Friday, December 20, 2019

मंहगाई पर फ़ौरन लगाम लगाना जनहित भी है और राष्ट्रहित भी



शेष नारायण सिंह


पुलवामा बालाकोट,ट्रिपल तलाक़,  370 और अब नागरिकता बिल पर पिछले आठ महीने से सरकार का ध्यान लगा  हुआ है .  यह भावनात्मक मुद्दे हैं. इनकी चर्चा के आम आदमी को प्रभावित करने वाली वे बातें विमर्श के केंद्र में नहीं आतीं जिनके बहुत ही दूरगामी परिणाम होने वाले हैं .मीडिया और देश इन मुद्दों पर लगातार चर्चा कर रहा  है . इन ज़रूरी मुद्दों के बीच हर चीज़ पर जो महंगाई का हमला लगभग रोज़ ही हो रहा है वह सार्वजनिक विमर्श के बाहर रह रहा है . पिछले दो वर्षों  में महंगाई ने जिस तरह से आम जनजीवन को तबाही की तरफ डाल दिया है उसपर भी मीडिया और जनता के बीच चर्चा होना बहुत ज़रूरी है . चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है इसलिए लगभग हर हफ्ते पेट्रोल की बढ़ रही कीमतें  दबे पाँव आ  जाती हैं और  जनता को गरीब  और मजबूर बनाती रहती  हैं . देश का प्रभावशाली मीडिया सरकारी एजेंडे के अनुसार  आचरण करता है. ज़रूरत इस बात की है कि आम आदमी की तकलीफों को बहस की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की जाए .
 
पिछली छः तिमाहियों ने सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर में लगातर कमी आ  रही है. विश्वविख्यात रेटिंग एजेंसी  मूडीज़ ने अगली  तिमाही और पूरे साल के भारत सबंधी अपने आकलन को फिर से संशोधित कर दिया है . और आगाह किया है कि लगातार घट रही विकास दर और भी घटेगी .इस बीच केंद्र सरकार ने महंगाई की खेप दर खेप आम आदमी के सिर पर लादने का सिलसिला जारी रखा हुआ  है. प्याज सहित खाने की हर चीज़ की महंगाई की ज़द में है . पेट्रोल की  कीमतें भी देश की बड़ी आबादी को कहीं का नहीं छोड़ रही हैं. हर हफ्ते  पेट्रोल की कीमत बढ़ती रहती है . जब कभी एकाध बार दो तीन पैसे प्रति लीटर की कमी की घोषणा हो जाती है तो बीजेपी और सरकार के प्रवक्ता उसका प्रचार शुरू कर देते हैं .सचाई यह है कि पेट्रोल की बार बार बढ़ रही कीमतों का महंगाई बढ़ने में बहुत बड़ा योगदान होता  है .फौरी तौर पर गरीब तो सोच सकता है कि बढ़ी हुई पेट्रोल की कीमतों से उनका क्या लेना देना लेकिन सही बात यह है कि पेट्रोल डीज़ल और बिजली की कीमत बढ़ने से सबसे ज्यादा तकलीफ गरीब आदमी ही झेलता है. आज की यह मंहगाई निश्चित रूप से कमर तोड़ है और उसमें ढुलाई की कीमतों का बड़ा योगदान है .

पचास साल पहले पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण था .अर्थव्यवस्था को सही तरीके से चला पाने में असमर्थ सरकार ने पेट्रोल के दाम बढाकर चीज़ों को सँभालने की कोशिश की थी. हुआ यह था कि १९६७ के अरब-इजरायल यद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़  गयी थीं. भारत में सब्सिडी पर डीज़लपेट्रोल और किरोसीन बेचा जाता था . आयातित कच्चे तेल में  भारी वृद्धि के  कारण दाम बढ़ाना ज़रूरी था लेकिन उसकी राजनीतिक कीमत थी और वह सरकार को झेलनी पडी थी .उस वक़्त के  मीडिया ने इसकी विषद विवेचना की थी .साल  १९६९ में जब प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गाँधी ने डीज़ल और पेट्रोल की कीमतों में मामूली वृद्धि की थी तो साप्ताहिक ब्लिट्ज के संपादक रूसी के करंजिया ने अपने अखबार की हेडिंग लगाई थी कि पेट्रोल के महंगा होने से आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होगा सबसे बड़ी चपत उसी को लगेगी . उन दिनों लोगों की समझ में नहीं आता था कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी कैसे प्रभावित होगा. आर के करंजिया ने अगले अंक में ही बाकायदा समझाया था कि किस तरह से पेट्रोल की कीमत बढ़ने से आम आदमी प्रभावित होता है . उन दिनों तो उनका तर्क ढुलाई के तर्क पर ही केंद्रित था लेकिन उन्होंने समझाया था कि डीज़ल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ने या घटने का लाभ या हानि आम आदमी को सबसे ज्यादा होता है .

आज की हालात अलग हैं . आज की मंहगाई जनविरोधी नीतियों की कई साल से चली आ रही गलतियों का नतीजा है . विपक्ष की मुख्य पार्टी कांग्रेस है लेकिन वह अभी भी अपने आपको सत्ताधारी पार्टी जैसी ही मानती है और जनता की तकलीफ के सबसे ज़रूरी मुद्दे महंगाई पर किसी आन्दोलन की बात नहीं करती,सड़क पर जाने की बात सोचती ही नहीं  .जबकि डॉ मनमोहन सिंह के समय मुख्य विपक्षी पार्टी  बीजेपी-आरएसएस हुआ करती थी और वह महंगाई के हर मुद्दे पर सड़क का मैदान ले लेती थी . समझ में नहीं आता की मौजूदा विपक्षी पार्टियों की समझ में यह बात कब आयेगी कि संकट की हालात की शुरुआत में  ही सरकार की नीतियों के खिलाफ जागरण का अभियान शुरू कर देने से आम आदमी की जान महंगाई के थपेड़ों से बचाई जा सकती है. पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि तो ऐसी बात है जो सौ फीसदी सरकारी कुप्रबंध का नतीजा है . अगर कांग्रेस के शुरुआती दौर की बात छोड़ भी दी जाए जब घनश्याम दास बिड़ला की अम्बेसडर कार को जिंदा रहने के लिए अपने देश में कारों का वही इंजन चलता रहा जिसे बाकी दुनिया बहुत पहले ही नकार चुकी थी क्योंकि वह पेट्रोल बहुत पीता था . अम्बेसडर कार में वही इंजन चलता रहा लेकिन कांग्रेस में बिड़ला की पंहुच इतनी थी कि सरकारी कार के रूप में अम्बेसडर ही चलती रही . बहरहाल यह पुरानी बात है और उसके लिए ज़िम्मेदार किसी को भी ठहरा लिया जाए लेकिन इतिहास बदला नहीं जा सकता ,उससे केवल सबक लिया जा सकता है . केंद्र सरकार का मौजूदा रुख निश्चित रूप से अजीब है  क्योंकि वह पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों के बढ़ने से होने वाली महंगाई को रोकने की दिशा में कोई पहल करने की बात तो दूर   उसको स्वीकार तक नहीं कर रही है . बहुत मेहनत से इस देश में पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ था लेकिन ग्लोबलाइज़ेशन और उदारीकरण की आर्थिक नीतियों  के दौर में डॉ मनमोहन सिंह की  सरकार ने ही  आर्थिक विकास में सबसे ज्यादा योगदान कर सकने वाली कंपनियों को पूंजीपतियों को सौंपने का सिलसिला शुरू कर  दिया  था  वह प्रक्रिया आज भी जारी है यह अलग बात है कि कभी देश की शान रही एयर इंडिया जैसी लाभ कमाने वाली  कंपनी की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उसे बिक्री के लिए बाज़ार में लाया  गया तो  कोई खरीदने के लिए  तैयार नहीं हुआ. सरकार उसको बेचने पर आमादा है . जाहिर है इस बार औने पौने दाम पर उसको निपटा दिया जाएगा . कभी देश को पेट्रोलियम  की खोज की दिशा में आत्मनिर्भर बनाने वाली सरकारी कंपनी ,ओ एन जी सी और अन्य पेट्रोलियम कंपनियां  अब घाटे में हैं और बिक्री के लिए विनिवेश के बाज़ार में सौदा बन सकती हैं .  कई बार तो ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन अब सरकार के काबू से बाहर जा चुका है . आर्थिक उदारीकरण के बाद  पिछले २५  वर्षों में कार्पोरेट जगत के पास इतनी  ताक़त आ  गयी है कि अब वे हर क्षेत्र में सरकार और उसकी नीतियों को नज़रअंदाज़ करने और चुनौती देने की स्थिति में आ गए हैं और  मनमानी कर सकने की स्थिति में हैं . सरकार के पास निजी पूंजी को काबू कर सकने की ताक़त अब बिलकुल नहीं है .

इस पृष्ठभूमि में बढ़ती कीमतों के अर्थशास्त्र को समझने की ज़रुरत है . दुर्भाग्य यह है कि देश का मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व कुछ भी कंट्रोल कर पाने की स्थिति में नहीं है . ऐसे ही हालात यू पी ए-२  सरकार के समय में २००९ से ही शुरू हो गए थे  और २०११ आते आते त्राहि त्राहि मच गयी थी . हालांकि उस वक़्त तर्क यह दिया गया था कि गठबंधन सरकार की अपनी मजबूरियां होती हैं . लेकिन सचाई को सार्वजनिक रूप से कोई भी स्वीकार  करने के लिए तैयार नहीं था.  जबकि सरकारी नेता  मानते थे  कि कीमतों को बढ़ना राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करता  है . २०१२ में  ही तत्कालीन विपक्षखासकर बीजेपी-आरएसएस का महंगाई के खिलाफ अन्ना हजारे वाला आन्दोलन चल पड़ा और कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को  भ्रष्टाचार का पर्यावाची बना दिया गया . तत्कालीन सी ए जी विनोद राय ने टू जी स्पेट्रम घोटाले  के पौने  दो लाख करोड़ रूपये के घोटाले का हथियार भी पब्लिक डोमेन में डाल दिया कामनवेल्थ खेलों के घोटाले को भी बड़ा रूप दे दिया गया और उसके सर्वेसर्वा  सुरेश कलमाडी को जेल की हवा खानी पड़ी थी  . यह अलग बात है कि अभी तक  कामनवेल्थ खेलों के घोटालों के कथित अभियुक्तों को कोई सज़ा नहीं हुई है .  सी ए जी विनोद राय के पौने दो लाख  रूपये के टू जी स्पेक्ट्रम के घोटाले के आंकड़े भी मौजूदा सरकार के अधिकारियों की नज़र में फर्जी पाए  गए हैं लेकिन राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन में  उनका इतना बेहतरीन उपयोग  हुआ कि उस वक़्त के  विपक्ष को जनता ने देश की सरकार सौंप दी.

आज देश में उसी पार्टी की सरकार है जो उस वक़्त आन्दोलन की अगुवा थी . इसमें दो राय नहीं कि यह महंगाई और भ्रष्टाचार विरोधी उसी आन्दोलन के बाद सत्ता में आई है .  आज भी  जिस तरह से दाम बढ़ रहे हैं वे बहुत ही खतरनाक दिशा की ओर संकेत कर रहे हैं . सरकार की आर्थिक नीतियाँ ऐसी  हैं कि आम आदमी के पास कुछ भी खरीदने के लिए पैसा नहीं है . उदारीकरण के बाद आम आदमी ने स्वीकार कर लिया था कि अब उसके मेहनत को पूंजीपति वर्ग के कारखानों के लिए कच्चा माल माना जाएगा और उस्सको जो  भी अपनी  मेहनत की कीमत मिलेगी ,वह कारखानों से निकले हुए माल के बाज़ार में खरीदारी के काम आयेगी . नोटबंदी के बाद जो बहुत बड़े पैमाने पर बेरोजगारी आयी है उसके चलते गरीब की मेहनत के लिए कोई बाज़ार नहीं रह गया है . ज़ाहिर है उपभोक्ता वस्तुओं के खरीदार भी  कम हुए  हैं . सरकार सप्लाई साइड में तो  पब्लिक का पैसा झोंक  रही है लेकिन उससे कोई रोज़गार नहीं पैदा हो रहा है  जिसके चलते आम आदमी के हाथ में कुछ सरप्लस आमदनी नहीं आ रही है .उसी आमदनी से तो कारखानों में बने हुए माल की डिमांड  बढ़ती है जो अब नहीं बढ़ रही  है.  अजीब स्थिति है .इससे बचने का एक ही  तरीका  है कि  सरकार ऐसी नीतियाँ लाये जिससे यह आगे कुआं और पीछे खाईं वाली स्थिति को संभाला जा सके .

दुनिया भर के इतिहास से सबक लेने की ज़रूरत है . देखा गया है कि जब महंगाई कमरतोड़ होती  है तो शहरी आबादी के पास खाने पीने की भारी कमी हो जाती है . ऐसी हालत में  असंतोष बढ़ जाता है . अगर खाने की हर चीज़ नागरिकों की क्रय सीमा के बाहर हो जाती है तो आम आदमी लूट खसोट पर आमादा हो  जाता है .वह स्थिति अराजकता को जन्म देती है .इसलिए सरकार को चाहिए कि विवाद के नए नए मुद्दे पैदा करके जनता को उसमें भरमाये रखने  शुतुरमुर्गी  नीतियों को  छोड़ दे और तबाह हो रही अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश करें .  पाकिस्तान की  हालात को टीवी पर चर्चा के माहौल को बंद करें और आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करें. 

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