Thursday, April 11, 2019

क्या वैकल्पिक मीडिया के कारण २०१९ का चुनाव असली मुद्दों पर हो पायेगा ?



शेष नारायण सिंह

लोकसभा २०१९ का चुनाव आभियान शुरू हो गया है . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब बाकायदा प्रचार में शामिल हो गए हैं . पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पहले दौर के मतदान वाले क्षेत्रों में वे सघन प्रचार कर रहे हैं . पश्चिमी उत्तर प्रदेश में २०१४ के चुनाव में नरेंद्र मोदी को जो ज़बरदस्त बढ़त मिली थी ,वह आगे के हर दौर में और घनीभूत होती  गयी थी . २०१४ का चुनाव मुज़फ्फरनगर के २०१३ के दंगों के तुरंत बाद हो रहा  था. इलाके के असामाजिक तत्वों   ने तरह तरह के वीडियो आदि जारी करके माहौल  बहुत ही ज़हरीला बना दिया था . चुनाव में मुसलमानों के खिलाफ इलाके के  हिन्दुओं को एकजुट कर दिया गया था . नतीजा दुनिया के सामने  है . मुज़फ्फर नगर के दंगों में मुसलमान गुंडे और हिन्दू गुंडे एक दूसरे से  लड़ रहे थे .  राजनीतिक नेताओं ने माहौल को बहुत ही गरम कर दिया था . मुसलमान  भी हर घटना पर  प्रतिक्रिया दे रहे थे . जिसको मीडिया अपने मसाले के साथ पेश कर रहा था .नतीजा यह हुआ कि चुनाव के समय किसी को कुछ करना ही नहीं पड़ा . बहुसंख्यक लोग हिन्दू पार्टी को जिताने के लिए तैयार थे  . बीजेपी की पहचान पिछले  तीस   साल में एक हिन्दू पार्टी की हो चुकी है लिहाज़ा जब चुनाव आया तो जनता ने अपना फैसला दे दिया .उम्मीदवार कोई  हो हिन्दू जनता का वोट कमल पर लगा गया . उस वक़्त की सरकार की नाकामियों को  बीजेपी के नेता और   प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार , नरेंद्र मोदी  ने बहुत ही करीने से हाईलाईट किया . उन्होंने गुजरात माडल के विकास और दो करोड़ नौकरियाँ प्रति वर्ष देने का वायदा करके चुनाव को बहुत ही ऊंची पिच पर ले जाकर खड़ा कर दिया .डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के भ्रष्टाचार को, उनके ऊपर रिमोट कंट्रोल की मौजूदगी और बेरोजगारी को मुद्दा  बनाया और वायदा किया कि बेरोजगारी  भी खतम कर देंगे, भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूद कर देंगें और देश की आर्थिक प्रगति को ज़रूरी रफ़्तार देंगे. जनता ने विश्वास किया और बम्पर  बहुमत नरेंद्र मोदी को थमा दिया . लेकिन इस बार बात अलग  है . नरेंद्र मोदी को वायदा नहीं करना है . वह काम तो वे पांच साल पहले कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि पांच साल बाद जब दोबारा जनादेश लेने आऊंगा तो अपने काम का हिसाब दूंगा .इस  हिसाब से अब लेखाजोखा देने का समय आया है लेकिन अब हालात बदल गए हैं . जनता सवाल तो पूछ रही है लेकिन मीडिया में उनपर चर्चा नहीं हो रही है.

पांच साल पहले  किये गए वायदों पर तो अब कोई बात ही नहीं हो रही है . नए मुद्दे बनाने की कोशिश  सत्ताधारी पार्टी बड़े पैमाने पर कर रही है . पाकिस्तान को दुश्मन नंबर एक बनाकर चुनावी बिसात बिछाई जा रही है . इस्लाम और पाकिस्तान को केंद्र में रखकर चुनाव  संचालित करने की कोशिश चल रही है . पुलवामा में सी आर पी एफ के सैनिको पर आतंकवादी हमला और बालाकोट   में  भारतीय वायुसेना की बमबारी ने देश में पाकिस्तान विरोध के नाम पर बीजेपी के पक्ष में ज़बरदस्त माहौल बनाया  था लेकिन विपक्ष ने उस पर भी शंका के बादल घेर दिया  . नतीजा यह हुआ कि मार्च के पहले हफ्ते में जो माहौल बना था अब वह   नहीं है .  जहां तक पांच साल में किए गए काम की बात है , उसमें मौजूदा सरकार के बहुत ही बड़े कामों में नोटबंदी और जी एस टी हैं लेकिन बीजेपी के नेता उसका ज़िक्र ही  नहीं कर रहे हैं . ज़ाहिर है यह मुद्दे बीजेपी को नुक्सान पंहुचाने की ताक़त रखते हैं. दो करोड़ नौकरियाँ और किसानों की आमदनी दुगुनी  करने वाले वायदों को  भी भुलाने की कोशिश की जा रही है  . अंतरिक्ष में मिसाइल दागे जाने को भी राष्ट्रप्रेम से जोड़ने की कोशिश चल रही है . अगले दो चार दिन में इसका भी असर स्पष्ट होने लगेगा . सौ बात की एक बात यह कि बीजेपी के पास २०१४ जैसे ज़बरदस्त असर वाले मुद्दे नहीं हैं . सरकार में होने की वजह से हमला करने का विकल्प भी  जा चुका  है . अब तो अपने काम का हिसाब देना है .  बीजेपी के नेता गिनाते तो बहुत सारे काम हैं लेकिन मीडिया के साथ साथ उनकी विश्वसनीयता पर भी  संकट है .
मुद्दों की कमी के संकट के वक़्त बीजेपी की चुनावी मशीनरी १९८९ से ही हिन्दू मुस्लिम झगड़ों को इस्तेमाल करती रही है लेकिन उसके लिए ज़रूरी है कि मुसलमानों के नेता भी बढ़ चढ़कर आक्रामक बयान दें .उन बयानों के जवाब में आक्रामक भाषा बहुत काम आती है .. लेकिन इस बार वैसा माहौल नहीं है. सबसे ताज़ा वाकये का ज़िक्र करके बात को समझा जा सकता है .दिल्ली के पास के हरियाणा के  गुडगाँव जिले के एक गाँव में कुछ गुंडों ने  एक मुस्लिम परिवार के घर में  घुसकर लाठी डंडों से परिवार के लोगों को बेरहमी से मारा और उनको घायल कर दिया . उनका घर लूटा बच्चों को मारा . इस गुंडागर्दी का शिकार एक चार साल का एक बच्चा भी हुआएक दुधमुंही बच्ची को भी उठाकर फेंक दिया गया .आस पड़ोस का कोई भी आदमी उनको बचाने नहीं आया . अभी तीस साल पहले तक अगर कहीं कोई गुंडा गाँव में किसी को मारता पीटता था तो  पूरा गाँव साथ खड़ा हो जाता था. जहां यह वारदात हुई है वहां बहुत सारी  कालोनियां  हैं जिनमें दिल्ली के लोग रहते हैं और बहुत सारे ऐसे लोग भी रहते हैं   जो रोज़ दिल्ली काम करने के लिए जाते हैं . जिस मुहम्मद साजिद को गुंडों ने मारा  पीटा वह  किसी गेटेड सोसाइटी में नहीं एक गाँव में रहता है . रोज़गार की तलाश में करीब पन्द्रह साल पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से वह यहाँ आया था . किसी मामूली विवाद पर पड़ोस के गाँव के दो लड़कों ने उनके भतीजे को झापड़ मार दिया और जब उसने विरोध किया तो दस मिनट बात कुछ गुंडे  हथियारों के साथ आये और घर में घुसकर साजिद को मारा पीटा बच्चों को मारा औरतों को मारा और घर में तोड़फोड़ किया . इस  सारे अपराध को करने के बाद वे लोग आराम से चले गए . घर के छत पर छुपे परिवार के लोगों ने अपने फोन के कैमरे से अपराध  का वीडियो बना लिया. वारदात के बाद कहीं कोई कार्रवाई नहीं की गयी पुलिस ने कोई  एक्शन नहीं लिया . लेकिन जब हिंसा का वह वीडियो वायरल हो गया पूरे देश में चर्चा शुरू हो गयी ,राहुल गांधीअखिलेश यादव आदि नेताओं ने तो इस  शर्मनाक घटना पर बयान दिया लेकिन किसी मुसलमान नेता ने कोई भी आक्रामक  बयान  नहीं दिया .नतीजा यह हुआ कि बात आगे नहीं बढ़ सकी .   इस वारदात के बाद कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ. राजनीति चमकाने के लिए दंगों का आविष्कार  तब शुरू हुआ जब १९२० के असहयोग आन्दोलन के दौरान महात्मा  गांधी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक हैं . अंग्रेजों के खिलाफ पूरा देश एकजुट खड़ा हो गया तब अँगरेज़ ने दंगों की योजना पर काम शुरू किया . उसके बाद से ही दंगे राजनीतिक ध्रुवीकरण के हथियार के रूप में इस्तेमाल होते रहे हैं .चुनावों में इनका इस्तेमाल भी कोई नया नहीं है . लेकिन इस बार लगता है कि मुसलमान नेताओं ने तय कर लिया है कि चाहे जितनी उत्तेजना फैलाई जाए लेकिन वे चुप रहेंगे . अगर साम्प्रदायिक तनाव न  फैला तो दंगे होना असंभव होगा .
ऐसी हालात में लगता है  कि लोकसभा चुनाव २०१९ असली मुद्दों पर ही लड़ा जाएगा . जनता की तरफ से भी सवाल पूछे जा रहे हैं . कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को महत्वपूर्ण राजनीतिक ज़िम्मेदारी दे दी है . प्रियंका गांधी को मीडिया भी कवर कर रहा है और वे असली सवालों को बार बार पूछ रही हैं.कांग्रेस के बडबोले प्रवक्ताओं और लुटियन की दिल्ली में  रहकर का पिछले तीस-चालीस साल से कांग्रेसी  राजनीति का मालपुआ  काट रहे नेताओं से बिलकुल अलग हटकर उन्होने दो करोड़ नौकरियों , किसानों की मुसीबतों , अर्थव्यवस्था की बदहाली को राजनीतिक विमर्श में  लाने में आंशिक ही सही ,सफलता पायी  है . विपक्ष के कुछ और नेताओं से बात करने से अनुमान लगना शुरू हो गया है कि वे अब बीजेपी और  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से तय किए गए एजेंडे पर बहस नहीं करेंगे. वे नरेंद्र मोदी से  उन्हीं मुद्दों को  फोकस में रहने के लिए कह रहे हैं जो २०१४ में बीजेपी के चुनाव अभियान के केंद्र में थे .अभी पिछले हफ्ते जिस तरह से पुलवामा और बालाकोट के मुद्दे को चुनावी बहस से बाहर लाने का काम राम गोपाल यादव, सैम पित्रोदा और ममता बनर्जी ने किया है,उससे जानकारों को यह उम्मीद हो गयी है कि देशहित के असली मुद्दों पर चुनाव फिर लौट सकता है .हालांकि बीजेपी के नेता तो यही कोशिश करते रहेंगे कि चुनाव , देशप्रेम , भारतमाता, पाकिस्तान और हिंदुत्व के इर्दगिर्द ही केन्द्रित रखा जाए लेकिन संचार क्रान्ति के कारण अब सूचना पर प्रीमियम नहीं है . वह  आसानी से आमजन के लिए भी उपलब्ध है .  एक बात और हुयी है . टेलिविज़न और अखबारों में  बहुत सारे ऐसे लोग काम करने आ गए हैं जिनकी प्रतिबद्धता किसी न किसी विचारधारा से रहती है. नतीजतन मीडिया की विश्वनीयता बहुत ही कम हो गयी है . टेलिविज़न और अखबार चलाने में बहुत ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत होती है जिसके चलते  खबरों के रुझान मालिकों के हित को ध्यान में रखकर किया जाता है .विश्वास के इस संकट के वक़्त  खबरों के लिए लोग सीधे इंटरनेट पर भरोसा कर रहे हैं . यह बात शहरी  इलाकों में तो है ही ,गाँवों में  भी इंटरनेट की सघनता है . नतीजा सामने है . सरकार और मीडिया घरानों की कोशिश के बावजूद भी सचाई आसानी से पब्लिक डोमेन में है. जिसके चलते लोकसभा २०१९ का चुनाव असली मुद्दों पर तय होने की सम्भावना बढ़ गयी है.

अगर अवाम की हिफाज़त नहीं कर सके तो हुकूमत करना मुश्किल हो जाएगा


शेष नारायण सिंह

गुडगाँव जिले के एक गाँव में कुछ गुंडों ने  एक मुस्लिम परिवार के घर में  घुसकर लाठी डंडों से परिवार के लोगों को बेरहमी से मारा और उनको घायल कर दिया . उनका घर लूटा , बच्चों को मारा . इस गुंडागर्दी का शिकार एक चार साल का एक बच्चा भी हुआ, एक दुधमुंही बच्ची को भी उठाकर फेंक दिया गया .आस पड़ोस का कोई भी आदमी उनको बचाने नहीं आया . अभी तीस साल पहले तक अगर कहीं कोई गुंडा गाँव में किसी को मारता पीटता था तो  पूरा गाँव साथ खड़ा हो जाता था.  शहरों में अलग बात थी . लेकिन गाँव में हिन्दू-मुसलमान के बीच आज जैसी नफरत नहीं थी.  बाबरी मस्जिद के खिलाफ अभियान चलाने वाली राजनीति ने हिन्दू और मुसलमान के बीच इतनी गहरी खाईं बना दी है कि अब कोई नहीं आता . हरियाणा का गुडगाँव जिला दिल्ली से सटा हुआ है . जहां यह वारदात हुई है वहां बहुत सारी  कालोनियां  हैं , जिनमें दिल्ली के लोग रहते हैं और बहुत सारे ऐसे लोग भी रहते हैं   जो रोज़ दिल्ली काम करने के लिए जाते हैं . जिस मुहम्मद साजिद को गुंडों ने मारा  पीटा वह  किसी गेटेड सोसाइटी में नहीं , एक गाँव में रहता है . रोज़गार की तलाश में करीब पन्द्रह साल पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से वह यहाँ आया था .पुराने फर्नीचर की मरम्मत और गैस के चूल्हों की मरम्मत का काम करता था. अभी तीन साल पहले उसने यहाँ अपना  घर बना लिया था. सारा परिवार मेहनत करता था और अपनी छत के नीचे गुज़र बसर करता था. किसी मामूली विवाद पर पड़ोस के गाँव के दो लड़कों ने उनके भतीजे को झापड़ मार दिया और जब उसने विरोध किया तो दस मिनट बात कुछ गुंडे  हथियारों के साथ आये और घर में घुसकर साजिद को मारा पीटा , बच्चों को मारा , औरतों को मारा और घर में तोड़फोड़ किया . इस  सारे अपराध को करने के बाद वे लोग आराम से चले गए . घर के छत पर छुपे परिवार के लोगों ने अपने फोन के कैमरे से   अपराध  का वीडियो बना लिया. वारदात के बाद कहीं कोई कार्रवाई नहीं की गयी , पुलिस ने कोई  एक्शन नहीं लिया . लेकिन जब हिंसा का वह वीडियो वायरल हो गया , पूरे देश में चर्चा शुरू हो गयी ,राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविन्द केजरीवाल के बयान आने लगे तो शायद हरियाणा सरकार को लगा  कि कुछ करना चाहिए . नतीजतन पुलिस ने  पड़ोस के गाँव के एक लड़के को पकड़ लिया और बयान दे दिया कि कार्रवाई हो रही है .  हरियाणा के एक बीजेपी प्रवक्ता का बयान आ  गया कि दो पक्षों की मारपीट को कम्युनल रंग दिया जा रहा है . उस प्रवक्ता महोदय को वीडियों में यह नहीं दिख रहा है कि छः सात गुंडे एक आदमी को बुरी तरह से लाठियों से पीट रहे हैं और उसके बचाव में उसके परिवार की जो एक महिला आयी है उसके साथ भी धक्कामुक्की हो रही है . बीजेपी के बड़े नेता जो आम तौर पर हर किसी घटना पर ट्वीट करते रहते हैं ,इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं . शायद ऐसा इसलिए हो कि चुनाव के मौसम में अपने हिन्दू कार्यकर्ताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते हों .
यह शर्मनाक है , यह हमारी आज़ादी के बुनियादी उसूलों पर हमला है और इसकी निंदा की जानी चाहिए . पुलिस को सरकार के सर्वोच्च स्तर से याद दिलाया जाना चाहिए कि  कानून व्यवस्था को लागू करना उनका प्राथमिक कर्तव्य है. उनको अपना काम करना चाहिए .लेकिन .आज हम देखते हैं कि दंगे भड़काने के लिए सत्ताधारी पार्टी के लोग तरह तरह की कोशिश करते पाये जा रहे  हैं . आम तौर पर माना जाता  है कि जब दंगे होते हैं तो सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण होता है और बीजेपी को चुनाव में लाभ होता है . यह ट्रेंड १९८९ के आम चुनाव के बाद से देखा जा रहा है . इस बात में दो राय नहीं है कि साम्प्रदायिक हिंसा का उद्देश्य चुनाव में लाभ लेना होता है .  राजनीति चमकाने के लिए दंगों का आविष्कार  तब शुरू हुआ जब १९२० के असहयोग आन्दोलन के दौरान महात्मा  गांधी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत में हिन्दू और मुसलमान एक हैं . अंग्रेजों के खिलाफ पूरा देश एकजुट खड़ा हो गया तब अँगरेज़ ने दंगों की योजना पर काम शुरू किया . उसके बाद से ही अंग्रेजों ने दंगों के बारे में एक विस्तृत रणनीति बनाई और संगठित तरीके से देश में दंगों का आयोजन होने लगा .प्रायोजित साम्प्रदायिक हिंसा तो १९२७ में शुरू हो गयी थी लेकिन स्वार्थी राजनेताओं ने 1940 के दशक में धर्म आधारित खूनी संघर्ष की बुनियाद रख दी । जब अंग्रेजों की समझ में आ गया कि अब इस देश में उनकी हुकूमत के अंतिम दिन आ गए हैं तो उन्होंने मुल्क को तोड़ देने की अपनी प्लान बी पर काम शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अगस्त 1947 में जब आजादी मिली तो एक नहीं दो आजादियां मिलींभारत के दो टुकड़े हो चुके थेसाम्राज्यवादी ताकतों के मंसूबे पूरे हो चुके थे लेकिन सीमा के दोनों तरफ ऐसे लाखों परिवार थे जिनका सब कुछ लुट चुका था.  जो हिंसक अभियान शुरू हुआ उसको अब बाकायदा  संस्थागत रूप दिया  जा चुका है। भारत की आजादी के पहले हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसने हिन्दू और मुसलमान के बीच अविश्वास का ऐसा बीज बो दिया था जो आज बड़ा पेड़ बन चुका है और अब उसके जहर से समाज के कई स्तरों पर नासूर विकसित हो रहा है। भारत की राजनीतिकसामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी में अब दंगे स्थायी भाव बन चुके हैं।
अब भारत में दंगे नहीं होते. पहले के समय में जब  केंद्र में सेकुलर पार्टी की सरकारें होती थीं तो मुसलमान भी मारपीट का जवाब मारपीट से देता था जिसके कारण दंगे होते थे . अब मुसलमान दहशत में है , चुप रहता  है . इसलिए अब राजनीतिक संरक्षण प्राप्त  गुंडे छिटपुट मुसलमानों को  उनके घर में घुसकर मारते हैं और घटना का वीडियो बनाकर पूरे देश में वायरल करते हैं . जिसके बाद मुसलमानों में दहशत फ़ैलाने में सफलता पाते हैं . जब दंगे होते थे तो अधिकतर दंगों के आयोजकों का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए सम्प्रदायों का ध्रुवीकरण होता था .  देखा यह गया है कि भारत में अधिकतर दंगे चुनावों के कुछ पहले सत्ता को ध्यान में रख कर करवाए जाते हैं। विख्यात भारतविद् प्रोफेसर पॉल ब्रास ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ''द प्रोडक्शन ऑफ हिन्दू-मुस्लिम वायलेंस इन कंटेम्परेरी इण्डिया" में दंगों का बहुत ही विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है। उन्होंने साफ कहा है कि हर दंगे में जो मुकामी नेता सक्रिय होता हैदोनों ही समुदायों में उसकी इच्छा राजनीतिक शक्ति हासिल करने की होती है लेकिन उसको जो ताकत मिलती है वह स्थानीय स्तर पर ही होती है।  उसके ऊपर भी राजनेता होते हैं जो साफ नज़र नहीं आते लेकिन वे बड़ा खेल कर रहे होते हैं। अपनी किताब में पॉल ब्रास ने यह बात बार-बार साबित करने की कोशिश की है कि भारत में दंगे राजनीतिक कारणों से होते हैंहालांकि उसका असर आर्थिक भी होता है लेकिन हर दंगे में मूलरूप से राजनेताओं का हाथ होता है।  अब दंगों की जगह मुसलमानों में दहशत फैलाकर राजनीतिक  मकसद हासिल किया जाता  है .इसकी शुरुआत दादरी में अखलाक के घर में गोश्त पकडकर की गयी थी . तब तक मुसलमानों को मुगालता था कि  हुकूमत उनकी मदद करेगी .इसलिए थोडा हल्ला गुल्ला भी हुआ था लेकिन उसके बाद से पहलू खान समेत ऐसे तमाम वारदात हुयी हैं जिसमें सरकारें अपराधियों के साथ ही देखी गयी हैं . गुडगाँव की घटना उसी सिलसिले की सबसे ताज़ा कड़ी है .  लेकिन सरकार को खबरदार रहना पडेगा क्योंकि अगर अवाम की  हिफाज़त की  गारंटी नहीं दे सके तो हुकूमत का अधिकार ही नहीं रहेगा .

Monday, March 18, 2019

एयर स्ट्राइक नहीं ,जातीय वफादारी बड़े पैमाने पर काम कर रही है .

शेष नारायण सिंह 

छुट्टा घूम रहे जानवरों से खेती को हुए नुक्सान पर एयरस्ट्राइक ने पर्दा डाल दिया है . जो लोग खेती के नुक्सान के कारण बीजेपी से नाराज़ थे ,वे अब प्रधानमंत्री के पुलवामा के जवाब से संतुष्ट हैं . इन लोगों ने २०१४ में भी मोदी लहर में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया था. कई बड़े किसान यह भी साबित करने की कोशिश करते हैं कि सांडों से खेती का कोई नुक्सान हुआ ही नहीं .लिहाज़ा यह वर्ग भी अब मजबूती से नरेंद्र मोदी के समर्थक खेमे में वापस पंहुच चुका है .मोदी के पक्ष में वे दो हज़ार रूपये भी काम कर रहे हैं जो किसानों के लिए दिए गए थे . शौचालय भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में हैं लेकिन शौचालय से दलितों में मोदी को लाभ नहीं हो रहा है . .कुछ लोग नरेंद्र मोदी के समर्थक में बहुत ही मुखर हैं . कुछ तो उन प्रवक्ताओं से भी ज़्यादा उत्साहित रहते हैं जिनका काम ही टीवी पर प्रधानमन्त्री की सकारात्मक छवि बनाना है . प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियों का मामला भी कहीं नहीं सुनाई पड़ रहा है . ऊपरी तौर पर साफ़ लग जाता है कि माहौल नरेंद्र मोदी के पक्ष में है. यह सारा माहौल ठाकुर, ब्राहमण . लाला, बनिया और कुर्मी बिरादरी के लोगों से बात करके समझ में आता है . इनकी राय बनाने में टीवी चैनलों और दैनिक जागरण अखबार का है बहुत ही अधिक है . यही लोग चौराहों पर भी देखे जाते हैं . ठाकुर ब्राहमणों के बेरोजगार लड़के चौराहों पर लगभग दिन भर जमे रहते हैं और नरेंद्र मोदी की तारीफ करते रहते हैं . इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि चुनाव मोदीमय हो गया है .नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोगों की संख्या वहां मिलती है जहाँ दलित जातियों के लोग रहते हैं . वहां मायावती-अखिलेश यादव के प्रति वफादारी दलितों के अलावा यादव और मल्लाह जातियों के लोगों में है . यह बड़ी संख्या वाली जातियां हैं . अन्य ओबीसी में गडरिया,कुम्हार, मौर्या,लोहार ,कहार आदि आते हैं . इनकी संख्या ज्यादा नहीं है . इनकी जातियों के घोषित नेता भी नहीं हैं . ऐसा लगता है कि इन जातियों के लोग किसी भी तरफ चले जायेंगें . प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर का उदाहरण दिया जाए तो इन दो जिलों में ठाकुर और ब्राह्मण बड़ी संख्या में हैं और अक्सर निर्णायक साबित होते हैं . लेकिन यादव और दलित एकता इनको बैलेंस कर देती है . बनिया और कायस्थ बड़ी संख्या में नहीं है लेकिन कुर्मी बड़ी संख्या में हैं और वे आम तौर पर बीजेपी के साथ हैं .
लुब्बो लुबाब यह है कि पुलवामा के बाद की एयर स्ट्राइक के बाद बीजेपी से नाराज़ हुए उनके समर्थक वापस उनकी शरण में जा चुके हैं लेकिन दलितों , यादवों , मल्लाहों और मुसलमानों की एकता भी अपना काम कर रही है . लहर कोई नहीं है ,खेल जातीय हिसाब किताब के आस पास ही मंडराता दिख रहा है .सुलतानपुर में तो बहुजन समाज पार्टी का ठाकुर प्रभारी दो दिन पहले ही घोषित हुआ है और ठाकुरों के लड़के उनकी तरफ मुड़ रहे हैं .एक यादव कर्मचारी की कुछ वर्ष पहले हत्या हो गयी थी . लोकसभा के वर्तमान बसपा उम्मीदवार के खिलाफ उन कर्मचारी की पत्नी अभियान चला रही हैं. बीजेपी के समर्थकों को उम्मीद है कि वे यादवों को बसपा-सपा के संयुक्त उम्मीदवार से अलग कर देंगीं लेकिन कई यादव नेताओं से बात के बाद पता चला कि ऐसी बात नहीं है.
फिर वही बात ठीक लगती है कि जातीय वफादारी बड़े पैमाने पर काम कर रही है .

Thursday, March 7, 2019

मारु जुझारु बजै बजना , केहु दूसर राग सुनावत नाहीं .


शेष नारायण सिंह
बालाकोट में हवाई हमला करके के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है . ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव २०१९ में महंगाई, बेरोज़गारी,किसानों की दुर्दशा , लुंजपुंज अर्थव्यवस्था ,राफेल का कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे बैकबर्नर पर चले गए हैं . देशप्रेम, राष्ट्रवाद , पाकिस्तान का विरोध और पाकिस्तान को औकात बता देने वाले मुद्दे ही चुनावी मौसम में हर तरफ सुने जायेंगें . असली युद्ध का ख़तरा तो नहीं है लेकिन युद्ध का राग हर राजनीतिक चर्चा में अब स्थाई भाव हो गया है .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक रणनीति के चलते युद्ध या युद्ध की आशंका अब राजनीतिक आकाश का स्थाई चरित्र बन गया है . इस सब के चलते लोकसभा चुनाव २०१९ बहुत ही दिलचस्प दौर में पंहुच गया है जिस चुनाव को पिछले पांच साल के काम काज पर लड़ा जाना था , वह एकाएक फिर भविष्य की योजनाओं के मुद्दे को केंद्र रख कर लड़ा जाने वाला है . प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को भरोसा दिला दिया है कि वे अब देश को आतंकवाद की राजनीति से मुक्ति दिला देंगें . उसके लिए उन्होंने राजनीति की पिच को बहुत ही ऊंचाई पर लाकर छोड़ दिया है और विपक्षी पार्टियां उनके भाषणों पर प्रतिक्रिया देने की ड्यूटी निभा रही हैं . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाली विपक्ष की पार्टियां उन मुद्दों को उठाना भूल गयी हैं जिनको केंद्र में रखकर विपक्ष ने सरकार और बीजेपी को घेरने का मंसूबा बनाया था. प्रधानमंत्री ने २०१४ के लोकसभा चुनाव के पहले जो वायदे किये थे उनका लेखा जोखा इस चुनाव की स्थाई धारा होनी चाहिए थी. प्रधानमंत्री ने पद संभालने के बाद कहा था कि उनको देश की जनता ने जो पांच साल दिए हैं , २०१९ के चुनाव के पहले उसका हिसाब देंगें . शुरू में तो मुख्य विपक्षी पार्टी की समझ में ही कुछ नहीं आ रहा था लेकिन करीब दो साल बाद सरकार की कमियों को रेखांकित करने का काम शुरू किया . राहुल गांधी ने विपक्ष का धर्म निभाया और तीन राज्यों से बीजेपी की सरकार को बेदखल करने में सफलता पाई . वे प्रधानमंत्री द्वारा २०१४ के चुनाव के पहले किये गए वायदों पर ख़ास ध्यान दे रहे थे. चुनाव के पहले प्रधानमंत्री ने प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियों का वायदा किया था, किसान की आमदनी दुगुनी करने और विदेशों से काला धन लाने का वायदा किया था .इसके अलावा और भी बहुत सारे संकल्प नरेंद्र मोदी ने किया था. कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने उन मुद्दों को उठाया और बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा कीं . जिस कांग्रेस से भारत को मुक्त करने की बाद नरेंद्र मोदी ने की थी उसी कांग्रेस ने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में सरकार बना कर साबित कर दिया था कि कांग्रेसमुक्त भारत एक असंभव संभावना है . २०१४ में नरेद्र मोदी की जीत और उनकी सरकार के बनने में यू पी ए के राज के भ्रष्टाचार का भारी योगदान था. संकल्प लिया गया था कि मोदी जी के राज में भ्रष्टाचार नहीं होगा . लेकिन लोकपाल की नियुक्ति न करके और राफेल सौदे में कुछ नियमों की अनदेखी करके बीजेपी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ऐसा अवसर दे दिया जिस के सहारे उन्होंने नरेंद्र मोदी की ईमानदारी वाली छवि पर हथौड़े मारने शुरू कर दिए . उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के बाद राज्य में जितने भी उपचुनाव हुए सब में बीजेपी के उम्मीदवार हार गए . दोनों पार्टियों ने लोकसभा के लिए भी चुनावी गठबंधन कर लिया . बीजेपी के आशीर्वाद से सपा अध्यक्ष के चाचा शिवपाल यादव ने नई पार्टी भी बना ली लेकिन उनका कोई ख़ास राजनीतिक असर नहीं दिख रहा था. सपा-बसपा गठबंधन के रूप में उत्तर प्रदेश में बीजेपी को ज़बरदस्त प्रतिद्वंदी मिल गया है. सपा-बसपा गठबंधन के बाद बीजेपी को अंदाजा लग गया था कि उत्तर प्रदेश की राह आसान नहीं हैं . कांग्रेस भी २०१४ की दुर्दशा से बाहर आ चुकी है . उसकी मध्यप्रदेश ,राजस्थान और छतीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हुई जीत के बाद बीजेपी की कमजोरी रेखांकित हो चुकी है . २०१४ में नरेंद्र मोदी सरकार की स्थापना में इन चार राज्यों में मिली बहुत बड़ी संख्या में सीटों का भारी योगदान था. इन राज्यों में कमज़ोर होने का मतलब यह था कि केंद्र में बीजेपी सरकार बनना नामुमकिन नहीं तो कठिन ज़रूर हो जाता . नरेंद्र मोदी के २०१४ के वायदे विपक्ष की पार्टियां सभी मोर्चों पर उठा रही थीं और सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल हो रहा था.
बीजेपी और केंद्र सरकार का सौभाग्य है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनको सही मानता है और उनकी तारीफ़ करता है . लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है जो कठिन सवालों को भी उठा रहा है . सोशल मीडिया में सरकार की नाकामियों को लिखने बोलने वाले भी बहुत बड़ी संख्या में हैं . जो हालत थे उसमें चुनाव जीतने के उपलब्ध तरीकों से चुनाव जीतना संभव नहीं था. कुछ नया करने की ज़रूरत थी . मौजूदा बीजेपी उसी तरह की स्थिति में पंहुच गयी थी जिसमें १९९० में मंडल कमीशन की सिफारिश लगने के बाद लाल कृष्ण आडवानी की बीजेपी फंस गई थी . १९८६ से बीजेपी के सभी नेता अयोध्या के रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के सहारे जनमानस में लोकप्रियता अर्जित कर रहे थे .कट्टर हिन्दुओं का एक वर्ग बीजेपी की तरफ आकर्षित भी हो रहा था. मुसलमानों के खिलाफ कुछ सुनने को उत्सुक हिन्दू समाज के लोग बीजेपी के साथ होने लगे थे लेकिन वक़्त तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दीं और देश की ५४ प्रतिशत आबादी को अपनी तरफ खींचने की रणनीति का दांव चल दिया . पिछड़ी जातियों के लोगों को सरकारी नौकरियों में २७ % आरक्षण दे दिया गया . बेरोजगारों के बहुत बड़ी आबादी वाले देश में यह बात ऐसी थी जिसके बाद एक अलग तरह की लामबंदी की शुरुआत हो गयी .लाल कृष्ण आडवानी और विश्व हिन्दू परिषद का सभी हिन्दुओं को साथ लेने का प्रोजेक्ट गड़बड़ा गया .पिछड़ी जातियों के लोगों की वफादारी अपनी जाति के लोगों को मिलने वाली नौकरियों की संभावना पर केन्द्रित हो गयी . लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार ,राम विलास पासवान नए नेता के रूप में तेज़ी से उभरने लगे . बीजेपी के नेता सकते में थे .सारे किये कराये पर पानी पड़ने वाला था. लेकिन लाल कृष्ण आडवानी की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा ने बीजेपी को एक मौक़ा दे दिया कि जाति और धर्म के ऊपर भगवान राम के मन्दिर की बात शुरू हो गयी .जहां जहां से रथयात्रा गुज़री , वहां बहुत बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हुआ और समाज फिलहाल हिन्दू बहुमत के साथ एकजुट हो गया . यह आडवानी की राजनीति का जलवा था कि उन्होंने चुनावी राजनीति के पैमाने बदल दिए और जब उनको लगा कि हिन्दू मन भाजपामय हो रहा है तो विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और उनको झटका देकर पैदल कर दिया . कांग्रेस के सहयोग से चन्द्रशेखर ने सरकार चलाने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस ने हस्बे मामूल उनकी सरकार को ठीक उसी तरह गिरा दिया जैसे इंदिरा गांधी ने चुनाव करवाने के लिए १९७९ में चरण सिंह की सरकार गिराई थी. मुद्दा यह है कि १९९० में रथयात्रा के ज़रिये लाल कृष्ण आडवानी ने मंडल कमीशान के असर को ख़त्म कर दिया . चुनाव में ओबीसी जातियां अपनी जाति की सीमा से बाहर आकर हिन्दू बन गयीं और बीजेपी को बड़ी संख्या में सीटें उपलब्ध करवा दीं. नैरेटिव बदल गया था और बीजेपी एक ताक़तवर जमात बन चुकी थी .
चुनाव का नैरेटिव बदलने का काम बीजेपी ने २०१४ में भी किया . उस वक़्त के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने ऐसे वायदे किये जिनके पूरा होने पर देश के नौजवानों और किसानों के अच्छे दिन आ जाते . उन्होंने पूरे देश को भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर , दो करोड़ प्रतिवर्ष की नौकरियों की बुनियाद पर किसानों की खुशहाली के सपने पर और मज़बूत सरकार के वायदे के साथ एकजुट कर दिया . जातीय पहचान के ऊपर आर्थिक खुशहाली और रोज़गार के वायदे ने देश को नरेंद्र मोदी के पक्ष में खडा कर दिया .नतीजा सब के सामने है .
अपने इन वायदों को नरेंद्र मोदी पिछले पांच साल में पूरा नहीं कर पाए थे. लेकिन उन्होंने लोकलुभावन बहुत सारी योजनायें चलाईं . उज्ज्वला, गरीबों के लिए घर , ग्रामीण परिवारों के लिए शौचालय , किसानों के बैंक खातों में २००० रूपये आदि ऐसे सरकारी कार्यक्रम हैं जिसका फायदा प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को चुनावी लाभ के रूप में मिल सकता था लेकिन बेरोजगारी, खेती की दुर्दशा और महंगाई जैसे मुद्दे उनके लिए भारी पड़ रहे थे. इसी के चलते १४ फरवरी के पहले के जो भी विमर्श थे उसमें नरेंद्र मोदी सरकार रक्षात्मक मुद्रा में थी,बैकफुट पर थी लेकिन पुलवामा में सी आर पी एफ के काफिले पर आतंकवादी हमले के बाद सब कुछ बदल गया .पुलवामा के आतंकवादी हमले के बाद कुछ दिन टीवी चैनलों के ज़रिये बदला लेने का माहौल बनाया गया और नरेंद्र मोदी ने वायु सेना को अधिकृत किया .नतीजतन पकिस्तान में घुसकर वायुसेना ने बमबारी की और नतीजा समाने है .इस घटना ने चुनाव को देशप्रेम की पिच पर ला दिया . पूरा देश आज देशप्रेम की बात कर रहा है . कोई भी मंहगाई , किसानों की दुर्दशा ,राम मंदिर और राबर्ट वाड्रा के भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहा है . नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक बहस के दायरे को ऐसे मुकाम पर लाका छोड़ दिया है जहां विपक्ष के लोग उनके आरोपों के जवाब ही दे रहे हैं . अब चर्चा यह है देश की रक्षा ,आतंकवाद से मुकाबला और पाकिस्तान को औकात दिखाना ज़रूरी काम हैं .प्रधानमंत्री की कोशिश है कि वे मुद्दे चुनावी विमर्श में न आयें जिनमें उनकी कमजोरी दिखती है . वे भाग्यशाली हैं क्योंकि ममता बनर्जी को छोड़कर पूरा विपक्ष उनके भाषणों पर प्रतिक्रिया दे रहा है .राजनीतिक घेरेबंदी में नई नई बातें हो रही हैं . नरेंद्र मोदी एजेंडा सेट कर रहे हैं और विपक्ष उसी के घेरे में फंसता जा रहा है . ऐसा लगता है कि खुद पहल न करके विपक्ष ने पहल का अधिकार पूरी तरह से नरेंद्र मोदी को सौंप दिया है. हालांकि देश की सुरक्षा और आतंकवाद से देश को बचाना किसी भी सरकार का बुनियादी धर्म है . उसके साथ साथ देश के लोगों को जो चुनावी वायदे किये गए थे उनको भी पूरा किया जाना ज़रूरी है .लेकिन नरेंद्र मोदी ने एजेंडा फिक्स कर दिया है . नया नैरेटिव शुरू कर दिया है . यह देखना दिलचस्प होता है कि उनके एजेंडे को ही विरोधी दल लागू करने में जुटे रहते हैं कि देशप्रेम के अलावा वाले मुद्दे भी उठाने की हिम्मत जुटा पाते हैं .

जंग टलती रहे तो बेहतर है


शेष नारायण सिंह
पुलवामा में  सी आर पी एफ के काफिले पर हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच माहौल बहुत ही गरम हो गया  है . भारतीय मीडिया ने भारत सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी कोई कार्रवाई की जाए या अगर सम्भव हो तो युद्ध ही कर लिया जाए. मौजूदा सरकार के सामने कठिन दुविधा की स्थिति  है . सरकार को मालूम है कि जंग शुरू करना तो आसान है लेकिन उसको खत्म करना बहुत ही मुश्किल है . जंग किसी  भी समस्या का हल नहीं  है  लेकिन जंग को बचाने में यह सन्देश भी नहीं  जाना चाहिए कि भारत किसी से डरता है या किसी के दबाव में काम कर रहा है . पुलवामा के हमले के लिए पाकिस्तान के आतंकवादी  संगठन जैशे-मुहम्मद ने ज़िम्मा ले लिया है .  ज़ाहिर है कि पुलवामा का हमला पाकिस्तान की शह पर ही हुआ है . हालांकि पाकिस्तान में  फौज की कृपा से सत्ता पर बैठे प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी शुरुआत भारत से दोस्ती की बात करके की थी लेकिन फौज की मनमानी के खिलाफ वे कुछ नहीं कर सकते .पाकिस्तान में सारी सत्ता फौज के ही हाथ में होती है आज भी हालात वही हैं . जब भी कभी सिविलियन सत्ता फौज की बात को ऊपर  रखने से इनकार करती है तो उसको रास्ते से हटा दिया  जाता  है . इसलिए पाकिस्तान से किसी समझदारी  की उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं  है .
खबर है कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सी आर पी एफ बी एस एफ आई टी बी पी और सीमा सुरक्षा बल की  एक सौ  कंपनियों को तैनात कर दिया  है . इसका मतलब यह हुआ कि भारत पाकिस्तान  पर सैनिक हमला करने के पहले अपने अर्धसैनिक बलों की ताक़त का प्रयोग करके राज्य में शांति स्थापित करना चाहता है . कश्मीर के अन्दर सक्रिय पाकिस्तान परस्त गुटों को अगर शांत किया जा  सके वह सबसे अच्छा  होगा .
  दो देशों के बीच दो ही तरह के सम्बन्ध होते हैं . कूटनीतिक सम्बन्ध शान्ति की स्थिति में रहते हैं . कूटनीति के सहारे ही शान्ति की स्थापना की जा सकती है . कूटनीति को कभी फेल नहीं होने देना चाहिए  क्योंकि अगर कूटनीति फेल होती है तो युद्ध की स्थिति बन जाती है . युद्ध को टालना दुनिया के सारे सभ्य समाजों की प्राथमिकता होनी चाहिए . भारत  की राजनीति का यह हमेशा से स्थाई भाव रहा है . जब कबायली हमले के बहाने जिन्नाह के दौर में विभाजन के बाद ही पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला किया था तो भारत ने उसको खदेड़ा लेकिन युद्ध को आगे नहीं बढ़ाया . जब १९६५ में पाकिस्तानी शासक जनरल अय्यूब ने कश्मीर में बहुत बड़े पैमाने पर घुसपैठ कराई तो उनको मुगालता था  कि कश्मीरी अवाम उनके साथ है . लेकिन जब उनके घुसपैठिये  फौजियों को पकड़कर कश्मीरी जनता ने पुलिस के हवाले  कर दिया तो उनकी समझ में बात आ गयी  और पाकिस्तान को जो खामियाजा भुगतना पड़ा वह पूरी दुनिया को मालूम है . १९७१ की जंग भी एक फौजी जनरलयाह्या खान की बेवकूफी का  नतीजा था .पाकिस्तानी  कौमी असेम्बली के चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान को स्पष्ट बहुमत था लेकिन जनरल याहया खान ने उन्हें  प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया . नतीजा हुआ कि एक राष्ट्र के रूप में बंगलादेश का जन्म हो गया .  मुराद यह  है कि  फौजी जनरल जब भी कंट्रोल में होते हैं तो वे भारत के साथ पंगा ज़रूर  लेते हैं . जनरल जिया और जनरल मुशर्रफ की कारस्तानियाँ भी सबको मालूम हैं .
ऐसी ही बेवकूफी पाकिस्तान की तरफ से फिर हो रही है .पाकिस्तानी फौज ने एक मंदबुद्धि क्रिकेट खिलाड़ी को देश  का प्रधानमंत्री बना दिया है और उसके कंधे पर बन्दूक रख कर भारत को छेड़ने की कोशिश की जा रही है.   पूरी दुनिया के समझदार लोग यह चाहते हैं कि पाकिस्तान अपने देश में मुसीबत झेल रहे आम आदमी को सम्मान का जीवन देने में अपनी सारी ताक़त लगाए लेकिन पाकिस्तानी फौज की दहशत में रहकर वहां की तथाकथित सिविलियन सरकार के प्रधानमंत्री भारत विरोधी राग अलापते रहते हैं . आज की भू भौगोलिक सच्चाई यह है कि अगर पाकिस्तानी नेता तमीज से रहें तो भारत के लोग और सरकार उसकी मदद कर सकते हैं . पाकिस्तान को यह भरोसा होना चाहिए कि भारत को इस बात में कोई रूचि नहीं है कि वह पाकिस्तान को परेशान करे लेकिन मुसीबत की असली जड़ वहां की फौज है . फौज के लिए भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढाना लगभग असंभव है . इसके दो कारण हैं . पहला तो यह कि भारत से दुश्मनी का हौव्वा खड़ा करके पाकिस्तानी जनरल अपने मुल्क में राजनीतिक और सिविलियन बिरादरी को सत्ता से दूर रखना चाहते हैं . इसी के आधार पर उसे चीन जैसे देशों से आर्थिक मदद भी मिल जाती है . लेकिन दूसरी बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है . पाकिस्तानी फौज में टाप पर बैठे लोग १९७१ की हार को कभी नहीं भूल पाते .फौज़ को वह दंश हमेशा सालता रहता है . उसी दंश की पीड़ा के चक्कर में उनके एक अन्य पराजित जनरल , जिया -उल -हक ने भारत के पंजाब में खालिस्तान बनवा कर बदला लेने की कोशिश की थी . मैजूदा फौजी निजाम यही खेल कश्मीर में करने के चक्कर में है . फौज को मुगालता यह है कि उसके पास परमाणु बम है जिसके कारण भारत उस पर हमला नहीं करेगा . लेकिन ऐसा नहीं है . अगर कश्मीर में पाकिस्तानी फौज और आई एस आई ने संकट का स्तर इतना बढ़ा दिया कि भारत की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो गया तो भारतीय फौज पाकिस्तान को तबाह करने का माद्दा रखती है और वह उसे साबित भी कर सकती है . लेकिन फौजी जनरल को अक्ल की बात सिखा पाना थोडा टेढ़ा काम होता है . इसी तरह के हवाई किले बनाते हुए जनरल अयूब और जनरल याहया ने भारत पर हमला किया था जिसके नतीजे पाकिस्तान आज तक भोग रहा है .और उसकी आने वाली नस्लें भी भोगती रहेगीं.
ज़मीनी सच्चाई जो कुछ भी हो ,पाकिस्तानी हुक्मरान उससे बेखबर हैं .

जहां तक भारत का सवाल है ,वह एक उभरती हुई महाशक्ति है और अमरीका भारत के साथ बराबरी के रिश्ते बनाए रखने की कोशिश कर रहा है . अब पाकिस्तान को अमरीका से वह मदद नहीं मिलेगी जो १९७१ में मिली थी. इस लिए पाकिस्तानी हुक्मरान ,खासकर फौज को वह बेवकूफी नहीं करनी चाहिए जो १९६५ में जनरल अयूब ने की थी . जनरल अयूब को लगता था कि जब वे भारत पर हमला कर देगें तो चीन भी भारत पर हमला कर देगा और भारत डर जाएगा उर कश्मीर उन्हें दे देगा. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और पाकिस्तानी फौज़ लगभग तबाह हो गयी. इस बार भी भारत के खिलाफ किसी भी देश से मदद मिलने की उम्मीद करना पाकिस्तानी फौज की बहुत बड़ी भूल होगी. लेकिन  सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी फौज़ के टॉप  अफसर बदले की आग में जल रहे हैं , वहां की तथाकथित सिविलियन सरकार पूरी तरह से फौज के सामने नतमस्तक है . कश्मीर में आई एस आई ने हालात को बहुत खराब कर दिया है . आजकल आई एस आई का नया खिलौना जैशे-मुहम्मद है  जिसका सरगना मसूद अजहर भारत को तबाह करने के सपने देख रहा है .इसलिए इस बात का ख़तरा बढ़ चुका है कि पाकिस्तानी जनरल अपनी सेना के पिछले सत्तर साल के इतिहास से सबक न लें और भारत से युद्ध करने की मूर्खता कर बैठें .  भारत को कूटनीतिक तरीके से यह समझा देना चाहिए कि  अगर पाकिस्तानी फौज हमला करने के खतरे से खेलती है तो बाकी दुनिया को मालूम रहे कि भारत न तो गाफिल है और न ही पाकिस्तान पर किसी तरह की दया दिखाएगा .इस बार लड़ाई फाइनल होगी. १९६५ में भारत की सेना ने लाहौर के दरवाज़े पर दस्तक दे दी थी . रूस ने बीच बचाव करके सुलह करवाया तब इच्छोगिल तक  बढ़ गयी भारतीय सेना  वापस आई.
इधर भारत में भी  युद्ध के खतरों से अनभिज्ञ  सत्ताधारी पार्टी के  कुछ नेताओं को मुगालता है कि अगर  पाकिस्तान से कारगिल जैसा कोई सीमित युद्ध हो जाए तो २०१९ के चुनावों में फ़ायदा होगा . लेकिन उनको पता होना चाहिए कि १९६५ की लड़ाई के बाद  सत्ताधारी पार्टी पूरे उत्तर भारत में हार गयी थी . १९७१ की लडाई में निर्णायक जीत के बाद जो पहला लोकसभा चुनाव हुआ उसमें  इंदिरा गांधी की पार्टी बुरी तरह से हार गयी थी और देश की जनता उनके खिलाफ १९७४ से ही लामबंद हो गयी थी.
इस बार भी जंग टलती रहे तो बेहतर है लेकिन अगर पाकिस्तान जंग थोप देता है तो उसको जवाब तो देना ही पडेगा .

Thursday, February 21, 2019

जन पक्षधरता के महान विद्वान की मृत्यु , डॉ नामवर सिंह अमर रहें


शेष नारायण सिंह

१९७४ में जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आंचलिक उपन्यास के अध्ययन के कोर्स में डॉ राही मासूम रज़ा का ' आधा गाँव ' लगा दिया गया . बड़ा हो हल्ला हुआ . छात्रों के एक गुट ने आसमान सर पर उठा लिया और किताब को हटवाने के लिए आन्दोलन करने लगे . उपन्यास में कुछ ऐसी बातें  लिखी थीं जो पुरातनपंथी दिमाग वालों की समझ में नहीं आ रही थीं लिहाज़ा उन लोगों ने आन्दोलन शुरू  कर दिया . डॉ नामवर सिंह वहां उन दिनों हिंदी के विभागाध्यक्ष थे . किताब को कोर्स से हटाने की मांग शुरू हो गयी . डॉ नामवर सिंह झुकना नहीं जानते थे और अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण  उन पोंगापंथी छात्रों के सामने भी नहीं झुके.  जब उन्होंने देखा कि आन्दोलन बहुत जोर पकड़ गया .अपने ऊपर उनको इतना विश्वास था कि वे किसी भी नौकरी से  चिपकना चाहते ही नहीं थे. जोधपुर वालों का आन्दोलन दिल्ली विश्वविद्यालय में भी शुरू हो गया . कुछ दक्षिणपंथी जमातों से सम्बद्ध छात्रों ने दिल्ली में भी हल्ला गुल्ला किया और डाक्टर साहब ने इस्तीफा दे दिया . उसके बाद डॉ राम विलास शर्मा ने उनको आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान में जाने के लिए राजी  किया, सब कुछ हो गया लेकिन भविष्य तो हिंदी की दुनिया में उनके लिए कुछ और भूमिका तय कर   चुका था. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन दिनों हिंदी का नियमित कोर्स नहीं था. डी पी  त्रिपाठी जे एन यू   छात्र संघ के अध्यक्ष थे . छात्रों ने मांग की कि डॉ नामवर सिंह को  जे एन यू लाया जाय. और डॉ नामवर सिंह को लाने का  फैसला हो गया .  एक नया  कोर्स शुरू हुआ जिसका नाम था , Teaching Hindi as a Foreign Language . उन दिनों विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों का जमावड़ा होता था , शायद यह कोर्स उनके लिए ही तय किया गया रहा होगा .  हिंदी में एम ए करने वालों की पहली बैच  का प्रवेश इसी कोर्स में हुआ था. आज के महान कवि मनमोहन , स्व घनश्याम मिश्र आदि इसी कोर्स में दाखिल हुए थे .
डॉ नामवर सिंह के जे एन यू आ जाने के बाद हिंदी आलोचना  भी कैम्पस में चर्चा के केंद्र में आ गयी . राजकमल प्रकाशन से निकलने वाली विख्यात साहित्यिक पत्रिका ' आलोचना ' के सम्पादक भी  वे ही थे. उन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में देश के शीर्ष विद्वानों का जमावड़ा हुआ  करता था. प्रो. मुहम्मद हसन के साथ मिलकर डॉ नामवर सिंह ने भारतीय भाषा केंद्र को दुनिया की एक आदरणीय संस्था  बना दिया . इसी  भारतीय भाषा केंद्र में साहित्य की विभूतियों के आने जाने का सिलसिला जो शुरू हुआ तो बहुत समय बाद तक चलता रहा . उन दिनों सारी कक्षाएं पुराने कैम्पस में चलती थीं.  अध्यापकों के आवास और छात्रावास नए कैम्पस में हुआ करते थे. आम तौर पर लोग दोनों परिसरों के बीच बनी पत्थर की पगडंडी से पैदल ही आया जाया करते थे. हालांकि ६१२ नम्बर की एक डी टी सी  बस भी थी जो ओल्ड कैम्पस से गोदवरी  हॉस्टल तक आती थी. इसी पगडंडी पर पैदल चलते हुए डाक्टर साहब ने आम बातचीत में मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के महान विद्वान क्रिस्टोफर काडवेल की किताब  ' इल्यूज़न एंड रियलिटी ' का ज़िक्र किया था .  तब तक मैंने उस किताब का नाम नहीं सुना था. उन्होंने उसके बारे में मुझे बताया और उत्सुकता पैदा की कि मैं उसके बारे में और जानकारी    करूँ. साहित्यिक आलोचना में यह किताब पिछले अस्सी साल से सन्दर्भ की पुस्तक में  गिनी जाती है .
कठिन से कठिन बात को बहुत ही साधारण तरीके से बता देना डाक्टर नामवर सिंह के बाएं हाथ का खेल था. आजादी की लड़ाई के  दौरान सन बयालीस में  कम्युनिस्टों का अंग्रेजों के साथ खड़ा हो जाना एक ऐसा तथ्य है जिसको   सभी मंचों से दोहराया  जाता  रहा है.  हम भी नहीं समझ  पाते थे कि ऐसा क्यों हुआ . एक दिन उन्होंने समझाया . उन्होंने कहा कि दूसरा विश्वयुद्ध  जब उफान पर था और हिटलर ने सोवियत रूस पर हमला कर दिया तो हिटलर का विरोध करना जनयुद्ध ( Peoples War ) हो गया और दुनिया भर की बाएं बाजू की जमातें तानाशाह हिटलर को हराने के  लिए लामबंद हो गयीं . उसी प्रक्रिया में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी हिटलर की विरोधी ताकतों का समर्थन कर दिया . उस  प्रक्रिया में कम्युनिस्टों को  आज़ादी के बाद बार बार ताने सुनने पड़े लेकिन जब फैसला हुआ था तब उसमें कोई  गलती नहीं थी. देश और विदेशों में उनके छात्रों की बहुत बड़ी संख्या है . सब अपने अपने क्षेत्र में शीर्ष पर  हैं. डॉ मैनेजर पाण्डेय ,मनमोहन, असद ज़ैदी, उदय  प्रकाश, राजेन्द्र शर्मा, अली जावेद, जगदीश्वर चतुर्वेदी ,पंकज सिंह ,  महेंद्र शर्मा आदि उनके छात्र  रहे हैं . हिंदी के जितने भी सही अर्थों में शीर्ष विद्वान हैं उनमें से अधिकतर उनके  छात्र हैं  . उनके बारे में सबके पास निजी संस्मरण हैं . उनकी सेमिनारीय प्रतिभा भी बेजोड़ रही है . हमने देखा है कि जब भी वे किसी सेमिनार में शामिल हो जाते थे तो चर्चा उनके बारे में ही केन्द्रित हो जाती थी.  जहां वे नहीं भी होते थे कोई न कोई उनकी दृष्टि का उल्लेख कर देता था और चर्चा उसी  विषय पर केन्द्रित हो जाती थी .
उनके छात्रों में बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली  छात्र भी थे जो उनके खिलाफ हो रही साजिशों को हर स्तर पर बेनकाब करते थे . १९७७ में एक बार जे एन यू के सिटी सेंटर, ३५ फीरोज़ शाह रोड ,नई दिल्ली में  एक सम्मेलन हो रहा था. बंबई से आये एक साहित्यिक बाहुबली ने उसको संपन्न करवाने का ज़िम्मा लिया हुआ था. जनता पार्टी का राज था . अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे . विदेश मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने उस सम्मलेन को सहयोग दिया था. कार्यक्रम  प्राइवेट था लेकिन  सरकार का गुप्त सहयोग था. डॉ नामवर सिंह के खिलाफ उसमें कुछ पत्रक पढ़े जाने थे . भारतीय भाषा केंद्र के  छात्रों को भी इस आयोजन के एजेंडा की भनक लग गयी . श्रोता के रूप में घनश्याम मिश्र,  विजय चौधरी , पंकज सिंह आदि शारीरिक रूप से सक्षम  छात्र भी वहां पंहुच गए . जैसे ही भूमिका के दौरान उन कार्तिकेय जी ने नामवर जी के बारे में कुछ उलटा सीधा कहा ,उनका मुखर विरोध  हुआ . वे अपनी बात पर अड़े रहे तो उनको रोका गया और जब वे नहीं माने तो अगला कदम भी संपादित कर दिया . बाद में स्व सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने उनको समझाया कि यहाँ इस तरह का प्रयास उनको ज़रूरी नतीजे नहीं दे पायेगा . शाम को जब कैम्पस में  इस टीम के कुछ सदस्य मिले तो डाक्टर साहब ने उनको समझाया कि  बौद्धिक धरातल पर ही विरोध किया जाना चाहिए था . शारीरिक दंड देना बिलकुल गलत था .
डॉ मानवर सिंह का नाम जब भी लिया जाएगा तो यह  बात बिना बताये सब की समझ में आ जायेगी कि उन्होंने कभी  किसी को अपमानित नहीं किया लेकिन आत्मसम्मान से कभी भी समझौता नहीं किया . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक के रूप में वे कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव  लड़े थे, चुनाव में हर गए तो नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया . उन दिनों उनके सबसे छोटे  भाई काशीनाथ सिंह को बी एच यू में काम मिल गया था. घर चल रहा था. परिवार साथ ही रहता था. सुबह जब वे घर से निकलते थे तो  चार आना  उनकी जेब  में होता था.  उसमें उनके पान का खर्चा और केदार की दूकान पर चाय का खर्च चल जाता था. काशी उन दिनों बहुत बड़े साहित्यकारों का ठिकाना हुआ करता था . काशीनाथ सिंह ने बताया था या शायद कहीं लिखा भी है कि एक बार उन्होंने उनकी जेब में  कुछ रूपये डाल दिया . जब शाम को घर आये तो उनको समझाया कि उनके अपने खर्च के  लिए जो चाहिए ,वह उनके पास रहता है .आगे से ऐसी बात नहीं होनी चाहिए . ऐसे बहुत सारे दृष्टांत हैं जिनके आधार पर उनक शख्सियत के   इस अहम पहलू को रेखांकित किया जा सकता  है .
हिंदी आलोचना के क्षेत्र में और भी बहुत से लोग हैं जो अपने को उनके बराबर बताते थे . पुराने कैम्पस की क्लब  बिल्डिंग के लॉन पर बैठे हुए १९७७ की फरवरी में बाबा नागार्जुन ने बहुत ही गंभीरता से कहा था कि बाकी सब नामवर सिंह के हवाले से अपनी बात कहते हैं जबकि नामवर  सिंह हमेशा मौलिक बात करते हैं . उनके कहे में मार्क्सवाद की शास्त्रीय और व्यावहारिक समझ को  वे लोग देख सकते हैं जो विषय को समझते हैं . दिल्ली में हर दौर में नामवर के विरोधियों के खेमे रहे हैं लेकिन ज्यादातर के विरोध निजी कारणों से  होते हैं या  अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों से सम्बद्धता के कारण होते हैं . मैंने पिछले चालीस वर्षों में  ऐसे लोग भी देखे हैं जिनका उन्होंने कोई फायदा नहीं होने दिया ,बल्कि नुक्सान होने के अवसर बनाये लेकिन वे लोग भी उनकी मेधा और विद्वत्ता के कारण उनकी तारीफ़ करते हैं . कलकत्ता विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी ऐसे ही एक विद्वान हैं . जे एन यू में उनके प्रवेश  में भी नामवर सिंह ने अड़चन डाली थी. दिल्ली में उनकी नौकरी लगने में भी अडंगा लगाया और भी कोई सहयोग नहीं किया लेकिन जगदीश्वर हमेशा उनको सम्मान  करते हैं . उनके हज़ारों छात्रों में जगदीश्वर इकलौते छात्र है जिन्होंने उनके जीवन और  लेखन के  बारे में एक   किताब लिखी है . जगदीश्वर का कहना  है कि डॉ नामवर सिंह ने अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ जो भी लिखा  है वह साम्राज्यवाद के खिलाफ लिखे गए सभी भाषाओं के लेखन की तुलना में बेजोड़ है . साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनका लेखन अगर सेकुलर ताक़तों के पैरोकार लोग ठीक से पढ़ लें और उसका प्रयोग करें तो साम्प्रदायिक राजनीति निश्चित रूप से कामजोर पड़ेगी. उनके बारे में लिखी हुई अपनी किताब को जब जगदीश्वर चतुर्वेदी ने  उनके घर जाकर दिया तो उन्होंने कहा कि तुमने मुझे एक बार फिर जीवित कर दिया . उस किताब में उनके विचलन का भी ज़िक्र है,  किसी को भी महान कह देने की उनकी परवर्ती प्रवृत्तियों का भी ज़िक्र है ,उनकी आलोचना भी है लेकिन डाक्टर साहब ने उसकी तारीफ की और उस किताब को माथे से लगाया .
एक शानदार जीवन  बिता कर डॉ नामवर सिंह की मृत्यु हुई है. जो कुछ उन्होंने लिखा है वह अपने देश के साहित्यिक इतिहास की धरोहर है . उनकी प्रमुख किताबें हैं ,हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदानआधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, छायावादपृथ्वीराज रासो की भाषाइतिहास और आलोचनाकविता के नए प्रतिमानदूसरी परंपरा की खोज. आने वाली पीढियां इनके आलोक में मेधा का विकास करती रहेंगी . 

Wednesday, February 20, 2019

आज मेरे बाबू की पुण्यतिथि है


मेरे बाबू का जन्म १९२४ में हुआ था . उनके बाबा ठाकुर जगेशर सिंह ज़मींदार थे . परिवार में बाबू के जन्म से बहुत ही खुशी का माहौल बन गया था क्योंकि पट्टी पिरथी सिंह को वारिस मिल गया था . उनकी बरही के दिन बहुत बड़ा जश्न हुआ था .इलाके की सभी तवायफों ने बधाई गाई थी और इनाम पाया था . आजकल बच्चों के प्रति प्रेम का सबूत यह होता है कि उनको अच्छी से अच्छी शिक्षा दी जाये लेकिन उन दिनों ऐसा नहीं था . उन दिनों अपने बच्चों को गाँव से दूर भेजना कायथ करिन्दा का काम माना जाता था .परिवार में शिक्षा के प्रति उत्साह नहीं था. इसलिए पड़ोस के नरिंदा पुर गाँव में १८६६ में जो प्राइमरी स्कूल खुला था ,वहीं से प्राइमरी तक की ही उनकी पढ़ाई हुई थी .उनके पिता और बाबा भी नरिंदापुर ही पास थे .मेरे बाबू के काका ठाकुर राम आधार सिंह सुलतानपुर के मिडिल स्कूल में पढने गए थे . बाद में वही स्कूल माडल स्कूल बन गया था. उन दिनों सुल्तानपुर और दोस्तपुर में ही मिडिल स्कूल थे . दोस्तपुर जाने के लिए गोमती नदी पार करना पड़ता था इसलिए सुल्तानपुर को ही प्राथमिकता दी जाती थी .मेरे पिताजी बहुत दुलरुआ थे इसलिए उनको सुल्तानपुर नहीं भेजा गया . हालांकि उनके काका ,ठाकुर राम आधार सिंह ने मुझसे कई बार बताया कि जब यह चहारुम ही नहीं पास हुए तो मिडिल स्कूल में कैसे भेजे जाते. उन्होंने मिडिल स्कूल पढ़कर भी बहुत तीर नहीं मारा था . मेरे चचेरे बाबा जब मिडिल स्कूल में सुल्तानपुर पढने गए तो उनके साथ गाँव के ही दो नौजवान और गए थे . एक थे राम अवध सिंह जिनके पिता बरार ( विदर्भ ,महाराष्ट्र ) में कपास के खेत में चौकीदारी करते थे लिहाज़ उनके घर बाहरी पैसा आता था . इन लोगों के तीसरे सहपाठी थे काली सहाय सिंह . उनके पिता सरकारी नौकरी में थी . डाकखाने में चिट्ठीरसा थे. बहरहाल जो भी कारण रहे हों ,मेरे पिताजी ने मिडिल की पढ़ाई नहीं की .अगर उन दिनों हाई स्कूल तक पढ़ लिया होता तो शायद हमारे परिवार की तस्वीर बदल जाती लेकिन नहीं बदली.
जब बाबू २० साल के थे ,उनके पिता जी की मृत्यु हो गयी . घर में अलगौझी हो गयी . बाबू के काका का परिवार अलग हो गया . बाबू के बाबा बड़े भाई थे लिहाज़ा वे ही ज़मींदार थे. लगान पूरा वसूल नहीं हो पाता था इसलिए लगान अदा करने के चक्कर में सीर खुदकाश्त के बहुत सारे खेत और बाग़ नीलाम हो जाते थे . खुद की खेती ठीक से नहीं होती थी इसलिए ज़मींदारी उन्मूलन के पहले ही हमारे परिवार में गरीबी आ गई थी . जब १९५१ में ज़मींदारी उन्मूलन हुआ तो छोटे ज़मींदारों के ऊपर तो वज्र जैसा पड़ा . हमारे इलाके के पटवारी,मुसई लाल थे ,उनसे मिलजुल कर ज़्यादातर लोगों ने ज़मींदार की ज़मीन अपने नाम शिकमी करवा ली और हमारे परिवार की हालत बहुत खराब हो गई.उस समय बाबू की उम्र सताईस साल की थी . उन्होंने कुछ ज़मीन तो मुक़दमा लड़कर और कुछ ज़मीन अन्य तरीकों से वापस ली लेकिन आर्थिक सम्पन्नता की बात हमारे घर में कभी नहीं थी . हां यह भी सच है कि बाबू ने कभी किसी के सामने सर नहीं झुकाया . जब पंचायती राज की व्यवस्था लागू हुयी तो १९५२ में गाँव के प्रधान बना दिए गए . करीब ३८ साल प्रधान रहे और एकाध बार को छोड़कर हमेशा निर्विरोध ही चुने जाते रहे. शिक्षा का अभाव था इसलिए तहसील के लेखपाल और कानूनगो हमारे यहाँ बड़े अफसर माने जाते थे . लड़कियों की शिक्षा पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया जाता था इसलिए गाँव पूरी तरह से पिछड़ा हुआ था ..
आज़ादी के बाद की बहुत सारी योजनायें मेरे गाँव में कोई असर नहीं डाल सकीं . अपने उद्यम से ही लोग जो कर सकते थे ,वही किया . सामन्ती मानसिकता के रिश्तों में जकड़ा गाँव आज शहरीकरण की तरफ बढ़ रहा है . शहर की अमानवीयता तो आ रही है लेकिन आपसी रिश्तों में गंवई गर्मजोशी ख़त्म हो रही है . १९९१ में मेरे पिताजी की वही उम्र रही होगी जो मेरी अब है . बहुत ज़्यादा बीमार हो गए थे . मेरी दोनों बहनें, मेरे भाई और बहन के बेटे ने उनकी बीमारी में उनको बहुत सहारा दिया . ठीक हो गए थे लेकिन वह बात नहीं बची थी जो उनकी शख्सियत का अहम हिस्सा हुआ करती थी. वे जीवन भर सभी फैसले वे खुद करते रहे थे ,किसी की राय को अपने फैसलों के बीच में नहीं आने देते थे लेकिन बीमारी के बाद फैसले लेना ही छोड़ दिया था. मेरी बहनों को बहुत मानते थे लेकिन उनको उच्च शिक्षा नहीं दिलवाई थी. इसी मुद्दे पर मेरी मां से उनका मतभेद रहा करता था जो जीवन भर चला . उन्होंने गाँव या आसपास के किसी भी आदमी का कभी कोई नुक्सान नहीं किया लेकिन कभी भी किसी और की राय को महत्व नहीं दिया . हमेशा अपनी मर्जी के मालिक रहे . उनके जीवनकाल में हम भी अपनी ज़िंदगी को सुर्खरू करने के लिए संघर्ष करते रहे. जब हम लोगों के बच्चे बड़े हो रहे थे . शिक्षा दीक्षा में प्रवीणता पा रहे थे और इस बात की संभावना बन रही थी कि हमारे माता पिता के साथ साथ हमारी भी मनई की जिनगी हो जायेगी तो १९ फरवरी २००१ के दिन वे दुनिया छोड़ गए . आज उनकी पुण्यतिथि है .