Friday, December 20, 2019

मंहगाई पर फ़ौरन लगाम लगाना जनहित भी है और राष्ट्रहित भी



शेष नारायण सिंह


पुलवामा बालाकोट,ट्रिपल तलाक़,  370 और अब नागरिकता बिल पर पिछले आठ महीने से सरकार का ध्यान लगा  हुआ है .  यह भावनात्मक मुद्दे हैं. इनकी चर्चा के आम आदमी को प्रभावित करने वाली वे बातें विमर्श के केंद्र में नहीं आतीं जिनके बहुत ही दूरगामी परिणाम होने वाले हैं .मीडिया और देश इन मुद्दों पर लगातार चर्चा कर रहा  है . इन ज़रूरी मुद्दों के बीच हर चीज़ पर जो महंगाई का हमला लगभग रोज़ ही हो रहा है वह सार्वजनिक विमर्श के बाहर रह रहा है . पिछले दो वर्षों  में महंगाई ने जिस तरह से आम जनजीवन को तबाही की तरफ डाल दिया है उसपर भी मीडिया और जनता के बीच चर्चा होना बहुत ज़रूरी है . चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है इसलिए लगभग हर हफ्ते पेट्रोल की बढ़ रही कीमतें  दबे पाँव आ  जाती हैं और  जनता को गरीब  और मजबूर बनाती रहती  हैं . देश का प्रभावशाली मीडिया सरकारी एजेंडे के अनुसार  आचरण करता है. ज़रूरत इस बात की है कि आम आदमी की तकलीफों को बहस की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जाए .
 
पिछली छः तिमाहियों ने सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर में लगातर कमी आ  रही है. विश्वविख्यात रेटिंग एजेंसी  मूडीज़ ने अगली  तिमाही और पूरे साल के भारत सबंधी अपने आकलन को फिर से संशोधित कर दिया है . और आगाह किया है कि लगातार घट रही विकास दर और भी घटेगी .इस बीच केंद्र सरकार ने महंगाई की खेप दर खेप आम आदमी के सिर पर लादने का सिलसिला जारी रखा हुआ  है. प्याज सहित खाने की हर चीज़ की महंगाई की ज़द में है . पेट्रोल की  कीमतें भी देश की बड़ी आबादी को कहीं का नहीं छोड़ रही हैं. हर हफ्ते  पेट्रोल की कीमत बढ़ती रहती है . जब कभी एकाध बार दो तीन पैसे प्रति लीटर की कमी की घोषणा हो जाती है तो बीजेपी और सरकार के प्रवक्ता उसका प्रचार शुरू कर देते हैं .सचाई यह है कि पेट्रोल की बार बार बढ़ रही कीमतों का महंगाई बढ़ने में बहुत बड़ा योगदान होता  है .फौरी तौर पर गरीब तो सोच सकता है कि बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमतों से उनका क्या लेना देना लेकिन सही बात यह है कि पेट्रोल डीज़ल और बिजली की कीमत बढ़ने से सबसे ज्यादा तकलीफ गरीब आदमी ही झेलता है. आज की यह मंहगाई निश्चित रूप से कमर तोड़ है और उसमें ढुलाई की कीमतों का बड़ा योगदान है .

पचास साल पहले पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण था .अर्थव्यवस्था को सही तरीके से चला पाने में असमर्थ सरकार ने पेट्रोल के दाम बढाकर चीज़ों को सँभालने की कोशिश की थी. हुआ यह था कि १९६७ के अरब-इजरायल यद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़  गयी थीं. भारत में सब्सिडी पर डीज़लपेट्रोल और किरोसीन बेचा जाता था . आयातित कच्चे तेल में  भारी वृद्धि के  कारण दाम बढ़ाना ज़रूरी था लेकिन उसकी राजनीतिक कीमत थी और वह सरकार को झेलनी पडी थी .उस वक़्त के  मीडिया ने इसकी विषद विवेचना की थी .साल  १९६९ में जब प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाँधी ने डीज़ल और पेट्रोल की कीमतों में मामूली वृद्धि की थी तो साप्ताहिक ब्लिट्ज के संपादक रूसी के करंजिया ने अपने अखबार की हेडिंग लगाई थी कि पेट्रोल के महंगा होने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होगा सबसे बड़ी चपत उसी को लगेगी . उन दिनों लोगों की समझ में नहीं आता था कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी कैसे प्रभावित होगा. आर के करंजिया ने अगले अंक में ही बाकायदा समझाया था कि किस तरह से पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी प्रभावित होता है . उन दिनों तो उनका तर्क ढुलाई के तर्क पर ही केंद्रित था लेकिन उन्होंने समझाया था कि डीज़ल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ने या घटने का लाभ या हानि आम आदमी को सबसे ज्यादा होता है .

आज की हालात अलग हैं . आज की मंहगाई जनविरोधी नीतियों की कई साल से चली आ रही गलतियों का नतीजा है . विपक्ष की मुख्य पार्टी कांग्रेस है लेकिन वह अभी भी अपने आपको सत्ताधारी पार्टी जैसी ही मानती है और जनता की तकलीफ के सबसे ज़रूरी मुद्दे महंगाई पर किसी आन्दोलन की बात नहीं करती,सड़क पर जाने की बात सोचती ही नहीं  .जबकि डॉ मनमोहन सिंह के समय मुख्य विपक्षी पार्टी  बीजेपी-आरएसएस हुआ करती थी और वह महंगाई के हर मुद्दे पर सड़क का मैदान ले लेती थी . समझ में नहीं आता की मौजूदा विपक्षी पार्टियों की समझ में यह बात कब आयेगी कि संकट की हालात की शुरुआत में  ही सरकार की नीतियों के खिलाफ जागरण का अभियान शुरू कर देने से आम आदमी की जान महंगाई के थपेड़ों से बचाई जा सकती है. पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि तो ऐसी बात है जो सौ फीसदी सरकारी कुप्रबंध का नतीजा है . अगर कांग्रेस के शुरुआती दौर की बात छोड़ भी दी जाए जब घनश्याम दास बिड़ला की अम्बेसडर कार को जिंदा रहने के लिए अपने देश में कारों का वही इंजन चलता रहा जिसे बाकी दुनिया बहुत पहले ही नकार चुकी थी क्योंकि वह पेट्रोल बहुत पीता था . अम्बेसडर कार में वही इंजन चलता रहा लेकिन कांग्रेस में बिड़ला की पंहुच इतनी थी कि सरकारी कार के रूप में अम्बेसडर ही चलती रही . बहरहाल यह पुरानी बात है और उसके लिए ज़िम्मेदार किसी को भी ठहरा लिया जाए लेकिन इतिहास बदला नहीं जा सकता ,उससे केवल सबक लिया जा सकता है . केंद्र सरकार का मौजूदा रुख निश्चित रूप से अजीब है  क्योंकि वह पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों के बढ़ने से होने वाली महंगाई को रोकने की दिशा में कोई पहल करने की बात तो दूर   उसको स्वीकार तक नहीं कर रही है . बहुत मेहनत से इस देश में पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ था लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन और उदारीकरण की आर्थिक नीतियों  के दौर में डॉ मनमोहन सिंह की  सरकार ने ही  आर्थिक विकास में सबसे ज्यादा योगदान कर सकने वाली कंपनियों को पूंजीपतियों को सौंपने का सिलसिला शुरू कर  दिया  था  वह प्रक्रिया आज भी जारी है यह अलग बात है कि कभी देश की शान रही एयर इंडिया जैसी लाभ कमाने वाली  कंपनी की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उसे बिक्री के लिए बाज़ार में लाया  गया तो  कोई खरीदने के लिए  तैयार नहीं हुआ. सरकार उसको बेचने पर आमादा है . जाहिर है इस बार औने पौने दाम पर उसको निपटा दिया जाएगा . कभी देश को पेट्रोलियम  की खोज की दिशा में आत्मनिर्भर बनाने वाली सरकारी कंपनी ,ओ एन जी सी और अन्य पेट्रोलियम कंपनियां  अब घाटे में हैं और बिक्री के लिए विनिवेश के बाज़ार में सौदा बन सकती हैं .  कई बार तो ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन अब सरकार के काबू से बाहर जा चुका है . आर्थिक उदारीकरण के बाद  पिछले २५  वर्षों में कार्पोरेट जगत के पास इतनी  ताक़त आ  गयी है कि अब वे हर क्षेत्र में सरकार और उसकी नीतियों को नज़रअंदाज़ करने और चुनौती देने की स्थिति में आ गए हैं और  मनमानी कर सकने की स्थिति में हैं . सरकार के पास निजी पूंजी को काबू कर सकने की ताक़त अब बिलकुल नहीं है .

इस पृष्ठभूमि में बढ़ती कीमतों के अर्थशास्त्र को समझने की ज़रुरत है . दुर्भाग्य यह है कि देश का मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व कुछ भी कंट्रोल कर पाने की स्थिति में नहीं है . ऐसे ही हालात यू पी ए-२  सरकार के समय में २००९ से ही शुरू हो गए थे  और २०११ आते आते त्राहि त्राहि मच गयी थी . हालांकि उस वक़्त तर्क यह दिया गया था कि गठबंधन सरकार की अपनी मजबूरियां होती हैं . लेकिन सचाई को सार्वजनिक रूप से कोई भी स्वीकार  करने के लिए तैयार नहीं था.  जबकि सरकारी नेता  मानते थे  कि कीमतों को बढ़ना राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करता  है . २०१२ में  ही तत्कालीन विपक्षखासकर बीजेपी-आरएसएस का महंगाई के खिलाफ अन्ना हजारे वाला आन्दोलन चल पड़ा और कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को  भ्रष्टाचार का पर्यावाची बना दिया गया . तत्कालीन सी ए जी विनोद राय ने टू जी स्पेट्रम घोटाले  के पौने  दो लाख करोड़ रूपये के घोटाले का हथियार भी पब्लिक डोमेन में डाल दिया कामनवेल्थ खेलों के घोटाले को भी बड़ा रूप दे दिया गया और उसके सर्वेसर्वा  सुरेश कलमाडी को जेल की हवा खानी पड़ी थी  . यह अलग बात है कि अभी तक  कामनवेल्थ खेलों के घोटालों के कथित अभियुक्तों को कोई सज़ा नहीं हुई है .  सी ए जी विनोद राय के पौने दो लाख  रूपये के टू जी स्पेक्ट्रम के घोटाले के आंकड़े भी मौजूदा सरकार के अधिकारियों की नज़र में फर्जी पाए  गए हैं लेकिन राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन में  उनका इतना बेहतरीन उपयोग  हुआ कि उस वक़्त के  विपक्ष को जनता ने देश की सरकार सौंप दी.

आज देश में उसी पार्टी की सरकार है जो उस वक़्त आन्दोलन की अगुवा थी . इसमें दो राय नहीं कि यह महंगाई और भ्रष्टाचार विरोधी उसी आन्दोलन के बाद सत्ता में आई है .  आज भी  जिस तरह से दाम बढ़ रहे हैं वे बहुत ही खतरनाक दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं . सरकार की आर्थिक नीतियाँ ऐसी  हैं कि आम आदमी के पास कुछ भी खरीदने के लिए पैसा नहीं है . उदारीकरण के बाद आम आदमी ने स्वीकार कर लिया था कि अब उसके मेहनत को पूंजीपति वर्ग के कारखानों के लिए कच्चा माल माना जाएगा और उस्सको जो  भी अपनी  मेहनत की कीमत मिलेगी ,वह कारखानों से निकले हुए माल के बाज़ार में खरीदारी के काम आयेगी . नोटबंदी के बाद जो बहुत बड़े पैमाने पर बेरोजगारी आयी है उसके चलते गरीब की मेहनत के लिए कोई बाज़ार नहीं रह गया है . ज़ाहिर है उपभोक्ता वस्तुओं के खरीदार भी  कम हुए  हैं . सरकार सप्लाई साइड में तो  पब्लिक का पैसा झोंक  रही है लेकिन उससे कोई रोज़गार नहीं पैदा हो रहा है  जिसके चलते आम आदमी के हाथ में कुछ सरप्लस आमदनी नहीं आ रही है .उसी आमदनी से तो कारखानों में बने हुए माल की डिमांड  बढ़ती है जो अब नहीं बढ़ रही  है.  अजीब स्थिति है .इससे बचने का एक ही  तरीका  है कि  सरकार ऐसी नीतियाँ लाये जिससे यह आगे कुआं और पीछे खाईं वाली स्थिति को संभाला जा सके .

दुनिया भर के इतिहास से सबक लेने की ज़रूरत है . देखा गया है कि जब महंगाई कमरतोड़ होती  है तो शहरी आबादी के पास खाने पीने की भारी कमी हो जाती है . ऐसी हालत में  असंतोष बढ़ जाता है . अगर खाने की हर चीज़ नागरिकों की क्रय सीमा के बाहर हो जाती है तो आम आदमी लूट खसोट पर आमादा हो  जाता है .वह स्थिति अराजकता को जन्म देती है .इसलिए सरकार को चाहिए कि विवाद के नए नए मुद्दे पैदा करके जनता को उसमें भरमाये रखने  शुतुरमुर्गी  नीतियों को  छोड़ दे और तबाह हो रही अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश करें .  पाकिस्तान की  हालात को टीवी पर चर्चा के माहौल को बंद करें और आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करें. 

बंटवारा एक दर्द है जिसको सियासत चमकाने के लिए नहीं कुरेदा जाना चाहिए



शेष नारायण सिंह

नागरिकता संशोधन एक्ट २०१९ पास हो गया , राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी , गज़ट में भी छप गया और अब वह कानून बन गया . लेकिन उसके बाद देश के  पूर्वोत्तर राज्यों में भारी उथल पुथल है . इस कानून से नाराज़गी है.  असम में आबादी का एक बड़ा हिस्सा बगावत की राह पर है . त्रिपुरा में इंटरनेट बंद कर दिया गया है और पूरे राज्य में निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी है.  विदेशों में भी चर्चा है . मौजूदा सरकार के दोस्त समझे जाने वाले अमरीका के धार्मिक आजादी से सम्बंधित कमीशन ने बयान जारी किया है  जिसके अनुसार ” नागरिकता संशोशन विधेयक गलत दिशा में एक खतरनाक मोड़ है . यह भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के बहुलतावाद के खिलाफ है . उस संविधान में धर्म के परवाह किये बिना सब को कानून की नज़र में बराबरी की गारंटी दी गयी है ."  अपने विदेश मंत्रालय  ने अमरीका से आये इस बयान  को गलत बताया है .भारत के पड़ोसी और दोस्त बंगलादेश की सरकार ने भी इस कानून पर एतराज किया है और अपना विरोध दर्ज कराने के लिए उनके दो मंत्रियों ने अपनी भारत यात्रा को रद्द कर दिया है . इस विधेयक में जो खामियां हैं उनपर तो संसद में और पूरे देश में बहस चल ही रही है लेकिन जो  असम और अन्य राज्यों में  विरोध है , लगता है कि सरकार को उसका अनुमान नहीं था.
  
इस कानून को पास करवाने  के लिए लोकसभा में हुयी बहस के दौरान भारत के १९४७ में हुए बंटवारे पर भी खूब  चर्चा हुयी . संसद में दोनों सदनों में गृहमंत्री पर गलतबयानी का आरोप लगाया गया.  जब उन्होंने लोकसभा में कहा कि ,' आपको मालूम है कि यह बिल लाना क्यों ज़रूरी है ? " उन्होंने जवाब भी खुद ही दिया और कहा कि ,' अगर कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा न  किया होता ,तो इस बिल को लाने की ज़रूरत ही न पड़ती . कांग्रेस ने देश को धार्मिक आधार पर विभाजित किया "  सदन में मौजूद कांग्रेस के शशि थरूर ने उनके इस दावे का ज़बरदस्त विरोध किया . उन्होंने कहा कि धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे का समर्थन जिन्नाह ने किया था . धार्मिक आधार पर  देश की स्थापना आइडिया ऑफ़ पाकिस्तान है जबकि आइडिया ऑफ़ इण्डिया में एक  ऐसे मुल्क का तसव्वुर किया गया था जिसका स्थाई भाव धार्मिक बहुलता होगी . इतिहास को मालूम है कि तत्कालीन  हिन्दू महासभा के नेता वी डी सावरकर ने  भी उसी टू नेशन सिद्धांत  का ज़बरदस्त समर्थन किया था . सावरकर ने अंग्रेजों की वफादारी के चक्कर में  १९३७ में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में पार्टी के अहमदाबाद अधिवेशन में  जोर देकर कहा था कि हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग अलग राष्ट्र ( Nation ) हैं .इसलिए अगर किसी को धार्मिक आधार पर बंटवारे  के लिए गुनहगार माना जाएगा तो उसमें मुहम्मद अली  जिन्ना और विनायक दामोदर सावरकर के नाम ही सरे-फेहरिस्त होंगे .यह भी सच है  कि कांग्रेस ने कभी भी धार्मिक आधार पर बंटवारे का समर्थन नहीं किया . पाकिस्तान की स्थापना का आधार धार्मिक था लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्षता ही राज्य का धर्म स्वीकार की गयी . संविधान की प्रस्तावना में साफ़ साफ़ लिखा  है कि  ," हमभारत के लोगभारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्नसमाजवादी ,पंथनिरपेक्ष , लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिएतथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक न्यायविचारअभिव्यक्तिविश्वासधर्म और उपासना की स्वतंत्रताप्रतिष्ठा और अवसर की समताप्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में,व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वालीबन्धुता बढ़ाने के लिए,दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमीसंवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृतअधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।भारत की  आज़ादी की लड़ाई की यही विरासत है ..
  
धार्मिक आधार पर बंटवारे के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराने की गृहमंत्री अमित शाह की  बात को उनकी पार्टी के सबसे बुज़ुर्ग नेता ,लाल कृष्ण आडवाणी के सहयोगी सुधीन्द्र  कुलकर्णी ने भी गलत बताया है .  उन्होंने तो बहुत ही आक्रामक भाषा में  ट्वीट किया और कहा कि संसद के इतिहास में किसी मंत्री ने इतना बड़ा सफ़ेद झूठ कभी नहीं बोला क्योंकि कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे की बात तो दूर इस विचार को स्वीकार भी नहीं किया . डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी लिखा है कि जिस जनसंघ ( बीजेपी का पूर्व अवतार ) के लोग अखंड भारत के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं उनके पूर्वजों ने मुस्लिम लीग और ब्रिटेन को भारत का बंटवारा करने में मदद पंहुचाई है . डॉ बी आर आंबेडकर ने भी कहा था कि जिन्नाह और सावरकर एक  दूसरे के खिलाफ बोलते हैं लेकिन दो राष्ट्र सिद्धांत के मामले में दोनों एक दूसरे के साथ हैं . इसलिए कांग्रेस को किसी कीमत पर  धार्मिक आधार पर बंटवारे का दोषी नहीं माना जा सकता है .

पता नहीं क्यों हमारे हुक्मरान  मुल्क के बंटवारे की बात को राजनीतिक स्वार्थ के लिए आज 72 साल बाद भी छेड़ते रहते हैं . पाकिस्तान की स्थापना भारत की एक बड़ी आबादी के लिए दर्द की एक तकलीफदेह कहानी  भी है . जहां तक  दक्षिण एशिया के मुसलमानों की बात है उनेक साथ तो हर  स्तर पर धोखा  हुआ है.  1947 के पहले के अविभाजित भारत में रहने वाले मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बना कर पाकिस्तान की स्थापना की गयी थी. आखिर तकमुहम्मद अली जिन्ना ने यह नहीं बताया था कि पाकिस्तान की सीमा कहाँ होगी. क्योंकि अगर वे सच्चाई बता देते तो अवध और पंजाब के ज़मींदार मुसलमान अपनी खेती बारी छोड़ने को तैयार न होते और पाकिस्तान की अवधारणा ही खटाई में पड़ जाती. पाकिस्तान का बनना एक ऐसी राजनीतिक चाल थी जिसने आम आदमी को हक्का-बक्का छोड़ दिया था. इसके पहले कि उस वक़्त के भारत की जनता यह तय कर पाती कि उसके साथ क्या हुआ हैअंग्रेजों की शातिराना राजनीति और कांग्रेस और जिन्नाह वाली मुस्लिम लीग के  नेताओं की अदूरदर्शिता का नतीजा था कि अंग्रेजों की पसंद के हिसाब से मुल्क बँट गया.  मुसलामनों ने बंटवारे का दर्द सबसे ज़्यादा झेला है क्योंकि  हिन्दू और  सिख तो अपने परिवारों के साथ भारत आ गए लेकिन मुसलमानों के तो परिवार ही बंट गए .इस मजमून का उद्देश्य उस दर्द को और बढ़ाना नहीं है. हाँ यह याद करना ज़रूरी है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति चाहे जो हो, 1947 के बाद सरहद के इस पार बहुत सारे मुसलमानों के घरों के आँगन में पाकिस्तान बन गया है और वह अभी तक तकलीफ देता है . दुनिया मानती है कि 1947 में भारत का विभाजन एक गलत फैसला था . बाद में तो बँटवारे के सबसे बड़े मसीहामुहम्मद अली जिन्ना भी मानने लगे थे कि पाकिस्तान बनवाकर उन्होंने गलती की ..विख्यात इतिहासकार अलेक्स वोन टुंजेलमान ने अपनी किताब , " इन्डियन समर, : द सीक्रेट हिस्टरी ऑफ़ द एंड ऑफ़ ऐन एम्पायर (Indian Summer: The Secret History of the End of an Empire.) "  में लिखा  है कि अपने आखिरी वक्त में जिन्ना ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान से कहा था कि पाकिस्तान बनाना मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी है। अगर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली जाकर जवाहरलाल से कह दूंगा कि गलतियां भूल जाओ और हम फिर से दोस्तों की तरह रहें.  लेकिन यह मौक़ा कभी नहीं मिला . वैसे भी पछताने से इतिहास के फैसले नहीं बदलते ..

जब जिन्नाह ने आवाहन किया कि पाकिस्तान में मुसलमानों को नौकरी दी जायेगी तो नौकरी की लालच में उत्तर प्रदेश के बहुत सारे जिलों से नौजवान कराची चले गए थे .यहाँ उनका भरा पूरा परिवार था लेकिन बंटवारे के पूरी तरह से लागू हो जाने के बाद वे लोग वहां से कभी लौट नहीं पाए . उनके घर वालों ने वर्षों के इंतज़ार के बाद अपनी ज़िंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया लेकिन उसकी तकलीफ अब तक है..आज भी जब कोई बेटीजो पाकिस्तान में बसे अपने परिवार के लोगों में ब्याह दी जाती है जब भारत मायके आती है तो उसकी माँ उसके घर आने की खुशी का इस डर के मारे नहीं इज़हार कर पाती कि बच्ची एक दिन चली जायेगी. और वह बीमार हो जाती है . उसी बीमार माँ की बात वास्तव में असली बात है . नेताओं को शौक़ है तो वे भारत और पाकिस्तान बनाए रखेंराज करें ,सार्वजनिक संपत्ति की लूट करेंजो चाहे करें लेकिन दोनों ही मुल्कों के आम आदमी को आपस में मिलने जुलने की आज़ादी तो दें. अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान और हिन्दुतान सरहद पर तो होगा संयुक्त राष्ट्र में होगाकामनवेल्थ में होगा लेकिन हमारे मुल्क के बहुत सारे आंगनों में जो पाकिस्तान बन गया है वह ध्वस्त हो जाएगा.फिर कोई माँ इसलिए नहीं बीमार होगी कि उसकी पाकिस्तान में ब्याही बेटी वापस चली जायेगी . वह माँ जब चाहेगी ,अपनी बेटी से मिल सकेगी. इसलिए  राजनेताओं से गुजारिश की जानी चाहिए कि राजनीतिक प्वाइंट बनाने के लिए  बंटवारे के घाव को बार बार न  कुरेदें .

Wednesday, December 18, 2019

गांधी के लिबरल हिंदू धर्म और आर एस एस के कट्टर हिंदुत्व के बीच तय होगी देश की राजनीति


शेष नारायण सिंह

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार देश की राजनीति में एक बड़ी  राजनीतिक सोच का संकेत लेकर आई है। यह एक प्रयोग की तरह लगता है । साफ नजर आ रहा है कि अब कांग्रेस की सेकुलर राजनीति जवाहरलाल नेहरू की धर्म निरपेक्षता से थोड़ा दूर जा रही है। राजनीतिविज्ञान के जानकारों की समझ में आने लगा है कि सोनिया गांधी की कांग्रेस अब महात्मा गांधी की सेकुलर राजनीति को बड़े पैमाने पर अपनाने की तैयारी कर रही है जिसमे हिन्दू होने के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता के गांधी जी के मूल्यों को प्रमुखता दी जाएगी । 
महाराष्ट्र में एक नए तरह की राजनीतिक ताक़त के पास सत्ता आयी है . शिवसेना की मुस्लिम विरोधी राजनीति के चलते भारतीय राजनीति में बीजेपी के अलावा कोई भी उनको साथ लेने के लिए तैयार नहीं होता  था. शिवसेना के संस्थापक ,बाल ठाकरे  भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप का विरोध करते थे लेकिन सत्ता में आने के चक्कर में उसी   संविधान की शपथ लेकर एम पी एम एल ए ,निगम पार्षद आदि पदों पर शिव सेना के सदस्य पंहुचते भी रहे जिसका मुख्य फोकस सेकुलर राजनीति ही है .. सबको मालूम है कि यह एक विडम्बना ही थी क्योंकि इस देश में सत्ता पाने के लिए भारत के सेकुलर संविधान की रक्षा करने की शपथ लेनी ज़रूरी होती  है .  इस सब के बावजूद भी मुसलमानों का विरोध करने से शिवसेना के नेता बाज नहीं आ रहे थे . महाराष्ट्र में बीजेपी से उनका गठबंधन इसलिए टूटा क्योंकि शिवसेना इस बात पर आमादा थी कि मुख्यमंत्री उनका अपना ही कोई नेता बनेगा . बीजेपी के विधायकों की संख्या अधिक थी और बीजेपी इसी बुनियाद पर शिवसेना को मुख्यमंत्री पद देने को राजी नहीं थी . लेकिन शिवसेना ने सत्ता के लिए उन पार्टियों के सामने भी सहयोग की अर्जी लगाई जिनकी राजनीति का हमेशा से शिवसेना विरोध करती रही है. आज उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने हैं तो उनको मुसलमानों का दोस्त समझी जाने वाली   समाजवादी पार्टी का भी सहयोग मिला हुआ है . कांग्रेस ने सरकार का कामकाज  चलाने के  लिए बनाए न्यूनतम साझा  कार्यक्रम में धर्मनिरपेक्षता  की शर्त भी लगवा दी है . यानी  कट्टर हिन्दू राजनीति की समर्थक और सार्वजनिक रूप से धर्म निरपेक्षता की निंदा करने वाली  पार्टी का मुखिया  आज मुंबई में मुख्यमंत्री का काम सेकुलर राजनीति की अलमबरदार पार्टियों की कृपा से कर रहा  है  . मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सत्ता को सेकुलर बुनियाद पर चलाने  की शर्त को भी स्वीकार किया है .उनको मालूम है कि अगर   सेकुलर राजनीति से किनारा किया तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की गद्दी से भी अलविदा हो जायेगी .
 ऐसा लगता है  कि महाराष्ट्र में एक नई किस्म राजनीति जन्म ले रही है. बीजेपी की राजनीति को नकार देने के लिये उनकी  ही विचारधारा और उनके तीस साल पुराने साथी को तोड़कर एक नए किस्म की राजनीतिक ताक़त को शक्ल देने की कोशिश  शरद पवार और सोनिया गांधी ने किया है . जब भी केंद्र सरकार पर किसी ऐसी सत्ता की स्थापना हो जाती है जिसको  विपक्ष की ज़्यादातर पार्टियां सही नहीं मानतीं तो उनके सामने एकजुट होने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. यह बात आज़ादी के बाद भी हुयी थी. आज़ादी के बाद  सोशलिस्टों को लगा था कि जवाहरलाल नेहरू की  नीतियां आज़ाद भारत के लिए ठीक नहीं हैं . कांग्रेस से अलग पहले ही हो चुके थे . सोशलिस्ट पार्टी ने तय किया कि १९५२ के  आम चुनावों में कांग्रेस को चुनौती देनी ज़रूरी है . लेकिन कांग्रेस और उसके नेता जवाहरलाल नेहरू की आंधी के सामने सब बुरी तरह से हार गए . आज जो स्थिति लोकसभा में कांग्रेस की है ,लगभग वही स्थिति सोशलिस्टों की  १९५२ के चुनाव में थी . पांच साल बाद १९५७ के चुनाव में नेहरू और उनकी कांग्रेस बहुत ही मजबूती से चुनाव में कामयाब रहे . सोशलिस्ट नेता जयप्रकश नारायण तो पहले चुनाव के बाद ही चुनावी राजनीति से अलग हो चुके थे . १९५६ में आचार्य नरेंद्र देव की भी मृत्यु हो चुकी थी . डॉ राम मनोहर लोहिया और अशोक मेहता बचे थे .जब जवाहरलाल नेहरू ने   सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ़ सोसाइटी की बात करना शुरू किया तो बड़ी संख्या में समाजवादियों का झुकाव उनकी तरफ होने  लगा और १९६२ के चुनाव में कांग्रेस की  भारी जीत के बाद अशोक मेहता के नेतृत्व में  बड़ी संख्या में  समाजवादियों ने   कांग्रेस की सदस्यता ले ली . डॉ राम मनोहर लोहिया को भरोसा हो गया कि कांग्रेस को हराना सोशलिस्टों के बस की बात नहीं है . उन्होंने कांग्रेस पार्टी को हराने के लिए एक वैकल्पिक राजनीतिक ताक़त की तलाश शुरू कर दी .डॉ  राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की अपनी राजनीतिक सोच को  बहस के दायरे में  डाल दिया और १९६३ में अपनी पार्टी के कलकत्ता  सम्मलेन में उन्होंने गैरकांग्रेसवाद की सोच को मंज़ूर करवा लिया . उसी साल लोकसभा की चार सीटों पर उपचुनाव हुए और डॉ लोहिया ने  राजाओं की समर्थक स्वतंत्र पार्टी , आर एस एस की सहयोगी  भारतीय जनसंघ के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया . किसी को विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि समाजवादियों ने हमेशा  आर एस एस और देसी राजाओं महाराजाओं का  विरोध  किया था . लेकिन डॉ लोहिया साफ़ देख रहे थे कि गैरकांग्रेसवाद के नाम पर सभी कांग्रेस विरोधी ताकतों को एक किये बिना कांग्रेस को हराना असंभव है . गैरकांग्रेसवाद के इस मंच ने उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद,अमरोहा ,जौनपुर और बंबई में १९६३ में हुए लोकसभा के उपचुनावों में हिस्सा लिया . संसोपा के डॉ लोहिया  फर्रुखाबाद ,प्रसोपा के आचार्य जे बी कृपलानी अमरोहा ,जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर और स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी मुंबई से गैर कांग्रेसवाद के उम्मीदवार बने . दीन दयाल उपाध्याय तो हार गए लेकिन बाकी तीनों विजयी  रहे .इसी प्रयोग के बाद  गैरकांग्रेसवाद ने एक शकल हासिल की और १९६७ में हुए आम चुनावों में अमृतसर से कोलकता तक के  इलाके में वह कांग्रेस विधानसभा के चुनाव हार गयी जिसे जवाहर लाल  नेहरू के जीवनकाल में अजेय माना जाता रहा था . १९६७ में संविद सरकारों का जो प्रयोग हुआ उसे शासन  पद्धति का को बहुत बड़ा उदाहरण तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह पक्का है कि उसके बाद से ही यह बात आम  जहनियत का हिस्सा बन गयी कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है .इस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं.
ऐसा लगता है कि २०१४ और २०१९ के  लोकसभा चुनावों में  नरेंद्र मोदी की बीजेपी की ताबड़तोड़ सफलता के बाद विपक्ष की समझ में यह बात आ गयी है कि   नरेंद्र मोदी को हराने के लिए कुछ गैर भाजपावाद जैसा प्रयोग करना पडेगा जसमें राजनीतिक  विचारधारा के विरोधी भी एक मंच पर आ सकें और बीजेपी को एकमुश्त चुनौती दे सकें . लगता है कि महाराष्ट्र में शिवसेना को अछूत मानने वाली समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने भी इसी सोच के तहत शिव सेना को समर्थन देने का फैसला किया है . कांग्रेस की एक और दुविधा थी . २०१४ के चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस के बड़े नेता , ए के एंटनी ने एक रिपोर्ट तैयार की थी  जिसमें कांग्रेस की हार के कारणों का विश्लेषण  किया  गया था . एक प्रमुख कारण यह बताया गया था कि  बीजेपी के पचीस साल से  अयोध्या की बाबरी मस्जिद के खिलाफ चल  रहे अभियान के चलते कांग्रेस की सेकुलर राजनीति को हिन्दू विरोधी सांचे में फिट कर दिया गया था . उसी लेबल से बचने की कोशिश में २०१४ के बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में कांग्रेस  अध्यक्ष ,राहुल गांधी कहीं  शिव भक्त के रूप में जाते थे तो कहीं जनेऊ धारी हिन्दू बनकर प्रचार करते थे . कांग्रेस के जिन नेताओं पर हिन्दू विरोधी होने का आरोप लगा था   उनमें  कांग्रेस  वर्किंग कमेटी के तत्कालीन सदस्य , दिग्विजय सिंह का  नाम सबसे  ऊपर था।  उसकी काट का  पारम्परिक तरीका अपनाया और साढ़े छः महीने में करीब तीन हज़ार किलोमीटर पैदल चल कर  नर्मदा  यात्रा की . अपनी पत्नी के साथ वे यात्रा पर निकल गए ,  मीडिया को दूर रखा , दिन में दो बार  नर्मदा जी की आरती की और जहां ,जहां गए सब को साफ़ नज़र आता रहा कि वे बीजेपी वालों से बड़े हिन्दू हैं .   आज किसी भी टीवी चैनल  वाले की हिम्मत नहीं है कि उनको हिन्दू विरोधी कह सके. राजनीति शास्त्र का प्रत्येक  छात्र जानता  है कि मध्य प्रदेश में  कांग्रेस की जीत में दिग्विजय सिंह  की नर्मदा यात्रा का भी  योगदान है .  

 नरेद्र मोदी ने २०१४ और २०१९ के लोकसभा चुनावों में साबित कर दिया था कि  दिल्ली में सत्ता हासिल करने के लिए मुसलमानों के वोट की कोई ज़रूरत नहीं है . इसलिए अब हिंदुत्व की राजनीति इस देश की सत्ता के लिए ज़रूरी हो गयी थी .महाराष्ट्र के गठबंधन में सोनिया गांधी की कांग्रेस की शिरकत को इसी रोशनी में   देखने की जरूरत है . ऐसा लगता  है कि अब इस देश में सत्ता की राजनीति करने वाले पार्टियों को  दो वर्ग में रखा जायेगा. एक तो कट्टर हिंदुत्व की  समर्थक पार्टियां जो  मुसलमानों को घेरकर मार डालने की घटनाओं को सही ठहराती  हैं और दूसरी वे  पार्टियां जो हिन्दू समर्थक  तो हैं लेकिन लिबरल भी  हैं और महात्मा गांधी की तरह हिन्दू होते हुए   सबको बराबर का सम्मान देने की पक्षधर हैं . कांगेस के शिवसेना के साथ जाने की राजनीति में मुझे इसी तरह के संकेत नज़र आ रहे हैं . इस गठबंधन के बाद कांग्रेस ने यह सुनिश्चित किया है कि सत्ता  चलाने के लिए शिवसेना को अपनी कट्टर हिंदूवादी राजनीति को छोड़कर कॉमन मिनिमम  प्रोग्राम को मानना पड़ेगा  जिसका स्थाई भाव सेकुलर राजनीति  है. बाकी देश में  अब कांग्रेस के नेताओं को हिन्दू विरोधी सांचे से निकलने में महाराष्ट्र के गठबंधन से मदद  मिलेगी . मुसलमानों को भी यह तय करना पड़ेगा  कि कांग्रेस के विरोध की ओवैसी की राजनीति करेंगें जिसमें बीजेपी को चुनावी फायदा होता है या  एन सी पी नेता नवाब मालिक की राजनीति करेंगें जिससे बीजेपी को सत्ता से बाहर रखा जा सकता है .महाराष्ट्र को इस राजनीति की शुरुआत की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा सकता है .

Sunday, December 8, 2019

परमाणु हथियारों का ज़खीरा बनाने के लिए कुछ भी करने पर आमादा है पाकिस्तान


शेष नारायण सिंह 
पाकिस्तान के परमाणु हथियारों और सामूहिक तबाही के हथियारों के ज़खीरे पर एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा शुरू हो गयी है. जर्मनी से खबर है कि पाकिस्तान में अनधिकृत तरीके से यह काम किया जा रहा है . आशंका है कि पाकिस्तान जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में ऐसे लोगों और कंपनियों की तलाश कर रहा है जो परमाणु, जैविक और रासायनिक हथियारों को बनाने और उनको विकसित करने की टेक्नालोजी मुहैया करा सकें . जर्मनी की सरकार को विश्वास है कि पाकिस्तान की इन गतिविधयों में आजकल ज़बरदस्त तेज़ी आई है . अपने देश के एक विपक्षी सांसद के एक पत्र के जवाब में जर्मनी की सरकार ने यह जानकारी दी है . यह कोशिश कोई नई नहीं है . जर्मनी की  ख़ुफ़िया एजेंसी , बी एफ वी ने २०१८ में भी  रिपोर्ट दी थी कि पाकिस्तान बहुत समय से यह कोशिश कर रहा है . रिपोर्ट में बताया गया है कि इनका फोकस परमाणु हथियारों की टेक्नोलोजी पर ज़्यादा रहता है और यह कोशिश बहुत पहले से चल  रही है . उस रिपोर्ट में एक और दिल दहलाने वाली बात भी कही गई है . लिखा है कि पाकिस्तान  का सिविलियन परमाणु कार्यक्रम तो  है ही, उसकी एक बड़ी योजना इस बात की भी है कि परमाणु हथियारों का बड़ा ज़खीरा बनाया जाए . यह सारा कार्यक्रम भारत को टार्गेट करके चालाया जा रहा  है. जर्मनी की सरकार मानती है कि अभी पाकिस्तान के पास करीब १४० परमाणु हथियार हैं जिसको वह २०१५ तक २५० तक पंहुचा देना चाहता है .
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान पर बाकी दुनिया की नज़र पहली बार   पड़ी है . २०११ में भी अमरीका से इसी तरह की एक रिपोर्ट अमरीकी संसद में दी गयी थी. उस वक़्त अमरीकी थिंक टैंक , कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस  , ने बताया था कि पाकिस्तान के पास 90 और 100 के बीच परमाणु हथियार थे जबकि भारत के पास उससे कम थे . अब यही संख्या बढ़कर 140 हो गयी है . जिसे वह 250 तक ले जाना चाहता है .  कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस का काम काम दुनिया भर के मामलों से अमरीकी संसद के सदस्यों को आगाह रखना है . समय समय पर यह संगठन अपनी रिपोर्ट देता रहता है जिसका अमरीकी सरकार की नीति निर्धारण में अहम भूमिका होती है . २०११ में जब यह रिपोर्ट आई थी अमरीकी विदेश नीति के नियामकों के लिए भारी उलझन पैदा हो गयी थी . इस बात पर बहुत ही नाराजगी जताई गयी थी कि पकिस्तान के विकास के लिए दिया जा रहा धन  परमाणु हथियारों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है .

२०११ में अमरीकी संसद की इस रिपोर्ट के बाद  भारत में भी विदेश और रक्षा मंत्रालयों के आला अधिकारी चिंतित हो गए थे .. इतनी खतरनाक खबर से भरी हुई रिपोर्ट के आने के बाद चिंता होना स्वाभाविक था. उसी रिपोर्ट में लिखा हुआ था कि पाकिस्तान में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि वह उन हालात की फिर से समीक्षा की जाए जिनमें वह अपने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है . अब चिंता यह है कि परमाणु हमले की धमकी देने वाले उसके मंत्रियों की मंशा कहीं खतरनाक तो नहीं है . पाकिस्तान के एक मंत्री ने तो किलो आधे किलो के परमाणु बमों की बात भी करके अजीब स्थिति पैदा कर दी थी. अवाम तो यही समझ रहा था कि वह मंत्री कुछ खिसका हुआ है लेकिन सरकारी तत्र को मालूम था कि पाकिस्तान से आने वाले हर संकेत को हलके में निपटना खतरनाक हो सकता है .आज भी आशंका बनी हुयी है  कि वह मामूली झगड़े की हालात में भी परमाणु बम चला चला सकता है . अगर ऐसा हुआ तो यह मानवता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा होगा . रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि पाकिस्तान कम क्षमता वाले अपने परमाणु हथियारों को भारत की पारंपरिक युद्ध क्षमता को नाकाम करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है .

जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं उन्होंने यह ऐलान कर रखा है कि वे किन हालात में अपने हथियार इस्तेमाल कर सकते हैं . आम तौर पर सभी परमाणु देशों ने यह घोषणा कर रखी है कि जब कभी ऐसी हालत पैदा होगी कि उनके देश के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा तभी उनके परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होगा . लेकिन पाकिस्तान ने ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा नहीं बनायी है . उसके बारे में आम तौर पर माना जाता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम भारत को केंद्र में रख कर चलाया जा रहा है . रक्षा मामलों के जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान ने ऐसा इसलिए कर रखा है जिस से भारत और दुनिया के बाकी देश गाफिल बने रहे और पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर ब्लैकमेल के खेल में कामयाब होता रहे. कोई नहीं जानता कि पाकिस्तान परमाणु असलहों का ज़खीरा कब इस्तेमाल होगा . कोई कहता है कि जब पाकिस्तानी राष्ट्र के अस्तित्व पर सवाल खड़े हो जायेगें तब इस्तेमाल किया जाएगा. यह एक पेचीदा बात है . पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कई बार यह कहा है कि पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट है . क्या यह माना जाए कि पाकिस्तान अपने उन बयानों के ज़रिये परमाणु हथियारों की धमकी दे रहे थे . पाकिस्तानी सत्ता में ऐसे भी बहुत लोग है जो संकेत देते रहते हैं कि अगर भारत ने पाकिस्तान पर ज़बरदस्त हमला कर दिया तो पाकिस्तान परमाणु ज़खीरा खोल देगा. दुनिया के सभ्य समाजों में पाकिस्तानी फौज के इस संभावित दुस्साहस को खतरे की घंटी माना जा रहा है . पाकिस्तान में इस तरह की मानसिकता वाले लोगों पर काबू करने की ज़रुरत है . यह पाकिस्तान के दुर्भाग्य की बात है कि वहां इस तरह की मानसिकता वालों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है .लेकिन इस मानसिकता वालों की वजह से परमाणु तबाही का ख़तरा भी बढ़ गया है . भारत समेत दुनिया भर के लोगों को कोशिश करनी चाहिए कि पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी मानसिकता के लोग काबू में लाये जाएँ. हालांकि यह काम बहुत आसान नहीं होगा क्योंकि भारत के खिलाफ आतंक को हथियार बनाने की पाकिस्तानी नीति के बाद वहां का सत्ता के बहुत सारे केन्द्रों पर उन लोगों का क़ब्ज़ा है जो भारत को कभी भी ख़त्म करने के चक्कर में रहते हैं . वे १९७१ में पाकिस्तान की सेना की उस हार का बदला लेने के फिराक में रहते हैं जिसके बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ था. बदला लेने की इस जिद के चलते उनके अपने देश को भी तबाही का खतरा बना हुआ है . क्योंकि अगर उन्होंने परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की गलती कर दी तो अगले कुछ घंटों में भारत उनकी सारी सैनिक क्षमता को तबाह कर सकता है . अगर ऐसा हुआ तो वह विश्व शान्ति के लिए बहुत ही खतरनाक संकेत होगा .


पाकिस्तानी परमाणु हथियारों की सुरक्षा हमेशा से ही सवालों के घेरे में रही है . जिस तरह से पाकिस्तानी फौज ने आई एस आई के नेतृव में आतंक का तामझाम खड़ा किया है उस से तो लगता है कि एक दिन पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के सरगना उसके परमाणु ज़खीरे की चौकीदारी करने लगेगें. अगर ऐसा न भी हुआ तो पाकिस्तान  में जिस तरह से अपनी कौम को सबसे ताक़तवर बताने और भारतीयों को बहुत कमज़ोर बताने का माहौल है ,उसके चलते कोई भी फौजी जनरल बेवकूफी कर सकता है .इस तरह की गलती १९६५ में जनरल अयूब कर चुके हैं . उन्होंने भारतीयों को कमज़ोर समझकर हमला कर दिया था और जब अमरीका से मिले भारी असलहे से लैस पाकिस्तानी सेना बुरी तरह से हार गयी तब राष्ट्रपति अयूब की समझ में आया कि वे कितनी बड़ी गलती कर बैठे थे . बाद में  ताशकंद में रूस के सौजन्य से भारत में उन्हें कुछ ज़मीन वापस कर दी .पाकिस्तान को महान मानने वालों की आज भी वहां कमी नहीं है .ज़ाहिर है जनरल अयूब वाला दुस्साहस कोई भी पाकिस्तानी जनरल कर सकता है .इसलिए जर्मनी से आयी ताज़ी जानकारी को पाकिस्तानी इस्टेब्लिशमेंट में मौजूद  जंगी मानसिकता के लोगों लो लगाम लगाने के काम में इस्तेमाल किया जाना चाहिये  और दुनिया को पाकिस्तानी परमाणु ज़खीरों पर अंतर राष्ट्रीय निगरानी रखने का माकूल बंदोबस्त करना चाहिए

Thursday, November 14, 2019

साधो ,देखी तुम्हरी कासी






शेष नारायण सिंह

बनारसी संस्कृति , धर्म, परंपरा और लंठई की बुलंदी को फिर से स्थापित करने वाली एक किताब हाथ लगी है .नाम है , " साधो ये उत्सव का गाँव " अभिषेक उपाध्याय, अजय सिंह और रत्नाकर चौबे ने इस किताब का संपादन किया है .यह  काशी की पंचक्रोशी यात्रा की यादों का एक बेहतरीन संकलन है .सभी यात्रियों की यादें इसमें लिखी गयी हैं. हुआ यह कि बनारसी ठलुओं की एक अड़ी के कुछ नक्षत्रों को यह बताया  गया कि तुम बनारस को ठीक से नहीं जानते , लिहाजा बनारस को समझने की एक यात्रा करते हैं .इन सबों ने मिलकर अगस्त के अंतिम दिनों में काशी की पंचक्रोशी यात्रा की और अपने अनुभवों को कलमबंद कर दिया  . सारी यादें भाइयों ने व्हाट्सप पर लिखीं और इसको पुस्तक के रूप  छाप दिया गया .  यात्रा का घोषित उद्देश्य था कि काशी को ठीक से समझा जाएगा  . लेकिन कई यात्रियों ने लिखा  है कि उनकी हालत कोलंबस वाली हो गयी. कोलंबस खोजने निकले थे भारत और खोज  निकाला अमरीका ,लगभग उसी तरह कुछ  ठलुओं ने कुबूल किया है उन्होंने यात्रा शुरू की थी , बनारस को पूरा खोजने के लिए लेकिन अंत में अपने  आपको ही समझकर  संतुष्ट हो गए . विख्यात पत्रकार हेमंत शर्मा इस टोली के मुख्य संयोजक थे , भांति  भांति के संतों को इस यात्रा में शामिल होने की  प्रेरणा दी और सब को लेकर चल पड़े. जनसत्ता के आदिकाल से बहुत बाद तक उसके उत्तर प्रदेश के संवाददाता के रूप में हेमंत ने अपने आपको मेरे जैसे लोगों के दिमाग में स्थापित किया था . जनसत्ता की  भाषा का जो विकास हुआ उसमें हेमंत के बनारस की   भाषा के भी बहुत से लक्षन थे. इस यात्रा के संकलन का जो परिचय उन्होंने लिखा है उसमें उस विकासमान भाषा के कुछ विकसित तत्व भी शामिल हैं . पंचक्रोशी यात्रा, काशी, अड़ी, ठलुआ और लंठई की बाकी दुनिया में अबूझ सत्ता को उनके चरैवेति चरैवेति को पढने से समझने में बहुत सुविधा होगी .उनके उसी लेख से कुछ उधार लेकर बात को साफ़ करने की कोशिश की जायेगी .
बहुत सारे लोग काशी को जानते हैं या जानने का दावा करते हैं लेकिन उनके मानसिक विकास के क्रम में एक मुकाम ऐसा आता  है जब उनको लगता है कि उन्होंने  काशी की गलियाँ देखीं , घाट देखे  , खानपान देखा, बोली बानी देखी ,पहनावा देखा, हर हर महादेव की  बारीकियां समझीं , नाटी इमली का भरत मिलाप देखा, चेतगंज की नक्कटइया देखी, सांड और सन्यासी देखे ,वह गलियाँ देखीं जहाँ से अपने अपने वक़्त के बड़े बड़े सूरमा विश्वनाथ दरबार में हाजिरी लगाने आते रहे थे  लेकिन  उन्होंने वह काशी नहीं देखी जहां कबीर को रामानंद मिले थे  ,जहां रामबोला को उनके  आक़ा ने तुलसीदास बना दिया था , कलकत्ता जाते हुए जहां  ग़ालिब ठहरे थे और उन्होंने एक बार तो बनारस को ही अपना ठिकाना बनाने  का मन बना लिया था . उसी बनारस में ग़ालिब ने चराग़-ए-दैर लिखा था . हेमंत शर्मा लिखते हैं कि सब कुछ नज़रों के सामने था, बस , 'नज़र' नहीं थी.  जो कुछ दिख रहा था ,उससे बस एक कदम बढ़ाना था और काशी के भूगोल से निकलकर बस अगला क़दम उसके इतिहास में ,उसकी परम्पराओं में पड़ने वाला था.
तो जनाब इस तलाश में ठलुओं की अड़ी के यह लोग निकला पड़े . जो यात्रा आमतौर पर पांच दिन में की जाती है उसको तीन दिन में पूरी की . करीब अस्सी  किलोमीटर की यात्रा  यानी पचीस किलोमीटर रोज़ का पैदल चलना . शहराती बाबुओं के लिए यह टेढ़ी खीर है . लेकिन इन लोगों ने इस यात्रा को पूरा किया क्योंकि अगर असंभव को संभव बनाने  की क्षमता न हो तो बनारसी कैसा और ठलुआ कैसा . ठलुआ काशी की  संस्कृति का स्थाई भाव तो है ही सदियों से यह संचारी भाव भी  है .चरैवेति चरैवेति में ही ठलुआ की प्रबोधिनी लिख दी गयी है .लिखते हैं "  ठलुवत्व एक बनारसी जीवनदर्शन है ,जीने की कला है , समाज को देखने की दृष्टि है ,दुनिया को ठेंगे पर रखकर अपनी बात को बेलौस कहने की जिद  है , ' उधो क लेना ,न माधो का देना ' उसका मकसद है . ठलुवा दुखी हो सकता है ,पर रोता नहीं है . वह रोने में भी हंसने का आनंद लेता है . ठलुए में चार कहने और चार सुनने की क्षमता होती है . वह खुद के अलावा समूची दुनिया को मूर्ख समझता है. वह जीवन के राग-रंग से  चुस्त-दुरुस्त होने के साथ ही औघड़पन का दिव्य रस पैदा करने देने वाली भांग-ठंडाई का भी  शौक़ीन होता है . भगवान भोले का यह परम भक्त, धन कमाने के कौशल को मूर्खता नहीं , तो धूर्तता तो ज़रूर  समझता है . ठलुवा भूखा रहेगा पर किसी के आगे हाथ नहीं पसारेगा , अगर कभी पसारेगा तो भी शेर की तरह गुर्राते हुए . " ऐसे ही  ठलुवों ने अपनी काशी की पंचक्रोशी यात्रा की और उस यात्रा के अपने अनुभव हम जैसे लोगों के लिए लिख दिया जिनके बचपन का सपना है कि काश हम भी कभी बनारस में रह पाते  . उम्र के चौथेपन में आ गए लेकिन वह सपना अधूरा ही  रह गया .
यह ठलुवे एक  अड़ी के सदस्य हैं .बंगाल में जिस संस्था को अड्डा कहते हैं उसका आदिस्वरूप बनारस शहर की अड़ी से ही लिया गया है.  किताब में पिछले सौ दो सौ साल की प्रमुख अड़ियों का ज़िक्र भी है. यह भी बताया गया है कि बनारस से  निकलकर जिन लोगों पूरे देश में अपनी मौजूदगी की धाक बनाई , वे बनारस की  किसी न किसी अड़ी के सदस्य थे और वहीं उन्होंने अपनी मेधा , ज्ञान और तर्कशक्ति का  विकास  किया था.  शिव  प्रसाद सिंह, केदारनाथ सिंह , नामवर सिंह, धूमिल, चंद्रशेखर मिश्र ,बेधडक बनारसी , भैयाजी बनारसी  सभी किसी न किसी अड़ी के सदस्य रह चुके  हैं. बनारस में एक ठलुवा क्लब भी है जहां अपने क्षेत्र के बड़े बड़े  महारथियों और  साहित्यकारों को आमंत्रित करके उनका मुंडन करने की सांस्कृतिक परम्परा रही है .
" साधो ये उत्सव का गाँव " में सभी यात्रियों ने अपने अपने अनुभव को  कलमबंद किया है . कुछ ऐसे भी लोगों ने इस यात्रा से जुडी अपनी यादों को  लिखा  है जो इस यात्रा में किन्हीं कारणों से शामिल  नहीं हो सके थे . किसी के परिवार में कोई  ग़मी हो गयी और किसी को छुट्टी नहीं मिली . उनके लेख से यह बात समझ में आ जाती  है कि यात्रा में न जाकर क्या क्या मिस किया था  ठलुवों ने .
शरद शर्मा ने  पंचक्रोश के इतिहास और महिमा पर जो लिखा है वह जानकारी के लिहाज से बहुत उपयोगी है .ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कन्द पुराण के हवाले से काशी के प्राचीन भूगोल के बारे में ज़रूरी सूचना उनके लेख में उपलब्ध है .मुनीश मिश्रा ने सत्यं ,शिवं ,सुन्दरम के हवाले से पंचक्रोशी की यात्रा को ऐतिहासिक नज़र को लिपिबद्ध कर दिया है .
अभिषेक उपाध्याय और रत्नाकर चौबे ने यात्रा का वृत्तान्त लिखा है . रास्ते के गाँव, कस्बे ,मंदिर  , तालाबों का अच्छा परिचय है .उन्होंने बनारस से जुडी बहुत सारी ऐतिहासिक जानकारी भी शामिल किया है . मणिकर्णिका से मणिकर्णिका तक की यह यात्रा उन्होंने संभालकर लिखा है .प्रेमचंद की कहानी ' बड़े भाई साहब ' का एकल मंचन जो अभिषेक उपाध्याय ने किया उसकी तारीफ़ लगभग सभी रिपोर्टों में है . ममता शर्मा का गायन और बिरहा का मुकाबला भी ठलुवों के दिल में समाया  हुआ  है .

बहुत ही दिलचस्प किताब . ठलुवा कल्चर के हिसाब से लगभग सभी लेखकों ने अपनी लेख में किसी न किसी की खिंचाई ज़रूर की  है . मसलन वृत्तान्त में ही बब्बू राय पर तंज है कि ' बिना कुछ किये श्रेय लेने की धरतीफाड़ कोशिश " . यह अभिव्यक्ति का तरीका अच्छा लगा . बब्बू  विनय राय की रिपोर्ट मनमोहक  है .' जब बाहुबली ने पहली बार देखी माहिष्मती ' मुझे बहुत अच्छी लगी. उस पर रत्नाकर चौबे की टिप्पणी , " जौ विनायक का दर्शन कर सब लोग 'सशरीर ' मणिकर्णिका घाट जाकर यात्रा पूरी किये  " लाजवाब है.    उस पर सवा सेर है हेमंत शर्मा की टिप्पणी . लिखते हैं ," वाह रे बब्बू ! अभई तक हम तोहके बाहुबलिये जानत रहली. पर तू त विद्वानौ हउआ ."
सभी लेखकों के लेख अंत में उनका परिचय भी है. कुछ परिचय ऐसे हैं जो आनंद की धार से भरपूर हैं. ठलुवों की अड़ी के स्तम्भ नवीन तिवारी के परिचय की एक बानगी  देखिये ," नवीन तिवारी ठलुवों की इस अड़ी के आमरण अध्यक्ष हैं. वे बहुमत के विरोध के बावजूद इस पद पर  ' निर्विरोध ' चुने गये . ऐसी उपलब्धि हासिल करने वाले देश के पहले  अध्यक्ष हैं . "
किताब को  दिल्ली के प्रभात प्रकाशन ने छापा है.





Saturday, October 19, 2019

कश्मीर : नेहरू, शेख अब्दुल्ला और श्यामा प्रसाद मुखर्जी



शेष नारायण सिंह

आज जम्मू-कश्मीर की सियासत में बहुत बड़ा उथल पुथल चल रहा है  संविधान के अनुच्छेद ३७० के असर को ख़त्म कर दिया गया है और  राज्य को किसी और राज्य की तरह बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है . अभी फिलहाल लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया गया है और पूरे राज्य की जगह पर दो केंद्र शासित राज्य बना दिए गए  हैं . जम्मू-कश्मीर ऐतिहासिक रूप से हमेशा से भारत का हिस्सा रहा है . हालांकि यह भी सच है कि राजनीतिक एकता समय समय पर नहीं रही लेकिन सांस्कृतिक एकता रही  है. कल्हण की राजतरंगिणी के समय से तो कश्मीर का भारत से बहुत ही क़रीबी सम्बन्ध रहा है . १९४७ में जो समस्याएं पैदा हुईं उनकी जड़ में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरिसिंह की सबसे गैर ज़िम्मेदार भूमिका रही है . हालांकि बाद में शेख अब्दुल्ला का भी रवैया बहुत ही अजीब हो गया था और जो जवाहरलाल नेहरू उन पर पूरी तरह से विश्वास कर रहे थे उनको ही शेख अब्दुल्ला के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी पड़ी और उनको गिरफ्तार भी करना पडा . जम्मू-कश्मीर की राजनीति में  आजादी  का सन्दर्भ बिलकुल अलग है . राजा हरसिंह के राज में भी जनता अपने को गुलाम  मानती थी और रणजीत सिंह के राज में भी . लेकिन जब सरदार पटेल ने राजा से जम्मू -कश्मीर के विलय के दस्तावेजों पर दस्तखत करवा लिया तो वहां के हिन्दू,मुसलमान और बौद्धों ने अपने को आज़ाद माना था. जम्मू-कश्मीर अंग्रेजों के डायरेक्ट अधीन तो कभी रहा नहीं इसलिए उनकी आज़ादी १५ अगस्त १९४७ के दिन नहीं हुई. उनकी आज़ादी तब हुयी जब अक्टूबर १९४७ में राजा हरिसिंह ने उनका पिंड छोड़ दिया और जम्मू-कश्मीर आज़ाद  भारत का हिस्सा हो गया .लेकिन आज हालात बिलकुल अलग हैं .जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्नाह को धता बता दी थी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ मिलने की कोशिशों को फटकार दिया थाऔर भारत के साथ विलय के लिए चल रही शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी आज वह भारतीय नेताओं से इतना नाराज़ है. कश्मीर में पिछले ३० साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुमत वाली जनता ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नेताओंमहात्मा गाँधी जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल को अपना माना था. पिछले ७० साल के इतिहास पर एक नज़र डाल लेने से तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो जायेगी.

देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधान मंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया . पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडे, पेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.

ऐसी हालत में राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. . नतीजा यह हुआ कि उनके प्रधान मंत्री मेहर चंद महाजन को कराची बुलाया गया. जहां जाकर उन्होंने अपने ख्याली पुलाव पकाए. महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए , स्वतंत्र देश हो और भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बहुत ही दोस्ताना सम्बन्ध रहें . लेकिन पाकिस्तान को कल्पना की इस उड़ान में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा . इधर २१ अक्टूबर १९४७ के दिन राजा ने अगली चाल चल दी. उन्होंने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चंद को नियुक्त कर दिया कि वे कश्मीर का नया संविधान बनाने का काम शुरू कर दें.कश्मीर को  स्वतंत्र देश बनाने का  महाराजा का आइडिया जिन्ना को पसंद नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले की शुरुआत कर दी. राजा को अंधरे में रख कर  पाकिस्तान की फौज़ कबायलियों को आगे करके श्रीनगर की तरफ बढ़ रही थी.  बातचीत का सिलसिला भी जारी था . पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव मेजर ए एस बी शाह श्रीनगर में थे और राजा के अधिकारियों से मिल जुल रहे थे. जब हमले का पता चला तब राजा हरिसिंह की समझ में जिन्नाह की  तिकड़मबाज़ी आई . उनके प्रधान मंत्री, मेहर चंद महाजन २६ अक्टूबर को दिल्ली भागे. उन्होंने नेहरू से कहा कि महाराजा भारत के साथ विलय करना चाहते हैं . लेकिन एक शर्त भी थी. वह यह कि भारत की सेना आज ही कश्मीर पंहुच जाए और पाकिस्तानी हमले से उनकी रक्षा करे वरना वे पाकिस्तान से बात चीत शुरू कर देगें. नेहरू ने गुस्से में उनको भगा दिया . शेख अब्दुल्ला दिल्ली में ही थे .उन्होंने नेहरू का गुस्सा शांत कराया . मेहरचंद महाजन को औकातबोध हुआ और सरदार पटेल ने वी पी मेनन को भेजकर राजा से  विलय के कागज़ात पर दस्तखत करवाया जिसे  २७ अक्टूबर को भारत सरकार ने मंज़ूर कर लिया.  सरदार पटेल ने हवाई ज़हाज से भारत की फौज़ को तुरंत रवाना कर दिया और कश्मीर से पाकिस्तानी शह पर आये कबायलियों को हटा दिया गया . कश्मीरी अवाम ने कहा कि भारत हमारी आज़ादी की रक्षा के लिए आया है जबकि पाकिस्तान ने फौजी हमला करके हमारी आजादी को रौंदने की कोशिश की थी. उस दौर में आज़ादी का मतलब भारत से दोस्ती हुआ करती थी लेकिन अब वह बात नहीं है.
यहाँ तक तो सब कुछ ठीक था लेकिन उसके बाद बातें बिगड़ना शुरू हो गयीं . लड़ाई चल ही रही थी कि भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन की सलाह पर पाकिस्तानी हमले का मामला जवाहरलाल नेहरू १ जनवरी १९४८ के दिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गए . अपने इस फैसले पर खुद वे भी बाद में पछताए . एक देश के रूप में तो भारत आज  तक अफसोस कर रहा है .पाकिस्तान  इसी मौके का इंतज़ार कर रहा था. उसने भारत पर तरह तरह के आरोप लगाना शुरू कर दिया . जवाहरलाल नेहरू को अपनी गलती  का अंदाजा हो गया . ब्रिटेन की सरकार ने मामले को बहुत बड़ा विस्तार दे दिया . बात पाकिस्तानी हमले की हो रही थी लेकिन ब्रिटेन की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में अपने प्रभाव और अमरीका की मदद लेकर इसको भारत-पाकिस्तान  विवाद की शक्ल दे दिया .सरदार पटेल इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन जवाहरलाल नेहरू को अंगेजों की इन्साफ भावना पर बहुत भरोसा था  . २१ अप्रैल १९४८ के दिन एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पास कर दिया . इस प्रस्ताव में पाकिस्तान को अपने कबायली लड़ाके वापस लेने को नहीं कहा गया . भारत को अपमानित करने के लिए भारत और पाकिस्तान को बराबर माना  गया .भारत में  चारों तरफ तल्खी ला माहौल बन गया . उन दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के स्थाई प्रतिनिधि एन गोपालस्वामी अय्यंगर हुआ करते थे .उन्होंने सरकार के पास जो नोट भेजा उसमें लिखा है कि ," मैं अपनी सरकार को यह सलाह कभी नहीं दूंगा कि वह कोई मामला सुरक्षा परिषद में लाये  " जवाहरलाल नेहरू को इस बात की गंभीरता का अनुमान पूरी तरह से हो गया था . बहुत बाद में  जब अमरीका की सरकार भारत को कुछ  दोस्ती के संकेत देने की कोशिश कर रही थी और अमरीका में भारत की राजदूत विजयलक्ष्मी पंडित के ज़रिये कुछ सन्देश भेजने की कोशिश कर रही थी तो नेहरू ने एक सख्त सात टेलीग्राम विजयलक्ष्मी पंडित के पास १० नवम्बर १९५२ को भेजा. उसमें लिखा था , " किसी गलत बुनियाद पर कोई भी सही फैसला नहीं हो सकता . अमरीका ने  हमारे साथ अन्याय किया है पहले उस अन्याय को ठीक करें तब आगे की बात की जायेगी ." अमरीकी  विदेश विभाग को भी जवाहरलाल ने बहुत ही साफ शब्दों में  समझा दिया था कि भारत के प्रति अमरीकी रवैय्या  दुश्मनी पूर्ण रहा है .हम सबकी इच्छा है कि दोनों देशों के बीच  दोस्ती कायम हो लेकिन इस अमरीकी रुख के बीच वह संभव नहीं है . ( नेहरू का पत्र ,जी एल मेहता के नाम ) .

कश्मीर के मामले में शेख अब्दुल्ला एक स्थाई तत्व  हमेशा से ही रहे  हैं. शुरू में वे पूरी तरह से महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के साथ थे . लेकिन बाद में उनके नज़रिए में  भारी बदलाव आ गया . सबको मामूल है कि शेख अब्दुल्ला पर जवाहरलाल को बहुत ही अधिक भरोसा था.  शेख अब्दुल्ला कश्मीरी हिन्दू मुसलमान सबके  हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता था  . लेकिन  बाद में उनमे भारी बदलाव आ गया . वे खुद को  बहुत ही बड़ा मानने लगे थे . एक समय था जब नेहरू मानते थे कि शेख अब्दुल्ला ही कश्मीर को संभाल सकते थे .जवाहरलाल नेहरू १३ नवम्बर १९४७ को राजा हरसिंह को लिखा था कि ," अगर कोई आदमी कश्मीर में सब  कुछ ठीक कर सकता है तो वह  है शेख अब्दुल्ला . उनकी विश्वसनीयता और दिमाग के संतुलन पर मुझे पूरा भरोसा है. मामूली बातों में तो  वे छोटी मोटी गलती कर सकते हैं लेकिन बड़े फैसलों में वे  चूकेंगें नहीं  ऐसा मुझे विश्वास है .कश्मीर की  किसी परेशानी का हल शेख के बिना नहीं हासिल किया जा सकता ."
शुरू में ऐसा लगता  था कि  शेख अब्दुल्ला भारत और उसके प्रधानमंत्री के प्रति पूरी तरह समर्पित थे .यह नेहरू का भी सोचना था लेकिन  नेहरू को अनुमान ही नहीं था कि शेख साहब एक ऐसे कश्मीर की कल्पना कर रहे थे तो भारत से पूरी तरह आज़ाद होगा. इस बात की संभावना इसलिए भी जोर पकड रही थी कि दिल्ली में कुछ अमरीकी अधिकारियों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि आज़ादी अच्छी चीज़ है. इसी बातचीत में उन्होंने ब्रिटेन और अमरीका को कश्मीर के विकास में सहभागी के रूप में आमंत्रित करने के भी संकेत दिए थे . हद तो तब हो गयी जब नेहरू को पता लगा कि शेख अब्दुल्ला सरदार पटेल और नेहरू के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे थे . हुआ यों कि शेख ने कहीं बयान दे दिया कि कुछ लोग कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले कर देना चाहते  थे. सरदार पटेल ने इस बात का बहुत बुरा माना और अपनी नाराजगी जताई . लेकिन नेहरू अभी भी बात को टालते नज़र आये . उन्होंने ४ अक्टूबर १९४८ को सरदार पटेल को एक चिट्ठी लिखकर बात को संभालने की कोशिश की . चिट्ठी में लिखा कि ," मुझे विश्वास है कि शेख  अब्दुल्ला बहुत ही साफगोई से बात करते हैं . उनकी सोच में स्पष्टता की कमी है और बहुत सारे नेताओं की तरह तरह बोलते बोलते कुछ भी बोल जाते  हैं .वे इस बात से बहुत चिंतित रहते हैं कि कहीं उनके लोग पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा के शिकार होकर पाकिस्तान के प्रभाव में न आ जाएँ .मैंने उनको साफ़ कह दिया है कि उनकी यह समझ अपनी जगह  ठीक है लेकिन उनको अपनी बात को संभाल कर कहना चाहिए ."
 शेख अब्दुल्ला  नेहरू की बात को समझने के लिए तैयार नहीं थे . अब तो उनके और जवाहरलाल के बीच मतभेद इस क़दर बढ़ गए कि जनवरी १९४९ में जवाहरलाल को उनसे अपील करनी पडी कि हर बात को प्रेस में बोलने से बाज़ आयें और किसी विवाद को बातचीत से हल करने की आदत  डालें. " लेकिन इसके बाद भी हालात सुधरे नहीं . नेहरू ने  फरवरी १९४९ में कृष्ण मेनन को लिखा कि शेख अब्दुल्ला और केंद्र सरकार के बीच कोई समझदारी ही नहीं है . भारत में अमरीकी  राजदूत ने  इसी समय के आसपास श्रीनगर की यात्रा की और उनसे बातचीत के बाद तो शेख अब्दुल्ला को लगने लगा कि ब्रिटेन और अमरीका कश्मीर को स्वत्रन्त्र देखना चाहते  हैं. अमरीकी राजदूत की पत्नी श्रीमती लॉय हेंडरसन और सी आई ए के भारत में तैनात कुछ अफसरों ने शेख अब्दुल्ला की महत्वाकांक्षा को खूब हवा दी .शेख अब्दुल्ला ने १९५० में  संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनधि सर ओवन डिक्सन को यह सुझाव दिया था कि उनकी इच्छा है  कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के नेताओं से बातचीत करके स्वतंत्र कश्मीर की  बात को वे आगे बढ़ाएंगे .यह सब बातें पब्लिक डोमेन में आ चुकी थीं और चर्चा हो रही थी. शेख अब्दुल्ला प्रेस से बात करने से बाज़ नहीं आ रहे थे और कृष्ण मेनन भी तुरंत जवाब दे रहे थे . नेहरू बहुत ही खिसिया गए थे . उन्होंने कहा कि जब इस तरह के दोस्त हों तो बात कैसे संभल सकती है . लेकिन शेख अब्दुल्ला बात को आगे बढाते जा रहे थे . उनको भारत सरकार से सलाह लेना भी मंज़ूर नहीं था. . खीजकर जवाहरलाल ने उनको ४ जुलाई १९५० के दिन एक पत्र लिखा . यह पत्र उपलब्ध है . लिखते हैं ,"  मैं समझता हूँ कि मैंने आपको पहले भी बताया था कि अगर आपके और हमारे बीच किसी मुद्दे पर कोई महत्वपूर्ण मतभेद हो तो मैं विवाद से अलग हो  जाउंगा . ... मुझे बहुत अफसोस है कि आपने ऐसी पोजीशन ले ली  है कि हमारी किसी दोस्ताना सलाह को भी आप कोई महत्व नहीं देते और उसको दखलंदाजी मानते हैं. अगर ऐसी बात है को व्यक्तिगत रूप से मुझे कुछ नहीं कहना है ." शेख अब्दुल्ला सरदार पटेल के मातहत अफसरों की शिकायत जवाहरलाल से करते रहते थे और सरदार की शिकायत जवाहरलाल नेहरू को बर्दाश्त नहीं थी. 

शेख अब्दुल्ला की अपनी जिद के चलते बात  बिगडती जा रही थी . गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने नेहरू से बताया कि वल्लभ भाई ( सरदार पटेल ) सोचते  हैं कि शेख अब्दुल्ला को डील करना नेहरू का ही काम है. सच्ची बात यह है  दिल्ली के हर अधिकारी और नेता यही समझता था . शेख दिन पर दिन मुश्किल पैदा करते जा रहे थे .उन्होंने ११ अप्रैल १९५२ के  दिन  रणबीरसिंह पुरा में एक भाषण दे दिया जिसमें जवाहरलाल और उनके मतभेद बहुत ही खुलकर सामने आ गए . भाषण में उन्होंने भारत और पाकिस्तान को एक दूसरे के बराबर साबित करने की कोशिश की और भारतीय अखबारों को खूब कोसा . जवाहरलाल नेहरू ने उनके इस गैरजिम्मेदार बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दीएक तरह से उसको नज़रंदाज़ ही किया . जब नेहरू की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो शेख की समझ में आ गया कि प्रधानमंत्री नेहरू नाराज़ हैं . उसके बाद उन्होंने अपनी तरफ से ही सफाई देना शुरू कर दिया . एक बयान जारी करके कहा कि प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया ने उनके बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है .  उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रेस ट्रस्ट वालों  ने उनकी सरकार से कुछ आर्थिक सहयोग माँगा था . जब मना कर दिया गया तो उनके पीछे पड़ गए हैं .  शेख अब्दुल्ला के इस के बाद के  बयान भी इसी तर्ज के हैं . इन सबके कारण जवाहरलाल को बहुत  दिक्क़तें पेश आईं. इतने परेशान हो गए कि उन्होंने शेख को २५ अप्रैल १९५२ के दिन एक चिट्ठी लिखी और उसमें लिखा कि वे शेख साहब से इस सम्बन्ध में कोई  बात नहीं करना चाहते . उन्होने यहाँ तक कह दिया कि वे उनसे किसी भी मसले पर बात नहीं करना चाहते . लिखा कि मेरी नज़र में आप ही कश्मीरी अवाम के प्रतिनिधि थे लेकिन आपने इस तरह के बयानात देकर मुझे  बहुत तकलीफ पंहुचाई है . व्यक्तिगत रूप से शेख अब्दुल्ला इस सबके बाद भी दोस्ती की बात करते थे  लेकिन  अपनी गैरजिम्मेदार राजनीति  के लिए बिलकुल अफ़सोस नहीं जताते थे . नेहरू की परेशानी यह  थी कि सरदार  पटेल का स्वर्गवास हो चुका था. जब तक सरदार जीवित थे कश्मीर के राजा या शेख अब्दुल्ला की ऊलजलूल बातों को संभाल लेते  थे लेकिन अब नेहरू अकेले पड़ गए थे . अगस्त १९५२ तक कश्मीर की हालत यह हो  गयी थी कि वह न तो स्वतंत्र थान वहां शान्ति थी और न ही वहां के हालात सामान्य थे.  उथल पुथल का माहौल था .
शेख अब्दुल्ला के अजीबोगरीब  रुख का नतीजा था कि जम्मू के इलाकों में हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियों को शेख के बहाने जवाहरलाल पर हमला करने का मौक़ा मिल रहा था . १९५२ के दिसंबर तक यह बात साफ़ नज़र आ रही थी कि देश भर में शेख अब्दुल्ला मुद्दा बनते जा रहे थे . जम्मू में प्रजा परिषद का शेख अब्दुल्ला और उनकी सरकार के खिलाफ  आन्दोलन चल रहा  था. वह पूरी तरह साम्प्रदायिक आन्दोलन था . प्रजा परिषद को हिन्दू महासभा के  पुराने नेता  श्यामा प्रसाद मुखर्जी  की नई पार्टी  जनसंघअकाली दल हिन्दू महासभा और आर एस एस का समर्थन मिल रहा था. हालत बहुत ही नाजुक हो गयी थी . अब इस आन्दोलन के निशाने पर जवाहरलाल नेहरू आ गए थे . शेख के हवाले  से बढ़ रहे आन्दोलन में गौहत्या और  पूर्वी बंगाल ( अब बंगलादेश ) से आये शरणार्थियों के मुद्दे भी जोड़ दिए गए थे . सिख नेता सरदार तारा सिंह ने एक ऐसा बयान दे दिया था जिससे लगता था कि वे नेहरू की ह्त्या का आह्वान कर रहे थे .  ऐसा लगने लगा था कि एक बार फिर वही हालात पैदा हो  जायेंगें जो बंटवारे के वक़्त थे और क़त्लो-गारद का माहौल बन जाएगा . अगर फौरन कार्रवाई न की गयी और हालात के और भी बिगड़ने का खतरा रोज़ ही बढ़ रहा था .  जवाहरलाल ने खुद संकेत दिया कि वे हर मोर्चे पर असफल नज़र आ रहे थे . उनके आदेशों का पालन नहीं हो रहा था . उन्होंने आदेश दिया कि जहां भी उपद्रव हो रहा हो उसको फ़ौरन रोका  जाए लेकिन कोई असर नहीं हो रहा था क्योंकि नए गृहमंत्री  कैलाशनाथ काटजू  में वह बात नहीं थी जी सरदार पटेल में थी . बहुत सारे अफसर काटजू साहब की बात ही नहीं सुनते थे .  सोशलिस्ट पार्टी के लोग भी जवाहरलाल के खिलाफ हो गए थे. उन्होंने  सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं आचार्य जे बी कृपलानी और जयप्रकाश नारायण से अपील किया कि इस आन्दोलन का समर्थन मत करो क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष राजनीति के खिलाफ है . जयप्रकाश नारायण ने  टका सा जवाब दे दिया कि साम्प्रदायिकता के विरोध का मतलब यह नहीं है कि समस्या के निदान की नेहरू की तरकीब का समर्थन किया जाए . उन दिनों जयप्रकाश नारायण अपने को नेहरू से ज्यादा काबिल समझते थे. उधर नेहरू ने जो बुनियादी ग़लती की वह यह थी कि वे साम्प्रदायिक आन्दोलन को रोकने के लिए शेख अब्दुल्ला की सरकार को  सेकुलर और राष्ट्रहित में बता रहे थे  .उनके अलावा  और कोई भी  इस बात को मानने के लिए  तैय्यार नहीं था. जम्मू के आन्दोलन को श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुत ही सलीके से  जवाहरलाल की धुलाई करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे और उन्होंने  संसद के उस अधिकार को चुनौती देना शुरू कर दिया था जिसके कारण जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा और अधिकार दिया गया था . श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने  जवाहरलाल को ३ फरवरी १९५३ को  एक बहुत ही सख्त चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा था कि ,” आपकी गलत नीतियों और अपने विरोधियों की राय को नज़रन्दाज़ करने की आपकी आदत के कारण ही आज देश बर्बादी के मुहाने पर खड़ा है .” इस मौके पर जवाहरलाल खुद जम्मू का दौरा करना चाहते थे लेकिन शेख साहब ने इस बात को पसंद नहीं किया .नेहरू ने शेख अब्दुल्ला से कहा कि समस्या विकराल है और उसका समाधान लोगों के दिल और दिमाग को जीत कर हासिल किया जाना चाहिए . दमन का रास्ता ठीक नहीं है .लेकिन शेख उनकी बात मानने को तैयार नहीं  थे. एक मुकाम ऐसा भी आया जब साफ़ लगने लगा कि शेख अब्दुल्ला बुरी तरह से कन्फ्यूज़ हो गए हैं . नेहरू ने १ मार्च ,१९५३ को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को एक पत्र में बताया कि शेख साहब कन्फ्यूज़ हो गए हैं . उनके ऊपर तरह तरह के दबाव पड़ रहे हैं और वे उसी में बुरी तरह से फंसते जा रहे हैं . वे किसी पर विश्वास नहीं कर रहे  हैं लेकिन ऐसे लोगों के बीच घिर गए हैं जो उनको उलटा सीधा पढ़ा रहे हैं . हालांकि वे उनपर विश्वास नहीं करते लेकिन उनकी बात  को मानकर कोई न कोई गलत क़दम उठा लेते हैं . मुझे डर है कि इस दिमागी हालत में शेख कोई ऐसा काम कर बैठेंगे जो बात को और बिगाड़ देगा .’  मौलाना आज़ाद को  पत्र लिखने के बाद जवाहरलाल ने शेख अब्दुल्ला को भी उसी दिन एक बहुत ज़रूरी पत्र लिखा . उन्होंने लिखा कि ,” केवल इतना ही काफी नहीं है कि हम यह इच्छा करें कि सब ठीक हो  जाए . उसके लिए कुछ करना भी चाहिए . नतीजा अपने हाथ में नहीं है लेकिन समस्या के हल की कोशिश करना तो हमारे   हाथ में है .” शेख अब्दुल्ला ने इस पत्र का कोई जवाब ही नहीं दिया .
नेहरू की सबसे बड़ी कमजोरी उस वक़्त का लाचार गृह मंत्रालय था .गृहमंत्री कैलाशनाथ काटजू भी अपने प्रधानमंत्री की सलाह मानने को तैयार नहीं थे . इस आशय का एक पत्र भी उन्होंने १९ अप्रैल १९५३ को नेहरू के पास भेज दिया था . उधर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने आंदोलन को बहुत ही तेज़ कर दिया था .  गृहमंत्री   काटजू कुछ भी करने को तैयार नहीं थे  . यहाँ तक कि उनके भरोसे के मित्र और केंद्रीय मंत्री ,रफ़ी अहमद किदवई ने नेहरू को लिखा कि आपने अपने इर्द गिर्द ऐसे लोगों को जमा कर रखा है जिनको सभी रिजेक्ट कर चुके हैं .उनका संकेत कैलाशनाथ काटजू की तरफ था. इस बीच श्यामा प्रसाद मुखर्जी बिना किसी परमिट के जम्मू-कश्मीर चले गए . और शेख अब्दुल्ला ने नेहरू की एक न मानी और उनको गिरफ्तार कर लिया . उन्होंने नेहरू को श्रीनगर आने की दावत दी. जवाहरलाल वहां गये और शेख अब्दुल्ला ने उनको समझाया कि पूरी  स्वायत्तता और पूर्ण विलय के बीच का कोई रास्ता नहीं है . जम्मू-कश्मीर का  भारत में पूर्ण विलय कम्मू-कश्मीर के लोग मानेगें नहीं इसलिए केवल एक रास्ता बचता है कि राज्य को पूर्ण स्वायत्तता दे दी जाए. पूर्ण स्वायत्तता से शेख अब्दुला का मतलब आज़ादी ही था. नेहरू ने समझाया कि और भी बहुत से रास्ते हैं लेकिन शेख अब्दुल्ला और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं  थे जबकि उनकी वह हैसियत नहीं थी जो पहले हुआ करती थी  शेख  साहब अपनी पार्टी में भी अलग थलग पड़ रह  थे . नेहरू ने उनको और अन्य कश्मीरी नेताओं को समझाया कि वे कामनवेल्थ सम्मलेन में जा रहे हैं . उनके लौटने तक यथास्थिति बनाये रखा जाए. लेकिन भविष्य में कुछ और लिखा था . काहिरा में नेहरू को पता लगा कि २३ जून’५३ को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जेल में ही मृत्यु हो गयी . उसके बाद तो सब कुछ बदल गया .  शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त हुयी और वे भी गिरफ्तार हुए . लेकिन जवाहरलाल के मन में किसी के लिए तल्खी नहीं थी. बाद में उनको जब लगा कि कश्मीर की  समस्या का समाधान शेख अब्दुल्ला के बिना नहीं हो सकता तो उन्होंने शेख को रिहा किया और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जाकर वहां के नेताओं से बात करने की प्रेरणा दी लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था  . शेख साहब पाकिस्तान गए . २७ मई १९६४ के दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थेजवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. लेकिन इसके साथ ही नेहरू युग भी ख़त्म हो गया .