Saturday, October 13, 2018

नीम का बड़े पैमाने पर रोपण देश को जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचा सकता है .



शेष नारायण सिंह

नीम प्रकृति की  तरफ से इंसानियत को एक वरदान है . यह बात आदिकाल से सत्य है और अब तो मानवीय आस्था का हिस्सा बन चुकी है .नीम के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन भी खूब हुए हैं . तारा तरह के हुए अनुसंधान का नतीजा है कि आज नीम का सम्मान दुनिया भर में है. नीम एक ऐसा पेड़ है जो कड़वा होता है परंतु अपने गुणों के कारण आयुर्वेद व चिकित्सा जगत में इसका दुनिया भर में डंका बज रहा है .नीम से खून साफ होता है .
नीम कीड़ों को मारता है। इसलिए इसके पत्तों को कपड़ों व अनाज में रखा जाता है।
हृदय रोगों में भी नीम लाभदायक है। हृदय रोगी नीम के तेल का सेवन करें तो फायदा होता है .नीम की दातुन से दांत साफ करना काफी फायदेमंद होता है।
 स्वाद तो कड़वा होता  है लेकिन फायदे अनंत है . 
नीम को एक अभियान की तरह विकसित करने के बहुत सारे प्रयास हो रहे  हैं . इस का एक उदाहरण मुंबई में देखने को मिला. अखिल भारतीय मारवाड़ी महासभा के संस्थापक अध्यक्ष महेश राठी ने एक संकल्प ले रखा है कि पूरे देश में नीम के पेड़ लगाना है . महेश जी मुंबई में रहते हैं . वहां सोसाइटियों में बहुत कम कच्ची मिट्टी होती है लेकिन मारवाड़ी महासभा के तत्वावधान में हर सोसाइटी में नीम लगाने का अभियान छेड़ रखा है . करीब चार साल पहले उन्होंने मुझे बताया था कि पूरी देश में नीम के पौधे लगाने का अभियान चलायेंगें . मुझे लगा कि महेश जी सपने देख रहे हैं लेकिन आज जब उनके प्रयास से नीम लगाने की ख़बरें देखता हूँ तो लगता है कि यह आदमी एक जूनून की हद तक जाने को तैयार है .राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र में उन्होंने नीम के पौधे लगाने को एक आन्दोलन का रूप दे दिया है . अभी खबर आई है कि इंदौर में भी उन्होंने  नीम महोत्सव का बड़ा आयोजन किया बताया गया है कि मारवाड़ी महासभा द्वारा अभी तक पांच लाख से अधिक नीम के पौधे वितरित करके  उन्हें वृक्ष के रूप में विकसित करने काम चल रहा है . शायद यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि अगर सघन रूप से नीम का अभियान चल गया तो राजस्थान से मरुस्थल का क्षेत्र  बहुत ही कम हो जाएगा .
मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो तीन चार एकड़ खेत में नीम के उद्यान लगाकर उनसे निकलने वाली  निमकौडी से अच्छी आमदनी ले रहे हैं .  मेरठ की संस्था हरित पर्याय भी अपने चंहुमुखी  अभियान में नीम को महत्व देकर पर्यावरण में योगदान कर रही है . उसकी संस्थापक मधु गुप्ता दिन रात वातावरण से प्रदूषण को खारिज करने के काम में लगी रहती हैं.  नीम से मुझे भी बहुत ही अधिक लगाव  है . नीम की चर्चा होते ही पता नहीं क्या होता  है कि  मैं अपने  गांव पंहुंच जाता हूँ.  बचपन  की पहली यादें ही नीम से जुडी हुयी हैं . मेरे  गाँव में नीम  एक देवी  के रूप में स्थापित हैं, गाँव के पूरब में अमिलिया तर वाले बाबू साहेब की ज़मीन में जो नीम  का पेड़ है ,वही काली माई का स्थान है . गाँव के बाकी नीम के पेड़ बस पेड़ हैं .   लेकिन उन पेड़ों में भी मेरे बचपन की बहुत सारी मीठी यादें हैं . मेरे दरवाज़े पर जो नीम का  पेड़ था , वह गाँव  की बहुत सारी गतिविधियों का केंद्र था . सन २००० के सावन में जब  बहुत तेज़ बारिश हो रही थी, तो आकाशीय विद्युत् के कारण उस पेड़  को नुक्सान हो गया .  लोग बताते हैं कि पूरे गाँव में घनी वर्षा हो रही थी, रात का समय था  , बहुत तेज़ आवाज़ आई थी और सुबह  जब लोगों ने देखा तो मेरे दरवाज़े की नीम की एक मोटी डाल टूट कर नीचे गिर गई थी,  मेरे बाबू वहीं पास में बनी  बैठक  में रात में सो  रहे थे. उस आवाज़ को सबसे क़रीब से  उन्होंने ही सुना था. कान फाड़ देने वाली आवाज़ थी वह . उस हादसे के बाद नीम का  पेड़ सूखने लगा था. अजीब इत्तिफाक है कि उसके बाद ही मेरे बाबू  की जिजीविषा  भी कम होने लगी थी. फरवरी आते आते नीम का पेड सूख  गया . और उसी  २००१ की फरवरी में बाबू भी चले गए थे . जहां वह नीम का पेड़ था , उसी जगह के आस पास मेरे भाई ने नीम के तीन पेड़ लगा दिए है , यह नीम भी तेज़ी से बड़े हो  रहे हैं .
पुरानी नीम के पेड़ का मेरे गाँव के सामाजिक जीवन में बहुत महत्व है .इसी पेड़ के नीचे मैं अपने बचपन के साथियों के साथ घंटों खेला करता था . जाड़ों में धूप सबसे पहले इसी पेड़ के नीचे बैठ कर सेंकी जाती थी. पड़ोस के कई बुज़ुर्ग वहां मिल जाते थे . टिबिल साहेब और पौदरिहा बाबा तो  धूप निकलते  ही आ जाते थे. बाकी लोग भी आते जाते रहते थे. यह दोनों  बहुत आदरणीय इंसान थे. हुक्का भर भर के नीम के पेड़ के नीचे पंहुचाया जाता रहता था. घर के अलाव  में आग जलती रहती थी.    इन दोनों ही बुजुर्गों का असली नाम कुछ और था लेकिन  सभी इनको इसी नाम से जानते थे. टिबिल साहेब कभी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबिल रहे थे , १९४४ में रिटायर हो गए थे , और मेरे पहले की पीढी भी उनको इसी नाम से जानती थी.  पौदरिहा का नाम इस लिए पड़ा था कि वे  गाँव से किसी की बरात में गए थे तो किसी कुएं की पौदर के पास ही खटिया  डाल कर वहीं सो गए थे . पौदर उस जगह को कहा जाता था जो कुएं के पास होती थी. किसी घराती ने उनको पौदरिहा कह दिया और जब बरात लौटी तो गाँव वालों ने उनका यही नाम कर दिया . इन्हीं  मानिंद  बुजुर्गों की छाया में हमने शिष्टाचार  की बुनियादी  बातें भी सीखीं थीं.
मेरी नीम की मज़बूत डाल पर ही सावन में झूला पड़ता था. रात में गाँव की लडकियां और बहुएं उस  पर झूलती थीं और कजरी गाती थीं.  मानसून के  समय चारों तरफ झींगुर की आवाज़ के बीच में ऊपर नीचे जाते झूले पर बैठी  हुयी कजरी गाती मेरे गाँव की लडकियां  हम लोगों को किसी भी महान संगीतकार से कम नहीं लगती थीं.  जब १९६२ में मेरे गाँव  में स्कूल खुला तो सरकारी बिल्डिंग बनने के पहले इसी नीम के पेड़ के नीचे ही  शुरुआती कक्षाएं चली थीं.   पीलीभीत से गाजीपुर की गोमती नदी की यात्रा में उसके किनारे   वैसे तो बहुत सारे तीर्थ स्थान हैं लेकिन धोपाप का महत्व सबसे ज़्यादा है .  लोकोक्ति है कि जब भगवान् राम रावण  वध के बाद अयोध्या आये तो उनके पंडितों ने उनको बताया कि उन पर ब्राह्मण की हत्या का दोष है . उस दोष से मुक्ति के लिए राजा रामचंद्र ने विधिवत यज्ञ आदि करवाया था.  उस इलाके में यह विश्वास है कि गौहत्या और ब्रह्म हत्या का  दोष लगने पर यजमान को अंत में धोपाप में गोमती नदी में स्नान करना ज़रूरी होता है . गौहत्या का दोष तो तब भी लग जाता था अगर किसी ने किसी खूंटे से  गाय को बांध दिया और सांप के काटने या किसी  बीमारी से गाय की मृत्यु हो गयी. ऐसे बहुत सारे लोग धोपाप जाया करते थे . जिसको  बाकी देश में गंगा दशहरा कहते हैं वह हममरे इलाके में जेठ की दशमी के नाम से जाना जाता है . इस अवसर पर  पहले के ज़माने में लोग पैदल ही  जाते थे और थक कर इसी नीम  के नीचे आराम करते  थे. अब तो सड़क पक्की हो  गयी है , बस  , टैक्सी आदि चलने लगी है लेकिन उन दिनों सड़क कच्ची थी और ज़्यादातर लोग धोपाप पैदल ही जाते थे .

 मेरे गाँव में सबके घर के आस पास नीम के पेड़ हैं और किसी भी बीमारी में उसकी  पत्तियां , बीज, तेल , खली आदि का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर  होता था लेकिन आब नहीं होता. निमकौड़ी बीनने और बटोर कर रखने का रिवाज ही खत्म हो गया है . लेकिन नीम के पेड़ के प्रति श्रद्धा कम नहीं  हो रही है .
 एक दिलचस्प वाकया है  . मेरे बचपन में   मुझसे छः साल बड़ी मेरी   बहिन  ने घर के ठीक  सामने  नीम का एक पौधा  लगा दिया   था. उसका विचार था कि जब भाइयों की दुलहिन आयेगी  तब तक नीम  का पौधा पेड़ बन जाएगा  और उसी  पर उसकी  भौजाइयां झूला डालकर झूलेंगी.  अब वह पेड़ बड़ा हो गया  है , बहुत ही घना और शानदार .  बहिन के भाइयों की दुलहिनें  जब आई थीं तो पेड़ बहुत छोटा था . झूला नहीं पड़ सका . अब उनकी भौजाइयों के  बेटों की दुलहिनें आ गयी हैं लेकिन अब गाँव  में  झूला झूलने की परम्परा  ही ख़त्म हो गयी है .करीब दो साल पहले  मेरे छोटे भाई ने ऐलान कर दिया कि बहिन   वाले  नीम के पेड़ से घर को ख़तरा है ,लिहाज़ा उसको कटवा दिया जाएगा . हम लोगों ने कुछ कहा नहीं लेकिन बहुत तकलीफ हुयी  . हम  चार भाई  बहनों के   बच्चों को हमारी तकलीफ  का अंदाज़ लग गया और उन लोगों ने ऐसी  रणनीति बनाई   कि नीम का  पेड़ बच गया .जब नीम के उस पेड़ पर हमले का खतरा मंडरा रहा   था तब मुझे अंदाज़ लगा कि मैं नीम से कितना मुहब्बत करता हूँ .
जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है . भारत में तो अगर बहुत बड़े पैमाने पर नीम के पौधे लगाने का अभियान शुरू कर दिया जाए तो भारत जलवायु परिवर्तन के खतरों से बच सकता है और पर्यावरण की रक्षा में दुनिया अग्रणी मुकाम हासिल कर सकता है .

जीका वाइरस का प्रकोप और राजनीति को मज़बूत करने की ज़रूरत




शेष नारायण सिंह

राजस्थान में एक भयानक बीमारी ने दस्तक दे दी है . ज़ीका वाइरस के 55 मामले सामने आये हैं . यह एक खतरनाक  विषाणु है जिसका सही इलाज अभी विकसित नहीं हुआ है . अभी अंदाज़ से ही लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता  है . राजस्थान से जो सरकारी आंकड़े आ रहे हैं उसके हिसाब से स्थिति चिंताजनक  चुकी है . यह आंकड़े केवल  राजधानी जयपुर से लिए गए हैं. केंद्र सरकार की एक टीम ने वहां जाकर यह आंकडे एकत्र किया और नतीजे डरावने हो चुके हैं . यह जानना ज़रूरी  है कि विश्व  स्वास्थ्य संगठन इस वाइरस के बारे में के कहता है . जीका वाइरस मूल रूप से एडीज मच्छर के काटने से फैलता है . यह मच्छर दिन में ही काटता है . इसके लक्षण  पहले बहुत ही साधारण  दीखते  हैं. मामूली बुखार  ,खुजली, कंजक्टीवाइटिस,मांश पेशियों और जोड़ों में दर्द और सरदर्द बीमारी के शुरुआती लक्ष्ण हैं . गर्भवती महिलाओं में यह बहुत ही खतरनाक हो सकता है .जीका से ग्रस्त माहिला के गर्भ में पल रहा शिशु माइक्रोसेफाली से पीड़ित हो सकता है. यानी जब वह पैदा होगा तो उसका सर अपेक्षाकृत बहुत छोटा होगा .इसके अलावा कई बार गर्भपात या समय से पूर्व जन्म भी हो सकता है. न्यूरोलाजी से सम्बंधित बीमारियाँ भी इस  विषाणु के कारण हो सकती हैं .. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेताया है कि जी बी सिंड्रोम का कारण भी जीका वाइरस बन सकता  है . जी बी सिंड्रोम एक ऐसा रोग  है जो मरीज़ के शरीर की  मांशपेशियों को लगातार कामजोर करता रहता है और एक स्थिति ऐसी आ जाती है कि शरीर के अंगों का हिलना डुलना भी बंद हो जाता है .
जीका वाइरस की जानकारी का सबसे पुराना उदहारण १९४७  का है जब उगांडा में यह विषाणु बंदरों में पाया गया था . १९५२ में पहली बार इस के लक्षण उगांडा और नाइजीरिया में इंसानों में देखे गए थे . बाद में तो १९६० से १९८० के बीच अफ्रीका और लातीनी अमरीका में जीका के बहुत सारे मामले पकड़ में आये .२००७ में बहुत बड़े पैमाने पर यह बीमारी  लातीनी अमरीका के द्वीप याप में फ़ैल गयी थी प्रशांत महासागर के देशों में जीका वाइरस के संक्रमण के बहुत सारे मामलों का पता चला .२०१५ में ब्राजील में खुजली की महामारी का पता चला जिसको बाद में जीका का संक्रमण माना गया . उसी साल इसको जी बी सिंड्रोम का कारण भी माना गया .अब तो मामला बहुत बढ़ गया है. अब तक ८६ देशों में जीका वाइरस आपना ज़हर फैला चुका है .  
अब तक जीका वाइरस से सम्बंधित जितनी बीमारियों का पता चला है उनमें जी बी सिंड्रोम सबसे खतरनाक है . करीब तीन साल पहले हमारे एक मित्र की पत्नी को पांव में कुछ कमजोरी महसूस हुयी. लखनऊ के पाश गोमती नगर इलाके में रहते हैं. उनके  एक पुराने सहपाठी लखनऊ मेडिकल कालेज में न्यूरोलाजी विभाग में  बड़े डाक्टर के रूप में तैनात थे . उनके पास ले जाया गया. उन्होंने देखते ही कहा कि शायद जी बी सिंड्रोम है . वहां पूरी सुविधाएं नहीं थीं  लिहाज़ा लखनऊ के एस जी पी जी आई रिफर कर दिया . वहां के डाक्टर भी दोस्त थे . उसके बाद यह लोग घर आ गए और सोचा कि खाना खाकर  पी जी आई चले जायेंगें .इस बीच पीजी आई वाले डाक्टर का फोन आया कि अभीतक आप लोग आये नहीं . कहाँ हैं. जब उनको   बताया गाया कि लंच करके आते हैं तो वे चिल्लाने लगे और डांटा कि तुंरत आओ वरना बहुत देर हो जायेगी . बहरहाल  जो आधे घंटे की  देरी हुई थी ,उसका नतीजा यह हुआ कि मरीज़ के शरीर की ज़्यादातर मांसपेशियाँ प्रभावित हो चुकी थीं और उनको ठीक होने में ढाई साल लग गए. पति पत्नी दोनों ही बड़े अफसर थे इसलिए खर्च नहीं हुआ लेकिन अगर मुफ्त इलाज़ की सुविधा न रही होती तो  आर्थिक रूप से भी बहुत मुश्किल हुई होती.
जी बी सिंड्रोम का अनुसंधान फ्रांस के दो  महान डाक्टरों ने किया था .  उनके नाम के आधार पर ही  इस बीमारी का नाम पड़ा है . इसमें शरीर का इम्यून  सिस्टम ही मांसपेशियों को कमज़ोर करने लगता है . शुरू में तकलीफ हाथ और पाँव में होती है उसके बाद  शरीर के ऊपरी हिस्से में कमजोरी आती है . एक स्थिति ऐसी आ जाती है  जब फेफड़ों की नसें भी जवाब देने लगती हैं और उसके बाद सांस लेना असंभव हो जाता है . और  यह सब केवल कुछ घंटों में हो जाता है.
इस पृष्ठभूमि में जीका वाइरस को देखने की ज़रूरत है . अब तो यह पक्का हो गया है कि यह वाइरस  मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश करता  है इसलिए उम्मीद  है कि मच्छरों पर काबू करके इसको बढ़ने से रोका जा सकता है.  हालांकि शुरू तो गरीब  इलाकों में होता है लेकिन मच्छरों को रोका तो जा नहीं सकता है . और  संपन्न इलाकों में भी फैलने की आशंका बनी हुयी रहती है इसलिए उम्मीद है कि सरकारी  तौर पर इसको काबू करने के सारे उपाय किये जायेंगें . राजस्थान में अभी खून के जो नमूने मिले हैं ,वे शास्त्री नगर और सिंधी कैम्प से लिए गए हैं . यहाँ से लाये गए  मच्छरों में विषाणु का मिलना कन्फर्म  हो चुका है . वहां मच्छर मारने के सरकारी अभियान शुरू किये जा चुके हैं . जो लोग बीमारी की चपेट में आ गए हैं उनके लिए  इलाज़ का विशेष इंतज़ाम किया जा चुका है . लोगों में जानकारी बढाने के लिए भी प्रयास किये जा रहे हैं .
भारत में यह जीका वाइरस का प्रादुर्भाव अपेक्षाकृत नया है. जनवरी २०१७ में पहली बार जीका वाइरस का पता अहमदाबाद में चला था उसी साल तमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले में भी  जीका का संक्रमण देखा गया था . लेकिन इनको कंट्रोल कर लिया गया था .शायद इसलिए कि मामला बाहुत छोटा था लेकिन  जयपुर का केस अलग  हैं . वहां बात बहुत बढ़ गयी है और  अभी तो पता नहीं वहां जीका का विस्तार कितना है .इसके लिए सरकार को युद्ध स्तर पर जुट जाना चाहिए . दिल्ली में ढाई साल पहले हुई सफाईकर्मियों की हड़ताल का नतीजा दिल्ली और आस पास के लोग भोग चुके  हैं. २०१६ में दिल्ली की केजरीवाल सरकार और बीजेपी के कंट्रोल वाले नगर निगम के झगड़े में सफाई कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला था. बीजेपी और आम आदमी पार्टी के नेता एक  दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हड़ताल को हवा दे रहे थे . नतीजा यह हुआ कि सफाई कर्मियों की तीन महीने से अधिक समय तक हड़ताल चली . सडकों पर कूड़े का अम्बार लग गया और बहुत बड़े पैमाने पर  मच्छरों की ब्रीडिंग हुई. दिल्ली ,नॉएडा ,फरीदाबाद, गाजियाबाद और  गुरुग्राम में बहुत बड़े पैमाने पर चिकनगुनिया, डेंगी और मलेरिया फैला . लेकिन दुर्भाग्य यह  है कि नेता लोग कोई सबक नहीं लेते. इस साल भी सफाई कर्मचारियों की हड़ताल हो  रही है .
सवाल यह  है कि जब मच्छरों के काटने से इतनी खतरनाक बीमारियाँ फ़ैल रही  हैं और उनको सफाई करके कंट्रोल किया जा सकता है तो सरकारें क्यों नहीं करतीं.ज़ाहिर है राजनीति में भ्रष्ट और गैरजिम्मेदार किस्म के लोग हैं और अब समय आ गया  है जब इन लोगों  पर लगाम  लगाया जाना ज़रूरी हो गया है .

Friday, October 12, 2018

मेरे दोस्त जवाहरलाल बरनवाल एक जिंदादिल इंसान हैं.




शेष नारायण सिंह

सुल्तानपुर -जौनपुर रोड पर सबसे बड़ा कस्बा लम्भुआ है . आज़ादी के पहले तो एक  गाँव था.  सड़क भी कच्ची मिट्टी और कंकड़ की थी . दूसरे विश्वयुद्ध के समय रेल लाइन बिछी थी  जो लम्भुआ से गुज़रती थी लेकिन वह केवल माल गाडी या फौज़ी गाडी के लिये ही इस्तेमाल होती थी.  १९४७  के बाद इस लाइन पर सवारी गाड़ी चलने लगी  . पहले सुल्तानपुर-जौनपुर पैसेंजर ( एस जे ) चलना शुरू हुयी तो आस पास के गाँवों के वैश्य बिरादरी के लोग  अपनी दुकानों को लेकर लम्भुआ आने लगे . जब मैं १९६७ में जौनपुर पढने गया तो सुबह एक गाड़ी जौनपुर जाती थी और वही शाम को वापस आती थी . और जो गाडी सुबह जौनपुर से चलकर सुल्तानपुर आयी रहती थी वह शाम ४.४०  पर सुल्तानपुर से चलकर जौनपुर जाती थी . सिंगरामऊ में  उसके कोयले के इन्जन में पानी भरा जाता था  . आजकल सिंगरामऊ स्टेशन का नाम हरपाल गंज कर दिया गया है . बाद में तो डीज़ल का इंजन आ गया लेकिन हमारी पैसेंजर कोयले से ही चलती थी .  लम्भुआ से जौनपुर का करीब पचास किलोमीटर का सफ़र यह  गाडी तीन  घंटे में तय करती थी. जब हम गाड़ी से जौनपुर सिटी स्टेशन पर उतरते थे तो सफ़ेद कपड़े सिलेटी हो चुके होते थे .उसी दौर में इस लाइन पर हावड़ा से अमृतसर जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन ,४९ अप और ५० डाउन भी चलने लगी थी. जब उसका स्टापेज लम्भुआ हो गया तो बाज़ार की कुण्डली में एक गाड़ी और जुड़ गयी . इस बीच सड़क पर भी काम शुरू हुआ और  धीरे धीरे सुल्तानपुर -जौनपुर की सड़क तारकोल वाली हो गयी . उसके बाद लम्भुआ की बाज़ार बड़ी होने लगी . शुरू में इस बाज़ार में शुक्रवार और सोमवार को ही ज्यादा खरीद फरोख्त होती थी , अब बात  बदल गयी है . अब तो लम्भुआ तहसील का  मुख्यालय भी  है . पहले नहीं था, पहले तहसील कादीपुर में हुआ करती थी . आज लम्भुआ बाज़ार नहीं एक छोटा शहर है .

लम्भुआ में एक जे क्लब है.  उसके आजीवन अध्यक्ष हैं जवाहर लाल बरनवाल . शायद १९६७ में इस क्लब ही स्थापना हुई थी . जवाहरलाल के अलावा क्लब के दो और सदस्य हैं, मास्टर कल्लूराम और अलीमुद्दीन . क्लब के नियम में लिखा है कि इसकी सदस्य संख्या बढ़ाई नहीं जा सकती है .सदस्य केवल तीन ही रहेगें.  बाद के वर्षों में क्लब बहुत ही लोकप्रिय हो गया . बहुत सारे दोस्तों ने मांग करना शुरू कर दिया कि हमको भी सदस्य बनाओ तो नियम में थोडा ढील दी गयी . तय हुआ कि स्थाई सदस्य तो नहीं  बढ़ाए जा सकते लेकिन लोगों को अस्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में स्वीकार किया जा  सकता है . इस नियम के बाद बहुत सारे लोग सदस्य बने . लेकिन सभी अस्थाई आमंत्रित सदस्य ही हैं . मुझे भी शायद १९७० में इस क्लब के सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया था  . सत्तर का दशक  क्लब के सदस्यों के लिए स्वर्णयुग है . ज्यादातर लोगों को इसी दौर में नौकरियाँ मिलीं. बहुत सारे लोगों की शादियाँ हुईं ,ज्यादातर लोगों के यहाँ बाल बच्चे हुए . और क्लब के अध्यक्ष जवाहरलाल बरनवाल को इमरजेंसी लगने के बाद गिरफ्तार किया गया . याद नहीं पड़ रहा कि मीसा में पकड़े गए थे कि डी आई आर में . किसी मुकामी कांग्रेसी नेता से उनकी अनबन हो गयी थी जिसने उनको इंदिरा गांधी का विरोधी बताकर बंद करवा दिया था . इंदिरा गांधी के विरोधी तो वे थे लेकिन किसी राज्नीतिक्गातिविधि से उनको कुछ भी लेना देना नहीं था . नेता के मुकामी रंग को चमकाने के लिए यह कारस्तानी हुई थी . जवाहरलाल की  बिसातखाने की दूकान थी . साबुन तेल आदि भी मिलता था, अच्छी दूकान थी . उनके यहाँ इलाके के  पढने लिखने वाले ज़्यादातर नौजवान ग्राहक होते थे . कभी कुछ पैसा कम पड़ गया तो उधार हो जाता था. उनके यहाँ उधार लेने वाले कुछ लोग इंटरमीडिएट के बाद ही  प्राइमरी स्कूल में मास्टर हो गए , कुछ लोग बी एड करके इंटर कालेजों में बतौर शिक्षक भर्ती हो गए, कुछ लोगों ने एम ए में प्रथम श्रेणी ली और डिग्री कालेजों में नौकरी पा गए . कुछ लोग वकील हो गए और कुछ लोग दिल्ली बंबई चले गए . मुराद यह कि जे क्लब के ज्यादातर सदस्य  उस इलाके के लिहाज़ से अच्छी नौकरियों में जम गए . उसके बाद कुछ लोगों ने उनकी दूकान का पुराना उधार चुकता कर दिया और  नियमित नक़द खरीदारी करने लगे लेकिन कुछ महान आत्माएं ऐसी भी थीं, जिन्होंने न तो पुराना अदा किया और नई खरीदारी के लिए दूसरी दूकान पकड ली. सबको पता है कि कस्बे की दुकनदारी की बुनियाद नया पुराना करते रहने में ही होती है और अगर पुराना उधार अंटक जाय तो काम गड़बड़ा जाता है . उनके साथ भी यही हुआ . धीरे धीरे दुकान से माल टूटने लगा . उधार वाला रजिस्टर मोटा  होता गया और दुकान कमज़ोर होती गयी लेकिन अध्यक्ष ने हार नहीं मानी . किसी पुराने  साथी से राह चलते तकादा नहीं किया . इस बीच उनका  बेटा पढाई लिखाई कर रहा था , वह तैयार हो गया , काम का रास्ता बदल दिया और आज अध्यक्ष का बुढापा सम्मान से बीत रहा है .
यह अध्यक्ष अजीब आदमी है . कभी भी हार नहीं मानता , सबके मुंह पर खरी खरी कह देता है.  जिससे  दोस्ती की ,कभी अपनी तरफ से नहीं तोडी . अगर कोई किसी कारण से अलग हो गया तो हो जाए ,कोई परवाह नहीं की. जिसने पंगा लिया उसको पूरी तरह से इग्नोर कर दिया . शान से जीने का आदी ७५ साल का  यह जवान आज भी उसी ज़िन्ददिली के साथ जमा हुआ है . जवाहरलाल से मेरी बहुत अपनैती है . इनका मूल गाँव मकसूदन है .  यही मेरे पुरखों का गाँव भी है . सैकड़ों साल से इनके और हमारे परिवार के बीच में अपनापा है . यह गाँव गोमती नदी के किनारे बसा हुआ है . मेरा पुराना  घर तो ठीक नदी के किनारे ही है ,इनका घर बाज़ार में है. मकसूदन गाँव में गोमती जी घूमती हैं और अर्धचन्द्राकार  दिशा लेकर नानेमाऊ की तरफ चली जाती हैं. पापर घाट से मकसूदन तक नदी का बहाव बिलकुल सीधा है लेकिन हमारी घरुही से मुड़कर अर्धचंद्राकार हो जाती हैं  . बाद में दियरा और धोपाप होती हुयी आगे जौनपुर चली जाती हैं .  शुरू के दिनों में जब सड़कें नहीं होती थीं तो नाव में लादकर व्यापार का सामान  नदियों के रास्ते ही लाया जाता था. शायद इसीलिये  ज्यादातर व्यापारिक केंद्र नदियों के किनारे ही हैं  . हमारे इलाके के पुराने समय के सबसे महत्वपूर्ण बाज़ार , मक्सूदन, दियरा, बरवारी पुर आदि बहुत बड़े बाज़ार हुआ करते थे . दियरा तो थोडा बचा हुआ है लेकिन मक्सूदन उजड़ गया. गाँव तो अब भी है लेकिन बाजार नहीं है . अब हमारे यहाँ के बरनवाल लोग लम्भुआ, सुल्तानपुर, कानपुर आदि  बाजारों में शिफ्ट हो चुके  हैं. और वहां भी उनको उनके कारोबार की वजह से पहचाना जाता है. जवाहरलाल का शानदार मकान भी अब गाँव में है लेकिन अब उसको गाँव के ही एक बाबू साहब को दे दिया गया  है . जवाहरलाल अब लम्भुआ में रहते हैं .  उनके कई भाई भी लम्भुआ में अपना घर बनवा चुके हैं .
आज़ादी मिलने के पहले हमारे इलाके में  हाई स्कूल नहीं था. कादीपुर तहसील में शायद छीतेपट्टी में इंटर कालेज था . सुल्तानपुर जिला मुख्यालय था , वहां भी इंटर कालेज था . जिले में डिग्री कालेज तो कोई भी नहीं था. आजादी के बाद सरकार ने ऐसी नीति  बनाई की कि  हाई स्कूल खोलना आसान हो गया . जिसके पास ज़मीन थी और देश के निर्माण का जज्बा था , उन लोगों ने स्कूल कालेज खोले. १९५०-५१ में हमारे गाँव के आस पास चौकिया, भरखरे, कादीपुर ,बेलहरी आदि गाँवों में इंटर कालेज खुल गए.  बेलहरी का इंटर कालेज मक्सूदन से करीब था . नाव से नदी पार करके  बेलहरी शुरू हो जाता था. जवाहरलाल उसी कालेज में हाई स्कूल के छात्र के रूप में १९५७ में दाखिल हो गए . बेलहरी उस इलाके का सम्मानित कालेज था . वहीं से इंटर पास करके आप ने ज़िंदगी की लड़ाई में क़दम रखा और लम्भुआ बाज़ार में  बिसातखाने की दुकान खोली. तब तक मक्सूदन की बाज़ार का रूतबा कम होना शुरू हो गया था. लेकिन जब इस बाज़ार का जलवा था तो यहाँ के सेठ साहूकार  बहुत ही इज्ज़त से देखे जाते थे.
महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में इनके पिताजी ने तीन हज़ार रूपये का चंदा दिया था. उनके साथ इनके खानदान के चार और सेठों  ने भी  चंदा दिया था और जेल गए थे. कादीपुर की तहसील की हवालात में उसका रिकार्ड था . जब जवाहरलाल इंटर में पढ़ते थे तो उन्होंने कादीपुर तहसील जाकर इसकी जानकारी ली . वहां तैनात क्लर्क ने कहा कि नाम तो रिकार्ड में है .अगर एक हज़ार रूपया दे दो तो स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की  सर्टिफिकेट बना दूंगा लेकिन इनके पिताजी ने साफ़ मना कर दिया .और कहा कि महात्मा गांधी के आन्दोलन में पैसा किसी लाभ की उम्मीद में नहीं दिया था . उस क्लर्क को घूस नहीं दिया गया और  सर्टिफिकेट नहीं बना .
जवाहरलाल बरनवाल की जाति वैश्य है . हमारे इलाके में सेठ साहूकारों के बच्चे दबंगई नहीं करते लेकिन आपने कालेज के दिनों में रुतबे का छात्र जीवन बिताया और बाकायदा फेल हुए. लेकिन हिम्मत नहीं हारी और इंटरमीडिएट पास करके ही बेलहरी कालेज का पिंड छोड़ा .जवाहरलाल ने पिछले पचास साल में  बहुत सारे ऐसे लोगों की मदद की है जिनकी पढ़ाई छूटने वाली थी . इम्तिहान की फीस तो सैकड़ों लोगों की जमा करवाई है . मैंने पूछा कि जिन लोगों की मदद की उनमें से कोई आपकी किसी  परेशानी में कभी खड़ा हुआ . तो उन्होंने मुझे बताया कि मैंने यह सोचकर किसी की मदद नहीं की थी . खुद मेरे लिये जवाहरलाल  परेशानी के वक़्त खड़े हो जाते थे . उसका डिटेल लिखकर उनको अपमानित नहीं करूंगा लेकिन मेरे  बच्चों को मालूम है कि वे मेरे सही अर्थों में शुभचिन्तक हैं . अपने दोस्तों की अच्छाइयों को पब्लिक करना उनकी आदत का हिस्सा है और उनकी कमियों को ढँक देने के फन के वे उस्ताद हैं
मुझे लगता  है भर्तृहरि के नीतिशतकम में संकलित यह सुभाषित उन जैसे लोगों के लिये ही लिखा गया रहा होगा
पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यम् च गूहति गुणान् प्रकटी करोति
आपद्गतम्  च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणम् इदम्  प्रवदन्ति सन्ताः
                     
जो अपने मित्र  पाप करने से रोकता है ,अच्छे काम करने की प्रेरणा देता है .
उसकी कमियों को छुपाता है और  सद्गुणों को सबके समक्ष प्रकट करता है
ऐसा बुरे वक़्त में साथ नहीं छोड़ता .ज़रूरत पड़ने पर सहायता देता है ,
संतों ने इसी को अच्छे मित्र का लक्षण बताया है .
जवाहरलाल बरनवाल के बारे में मैं अपने उस समय के मित्रों ,गया प्रसाद मिश्र  राम मूर्ति मिश्र, राम प्रसाद सिंह ,संगम प्रसाद दूबे , महेंद्र कुमार श्रीवास्तव राम चन्द्र मिश्र, डॉ समर बहादुर सिंह आदि के साथ बैठकर एक संस्मरण नुमा पोथी लिखना चाहता हूँ . देखें कब संभव होता है .

Thursday, October 11, 2018

गुजरात से हिंदी भाषी मजदूरों का पलायन बहुत ही खतरनाक संकेत है




शेष नारायण सिंह






गुजरात से भाग रहे लोग वहां रोजी रोटी की तलाश में गए  थे. अब उनको भागना पड़ रहा है . जो तस्वीरें सामने आ रही हैं , उनसे साफ़ पता चलता है कि वहां मजदूरी की तलाश में गए लोगों पर संकट है . किसी अपराधी मानसिकता के आदमी ने एक दुधमुंही बच्ची को अपनी हवस का शिकार बना दिया . इस जघन्य काम को करने के पीछे उस नीच की मानसिकता की निंदा की जानी चाहिए . उसको सज़ा दी जानी चाहिए लेकिन यह सज़ा उसको कानून के तहत दी जानी चाहिए . इस तरह की देश के अलग अलग राज्यों में घटनाएं हो रही हैं, और अदालतें सज़ा भी दे रही हैं . फास्ट ट्रैक कोर्ट बना दिए गए  हैं और अपराधी को ऐसी सज़ा दी जा रही है जो अन्य संभावित अपराधियों के मन में दहशत भी पैदा कर रही है . गुजरात में बच्ची के साथ हुयी दरिन्दगी की सज़ा देने का जो काम सरकार और न्याय व्यवस्था को करना चाहिए था , वह  काम गली मोहल्ले के गुंडे कर रहे हैं . एक गैर गुजराती की नीच हरकत की सज़ा हर उस आदमी को दी जा रही है जो गुजरात में उत्तर प्रदेश ,बिहार  और मध्य प्रदेश से आकर  काम कर रहा है . सरकार खामोश है , कुछ नहीं कर रही  है. राजनीति की चाकर बन चुकी गुजरात पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है . पुलिस के एक आला अफसर ने तो गलत बयानी भी कर दी है . उन्होंने फरमाया कि लोग डर के मारे नहीं भाग रहे हैं , वे अपने गाँव छठ पूजा के लिए जा रहे हैं . अभी छठ पूजा में एक महीने से ज्यादा का समय बाकी है. जो लोग भाग रहे हैं उनसे जब स्टेशनों पर कुछ रिपोर्टरों ने बात की तो पता  लगा कि उन लोगों ने छठ  पूजा में अपने गाँव वापस जाने के लिए टिकट बुक करवा लिया था लेकिन वह तो अक्टूबर के अंत का  कन्फर्म टिकट है. अभी तो डर के कारण ही भाग रहे हैं .
गुजरात से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का पलायन बहुत सारे सवाल खड़े कर रहा है . टीवी की बहसों में सत्ताधारी पार्टी के वफादार पत्रकार तो इस के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं . उनका तर्क है कि कांग्रेस के टिकट पर एम एल ए का चुनाव जीतकर आया , अल्पेश ठाकोर नाम का एक व्यक्ति लोगों को भड़का रहा है  जिसके कारण लोग हिंसक होकर बिहारी मजदूरों को मार पीट रहे  हैं . इस तर्क में कई लोच हैं . सबसे बड़ा लोचा तो यही कि जो अल्पेश ठाकोर एक चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के चरणों में लेट गया था वह इतना ताक़तवर कब हो गया कि उसके भड़काने से गुजरात का नौजवान हथियार लेकर मैदान में आ गया और बिहारियों को डरा धमका कर भगाने लगा . यह तर्क सही नहीं है .  इस तर्क में तार्किक दोष भी हैं .अगर अल्पेश ठाकोर के भड़काने से ऐसी हालात पैदा हो गयी हैं कि गुजरात की सरकार बेचारी लग रही है तो यह शर्म की बात है . सरकार की एजेंसियों को चाहिए कि अल्पेश ठाकोर को गिरफ्तार करें, उस पर मुक़दमा कायम करें और उसको काबू में करके उसकी भड़का सकने की ताकत को नाकाम कर दें . लेकिन सरकार ऐसा कुछ नहीं कर  रही है . यह सरकार राज करने की अपनी वैधनिकता को  गँवा चुकी है क्योंकि गुजरात में  जो हालात है उससे साफ़ पता चलता है कि वहां संवैधानिक मशीनरी  फेल हो गयी है. संविधान और राजनीति का कोई भी जानकार  बता देगा कि संवैधानिक को लागू न करवा पाने की स्थिति में अनुच्छेद ३५५ और और ३५६ लगाकर राज्य सरकार को बर्खास्त करके केंद्र  का शासन लागू कर दिया जाता है . जो गुजरात में हो  रहा है वह तो संविधान के मौलिक अधिकारों की खिल्ली उड़ाने जैसा काम है .
यह बहुत ही गंभीर मामला है . संविधान के मौलिक अधिकारों वाले  खंड में  अनुच्छेद १९ में यह प्रावधान है कि देश के सभी नागरिक भारत के किसी भी  हिस्से में जा सकते हैं ( अनुच्छेद 19 (1) (d) ,भारत के किसी भी हिस्से में निवास कर सकते हैं और वहां बस सकते हैं (19 (1) (e) , कोई भी  रोज़गार कर सकते हैं और कोई भी काम, उद्योग या व्यापार कर सकते हैं .(19) (1) (g) .इसके अलावा जिस तरह से गुजरात से लोगों को धमकाया जा रहा  है .उसमें संविधान के अनुच्छेद १५ की भी अनदेखी हो रही है . उसमें साफ़ लिखा है कि किसी भी भारतीय नागरिक के खिलाफ धर्म , जाति, सेक्स, जन्मस्थान के कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता है . गुजरात में जो भी हो रहा है वह सीधे तौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश से आये लोगों को घेरने की साजिश का  हिस्सा  है. अनुच्छेद  २१ की भी अवहेलना हो  रही है .इस अनुच्छेद में लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन के अधिकार और उसकी निजी  स्वतन्त्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है . बिहारियों से मारपीट कर रही भीड़ इन दोनों ही अधिकारों को छीन रही  है. इस तरह  से संविधान की खुले आम अवहेलना हो रही है और राज्य सरकार  संविधान की रक्षा के लिए कुछ नहीं कर रही है . केंद्र सरकार का कर्तव्य है कि वह इस स्थिति को समझे और राज्य सरकार को उसका कर्तव्य पालन करने के लिए बाध्य करे. संवैधानिक मशीनरी के फेल होने पर केंद्र सरकार की मंत्रिपरिषद  माननीय  राष्ट्रपति जी को राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सलाह दे सकती है और संविधान के अनुसार वह सलाह राष्ट्रपति जी को माननी ही पड़ेगी.लेकिन ऐसा कुछ भी होता दिख नहीं रहा है .
एक  हफ्ते से गुजरात में संविधान की धज्जियां उडाई जा रही हैं और सरकार की तरफ से राजनीतिक रूप से असुविधाजनक कुछ लोगों की गिरफ्तारी के अलावा कुछ नहीं हुआ है. . होना यह चाहिए था कि राज्य सरकार हुकूमत के इकबाल को बहाल करती और जो लोग भी बिहारी मजदूरों को मार पीट रहे हैं उनके मन में कानून का डर पैदा होता और स्थिति सामान्य हो जाती . जिस तरह से  स्पष्ट बहुमत वाली राज्य सरकार अकर्मण्य बन कर  बैठी है उससे तो लगता  है कि गुंडों और राज्य सरकार की  मिलीभगत है . अगर यह संभवाना सच है तो बहुत बुरा  है. आरोप लग रहे हैं कि एक  कांग्रेसी एम एल ए को ज़िम्मेदार बताकार उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को बदनाम करने की किसी  साज़िश के मद्दे नज़र सरकार कोई कार्रवाई  नहीं कर रही है . अगर यह  सच है तो बहुत बुरा है . सरकार को मालूम होना चाहिए कि अगर आपने सही तरीके से अपना फ़र्ज़ नहीं  निभाया तो आपकी सरकार की वैधता पर तो सवाल उठते ही हैं ,चुनाव में भी गैरजिम्मेदार पार्टी को भारी नुक्सान उठाना पड़ता है .इस सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश में २०१३ में हुए मुज़फ्फरनगर दंगे से सबक सीखना किसी भी सरकार और राजनीतिक पार्टी के लिए उपयोगी होगा. सितम्बर २०१३ में उत्तर प्रदेश में बिलकुल ताज़ा सरकार थी . कुल  सवा साल पहले अखिलेश यादव ने शपथ ली थी. उनके पास अनुभव नहीं था . वे अपने पिता और उनके मित्रों पर बहुत भरोसा करते थे . इसी बीच मुज़फ्फरनगर में दंगा हो गया. अब तो खैर सब जानते हैं कि दंगा पूर्व नियोजित था . मुसलमानों का राजनीतिक प्रबंधन उनके पिता जी के एक मित्र कर  रहे. उनको अंदाज़ ही नहीं लगा कि मेरठ और मुज़फ्फर नगर के कुछ गुंडा टाइप समाज विरोधी तत्व सोशल मीडिया पर भड़काऊ तस्वीरें डालकर साम्प्रदायिक माहौल बना रहे थे . उन्होंने सरकार की तरफ से दंगे को रोकने की कोई कोशिश नहीं होने दी  अपने कुछ गुंडों को सक्रिय कर दिया . बताते हैं कि उनको उम्मीद थी कि मुसलमानों में जो थोडा बहुत मायावती की पार्टी की तरफ का झुकाव देखा जा रहा था ,वह दंगे के बाद उनकी पार्टी के साथ एकजुट हो जाएगा . सारे मुस्लिम  वोट उनकी पार्टी को मिल जायेंगें . दंगे  के बाद कई अफसरों से बात हुयी . सब का यही कहना था कि अगर सरकार की तरफ से कोई अड़चन न होती तो सोशल मीडिया पर ज़हर उड़ेल रहे गुंडों को काबू कर लिया गया होता और दंगा किसी कीमत पर न होता. लेकिन दंगा हुआ . सरकार की तरफ से ढिलाई हुयी और नतीजा सबके सामने है . हालांकि उसी दंगे के  बाद अखिलेश यादव ने अपने पिताजी के मित्रों को नज़रंदाज़ करना शुरू कर दिया था और बाद में ठीक शासन चलाया लेकिन सरकार की नाकामी का नुक्सान उनकी पार्टी को २०१४ में भी हुआ और २०१७ में भी . इसलिए सामाजिक अशांति की हालात के बाद राजनीतिक लाभ की उम्मीद लगाए गुजरात के हुक्मरानों को पता होना चाहिए कि जनता अशांति को बर्दाश्त नहीं करती . अगर सरकारें अपना फ़र्ज़ सही  तरीके से नहीं निभातीं  तो उनकी पार्टी को उसकी कीमत देनी पड़ती है .  

 पलायन एक बड़ी समस्या है . उत्तर प्रदेश , बिहार ,राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरकारों को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि उनके ही राज्य से लोग गुजरात, पंजाब , हरियाणा ,महाराष्ट्र या कर्नाटक  में रोज़गार की तलाश में क्यों जाते हैं . कोई भी गुजराती आदमी उत्तर प्रदेश या बिहार में काम की तलाश में नहीं आता . इसका कारण  यह है कि  इन राज्यों में गैर ज़िम्मेदार सरकारों ने रोज़गार के अवसर ही नहीं पैदा किये . गंगा जी के आसपास का क्षेत्र जितना उपजाऊ है उतना उपजाऊ इलाका  कहीं नहीं है लेकिन चूंकि सरकारों ने उद्योग सृजन या रोज़गार का माहौल नहीं बनाया इसलिए यहाँ का आदमी उन राज्यों में मजदूरी करने के लिए अभिशप्त है जहां के नेताओं ने विकास को प्राथमिकता दी है .इसलिए इन राज्यों में जो भी सरकारें हैं या आने वाली हैं सबका कर्त्तव्य है कि अपनी मानव संपदा को अपने ही राज्य में रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने के लिये नीतियाँ बनाएं और अपने लोगों को अन्य राज्यों के गुंडों से पिटने  से बचाएं .दूसरी तरफ ,किसी अन्य राज्य के लोगों को अपने यहाँ से भागने को मजबूर करने वाले नेताओं को शायद यह भी मालूम नहीं है कि वे इस तरह के काम करके देश की  सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता को भरी नुक्सान पंहुचा रहे हैं . इसलिये केंद्र सरकार का ज़िम्मा है कि वह गुजरात की सरकार को आगाह  करे कि बिगड़ते हालात पर फ़ौरन काबू करें वरना देर हो जायेगी और एक राज्य की सरकार अदूरदर्शिता का खामियाजा पूरे देश को उठाना पडेगा .


Wednesday, October 10, 2018

किसानों को सम्मान न दिया तो बात बिगड़ जायेगी

  

शेष नारायण सिंह

१८५७ में ईस्ट इण्डिया कंपनी के सिपाही जिस रास्ते मेरठ से दिल्ली आये थे ,उसी  रास्ते दिल्ली आ रहे  किसानों को दिल्ली की पुलिस ने शहर में नहीं घुसने दिया .आज़ादी की पहली लड़ाई के लिए जो सिपाही दिल्ली आ रहे थे ,वे सभी किसानों के बेटे थे . इस बार भी किसान ही आ रहे थे और उन पर आंसू गैस के  गोले, पानी की तोप और लाठियां बरसाने वाले दिल्ली पुलिस के सभी सिपाही  किसानों के ही बेटे थे . दिल्ली के भद्र जनों  की सुरक्षा में लगे यह सिपाही दिल्ली पुलिस में नौकरी करके गाँव में रहने वाले अपने माता पिता और गाँव की खेती और उस पर आश्रित  परिवार  का पेट पालते हैं. कॉल आफ ड्यूटी के चक्कर  में उन्होंने इस बार अपने परिवार जैसे लोगों के ऊपर पुलिस का कर्त्तव्य किया और किसानों को घायल करने पर मज़बूर हुए . दिल्ली -यूपी सीमा पर जिन  लोगों की  हड्डियां तोडी गयी हैं ,उनको २०१४ और २०१७ के चुनावों के पहले दिल्ली और यूपी की सरकार बनाने की कोशिश कर रहे राजनेताओं ने वायदा किया था कि किसानों की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी , स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू कर दी जायेगी और उनको बहुत ही खुशहाल कर दिया जाएगा .लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.
सच्ची बात यह है कि सरकारें जो दिल्ली में जम जाती हैं वे किसानों को लोकतंत्र का कच्चा माल मानने लगती हैं . उनकी नज़र में किसान का काम केवल वोट देना रह जाता है और अन्नदाता बने रहने का कर्तव्य निभाना होता है . अपनी मेहनत की कीमत जब भी किसान  मांगेगा वह स्वार्थी साबित कर दिया जाएगा . अभी तो बीजेपी की सरकार  है. पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समर्थक बीजेपी के लिए किसानों की हितैषी होना संभव ही नहीं है क्योंकि पूंजी के बल पर अपनी शक्ति को मज़बूत कर रहे वर्गों के लिए ज़रूरी है कि वे किसान और मजदूर का शोषण करें . उनकी मेहनत का जो सरप्लस होता  है वही तो पूंजीवादी अर्थशास्त्र में उद्यमी का मुनाफ़ा कहलाता है . मुनाफे की पक्षधर जमातें कभी भी गरीब की पक्षधर नहीं हो सकतीं . यह अलग बात है कि मज़बूत  विपक्ष की  गैर मौजूदगी में सत्ताधारी पक्ष के प्रवक्ता लोग हर तीसरे चौथे वाक्य में गरीब शब्द का प्रयोग  करते रहते हैं . इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस या सत्ताधारी वर्ग की अन्य पार्टियां किसानों की या गरीबों की भलाई की राजनीति को महत्व देती हैं. अभी कुछ दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का बयान आया था कि दिल्ली में ठीक से सरकार चलाना इसलिए मुश्किल होता है कि बाहर  के राज्यों के लोग यहाँ आ कर बस जाते हैं. या काम की तलाश में आये उत्तर प्रदेश, बिहार ,मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोग दिल्ली की व्यवस्था को गड़बड़ा देते हैं .
जहां तक कांग्रेस की बात है , ग्रीन रिवोल्यूशन के बाद कांग्रेस ने कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे किसानों की इज्ज़त और उनकी कमाई में  वृद्धि हो. बीजेपी की सरकार तो साढ़े चार साल पहले आई  है ,उसके पहले दस साल तक देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी . उस सरकार के गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने तो कई बार दिल्ली में बाहर से आने वाले और मजदूरी तलाशने वाले लोगों को दिल्ली के बढ़ते अपराध के आंकड़ों के लिए ज़िम्मेदार बता दिया था . दिसम्बर २०१० में एक बार नई दिल्ली नगर परिषद के सिटी सेंटर का उद्घाटन करने आये तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने  यह बातें जोर देकर कही थीं और  उसकी विधिवत व्याख्या की थी . उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में अनधिकृत कालोनियां हैं .बाहर से आकर जो लोग इन कालोनियों में रहते हैं . उनका आचरण एक आधुनिक शहर में रहने वालों को मंज़ूर नहीं है और इसकी वजह सी अपराध में वृद्धि होती है . बाद में राजनीतिक कारणों से चिदंबरम को यह बयान वापस लेना पड़ा था लेकिन उनके बयान ने शासक वर्गों की नकारात्मक सोच की पोल तो खोल ही दी थी .

दिल्ली में सत्ता के गलियारों में विराजने वाले लोग ऐसे ही सोचते हैं . इसी सोच का नतीजा है कि दिल्ली में चौधरी चरण सिंह की समाधि तक आ आ रहे किसानों को रोकने का ज़िम्मा पुलिस को दिया गया क्योंकि दिल्ली के आकाओं को शक था कि जो लोग गाँव से आ रहे हैं और किसान हैं , वे अपराधी भी होंगे.इन लोगों की यह सोच खोटी है .शासकों  को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि दिल्ली वास्तव में बाहर से आये हुए लोगों का शहर है . कुछ लोग बाद में आये और कुछ लोग पहले आ चुके थे .अगर वे १९५१ की जनगणना की रिपोर्ट पर नज़र डालें तो उन्हें पता लग जाएगा कि उस साल दिल्ली की आबादी चार लाख पैंसठ हज़ार थी जबकि कानपुर की आबादी चार लाख पचहत्तर हज़ार थी . कांग्रेस की औद्योगिक और आर्थिक नीति में कमियों के कारण आज कानपुर शहर उजड़ गया और दिल्ली शहर की आबादी तब से पच्चीस गुना से भी ज्यादा बढ़ गयी. १९५१ में दिल्ली में तीन मिलें थीं जबकि कानपुर में सैकड़ों मिलें थीं और इतना बड़ा औद्योगिक तंत्र था कि उसे मैनचेस्टर ऑफ़  ईस्ट कहते थे. कानपुर में आ कर अपनी रोजी रोटी कमाने के अवसर सूख गए तो लोग दिल्ली आने लगे. गाँवों के विकास के लिए केंद्र और राज्यों की किसी सरकार ने कुछ नहीं किया . आज गाँव में रहने वाला आदमी भरी पूरी खेती के बावजूद भी गरीब ही बना रहने के लिए अभिशप्त है . हद तो यह है कि जब वह सरकार से अपने अधिकारों की मांग करता है तो उसे लाठी ,आंसू गैस और पानी की तोप से मारा जाता है.
खेती से भाग रहे इन्हीं लोगों के कारण बड़े शहरों में गाँव से आया सस्ता मजदूर ठोकर खाता है बड़े शहर की आबादी बढाता है . इसके  लिए देश के गाँवों में विकास की शून्यता ही ज़िम्मेदार है . भारत गाँवों का है . लेकिन गाँवों के विकास के लिए सरकारी नीतियों में बहुत ही तिरस्कार का भाव रहता है .पहली पंचवर्षीय योजना में जो कुछ गाँवों के लिए तय किया गया था , वह भी नहीं पूरा किया जा सका जबकि शहरों के विकास के लिए नित ही नयी योजनायें बनती रहीं . नतीजा यह हुआ कि गाँवों और शहरों के बीच की खाईं लगातार बढ़ती रही. सत्तर के दशक में तो ग्रामीण विकास का ज़िम्मा पूरी तरह से उन लोगों के आर्थिक योगदान के हवाले कर दिया गया तो शहरों में रहते थे और अपने गाँव में मनी आर्डर भेजते थे . गाँवों के आर्थिक विकास के लिए पहली पंच वर्षीय योजना में ब्लाक की स्थापना की गयी और ब्लाक को ही विकास की यूनिट मान लिया गया . यह महात्मा गांधी की सोच से बिलकुल अलग तरह की सोच का नतीजा था . गाँधी जी ने कहा था कि गाँव को विकास की इकाई बनाया जाय और ग्रामीण स्तर पर उपलब्ध संसाधनों को गाँव के विकास में लगाया जाय . उन्होंने अपनी किताब ग्राम स्वराज के हवाले से भारत की आज़ादी के बाद के भारत के विकास के लिए एक विचार प्रस्तुत किया था . उन्हें उम्मीद थी आज़ादी के बाद गाँवों के विकास को प्राथमिकता दी जायेगी . महात्मा जी की इच्छा थी कि पंचायती राज संस्थाओं को इतना मज़बूत कर दिया जाय कि ग्रामीण स्तर पर ही बहुत सारी समस्याओं का हल निकल आये लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ब्लाक डेवलपमेंट के खेल में देश के गाँवों के आर्थिक विकास को फंसा दिया गया  . कांग्रेस ने जो दोषपूर्ण विकास का माडल १९५२  में बनाया था , गाँवों में रहने वाला व्यक्ति उसी का शिकार हो रहा है.उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में रोज़गार के अवसर बिलकुल नहीं हैं .नेताओं के साथ जुड़कर कुछ युवक ठेकेदारी वगैरह में एडजस्ट हो जाते हैं . बड़ी संख्या में नौजवान लोग मुकामी नेताओं के आस पास मंडराते रहते हैं और उम्मीद लगाए रहते हैं कि शायद कभी न कभी कोई काम हो जाएगा .उनमें न तो हिम्मत की कमी है और न ही उद्यमिता की . सरकारी नीतियों की गड़बड़ी की वजह से उनके पास अवसर की भारी कमी रहती है.और इस अवसर की कमी के लिए गलत राजनीतिक फैसले जिम्मेवार रहते हैं. एक उदाहरण से बात और साफ़ हो जायेगी . जब से ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत गाँवों में काम शुरू हुआ है उत्तर प्रदेश और बिहार से पंजाब जा कर खेतिहर मजदूर बनने वालों की संख्या में भारी कमी आई है .इसका मतलब यह हुआ कि अगर गाँवों में रोज़गार के नाम पर मजदूरी के अवसर भी मिलें तो नौजवान दिल्ली जैसे बड़े शहरों में आने के बारे में सोचना बंद कर देगें . तकलीफ की बात यह है कि अपना घर बार और परिवार छोड़कर दिल्ली आने वाला नौजवान यहाँ दिल्ली में उन लोगों की ज़बान से अपराध के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जिनकी पार्टी के गलत नीतियों के कारण उसके गाँवों की दुर्दशा हई है .

ध्यान देने की बात यह है कि किसानों के लिए लाल बहादुर शास्त्री की सरकार के बाद किसी ने कुछ नहीं सोचा . किसान अपने तरकीबों के सहारे छोड़ दिया गया और आज किसानी की हालत ऐसी स्थिति में पंहुच गयी है  कि   ज़्यादातर किसान खेती से भागना चाहते हैं . जो  किसानी के काम में लगा हुआ है उसको सरकारें अपमानित करती हैं , उसको केवल वोट देने की मशीन मानती हैं . इन हालात को जल्द से जल्द सुधारना पडेगा वरना देश की बड़ी आबादी सत्ता तंत्र से अलग थलग पड़ सकती है .

मामिला बाबा एक नेकदिल इंसान थे


शेष नारायण सिंह

आज मामिला बाबा की बहुत याद आ रही है , दुबले पतले ,सांवला रंग, मुंह में एक भी दांत नहीं, हमेशा सफ़ेद धोती बनियान पहने मामिला बाबा भलमनसी की  मूर्ति थे. मेरे बाबू उनको मामिला काका कहते थे . वे उन भाग्यशाली लोगों में से थे जिनके पिता सौ साल तक जीते हैं . जब उनके पिता की मृत्यु हुयी तो वे करीब सत्तर साल के थे . उनका असली नाम मामिला नहीं था. उनके पिता जी को भी गाँव में सभी चश्मा बाबा कहते थे .उनका नाम भी चश्मा बाबा नहीं था. चश्मा लगाते थे इसलिए चश्मा बाबा हो गए .मामिला बाबा भी हर समस्या में धीरज से रहते थे और सही सलाह देते थे इसलिए उनका नाम मामिला हो गया .  मामिला बाबा को मैं अपने शुभचिंतक के रूप में ही याद रखता हूँ. बचपन में जब उनके परिवार के दबंग बच्चे मेरी पिटाई कर देते थे तो मैं रोते हुए अपने घर शिकायत करने नहीं आता था . डर रहता था कि कहीं  घर वाले उन लोगों के साथ खेलने से ही मना न कर दें.  पिटने के तुरंत बाद मैं मामिला बाबा के पास पंहुच जाता था और  मुझे पीटने वाले उनके बच्चे डांट खा जाते थे . केस ख़त्म . उन्हों एकाध बार मुझसे कहा कि  तुम भी जवाब में पीट दिया करो. मैंने उनकी सलाह सर आँखों पर ली और उसके अमल के बाद मेरी पिटाई नहीं हुयी. मैं भी दबंग के रूप में स्वीकार कर लिया गया . उनके छोटे भाई का नाम पौदरिहा  था. वैसे उनका नाम भी कुछ और था लेकिन वे भी  नामभ्रंश के शिकार थे . उनके साथ तो यह हुआ था कि एक बार वे गाँव की किसी बारात में गये थे. शादियाँ गर्मियों में ही होती थीं.  वहां जनवासे में वे एक कुएं की पौदर के पास खटिया डालकर दुपहरिया नेवार  रहे थे .  घराती लोग जब कुछ नाश्ता पानी लाते  थे तो  आपस में बात करते थे कि अरे भाई पौदरिहा को भी कुछ खिलाओ पिलाओ . बस उसी बारात से लौट कर उनके हम उम्र और छोटे मर्दों ने उनको इस नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया . उनके एक चचेरे भाई थे . वे सन  १९१० में यू पी पुलिस में कांस्टेबिल के रूप में भर्ती हो गए थे . उनका नाम पूरे गाँव और पवस्त में टिबिल सिंह ही हो गया था. नेवता हंकारी सब इसी नाम से आता  था . हालांकि ज़मीन के रिकार्ड में उनका सरकारी नाम लिखा था.
आज पीछे मुडकर देखता हूँ तो लगता है कि बहुत सारे ऐसे लोग थे जिनके नाम उनके जन्म के समय कुछ थे लेकिन लोक व्यवहार में उनके व्यक्तित्व  या उनके काम के हवाले से नया नाम दे दिया जाता था. इसके बहुत सारे कारण रहे होंगें लेकिन एक कारण तो यही था कि गाँव में आने वाली दुलहिनें किसी भी  उम्रदराज़ मर्द का नाम नहीं
ले सकती थीं. किसी बच्चे के बाबा  या काका कहकर काम चलाने का रिवाज़ था . ज़्यादातर लोग खेती के काम में ही रहते थे लेकिन अगर कोई कुछ और काम करने लगता था तो उसके काम से जोड़कर उनका नाम रख दिया जाता था . बहुत  सारे लोगों को तो मालूम ही नहीं होता था कि उनका कोई नया नाम रख दिया गया है. मसलन जिनको मेरी माई पलटनिहां कहती थीं वे  फौज में भर्ती हो  गए थे . एक ठाकुर साहब का नाम दर्जी भी था. मेरी मौसी के गाँव में घोड़हा भी थे तो सैकिलिहा भी . यानी जिनके पास घोडा था वे घोड़हा और साइकिल वाले सैकिलिहा .
बहरहाल मामिला बाबा ने कभी किसी को तकलीफ नहीं  पंहुचाई . उनके पिता चश्मा बाबा के जीवन काल में ही उनके कई लड़के सरकारी नौकरियों में इज्ज़त का मुकाम हासिल कर चुके थे . खेती बारी तो ज्यादा  नहीं थी लेकिन उनके जीवनकाल में उनका परिवार गाँव के संपन्न परिवारों में गिना जाता था .  उनकी मृत्यु के बाद तो उनके सभी बेटे अपनी अपनी राह चल पड़े. उनके दूसरे बेटे ने ही हमारे इलाके में सबसे पहले  केमिस्ट्री में एम एस सी किया , पी एच डी किया और टी डी कालेज जौनपुर में लेक्चरर बने. उन्होंने ही मुझे  अंगेजी वर्णमाला का ज्ञान गर्मी की छुट्टियों में  कराया था. पढ़ाई पूरी करके ,बाद  में जब मैं लेक्चरर पद के लिए उम्मीदवार बना तो मुझे लेकर गोरखपुर विश्वविद्यालय गए और  सहारा दिया .. जब मैं लेक्चरर की नौकरी पा गया तो मामिला बाबा ने मुझे गले से लगाकर आशीर्वाद दिया था . उनकी याद इसलिए भी आती रहती  है कि गाँव की भलमनसी की ज़िंदगी के वे शलाकापुरुष थे , उनके जाने के बाद हमारा गाँव बिखरना शुरू हुआ तो आज तो ज्यादातर लोग पड़ोसी की तरक्की से परसंताप करते हैं और तकलीफ में रहते हैं

Tuesday, October 2, 2018

काश जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की वह बात भी मान ली होती.


शेष नारायण सिंह

२ अक्टूबर महात्मा गाँधी का जन्मदिन तो है ही, लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन भी है .  महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत के आज़ाद होने के बाद यहाँ ग्राम स्वराज   आयेगा . देश को विकसित करने के लिए गांव को विकास की इकाई बनाया जाएगा और गाँवों की सम्पन्नता ही देश की सम्पन्नता की यूनिट बनेगी . जवाहरलाल नेहरू गांधी जी की हर बात को मानते थे लेकिन पता नहीं क्यों उन्होंने गांधी के विकास के दर्शन की इस बुनियाद बात को लागू नहीं किया . उन्होंने सोवियत रूस में प्रचलित ब्लाक डेवेलपमेंट के माडल को अपनाया . और उसी को बुनियाद बनाकर ग्रामीण विकास के लिए साम्युदायिक विकास की बहुत बड़ी योजना को लागू कर दिया . महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर १९५२ में भारत में कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया गया . आज़ादी के बाद देश में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए शुरू किये गए कार्यक्रमों में यह बहुत ही महत्वपूर्ण कार्यक्रम था . लेकिन यह असफल रहा ,अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका.इस कार्यक्रम के असफल होने के कारणों की पडताल शायद महात्मा जी के प्रति सच्ची श्रध्हांजलि होगी क्योंकि इस कार्यक्रम को शुरू करते वक़्त लगभग हर मंच से सरकार ने यह दावा किया था कि कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के ज़रिये महात्मा गान्धी के सपनों के भारत को एक वाताविकता में बदला जा सकता है. मौजूदा सरकार भी महात्मा  गांधी के नाम पर कई कार्यक्रम चला रही है . उनके जन्म से डेढ़ सौ साल पूरे होने पर तरह तरह के कार्यक्रम होने जा रहे हैं . लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत के गाँवों को खुशहाल देखने के महात्मा गांधी के सपने को क्या इनका कोई कार्यक्रम लागू कर पायेगा .

सामुदायिक विकास वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जिस से एक समुदाय के विकास के लिए लोग अपने आपको औपचारिक या अनौपचारिक रूप से संगठित करते हैं.यह विकास की एक सतत प्रक्रिया है.इसकी पहली शर्त ही यही थी कि अपने यहाँ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करके समुदाय का विकास किया जाना था जहां ज़रूरी होता वहां बाहरी संसाधनों के प्रबंध का प्रावधान भी था. कम्युनिटी डेवलपमेंट की परिभाषा में ही यह लिखा है कि सामुदायिक विकास वह तरीका है जिसके ज़रिये गांव के लोग अपनी आर्थिक और सामाजिक दशा में सुधार लाने के लिए संगठित होते हैं . बाद में यही संगठन राष्ट्र के विकास में भी प्रभावी योगदान करते हैं . सामुदायिक विकास की बुनियादी धारणा ही यह है कि अगर लोगों को अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने के अवसर मुहैया कराये जाएँ तो वे किसी भी कार्यक्रम को सफलतापूर्वक चला सकते हैं .

भारत में २ अक्टूबर १९५२ के दिन जब कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम की शुरुआत की गयी तो सोचा गया था कि इसके रास्ते ही ग्रामीण भारत का समग्र विकास किया जाएगा.इस योजना में खेती,पशुपालन,लघु सिंचाई,सहकारिता,शिक्षा,ग्रामीण उद्योग अदि शामिल था जिसमें सुधार के बाद भारत में ग्रामीण जीवन की हालात में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता था.कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम को लागू करने के लिए बाकायदा एक अमलातंत्र बनाया गया . जिला और ब्लाक स्तर पर सरकारी अधिकारी तैनात किये गए लेकिन कार्यक्रम से वह नहीं हासिल हो सका जो तय किया गया था. इस तरह महात्मा गांधी के सपनों के भारत के निर्माण के लिए सरकारी तौर पर जो पहली कोशिश की गयी थी वह भी बेकार साबित हुई . ठीक उसी तरह जिस तरह गांधीवादी दर्शन की हर कड़ी को अन्धाधुन्ध औद्योगीकरण और पूंजी के केंद्रीकरण के सहारे तबाह किया गया . कांग्रेस ने कभी भी गांधीवाद को इस देश में राजकाज का दर्शनशास्त्र नहीं बनने दिया . ग्रामीण भारत में नगरीकरण के तरह तरह के प्रयोग हुए और आज भारत तबाह गाँवों का एक देश है .देश के कई हिस्सों में तो ऐसे हांव हैं जहाँ जिउ नहीं रहता .  उत्तराखंड में इस तरह के गाँव सबसे ज़्यादा हैं . 

यह देखना दिलचस्प होगा कि इतनी बड़ी और महत्वाकांक्षी परियोजना को इस देश के हर दौर के हुक्मरानों ने कैसे बर्बाद किया .यहाँ यह ध्यान में रखना होगा कि उस योजना को तबाह करने वालों में जवाहरलाल नेहरू भी एक थे. उनके दिमाग में भी यह बात समा गयी थी कि भारत का ऐसा विकास होना चाहिये जिसके बाद भारत के गाँव भी शहर जैसे दिखने लगें . वे गाँवों में शहरों जैसी सुविधाओं को उपलब्ध कराने के चक्कर में थे .उन्होंने उसके लिए सोवियत रूस में चुने गए माडल को विकास का पैमाना बनाया और हम एक राष्ट्र के रूप में बड़े शहरों , मलिन बस्तियों और उजड़े गाँवों का देश बन गए . कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम को शुरू करने वालों ने सोचा था कि इस कार्यक्रम के लागू होने के बाद खेतों, घरों और सामूहिक रूप से गाँव में बदलाव आयेगा . कृषि उत्पादन और रहन सहन के सत्र में बदलाव् आयेगा . गाँव में रहने वाले पुरुष ,स्त्री और नौजवानों की सोच में बदलाव लाना भी कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम का एक उद्देश्य था लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ. सरकारी स्तर पर ग्रामीण विकास के लिए जो लोग तैनात किये गए उनके मन में सरकारी नौकरी का भाव ज्यादा था , इलाके या गांव के विकास को उन्होंने कभी प्राथमिकता नहीं दिया . ब्रिटिश ज़माने की नज़राने और रिश्वत की परम्परा को इन सरकारी कर्मचारियों ने खूब विकसित किया. पंचायत स्तर पर कोई भी ग्रामीण लीडरशिप डेवलप नहीं हो पायी. अगर विकास हुआ तो सिर्फ ऐसे लोगों का जो इन सरकारी कर्मचारियों के दलाल के रूप में काम करते रहे. इसी बुनियादी गलती के कारण ही आज जो भी स्कीमें ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत गाँवों में भेजी जाती हैं उनका लगभग सारा पैसा इन्हीं दलालों के रास्ते सरकारी अफसरों और नेताओं के पास पंहुच जाता है .
२ अक्टूबर १९५२ को शुरू किया गया यह कार्यक्रम आज पूरी तरह से नाकाम साबित हो चुका है . इसके कारण बहुत से हैं . सामुदायिक विकास कार्यक्रम के नाम पर पूरे देश में नौकरशाही का एक बहुत बड़ा वर्ग तैयार हो गया है लेकिन उस नौकरशाही ने सरकारी नौकरी को ही विकास का सबसे बड़ा साधन मान लिया .शायद ऐसा इसलिए हुआ कि विकास के काम में लगे हुए लोग रिज़ल्ट दिखाने के चक्कर में ज्यादा रहने लगे. सच्चाई यह है कि ग्रामीण विकास का काम ऐसा है जिसमें नतीजे हासिल करने के लिए किया जाने वाला प्रयास ही सबसे अहम प्रक्रिया है . सरकारी बाबुओं ने उस प्रक्रिया को मार दिया .उसी प्रक्रिया के दौरान तो गाँव के स्तर पर सही अर्थों में लीडरशिप का विकास होता लेकिन सरकारी कर्मचारियों ने ग्रामीण लीडरशिप को मुखबिर या दलाल से ज्यादा रुतबा कभी नहीं हासिल करने दिया .सामुदायिक विकास के बुनियादी सिद्धांत में ही लिखा है कि समुदाय के लोग अपने विकास के लिए खुद ही प्रयास करेगें .उस काम में लगे हुए सरकारी कर्मचारियों का रोल केवल ग्रामीण विकास के लिए माहौल बनाना भर था लेकिन वास्तव में ऐसा कहीं नहीं हुआ . कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के बुनियादी कार्यक्रम के लिए बनायी गयी सुविधाओं और नौकरशाही के जिम्मे अब लगभग सभी विकास कार्यक्रम लाद दिए गए गए हैं लेकिन विकास नज़र नहीं आता.सबसे ताज़ा उदाहरण महात्मा गाँधी के नाम पर शुरू किये गए मनरेगा कार्यक्रम की कहानी है . बड़े ऊंचे उद्देश्य के साथ शुरू किया गया यह कार्यक्र आज ग्राम प्रधान से लेकर कलेक्टर तक को रिश्वत की एक गिज़ा उपलब्ध कराने से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया है . इसलिए आज महात्मा गाँधी के जन्म दिवस के अवसर पर उनके सपनों का भारत बनाने के लिए शुरू किये गए जवाहर लाल नेहरू के प्रिय कार्यक्रम की दुर्दशा का ज़िक्र कर लेना उचित जान पड़ता है और मौजूदा हुक्मरानों को आगाह कर देने की भी ज़रूरत है कि अंधाधुंध  शहरीकरण के चक्कर में कहीं हम अपने देश के गाँवों को तबाह न कर दें .