Monday, March 15, 2021

बहुत अरसा बाद लखनऊ की माल एस्टेट गया ,मन खुश हो गया .


शेष नारायण सिंह

कई दशक बाद माल गया. माल के राजा कुंवर भूपेन्द्र सिंह की शादी की 51 वीं सालगिरह थी . उनकी पौत्री ( नवनिधि और माधवेंद्र की बेटी ) का अन्नप्राशन भी था बाकायदा जश्न मनाया गया . उनके प्रिय जल्लाबाद फार्म पर मुख्य कार्यक्रम था . उनके बच्चों ने आयोजन किया था . उनके उन सारे दोस्तों को आमंत्रित किया गया था जो उनको पाचास साल या उससे ज़्यादा वक़्त से जानते हैं . उन्होंने अपनी पढ़ाई काल्विन ताल्लुकेदार्स कालेज लखनऊ में थोड़े दिन की ,अमेरिका गए और लखनऊ यूनिवर्सिटी में पूरी की . उनको मैं सत्तर के दशक से जानता हूं. मैं उनको सम्मान से लल्लन दादा कहता हूं. शुरुआती परिचय के बाद उनसे मुलाकातें तो बहुत रेगुलर नहीं थीं लेकिन लखनऊ के उनके 60 पुराना क़िला आवास पर कभी कभार आना जाना होता था . बाद में मैं दिल्ली आ गया और वे लखनऊ में आम के पल्प की यूनिट लगाने में व्यस्त हो गए . फिर इमरजेंसी लग गयी और ज्यादातर पढ़े लिखे लोग थोड़े संकोच में रहने लगे . पता नहीं कब कौन और कहाँ नाराज़ हो जाए और फिर सत्ता का क्रोध किस रूप में आ जाये . अमेठी के कोहरा में उनकी चाची का मायका है . उनके मामा स्व रवीन्द्र प्रताप सिंह सुल्तानपुर जिले के जनसंघ के जिलास्तर के नेता थे. 1967 में गौरीगंज से एम एल ए रह चुके थे. 1977 में जब संजय गांधी के सामने विपक्ष को कोई ताकतवर उम्मीदवार नहीं सूझ रहा था तो नानाजी देशमुख ने अमेठी से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में रवीन्द्र प्रताप सिंह के नाम की घोषणा कर दी . वे चुनाव में उस वक़्त की सत्ता के युवराज के खिलाफ मैदान में आये और उन्होंने संजय गांधी को बहुत बुरी तरह हराया . उन दिनों मैं रोज़गार की तलाश में दिल्ली में रहता था . उनके ही आवास पर लल्लन दादा से दोबारा मुलाक़ात हुई . लल्लन दादा mango belt में बहुत सम्मान की शख्सियत हैं . मलीहाबाद के आसपास जहां लखनऊ के आम की राजधानी है , उसी के पास उनका एस्टेट है . जल्लाबाद का बाग़ भी उसी इलाके में है और अब वहां उनके बेटे कुंवर माधवेंद्र सिंह ने एक आधुनिक और वैज्ञानिक ,माधव उद्यान विकसित कर दिया है . उसी माधव उद्यान में १३ मार्च का जश्न आयोजित था . उस कार्यक्रम का आयोजन उनकी बेटियों और बेटों ने किया था . उनके भाई कुंवर देवेन्द्र सिंह हामेशा की तरह साथ साथ मौजूद थे जैसे राम के साथ लक्ष्मण. भाभी साहिबा, कुंवरानी गायत्री सिंह के इर्द गिर्द ही सारा कार्यक्रम केंदित था. हो भी क्यों न ? अपनी बेटियों को जिस तरह से भाभी ने शिक्षा दिलवाई है , जिस तरह से उनका लालन पालन किया है सभी ख़ुदमुख़्तार हैं . आम तौर पर राजाओं की बेटियाँ इतनी आत्मनिर्भर नहीं होतीं, लेकिन मनीषा ,मेघना, मोहिता, मौसमी सब जहां भी जाती हैं रोशनी बिखेर देती हैं . दादा की बहनों, भाइयों की औलादें अपने जीवनसाथियों के साथ जश्न में शामिल थीं. कटक से आयी भांजी ने जिस तरह से फिल्म का गाना render किया वह बेहतरीन था . उनके बेटे माधवेंद्र की जो बहू आई है वह एक सकारात्मक ऊर्जा का पुंज है . नवनिधि सिंह , माल की बहू है लेकिन भाभी साहिबा उसको वही सम्मान देती हैं जो बेटियों को या शायद उससे भी ज्यादा . मुझे खुशी है कि मैं इस बार माल के किसी आयोजन में शामिल हो सका. मैं ही नहीं ,अवध के ताल्लुकेदारों के ज्यादातर परिवार जश्न में शामिल हुए .उनमें बहुत से लल्लन दादा के साथ यूनिवर्सिटी के छात्र भी रह चुके हैं. सबकी अपनी मीठी मीठी यादें हैं .
मैं बजात खुद राजा या ताल्लुकदार परिवार से नहीं हूँ. commoner हूं . उनसे सात साल छोटा हूँ तो साथ पढने लिखने का भी कोई मतलब नहीं . दर असल मेरा बेहतरीन समय उनके साथ दिल्ली में ही बीता है . लल्लन दादा ने लोगों से मुझे अपना भाई कहकर परिचित कराया . उनके बालसखा अनिल चंद्रा दिल्ली में गारमेंट की दुनिया के बहुत ही आदरणीय नाम हुआ करते थे. अब तो बुज़ुर्ग हो गए . दोनों साथ साथ लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ते थे. अनिल दादा के पिताजी स्व डॉ सुशील चंद्रा ,लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके थे , जेके इंस्टीट्यूट के डाइरेक्टर रह चुके, रिटायर होने के बाद दिल्ली में ही रहते थे. बहुत बड़ा नाम था उनका. वे सभ्यता की प्रतिमूर्ति थे . अनिल चंद्रा के डैडी थे तो लल्लन दादा समेत ज्यादातर दोस्त उनको डैडी ही कहते थे . वे हमारे डैडी चंद्रा हो गए . एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि तुम ठाकुर हो सुल्तानपुर के और अवध की असली नफासत और ठसक तुम्हारी पर्सनालिटी में नहीं है . तुमको चाहिए कि लल्लन को गुरू मानकर चलो तो तुमको सभ्य समाज में उठने बैठने की तमीज आ जायेगी . तो जनाब हमने डैडी चंद्रा की सलाह मानी और तमीज के मामले में हम लल्लन दादा के शिष्य हो गए. अपने गुरू के पद को उन्होंने बहुत ही गंभीरता से लिया और मुझे 1978 में तमीज सिखाने के प्रोजेक्ट में लग गए . यह अलग बात है कि आज 43 साल बाद भी मैं कुछ खास तमीज नहीं सीख पाया . लल्लन दादा और अनिल दादा जब कभी बात करने लगते थे तो घंटों बतियाते रहते थे. दोनों ही मित्र , भाई ज़्यादा लगते थे . एक बार अनिल चंद्रा के मालचा मार्ग दिल्ली स्थित घर पर एलान किया गया कि लल्लन दादा और अनिल दादा कुछ ख़ास किस्म का लखनवी भोजन आमंत्रित लोगों को खिलाएंगे. दोनों ही मित्रों ने खुद ही बावर्चीखाने का ज़िम्मा संभाला . हम लोग लंच पर आमंत्रित थे . सारे नौकर चाकर भी साथ लगे थे . हम भी सहायक की भूमिका में थे. एक बजे के बाद से भूख के मारे बुरा हाल था लेकिन चूंकि तमीज के विद्यार्थी थे तो भूख ज़ाहिर करने का तो सवाल ही नहीं उठता था. चार बजे लंच सर्व हुआ तब तक हमारे पेट में चूहे कूद रहे थे. बहरहाल खाना लाजवाब था. 13 मार्च के जश्न में अनिल दादा शामिल नहीं हो सके लेकिन मैं उनकी भी नुमाइंदगी कर रहा था .
दिल्ली में जे एन यू के छात्रावास का खाना ही हम खाते थे लेकिन जब लल्लन दादा दिल्ली आते थे तो हम पांच सितारा होटलों में खाने जाया करते थे . हमने अमरीका और ब्रिटेन की बेहतरीन फ़िल्में उनके साथ ही देखी हैं . उनको अच्छे कपडे पहनने का बहुत ही शौक़ है . उस दौर के मेरे भी सभी अच्छे कमीजें और पतलून उनके साथ ही जाकर खरीदे गए हैं.
लल्लन दादा यानी कुंवर भूपेन्द्र सिंह का एक कौल है कि उनके आम दुनिया में सबसे बेहतरीन आम होते हैं . मैं इस बात की तस्दीक करता हूँ. हर साल आम के मौसम में मेरे लिए जल्लाबाद फ़ार्म के आम ज़रूर आते थे और दिल्ली में अपने ख़ास मित्रों और शुभचिंतकों को मैं आम खिलाया करता था. उन दिनों मैं बेरोजगार था लेकिन उन्होंने जब भी मुझे किसी से मिलाया तो या तो अपना भाई या colleague कहकर ही मिलाया . दुनिया भर विख्यात food technologist डॉ आनन्द कुराडे को कुंवर भपेन्द्र सिंह ने अपनी कम्पनी में काम दिया था . माल की कैनर्स इंडिया लिमिटेड उनका पहला कंसल्टेंसी का काम था. . जब लल्लन दादा को मैंने बताया कि बीबीसी रेडियो में भी मुझे कुछ काम मिलता रहता है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था. आज के करीब 24 साल पहले जब मैंने एन डी टी वी ज्वाइन किया तो उन्होंने मुझे और मेरे दोस्तों को मिठाई खिलाई थी. मेरे तीनों बच्चे उनको बहुत ही सम्मान की नज़र से देखते हैं. 1988 में मेरे ग्रीन पार्क के घर में जब भी वे पधारे सब के लिए कोई न कोई गिफ्ट लेकर आये .
एक बार उन्होंने कहा कि पीटर सेलर्स की कोई फिल्म चाणक्य सिनेमा में लगी हुयी है , उसको देखना है . उस सिनेमा हाल की महंगी टिकटें सबसे पहले बिक जाती थीं. जब हम पंहुचे तो थोड़ी देर हो गयी थी और 65 पैसे वाली टिकटें ही बची थी, उन्होंने कहा वही खरीद लो क्योंकि उनको अगले दिन सुबह की फ्लाइट से लखनऊ जाना था. एक रूपये तीस पैसे की टिकट खरीदी गयी . गौर करने की बात यह है कि हम अशोक होटल में खाना खाकर गए थे जिसका बिल आज के चालीस साल पहले हज़ार रूपये तो रहा ही होगा और जिस टैक्सी में हम आये उस्सको भी उन दिनों डेढ़ सौ रूपये दिए गए. भाभी साहिबा के साथ एक बार वे वैष्णों देवी गए . जब लौटे तो मेरे बच्चों को ख़ास तौर से बुलाकर प्रसाद दिया .
ऐसी उनके बारे में बहुत सारी यादें हैं . कभी लिखूँगा . अब वे पूरी तरह रिटायर हैं , माधवेंद्र ने काम बहुत अच्छी तरह संभाल लिया है . अब माल या जल्लाबाद जाना बहुत आसान है . पहली बार जब गया था तो मलीहाबाद होकर गया था , गंगा नाम का उनका सहायक मेरी सेवा में रहता था . उन दिनों लगता लगता था कि माल बहुत दूर है . लेकिन इस बार हज़रतगंज से चलने के एक घंटे के बाद मैं जल्लाबाद पंहुच गया था , क्योंकि दुबग्गा से माल के लिए एक सड़क बन गयी है जिसपर कोई ख़ास ट्रैफिक नहीं रहता . कुल मिलाकर ‘ मालगाँव ‘ भी तरक्की कर रहा है .माल में तो कोठी है ही जल्लाबाद में भी एक बेहतरीन कॉटेज है. सोचता हूं कि अब जब भी लखनऊ जाऊं तो एक बार उस संत , राजा भूपेन्द्र सिंह के ठिकाने पर ज़रूर जिसने पता नहीं कितने लोगों का उपकार किया है लेकिन कभी किसी से उस मदद पाने वाले की मजबूरी या गरीबी का उल्लेख नहीं किया . उनके बारे में मुबारक सिद्दीकी का यह शे’र कितना मौजूं है .
किसी की रह से , ख़ुदा की ख़ातिर , उठा के काँटे हटा के पत्थर
फिर उस के आगे , निगाह अपनी झुका के रखना . कमाल ये है
बहुत बहुत मुबारक भाभी जी और लल्लन दादा . बहुत बहुत बधाई मेरे बच्चो .

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