Sunday, October 21, 2018

ताकि सनद रहे


दूसरा युद्ध समाप्त होने के बाद जर्मन, जापान और इटली के सभी सैनिक बतौर युद्धबंदी पकड़ लिए गए थे. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के सभी अफसर और सैनिक भी बर्मा, मलाया, सिंगापुर आदि जगहों से युद्धबंदी बना लिए गए थे. उन सैनिकों के ऊपर अंग्रेजों ने बाकायदा मुक़दमा चलाया . भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने INA डिफेंस कमेटी बनाकर इन युद्धबंदियों की मदद की . जब उन पर मुक़दमा चला तो कांग्रेस की इस कमेटी की ओर से आज़ाद हिन्द फौज के सैनकों की पैरवी करने के लिए जो बड़े वकील को पेश हुए उनमें भूलाभाई देसाई , जवाहरलाल नेहरू, आसफ अली ,कैलाश नाथ काटजू और तेज़ बहादुर सप्रू प्रमुख थे . जवाहरलाल नेहरू ने आज़ाद हिन्द फौज के युद्धबंदियों के पक्ष में वकील के रूप में भी काम किया और एक राजनेता के रूप में भी अपने भाषणों में बार बार अँगरेज़ सरकार को चेतावनी दी कि आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह व्यवहार किया जाए क्योंकि वे अपने देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जबकि जर्मनी, जापान आदि की सेनायें अन्य देशों पर हमला करने के लिए लड़ रही थीं. बाकी लोग तो वकील का काम करते रहे थे लेकिन जवाहरलाल ने वकालत का काम १९२६ में ही छोड़ दिया था और उसके बीस साल बाद लाल किले में अपने दोस्त सुभाष चन्द्र बोस के साथियों के बचाव पक्ष के वकील के रूप में पेश हुए थे.
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Friday, October 19, 2018

धर्म का उद्देश्य सबका कल्याण है , धर्म में परपीड़ा की कोई जगह नहीं



शेष नारायण सिंह
नौ दिन के नवरात्र बीत गए . आसपास का पूरा माहौल धर्ममय था . चारों तरफ श्रद्धा और आस्था का माहौल था .. दुर्गा जी के अलग अलग रूपों की पूजा अर्चना होती रही . बच्चे बूढ़े सभी भक्ति में सराबोर रहे. मेरे जैसे लोग भी बच्चों के साथ  पूजा पंडाल में जाते रहे . विद्वान पत्रकार और अग्रणी साहित्यकार विष्णु नागर ने अपनी दुर्गापूजा की अनुभूतियों को बहुत ही दिव्य भाषा में लिखा : "आज इस अधार्मिक व्यक्ति ने धर्म का लाभ उठाने में चूक नहीं की,बिल्कुल नेताओं की तरह।हमारे इलाके में बांग्लाभाषी बड़ी संख्या में हैं और दुर्गा पूजा एकदम आसपास के इलाके में तीन जगह होती है।आज सप्तमी को खिचड़ी और लाबड़ा(मिक्स सब्जी) बनता है।कुछ साल पहले यहाँ की कालीबाड़ी में बेटा -बहू और पोते समेत रौनक और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने गये तो वहाँ खिचड़ी और लाबड़ा वितरण चल रहा था। शायद दिन का बच गया था।खाया तो खूब आनंद आया।फिर पता चला कि सप्तमी को दिन में बाकायदा भोजन मिलता है।अगले साल से जाने लगे और खिचड़ी का स्वर्गिक आनंद लेने लगे।यहाँ लाइन में लगकर थाली लेना चाहें तो वह व्यवस्था भी है और बाकायदा बैंच और टेबल पर खाना चाहें तो वह भी।हमने आज सभ्यता का चोलाधारण कर भोजन ग्रहण किया।खिचड़ी,लाबड़ापत्तागोभी की सब्जी भरपेट खाई और फिर खीर और गुलाबजामुन प्राप्त किया।सब उत्कृष्ट।डटकर खाया।सोचा कि जब देवी के नाम पर इतनी बढ़िया खिचड़ी का भोजन किया है तो देवी को नमस्कार भी कर दें,सो मानवी मानकर वह भी कर दिया।कल पास में हमारे पड़ोस की एक बच्ची का कथक नृत्य देखने जाना था तो दुर्गा कथा का भी लाभ मिल गया।क्या तैयारी और क्या सामूहिक गायन था।इतना सुदीर्घ न होता तो इसके संगीत पक्ष का आनंद और अधिक ले पाता।नवमी तक हमारे इलाके में जैसी रौनक शाम- रात को होती है,वैसी सालभर तक कभी देखने को नहीं मिलती।"
धर्म का अर्थ वास्तव में मानव जीवन में आनंद की स्थिति उत्पन्न करना है . नास्तिक और अधार्मिक होते ही भी विष्णु जी ने अपने बच्चों के साथ अपने सामजिक परिवेश में धार्मिक माहौल का आनंद लिया . धर्म के और भी बहुत सारे उद्देश्य होंगें लेकिन यह भी एक महत्वपूर्ण  उद्देश्य है.  अपने देश में बहुत सारे ऐसे दर्शन हैं जिनमें ईश्वर की अवधारणा ही  नहीं है . ज़ाहिर है उन दर्शनों पर  आधारित धर्मों में में ईश्वर की पूजा का कोई विधान नहीं होगा. देश में नास्तिकों की भी बहुत बड़ी संख्या है . उनके लिए भी किसी देवी देवता का पूजन बेमतलब है . लेकिन सामाजिक स्तर पर धार्मिक गतिविधियां होती रहती हैं और  नास्तिक भी उसमें शामिल होते हैं .  ऐसा इसलिए होता  है कि अपनी मूल डिजाइन में कोई भी धर्म समावेशी होता है , वह अधिकतम संख्या को अपने आप में शामिल करने में विश्वास करता है .
धर्म के सम्बन्ध में बहस राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में भी चली थी. उस दौर में राष्ट्रीय आन्दोलन के अंदर जो प्रगतिशील आन्दोलन की धारा थी उसके लिए धर्म की  मार्क्सवादी व्याख्या को भारतीय   सन्दर्भ में समायोजित करने की  चुनौती थी . आखिर में  तय हुआ कि धर्म का जो सांगठनिक पक्ष है वह तो कर्मकांडी लोगों का ही क्षेत्र है लेकिन धर्म से  जुडी जो  सांस्कृतिक गतिविधियाँ हैं उनका धर्म के कर्मकांड से कोई लेना देना नहीं है .वह वास्तव में जनसंस्कृति का हिस्सा है . ऐसा इसलिए भी  है कि पूजा पद्धति में वर्णित पूजा विधियां तो लगभग सभी जगह  एक ही होती हैं और उनका निष्पादन धार्मिक कार्य करने वाले करते हैं . यह सभी धर्मों में  अपने अपने तरह से संपादित किया जाता  है लेकिन उसके साथ वे कार्य जिसमें आम जनता पहल करती है और शामिल होती है वह जनभावना होती है .उसमें मुकामी संस्कृति अपने  रूप में प्रकट होती है .बंगाल में दुर्गापूजा तो धार्मिक जीवन का हिस्सा है लेकिन उसी स्तर पर वह लोकजीवन का भी  हिस्सा है . पूजा पंडालों  में देश -काल के हवाले से हमेशा ही बदलाव होते रहते हैं . उसी तरह से पूजा के अवसर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी  हालाँकि धार्मिक होते हैं लेकिन उनका स्थाई और संचारी भाव लोकजीवन और क्षेत्रीय संस्कृति से  जुड़ा हुआ होता  है .
पश्चिम बंगाल में जब १९७७ में लेफ्ट फ्रंट की सरकार बनी तो  विचारधारा के स्तर पर यह चर्चा एक बार फिर हुयी और यही सही पाया गया कि संस्कृति की रक्षा अगर करनी है तो उससे जुड़े  आम आदमी के काम को महत्व देना ही होगा .जहां तक धर्म के शुद्ध रूप की बात है उसमें भी किसी तरह के झगड़े का स्पेस नहीं होता .दर्शन शास्त्र के लगभग सभी विद्वानों ने धर्म को परिभाषित करने का प्रयास किया है। धर्म दर्शन के बड़े ज्ञाता गैलोबे की परिभाषा लगभग सभी ईश्वरवादी धर्मों पर लागू होती है। उनका कहना है कि -''धर्म अपने से परे किसी शक्ति में श्रद्धा है जिसके द्वारा वह अपनी भावात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और जीवन में स्थिरता प्राप्त करना है और जिसे वह उपासना और सेवा में व्यक्त करता है। इसी से मिलती जुलती परिभाषा ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी दी गयी है जिसके अनुसार ''धर्म व्यक्ति का ऐसा उच्चतर अदृश्य शक्ति पर विश्वास है जो उसके भविष्य का नियंत्रण करती है जो उसकी आज्ञाकारिताशीलसम्मान और आराधना का विषय है।"

भारत में भी कुछ ऐसे धर्म हैं जो सैद्धांतिक रूप से ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। जैन धर्म में तो ईश्वर की सत्ता के विरुद्ध तर्क भी दिए गये हैं। बौद्ध धर्म में प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत को माना गया है जिसके अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है और यह संसार कार्य-कारण की अनन्त श्रंखला है। इसी के आधार पर दुख के कारण स्वरूप बारह कडिय़ों की व्याख्या की गयी है। जिन्हें द्वादश निदान का नाम दिया गया है।इसीलिए धर्म वह अभिवृत्ति है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र कोप्रत्येक क्रिया को प्रभावित करती है। इस अभिवृत्ति का आधार एक सर्वव्यापक विषय के प्रति आस्था है। यह विषय जैन धर्म का कर्म-नियमबौद्धों का प्रतीत्य समुत्पाद का सिद्धांत  या वैष्णवोंईसाइयों और मुसलमानों का ईश्वर हो सकता है। आस्था और विश्वास में अंतर है। विश्वास तर्क और सामान्य प्रेक्षण पर आधारित होता है लेकिन आस्था तर्क से परे की स्थिति है। पाश्चात्य  दार्शनिक इमैनुअल  कांट ने आस्था की परिभाषा की है। उनके अनुसार ''आस्था वह है जिसमें आत्मनिष्ठ रूप से पर्याप्त लेकिन वस्तुनिष्ठ रूप से अपर्याप्त ज्ञान हो।"आस्था का विषय बुद्धि  या तर्क के बिल्कुल विपरीत नहीं होता लेकिन उसे तर्क की कसौटी पर कसने की कोशिश भी नहीं की जानी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि जो धार्मिक मान्यताएं बुद्धि के विपरीत होंवे स्वीकार्य नहीं। धार्मिक आस्था तर्कातीत है तर्क विपरीत नहीं। सच्चाई यह है कि धार्मिक आस्था का आधार अनुभूति है। यह अनुभूति सामान्य अनुभूतियों से भिन्न है। इसी अनुभूति को रहस्यात्मक अनुभूति या समाधिजन्य अनुभूति कहा सा सकता  है। धार्मिक मान्यता है कि यह अनुभूति सबको नहीं होती केवल उनको ही होती है जो अपने आपको इसके लिए तैयार करते हैं।


इस अनुभूति को प्राप्त करने के लिए धर्म में साधना का मार्ग बताया गया है। इस साधना की पहली शर्त है अहंकार का त्याग करना। जब तक व्यक्ति तेरे-मेरे के भाव से मुक्त नहीं होगातब तक चित्त निर्मल नहीं होगा और दिव्य अनुभूति प्राप्त नहीं होगी। इस अनुभूति का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि इस अनुभूति के वक्त ज्ञाताज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुरी नहीं रहती। कोई भी साधक जब इस अनुभूति का वर्णन करता है तो वह वर्णन अपूर्ण रहता है। इसीलिए संतों और साधकों ने इसके वर्णन के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीक उसी परिवेश के लिए जाते हैंजिसमें साधक रहता है इसीलिए अलग-अलग साधकों के वर्णन अलग-अलग होते हैंअनुभूति की एकरूपता नहीं रहती।
लेकिन इस बात में बहस नहीं है कि इस दिव्य अनुभूति का प्रभाव सभी देशों में रहने वाले साधकों पर एक सा पड़ता है। यही नहीं यह सर्वकालिक भी है .
आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि सन्त चरित्र है। सभी धर्मों के संतों का चरित्र एक सा रहता है। सन्तों का जीवन के प्रति दृष्टिïकोण बदल जाता हैऐसे सन्तों की भाषा सदैव प्रतीकात्मक होती है। इसका उद्देश्य किसी वस्तुसत्ता का वर्णन करना न होकरजिज्ञासुओं तथा साधकों में ऊंची भावनाएं जागृत करना होता है। सन्तों में भौतिक सुखों के प्रति उदासीनता का भाव पाया जाता है। लेकिन यह उदासीनता नकारात्मक नहीं होती। पतंजलि ने साफ साफ कहा है कि योग साधक के मन में मैत्रीकरुणा एवं मुदिता अर्थात दूसरों के सुख में संतोष के गुण होने चाहिये।
धर्म की बुलंदी यह  है कि जो वास्तव में धार्मिक होते हैं वे मानवीय तकलीफों के प्रति उदासीन नहीं होते। रामचरित मानस के अरण्यकांड के अंत मे संत तुलसीदास ने सन्तों के स्वभाव की विवेचना की है। कहते हैं-संत सबके सहज मित्र होते हैं-श्रदधा , क्षमामैत्री और करुणा उनके स्वाभाविक गुण होते हैं। मैत्रीकरुणामुदिता और सांसारिक भावों के प्रति उपेक्षा ही संत का लक्षण है .किसी भी धर्म की सर्वोच्च उपलब्धि सन्त का चरित्र ही है।
धर्म के किसी भी कार्य में संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं होती . जब घोषित रूप से धर्म का उद्देश्य ' दूसरों के सुख में संतोष' ही है तो धर्म के नाम पर हिंसा तो किसी तरह से धर्म का काम हो ही नहीं सकती . इसलिए वर्तमान धार्मिक नेताओं और धर्म के नाम अपर राजनीति करने वाले राजनीतिक नेताओं को यह तय करना पडेगा कि जब धर्म में ' मैत्रीकरुणा एवं मुदिता' सबसे ज़रूरी शर्त है तो अपने समर्थकों को हिंसक गतिविधियों से दूर रहने की प्रेरणा दें . यह बात सबरीमाला में भी लागू होनी चाहिए और अयोध्या में भी . संत तुलसीदास ने भी कह दिया है :' परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई ' पाकिस्तान में बैठे जो लोग धर्म के नाम पर देश की एक बड़ी आबादी को  अधार्मिक काम करने को प्रेरित कर रहें ,उनको नियम कानून के हिसाब से दण्डित किया जाना चाहिए .  

Thursday, October 18, 2018

नारायण दत्त तिवारी होने का मतलब ,अलविदा तिवाड़ी जी




नारायण  दत्त तिवारी नहीं रहे.  93 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी . एक ज्योतिषी मित्र ने बताया था उनकी कुण्डली में एकावली योग था . एकावली के बारे में उन्होंने बताया कि यदि लग्न से अथवा किसी भी भाव से आरम्भ करके सातों ग्रह क्रमशः सातों भावों में स्थित हो तो एकावली योगबनता है .इस योग में जन्म लेने वाला जातक महाराजा अथवा मुख्यमन्त्री या फिर राज्यपाल आदि होता है . बहरहाल उनका यह तथाकथित एकावली योग तो मुझे बहुत प्रभावित नहीं करता लेकिन उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने जो काम किया है उस पर किसी को भी गर्व हो सकता है .  तीन मुख्यमंत्रियों ने उनकी राजनीति और वक्तृता की धार देखी थी. 1952 में तिवारी जी नैनीताल  क्षेत्र से प्रसोपा ( प्रजा सोशलिस्ट पार्टी-झोपड़ी निशान ) से चुनकर आये थे . गोविन्द वल्लभ पन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. कुछ दिन बाद पन्त जी केंद्र सरकार में चले गए और डॉ संपूर्णानंद मुख्यमंत्री हुए . जिस तरह से पहाड़ की और किसानों की समस्यायों को उन्होंने विधानसभा में उठाया , सरकार को उसके बारे में विचार करने को मजबूर होना पड़ा. १९५७ में भी वह  नैनीताल से ही चुनकर आये . उनकी पार्टी के के नेता त्रिलोकी सिंह विरोधी दल के भी नेता थे.  नारायण दत्त तिवारी प्रसोपा के उपनेता थे. गन्ना किसानों की समस्याओं को जिस धज से तिवारी जी ने उत्तर प्रदेश सरकार का एजेंडा बनाया ,वह किसी भी संसदविद का सपना हो सकता है. उनके हस्तक्षेप के कारण ही उत्तर प्रदेश में गन्ना विभाग में बहुत काम हुआ . बहुत सारे विभाग आदि बने .उस दौर में चंद्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री थे और उन्होंने विपक्ष से आने वाली सही बातों को सरकार के कार्यक्रमों में शामिल किया . गुप्त जी मूल रूप से  डेमोक्रेट थे. आज जिस उत्तर  प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री लोग सरकारी मकान पर क़ब्ज़ा करने के लिए तरह तरह के तिकड़म करते देखे गए हैं उसी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चंद्रभानु गुप्त अपने पानदरीबा वाले पुराने मकान में ही जीवन भर रहे  और वे विपक्षी नेता के रूप में नारायणदत्त तिवारी का लोहा मानते थे .
1963 में नारायण दत्त ने पार्टी बदल दी . जब जवाहरलाल नेहरू ने सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी को सरकार और कांग्रेस का लक्ष्य  बताया और समाजवादियों को कांग्रेस में शामिल होने का आवाहन किया तो  बहुत सारे सोशलिस्ट नेता कांग्रेस में शामिल हो गए . अशोक मेहता जैसे राष्ट्रीय नेता की अगुवाई में  जो लोग कांगेस में गए उसमें उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख सोशलिस्ट थे. नारायण दत्त तिवारी और चन्द्र शेखर. कांग्रेस में तो उनको बहुत सारे पद-वद मिले . दो राज्यों के मुख्यमंत्री , केंद्रीय मंत्री ,राज्यपाल वगैरह भी रहे लेकिन मुझे उनकी शुरुआती राजनीति हमेशा ही प्रभावित करती रही  है . 1963 का वह काल उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्ण काल है .

धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट , आपने पटाखे बंद करके गरीब को सम्मान दिया है

A gacebook post from October 18, 2017 

उसके गाँव में दीवाली के दिन दाल भरी पूरियां, सूरन की मसलही तरकारी ,बखीर और कचौरी का भोजन हुआ करता था. माई सुबह से ही यह सब बनाने में जुट जाती थीं. गुड में सोंठ डालकर भरन बनायी जाती थी, जो गुझिया में डाल कर बहुत ही स्वादिष्ट हो जाती थी.
शाम को रोंघई कोंहार के यहाँ से आया दिया जलाकर ,घूर पर , खेत में , बैलों के खूंटे पर , जुआठ और हल पर , घर में हर कोने में , आँगन में रखा जाता था.
घर की बड़ी बूढ़ी दिया जलाती थीं ,जिसको बच्चे ले जाकर सही जगह पर रखते थे. जहाँ पूजा होती थी, वह जगह सबसे पवित्र होती थी. सारे दिए बस कुछ मिनटों में बुझ जाते थे. घर में एक दिया बड़ा वाला जलाया जाता था , जो शुद्ध घी का होता था और रात भर प्रकाशमान रहता था.
सुबह सुबह उठकर बच्चे गाँव भर में घूमकर दिया बटोरते थे जो घर के बहुत छोटे बच्चों के खिलौने के रूप में संभालकर रख लिया जाता था . पूरे गाँव में ,हर परिवार में दीवाली का यही तरीका होता था .
कहीं कोई पटाखे नहीं, कोई मोमबती नहीं, कोई झालर नहीं . गाँव में सभी परिवार खुश रहते थे ,किसी को गरीब होने का अहसास नहीं होता था , हालांकि उसके गाँव में सभी गरीब थे .
एक परिवार के कुछ लोग सरकारी नौकरी में चले गए तो उनके यहाँ दीवाली के दिन मोमबती आ गयी . लेकिन वे लोग किसी भी परिवार को हीनभावना नहीं दिला सके.
बुजुर्गों ने उस परिवार के लोगों को ललगंड़िया कहकर निपटा दिया , यानी कुछ पैसे क्या आ गए नक्शेबाजी करने लगे. अब वहां भी सब बदल गया है. शहर की नक़ल करने के चक्कर में गाँव को लुटाया जा रहा है.
सोलह साल की उम्र में दसवीं पास करके वह शहर के कालेज में दाखिल हो गया . वहां भी छात्रावास की दीवाली में कुछ ख़ास नहीं होता था . बल्कि दीवाली की छुट्टियों में हास्टल सूना हो जाता था, सब लड़के अपने अपने गाँव चले जाते थे .
उसको शहर की दीवाली का अनुभव दिल्ली में हुआ. वहां हल, बैल,खेत आदि तो था नहीं इसलिए नार्थ एवेन्यू की उस बरसाती के एक कमरे के उसके घर में दाल भरी पूरी , सूरन की सब्जी बन गयी .
शाम को जब किसी दोस्त की बहन अपने बच्चों के साथ आई तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि यह लोग दीवाली क्यों नहीं मना रहे है.जब उसको बताया गया तो शहर में पली बढ़ी महिला की समझ में बात तुरंत आ गयी.
पहाड़गंज जाकर उन्होंने कुछ खील बताशे, कुछ मोमबत्तियां, आधा किलो मिठाई , लक्ष्मी-गणेश की छोटी मूर्ति खरीद कर हमारी दीवाली को शहरी बना दिया .
जब पड़ोसियों के बच्चे पटाखे चलाने लगे और उसके बच्चे टुकुर टुकुर ताकने लगे तब उसको लगा कि हमसे कुछ गलती हो गयी है , अब वह शहर में आ चुका है .
शहर हर इंसान को हीन भावना का शिकार बना देता है .
दूसरों के बच्चों को पटाखे चलाते देखते हुए बच्चों के चेहरे पर जो भाव थे , वे उसको हर पल गरीब बना रहे थे .
अगले साल वह सफदरजंग एन्क्लेव में किराए के मकान में रहने चला गया . वहां शहरी हिसाब से पटाखे आदि लाये गए, मोमबती लगाई गयी , पूजा हुयी, मिठाई आयी लेकिन पड़ोसियों के बच्चों के पटाखों की संख्या बहुत ज्यादा थी, सब गड़बड़ा गया .
बच्चे इस बार भी अपने को कमतर पा रहे थे. अगले साल ज़्यादा पटाखे आये लेकिन तब तक हज़ार ,दो हज़ार, दस हज़ार पटाखों वाली लड़ी बाज़ार में आ चुकी थी.
व्यापारियों का मोहल्ला था, रात ग्यारह बजे के बाद जब सेठ लोग दूकान बंद करके आये तो उन्होंने घंटों पटाखे चलाये और पटाखों की धौंस का मतलब उसकी समझ में आया.
इस साल जब सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाया तो उसने सोचा कि अगर सन अस्सी में यह काम हो गया होता तो वह अपने बच्चों की बेचारगी देखने से बच गया होता .
सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद कि उन्होंने दिल्ली शहर में रह रहे लाखों लाचार लोगों को हीनभावना का शिकार होने से बचा लिया .

Saturday, October 13, 2018

नीम का बड़े पैमाने पर रोपण देश को जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचा सकता है .



शेष नारायण सिंह

नीम प्रकृति की  तरफ से इंसानियत को एक वरदान है . यह बात आदिकाल से सत्य है और अब तो मानवीय आस्था का हिस्सा बन चुकी है .नीम के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन भी खूब हुए हैं . तारा तरह के हुए अनुसंधान का नतीजा है कि आज नीम का सम्मान दुनिया भर में है. नीम एक ऐसा पेड़ है जो कड़वा होता है परंतु अपने गुणों के कारण आयुर्वेद व चिकित्सा जगत में इसका दुनिया भर में डंका बज रहा है .नीम से खून साफ होता है .
नीम कीड़ों को मारता है। इसलिए इसके पत्तों को कपड़ों व अनाज में रखा जाता है।
हृदय रोगों में भी नीम लाभदायक है। हृदय रोगी नीम के तेल का सेवन करें तो फायदा होता है .नीम की दातुन से दांत साफ करना काफी फायदेमंद होता है।
 स्वाद तो कड़वा होता  है लेकिन फायदे अनंत है . 
नीम को एक अभियान की तरह विकसित करने के बहुत सारे प्रयास हो रहे  हैं . इस का एक उदाहरण मुंबई में देखने को मिला. अखिल भारतीय मारवाड़ी महासभा के संस्थापक अध्यक्ष महेश राठी ने एक संकल्प ले रखा है कि पूरे देश में नीम के पेड़ लगाना है . महेश जी मुंबई में रहते हैं . वहां सोसाइटियों में बहुत कम कच्ची मिट्टी होती है लेकिन मारवाड़ी महासभा के तत्वावधान में हर सोसाइटी में नीम लगाने का अभियान छेड़ रखा है . करीब चार साल पहले उन्होंने मुझे बताया था कि पूरी देश में नीम के पौधे लगाने का अभियान चलायेंगें . मुझे लगा कि महेश जी सपने देख रहे हैं लेकिन आज जब उनके प्रयास से नीम लगाने की ख़बरें देखता हूँ तो लगता है कि यह आदमी एक जूनून की हद तक जाने को तैयार है .राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र में उन्होंने नीम के पौधे लगाने को एक आन्दोलन का रूप दे दिया है . अभी खबर आई है कि इंदौर में भी उन्होंने  नीम महोत्सव का बड़ा आयोजन किया बताया गया है कि मारवाड़ी महासभा द्वारा अभी तक पांच लाख से अधिक नीम के पौधे वितरित करके  उन्हें वृक्ष के रूप में विकसित करने काम चल रहा है . शायद यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि अगर सघन रूप से नीम का अभियान चल गया तो राजस्थान से मरुस्थल का क्षेत्र  बहुत ही कम हो जाएगा .
मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो तीन चार एकड़ खेत में नीम के उद्यान लगाकर उनसे निकलने वाली  निमकौडी से अच्छी आमदनी ले रहे हैं .  मेरठ की संस्था हरित पर्याय भी अपने चंहुमुखी  अभियान में नीम को महत्व देकर पर्यावरण में योगदान कर रही है . उसकी संस्थापक मधु गुप्ता दिन रात वातावरण से प्रदूषण को खारिज करने के काम में लगी रहती हैं.  नीम से मुझे भी बहुत ही अधिक लगाव  है . नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैंगाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था , वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थीतो आकाशीय विद्युत् के कारण उस पेड़  को नुक्सान हो गया .  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में घनी वर्षा हो रही थी, रात का समय था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम की एक मोटी डाल टूट कर नीचे गिर गई थी,  मेरे बाबू वहीं पास में बनी  बैठक  में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . उस हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम का पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं .
पुरानी नीम के पेड़ का मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैं अपने बचपन के साथियों के साथ घंटों खेला करता था . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. यह दोनों  बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के अलाव  में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे , १९४४ में रिटायर हो गए थे , और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो किसी कुएं की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . पौदर उस जगह को कहा जाता था जो कुएं के पास होती थी. किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो गाँव वालों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें भी सीखीं थीं.
मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   पीलीभीत से गाजीपुर की गोमती नदी की यात्रा में उसके किनारे   वैसे तो बहुत सारे तीर्थ स्थान हैं लेकिन धोपाप का महत्व सबसे ज़्यादा है .  लोकोक्ति है कि जब भगवान् राम रावण  वध के बाद अयोध्या आये तो उनके पंडितों ने उनको बताया कि उन पर ब्राह्मण की हत्या का दोष है . उस दोष से मुक्ति के लिए राजा रामचंद्र ने विधिवत यज्ञ आदि करवाया था.  उस इलाके में यह विश्वास है कि गौहत्या और ब्रह्म हत्या का  दोष लगने पर यजमान को अंत में धोपाप में गोमती नदी में स्नान करना ज़रूरी होता है . गौहत्या का दोष तो तब भी लग जाता था अगर किसी ने किसी खूंटे से  गाय को बांध दिया और सांप के काटने या किसी  बीमारी से गाय की मृत्यु हो गयी. ऐसे बहुत सारे लोग धोपाप जाया करते थे . जिसको  बाकी देश में गंगा दशहरा कहते हैं वह हममरे इलाके में जेठ की दशमी के नाम से जाना जाता है . इस अवसर पर  पहले के ज़माने में लोग पैदल ही  जाते थे और थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. अब तो सड़क पक्की हो  गयी है , बस  , टैक्सी आदि चलने लगी है लेकिन उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .

 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीजतेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है .
 एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में  झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .करीब दो साल पहले  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ कहा नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ .
जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है . भारत में तो अगर बहुत बड़े पैमाने पर नीम के पौधे लगाने का अभियान शुरू कर दिया जाए तो भारत जलवायु परिवर्तन के खतरों से बच सकता है और पर्यावरण की रक्षा में दुनिया अग्रणी मुकाम हासिल कर सकता है .

जीका वाइरस का प्रकोप और राजनीति को मज़बूत करने की ज़रूरत




शेष नारायण सिंह

राजस्थान में एक भयानक बीमारी ने दस्तक दे दी है . ज़ीका वाइरस के 55 मामले सामने आये हैं . यह एक खतरनाक  विषाणु है जिसका सही इलाज अभी विकसित नहीं हुआ है . अभी अंदाज़ से ही लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता  है . राजस्थान से जो सरकारी आंकड़े आ रहे हैं उसके हिसाब से स्थिति चिंताजनक  चुकी है . यह आंकड़े केवल  राजधानी जयपुर से लिए गए हैं. केंद्र सरकार की एक टीम ने वहां जाकर यह आंकडे एकत्र किया और नतीजे डरावने हो चुके हैं . यह जानना ज़रूरी  है कि विश्व  स्वास्थ्य संगठन इस वाइरस के बारे में के कहता है . जीका वाइरस मूल रूप से एडीज मच्छर के काटने से फैलता है . यह मच्छर दिन में ही काटता है . इसके लक्षण  पहले बहुत ही साधारण  दीखते  हैं. मामूली बुखार  ,खुजली, कंजक्टीवाइटिस,मांश पेशियों और जोड़ों में दर्द और सरदर्द बीमारी के शुरुआती लक्ष्ण हैं . गर्भवती महिलाओं में यह बहुत ही खतरनाक हो सकता है .जीका से ग्रस्त माहिला के गर्भ में पल रहा शिशु माइक्रोसेफाली से पीड़ित हो सकता है. यानी जब वह पैदा होगा तो उसका सर अपेक्षाकृत बहुत छोटा होगा .इसके अलावा कई बार गर्भपात या समय से पूर्व जन्म भी हो सकता है. न्यूरोलाजी से सम्बंधित बीमारियाँ भी इस  विषाणु के कारण हो सकती हैं .. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेताया है कि जी बी सिंड्रोम का कारण भी जीका वाइरस बन सकता  है . जी बी सिंड्रोम एक ऐसा रोग  है जो मरीज़ के शरीर की  मांशपेशियों को लगातार कामजोर करता रहता है और एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि शरीर के अंगों का हिलना डुलना भी बंद हो जाता है .
जीका वाइरस की जानकारी का सबसे पुराना उदहारण १९४७  का है जब उगांडा में यह विषाणु बंदरों में पाया गया था . १९५२ में पहली बार इस के लक्षण उगांडा और नाइजीरिया में इंसानों में देखे गए थे . बाद में तो १९६० से १९८० के बीच अफ्रीका और लातीनी अमरीका में जीका के बहुत सारे मामले पकड़ में आये .२००७ में बहुत बड़े पैमाने पर यह बीमारी  लातीनी अमरीका के द्वीप याप में फ़ैल गयी थी प्रशांत महासागर के देशों में जीका वाइरस के संक्रमण के बहुत सारे मामलों का पता चला .२०१५ में ब्राजील में खुजली की महामारी का पता चला जिसको बाद में जीका का संक्रमण माना गया . उसी साल इसको जी बी सिंड्रोम का कारण भी माना गया .अब तो मामला बहुत बढ़ गया है. अब तक ८६ देशों में जीका वाइरस आपना ज़हर फैला चुका है .  
अब तक जीका वाइरस से सम्बंधित जितनी बीमारियों का पता चला है उनमें जी बी सिंड्रोम सबसे खतरनाक है . करीब तीन साल पहले हमारे एक मित्र की पत्नी को पांव में कुछ कमजोरी महसूस हुयी. लखनऊ के पाश गोमती नगर इलाके में रहते हैं. उनके  एक पुराने सहपाठी लखनऊ मेडिकल कालेज में न्यूरोलाजी विभाग में  बड़े डाक्टर के रूप में तैनात थे . उनके पास ले जाया गया. उन्होंने देखते ही कहा कि शायद जी बी सिंड्रोम है . वहां पूरी सुविधाएं नहीं थीं  लिहाज़ा लखनऊ के एस जी पी जी आई रिफर कर दिया . वहां के डाक्टर भी दोस्त थे . उसके बाद यह लोग घर आ गए और सोचा कि खाना खाकर  पी जी आई चले जायेंगें .इस बीच पीजी आई वाले डाक्टर का फोन आया कि अभीतक आप लोग आये नहीं . कहाँ हैं. जब उनको   बताया गाया कि लंच करके आते हैं तो वे चिल्लाने लगे और डांटा कि तुंरत आओ वरना बहुत देर हो जायेगी . बहरहाल  जो आधे घंटे की  देरी हुई थी ,उसका नतीजा यह हुआ कि मरीज़ के शरीर की ज़्यादातर मांसपेशियाँ प्रभावित हो चुकी थीं और उनको ठीक होने में ढाई साल लग गए. पति पत्नी दोनों ही बड़े अफसर थे इसलिए खर्च नहीं हुआ लेकिन अगर मुफ्त इलाज़ की सुविधा न रही होती तो  आर्थिक रूप से भी बहुत मुश्किल हुई होती.
जी बी सिंड्रोम का अनुसंधान फ्रांस के दो  महान डाक्टरों ने किया था .  उनके नाम के आधार पर ही  इस बीमारी का नाम पड़ा है . इसमें शरीर का इम्यून  सिस्टम ही मांसपेशियों को कमज़ोर करने लगता है . शुरू में तकलीफ हाथ और पाँव में होती है उसके बाद  शरीर के ऊपरी हिस्से में कमजोरी आती है . एक स्थिति ऐसी आ जाती है  जब फेफड़ों की नसें भी जवाब देने लगती हैं और उसके बाद सांस लेना असंभव हो जाता है . और  यह सब केवल कुछ घंटों में हो जाता है.
इस पृष्ठभूमि में जीका वाइरस को देखने की ज़रूरत है . अब तो यह पक्का हो गया है कि यह वाइरस  मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश करता  है इसलिए उम्मीद  है कि मच्छरों पर काबू करके इसको बढ़ने से रोका जा सकता है.  हालांकि शुरू तो गरीब  इलाकों में होता है लेकिन मच्छरों को रोका तो जा नहीं सकता है . और  संपन्न इलाकों में भी फैलने की आशंका बनी हुयी रहती है इसलिए उम्मीद है कि सरकारी  तौर पर इसको काबू करने के सारे उपाय किये जायेंगें . राजस्थान में अभी खून के जो नमूने मिले हैं ,वे शास्त्री नगर और सिंधी कैम्प से लिए गए हैं . यहाँ से लाये गए  मच्छरों में विषाणु का मिलना कन्फर्म  हो चुका है . वहां मच्छर मारने के सरकारी अभियान शुरू किये जा चुके हैं . जो लोग बीमारी की चपेट में आ गए हैं उनके लिए  इलाज़ का विशेष इंतज़ाम किया जा चुका है . लोगों में जानकारी बढाने के लिए भी प्रयास किये जा रहे हैं .
भारत में यह जीका वाइरस का प्रादुर्भाव अपेक्षाकृत नया है. जनवरी २०१७ में पहली बार जीका वाइरस का पता अहमदाबाद में चला था उसी साल तमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले में भी  जीका का संक्रमण देखा गया था . लेकिन इनको कंट्रोल कर लिया गया था .शायद इसलिए कि मामला बाहुत छोटा था लेकिन  जयपुर का केस अलग  हैं . वहां बात बहुत बढ़ गयी है और  अभी तो पता नहीं वहां जीका का विस्तार कितना है .इसके लिए सरकार को युद्ध स्तर पर जुट जाना चाहिए . दिल्ली में ढाई साल पहले हुई सफाईकर्मियों की हड़ताल का नतीजा दिल्ली और आस पास के लोग भोग चुके  हैं. २०१६ में दिल्ली की केजरीवाल सरकार और बीजेपी के कंट्रोल वाले नगर निगम के झगड़े में सफाई कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला था. बीजेपी और आम आदमी पार्टी के नेता एक  दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हड़ताल को हवा दे रहे थे . नतीजा यह हुआ कि सफाई कर्मियों की तीन महीने से अधिक समय तक हड़ताल चली . सडकों पर कूड़े का अम्बार लग गया और बहुत बड़े पैमाने पर  मच्छरों की ब्रीडिंग हुई. दिल्ली ,नॉएडा ,फरीदाबाद, गाजियाबाद और  गुरुग्राम में बहुत बड़े पैमाने पर चिकनगुनिया, डेंगी और मलेरिया फैला . लेकिन दुर्भाग्य यह  है कि नेता लोग कोई सबक नहीं लेते. इस साल भी सफाई कर्मचारियों की हड़ताल हो  रही है .
सवाल यह  है कि जब मच्छरों के काटने से इतनी खतरनाक बीमारियाँ फ़ैल रही  हैं और उनको सफाई करके कंट्रोल किया जा सकता है तो सरकारें क्यों नहीं करतीं.ज़ाहिर है राजनीति में भ्रष्ट और गैरजिम्मेदार किस्म के लोग हैं और अब समय आ गया  है जब इन लोगों  पर लगाम  लगाया जाना ज़रूरी हो गया है .

Friday, October 12, 2018

मेरे दोस्त जवाहरलाल बरनवाल एक जिंदादिल इंसान हैं.




शेष नारायण सिंह

सुल्तानपुर -जौनपुर रोड पर सबसे बड़ा कस्बा लम्भुआ है . आज़ादी के पहले तो एक  गाँव था.  सड़क भी कच्ची मिट्टी और कंकड़ की थी . दूसरे विश्वयुद्ध के समय रेल लाइन बिछी थी  जो लम्भुआ से गुज़रती थी लेकिन वह केवल माल गाडी या फौज़ी गाडी के लिये ही इस्तेमाल होती थी.  १९४७  के बाद इस लाइन पर सवारी गाड़ी चलने लगी  . पहले सुल्तानपुर-जौनपुर पैसेंजर ( एस जे ) चलना शुरू हुयी तो आस पास के गाँवों के वैश्य बिरादरी के लोग  अपनी दुकानों को लेकर लम्भुआ आने लगे . जब मैं १९६७ में जौनपुर पढने गया तो सुबह एक गाड़ी जौनपुर जाती थी और वही शाम को वापस आती थी . और जो गाडी सुबह जौनपुर से चलकर सुल्तानपुर आयी रहती थी वह शाम ४.४०  पर सुल्तानपुर से चलकर जौनपुर जाती थी . सिंगरामऊ में  उसके कोयले के इन्जन में पानी भरा जाता था  . आजकल सिंगरामऊ स्टेशन का नाम हरपाल गंज कर दिया गया है . बाद में तो डीज़ल का इंजन आ गया लेकिन हमारी पैसेंजर कोयले से ही चलती थी .  लम्भुआ से जौनपुर का करीब पचास किलोमीटर का सफ़र यह  गाडी तीन  घंटे में तय करती थी. जब हम गाड़ी से जौनपुर सिटी स्टेशन पर उतरते थे तो सफ़ेद कपड़े सिलेटी हो चुके होते थे .उसी दौर में इस लाइन पर हावड़ा से अमृतसर जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन ,४९ अप और ५० डाउन भी चलने लगी थी. जब उसका स्टापेज लम्भुआ हो गया तो बाज़ार की कुण्डली में एक गाड़ी और जुड़ गयी . इस बीच सड़क पर भी काम शुरू हुआ और  धीरे धीरे सुल्तानपुर -जौनपुर की सड़क तारकोल वाली हो गयी . उसके बाद लम्भुआ की बाज़ार बड़ी होने लगी . शुरू में इस बाज़ार में शुक्रवार और सोमवार को ही ज्यादा खरीद फरोख्त होती थी , अब बात  बदल गयी है . अब तो लम्भुआ तहसील का  मुख्यालय भी  है . पहले नहीं था, पहले तहसील कादीपुर में हुआ करती थी . आज लम्भुआ बाज़ार नहीं एक छोटा शहर है .

लम्भुआ में एक जे क्लब है.  उसके आजीवन अध्यक्ष हैं जवाहर लाल बरनवाल . शायद १९६७ में इस क्लब ही स्थापना हुई थी . जवाहरलाल के अलावा क्लब के दो और सदस्य हैं, मास्टर कल्लूराम और अलीमुद्दीन . क्लब के नियम में लिखा है कि इसकी सदस्य संख्या बढ़ाई नहीं जा सकती है .सदस्य केवल तीन ही रहेगें.  बाद के वर्षों में क्लब बहुत ही लोकप्रिय हो गया . बहुत सारे दोस्तों ने मांग करना शुरू कर दिया कि हमको भी सदस्य बनाओ तो नियम में थोडा ढील दी गयी . तय हुआ कि स्थाई सदस्य तो नहीं  बढ़ाए जा सकते लेकिन लोगों को अस्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में स्वीकार किया जा  सकता है . इस नियम के बाद बहुत सारे लोग सदस्य बने . लेकिन सभी अस्थाई आमंत्रित सदस्य ही हैं . मुझे भी शायद १९७० में इस क्लब के सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया था  . सत्तर का दशक  क्लब के सदस्यों के लिए स्वर्णयुग है . ज्यादातर लोगों को इसी दौर में नौकरियाँ मिलीं. बहुत सारे लोगों की शादियाँ हुईं ,ज्यादातर लोगों के यहाँ बाल बच्चे हुए . और क्लब के अध्यक्ष जवाहरलाल बरनवाल को इमरजेंसी लगने के बाद गिरफ्तार किया गया . याद नहीं पड़ रहा कि मीसा में पकड़े गए थे कि डी आई आर में . किसी मुकामी कांग्रेसी नेता से उनकी अनबन हो गयी थी जिसने उनको इंदिरा गांधी का विरोधी बताकर बंद करवा दिया था . इंदिरा गांधी के विरोधी तो वे थे लेकिन किसी राज्नीतिक्गातिविधि से उनको कुछ भी लेना देना नहीं था . नेता के मुकामी रंग को चमकाने के लिए यह कारस्तानी हुई थी . जवाहरलाल की  बिसातखाने की दूकान थी . साबुन तेल आदि भी मिलता था, अच्छी दूकान थी . उनके यहाँ इलाके के  पढने लिखने वाले ज़्यादातर नौजवान ग्राहक होते थे . कभी कुछ पैसा कम पड़ गया तो उधार हो जाता था. उनके यहाँ उधार लेने वाले कुछ लोग इंटरमीडिएट के बाद ही  प्राइमरी स्कूल में मास्टर हो गए , कुछ लोग बी एड करके इंटर कालेजों में बतौर शिक्षक भर्ती हो गए, कुछ लोगों ने एम ए में प्रथम श्रेणी ली और डिग्री कालेजों में नौकरी पा गए . कुछ लोग वकील हो गए और कुछ लोग दिल्ली बंबई चले गए . मुराद यह कि जे क्लब के ज्यादातर सदस्य  उस इलाके के लिहाज़ से अच्छी नौकरियों में जम गए . उसके बाद कुछ लोगों ने उनकी दूकान का पुराना उधार चुकता कर दिया और  नियमित नक़द खरीदारी करने लगे लेकिन कुछ महान आत्माएं ऐसी भी थीं, जिन्होंने न तो पुराना अदा किया और नई खरीदारी के लिए दूसरी दूकान पकड ली. सबको पता है कि कस्बे की दुकनदारी की बुनियाद नया पुराना करते रहने में ही होती है और अगर पुराना उधार अंटक जाय तो काम गड़बड़ा जाता है . उनके साथ भी यही हुआ . धीरे धीरे दुकान से माल टूटने लगा . उधार वाला रजिस्टर मोटा  होता गया और दुकान कमज़ोर होती गयी लेकिन अध्यक्ष ने हार नहीं मानी . किसी पुराने  साथी से राह चलते तकादा नहीं किया . इस बीच उनका  बेटा पढाई लिखाई कर रहा था , वह तैयार हो गया , काम का रास्ता बदल दिया और आज अध्यक्ष का बुढापा सम्मान से बीत रहा है .
यह अध्यक्ष अजीब आदमी है . कभी भी हार नहीं मानता , सबके मुंह पर खरी खरी कह देता है.  जिससे  दोस्ती की ,कभी अपनी तरफ से नहीं तोडी . अगर कोई किसी कारण से अलग हो गया तो हो जाए ,कोई परवाह नहीं की. जिसने पंगा लिया उसको पूरी तरह से इग्नोर कर दिया . शान से जीने का आदी ७५ साल का  यह जवान आज भी उसी ज़िन्ददिली के साथ जमा हुआ है . जवाहरलाल से मेरी बहुत अपनैती है . इनका मूल गाँव मकसूदन है .  यही मेरे पुरखों का गाँव भी है . सैकड़ों साल से इनके और हमारे परिवार के बीच में अपनापा है . यह गाँव गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है . मेरा पुराना  घर तो ठीक नदी के किनारे ही है ,इनका घर बाज़ार में है. मकसूदन गाँव में गोमती जी घूमती हैं और अर्धचन्द्राकार  दिशा लेकर नानेमाऊ की तरफ चली जाती हैं. पापर घाट से मकसूदन तक नदी का बहाव बिलकुल सीधा है लेकिन हमारी घरुही से मुड़कर अर्धचंद्राकार हो जाती हैं  . बाद में दियरा और धोपाप होती हुयी आगे जौनपुर चली जाती हैं .  शुरू के दिनों में जब सड़कें नहीं होती थीं तो नाव में लादकर व्यापार का सामान  नदियों के रास्ते ही लाया जाता था. शायद इसीलिये  ज्यादातर व्यापारिक केंद्र नदियों के किनारे ही हैं  . हमारे इलाके के पुराने समय के सबसे महत्वपूर्ण बाज़ार , मक्सूदन, दियरा, बरवारी पुर आदि बहुत बड़े बाज़ार हुआ करते थे . दियरा तो थोडा बचा हुआ है लेकिन मक्सूदन उजड़ गया. गाँव तो अब भी है लेकिन बाजार नहीं है . अब हमारे यहाँ के बरनवाल लोग लम्भुआ, सुल्तानपुर, कानपुर आदि  बाजारों में शिफ्ट हो चुके  हैं. और वहां भी उनको उनके कारोबार की वजह से पहचाना जाता है. जवाहरलाल का शानदार मकान भी अब गाँव में है लेकिन अब उसको गाँव के ही एक बाबू साहब को दे दिया गया  है . जवाहरलाल अब लम्भुआ में रहते हैं .  उनके कई भाई भी लम्भुआ में अपना घर बनवा चुके हैं .
आज़ादी मिलने के पहले हमारे इलाके में  हाई स्कूल नहीं था. कादीपुर तहसील में शायद छीतेपट्टी में इंटर कालेज था . सुल्तानपुर जिला मुख्यालय था , वहां भी इंटर कालेज था . जिले में डिग्री कालेज तो कोई भी नहीं था. आजादी के बाद सरकार ने ऐसी नीति  बनाई की कि  हाई स्कूल खोलना आसान हो गया . जिसके पास ज़मीन थी और देश के निर्माण का जज्बा था , उन लोगों ने स्कूल कालेज खोले. १९५०-५१ में हमारे गाँव के आस पास चौकिया, भरखरे, कादीपुर ,बेलहरी आदि गाँवों में इंटर कालेज खुल गए.  बेलहरी का इंटर कालेज मक्सूदन से करीब था . नाव से नदी पार करके  बेलहरी शुरू हो जाता था. जवाहरलाल उसी कालेज में हाई स्कूल के छात्र के रूप में १९५७ में दाखिल हो गए . बेलहरी उस इलाके का सम्मानित कालेज था . वहीं से इंटर पास करके आप ने ज़िंदगी की लड़ाई में क़दम रखा और लम्भुआ बाज़ार में  बिसातखाने की दुकान खोली. तब तक मक्सूदन की बाज़ार का रूतबा कम होना शुरू हो गया था. लेकिन जब इस बाज़ार का जलवा था तो यहाँ के सेठ साहूकार  बहुत ही इज्ज़त से देखे जाते थे.
महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में इनके पिताजी ने तीन हज़ार रूपये का चंदा दिया था. उनके साथ इनके खानदान के चार और सेठों  ने भी  चंदा दिया था और जेल गए थे. कादीपुर की तहसील की हवालात में उसका रिकार्ड था . जब जवाहरलाल इंटर में पढ़ते थे तो उन्होंने कादीपुर तहसील जाकर इसकी जानकारी ली . वहां तैनात क्लर्क ने कहा कि नाम तो रिकार्ड में है .अगर एक हज़ार रूपया दे दो तो स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की  सर्टिफिकेट बना दूंगा लेकिन इनके पिताजी ने साफ़ मना कर दिया .और कहा कि महात्मा गांधी के आन्दोलन में पैसा किसी लाभ की उम्मीद में नहीं दिया था . उस क्लर्क को घूस नहीं दिया गया और  सर्टिफिकेट नहीं बना .
जवाहरलाल बरनवाल की जाति वैश्य है . हमारे इलाके में सेठ साहूकारों के बच्चे दबंगई नहीं करते लेकिन आपने कालेज के दिनों में रुतबे का छात्र जीवन बिताया और बाकायदा फेल हुए. लेकिन हिम्मत नहीं हारी और इंटरमीडिएट पास करके ही बेलहरी कालेज का पिंड छोड़ा .जवाहरलाल ने पिछले पचास साल में  बहुत सारे ऐसे लोगों की मदद की है जिनकी पढ़ाई छूटने वाली थी . इम्तिहान की फीस तो सैकड़ों लोगों की जमा करवाई है . मैंने पूछा कि जिन लोगों की मदद की उनमें से कोई आपकी किसी  परेशानी में कभी खड़ा हुआ . तो उन्होंने मुझे बताया कि मैंने यह सोचकर किसी की मदद नहीं की थी . खुद मेरे लिये जवाहरलाल  परेशानी के वक़्त खड़े हो जाते थे . उसका डिटेल लिखकर उनको अपमानित नहीं करूंगा लेकिन मेरे  बच्चों को मालूम है कि वे मेरे सही अर्थों में शुभचिन्तक हैं . अपने दोस्तों की अच्छाइयों को पब्लिक करना उनकी आदत का हिस्सा है और उनकी कमियों को ढँक देने के फन के वे उस्ताद हैं
मुझे लगता  है भर्तृहरि के नीतिशतकम में संकलित यह सुभाषित उन जैसे लोगों के लिये ही लिखा गया रहा होगा
पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यम् च गूहति गुणान् प्रकटी करोति
आपद्गतम्  च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणम् इदम्  प्रवदन्ति सन्ताः
                     
जो अपने मित्र  पाप करने से रोकता है ,अच्छे काम करने की प्रेरणा देता है .
उसकी कमियों को छुपाता है और  सद्गुणों को सबके समक्ष प्रकट करता है
ऐसा बुरे वक़्त में साथ नहीं छोड़ता .ज़रूरत पड़ने पर सहायता देता है ,
संतों ने इसी को अच्छे मित्र का लक्षण बताया है .
जवाहरलाल बरनवाल के बारे में मैं अपने उस समय के मित्रों ,गया प्रसाद मिश्र  राम मूर्ति मिश्र, राम प्रसाद सिंह ,संगम प्रसाद दूबे , महेंद्र कुमार श्रीवास्तव राम चन्द्र मिश्र, डॉ समर बहादुर सिंह आदि के साथ बैठकर एक संस्मरण नुमा पोथी लिखना चाहता हूँ . देखें कब संभव होता है .