शेष नारायण सिंह
लोक सभा में पिछली लोकसभा में जो दृश्य देखा गया वह उसके पहले कभी नहीं देखा गया था. कुछ संसद सदस्य हज़ार हज़ार के नोटों के बण्डल उपाध्यक्ष जी के सामने लहरा रहे थे . बाद में पता चला कि वह रूपये उनका समर्थन खरीदने के लिए उनके पास समाजवादी पार्टी के तत्कालीन नेता अमर सिंह ने भेजे थे.पिछली लोकसभा में अमरीका के साथ परमाणु समझौते वाला बिल पास कराने के लिए उस वक़्त की यू पी ए सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया था.आरोप है कि उस काम के लिए कि सरकार ने सांसदों की खरीद फरोख्त की थी. बीजेपी वाले खुद लोक सभा में हज़ार हज़ार के नोटों की गड्डियाँ लेकर आ गए थे और दावा किया था कि यूपीए के सहयोगी और समाजवादी पार्टी के नेता ,अमर सिंह ने वह नोट उनके पास भिजवाये थे, बाद में एक टी वी चैनल ने सारे मामले को स्टिंग का नाम देकर दिखाया भी था. बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने स्वीकार भी किया था कि उनके कहने पर ही उनकी पार्टी के सांसद वह भारी रक़म लेकर लोकसभा में आये थे . सारे मामले की जे पी सी जांच भी हुई थी और जे पी से ने सुझाव दिया था कि मामला गंभीर है लेकिन जे पी सी के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि आपराधिक मामलों की जांच कर सके . इसलिए किसी उपयुक्त संस्था से इसकी जांच करवाई जानी चाहिए . जिन लोगों की गहन जांच होनी थी , उसमें बीजेपी के नेता, लाल कृष्ण आडवाणी के विशेष सहायक सुधीन्द्र कुलकर्णी का भी नाम था . कमेटी की जांच के नतीजों के मद्दे नज़र लोकसभा के तत्कालीन अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने आदेश भी दे दिया था कि गृह मंत्रालय को चाहिए कि सारे मामले की जांच करे .लोक सभा के महासचिव ने दिल्ली पुलिस को एक चिट्ठी लिख कर जानकारी दी थी जिसे प्राथामिकी के रूप में रिकार्ड कर लिया गया था . लेकिन कहीं कोई जांच नहीं हुई .जब पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को हडकाया तो जाकर मामला ढर्रे पर आया. अमर सिंह के तत्कालीन सहायक संजीव सक्सेना से पुलिस हिरासत में पूछ ताछ चल रही है .अमर सिंह के ड्राइवर की तलाश की जा रही है लेकिन आडवाणी के सहायक और एक अन्य व्यक्ति जिसके लिए लोक सभा की कमेटी ने जांच का आदेश दिया था , अभी गिरफ्तार नहीं हुए हैं . दिल्ली में सत्ता के गलियारों में जो सवाल पूछे जा रहे हैं ,वे बहुत ही मुखर हैं . सवाल यह है कि क्या सक्सेना और कुलकर्णी टाइप प्यादों की जांच करके ही न्याय हो जाएगा या अमर सिंह और आडवाणी की भी जांच होगी. इसके अलावा कैश फार वोट की राजनीति का लाभ सबसे ज्यादा तो कांग्रेस को मिला था .क्या उनके भी कुछ नेताओं को जांच के दायरे में लिया जायेगा.क्योंकि यह मानना तो बहुत ही मुश्किल है कि कुलकर्णी, सक्सेना या हिन्दुस्तानी अपने मन से संसद सदस्यों को करोड़ों रूपये दे रहे थे. मार्च में जब विकीलीक्स के दस्तावेजों में बात एक बार फिर सामने आई तो बीजेपी वालों को फिर गद्दी नज़र आने लगी थी . आर एस एस के मित्र टेलीविज़न एंकरों ने जिस हाहाकार के साथ मामले को गरमाने की कोशिश की वह बहुत ही अजीब था. बीजेपी ने भी अपने बहुत तल्ख़-ज़बान प्रवक्ताओं को मैदान में उतारा था और मामला बहुत ही मनोरंजक हो गया था . लेकिन बाद में सब कुछ शांत हो गया .यह चुप्पी हैरान करने वाली थी . जानकार बताते हैं कि उस वक़्त बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को अंदाज़ हो गया था कि अगर सही जांच होगी तो अमर सिंह के सहायक और आडवानी के सहायक तक ही मामला सीमित नहीं रहेगा .सब को मालूम है कि लोकसभा में नोटों की गड्डियाँ लहराए जाने के बाद ही लाल कृष्ण आडवाणी ने संसद भवन परिसर में ही टी वी चैनलों को बताया था कि बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को नोटों के बण्डल लोकसभा में लाने की अनुमति दी थी. इस इक़बालिया बयान के बाद लोकसभा में नोटों के बण्डल लहराए जाने के मामले में की गयी साजिश में सक्सेना, कुलकर्णी और अमर सिंह के अलावा आडवानी की भूमिका की भी जांच होना जरूरी है .अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक बार फिर उम्मीद बनी है कि सही जांच होगी . लेकिन जांच का उद्देश्य असली ज़िम्मेदार लोगों को भी पकड़ना होना चाहिए , प्यादों की जांच करके मामले की लीपा पोती की दिल्ली पुलिस और सरकार की हर कोशिश को खारिज किया जाना चाहिए .
Tuesday, July 19, 2011
Thursday, July 14, 2011
आतंक फैलाने वाले मौत के सौदागरों को बेनकाब करने की ज़रुरत
शेष नारायण सिंह
मुंबई में एक बार फिर आतंक का हमला हुआ. तीन भीड़ भरे मुकामों को निशाना बनाया गया . मकसद फिर वही था, आम आदमी के अंदर दहशत भर देना . मुंबई फिर अपने काम काज में लग गयी. आतंकवादी अपने मकसद में कामयाब नहीं हुए . उनके हिसाब में कुछ लोगों का क़त्ल और लिख दिया गया. सरकार ने अपना काम शुरू कर दिया और आम आदमी ने इस तरह से अपना काम करने का फैसला किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. जिन लोगों की जान गयी है उनके परिवार वाले ज़िंदगी भर का दर्द अपने सीने में लेकर जिंदा रहेगें. जो घायल हुए हैं उनकी ज़िंदगी बिलकुल बदल जायेगी. वे आतंक को कभी भी माफ़ नहीं करेगें. पाकिस्तान की फौज और आई एस आई की तरफ से दावा किया जाता है कि भारत में जो लोग भी आतंक फैला रहे हैं, वे किसी अन्याय का बदला ले रहे होते हैं . दुर्भाग्य की बात यह है कि पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी को भी यह बता दिया गया है कि भारत ने कभी कुछ नाइंसाफी की थी ,उसी को दुरुस्त करने के लिए जिया उल हक और परवेज़ मुशर्रफ जैसे फौजी तानाशाहों ने पाकिस्तान की गरीब जनता को आतंकवादी बना कर भारत में भेज दिया था . लेकिन हर आतंकी हमले के बाद यह साफ़ हो जाता है कि मौत के यह सौदागर किसी भी अन्याय के खिलाफ नहीं हैं .यह तो अन्याय का निजाम कायम करने के अभियान को चलाने वाले के हाथ की कठपुतली हैं .
मुंबई के दादर, झवेरी बाज़ार और ओपेरा हाउस में हुए धमाकों के पीछे छुपे इरादों की निंदा पूरी दुनिया में हो रही है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने इस हमले को अपराधी कारनामा बताया है और कहा है कि इसको किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता . इंग्लैण्ड, अमरीका, रूस आदि देशों के नेताओं ने भी मुंबई पर हुए आतंक के हमले की निंदा की है . भारत में भी इस हमले के बाद संतुलन दिख रहा है . आमतौर पर किसी भी आतंकी हमले को पाकिस्तान की साज़िश बता देने वाले मीडिया के उस वर्ग में भी संतुलन नज़र आ रहा है . मीडिया ने मुंबई के ताज़ा आतंक की विस्तार से रिपोर्ट की है लेकिन अभी तक आमतौर पर यही कहा जा रहा है कि हर उस संगठन और मंशा की जांच की जा रही है जो भारत को नुकसान पंहुचा सकते हों . महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री ने साफ़ कह दिया है कि शक़ करने का कोई मतलब नहीं है . मामले की गहराई से जांच की जा रही है . अक्सर ऐसा होता है कि दक्षिण एशिया के इलाके में शान्ति बनाए रखने की कोशिशों को पटरी से उतारने के लिए इस तरह के हमले किये जाते हैं . अगर हमला करने वालों का यह उद्देश्य था तो वे पूरी तरह से नाकाम हो गए हैं . भारत और पाकिस्तान की सरकारों की तरफ से बयान आ गए हैं कि दोनों देशों के विदेश मंत्रालय के बीच जुलाई के अंत में होने वाली बातचीत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. अमरीकी विदेश मंत्री , हिलेरी क्लिंटन की प्रस्तावित भारत यात्रा भी कार्यक्रम के अनुसार ही होगी. यानी कुछ निरीह लोगों की जान लेने के अलावा इस हमले ने कोई भी राजनीतिक मकसद नहीं हासिल किया है. उलटे ऐसा लगता है कि जब भी इस हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान हो जायेगी , उनके समर्थकों के बीच भी उनकी निंदा होगी .
मुंबई पर बुधवार को हुए हमले का एक अहम पक्ष यह भी है कि पाकिस्तान को तुरंत ही ज़िम्मेदार बता देने वाले नेता भी इस बार शांत हैं और आतंक के खिलाफ माहौल बनाने की बात कर रहे हैं . इस बार ऐसा लग रहा है कि भारत और पाकिस्तान के सभ्य समाज के लोगों की तरह वहां की सरकारें भी एक ही तरीके से आतंक की कार्रवाई की निंदा कर रही हैं . इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमले में पाकिस्तानी फौज , आई एस आई या कुछ पाकिस्तानी जनरल शामिल हों . लेकिन लगता है कि पाकिस्तानी फौज के गुनाहों को इस बार पाकिस्तान की सरकार अपने सिर लेने को तैयार नहीं है . अगर ऐसा हुआ तो इसे बहुत ही बड़ी बात के रूप में याद रखा जाएगा .ज़रुरत इस बात की है कि पाकिस्तानी फौज और उसके आतंक के निजाम को अलग थलग किया जाए . यह अजीब लग सकता है लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान में हुकूमत सेना की ही चलती है .पहली बार ऐसा हो रहा है कि पाकिस्तान की तथाकथित सिविलियन सरकार अपनी ही फौज के किसी कारनामे को अपनाने को तैयार नहीं है. ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तानी राष्ट्र और समाज में भी तूफ़ान आया हुआ है . लगता है कि अपनी बेचारगी को दुनिया के सामने रख कर पाकिस्तानी सरकार ने अपनी ही फौज़ को घेरने में शुरुआती सफलता हासिल की है . आगे के राजनीतिक घटनाक्रम में दुनिया का आतंक के प्रति रुख बदलने की क्षमता है . कोशिश की जानी चाहिए कि आतंक के सौदागर जहां भी हों उन्हें पकड़ा जाए और सज़ा दी जाए.
मुंबई में एक बार फिर आतंक का हमला हुआ. तीन भीड़ भरे मुकामों को निशाना बनाया गया . मकसद फिर वही था, आम आदमी के अंदर दहशत भर देना . मुंबई फिर अपने काम काज में लग गयी. आतंकवादी अपने मकसद में कामयाब नहीं हुए . उनके हिसाब में कुछ लोगों का क़त्ल और लिख दिया गया. सरकार ने अपना काम शुरू कर दिया और आम आदमी ने इस तरह से अपना काम करने का फैसला किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. जिन लोगों की जान गयी है उनके परिवार वाले ज़िंदगी भर का दर्द अपने सीने में लेकर जिंदा रहेगें. जो घायल हुए हैं उनकी ज़िंदगी बिलकुल बदल जायेगी. वे आतंक को कभी भी माफ़ नहीं करेगें. पाकिस्तान की फौज और आई एस आई की तरफ से दावा किया जाता है कि भारत में जो लोग भी आतंक फैला रहे हैं, वे किसी अन्याय का बदला ले रहे होते हैं . दुर्भाग्य की बात यह है कि पाकिस्तान की एक बड़ी आबादी को भी यह बता दिया गया है कि भारत ने कभी कुछ नाइंसाफी की थी ,उसी को दुरुस्त करने के लिए जिया उल हक और परवेज़ मुशर्रफ जैसे फौजी तानाशाहों ने पाकिस्तान की गरीब जनता को आतंकवादी बना कर भारत में भेज दिया था . लेकिन हर आतंकी हमले के बाद यह साफ़ हो जाता है कि मौत के यह सौदागर किसी भी अन्याय के खिलाफ नहीं हैं .यह तो अन्याय का निजाम कायम करने के अभियान को चलाने वाले के हाथ की कठपुतली हैं .
मुंबई के दादर, झवेरी बाज़ार और ओपेरा हाउस में हुए धमाकों के पीछे छुपे इरादों की निंदा पूरी दुनिया में हो रही है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने इस हमले को अपराधी कारनामा बताया है और कहा है कि इसको किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता . इंग्लैण्ड, अमरीका, रूस आदि देशों के नेताओं ने भी मुंबई पर हुए आतंक के हमले की निंदा की है . भारत में भी इस हमले के बाद संतुलन दिख रहा है . आमतौर पर किसी भी आतंकी हमले को पाकिस्तान की साज़िश बता देने वाले मीडिया के उस वर्ग में भी संतुलन नज़र आ रहा है . मीडिया ने मुंबई के ताज़ा आतंक की विस्तार से रिपोर्ट की है लेकिन अभी तक आमतौर पर यही कहा जा रहा है कि हर उस संगठन और मंशा की जांच की जा रही है जो भारत को नुकसान पंहुचा सकते हों . महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री ने साफ़ कह दिया है कि शक़ करने का कोई मतलब नहीं है . मामले की गहराई से जांच की जा रही है . अक्सर ऐसा होता है कि दक्षिण एशिया के इलाके में शान्ति बनाए रखने की कोशिशों को पटरी से उतारने के लिए इस तरह के हमले किये जाते हैं . अगर हमला करने वालों का यह उद्देश्य था तो वे पूरी तरह से नाकाम हो गए हैं . भारत और पाकिस्तान की सरकारों की तरफ से बयान आ गए हैं कि दोनों देशों के विदेश मंत्रालय के बीच जुलाई के अंत में होने वाली बातचीत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. अमरीकी विदेश मंत्री , हिलेरी क्लिंटन की प्रस्तावित भारत यात्रा भी कार्यक्रम के अनुसार ही होगी. यानी कुछ निरीह लोगों की जान लेने के अलावा इस हमले ने कोई भी राजनीतिक मकसद नहीं हासिल किया है. उलटे ऐसा लगता है कि जब भी इस हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान हो जायेगी , उनके समर्थकों के बीच भी उनकी निंदा होगी .
मुंबई पर बुधवार को हुए हमले का एक अहम पक्ष यह भी है कि पाकिस्तान को तुरंत ही ज़िम्मेदार बता देने वाले नेता भी इस बार शांत हैं और आतंक के खिलाफ माहौल बनाने की बात कर रहे हैं . इस बार ऐसा लग रहा है कि भारत और पाकिस्तान के सभ्य समाज के लोगों की तरह वहां की सरकारें भी एक ही तरीके से आतंक की कार्रवाई की निंदा कर रही हैं . इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमले में पाकिस्तानी फौज , आई एस आई या कुछ पाकिस्तानी जनरल शामिल हों . लेकिन लगता है कि पाकिस्तानी फौज के गुनाहों को इस बार पाकिस्तान की सरकार अपने सिर लेने को तैयार नहीं है . अगर ऐसा हुआ तो इसे बहुत ही बड़ी बात के रूप में याद रखा जाएगा .ज़रुरत इस बात की है कि पाकिस्तानी फौज और उसके आतंक के निजाम को अलग थलग किया जाए . यह अजीब लग सकता है लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान में हुकूमत सेना की ही चलती है .पहली बार ऐसा हो रहा है कि पाकिस्तान की तथाकथित सिविलियन सरकार अपनी ही फौज के किसी कारनामे को अपनाने को तैयार नहीं है. ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तानी राष्ट्र और समाज में भी तूफ़ान आया हुआ है . लगता है कि अपनी बेचारगी को दुनिया के सामने रख कर पाकिस्तानी सरकार ने अपनी ही फौज़ को घेरने में शुरुआती सफलता हासिल की है . आगे के राजनीतिक घटनाक्रम में दुनिया का आतंक के प्रति रुख बदलने की क्षमता है . कोशिश की जानी चाहिए कि आतंक के सौदागर जहां भी हों उन्हें पकड़ा जाए और सज़ा दी जाए.
Wednesday, July 13, 2011
ए राजा के खिलाफ कुछ भी नहीं सुनना चाहते थे प्रधानमंत्री ,गुरुदास कामत का संकेत
शेष नारायण सिंह
मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद नाराज़ मंत्रियों में वीरप्पा मोइली और श्रीकांत जेना को संभल गए लेकिन मुंबई के नेता गुरुदास कामत ने कांग्रेस आलाकमान को घेरने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है..वे खुद तो माफी मांग रहे हैं लेकिन उनके कुछ ख़ास अफसर एक अजीब मुहिम चला रहे हैं . दिल्ली के सरकारी गलियारों में आज एक चर्चा ज़ोरों पर है कि गुरुदास कामत को इसलिए डिमोट किया गया कि उन्होंने ए राजा के अधीन काम करते हुए तत्कालीन संचार मंत्री के काले कारनामों के बारे में एक चिठ्ठी प्रधान मंत्री को लिख कर भेज दी थी. जिसमें जो कुछ लिखा है बाद में वही सब कुछ सी ए जी की मार्फत पब्लिक डोमेन में आया था. उनके चेला टाइप अफसरों ने राजनीतिक हलकों में यह खबर कुछ पत्रकारों के ज़रिये चलाने की कोशिश की है. बताया जा रहा है कि ए राजा जब टू जी स्पेक्ट्रम में गड़बड़ी कर रहे थे तो गुरुदास कामत ने प्रधान मंत्री को सारी जानकारी एक पत्र लिख कर भेज दी थी. लेकिन उन्हें प्रधान मंत्री कार्यालय से यह सन्देश आया कि उस पत्र में लिखी गयी बातों को थोडा हल्का कर दें . खुसुर फुसुर अभियान में बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में उन्होंने पत्र को बदल भी दिया था. अभियान में जुड़े अफसरों की टोन यह है कि गुरुदास कामत जैसा पवित्र आत्मा भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं कर पाया इसलिए उन्होंने उन्होंने पत्र लिख दिया था लेकिन प्रधान मंत्री कार्यालय और कांग्रेस की टाप लीडरशिप के पास फुर्सत ही नहीं थी कि वह ए राजा के खिलाफ कुछ सुन सके. . इस गंभीर बात के बारे में जब कुछ जानकारी हासिल करने की कोशिश की गयी तो अजीब बातें सामने आयीं. पता चला कि कि गुरुदास कामत ने ए राजा की शिकायत तो प्रधानमंत्री से की थी लेकिन उनका मकसद भ्रष्ट्राचार का खात्मा नहीं था. टू जी स्पेक्ट्रम में गले तक डूबे हुए विनोद गोयनका नाम के व्यक्ति ने शुरू में गुरुदास कामत से ही संपर्क साधा था. शायद ऐसा इसलिए था कि गुरुदास कामत उन दिनों संचार मंत्रालय में ए राजा के मातहत राज्य मंत्री थे . लेकिन बाद में विनोद गोयनका ने सीधे ए राजा से सम्बन्ध बना लिया. बताया जा रहा है कि जब गुरुदास कामत ने उससे अपनी बात की तो उसने टका सा जवाब दे दिया और कामत को कुछ भी देने से इनकार कर दिया . इसकी शिकायत लेकर गुरुदास कामत महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नेता के पास भी गए. उन नेता जी के हस्तक्षेप के बाद कुछ सुलह सफाई हो गयी लेकिन विनोद गोयनका ने जो कुछ देने का प्रस्ताव किया वह बहुत कम था . गुरुदास कामत अपने को ए राजा से बड़ा नेता मानते थे . ए राजा की तुलना में उनको मिलने वाली रक़म बहुत कम थी. बात बढ़ गयी और पिछली फेरबदल में कामत को संचार मंत्रालय से हटा दिया गया. लेकिन जब उन्होंने इस बार के फेरबदल के पहले अपने उस पुराने पत्र का ज़िक्र करके दबाव बनाने की कोशिश की तो कांग्रेस आलाकमान को उनका यह तरीका बहुत नागवार गुज़रा और उनको बहुत ही मामूली विभाग देने का फैसला कर लिया गया. देखना है कि इस जानकारी के सार्वजनिक डोमेन में आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व उनको वास्तव में दण्डित करता है या उनके उस पत्र के डरकर उन्हें फिर से सम्मानित करता है .
गुरुदास कामत के इस प्रचार अभियान के जुटे साथी बताते हैं कि जिस तरह से वित्त मंत्री के रूप में मोरारजी देसाई ने तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की विदेश यात्रा के दौरान किये गए कुछ खर्चों पर आपत्ति दर्ज करवा कर ईमानदारी की एक मिसाल कायम की थी ,उसी तरह से गुरुदास कामत ने भी ईमानदारी की मिसाल कायम की है. लेकिन आर्थिक अपराध के जानकारों का कहना है कि अगर यह साबित हो गया कि ए राजा जब आपराध कर रहे थे ,उस वक़्त गुरुदास कामत को मालूम था कि अपराध हो रहा है और उन्होंने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की तो उनको भी पकड़ा जा सकता है . वैसे भी राजा के खिलाफ जब से जांच शुरू हुई है उसके बाद भी गुरुदास कामत ने सी बी आई को इतनी अहम जानकारी नहीं दी तो उनकी नीयत पर सवाल उठेगें. सवाल उठता है कि राष्ट्रहित और जनहित की इतनी बड़ी जानकारी को उन्होंने सही एजेंसी के पास न पंहुचा कर अपनी पार्टी की टाप लीडरशिप पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करके अपना हित तो साधा है लेकिन क्या उन्होंने जनहित की अनदेखी नहीं की. यह देखना बभी दिलचस्प होगा कि क्या इस नई जानकारी के अफवाह के रूप में चलाये जाने के बाद सी बी आई इस सन्दर्भ में कोई कार्रवाई करेगी.
मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद नाराज़ मंत्रियों में वीरप्पा मोइली और श्रीकांत जेना को संभल गए लेकिन मुंबई के नेता गुरुदास कामत ने कांग्रेस आलाकमान को घेरने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है..वे खुद तो माफी मांग रहे हैं लेकिन उनके कुछ ख़ास अफसर एक अजीब मुहिम चला रहे हैं . दिल्ली के सरकारी गलियारों में आज एक चर्चा ज़ोरों पर है कि गुरुदास कामत को इसलिए डिमोट किया गया कि उन्होंने ए राजा के अधीन काम करते हुए तत्कालीन संचार मंत्री के काले कारनामों के बारे में एक चिठ्ठी प्रधान मंत्री को लिख कर भेज दी थी. जिसमें जो कुछ लिखा है बाद में वही सब कुछ सी ए जी की मार्फत पब्लिक डोमेन में आया था. उनके चेला टाइप अफसरों ने राजनीतिक हलकों में यह खबर कुछ पत्रकारों के ज़रिये चलाने की कोशिश की है. बताया जा रहा है कि ए राजा जब टू जी स्पेक्ट्रम में गड़बड़ी कर रहे थे तो गुरुदास कामत ने प्रधान मंत्री को सारी जानकारी एक पत्र लिख कर भेज दी थी. लेकिन उन्हें प्रधान मंत्री कार्यालय से यह सन्देश आया कि उस पत्र में लिखी गयी बातों को थोडा हल्का कर दें . खुसुर फुसुर अभियान में बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में उन्होंने पत्र को बदल भी दिया था. अभियान में जुड़े अफसरों की टोन यह है कि गुरुदास कामत जैसा पवित्र आत्मा भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं कर पाया इसलिए उन्होंने उन्होंने पत्र लिख दिया था लेकिन प्रधान मंत्री कार्यालय और कांग्रेस की टाप लीडरशिप के पास फुर्सत ही नहीं थी कि वह ए राजा के खिलाफ कुछ सुन सके. . इस गंभीर बात के बारे में जब कुछ जानकारी हासिल करने की कोशिश की गयी तो अजीब बातें सामने आयीं. पता चला कि कि गुरुदास कामत ने ए राजा की शिकायत तो प्रधानमंत्री से की थी लेकिन उनका मकसद भ्रष्ट्राचार का खात्मा नहीं था. टू जी स्पेक्ट्रम में गले तक डूबे हुए विनोद गोयनका नाम के व्यक्ति ने शुरू में गुरुदास कामत से ही संपर्क साधा था. शायद ऐसा इसलिए था कि गुरुदास कामत उन दिनों संचार मंत्रालय में ए राजा के मातहत राज्य मंत्री थे . लेकिन बाद में विनोद गोयनका ने सीधे ए राजा से सम्बन्ध बना लिया. बताया जा रहा है कि जब गुरुदास कामत ने उससे अपनी बात की तो उसने टका सा जवाब दे दिया और कामत को कुछ भी देने से इनकार कर दिया . इसकी शिकायत लेकर गुरुदास कामत महाराष्ट्र के एक बहुत बड़े नेता के पास भी गए. उन नेता जी के हस्तक्षेप के बाद कुछ सुलह सफाई हो गयी लेकिन विनोद गोयनका ने जो कुछ देने का प्रस्ताव किया वह बहुत कम था . गुरुदास कामत अपने को ए राजा से बड़ा नेता मानते थे . ए राजा की तुलना में उनको मिलने वाली रक़म बहुत कम थी. बात बढ़ गयी और पिछली फेरबदल में कामत को संचार मंत्रालय से हटा दिया गया. लेकिन जब उन्होंने इस बार के फेरबदल के पहले अपने उस पुराने पत्र का ज़िक्र करके दबाव बनाने की कोशिश की तो कांग्रेस आलाकमान को उनका यह तरीका बहुत नागवार गुज़रा और उनको बहुत ही मामूली विभाग देने का फैसला कर लिया गया. देखना है कि इस जानकारी के सार्वजनिक डोमेन में आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व उनको वास्तव में दण्डित करता है या उनके उस पत्र के डरकर उन्हें फिर से सम्मानित करता है .
गुरुदास कामत के इस प्रचार अभियान के जुटे साथी बताते हैं कि जिस तरह से वित्त मंत्री के रूप में मोरारजी देसाई ने तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू की विदेश यात्रा के दौरान किये गए कुछ खर्चों पर आपत्ति दर्ज करवा कर ईमानदारी की एक मिसाल कायम की थी ,उसी तरह से गुरुदास कामत ने भी ईमानदारी की मिसाल कायम की है. लेकिन आर्थिक अपराध के जानकारों का कहना है कि अगर यह साबित हो गया कि ए राजा जब आपराध कर रहे थे ,उस वक़्त गुरुदास कामत को मालूम था कि अपराध हो रहा है और उन्होंने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की तो उनको भी पकड़ा जा सकता है . वैसे भी राजा के खिलाफ जब से जांच शुरू हुई है उसके बाद भी गुरुदास कामत ने सी बी आई को इतनी अहम जानकारी नहीं दी तो उनकी नीयत पर सवाल उठेगें. सवाल उठता है कि राष्ट्रहित और जनहित की इतनी बड़ी जानकारी को उन्होंने सही एजेंसी के पास न पंहुचा कर अपनी पार्टी की टाप लीडरशिप पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करके अपना हित तो साधा है लेकिन क्या उन्होंने जनहित की अनदेखी नहीं की. यह देखना बभी दिलचस्प होगा कि क्या इस नई जानकारी के अफवाह के रूप में चलाये जाने के बाद सी बी आई इस सन्दर्भ में कोई कार्रवाई करेगी.
Sunday, July 10, 2011
सैम पित्रोदा के साथ आविष्कार क्रान्ति की तरफ बढ़ने का वक़्त आ गया है .
शेष नारायण सिंह
सैम पित्रोदा ने एक नई बात कहना शुरू कर दिया है . उनकी बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत इसलिए है कि मेरे जैसे जिन लोगों ने १९८४ में उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया था,बाद में उन्हें पछताना पड़ा था. उन दिनों अपने देश में टेलीफोन होना स्टेटस सिम्बल माना जाता था. बहुत कम लोगों के घरों में टेलीफोन के कनेक्शन होते थे . टेलीफोन लगाने के लिए दरखास्त देने के कई साल बाद लोगों के नंबर आते थे. इंदिरा गाँधी का राज था और टेलीफोन का काम देखने वाला मंत्रालय ऐसे मंत्री के हवाले कर दिया जाता था जिसकी राजनीतिक हैसियत बहुत मामूली होती थी. . जिसको सज़ा देनी हो वही संचार मंत्री बनाया जाता था. सैम पित्रोदा उन दिनों अमरीका में बहुत नाम कमा चुके थे ,संचार के क्षेत्र में उनका बड़ा नाम था . बताते हैं कि उनके अंदर मातृभूमि के प्रति प्रेम इतना ज्यादा था कि उन्होंने अपना अमरीका का बहुत बड़ा कारोबार छोड़कर भारत में सूचना क्रान्ति की बुनियाद रखने की योजना बनायी .किसी परिचित के हवाले से तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से मिले .इंदिरा जी ने उनकी बात सुनी और उनको लगभग टाल दिया . लेकिन उनका दिल रखने के लिए उन्हें राजीव गाँधी के पास भेज दिया . राजीव गाँधी उन दिनों राजनीति में शुरुआती प्रशिक्षण ले रहे थे . इंदिरा गाँधी के सामने सैम पित्रोदा ने जो प्रस्ताव रखा था ,उसी को उन्होंने राजीव गाँधी को सुना दिया . राजीव गाँधी इलेक्ट्रानिक गैजेट्स के बहुत शौक़ीन थे. उन्होंने सैम पित्रोदा की बात को समझा और उन्हें फिर इंदिरा गाँधी के सामने पेश किया . बेटे के कहने पर इंदिरा गाँधी ने कुछ धन की व्यवस्था कर दी और देश में संचार क्रान्ति की बुनियाद पड़ गयी . उस दौर में सब को मालूम था कि इंदिरा जी ने सैम सैम पित्रोदा को गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन अपने बेटे की बात मान कर उनको कुछ काम दे दिया था. हालांकि यह सच है कि सैम पित्रोदा किसी काम की तलाश में नहीं थे ,वे अपने देश में संचार की व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहते थे. बहरहाल उसके बाद ही सी-डाट की शुरुआत हुई और टेलीफोन टेक्नालोजी के क्षेत्र में दुनिया के बड़े बड़े दिग्गज सैम पित्रोदा के ज्ञान का लोहा मानने लगे. राजीव गाँधी जब प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने सैम पित्रोदा को अपने आविष्कारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए खुली छूट दे दी और आज दुनिया जानती है कि सैम पित्रोदा के उसी प्रयास का नतीजा है कि संचार क्रान्ति आ चुकी है . संचार क्रान्ति की दुनिया में भारत अग्रणी देश है . दुनिया भर की कम्पनियां भारत में काम करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं . दुनिया भर के काल सेंटर , इन्फार्मेशन टेक्नालोजी के क्षेत्र में निर्यात सब उसी संचार क्रान्ति का नतीजा है . सैम पित्रोदा के आने के पहले टेलीफोन विभाग के बाहर लोग लाइन में खड़े होते थे और ट्रंककाल करने की लाइन लगती थी. आज सब की जेब में ऐसी मशीन रहती है कि दुनिया के किसी कोने में आसानी से बात हो जाती है . मेरे जैसे बहुत सारे लोगों ने अस्सी के दशक में सैम पित्रोदा के काम पर हो रहे खर्च को राजीव गांधी की सरकार के शौक़ की चीज़ माना था . बाद में हमने अपनी राय बदली और अब हम भी उसी संचार क्रान्ति का आनंद ले रहे हैं.
सैम पित्रोदा ने फिर आवाज़ दी है कि इस बार ज्ञान की क्रान्ति लाने की ज़रुरत है . जब तक बच्चे लीक से हट कर नई शिक्षा नहीं हासिल करेगें तब तक कुछ नहीं होने वाला है . शिक्षा के परंपरागत हथियारों को भूल कर नए हथियारों के ज़रिये ही ज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति लायी जा सकती है .उनकी कोशिश है कि मैकाले ने जिस तरह की शिक्षा की बात की थी उस से आविष्कार करने वाले दिमाग नहीं पैदा होगें . शिक्षा की तरकीबों में मौलिक बदलाव की ज़रुरत है . उसके बिना काम नहीं चलने वाला है .सैम पित्रोदा का पुराना रिकार्ड ऐसा है कि उनकी बात पर विश्वास करके लाभ होगा. इसलिए अब अपने देश को ऐसे नौजवानों का स्वागत करने को तैयार हो जाना चाहिए जिनका दिमाग आविष्कार की तरफ मुड़ चुका हो
सैम पित्रोदा ने एक नई बात कहना शुरू कर दिया है . उनकी बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत इसलिए है कि मेरे जैसे जिन लोगों ने १९८४ में उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया था,बाद में उन्हें पछताना पड़ा था. उन दिनों अपने देश में टेलीफोन होना स्टेटस सिम्बल माना जाता था. बहुत कम लोगों के घरों में टेलीफोन के कनेक्शन होते थे . टेलीफोन लगाने के लिए दरखास्त देने के कई साल बाद लोगों के नंबर आते थे. इंदिरा गाँधी का राज था और टेलीफोन का काम देखने वाला मंत्रालय ऐसे मंत्री के हवाले कर दिया जाता था जिसकी राजनीतिक हैसियत बहुत मामूली होती थी. . जिसको सज़ा देनी हो वही संचार मंत्री बनाया जाता था. सैम पित्रोदा उन दिनों अमरीका में बहुत नाम कमा चुके थे ,संचार के क्षेत्र में उनका बड़ा नाम था . बताते हैं कि उनके अंदर मातृभूमि के प्रति प्रेम इतना ज्यादा था कि उन्होंने अपना अमरीका का बहुत बड़ा कारोबार छोड़कर भारत में सूचना क्रान्ति की बुनियाद रखने की योजना बनायी .किसी परिचित के हवाले से तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से मिले .इंदिरा जी ने उनकी बात सुनी और उनको लगभग टाल दिया . लेकिन उनका दिल रखने के लिए उन्हें राजीव गाँधी के पास भेज दिया . राजीव गाँधी उन दिनों राजनीति में शुरुआती प्रशिक्षण ले रहे थे . इंदिरा गाँधी के सामने सैम पित्रोदा ने जो प्रस्ताव रखा था ,उसी को उन्होंने राजीव गाँधी को सुना दिया . राजीव गाँधी इलेक्ट्रानिक गैजेट्स के बहुत शौक़ीन थे. उन्होंने सैम पित्रोदा की बात को समझा और उन्हें फिर इंदिरा गाँधी के सामने पेश किया . बेटे के कहने पर इंदिरा गाँधी ने कुछ धन की व्यवस्था कर दी और देश में संचार क्रान्ति की बुनियाद पड़ गयी . उस दौर में सब को मालूम था कि इंदिरा जी ने सैम सैम पित्रोदा को गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन अपने बेटे की बात मान कर उनको कुछ काम दे दिया था. हालांकि यह सच है कि सैम पित्रोदा किसी काम की तलाश में नहीं थे ,वे अपने देश में संचार की व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहते थे. बहरहाल उसके बाद ही सी-डाट की शुरुआत हुई और टेलीफोन टेक्नालोजी के क्षेत्र में दुनिया के बड़े बड़े दिग्गज सैम पित्रोदा के ज्ञान का लोहा मानने लगे. राजीव गाँधी जब प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने सैम पित्रोदा को अपने आविष्कारों की दिशा में आगे बढ़ने के लिए खुली छूट दे दी और आज दुनिया जानती है कि सैम पित्रोदा के उसी प्रयास का नतीजा है कि संचार क्रान्ति आ चुकी है . संचार क्रान्ति की दुनिया में भारत अग्रणी देश है . दुनिया भर की कम्पनियां भारत में काम करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं . दुनिया भर के काल सेंटर , इन्फार्मेशन टेक्नालोजी के क्षेत्र में निर्यात सब उसी संचार क्रान्ति का नतीजा है . सैम पित्रोदा के आने के पहले टेलीफोन विभाग के बाहर लोग लाइन में खड़े होते थे और ट्रंककाल करने की लाइन लगती थी. आज सब की जेब में ऐसी मशीन रहती है कि दुनिया के किसी कोने में आसानी से बात हो जाती है . मेरे जैसे बहुत सारे लोगों ने अस्सी के दशक में सैम पित्रोदा के काम पर हो रहे खर्च को राजीव गांधी की सरकार के शौक़ की चीज़ माना था . बाद में हमने अपनी राय बदली और अब हम भी उसी संचार क्रान्ति का आनंद ले रहे हैं.
सैम पित्रोदा ने फिर आवाज़ दी है कि इस बार ज्ञान की क्रान्ति लाने की ज़रुरत है . जब तक बच्चे लीक से हट कर नई शिक्षा नहीं हासिल करेगें तब तक कुछ नहीं होने वाला है . शिक्षा के परंपरागत हथियारों को भूल कर नए हथियारों के ज़रिये ही ज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति लायी जा सकती है .उनकी कोशिश है कि मैकाले ने जिस तरह की शिक्षा की बात की थी उस से आविष्कार करने वाले दिमाग नहीं पैदा होगें . शिक्षा की तरकीबों में मौलिक बदलाव की ज़रुरत है . उसके बिना काम नहीं चलने वाला है .सैम पित्रोदा का पुराना रिकार्ड ऐसा है कि उनकी बात पर विश्वास करके लाभ होगा. इसलिए अब अपने देश को ऐसे नौजवानों का स्वागत करने को तैयार हो जाना चाहिए जिनका दिमाग आविष्कार की तरफ मुड़ चुका हो
Friday, July 8, 2011
पाक प्रधानमंत्री ने कहा -उनके मुल्क के अस्तित्व को ख़तरा
शेष नारायण सिंह
पाकिस्तान बुरी तरह से आतंकवाद के घेरे में फंस गया है.वहां के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गीलानी ने बुधवार को अपने मुल्क की परेशानी का बहुत ही साफ़ शब्दों में उल्लेख किया . बहुत ही दुखी मन से उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई उनका देश लड़ रहा है, उसमें सफल होना बहुत ज़रूरी है . उन्होंने आगाह किया कि अगर पाकिस्तानी राष्ट्र के अस्तित्व को बचाना है तो सरकार और देश की जनता को इस लड़ाई में फतह हासिल करनी पड़ेगी. पाकिस्तानी प्रधान मंत्री क यह दर्द जायज़ है . बहुत तकलीफ होती है जब हम देखते हैं कि पाकिस्तान पूरी तरह से आजकल आतंकवाद की ज़द में है . भारत और पाकिस्तान की अंदरूनी हालात पर जब नज़र डालते हैं तो साफ़ नज़र आता है कि गलत राजनीतिक फैसलों के चलते राष्ट्रों की क्या फजीहत हो सकती है .भारत और पाकिस्तान एक ही दिन ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद हुए थे.भारत ने सभी धर्मों को सम्मान देने की राजनीति को अपने संविधान की बुनियाद में डाल दिया . पाकिस्तान के संस्थापक,मुहम्मद अली जिन्नाह भी वही चाहते थे लेकिन वह नहीं हो सका.उनकी मृत्यु के बड़ा पाकिस्तान में ऐसे लोगों की सत्ता कायम हो गयी जो बहुत ही हलके लोग थे .आज आलम यह है कि भारत एक सुपरपावर बनने के रास्ते पर है और पाकिस्तान का प्रधानमंत्री स्वीकार कर रहा है कि जिस आतंकवाद को पाकिस्तानी हुक्मरान ने भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए शुरू किया और पाला पोसा उसी के चलते आज पाकिस्तानी राष्ट्र के सामने अस्तित्व का सवाल पैदा हो गया है . हालांकि जब पाकिस्तान के पूर्व फौजी तानाशाह,जनरल जिया उल हक ने आतंकवाद को जिहाद का नाम देने की कोशिश की थी.हो सकता है ऐसा रहा भी हो लेकिन आज तो यह कुछ लोगों का बाकायदा धंधा बन चुका है.पाकिस्तानी समाज में जिस तरह से रेडिकल तत्व हावी हुए हैं वह किसी भी सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं . युसूफ रजा गीलानी अपने देश के शहर, मिंगोरा में आयोजित रेडिकल तत्वों को खत्म करने के राष्ट्रीय सेमिनार में भाषण कर रहे थे.उन्होंने दावा किया कि वे अपने देश से आतंकवाद को ख़त्म कर देगें.उनको भरोसा है कि उनके देश की जनता इस मुहिम में पाकिस्तान की सरकार को पूरी मदद करेगी. उनके हिसाब से पाकिस्तान आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है .पाकिस्तान की सरकार की नीयत पर बाकी दुनिया में भरोसा नहीं किया जा रहा है . इस बात का अंदाज़ इस सेमिनार में भी लग गया .पाकिस्तान में आतंकवाद के फलने फूलने में वहां की फौज और आई एस आई का बड़ा हाथ माना जाता है लेकिन इस सेमिनार में पाकिस्तानी फौज़ के मुखिया जनरल परवेज़ अशफाक कयानी ने भी भाषण किया . ज़ाहिर है कि प्रधान मंत्री गीलानी ने जो भी बातें कहीं वे अमरीका और भारत को नज़र में रख कर कहीं गयी थीं क्योंकि यही दो मुल्क पाकिस्तान से बार बार निवेदन कर रहे हैं कि है वह अपने देश से आतंकवाद का खात्मा करे. हालांकि यह भी उतना ही सच है कि न तो अमरीका और न ही भारत को यह विश्वास है कि पाकिस्तानी फौज आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर क़दम उठायेगी. कुछ संवेदन हीन लोग पाकिस्तानी आतंकवाद को इस्लामी आतंकवाद भी कहते हैं . यह बहुत ही गलत बात है क्योंकि आतंकवाद इस्लामी नहीं हो सकता. इस्लाम में आतंकवाद की कोई गुंजाइश नहीं है .वह स्वार्थी लोगों की तरफ से राजनीतिक फायदे के लिए किया जाने वाला काम है . मुलिम नौजवानों के शामिल होने की वजह से उसे 'इस्लामी आतंकवाद' नाम देने की कोशिश की जाती है . जो कि सरासर गलत है . अमरीकी अखबारों, भारतीय दक्षिणपंथी राजनेताओं और अमरीकी सरकार की तरफ से कोशिश होती है और उन्हें इस प्रचार में आंशिक सफलता भी मिलती है .
सच्चाई यह है कि अगर सही माहौल मिले तो मुसलमान आतंक को कभी भी राजनीतिक हथियार नहीं बनाएगा. जो अमरीका, पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों को लगभग पूरी तरह से आतंकवाद का केंद्र मानता है वही अमरीका भारत के मुसलमानों को आतंकवाद से बहुत दूर मानता है . यह देखना दिलचस्प होगा कि पिछले दिनों भारत में तैनात अमरीकी राजदूत डेविड मुलफोर्ड ने समय समय पर अपनी सरकार के पास जो गुप्त रिपोर्टें भेजी थीं ,उसमें उन्होंने साफ़ कहा था को भारत में पंद्रह करोड़ से ज्यादा मुसलमान हैं लेकिन वे अपने आप को हर तरह की आतंकवादी गतिविधियों से दूर रखते हैं . उन्होंने दावा किया कि भारत के मुसलमान अपने देश के जीवंत लोकतंत्र में पूरी तरह से शामिल हैं .साझा संस्कृति पर गर्व करते हैं और भारत के अल्पसंख्यक राष्ट्रवादी हैं. अमरीकी राजदूत का यह कथन किसी कूटनीतिक सभा में दिया भाषण नहीं है . यह विकीलीक्स के हवाले से दुनिया को मालूम हुआ है और यह उन गुप्त दस्तावजों का हिस्सा है जो प्रतिष्ठित अखबार ' हिन्दू 'के सहयोग से विकीलीक्स ने भारत में जारी किया था.डिस्पैच में लिखा है कि भारत के बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी राजनीति में विश्वास करते हैं और अपने देश के उद्योग और समाज में अच्छे मुकाम पर पंहुचने की कोशिश करते हैं .उन्होंने दावा किया कि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवान मुख्य धारा में ही अपनी तरक्की के अवसर तलाशते हैं इसलिए यहाँ से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए रंगरूट नहीं मिल रहे हैं .डेविड मुलफोर्ड ने लिखा है कि भारत में भी इस्लाम में विश्वास करने वाले लोग कई समुदायों में बँटे हुए हैं लेकिन वे सभी राजनीति के सेकुलर धाराओं में हे एसक्रिया होते हैं . धार्मिक अपील वाले संगठनों को भारत में कोई भी समर्थन नहीं मिलता . वे हाशिये पर ही रहते हैं .जबकि भारत में सभी धर्मों के नौजवानों के हीरो आजकल मुस्लिम नौजवान ही हैं . मुलफोर्ड के डिस्पैच में शाहरुख खां ,आमिर खान और सलमान खान का ज़िक्र भी है जो सभी धर्मों के नौजवानों के प्रिय हैं.
अजीब बात है कि शुरू से की पाकिस्तान के साथ खड़े होने वाले अमरीका को अब पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है जबकि अमरीका ने पाकिस्तान के बराबर साबित करने के चक्कर में हमेशा से ही भारतक अविरोध किया था . १९७१ के बंगलादेश मुक्ति संग्रामके दौरान तो पाकिस्तान की फौजी हुकूमत को बचाए रखने के लिए उसने भारत पर सातवें बेडे के हमले की योजना भी बना दी थी .लेकिन आज उसी अमरीका को भारत में जीवंत लोकतंत्र नज़र आ रहा है जबकि पाकिस्तान को वह आतंकवादी देश घोषित करने की योजना पर काम कर रहा है.
पाकिस्तान बुरी तरह से आतंकवाद के घेरे में फंस गया है.वहां के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गीलानी ने बुधवार को अपने मुल्क की परेशानी का बहुत ही साफ़ शब्दों में उल्लेख किया . बहुत ही दुखी मन से उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई उनका देश लड़ रहा है, उसमें सफल होना बहुत ज़रूरी है . उन्होंने आगाह किया कि अगर पाकिस्तानी राष्ट्र के अस्तित्व को बचाना है तो सरकार और देश की जनता को इस लड़ाई में फतह हासिल करनी पड़ेगी. पाकिस्तानी प्रधान मंत्री क यह दर्द जायज़ है . बहुत तकलीफ होती है जब हम देखते हैं कि पाकिस्तान पूरी तरह से आजकल आतंकवाद की ज़द में है . भारत और पाकिस्तान की अंदरूनी हालात पर जब नज़र डालते हैं तो साफ़ नज़र आता है कि गलत राजनीतिक फैसलों के चलते राष्ट्रों की क्या फजीहत हो सकती है .भारत और पाकिस्तान एक ही दिन ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद हुए थे.भारत ने सभी धर्मों को सम्मान देने की राजनीति को अपने संविधान की बुनियाद में डाल दिया . पाकिस्तान के संस्थापक,मुहम्मद अली जिन्नाह भी वही चाहते थे लेकिन वह नहीं हो सका.उनकी मृत्यु के बड़ा पाकिस्तान में ऐसे लोगों की सत्ता कायम हो गयी जो बहुत ही हलके लोग थे .आज आलम यह है कि भारत एक सुपरपावर बनने के रास्ते पर है और पाकिस्तान का प्रधानमंत्री स्वीकार कर रहा है कि जिस आतंकवाद को पाकिस्तानी हुक्मरान ने भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए शुरू किया और पाला पोसा उसी के चलते आज पाकिस्तानी राष्ट्र के सामने अस्तित्व का सवाल पैदा हो गया है . हालांकि जब पाकिस्तान के पूर्व फौजी तानाशाह,जनरल जिया उल हक ने आतंकवाद को जिहाद का नाम देने की कोशिश की थी.हो सकता है ऐसा रहा भी हो लेकिन आज तो यह कुछ लोगों का बाकायदा धंधा बन चुका है.पाकिस्तानी समाज में जिस तरह से रेडिकल तत्व हावी हुए हैं वह किसी भी सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं . युसूफ रजा गीलानी अपने देश के शहर, मिंगोरा में आयोजित रेडिकल तत्वों को खत्म करने के राष्ट्रीय सेमिनार में भाषण कर रहे थे.उन्होंने दावा किया कि वे अपने देश से आतंकवाद को ख़त्म कर देगें.उनको भरोसा है कि उनके देश की जनता इस मुहिम में पाकिस्तान की सरकार को पूरी मदद करेगी. उनके हिसाब से पाकिस्तान आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है .पाकिस्तान की सरकार की नीयत पर बाकी दुनिया में भरोसा नहीं किया जा रहा है . इस बात का अंदाज़ इस सेमिनार में भी लग गया .पाकिस्तान में आतंकवाद के फलने फूलने में वहां की फौज और आई एस आई का बड़ा हाथ माना जाता है लेकिन इस सेमिनार में पाकिस्तानी फौज़ के मुखिया जनरल परवेज़ अशफाक कयानी ने भी भाषण किया . ज़ाहिर है कि प्रधान मंत्री गीलानी ने जो भी बातें कहीं वे अमरीका और भारत को नज़र में रख कर कहीं गयी थीं क्योंकि यही दो मुल्क पाकिस्तान से बार बार निवेदन कर रहे हैं कि है वह अपने देश से आतंकवाद का खात्मा करे. हालांकि यह भी उतना ही सच है कि न तो अमरीका और न ही भारत को यह विश्वास है कि पाकिस्तानी फौज आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर क़दम उठायेगी. कुछ संवेदन हीन लोग पाकिस्तानी आतंकवाद को इस्लामी आतंकवाद भी कहते हैं . यह बहुत ही गलत बात है क्योंकि आतंकवाद इस्लामी नहीं हो सकता. इस्लाम में आतंकवाद की कोई गुंजाइश नहीं है .वह स्वार्थी लोगों की तरफ से राजनीतिक फायदे के लिए किया जाने वाला काम है . मुलिम नौजवानों के शामिल होने की वजह से उसे 'इस्लामी आतंकवाद' नाम देने की कोशिश की जाती है . जो कि सरासर गलत है . अमरीकी अखबारों, भारतीय दक्षिणपंथी राजनेताओं और अमरीकी सरकार की तरफ से कोशिश होती है और उन्हें इस प्रचार में आंशिक सफलता भी मिलती है .
सच्चाई यह है कि अगर सही माहौल मिले तो मुसलमान आतंक को कभी भी राजनीतिक हथियार नहीं बनाएगा. जो अमरीका, पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों को लगभग पूरी तरह से आतंकवाद का केंद्र मानता है वही अमरीका भारत के मुसलमानों को आतंकवाद से बहुत दूर मानता है . यह देखना दिलचस्प होगा कि पिछले दिनों भारत में तैनात अमरीकी राजदूत डेविड मुलफोर्ड ने समय समय पर अपनी सरकार के पास जो गुप्त रिपोर्टें भेजी थीं ,उसमें उन्होंने साफ़ कहा था को भारत में पंद्रह करोड़ से ज्यादा मुसलमान हैं लेकिन वे अपने आप को हर तरह की आतंकवादी गतिविधियों से दूर रखते हैं . उन्होंने दावा किया कि भारत के मुसलमान अपने देश के जीवंत लोकतंत्र में पूरी तरह से शामिल हैं .साझा संस्कृति पर गर्व करते हैं और भारत के अल्पसंख्यक राष्ट्रवादी हैं. अमरीकी राजदूत का यह कथन किसी कूटनीतिक सभा में दिया भाषण नहीं है . यह विकीलीक्स के हवाले से दुनिया को मालूम हुआ है और यह उन गुप्त दस्तावजों का हिस्सा है जो प्रतिष्ठित अखबार ' हिन्दू 'के सहयोग से विकीलीक्स ने भारत में जारी किया था.डिस्पैच में लिखा है कि भारत के बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी राजनीति में विश्वास करते हैं और अपने देश के उद्योग और समाज में अच्छे मुकाम पर पंहुचने की कोशिश करते हैं .उन्होंने दावा किया कि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवान मुख्य धारा में ही अपनी तरक्की के अवसर तलाशते हैं इसलिए यहाँ से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए रंगरूट नहीं मिल रहे हैं .डेविड मुलफोर्ड ने लिखा है कि भारत में भी इस्लाम में विश्वास करने वाले लोग कई समुदायों में बँटे हुए हैं लेकिन वे सभी राजनीति के सेकुलर धाराओं में हे एसक्रिया होते हैं . धार्मिक अपील वाले संगठनों को भारत में कोई भी समर्थन नहीं मिलता . वे हाशिये पर ही रहते हैं .जबकि भारत में सभी धर्मों के नौजवानों के हीरो आजकल मुस्लिम नौजवान ही हैं . मुलफोर्ड के डिस्पैच में शाहरुख खां ,आमिर खान और सलमान खान का ज़िक्र भी है जो सभी धर्मों के नौजवानों के प्रिय हैं.
अजीब बात है कि शुरू से की पाकिस्तान के साथ खड़े होने वाले अमरीका को अब पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है जबकि अमरीका ने पाकिस्तान के बराबर साबित करने के चक्कर में हमेशा से ही भारतक अविरोध किया था . १९७१ के बंगलादेश मुक्ति संग्रामके दौरान तो पाकिस्तान की फौजी हुकूमत को बचाए रखने के लिए उसने भारत पर सातवें बेडे के हमले की योजना भी बना दी थी .लेकिन आज उसी अमरीका को भारत में जीवंत लोकतंत्र नज़र आ रहा है जबकि पाकिस्तान को वह आतंकवादी देश घोषित करने की योजना पर काम कर रहा है.
Tuesday, July 5, 2011
इन्हें मंत्री बनाना ही गलत था
शेष नारायण सिंह
आज अखबारों में एक दिलचस्प खबर छपी है कि केंद्रीय मंत्री मुरली देवड़ा ने प्रधान मंत्री से कहा है कि उन्हें मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाए .इस खबर को पढ़ते ही तुरंत दिमाग में एक बात आई कि मुरली देवड़ा को मंत्री बनाया ही क्यों गया . उनको उस मंत्रिमंडल में जगह क्यों दी गयी जिसमें कभी सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे लोग हुआ करते थे . यह उम्मीद करना कि आज के ज़माने में उन महान नेताओं की तरह के लोग राजनीति में शामिल होंगें, बेमतलब है .लेकिन ऐसे लोगों का भी शामिल होना खलता है जिनको जनता के हित की बात सोचने का एक दिन का भी अनुभव न हो .राजनीति में पचास और साठ के दशक में ऐसे लोगों की भरमार थी जो आज़ादी की लड़ाई के सिपाही रह चुके थे लेकिन सत्तर का दशक आते आते सब गड़बड़ हो गया .दिल्ली में इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के बाद उनके छोटे बेटे संजय गाँधी का राज आ गया था.देश की राजनीति में मनमानी का युग आ गया था . ज़मीन से जुड़े नेताओं को अपमानित किया जाने लगा था . संजय गाँधी के हुक्म से राज्यों के नेता तैनात होने लगे. जो भी संजय गाँधी या उनके चेलों की सेवा में हाज़िर हो गया उसको ही राजनीति में भर्ती कर लिया गया. इस चक्कर में बहुत सारे ऐसे लोग राजनीति में आ गए जिनको कायदे से जेलों में होना चाहिए था . वही लोग देश के भाग्यविधाता बन गए. उन लोगों ने ही देश में दलालों का एक वर्ग तैयार कर दिया . दलाली एक संस्कृति के रूप में पैदा हो चुकी थी . अस्सी के दशक की शुरुआत में अरुण नेहरू की सर परस्ती में इन्हीं दलालों ने मामूली लेकिन महत्वाकांक्षी व्यापारियों को बड़े उद्योगपति बनने के सपने दिखाए . मुरली देवड़ा और धीरूभाई अम्बानी उसी दौर में मुंबई में यार्न के मामूली व्यापारी के रूप में मुंबई में काम करते थे . दिल्ली का रास्ता इन्होने देख लिया था . दोनों साथ साथ रहते थे. अपने लिए भी बहुत सारे लाइसेंस लिए और बाकी लोगों को भी लाइसेंस दिलवाए . दोनों में दोस्ती खूब गाढ़ी थी. सुबह की जहाज से मुंबई से दिल्ली आते और शाम को वापस चले जाते . लाइसेंस का ज़माना था . डी जी टी डी के अफसरों को दे दिला कर काम करवाते और वापस चले जाते . अस्सी में जब इंदिरा गाँधी दुबारा सत्ता में आयीं तब तक यह टोली बहुत प्रभावी हो चुकी थी . धीरूभाई जो चाहते थे वही होता था.अगर किसी को शक़ हो तो बाम्बे डाइंग के नस्ली वाडिया या सिंथेटिक धागे के पुराने कारोबारी कपल मेहरा के वंशजों से पूछ ले. आज भी मुरली देवड़ा पूरी तरह से धीरूभाई के परिवार के प्रति प्रतिबद्ध हैं . जो सी ए जी की रिपोर्ट आई है वह पिछले ३० वर्षों के इस इतिहास की रोशनी में साफ़ हो जाती है .ज़ाहिर है कि जनता को लाभ पंहुचाने का मुरली देवड़ा को कोई तजुर्बा नहीं है , वे किसी औद्योगिक घराने को ही लाभ पंहुचा सकते हैं . इसलिए उन्हें किसी ऐसे मंत्रालय का चार्ज देने का औचित्य समझ में नहीं आया जो पेट्रोलियम जैसी अहम कमोडिटी का विभाग हो जिसकी वजह से महंगाई के बढ़ने पर सीधा असर पड़ता हो. उनके मित्र धीरूभाई अम्बानी का परिवार जिस विभाग की नीतियों से सीधे तौर पर लाभान्वित होता हो .सी ए जी की रिपोर्ट ने तो उनके कारनामों का पोस्ट मार्टम भर किया है . आज जनता त्राहि त्राहि कर रही है और कांग्रेस की सरकार महंगाई बढाने के लिए ज़िम्मेदार मंत्री और उनके साथियों पर कोई कार्रवाई करने की बात तक नहीं सोच रही है . अखबारों में वह बयान छपवा रहा है कि वह मंत्री पद छोड़ देना चाहता है . मुरली देवड़ा जैसे लोगों को मंत्री ही नहीं बनाया जाना चाहिए था .बहर हाल उम्मीद की जानी चाहिए कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद इस तरह के लोग फिर से मंत्रिपरिषद की शोभा न बनें .
आज अखबारों में एक दिलचस्प खबर छपी है कि केंद्रीय मंत्री मुरली देवड़ा ने प्रधान मंत्री से कहा है कि उन्हें मंत्री पद से मुक्त कर दिया जाए .इस खबर को पढ़ते ही तुरंत दिमाग में एक बात आई कि मुरली देवड़ा को मंत्री बनाया ही क्यों गया . उनको उस मंत्रिमंडल में जगह क्यों दी गयी जिसमें कभी सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे लोग हुआ करते थे . यह उम्मीद करना कि आज के ज़माने में उन महान नेताओं की तरह के लोग राजनीति में शामिल होंगें, बेमतलब है .लेकिन ऐसे लोगों का भी शामिल होना खलता है जिनको जनता के हित की बात सोचने का एक दिन का भी अनुभव न हो .राजनीति में पचास और साठ के दशक में ऐसे लोगों की भरमार थी जो आज़ादी की लड़ाई के सिपाही रह चुके थे लेकिन सत्तर का दशक आते आते सब गड़बड़ हो गया .दिल्ली में इंदिरा गाँधी के प्रधान मंत्री बनने के बाद उनके छोटे बेटे संजय गाँधी का राज आ गया था.देश की राजनीति में मनमानी का युग आ गया था . ज़मीन से जुड़े नेताओं को अपमानित किया जाने लगा था . संजय गाँधी के हुक्म से राज्यों के नेता तैनात होने लगे. जो भी संजय गाँधी या उनके चेलों की सेवा में हाज़िर हो गया उसको ही राजनीति में भर्ती कर लिया गया. इस चक्कर में बहुत सारे ऐसे लोग राजनीति में आ गए जिनको कायदे से जेलों में होना चाहिए था . वही लोग देश के भाग्यविधाता बन गए. उन लोगों ने ही देश में दलालों का एक वर्ग तैयार कर दिया . दलाली एक संस्कृति के रूप में पैदा हो चुकी थी . अस्सी के दशक की शुरुआत में अरुण नेहरू की सर परस्ती में इन्हीं दलालों ने मामूली लेकिन महत्वाकांक्षी व्यापारियों को बड़े उद्योगपति बनने के सपने दिखाए . मुरली देवड़ा और धीरूभाई अम्बानी उसी दौर में मुंबई में यार्न के मामूली व्यापारी के रूप में मुंबई में काम करते थे . दिल्ली का रास्ता इन्होने देख लिया था . दोनों साथ साथ रहते थे. अपने लिए भी बहुत सारे लाइसेंस लिए और बाकी लोगों को भी लाइसेंस दिलवाए . दोनों में दोस्ती खूब गाढ़ी थी. सुबह की जहाज से मुंबई से दिल्ली आते और शाम को वापस चले जाते . लाइसेंस का ज़माना था . डी जी टी डी के अफसरों को दे दिला कर काम करवाते और वापस चले जाते . अस्सी में जब इंदिरा गाँधी दुबारा सत्ता में आयीं तब तक यह टोली बहुत प्रभावी हो चुकी थी . धीरूभाई जो चाहते थे वही होता था.अगर किसी को शक़ हो तो बाम्बे डाइंग के नस्ली वाडिया या सिंथेटिक धागे के पुराने कारोबारी कपल मेहरा के वंशजों से पूछ ले. आज भी मुरली देवड़ा पूरी तरह से धीरूभाई के परिवार के प्रति प्रतिबद्ध हैं . जो सी ए जी की रिपोर्ट आई है वह पिछले ३० वर्षों के इस इतिहास की रोशनी में साफ़ हो जाती है .ज़ाहिर है कि जनता को लाभ पंहुचाने का मुरली देवड़ा को कोई तजुर्बा नहीं है , वे किसी औद्योगिक घराने को ही लाभ पंहुचा सकते हैं . इसलिए उन्हें किसी ऐसे मंत्रालय का चार्ज देने का औचित्य समझ में नहीं आया जो पेट्रोलियम जैसी अहम कमोडिटी का विभाग हो जिसकी वजह से महंगाई के बढ़ने पर सीधा असर पड़ता हो. उनके मित्र धीरूभाई अम्बानी का परिवार जिस विभाग की नीतियों से सीधे तौर पर लाभान्वित होता हो .सी ए जी की रिपोर्ट ने तो उनके कारनामों का पोस्ट मार्टम भर किया है . आज जनता त्राहि त्राहि कर रही है और कांग्रेस की सरकार महंगाई बढाने के लिए ज़िम्मेदार मंत्री और उनके साथियों पर कोई कार्रवाई करने की बात तक नहीं सोच रही है . अखबारों में वह बयान छपवा रहा है कि वह मंत्री पद छोड़ देना चाहता है . मुरली देवड़ा जैसे लोगों को मंत्री ही नहीं बनाया जाना चाहिए था .बहर हाल उम्मीद की जानी चाहिए कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद इस तरह के लोग फिर से मंत्रिपरिषद की शोभा न बनें .
Monday, July 4, 2011
यू पी में २०१२ का युद्ध मायावती और बीजेपी के बीच होने की संभावना बढ़ी
शेष नारायण सिंह
राजनाथ सिंह को अपनी पार्टी का उत्तर प्रदेश में आला मालिक बनाकर बीजेपी ने उत्तरप्रदेश विधान सभा के चुनाव की तैयारियों को टाप गियर में डाल दिया है.कांग्रेस के दो सबसे ताक़तवर महासचिव पिछले कई महीने से उत्तर प्रदेश के बारे में ही चिंता करते पाए जा रहे हैं . ग्रेटर नोयडा के गाँव भट्टा और पारसौल में राहुल गाँधी का नाटकीय अंदाज़ मीडिया के लिए बहुत ही अच्छे विजुवल का मौक़ा था , उनके सबसे करीबी महासचिव दिग्विजय सिंह भी आजकल वही राग चला रहे हैं. दिग्विजय सिंह और राहुल गाँधी को उम्मीद है कि अगर किसी एक वर्ग का वोट अपने नाम मुक़म्मल तरीके से ले लिया जाए तो मुसलमानों के वोट कांग्रेस को मिल जायेगें . इसी रणनीति के तहत अब किसानों के एक बड़े वर्ग को साथ लेने की कोशिश चल रही है . अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट , गूजर और राजपूत किसानों में कांग्रेस की आंशिक पैठ बन गयी तो इस इलाके के प्रभावशाली मुसलमानों को कांग्रेस की तरफ खींचने की कोशिश के कुछ कांग्रेस के लिए उत्साहवर्धक नतीजे हो सकते हैं . इसके पहले दिग्विजय सिंह ने मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को ठाकुरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की थी. उसी अभियान में उन्होंने अमर सिंह को भी इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. राज्य के मज़बूत राजपूत कांग्रेसी सांसदों ने दिग्विजय सिंह को जमने नहीं दिया . जगदम्बिका पाल , संजय सिंह , हर्षवर्धन आदि ऐसे कांग्रेसी सांसद हैं जो अपने आपको दिग्विजय सिंह से बड़ा नेता मानते हैं . जब दिग्विजय सिंह को इस खेल का अंदाज़ लगा तो उन्होंने ठाकुरों वाले प्रोजेक्ट को तिलांजलि दे दी और अब मुस्लिम बहुल इलाकों में सभी जातियों के किसानों के हितचिंतन की पिच पर राहुल गाँधी को घुमा रहे हैं. भट्टा पारसौल और अलीगढ की सभा का मकसद यही है . लेकिन दिग्विजय सिंह जैसा मंजा हुआ खिलाड़ी यह कैसे भूल जाता है कि " किसान " नाम का कोई वोट बैंक नहीं होता. किसान आम तौर पर जातियों में बंटा होता है और जब वोट देने की बात आती है तो वह अपनी जाति के हिसाब से वोट देता है .इसलिए किसान को केंद्र में रख कर राजनीतिक अभियान चलाने का दिग्विजय सिंह का कार्यक्रम राहुल गाँधी को व्यस्त रखने से ज्यादा खुछ नहीं है .
उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य फिरोजाबाद लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव बहुत अजीब तरीके से बदल गया था . जब फिरोजबाद जैसी सीट पर मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू चुनाव हार गयी तो राजनीति के बड़े बड़े जानकार सन्न रह गए थे. लेकिन सच्चाई यह है कि माहौल बदल गया था . उस चुनाव में मुलायम सिंह यादव को शिकस्त देने के बाद कांग्रेस के हौसले भी बढ़ गए थे. उसे भी उत्तर प्रदेश की सीधी लड़ाई को त्रिकोणीय करने की रणनीति पर काम करने का मौक़ा मिल गया था . उन दिनों ऐसा लगता था कि बीजेपी ने राज्य में हार मान ली है और मायावती की ताक़त के सामने उसकी कोई औकात नहीं है . शायद इसी लिए बीजेपी ने कुछ मनोरंजक नेताओं को सामने करने का फैसला किया था . वरुण गाँधी जैसे लोग उसी योजना के तहत सामने लाये गए थे . दिल्ली के कुछ शहरी नेताओं को उत्तर प्रदेश में रणनीति संचालन का काम दिया गया . पूरा माहौल ऐसा था कि लगता था कि बीजेपी ने स्वीकार कर लिया है कि वह अब देश के सबसे बड़े राज्य में हाशिये पर ही रहेगी. कांग्रेस ने लोकसभा २००९ में कई राजपूतों को जिताया था तो वह राजपूतों को अपने साथ लाने की योजना पर काम कर रही थी. उम्मीद यह थी कि अगर कांग्रेस के जीतने की कोई उम्मीद बनेगी तो मुसलमान उसके साथ चला जाएगा. इस बात में दो राय नहीं है कि मुसलमानों के बीच में कांग्रेस की विश्वसनीयता बढ़ रही है . लेकिन मुसलमान किसी भी कीमत पर बीजेपी को नहीं जीतने देना चाहता .अगर कांग्रेस के साथ कोई और वोट बैंक न जुड़ा तो मुसलमान का बीजेपी को हराने की बजाय उसे जिताने में काम आ जायेगा . रायबरेली ,अमेठी और प्रतापगढ़ के अलावा उत्तर प्रदेश के किसी जिले में ठाकुर अब कांग्रेस के साथ नहीं है. यह बात बीजेपी के रणनीतिकारों की समझ में आ गयी है .राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का पूरी तरह से इंचार्ज बनाने के पीछे पार्टी की मंशा यह है कि एक राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े नेता के क़द का फायदा उठाया जाए. इस बीच मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को भी यू पी में लगा दिया गया है . हालांकि मायावती के सामने उनके टिक पाने की संभावना बहुत कम है लेकिन ज़मीन से जुडी एक महिला राजनेता की मौजूदगी से लाभ तो होगा ही.उधर मीडिया में मौजूद आर एस एस के कार्यकर्ताओं ने भी अपना काम शुरू कर दिया है और मायावती की सरकार के खिलाफ रोज़ ही कुछ न कुछ प्रमुखता से सुर्ख़ियों में मिल रहा है.राजनाथ सिंह को कमान सौंपने के बीजेपी के फैसले में यह भी निहित है कि जो तिकड़म की राजनीति करने वाले नेता यू पी में मुखिया बने बैठे थे अब वे आराम करेगें. प्रतिष्ठित अखबार हिन्दू ने लिखा है कि उत्तरप्रदेश में जितने भी बीजेपी नेता है लगभग सभी कभी न कभी वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती के समर्थक रह चुके हैं . राजनाथ सिंह अकेले ऐसे बीजेपी नेता हैं जिनकी छवि मायावती के धुर विरोधी की है . ऐसी हालत में उनको वे वोट भी मिल सकते हैं जो मौजूदा सरकार को हराना चाहते हैं . जहां तक मायावती का सवाल है उत्तर प्रदेश में सबसे मज़बूत जनाधार उनका ही है . और अगर यह लगा कि उनको सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी से मिल रही है तो मुसलमान थोक में मायावती के साथ चले जायेगें . उस हालत में कांग्रेस और मुलायम सिंह दोनों ही कमज़ोर पड़ेगें और उत्तर प्रदेश की लड़ाई पूरी तरह से मायावती बनाम बीजेपी हो जायेगी . बाकी लोग केवल हाशिये के खिलाड़ी के रूप में ही उत्तर प्रदेश चुनाव २०१२ में शामिल हो सकेंगें.
राजनाथ सिंह को अपनी पार्टी का उत्तर प्रदेश में आला मालिक बनाकर बीजेपी ने उत्तरप्रदेश विधान सभा के चुनाव की तैयारियों को टाप गियर में डाल दिया है.कांग्रेस के दो सबसे ताक़तवर महासचिव पिछले कई महीने से उत्तर प्रदेश के बारे में ही चिंता करते पाए जा रहे हैं . ग्रेटर नोयडा के गाँव भट्टा और पारसौल में राहुल गाँधी का नाटकीय अंदाज़ मीडिया के लिए बहुत ही अच्छे विजुवल का मौक़ा था , उनके सबसे करीबी महासचिव दिग्विजय सिंह भी आजकल वही राग चला रहे हैं. दिग्विजय सिंह और राहुल गाँधी को उम्मीद है कि अगर किसी एक वर्ग का वोट अपने नाम मुक़म्मल तरीके से ले लिया जाए तो मुसलमानों के वोट कांग्रेस को मिल जायेगें . इसी रणनीति के तहत अब किसानों के एक बड़े वर्ग को साथ लेने की कोशिश चल रही है . अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट , गूजर और राजपूत किसानों में कांग्रेस की आंशिक पैठ बन गयी तो इस इलाके के प्रभावशाली मुसलमानों को कांग्रेस की तरफ खींचने की कोशिश के कुछ कांग्रेस के लिए उत्साहवर्धक नतीजे हो सकते हैं . इसके पहले दिग्विजय सिंह ने मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को ठाकुरों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की थी. उसी अभियान में उन्होंने अमर सिंह को भी इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. राज्य के मज़बूत राजपूत कांग्रेसी सांसदों ने दिग्विजय सिंह को जमने नहीं दिया . जगदम्बिका पाल , संजय सिंह , हर्षवर्धन आदि ऐसे कांग्रेसी सांसद हैं जो अपने आपको दिग्विजय सिंह से बड़ा नेता मानते हैं . जब दिग्विजय सिंह को इस खेल का अंदाज़ लगा तो उन्होंने ठाकुरों वाले प्रोजेक्ट को तिलांजलि दे दी और अब मुस्लिम बहुल इलाकों में सभी जातियों के किसानों के हितचिंतन की पिच पर राहुल गाँधी को घुमा रहे हैं. भट्टा पारसौल और अलीगढ की सभा का मकसद यही है . लेकिन दिग्विजय सिंह जैसा मंजा हुआ खिलाड़ी यह कैसे भूल जाता है कि " किसान " नाम का कोई वोट बैंक नहीं होता. किसान आम तौर पर जातियों में बंटा होता है और जब वोट देने की बात आती है तो वह अपनी जाति के हिसाब से वोट देता है .इसलिए किसान को केंद्र में रख कर राजनीतिक अभियान चलाने का दिग्विजय सिंह का कार्यक्रम राहुल गाँधी को व्यस्त रखने से ज्यादा खुछ नहीं है .
उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य फिरोजाबाद लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव बहुत अजीब तरीके से बदल गया था . जब फिरोजबाद जैसी सीट पर मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू चुनाव हार गयी तो राजनीति के बड़े बड़े जानकार सन्न रह गए थे. लेकिन सच्चाई यह है कि माहौल बदल गया था . उस चुनाव में मुलायम सिंह यादव को शिकस्त देने के बाद कांग्रेस के हौसले भी बढ़ गए थे. उसे भी उत्तर प्रदेश की सीधी लड़ाई को त्रिकोणीय करने की रणनीति पर काम करने का मौक़ा मिल गया था . उन दिनों ऐसा लगता था कि बीजेपी ने राज्य में हार मान ली है और मायावती की ताक़त के सामने उसकी कोई औकात नहीं है . शायद इसी लिए बीजेपी ने कुछ मनोरंजक नेताओं को सामने करने का फैसला किया था . वरुण गाँधी जैसे लोग उसी योजना के तहत सामने लाये गए थे . दिल्ली के कुछ शहरी नेताओं को उत्तर प्रदेश में रणनीति संचालन का काम दिया गया . पूरा माहौल ऐसा था कि लगता था कि बीजेपी ने स्वीकार कर लिया है कि वह अब देश के सबसे बड़े राज्य में हाशिये पर ही रहेगी. कांग्रेस ने लोकसभा २००९ में कई राजपूतों को जिताया था तो वह राजपूतों को अपने साथ लाने की योजना पर काम कर रही थी. उम्मीद यह थी कि अगर कांग्रेस के जीतने की कोई उम्मीद बनेगी तो मुसलमान उसके साथ चला जाएगा. इस बात में दो राय नहीं है कि मुसलमानों के बीच में कांग्रेस की विश्वसनीयता बढ़ रही है . लेकिन मुसलमान किसी भी कीमत पर बीजेपी को नहीं जीतने देना चाहता .अगर कांग्रेस के साथ कोई और वोट बैंक न जुड़ा तो मुसलमान का बीजेपी को हराने की बजाय उसे जिताने में काम आ जायेगा . रायबरेली ,अमेठी और प्रतापगढ़ के अलावा उत्तर प्रदेश के किसी जिले में ठाकुर अब कांग्रेस के साथ नहीं है. यह बात बीजेपी के रणनीतिकारों की समझ में आ गयी है .राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का पूरी तरह से इंचार्ज बनाने के पीछे पार्टी की मंशा यह है कि एक राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े नेता के क़द का फायदा उठाया जाए. इस बीच मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को भी यू पी में लगा दिया गया है . हालांकि मायावती के सामने उनके टिक पाने की संभावना बहुत कम है लेकिन ज़मीन से जुडी एक महिला राजनेता की मौजूदगी से लाभ तो होगा ही.उधर मीडिया में मौजूद आर एस एस के कार्यकर्ताओं ने भी अपना काम शुरू कर दिया है और मायावती की सरकार के खिलाफ रोज़ ही कुछ न कुछ प्रमुखता से सुर्ख़ियों में मिल रहा है.राजनाथ सिंह को कमान सौंपने के बीजेपी के फैसले में यह भी निहित है कि जो तिकड़म की राजनीति करने वाले नेता यू पी में मुखिया बने बैठे थे अब वे आराम करेगें. प्रतिष्ठित अखबार हिन्दू ने लिखा है कि उत्तरप्रदेश में जितने भी बीजेपी नेता है लगभग सभी कभी न कभी वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती के समर्थक रह चुके हैं . राजनाथ सिंह अकेले ऐसे बीजेपी नेता हैं जिनकी छवि मायावती के धुर विरोधी की है . ऐसी हालत में उनको वे वोट भी मिल सकते हैं जो मौजूदा सरकार को हराना चाहते हैं . जहां तक मायावती का सवाल है उत्तर प्रदेश में सबसे मज़बूत जनाधार उनका ही है . और अगर यह लगा कि उनको सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी से मिल रही है तो मुसलमान थोक में मायावती के साथ चले जायेगें . उस हालत में कांग्रेस और मुलायम सिंह दोनों ही कमज़ोर पड़ेगें और उत्तर प्रदेश की लड़ाई पूरी तरह से मायावती बनाम बीजेपी हो जायेगी . बाकी लोग केवल हाशिये के खिलाड़ी के रूप में ही उत्तर प्रदेश चुनाव २०१२ में शामिल हो सकेंगें.
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