Saturday, July 18, 2020

अमरीकी नागरिक अधिकारों के चैंपियन जॉन लुईस नहीं रहे


शेष नारायण सिंह  

अमरीका में नागरिक अधिकारों के बड़े चैंपियन, जॉन राबर्ट लुईस नहीं रहे . अस्सी साल की उम्र में उनका देहांत हुआ . उनको कैंसर था.  सभी जीवित अमरीकी पूर्व राष्ट्रपतियों ने उनकी मृत्यु पर शोक सन्देश भेजा  है लेकिन ट्विटर पर हमेशा मौजूद रहने वाले वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक कुछ नहीं कहा है . वे गोल्फ खेल रहे  हैं .

अमरीका में काले लोगों के खिलाफ बहुत ही विद्वेषपूर्ण रवैया अपनाया जाता था , १९६४ तक उन लोगों को वोट देने का अधिकार तक नहीं था, बसों में अलग सेक्शन होता था .कैंटीनों में उनके खाने के लिए अलग जगह तय रहा करती थी. बस के लिए इंतज़ार करते हुए उनको  गोरों से दूर रहना पड़ता था .  इस सब के खिलाफ १९६१ में दक्षिणी राज्य टेनेसी की राजधानी  नैशविल में एक आन्दोलन शुरू हुआ. उस आन्दोलन में अधिकतर नैशविल की फिस्क यूनिवर्सिटी के छात्र छात्राएं शामिल थे . इस आन्दोलन को दिशा देने का काम जेम्स लासन ने किया . तीन साल तक भारत में रहकर उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के राजनीतिक हथियार की बारीकियां समझ लीं थी .इसलिए जब जेम्स लासन ने काम शुरू किया तो उनका सबसे बड़ा हथियार महात्मा गांधी का सत्याग्रह था। इसके पहले अमरीका के अफ्रीकी मूल वाले नागरिक, मानवाधिकारों की लड़ाई के लिए हिंसक तरीके अपनाते थे लेकिन जेम्स लासन ने महत्मा गांधी की तरकीब अपनाई और लड़ाई सिविल नाफरमानी के सिद्धांत पर केंद्रित हो गई। वहां के क्लू, क्लास, क्लान के श्वेत गुंडों ने इन लोगों को बहुत मारा-पीटा, आतंक का सहारा लिया लेकिन लड़ाई चलती रही, शांति ही उस लड़ाई का स्थाई भाव था। इस  सत्याग्रही  संघर्ष में जॉन लुईस अगली कतार के नेता थे . उनके साथ जो ने लोग थे वे सभी बीस से पचीस वर्ष की आयु के बीच के ही  थे.

बाद में मार्टिन लूथर किंग भी इस संघर्ष में शामिल हुए और अमरीका में अश्वेत मताधिकार सेग्रेगेशन आदि की समस्याएं हल कर ली गईं। अमरीकी मानवाधिकारों को दबा देने की कोशिश कर रहे सभी अश्वते गुंडे आतंक का सहारा ले रहे थे  आतंकवाद को राजनीतिक हथियार बनाने वाले व्यक्ति का उद्देश्य हमेशा राजनीतिक होता है और वह भोले भाले लोगों को अपने जाल में फंसाता है. जॉन लुईस के साथियों ने आतंक का विरोध किया और अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन केनेडी की मदद से ऐसे  क़ानून बनवाने में सफलता पाई जो कि किसी भी सभी समाज के लिए ज़रूरी होते हैं.

जॉन  लुईस बाद में चुनावी राजनीति में शामिल हुए और डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से जार्जिया से अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा के सदस्य रहे . पहली बार १९८७ में जीते थे तब से लेकर  १७ जुलाई  २०२० को अपनी मृत्यु तक वह सीट लगातार जीतते रहे .

वे बहुत ही शिष्ट और  विनम्र व्यक्ति थे. उन्होंने  अहिंसा का रास्ता अपनाया और सिविल  नाफ़रमानी के राजनीतिक अधिकार से अमरीका के इतिहास को बदल कर रख दिया “

Wednesday, July 15, 2020

राजस्थान में मध्यप्रदेश जैसा करिश्मा नहीं हुआ, सचिन पायलट की राजनीति की दिशा तय नहीं


शेष नारायण सिंह


राजस्थान की राजनीति में अनिश्चित्तता का दौर जारी है. अभी तक की स्थिति यह है कि बागी नेता ,सचिन पायलट को अपनी टीम को संभालकर रखना ख़ासा कठिन काम लग रहा है . बीजेपी से उनको कोई ख़ास मदद नहीं मिल रही है . बीजेपी ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दिया है कि उसके दरवाज़े सब के लिए खुले हैं . यानी अगर कोई भी पार्टी में भर्ती होना चाहे तो उसका स्वागत है . कोई भी राजनीतिक पार्टी  किसी को भी अपनी पार्टी में स्वागत करती रहती है क्योंकि जनता के समर्थन के बल पर सत्ता में आने वाली पार्टी को यह दावा तो करना ही पडेगा . लगता है कि बीजेपी के आला नेताओं की समझ में बात आ गयी है कि राजस्थान की सरकार को गिरा पाना सचिन पायलट के बूते की बात नहीं है. इसलिए उनको साथ लेकर वे कुछ ख़ास हासिल करने वाले नहीं हैं . यह अलग बात है कि   अशोक गहलौत और सचिन पायलट के झगडे  में  बीजेपी को  बड़ा फायदा हुआ है. सचिन पायलट के पांच साल के परिश्रम के बाद कांग्रेस वहां इतनी मज़बूत हो गयी थी कि राज्य  की   बीजेपी की  सरकार को हरा दिया था. उस जीत को सचिन पायलट के दोस्तों ने केवल उनकी जीत के रूप में पेश करना शुरू कर दिया लेकिन सच्ची बात यह है कि वह जीत उनके कठिन परिश्रम के साथ साथ  कांग्रेस पार्टी के संगठन और वसुंधरा सरकार की दस साल की कमियों के कारण भी हुयी थी. कांग्रेस में रिवाज़ है कि जब पार्टी कहीं चुनाव हार जाती है तो उसका ज़िम्मा स्थानीय पार्टी को दिया जाता है और जीत का सेहरा इंदिरा गांधी के परिवार को मिलता है . उसी फारमूले के तहत राजस्थान में पार्टी की जीत का श्रेय राहुल गांधी ने लिया और सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने के अपने वायदे को लागू  करने की कोशिश  शुरू कर दी लेकिन सोनिया गांधी और दिल्ली में उनके आसपास रहने वाले कांग्रेसी नेताओं ने दखल दिया और अपने पुराने जांचे परखे साथी अशोक गहलौत को मुख्यमंत्री बनवा दिया .उसी दिन दोनों नेताओं में झगडे  के बीज बो दिए गए थे .  आज उस झगडे का फल पब्लिक  डोमेन में आया है ,. डेढ़ साल बाद सचिन पायलट की नाराजगी  ऐसी बगावत का रूप ले चुकी है जिससे कांग्रेस को राजस्थान में भारी  नुकसान हो सकता है.
  मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के  पतन में पूर्व कांग्रेसी ज्योतिरादित्य  सिंधिया की भूमिका और  बीजेपी से  जो लाभ उनको मिला है , वह  कांग्रेस से नाराज़ किसी भी ताकतवर नेता के लिए बहुत ही उत्साहवर्धक माना जा रहा है.  ज्योतिरादित्य सिंधिया को बीजेपी में शामिल होने से बहुत ही अधिक फायदा  हुआ है. वे लोकसभा की अपनी सीट हार चुके थे, आज राज्यसभा में हैं . तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ उनको हाशिये पर डाल चुके थे , सरकार के  किसी भी फैसले को प्रभावित कर पाने की उनकी  कोई  हैसियत नहीं रह गयी थी . आज  बीजेपी की शिवराज सिंह चौहान सरकार में वे एक ताक़तवर केन्द्रीय नेता  हैं. सरकार में  अपने ख़ास लोगों को न केवल जगह दिलवाई  , बल्कि अपने लोगों को महत्वपूर्ण विभाग भी दिलवा दिया .  शायद यही सोच सचिन पायलट की भी थी.

अशोक गहलौत से नाराज़ होकर जब सचिन पायलट दिल्ली आये तो उनकी ज्योतिरादित्य सिंधिया से हुई मुलाक़ात से सत्ता के गालियारों में यह अंदाज़ तो लग गया था कि सिंधिया उनकी  मदद कर रहे हैं लेकिन बीजेपी के  शीर्ष नेताओं ने सचिन पायलट से मिलना ठीक नहीं समझा . बड़े नेताओं में उनकी मुलाकात  केवल ओम माथुर से ही हो  पाई . लेकिन उनके साथ जो पचीस विधायक थे उनको उम्मीद थी कि सचिन पायलट बीजेपी की मदद से राजस्थान में सत्ता पलट देंगे और उन लोगों को राजस्थान और कर्नाटक के बागियों की तरह ही मंत्री पद मिल जाएगा लेकिन यह एक मुश्किल संभावना थी. कर्नाटक और मध्य प्रदेश में जो  लोग पार्टी छोड़ रहे थे वे मंत्री पद ही  छोड़ रहे थे और मंत्री बने रहना ही उनका मकसद था .  बीजेपी ने उन सबको बी एस येदुरप्पा  और शिवराज सिंह चौहान की सरकारों में मंत्री बना दिया .  जो उनके पास था वही  या उससे भी बेहतर विभाग भी मिल गया . मध्यप्रदेश में उनके नेता , सिंधिया जी  जो किसी भी सदन में  नहीं थे , उनको राज्यसभा की सदस्यता मिल गयी. लेकिन राजस्थान में मामला थोडा  अलग था .  वहां तो बगावत के नेता सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष  पहले से ही थे . उनको तो मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहिए थी . यह असंभव था . पूर्वोत्तर राज्यों की बात छोड़ दें तो जहां बीजेपी के  प्रभाव वाले राज्य हैं , वहां पार्टी बाहर से आये लोगों को साथ तो ले लेती है लेकिन उनको राज्य की सरकार की  कमान कभी नहीं सौंपती . इसका मतलब यह हुआ कि अगर सचिन पायलट  जोड़तोड़ करके गहलौत सरकार को अपदस्थ भी कर लेते तो उनको बीजेपी की तरफ से मुख्यमंत्री बनाये जाने की कोई संभावना नहीं थी. वसुंधरा राजे वहां हैं ही , पार्टी गंजेंद्र सिंह   शेखावत को भी  बड़ी ज़िम्मेदारी  के लिए तैयार कर रही है . दूसरी बात यह थी कि सचिन पायलट की विश्वसनीयता भी बीजेपी की नज़र में अभी इतनी नहीं है कि उनको बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सके . पार्टी में यह भी विचार  किया जा रहा है कि जिस कांग्रेस में उनके परिवार को इंदिरा गांधी ,  संजय गांधी ,राजीव गांधी , सोनिया गांधी और राहुल गांधी की विशेष कृपा थी , उसी पार्टी को वे तोड़ने के लिए उद्यत हैं तो उनको बीजेपी जैसी अनुशासन वाली पार्टी में असुविधा हो सकती थी . इंदिरा गांधी ने  सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट को   लोकसभा का टिकट दिया .  राजीव गांधी ने मंत्री बनाया . जब पी वी  नरसिम्हाराव की सरकार बनी तो सोनिया गांधी ने उनको कैबिनेट मंत्री बनवाया . डॉ मनमोहन सिंह की सरकार में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की कृपा से सचिन पायलट भी मंत्री रहे . एक राज्य का पूरा ज़िम्मा उनको दे दिया . उपमुख्यमंत्री बनवाया . जब  वे उस परिवार को छोड़ सकते हैं तो बीजेपी से तो उनका रिश्ता  एक   विरोधी का ही रहा है . राजस्थान विधानसभा के चुनावों में उन्होंने बीजेपी पर बहुत भी ज़बरदस्त हमला किया था. राज्य के बहुत सारे नेता मानते हैं कि सचिन पायलट के कारण ही उनको विधानसभा में हार का मुंह देखना पडा था. इसलिए बीजेपी में उनकी  सम्मानजनक पोजीशन बनने की संभावना  बहुत  कम थी. अगर वे ज्योतिरादित्य सिंधिया की बराबरी कर रहे थे तो गलत कर रहे थे . सिंधिया परिवार से बीजेपी , जनसंघ और आर एस एस का बहुत ही प्रगाढ़ रिश्ता रहा है . १९४८ से लेकर अब तक उनका परिवार संघ के बड़े नेताओं  से  जुड़ा रहा है . जबकि सचिन पायलट के पिता और  स्वयं वे आर एस एस/बीजेपी के घोर विरोधी रहे हैं . ऐसी हालत में बीजेपी में उनको  वह मुकाम  नहीं मिल सकता जो उनको  कांग्रेस में मिला हुआ है .


अशोक गहलौत के भारी पड़ने के बाद सचिन पायलट को कमजोर करने के लिए कांग्रेस ने सारे घोड़े खोल  दिए  हैं.   सचिन पायलट को उम्मीद थी कि  कांग्रेस के नेताओं से उनको समर्थन मिलेगा लेकिन कोई ख़ास नेता उनके साथ नहीं आया .  प्रिया दत्त , संजय झा और संजय  निरुपम ने उनके पक्ष में ट्वीट तो किया लेकिन उनकी अपनी ही हैसियत कांग्रेस में फिलहाल कुछ नहीं है . कांग्रेस के ताक़तवर लोग उनके खिलाफ हैं . राजस्थान विधानसभा के स्पीकर एन सी जोशी ने  उनके साथियों से जवाब  तलब कर लिया  है . अब उनके साथियो में भी यह डर समा  गया है कि कहीं विधानसभा की सदस्यता ही न ख़त्म हो जाए. क्योंकि अगर सदस्यता  ख़तम हुई तो उपचुनाव जीतना बिलकुल आसान नहीं होगा क्योंकि बीजेपी में शामिल होने की संभावना  भी शून्य के बराबर हो गयी है . सचिन पायलट ने खुद ही पी टी आई को बता दिया है कि  राजस्थान के कुछ नेता इस बात को हवा दे रहे  हैं कि मैं बीजेपी में शामिल हो रहा हूँ. लेकिन मैं बीजेपी में नहीं जा रहा हूँ. मैंने राजस्थान में  कांग्रेस को सत्ता वापस में लाने के लिए कठिन परिश्रम किया  है “ इस बयान से ऐसा लगता है कि अभी उनको कांग्रेस से उम्मीद बची हुई है .लेकिन एक बात तो तय  है कि उनको  कांग्रेस में वह मुकाम नहीं मिलने वाला  है जो पहले था. दूसरी पार्टी बनाने की बात सचिन पायलट ने कभी नहीं किया  है लेकिन दिल्ली में बैठे राजनीतिक विश्लेषक इस संभावना की बात भी कर रहे हैं . अगर ऐसी नौबत आई तो जो विधायक उनके साथ हैं उनमें  से ज्यादातर गहलौत वापसी पर  लेंगे क्योंकि नई पार्टी के बल पर चुनाव जीत पाना बहुत ही मुश्किल है .
ऐसी हालत में राजस्थान की तस्वीर अभी साफ़ तो  बिलकुल नहीं कही जा सकती लेकिन एक  बात भरोसे के साथ कही जा सकती है कि  राजस्थान में वह नहीं हो सका जो मध्यप्रदेश में संभव हो गया था .  मध्यप्रदेश में कांग्रेस को डुबोने वाले नेता तो बीजेपी में सम्मानजनक तरीके से  व्यवस्थित हो गए लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को अपदस्थ करने की  मुहिम में जुटे पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक अभी अधर में हैं , उनके राजनीतिक जीवन में अस्थिरता  का राज है .

Thursday, July 9, 2020

कानपुर में अपराधी ने पुलिस वालों की हत्या करके लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को चुनौती दी है



शेष नारायण सिंह

कानपुर  जिले के चौबेपुर  पुलिस थाने के  एक गाँव में अपना काम करने गए पुलिस वालों पर  हुए जानलेवा हमले ने अपराध राजनीति, पुलिस , राजकाज और कानून व्यवस्था से जुड़े बहुत सारे मामलों को एक बार  फिर बहस के दायरे में ला दिया है .   अपराधी तत्वों ने दबिश देने गयी पुलिस पार्टी पर हमला किया .इस हमले में आठ पुलिस वालों की मृत्यु हो गयी और सात घायल अवस्था में अस्पताल में हैं  . पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से अपराधियों के हौसले  बढे हैं उसमें इस तरह की  घटनाओं से ताज्जुब नहीं होता लेकिन चौबेपुर की घटना में पुलिस वालों ने जिस तरह से अपने लोगों के खिलाफ अपराधी की मुखबिरी की वह  बहुत बड़ी अनहोनी है. चौबेपुर थाने के इंचार्ज दरोगा ने अपने ही साथियों  को एक वांछित अपराधी के जाल में धकेल दिया .  अजीब बात यह है कि उस दरोगा के ऊपर बड़े अफसरों के हाथ होने की बात के भी सबूत मिलना शुरू हो गए हैं . अब उस दरोगा को गिरफ्तार करके आगे की जाँच का काम शुरू हो चुका है .  चौबेपुर थाने में तैनात सभी पुलिस कर्मचारियों को थाने से हटा लिया गया है और सभी संदेह के घेरे में  हैं . कानपुर महानगर के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी जांच एजेंसियां  शक के घेरे में ले चुकी हैं. उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जिले का सबसे बड़ा पुलिस अधिकारी होता है . जिले का पुलिस प्रशासन  , कानून व्यवस्था सब उसकी सीधी ज़िम्मेदारी होते हैं . खबरें तो यह भी आ आ रही  हैं कि चौबेपुर हत्याकांड का सरगना विकास दुबे जिले के आला पुलिस अधिकारी का  कृपापात्र था . शायद इसीलिये उस अधिकारी की भूमिका भी संदेह का विषय है .पता चला है कि प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी समेत कई पार्टियों के नेताओं से  पांच लाख रूपये के इनामी बदमाश विकास दुबे के क़रीबी सम्बन्ध हैं .
विकास  दुबे को बचाने के लिए लखनऊ के ताक़तवर लोगों का एक वर्ग सक्रिय हो गया है. इतने दुर्दांत  अपराधी के पक्ष में खड़े इन लोगों की  मौजूदगी ही इस बात का सबूत है कि उत्तर प्रदेश में अपराध, राजनीति, भूमाफिया, पुलिस ,पत्रकारिता और नौकरशाही का सब घालमेल हो गया है . यह मामला केवल उत्तर प्रदेश का नहीं है .कई राज्य सरकारों में ऐसे मंत्री हैं जो  स्वयं ही कई घृणित अपराधों के मुलजिम हैंकई मंत्रियों पर हत्यालूटडकैतीबलात्कारआगजनी जैसे मुकदमे चल रहे हैं। लेकिन वे सरकार में  बने हुए हैं क्योंकि  लोकतंत्र में मंत्री ही सत्ता का मुखिया होता हैवही सरकार होता है।अगर वह अपराधी है तो लोकतंत्र के तबाह होने के खतरे बढ़ जाते हैं। लोक प्रतिनिधित्व कानून और संविधान में ऐसे प्रावधान नहीं हैं कि किसी अपराधी को चुनाव लडऩे से रोका जा सके। बाद में कुछ संशोधन आदि करके बात को कुछ संभालने की कोशिश की गई है लेकिन वह अपराधियों को संसद या विधानसभा में पहुंचने से रोकने के लिए नाकाफी है। दरअसल संविधान के निर्माताओं ने यह सोचा ही नहीं रहा होगा  कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि अपराधी भी चुनाव लडऩे लगेगा। उनकी सोच थी कि अव्वल तो अपराधी चुनाव लडऩे की हिम्मत ही नहीं करेगा और अगर लड़ता भी है तो जनता उसे नकार देगी
पिछले चालीस साल के देश के चुनावी इतिहास पर नज़र डालें तो साफ़ समझ में आ  जाएगा की हमारे संविधान के निर्माताओं और स्वतन्त्रता  संग्राम के सेनानियों की यह उम्मीद पूरी नहीं हुयी .  जातिपांत के दलदल में फंसे समाज में अपराधी स्वीकार्य होने लगा और एक समय तो ऐसा आया कि विधानसभाओं  में बड़ी संख्या में अपराधी पहुंचने लगे। इन अपराधियों के पौ बारह तब  हो गए जब गठबंधन की सरकारें बनने लगीं . हर विधायक के वोट की कृपा पर सरकारें आश्रित हो गयीं . ऐसी  हालत में राजकाज  का स्तर बुरी तरह से प्रभावित हुआ . अपराधी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा पुलिस से ही होता था. लेकिन जब उसी अपराधी की सरकार बन गई तो  पुलिस पर धौंसपट्टी का काम शुरू हो गया .नतीजा यह हुआ कि पुलिस उन अपराधी राजनेताओं की चेरी बन गई . पुलिस अपनी  सेवा की शर्तों के हिसाब से काम नहीं कर सकी . सबको मालूम है कि जब पुलिस का अधिकारी नौकरी में आता है तो संविधान का पालन करने की शपथ लेता है ,किसी नेता की चापलूसी करने की शपथ नहीं लेता लेकिन नेताओं की हां में हां मिलाने वालों की पुलिस फोर्स में हो रही भरमार की वजह से पुलिस के कुछ लोग अपराधी-नेता के साथ संलिप्त हो गए और ऐसे ऐसे  काम करने लगे जो अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आते हैं।


अपने देश के  कई   राज्यों में में पुलिस प्रशासन की हालत बहुत खराब है। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण  लिया जा सकता है .राज्य में पुलिस की लीडरशिप को कमज़ोर करने का सिलसिला  तब शुरू हुआ जब बहुत बड़ी संख्या में अपराधी लोग  विधायक बन गए. यह काम 1980 के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुआ था . 1977 में जब उत्तर  भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया तो बहत बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ गए . नतीजा या हुआ कि कांग्रेस ने हर इलाके के प्रभावशाली लोगों को साथ ले लिया और उनको टिकट भी दिया . उन प्रभावशाली लोगों में अपराधी भी बड़ी संख्या में थे . 80 के चुनाव में उत्तर भारत में फिर कांग्रेस की ज़बरदस्त वापसी हुई . इन नेताओं ने  राजकाज और गवर्नेंस के स्तर को बहुत नीचे  गिराया . अपराध की परिभाषा में भी ज़बरदस्त बदलाव हुआ.  अपराध की पृष्ठभूमि से आये नेताओं की पुलिस प्रशासन से उम्मीदें अलग तरह की थीं .  इसलिए अपराध  कम करने के लिए इंगेजमेंट के नियमों की धज्जियां उड़ने लगीं . अपराध को खतम करना प्राथमिकता की सूची से खिसक गया और  अपराधियों को खत्म करना  प्राथमिकता हो गया . वह अपराधी आम तौर पर सत्ताधारी नेता के दुश्मन हुआ करते थे.  अपराधियों को ख़त्म करने के लिए नए तरह के प्रयोग होने लगे .फर्जी मुठभेड़ का सहारा लिया जाने लगा . कुछ मामलों में तो अपराधियों से ही दूसरे अपराधी को मरवाने का रिवाज़ शुरू हो गया .पुलिस सिस्टम में नई  परिपाटी भी शुरू हो गयी . आउट ऑफ टर्न प्रमोशन की कल्चर शुरू हो गयी . इसके तहत अपराधी को मारने वाला प्रमोशन पा जाता है। कई बार उसे पुरस्कार भी मिल जाता है।

 लेकिन अब माहौल बदल चुका  है .अब पुलिस में कुछ ऐसे लोग भर्ती हो गए  हैं जिनको आउट ऑफ़ टर्न  प्रमोशन नहीं चाहिए . वे सीधे अपराधी से मिलकर धन इकठ्ठा करते हैं और अपराध से मिलने वाली कमाई के ज़रिये ऐश  करते हैं . उनकी  इस मानसिकता के कारण देश की राजकाज की पद्धति खतरे के दायरे में आ चुकी है . इससे बचने की ज़रूरत को सर्वोच्च प्राथमिकता  दी जानी चाहिए वरना देश क्रिमिनल  गवरनेंस  कि लपेट में आ जाएगा  जो देश के लिए बहुत ही चिंता की  बात है .कुछ देश  क्रिमिनल  गवर्नेंस के बोझ के नीचे आ चुके हैं और अपने देश को तबाह कर चुके हैं .  संयुक्त राष्ट्र में भी इस मामले पर चिंता  जतायी जा चुकी है . संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के देशों में अपराधहीन समाज की स्थापना के कार्यक्रम में जिस बात  पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है वह यह है कि सत्ता की बाग़डोर अपराधियों के हाथ में न जाने पाए . कुछ वर्ष पहले तक अफगानिस्तान की तालिबान और कोलंबिया के नशे और ड्रग के कारोबार वाले लोगों की सत्ता को क्रिमिनल गवर्नेस के उदाहरण के तौर पर बताया जाता था. लेकिन अब यह  ' क्रिमिनल  गवर्नेंस ‘ वाली बात पूरी दुनिया में फैल रही है . पाकिस्तान में भी जिस तरह से उदारवादी विचारों वाले लोगों को चुन चुन कर  मारा  जा रहा  हिया ,उस से साफ़ संकेत मिलते हैं कि अब पाकिस्तान में भी  ' क्रिमिनल  गवर्नेंस का राज आ चुका है . धार्मिक बुनियाद पर जिस तरह से पाकिस्तानी फौज़ का अपराधीकरण हुआ है ,वह निश्चित रूप से चिंता का विषय है . अफ्रीका के ज्यादातर देश इसी  ' क्रिमिनल  गवर्नेंस ' के शासन के शिकार हुए हैं . लेकिन यह बात देखना ज़रूरी है कि सत्ता एक दिन में अपराधी नहीं हो जाती . उसके  लिए ज़रूरी है कि  जनता कई दशक तक इस बात से बेफिक्र रहे कि कौन राज करने आ रहा है . कोई नृप होइ हमैं  का हानी की मानसिकता देश में अपाधियों को सत्ता के केंद्र में ला देती है .उत्तर प्रदेश के चौबेपुर थाने का  हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे इसी मानसिकता की पैदावार है .  साठ के दशक तक अपराधी चोरी छुपे नेताओं के यहाँ जाते थे. उनका सबसे बड़ा काम यह होता था कि मुकामी दरोगा से यह कह दिया जाय कि जब वह अपराधी पकड़ा जाय तो उसकी पिटाई न हो . लेकिन सत्तर के दशक में अपराधियों की भर्ती भी शुरू हो गयी. नतीजा यह हुआ कि जो अपराधी नेता के पीछे रहता था ,वह आगे आ गया और असली नेताओं को अपने टिकट के लिए उसी अपराधी के दरबार में हाजिरी देनी पड़ने लगी . अपराधी  प्रवृत्ति के लोग सत्ता के केंद्र में हैं और हर पार्टी में हैं .  पिछले तीस वर्षों के  अपराधों में राजनीतिक नेताओं के शामिल होने की घटनाओं पर एक नज़र डालें तो समझ में आ जाएगा कि देश की राजनीति क्रिमिनल  गवर्नेंस की दिशा में तेज़ी से  बढ़ रही है . जरूरत इस बात की है कि इस देश का बहुत बड़ा मध्य वर्ग सामने आये और  अपने भविष्य को सुधारने के यज्ञ में शामिल हो जाए. राजनीति में अपराधियों के प्रवेश को रोकने का सबसे आसान तरीका यह है कि अगर कोई राजनीतिक पार्टी किसी अपराधी को जिताऊ उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारे तो उसको हरा दे . लेकिन इसके लिए  जाति, धर्म  आदि को भुलाकर योग्य उम्मीदवार को चुने . आगर ऐसा न हुआ तो सत्ता में बैठे आपराधिक  पृष्ठभूमि के राजनेता अपराधियों के ज़रिये आतंक का राज कायम करने में सफल होंगे और देश का बहुत नुक्सान होगा .

चंद्रशेखर की नसीहत - धर्मनिरपेक्षता आज़ादी की लड़ाई की विरासत है उसको संभाल कर रखना चाहिए

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शेष नारायण सिंह 


अख़बारों में तो नहीं लेकिन सोशल मीडिया में स्व चंद्रशेखर का ज़िक्र छाया हुआ  है .उनकी मृत्यु को तेरह साल हो गए . तब तो नहीं लेकिन अब समझ  में आने लगा है कि उनके साथ ही एक बहुत बड़ी लोकशाही मूल्यों की परम्परा भी चली गयी . चंद्रशेखर मूल रूप से   सोशलिस्ट थे. इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में  १९५० में आचार्य नरेंद्र देव के संपर्क में आये और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ( प्रसोपा) के सदस्य हो .लेकिन जब १९५५ में कांग्रेस ने सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़  डेवलपमेंट का प्रस्ताव अपने अवाडी कांग्रेस में पारित किया तो समाजवादियों में कांग्रेस के प्रति आकर्षण शुरू हो गया . उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष उच्छंग राय ढेबर थे .  नेहरू के मित्र थे .माना जाता  है यह प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू के कारण ही पास  हुआ था क्योंकि १९५१ से १९५ तक वे ही कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे . बाद  १९५६ में संसद में भी सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़   सोसाइटी की स्थापना के लिए प्रस्ताव पारित हुआ और भारत के विकास के लिए समाजवादी मूल्यों को स्थाई भाव के रूप में स्वीकार कर लिया गया . सोशलिस्ट  पार्टी वैसे भी कांग्रेस की कोख से ही जन्मी थी . १९३४ में कांग्रेस में प्रभावशाली हो रहे पुरातन पंथी सोच के नेताओं पर नियंत्रण रखने के लिए कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हो गयी थी. यह अलाग से कोई पार्टी नहीं थी . कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में आचार्य नरेंद्र देव , राम मनोहर लोहिया , जयप्रकाश नारायण और ई एम एस नम्बूदिरीपाद जैसे बड़े समाजवादी शामिल थे . उस वक़्त के अखबारों को देखने से पता लगता   है कि जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस भी इस फोरम को समर्थन देते थे . हालांकि वे लोग इस मंच में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुए थे.
कांग्रेस और आज़ादी की लड़ाई  के कार्यक्रमों में  समाजवादी तरीके से विकास कांग्रेस के कराची अधिवेशन में १९३१ में ही स्वीकार कर लिया गया था. उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे . बाद में उनकी समाजवादियों से कोई सहानुभूति नहीं रही. इतिहास के जानकार बताते हैं कि कराची अधिवेशन का प्रस्ताव भी जवाहरलाल के कारण ही पास हुआ था क्योंकि सरदार के पहले १९२९ और १९३० में जवाहरलाल कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे . महात्मा गांधी  भी  उस  सम्मेलन में मौजूद थे . सबको मालूम है कि उनकी मर्जी के बिना उन दिनों कोई भी प्रस्ताव पास नहीं किया जा सकता था. 
१९५६ में जब भारतीय संसद ने सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़ सोसाइटी की बाद की तो बहुत सारे समाजवादी नेता  अपनी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने लगे . अशोक मेहता के नेतृत्व में समाजवादी नेताओं की बड़ी खेप कांग्रेस में शामिल हुई. उन दिनों आज की तरह गद्दी के लिए लोग पार्टी नहीं बदलते थे . जब अशोक मेहता और उनके साथियों की  समझ में आ गया  कि सत्ताधारी पार्टी ही उनके कार्यक्रमों को लागू करने के लिए तैयार है तो वे लोग कांग्रेस में शामिल हुए. उसी सिलसिले में नारायण दत्त तिवारी , चन्द्र शेखर आदि भी कुच्छ समय बाद कांग्रेस में शामिल हुए . बाद में  तो इंदिरा गांधी ने ४२वें संविधान संशोधन के ज़रिये सोशलिस्ट शब्द को संविधान की प्रस्तावना में भी डलवा दिया .हालांकि जब यह प्रस्ताव पास हुआ तो चन्द्र शेखर जेल में थे और कांग्रेस से निकाले जा  चुके थे .
चंद्रशेखर का व्यक्तिव  अपने देश में लोकशाही के  मूल्यों को याद रखने का एक बेहतरीन तरीका है . वे हमेशा लोकतंत्र की मान्यताओं के लिए संघस्ढ़ करते रहे . नेहरू की मृत्य के बाद कांग्रेस में जो राजनीतिक शक्तियां उभरने लगीं वे पूंजीवादी राजनीति को समर्थन करने वाली थीं. कांग्रेसी सिंडिकेट ने कांग्रेस की राजनीति को पूरी तरह से काबू में कर लिया . सिंडिकेट से इंदिरा गाँधी ने बगावत तो किया लेकिन वे भी पुत्रमोह के चलते आम आदमी की समस्याओं के पूंजीवादी हल तलाशने लगीं .नतीजा यह हुआ  कि चन्द्र शेखर जी को जय प्रकाश नारायण के  नेतृत्व में चल रहे तानाशाही विरोधी आन्दोलन का साथ देना पड़ा. चन्द्रशेखर हमेशा से ही धर्मनिरपेक्ष  राजनीति के पक्षधर रहे थे लेकिन अजीब इत्तेफाक है कि जिस साम्प्रदायिक राजनीति का चन्द्रशेखर जी  ने हमेशा ही विरोध किया था उसी राजनीति के पोषक लोग जेपी के आन्दोलन में बहुमत में थे.  गुजरात से लेकर बिहार तक आर एस एस वाले ही  कंट्रोल कर रहे थे . बाद में जो सरकार बनी उसमें भी आर एस एस की सहायक पार्टी जनसंघ वाले ही हावी थे. चन्द्रशेखर और मधु  लिमये ने आर एस एस को एक राजनीतिक पार्टी बताया और कोशिश की कि जनता पार्टी के सदस्य किसी और पार्टी के सदस्य न रहें . लेकिन आर एस एस ने जनता पार्टी ही तोड़ दी और अलग भारतीय जनता पार्टी बना ली. लेकिन चन्द्र शेखर ने अपने  उसूलों से कभी समझौता नहीं किया .
१९९० में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के विश्वासमत के प्रस्ताव पर  चंद्रशेखर का भाषण एक ऐहासिक दस्तावेज़ है .उस भाषण में ही उन्होंने कहा था कि देश की एकता और लोकशाही की  रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्षता  बहुत ही ज़रूरी है . उन्होंने कहा कि मुझे  अत्यंत दुःख के साथ इस बहस में हिस्सा  लेना पड़  रहा है तो सदन में बैठे लोगों ने उस स्टेट्समैन के दर्द  का अनुभव किया था. गैलरी  में बैठे लोगों ने भी सांस खींच कर उनके भाषण को सुना. उन्होंने कहा कि जब ग्यारह महीने पहले हमने देश को बचाने के लिए बीजेपी से समझौता किया था .उस समय सोचा था कि  देश संकट में है ,कठिनाई में है और उस कठिनाई से निकलने के लिए सबको साथ मिलकर चलना चाहिए .उन्होंने अफ़सोस जताया कि  ग्यारह महीने पहले देश की जो दुर्दशा  थी ग्यारह महीने बाद उस से बदतर हो गयी थी. उन्होंने पूछा कि क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में आतंक  बढा है क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में विषमता बढ़ी है क्या यह सही नहीं है कि बेकारी बेरोजगारी,मंहगाई बढ़ी है ,,क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में सामाजिक तनाव बढ़ा है .क्या यह सही नहीं है कि पंजाब पीड़ा से कराह रहा है ,क्या यह सही नहीं है कश्मीर में आज वेदना है.क्या यह सही नहीं है कि असम में आतंक बढ़ रहा है ,क्या यह सही नहीं है कि देश के गाँव गाँव में धर्म और जाति के नाम पर आदमी ही आदमी के खून का प्यासा हो रहा  है . उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री से कहा कि संसद और देश को चलाना कोई ड्रामा नहींहै इसलिए गंभीरता  हर राजनीतिक काम के बुनियाद में होनी  चाहिए . 

लोकसभा के उसी  सत्र के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हटा दिया गया था .चन्द्रशेखर जी ने साफ़  कहा कि सिद्धांतों की बात करने वाले  विश्वनाथ प्रताप सिंह धर्मनिरपेक्षता का सवाल क्यों नहीं उठाते.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि धर्म निरपेक्षता मानव संवेदना की पहली परख है .  जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.इसी भाषण में चन्द्र शेखर जी ने बीजेपी की राजनीति को आड़े हाथों लिया था .  उन्होंने कहा कि मैं आडवाणी जी से ग्यारह महीनों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि   बाबरी मस्जिद  के बारे में सुझाव देने  के लिए एक समिति बनायी गयीउस समिति से भारत के गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को हटा दिया जाता है . बताते चलें  कि  उस वक़्त गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव थे. चन्द्र शेखर जी ने आरोप लगाया कि इन लोगों को इस लिए हटाया गया क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद् के कुछ नेता उनकी सूरत नहीं देखना चाहते.क्या इस  तरह से देश को चलाना है . उन्होंने सरकार सहित बीजेपी -आर एस एस की राजनीति को भी घेरे में ले लिया और बुलंद आवाज़ में पूछा कि क्यों हटाये गए मुलायम सिंह क्यों हटाये गए मुफ्ती मुहम्मद सईद ,उस दिन किसने समझौता किया था चाहे वह समझौता विश्व हिन्दू परिषद् से हो ,चाहे बाबरी मस्जिद के सवाल पर किसी इमाम से बैठकर समझौता करो ,यह समझौते देश की हालत को  रसातल में ले जाने के लिए ज़िम्मेदार हैं .उन्होंने प्रधान मंत्री को चेतावनी दी कि आपकी सरकार जा सकती है , उस से कुछ नहीं बिगड़ेगा .लेकिन याद रखिये कि जो संस्थाएं बनी हुई हैं ,उनका अपमान आप मत कीजिये . क्या यही परंपरा है कि बातचीत को चलाने के लिए राष्ट्रपति के पद का इस्तेमाल किया  जाय .शायद दुनिया के इतिहास में ऐसा कहीं भी नहीं हुआ होगा.कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यादेश लगाए जाएँ और २४ घंटों के अंदर उसको वापस ले लिया  जाए..उन्होंने कहा  कि यह तुगलकी मिजाज़ इस  देश को रसातल  तक पंहुचाएगा और देश को बचाने के लिए मैं तुगलकी मिजाज़ का विरोध करना अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानता  विश्वनाथ प्रताप सिंह ने  बीच में टिप्पणी कर दी और कहा कि सिद्धांत के चर्चे सरकारी पदों के गलियारों के नहीं गुज़रते हैं.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि चलिए मुझे मालूम है .सिद्धांत संघर्षों से पलते हैं और संघर्ष करना जिसका  इतिहास नहीं है वह सिद्धांतों की बात करता है . मैं उन लोगोंमें से  नहीं हूँ जो कि अपनी गलती को स्वीकार ही न करें . उन्होंने  प्रधान मंत्री से कहा कि जिस समय आप कुर्सियों से चिपके रहने के लिए हर प्रकार के घिनौने समझौते  कर रहे थे उस समय संघर्ष के रास्ते चल कर मैं हर  मुसीबत  का मुकाबला कर रहा था. आप सिद्धांतों की चर्चा हमसे मत करें .


विश्वनाथ प्रताप सिंह को चंद्रशेखर की यह नसीहत देश के सभी शासकों के लिए एक दिशानिर्देश बन सकता है . आज की राजनीतिक स्थिति भी ऐसी  है जिसमें आज़ादी की लड़ाई के मूल्यों को संभालकर रखने की ज़रूरत है . उन मूल्यों में  सर्वधर्म समभाव को प्राथमिकता दी गयी थी .  सत्ताधारी पार्टी  की विचारधारा ऐसी हो सकती है जिसमें धर्मनिरपेक्षता को वह स्थान न दिया जाता हो जो स्वंतंत्रता संग्राम का मूल भाव था लेकिन देश की एकता और अखण्डता के लिए यह ज़रूरी  है कि सबको साथ लेकर चला जाए.

स्व पुदई तिवारी की याद आषाढ़ में ज़रूर आती है


शेष नारायण सिंह


 जब भी  मानसून की पहली झमाझम बारिश होती है , मुझको अपने गाँव के आदरणीय बुज़ुर्ग स्व. पुदई तिवारी की बहुत याद आती  है. वे हमारे बाबू के मित्र थे और हमारे गाँव के मानिंद किसान थे .  उनका सरकारी नाम तो राम  सेवक तिवारी था लेकिन हर जगह उनको पुदई तिवारी नाम से ही पहचाना जाता था. यह लोग हन्या तिवारी हैं और ब्राह्मणों की   अगली   कतार के  माने जाते हैं .  .
एक कहावत है कि "तेरह  कातिक तीन अषाढ़ " .जब बारिश के पानी के सहारे खेती होती थीट्यूब वेल नहीं थे रबी में जौ  गेहूं ,मटर की सिचाई कुओं के पानी या तालाब के पानी से होती थी तब इस कहावत का बहुत मतलब होता  था . आम तौर पर अद्रा लगते ही मानसून की बारिश शुरू हो जाती थी ,और वह बारिश झूमकर होती थी. खेतों में पानी भर जाता था .ताल तलैया भी पानी से भर जाते थे . आम तौर पर आद्रा नक्षत्र जून के अंतिम सप्ताह में २२ जून के आसपास  लगता था. आषाढ़ के महीने में लगने वाले अद्रा को मानसून की आमद की घंटी भी माना जाता  था. चैत की दंवाई के बाद दशहरे के करीब एक महीने पहले  किसानों के हलवाहे अगर कहीं और काम करना चाहते थे तो अपने   किसान  को नोटिस  दे देते थे. दशहरे के दिन ही नए हलवाहे काम संभाल लेते थे . मानसून आने के साथ ही तीन दिन के अन्दर धान की बुवाई पूरी हो जाती है. इसीलिये  आषाढ़ के तीन दिन किसान के लिए  बहुत ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं . अगर इन तीन दिनों में कोई अड़चन आ गयी तो  आषाढी खेती की मुख्य फसल धान की कोई पैदावार नहीं मिलती थी .
ऐसे में ही 1965 में ऐन आद्रा के दिन हमारा बैल मर गया . हमारे हलवाहे दूलम थे . वे रोते हुए आये.  हम चारों भाई बहन भी बहुत दुखी थे. आषाढ़ में नया बैल खरीदे जाने में  भी थोड़ा समय तो लग ही जाता . वैसे भी आषाढ़  शुरुआत में कोई भी बैल बेचता नहीं था.  यह शाम की घटना है .रात में  झूमकर पानी बरसा. खेतों में पानी भर गया . उन दिनों धान की बुवाई के लिए पानी से भरे खेत में  ही हल चलाये जाते थे . पानी सूखने के पहले बीज खेत में पद जाना चाहिए होता था . सुबह खेतों में हल चलना था . लेकिन हमारे यहाँ तो बैल ही नहीं था.  सवेरे हमारे दूलम दौड़ते हुए आये और माई को बताया कि अपने खेत में  पुदई तिवारी  के हल चल रहे हैं . तिवारी जी हमारे  बाबू के हमउम्र भी थे और दोस्त भी थे. हुआ यह था कि  सारे गाँव  को पता चल गया था कि हमारे बैल नहीं हैं  लिहाजा हमारी धान की  बुवाई की सम्भावना  बिलकुल  नहीं थी. बाद में  रोपाई की जा सकती थी लेकिन तब तक धान की नहीं जड़हन की रोपाई का रिवाज़ था .अद्रा की पहली बारिश में लोग अपने अपने खेत में धान की बुवाई करते हैं . सब कर रहे थे लेकिन पुदई तिवारी ने अपने खेतों को दरकिनार करके हमारे खेत में अपने हल भेज दिया था . ज़ाहिर है , यह दोस्ती निभाने के चक्कर में  उनको घाटा हुआ होगा लेकिन उनकी शख्सियत की बुलंदी ही थी कि उन्होंने अपने दोस्त को  प्राथमिकता दी.
हमारे घर में  जब भी कोई परेशानी आती थी , तिवारी जी खड़े रहते थे . हमारे गाँव में सबसे अधिक ज़मीन उनके ही पास थी .  खेती के बल पर ही  शान से रहते थे . उनके बड़े बेटे , राम मिलन तिवारी मुझ उम्र में  बड़े हैं . जब मैं छठवीं में पढने गया  तो वे दसवीं जमात में थे  . स्कूल में  जब भी कोई मुझे परेशान करता , वे तुरंत उसको धमका देते थे . हाई स्कूल के  इम्तिहान के दौरान मैं बहुत बीमार हो गया . राम मिलन के रिश्तेदार और उनके हम उम्र माननीय उमाकांत मिश्र  के घर पर मैं रात में जाकर पढाई करता था .  बहुत मदद की उन्होंने .  किस्मत ऐसी थी कि परीक्षा  शुरू होने के एक महीने पहले मैं बीमार हो गया.   टायफायड हो गया था.  जिस दिन  इम्तिहान का पहला पर्चा था उसके तीन दिन पहले   मैं ठीक होकर  घर आया . सबको उम्मीद थी कि मैं उस साल इम्तिहान नहीं दूंगा  लेकिन मेरे पिताजी ने कहा कि जब आ गए  हैं तो इम्तिहान दे देना चाहिए . बेलहरी में मेरा कालेज थी. वहीं सेंटर भी था . नदी पार करके जाना होता था . मैं साइकिल चलाने  की स्थिति में नहीं था.  पैदल भी चलना पहाड़ था लेकिन बाबू ने फैसला  कर लिया और पुदई तिवारी ने मुझे पालकी पर   बैठाकर परीक्षा केंद्र तक भेजवा दिया .  
मेरे बचपन की जो यादें हैं उनमें एक है कि उनके घर जब  जब भी मैं  गया  , दही खाकर ज़रूर आया .  रात भर उपरी की आग में पके बादामी रंग के दूध की दही आज भी यादों में  ताजा है.  अब वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन अब भी उनके यहाँ जाता हूँ तो उनके बेटे पंडित राम मिलन के साथ बैठकर दही ज़रूर खाता हूँ .इस बार पंडित उमाकांत मिश्र के साथ गया था ,  भरपेट दही खाया और अपने बचपन की सुनहरी यादों में  डुबकी  लगाता रहा .
जब  भी हमारे यहाँ कोई संकट  आता था तो जो लोग सबसे पहले पंहुचते थे उनमें तिवारी जी का नाम   सबसे ऊपर है . अब वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके बेटे पं राम मिलन तिवारी अभी भी मुझे अपना सगा मानते हैं.  उनको आज के साठ साल पहले का हमारे परिवार का दुर्दिन याद है .  इसलिए जब हमारे  बच्चों के बारे में सुनते  हैं तो बहुत ही खुश होते हैं . अपने बच्चों को उन्होंने बहुत ही अच्छी  शिक्षा दिलवाई है और बच्चे जीवन में बहुत  अच्छा कर रहे  हैं. 

चीन से विवाद कूटनीतिक तरीके से हल किया जाना चाहिए , युद्ध को टालना देशहित में है



शेष नारायण सिंह

लदाख में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं  . चूशुल में कोर कमांडर  स्तर की बातचीत बेनतीजा रही है .सेना के सूत्रों के हवाले से अखबारों में खबर छपी है कि 15 कोर के कमांडर ले. जनरल हरिंदर सिंह और चीनी कमांडर मेजर जनरल लिउ लिन के बीच हुई ग्यारह घंटे की बातचीत में यह तय पाया गया कि स्थिति को सामान्य बनाने के लिए सेना और  राजनयिकों के बीच आगे भी  बातचीत की ज़रूरत है . साधारण भाषा में इसका  अनुवाद यह  है कि चूशुल की बातचीत में  दोनों ही पक्ष अपनी घोषित पोजीशन पर अड़े रहे और किसी भी निर्णय पर नहीं पंहुचे. बातचीत में  इस बात पर जोर दिया गया कि क्रमबद्ध तरीके से बढे हुए तनाव को कम करना सबसे ज़रूरी प्राथमिकता है . बातचीत शुरू होने के पहले भी यही  प्राथमिकता थी यानी इस बातचीत से तनाव की कमी के कोई संकेत नहीं आये हैं . इस बातचीत के बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और सेना प्रमुख हालात का जायजा लेने शुक्रवार को लदाख में हैं .वे    वहां तैनात सैनिकों  का उत्साहवर्धन भी करेंगे .अभी तक की बातचीत से किसी तरह की सहमति नहीं बनी  है . सेना के सूत्र बताते हैं कि सैनिकों को पीछे हटाने की प्रक्रिया बहुत ही पेचीदा होती है और उसमें समय लगता  है . इस बातचीत से एक बात तो साफ़ हो गयी कि चीन ने पैनगोंग झील और डेस्पांग में जिस भारतीय क्षेत्र पर अनधिकृत कब्ज़ा कर लिया हैवह वहां से हटने को तैयार नहीं है .यह दो इलाके ऐसे हैं  जहां दोनों ही पक्ष नियंत्रण रेखा ( एल ए सी ) की  अलग अलग परिभाषा करते हैं . अभी फिलहाल कोशिश यह  है कि ऐसी स्थिति बनाये रखी जाय  जिससे 15 जून को गलवान  घाटी में हुयी घटना की पुनरावृत्ति को रोका जा सके   जिसमें भारत की बीस वीर  सैनिक शहीद हो गए थे और चालीस से ऊपर  चीनी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी.   बातचीत में भारत की तरफ से  6 जून को हुई सहमति को लागू करवाने की कोशिश की गयी लेकिन चीनी रवैया ऐसा था जिसके कारण उस दिशा में कोई  प्रगति नहीं हो सकी. उलटे  चीन के  कब्जे वाले क्षेत्र में  उनकी सेना के बढ़ रहे जमावड़े से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि तनाव का माहौल लम्बा खिंच सकता  है.
चूशुल की बातचीत में कोई नतीजा न निकलने और रक्षामंत्री की लदाख यात्रा के बाद सहज ही अनुमान लगाया  जा सकता है कि तनाव बढ़ रहा है . भारतीय मीडिया  में रिटायर्ड फौजी अफसरों की युद्ध युद्ध की चीख भी बढ़   रही है . मीडिया की कृपा से देश में भी युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है . पाकिस्तान ने भी कश्मीर में  नियंत्रण रेखा के उस पार करीब बीस हज़ार अतिरिक्त  सैनिक तैनात कर दिया है . पाक अधिकृत कश्मीर में बनाये  गए पाकिस्तानी एयर  फोर्स के स्कार्डू बेस पर भी गतिविधियाँ तेज़ हो गयी हैं .  गिलगित  बाल्टिस्तान में भी  पाकिस्तानी सेना सक्रिय कर दी गयी है . सबको मालूम है कि पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था किसी  मामूली युद्ध  को भी नहीं झेल सकती लेकिन अपने आका चीन  के हुक्म से सीमा पर युद्ध का माहौल बनाने की उसकी कोशिश को कूटनीतिक और सैनिक मामलों के जानकार अच्छी तरह से समझ रहे हैं .इस बीच एशिया में चीन के खिलाफ अपने को मजबूत दिखाने के चक्कर में अमरीका  भी चीन और भारत को आमने सामने  लाने के  लिए बेताब दिख रहा है . ऐसा लगता है कि अमरीका की कोशिश है कि नए शीत युद्ध की अगर संभावना  बनती है तो भारत उसके साथ रहे. भारत के नेताओं को समझ लेना चाहिए कि  किसी भी संभावित शीत युद्ध में भारत का किसी भी तरफ होना उसके हित में नहीं है . जवाहरलाल नेहरू की निर्गुट विदेशनीति को जिंदा करने की कोशिश की जानी चाहिए .चीन के  59  ऐप बंद करके भारत ने चीन को यह संकेत दे दिया है कि अगर उसने सीमा पर तनाव कम नहीं किया तो उसको आर्थिक रूप से नुकसान पंहुचाया  जा सकता  है . ऐप बंद करने का असर भी चीन पर पड़ा है.  चीन की सरकार की सोच को बताने वाले अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारत को चाहिए कि वह  सीमा विवाद को  व्यापारिक संबंधों को  जोड़कर न देखे . ज़ाहिर है चीन अपने व्यापार को नुक्सान नहीं पंहुचाना चाहता . लेकिन भारत में चीन के खिलाफ बन रहे माहौल  के मद्देनज़र चीन को अपने कारोबारी पार्टनर के रूप में को रखना केंद्र सरकार के लिए असंभव होगा. शायद इसीलिये  चूशुल में बातचीन के नाकाम होने के बाद केंद्रीय सड़क परिवहनराजमार्ग और एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि अब देश में सड़क बनाने के लिए ऐसी किसी भी कम्पनी को ठेका नहीं दिया जाएगा जिसमें किसी चीनी कंपनी का कोई हिस्सा होगा. उन्होंने कहा कि  ''हमलोगों ने ये स्टैंड लिया है कि अगर चीनी कंपनियां ज्वाइंट वेंचर्स के ज़रिए हमारे देश में आना चाहती हैं तो हम इसकी भी अनुमति नहीं देंगे.'' ऐसा लगता  है कि  नितिन गडकरी का यह बयान भी चीन को सन्देश देने के   लिए ही है क्योंकि उन्होंने पी टी आई को दिए गए  इसी इंटरव्यू में संकेत दिया कि  फ़िलहाल केवल कुछ ही प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं जिनमें चीनी कंपनियां हिस्सेदार हैं लेकिन उनको ये टेंडर बहुत पहले  दे दिया गया था और काम लगभग पूरा होने वाला है . उन्होंने कहा कि चीनी कंपनियों के बारे में लिया गया फैसला मौजूदा और भविष्य के  ठेकों  पर लागू होगा. इसके पहले  संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी घोषित कर दिया था कि चीन के ऐप बंद करने के बाद उनके अन्य व्यापारिक हितों की समीक्षा भी की जायेगी .
कुल मिलाकर भारत और चीन के बीच तनाव  की स्थिति है . टीवी चैनलों की बात जाने दें तो सरकार भी  यही चाहती  है कि युद्ध को  टाला  जाय .  भारत  सरकार को मालूम है कि अपने देश की अर्थव्यवस्था अभी विश्व की महत्वपूर्ण ताक़त बनने की दिशा में बढ़ रही है . कोविड-19 के चलते देश के उद्योग धंधे बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं. अनलॉक की प्रक्रिया के तहत कारोबार को फिर से शुरू करने की कोशिश की जा रही है  लेकिन बहत सारे लोगों के रोज़गार ख़त्म होने के कारण  खाद्य सामग्री के अलावा किसी और चीज़ की मांग बाज़ार में नहीं है. मांग नहीं होगी तो कारखाने चालू करने से  भी क्या फ़ायदा होगा. केंद्र सरकार ने  नीतियों में ज़रूरी बदलाव करके ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की है कि  भारत में मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाया जा सके. यूरोप और अमरीका में आबादी का बड़ा हिस्सा यह मानता है कि कोरोना की बीमारी को चीन ने जानबूझ कर दुनिया के सर  पर लादा है .  पश्चिमी देशों में चीन के खिलाफ बहुत बड़ा जनमत  बन गया है .वहां की बहुत सारी कम्पनियां अभी तक  चीन में अपने   माल का उत्पादन करवा रही हैं . अब माहौल ऐसा है कि पश्चिमी देशों की कम्पनियां चीन से मैन्यूफैक्चरिंग हटाने की बात सोच रही हैं . भारत में उम्मीद की जा रही है कि अब वे कम्पनियां अपने मैन्यूफैक्चरिंग बेस भारत में बना दें . श्रम क़ानून और अन्य कानूनों में बदलाव करके भारत सरकार ने रास्ते भी खोले  हैं . जब से नरेंद्र मोदी आये हैं तब से मेक इन इण्डिया जैसे कार्यक्रमों के आधार पर भारत सरकार  ने प्रयास भी किये है . विदेशी पूंजी निवेश का वातावरण भी बनाया गया है  लेकिन अभी  अमरीकी कंपनियों ने भारत में मैन्यूफैक्चरिंग के लिए कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखाया  है . उसका एक  कारण  तो शायद  यहाँ की साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थिति ज़िम्मेदार है.क्योंकि देखा यह गया है कि चीन से जो भी कारखाने अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों ने हटाये हैं वे ज़्यादातर वियतनामताइवान, फिलिपीन्स ,बंगालादेश , दक्षिण कोरिया आदि की तरफ ही गए हैं  क्योंकि वहां  किसी तरह का साम्प्रदायिक संघर्ष नहीं है . भारत को उसमें कोई महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं मिला है. इन देशों की अर्थव्यवस्था  छोटी है  वह बड़ी मैन्यूफैक्चरिंग के कारखानों को ठीक से सम्भाल नहीं पायेंगे .इसलिए भारत  में कारखाने लगने की भारी संभावना  है . इस बीच अगर युद्ध  की  स्थिति बनती है तो हालात बहुत बिगड़ जायेंगे . क्योंकि किसी युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था का चौतरफा  नुक्सान होता है .उसको संभालने के लिए अतिरिक्त संसाधनों और पूंजी की दरकार होती है . युद्ध के बाद ससाधनों पर पर पडी मार को संभालने में बहुत समय और परिश्रम करना पड़ता  है.  जब भी देश को युद्ध से गुज़रना पड़ा  तो देश के संसाधन प्रभावित हुए  हैं . चीन के सन 62 के युद्ध के बाद तो देश की पूरी आर्थिक सोच ही बदल गयी थी. जब जवाहरलाल नेहरू औद्योगिक विकास की बुलंदियां तय कर रहे थे,  उत्तर से  दक्षिण, पूरब से पश्चिम खनिज संपदा के केन्द्रों पर उस खनिज से बनने वाले औद्योगिक उत्पाद के कारखाने  लगा रहे थे ,उसी बीच चीन का हमला हो गया .  सन 62 के उस हमले के बाद  उन्होंने देश के   विकास की प्राथमिकताओं को बदल दिया . आन्ध्र  प्रदेश विधानसभा के संयुक्त अधिवेशन में 27 जुलाई 1963 को दिया  गया उनका   भाषण देश के विकास के अभियान को तय करने की दिशा में   मील का पत्थर माना जाता है.  आज़ादी के बाद से ही जवाहरलाल औद्योगीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे थे . उनको  लगता  था कि चीन से दोस्ती के चलते  भारत पर उस तरफ से कोई हमला नहीं होने वाला है  . जैसी दोस्ती आज के चीनी नेता , शी जिनपिंग से  हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री की है उसी तरह की दोस्ती नेहरू की  चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई से थी . लेकिन हमला हुआ और देश की अर्थव्यवस्था पार भारी असर पडा . उसके बाद नेहरू की  देश के विकास के प्रति सोच बदल गयी  क्योंकि देश की गरीब  आबादी को भोजन की सुविधा भी नहीं थी. उन्होंने आन्ध्र प्रदेश विधानसभा के अपने भाषण में देश के आर्थिक विकास की भावी  दिशा की बुनियाद रख दी . उन्होंने कहा कि,"  मैं उद्योगों के  पक्ष में हूँ, स्टील प्लांट आदि लगते रहेंगे लेकिन मैं जोर देकर कहता हूँ कि खेती का महत्व उद्योगों से बहुत ही अधिक है " ( जवाहरलाल नेहरू , ए बायोग्राफी ,लेखक डॉ एस गोपाल  अंक 3 ,पृष्ठ 242).  उसके पहले नेहरू की सोच यह थी कि एक बार देश औद्योगिक मामलों में आत्मनिर्भर हो जाए, विदेशों पर निर्भरता ख़त्म हो जाए तो खेती को उसी जोश से सघन विकास का माध्यम  बनाया  जा सकेगा . लेकिन चीन के युद्ध ने उनकी सुविचारित सोच को भी बदल दिया .
आज देश आर्थिक विकास  के नए  माडल के सहारे चल रहा है . उसमें बहुत सारी  बाधाएं आई हैं. नोटबंदी और जी एस टी की जल्दबाजी में की गयी घोषणा के कारण आर्थिक विकास का पहिया कमज़ोर पड़ा है . कोविड-19 के कारण भी अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा घाटा  हुआ  है , बहुत बड़े पैमाने  पर मानवीय कष्ट की स्थिति  है. अगर  इसी समय एक युद्ध की भी  नौबत आ गयी तो आर्थिक विकास अवरुद्ध होगा. सरकार को चाहिए की युद्ध की स्थिति से बचने के लिए चीन से विवाद को सेना के ज़रिये नहीं , कूटनीतिक  रास्ते से  हल करने की कोशिश करे  क्योंकि अगर जंग टलती रहे  तो बेहतर है .

अर्धसत्य के आधार पर सरकार को घेरने की राहुल गांधी की कोशिश मुंह के बल औंधे पडी



शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली, १८ जून .कांग्रेस के नेता ,राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है .  विपक्ष के नेता के रूप में सरकार से सवाल पूछना उनका अधिकार है लेकिन अगर गलत  तथ्यों के आधार पर सवाल पूछे जायेंगे तो राहुल  गांधी ही जगहंसाई  होगी . इस बार भी वही हुआ है . उन्होंने सरकार से सवाल पूछा है कि गलवान घाटी में हमारे सैनिकों को निहत्था क्यों भेजा गया . सूचना क्रान्ति के इस दौर में सरकार के जवाब का इंतज़ार किये बिना  देश के लोग  ट्विटर और फेसबुक पर आ गए और उनको बताना शुरू कर दिया कि सेनाओं के पास हथियार होते हैं लेकिन १९९६ और २००५ में भारत और चीन के बीच इस तरह का समझौता हुआ है जिसके तहत एल ए सी के दो किलोमीटर के घेरे में कोई भी बन्दूक आदि नहीं चलाई जा सकती . वहां पर दोनों ही पक्षों को 'peace and tranquillity' बनाये रखना ज़रूरी होता है .इसीलिये जब विवाद हुआ तो हमारे सैनिकों ने किसी भी तरह के आग्नेयास्त्र का प्रयोग नहीं  किया .  १९९६ के 'peace and tranquillity'है समझौते में साफ़ साफ़ लिखा  है कि ,' एल ए सी के दो किलोमीटर के अन्दर कोई भी पक्ष गोली नहीं चलाएगा ,किसी  तरह का विस्फोट नहीं करेगा .  आमने सामने की मुठभेड़ की स्थिति में सैनिकों को आत्म नियंत्रण रखना पडेगा ." यही बात केंद्र सरकार में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी ट्वीट के ज़रिये राहुल गांधी को बताया दिया . गौरतलब है कि यह समझौता जब हुआ तो भारत के प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा थे और उनकी सरकार को कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी. राजीव गांधी की हत्या के बाद पी वी नरसिम्हाराव कांग्रेस  अध्यक्ष बनाए गए थे . हुआ यह था कि पी वी नरसिम्हाराव राजीव  गांधी के सलाहकारों से परेशान हो गए थे और १९९१ के चुनाव में उनको टिकट भी नहीं दिया गया था. वे अपना सामान  बांधकर वापस अपने  गाँव जाने की तैयारी में थे  लेकिन राजीव गांधी की हत्या के बाद उनको दस  जनपथ ने भरोसे का आदमी माना  और कांग्रेस अध्यक्ष और गठबंधन सरकार का प्रधानमंत्री बना दिया गया .उन दिनों दिल्ली में चर्चा हुआ करती थी कि  नरसिम्हाराव को इसलिए लाया गया है कि वे सोनिया गांधी के  भरोसे के आदमी  हैं  . सोनिया गांधी खुद तो राजीव गांधी की हत्या के बाद शोक में थीं और कांग्रेस के प्रबंधकों को उम्मीद थी कि जब भी सोनिया गांधी कांग्रेस के नेतृत्व करने का मन बनायेंगी , नरसिम्हाराव गद्दी छोड़ देंगे. लेकिन  सोनिया गांधी ने राजनीति में शामिल होने का फैसला नहीं किया और पी वी  नरसिम्हाराव पांच साल तक पार्टी   अध्यक्ष और प्रधानमन्त्री बने रहे . अपने कार्यकाल में नरसिम्हाराव ने बहुत सारे ऐसे   फैसले भी किये जो दस जनपथ की मर्जी के खिलाफ बताये जा रहे थे . उन्होंने अपने को एक स्वतंत्र राजनेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश  भी की .यह बात सोनिया जी के समर्थकों को पसंद नहीं आई. शायद इसीलिये जब  १९९६ के चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई तो नरसिम्हाराव को भी हटा दिया गया . बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर कांग्रेस ने जनता दल के नेतृत्व वाले गठबंधन की देवेगौडा सरकार को समर्थन देने का फैसला किया और कांग्रेस के अध्यक्ष पद का ज़िम्मा सीताराम केसरी  को दे दिया गया . केसरी जी को दस जनपथ की कठपुतली माना जाता था . हालांकि बाद में सीताराम केसरी से दस जनपथ नाराज़ हो गया तो उनको कांग्रेस के अध्यक्ष पद से १९९८ में हटा दिया गया .  कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में यही सीताराम केसरी एच डी देवेगौडा की सरकार को   समर्थन देने की राजनीति के मुखौटा थे . उनका हर काम  सोनिया गांधी और दस जनपथ की मंजूरी की मुहर लगने के बाद ही संपन्न किया जाता था . इसलिए चीन के साथ जिस समझौते पर देवेगौडा सरकार ने  दस्तखत किया था उसको सोनिया गांधी के समर्थन वाली सरकार ही माना जाएगा . १९९६ में जन चीन के राष्ट्रपति प्रधानमंत्री जियांग जेमिन भारत ए थे तो उन्होंने कांग्रेस के नेताओं से भी मुलाक़ात की थी .सितम्बर 1993 में जब भारत चीन से समझौता हुआ तो कांग्रेस की सरकार थी और तत्‍कालीन पीएम पीवी नरसिम्‍हा राव चीन भी  गए थे .२००५ में जो समझौता हुआ था उसको तो कांग्रेस की सरकार ने ही किया था और उस सरकार को सोनिया गांधी की मर्जी के बिना कोई भी फैसला लेने का अधिकार नहीं था. इसलिए राहुल गांधी को सरकार पर हमला  बोलते समय थोडा होमवर्क अवश्य कर लेना  चाहिए .

वैसे भी विदेश नीति और भारत के अन्य देशों से संबंधों के बारे में किसी पार्टी या किसी सरकार की नीति का कोई मतलब नहीं होता  . किसी भी पार्टी की  सरकार  हो लेकिन उसके देशहित में किये गए काम को सभी पार्टियां स्वीकार करती हैं और सत्ता में आने पर उसको लागू भी करती हैं.  राहुल गांधी की पार्टी की सरकारें जब भी चीन या पाकिस्तान की सरकारों के खिलाफ राष्ट्रहित में काम कर रही थीं तो उनको  समूचे विपक्ष ने समर्थन दिया था . लेकिन राहुल गांधी युद्ध की छाया में भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ  राजनीति करते हैं . उनकी बदकिस्मती  यह है कि अर्ध सत्य पर आधारित   तथ्यों को लेकर आते  हैं और अपनी किरकिरी करवाते हैं . इस बार भी वही हो रहा है .