Wednesday, August 26, 2020

हिमालय को तबाह करने की हर साज़िश को नाकाम किया जाना चाहिए


 

 

शेष नारायण सिंह

 

 

अपने कालजयी महाकाव्य , कुमारसंभव में महान कवि कालिदास ने पहला ही श्लोक हिमालय की महिमा में लिखा है . लिखते  हैं कि

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा ,हिमालयो नाम नगाधिराजः ।

पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य, स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥

 

दुर्भाग्य की बात यह है कि आज इस देवतात्मा ,नगाधिराज और पृथ्वी के मानदंड को हम वह सम्मान नहीं दे पा रहे हैं जो उसे वास्तव में मिलना चाहिए .हिमालय को पृथ्वी की बहुत नई पर्वत श्रृंखला माना जाता है . भारत के लिए तो हिमालय जीवनदायी है . गंगा और यमुना समेत बहुत सारी नदियाँ हिमालय से निकलती हैं . प्रगति के नाम पर में समय समय पर सरकारें हिमालय को नुक्सान  पंहुचाती रहती हैं . केदारनाथ में  प्रकृति के क्रोध और तज्जनित विनाशलीला को दुनिया  ने देखा है . उसके पहले उत्तरकाशी में एक  भूकम्प के चलते पहाड़ के दुर्गम इलाक़ों से किसी तरह का संपर्क महीनों के लिए रुक गया था. समय समय पर हिमालय से प्रेम करने वाले और दुनिया भर के पर्यावरणविद  चिंता जताते रहते हैं लेकिन कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता . गंगा और हिमालय की रक्षा के लिए बहुत सारे महामना संतों ने अपने जीवन का  बलिदान भी किया है . लेकिन आजादी के बाद से ही हिमालय के दोहन की प्रक्रिया शुरू हो गयी है जो अभी तक जारी है . इस कड़ी में नवीनतम ‘ विकास का प्रोजेक्ट ‘ चारधाम परियोजना है .पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में आया था कि सड़क यातयात और हाईवे मंत्रालय की चार धाम परियोजना  के कारण हिमालय की जंगलों और वन्यजीवन को भारी नुकसान हो रहा है . सुप्रीम कोर्ट ने सही जानकारी के लिए रवि चोपड़ा  की अगुवाई में  एक हाई पावर कमेटी नियुक्त किया था .उसकी  दो रिपोर्टें आ चुकी हैं .कमेटी की राय में  उत्तराखंड में चल रही  चार धाम परियोजना के कारण हिमालय के पर्यावरण को भारी नुक्सान हो रहा है .जिसके दूरगामी परिणाम बहुत ही भयानक होंगे.  इस कमेटी ने  पर्यावरण मंत्रालय से तुरंत कार्रवाई करने की मांग की है .. कमेटी की रिपोर्ट किसी भी पर्यावरण  प्रेमी को चिंता  में  डाल देगी .  रवि चोपड़ा ने पर्यावरण  मंत्रालय को लिखा है कि वहां अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं ,पहाड़ को तोड़ा जा रहा है . बिना किसी सरकारी मंजूरी के जगह जगह खुदाई की   जा रही है और कहीं भी मलबा  फेंका जा रहा है .

चारधाम परियोजना के तहत उत्तराखंड राज्य के प्रमुख धार्मिक केन्द्रों को  सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए करीब ने सौ किलोमीटर की सड़क तैयार करने की योजना है .  हिमालय के पर्यावरण को बिना कोई नुक्सान पंहुचाये इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन वहां तो मनमानी  चल  रही है. उच्च अधिकार प्राप्त कमेटी ने आगाह किया है कि इस मनमानी को फौरन रोकना पडेगा . 2017 से ही   बिना अनुमति लिए पेड़ों की कटाई का सिलसिला जारी है .जब यह बात वहां के अखबारों में छप गयी  तो 2018 में राज्य सरकार से बैक डेट में  अनुमति ली गयी . रिपोर्ट में लिखा  है कि  चारधाम   प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री की एक महत्वाकांक्षी और  महत्वपूर्ण योजना को लागू करने के लिए शुरू किया गया है . परियोजना के  ड्राफ्ट में बहुत साफ़ बता दिया गया है कि हिमालय के पर्यावरण को कोई नुक्सान नहीं पंहुचाया  जाएगा .लेकिन जो हो रहा है वह फारेस्ट एक्ट और एन जी टी एक्ट का सरासर उन्ल्लंघन है  . क़ानून और सरकारी आदेशों को तोडा मरोड़ा भी खूब जा रहा है . रक्षा मंत्रालय के सीमा सड़क संगठन ने 2002 और 2012 के बीच कोई आदेश दिया  था . उसी के सहारे बड़े पैमाने पर  पहाड़ों को तबाह किया जा रहा है जबकि उस आदेश में इस तरह की कोई बात  नहीं थी . राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के दिशानिर्देशों की भी कोई परवाह  नहीं की जा रही  है. केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य , राजाजी नैशनल पार्क और फूलों के घाटी नैशनल पार्क के इलाके में हिमालय को भारी नुक्सान पंहुचाया  जा रहा है .  सबको मालूम है कि हिमालय के पर्यावरण की रक्षा देश की सबसे बड़ी अदालत की हमेशा से ही प्राथमिकता रही है . लेकिन यह भी देखा गया है और चारधाम परियोजना में भी देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा को तोड़ मरोड़कर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने वाले बिल्डर-ठेकेदार-नौकरशाह-नेता माफिया  कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं . ऐसी हालत में उत्तराखंड के आज के प्रभावशाली नेताओं को राजनीतिक पार्टियों की सीमा के बाहर  जाकर काम करना होगा. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत, सांसद अनिल बलूनी ,पूर्व मुख्यमंत्री  हरीश रावत जैसे नेताओं की अगुवाई में पहाड़ की राजनीतिक बिरादरी को आगे आना चाहिए और अपने संरक्षक हिमालय की रक्षा के लिए लेकिन ज़रूरी राजनीतिक प्रयास करना  चाहिए .

अगर राजनेता तय  कर ले तो उनकी  मर्जी के खिलाफ जाने की किसी भी माफिया  की हिम्मत नहीं पड़ती है .  हरीश रावत के कार्यकाल में हिमालय को कई बार नुक्सान हुआ  है लेकिन अब पानी सर के ऊपर जा रहा है . सत्ता और राजनीतिक पार्टी तो आती जाती रहेगी लेकिन अगर हिमालय को नुक्सान पंहुचाने का सिलसिला जारी रहा  तो आने वाली इन लोगों को पीढ़ियां माफ़ नहीं करेंगी.

 

यही चेतावनी मैंने  2013 में  उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भी  दी थी .वे उन दिनों कांग्रेस में थे . जून 2013 की बाढ़ को ठीक से संभाल नहीं  पाए थे . उनकी चौतरफा आलोचना हुयी थी . उसी सिलसिले में उनको मुख्यमंत्री पद भी गंवाना पड़ा था .वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और केदारनाथ में फंसे हुए गुजरातियों को बचाने के लिए उन्होंने गुजरात सरकार को सक्रिय कर दिया था .  नरेंद्र मोदी ने विजय बहुगुणा और मनमोहन सिंह सरकार की केदारनाथ की बाढ़ के कुप्रबंध को लेकर सख्त आलोचना की थी. आज उनकी सरकार केंद्र में भी है और राज्य में भी  . उम्मीद की जानी चाहिए कि विजय बहुगुणा वाली गलतियां आने वाले समय में कोई भी सरकार न करने पाए .

 

हिमालय की अनदेखी जब जब नेताओं ने की है उसका  नुक्सान निश्चित रूप से हुआ  है . मुझे उत्तर  प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा  का वह इंटरव्यू कभी नहीं भूलता जो उन्होंने 1974  में उस वक़्त की सम्मानित हिंदी समाचार पत्रिका दिनमान को दिया था . टिहरी बाँध की प्रस्तावना बन चुकी थी  में उनका वह इंटरव्यू टिहरी बांध के बारे में ही  था. उत्तराखंड का गठन नहीं हुआ था , वह उत्तर प्रदेश में ही था . इंटरव्यू की  हेडलाइन लगी थी कि “ जब  टिहरी का पहाड़ डूबेगा तभी पहाड़ों की तरक्की होगी.”  उस वक़्त के भूवैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने हेमवतीनंदन बहुगुणा के उस बयान पर सख्त टिप्पणियाँ की थीं लेकिन सत्ता बहुत मतवाली होती है . किसी की कोई भी चेतावनी  काम न आयी .हिमालय के मूल निवासियों के हितों को नज़रअंदाज़ करके दिल्ली और लखनऊ में बैठे भाग्यविधाता लोग गंगा के आसपास के हिमालय की प्रलयलीला पर दस्तखत करने के लिए मजबूर होते रहे हैं .. 2013 की भारी बारिश और बादल फटने के कारण आयी तबाही के बारे में तर्क दिया गया था कि  बारिश एकाएक बहुत ज्यादा हो गयी और संभाल पाना मुश्किल हो गया . कोई इनसे पूछे कि हज़ारों वर्षों से बारिश भी तेज होती रही है और बाढ़ भी आती  रही है लेकिन इस तरह की तबाही नहीं आती थी. सच्चाई यह है कि हिमालय को इतना कमज़ोर कर दिया गया है कि वह तेज़ बारिश को संभाल नहीं पाता.

हिमालय गंगा का उद्गम स्थल है . गंगा को उसके उद्गम के पास ही बांध दिया गया है . बड़े बाँध बन गए हैं और भारत की संस्कृति से जुडी यह नदी  कई जगह पर अपने रास्ते से हटाकर सुरंगों के ज़रिये बहने को मजबूर कर दी गयी है .. पहाडों को खोखला करने का सिलसिला टिहरी बाँध की परिकल्पना के साथ शुरू हुआ  था. हेमवती नंदन बहुगुणा ने सपना देखा था कि प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई के बाद जो जीत मिलेगी वह पहाड़ों को बहुत संपन्न बना देगी .उनका कहना था कि पहाड़ों पर बाँध बनाकर देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा की जायेगी .उनकी इसी सोच के चलते  गंगा नदी में जगह जगह बाँध बनाए  गए थे . उत्तरकाशी और गंगोत्री के 125 किलोमीटर की दूरी में पांच बड़ी बिजली परियोजनायें है. जिसके कारण गंगा को अपना  रास्ता छोड़ना पड़ा .इस इलाके में बिजली की परियोजनाएं एक दूसरे से लगी हुई हैं .. एक परियोजना जहां  खत्म होती है वहां से दूसरी  शुरू हो जाती है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही है

 

 वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 प्रजातियों को आश्रय देती है. गंगा के मार्ग में  पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें मिलने वाले पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. जानकार कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी.. भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग तभी से कर रहे हैं जब  सत्तर के दशक से इन परियोजनाओं को मंजूरी देने का काम शुरू हुआ था . उत्तराखंड में करीब १७०० छोटी पनबिजली परियोजनाएं हैं भागीरथी और अलकनंदा के बेसिन में  करीब ७० छोटी पनबिजली स्कीमें हैं . इन योजनाओं के चक्कर में इन नदियों के सत्तर फीसदी हिस्से को नुक्सान पंहुचा  है .इन योजनाओं को बनने में जंगलों की भारी  कटाई हुई है . सड़कबिजली के खंभे आदि बनाने के लिए हिमालय में भारी तोड़फोड़ की गयी है

मौजूदा चारधाम परियोजना को भी अगर ठीक से न सम्भाला गया , पर्यावरण की अनदेखी की गयी तो जो नुक्सान टेहरी  बांध योजना के समय हुआ था ,उससे ज्यादा नुक्सान  होगा. इसलिए सुप्रीम कोर्ट की उच्च अधिकार प्राप्त कमेटी की बात को प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के प्रभावशाली नेताओं को गंभीरता पूर्वक लेना चाहिए क्योंकि हिमालय की रक्षा हमारा सबका कर्तव्य  भी है और विरासत भी . इसलिए कालिदास के  देवातात्मा , नगाधिराज  और  पृथ्वी के मानदंड की रक्षा करना हमारा धार्मिक , सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कर्तव्य है . हिमालय की उस महानता को बनाये रखना  हमारा राष्ट्रीय दायित्व भी है .

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