Thursday, March 1, 2018

बाबरी मस्जिद की राजनीति में सबसे ज़्यादा नुक्सान मुसलमानों का हुआ है .


शेष नारायण सिंह

अयोध्या की बाबरी  मस्जिद  के विध्वंस के पचीस साल पूरे हो चुके हैं . इस बीच अपने देश में बहुत कुछ बदल गया है . आज़ादी के बाद जिस तरह की राजनीति शुरू हुई थी वह अब नहीं है . जिस संविधान की बुनियाद पर भारत पूरी दुनिया में इज्ज़त  का हकदार है ,उसको बदल देने की बात शुरू हो गयी है . मुसलमान को हर तरह से निशाने पर लिया जा रहा है. उनके दीनी मामलों में ऐसे लोग चर्चा कर रहे हैं  जिनको  धर्म की कोई जानकारी नहीं  है. इस बीच छः दिसंबर १९९२ को अयोध्या में हुए विनाश के हर पहलू पर नए सिरे से बहस हो रही है . वहां की ज़मीन का जो विवाद चल रहा था उस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादित फैसला सुप्रीम कोर्ट अपील में  है . सुप्रीम कोर्ट ने इसी हफ्ते साफ़ कह दिया है कि केस में धार्मिक आस्था नहीं , उपलब्ध सबूत के आधार पर फैसला लिया जाएगा  .  सबूत तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को ही सही ठहराते हैं  क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद और उसके  सहयोगी  संगठन तो आस्था के नाम पर राजनीतिक और कानूनी अभियान चला रहे हैं  . आर एस एस और बीजेपी के नेता अक्सर दावा करते पाए जाते हैं कि आस्था के सवाल पूरी तरह से कानून की सीमा के बाहर होते हैं . सुप्रीम कोर्ट में  माननीय जज की टिप्पणी के बाद यह तय है कि वहां आस्था पर आधारित कोई भी फैसला नहीं किया जाएगा . मुक़दमा ज़मीन के मालिकाना हक से सम्बंधित है ,इसलिए फैसला भी वही होगा .
बाबरी मस्जिद की तबाही का आपराधिक मामला अलग से चल रहा है . उसमें भी फैसला आना है , जो पता नहीं कब आयेगा .  ज़मीन की मिलकियत के मूल पक्षकार , हाशिम अंसारी की मृत्यु हो चुकी है , निर्मोही अखाडा में भी अब  नए लोग  आ चुके हैं . सच्ची बात यह है कि बाबरी मस्जिद को विवाद में लाने की आर एस एस की जो मूल  योजना थी वह परवान चढ़ चुकी है. आज  केंद्र सहित अधिकतर राज्यों में आर एस   एस के राजनीतिक संगठन ,बीजेपी की सरकार है. यह सरकारें धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का नतीजा  हैं . यह कारनामा एक दिन में नहीं हासिल किया गया है . १९८४ में बीजेपी को लोकसभा में केवल दो सीटें  मिली थीं . उसके  बाद तय हो गया कि आगे  की राजनीति में  हिन्दू भावनाओं को एकमुश्त करके ही चुनाव मैदान में  बीजेपी को जाना पडेगा .अटल बिहारी वाजपेयी के गांधियन समाजवाद से सीटें बढ़ने वाली नहीं है . दुनिया जानती है कि उसके बाद आर एस एस ने बाबरी मस्जिद के मुद्दे को हवा दी. कुछ गैर ज़िम्मेदार मुसलमान उनके हाथों में खेलने लगे.. बीजेपी के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा की. गाँव गाँव से नौजवानों को भगवान राम के नाम पर इकट्ठा किया गया और माहौल पूरी तरह से साम्प्रदायिक बना दिया गया. उधर बाबरी मस्जिद के नाम पर मुनाफा कमा रहे कुछ गैर ज़िम्मेदार मुसलमानों ने वही किया जिस से आर एस एस को फायदा हुआ. हद तो तब हो गयी जब मुसलमानों के नाम पर सियासत कर रहे लोगों ने २६ जनवरी के बहिष्कार की घोषणा कर दी. बी जे पी को इस से बढ़िया गिफ्ट दिया ही नहीं जा सकता था. उन लोगों ने इन गैर ज़िम्मेदार मुसलमानों के काम को पूरे मुस्लिम समाज के मत्थे मढ़ने की कोशिश की . बाबरी मस्जिद के नाम पर हिन्दू-मुसलमान के बीच बहुत बड़ी खाई बनाने की  कोशिश की गयी और उसमें आर एस एस को बड़ी सफलता मिली. अब तो   टीवी की बहस में  भावनाओं को भड़का लिया जाता है लेकिन ख़बरों के चौबीस घंटे के टीवी के शुरू होने  के पहले धार्मिक ध्रुवीकरण करवाने के लिए दंगे करवाए जाते थे. दंगे अभी  भी होते हैं और उनका उद्देश्य हमेशा की तरह  राजनीतिक होता  है .बस फर्क यह पड़ा है कि पहले अफवाह फैलाकर बाकी देश में उनकी चर्चा होती थी. अब टीवी के डिबेट के जारिए की जाती है .इन दंगों को रोका जाना चाहिए  . दंगों को रोकने के लिए ज़रूरी यह है कि लोगों को जानकारी दी जाए कि दंगें होते कैसे हैं . जिन लोगों ने भीष्म साहनी की किताब तमस पढी है या उस पर बना सीरियल देखा है . उन्हें मालूम है १९४७ के बंटवारे के पहले  किस तरह से एक गरीब आदमी को पैसा देकर मस्जिद में सूअर फेंकवाया गया था. भीष्म जी ने बताया था कि वह एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी थी. या १९८० के मुरादाबाद दंगों की योजना बनाने वालों ने ईद की नमाज़ के वक़्त मस्जिद में सूअर हांक दिया था . दंगा करवाने वाले इसी तरह के काम कर सकते हैं . हो सकता है कि कुछ नए तरीके भी ईजाद करें . कोशिश की जानी चाहिए कि मुसलमान इस तरह के किसी भी भड़काऊ काम को नज़र अंदाज़ करें . क्योंक दंगों में सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमान का ही होता है . जहां तक फायदे की बात है वह बी जे पी का होगा क्योंकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद वोटों की खेती लहलहाती है .इस लिए दंगों को रोकने की किसी भी योजना को नाकाम करना आज की सबसे बड़ी  प्राथमिकता होनी चाहिए .
धार्मिक ध्रुवीकरण का सबसे ज़्यादा नुकसान  मुसलमानों को ही होता है . बाबरी मस्जिद की तबाही के बाद बहुत सारे दंगे कराये गए . लेकिन अभी  तक  कानून की तरफ से सज़ा किसी को  नहीं मिली .संविधान में पूजा स्थल को नुकसान पहुंचाने को अपराध माना गया है और भारतीय दंड संहिता में इस अपराध की सजा है। अदालत में मुकदमा चलता  है लेकिन अपराधियों को माकूल सजा कभी नहीं मिलती . बाबरी मस्जिद के नाम पर राजनीति करने वालों ने बहुत सारे ऐसे अपराध किए हैं जिनकी सजा इंसानी अदालतें नहीं दे सकतीं। बाबरी मस्जिद को ढहाने वालों ने परवरदिगार की शान में गुस्ताखी की हैउसके बंदों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। आर.एस.एस. से जुड़े जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद को शहीद करने की साजिश रचीउनको न तो इतिहास कभी माफ करेगा और न ही राम उन्हें माफी देंगे।देश की हिंदू जनता की भावनाओं को भड़काने के लिए आडवानी और उनके साथियों ने भगवान राम के नाम का इस्तेमाल किया। उन्हीं राम का जो सनातनधर्मी हिंदुओं के आराध्य देव हैं जिन्होंने कहा है कि 'पर पीड़ा सम नहिं अधमाई। यानी दूसरे को तकलीफ देने से नीच कोई काम नहीं होता। राम के नाम पर रथ यात्रा निकालकर सीधे सादे हिंदू जनमानस को गुमराह करने का जो काम आडवाणी ने किया था जिसकी वजह से देश दंगों की आग में झोंक दिया गया था उसकी सजा आडवाणी को अब मिल चुकी  है। प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के उद्देश्य से आडवाणी ने पिछले तीस वर्षों में जो दुश्मनी का माहौल बनाया उसका उनको राजनीतिक लाभ  नहीं मिला . प्रधानमंत्री पद का सपना एक खौफनाक ख्वाब बन गया है।वे प्रधानमंत्री तो नहीं ही बन सके,उनका नाम अब किसी को  अपमानित करने के मुहावरे की  तरह  इस्तेमाल होता है .
बाबरी मस्जिद के नाम पर मुसलमानों की  सियासत करने वालों का भी कहीं अता पता 
नहीं है . बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के ज्यादातर नेता आज गुमनामी की जिंदगी बिता रहे हैं हालांकि उन्होंने सियासी बुलंदी हासिल करने के लिए एक ऐतिहासिक मस्जिद के इर्द-गिर्द अपने तिकड़म का ताना बना बुना था। मुसलमानों के स्वयंभू नेता बनने के चक्कर में इन तथाकथित नेताओं ने उन हिंदुओं को भी नाराज करने की कोशिश की थी जो मुसलमानों के दोस्त हैं। शुक्र है उस पाक परवरदिगार का जिसने इस देश के धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को यह तौफीक दी कि वे आर.एस.एस. के चक्कर में  नहीं फंसे वरना इन लोगों ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सच्चाई यह है कि बाबरी मस्जिद अयोध्या में चार सौ साल से मौजूद थीलेकिन उसके नाम पर सियासत का सिलसिला 1948 से शुरू हुआ जो मस्जिद की शहादत के बाद भी जारी है।  इस सियासत का सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को  हुआ है .  देश की राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ है कि सत्ताधारी पार्टी  मुसलमानों  के विरोध को राजनीतिक अभियान की बुनियाद बनाकर चुनाव  जीत  रही है .  इसलिए मुसलमानों के असली नेताओं को सामने  आना पडेगा और देश की सियासत में हाशिये पर धकेले जा रही कौम को एकजुट करके  सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक  तरक्की की राह को आसान करना पडेगा .अगर संविधान बदलने में  आर एस एस को सफलता मिली तो मुसलमानों का सबसे ज्यादा नुक्सान होगा

शिमला समझौता इंदिरा गांधी की जीत और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की हार का दस्तावेज़ है



शेष नारायण सिंह
 

संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाये  गए धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिमला समझौते का भी ज़िक्र किया . उनके मुंह से यह निकल गया कि समझौता इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो के बीच हुआ था . यह स्लिप आफ टंग का नतीजा है .वास्तव में समझौता इंदिरा गांधी और बेनजीर भुट्टो के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच हुआ था.  लेकिन यह  शिमला समझौते के बारे में जानकारी ताज़ा कर लेने का अवसर है .बंगलादेश के संस्थापक ,शेख मुजीबुर्रहमान को तत्कालीन पाकिस्तानी शासकों ने जेल में बंद कर रखा था लेकिन उनकी प्रेरणा से शुरू हुआ बंगलादेश की आज़ादी का आन्दोलन भारत की मदद से परवान चढ़ा और एक नए देश का जन्म हो गया.. बंगलादेश का जन्म वास्तव में दादागीरी की राजनीति के खिलाफ इतिहास का एक तमाचा था जो शेख मुजीब के माध्यम से पाकिस्तान के मुंह पर वक़्त ने जड़ दिया था. आज पाकिस्तान जिस अस्थिरता के दौर में पंहुच चुका है उसकी बुनियाद तो उसकी स्थापना के साथ ही १९४७ में रख दी गयी थी लेकिन इस उप महाद्वीप की ६० के दशक की घटनाओं ने उसे बहुत तेज़ रफ़्तार दे दी थी.. यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य था कि उसकी स्थापना के तुरंत बाद ही मुहम्मद अली जिन्नाह की मौत हो गयी. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के मूल निवासी लियाक़त अली देश के प्रधान मंत्री थे .उनको पंजाबी आधिपत्य वाली पाकिस्तानी फौज और व्यवस्था के लोग अपना बंदा मानने को तैयार नहीं थे ,और उन्हें मौत के घाट उतार दिया. उसके बाद से ही वहां गैर ज़िम्मेदार हुकूमतों के दौर का आगाज़ हो गया. बांग्लादेश के जन्म के समय पाकिस्तान के शासक  जनरल  याह्या खां  थे .ऐशो आराम की दुनिया में डूबते उतराते जनरल याह्या खां ने पाकिस्तान की सत्ता को अपने क्लब का ही विस्तार समझ रखा था . मानसिक रूप से कुंद ,याह्या  खां किसी न किसी की सलाह पर ही काम करते  थे .  कभी प्रसिद्ध  गायिका नूरजहां की राय मानते ,तो कभी ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बात मानते थे . सत्ता हथियाने की अपनी मुहिम के चलते ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने याह्या खां से थोक में मूर्खतापूर्ण फैसले करवाए..जब  संयुक्त पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेम्बली ( संसद) में शेख मुजीबुर्रहमान की पार्टीअवामी लीग को स्पष्ट बहुमत मिल गया तो भी उन्हें सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया जाना ऐसा ही फैसला था .पश्चिमी पाकिस्तान की मनमानी के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में पहले से ही गुस्सा था और जब उनके अधिकारों को साफ़ नकार दिया गया तो पूर्वी बंगाल के लोग सडकों पर आ गए. . मुक्ति का युद्ध शुरू हो गया,मुक्तिबाहिनी का गठन हुआ और स्वतंत्र बंगलादेश की स्थापना हो गयी

बंगलादेश का गठन इंसानी हौसलों की फ़तेह का एक बेमिसाल उदाहरण है..जब से शेख मुजीब ने ऐलान किया था कि पाकिस्तानी फौजी हुकूमत से सहयोग नहीं किया जाएगाउसी वक्त से पाकिस्तानी फौज ने पूर्वी पाकिस्तान में दमनचक्र शुरू कर दिया था. सारा राजकाज सेना के हवाले कर दिया गया था और वहां फौज अत्याचार कर रही थी ..उसी अत्याचार ने बंगलादेश के गठन की प्रक्रिया को तेज़  किया था . बंगलादेश की स्थापना में भारत और उस वक़्त की प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी का बहुत बड़ा योगदान है . सच्चाई यह है कि अगर भारत का समर्थन न मिला होता तो शायद बंगलादेश का गठन अलग तरीके से हुआ होता.बंगलादेश की स्थापना में भारत के सहयोग के बाद भारत और पाकिस्तान में रिश्ते बहुत बिगड़  गए थे .पाकिस्तान पराजित मुल्क था . पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ पाकिस्तान में माहौल बन गया था . अपने देश में मुंह  छुपाने के और अपमान से बचने के लिए उनको भारत से कुछ मदद चाहिए थी . उसी पृष्ठभूमि में शिमला समझौता हुआ था .

शिमला समझौता  भारतीय कूटनीति की बहुत बड़ी सफलता है . बंगलादेश की धरती पर बलूचिस्तान के बूचर टिक्का खां की रहनुमाई में बलात्कार लूट और क़त्ल कर रही पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के सहयोग से मुक्ति बाहिनी ने पराजित किया था. पाकिस्तानी राष्ट्रपति,याह्या खां को हटाकर उनके विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपने देश की सत्ता हथिया चुके थे. अपने देश वासियों को उन्होंने मुगालते में रखा था कि उनकी सेना भारत और बंगलादेश की साझी ताक़त पर भारी पड़ेगी और बार बार डींग मारते रहते थे कि वे भारत से एक हज़ार साल तक युद्ध कर सकते थे लेकिन पाकिस्तानी फौज के करीब १ लाख सैनिकों ने भारत के पूर्वी कमान के सामने आत्म समर्पण कर दिया था. आल इण्डिया रेडियो पर रोज़ पकडे गए पाकिस्तानी सैनिकों की आवाज़ में " हम खैरियत से हैं " कार्यक्रम के तहत प्रसारण किया जाता था . किसी भी सेना के लिए इस से बड़ा अपमान क्या हो सकता था कि उसके सिपाही युद्धबंदी हों और रोज़ पूरे पाकिस्तान में लोग जानें कि उनके देश के करीब १ लाख सैनिक भारत के कब्जे में हैं . शिमला समझौता इसी दौर में हुआ था. पाकिस्तान सरकार के प्रतिनिधि ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो थे उनके साथ उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो भी आई थीं और अखबारों में उन पर खासी चर्चा होती थी. उन दिनों वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय थीं.  उनकी उम्र उस वक़्त यही बीस एक साल रही होगी .उस समझौते के मुख्य बिन्दुओं को याद कर लेना ज़रूरी है जिस से कि आने वाली पीढियां बाखबर रहें .


समझौते के बिंदु
१. भारत और पाकिस्तान की सरकारें इस बात पर सहमत हैं कि दोनों देश संघर्ष और झगड़े को समाप्त कर दें जिसकी वजह से अब तक दोनों देशों के बीच में रिश्ते खराब रहे हैं . दोनों देश आगे से ऐसा काम करेगें जिस से दोस्ताना और भाईचारे के रिश्ते कायम हो सकें और उप महाद्वीप में स्थायी शान्ति की स्थापना की जा सके.इसके बाद दोनों देश अपनी ऊर्जा और अपने संसाधनों का इस्तेमाल अपनी जनता के कल्याण के लिए कर सकेगें . इस मकसद को हासिल करने के लिए भारत और पाकिस्तान की सरकारों के बीच एक समझौता हुआ जिसकी शर्तें निम्न लिखित हैं .
क . यह कि दोनों देशों के बीच को संबंधों को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के हिसाब से चलाया जाएगा.

ख ..यह कि दोनों देशों ने तय किया है कि अपने मतभेदों को शान्ति पूर्ण तरीकों से आपसी बातचीत के ज़रिये ही हल करेगें या ऐसे तरीकों से हल करेगें जिन पर दोनों देश सहमत हों.दोनों देशों के बीच में जो ऐसी समस्याएं हैं जिनका अभे एहल नहीं निकला है उनके अंतिम समाधान के पहले दोनों देश ऐसा कुछ नहीं करेगें जिस से कि आपसी रिश्तों में और खराबी आये और शान्ति पूर्ण माहौल बनाए रखने में दिक्क़त हो.

ग़ . यह कि दोनों देशों के बीच सुलह,अच्छे पड़ोसी कीतरह आचरण और टिकाऊ शान्ति के लिए ज़रूरी है कि दोनों देश शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व,एक दूसरे की क्षेत्रीय एकता और संप्रभुता का सम्मान और एक दूसरे के आतंरिक मामलों में दखलंदाजी न की जाए और रिश्तों की बुनियाद बराबरी और आपसी लाभ की समझ पर आधारित हो .

घ यह कि पिछले २५ वर्षों से दोनों देशों के बीच जिन कारणों से रिश्ते खराब रहे हैं उनके बुनियादी सिद्धातों और कारणों को शान्तिपूर्ण तरीकों से हल किया जाए.

च यह कि दोनों एक दूसरे की राष्ट्रीय एकता,क्षेत्रीय अखंडता ,राजनीतिक स्वतंत्रता संप्रभुता का बराबरी के आधार पर सम्मान करेगें.

छ यह कि संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के आधार पर दोनों एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ न तो बल का प्रयोग करेगें और न ही धमकी देगें


२. दोनों देशों की सरकारे अपनी शक्ति का प्रयोग करके एक दूसरे के खिलाफ कुप्रचार पर रोक लगाएगी .दोनों देश ऐसी सूचना के प्रचार प्रसार को बढ़ावा देगें जिस से दोनों देशों के बीच दोस्ती के रिश्ते बनने में मदद मिले

३.दोनों देशों के बीच क़दम बा क़दम रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए निम्न लिखित बातों पर सहमति हुई.

क. ऐसे कदम उठाये जायेगें जिस से संचार डाक,तार समुद्र ज़मीन के रास्ते संपर्क बहाल हो सके. इसमें एक दूसरे की सीमा के ऊपर से विमानों की आवाजाही भी शामिल है .
ख. एक दूसरे के नागरिकों की यात्रा सुविधा को बढाने के लिए क़दम उठाये जायेगें.
ग़.जहां तक संभव हो उन क्षेत्रों में व्यापार शुरू किया जायेगा जिसके बारे में सहमति हो चुकी है .
घ..विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में आदान प्रादान को प्रोत्साहित किया जाएगा. . इस सन्दर्भ में दोनों देशों के प्रतिनिधि मंडल समय समय पर मिला करेगें और ज़रूरी तफसील पर काम होगा.

४.टिकाऊ शान्ति स्थापित करने की प्रक्रिया को शुरू करने के लिए दोनों सरकारें निम्नलिखित बातों पर सहमत हुईं.

क..भारतीय और पाकिस्तानी सेनायें अंतर राष्ट्रीय सीमा में अपनी तरफ तक वापस चली जायेगीं.
ख..जम्मू और कश्मीर में जहां १७ दिसंबर १९७१ के दिन सीज फायर हुआ था दोनों देश उसी को लाइन ऑफ़ कंट्रोल के रूप में स्वीकार करेगें . लेकिन इस से कोई भी देश अपने अधिकार को तर्क नहीं कर रहा है . कोई भी देश इस सीमा को आपसी मतभेद या कानूनी व्याख्या के मद्दे-नज़र बदलने की कोशिश नहीं करेगा. . लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर किसी तरह की ताक़त का न तो इस्तेमाल होगा और न ही धमकी दी जायेगी.
ग़ ..सेनाओं की वापसी का काम इस समझौते के लागू होने पर शुरू होगा और ३० दिन में पूरा कर लिया जाएगा.

५.यह समझौता दोनों देशों के संविधान के अनुसार उनके देशों में लागू संविधान के अनुसार मंज़ूर किया जाएगा . उसके बाद ही इसे लागू माना जाएगा.

६. दोनों सरकारें इस बात पर सहमत हैं दोनों ही सरकारों के मुखिया फिर मिलेगें . इस बीच दोनों सरकारों के प्रतिनिधि मिलकर यह सुनिश्चित करेगें कि टिकाऊ शान्ति स्थापित करने और रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए क्या तरीके अपनाए जाएँ . इसमें युद्ध बंदियों सम्बन्धी मुद्ददे,जम्मू-कश्मीर के स्थायी समझौते की बात और फिर से कूट नीतिक समबन्धों की बहाली शामिल है .


इस समझौते का मुख्य उद्देश्य इलाके में शान्ति स्थापित करना था लेकिन १९७१ की लड़ाई से उपजे मामलों को हल करने के अलावा इस से कुछ ख़ास हासिल नहीं किया जा सका . भुट्टो को भी फौज़ ने सत्ता से हटा दिया और इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी लगा कर देश की जनता के सामने अपना सब कुछ गंवा दिया और १९७७ का चुनाव हार गयीं.
बाद में बहुत दिनों तक भारत की ओर से यह शिकायत की जाती रही कि पाकिस्तान शिमला समझौते को नहीं मान रहा है लेकिन पाकिस्तान ने कभी परवाह नहीं की. शीतयुद्ध का ज़माना था और पाकिस्तान अमरीका का ख़ास कृपा पात्र था . . लेकिन दुनिया के राजनयिक इतिहास में शिमला समझौते का एक महत्व है .  कांग्रेस के खिलाफ संसद में भाषण करते  सत्ता पक्ष को ध्यान रखना पडेगा कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने देश को बहुत ही ऊंचे मुकाम तक पंहुचाया था .

Tuesday, February 6, 2018

मुश्किलों से मुक़ाबिल पत्रकारिता को सूचनाक्रांति ने पत्रकारिता का स्वर्णयुग बना दिया है



शेष नारायण सिंह 

पत्रकारिता का काम बहुत ही कठिन दौर  से  गुज़र रहा है .महानगरों से लेकर  दूर दराज़  के गाँवों में रहकर काम करने वालों की आर्थिक व्यवस्था बहुत सारे मामलों में चिंता का विषय है .यह ऐसा संकट है  जिसके कारण कई स्तर पर समझौते हो रहे हैं और सूचना के  निष्पक्ष  मूल्यांकन का काम बाधित हो रहा है . देश के कई बड़े अख़बार अपने कर्मचारियों  का आर्थिक शोषण करते हैं . उनसे पत्रकारिता से इतर काम करवाते हैं मालिक लोग  निजी संपत्ति में वृद्धि के लिए अखबार और पत्रकार की छवि का इस्तेमाल करते  हैं.  अखबार मालिकों का यही वर्ग  है  जहां पिछले वर्षों मजीठिया की वेतन संबंधी सिफारिशों को बेअसर  करने के लिए तरह  तरह के  तिकड़म किये गए थे. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना  करने वाले यह अखबार पत्रकारों के शोषण के भी सबसे बड़े हस्ताक्षर हैं . यह मालिक लोग वेतन इतना कम देते  हैं कि दो जून की रोटी का भी इंतजाम न हो सके . और उम्मीद करते हैं कि छोटे शहरों में उनके कार्ड को लेकर पत्रकारिता करता पत्रकार उनके लिए विज्ञापन भी  जुटाए . नाम लेने के ज़रूरत नहीं है लेकिन दिल्ली में ही नज़र दौड़ाने पर इस तरह के अखबारों और टीवी चैनलों के बारे में जानकारी मिल जायेगी .एक संस्मरण के माध्यम से इस बात को रेखांकित करना उचित होगा. हमारे एक  स्वर्गीय मित्र को करीब बीस साल पहले एक अख़बार  का राजस्थान का ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया .    कह दिया गया कि आप जल्द से जल्द  जयपुर जाकर काम शुरू कर दीजिये .  वे परेशान थे कि वेतन की कोई बात किये बिना कैसे  जयपुर चले जाएँ .  अगले दिन फिर वे मालिक- सम्पादक से मिले और  कहा कि पैसे की कोई बात नहीं हुई  थी इसलिए मैंने सोचा कि स्पष्ट बात कर लूं .  मालिक-सम्पादक ने   छूटते ही कहा कि ,आप से पैसे की क्या बात करना है . आप हमारे मित्र हैं जाइए काम करिए और तरक्की करिए. संस्था को बस पचास हज़ार रूपये महीने भेज दिया करिएगा ,बाकी सब आपका .  दफ्तर का खर्च निकाल कर सब अपने पास रख लीजिये . पत्रकारिता की गरिमा को कम करने में इन बातों का  बहुत योगदान है .

प्रेस की आज़ादी सबसे ज़रूरी बात है  लेकिन आजकल वह सबसे ज़्यादा मुश्किल में है .उसको बाधित करने के बहुत   सारे तरीके सिस्टम में मौजूद हैं  .अक्सर  देखा गया है कि सिस्टम किस तरह से दखल देता है . ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के पास हिदायत आ जाती है कि कुछ ख़ास लोगों के खिलाफ खबर नहीं चलाना है . लेकिन नीचे वालों को इस तरह से समझाया जाता था जिससे  उन्हें  मुगालता बना रहे कि वे प्रेस की आज़ादी का लाभ उठा रहे हैं . मुझे जब   बीस साल पहले टेलीविज़न में काम करने का अवसर मिला तो शुरुआती दौर दिलचस्प था .अपने देश में २४ घंटे की टी वी ख़बरों का वह शुरुआती काल था . अखबार से आये एक व्यक्ति के लिए बहुत मजेदार स्थिति थी . जो खबर जहां हुई ,अगर उसकी बाईट और शाट हाथ आ गए तो उन्हें लगाकर सही बात रखने में मज़ा बहुत आता था. लेकिन छः महीने के अन्दर व्यवस्था ने ऐसा सिस्टम बना दिया कि वही खबरें जाने लगीं जो संस्थान के हित में रहती थी. आज बीस साल बाद सब कुछ बदल गया है ,सिस्टम अपना काम कर रहा है और कुछ ख़बरें नज़रंदाज़ की जा रही  हैं और कुछ ऐसे मुद्दों को बहुत बड़ा बताया जा  रहा  है जिनके खबर होने पर ही शक रहती है. इसके चलते पत्रकार बिरादरी को बड़ा कष्ट है .कई बार तो इन बड़े लोगों के कारण साधारण पत्रकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं
लेकिन उम्मीद ख़त्म नहीं हुई है ,अभी  उम्मीद  बाकी है . सूचना क्रान्ति ने अपने देश में पाँव जमा लिया  है .भारत के सूचना टेक्नालोजी के जानकारों की पूरी दुनिया में हैसियत बन चुकी है .इसी सूचना क्रान्ति की कृपा से आज वेब पत्रकारिता सम्प्रेषण का ज़बरदस्त माध्यम बन चुकी  है . वेब मीडिया ने वर्तमान समाज में क्रान्ति की दस्तक दे दी है .अब लगभग सभी अखबारों और टीवी चैनलों के वेब  पोर्टल हैं  . लेकिन बहुत सारे  स्वतंत्र पत्रकारों ने भी इस दिशा में ज़बरदस्त तरीके से हस्तक्षेप कर दिया है . इन स्वतंत्र पत्रकारों के पास साधन बहुत कम हैं लेकिन यह हिम्मत नहीं हार रहे  हैं . उनको आधुनिक युग का अभिमन्यु कहा जा सकता  है . मीडिया के महाभारत में वेब पत्रकारिता के यह अभिमन्यु शहीद नहीं होंगें .हालांकि मूल महाभारत युद्ध में शासक वर्गों ने अभिमन्यु को घेर कर मारा था लेकिन मौजूदा समय में सूचना की क्रान्ति के युग का महाभारत चल रहा है .. जनपक्षधरता के इस यज्ञ में आज के यह वेब पत्रकार अपने काम के माहिर हैं और यह शासक वर्गों की १८ अक्षौहिणी सेनाओं का मुकाबला पूरे होशो हवास में कर रहे हैं . कल्पना कीजिये कि वेब के ज़रिये राडिया काण्ड का खुलासा न हुआ होता तो नीरा  राडिया की सत्ता की  दलाली की कथा के सभी खलनायक मस्ती में रहते और सरकारी समारोहों में मुख्य अतिथि बनते रहते और पद्मश्री आदि से सम्मानित होते रहते..लेकिन इन बहादुर वेब पत्रकारों ने टी वीप्रिंट और रेडियो की पत्रकारिता के संस्थानों को मजबूर कर दिया कि वे सच्चाई को जनता के सामने लाने के इनके प्रयास में इनके पीछे चलें और लीपापोती की पत्रकारिता से बचने की कोशिश करें ..

वास्तव में हम जिस दौर में रह रहे हैं वह पत्रकारिता के जनवादीकरण का युग है . इस जनवादीकरण को मूर्त रूप देने में सबसे बड़ा योगदान तो सूचना क्रान्ति का है क्योंकि अगर सूचना की क्रान्ति न हुई होती तो चाह कर भी कम खर्च में सच्चाई को आम आदमी तक न पंहुचाया जा सकता. और जो दूसरी बात हुई है वह यह कि अखबारों और टी वी चैनलों में मौजूद सेठ के कंट्रोल से आज़ाद हो कर काम करने वाले पत्रकारों की राजनीतिक और सामाजिक समझदारी बिकुल खरी है . इन्हें किसी कर डर नहीं है यह सच को डंके की चोट पर सच कहने की तमीज रखते हैं और इनमें हिम्मत भी है ..कहने का मतलब यह नहीं है कि अखबारों में और टी वी चैनलों में ऐसे लोग नहीं है जो सच्चाई को समझते नहीं हैं . वहां  बहुत अच्छे पत्रकार  हैं और जब वे अपने मन की बात लिखते हैं तो वह सही  मायनों में पत्रकारिता होती है

मुझे उम्मीद नहीं थी कि अपने जीवन में सच को इस बुलंदी के साथ कह सकने वालों के दर्शन हो पायेगा जो कबीर साहेब की तरह अपनी बात को कहते हैं और किसी की परवाह नहीं करते लेकिन खुशी है कि आज के पत्रकार सोशल मीडिया के ज़रिये अपनी बात डंके की चोट कह रहे  हैं .  आज सूचना किसी साहूकार की मुहताज नहीं है . मीडिया के यह नए जनपक्षधर उसे आज वेब पत्रकारिता के ज़रिये सार्वजनिक डोमेन में डाल दे रहे हैं और बात दूर तलक जा रही है . राडिया ने जिस तरह का जाल फैला रखा था  वह हमारे राजनीतिक सामाजिक जीवन में घुन की तरह घुस चुका है .. ऐसे पता नहीं कितने मामले हैं जो दिल्ली के गलियारों में घूम रहे होंगें . जिस तरह से राडिया ने पूरी राजनीतिक बिरादरी को अपने लपेट में ले लिया वह कोई मामूली बात नहीं है . इस से बहुत ही कमज़ोर एक घोटाला हुआ था जिसे जैन हवाला काण्ड के नाम से जाना जाता है . उसमें सभी पार्टियों के नेता बे-ईमानी करते पकडे गए थे लेकिन कम्युनिस्ट उसमें नहीं थे . इस बार कम्युनिस्ट भी नहीं बचे हैं . . यानी जनता के हक को छीनने की जो पूंजीवादी कोशिशें चल रही हैं उसमें पूंजीवादी राजनीतिक दल तो शामिल हैं हीकम्युनिस्ट भी रंगे हाथों पकडे गए हैं . सबको मालूम है कि जब राजा की चोरी पकड़ी जाती है तो उससके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती हमने देखा है कि  जैन हवाला काण्ड दफन हो गया था . ऐसे मामले दफन होते  हैं तो हो जाएँ लेकिन सूचना पब्लिक डोमेन में आयेगी तो अपना काम करेगी ,जनमत बनायेगी .
वेब पत्रकारिता की ताकत बढ़ जाने के कारण मेरा विश्वास है कि आज पत्रकारीय का स्वर्ण युग है . बस इस क्रान्ति में शामिल हो जाने की ज़रूरत है . अपनी  नौकरी के साथ साथ सूचनाक्रांति के महारथी बनने का   विकल्प  आज के पत्रकार के पास है . और विकल्प उपलब्ध हो तो उससे बड़ी आज़ादी कोई नहीं होती ..

दंगे पर फ़ौरन क़ाबू न किया गया तो पूंजी निवेश को ज़बरदस्त झटका लगेगा



शेष नारायण सिंह 


उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में  दो गुटों में हुई मुठभेड़ साम्प्रदायिक दंगे की शक्ल ले चुकी है . देश प्रेम ,तिरंगा, झंडा फहराने का अधिकार  और  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे विषय भी  झगडे के बीच मुद्दा बनने की होड़ में हैं . किसी भी तरह का दंगा समाज के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा होता है . यह एक राष्ट्र के रूप में हम सबके लिए चिंता की बात  होती है. खासकर  तब ,  जबकि  देश में औद्योगिक विकास के लिए ज़बरदस्त मुहिम चल रही है और प्रधानमंत्री ने सारी दुनिया के सामने यह बात सिद्ध कर दी है कि  देश के नौजवानों को  रोज़गार देने में निजी उद्योग के विकास की सबसे अहम भूमिका है . देश  भर में उद्योगों को जाल बिछाया जाना है और उसके लिए विदेशी पूंजी की भी बड़ी भूमिका  होगी . इस माहौल  में अगर देश में दंगे भड़कते हैं तो औद्योगिक विकास में बाधा आयेगी क्योंकि कोई भी उद्यमी अशांति के माहौल में कारोबार शुरू नहीं करेगा .इस तरह से दंगा करने वाले प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री को अपना लक्ष्य हासिल करने से रोक रहे  हैं .

अपने देश में साम्प्रदायिक हिंसा की शुरुआत योजनाबद्ध तरीके से महात्मा गांधी के १९२० के आन्दोलन के बाद से मानी जाती है. जब अंग्रेजों ने देखा कि महात्मा गांधी की अगुवाई में पूरे देश के हिन्दू और मुसलमान एक हो गए हैं ,तो उनको अपनी हुकूमत के भविष्य के बारे में चिंता होने लगी. उसके बाद से ही अंग्रेजों ने दंगों के बारे में एक विस्तृत रणनीति बनाई और संगठित तरीके से देश में दंगों का आयोजन होने लगा .अब तक के दंगों के इतिहास और उसकी राजनीति को समझने  के लिए माना जाता रहा है कि शासक वर्ग अपने राजनीतिक हितों की साधना के लिए दंगे करवाते हैं . लेकिन अब साम्प्रदायिक झगड़ों को समझने के विमर्श में एक नया  सिद्धांत बौद्धिक स्तर पर चर्चा  में है . बताया  गया है कि साम्प्रदायक दंगों की शुरुआत कोई न कोई व्यापारी करवाता  है और बाद में उसको राजनेताधार्मिक नेता या सामाजिक समूह अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करता है .  डॉ अनिरबान मित्रा और प्रोफेसर देबराज रे ने इस नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया है . " इम्प्लीकेशंस ऑफ ऐन इकानामिक थियरी ऑफ कानफ्लिक्ट: हिन्दू-मुस्लिम वायलेंस इन इण्डिया " शीर्षक वाला यह शोध पत्र  जब दुनिया  भर में अति सम्माननीय पत्रिका ," जर्नल आफ पोलिटिकल इकानामी " में जब अगस्त 2014 में छपा तो  यह  दंगे की राजनीति को समझने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है .


अब मुल्कों में जंग नहीं होती। अब एक ही मुल्क के लोग आपस में कट मरते हैं। ,पाकिस्तान,सीरिया और इराक में चल रही लड़ाइयां इसका सबसे ताजा उदाहरण हैं। इन देशों में भयानक संघर्ष की स्थिति है .इस संघर्ष में शामिल हर शख्स मुसलमान है। कोई राजा है तो कोई राजा बनने के लिए लड़ रहा है। जो हैरानी की बात है वह यह है कि पश्चिम एशिया में सत्ता पर कब्जा करने की जो जद्दोजहद चल रही हैउस हर लड़ाई में खून इंसान का बह रहा हैआम आदमी का बह रहा हैऐसे लोगों का खून बह रहा है जिनको इस लड़ाई में या तो मौत मिलेगी या गरीबी। लड़ाई की अगुवाई करने वालों को राज मिलेगावे जिसकी कठपुतलियां हैं उनको आर्थिक लाभ होगाअमेरिका और रूस इस इलाके में हो रही लड़ाई में अपने-अपने हित साध रहे हैंउनकी कठपुतलियां पूरे अरब को रौंद रही हैंऔर आम आदमी की जिंदगी तबाह कर रही हैं और अपने देश का मुस्तकबिल उन्हीं ताकतों के हवाले कर रही हैं जिन्होंने पूरी अरब दुनियां को आज से सौ साल पहले टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। विश्वयुद्ध के प्रमुख कारणों में से एक अरब इलाकों में मिले तेल पर कब्जा करना भी था।


भारत में भी स्वार्थी राजनेताओं ने 1940 के दशक में इसी तरह के धर्म आधारित खूनी संघर्ष की बुनियाद रख दी थी। जब अंग्रेजों की समझ में आ गया कि अब इस देश में उनकी हुकूमत के अंतिम दिन आ गए हैं तो उन्होंने मुल्क को तोड़ देने की अपनी प्लान बी पर काम शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अगस्त 1947 में जब आजादी मिली तो एक नहीं दो आजादियां मिलींभारत के दो टुकड़े हो चुके थेसाम्राज्यवादी ताकतों के मंसूबे पूरे हो चुके थे लेकिन सीमा के दोनों तरफ ऐसे लाखों परिवार थे जिनका सब कुछ लुट चुका था।  भारत और पाकिस्तान आजाद हो गए थे। दोनों ही देशों में साम्राज्यवादी ताकतों के नक्शेकदम पर राज करने की सौगंध खा चुके लोग नए शासक वर्ग बन चुके थेदोनों ही देशों में ऐसी अर्थव्यवस्था की बुनियाद डाल दी गई थी जिसमें आम आदमी की हिस्सेदारी केवल राजनीतिक पार्टियों को सरकार सौंप देने भर की थी। लेकिन जो हिंसक अभियान शुरू हुआ उसको अब बाकायदा  संस्थागत रूप दिया  जा चुका है। भारत की आजादी के पहले हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसने हिन्दू और मुसलमान के बीच अविश्वास का ऐसा बीज बो दिया था जो आज बड़ा पेड़ बन चुका है और अब उसके जहर से समाज के कई स्तरों पर नासूर विकसित हो रहा है। भारत की राजनीतिकसामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी में अब दंगे स्थायी भाव बन चुके हैं। आजादी के बाद से भारत में बहुत सारे दंगे हुए। अधिकतर दंगों के आयोजकों का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए सम्प्रदायों का धु्रवीकरण रहा है।  देखा यह गया है कि भारत में अधिकतर दंगे चुनावों के कुछ पहले सत्ता को ध्यान में रख कर करवाए जाते हैं। विख्यात भारतविद् पॉल ब्रास ने अपनी महत्वपूर्ण किताब ''द प्रोडक्शन ऑफ हिन्दू-मुस्लिम वायलेंस इन कंटेम्परेरी इण्डिया" में दंगों का बहुत ही विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया है। उन्होंने साफ कहा है कि हर दंगे में जो मुकामी नेता सक्रिय होता हैदोनों ही समुदायों में उसकी इच्छा राजनीतिक शक्ति हासिल करने की होती है लेकिन उसको जो ताकत मिलती है वह स्थानीय स्तर पर ही होती है।  उसके ऊपर भी राजनेता होते हैं जो साफ नज़र नहीं आते लेकिन वे बड़ा खेल कर रहे होते हैं। अपनी किताब में पॉल ब्रास ने यह बात बार-बार साबित करने की कोशिश की है कि भारत में दंगे राजनीतिक कारणों से होते हैंहालांकि उसका असर आर्थिक भी होता है लेकिन हर दंगे में मूलरूप से राजनेताओं का हाथ होता है।  पॉल ब्रास की अॅथारिटी को चुनौती देना मेरा मकसद नहीं है। आम तौर पर माना जाता है कि वे इस विषय के सबसे गंभीर आचार्य हैं। हिन्दू मुस्लिम संबंधों और झगड़ों पर ब्राउन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष वार्षणेय ने  भी बहुत गंभीर काम किया है,उनके विमर्श में पॉल ब्रास की बहुत सारी स्थापनाओं को चुनौती दी गई है लेकिन उनके भी निष्कर्ष लगभग वही हैं।

अब तक आमतौर पर यही माना जाता रहा है कि दंगों के पीछे राजनीतिक मकसद ही  होते हैं। लेकिन अब एक नया दृष्टिकोण भी बहस में आ गया है।  डॉ. अनिरबान मित्रा और प्रोफेसर देबराज रे के शोध के बाद दंगों को समझने के अध्ययन में एक नया आयाम जुड़ गया है . डॉ. मित्रा  कहते हैं कि 'राजनीतिशास्त्री और समाजशास्त्री  जातीय हिंसा के बारे में लिखते रहे हैं। लेकिन उनके लेखन में अक्सर आर्थिक कारणों को अहमियत नहीं दी जाती। हमारा विश्वास है कि इकानामिक थियरी और उसके तरीकों से संघर्ष को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।'  इस पर्चे के अनुसार भारत के कई इलाकों में धर्म का इस्तेमाल आर्थिक सम्पन्नता के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए कोई आदमी अपने जिले में कोई सामान बेचता है। अक्सर उसके मुकाबले में और लोग भी वही सामान या वही सेवाएं बेचने लगते हैं। अगर  वह कारोबारी मुसलमान है तो अपनी बिरादरी वालों को इकट्ठा करके दंगे की हालात पैदा कर देता है और अगर हिन्दू है तो वह मुसलमानों के खिलाफ लोगों  को भड़काता है। यह  व्यापारी किसी धर्म के मानने वालों से नफरत नहीं करतेबस कम्पीटीशन को खत्म करने के लिए सारा सरंजाम करते हैं और उनको उसका फायदा भी होता है। 

इस रिसर्च में 1950 से 2000 के बीच के दंगों के भारत सरकार के आंकड़ों का प्रयोग किया गया है। इस दौर में उन सभी लोगों के केस जांचे गए हैं जिनको दंगों के दौरान चोट लगी या जो घायल हुए। घरेलू खर्च के सरकारी सर्वे के आंकड़े भी इस्तेमाल किए गए है। शोध के नतीजे निश्चित रूप से एक नई समझ की तरफ संकेत  करते हैं। दंगे के अर्थशास्त्र को एक नया आयाम दे दिया गया है। बताया गया है कि दंगों में सबसे ज़्यादा परेशानी मुसलमानों को होती है। लिखते हैं, ''एक साफ पैटर्न नजर आता है। जब मुसलमानों की सम्पन्नता बढ़ती हैउसके अगले साल और बाद के वर्षों में धार्मिक संघर्ष बढ़ जाता है।"  देखा यह गया है कि अगर मुसलमानों की खर्च करने की क्षमता में एक प्रतिशत की वृद्धि होती है तो उस इलाके में हिंसक दंगों में पांच प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है। लेकिन हिन्दुओं के मामले में यह बिल्कुल उलटा है। अगर हिन्दू सम्पन्न होते हैं तो उनके खिलाफ कोई दंगा नहीं होता। इस रिसर्च के पहले भी ऐसी बहुत सारी  किताबें आई हैं जिनके अनुसार दंगों का कारण आर्थिक भी  होता है लेकिन अभी तक ऐसी कोई किताब या कोई सिद्धांत नहीं आया है जिसमें यह देखा जा सके कि दंगों में एक निश्चित आर्थिक पैटर्न होता है। इस शोध में यही बात जोर देकर कही गई है।

जाहिर है कि दंगों के मुख्य कारणों में आर्थिक मुद्दों को शामिल करना और राजनीतिक लाभ को उसका बाई प्रॉडक्ट मानना एक नई बात है और इससे विवाद पैदा होगा लेकिन यह भी सच है जब भी कोई नया सिद्धांत आता है तो जिन लोगों की बुद्धिमत्ता को चुनौती मिल रही होती है उनको चिंता होती है। जर्नल ऑफ पोलिटिकल इकानामी  जैसी सम्माननीय  शोष पत्रिका में इस शोध पत्र के छपने के बाद बहस की शुरुआत हो गयी थी ,कई लोग इसको खारिज भी कर रहे हैं . अब  संघर्ष और वैमनस्य के अध्येता मानने लगे हैं कि  हिन्दू-मुस्लिम झगडे आर्थिक लाभ के लिए ही किये  जाते हैं .कई बार लूट ही उद्देश्य होता है लेकिन अक्सर संसाधनों पर कब्जा , ख़ास उद्योग से किसी को बाहर करना ,प्रापर्टी पर क़ब्ज़ा करना आदि होता . राजनीतिक लाभ तो नेता लोग ऐसी हालात से निकाल ही लेते हैं लेकिन मुख्य प्रेरणा आर्थिक ही होती है . आर्थिक कारणों से दंगों
को हवा देने वाले नज़र नहीं आते . लेकिन वे अपने मुकामी स्वार्थ के लिए दंगों को बढाते हैं और अपने विरोधी कारोबारी के काम का एक हिस्सा झटकने के चक्कर में रहते हैं. यह भी सच है कि उनके स्वार्थ के चलते पूरे देश में पूंजी निवेश का माहौल खराब होता है. इसलिए सरकार को चाहिए कि अगर देश में नए उद्योग लगाकर नौजवानों को रोज़गार देना है तो किसी भी तरह के दंगे पर फ़ौरन रोक लगाई जानी चाहिए

महात्मा गांधी के हत्यारे को हीरो बनाने वाले देशद्रोही हैं



शेष नारायण सिंह


महात्मा गांधी की शहादत को सत्तर साल हो गए. महात्मा गांधी की हत्या जिस आदमी ने की थी वह कोई अकेला इंसान नहीं था. उसके साथ साज़िश में भी बहुत सारे लोग शामिल थे और देश में उसका समर्थन करने वाले भी बहुत लोग थे . वह एक विचारधारा का नेता था जिसकी बुनियाद में नफरत कूट कूट कर भरी हुयी है .तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने एक पत्र में लिखा  था कि  महात्मा जी की हत्या के दिन  कुछ लोगों ने खुशी से मिठाइयां बांटी थीं. नाथूराम गोडसे और उसके साथियों के पकडे जाने के बाद से अब तक उसके साथ सहानुभूति दिखाने वाले चुपचाप रहते थे ,उनकी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि कहीं यह बता सकें कि वे नाथूराम से सहानुभूति रखते हैं  . लेकिन अब बात बदल गयी है .अब उसके साथियों ने फिर सिर उठाना शुरू कर दिया है . देश के हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करने का दावा करें वाले एक नेता ने एक दिन एक   टीवी डिबेट में बिना पलक झपके कह दिया था कि नाथूराम गोडसे आदरणीय है  और   गांधी की  हत्या किसी और हत्या जैसी ही एक घटना है. उसके समर्थक अब  नाथूराम को सम्मान देने की कोशिश करने लगे  हैं . कुछ शहरों  में नाथूराम गोडसे के मंदिर भी बन गए हैं.


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महात्मा गांधी के हत्यारे को इस तरह से सम्मानित करने के पीछे वही रणनीति और सोच काम कर रही है जो महात्मा गांधी की ह्त्या के पहले थी .गांधी की हत्या के पीछे के तर्कों का बार बार परीक्षण किया गया है लेकिन एक पक्ष जो बहुत ही उपेक्षित रहा है वह है  कि महात्मा गांधी को मारने वाले संवादहीनता की राजनीति के पोषक थे वे बात को दबा देने और छुपा देने की रणनीति पर काम करते थे जबकि महात्मा गांधी अपने समय के सबसे महान कम्युनिकेटर थे. उन्होंने आज़ादी की लडाई से जुडी हर बात को बहुत ही  साफ़ शब्दों में बार बार समझाया था. पूरे देश के जनमानस में अपनी बात को इस तरह फैला दिया था की हर वह आदमी जो सोच सकता था ,जिसके पास ऐसा दिमाग था जो काम कर सकता था, वह गांधी के साथ था .

महात्मा गांधी की अपनी सोच में नफरत का हर स्तर पर विरोध किया गया था. पूरी दुनिया में महात्मा गांधी का बहुत सम्मान है .  पूरी दुनिया में उनके प्रशंसक और भक्त फैले हुए हैं। महात्मा जी के सम्मान का आलम तो यह है कि वे जातिधर्मसंप्रदायदेशकाल सबके परे समग्र विश्व में पूजे जाते हैं। वे किसी जाति विशेष के नेता नहीं हैं। हां यह भी सही है कि भारत में ही एक बड़ा वर्ग उनको सम्मान नहीं करता बल्कि नफरत करता है। इसी वर्ग और राजनीतिक विचारधारा के चलते ही 30 जनवरी 1948 के दिन गोली मारकर महात्मा जी की हत्या कर दी गयी थी उनके हत्यारे के वैचारिक साथी अब तक उस हत्यारे को सिरफिरा कहते थे लेकिन यह सबको मालूम है कि महात्मा गांधी की हत्या किसी सिरफिरे का काम नहीं था। वह उस वक्त की एक राजनीतिक विचारधारा के एक प्रमुख व्यक्ति का काम था। उनका हत्यारा ,नाथूराम गोडसे कोई सड़क छाप आदमी नहीं थावह हिंदू महासभा का नेता था और अपनी पार्टी के 'अग्रणीनाम के अखबार का संपादक था। गांधी जी की हत्या के आरोप में उसके बहुत सारे साथी गिरफ्तार भी हुए थे। ज़ाहिर है कि गांधीजी की हत्या करने वाला व्यक्ति भी महात्मा गांधी का सम्मान नहीं करता था और उसके वे साथी भी जो आजादी मिलने में गांधी जी के योगदान को कमतर करके आंकते हैं। अजीब बात है कि गोडसे को महान बताने वाले और महात्मा गांधी  के योगदान को कम करके आंकने वालों के हौसले आजकल  बढे हुए  हैं .

हालांकि इस सारे माहौल में एक बात और भी सच हैवह यह कि महात्मा गांधी से नफरत करने वाली बहुत सारी जमातें बाद में उनकी प्रशंसक बन गईं। जो कम्युनिस्ट हमेशा कहते रहते थे कि महात्मा गांधी ने एक जनांदोलन को पूंजीपतियों के हवाले कर दिया थावही अब उनकी विचारधारा की तारीफ करने के बहाने ढूंढते पाये जाते हैं। अब उन्हें महात्मा गांधी की सांप्रदायिक सदभाव संबंधी सोच में सदगुण नजर आने लगे है।लेकिन आज भी गोडसे के भक्तों की एक जमात है जो महात्मा गांधी को आज भी उतनी ही नफरत करती है ,जितना आजादी के समय करती थी.
आर.एस.एस. के ज्यादातर विचारक महात्मा गांधी के विरोधी रहे थे लेकिन 1980 में आर एस एस के अधीन काम करने वाली राजनीतिक पार्टी,बीजेपी ने गांधीवादी समाजवाद के सिद्घांत का प्रतिपादन करके इस बात को ऐलानिया स्वीकार कर लिया कि महात्मा गांधी का अनुसरण किये  बिना भारत में राजनीतिक सत्ता तक  पंहुचना नामुमकिन है और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। अब देखा गया है कि आर एस एस और उसके मातहत सभी संगठन महात्मा गांधी को अपना हीरो  बनाने की कोशिश करते पाए जाते हैं . आर एस एस के बहुत सारे समर्थक कहते हैं की महात्मा गांधी कभी भी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे. ऐसा इतिहास के अज्ञान के कारण ही कहा जाता है क्योंकि महात्मा गांधी के जीवन के तीन बड़े आन्दोलन  कांग्रेस पार्टी के ही आन्दोलन थे. १९२० के आन्दोलन को कांग्रेस से मंज़ूर करवाने के लिए महात्मा गांधी ने कलकत्ता और नागपुर के अधिवेशनों में बाक़ायदा अभियान चलाया था . देशबंधु चितरंजन दास ने कलकत्ता सम्मलेन में गांधी जी का विरोध किया था लेकिन महात्मा गांधी के व्यक्तित्व में वह ताकता थी कि नागपुर में देशबंधु चितरंजन दास खुद महात्मा गांधी के समर्थक बन गए . १९३० का आन्दोलन भी जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली कांग्रेस पार्टी के लाहौर में पास हुए प्रस्ताव का नतीजा था. १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन भी मुंबई में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में लिया गया था .  महात्मा  गांधी खुद १९२४ में बेलगाम में हुए कांग्रेस के उन्तालीसवें  अधिवेशन के अध्यक्ष थे . लेकिन वर्तमान कांग्रेसियों को इंदिरा गांधी के वंशज  गांधियों के सम्मान की इतनी चिंता  रहती है कि महात्मा गांधी की विरासत को अपने नज़रों के सामने छिनते देख रहे हैं और उनके  सम्मान तक की रक्षा नहीं कर पाते. इसके अलावा जिन अंग्रेजों ने महात्मा जी को उनके जीवनकाल में अपमान की नजर से देखाउनको जेल में बंद कियाट्रेन से बाहर फेंका उन्हीं के वंशज अब दक्षिण अफ्रीका और इंगलैंड के हर शहर में उनकी मूर्तियां लगवाते फिर रहे हैं। इसलिए गांधी के हत्यारे को सम्मानित करने की कोशिश में लगे लोगों को समझ लेना चाहिए कि भारत की आज़ादी की लड़ाई के हीरो और दुनिया भर में अहिंसा की राजनीति के संस्थापक को अपमानित करना असंभव है . इनको इन कोशिशों से बाज आना चाहिए.
मौजूदा सरकार को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि महात्मा गांधी के हत्यारे को सम्मानित करने वालों को शाह देने की कोशिश उन पर भी भारी पड़ सकती है .महात्मा गांधी की शहादत के दिन को देश में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है . लेकिन आजकल   बीजेपी के कई नेता  "पूज्य बापू को उनकी पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन. "  करते देखे जा रहे हैं. तीस जनवरी को शहीद दिवस मानने से संकोच देखा जा सकता है . सरकार को इस बात को सुनिश्चित करना चाहिए कि  गांधी के हत्यारों को सम्मानित करने वालों को सज़ा दिलवाएं .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने ही समकालीन अमरीकी इतिहास के सबसे यशस्वी  राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दिल्ली में अपनी सरकारी यात्रा के दौरान  बार बार यह बताया था कि उनके निजी जीवन और अमरीका के सार्वजनिक जीवन में महात्मा गांधी का कितना महत्व है . ज़ाहिर है महात्मा गांधी का नाम भारत के राजनेताओं के लिए बहुत बड़ी राजनीतिक पूंजी है . अगर उनके हत्यारों को सम्मानित करने वालों पर लगाम न लगाई गयी तो बहुत मुश्किल पेश आ सकती है . प्रधानमंत्री समेत सभी नेताओं को चाहिए कि नाथूराम गोडसे को भगवान बनाने की कोशिश करने वालों की मंशा को सफल न होने दें वरना भारत के पिछली सदी के इतिहास पर भारी कलंक लग जाएगा .

Thursday, January 25, 2018

क्या करणी सेना के पास भूख से तड़पते और लेबर चौक पर खड़े राजपूतों के लिए भी कोई योजना है ?

  
शेष नारायण सिंह

राजस्थान की  करणी माता के नाम पर बनी एक सेना के हवाले से एक फिल्म का विरोध आजकल राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है.बिना फिल्म देखे लाखों नौजवान सड़क पर आ गए और तोड़ फोड़ शुरू कर दी. कुछ नेता भी पैदा हो गए और फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग शुरू कर दी . मैंने कई बार इन नेताओं से राजपूत हित की बात करने की  कोशिश की लेकिन वे फिल्म पर पाबंदी के अलावा कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं थे.  अब फिल्म बहुत सारे लोगों ने देख लिया है और आम तौर  लोगों की राय यही है कि फिल्म में रानी पद्मिनी का कोई अपमान नहीं हुआ है और राजपूत  गौरव को पूरी तरह से सम्मान दिया गया है .सवाल उठता है कि बिना फिल्म देखे और उसके बारे में बिना जानकारी हासिल किये इतनी बड़ी संख्या में नौजवान  राजपूत लड़कों  को सड़क पर लाने वाले अब अपने आप को क्या जवाब देंगें . अब यह सवाल पूच्छे जायेंगे कि आप ने इतने बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ का जो आयोजन किया  उसके पीछे आपकी मंशा क्या थी. कहीं कोई गुप्त एजेंडा तो नहीं था. के वास्तव में आपको राजपूतों के गौरव का उतना ही ध्यान रहता है जितना उन बेरोजगार नौजवानों को इकठ्ठा करने के समय आपने दिखाई थी. रानी पद्मिनी की ऐतिहासिकता पर चर्चा करने की ज़रूरत नहीं है. उनको ऐतिहासिक चरित्र माना जा सकता है और राजपूतों के एक बड़े वर्ग में उनको सम्मान का  मुकाम हासिल है. अब उनके सम्मान से समझौता करने वाली फिल्म का विवाद ख़त्म हो  जाएगा . क्या मौजूदा आन्दोलन के नेता अब भी  उनके आवाहन पर मरने मारने के लिए सड़क पर आये लोगों के कल्याण के बारे में कुछ सोचेंगे .
आन्दोलन के दौरान राजपूतों के कई नेताओं से  मुलाक़ाते होती रही थीं.उनसे जब  ज़िक्र किया गया कि इन बेरोजगार लड़कों के लिए उनके दिमाग में क्या कोई योजना है . तो कई लोगों ने बताया कि सरकारी नौकरियों के रिज़र्वेशन के लिए आन्दोलन चलाया जाएगा . उनको भी मालूम है कि इस तरह की बात का कोई नतीजा  नहीं निकलने वाला है . लड़कों को किसी बेमतलब के झगडे में फंसाए रखना ही उद्देश्य है . ऐतिहासिक रूप से राजपूतों को शोषक और  उत्पीड़क के रूप में चित्रित किया  जाता रहा है . उनके तथाकथित उत्पीडन से मुक्ति के लिए ही दलितों और पिछड़ी जातियों  के लोगों को आरक्षण दिया गया था .  ज़ाहिर है उनके आरक्षण की मांग को  बिना विचार किये ही खारिज कर दिया जाएगा . इसलिए बेरोजगार राजपूत नौजवानों को सरकारी नौकरी के अलावा किसी और तरह का रोज़गार दिलाने के बारे में सोचना होगा. इन नेताओं के पास अवसर है कि राजपूतों को सामान्य इंसान के रूप में  भी पेश करने के लिए  प्रयास करें और उनकी जो शोषक की छवि बनी हुयी है उसको तोड़ें और पूर्व ज़मींदारों से गरीब राजपूतों  को अलग करके प्रस्तुत करें . आज की सच्चाई यह है कि दिल्ली और  नोयडा के किसी लेबर चौक पर सुबह पांच बजे चले जाइए ,वहां, उत्तर प्रदेश ,बिहार,मध्य प्रदेश और राजस्थान से दिल्ली आये राजपूत लड़के काम के इंतज़ार में खड़े मिल जायेगें . और अगर उसी चौक पर  ग्यारह बजे जाकर देहें तो क्चुह्ह नौजवान निराश खड़े मिले जायेगें क्योंकि मजदूरों की  मंडी में उस दिन उनको काम नहीं मिल पाया.

मेरा भी जन्म एक राजपूत परिवार में हुआ  है लेकिन  अपनी बिरादरी की पक्षधरता की बात करने से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढी के लिए यह अजूबा ही रहा है कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा है . हालांकि शोषण राजपूत तालुकेदारों और राजओंने किया होगा लेकिन शोषक का तमगा सब पर थोप दिया जाता रहा है . आम राजपूत तो अन्य जातियों के लोगों की तरह गरीब ही है . मैंने अपने बचपन में देखा है कि मेरे अपने गांव में राजपूत बच्चे भूख से तडपते थे. मेरे अपने घर में भी मेरे बचपन में भोजन की बहुत किल्लत रहती थी. इसलिए राजपूतों को एक वर्ग के रूप में शोषक मानना मेरी समझ में कभी नहीं आया.. मेरे बचपन में मेरे गाँव में राजपूतों के करीब १६ परिवार रहते थे .अब वही लोग अलग विलग होकर करीब ४० परिवारों में बँट गए हैं . मेरे परिवार के अलावा कोई भी ज़मींदार नहीं था . सब के पास बहुत मामूली ज़मीन थी. कई लोगों के हिस्से में तो एक एकड़ से भी कम ज़मीन थी. तालाब और कुओं से सिचाई होती थी और किसी भी किसान के घर साल भर का खाना नहीं पूरा पड़ता था . पूस और माघ के महीने आम तौर पर भूख से तड़पने के महीने माने जाते थे. जिसके घर पूरा भी पड़ता था उसके यहाँ चने के साग और भात को मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर लिया गया था. मेरे गांव में कुछ लोग सरकारी नौकरी भी करते थे हालांकि अपने अपने महकमों में सबसे छोटे पद पर ही थे. रेलवे में एक स्टेशन मास्टर ,तहसील में एक लेखपाल और ग्राम सेवक और एक गाँव पंचायत के सेक्रेटरी . तीन चार परिवारों के लोग फौज में सिपाही थे . सरकार में बहुत मामूली नौकरी करने वाले इन लोगों के घर से भूखे सो जाने की बातें नहीं सुनी जाती थीं . बाकी लोग जो खेती पर ही निर्भर थे उनकी हालत खस्ता रहती थी .
.उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में स्थित अपने गांव के हवाले से हमेशा बात को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे इंसान के लिए यह बात हमेशा पहेली बनी रही कि सबसे गरीब लोगों की जमात में खड़ा हुआ मेरे गाँव का राजपूत शोषक क्यों करार दिया जाता रहा है . मेरे गाँव के राजपूत परिवारों में कई ऐसे थे जो पड़ोस के गाँव के कुछ दलित परिवारों से पूस माघ में खाने का अनाज भी उधार लाते थे . लेकिन शोषक वही माने जाते थे. बाद में समझ में आया कि मेरे गाँव के राजपूतों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा की उपेक्षा रही है . जिन घरों के लोग पढ़ लिख गए वे आराम से रहने लगे थे . वरना पिछड़ेपन का आलम तो यह है कि २०१० में उत्तर प्रदेश सरकार ने जब सफाईकर्मी भर्ती करने का फैसला किया तो मेरे गाँव के कुछ राजपूत लड़कों ने दरखास्त दिया था. जबकि सफाई कर्मी का काम ग्रामीण राजपूती पहचान के लिए बहुत ही अपमानजनक माना जाता  था. लेकिन गरीबी की मार ऐसी ज़बरदस्त होती  है कि कोई भी अहंकार उसके सामने ज़मींदोज़ हो जाता  है . जब गाँव से बाहर निकल कर देखा तो एक और बात नज़र आई कि हमारे इलाके में जिन परिवारों के लोग ,कलकत्ता,जबलपुर ,अहमदाबाद,सूरत या मुंबई में रहते थे उनके यहाँ सम्पन्नता थी. मेरे गाँव के भी एकाध लोग मुंबई में कमाने गए थे .वे भी काम तो मजूरी का ही करते थे लेकिन मनी आर्डर के सहारे घर के लोग दो जून की रोटी खाते थे . जौनपुर में मेरे ननिहाल के आस पास लगभग  सभी संपन्न राजपूतों के परिवार मुंबई की ही कमाई से आराम का जीवन बिताते थे. २००४ में जब मुझे मुंबई जाकर नौकरी करने का प्रस्ताव आया तो जौनपुर में पैदा हुई मेरी माँ ने खुशी जताई और कहा कि भइया चले जाओ बम्बई लक्ष्मी का नइहर है . बात समझ में नहीं आई . जब मुंबई में आकर एक अधेड़ पत्रकार के रूप में अपने आपको संगठित करने की कोशिश शुरू की तो देखा कि यहाँ बहुत सारे सम्पन्न राजपूत रहते हैं . देश के सभी अरबपति ठाकुरों की लिस्ट बनायी जाय तो पता लगेगा कि सबसे ज्यादा संख्या मुंबई में ही है . दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर लोगों के गाँव तत्कालीन बनारस और गोरखपुर कमिश्नरियों में ही हैं .कभी इस मसले पर गौर नहीं किया था. २०१२ में मुंबई यात्रा के दौरान कांदिवली के ठाकुर विलेज में एक कालेज के समारोह में जाने का मौक़ा मिला . वहां राष्ट्रीय राजपूत संघ के तत्वावधान में उन बच्चों के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिनको २०११ की परीक्षाओं में बहुत अच्छे नंबर मिले थे. बहुत बड़ी संख्या में ७० प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की लाइन लगी हुई थी और राजपूत समाज के ही सफल,संपन्न और वारिष्ठ लोगों के हाथों बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. उस सभा में मुंबई में राजपूतों के सबसे आदरणीय और संपन्न लोग मौजूद थे.उस कार्यक्रम में जो भाषण दिए गए उनसे मेरी समझ में आया कि माजरा क्या है . मुम्बई में आने वाले शुरुआती राजपूतों ने देखा कि मुंबई में काम करने के अवसर खूब हैं . उन्होंने बिना किसी संकोच के हर वह काम शुरू कर दिया जिसमें मेहनत की अधिकतम कीमत मिल सकती थी. और मेहनत की इज्ज़त थी .शुरुआत में तबेले का काम करने वाले यह लोग अपने समाज के अगुवा साबित हुए. उन दिनों माहिम तक सिमटी मुंबई के लोगों को दूध पंहुचाने काम इन लोगों ने हाथ में ले लिया . जो भी गाँव जवार से आया सबको इसी काम में लगाते गए. आज उन्हीं शुरुआती उद्यमियों के वंशज मुंबई की सम्पन्नता में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है . साठ और सत्तर के दशक में जो लोग मुंबई किसी मामूली नौकरी की तलाश में आये ,उन्होंने भी सही वक़्त पर अवसर को पकड़ा और अपनी दिशा में बुलंदियों की तरफ आगे चल पड़े,. आज शिक्षा का ज़माना है . बारम्बार कहा जा रहा  है कि भारत को शिक्षा के एक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. मुंबई के राजपूत नेताओं ने इस बयान के आतंरिक तत्व को पहचान लिया और आज उत्तर प्रदेश से आने वाले राजपूतों ने शिक्षा के काम में अपनी उद्यमिता को केन्द्रित कर रखा है .उत्तरी मुंबई में कांदिवली के ठाकुर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशनस की गिनती भारत के शीर्ष समूहों में होती है . इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे राजपूत नेताओं को मैं जानता हूँ जिन्होंने शिक्षा को अपने उद्योग के केंद्र में रखने का फैसला कर लिया है . लगता है कि अब यह लोग शिक्षा के माध्यम से उद्यम के क्षेत्र में भी सफलता हासिल करेगें और आने वाली पीढ़ियों को भी आगे ले जायेगें .
फिर सवाल वहीं आकर बैठ जाता है कि श्री राजपूत करणी सेना के नेता लोग क्या  राजपूत लड़कों को अगले किसी काल्पनिक संघर्ष में फंसाने के लिए तैयार करेंगे  या उनके लिये उद्यमिता  के विकल्पों पर  विचार करने का अवसर उपलब्ध करायेंगें . मुंबई का जो उदाहरण दिया  गया  है उसमें कहीं भी किसी सरकार की कोई भूमिका नहीं है . अगर इन नौजवानों को सरकार से मिलने वाले  किसी लालीपाप का लालच देकर अपने की चंगुल में फंसाए रखना उद्देश्य है तो उसमें दीर्घकालिक सफलता नहीं मिलेगी लेकिन अगर इतने बड़े पैमाने पर मोबिलाइज़ किये गए बेरोजगार नौजवानों की ज़िंदगी में कुछ  अच्छा करने की कोशिश की जाए तो समाज का भला होगा .

मानव संसाधन विकास मंत्रालय में जूनियर मंत्री सत्यपाल सिंह टिके रहने पर सवालिया निशान



शेष नारायण सिंह

बीजेपी के  टिकट पर बागपत से चुनाव जीतकर आये पूर्व पुलिस अफसर सत्यपाल सिंह केंद्र सरकार में जूनियर मंत्री हो गए और उनको महत्वपूर्ण शिक्षा विभाग में कैबिनेट मंत्री प्रकाश जावडेकर के अधीन काम करने का मौक़ा भी मिल गया . लेकिन वे भूल गए कि उनको कुछ भी कह देने का अधिकार नहीं मिल गया है . अपनी धुन में आई आई टी गौहाटी में बोल गए कि मनुष्य के विकास का डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक  नहीं है . उन्होंने  दावा किया कि डार्विन गलत थेकिसी ने बंदर को इंसान में बदलते नहीं देखा। मानव विकास संबंधी चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत वैज्ञानिक तौर पर गलत है।उन्होंने स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में इसमें बदलाव की भी हिमायत  कर डाली . डार्विन के सिद्धांत पर सत्यपाल सिंह ने कहा कि जब से इस धरती पर इंसान आया हैतब से वह मानव रूप में ही है। यानी इंसान मानव के रूप में ही इस धरती पर आया है. उन्होंने और भी ज्ञान बघारा कि उनके किसी भी पूर्वज ने कभी भी किसी बंदर को इंसान बनते नहीं देखा . उन्होंने साथ साथ यह भी घोषणा कर दी कि सरकार एक  सेमीनार बुलाकर डार्विन के सिद्धांत की कमियों को उजागर करेगी. हो सकता है कि इस तरह के बयान  सत्यपाल सिंह पहले भी देते रहे हों . ज़ाहिर है उनको किसी ने गंभीरता से नहीं लिया होगा / लेकिन जब इस बार उन्होंने स्कूलों में पाठ्यक्रम बदलने की बात कर दी तो सरकार को  चिंता हो गयी और उनके बॉस प्रकाश जावडेकर ने उनको डांट दिया कि इस तरह के उल जलूल बयान न दिया करें .
 सत्यपाल सिंह के  बयान के बाद बीजेपी और सरकार के लिए मुश्किल बढ़ गयी थी. दुनिया भर में मजाक उड़ाया जा रहा  था . शायद इसी नुक्सान को कंट्रोल करने के लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने अपने जूनियर मंत्री के बयान  पर सख्त हिदायत दी और कहा कि उनको ऐसे बयान देने से बाज़ आना चाहिए .  जावडेकर ने यह भी कहा कि डार्विन के सिद्धांत को गलत साबित करने के लिए किसी भी सेमिनार के  आयोजन की बात भी गलत  है . सरकार की  ऐसी कोई योजना नहीं है . सरकार की तरफ से ऐसे किसी भी आयोजन के लिए न तो कोई धन दिया जाएगा और न ही सरकार किसी भी सेमीनार का आयोजन करेगी .
राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह के बयान पर वैज्ञानिकों में भी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी .देश  भर के  करीब  दो हज़ार वैज्ञानिकों ने केंद्र सरकार को एक ज्ञापन दिया जिसमें लिखा है कि ," यह कहना गलत है कि  डार्विन के विकास के सिद्धांत को वैज्ञानिकों ने रिजेक्ट कर दिया है .इसके विपरीत सच्चाई यह  है कि हर नई खोज डार्विन के सिद्धान्त को और मजबूती देती है .इस बात के बहुत सारे अकाट्य सबूत हैं कि बंदरों और मनुष्यों के पूर्वज एक ही थे. " इस ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में  देश के सबसे  महान संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हैं . टाटा  इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई, नैशनल सेंटर फार रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स ,पुणे, नैशनल सेंटर फार सेलुलर एंड मालिकुलर बायोलाजी ,हैदराबाद जैसे संस्थानों के वैज्ञानिकों के सत्यपाल सिंह के बयान से असहमति  जताई और नाराज़गी भी ज़ाहिर की .
अपने बॉस की परेशानी की चिंता किये  बगैर सत्यपाल सिंह अभी भी अपने बयान पर कायम हैं और कहते पाए गए हैं कि डार्विन का विकास का सिद्धांत वैज्ञानिक नहीं है . अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनी इस जिद के बाद सत्यपाल सिंह कब  तक मंत्रिमंडल में टिके रह पायेगें . दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तो यह   पक्का ही माना जा  रहा है कि उनका प्रकाश जावडेकर के मंत्रालय में काम कार पाना तो असंभव ही हो गया है . हाँ यह संभव है कि किसी अन्य विभाग में कोई काम देकर उनको मंत्री बना रहने दिया जाए