Saturday, December 16, 2017

जाति एक शिकंजा है ,तरक्की के लिए इसका विनाश ज़रूरी है.



शेष नारायण सिंह

डा.अंबेडकर के  निर्वाण को साठ साल से ऊपर हो गए .इस मौके पर उनको  हर साल याद किया जाता  है , इस साल भी किया जाएगा. इस अवसर पर ज़रूरी है कि उनकी सोच और दर्शन के सबसे अहम पहलू पर गौर किया जाए. सब को मालूम है कि डा. अंबेडकर के दर्शन ने २० वीं सदी के भारत के राजनीतिक आचरण को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है . लेकिन उनके दर्शन की सबसे ख़ास बात पर जानकारी की भारी कमी है. शायद ऐसा इसलिए है कि उनके नाम पर राजनीति करने वाले उन्हीं बातों को प्रचारित करते है जो उनको  अपने  स्वार्थ के हिसाब से उपयोगी लगती  हैं . आम अवधारणा यह है कि बाबा साहेब जाति व्यवस्था के खिलाफ थे . यह सच है लेकिन इतना ही सच नहीं है . और  भी बहुत कुछ है . मसलन  डॉ साहब मानते थे कि  जाति की व्यवस्था शताब्दियों की साज़िश का नतीजा है और उसका खात्मा सामाजिक विकास की एक ज़रूरी शर्त है . अंबेडकर ने कहा था कि जब तक अंतरजातीय शादी-ब्याह नहीं होंगें तब तक बात नहीं बनने वाली नहीं है, जाति प्रथा को तोड़ना नामुमकिन होगा . सहविवाह और सहभोजन  बहुत  ज़रूरी है .
डॉ आंबेडकर के  दर्शन में इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो देश के हर नागरिक को जानना चाहिए .उनके दर्शन शास्त्र की  कई बातों के बारे में ज़्यादातर लोग अन्धकार में हैं. उन्हीं कुछ बातों का ज़िक्र करना आज के दिन सही रहेगा. डा. अंबेडकर को इतिहास एक ऐसे राजनीतिक चिन्तक के रूप में याद रखेगा जिन्होंने जाति के विनाश को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की बुनियाद माना था. यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उनकी राजनीतिक विरासत का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली पार्टी की नेताआज जाति की संस्था को संभाल कर रखना चाहती हैं ,उसके विनाश में उनकी कोई रूचि नहीं है . वोट बैंक राजनीति के चक्कर में पड़ गयी अंबेडकरवादी पार्टियों को अब वास्तव में इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर जाति का विनाश हो जाएगा तो उनकी वोट बैंक की राजनीति का क्या होगा. डा अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांतियां भी हैं . कांशीराम और मायावती ने इस क़दर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस्था का ज़हर मनु ने ही फैलाया थावही इसके संस्थापक थे और मनु की सोच को ख़त्म कर देने मात्र से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन बाबा साहेब ऐसा नहीं मानते थे . उनके एक बहुचर्चितऔर अकादमिक भाषण के हवाले से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस्था की सारी बुराइयों को लिए मनु को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता .मनु के बारे में उन्होंने कहा कि अगर कभी मनु रहे भी होंगें तो बहुत ही हिम्मती रहे होंगें . डा. अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यक्ति बना दे और बाकी पूरा समाज उसको स्वीकार कर ले. उनके अनुसार इस बात की कल्पना करना भी बेमतलब है कि कोई एक आदमी कानून बना देगा और पीढियां दर पीढियां उसको मानती रहेंगीं. . हाँ इस बात की कल्पना की जा सकती है कि मनु नाम के कोई तानाशाह रहे होंगें जिनकी ताक़त के नीचे पूरी आबादी दबी रही होगी और वे जो कह देंगे ,उसे सब मान लेंगें और उन लोगों की आने वाली नस्लें भी उसे मानती रहेंगी.उन्होंने कहा कि मैं इस बात को जोर दे कर कहना चाहता हूँ कि मनु ने जाति की व्यवस्था की स्थापना नहीं की क्योंकि यह उनके बस की बात नहीं थी  . मनु के जन्म के पहले भी जाति की व्यवस्था कायम थी. . मनु का योगदान बस इतना है कि उन्होंने इसे एक दार्शनिक आधार दिया. . जहां तक हिन्दू समाज के स्वरूप  और उसमें जाति के मह्त्व की बात हैवह मनु की हैसियत के बाहर था और उन्होंने वर्तमान हिन्दू समाज की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभाई. उनका योगदान बस इतना ही है उन्होंने जाति को एक धर्म के रूप में स्थापित करने की कोशिश की . जाति का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक आदमीचाहे वह जितना ही बड़ा ज्ञाता या शातिर होसंभाल ही नहीं सकता. . इसी तरह से यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि ब्राह्मणों ने जाति की संस्था की स्थापना की. मेरा मानना है कि ब्राह्मणों ने बहुत सारे गलत काम किये हैं लेकिन उनकी औक़ात यह कभी नहीं थी कि वे पूरे समाज पर जाति व्यवस्था को थोप सकते.  बाबा साहेब ने अपने इसी भाषण में एक चेतावनी और दी थी कि उपदेश देने से जाति की स्थापना नहीं हुई थी और इसको ख़त्म भी उपदेश के ज़रिये नहीं किया जा सकता. इस बात में दो राय नहीं है कि  डा अंबेडकर पर अपने पहले के महान समाज सुधारक ,ज्योतिबा फुले का बड़ा प्रभाव था . उन्हें यह पूरा विश्वास था कि जाति प्रथा को किसी व्यक्ति से जोड़ कर उसकी तार्किक परिणति तक नहीं ले जाया जा सकता. कहीं ऐसा न हो कि केवल मनु को लक्ष्य करने के चक्कर में  मनु के विचार तो ख़त्म हो जाएँ लेकिन  जाति प्रथा ज्यों की त्यों बनी रह जाये . जाति प्रथा का खात्मा ज़रूरी  है लेकिन अगर केवल मनु को टारगेट किया जाता रहा तो बात बनेगी नहीं . पूरे सिस्टम पर हमला करना पडेगा .

डा अंबेडकर के अनुसार हर समाज का वर्गीकरण और उप वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे सांचों में फिट हो जाता है कि एक दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं . यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त्म किये बिना कोई तरक्की नहीं हो सकती. सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बंटा हुआ था . ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र . यह वर्गीकरण मूल रूप से जन्म के आधार पर नहीं थायह कर्म के आधार पर था .एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हज़ारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक दूसरे वर्ग में आने जाने की रीति ख़त्म हो गयी. और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा. . अगर आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जाय और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराये जाएँ तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा. और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा.. अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योतिबा फुलेडा. राम मनोहर लोहिया और डा. अम्बेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा..

समाज और राजनीति का फ़र्ज़ है लड़कियों को आत्मनिर्णय का अधिकार देना



शेष नारायण सिंह

केरल की हादिया के प्रेम और विवाह करने एक अधिकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है . हाई कोर्ट में उसके अपनी पसंद के पुरुष से शादी करने के  अधिकार को अनुपयुक्त पाया गया था जिसके खिलाफ  देश के सर्वोच्च न्यायलय में अपील की गयी है . फैसला अभी नहीं आया है इसलिए उस मामले में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं   है. हादिया पहले अखिला थी , इस्लाम  क़ुबूल कर लिया और अपनी पसंद के मुस्लिम लड़के से शादी कर ली . उसके विवाह करने के अधिकार पर जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ जाएगा तब उस पर चर्चा की जायेगी . सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उचित  समझा कि उसकी शिक्षा को जारी रखा जाना  चाहिए तो उसके लिए ज़रूरी निर्देश दे दिए गए हैं और वह तमिलनाडु के अपने मेडिकल कालेज में अपनी पढ़ाई से सम्बंधित कार्य कर रही है . लेकिन लव जिहाद के बारे में बात की जा सकती  है ,उसपर समाजशास्त्रीय  विमर्श और टिप्पणी की जा सकती है .
वास्तव में एक लडकी और एक लड़के के बीच होने वाले प्रेम को लव जिहाद का नाम देना और इसको मुद्दा बनाना समाज में पुरुष आधिपत्य की मानसिकता का एक  नमूना है . लव  जिहाद वाले ज़्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि जो गरीब या मध्य वर्ग के लोग हैं , उनको ही अपमानित करने के लिए लक्षित किया जाता है . यह नया भी नहीं है . हिन्दू लडकी और मुस्लिम लड़के के बीच प्रेम को हमेशा ही आर एस एस और उसके अधीन  संगठनों की राजनीति में हिकारत की नज़र से देखा जाता रहा   है .  बीजेपी के पूर्व उपाध्यक्ष सिकंदर बख्त को भी आर एस एस के इस क्रोध  को झेलना पड़ा था. बाद में तो वे बीजेपी की कृपा से केंद्रीय मंत्री  और राज्यपाल भी हुए लेकिन आर एस एस के अखबार आर्गनाइज़र के २ जून १९५२ के  अंक में उनके बारे में जो लिखा है उससे साफ़ हो जाता है कि आर एस एस ने  उनको शक की नज़र से देखा . सिकंदर बख्त एंड कंपनी शीर्षक के लेख में उनके बारे में जो बातें लिखीं थीं ,वे किसी को भी आपत्तिजनक लग सकती हैं. अखबार को शक था कि तब के कांग्रेसी नेता  सिकंदर बख्त किसी बड़ी कांग्रेसी महिला नेता के प्रेम में हैं और उसके साथ रह रहे हैं . इसी को केंद्र में रख कर काफी कुछ लिखा गया था . बाद में जब उन्होंने एक हिन्दू लडकी से शादी कर लिया तो दिल्ली शहर में भारी हल्ला  गुल्ला किया गया था . इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि हिन्दू-मुस्लिम प्रेम और विवाह पर आर एस एस के संगठन अब ज्यादा आक्रामक हो गए हैं . यह हमेशा से ही ऐसे ही थे. इनकी राजनीतिक  ताक़त बढ़ गयी  है और अब उनके  इस तरह के कारनामों को सरकारी संरक्षण मिलता है इसलिए वे  ज़्यादा मुखर  हो गए हैं .
एक और दिलचस्प बात गौर करने लायक है . लव जिहाद और  उससे जुडी हिंसा का शिकार आम तौर पर गरीब या  सम्पन्नता के निचले पायदान पर  मौजूद लोग ही होते हैं .  सम्पन्न या राजनीतिक रूप से  ताक़तवर लोगों पर लव जिहाद के हमलावर कुछ नहीं बोलते .  देश  भर में ऐसे  लाखों जोड़े हैं जो हिन्दू  मुस्लिम विवाह के उदाहरण हैं लेकिन उनपर कभी किसी लव जिहादी ने जिहाद नहीं छेड़ा .शाहरुख ख़ानआमिर ख़ानसैफ़ अली ख़ानइरफान ख़ानसलीम ख़ानन नसीरूद्दीन शाहसाजिद नाडियावाला, , इमरान हाशमीमुज़फ़्फ़र अलीइम्तियाज़ अलीअज़ीज़ मिर्ज़ाफ़रहान अख़्तरआदि बाहुत सारे  फ़िल्मी लोगों की पत्नियां हिन्दू हैं . यह ताक़तवर लोग हैं . शायद  इसीलिये इनके खिलाफ कभी कोई बयान भी नहीं आया है . बीजेपी के नेता  मुख्तार अब्बास नक़वीशहनवाज़ हुसैन और एम  जे अकबर की पत्नियां भी हिन्दू लडकियां   हैं .  इनकी भी कभी चर्चा नहीं होती ,शायद  इसलिए कि यह तो अपने लोग हैं .
असल मुद्दा सामाजिक और आर्थिक है . जो लोग समाज के सबसे गरीब तबके से हैं उनको सभी ब्रांड के राजनीतिक और धार्मिक शमशीर  चमकाने वाले निशाना  बनाते हैं . और यह समस्या केवल हिन्दू मुस्लिम जोड़ों  तक की सीमित नहीं है.  पिछले कई वर्षों से लगभग रोज़ ही अखबार में ऐसी कोई खबर नज़र आ जाती है   जिसमें पता  चलता है कि किसी लडकी की इसलिए हत्या कर दी गयी कि उसने अपने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी  कर ली थी . इसी हफ्ते एक हैरतअंगेज़ खबर पढने को मिली जिसमे लिखा था  कि एक लडकी अपने  किसी पुरुष सजातीय दोस्त के साथ  सिनेमा देखने चली गयी . लडकी के पिता और भाई को वह लड़का पसंद नहीं था . बाप और भाइयों ने अपनी ही लडकी और बहन का गैंग रेप किया और उसको सबक सिखाने की कोशिश की . यह हैवानियत क्यों है ? यह  सवाल सरकार के दायरे में जाएगा ,तो वह इसको कानून व्यवस्था की नज़र से देखेगी . इस खबर  में भी पुलिस का पक्ष ही अखबार में छपा था लेकिन इसका असली हल पुलिस नहीं निकाल  सकती  है . इस समस्या के हल के लिए समाज को आगे आना पडेगा . इसका गहराई से  अध्ययन करना पड़ेगा और कोई सूरत सुझानी पड़ेगी . अब  तक तो जो भी तरीके बताये गए है वे ठीक नहीं हैं . शायद समाज और राष्ट्र ने इस समस्या की गहराई को समझा ही नहीं है .
बहुत पहले सब इस  तरह  की खबरें   सार्वजनिक चर्चा में  आने लगी थीं तो कुछ हलकों से सुझाव आये थे कि शिक्षा के स्तर में तरक्की होने पर यह सब बदल जाएगा लेकिन अब देखा जा रहा  है कि आम तौर पर ऊंची औपचारिक शिक्षा प्राप्त लोग  इस तरह के असमाजिक और अमानवीय कार्यों में लगे हुए हैं . ज़ाहिर है केवल शिक्षा से  समस्या का हल   नहीं निकलने वाला है . इसके लिए    सम्पन्नता भी चाहिए और उससे भी  ज्यादा राजनीतिक स्तर पर सुरक्षा की व्यवस्था भी चाहिए .  न्यायपालिका की सुरक्षा तभी प्रभावी होगी जब  राजनीतिक स्तर पर उसको लागू करने की इच्छा शक्ति मौजूद हो . राजनीतिक इच्छा  शक्ति का तभी विकास होगा जब एक समाज के रूप में राजनीति कर्मियों को सामाजिक ज़िम्मेदारी और दायित्व से  बांधा जा सके .
देश की राजधानी  के एक सौ किलोमीटर के दायरे में लगभग प्रति  दिन ' हानर किलिंग ' के नाम पर  लड़कियों को हलाल किया जा रहा है . अजीब बात यह है कि  इलाके के सभी मुकामी नेता इन हत्यारों का ही साथ देते हैं. इसका  कारण यह है कि नेताओं को वोट से मतलब है और  ग्रामीण समाजों में  परिवार का वोट देने का फैसला पुरुष ही करते  हैं . वोटबाज़ी की तिकड़म की राजनीति में लड़कियों की कोई भूमिका नहीं होती . ऐसा इलसिए होता है कि वे  लडकियां राजनीतिक शक्ति से संपन्न नहीं होती हैं .उनको शक्ति सम्पन्न बनाये बिना  समाज का भला नहीं होने वाला है .सरकार ने  लड़कियों को सक्षम बनाने के लिए कई योजनायें चला रखी हैं . बेटी बचाओ, बेटी पढाओ  , उज्जवला, स्वाधार ,महिलाओं के प्रशिक्षण और उनको जिम्मेवारी देने संबंधी योजनाएं कागजों में उपलब्ध हैं लेकिन उनको सही अर्थों में लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए . जिसकी भारी कमी है .
संविधान के ७३ वें और ७४ वें   संसोधन के बाद पंचायतों के चुनावों में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गयी थीं लेकिन नतीजा क्या हुआ ? महिलाओं का पर्चा भरवाकर उनके पति गाँव पंचायत के प्रधान  बन बैठे . प्रधानपति नाम के एक अलग  किस्म के जीव  ग्रामीण भारत में विचरण करने लगे . ऐसा इसलिए हुआ कि लड़कियों की  शिक्षा पर ज़रूरी ध्यान नहीं दिया गया था. लेकिन अब  बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहे हैं . ग्रामीण इलाकों की लडकियां उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा के ज़रिये सफलता हासिल करने की कोशिश में लगे हुए हैं . अभी २५ साल पहले तक जिन गावों की लड़कियों को उनके माता पिता दसवीं की पढ़ाई करने के लिए २ मील दूर नहीं जाने देते थे उन इलाकों की लडकियां दिल्लीपुणेबंगलोर नोयडा ,ग्रेटर नोयडा में स्वतन्त्र रूप से रह रही हैं और शिक्षा हासिल कर रही हैं . उनके माता पिता को भी मालूम है कि बच्चे पढ़ लिख कर जीवन में कुछ हासिल करने लायक बन जायेंगें . लेकिन अभी भारत के मध्यवर्गीय समाज में यह जागरूकता नहीं है कि शिक्षा के विकास के बाद जब पश्चिमी देशों की तरह बच्चे आत्म निर्भर होंगें तो उनको अपनी निजी ज़िंदगी में भी स्पेस चाहिए . उनको अपनी ज़िंदगी के अहम फैसले खुद लेने की आज़ादी उन्हें देनी पड़ेगी लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है .छः साल पहले की बात है . झारखण्ड की पत्रकार निरुपमा पाठक के मामले ने मुझको विचलित कर दिया था .  उसके माता पिता ने उसे पत्रकारिता की शिक्षा के लिए दिल्ली भेजालड़की कुशाग्रबुद्धि की थीउसने अपनी कोशिश से नौकरी हासिल की और अपनी भावी ज़िंदगी की तैयारियां करने लगी. अपने साथ पढने वाले एक लडके को पसंद किया और उसके साथ घर बसाने का सपना देखने लगी. जब वह घर से चली थी तो उसके माता पिता अपने दोस्तों के बीच हांकते थे कि उनकी बेटी बड़ी सफल है और वे उसकी इच्छा का हमेशा सम्मान करते हैं . लेकिन  वे तभी तक अपनी बच्ची की इज्ज़त करते थे जब तक वह उनकी हर बात मानती थी लेकिन जैसे ही उसने उनका हुक्म मानने से इनकार किया उन्होंने उसे मार डाला . यह तो बस एक मामला है . ऐसे बहुत सारे मामले हैं .. इसके लिए बच्चों के माँ बाप को कसाई मान लेने से काम नहीं चलने वाला है . वास्तव में यह एक सामाजिक समस्या है . अभी लोग अपने पुराने सामाजिक मूल्यों के साथ जीवित रहना चाहते हैं . इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे नए मूल्यों को अपनाना नहीं चाहते . शायद वे चाहते हों लेकिन अभी पूंजीवादी रास्ते पर तो विकास आर्थिक क्षेत्र में पींगें मार रहा है लेकिन परिवार और समाज के स्तर पर किसी तरह का मानदंड विकसित नहीं हो रहा है . नतीजा यह हो रहा है कि पूंजीवादी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में भारत के ग्रामीण समाज के लोग सामन्ती मूल्यों के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर हैं . खाप पंचायतों के मामले को भी इसी सांचे में फिट करके समझा जा सकता है . सूचना क्रान्ति के चलते गाँव गाँव में लडके लड़कियां वह सब कुछ देख रहे हैं जो पश्चिम के पूंजीवादी समाजों में हो रहा है . वह यहाँ भी हो सकता है . दो नौजवान एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं लेकिन फिर उन्हें उसके आगे बढ़ने की अनुमति सामंती इंतज़ाम में नहीं मिल पाती .
समाज और राजनीति को ऐसी ही परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना पडेगा . समाज में  लड़के लड़कियों को सम्मान की ज़िंदगी देने के लिए उनको खुदमुख्तारी के अधिकार देने पड़ेगें . और यह  कम सरकार और राजनीतिक  बिरादरी ही कर सकती है 

Saturday, November 25, 2017

क्या गरीब राजपूत लड़के लड़कियों की भी सुध ली जायेगी ?



शेष नारायण सिंह

चित्तौड़ की रानी पद्मिनी और चित्तौड़ गढ़ के हवाले से एक  फिल्म बनी है और उस पर विवाद हो  रहा है. जिस अभिनेत्री ने रानी पद्मिनी की भूमिका अदा की है उसको जला डालने और उसकी नाक काट लेने के लिए इनामों  की घोषणा हो रही है . राजपूतों के  कुछ संगठन इसमें आगे आ गए हैं . राजपूती आन बान और शान पर खूब चर्चा  हो रही है . ऐसा लगता है कि कुछ लोग राजपूतों की एकता की कोशिश कर रहे हैं और उसको बतौर वोट  बैंक विकसित करने का कोई कार्यक्रम चल रहा है . इसका आयोजन कौन कर रहा है,अभी इसकी जानकारी सार्वजनिक चर्चा में नहीं आयी है . राजपूतों के इतिहास पर बहुत कुछ लिखा गया  है . नामी गिरामी विद्वानों  ने शोध किया  है और  क्षत्रियों और राजपूतों में तरह तरह के भेद बताये गए हैं . वह बहसें आकादमिक हैं लेकिन आम तौर पर ठाकुरक्षत्रिय और राजपूत को एक ही माना जाता है . इसलिए इस लेख में ठाकुरों और राजपूतों के बारे में अकादमिक चर्चाओं से दूर सामाजिक सवालों पर बात करने की कोशिश की जायेगी . मैं राजपूत परिवार में  पैदा हुआ था . लेकिन राजपूत  जाति की राजनीति से मेरा साबका १९६९ में पडा जब जौनपुर के मेरे कालेज में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का अधिवेशन हुआ . देश के कोने  कोने से राजपूत राजा महाराजा आये थे . मेवाड़ के स्व महाराणा भगवत सिंह  ने  अध्यक्षता की थी. डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मण सिंह भी आये  थे.  और भी बहुत से राजा आये थे .  उस अधिवेशन में पूरी चर्चा इस बात पर होती रही  कि इंदिरा गांधी ने राजाओं का प्रिवी पर्स छीन कर राजपूतों की आन बान पर बहुत बड़ा हमला किया था . आजादी के बाद सरदार पटेल ने जिन राजाओं के राजपाट का भारत में विलय करवाया था उनको कुछ विशेषाधिकार और उनके राजसी जीवन निर्वाह के लिए प्रिवी पर्स देने का वायदा  भी किया था . कुछ राजाओं को को १९४७   में लाखों रूपया  मिलता था . मसलन मैसूर के राजा को २६ लाख रूपये मिलते थे .  सन १९५०  में सोने का भाव करीब १०० रूपये प्रति दस ग्राम  होता था .आज करीब  तीस हज़ार रूपये है. आज की कीमत से इसकी तुलना की जाए तो यह ७८  करोड़  रूपये हुए. 1970 में जब इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स ख़त्म किया तब  भी सोना १८४ रूपये प्रति दस ग्राम था . ऐसे सैकड़ों राज थे हालांकि कुच्छ को तो बहुत कम रक़म मिलती थी .  यानी प्रिवी पर्स देश  संपत्ति पर बड़ा बोझ था . इसलिए स्वतंत्र भारत में प्रिवी पर्स के मामले  पर आम नाराज़गी की थी .उस समय की देश की आर्थिक स्थिति  के लिहाज़ से इस को  देश पर  बोझ माना जाता था .राजाओं के ख़िताबों की आधिकारिक मान्यता को भी पूर्णतः असंवैधानिक व अलोकतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था। प्रिवी पर्स को  हटाने का प्रस्ताव १९६९ में जब संसद में लाया गया तो प्रस्ताव राज्य सभा पारित नहीं हो  सका और मामला टल गया . बाद में  इंदिरा गांधी ने  नागरिकों के लिये सामान अधिकार एवं सरकारी धन के दुरूपयोग का हवाला देकर  १९७१ में २६वें संविधानिक संशोधन के रूप में पारित कर दिया . और प्रिवी पर्स ख़त्म हो गया .कई राजाओं ने १९७१ के चुनावों में इस मुद्दे पर इंदिरा गांधी को चुनौती दी , लोक सभा का चुनाव लड़ने  लिए मैदान लिया और सभी बुरी तरह से हार गए .

इंटरमीडिएट के छात्र के रूप में मैंने इस अधिवेशन को देखा और इसमें शामिल हुआ. अजीब लगा कि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों के पक्ष में क्षत्रिय समाज को एकजुट  करने की आयोजकों की तरफ से  की गयी .  मेरे दर्शनशास्त्र के  और मेरे गुरू ने मुझे समझाया कि इस बहस का  कोई मतलब नहीं है . उत्तर प्रदेश ,जहां यह बहस हो रही थी वहां किसी भी  राजपूत या क्षत्रिय राजा को प्रिवी पर्स नहीं मिलता था . उत्तर प्रदेश में प्रिवी पर्स वाले लेवल तीन राजा थेकाशी नरेश ,नवाब रामपुर और समथर के राजा.. इन तीनों में कोई भी राजपूत नहीं था. जबकि उसी उत्तर प्रदेश में लगभग सभी  गाँवों  में राजपूत  रहते हैं . उनकी समस्याओं पर  अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अधिवेशन में कोई चर्चा नहीं हुयी .उस दौर में किसानो को खाद,  चीनी ,सीमेंट आदि काले बाज़ार से दुगुनी कीमत पर खरीदना पड़ता था ,उन  किसानों में बड़ी संख्या में राजपूत थे  लेकिन महासभा में इस विषय पर कहीं कोई बात नहीं हो रही थी.  एक छात्र को भी भाषण करने का अवसर मिलना था . जिसके लिए मुझे कालेज की तरफ से बुलाया गया . मैंने किसान राजपूतों , चपरासी राजपूतों, क्लर्क राजपूतों , बेरोजगार राजपूतों  की समस्याओं का ज़िक्र कर दिया और राजाओं के लाभ के  एजेंडे से बात फिसल गयी. उसके बाद से सरकार से किसानों की समस्याओं  पर बात शुरू हो गयी . राजपूती शान और आन बान की  बहस के बीच राजपूतों की बुनियादी समस्याओं पर भी बहस  शुरू हो गयी .

यह काम मैं कसर करता हूँ . अभी पिछले दिनों  रानी पद्मिनी को केंद्र में रख कर बनाई फिल्म की बहस में जब मुझे शामिल होने का अवसर मिला तो मैंने रानी पद्मिनी के इतिहास और जौहर के हवाले से उन समस्याओं का भी उल्लेख कर दिया जो आज के राजपूत रोज़ ही  झेल रहे हैं . मेरे गाँव और आस पास के इलाके में  राजपूतों की बड़ी आबादी  है . सैकड़ों  किलोमीटर तक राजपूतों के ही गाँव हैं . बीच बीच में और भी जातियां हैं .ज्यादातर लोग  बहुत ही गरीबी की ज़िंदगी बिता  रहे  हैं . दिल्ली , मुंबई, जबलपुर, नोयडा , गुरुग्राम आदि शहरों में हमारे इलाके के राजपूत भरे पड़े हैं . वे अपना गाँव छोड़कर आये हैं . वहां खेती है लेकिन ज़मीन के रकबा इतना कम हो गया है कि परिवार का भरण पोषण नहीं हो  सकता . शिक्षा की कमी है इसलिए यहां मजदूरी करने पर विवश हैं . मजदूरी भी ऐसी कि न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम कमाते हैं . किसी झुग्गी में  चार -पांच लोग रहते हैं . राजपूती आन की ऐसी चर्चा गाँव में होती रहती है कि वहां चल रही मनरेगा योजनाओं में काम   नहीं कर सकते ,  खानदान की नाक कटने का डर है . यह तो उन लोगों की हाल है जो अभी   दस पांच साल पहले घर से आये हैं . जो लोग यहाँ चालीस साल से रह रहे  हैं , उनकी हालत बेहतर बताई जाती है . एक उदाहरण पूर्वी दिल्ली के मंडावली का दिया जा सकता है . पटपडगंज की पाश सोसाइटियों से लगे हुए  मंडावली गाँव की खाली पडी ज़मीन पर १९८० के आस पास पूर्वी दिल्ली के बड़े नेता , हरिकिशन लाल  भगत के  गुंडों ने पुरबियों से दस दस हज़ार रूपये लेकर ३५ गज ज़मीन के प्लाट पर क़ब्ज़ा करवा दिया था. सब बस गए .बाद में वह कच्ची कालोनी मंज़ूर हो गयी और अब ३५ साल बाद उस ज़मीन की कीमत बहुत बढ़ गयी  है लेकिन उस  ज़मीन की कीमत बढवाने में वहां रहने वालों की दो पीढियां लग गईं . वहां ठाकुरों , ब्राहमणों आदि के जाति के आधार मोहल्ले बना दिए गए थे . उनमें राजपूत भी बड़ी संख्या में थे. दिल्ली के संपन्न इलाकों में भी राजपूत रहते थे . सुल्तानपुर के सांसद भी उन दिनों राजपूत थे और राजपूत वोटों के बल  पर जीत कर आये थे लेकिन उनको  भी उन गंदी बस्ती में रह रहे लोगों की परवाह   नहीं थी . जब  पांच साल बाद फिर चुनाव हुए तो उन्होंने जिले में जाकर ठाकुर एकता का नारा दिया था .  इसी तरह की एक  कालोनी दिल्ली के वजीराबाद पुल के आगे है . सोनिया विहार नाम की इस कालोनी में भी लाखों की संख्या में राजपूत रहते हैं और आजकल  उस फिल्म में रानी  पद्मावती के चित्रण को लेकर गुस्से में हैं .

बुनियादी सवाल यह है कि  चुनाव के समय या किसी आन्दोलन के समय राजपूतों का आवाहन करने वालों को क्या  इस बात का ध्यान नहीं रखना चाहिए कि राजपूतों में जो गरीबी , अशिक्षा , बेरोजगारी आदि समस्याएं हैं उनको भी विचार के दायरे में रखना बाहुत ज़रूरी है .  मेरे गाँव में  राजपूतों के पास बहुत कम ज़मीन है . १९६१ में जब जनगणना हुयी थी तो मैं अपने गाँव के लेखपाल  के साथ घर घर घूमा  था .  राजपूतों के १५ परिवार थे . अब वही अलग बिलग होकर करीब चालीस परिवार  हो गए हैं . ज़मीन  जितनी थी ,वही है. यानी सब की ज़मीन  के बहुत ही छोटे  छोटे टुकड़े  हो गए हैं . पहले भी किसी तरह पेट पलता था , अब तो सवाल ही नहीं है . उन्हीं परिवारों के राजपूत लड़के , महानगरों में मेहनत मजूरी करके पेट पाल रहे हैं. मालिन बस्तियों में रह  रहे  हैं , राजपूत एकता का जब भी नारा दिया जाता है , वे ही लोग  भीड़ का हिस्सा बनते हैं और राजपूत नेताओं की कमियों को छुपाने के लिए चलाई गयी बहसों में भाग लेते हैं . सवाल यह  है कि क्या इन लोगों के बुनियादी  शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकारों के लिए कोई आन्दोलान नहीं चलाया जाना  चाहिए . अगर राजपूतों के नाम पर  राजनीति करने वालों और राजपूत भावनाओं से लाभ लेने वालों से यह सवाल पूछे जाएँ तो समाज का भला होना निश्चित है . लेकिन यह सवाल   पूछने के लिए गरीबी और सरकारी उपेक्षा का जीवन जी रहे लोगों  को ही आगे आना पड़ेगा. राजपूती आन बान और शान के आंदोलनकारियों के नेताओं से यह  सवाल भी पूछे जाने चाहिए .

रानी पद्मिनी के संदर्भ में एक बात और बहुत ज़रूरी पूछी  जानी है लेकिन वह सवाल पीड़ित पक्ष के लोग पूछने नहीं आयेगें . किसान राजपूतों के  परिवार में लड़कियों की शिक्षा आदि का सही ध्यान  नहीं दिया जाता . जहां लड़कों के लिए गरीबी  में भी कुछ न कुछ इंतज़ाम किया जाता  था , लड़कियों को पराया धन मान कर  उपेक्षित किया जाता था . आज ज़रूरी यह है कि राजपूत नेताओं से समाज के वरिष्ठ लोग यह सवाल पूछें कि क्या राजपूत लड़कियों की शिक्षा आदि के लिए कोई ख़ास इंतजाम नहीं किया  जाना चाहिए . क्या उनके अधिकारों की बात को हमेशा नज़र अंदाज़ किया जाता रहेगा .  अगर लड़कियों  को सही शिक्षा दी जाए और उनको भी अवसर उपलब्ध कराये जाएँ तो सामाजिक परिवर्तन की बात को रफ्तार मिलेगी . ऐसा हर वह आदमी जानता  है जिसकी सोचने समझने की शक्ति अभी बची हुयी  है . आज एक सिनेमा के विरोध के नाम पर जो नेता आन्दोलन की अगुवाई कर रहे  हैं क्या उनको अपने गिरेबान में झाँक कर नहीं देखना चाहिए कि लड़कियों को सम्मान की ज़िन्दगी देने में समाज और सरकार का भी कुछ योगदान होता है . जो लोग राजपूतों के इतिहास की बात करके राजपूत लड़कों को  किसी की नाक काटने और किसी को जिंदा जला देने की राह पर डाल रहे हैं क्या उनको राजपूतों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दुरुस्त करने के लिए आन्दोलन नहीं शुरू करना  चाहिए .  हर राजपूत को  अत्याचारी के रूप में चित्रण करने की परम्परा  को दुरुस्त करने के लिए क्या कोई राजपूत नेता आन्दोलन की डगर  पर जाने  के बारे में विचार करेगा  क्योंकि ऐसे बहुत सारे इलाके हैं जहां राजपूत परिवार की आर्थिक हालत दलितों से भी बदतर है . इन सवालों को पूछने  वालों की समाज  और देश को सख्त ज़रूरत  है . क्या राजपूतों के कुछ नौजवान यह सवाल पूछने के लिए आगे आयेंगें ?

Monday, November 20, 2017

६३ साल की उम्र में जाना भी कोई जाना है , के वी एल नारायण राव नहीं



के वी एल नारायण राव नहीं रहे . एन डी टी वी को राधिका रॉय की बहुत छोटी कंपनी से बड़ी कंपनी बनाने में जिन लोगों का योगदान है , नारायण राव उसमें सरे फेहरिस्त हैं . ६३ साल की उम्र में कूच करके नारायण राव ने बहुत लोगों को तकलीफ पंहुचाई है , मुझे भी . 

बृहस्पतिवार दिनांक २० नवम्बर १९९७ के दिन मैं नारायण राव से पहली बार मिला था. एन डी टी वी में मुझे पंकज पचौरी ने प्रवेश दिलाया था. हिंदी विभाग की प्रमुख मृणाल पांडे ने किसी ऐसे पत्रकार को अपने नए कार्यक्रम के लिए लेने का फैसला किया था, जो बीबीसी के कार्य पद्धति को जानता हो. पंकज ने कहा कि बीबीसी छोड़कर तो कोई नहीं आएगा लेकिन अगर आप कहें तो एक आउटसाइड कंट्रीब्यूटर को बुला दूं . मृणाल जी ने पंकज से सुझाव माँगा तो उन्होंने मेरा नाम बता दिया . मृणाल जी ने मुझे राधिका रॉय से मिलवाया और वहीं , प्रणय रॉय और आई पी बाजपाई भी आ गए और मेरा इंटरव्यू हो गया . चुन लिया गया . राधिका ने कहा अब आप नरायन के पास जाइए क्योंकि Only he negotiates the money . इस तरह मेरी ,के वी एल नारायण राव से डब्लू-१७ गेटर कैलाश-१ वाले दफ्तर में मुलाक़ात हुयी .

नारायण राव उन दिनों जनरल मैनेजर थे . मालिकों के बाद सबसे बड़ी पोजीशन वही थी. मैं अख़बार से गया था , मुझे पता ही नहीं था कि एन डी टी वी में तनखाहें बहुत ज्यादा होती थीं. मुझे जो मिल रहा था मैने उस से काफी आगे बढ़ कर बताया . नारायण राव ने कहा कहा कि सोच लीजिये . मुझे नौकरी ज़रूर चाहिए थी , मैंने थोडा कम कर दिया . मुस्कराते हुए टोनी ग्रेग की लम्बाई वाले गंभीर आवाज वाले शख्स ने कहा कि आपने जो पहले कहा था , कंपनी ने आपको उस से ज्यादा धन देने का फैसला लिया है . अगर आप उससे ज्यादा कहते तो भी मिल सकता था . बहरहाल अब आप जाइए ,, काम शुरू करिए . आपकी उम्मीद से ज्यादा तनखाह आपको मिलेगी.

आज उस दिन को बीस साल हो गए थे . मैं आज ही सोच रहा था कि अपने बीस साल पहले के दिन को याद करूंगा और कुछ लिखूंगा . मैंने बिलकुल नहीं सोचा था कि उस दिन को याद करते हुए मैं आज के वी एल नारायण राव के लिए श्रद्धांजलि लिखूंगा . दिल एकदम टूट गया है .

मैं एन डी टी वी में ज़्यादातर सुबह ही शिफ्ट में काम करता था . सुबह छः बजे से दिन के दो बजे तक . उसी शिफ्ट में अंग्रेज़ी बुलेटिन की इंचार्ज रेणु राव भी हुआ करती थीं. रेनू ने नारायण राव से विवाह किया था. रेनू . स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा की भांजी थीं . मैं बहुगुणा जी को जानता था और इन दोनों की शादी में बहुगुणा जी के आवास सुनहरी बाग़ रोड पर शामिल हुआ था . यह दोनों इन्डियन एक्सप्रेस में मिले थे जहां राधिका रॉय डेस्क की इंचार्ज हुआ करती थीं . बाद में नारायण राव , आई आर एस में चुन लिए गए . कुछ साल वहां काम किया लेकिन जब राधिका रॉय ने एन डी टी वी को बड़ा बनाने का फैसला किया तो उन्होंने नारायण राव को अपने साथ आने का प्रस्ताव दिया . उन्होंने नौकरी छोड़ी और एन डी टी वी आ गए . रेनू वहां पहले से ही थीं. एन डी टी वी में काम करने का जी बेहतरीन माहौल था , अब शायद नहीं है , उसको राधिका रॉय की प्रेरणा से नारायण राव ने ही बनाया था.

नारायण राव से किसी ने पूछा कि इनकम टैक्स के बड़े पद पर आप थे, उसको छोड़कर प्राइवेट कंपनी में क्यों आ गए . उन्होंने कहा कि वहां तनखाह कम थी , यहाँ पैसे बनाने आया हूँ . नारायण राव ने इनकम टैक्स विभाग में भी बहुत इमानदारी का जीवन जिया था .उनके पिता , स्व.जनरल के वी कृष्णा राव ,भारतीय सेना के प्रमुख रह चुके थे . रिटायर होने के बाद जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा,नगालैंड और मणिपुर के राज्यपाल भी हुए ..नारायण राव ने अपने बहुत ही बड़े इन्सान और आदरणीय पिता के गौरव को अपना आदर्श मानते थे . के वी एल नारायण राव को मैं कभी नहीं भुला पाऊंगा .

Sunday, November 19, 2017

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना: बाबरी मस्जिद विवाद और श्री श्री रविशंकर



शेष नारायण सिंह


 अयोध्या विवाद में अब कोर्ट के बाहर सुलह की बात को ज्यादा अहमियत दी जा रही है. इस बार सुलह कराने  के लिए बंगलौर के एक  धार्मिक नेता श्री श्री रविशंकर ने अपने आपको मध्यथ नियुक्त  कर लिया है . माहौल भी अनुकूल है .आज उत्तर प्रदेश में एक ऐसी सरकार है जिसके मुख्य मंत्री,योगी आदित्यनाथ हैं जो गोरखनाथ पीठ के महंत भी हैं . वे स्वयं  भी   अयोध्या की बाबरी मस्जिद की जगह राम जन्म भूमि बनाने के बड़े समर्थक रहे हैं . उनके पहले के गोरखनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ रामजन्म भूमि आन्दोलन के बड़े नेता रहे  हैं . महंत अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ ने १९४९ में बाबरी मस्जिद में रामलला की  मूर्ति रखवाने में प्रमुख  भूमिका निभाई थी . ज़ाहिर है वर्तमान मुख्यमंत्री की इच्छा होगी कि वहां राम मंदिर बन जाये लेकिन अब वे संवैधानिक  पद पर हैं और उनकी ज़िम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट का जी भी आदेश होगा ,उसको  लागू करने भर की है. जो मामला सुप्रीम कोर्ट में है उसमें उत्तर प्रदेश सरकार पार्टी भी नहीं है . उत्तर प्रदेश सरकार ने साफ़ कर दिया  है कि बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट का   फैसला  ही अंतिम सत्य होगा और सरकार उसको लागू करेगी . राज्यपाल राम नाइक ने इस  आशय का बयान भी दे दिया है . 

इस पृष्ठभूमि में श्री श्री रविशंकर ने अयोध्या विवाद में इंट्री मारी  है . राज्यपाल ने उनको साफ़ संकेत दे दिया है कि सरकार से कोई मदद नहीं मिलने  वाली है . राज्यपाल  से जब रविशंकर मिलने गए तो उन्होंने मुलाक़ात की लेकिन बाद में एक बयान भी दे दिया . राज्यपाल ने  कहा कि ," इस तरह की कोशिशें उन लोगों द्वारा  की जा रही हैं जिनको लगता है कि इस से मामले को जल्दी सुलझाया जा सकता है . मेरी शुभकामना उन लोगों के साथ है लेकिन सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही अंतिम और  बाध्यकारी होगा ."   लेकिन श्री श्री रविशंकर का उत्साह इससे कम नहीं हुआ . वे
अयोध्या भी गए ,उत्तर प्रदेश में  मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले.  उनकी तरफ से यह माहौल बनाने की कोशिश की गयी  कि उनके प्रयासों को  सरकार का आशीर्वाद प्राप्त है लेकिन कुछ देर बाद ही सरकार की तरफ से बयान आ गया  कि  श्री श्री की मुख्यमंत्री से हुयी मुलाकात केवल शिष्टाचार वश की गयी मुलाक़ात है . इसका भावार्थ यह हुआ कि उनके अयोध्या जाने न जाने से सरकार को कुछ  भी लेना देना नहीं है .  

 श्री श्री रविशंकर ने यह मुहिम  शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी की प्रेरणा से शुरू की  थी. लेकिन वसीम रिजवी को मुसलमानों के बीच बहुत इज्ज़त नहीं दी जाती 'वसीम रिजवी के अयोध्या मसले को लेकर चल रही मुलाकातों व दावों को लेकर इससे जुड़े मुकदमे के पक्षकारों से जब बात की गई तो दोनों पक्षों के लोगों ने एक सुर से समझौते के मसौदे को बकवास बताया। 

अयोध्या मसले के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी ने वसीम रिजवी  के फार्मूले को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा, 'राजनीतिक  फायदा उठाने के लिए इस तरीके के फार्मूले पेश किए जा रहे हैं। सुन्नी इसको मानने को तैयार नहीं है.'  
श्री श्री रविशंकर के इस मामले में शामिल होने को लेकर सभी पक्षकारों में खासी  नाराज़गी है .आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल  ला  बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वली रहमानी ने कहा  कि ,"१२ साल पहले भी  श्री श्री रविशंकर  ने इस तरह की कोशिश की थी और कहा था कि विवादित   स्थल हिन्दुओं को सौंप दिया जाना चाहिए. आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल  ला  बोर्ड के महासचिव ने  शिया सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी की दखलन्दाजी का भी बहुत बुरा माना है . उन्होंने कहा कि किसी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष के  पास इस तरह के अख्तियारात नहीं हैं कि वह किसी भी विवादित जगह को किसी एक पार्टी को सौंप दे .  वसीम रिजवी उत्तर प्रदेश की पिछली सरकार के ख़ास थे लेकिन आजकल नई सरकार के करीबी बताये जा रहे हैं . कुछ दिन पहले उन्होंने  बाबरी मस्जिद को लेकर कई विवादित बयान दिए हैं . 

यह मामला इतना बड़ा इसलिए बना  कि बीजेपी को  हिंदुत्व का मुद्दा चाहिए था .१९८० में तत्कालीन जनता पार्टी टूट गयी और भारतीय जनता पार्टी का गठन हो गया .शुरू में इस पार्टी ने उदारतावादी राजनीतिक सोच को अपनाने की कोशिश की . गांधीवादी समाजवाद जैसे राजनीतिक शब्दों को अपनी बुनियादी सोच का आधार बनाया . लेकिन जब १९८४ के लोकसभा चुनाव में ५४२ सीटों वाली लोकसभा में बीजेपी को केवल दो सीटें मिलीं तो उदार राजनीतिक संगठन बनने का विचार हमेशा के लिए त्याग  दिया गया . जनवरी १९८५ में कलकत्ता में आर एस एस के शीर्ष नेताओं की बैठक हुई जिसमें भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओंअटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को भी बुलाया गया और साफ़ बता दिया गया कि अब गांधियन सोशलिज्म को भूल जाइए . आगे से पार्टी की राजनीति  के स्थाई भाव के रूप में हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को चलाया जाएगा . वहीं तय कर लिया गया कि अयोध्या में  रामजन्मभूमि  के निर्माण के नाम पर  राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन किया जाएगा . आर एस एस के दो संगठनोंविश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को इस प्रोजेक्ट को चलाने का जिम्मा दिया गया. विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना अगस्त १९६४  में हो चुकी थी लेकिन वह सक्रिय नहीं था. १९८५ के बाद उसे सक्रिय किया गया . १९८५ से अब तक बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को ही अपना स्थायी भाव मानकर चल रही है .
विश्व हिन्दू पारिषद आज भी  अयोध्या  विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है  . बिना  उसकी सहमति के कुछ भी  नहीं  हासिल किया जा सकता . श्री श्री रविशंकर की मध्यस्थता को विश्व हिन्दू परिषद वाले कोई महत्व नहीं देते . उसके प्रवक्ता , शरद  शर्मा ने कहा है कि ," रामजन्मभूमि हिन्दुओं की है . पुरातत्व के साक्ष्य यही कहते हैं कि वहां एक मंदिर था और अब एक भव्य मंदिर बनाया जाना चाहिए . जो लोग मध्यस्थता आदि कर रहे हैं उन्पीर नज़र रखी जा रही है लेकिन समझौते की कोई उम्मीद नहीं है . अब इस काम को संसद के ज़रिये किया जाएगा ,"
  समझ में नहीं आता कि श्री श्री रविशंकर किस  तरह की  मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहे हैं जब राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद  विवाद के दोनों ही पक्ष उनकी किसी भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं . अयोध्या में भी वे कुछ साधू संतों से मिलने में तो कामयाब रहे लेकिन किसी ने उनको गंभीरता से नहीं लिया . आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत से मिलने  की कोशिश भी वे कर रहे हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि उनको वहां से क्या हासिल होता है . 

Tuesday, November 14, 2017

गुजरात में कांग्रेस बीजेपी को टक्कर दे रही है लेकिन सर्वे के कहते हैं जीत बीजेपी की ही होगी



शेष नारायण सिंह 

अहमदाबाद १२ नवम्बर . हिमाचल प्रदेश में मतदान पूरा हो जाने के बाद अब सारा राजनीतिक ध्यान गुजरात चुनाव पर है .  बीजेपी ने  सारी ताकत इस चुनाव को जीतने के लिए झोंक दी है . कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कोई  कसर नहीं छोड़ रखी है . उनको  इस चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं , बीजेपी से माहौल में  जो नाराजगी है उसके हिसाब से राहुल गांधी की उम्मीद जायज़ लगती है  लेकिन गुजरात की सडकों में मिलने वाला हर शख्स कहता मिल जाता है कि इस  साल चुनाव में  भाजप की हालत बहुत खराब है लेकिन जीत अंत में सत्ताधारी पार्टी की ही  होगी क्योंकि बीजेपी  अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात विधानसभा के चुनाव में हार किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए वे हर हाल में जीतेंगें . उसके लिए कुछ भी करना पड़े. बीजेपी के कार्यकर्ता कहते हैं कि अभी भले कांग्रेस का प्रचार भारी नज़र आता हो लेकिन जब प्रधानमंत्री मनीला की विदेश यात्रा से वापस आयेगें और अपने  चुनावी प्रचार शुरू करेंगे तो कांग्रेस वाले कहीं नहीं  दिखेंगे.  उनका दावा है कि पिछले २५ वर्षों में नरेंद्र मोदी ने गुजरात में गंभीर राजनीतिक  कार्य किया है और हर गली मोहल्ले और गाँव को अच्छी तरह जानते हैं .   
गुजरात चुनाव का मौजूदा प्रचार देखकर १९८० के दशक में अमेठी में होने वाले   प्रचार की याद  ताज़ा हो गयी. उन दिनों कांग्रेस नेताओं संजय गांधी और  उनकी मृत्यु के बाद राजीव  गांधी को खुश करने के लिए किसी भी चुनाव के दौरान ,कांग्रेस का  हर बड़ा नेता अमेठी  क्षेत्र के गाँवों में घूमता मिल जाता था. आजकल गुजरात में केंद्रीय मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्य कहीं  न कहीं मिल जा रहे हैं .
रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन,  अहमदाबाद की मणिनगर में मतदाताओं के बीच पैदल घूमती नज़र आयीं . मणिनगर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र कहा जाता है . अहमदाबाद नगर का पूर्वी  इलाका मणिनगर विनसभा क्षेत्र है  . अहमदाबाद तमिल संगम के खजांची , आर राजा  का दावा है कि इस क्षेत्र में करीब पचास हज़ार तमिल परिवार  रहते हैं .  मुख्य रूप से उनकी आबादी खोखरा  और अमराई वाडी में है . शायद इसीलिये यहाँ पर तमिलनाडु की मूल निवासी रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन को घर घर जाकर प्रचार करने को कहा गया है. १९९० से इस सीट पर भाजप का क़ब्ज़ा है .२००१ में राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त होने के बाद इसी सीट से नरेंद्र मोदी ने विधान सभा की सदस्यता ली थी . उस वक़्त  कमलेश पटेल विधायक थे . उन्होंने नरेंद र्मोदी के लिए सीट खाली की थी. नरेंद्र मोदी २००२, २००७ और २०१२ में यहाँ से चुने गए थे .
मणिनगर विधान सभा बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है लेकिन  यहाँ भी उसके विरोध के सुर साफ़ नज़र आये .  हालांकि हर जगह बीजेपी के कार्यकर्ता रक्षामंत्री का खूब जोर शोर से स्वागत करते नज़र आये लेकिन एक  व्यक्ति उनको काला कपडा दिखाने में सफल रहा.. बाद में महेश पटेल नाम के उस व्यक्ति ने  बताया कि ,”मैं पाटीदार  हूँ ,और पिछले बीस साल से भाजप का  सदस्य हूँ . लेकिन अब मैं निराश हूँ . पार्टी के नेता लोग सरकारी पैसे को लूट रहे हैं और अपनी जेबें भर रहे हैं .सडकों के निर्माण में बहुत ही  घटिया माल लगाया गया है . मैं कई बार इन लोगों से शिकायत कर चुका हूँ लेकिन कोई सुनता ही नहीं “. पाटीदार ( पटेल )  बिरादरी में बीजेपी से नाराज़गी है .  सरदार पटेल और महात्मा गांधी के  समय से ही पटेल लोग कांग्रेस को वोट देते  रहे थे लेकिन लाल कृष्ण आडवानी की सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के बाद से पटेल लगभग पूरी तरह से बीजेपी  को वोट देते  रहे हैं . पहली बार हार्दिक पटेल के  आन्दोलन के बाद आजकल वे बीजेपी से दूर जाते नज़र आ रहे हैं . हालांकि जानकार इस बात को भी पक्का बता रहे हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की यात्राओं के बाद बड़ी संख्या में पटेल वोट हार्दिक को छोड़ देंगें  इस बात में दो राय नहीं है कि पटेल समुदाय इस बार पूरी तरह से बीजेपी के साथ नहीं होगा . ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर तो  कांग्रेस में औपचारिक रूप से शामिल ही  गए हैं , दलितों के नेता जिग्नेश भी  कांग्रेस की तरफ झुक चुके हैं . बीजेपी को अगर कोई नुक्सान होगा तो उसमें   इन  तीनों नौजवान नेताओं के अलावा  बहुत ही ख़ास योगदान राज्य भर में फैले हुए  छोटे व्यापारियों का होगा . वे अभी चुप  हैं लेकिन थोड़ी देर बात करने पर साफ़ समझ में आ जाता है कि वे बीजेपी के जी एस टी वाले  काम से बहुत परेशान हैं .इन्हीं कारणों  से शायद  प्रचार में अभी कांग्रेस का माहौल दिख रहा है .
प्रचार में कांग्रेस की हवा को चुनाव सर्वे सही नहीं मानते . लोकनीति सी एस डी एस के   सर्वे के अनुसार  बीजेपी को इस बार भी गुजरात में सत्ता मिलेगी . सर्वे के अनुसार जीत तो होगी लेकिन २०१२ से कम सीटें आने की उम्मीद है .बीजेपी के मतदान प्रतिशत में भी मामूली कमी आ सकती है.२०१२ में ४७.९ प्रतिशत मिला था जो इस साल ४७ प्रतिशत  रहने की संभावना है .कांग्रेस को पिछली बार ३८ प्रतिशत वोट मिले थे जो इस बार ४१ प्रतिशत तक बढ़ जाने  का आकलन सर्वे में किया  गया है . . सौराष्ट्र क्षेत्र में कांग्रेस को फिलहाल बढ़त है . सर्वे के अनुसार बीजेपी और कांग्रेस  दोनों को ही सौराष्ट्र में ४२-४२ प्रतिशत वोट मिल सकते हैं . अगर इसी में किसी  को थोडा तल विचल हुआ तो नतीजे भारी बदलाव का कारण बन सकते हैं . दक्षिण और मध्य गुजरात में बीजेपी की  मजबूती बनी हुयी  है. क्योंकि वहां उसको ५१ प्रतिशत वोट मिल  सकते हैं जिसके कारण बड़ी संख्या में सीटें मिल सकती हैं .
मतदान के लिए गुजरात में अभी करीब महीना भर बाकी है . नतीजा जो भी ,चुनाव बहुत ही दिलचस्प हो गया है .

Tuesday, November 7, 2017

एक बेहतरीन इंसान का जन्मदिन है आज , मुबारक हो सबीहा



दिल्ली के एक करखनदार परिवार में उसका जन्म हुआ था . मुल्क  के बंटवारे की तकलीफ को उसके  परिवार ने  बहुत करीब से झेला था. उसके परिवार के लोग जंगे-आज़ादी की अगली सफ़ में रहे थे. उनके पिता ने  हिन्दू कालेज के छात्र के रूप में बंटवारे के दौर में इंसानी बुलंदियों को रेखांकित किया था लेकिन बंटवारे के बाद  परिवार टूट गया था. कोई पाकिस्तान चला गया और कोई हिन्दुस्तान में रह गया . उसके दादा मौलाना अहमद सईद ने पाकिस्तान के चक्कर में पड़ने से मुसलमानों को आगाह किया था और जिन्ना का विरोध किया था . मौलाना अहमद सईद देहलवी ने 1919 में अब्दुल मोहसिन सज्जाद , क़ाज़ी हुसैन अहमद , और अब्दुल बारी फिरंगीमहली के साथ मिल कर जमीअत उलमा -ए - हिंद की स्थापना की थी. जो लोग बीसवीं सदी भारत के इतिहास को जानते हैं ,उन्हें मालूम है की जमियत उलेमा ए हिंद ने महात्मा गाँधी के १९२० के आन्दोलन को इतनी ताक़त दे दी थी की अंग्रेज़ी साम्राज्य के बुनियाद हिल गयी थी .उसके बाद ही अंग्रेजों ने  हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालने के अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया था. 
जमीअत उस समय के उलमा की संस्था थी . खिलाफत तहरीक के समर्थन का सवाल जमीअत और कांग्रेस को करीब लाया . जमीअत ने हिंदुस्तान भर में मुसलमानों को आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और खुले रूप से पाकिस्तान की मांग का विरोध किया . मौलाना साहेब भारत में ही रहे और परिवार का एक बड़ा हिस्सा भी यहीं रहा लेकिन कुछ लोगों के चले जाने से परिवार  तो बिखर गया ही था.
आठ नवम्बर ११९४९ को दिल्ली के  कश्मीरी गेट मोहल्ले में उसका जन्म  हुआ था. परिवार पर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा था लेकिन उसके माता  पिता ने हालात का बहुत ही बहादुरी से मुकाबला किया  अपनी पाँचों औलादों को इज्ज़त की ज़िंदगी देने की पूरी कोशिश की और कामयाब हुए. उसके सारे भाई बहन बहुत ही आदरणीय लोग हैं . जब दिल्ली में कारोबार लगभग ख़त्म हो गया तो डॉ जाकिर हुसैन और प्रो नुरुल हसन की   प्रेरणा से परिवार अलीगढ़ शिफ्ट हो गया . बाद में उसकी माँ को  दिल्ली में नौकरी मिल गयी तो बड़े बच्चे अपनी माँ के पास दिल्ली में आकर पढाई लिखाई करने लगे . छोटे अलीगढ में ही  रहे ' कुछ साल तक परिवार  दिल्ली और  अलीगढ के बीच झूलता रहा . बाद में सभी दिल्ली में आ  गए . इसी दिल्ली में आज से  चालीस साल  पहले मेरी उससे मुलाक़ात हुयी .

बंटवारे के बाद जन्मी  यह लडकी आज ( आठ नवम्बर )  अडसठ साल की हो गयी. जो लोग सबीहा को  जानते हैं उनमे से कोई भी बता देगा  कि उन्होंने सैकड़ों ऐसे लोगों की जिंदगियों को जीने लायक बनाने में योगदान किया है जो  अँधेरे भविष्य की और ताक  रहे  थे. वह किसी भी परेशान इंसान के मददगार के रूप में अपने असली  स्वरुप में आ  जाती  हैं . लगता है कि  आर्थिक अभाव में बीते अपने बचपन ने उनको एक ऐसे इंसान के रूप में स्थापित कर दिया जो किसी भी मुसीबतजदा इंसान को दूर से ही पहचान लेता है और वे फिर बिना उसको बताये उसकी मदद की योजना पर काम करना शुरू कर देती हैं .यह खासियत उनकी छोटी बहन में भी है . उनकी शख्सियत की यह खासियत मैंने पिछले चालीस  वर्षों में बार बार देखा .
दिल्ली के एक बहुत ही आदरणीय पब्लिक  स्कूल में आप आर्ट पढ़ाती थीं,  एक दिन उनको पता लगा कि बहुत ही कम उम्र के किसी बच्चे को कैंसर हो गया है . कैंसर की शुरुआती स्टेज थी . डाक्टर ने बताया कि अगर उस बच्चे का इलाज हो जाये तो उसकी ज़िंदगी बच सकती थी. अगले एक घंटे के अंदर आप अपने शुभचिंतकों से बात करके प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर चुकी थीं. बच्चे का इलाज हो गया . अस्पताल में ही जाकर जो भी करना होता था , किया . बच्चे की इस मदद को अपनी ट्राफी नहीं बनाया . यहाँ  तक कि उनको मालूम भी नहीं कि वह बच्चा कहाँ है . ऐसी अनगिनत मिसालें हैं . किसी की क्षमताओं को पहचान कर उसको बेहतरीन अवसर दिलवाना उनकी पहचान का हिस्सा है . उनके स्कूल में एक लड़का  उनके विभाग में चपरासी का काम करता था. पारिवारिक परेशानियों के कारण पढाई पूरी नहीं कर सका था . उसको  प्राइवेट फ़ार्म भरवाकर पढ़ाई पूरी करवाया और  बाद में वही लड़का बैंक के प्रोबेशनरी अफसर की परीक्षा में  बैठा और आज बड़े  पद पर  है .  उनके दफ्तर के  एक  अन्य सहयोगी की मृत्यु के बाद उसके घर गईं, आपने भांप लिया कि उसकी विधवा को उस  परिवार में परेशानी ही परेशानी होगी. अपने दफ्तर में उसकी  नौकरी  लगवाई. उसकी आगे की पढ़ाई करवाई और आज वह महिला स्कूल में  शिक्षिका है . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं ,लिखना शुरू करें तो किताब बन जायेगी . आजकल आप बंगलौर के पास के जिले रामनगर के एक गाँव में विराजती हैं और वहां भी  कई लड़कियों को अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं .   उस गाँव की कई बच्चियों के माता पिता  को हडका कर सब को शिक्षा पूरी करने का माहौल बनाती हैं और उनकी फीस  आदि का इंतज़ाम  करती हैं .  
सबीहा अपनी औलादों के लिए कुछ भी कर सकती हैं , कुछ भी . दिल्ली के पास गुडगाँव में उनके बेटे ने अच्छा ख़ासा  घर बना दिया था लेकिन जब उनको लगा कि उनको बेटे के पास बंगलौर रहना ज़रूरी है तो उन्होंने यहाँ से सब कुछ ख़त्म करके बंगलोर शिफ्ट करना उचित   समझा लेकिन  बच्चों के सर  पर बोझ नहीं बनीं, उनके घर में रहना पसंद नहीं किया .अपना अलग घर बनाया और आराम से  रहती हैं. इस मामले में खुशकिस्मत हैं  कि उनकी तीनों औलादें अब बंगलौर में ही हैं . सब को वहीं काम मिल गया है .आपने वहां एक ऐसे गाँव में ठिकाना  बनाया जहां जाने  के लिए सड़क भी नहीं है.. मुख्य सड़क से  काफी दूर पर उनका घर है लेकिन वहां से हट नहीं सकतीं क्योंकि गाँव का हर परेशान परिवार अज्जी की तरफ उम्मीद की नज़र  से देखता है . सबीहा ने अपने लिए किसी से कभी कुछ नहीं माँगा लेकिन  जब उनको किसी की मदद करनी होती है तो बेझिझक मित्रों , शुभचिंतकों से  योगदान करवाती हैं . अपने  गाँव की बच्चियों से हस्तशिल्प के आइटम बनवाती हैं , खुद  भी लगी रहती हैं और बंगलौर शहर में जहां भी कोई प्रदर्शनी लगती है उसमें बच्चों के काम को प्रदर्शित करती हैं , सामान की बिक्री से  जो भी आमदनी होती है उसको उनकी फीस के डिब्बे में डालती रहती  हैं . उसमें से  अपने लिए एक पैसा नहीं लेतीं .उनके तीनों ही बच्चे यह जानते हैं और अगर कोई ज़रूरत पड़ी तो हाज़िर रहते हैं.  
 अपने भाई के एक  ऐसे दोस्त को उन्होंने रास्ता दिखाया  और सिस्टम से ज़िंदगी जीने की तमीज सिखाई जो दिल्ली महानगर में पूरी तरह से कनफ्यूज़ था . छोट शहर और गाँव से आया यह नौजवान दिल्ली में दिशाहीनता की तरफ बढ़ रहा था . रोज़गार के सिलसिले में दिल्ली आया था , काम तो छोटा मोटा मिल गया था लेकिन परिवार गाँव में था. वह अपनी पत्नी और दो  बच्चों को इसलिए नहीं ला रहा था कि रहेंगे कहाँ . आपने डांट डपट कर बच्चों और उसकी पत्नी को दिल्ली बुलवाया, किराये के मकान में  रखवाया और आज वही बच्चे अपनी ज़िन्दगी संभाल रहे  हैं, अच्छी पढाई लिखाई कर चुके हैं  . वह दिशाहीन  नौजवान भी  अब बूढा हो गया है और शहर में कई हल्कों  में पहचाना जाता है .
सबीहा में हिम्मत और हौसला बहुत ज्यादा है . आपने चालीस साल की उम्र में रॉक क्लाइम्बिंग सीखा और  बाकायदा एक्सपर्ट बनीं, अडतालीस साल की उम्र में कार चलाना सीखा .  चालीस की उम्र पार करने के बाद चीनी भाषा में  उच्च शिक्षा ली.  नई दिल्ली के नैशनल म्यूज़ियम इंस्टीच्यूट ( डीम्ड यूनिवर्सिटी ) से पचास साल की उम्र में पी एच डी किया . जब मैंने पूछा कि इतनी उम्र के बाद पी एच डी से क्या फायदा होगा ?  आपने कहा कि ,"यह मेरी इमोशनल  यात्रा है . मेरे अब्बू की इच्छा थी कि मैं  पी एच डी करूं. उनके जीवनकाल में तो नहीं कर पाई लेकिन अब जब भी मैं उसके लिए पढ़ाई  करती हूँ तो लगता है उनको श्रद्धांजलि दे रही हूँ ."
आज उसी बुलंद इन्सान का जन्मदिन है .जन्मदिन मुबारक हो सबीहा .