया था और 1921 में तो साफ कह दिया था कि उनका प्रयास संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर आजादी हासिल करने का है। यहां महात्मा गांधी के 30 अप्रैल 1933 के हरिजन बंधु के अंक में लिखे गए लेख का उल्लेख करना जरूरी है। लिखा है, ''सत्य की अपनी खोज में मैंने बहुत से विचारों को छोड़ा है और अनेक नई बातें सीखा भी हूं। उमर में भले ही मैं बूढ़ा हो गया हूंलेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आतंरिक विकास होना बंद हो गया है।.... इसलिए जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगेतब अगर उसे मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।" इसका मतलब यह हुआ कि महात्मा जी ने अपने विचार में किसी सांचाबद्घ सोच को स्थान देने की सारी संभावनाओं को शुरू में ही समाप्त कर दिया था।
उन्होंने सुनिश्चित कर लिया था कि उनका दर्शन एक सतत विकासमान विचार है और उसे हमेशा मानवता के हित में संदर्भ के साथ विकसित किया जाता रहेगा।
महात्मा गांधी के पूरे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास। चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था। इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थें। उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगावह सही नहीं है। महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यहां हिंद स्वराज का स्थाई भाव है। लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में हैउतना ही साधन और साध्य के बीच में है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है। उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खडूगबिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे।
हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने भारत की भावी राजनीति की बुनियाद के रूप में हिंदू और मुसलमान की एकता को स्थापित कर दिया था। उन्होंने साफ कह दिया कि, ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिएतो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए।.... मुझे झगड़ा न करना होतो मुसलमान क्या करेगाऔर मुसलमान को झगड़ा न करना होतो मैं क्या कर सकता हूंहवा में हाथ उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों व मुल्लाओं को बीच में न आने देंतो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला रहेगा।' (हिंद स्वराजपृष्ठ 31 और 35) यानी अगर स्वार्थी तत्वों की बात न मानकर इस देश के हिंदू मुसलमान अपने धर्म की मूल भावनाओं को समझें और पालन करें तो आज भी देश में अमन चैन कायम रह सकता है और प्रगति का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
इस तरह हम देखते है कि आज से सौ से अधिक वर्ष पहले राजनीतिक और सामाजिक आचरण का जो बीजक महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज के रूप में लिखा थावह आने वाली सभ्यताओं को अमन चैन की जिंदगी जीने की प्रेरणा देता रहेगा।

Friday, June 26, 2015

ललित मोदी केस के चक्कर में वसुंधरा राजे भी येदियुरप्पा नीति की तैयारी में

 शेष नारायण सिंह

पावर ब्रोकर के रूप में नाम कमा चुके क्रिकेट के प्रशासक ललित मोदी के कारनामों के कारण सत्ताधारी बीजेपी में विश्वास का संकट पैदा हो गया है। दबाव यह है कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपना पद छोड़ दें और पार्टी की स्वच्छता की राजनीति को मजबूती दें लेकिन अब तक के संकेतों से साफ है कि वसुंधरा राजे किसी नैतिकता या शुचिता के कारण अपना पद छोडऩे वाली नहीं हैं।  उनकी तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि अगर उन्होंने नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शुचिता वाली लाइन को मानकर इस्तीफा दे दिया तो नरेंद्र मोदी की राजनीतिक हैसियत तो दुनिया भर में बढ़ जायेगी लेकिन उनकी अपनी राजनीति खत्म हो जायेगी। इस बात की भी कोई संभावना नहीं है कि मामला शांत होने पर वे  उनको दोबारा सत्ता सौंप देगें। वसुंधरा राजे को यह भी मालूम है कि अगर वे बगावत करेंगी तो उनका भी वही हश्र होगा जो कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का हुआ था। इसलिए मुख्यमंत्री ने पूरी तरह संकेत दे दिया है कि  वे गद्दी नहीं  छोडऩे वाली हैं। उनके रुख में इस मजबूती का कारण यह भी है कि केंद्र सरकार के दो सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों ने उनके कथित भ्रष्ट आचरण को भ्रष्ट मानने से इन्कार कर  दिया  है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उनके इस्तीफे की चर्चा होने पर एक प्रेस वार्ता में साफ कह दिया था कि यहां कोई इस्तीफा देने वाला नहीं है जबकि विदेश से लौटकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी में कोई भी राजनीतिक दागी नहीं है। यानी इस्तीफे का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। हालांकि यह भी सच है कि भाजपा के केंद्रीय ने अभी वसुंधरा राजे के मामले में अंतिम फैसला नहीं लिया है लेकिन राजनीतिक शतरंज की बिसात पर जो बाजी बिछ गयी है वह राजीव गांधी सरकार के अंतिम दिनों की याद ताजा कर रही है। उन दिनों भी लोग अंदाज लगा रहे थे कि राजीव गांधी मंत्रिमंडल में वित्त और रक्षा मंत्री रह चुके वीपी सिंह की बगावत टांय टांय फिस्स हो जायेगी और वीपी सिंह का भी वही अंजाम होगा जो उनके  पहले बगावत करने वाले प्रणव मुखर्जी आदि का हुआ था यानी हाथ-पांव जोडक़र फिर पार्टी में वापस आना पड़ेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ और तख्त बदल गया। इसलिए दिल्ली, जयपुर और लन्दन में खेला जा रहा राजनीतिक ड्रामा कभी शेक्सपियर के नाटकों  की तरह चल रहा है। कथानक में कभी ट्रेजडी भारी पड़ रही है तो कभी सारा मंच कामेडी के राग में डूब उतरा रहा है।
ऐसी हालात में भाजपा अजीब राजनीतिक दुविधा में है। चुनाव के पहले भ्रष्टाचारमुक्त और पारदर्शी प्रशासन देने का वादा करके सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने जब अपनी सरकार का एक साल पूरा होने पर पर गर्व के साथ दावा किया था कि पिछले एक साल में कोई घोटाला या भ्रष्टाचार का कारनामा नहीं हुआ, तो उनके कार्यकर्ता पूरे देश में खुशी में झूम उठे थे। अन्य मोर्चों पर सरकार की सफलता का भी दावा हर मंच से किया गया था। लेकिन अब प्रधानमंत्री के उस दावे में वह ताकत नहीं रही जो उनके 26 मई के भाषणों में हुआ करती थी। भाजपा के दो बड़े नेता ललित मोदी के पक्ष में ऐसे काम करने के आरोप के लपेटे में आ गए हैं जो अगर सच है तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार की श्रेणी में गिना जाएगा। केंद्रीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ललित मोदी के साथ अच्छे पारिवारिक सम्बन्ध हैं और दोनों के ऊपर आरोप है कि उन्होंने ललित मोदी की मदद कानून के दायरे के बाहर जाकर की। पूर्व गृह सचिव और भाजपा के सांसद आरके सिंह ने साफ कहा है कि ललित मोदी एक भगोड़ा है और उसकी मदद करना कानून की नजर में गलत है लेकिन उनकी पार्टी के बड़े नेता, पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की राय उनसे बिलकुल अलग है। उन्होंने जयपुर में वसुंधरा राजे से मुलाकात की और कहा कि भाजपा और केंद्र सरकार मजबूती से उनके साथ खड़ी है क्योंकि उनके खिलाफ आरोपों में कोई तथ्य नहीं है। गडकरी ने जोर दिया कि राजे ने कुछ भी गलत नहीं किया है और ऐसे मुद्दों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। ‘वसुंधरा राजे के खिलाफ आरोप आधारहीन है। वसुंधराजी कानूनी, तार्किक और नैतिक रूप से पूरी तरह से सही हैं। उनकी ओर से कहीं कोई गलती नहीं हुई है।
 नितिन गडकरी का यह बयान और क्लीन चिट वसुंधरा राजे के लिए बहुत बड़ी राहत थी लेकिन यह राहत बहुत देर तक नहीं रही क्योंकि जिस मंत्रालय के विभागों में वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह और ललित मोदी के भ्रष्टाचार की जांच हो रही है, वे सभी विभाग वित्त मंत्रालय के  मातहत विभाग हैं। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इस क्लीन चिट को बेबुनियाद साबित कर दिया था लेकिन अब वे भी वसुंधरा राजे के बारे में गडकरी लाइन ले चुके हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र और झालावाड़ से सांसद दुष्यंत सिंह के मामले में अरुण जेटली के पहले के बयान में कहा गया था कि मामले से जुड़ी जांच एजेंसियां अपना काम करेंगी। सांसद दुष्यंत सिंह पर यह आरोप लगे थे कि आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने दुष्यंत की कंपनी को 11.63 करोड़ रुपए दिए थे।
वसुंधरा राजे के ऊपर लगे आरोपों के बारे में तो बाद में पता चला। मूल आरोप सुषमा स्वराज  की तरफ से ललित मोदी को मदद करने की चर्चा से शुरु हुआ था। जो कागजात सामने आये थे उससे  पता चलता है कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने ललित मोदी को ब्रिटेन में बने रहने के लिए जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवाने में मदद की थी। हुआ यह था कि जब आईपीएल का विवाद शुरु हुआ तो ललित मोदी पर बहुत सारे आरोप लगे थे जिसमें आर्थिक भ्रष्टाचार के बहुत सारे मामले थे। कालाधन, इन्कम टैक्स आदि के कई केस चलाये गए थे। विवाद शुरु होने के बाद ललित मोदी ने लन्दन में ठिकाना बना लिया और जांच एजेंसियों को उनको बुलाकर पूछताछ करने का मौका नहीं मिला। ललित मोदी का आरोप है कि जांच एजेंसियां उनको गिरफ्तार करना चाहती थीं जिसका कोई औचित्य नहीं है। इधर जांच एजेंसियों को अपना काम पूरा करने में भारी असुविधा हो  रही थी। लेकिन उनको उम्मीद थी कि जब ललित मोदी का ब्रिटेन में रहने का वीजा खत्म हो जाएगा तो उनको मजबूरन भारत आना पड़ेगा। क्योंकि ब्रिटेन में यह नियम है कि किसी भी व्यक्ति को लम्बे समय का वीकाा तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक उसके पासपोर्ट को जारी करने वाली सरकार की सहमति न मिल जाए। विदेश मंत्रालय में ललित  मोदी ने दरखास्त दिया था लेकिन विदेश मंत्रालय ने साफ-साफ लिख कर दे दिया था कि ललित मोदी को कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए भारत में रहना जरूरी है इसलिए उनको ब्रिटेन में रहने के लिए भारत सरकार की सहमति नहीं दी जा सकती। सरकार के इस पत्र के लिखे जाने के कुछ दिन बाद ही  सुषमा स्वराज विदेशमंत्री बन गयीं। उन्होंने एक पत्र लिख दिया कि ललित मोदी को ब्रिटेन में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए क्योंकि वहीं रहकर वे अपनी पत्नी का पुर्तगाल में इलाज करवा पायेगें। यह सुषमा स्वराज का निजी पत्र था लेकिन ब्रिटेन के सांसद कीथ वाका ने इसको सरकार की सहमति बताकर पेश कर दिया और ललित मोदी को दो साल तक ब्रिटेन में रहने का वीजा मिल गया। कीथ वाका का आचरण भी इस मामले में संदेह के घेरे में है। सुषमा स्वराज पर आरोप यह है कि उन्होंने सरकार को भरोसे में लिए बिना एक भगोड़े की मदद की जिसको कई जांच एजेंसियां तलाश रही हैं। मामला प्रकाश में आ जाने के बाद सुषमा स्वराज ने ट्वीट करके कहा कि उन्होंने तो इसलिए मानवीय आधार पर मदद की थी कि ललित मोदी की पत्नी को कैंसर  था और उसके इलाज के लिए उनका वहां होना जरूरी था लेकिन  टेलिविजन चैनलों पर जिस तरह से तथ्य उजागर हो रहे थे उस से दुनिया को पता चल गया कि मामला उतना सीधा नहीं था। क्योंकि सुषमा स्वराज की बेटी इसी मामले में ललित मोदी की वकील थीं, उनके पति का भी ललित मोदी के साथ ऐसा सम्बन्ध था जिसमें आर्थिक लेने-देन की पुष्टि हो चुकी थी।
ललित मोदी के वकीलों ने सुषमा स्वराज को बचाने के उद्देश्य से मुंबई में एक प्रेसवार्ता का आयोजन किया और उसमें बहुत सारे दस्तावेज जारी किये गए। उसी में कहीं एक चि_ी ऐसी भी थी जिसको राजस्थान विधानसभा में विपक्ष की नेता के रूप में वसुंधरा राजे ने लिखा था। उस पत्र में साफ लिखा था कि ललित मोदी के इमिग्रेशन के सम्बन्ध भी जो भी प्रयास हैं उनका वह पूरी तरह से समर्थन करती हैं। उनके राज्य में चुनाव हो रहे हैं और वे अपनी पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व कर रही हैं इसलिए वे खुद लन्दन नहीं आ सकतीं। एक अन्य चि_ी में उन्होंने लिखा था कि ललित मोदी को वे जो भी मदद कर रही हैं उसके बारे में भारत सरकार को पता नहीं लगना चाहिए। जानकार इसको साजिश की श्रेणी में मान रहे हैं। पूर्व गृह सचिव आरके सिंह का कहना है कि किसी भगोड़े की मदद करना कानून की नजर में अपराध है। और अगर भगोड़े को मदद करने के बदले में पैसों के लेन-देन हो तो और भी आपराधिक मामले बन जाते हैं। वसुंधरा राजे के केस में उनके बेटे दुष्यंत की आर्थिक गतिविधियां ललित मोदी प्रकरण में पैसे के लेन-देन की बात को चर्चा के घेरे में ला देती है। ललित मोदी केस में वसुंधरा का मामला सामने आ जाने पर बात अलग दिशा में चल पड़ी है और लगता है कि वसुंधरा राजे का बचाव सरकार और भाजपा के लिए भारी पड़ रहा है। लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार चुकी कांग्रेस को भी विरोध करने का जबरदस्त मुद्दा हाथ लग गया है।
इसके अलावा महाराष्ट्र का मंत्री पंकजा मुंडे का कथित आर्थिक भ्रष्टाचार और केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी का डिग्री विवाद भी प्रधानमंत्री की राजनीतिक शुचिता वाली राजनीति से मेल नहीं खा रहे हैं। दोनों ही मंत्री अपने आप नहीं हट रही हैं। अगर उनको हटाया गया तो  निश्चित रूप से विवाद होगा और अगर न हटाया गया तो शुचिता की राजनीति की कुर्बानी हो जायेगी। वर्तमान शासक दल को केंद्र की सत्ता में आये एक साल से अधिक समय हो गया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो सरकार पूरी तरह से एकजुट थी उसमें पहली बार बड़े पैमाने पर विरोधाभास साफ नकार आ रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी अपने वर्तमान विरोधाभासों का प्रबंधन कैसे करती है।

Thursday, May 28, 2015

जवाहरलाल नेहरू की कश्मीर नीति ही खरी साबित हो रही है



शेष नारायण सिंह


देश में नेताओं और बुद्दिजीवियों का एक वर्ग जवाहरलाल नेहरू को बिलकुल गैर ज़िम्मेदार राजनेता मानता रहा है . मौजूदा सरकार में इस तरह के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है .  नेहरु की नीतियों की हर स्तर पर निंदा की जा रही है . जवाहरलाल ने तय कर रखा था कि कश्मीर को भारत से अलग कभी नहीं होने देगें लेकिन अदूरदर्शी नेताओं को नेहरू अच्छे नहीं लगते थे . जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार में भी ऐसे लोग हैं जो हालांकि भारत के संविधान की बात करते हैं लेकिन भारत की एकता और अखण्डता के नेहरूवादी ढांचे को नामंजूर कर देते  हैं .जम्मू-कश्मीर की मौजूदा सरकार में कुछ ऐसे लोग हैं जो पाकिस्तान परस्त अलगाव वादियों से दोस्ती के रिश्ते रखते हैं और कुछ ऐसे लोग है जो १९४६-४७ में कश्मीर के राजा हरि सिंह के समर्थकों के राजनीतिक  वारिस हैं . यह लोग हर क़दम पर गलतियाँ कर रहे हैं और जब भी गड़बड़ होती है ,केंद्र सरकार से फ़रियाद करते हैं कि  मामलों में दख़ल दो. केंद्रीय हस्तक्षेप के कारण ही कश्मीर की यह दुर्दशा हुयी है . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी है . यह जब भी विपक्ष में रही है , कश्मीर में संविधान के आर्टिकिल ३७० क विरोध करती रही है लेकिन जब भी सत्ता में आती है  उससे अपने को अलग कर लेती है और नेहरू की लाइन को मानने लगती  है .सरकार के साल पूरा होने की प्रेस वार्ता में भी बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने कश्मीर में  ३७० वाली बात में बीजेपी की पुरानी वाली बात को स्थगित कर दिया है .लेकिन जम्मू-कश्मीर की आधी सरकार हर मामले में केंद्र की तरफ ही देखती नज़र आ रही है .

 हमने देखा है जब भी जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय हस्तक्षेप हुआ है , नतीजे भयानक हुए हैं . शेख अब्दुल्ला की १९५३ की सरकार हो या फारूक अब्दुल्ला को हटाकर गुल शाह को मुख्यमंत्री बनाने की बेवकूफीकेंद्र की गैर ज़रूरी दखलंदाजी के बाद कश्मीर में हालात खराब होते हैं . कश्मीर में केन्द्रीय दखल के नतीजों के इतिहास पर नज़र डालने से तस्वीर और साफ़ हो जायेगी. सच्ची बात यह है कि जम्मू-कश्मीर की जनता हमेशा से ही बाहरी दखल को अपनी आज़ादी में गैरज़रूरी मानती रही है . इसी रोशनी में यह भी समझने की कोशिश की जायेगी कि जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया थाऔर भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ क्यों है. कश्मीर में पिछले २५ साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओंमहात्मा गाँधी जवाहर लाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण को अपना रहनुमा माना था. पिछले ७०  साल के इतिहास पर एक नज़र डाल लेने से तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जायेगी.
देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडेपेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.




राजा के गलतियों के कारण ही कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने में बहुत सारे कारण हैं.बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयीऔर शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता थाने हालात को बहुत बिगाड़ा . अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया जिसे लिखा कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने था . शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था . वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे.. नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा.. शेख गए . और २७ मई १९६४ के ,दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थेजवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. नेहरू के मरने के बाद तो हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .


कश्मीर की समस्या में इंदिरा गाँधी ने एक बार फिर हस्तक्षेप किया शेख साहेब को रिहा किया और उन्हें सत्ता दी. . उसके बाद जब १९७७ का चुनाव हुआ तो शेख अब्दुला फिर मुख्य मंत्री बने . उनकी मौत के बाद उनके बेटे फारूक अब्दुल्ला को मुख्य मंत्री बनाया गया. लेकिन अब तक इंदिरा गाँधी बहुत कमज़ोर हो गयी थीं एक बेटा खो चुकी थीं और उनके फैसलों को प्रभावित किया जा सकता था . अपने परिवार के करीबी अरुण नेहरू पर वे बहुत भरोसा करने लगी थीं, . अरुण नेहरू ने जितना नुकसान कश्मीरी मसले का किया शायद ही किसी ने नहीं किया हो . उन्होंने डॉ फारूक अब्दुल्ला से निजी खुन्नस में उनकी सरकार गिराकर उनके बहनोई गुल शाह को मुख्यमंत्री बनवा दिया . यह कश्मीर में केंद्रीय दखल का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है . हुआ यह था कि फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर में कांग्रेस के विरोधी नेताओं का एक सम्मलेन कर दिया .और अरुण नेहरू नाराज़ हो गए . अगर अरुण नेहरू को मामले की मामूली समझ भी होती तो वे खुश होते कि चलो कश्मीर में बाकी देश भी इन्वाल्व हो रहा है लेकिन उन्होंने पुलिस के थानेदार की तरह का आचरण किया और सब कुछ खराब कर दिया . इतना ही नहीं . कांग्रेस ने घोषित मुस्लिम दुश्मन जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया . उसके बाद तो हालात बिगड़ते ही गए. उधर पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक लगे हुए थे. उन्होंने बड़ी संख्या में आतंकवादी कश्मीर घाटी में भेज दिया . बची खुची बात उस वक़्त बिगड़ गयी . जब १९९० में तत्कालीन गृह मंत्रीमुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी का पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया यही दौर है जब . कश्मीर में खून बहना शुरू हुआ . और आज हालात जहां तक पंहुच गए हैं किसी के समझ में नहीं आ रहा है कि वहां से वापसी कब होगी.

इस तरह से हम देखते हैं कि कश्मीर के मामले में पिछले ७० वर्षों में बार बार केंद्रीय हस्तक्षेप हुआ है लेकिन सच्चाई यही है कि कश्मीर के बारे में नेहरू की सोच ही सही साबित होती रही है.