Tuesday, July 24, 2012

पाकिस्तानी फौज की अफगान गाँवों पर गोलीबारी से शान्ति को ख़तरा



शेष नारायण सिंह 
नई दिल्ली, २४ जुलाई. भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति की तलाश कर रहे लोगों को पाकिस्तानी हुकूमत से और निराशा हुई है . खबर है कि पाकिस्तान की ओर से पश्चिमी अफगानिस्तान के इलाकों में लगातार आर्टिलरी की गोलीबारी चल रही है. अभी एक दिन पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय ने काबुल स्थिति पाकिस्तानी राजदूत को बुलाकर समझाया था कि इस तरह की घटनाओं से  दोनों देशों के बीच रिश्ते और भी खराब होंगें . नई दिल्ली में मौजूद भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती का अभियान चलाने वाले कार्यकर्ताओं को इस बात की चिंता है कि अगर पाकिस्तानी फौज देश में  युद्ध का माहौल बनाने में सफल हो जाती है तो आस पास के सभी देशों के बीच तनाव बढेगा.
बीती रात पाकिस्तानी सीमा से अफगान गाँवों पर तोप के गोले  दागे गए . सुकून की बात यह है कि जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ लेकिन अफगान राज्य कोनार के दंगम जिले के कुछ  गाँवों  में रात में  गोले गिरते रहे.कोनार  के गवर्नर वसीफुल्ला वसीफी ने बताया कि जहां गोलीबारी हुई है उन इलाकों में लोगों के बीच दहशत है .कोनार पुलिस के बड़े अफसर एवाज़ मुहम्मद नजीरी ने कहा है कि  पिछले एक महीने में  पाकिस्तान की तरफ से करीब  २००० गोले दागे गए  जिस से भारी नुकसान हुआ है लेकिन पाकिस्तान की ओर से कहा गया है कि ऐसी कोई बात नहीं है.
अभी कुछ दिन पहले पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री  राजा परवेज़ अशरफ ने काबुल में अफगान  राष्ट्रपति हामिद करज़ई को भरोसा दिलाया था  कि उनकी तरफ से शान्ति भंग की कोई भी घटना नहीं होगी . दोनों नेता तालिबान को यह समझाने के लिए मिले थे कि वे सीमा के दोनों ओर से गोलीबारी बंद कर दें .लेकिन  गोलीबारी जारी है . यह इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान की सेना पर उनके सिविलियन शासकों का कोई असर नहीं है.इसी रविवार के दिन अफगानिस्तान के उप विदेश मंत्री  जावेद लुदिन ने पाकिस्तान के अफगानिस्तान में तैनात राजदूत, मुहम्मद सादिक को बुलाकर फटकार लगाई थी कि अगर गोलीबारी इसी तरह से जारी रही तो दोनों देशों के बीच के रिश्ते और भी खराब हो जायेगें. ऐसा लगता है अमरीका से नार्जा पाकिस्तानी फौज बड़े देश का तो कुछ नहीं बिगाड़  पा रही है लेकिन अमरीका के दोस्त अफ्गान्सितान को परेशान कर रही है. पाकिस्तानी मामलों के जानकारे बता रहे हैं कि यह पाकिस्तानी सेना और आई एस आई की पुरानी चाल  है .

Sunday, July 22, 2012

महिलाओं की अस्मिता का निगहबान बन चुके मीडिया का सम्मान किया जाना चाहिए



शेष नारायण सिंह 

गुवाहाटी में एक लड़की के साथ जो हुआ वह बहुत बुरा  हुआ. आज सारी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से अपने पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को अपमानित किया  जाता है .  टेलिविज़न और अखबारों में खबर के आ जाने के बाद ऐसा माहौल बना कि गुवाहाटी की घटना  के बारे में सबको मालूम  हो गया . लेकिन यह भी सच्चाई है कि इस तरह की घटनाएं देश के हर कोने में होती रहती हैं . ज्यादातर मामलों में किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती.  चर्चा तब होती है जब यह घटनाएं मीडिया में चर्चा का विषय बन जाती हैं . गुवाहाटी की घटना के साथ बिलकुल यही हुआ. देश के  लगभग सभी महत्वपूर्ण टेलिविज़न समाचार चैनलों ने  इस खबर को न केवल चलाया बल्कि कुछ प्रभावशाली चैनलों ने तो इस  विषय पर घंटों की चर्चा का कार्यक्रम भी प्रसारित किया . नतीजा सामने है . अब सबको मालूम है कि किस तरह से   एक समाज के रूप में हम असंवेदनशील हैं . घटना की जांच करने गयी महिला आयोग की एक प्रतिनधि और कभी दिल्ली विश्वविद्यालय की  नेता रही महिला ने तो वहां जाकर अपनी छवि मांजने की कोशिश की . इस चक्कर में पीड़ित लडकी का नाम भी उन्होंने  सार्वजनिक कर दिया . ऐसा नहीं करना चाहिए  था. महिलाओं के प्रति एक समाज के रूप में हमारा दृष्टिकोण आज पब्लिक डोमेन में है और इसके लिए सबसे ज्यादा  सम्मान का पात्र  मीडिया ही है .
आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से निभा भी रहा है . उसकी वजह से ही देश में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार को जनता के सामने लाया जा  रहा है और सरकार में भी किसी स्तर पर ज़िम्मेदारी का भाव जग रहा है  . लेकिन एक बात स्वीकार करने में मीडिया कर्मी के रूप में हमें संकोच नहीं होना चाहिए . अक्सर देखा जा रहा है कि जब एक बात किसी मीडिया कंपनी या किसी मेहनती पत्रकार की कोशिश से  खबरों की दुनिया में आ जाती है तो बहुत सारे पत्रकार उसी खबर को आधार बनाकर खबरें लिखना शुरू कर देते हैं . पत्रकारिता का पहला सिद्धांत है कि जब भी कोई खबर किसी भी रिपोर्टर की जानकारी में आती है तो वह उस व्यक्ति का पक्ष ज़रूर लेगा जिसके बारे में खबर है . कई बार ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति के बारे में खबर है उस तक पंहुचना ही बहुत मुश्किल होता है .  उस हालत में उस व्यक्ति से सम्बंधित जो लोग या जो भी संगठन हों उनसे जानकारी ली  जा सकती है .लेकिन इस काम में एक दिक्कत है . अगर वह  व्यक्ति प्रभावशाली हुआ  और  खबर उसके खिलाफ जा रही हो तो वह खबर को रोकने की कोशिश करवा सकता है . ज़ाहिर है कि उस से बात करने पर खबर दब सकती है .इस हालत में रिपोर्टर के पास इतने सबूत होने चाहिए कि वह ज़रुरत पड़ने पर अपनी खबर की सत्यता को साबित कर सके . उसके पास कोई दस्तावेज़ होना चाहिए, कोई टेप या कोई वीडियो  भी बतौर सबूत हो तो काफी है . लेकिन अगर किसी के  बयान के आधार पर कोई खबर लिखी जा रही है  तो उसके बयान की लिखित प्रति, उसका टेप किया बयान  या कुछ अन्य लोगों की मौजूदगी में दिया गया उसका बयान होना ज़रूरी है . अगर ऐसा न किया गया तो पत्रकारिता के पेशे का अपमान होता है और आने वाले समय में पत्रकार की विश्वसनीयता पर सवाल  उठ खड़े होते हैं . पत्रकार को किसी भी हालत में सुनी सुनायी बातों को  आधार बनाकर खबर नहीं लिखना चाहिए . दुर्भाग्य की बात यह है कि गुवाहाटी की घटना के बारे में इस तरह की पत्रकारिता हो गयी है . 
अभी एक दिन पहले एक बड़े अखबार में खबर छपी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष , ममता शर्मा ने लड़कियों को सलाह दी है कि वे अगर छेड़खानी जैसे अपराधों से बचना चाहती हैं तो उन्हें ठीक से कपडे पहनना  चाहिए .  बात बहुत ही अजीब थी . मैंने तय किया कि इन देवी जी के इस बयान के  आधार पर ही इस बार  अपने इस कालम में महिलाओं की दुर्दशा की चर्चा की जायेगी . बड़े अखबार की खबर के हवाले से जब उनसे बात करने की कोशिश की गयी तो वे गुवाहाटी में थीं लेकिन  थोड़ी कोशिश के बाद उनसे संपर्क हो गया . जब उनसे बताया कि आप के ठीक से कपडे पहनने वाले बयान के बारे में बात करना है तो उन्होंने जो कहा  वह बिलकुल उल्टी बात थी. उन्होंने कहा कि कभी भी उन्होंने वह बयान नहीं दिया है जो एक अंग्रेज़ी अखबार में छपा है. उन्होंने सूचित किया कि वे  दिल्ली के अपने  दफ्तर को हिदायत दे चुकी हैं कि वे  के बयान जारी करके यह कहें कि राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने सम्बंधित अखबार या उसके रिपोर्टर से कोई बात नहीं की है और बयान पूरी तरह  से फर्जी है. उनके इस बयान के बाद भारत सरकार की एक  बड़ी अधिकारी को कटघरे में लेने की अपनी इच्छा पर घड़ों पानी पड़ गया लेकिन यह सुकून ज़रूर हुआ कि एक गलत खबर को आधार बनाकर अपनी बात कहने से बच गए . लेकिन आज सुबह के अखबारों को देखने से अपने पत्रकारिता पेशे में लगे हुए लोगों की कार्यप्रणाली से निराशा जरूर हुई . राष्ट्रीय महिला आयोग के दफतर ने शायद बयान जारी किया होगा क्योंकि उस बड़े अखबार में आज उस खबर का फालो अप नहीं है . लेकिन आज एक अन्य बड़े अखबार में उस खबर का फालो अप छपा है . जिसमें महिला आयोग की अध्यक्ष की लानत मलानत की गयी है.  दिल्ली में रहने वाली कुछ महिला नेताओं से बातचीत की गयी है और उनके बयान में महिला आयोग की कारस्तानी की निंदा की गयी है .जिन महिला नेताओं के बयान छपे हैं उनमें से कोई भी महिला आयोग की अध्यक्ष या उस से भी बड़े पद पर विराजने लायक हैं . इसलिए उनकी  बात समझ  में आती है .उन्हें चाहिए कि वे राष्टीय महिला आयोग की  मौजूदा  अध्यक्ष को बिलकुल बेकार की अधिकारी साबित करती रहें जिससे जब अगली बार उस पद पर नियुक्ति की बात  आये तो अन्य लोगों के साथ इनका नाम भी आये . लेकिन क्या  हमको भी यह शोभा देता है कि एक गलत खबर का फालो अप चलायें . पत्रकारिता की नैतिकता के पहले  अध्याय में ही लिखा  है कि खबर ऐसी हो जिसकी सत्यता की पूरी तरह से जांच की जा सके और जब सम्बंधित व्यक्ति या उसका दफ्तर ऐलानियाँ बयान दे रहा है कि वह बयान उनका नहीं है तो उस बयान के आधार पर खबरों का  पूरा  ताम झाम बनाना अनैतिक है .बहर हाल नतीजा यह हुआ कि यह कालम जो राष्ट्रीय माहिला आयोग की अध्यक्ष के खिलाफ एक सख्त टिप्पणी के रूप में सोचा गया था , औंधे मुंह गिर  पडा . अब उनके खिलाफ कभी फिर टिप्पणी  लिखी जायेगी लेकिन आज तो अपने पेशे की ज़िम्मेदारी पर ही कुछ बात करना ठीक रहेगा.
 गुवाहाटी की खबर के हवाले से मीडिया की भूमिका पर बात करना बहुत ही ज़रूरी है . धीरे धीरे खबर आ रही है कि उस घटना के लिए जो अपराधी छेड़खानी कर रहे थे , उनको सेट करने का काम एक टी वी पत्रकार ने ही  किया था.उस टी वी चैनल के मुख्य संपादक के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है. ज़ाहिर है  कि फर्जी तरीके से खबर बनाने के लिए  उस टी वी चैनल  ने इस तरह का आयोजन किया . इस प्रवृत्ति की निंदा की जानी चाहिए  लेकिन उस टी वी  चैनल की मिलीभगत साबित हो जाने के बाद गुवाहाटी की घटना की गंभीरता कम नहीं हो जाती .बल्कि यह ज़रूरी हो जाता है कि छेड़खानी कर रहे अपराधियों के साथ साथ उन पत्रकारों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाए जिन्होंने इस तरह का आयोजन करके एक लडकी की अस्मिता की धज्जियां उड़ाईं.इस बात की पूरी संभावना है कि सत्ताधारी पार्टी गुवाहाटी के उस गैरजिम्मेदार  पत्रकार के हवाले से सभी खबरों की सत्यता को सवालों के घेरे में लेने  की कोशिश करेगें . लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए .  महिलाओं सहित अपने सभी नागरिकों के सम्मान की  रक्षा करना  सरकार का कर्तव्य  है और सरकार को उसे करते ही रहना चाहिए . देखा यह गया है कि  सरकार में बैठे लोग खबर की सच्चाई पर सवाल उठाने का मामूली सा मौक़ा हाथ आते ही खबर के  विषय को भूल जाते हैं . सत्ताधारी पार्टी के नेता बयानों की झड़ी लगा देते हैं और मुद्दा कहीं दफ़न हो जाता है . मीडिया को कोशिश करना चाहिए कि गुवाहाटी की घटना के साथ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के बारे में जो राष्ट्रीय बहस चल पड़ी है ,उसे उसके  अंजाम  तक पंहुचाएं.  

गुवाहाटी की घटना के साथ ही उत्तर प्रदेश के बागपत की बातें भी हो रही हैं . वहां के पुरुषों ने एक पंचायत करके अपने घरों की महिलाओं को सलाह दिया है कि वे दिन ढले घरों से बाहर न निकलें, सेल फोन का इस्तेमाल न करें और प्रेम  विवाह न करें . यानी उस पंचायत ने अब तक हुए विकास को उल्टी दिशा में दौडाने की कोशिश है . जहां की यह घटना है  वह देश की राजधानी से लगा हुआ इलाका है .  दिल्ली के इतने करीब हो कर भी महिलाओं के प्रति इतना आदिम रवैया बहुत ही अजीब  है . उस से भी अजीब है कि कई पार्टियों के राजनीतिक नेता महिलाओं के खिलाफ इस तरह का रुख रखने वालों के साथ खड़े पाए जा  रहे हैं . ज़ाहिर है एक समाज के रूप में हम कहीं फेल  हो रहे हैं . बागपत वाले मामले में मीडिया का रुख शानदार है और हर वह नेता तो मध्यकालीन सामंती सोच  के प्रभाव में आकर बयान दे रहा है  उसकी पोल लगातार खुल रही है .आज से करीब ३५ साल पहले भी इसी बागपत में माया त्यागी नाम की एक महिला के साथ पुरुष प्रधान मर्दवादी  सोच वालों ने अत्याचार किया था . उस वक़्त भी मीडिया के चलते ही वह मामला पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना था. इतने वर्षों बाद भी आज बागपत और दिल्ली के आस पास के अन्य इलाकों में महिलाओं के प्रति जो रवैया है वह क्यों नहीं बदल रहा है , यह चिंता की बात  है और इसकी भी पड़ताल की जानी चाहिए . लगता है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो  इस बात पर तब तक ध्यान नहीं देगें जब तक कि उनकी असफलताओं को मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक न किया  जाए.   पिछले कई वर्षों में यही हुआ है . जब १४ फरवरी के आस पास लड़कियों की अस्मिता पर बंगलोर में हमला हुआ था , उस वक़्त भी मीडिया के हस्तक्षेप से ही  अपराधी पकडे  गए थे . इसलिए साफ़ लगने लगा है कि इस देश में महिलाओं  के सम्मान की रक्षा  के काम में सबसे अहम भूमिका मीडिया की ही रहेगी .

Thursday, July 19, 2012

क्या राहुल गांधी को उनकी असफलता के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है ?





शेष नारायण सिंह 

नई दिल्ली, १९ जुलाई. राष्ट्रपति चुनाव के मतदान में वोट डालने आये राहुल गाँधी ने आज यह कह कर सत्ता के गलियारों में तूफ़ान खड़ा कर दिया कि वे सरकार या पार्टी में बड़ी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हैं . इस से ज्यादा राहुल गांधी ने कुछ नहीं  कहा है . कांग्रेस पार्टी य यूं कहें के १० जनपथ के सबसे महत्वपूर्ण प्रवक्ता, जनार्दन  द्विवेदी  ने केवल यह कहा है कि हमें बहुत खुशी होगी अगर राहुल गांधी सरकार या पार्टी में और कोई  पद  स्वीकार करते हैं . लेकिन यह उनको तय करना है कि वे  कब और क्या पद स्वीकार करते हैं . आधिकारिक तौर पर इससे ज्यादा कुछ नहीं मालूम है  लेकिन सभी टी वी चैनलों और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में तरह तरह के अनुमान लगाए जा  रहे हैं . कुछ चैनलों पर बैठे राजनीतिक विश्लेषक मंत्रिपरिषद में राहुल गांधी के संभावित   विभागों की विवेचना भी कर रहे हैं . कोई उन्हें ग्रामीण विकास दे रहा है तो कोई शिक्षा मंत्रालय का चार्ज दे रहा  है . कांग्रेस पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह भी अपनी पीठ ठोंक रहे हैं कि उन्होंने तो दो साल पहले ही कह दिया था.  

सही बात यह है कि किसी को नहीं मालूम है  कि अगले दो तीन दिनों में राष्ट्रीय राजनीति, खासकर कांग्रेस के राजनीति क्या शक्ल अख्तियार करेगी  लेकिन इतना पक्का है कि अब सत्ता के समीकरण निश्चित रूप से बदल जायेगें. हालांकि दिल्ली में अभी किसी ने खुलकर नहीं कहा है  लेकिन एक बहुत ही भरोसेमंद सूत्र ने बताया है कि  इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गांधी सरकार में बहुत ऊंचे पद पर ही बैठा  दिए जाएँ. लेकिन यह सब केवल राहुल गांधी और उनके  परिवार के अलावा किसी को पता नहीं है . 

अब जब यह पक्का हो गया है कि राहुल गांधी को मौजूदा राजनीतिक जिम्मेदारियों से बड़ा काम मिलें वाला  है . यह देखना दिलचस्प होगा कि उन्होंने  अपने पिछले करीब १० साल के राजनीतिक जीवन में क्या ख़ास हासिल किया है .  उत्तर प्रदेश विधान सभा के  पिछले चुनाव में राहुल गांधी ने बहुत  मेहनत की लेकिन नतीजा सबके सामने है . उनके हवाले पूरी कांग्रेस पार्टी थी , सारे संसाधन थे, हेलीकाप्टर , और  विमान थे  लेकिन अपनी सीटों की संख्या में वे कोई वृद्धि नहीं कर पाए. उनकी  राजनीतिक सूझ बूझ  पर भी सवाल उठे जब उन्होंने बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता के हवाले पार्टी के विधान सभा के टिकटों का एक बहुत  बड़ा हिस्सा कर दिया . बेनी प्रसाद वर्मा ने जितने लोगों को टिकट दिया था वे सभी हार गए . जबकि उनसे कम संसाधनों के सहारे काम कर रहे समाजवादी पार्टी के   नेता अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी को बहुमत दिला दिया . इसके पहले राहुल गांधी ने बिहार में अपनी  पार्टी के दुर्दशा  का  सुपरविजन  किया था.  हुछ साल पहले  उनकी राजनीति का लाभ नरेंद्र मोदी ने गुजरात में लिया था और कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष के भाषण  लेखक के उस वाक्य का पूरे देश में मजाक उड़ाया गया था जब उनके मुंह से  नरेंद्र  मोदी को मौत का सौदागर कहलवा दिया गया था .  
 इसके अलावा अभी राहुल गांधी और उनके साथियों के खाते में मुंबई सहित महाराष्ट्र  के नगर पालिका चुनावों में कांग्रेस की खस्ता हालत भी दर्ज है . आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की मौजूदा हालत के लिए भी राष्ट्रीय नेतृत्व  ही ज़िम्मेदार  है . इस सबसे ऐसा लगता है कि राहुल इतिहास के इकलौते ऐसे नेता हैं जो हर मोर्चे पर फेल होने के बाद भी और बड़ी ज़िम्मेदारी के  हक़दार माने जा रहे हैं . बहर हाल  जो भी हो अब  यह पक्का है कि राहुल गांधी के हाथ में देश का भविष्य सुरक्षित करने की तैयारी कांग्रेस ने पूरी कर ली है .

Saturday, July 14, 2012

बराक ओबामा भारत में कैंसर की महंगी दवा बेचने के लिए सरकार पर दबाव डाल रहे हैं


  
शेष नारायण सिंह 
 अमरीका की कोशिश है कि वह भारत के कैंसर  के रोगियों से बहुत भारी मुनाफा कमाए और उसके लिए उसे भारत सरकार की मदद चाहिए . अमरीकी कम्पनियां कैंसर की जो दवा भारत में बेचती हैं उनकी  कीमत कैंसर के  रोगी को करीब ढाई लाख  रूपया प्रति महीना पड़ता है . जब कि वही दवा भारत की कंपनियों ने बना लिया है और उसकी कीमत केवल साढ़े सात हज़ार रूपये महीने है . अपने  पूंजीपतियों को बेजा लाभ पंहुचाने के लिए अमरीकी प्रशासन भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह भारतीय कंपनी को दवा बेचने से रोक दे और अमरीकी दवा पर ही भारत के कैंसर के रोगी निर्भर बने रहें. अमरीकी सरकार की एक बड़ी अधिकारी ने दावा  किया है कि वह भारत सरकार में उच्च पदों पर बैठे कुछ लोगों से इस काम को करवाने के लिए संपर्क में है . ज़रुरत  इस बात की है  यह पता  लगाया जाए कि उच्च पदों पर बैठे यह कौन लोग हैं . पता लगने के बाद उन्हें कानून के  हिसाब से दण्डित किया  जाना चाहिए  . संतोष की बात यह  है अभी तो भारत सरकार ने अमरीका को  साफ़ मना कर दिया है  कि वह अपने देश के कैंसर के मरीजों के खून से अमरीकी व्यापार को फलने फूलने नहीं देगें लेकिन जिस तरह से केंद्र सरकार में अमरीका परस्त लोगों का बोलबाला है , लगता है कि देर सवेर भारत सरकार अमरीकी दबाव के सामने झुक जायेगी .
अमरीका और पाकिस्तानमें एक समानता है . दोनों ही देशों में राजनीतिक शमशीर चमकाने के लिए भारत के खिलाफ ज़हर उगलने का फैशन है . अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा वैसे तो भले आदमी माने जाती हैं  लेकिन अमरीकी कट्टरपंथियों को साथ लेने के  लिए वे भी भारत के खिलाफ गैरजिम्मेदार अभियान चलाने की पूरी कोशिश करते हैं .अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे कमज़ोर देशों में तो वे  गोली बारूद से सीधा हमला करते हैं , ड्रोन चलाते हैं और आतंकवादियों के साथ साथ निर्दोष लोगों की भी जान ले लेते हैं . लेकिन भारत की बढ़ती आर्थिक ताक़त और हैसियत के मद्दे नज़र भारत से कुछ आर्थिक लाभ झटक लेने के चक्कर में रहते हैं .
ताज़ा मामला कैंसर की दवा की मनमानी  कीमत वसूलने का है . जर्मनी की बड़ी दवा कम्पनी बायर कैंसर की दवा बनाती है . इस दवा से कैंसर का इलाज भारत में भी होता है .अभी तक इस दवा के सहारे इलाज कराने में करीब ढाई लाख रूपये प्रति महीने का खर्च आता है . एक भारतीय दवा कंपनी ने वहीं दवा अपने देश में बना दिया और उसकी मदद से कैंसर के इलाज की कीमत करीब साढ़े सात हज़ार रूपये  प्रति माह पड़ रही है . यह दवा बनाने वाली कंपनी ने भारत सरकार से बाकायदा अनुमति लेकर इस दवा को बेचना शुरू कर दिया  है, सारा काम अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के हिसाब से  कानूनी है और भारतीय कंपनी जर्मन/अमरीकी कंपनी को साढ़े छः प्रतिशत की रायल्टी दे रही है . लेकिन इस दवा के बन जाने से अमरीका में बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रही बायर को भारी घाटा हो रहा है और अब ओबामाअमरीकी /जर्मन कंपनी को लाभ पंहुचाने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं. 
अमरीकी पेटेंट और ट्रेडमार्क आफिस की एक  डिप्टी डाइरेक्टर  ने अमरीकी सेनेट से अपील की है कि वह भारत सरकार पर दबाव बनाए कि वह अपनी ताकत का इस्तेमाल करके भारत सरकार को मजबूर कर दे कि वह भारतीय कम्पनी  को कम कीमत वाली लेकिन बहुत अच्छी दवा बेचने से रोकें. सेनेट से उन्होंने अपनी पेशी के दौरान अपील कि   कि वह भारत सरकार को फटकार लगाए कि उसने क्यों किसी भारतीय कंपनी को दवा बेचने की अनुमति दे दी. उन्होंने यह भी कुबूल किया कि वे निजी तौर पर भी भारत सरकार की एजेंसियों से  संपर्क  बनाए हुए हैं और पूरी कोशिश कर  रही  हैं कि अमरीकी /जर्मन दवा कम्पनी  को होने वाला मुनाफ़ा  कम न  होने पाए . ज़रुरत इस बात की है कि भारत सरकार की सी बी आई या अन्य  कोई सक्षम संस्था इस बात की  जांच करे कि अमरीकी पेटेंट और ट्रेड आफिस भारत सरकार में किन लोगों के साथ संपर्क बनाए हुए है और वे क्यों भारत के राष्ट्रीय  और सार्वजनिक  हित के खिलाफ काम कर रहे हैं .

Friday, July 13, 2012

मेरे गाँव की अपनैती , पता नहीं कहाँ गायब हो गयी है


 

शेष नारायण सिंह 


इस बार दस दिन अपने गाँव में रहा .मेरे बचपन के साथी ठाकुर बद्दू सिंह के साथ दस  दिन हंसी खुशी बीत गए. मेरी दोनों बहनें और भाई भी लगभग पूरे वक़्त साथ साथ ही रहे. मेरी माँ की  सबसे छोटी पौत्री की शादी पूरे सम्मान के साथ संपन्न हो गयी. हम अपनी माँ को माई कहते थे.अगर वे जीवित होतीं तो निश्चित रूप से खुश होतीं.  मेरी माँ का जीवन सपनों का जीवन था, अधूरे सपनों का जीवन.उनके सभी सपने अधूरे ही रह गए .अपनी दोनों ही बेटियों को वे पढ़ाना चाहती थीं. बड़ी बेटी तो  खैर स्कूल ही नहीं जा सकी, छोटी वाली बिटिया , मुन्नी ,जो पढने में बहुत अच्छी थी, भी प्राइमरी के बाद पढने नहीं जा सकी. सामंती सोच की दीवार मुन्नी की शिक्षा के बीच में खडी हो गयी थी. यह अलग बात है कि बाद में मुन्नी ने अपनी पढाई पूरी की.हमारे छोटे भाई ने उसमें बहुत मेहनत की. लेकिन माई के बच्चों ने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जो भी हो सका , क़दम उठाया .आज माई के सभी पोते पोतियों के पास उच्च शिक्षा का  हथियार है . शायद इसी वजह से लगता है कि मृत्यु के बाद ही सही माई के कुछ सपने तो पूरे हो ही गए.
लेकिन मेरे गाँव में लड़कियों की इज्ज़त नहीं है . उन्हें घर के किसी भी फैसले से दूर रखा जाता है. जबकि मेरे बचपन में  मेरी बड़ी बहन की सहेलियां घर के फैसलों में शामिल होती थीं. उनके माता पिता उनसे पूछते थे . हालांकि शादी ब्याह जल्दी हो जाते थे लेकिन लडकियां अपने घर के फैसलों में शामिल होती थीं. मेरी बड़ी बहन तो मेरी शिक्षा दीक्षा में भी माई के साथ हमारे पिता जी से लड़ाई करती थीं. अब तो  सब कुछ बदल गया है 
इस बार जो दस दिन मैंने अपने गाँव में बिताया उसमें मुझे अपने भाई बहनों और दोस्त बद्दू सिंह के अलावा सब कुछ विदेशी जैसा लग रहा था .  लगता था कि अपने  गाँव में नहीं ,कहीं और आ गया हूँ. मेरे आस्था के सारे केंद्र ढह गए हैं .  लोग शादी ब्याह में केवल कुछ रूपये देने के लिए शामिल होते हैं .कहीं कोई चाहत नहीं , कोई अपनापन नहीं . ज़्यादातर परिवारों के नौजवान किसी बड़े शहर में चले गए हैं . कुछ लड़कों ने पढ़ाई कर ली है लेकिन खेती में काम करना नहीं चाहते और बेरोजगार हैं . मेरे गाँव की तहसील पहले कादीपुर हुआ करती थी , नदी पार कर के जाना होता था . लेकिन अब तहसील ३ किलोमीटर दूर लम्भुआ बाज़ार में है.  मेरे गाँव के कुछ लडके अब तहसील में दलाली कारते हैं . कुछ नौजवानों का थाने की दलाली का अच्छा कारोबार चल रहा है  . वह गाँव  जिसमें मेरी माँ का रोल सबसे ज्यादा स्थायी है ,अब कहीं खो गया है . मेरी माँ ने गरीबी को खूब करीब से उलट पुलट कर देखा था, उसे झेला था . एक संपन्न किसान की बेटी थीं वह लेकिन ज़मींदारों के परिवार  में ब्याह दी  गयी थीं . ज़मींदार  भी ऐसे जो नाम के ही ज़मींदार  थे . घर में भोजन  की भी  तकलीफ  रहा करती थी.   मेरी माँ का मायका जौनपुर सिटी  रेलवे स्टेशन से लगे हुए एक गाँव में था .मेरे नाना वहां के  संपन्न किसान थे . मेरे पिता के परिवार में शिक्षा को कायथ कारिन्दा का काम माना जाता था और जब मेरे माता- पिता की शादी के १४ साल बाद ज़मींदारी का उन्मूलन हो गया तब ज़मींदारों को लगा कि सब कुछ लुट गया .
और इस बार जब मैं अपने गाँव में दस दिन तक बैठा रहा तो मुझे लगा कि छिट पुट सम्पन्नता तो आई है लेकिन मेरे गाँव की अपनैती पता नहीं कहाँ लुट गयी है .. 

Saturday, July 7, 2012

चन्द्रशेखर ने कहा था --जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.


शेष नारायण सिंह 


८ जुलाई को चन्द्रशेखर जी को गए पांच साल हो गए. अगर होते तो ८५ साल के हो गए होते. उनको लोग बहुत अच्छा संसदविद कहते हैं . वे संसद में थे इसलिए संसदविद भी थे लेकिन लेकिन सच्चाई यह है कि वे जहां भी रहे धमक के साथ रहे और कभी भी नक़ली ज़िंदगी नहीं जिया. मैं चन्द्रशेखर जी  को एक ऐसे इंसान के रूप में याद करता हूँ जो राजनेता भी थे नहीं , लेकिन वे सही  अर्थ में स्टेट्समैन थे . जो दूरद्रष्टा थे और राष्ट्र और समाज के हित को सर्वोपरि मानते थे. आज चन्द्रशेखर की विरासत को संभालने वाला कोई नहीं है क्योंकि उनकी राजनीति को आगे ले जाने वाली कोई पार्टी ही कहीं नहीं है . जिस पार्टी को उन्होंने अपनी बनाया था उसके वे आख़िरी कार्यकर्ता साबित हुए . पचास के दशक में आचार्य नरेंद्रदेव के सान्निध्य में उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की राजनीति में हिस्सा लेना शुरू किया लेकिन १९६४ आते आते उनको लग गया कि उनकी और आचार्य जी की राजनीति की सबसे बड़ी वाहक जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस पार्टी ही रह गयी थी. शायद इसीलिये उन्होंने अपनी पार्टी के एक अन्य बड़े नेता, अशोक मेहता के साथ कांग्रेस की सदस्यता ले ली. लेकिन उनका और शायद देश के दुर्भाग्य था कि उसके बाद ही से कांग्रेस में जो राजनीतिक शक्तियां उभरने लगीं , वे पूंजीवादी राजनीति को समर्थन करने वाली थीं. कांग्रेसी सिंडिकेट ने कांग्रेस की राजनीति को पूरी तरह से काबू में कर लिया . सिंडिकेट से इंदिरा गाँधी ने बगावत तो किया लेकिन वह पुत्रमोह में फंस गयीं और उन्होंने ने भी तानाशाही का रास्ता अपना लिया . नतीजा यह हुआ  कि चन्द्र शेखर जी को जय प्रकाश नारायण के  नेतृत्व में चल रहे तानाशाही विरोधी आन्दोलन का साथ देना पड़ा. यह भी अजीब इत्तेफाक है कि जिस साम्प्रदायिक राजनीति का चन्द्रशेखर जी  ने हमेशा ही विरोध किया था , उसी राजनीति के पोषक लोग जेपी के आन्दोलन में चौधरी बने बैठे थे. हालांकि समाजवादी लोग सबसे आगे आगे  नज़र आते थे लेकिन सबको मालूम था कि गुजरात से लेकर बिहार तक आर एस एस वाले ही वहां हालत को कंट्रोल कर रहे थे . बाद में जो सरकार बनी उसमें भी आर एस एस की सहायक पार्टी जनसंघ वाले ही हावी थे. चन्द्रशेखर और मधु  लिमये ने आर एस एस को एक राजनीतिक पार्टी बताया और कोशिश की कि जनता पार्टी के सदस्य किसी और पार्टी के सदस्य न रहें . लेकिन आर एस एस ने जनता पार्टी ही तोड़ दी और अलग भारतीय जनता पार्टी बना ली. लेकिन चन्द्र शेखर ने अपने  उसूलों से कभी समझौता नहीं किया 

उनके जाने के पांच साल बाद यह साफ़ समझ में आता है  कि उनकी विरासत को जिंदा रखने के लिए किसी संस्था की ज़रुरत नहीं है . उनकी ज़िंदगी ही एक ऐसी संस्था का रूप ले चुकी थी जिसमें बहुत सारी सकारात्मक शक्तियां एकजुट हो गयी थीं.उनकी ज़िंदगी ने देश की राजनीति को हर मुकाम पर प्रभावित किया.  इंदिरा गाँधी ने जब सिंडिकेट के चंगुल से निकल कर राष्ट्र की संपत्ति को जनता की हिफाज़त में रखने के लिए बैंकों का  राष्ट्रीयकरण किया तो चन्द्रशेखर ने उनको पूरा समर्थन दिया और सिंडिकेट वालों के लिए राजनीतिक मुश्किल पैदा की. लेकिन वही इंदिरा गाँधी जब पुत्रमोह में तानाशाही और गैर ज़िम्मेदार राजनीतिक परंपरा की स्थापना करने लगीं तो चन्द्रशेखर ने उनको चेतावनी दी और  बाद में तानाशाही प्रवृत्तियों को ख़त्म करने के आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभाई. 
आज चन्द्रशेखर जी के जीवन की बहुत सारी घटनाएं याद आती हैं . लेकिन उनके जीवन की जिस घटना ने मुझे हमेशा ही प्रभावित किया है वह भारत की लोकसभा में ७ नवम्बर १९९० में घटी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हटाने के लिए  लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां एकजुट थीं. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने ग्यारह महीने के राज में बहुत सारे  गैरज़िम्मेदार फैसले किये थे और उनका प्रधान मंत्री पद  से हटना बहुत ज़रूरी माना जा रहा  रहा. जब चन्द्रशेखर जी  को अध्यक्ष ने भाषण करने के लिए बुलाया तो सदन में बिलकुल सन्नाटा छा गया था . और जब  चन्द्रशेखर ( बलिया ) ने कहा कि मुझे  अत्यंत दुःख के साथ इस बहस में हिस्सा  लेना पड़  रहा है तो सदन में बैठे लोगों ने उस स्टेट्समैन के दर्द  का अनुभव किया था. गैलरी  में बैठे लोगों ने भी सांस खींच कर उनके भाषण को सुना. उन्होंने कहा कि जब ग्यारह महीने पहले हमने देश को बचाने के लिए बीजेपी से समझौता किया था .उस समय सोचा था कि  देश संकट में है ,कठिनाई में है और उस कठिनाई से निकलने के लिए सबको साथ मिलकर चलना चाहिए .उन्होंने अफ़सोस जताया कि  ग्यारह महीने पहले देश की जो दुर्दशा  थी , ग्यारह महीने बाद उस से बदतर हो गयी थी. उन्होंने पूछा कि क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में आतंक  बढा है , क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में विषमता बढ़ी है , क्या यह सही नहीं है कि बेकारी , बेरोजगारी,मंहगाई बढ़ी है ,,क्या यह सही नहीं है कि हमारे देश में सामाजिक तनाव बढ़ा है .क्या यह सही नहीं है कि पंजाब पीड़ा से कराह रहा है ,क्या यह सही नहीं है कश्मीर में आज वेदना है.क्या यह सही नहीं है कि असम में आतंक बढ़ रहा है ,क्या यह सही नहीं है कि देश के गाँव गाँव में धर्म और जाति के नाम पर आदमी ही आदमी के खून का प्यासा हो रहा  है . उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री से कहा कि संसद और देश को चलाना कोई ड्रामा नहींहै इसलिए गंभीरता  हर राजनीतिक काम के बुनियाद में होनी  चाहिए . 

लोकसभा के उसी  सत्र के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को हटा दिया गया था .चन्द्रशेखर जी ने साफ़  कहा कि सिद्धांतों की बात करने वाले  विश्वनाथ प्रताप सिंह धर्मनिरपेक्षता का सवाल क्यों नहीं उठाते.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि धर्म निरपेक्षता मानव संवेदना की पहली परख है .  जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.इसी भाषण में चन्द्र शेखर जी ने बीजेपी की राजनीति को आड़े हाथों लिया था .  उन्होंने कहा कि मैं आडवाणी जी से ग्यारह महीनों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि   बाबरी मज्सिद के बारे में सुझाव देने  के लिए एक समिति बनायी गयी, उस समिति से भारत के गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को हटा दिया जाता है . बताते चलें  कि  उस वक़्त गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव थे. चन्द्र शेखर जी ने आरोप लगाया कि इन लोगों को इस लिए हटाया गया क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद् के कुछ नेता उनकी सूरत नहीं देखना चाहते.क्या इस  तरह से देश को चलाना है . उन्होंने सरकार सहित बीजेपी -आर एस एस की राजनीति को भी घेरे में ले लिया और बुलंद आवाज़ में पूछा कि क्यों हटाये गए मुलायम सिंह , क्यों हटाये गए मुफ्ती मुहम्मद सईद ,उस दिन किसने समझौता किया था ? चाहे वह समझौता विश्व हिन्दू परिषद् से हो ,चाहे बाबरी मस्जिद के सवाल पर किसी इमाम से बैठकर समझौता करो ,यह समझौते देश की हालत को  रसातल में ले जाने के लिए ज़िम्मेदार हैं .उन्होंने प्रधान मंत्री को चेतावनी दी कि आपकी सरकार जा सकती है ,ज उस से कुछ नहीं बिगड़ेगा .लेकिन याद रखिये कि जो संस्थाएं बनी हुई हैं ,उनका अपमान आप मत कीजिये . क्या यही परंपरा है कि बातचीत को चलाने के लिए राष्ट्रपति के पद का इस्तेमाल किया  जाय .शायद दुनिया के इतिहास में ऐसा कहीं भी नहीं हुआ होगा.कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यादेश लगाए जाएँ और २४ घंटों के अंदर उसको वापस ले लिया  जाए..उन्होंने कहा  कि यह तुगलकी मिजाज़ इस  देश को रसातल  तक पंहुचाएगा और देश को बचाने के लिए मैं तुगलकी मिजाज़ का विरोध करना अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मानता हूँ.
इसी भाषण के  दौरान किस्मत के मारे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने  बीच में टिप्पणी कर दी और कहा कि सिद्धांत के चर्चे सरकारी पदों के गलियारों के नहीं गुज़रते हैं.चन्द्रशेखर जी ने कहा कि , चलिए मुझे मालूम है .सिद्धांत संघर्षों से पलते हैं और संघर्ष करना जिसका  इतिहास नहीं है वह सिद्धांतों की बात करता है . मैं उन लोगोंमें से  नहीं हूँ जो कि अपनी गलती को स्वीकार ही न करें . उन्होंने  प्रधान मंत्री से कहा कि जिस समय आप कुर्सियों से चिपके रहने के लिए हर प्रकार के घिनौने समझौते  कर रहे थे , उस समय संघर्ष के रास्ते चल कर मैं हर  मुसीबत  का मुकाबला कर रहा था. आप सिद्धांतों की चर्चा हमसे मत करें .

चन्द्रशेखर जी ने इस भाषण में और भी बहुत सारी बातें कहीं जो कि भारत के राजनीतिक  भविष्य के लिए दिशा निर्देश का प्रकाश स्तम्भ हो सकती  हैं . आज उन्हीं चन्द्र शेखर की पुण्य तिथि है जिन्होंने  स्वार्थ के सामने कभी भी सर नहीं झुकाया  . भारत के एक नागरिक के रूप में उन्हें आज सम्मान से याद करने में मुझे गर्व है .

बातचीत जारी रहेगी और कभी न कभी फैसला हो ही जाएगा.



शेष नारायण सिंह 

भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की कोशिश जारी है .इसी सिलसिले में इस हफ्ते नई दिल्ली में दोनों देशों के विदेश सचिवों की अहम बैठक हुई. दोनों ही देशों पर अब दबाव है कि वे आपस में दोस्ती करें. हालांकि दोनों ही देशों की आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग दुश्मनी  पक्ष में कभी नहीं रहा है लेकिन भारत की दुश्मनी के नाम पर राजनीति  करने वालों ने हमेशा ही पाकिस्तान की राजनीति में अपना दबदबा बना रखा था. पाकिस्तान में रहकर भारत की मुखालिफत करने वालों को अमरीकी मदद भी बहुत बड़े पैमाने पर मिलती रही है . लेकिन अब हालात बदल रहे हैं . अब पाकिस्तान में और भारत में उन लोगों को हाशिये पर धकेलने का काम शुरू हो गया है जो दोनों देशों के बीच दुश्मनी के बल पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं . अमरीका भी अब समझने  लगा अहै कि भारत और पाकिस्तान के बीच   दोस्ती बढ़ाना उसके राष्ट्रीय हित में है नतीजा यह है कि अब  दोनों ही सरकारें दोस्ती की बात  कर रही हैं . इसी कड़ी का नतीजा है कि  दोनों ही देशों के कूटनीतिक विभागों के सबसे बड़े अफसरों की एक बैठक दिल्ली में आयोजित की गयी. . शान्ति और सुरक्षा के नाम पर बातचीत करने के नाम पर बुलाये गए इस सम्मलेन में  जम्मू कश्मीर पर भी बात हुई. हालांकि यह सभी जानते हैं कि दोनों देशों के राजनेताओं के बस की बात नहीं है कि कश्मीर के मसले पर कोई भी रियायत दे सकें लेकिन इस बातचीत का योगदान यह है कि दोनों देशों के  भले आदमियों की आवाजाही को  प्रोत्साहन दिया जाएगा  और एक दूसरे पर भरोसा करने लायक माहौल  बनाने में सरकारी तौर पर योगदान किया जाएगा  

किसी को उम्मीद नहीं थी कि इस हफ्ते हुई बात चीत के बाद कोई बहुत बड़ा फैसला हो जाएगा . क्योंकि दोनों ही देशों के बीच तल्खियां इतनी ज़्यादा हैं कि  अपनी घोषित नीति  से आगे कोई भी बढ़ने को तैयार नहीं है .  अगर एक पक्ष ज़रा सा भी रियायत देता नज़र आयेगा तो उसके  देश के धार्मिक कट्टरपंथी उस सरकार का जीना दूभर कर देगें . इसलिए कूटनीतिक बातचीत का सबसे  बड़ा लाभ यह होता है  कि अगली बातचीत के लिए कार्यक्रम तय हो जाता है . इस बार भी वही हुआ. दोनों विदेश मंत्रियों ने तय किया कि बातचीत का सिलसिला  आगे भी जारी रखा जाएगा. हर बार की तरह इस बार भी दोनों  ही पक्षों ने उम्मीद जताई कि आगे की बातचीत से सकारात्मक नतीजे निकलेगें . . हर बार की तरह इस बार भी भरोसा पैदा करने वाले तरीकों यानी सी बी एम को जारी  रखने की बात की गयी. .इसके पहले की बैठक में  तय किया गया था कि परमाणु हथियारों के बारे में भी भरोसा पैदा करने वाले तरीकों पर काम किया जाएगा. इस बार की बैठक  में उन पर अब तक की प्रगति  का लेखा जोखा  लिया गया. परमाणु मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई और तय किया गया कि इस दिशा में बातचीत को आगे बढाने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनायी जायेगी. वही समिति यह सुझाव देगी कि और क्या किया जाए जिस से इस महत्वपूर्ण समस्या पर विचारों का आदान प्रदान नियमित रूप से होता रहे और कूटनीतिक माहौल बनाया जा सके. विदेश सचिवों ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों ही देशों के सामने आतंक का ख़तरा बना हुआ है . लेकिन आतंक के बारे में कोई ख़ास क़दम नहीं  उठाया जा सका और कूटनीतिक भाषा के जाल में ही सारी बात फंस कर रह गयी. दोनों ही देशों में आतंक से लड़ने के अपने संकल्प को हर बार  की तरह फिर से दोहराया और कहा कि  हर तरह के आतंक को खत्म करने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाये जायेगें.जम्मू-कश्मीर पर भी बात की गयी लेकिन हर बार  की तरह किसी भी मुद्दे पर समझौता नहीं हुआ. सही बात यह है कि जम्मू-कश्मीर का मामला इतना पेचीदा हो गया  है कि अब दोनों देशों की किसी सरकार की हैसियत नहीं है कि उस  पर कोई समझौता  कर सके. इस बात चीत में भी यही हुआ . दोनों ही देशों के आला अफसर इस बात पर सहमत हो गए कि जम्मू-कश्मीर  के बारे में आगे भी बात चीत की जायेगी और शान्ति पूर्ण तरीकों से समस्या  का हल निकाला जाएगा. यह भी तय किया गया कि आने वाले दिनों में कुछ ऐसा किया  जाये़या जिसके  बाद कश्मीर के बारे में दोनों देशों के मतभेद कम किये जा सकें. जानकार बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर के बारे में इस से ज्यादा कोई सहमति पैदा कर सकना फिलहाल असंभव है . 

 नियंत्रण रेखा के  रास्ते सीमा पार के व्यापार को बढ़ावा देने के बारे में भी बातचीत हुई और तय पाया गया कि इस दिशा में  क़दम उठाये जा  सकते हैं . इस काम के लिए सम्बंधित  अफसरों की बैठक  भी इसी साल १९ जुलाई को करने का फैसला कर लिया गया . इस रास्ते  व्यापार और लोगों की यात्रा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर दोनों ही देशों एक बीच अधिकतम सहमति है . ज़ाहिर है कि आने वाले दिनों में भी इस दिशा में कुछ अहम ऐलान हो सकते हैं .दोनों देशों के मीडियाकर्मियों , पत्रकारों और खिलाड़ियों आवाजाही  को भी प्रोत्साहित करने का फैसला किया गया है. दोनों देशों  की जनता के बीच आवाजाही को बढ़ावा देने के फैसला भी किया गया . मुझे लगता है यह एक ऐसा फैसला है जिसके बाद भारत और पाकिस्तान की सरकारों पर इस  बात का दबाव बढेगा कि वे दुश्मनी को कम करें. दोनों ही देशों की जनता जब दोस्ती के लिए तैयार होगी  तो दुश्मनी की तिजारत करने वालों के  लिए बहुत ही मुश्किल हो जायेगी. दोनों  ही विदेश सचिव  जल्दी ही इस्लामाबाद  में मिलेगें जहां सितम्बर में  प्रस्तावित विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात की तैयारियों का जायजा लिया जाएगा और उनकी बातचीत के बाद घोषित किये जाने वाले फैसलों को अंतिम रूप देने की  दिशा में आगे का काम होगा.

भारत और  पाकिस्तान के बीच दोस्ती  हालांकि बहुत ज़रूरी है लेकिन आज के माहौल में यह बहुत ही मुश्किल काम लगता है . लेकिन  फिर भी दोनों देशों के बीच बातचीत होते रहने का फायदा यह है उम्मीद कभी भी ख़त्म नहीं होगी. विदेश सचिव स्तर की बातचीत  का सबसे बड़ा यही लाभ हुआ है कि बातचीत आगे भी जारी रहेगी और और अगर सब ठीकठाक रहा तो दूर भविष्य में कभी न कभी फैसला  हो ही जाएगा.