Thursday, March 4, 2021

महिलाओं के सशक्तीकरण से ही हाथरस जैसी घटनाओं पर लगाम लगेगी


 

शेष नारायण सिंह

 

 

हाथरस में एक बार फिर इंसानियत को अपमानित किया गया है . एक बदमाश कई साल से एक लडकी के पीछे पडा हुआ था . करीब तीन साल पहले लडकी के पिता ने उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत की . 15 दिन  बाद ही उसकी ज़मानत हो गयी . तब से वह परिवार को परेशान कर रहा था . पिछले दिनों उस बदमाश ने लडकी के  पिताजी  को  गोली मार दी. गोली सरेआम मारी गयी,  बहुत ही वहशियाना तरीके से मारी गयी लेकिन  पुलिस ने कोई  कार्रवाई नहीं की. गोली लगने के बाद लडकी  चीखती रही लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुयी . जब उसका वीडियो वायरल हुआ तब सरकार हरकत में आई. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी मैदान ले लिया और योगी सरकार से पीडिता के लिए इन्साफ माँगा . लेकिन कुछ ही देर बाद पता चला कि गोली मारने वाला  बदमाश ,गौरव शर्मा सामाजवादी पार्टी से  जुड़ा हुआ था .सपा के उस दौर के बड़े नेताओं के साथ गौरव शर्मा की कई तस्वीरें भी वायरल हो रही हैं। वह अविभाजित सपा के नेता और पूर्व मंत्री शिवपाल यादव समेत कई दिग्गज नेताओं का ख़ास बताया जा रहा है . अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम के साथ भी उसकी कई तस्वीरें हैं . ऐसे में भाजपा और सपा समर्थकों के बीच सोशल मीडिया पर एक दूसरी पार्टी पर आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है .

हाथरस में  कुछ महीने पहले भी एक  लडकी की मौत  की खबर आई थी जिसमें अभियुक्त ने उसको खेत में मार डाला था. उस केस में भी बलात्कार और हत्या के आरोप  लगे थे लेकिन सरकार ने बार बार दावा किया कि बलात्कार नहीं हुआ था , केवल हत्या की गयी थी. उस बार भी सरकारी अमले का रवैया बहुत ही गैरजिम्मेदार रहा था . सरकार ने पुलिस वालों को तो हटा दिया  था लेकिन कलेक्टर जमा रह गया था. हालांकि परिवार वालों  को बताये बिना ,उसी ने लाश को रात के अँधेरे में जलाने जैसा गलत काम किया था. यह उत्तरप्रदेश सरकार की क़ानून व्यवस्था पर ज़बरदस्त सवालिया निशान तो पैदा करता ही है  . योगी  सरकार की रहबरी भी सवालों की ज़द में है . नए मामले में उत्तरप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष की मुख्य पार्टी से अपराधी के सम्बन्ध सामने आ रहे हैं .अब होगा यह दोनों ही पार्टियां मिलकर केस को दबा देंगी, उस पापी का कहीं न कहीं रिश्ता निकल आएगा और राजनीतिक बिरादरी उसके पक्ष में खडी  हो जायेगी . इसके पहले वाले हाथरस कांड में भी यह हो चुका है . अभियुक्त की बिरादरी वाले राजपूत समाज के लोग अपराधी को महान बनाने के चक्कर में सभाएं कर रहे  थे. कुछ साल पहले भी इसी  इसी ब्रज क्षेत्र में आपराधियों को फूल माला पहनाकर वोट लेने की कोशिश हो चुकी है . सबको मालूम था वे अपराधी वही थे जिन्होंने मुज़फ्फर नगर के  दंगे के दौरान बेहिसाब खून खराबा किया था . उन अभियुक्तों को सम्मानित करने वाले सभी नेता भारतीय जनता  पार्टी के थे. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते उनकी पार्टी के बदमाश  सरेआम यही सब अपराध किया करते थे . उनको भी सरकारी संरक्षण मिलता था . अब भारतीय जनता पार्टी के गुंडों को वह संरक्षण मिल रहा है . अपने गुंडों की मनमानी का समर्थन करने का भस्मासुरी  तरीका ख़त्म किये बिना समाज और राष्ट्र का भला नहीं होगा .   सत्ताधारी नेताओं की इन्हीं  कारस्तानियों के चलते भारत की इज्ज़त दुनिया के देशों में कम हो रही है . अमरीका के थिंक टैंक ‘फ्रीडम हाउस ‘ की  रिपोर्ट अखबारों में छपी है . पिछले साल तक की रिपोर्टों में भारत को “ स्वतंत्र “ श्रेणी में रखा जाता था लेकिन सी बार भारत को “ आंशिक रूप से स्वतंत्र “ में रख दिया गया है .इस पदावनति का कारण असहिष्णुता है . रिपोर्ट में मुसलमानों पर हमले  ,नागरिक अधिकार की अवहेलना , देशद्रोह  कानून का मनमाना प्रयोग जैसी बातें का उल्लेख किया गया है . हाथरस जैसे काण्ड के कारण महिलाओं और लड़कियों की असुरक्षा भी देश की प्रतिष्टा को बाकी  दुनिया में घटा रही है .

देश के हर कोने से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की ख़बरें आ रही हैं . उत्तर प्रदेश से  बलात्कार की ख़बरें कई ज़िलों से आ रही हैं।  मध्य प्रदेश और राजस्थान में महिलाओं के साथ अत्याचार की इतनी ख़बरें आती हैं कि  जब किसी दिन घटना की सूचना नहीं आती तो लगता है कि  वही समाचार  का विषय है। आज आलम यह है कि कहीं भी  किसी भी लडकी को घेरकर उसको अपमानित करना राजनीतिक पार्टियों से जुड़े शोहदों का अधिकार सा हो गया है .सवाल उठता है कि  क्या वे लड़कियां जो अकेले देखी जायेगीं उनको बलात्कार का शिकार बनाया जायेगा. बार बार सवाल पैदा होता है कि लड़कियों के प्रति समाज का रवैया इतना वहशियाना क्यों है। दिसंबर २०१३ में हुए दिल्ली गैंग रेप कांड के बाद समाज के हर वर्ग में गुस्सा था.  अजीब बात है कि बलात्कार जैसे अपराध के बाद शुरू हुए आंदोलन से वह बातें निकल कर नहीं आईं जो महिलाओं को राजनीतिक ताक़त  देतीं  और उनके सशक्तीकरण की बात को आगे बढ़ातीं . गैंग रेप का शिकार हुई लडकी के साथ हमदर्दी वाला जो आंदोलन शुरू हुआ था उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो कि व्यवस्था बदल देने की क्षमता रखता था लेकिन बीच में पता नहीं कब अपना राजनीतिक एजेंडा चलाने वाली राजनीतिक पार्टियों ने आंदोलन को हाइजैक कर लिया और आंदोलन को दिशाहीन और हिंसक बना दिया . इस दिशाहीनता का नतीजा यह  हुआ  कि महिलाओं के सशक्तीकरण के मुख्य मुद्दों से राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह से भटका दिया गया  .  बच्चियों और महिलाओं के प्रति समाज के रवैय्ये को  बदल डालने का जो अवसर मिला था  उसको गँवा दिया गया।   अब ज़रूरी है कि कानून में ऐसे प्रावधान  किये जाएँ और उनको लागू करने की इच्छाशक्ति सरकारों में नज़र आये जिससे कि अपराधी को मिलने वाली सज़ा को देख कर भविष्य में किसी भी पुरुष की हिम्मत न पड़े कि बलात्कार के बारे में सोच भी सके.  ऐसे लोगों के खिलाफ सभ्य समाज को लामबंद होने की ज़रूरत है जो लडकी को इस्तेमाल की वस्तु साबित करता . हमें एक ऐसा समाज  चाहिए जिसमें लडकी के साथ बलात्कार करने वालों और उनकी मानसिकता की हिफाज़त करने वालों के खिलाफ  सामाजिक जागरण हो ,ताक़त हो.  मर्दवादी  मानसिकता के चलते इस देश में लड़कियों को दूसरे दरजे का इंसान माना जाता है और लडकी की इज्ज़त की रक्षा करना समाज का कर्त्तव्य माना जाता है . यह गलत है . पुरुष कौन होता है लडकी की रक्षा करने वाला . ऐसी शिक्षा और माहौल बनाया जाना चाहिए जिसमें लड़की खुद को अपनी रक्षक माने . लड़की के रक्षक के रूप में पुरुष को पेश करने की  मानसिकता को जब तक खत्म नहीं किया जाएगा तह तक कुछ  नहीं बदलेगा . जो पुरुष समाज अपने आप को महिला की इज्ज़त का रखवाला मानता है वही पुरुष समाज अपने आपको यह अधिकार भी दे देता है कि वह महिला के  यौन जीवन का संरक्षक  और उसका उपभोक्ता है . इस मानसिकता को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया जाना चाहिए .मर्दवादी सोच से एक समाज के रूप में लड़ने की ज़रूरत है . और यह लड़ाई केवल वे लोग कर सकते हैं जो लड़की और लड़के को बराबर का  इंसान मानें और उसी सोच को जीवन के हर क्षेत्र में उतारें  . कुछ स्कूलों में भी कायरता को शौर्य बताने वाले पाठ्यक्रमों की कमी  नहीं है .इन पाठ्यक्रमों को खत्म करने की ज़रूरत है . सरकारी स्कूलों के स्थान पर देश में कई जगह ऐसे स्कूल खुल गए हैं,जहां मर्दाना शौर्य की वाहवाही की शिक्षा दी जाती है . वहाँ औरत को एक  ‘ वस्तु ‘ की रूप में सम्मानित करने की सीख दी जाती है. इस मानसिकता के खिलाफ एकजुट  होकर उसे ख़त्म करने की ज़रूरत है . अगर हम एक समाज के रूप में अपने आपको बराबरी की बुनियाद पर नहीं स्थापित कर सके तो जो पुरुष अपने आपको महिला का रक्षक बनाता फिरता है वह उसके साथ ज़बरदस्ती करने में भी संकोच नहीं करेगा. शिक्षा और समाज की बुनियाद में ही यह भर देने की ज़रूरत है कि पुरुष और स्त्री बराबर है और कोई किसी का रक्षक नहीं है. सब अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं. बिना बुनियादी बदलाव के बलात्कार को हटाने की कोशिश वैसी  ही है जैसे किसी घाव पर मलहम लगाना . हमें ऐसे एंटी बायोटिक की तलाश करनी है जो शरीर में ऐसी शक्ति पैदा करे कि घाव में मवाद पैदा होने की नौबत ही न आये. कहीं कोई बलात्कार ही न हो . उसके लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि महिला और पुरुष के बीच बराबरी को सामाजिक विकास की आवश्यक शर्त माना जाए.

इस बात की भी ज़रुरत है कि लड़कियों की तालीम को हर परिवार ,हर बिरादरी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाये और उनकी शिक्षा के लिए ज़रूरी पहल की जाए . लेकिन जो भी करना हो फ़ौरन करना पडेगा क्योंकि इस दिशा में जो काम आज से सत्तर साल पहले  होने चाहिए थे उन्हें अब शुरू करना है . अगर और देरी हुई तो बहुत देर हो जायेगी .

 

गुजरात के चुनाव नतीजों से आन्दोलन करने वाले किसान नेताओं को सबक लेना चाहिए

 

 

शेष नारायण सिंह

 

गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने भारी जीत दर्ज की है . अभी कुछ दिन पहले छः महानगरपालिकाओं के चुनाव हुए थे . उन चुनावों में भी बीजेपी ने  सभी नगरों पर कब्जा किया था . सूरत ,अहमदाबाद, वड़ोदरा, राजकोट ,जामनगर और भावनगर की  6 महानगर पालिकाओं में ही चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी  ने पूरी सफलता पाई थी . उसदिन एक  टीवी चैनल के डिबेट में शामिल होने का मौक़ा मिला था. दिल्ली के कुछ विद्वानों ने कहा था कि बीजेपी मूल रूप से महानगरों की पार्टी  है इसलिए जीत  स्वाभाविक है .  जब ग्रामीण इलाकों वाले जिला पंचायत , नगर पंचायत , तालुका और ग्राम पंचायतों के चुनाव होंगे तो माहौल बदल जाएगा . उसी चर्चा में अहमदाबाद से शामिल हो रहे एक पत्रकार मित्र ने चेतावनी दी थी कि अभी जल्दी इस तरह के अनुमान   लगाना ठीक नहीं है क्योंकि कुछ दिन बाद ही ग्रामीण  क्षेत्रों में भी चुनाव होने वाले हैं ,दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा . वे चुनाव हो गए हैं और स्पष्ट हो गया  है कि गुजरात के ग्रामीण इलाकों में भी भारतीय जनता पार्टी और नरेद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है . इसके पहले  गुजरात विधानसभा की आठ सीटों पर उपचुनाव हुए थे जहां भारतीय जनता पार्टी को 8 सीट मिली थी . अब  ग्रामीण   क्षेत्रों में फैले ,जिला ,तहसील पंचायत एवं नगर पालिका में भारी  जीत देखी गयी  है .

 

इन नतीजों से सबसे बड़ा  नुकसान कांग्रेस का हुआ है . गुजरात में कांग्रेस की जड़ें बहुत कमज़ोर पड़ चुकी हैं और अब कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो पार्टी को सफलता की राह पर ले जा सके. ताज़ा पंचायत चुनावों में कांग्रेस की बुरी तरह से हुयी हार के बाद राज्य के पार्टी अध्यक्ष अमित चावड़ा और नेता प्रतिपक्ष परेश धनानी ने इस्तीफा दे दिया है . या यों कहें की उनको पार्टी आलाकमान ने हटा दिया है . इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि , “ स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम हमारी उम्मीदों के विपरीत हैं। हम जनता के जनादेश को स्वीकार करते हैं। ‘ आदिवासी समाज में  मज़बूत पकड़ वाले ,भारतीय ट्राइबल पार्टी के नेता छोटू भाई वसावा भी गुजरात की कुच्छ सीटों पर नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता वाले नेता मने जाते हैं . हर चुनाव के पहले पार्टियां  उनको साथ लेने की कोशिश करती हैं . लेकिन इस चुनाव में उनकी भी मिट्टी पलीद हो गयी है .उनके अपने पुत्र चुनाव हार गए हैं .  कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व अध्यक्ष अर्जुन भाई मोढवाडिया के भारी रामदेव भाई भी चुनाव हार गए हैं

 

इन चुनावों ने साबित कर दिया है कि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी अब उतनी ही मज़बूत पार्टी है जितनी 1977 के चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी हुआ करती थी . उन दिनों कांग्रेस में  ऐसे नेता  थे जिन्होंने महात्मा गांधी और सरदार पटेलके साथ काम किया था और उन दोनों नेताओं का वहां पूरा सम्मान था लेकिन  कांग्रेस की राजनीति  में इंदिरा गांधी के आगमन के बाद गुजरात समेत पूरे देश में कांग्रेसियों के बीच सरदार पटेल का सम्मान होना बंद हो गया . उसके बाद कांग्रेस की शक्ति में कमी आने का सिलसिला शुरू हुआ . अयोध्या आन्दोलन के बाद भारतीय जनता पार्टी  में मजबूती आने लगी .  सरदार पटेल की विरासत के सही उत्तराधिकारी के रूप में भी नरेंद्र मोदी की पहचान होने लगी है जिसका नतीजा है कि आज  भारतीय जनता पार्टी   के गढ़ के रूप में गुजरात स्थापित हो चुका है और अब साफ़ लगने लगा है कि वहां पार्टी को हरा पाना बहुत ही दूर की कौड़ी है .

 

 आम तौर पर माना जाता था कि भारतीय जनता पार्टी   शहरी  मध्यवर्ग की पार्टी है लेकिन अब ऐसा नहीं है . अब सभी वर्गों के लोग भारतीय जनता पार्टी   के साथ नज़र आने लगे हैं. 2019 के चुनावों में एक बात बार बार उभर का सामने आ रही थी कि उत्तर भारत के सभी इलाकों में लोग ओबीसी वर्ग की  जातियों में नरेंद्र मोदी की पहचान उनके अपने नेता के रूप  में हो रही थी. ग्रामीण इलाकों में  रसोई गैस , बिजली और सरकारी खर्च पर बने शौचालयों के कारण सभी जातियों के लोगों में उनकी लोकप्रियता बढ़ी थी .आज नरेंद्र मोदी को सभी वर्गों का समर्थन है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी   को उन्होंने उसी मुकाम पर पंहुचा दिया है जहां कभी कांग्रेस हुआ करती थी. आज लगभग पूरे भारत में बीजेपी या तो सत्ता में है या विपक्ष की मज़बूत पार्टी है .

पिछले एक साल में हुए कई राज्यों के चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी  ने  गुजरात जैसा तो नहीं लेकिन अच्छा प्रदर्शन किया है . बिहार  विधानसभा चुनाव में  अब तक भारतीय जनता पार्टी   नीतीश कुमार की सहयोगी पार्टी के रूप में चुनाव लडती थी.. इस बार भी वही हुआ  लेकिन इस बार.  भारतीय जनता पार्टी   को नीतीश कुमार की जे डी यू से ज्यादा सीटें मिलीं   . पिछले साल कई अन्य राज्यों में उपचुनाव भी हुए . 11 राज्यों में हुए  58 सीटो के  उप-चुनाव में भाजपा को 40 सीटो पर जीत हासिल  हुई जिसमें एक तो गुजरात ही है जहां  उसका स्ट्राइक रेट शत प्रतिशत रहा .  मध्य प्रदेश में 28 में 19 उत्तर  प्रदेश में 7 में 6 मणिपुर में 5 में से 4 ,कर्नाटक में और  तेलंगाना की सभी सीटों के उपचुनाव  भारतीय जनता पार्टी   के नाम रहे . इसके अलावा  लद्दाख ऑटोनोमस  डेवलपमेंट काउन्सिल और

 ग्रेटर हैदराबाद  म्युनिसिपल  भी भारतीय जनता पार्टी   को खासी सफलता मिली .

 इन चुनावों में बहुत  सारे चुनाव दिल्ली के पास हो रहे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के आन्दोलन के शुरू होने के बाद हुए हैं . आन्दोलन में शामिल किसानों ने   बार बार यह बात दुहराई  है कि वे खेती में नीतिगत हस्तक्षेप वाले तीन कानूनों के वापस होने तक आन्दोलन को जारी रखेंगे. शुरू में ऐसा संकेत दिया जा रहा था कि किसान आन्दोलन को ग्रामीण जनता का बड़ा समर्थन हासिल है .आम तौर पर आन्दोलन के बाद होने वाले चुनाव के नतीजे इस बात का संकेत देते हैं कि किस पार्टी की क्या हैसियत है . अगर आन्दोलन सफल रहा तो उसके बाद होने वाले चुनावों में  सत्ताधारी पार्टी को हार का सामना करना पड़ता है लेकिन अगर सत्ताधारी पार्टी को सफलता मिलती है तो माना जाता है कि आन्दोलन  की लोकप्रियता उतनी नहीं है जितनी कि बताई जा रही है. मौजूदा किसान आन्दोलन की भी यही स्थति है .  पंजाब में  नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे में तो बीजेपी का नुकसान हुआ लेकिन पंजाब वैसे भी बीजेपी स्टेट नहीं है . वहां वह अकाली दल की सहयोगी पार्टी रही है . अब अकाली दल अलग है, किसानों के मुद्दे पर ही अकाली दल ने बीजेपी का साथ छोड़ा था लेकिन उसको भी कोई ख़ास सफलता नहीं मिली .

गुजरात के ग्रामीण इलाकों में हुए चुनावों और उसमें सत्ताधारी पार्टी को मिली सफलता की रोशनी में नई कृषि नीति के खिलाफ आन्दोलन कर रहे किसानों को ज़रूरी सबक लेना चाहिए और वह सबक यह है कि  तीनों कानूनों को वापस लेने की जिद छोड़कर  किसानों के फायदे वाले प्रावधानों की बात  करें . सबको मालूम है कि कृषि क़ानून में बदलाव ज़रूरी है ,क्योंकि 1965-66  की हरित क्रान्ति के नीतिगत हस्तक्षेप के बाद कोई भी बड़ा बदलाव  नहीं किया गया है .  कांग्रेस को जानना चाहिए कि 1991 में जब डॉ मनमोहन सिंह ने देश के आर्थिक विकास के लिए जो  फार्मूला तय किया था ,मौजूदा  क़ानून उसी बात को आगे बढाने की कोशिश है . किसानों को चाहिए कि दीवाल पर लिखी इबारत को भांप लें और मान लें कि नई कृषि नीति के बाद भारतीय  जनता पार्टी और नरेद्र मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ में वृद्धि हुयी है और किसान आन्दोलन के नेताओं को सरकार के साथ मिल बैठकर आन्दोलन को वापस लेने की कोशिश करनी चाहिए .

मेरा गाँव ,मेरा देस

 


यह  गाँव सुल्तानपुर जिले के लम्भुआ ब्लाक में  है. गाँव पंहुचने के लिए जिला मुख्यालय से करीब २२ किलोमीटर सुलतानपुर जौनपुर रोड पर चलने के बाद धोपाप रोड पर बाएं मुड़ना पड़ता है . लम्भुआ  से तीन किलोमीटर दूरी पर यह गाँव स्थित है . मेरा गाँव शोभीपुर अपेक्षाकृत नया गाँव है . यह मामपुर नाम की गाँव सभा का हिस्सा है .माम्पुर गाँव सभा में चार हिस्से हैं . झलिया ,पुरवा ,माम्पुर और शोभीपुर .मामपुर  सरयूपारीण ब्राह्मणों का गाँव है जो पुरवा और मामपुर में बसे हुए हैं. शायद उनका कोई पूर्वज  देवरिया से प्रयाग की यात्रा के दौरान यहीं बस गया होगा . हन्या तिवारी हैं यह लोग . इनके रिश्तेदार कुछ पाण्डेय ,दूबे और मिश्र  भी अब गाँव में बस गए हैं . झलिया में मूल रूप से गौतम ठाकुरों का निवास है . यह लोग  भी पड़ोस के मकसूदन गांव से जुड़े हुए लोग हैं . मकसूदन में गौतम ठाकुरों की बड़ी आबादी है जो डेरवा, बगिया और झलिया में  फैली हुई है . यही झलिया सरकारी  कागज़ात में मामपुर का हिस्सा बन गया  है . गौतम लोग मकसूदन के राजकुमार ज़मींदारों के रिश्तेदार थे . उनको पूर्वजों से सम्मान से लाकर यहाँ बसाया था . शोभीपुर में करीब १२० साल पहले मकसूदन के ज़मींदारों की एक पट्टी के लोगों ने घर बना लिया था . मकसूदन के १८६१ के ज़मींदार बाबू दुनियापति सिंह के चार बेटों में से एक की औलादों ने शोभीपुर में घर बना लिया था . उसके पहले उनके साथ कुछ परजा पवन भी आ गए थे . इसलिए कुम्हार ,कहार, नाई भी गाँव में हैं . बस यही गाँव था . कुछ साल बाद पड़ोस के गाँव नरिन्दापुर से परिहार ठाकुरों के एक परिवार को गाँव के बाबू साहेब ने गाँव निकाला दे दिया था . शोभीपुर वालों ने उनको रोक लिया और कुछ ज़मीन उनके हवाले करके यहीं बसा दिया . इन्हीं पर्हारों के रिश्तेदार कुछ चौहान ठाकुर भी आ गए . राजकुमारों के रिश्तेदार बैस भी आ गए . मकसूदन के गौतम ठाकरों का एक हिस्सा भी इस गाँव में है. एक परिवार  नाऊ और एक परिवार दलित बिरादरी का भी है . मुस्लिम फकीरों का भी एक परिवार है  जो गाँव से थोड़ी दूरी पर बसा हुआ है . भुडकुल्ली साईं की औलादें हैं सब लेकिन अब कई परिवार बन गए हैं .

गाँव में पुरानी सोच हावी रही  है .  पढाई लिखाई के कोई ख़ास परम्परा नहीं रही  है . झलिया के कुछ लोग  आज से करीब सत्तर साल पहले मुम्बई गए थे . वहां छोटे मोटे काम ही करते रहे . मजदूर रहे या किसी कपडे की मिल में कुछ काम किया . झलिया के लिए लगभग हर घर से लोग मुम्बई में हैं . मामपुर के लोग भी हैं. लेकिन ऐसा कोई  नहीं है जिसको खोली के आसपास के बाहर कोई जानता हो . पुरवा के एक पाण्डेय जी मुंबई में  पुरोहिती का काम करते हैं. उनकी पैठ कई उद्योगपति परिवारों में भी है.  शोभीपुर से पहली बार मुम्बई ठाकुर रामसुख सिंह गए थे. कल्याण के नैशनल रेयान  कारपोरेशन  में उनको काम मिल गया था. उन्हीं के हवाले से उनके परिवार के लोग भी गए . सभी छोटे मोटे काम करते हैं . मूलत कल्याण  के आसपास ही रहते हैं. इन लोगों के बच्चों ने ठीक ठाक पढाई कर ली है . कुछ वकील हैं , कुछ डाक्टर हैं ,कुछ ने अपना कारोबार कर लिया है . २००२ में गाँव के एक लड़के ने आई आई एम से एम बी ए करने के बाद मुंबई में एक विदेशी बैंक में मैनेजर की नौकरी कर ली थी अब वह एक अमरीकी बैंक का प्रेसीडेंट है .उसकी पत्नी पहले बीबीसी में थीं अब मुंबई के प्रतिष्ठित एस पी जैन  इंस्टीटयूट ऑफ़ मैनेजमेंट एंड रिसर्च में प्रोफ़ेसर है .

मामपुर ग्रामसभा में कोई मंदिर नहीं है . शोभीपुर में एक नीम के पेड़ में विराजमान काली माई ही गाँव की सामूहिक आस्था का केंद्र हैं . चारों ही गाँवों में  काली माई हैं . कुछ पीपल के पेड़ों में शंकर जी का स्थान मान लिया गया है . मंदिर तो गाँव से  करीब पांच किलोमीटर दूर गोमती के किनारे धोपाप में था मकसूदन में भी एक हनुमान जी का मंदिर था ,नरेंदापुर में भी एक मंदिर था जिसमें वहां के बाबू साहेब ने एक पुजारी रख दिया था जिसको वे कुछ तनखाह देते थे और वह सुबह शाम वहां पूजा कर देता था .धोपाप के मंदिर में तो जेठ के दशहरा और  कार्तिक की पूर्णिमा जैसे अवसरों पर भारी भीड़ होती थी लेकिन ज़्यादातर लोग गोमती में स्नान करके अपने घर चले जाते थे. मंदिर में जाने वालों की संख्या बहुत कम होती थी .दर असल इलाके में लोग मंदिरों में जाकर पूजा पाठ नहीं करतेवहां केवल दर्शन करते हैं और अयोध्याबिजेथुआजनवारी नाथ जैसे मंदिरों में जाकर चढ़ावा चढाते हैं ,जहां वहां के मुक़ामी पंडित जी खुली तोंद के साथ विद्यमान रहते हैं और पूजा कर रहे होते हैं .

तीन चार साल पहले गाँव में सड़क की ज़मीन पर अपने घर के सामने एक बाबू साहब ने एक बहुत ही छोटा मंदिर बनवा दिया है लेकिन उसमें भी ताला बंद रहता है .  चर्चा है कि गाँव के बीच में जाने वाली प्रयागराज-अकबरपुर का  चौडीकरण होना है और गाँव में जिन लोगों ने सड़क की ज़मीन पर अपनी दीवारें बनवा रखी हैं,उसी से बचने के लिए यह मंदिर बनवाया गया है. पूरी ग्रामसभा में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल है जो १९६२ में खुला था. एक उद्यमी ने एक नर्सरी स्कूल भी खोल दिया है . गाँव मुख्य मार्ग पर है इसलिए वहां यातायात की सुविधा है .करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित लम्भुआ बाज़ार अब नागर पंचायत बन गया है . तहसील ,ब्लाक आदि सरकारी दफतर सब वहीं हैं . गाँव में सरकार के नाम पर बस प्राइमरी स्कूल ही है .

गाँव में खेती ही आजीविका का साधन है लेकिन कोई भी खेती नहीं करना चाहता . चीन से लड़ाई के बाद साठ के  दशक में गाँव से तीन चार लोग फ़ौज में भर्ती हो गए थे . उनमें से एकाध कोई नायब सूबेदार तक पंहुचकर रिटायर हुआ . उसके पहले चीन की लड़ाई में भी गाँव के एक व्यक्ति शामिल हुए थे लेकिन वी आर एस लेकर आ गए . गाँव के सबसे पुराने फौजी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो भर्ती शुरू हुई उसमें भी  फ़ौज में  गए थे  . गाँव में सबसे पहले उच्च शिक्षा पाने वालों में डॉ श्रीराज सिंह हैं . उन्होंने १९५५ में बी एच यू से बी एस-सी कर लिया था . बाद में पी एच डी तक की पढाई की और पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में रीडर पद से रिटायर हुए . अब वे ९० साल के हैं और गाँव में सबसे अधिक उम्र के वे ही हैं . गाँव में उनका शानदार घर है लेकिन वे  शहर में सुलतानपुर में घर बनवाकर रहते हैं .बहुत सारे जूनियर इंजीनियर ( जे ई ) गाँव में हैं. सरकारी विभागों में जे ई को  तनख्वाह के अलावा जो गिजा मिलती है उसके  कारण उन जे ई लोगों के परिवार में सम्पन्नता भी है . सरकारी नौकरी का मोह गाँव में बहुत प्रबल है इसलिए आर पी ऍफ़ में कुछ सिपाही भी भर्ती हो गए हैं . एकाध लड़के सब इंस्पेक्टर भी हैं.  गाँव की एक लडकी विश्व बैंक में भी काम कर चुकी है . विदेश में तो कोई नहीं बसा है एक परिवार ऐसा है जिसका विदेशों में आना जाना लगा रहता है . जो अमरीकी बैंक में प्रेसीडेंट हैं उनकी बहन आई आई एम बंगलौर में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर है.  उनके ही परिवार का एक लड़का पिछले साल इलाहाबाद  के  ग्रामीण इंजीनियरिंग कालेज से बी ई करने के बाद सहायक इंजीनियर बना है . उनके यहाँ कभी हलवाही करने वाले दलित पारिवार का एक लड़का भी उनके साथ ही पढाई करके सहायक इंजीनियर बना है. इसको सामाजिक तरक्की का एक बड़ा उदहारण माना जा सकता है  

 

गाँव में कोई हाट  बाज़ार या मेला नहीं लगता . पड़ोस के गाँव  रामपुर के चौराहे पर कुछ लोगों ने दूकान खोल ली थी ,अब वहीं एक बाज़ार  विकसित होता नज़र आ रहा है . इस गाँव में  सरकार में उच्च पद पर कोई नहीं है . मुंबई आदि शहरों में जो लोग गए हैं उनमें उद्योगपति कोई नहीं है. सब मेहनत मजूरी करके ही पेट पाल रहे हैं. गाँव  में गरीबी सबसे बड़ी समस्या है . कोरोना के दौर में इस गाँव में एक आदमी मुंबई से आया था लेकिन कोरोना का कोई भी असर गाँव पर नहीं पड़ा

नई कृषिनीति को पूरी तरह से खारिज़ करने की मांग का विरोध होना चाहिए .


शेष नारायण सिंह

 

 

नई कृषिनीति के लिए केंद्र सरकार की तरफ से लाये गए कानूनों के बाद पंजाब सहित देश के कई हिस्सों में किसानों की अगुवाई में विरोध हो रहा है  जिसको किसान आंदोलन का नाम दिया गया है . दिल्ली  राज्य के तीन प्रवेश द्वारों पर किसानों ने अपने खेमे लगा दिए हैं . किसान आन्दोलन शुरू होने के बाद जब पहली बार कोई राजनीतिक चुनाव हुआ तो साफ़ समझ में आ गया कि किसानों का आन्दोलन बीजेपी को राजनीतिक नुकसान पंहुचा सकता  है .  पंजाब में  नगर पंचायतों के चुनाव के नतीजे आये वे केंद्र की बीजेपी सरकार के लिए  बुरी खबर के रूप में आये. हालांकि यह भी सच है कि जहां बीजेपी के खिलाफ खडी पार्टी का   मुकामी नेता मज़बूत है ,वहां बीजेपी को नुक्सान होता  है लेकिन अगर विपक्ष लुंजपुंज है तो  बीजेपी का कुछ नहीं बिगड़ेगा . पंजाब के बाद ही गुजरात में बड़े नगर निगमों के चुनाव हुए जहां बीजेपी को भारी फ़ायदा हुआ. यह नतीजे यह भी ऐलान कर रहे हैं कि अगर विपक्ष में कोई मज़बूत पार्टी या नेता खड़ा  होगा तो बीजेपी के खिलाफ जनता वोट देने के लिए तैयार हो  जायेगी . कांग्रेस पार्टी  की पंजाब में सरकार है और   पिछले चार साल से अमरिंदर सिंह की  सरकार ने बहुत सारे ऐसे काम किये  हैं जिनके कारण उनका विरोध भी है लेकिन नगर  पंचायतों के चुनाव के नतीजे बताते हैं कि अकाली दल और बीजेपी से नाराज़ लोगों ने टूट कर  कांग्रेस को  समर्थन दिया है .  कांग्रेस का लगभग सभी नगर पंचायतों पर क़ब्ज़ा हो गया है . इन नतीजों से बीजेपी की उन उम्मीदों को झटका लगा है जिसके तहत  उसके नेता सोच रहे थे कि यह चुनाव मूल  रूप से शहरी इलाकों में हुए हैं . कृषि कानूनों का विरोध करने वाले  ज्यादातर किसान गाँवों में रहते हैं.  बीजेपी वाले सोच रहे थे कि शहरी इलाकों में अगर अच्छा समर्थन मिल गया तो किसान आन्दोलन को अलोकप्रिय बताने में मदद मिलेगी ज्यादातर  विरोध प्रदर्शन जारी है .

बंगाल में भी बीजेपी को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ा है . वहां इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. सबको मालूम  है कि नंदीग्राम में किसानों की समस्याओं को मुद्दा बना कर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने २०११ का चुनाव लड़ा था और दशकों से जमी हुई वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंका था. उस आन्दोलन का प्रमुख नौजवान चेहरा था  शुवेंदु  अधिकारी . शुवेंदु को बाद में ममता बनर्जी ने मंत्री बनाया . उनके पूरे परिवार को राजनीति से जो भी लाभ संभव  है मिलता रहा लेकिन बीजेपी ने उनको तोड़ लिया . कोशिश यह थी कि किसानों के नेता के रूप में बनी उनकी छवि का लाभ लिया जाएगा .बहुत ही बाजे गाजे के साथ उनको बीजेपी में  भर्ती  किया गया . लेकिन जब किसान आन्दोलन से उपजी नाराज़गी की आंच बंगाल में भी दिखने लगी तो पार्टी ने चुनावी रणनीति में बदलाव किया . अब मुस्लिम नेता ,असदुद्दीन ओवैसी को मैदान में  आ गए हैं .बीजेपी के सभी  नेता अपने भाषणों में ममता सरकारी की तुष्टीकरण  की नीति की आलोचना कर रहे हैंजय श्रीराम के नारे लगा रहे हैं और ममता को हिंदुत्व की पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर रहे हैं .

 बीजेपी को  नई कृषि नीति की  वजह से चुनावी नुक्सान हो रहा है . यह भी संभव है कि राजनीतिक नुक्सान का आकलन  करने के बाद  बीजेपी और उनकी सरकार किसानों की मांग को मान भी ले और तीनों क़ानून  वापस ले ले लेकिन लेकिन वह देश के लिए ठीक नहीं होगा . आन्दोलन का असर गावों में किसानों की नाराजगी के रूप में साफ नज़र आ रहा है . बीजेपी को अगर इस बात का सही अंदाजा लग गया तो  खेती के औद्योगीकरण और पूंजीवादीकरण पर रोक लग जायेगी  और किसानी उसी हरित क्रान्ति के दौर में बनी रह जायेगी . पूंजीवादी आर्थिक विकास की दिशा कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है लेकिन जब पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था  उसी ढर्रे पर जा रही हो तो खेती को उससे बाहर रखने से उन्हीं लोगों का नुक्सान होगा जो खेती पर ही  निर्भर हैं . यह भी सच है कि  जिस रूप में नए कानूनों को लाया  गया  है उसमें बहुत कमियाँ हैं . पूरा कानून वापस लेने की जिद पर अड़े किसानों को चाहिए कि उसमें जो खामियां हैं उनको दुरुस्त करने की बात करें और पूरे के पूरे कानून को वापस लेने की बात छोड़ दें . वरना डर यह है कि कहीं नई कृषि नीति का भी वही हाल न हो जाए जो  इंदिरा गांधी के पहले कार्यकाल में परिवार नियोजन का हुआ था . दो  बच्चों तक परिवार को सीमित रखने की योजना बहुत ही अच्छी थी. उसको लागू करने की तरकीब भी बहुत अच्छी थी . स्वैच्छिक नीति थीउत्साहित करने के लिए धन आदि की भी व्यवस्था  थी लेकिन  संजय गांधी ने जिस तरह से उसको लागू करने की योजना बनाई उससे  कांग्रेस की सरकार जनमानस में बहुत अलोकप्रिय हो गयी और नतीजा हुआ कि १९७७ में इंदिरा गांधी चुनाव हार गयीं . उनकी हार में परिवार नियोजन की नीति को आक्रामक तरीके से  लागू करने की बात भी थी .उसी का नतीजा है कि बाद की किसी सरकार ने परिवार नियोजन को ठीक से लागू करके राजनीतिक हानि झेलने का जोखिम नहीं लिया और आज देश की आबादी  सवा सौ करोड़ से ज़्यादा हो चुकी है . सभी संसाधनों पर भारी असर पड़ रहा है .

नई कृषि नीति लागू करने के लिए देश के सभी गुनी जन मिलकर बैठकर कृषि नीति में ज़रूरी सुधारों की बात करें . सरकार भी जिद छोड़कर कृषि नीति में जो किसान विरोधी धाराएं हैं उनको सही कर दे और किसान भी  सभी कानूनों को वापस लेने की जिद छोड़कर  किसानों के फायदे वाला कानून बनवाने की बात  करें . कृषि क़ानून में बदलाव ज़रूरी है ,क्योंकि हरित क्रान्ति के बाद कोई भी बड़ा बदलाव  नहीं किया गया है .  1991 में जब डॉ मनमोहन सिंह ने जवाहरलाल देश की अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी  विकास के रास्ते  पर डाला था तो उन्होंने कृषि में बड़े सुधारों की बात की थी .  मौजूदा  क़ानून उसी बात को आगे बढाने की कोशिश है लेकिन  उसमें बहुत सारी कमियाँ हैं . इसीलिये नए  कानून का विरोध हो रहा है . खेती को अगर विकास का औजार और ग्रामीण गरीबी को घटाने  के वाहक रूप में रखना है तो कृषि सुधारों के का पूरी तरह से विरोध नहीं किया जाना चाहिए . १९९१-९२  में जो होना चाहिए था अगर उसमें और देर की गयी तो ग्रामीण  क्षेत्रों में गरीबी और बढ़ेगी . डॉ मनमोहन सिंह ने गरीबों की रक्षा करने वाली कृषि नीति के आधार पर बात करते हुए खुले बाज़ार की सुविधा नहीं दी . खेती की पैदावार पर निर्यात के कंट्रोल लागू रहे उपज की आवाजाही पर भी सरकारी सख्ती थी. नतीजा यह हुआ कि खेती से प्रति एकड़ कम कीमत मिलती रही . किसान के  पास आमदनी  ही नहीं थी तो मजदूरी भी कम  रही. आज भारतीय खेती में खेत मजदूर की संख्या ,ज़मीन के मालिक से ज्यादा है . पंजाब और हरियाणा के अलावा बाकी देश में किसानों के पास बहुत कम  क्षेत्रफल की ज़मीन खेती लायक है . पंजाब सहित बाकी देश में ज़मीन के नीचे  पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है . धान और गेहूं की खेती में बहुत पानी लगता है . धान से निकलने वाले चावल का तो देश के बाहर भी बाज़ार है लेकिन गेहूं को निर्यात करना असंभव है .ऐसी खेती की ज़रूरत है जिससे जलस्तर का संतुलन भी बना रहे और खेती से प्रति एकड़ आर्थिक उपज भी ऐसी हो जिससे किसान के परिवार की देखभाल भी हो सके. साथ साथ औद्योगीकरण को भी  रफ्तार दी जाए जिससे खेती से बाहर निकलने वाले कामगारों को उद्योगों में खपाया जा सके .

सबसे ज़रूरी बात तो कम पानी  वाली खेती को देश की आदत बनाने की ज़रूरत है क्योंकि अगर ज्यादा पानी वाली गेहूं और धान जैसी फसलें ही पैदा की जाती रहीं तो देश में पानी की भारी कमी हो जायेगी . इजरायल में इसी तरह के प्रयोग किये गए और अब बहुत बड़े पैमाने पर सफलता मिल चुकी है . रेगिस्तान में महंगी निर्यात होने लायक फसल पैदा करके उन्होंने अपने यहाँ के ज़मीन मालिकों की संपन्नता को कई  गुना बढ़ा दिया है. कीनूनींबूखजूर और जैतून की खेती को बढ़ावा दिया गया जिसमें कम से कम पानी लगता है और सभी उत्पादन निर्यात किये जाते हैं . ज़रूरत इस बात की है एक एक बूँद पानी बचाया जाय और सीमित ज़मीन से ज़्यादा आर्थिक लाभ लिया जाए.  नई कृषि नीति को इस दिशा में जाना चाहिए था. एक  प्रसिद्ध कहावत है कि “ हमको ज़मीन अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिलती ,हम उसे अपने बच्चों से उधार लेते  हैं . “ यानी  हमें इस ज़मीन को उनके मालिकों तक उसी तरह से पंहुंचाना है जैसी हमको मिली थी . साफ़ मतलब है कि  ज़मीन का जलस्तर घटाए बिना खेती करने की ज़रूरत है . उसके लिए धान और गेहूं से खेती को हटाकर कम पानी वाली खेती करनी पड़ेगी . नए  कृषि क़ानून  में इस व्यवस्था को लागू करने की कोशिश की गयी है लेकिन कुछ कमियाँ हैं उनको ठीक किये जाने की ज़रूरत है . 

 

 

Wednesday, February 10, 2021

 हिमालय को तबाही बचाने को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए

 

शेष नारायण सिंह

 

हिमालय की छाती पर एक बार और मूंग दला गया . चमोली जिले में ग्लैसियर फटने से तबाही आयी. सबसे बड़ी तबाही का कारण एक बिजली परियोजना और उसके तथाकथित विकास के कारण आई है . हिमालय को उजाड़ने का  सारा काम विकास के लिए और विकास के नाम पर किया जा रहा है लेकिन उसके चक्कर में प्रकृति की सबसे बड़ी धरोहर,  हिमालय को ही तबाह किया जा  रहा है . हिमालय में आज  विकास के नाम पर अजीबोगरीब कारनामे हो रहे  हैं . दुर्भाग्य यह है कि सत्तर के  दशक में शासक वर्गों ने यह समझना शुरू कर दिया था कि हिमालय के क्षेत्र में भी विकास उसी तरह का किया जाना चाहिए जैसा कि मैदानी क्षेत्रों में सड़क बिजली पानी की व्यवस्था करके किया जाता है .  आज य्तक वही सोच जारी है . सत्ता पर बैठे लोगों को समझना चाहिए कि हिमालय हमारे विकास का प्रहरी है , रक्षक है . वह  जीवंत बना रहे ,यही बहुत बड़ी बात है . पूरे देश को चाहिए कि हिमालय में वैसा विकास न होने दें जैसा कि मैदानी इलाकों में होता है . हिमालय प्रेमी लोगों की एक बड़ी जमात यह मानती है कि हिमालय के कारण ही भारत के उत्तरी भाग में विकास होता  है . हिमालय से ही देश में नदियों की कई बड़ी श्रृंखलाएं चलती हैं. गंगा और यमुना  नदी का भारत के  आर्थिक , सांस्कृतिक ,राजनीतिक, सामरिक ,धार्मिक और साहित्यिक विकास में योगदान अद्वितीय है . ज़रूरत इस बात की है कि हिमालय को उसकी अपनी गति से , अपनी लय से भारत के रक्षक के रूप में बने रहने दिया जाए . लेकिन अजीब बात यह  है कि जो भी शासक होता है वह विकास के वही पैमाने अख्तियार करने लगता है जिसका विरोध लगातार करता रहा होता है .

 

हिमालय अपनी मौजूदगी से ही देश के बहुत बड़े भूभाग पर विकास की  धारा बहा रहा है लेकिन उसके अस्तित्व को ही खतरे में डालकर विकास की इबारत रखना बहुत बड़ी गलती होगी . अपने कालजयी महाकाव्य कुमारसंभव में महान कवि कालिदास ने पहला ही श्लोक हिमालय की महिमा में लिखा है . लिखते  हैं कि

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा ,हिमालयो नाम नगाधिराजः ।

पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्यस्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥

 

दुर्भाग्य की बात यह है कि आज इस देवतात्मा ,नगाधिराज और पृथ्वी के मानदंड को हम वह सम्मान नहीं दे पा रहे हैं जो उसे वास्तव में मिलना चाहिए .हिमालय को पृथ्वी की बहुत नई पर्वत श्रृंखला माना जाता है . भारत के लिए तो हिमालय जीवनदायी है . गंगा और यमुना समेत बहुत सारी नदियाँ हिमालय से निकलती हैं . प्रगति के नाम पर में समय समय पर सरकारें हिमालय को नुक्सान  पंहुचाती रहती हैं . केदारनाथ में  प्रकृति के क्रोध और तज्जनित विनाशलीला को दुनिया  ने देखा है . उसके पहले उत्तरकाशी में एक  भूकम्प के चलते पहाड़ के दुर्गम इलाक़ों से किसी तरह का संपर्क महीनों के लिए रुक गया था. समय समय पर हिमालय से प्रेम करने वाले और दुनिया भर के पर्यावरणविद  चिंता जताते रहते हैं लेकिन कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता . गंगा और हिमालय की रक्षा के लिए बहुत सारे महामना संतों ने अपने जीवन का  बलिदान भी किया है . लेकिन आजादी के बाद से ही हिमालय के दोहन की प्रक्रिया शुरू हो गयी है जो अभी तक जारी है . इस कड़ी में एक  ‘ विकास का प्रोजेक्ट ‘ चारधाम परियोजना है .कुछ वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया था कि सड़क यातयात और हाईवे मंत्रालय की चार धाम परियोजना  के कारण हिमालय के जंगलों और वन्यजीवन को भारी नुकसान हो रहा है . सुप्रीम कोर्ट ने सही जानकारी के लिए रवि चोपड़ा  की अगुवाई में  एक हाई पावर कमेटी नियुक्त की थी ..उसकी  कुछ रिपोर्टें आ चुकी हैं .कमेटी की राय में  उत्तराखंड में चल रही  चार धाम परियोजना के कारण हिमालय के पर्यावरण को भारी नुक्सान हो रहा है .जिसके दूरगामी परिणाम बहुत ही भयानक होंगे.  इस कमेटी ने  पर्यावरण मंत्रालय से तुरंत कार्रवाई करने की मांग की है .. कमेटी की रिपोर्ट किसी भी पर्यावरण  प्रेमी को चिंता  में  डाल देगी .  रवि चोपड़ा ने पर्यावरण  मंत्रालय को लिखा है कि वहां अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं ,पहाड़ को तोड़ा जा रहा है . बिना किसी सरकारी मंजूरी के जगह जगह खुदाई की   जा रही है और कहीं भी मलबा  फेंका जा रहा है .

चारधाम परियोजना के तहत उत्तराखंड राज्य के प्रमुख धार्मिक केन्द्रों को  सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए कई सौ किलोमीटर की सड़क तैयार करने की योजना है .  हिमालय के पर्यावरण को बिना कोई नुक्सान पंहुचाये इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन वहां  खूब मनमानी  हुई . उच्च अधिकार प्राप्त कमेटी ने आगाह किया था कि इस मनमानी को फौरन रोकना पडेगा . 2017 से ही   बिना अनुमति लिए पेड़ों की कटाई का सिलसिला जारी है .जब यह बात वहां के अखबारों में छप गयी  तो 2018 में तत्कालीन राज्य सरकार से बैक डेट में  अनुमति ली गयी . रिपोर्ट में लिखा  है कि  चारधाम   प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री की एक महत्वाकांक्षी और  महत्वपूर्ण योजना को लागू करने के लिए शुरू किया गया है . परियोजना के  ड्राफ्ट में बहुत साफ़ बता दिया गया है कि हिमालय के पर्यावरण को कोई नुक्सान नहीं पंहुचाया  जाएगा .लेकिन वहां  फारेस्ट एक्ट और एन जी टी एक्ट का सरासर उन्ल्लंघन करके अंधाधुंध विकास का तांडव जमकर हुआ . क़ानून और सरकारी आदेशों को तोडा मरोड़ा भी खूब गया . रक्षा मंत्रालय के सीमा सड़क संगठन ने 2002 और 2012 के बीच कोई आदेश दिया  था . उसी के सहारे बड़े पैमाने पर  पहाड़ों को तबाह किया जा रहा है जबकि उस आदेश में इस तरह की कोई बात  नहीं थी . राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के दिशानिर्देशों की भी कोई परवाह  नहीं की गयी . केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य राजाजी नैशनल पार्क और फूलों के घाटी नैशनल पार्क के इलाके में हिमालय को भारी नुक्सान पंहुचाया  जा रहा है .  सबको मालूम है कि हिमालय के पर्यावरण की रक्षा देश की सबसे बड़ी अदालत की हमेशा से ही प्राथमिकता रही है . लेकिन यह भी देखा गया है और चारधाम परियोजना में भी देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा को तोड़ मरोड़कर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले बिल्डर-ठेकेदार-नौकरशाह-नेता माफिया  कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं . ऐसी हालत में उत्तराखंड के आज के प्रभावशाली नेताओं को राजनीतिक पार्टियों की सीमा के बाहर  जाकर काम करना होगा. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावतसांसद अनिल बलूनी ,पूर्व मुख्यमंत्री  हरीश रावत जैसे नेताओं की अगुवाई में पहाड़ की राजनीतिक बिरादरी को आगे आना चाहिए और अपने संरक्षक हिमालय की रक्षा के लिए लेकिन ज़रूरी राजनीतिक प्रयास करना  चाहिए .

अगर राजनेता तय  कर ले तो उनकी  मर्जी के खिलाफ जाने की किसी भी माफिया  की हिम्मत नहीं पड़ती है .  हरीश रावत के कार्यकाल में हिमालय को कई बार नुक्सान हुआ  है लेकिन अब पानी सर के ऊपर जा रहा है . सत्ता और राजनीतिक पार्टी तो आती जाती रहेगी लेकिन अगर हिमालय को नुक्सान पंहुचाने का सिलसिला जारी रहा  तो आने वाली पीढ़ियां इन नेताओं को माफ़ नहीं करेंगी.

 

 हिमालय के चमोली  जिले में आया मौजूदा संकट भी  हिमालय को सम्मान  न देने के कारण ही आया है .लेकिन लगातार चल रही हिमालय के असम्मान की दिशा में वः एक कड़ी मात्र है . वहां भी अगर वह बिजली उत्पादन केंद्र न होता तो इतना ज्यादा नुक्सान न होता , जितना हुआ है . इसलिए ज़रूरी है कि  हिमालय से छेड़छाड़ फ़ौरन बंद की जाय. हिमालय को उसके मूल  स्वरूप में रहने दिया जाय. अपनी   नदियों, पेड़  पौधों ,पशुपक्षियों के साथ हिमालय एक देवतात्मा की तरह खड़ा रहे और देश की  निगहबानी करता रहे. हिमलाय के विकास के लिए ,वहां रहने वालों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अतिरिक्त धन की व्यवस्था करनी चाहिए , ज़रूरत पड़े तो हिमालय के नाम  पर अतितिक्त टैक्स लगाया जा सकता है और हिमलाय के गाँवों में रहने वालों को मैदानी विकास के लालच से मुक्त किया जा सकता है . पर्यावरण प्रबंधन के बहुत सारी संस्थान बनाये  जा सकते हैं और पूरी दुनिया में पर्यावरण  संरक्षण के हिमालयी विशेषज्ञ भेजे जा सकते हैं .  हमारे आई आई एम और आई आई टी के  स्नातकों ने दुनिया भर में  इंजीनियरिंग और प्रबंधन के क्षेत्र में जो मुकाम बनाया है वह काम हिमालय  के संस्थाओं से निकले पर्यावरणविद कर सकते हैं . नरेंद्र मोदी सख्त  फैसले लेने के लिए विख्यात हैं इसलिए मौजूदा दौर में यह संभव है कि हिमालय की रक्षा के लिए ऐसे  फैसले लिए जाएँ जिससे हिमालय की रक्षा की गारंटी हो सके. पूरे देश को इस बात के लिए तैयार होना पड़ेगा कि हिमालय की इंसानी आबादी को सब्सिडी देने की किसी भी सरकारी स्कीम का पूरी तरह से स्वागत  किया जाय.  उत्तराखंड की सरकार की ड्यूटी यह बना दी जाय कि वह हिमालय में इंसानी लालच से पैदा हुयी किसी प्रगति को घुसने न दें. वह केवल हिमालय की रक्षा करें. सरकार चलाने एक लिए केंद्र और गंगा नदी के क्षेत्र में आने वाले राज्य उनको आर्थिक योगदान करें . केंद्र सरकार में हिमालय के संरक्षण के लिए अलग मंत्रालय बनाया जाना चाहिए . पिछले कुछ वर्षों में देखा गया  है कि उत्तराखंड के सांसद अनिल बलूनी हिमालय के विकास के लिए समय समय पर पहल करते रहते हैं . उनको मेरे इन सुझावों को तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए सक्रिय होना चाहिए . हिमालय की रक्षा आज हमारे अस्तित्व से जुड़ गया है . किसी भी  इंसानी गलती को उसकी तबाही में शामिल होने से रोकना एक राष्ट्रीय  प्राथमिकता होनी चाहिए .

 

हिमालय को बचाना सभी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए

 

 

 

    

 

शेष नारायण सिंह

 

उत्तर दिशा में स्थित देवतात्मा हिमालय नाम के नगाधिराज पर प्रकृति का एक और आक्रोश फूटा है. ल  यह इंसान की गलत नीतियों का खामियाजा हिमालय को भोगना पड़ता है .नतीजतन  हिमालय पर प्रकृति का एक और कहर बरपा हो गया . उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ग्लेशियर फटने से ऋषि गंगा क्षेत्र में तबाही आयी है .  वहां के एक बिजली उत्पादन केंद्र पर मुख्य रूप से असर पड़ा है . अपने देश में बिजली के उत्पादन को  विकास से जोड़ा जाता है .अपने देश में नेताओं ने और पूंजी के बल पर राज करने वाले लोगों के एक वर्ग ने विकास की अजीब परिभाषा प्रचलित कर दी है . ग्रामीण इलाकों को शहर जैसा बना देना विकास माना जाता है . इकनामिक फ्रीडम के  बड़े चिन्तक डॉ मनमोहन सिंह और बीजेपी, कांग्रेस और शासक वर्गों की अन्य  पार्टियों में मौजूद उनके ताक़तवर चेले पूंजीपति वर्ग की आर्थिक तरक्की के लिए कुछ भी तबाह कर देने पर आमादा हैं . इसी चक्कर में अब  उत्तराखंड के पहाड़ तबाही की ज़द में हैं .इस बार की चमोली की घटना  में लगातार गर्म होते जा रहे  पर्यावरण का भी योगदान है . विश्व  के नेता क्लाइमेट चेंज को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति ,डोनाल्ड ट्रंप जैसे गैरजिम्मेदार नेता तो पेरिस समझौते से अमरीका को बाहर ले गए थे . यह तो गनीमत है कि नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने फिर से अमरीका को पेरिस वार्ता से जोड़ दिया है. क्लाइमेट चेंज का खामियाजा दुनिया भर को झेलना पड़ेगा .भारत ने चमोली में झेल लिया . सफलता के लिए इस दिशा में दुनिया भर के देशों के साथ मिलकर चलना पडेगा . भारत अकेले कुछ नहीं कर सकता . लेकिन अकेले यह तो किया ही जा सकता है कि अपने हिमालय को बचाने के लिए जो ज़रूरी उपाय हों और अपने बस में हिन्, वे किये जाएँ.अब हिमालय को निजी और पूंजीपति वर्ग के स्वार्थों और मैदानी तर्ज के विकास की सोच के कारण इतना कमज़ोर कर दिया गया है कि वह बारिश को भी संभाल नहीं पाता, ग्लेशियर फटने की बात तो अलग है .  आज उत्तराखंड ,खासकर गढ़वाल क्षेत्र में हिमालय नकली तरीके के विकास की साज़िश का शिकार हो चुका है और वह प्रकृति के मामूली  गुस्से को भी नहीं झेल पा रहा है .

 

हिमालय के प्रति अपमान का आलम यह है कि गंगा  नदी को उसके उद्गम के पास ही बांध दिया गया है . बड़े बाँध बन गए हैं और भारत की संस्कृति से जुडी यह नदी  कई जगह पर अपने रास्ते से हटाकर सुरंगों के ज़रिये बहने को मजबूर कर दी गयी है .. पहाडों को खोखला करने का सिलसिला टिहरी बाँध की परिकल्पना के साथ शुरू हुआ  था. 1974 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे ,हेमवती नंदन बहुगुणा ने सपना देखा था कि प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई के बाद जो जीत मिलेगी वह पहाड़ों को भी उतना ही संपन्न बना देगी जितना मैदानी इलाकों के शहर हैं .उनका कहना था कि पहाड़ों पर बाँध बनाकर देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा की जायेगी .इसी सोच के चलते  गंगा को घेरने की योजना बनाई गयी थी . ऐसा लगता है कि हिमालय के पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा को यह बिलकुल अंदाज़ नहीं रहा होगा कि वे किस तरह की तबाही को अपने हिमालय में न्योता दे रहे हैं .पहाड़ों से बिजली पैदा करके संपन्न  होने की दीवानगी के चलते ही  उत्तरकाशी और गंगोत्री के 125 किलोमीटर  इलाके में पांच बड़ी बिजली परियोजनायें है. जिसके कारण गंगा को अपना  रास्ता छोड़ना पड़ा .इस इलाके में बिजली की परियोजनाएं एक दूसरे से लगी हुई हैं .. एक परियोजना जहां  खत्म होती है वहां से दूसरी  शुरू हो जाती है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 प्रजातियों को आश्रय देती है. इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें मिलने वाले पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. जानकार कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी.. इसके बावजूद सरकारें  बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देने पर आमादा रहती हैं ..

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 भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. लेकिन वहीं पर रहने वाले बहुत से नामी साहित्यकार और बुद्धिजीवी इस अनुचित  विकास की बात भी करने लगे  हैं . उसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे  जिन्होंने पहले बड़े बांधों के नुक्सान से लोगों को आगाह भी किया था लेकिन बाद में पता नहीं किस लालच में वे सत्ता के पक्षधर बन  गए. ऐसा भी नहीं है कि हिमालय और गंगा के साथ हो रहे अन्याय से लोगों ने आगाह नहीं किया था. पर्यावरणविद, आज के बीस साल पहले सुनीता नारायण, मेधा पाटकर , आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल और बहुत सारे हिमालय प्रेमियों ने इसका विरोध किया . बहुत सारी  पत्रिकाओं ने बाकायदा अभियान चलाया लेकिन सरकारी तंत्र ने कुछ नहीं सुना. सरकार ने जो सबसे बड़ी कृपा की थी वह यह कि प्रोफ़ेसर अग्रवाल का अनशन तुडवाने के लिए उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री  भुवन चंद्र खंडूड़ी दो परियोजनाओं को अस्थाई रूप से रोकने पर सहमत जता दी थी लेकिन बाद में फिर उन परियोजनाओं पर उसी अंधी गति से काम शुरू हो गया. सबसे तकलीफ की बात यह है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही करीब 700 बांधों  को हटाया जा चुका है

 

सेंटर फार साइंस एंड इन्वायरमेंट ने एक रिपोर्ट जारी करके कहा  था  कि २५ मेगावाट से कम की जिन छोटी पनबिजली परियोजनाओं को सरकार बढ़ावा दे रही है उनसे भी पर्यावरण को बहुत नुक्सान हो रहा  है . इस तरह की देश में हज़ारों परियोजनाएं हैं .उत्तराखंड में भी इस तरह की थोक में परियोजनाएं  हैं  जिनके कारण भी बर्बादी आयी है. उत्तराखंड में करीब 1700  छोटी पनबिजली परियोजनाएं हैं . भागीरथी और अलकनंदा के बेसिन में  करीब 70  छोटी पनबिजली स्कीमों को लगाया गया है . जो  हिमालय को अंदर से कमज़ोर कर रही  हैं. इन योजनाओं के चक्कर में  नदियों के सत्तर फीसदी हिस्से को नुक्सान पंहुचा  है .इन योजनाओं को बनाने में जंगलों की भारी  क्षति हुई है . सड़क, बिजली के खंभे आदि बनाने के लिए हिमालय में भारी तोड़फोड़ की गयी है और अभी भी जारी है.मौजूदा कहर इसी गैरजिम्मेदार सोच का नतीजा है .

 

अगर राजनेता तय  कर ले तो उनकी  मर्जी के खिलाफ जाने की किसी भी माफिया  की हिम्मत नहीं पड़ती है .  लेकिन नेताओं ने  सही सलाह न सुनने का निश्चय कर लिया है . तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में हिमालय को कई बार नुक्सान हुआ  है . उसके बाद से अब तक यह सिलसिला चला आ रहा है. अब तो  पानी सर के ऊपर जा रहा है . सत्ता और राजनीतिक पार्टी तो आती जाती रहेगी लेकिन अगर हिमालय को नुक्सान पंहुचाने का सिलसिला जारी रहा  तो आने वाली इन लोगों को पीढ़ियां माफ़ नहीं करेंगी. सरकार को चाहिए कि हिमालय के विकास की अपनी मैदानी कल्पनाओं से दूर रहे. सरकारी अदूरदृष्टि का एक  नमूना यह है कि सत्तर के दशक में जब बहुगुणा जी  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उनकी चापलूसी करने के चक्कर में गढ़वाल और कुमाऊं के लिए लखनऊ में बैठे आला अफसरों ने जुताई के लिए ट्रैक्टरों पर भारी सब्सिडी की स्कीम शुरू कर दी थी. जब  कुछ लोगों ने बहुगुणा जी को बताया तो उन्होंने इस योजना को तुरंत रोकने का आदेश दिया . उन्होंने अफसरों को समझाया कि पहाड़ में खेती वाली ज़मीन नाली या सीढीनुमा होती है इसलिए वहां ट्रैक्टर का कोई इस्तेमाल नहीं है .  पहाड़ पर बिजली उत्पादन और ऋषिकेश से रूद्र प्रयाग तक बने  दिल्ली और मुंबई के रईसों के आलीशान बंगले भी जलेबीनुमा दिमागी सोच का नतीजा है .उन  बंगलों से भी हिमालय का भारी नुक्सान हो रहा है .

 

आज जो चमोली में हुआ है वही  2013 में  केदारनाथ में हुआ था . उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हिमालय की इकोलाजी से खिलवाड़ करने वाली नीतियों को  रोकने की सलाह दी गयी थी .वे उन दिनों कांग्रेस में थे . जून 2013 की बाढ़ को ठीक से संभाल नहीं  पाए थे . उनकी चौतरफा आलोचना हुयी थी . उसी सिलसिले में उनको मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पड़ा था .वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और केदारनाथ में फंसे हुए गुजरातियों को बचाने के लिए उन्होंने गुजरात सरकार को सक्रिय कर दिया था .  नरेंद्र मोदी ने विजय बहुगुणा और मनमोहन सिंह सरकार की केदारनाथ की बाढ़ के कुप्रबंध को लेकर सख्त आलोचना की थी. आज उनकी सरकार केंद्र में भी है और राज्य में भी  . उम्मीद की जानी चाहिए कि विजय बहुगुणा वाली गलतियां आने वाले समय में कोई भी सरकार न करने पाए .केंद्र सरकार को विकास के  लिए अन्य जगहों से अलग तरह की नीतियों को हिमालय में लागू करना चाहिए . हिमालय के क्षेत्र में आने वाले सभी राज्यों की सरकारों को शामिल करके केंद्र सरकार एक ज़रूरी  नीति की घोषणा कर सकती है .

 

 

Friday, February 5, 2021

नई कृषि नीति के बारे में मेरे विचार



 कबिरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.

कल ( 5 फरवरी ) पहली बार टीवी डिबेट में किसान आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए दिल्ली के गाजीपुर बार्डर के यू पी गेट पर गया. डिबेट वहीं किसानों के बीच होनी थी.
मुझे खुशी है कि मैंने वह सब बातें खुलकर कहीं जिनको मैं सच मानता हूं. स्टूडियो में तो कई बार बहस में शामिल हो चुका हूँ लेकिन ज़मीनी बहस का यह पहला मौक़ा था.

मैंने कहा कि सरकारी नीतियों के स्तर पर नीतिगत हस्तक्षेप की ज़रुरत बहुत दिनों से ओवरड्यू है . यह काम सरकार को कई साल कर लेना था. तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने अपने 1992 के आद्योगीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम में इसका संकेत दिया था .लेकिन गठबंधनों की सरकारों के चलते कोई नहीं सरकार यह काम नहीं कर सकी.

आज़ादी के बाद देश में करीब बीस साल तक खेती में कोई भी सुधार नहीं किया गया . १९६२ में चीन के हमले के समय पहले से ही कमज़ोर अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर खडी थी तो पाकिस्तान का भी हमला हो गया . खाने के अनाज की भारी कमी थी . उस समय के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने कृषिमंत्री सी सुब्रमण्यम से कुछ करने को कहा . सी सुब्रमण्यम ने डॉ एस स्वामीनाथन के सहयोग से मेक्सिको में बौने किस्म के धान और गेहूं के ज़रिये खेती में क्रांतिकारी बदलाव ला चुके डॉ नार्मन बोरलाग ( Dr Norman Borlaug ) को भारत आमंत्रित किया . उन्होंने पंजाब की खेती को देखा और कहा कि इन खेतों में गेहूं की उपज को दुगुना किया जा सकता है . लेकिन कोई भी किसान उनके प्रस्तावों को लागू करने को तैयार नहीं था . कृषि मंत्री सी सुब्रमण्यम ने गारंटी दी कि आप इस योजना को लागू कीजिये ,केंद्र सरकार सब्सिडी के ज़रिये किसी तरह का घाटा नहीं होने देगी. शुरू में शायद डेढ़ सौ फार्मों पर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के सहयोग से यह स्कीम लागू की गयी. और ग्रीन रिवोल्यूशन की शुरुआत हो गयी. पैदावार दुगुने से भी ज़्यादा हुई और पूरे पंजाब और हरियाणा के किसान इस स्कीम में शामिल हो गए . ग्रीन रिवोल्यूशन के केवल तीन तत्व थे . उन्नत बीज, सिंचाई की गारंटी और रासायनिक खाद का सही उपयोग . उसके बाद तो पूरे देश से किसान लुधियाना की तीर्थयात्रा पर यह देखने जाने लगे कि पंजाब में क्या हो रहा है कि पैदावार दुगुनी हो रही है . बाकी देश में भी किसानों ने वही किया .उसके बाद से खेती की दिशा में सरकार ने कोई पहल नहीं की है .आज पचास साल से भी ज़्यादा वर्षों के बाद खेती की दिशा में ज़रूरी पहल की गयी है .मोदी सरकार की मौजूदा पहल में भी खेती में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता है .


1991 में जब डॉ मनमोहन सिंह ने जवाहरलाल नेहरू के सोशलिस्टिक पैटर्न के आर्थिक विकास को अलविदा कहकर देश की अर्थव्यवस्था को मुक़म्मल पूंजीवादी विकास के ढर्रे पर डाला था तो उन्होंने कृषि में भी बड़े सुधारों की बात की थी . लेकिन कर नहीं पाए क्योंकि गठबंधन की सरकारों की अपनी मजबूरियां होती हैं . अब नरेंद्र मोदी ने खेती में जिन ढांचागत सुधारों की बात की है डॉ मनमोहन सिंह वही सुधार लाना चाहते थे लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण नहीं ला सके. मोदी सरकार ने उन सुधारों का कांग्रेस भी विरोध कर रही है , किसानों का एक वर्ग भी विरोध कर रहा है . वह राजनीति है लेकिन कृषि सुधारों के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को समझना ज़रूरी है . सरकार ने जो कृषि नीति घोषित की है उसको आर्थिक विकास की भाषा में agrarian transition development यानी कृषि संक्रमण विकास का माडल कहते हैं . यूरोप और अमरीका में यह बहुत पहले लागू हो चुका है . आज देश का करीब 45 प्रतिशत वर्कफ़ोर्स खेती में लगा हुआ है . जब देश आज़ाद हुआ तो जीडीपी में खेती का एक बड़ा योगदान हुआ करता था . लेकिन आज जीडीपी में खेती का योगदान केवल 15 प्रतिशत ही रहता है . यह आर्थिक विकास का ऐसा माडल है जो एक तरह से अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवनशैली पर बोझ बन चुका है .

आर्थिक रूप से टिकाऊ ( sustainable ) खेती के लिए ज़रूरी है कि खेती में लगे वर्कफोर्स का कम से कम बीस प्रतिशत शहरों की तरफ भेजा जाय जहां उनको समुचित रोज़गार दिया जा सके. आदर्श स्थिति यह होगी कि उनको औद्योगिक क्षेत्र में लगाया जाय. आज सर्विस सेक्टर भी एक बड़ा सेक्टर है .गावों से खाली हुए उस बीस प्रतिशत वर्कफोर्स को सर्विस सेक्टर में काम दिया जा सकता है . खेती में जो 25 प्रतिशत लोग रह जायेंगें उनके लिए भी कम होल्डिंग वाली खेती के सहारे कुछ ख़ास नहीं हासिल किया जा सकता . खेती पर इतनी बड़ी आबादी को निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता ,अगर ऐसा होना जारी रहा तो गरीबी बढ़ती रहेगी .इसलिए खेती में संविदा खेती ( contract farming ) की अवधारणा को विकसित करना पडेगा . संविदा की खेती वास्तव में कृषि के औद्योगीकरण का माडल है .खेती के औद्योगीकरण के बाद गावों में भी शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ होगी और वहां भी औद्योगिक और सर्विस सेक्टर का विकास होगा . इस नवनिर्मित औद्योगिक और सर्विस सेक्टर में बड़ी संख्या में खेती से खाली हुए लोगों को लगाया जा सकता है .
मैंने उस डिबेट में यह भी कहा कि सरकार जो मौजूदा कानून लाई है उसमें खामियां भी हैं .उनको ठीक किया जाना चाहिए नहीं तो वे नतीजे नहीं निकलेगें जो निकलना चाहिए . ज़खीरेबाज़ों और कान्ट्रेक्ट फार्मिंग के ज़रिये ज़मीन हथियाने वालों पर लगाम लगाने का प्रावधान बिल में नहीं है ,वह भी किया जाना चाहिए . कानून में इस बात की गारंटी होनी चाहिए कि विवादों का निपटारा दीवानी अदालतों में होगा ,एस डी एम् को सारी ताक़त नहीं दी जानी चाहिए . सरकार को और किसान नेताओं को जिद के दायरे से बाहर आना पडेगा . सरकार का कानून अभी प्रो बिजनेस है उसको प्रो मार्केट करने की ज़रूरत है . अपनी जिद छोड़कर सरकार को यह सुधार करके बात करनी चाहिए और किसानों को भी क़ानून वापस लेने की जिद छोडनी चाहिए क्योंकि अगर यह क़ानून रद्द हो गया तो कृषि को आधुनिक बनाने की कोशिश को बड़ा झटका लगेगा .
मुझे व्यक्तिगत रूप से खुशी इस बात की है कि किसानों के बीच में खड़े होकर उनकी कमियाँ बताने की हिम्मत मुझे ऊपर वाले ने दी. जहाँ तक सरकार की कमियाँ बताने के बात है वह तो मैं कई बार स्टूडियों में बैठकर कर चुका हूँ. . अब न्यूज़ 18 इंडिया के अलावा भी अब सभी चैनलों में जा सकता हूँ . जो लोग भी मुझे बुलाएं उनकी सूचनार्थ निवेदन है मेरे यही दृष्टिकोण हैं और कोई चैनल इससे इतर बात कहलवाना चाहता है तो वह मैं नहीं आर पाऊंगा .


( इस लेख में कुछ पैराग्राफ मेरे एक पुराने लेख से कापी पेस्ट किये गए हैं )