Tuesday, August 11, 2020

गीता का केंद्रीय भाव कर्मयोग है क्योंकि योगः कर्मसु कौशलं

 जन्माष्टमी के अवसर पर

 

शेष नारायण सिंह

 

योगेश्वर कृष्ण का जन्मदिन  सदियों से इस देश में जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है . कृष्ण के बहुत सारे रूप साहित्य और  पुराणों में वर्णित हैं .सूरदास के यहाँ वे वृन्दावन और गोकुल की गलियों में माखन चुराते, गोपियों को छेड़ते, बहाने बनाते दीखते हैं तो वहीं कालियादह में  भयानक नाग को नाथते भी दिखते हैं. कहीं द्वारकाधीश हैं तो कहीं महाभारत के युद्ध में बिना हथियार उठाये युद्ध का संचालन करते नज़र आते हैं .कहीं  ऐसे मित्र के रूप में दिखते हैं जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं  है .कवि  नरोत्तम दास के यहाँ वे देखि सुदामा की दीन दसा‚ करुना करिके करुनानिधि रोए और पानी परात को हाथ छुयो नहिं‚ नैनन के जल से पग धोये. दोस्त सुदामा की गरीबी देखकर वे रोते हैं और अपने आंसुओं से ही उनके पाँव धोते हैं . कभी दुर्योधन की  अठारह अक्षौहिणी सेना के मुकाबले साधनहीन  पांडवों को विजयी बनाने के संकल्प के साथ  कुरुक्षेत्र के मैदान में बेझिझक खड़े हैं ,तो ,कहीं उद्धव को गोपियों के पास ज्ञान की बात बताने भेजते हैं जबकि उनको अनुमान है कि वहां बेचारे उद्धव की क्या दुर्दशा होने वाली ही , कहीं  द्रौपदी की लाज बचाने के लिए वस्त्रों का अम्बार लगा देते हैं तो कहीं रोहिणी के पति के रूप में दाम्पत्य  जीवन की नई परिभाषा बना रहे  हैं तो कहीं राधा के सखा के रूप में स्त्री पुरुष संबंधों के सर्वोच्च मानदंड के लिए नियम बना रहे हैं. कहीं मीरा के कृष्ण सर्वस्व न्योछावर करने के हौसले के वाहक हैं तो नज़ीर अकबराबादी के यहाँ  उनका बालपन उस मुकाम पर जाकर खड़ा हो जाता है ,जहां महान कवि सूरदास विराज रहे हैं. कहीं  गोपाल हैं, कहीं कन्हैया हैं तो कहीं श्याम हैं . सदियों से स्त्रियों के लिए वे आदर्श के रूप में नजर आते हैं , बेटा ,भाई,  मित्र हर रूप में वे महान ही  हैं. यशोदा हों या देवकी हों  सबके प्रिय बेटे के रूप में  भी उन्होंने सबसे बुलंद मुकाम पर इंसानी  रिश्तों को स्थापित किया . रसखान के यहां तो वे समग्र कायनात में छाये हुए नज़र आते  हैं. रसखान कहते  हैं :

सेषगनेसमहेसदिनेससुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक ब्‍यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।।

उन कृष्ण से कोई पार नहीं पा सकता . शेष ,गणेश ,महेश ,दिनेश ,सुरेश उनका गुणगान करते हैं .उनको अनादि, अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बताते हैं , नारद ,शुकदेव ,व्यास उनकी कथा को बताते रहते हैं लेकिन पूर्णता नहीं दे सकते और उन्हीं भगवान कृष्ण को अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचाती हैं.

राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है . राम ने पारंपरिक मर्यादा का पालन किया ,वर्णाश्रम धर्म का पालन किया और गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये लेकिन कृष्ण ने हर तरह की मर्यादा स्वयं स्थापित की , जिसको भी साथ लिया उसको कभी नहीं छोड़ा . न्याय की स्थापना के लिए उन्होंने  कभी घटोत्कच को  कर्ण के ब्रह्मास्त्र का सामना करने के लिए भेज दिया तो कभी  कर्ण की दानवीरता का लाभ लेकर उसका कवच और कुंडल ही उतरवा दिया . अपने मित्र अर्जुन की विजय सुनिश्चित करने के लिए स्वयं के  बनाये हुए नियमों को भी कई बार दरकिनार किया . किसी की मर्यादा में अपने को कभी नहीं बंधा लेकिन न्याय के लिए हमेशा नई मर्यादा  का  सृजन किया . मुझे  व्यक्तिगत रूप से कृष्ण  की सभी मर्यादाएं   सुपीरियर लगती हैं . लेकिन गीताकार कृष्ण का जो रूप है ,वह मुझे मंत्रमुग्ध रखता है . पूरे महाभारत में कृष्ण की महिमा के दर्शन होते हैं लेकिन महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास ने स्वयं कहा है कि,

गीता सुगीता कर्तव्या  किमन्यैः शास्त्रविस्तरै:,

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता .

यानी अगर गीता का ठीक से पारायण कर लिया तो अन्य शास्त्रों के अध्ययन की कोई ज़रूरत नहीं रह जायेगी . गीता  के अठारहों अध्यायों में आचरण के बहुत  सारे  मंत्र हैं, सांख्य योग है ,भक्तियोग है  लेकिन कर्मयोग साधारण आदमी के लिए बहुत ही उपयोगी है . मुझे लगता है कि कर्मयोग ही श्रीमद्भग्वत्गीता का  केंद्रीय तत्व है क्योंकि गीता के उपदेश के बाद अर्जुन कहीं भक्तियोग की साधना में नहीं लगे , भक्ति की दुनिया में नहीं चले गए  बल्कि उन्होंने कर्म  किया ,अपने स्वधर्म का पालन किया और युद्ध किया ..गीताकार कृष्ण ने मानवीय आचरण के बहुत सारे विकल्प अर्जुन को दिये , उनको यह भी बताया कि जो कुछ भी होगा वह  ईश्वर  ही करेगा उन्होंने अर्जुन को बताया कि निमित्त मात्रं भाव सव्यसाचिन . उन्होंने उनको भरोसा दिलाया कि

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्। और यह कि परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

इस सब के बावजूद वे अर्जुन को कर्म की प्रेरणा देते रहे , विराट रूप दिखाया और   युद्ध करने को कहा क्यों  धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे सबका  स्वधर्म युद्ध ही था . लेकिन भगवान कृष्ण ने युद्ध का नियम भी तय कर दिया था. युद्ध तो करना था लेकिन युद्ध की  सीमा थी . वह सीमा थी कि लाभालाभ की परवाह किये बिना  द्वेष और प्रतिशोध की भावना से मुक्त होकर ही युद्ध करना है . तीसरे अध्याय में गीताकार ने अर्जुन को हिदायत दे दी

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा !
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्धस्व विगतज्वरः !!   

 अपने चित्त को आत्मा में स्थिर करकेसम्पूर्ण कर्मों को मुझमें समर्पित करकेइच्छारहित,ममता रहित और ज्वर रहित होकर युद्ध करो . इच्छारहित रहने की बात की गयी है और कहा गया है कि

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन 

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात कर्म करना आपके वश में है उसके फल की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है .क्योंकि वह आपके वश में ही नहीं है .

 

सारी बातें बताने के बाद भी जब अर्जुन का संकट बना रहा तो उन्होंने सीधा प्रस्ताव दे दिया कि

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

 

यानी सभी धर्म छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ .

कृष्ण जन्माष्टमी पर मैं योगेश्वर कृष्ण को इसी रूप में याद करता हूँ .

जय श्रीराम के युद्ध घोष से हटकर शान्ति के संबोधन जय सियाराम को अपनाने की ज़रूरत


शेष नारायण सिंह

अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर का  शिलान्यास हो गया . 1949 में शुरू हुआ एक विवाद समाप्त हो गया .रामजन्मभूमि का  विवाद तो पुराना है लेकिन 1853 में वाजिद अली शाह के समय में विवाद के बहुत ही खूनी रूप ले लेने का ऐतिहासिक  सन्दर्भ मौजूद है .  आज़ादी के बाद 1949 में विवाद तब बहुत गरमा गया था जब गोरखनाथ पीठ के महंत स्व दिग्विजयनाथ की अगुवाई में अयोध्या की बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति स्थापित कर दी गयी थी . तब से लेकर 1992 तक वहां विवादित ढांचे के  बाहर अखंड रामायण चलता रहा था. मस्जिद में कोर्ट के आदेश से ताला बंद था लेकिन देश भर से लोग अयोध्या आते थे तो   विवादित ढाँचे के बाहर से ही रामलला के  दर्शन करते  रहे थे . बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद सारे मामले ने एक नया आयाम ले लिया था.  1949 में जब  विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति राखी गयी तो अयोध्या में दर्जी का काम करने वाले स्व हाशिम अंसारी ने एफ आई आर लिखाया था. बाद में जो मुक़दमा  चला उसमें वे बाबरी मस्जिद के पैरोकार बने . उनको हमारी  पीढ़ी के लोग हाशिम चचा ही कहते थे .  उन्होंने मुकदमे की पैरवी  65 साल तक की लेकिन उनकी  किसी से  कोई दुश्मनी नहीं हुई. 1985 में जब विश्व हिन्दू परिषद ने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को गरमाना शुरू किया  तो मामला देश-विदेश में सुर्ख़ियों में आया लेकिन हाशिम अंसारी पर बहुत फर्क नहीं पड़ा . 201 6 में जब 95 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुयी तो सबसे पहले उनके घर पंहुचने वालों में रामजन्मभूमि मंदिर के पुजारी सत्येन्द्र दास और हनुमान गढ़ी के  महंत ज्ञानदास थे . जब विश्व हिन्दू परिषद ने विवाद में दखल देना शुरू किया तो दिल्ली और लखनऊ के कुछ मुसलमानों ने भी बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनाकर मामले को हवा देना शुरू कर दिया . अगले छः वर्षों में मामला इतना गरमा गया कि अयोध्या का विवादित ढांचा ढहा दिया गया और इन्हीं छः वर्षों में बाबरी मस्जिद की रक्षा और रामजन्मभूमि की बहाली के लिए हज़ारों करोड़ रूपये का चंदा बटोरा गया . दोनों ही पक्षों के मौकापरस्त लोग  बहुत ही धनवान हो गए लेकिन हाशिम चचा जैसे थे वैसे ही रह गए . अयोध्या में मुक़दमेबाज़ी  या चुनाव के विवाद में आपने सामने खड़े लोगों के बीच भी  अपनैती के रिश्ते रहते हैं . उसी आपसी रवादारी के नगर अयोध्या में  पांच अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने नए राममंदिर के निर्माण के लिए आधारशिला रखने के लिए पूजा अर्चना की .

 भगवान राम भारत की एक बहुत बड़ी आबादी के आस्था के नायक  हैं . रामचरित की समय समय पर बहुत लोगों ने अपने हिसाब से  व्याख्या की है . लेकिन अयोध्या के आसपास जिन राम का   चरित्र सब के मन में समाया हुआ है वह तुलसीदास के राम का चरित्र है . गोस्वामी तुलसीदास की निजी आस्था के केंद्र में राजा रामचंद्र विराजते थे लेकिन  उन्होंने उन्हीं भगवान रामचंद्र को हर उस घर में पंहुचा दिया जहां  किसी भी रूप में हिंदी बोली और समझी जाती है . क्योंकि वे विद्यावान गुनी अति चातुर थे और  राम काज  करिबे को आतुर भी थे . गोस्वामी तुलसीदास की यही आतुरता सियापति रामचंद्र के ईश्वरीय  स्वरुप को जनमानस में स्थापित कर  देती है . ऐसा लगता है कि पांच अगस्त को जिन राम के मंदिर के  निर्माण की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है , वे  गोस्वामी तुलसीदास के ही राम हैं . अयोध्या के आसपास ही कबीर साहेब का मगहर भी है जहां उनकी हड्डियाँ दफ़न हैं  कबीर के राम भी सर्वव्यापी  हैं लेकिन अयोध्या में जिन राम का मंदिर बनने जा रहा है वे कबीर के राम तो वे निश्चित रूप से नहीं हैं . क्योंकि कबीर ने ईश्वर को निराकार माना है . वे निर्गुनिया संत हैं . उनकी दार्शनिक सोच में  राम का अवतारवाद का कोई स्थान  नहीं है . वे  मूर्तिपूजा के विरोधी हैं   उनके राम की मूर्ति नहीं बनाई जा सकती .उनके राम तो ब्रह्म हैं जिनको उन्होंने रहीमहरिगोविंद जैसे नामों  से संबोधित किया . यह सारे नाम उसी एक राम के  नाम हैं लेकिन या सभी निराकार हैं . उनको मूर्ति में समेटा नहीं जा सकता .

भारतीय मनीषा में राम के भांति भांति के रूप  बताये गए हैं .  वैदिक साहित्य के राम  जातक कथाओं के राम से अलग हैं . महर्षि वाल्मीकि के ग्रन्थ ‘ रामायण ‘ के राम उनके एक अन्य ग्रन्थ  योगवसिष्ठ’ में दूसरे रूप में देखने को मिलते  हैं .  कम्ब रामायणम’ के राम  दक्षिण भारत में घर घर में जबकि तुलसीदास के राम परिवार का  बड़ा और आज्ञाकारी बेटाआदर्श राजा और सौम्य पति के रूप में प्रस्तुत होते  हैं. अयोध्या आन्दोलन में पिछले 35 साल से जिन राम की बात चल   रही है वह यही तुलसी के राम के योद्धा रूप हैं क्योंकि इस आन्दोलन का उद्देश्य राजनीतिक सत्ता हासिल करना  ही था इसलिए चक्रवर्ती सम्राट  राम का  स्वरूप ही सर्वस्वीकार्य स्वरूप  माना गया .  राम के व्यक्तित्व   को फिर से परिभाषित करने के चक्कर में आर एस एस ने उनको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का राजनीतिक प्रतीक बनाने की पूरी  कोशिश की है और जिस  तरह से मीडिया के माध्यम से राम को समग्र विश्व में जागरण का कारक बताया जा रहा है उससे लगता है कि आर एस एस अपने प्रोजेक्ट में खासा सफल नज़र आ रहा है .  लगता है कि  राम के जिस चरित्र को राजनीतिक सुविधा के अनुसार आस्था के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास हो रहा  है वह रामानन्द  सागर के राम होंगे क्योंकि मौजूदा विमर्श में कबीर  या  सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की शक्तिपूजा वाले राम के लिए तो कोई स्पेस नहीं है . हिन्दुराष्ट्र के पैरोकारों की कोशिश है कि अयोध्या में जिन राम के मंदिर का शिलान्यास हुआ है वे लड़ाकू तेवर में जोर-जोर से अपने जयकारे लगवाने वाले हिंदू हृदय सम्राट राम हों जो नई पीढ़ी को लाठीतलवार और  त्रिशूल जैसे हथियार लेकर चलने की प्रेरणा दें .  यही चिंता का विषय है .

प्रधानमंत्री ने  भूमिपूजन के यज्ञ में  जनमानस की एकता की बात की . आज  देश के प्रधानमंत्री का क़द इतना बड़ा है कि वह आर एस एस के निर्देशों को मानने को बाध्य नहीं है . संघ के कार्यकर्ताओं और  उनके  समर्थको में नरेंद्र मोदी वास्तव में आर एस एस के प्रमुख मोहन भगवत से से ज़्यादा  सम्मानित  माने जाते हैं .वे सारे देश के प्रधानमंत्री हैं इसलिए उनको  चाहिए कि गोस्वामी तुलसीदास के उन राम को आदर्श बनाएं जो समय पड़ने पर तो योद्धा हो जाते हैं लेलिन जिनका स्थाई  स्वरूप  एक दयावान सम्राट का  है. प्रधानमंत्री को  भगवान राम के उसी उदात्त  चरित्र का वरण करना चाहिए .अद्वैत वेदान्त के  ग्रन्थ  अष्टावक्र गीता’ में  में राम का जो चरित्र बताया गया  है वह आत्माराम है . वह आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः’ — अर्थात निरंतर आत्मा में रमने वाला आत्माराम ही शीतल और स्वच्छ हृदय का धीरज वाला संत है. जो जातिवर्णसंप्रदाय और ब्रह्मचर्य-सन्यास आदि अहंकार से परे है .  आज  देश की राजनीतिक स्थिति में ऐसे जी राम को आदर्श मानने की ज़रूरत है .

वास्तव में संत तुलसीदास के रामचरितमानस में राम का जो चरित्र है वह समकालीन  राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी के लिए सबसे अधिक समझ में आने वाला   विषय है . रामचरित मानस’ का एक मज़बूत सामाजिक आधार है हालाँकि रामचिरत मानस’ भक्तिकाल की एक रचना है लेकिन वह वीरगाथा काल की रचना के रूप में भी देखी जा सकती है. भक्तिकाल का वही समय है जब भारतीय समाज में इस्लाम अपनी जड़ें ज़माना शुरू कर चुका था .उसके पहले मध्य एशिया से आने वाले मुसलमान हमलवारों के हमले होते  थे. अधिकतर लड़ाइयों में भारत के राजपूत राजा हार रहे थे लेकिन उनके चारण कवियों ने वीरगाथाएं लिखीं और उन राजाओं को कविता के माध्यम से महान योद्धा सिद्ध करने की कोशिश की लेकिन अकबर के समय तक इस्लाम में विश्वास करने वाले शासकों ने अपनी मंशा ज़ाहिर कर  दी थी कि वे अब   यहीं रहेंगे. यह वही  समय है जब हिंदी साहित्य का  भक्तिकाल अपनी बुलंदी पर था .सूरतुलसी ,मीरा ,रसखान और जायसी की वाणी जनमानस में  आना शुरू हो गयी थी. इन सारी कविताई के बीच तुलसीदास की आवाज़ भक्तिकाल के सभी कवियों से अलग है । तुलसीदास की कविता में एक नायक की तलाश है जो मुसलमान हमलावरों के सांस्कृतिक हमलों से मुकाबला कर सके . तुलसीदास के लिए लड़ाई वह लड़ाई ख़त्म नहीं नहीं हुई थी जो गज़नवी और गोरी के समय शुरू  हुई थी  । इसीलिए उन्होंने सूरदास की तरह माखनचोर या राधाकृष्ण की छवि को केंद्र में नहीं रखा .  सूरदास ने कन्हैया के बालपन को अवाम के दिलोदिमाग पार हावी कर दिया . तुलसीदास ने भी भगवान राम के बचपन का बहुत ही सुन्दर वर्णन तो किया लेकिन उस रूप को अपनी कथा का मुख्य केंद्र नहीं बनाया. उन्होंने राम के  योद्धा रूप को ही केंद्र में रखा .रामचरितमानस में बालकाण्ड एक प्रमुख खंड है लेकिन उसमें भी राम के योद्धा रूप पर बाबा तुलसीदास ने फोकस किया है . पन्द्रह दोहों और उनके बीच आने वाली चौपाइयों में  राम के बचपन की कथा को निपटा दिया है . 190 नंबर के दोहे में राम का जन्म  होता है और 205 नम्बर के दोहे तक विश्वामित्र उनको मांगने के लिए आ जाते हैं . उसके बाद राम का  योद्धा रूप शुरू हो जाता है . वह चाहे शस्त्र आदि की शिक्षा हो, राक्षसों से ऋषियों की तपस्या में  बाधा डालने का प्रतिकार हो या  जनकपुर में सारे भारत से आये योद्धाओं और राजाओं को सीता जी के स्वयंवर में शिकस्त देना हो , कैकेयी की जिद हो या वन की यात्रा हो या  रावण से युद्ध हो ,इन सभी स्थितियों में राम का  योद्धा रूप ही देखा जाता है .इसलिए विद्वानों का एक वर्ग रामचरितमानस को  भक्तिकाल की नहीं  वीरगाथा काल की निरंतरता में रचा गया महाकाव्य मानता है . इसीलिये कांग्रेस की स्थापित सत्ता से लड़ने के लिए आर एस एस ने  तुलसी के राम के योद्धा रूप को आगे  किया और मनोवांछित सफलता मिली . कभी दो सीटों तक सीमित हो गयी आर एस एस की मातहत राजनीतिक पार्टी की सरकार आज देश में स्पष्ट बहुमत के साथ बनी हुई है .लेकिन अब उनको चाहिए कि राम के योद्धा रूप के बाद का रूप अपनाए. जिस तरह से मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने युद्ध जीतने के बाद  देश में अमन चैन कायम किया था , वैसा ही माहौल बनायें . किसी धर्म के  अनुयायियों के प्रति शत्रुताभाव न रखें . जिस एकता की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिलापूजन के बाद के अपने भाषण में की थी उसका मुख्य तत्वा यही होना चाहिए . उन्होंने जय श्रीराम के युद्ध घोष से हटकर जय सियाराम का जो संबोधन किया  है उसको आगे बढ़ाना चाहिए 

Tuesday, August 4, 2020

अनुच्छेद 370 और अयोध्या विवाद का अंत करके नरेंद्र मोदी शान्ति की स्थापना का सन्देश दिया है

 

शेष नारायण सिंह   

अयोध्या में भव्य रामजन्मभूमि मंदिर के  निर्माण के लिए विधिवत भूमिपूजन हो गया . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  मुख्य पूजा की . इसके  साथ ही पिछले 35 साल के चल  रहा विवाद समाप्त हो गया . अयोध्या में राममंदिर के निर्माण का काम शुरू हो गया है . विश्व हिन्दू परिषद की अगुवाई में यह आन्दोलन शुरू हुआ था.जब आन्दोलन शुरू हुआ था तो आज की मुख्य विपक्षी पार्टी सत्ता में थी . केंद्र में और अधिकतर राज्यों में भारी बहुमत से कांग्रेस  की सरकारें थीं . राजीव गांधी प्रधानमन्त्री थे और उनके साथ सलाहकारों की जो टीम थी उन लोगों ने रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की बात को सिरे से खारिज कर दिया . आन्दोलन का संचालन कर रहे  संगठन विश्व हिन्दू परिषद  को मुंहमांगी मुराद मिल गयी . विश्व हिन्दू परिषद ने देश की उस दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को भगवान राम के खिलाफ प्रस्तुत कर दिया  और तब की काल दो लोकसभा सीट वाली पार्टी को राममन्दिर की पक्षधर के रूप में पेश कर दिया .  विश्व हिन्दू परिषद के उस समय  के महत्वपूर्ण नेता प्रवीण तोगड़िया ने मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देना शुरू कर दिया . उस आन्दोलन को सडक पर चलाने का मुख्य दस्ता , बजरंग दल को बना दिया गया . उन दिनों दाऊद इब्राहीम भारत में ही रहता था . भारत में अशांति पैदा करने के पाकिस्तानी एजेंडे का वह हिस्सा बन गया . पाकिस्तान की  आई एस आई ने देश में बहुत सारे संगठन बना रखे थे . दाऊद को भी  पाकिस्तान ने समर्थन देना शुरू कर दिया . नतीजा यह हुआ कि प्रवीण  तोगड़िया और बजरंग दल के हर भड़काऊ बयान का जवाब पाकिस्तान की शह पर काम करने वाले भारत में सक्रिय संगठन देने लगे. नतीजा यह  हुआ कि अयोध्या में पिछले 35 वर्षों ने  अशांति का  वातावरण बना हुआ था .

 

 2020 में  लगता  है कि अब शान्ति रहेगी . इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है . उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ही  स्पष्ट कर दिया था कि संविधान के दायरे में रहकर ही राम मंदिर का  निर्माण होगा और आज वह कार्य पूरा कर लिया गया है . मंदिर निर्माण के लिए चले आन्दोलन में कई बार हिंसा की स्थितियां पैदा हुईं लेकिन इस बार कहीं से कोई  विरोध नहीं हो रहा है . मंदिर निर्माण के  काम में नरेंद्र मोदी को मिलने वाले समर्थनों में सबसे दिलचस्प मामला कांग्रेस का है . कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने  कहा है कि भगवान राम सब में हैं और सब के हैं। ऐसे में पांच अगस्त को अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए होने जा रहा भूमि पूजन राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का कार्यक्रम बनना चाहिए। दुनिया और भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति में रामायण की गहरी और अमिट छाप है। भगवान राम, माता सीता और रामायण की गाथा हजारों वर्षों से हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक स्मृतियों में प्रकाशपुंज की तरह आलोकित है। उन्होंने कबीर के राम , तुलसी के राम , रैदास के राम के साथ साथ कई महान आत्माओं के राम का ज़िक्र किया और एक तरह से ऐलान कर दिया कि राम मंदिर के  निर्माण में कांग्रेस की तरफ से अब कोई बाधा नहीं  आयेगी . हालांकि उन्होंने अपने बयान में कहा नहीं लेकिन उनकी भाषा के प्रवाह से ऐसा लगता है कि वे मोदी के राम को भी  उसी श्रेणी में रख रही हैं . जिन लोगों ने 1986 से राममंदिर निर्माण के आन्दोलन को देखा है उनको  मालूम है कि अगर उनके  पिताजी और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी शुरू में ही यही रवैया अपनाया होता तो बाबरी मसजिद  के विध्वंस और राममंदिर  निर्माण के आन्दोलन के नाम पर जितना खून बहा , वह न बहा होता. बाबरी  मसजिद के टाइटिल के मुक़दमे के मुख्य पैरोकार स्व हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी ने खुले दिन से मंदिर निर्माण  के  काम का समर्थन किया . वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भूमिपूजन समारोह में शामिल होंगे . उन्होंने एक टेलिविज़न कार्यक्रम में कहा कि  देश के  मुसलमान मंदिर  निर्माण के अभियान का समर्थन करते हैं . यह उनका अति उत्साह में दिया गया बयान है क्योंकि  मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी और पीस  पार्टी के डॉ अयूब उनकी बात से सहमत नहीं होंगे . डॉ अयूब  ने तो  अखबार में विज्ञापन छपवा कर देश में निजाम-ए-मुस्तफा का संकल्प लिया है . इसका मतलब यह है कि उनकी पार्टी के देश में संविधान को खारिज करके एक नया इस्लामी निजाम लाने की बात कर रही है जबकि रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण पूरी तरह से संविधान के दायरे में रहकर हो रहा  है .

 

राम का मंदिर निर्माण संविधान के दायरे  में   हो रहा है और उसके  लिए  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रेय दिया जा रहा है . ऐसा माहौल है कि कोई विरोध कर ही नहीं सकता. लेकिन जो सबसे बड़ी बात उन्होंने की वह यह है कि  अपने संगठन के सहयोगी बजरंग दल वालों को काबू में रखा . हिन्दू धर्म में आक्रामकता लाने की  कोशिश करने वाले सभी नेता सिस्टम से बाहर हो चुके हैं . प्रवीण तोगड़िया एक समय में विश्व हिन्दू परिषद के सर्वेसर्वा हुआ  करते थे.  आजकल कहीं गुमनामी के  अँधेरे में  बिला गए हैं . उनके साथी संगी भी अब हाशिये पर  हैं . लगता  है कि नरेंद्र मोदी ने सबको यह संदेश दे दिया है कि आपसी वैमनस्य नहीं आपसी सौहार्द से ही देश का राजकाज चलाया जाना चाहिए . उन्होंने जे एस मिल के सिद्धांत ‘ अधिकतम संख्या का अधिकतम कल्याण ‘ को गवर्नेंस का माडल बनाकर काम करने का फैसला किया  है .

 

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत पांच अगस्त को होगी . ठीक एक साल पहले पांच  अगस्त 2019 के दिन  जम्मू-कश्मीर से  संविधान के अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया था. राम मंदिर निर्माण के साथ साथ अनुच्छेद 370 का हटाया जाना भी आर एस एस  का एक बहुत ही महत्वपूर्ण  लक्ष्य  था . भारतीय जनता पार्टी अपने पूर्व अवतार  भारतीय जनसंघ के समय से ही जम्मू-कश्मीर को अलग दर्ज़ा देने  का  विरोध करती रही है . जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी उसी सिलसिले में कश्मीर  गए थे जब उनकी मृत्यु हुई थी . जनसंघ के कानपुर अधिवेशन में 1952 में इस आशय का प्रस्ताव भी पास किया गया था. तब से ही पार्टी जम्मू-कश्मीर से 370 हटाने का विरोध करती आ रही है .वहां पाकिस्तान अपने कठपुतली नेताओं के ज़रिये कश्मीर के   भारत में विलय के विरोध में आन्दोलन करवाता रहा  है. सबको मालूम है कि संविधान में अनुच्छेद 370 एक टेम्परेरी प्रावधान था लेकिन कश्मीर सहित बाकी देश में अशांति के डर से अब तक की सरकारें 370  हटाने वाली बात को टालती रही हैं . नरेंद्र मोदी ने कश्मीर से 370 तो हटा ही दिया , वहां पर पाकिस्तानी शह पर  हिंसा करने वालों को भी औकात में ला दिया . सबसे बड़ी बात यह हुई कि देश में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई बल्कि खुशी ही जाहिर की गयी. देश में पिछले कई दशकों से अशांति की जड़ बनी समस्याओं को सुलझाकर नरेंद्र मोदी ने निश्चित कुशल राजनीति का परिचय दिया है .इसके लिए उनके  विरोधियों के बीच भी उनका सम्मान बढ़ा है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


Wednesday, July 29, 2020

चारण पत्रकारिता से लोकतंत्र , राष्ट्र और सत्ताधारी पार्टी का भारी नुकसान होता है





शेष नारायण सिंह


पूरी दुनिया में कोरोना वायरस के  विषाणु के कारण हाहाकार मचा हुआ है . भारत में भी यह बहुत ही खतरनाक बीमारी साबित हो चुकी है . देश के हर राज्य में कोरोना संक्रमित मरीज़ हैं . लोगों को तरह तरह की पेशानियां झेलनी पड़ रही हैं . कहीं अस्पताल की सुविधा नहीं है तो कहीं क्वारंटाइन के  प्रबंधन को लेकर मुसीबतें हैं. टेस्ट बहुत कम हो  रहे हैं . ख़बरें यह भी हैं कि बहुत सारे बीमार लोग टेस्ट के लिए नमूने नहीं दे   पा रहे हैं क्योंकि टेस्ट की  सुविधा के अभाव में अधिकारी नमूने नहीं  ले  रहे हैं . गाँव में भी लोग कोरोना संक्रमित हो रहे हैं लेकिन उनकी गिनती नहीं हो  रही है क्योंकि किसी अस्पताल या सरकारी एजेंसी में उनका कहीं कोई रिकार्ड नहीं है .अगर किसी की कोरोना से मृत्यु   हो रही है तो  ऐसी  भी सूचना आ रही है कि उसके गहर परिवार वाले उसका अंतिम संस्कार तक   नहीं कर  रहे हैं .कोरोना से बीमार लोगों को परिवार के लोग छोड़कर ज़िम्मेदारी से मुक्त हो रहे  हैं.  यह जितने भी विषय हैं यह सब समाचार हैं. ईमानदारी की पत्रकारिता में या सारी ख़बरें हेडलाइन की ख़बरें मानी जायेंगी .
असम , बिहार  और उत्तराखंड में बरसात में आने वाली बाढ़ के चलते तबाही आई हुयी है . सड़कें टूट रही हैं, पुल गिर रहे हैं. गाँवों में पानी घुस आया है , इंसानी  ज़िंदगी मुसीबत के मंझधार में  है. मानवीय विपत्ति की यह ख़बरें भी अगर  कहीं आ रही हैं तो साइड की ख़बरों की तरह चलाई जा रही हैं . लेकिन कुछ टीवी चैनलों में तो बिलकुल नदारद हैं. हां कुछ चैनल इन ख़बरों को भी ज़रूरी प्राथमिकता दे रहे हैं लेकिन पिछले एक हफ्ते थे ज्यादातर टीवी चैनलों की ख़बरों को देख कर लगता है देश में सब अमन चैन है , कहीं कोई परेशानी नहीं है .
अजीब  बात है कि फ्रांस से बहुत ही महंगे दाम में खरीदे गए रफायल युद्धक विमानों को घंटों ख़बरों में चलाया जा रहा है . अव्वल तो सेना के पास कितने हथियार हैं यह बात आम तौर पर सीक्रेट  रखी जाती   है क्योंकि माना यह जाता है कि  जिनके खिलाफ युद्ध होना है उनको किसी  भी देश के हथियारों की विस्तृत जानकारी नहीं होनी चाहिए . और एक हमारा विजुअल मीडिया  है जो एक महत्वपूर्ण हथियार के सारे विवरण टेलिविज़न पर दिन रात प्रचारित कर रहा है.  यह प्रवृत्ति गैर ज़िम्मेदार पत्रकारिता तो हैं ही यह राष्ट्रहित को भी नुक्सान पंहुचा सकती है .
कई साल के विवाद के बाद अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण होना है . पांच अगस्त को उस मंदिर का शिलान्यास  प्रधानमंत्री जी करेंगे . उस कार्यक्रम को लाइव दिखाया जाएगा .  यह खबर है लेकिन टीवी चैनलों की नज़र में पिछले एक हफ्ते से  पांच अगस्त के शिलान्यास के कार्यक्रम की जो विवरणी शास्वत चल रही है उसको देख कर लगता है कि उसके अलावा  कोई ऐसी खबर ही नहीं है जिसको  हाईलाईट किया जा सके . टीवी  चैनलों की एक अन्य खबर है कि मुंबई में  सिनेमा के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली थी. उसकी जाँच चल रही है . उस जांच की पल पल की जानकारी चप्पे  चप्पे पर  मौजूद चैनल के रिपोर्टर दे रहा  है. और चैनल इसको लहक लहक लार सुना रहा है . सुशांत  सिंह की आत्महत्या निश्चित रूप से एक बड़ी खबर है लेकिन उसकी जांच की हर जानकारी तो उतनी बड़ी खबर नहीं  है कि  उसका लगभग लाइव प्रसारण किया जाय लेकिन आजकल टीवी पत्रकारिता में जो भेडचाल है उसके चलते यह सारी हालात पैदा हुए हैं . अमिताभ बच्चन के बीमारी भी कई दिन तक टीवी चैनलों का मुख्य विषय बना रहा . इन खबरों के बीच में मुंबई सहित बाकी देश में कोरोना  के कारण पैदा हुई आर्थिक तबाही ,  बेरोजगारी , फ़िल्मी दुनिया में काम करने वालों की भीख माँगने की मजबूरी का कहीं भी ज़िक्र  नहीं हो रहा है . बड़े शहरों ने बेरोजगार होकर गाँवों में गये लोग जिस तरह से अपराध की तरफ प्रवृत्त ही रहे हैं वह भी कहीं चर्चा में नहीं आ रहा है .
राजस्थान में संविधान की व्यख्या को लेकर जो संकट मौजूद है उसका भी ज़िक्र केवल सचिन पायलट के अधिकारों को  छीन लेने तक सीमित कर दिया गया है.  वहां के राज्यपाल की संदिग्ध भूमिका का टीवी चैनलों में  विश्लेषण  नहीं हो रहा है . मायावती की राजनीति में बहुत बड़ा शिफ्ट हो चुका है . अगर  कबीरपंथी  पत्रकारिता का दौर होता तो उसका विधिवत विश्लेषण किया  जाता  लेकिन  ऐसा कहीं कुछ देखने को नहीं मिल रहा है .    राजस्थान में उनकी पार्टी के विधान मंडल दल ने अपना विलय कांग्रेस में बहुत पहले पर लिया था . अब मायावती उन कांग्रेसी विधायकों के लिए व्हिप जारी करती हैं या उनकी सदस्यता रद्द करवाने  सुप्रीम कोर्ट जाती  हैं, उसकी जानकारी पूरी तरह से बार  बार देश को बाताई जा रही है लेकिन यह  नहीं बताया जा रहा है कि उनको यह काम करने की  प्रेरणा कौन दे रहा है .
इस तरह की पत्रकारिता को चारण पत्रकारिता कहते हैं .टीवी चैनल देखने से लगता है कि रफायल युद्धक विमान और राम मंदिर के शिलान्यास से बड़ी कोई खबर ही नहीं है .जबकि पत्रकारिता का बुनियादी सिद्धांत यह  है कि इंसानी मुसीबतों या उनकी बुलंदियों के बारे में सूचना दी जाए . सवाल यह  है कि मीडिया संस्थान सचाई को दिखाने से डरते क्यों हैं .संविधान  मीडिया को जनहित में अपनी बात कहने की आज़ादी देता है .  प्रेस की आज़ादी की  व्यवस्था  संविधान में ही है . संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता की व्यवस्था दी गयी हैप्रेस की आज़ादी उसी से निकलती  है . इस आज़ादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है . १९५० के  बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य  और १९६२ के सकाळ पेपर्स  प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसलों में  प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को मौलिक अधिकार के  श्रेणी में रख दिया  गया है . प्रेस की यह आज़ादी निर्बाध ( अब्सोल्युट ) नहीं है . संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 19(2) में ही उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं.  संविधान में लिखा है  कि  अभिव्यक्ति की आज़ादी के "अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडताराज्य की सुरक्षाविदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधोंलोक व्यवस्थाशिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमानमानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी"  यानी प्रेस की आज़ादी तो मौलिक अधिकारों के तहत कुछ भी लिखने की आज़ादी  नहीं है .
हालांकि यह भी सच   है कि  सत्ताधीश कई बार इस आज़ादी को गैर संवैधानिक तरीकों से कुचल भी देते हैं. सरकारी आदेश या अन्य  तरीकों से मीडिया संस्थान या  पत्रकारों पर हमले भी होते  हैं.कई बार तो पत्रकारों को सही खबर लिखने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है . सत्ता के करीबी पत्रकार भी इस बात को सही ठहराते पाए जाते हैं .और कई बार पत्रकारों की  हत्या को भी सही बताते है . वे मानते है कि अगर  पत्रकार ने संविधान के अनुच्छेद 19(2) का उन्लंघन किया  है तो उसको मार डालना  भी सही है  . इस तर्क की परिणति बहुत ही खतरनाक है और इसी तर्क से लोकशाही को ख़तरा  है . कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के हवाले से बात को समझने की कोशिश की जायेगी . उनकी हत्या के बाद उनके पुराने लेखों का ज़िक्र किया गया जिसमें उन्होंने ऐसी बातें लिखी थीं जो एक वर्ग को स्वीकार नहीं थीं. सोशल मीडिया पर सक्रिय एक  वर्ग ने  चरित्र हनन का प्रयास भी किया .वे यह कहना चाह  रहे थे कि गौरी लंकेश की  हत्या करना एक ज़रूरी काम था और जो हुआ वह ठीक ही हुआ.  आज ज़रूरत इस बात की है कि इस तरह की प्रवृत्तियों की निंदा की जाये .अगर इस बात को सही साबित करने की कोशिश की जायेगी तो लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही  सवालिया निशान  लग जाएगा.  इस लोकतंत्र को बहुत ही मुश्किल से हासिल किया  गया है और उतनी ही मुश्किल इसको संवारा गया है . अगर समाचार संस्थान  जनता तक सही बातें और वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पंहुचाएगा तो सत्ता पक्ष के  लिए भी मुश्किल होगी. इंदिरा  गांधी ने यह गलती १९७५ में की थी. इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दिया था . सरकार के खिलाफ कोई भी खबर नहीं छप सकती थी. टीवी और रेडियो पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में थे , उनके पास  तक  जा सकने वालों में सभी चापलूस होते थेउनकी जयजयकार करते रहते थे इसलिए उनको  सही ख़बरों का पता  ही नहीं लगता था . नौकरशाही ने उनको  बता दिया कि देश में उनके पक्ष में बहुत भारी माहौल है और वे दुबारा भी बहुत ही आराम से चुनाव जीत जायेंगीं .  चुनाव करवा दिया और  १९७७ में बुरी तरह से हार गईं ..इंदिरा गांधी के भक्त और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रेस सेंसरशिप के दौरान नारा दिया था कि  ' इंदिरा इज इण्डिया ,इण्डिया इज  इंदिरा ,' इसी .तरह से जर्मनी के तानाशाह हिटलर के तानाशाह बनने के पहले उसके एक चापलूस रूडोल्फ हेस ने नारा दिया था कि  ,' जर्मनी इस हिटलर , हिटलर इज जर्मनी '.   रूडोल्फ हेस नाजी पार्टी में बड़े पद पर था .
चारण पत्रकारिता  सत्ताधारी पार्टियों  की सबसे  बड़ी दुश्मन है क्योंकि वह सत्य पर पर्दा डालती है और सरकारें गलत फैसला लेती हैं . ऐसे माहौल में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह मीडिया को निष्पक्ष और निडर बनाए रखने में योगदान करे  . चापलूस पत्रकारों से पिंड छुडाये . सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के सवाल पूछने के  अधिकार और आज़ादी को सुनिश्चित करे . साथ ही संविधान के अनुच्छेद १९(२) की सीमा में  रहते हुए कुछ भी लिखने की  आज़ादी और अधिकार को सरकारी तौर पर गारंटी की श्रेणी में ला दे . इससे निष्पक्ष पत्रकारिता का बहुत लाभ होगा.  ऐसी कोई व्यवस्था कर दी जाए जो सरकार की चापलूसी करने को  पत्रकारीय  कर्तव्य पर कलंक माने और इस तरह का काम करने वालों को हतोत्साहित करे. अगर मौजूदा सरकार इस तरह का  माहौल  बनाने में सफल होती है तो वह राष्ट्रहित और समाज के हित में होगा .


Monday, July 27, 2020

Happy birthday Dr S B Singh



जन्मदिन मुबारक डाक्टर एस बी सिंह

आज  डॉ एस बी सिंह का जन्मदिन है . आप इलाहाबाद में विराजते हैं . यहाँ दिल्ली में जब मेरे किसी दोस्त  या  शुभेच्छु को कोई मुश्किल बीमारी हो जाती है तो मैं उनका फोन  नंबर दे देता हूँ और फोन पर ही वे होम्योपैथिक  दवा का नाम लिखवा देते हैं . ज्यादातर लोग बिलकुल ठीक हो जाते  हैं . चार दशक से भी ज़्यादा समय से  होम्योपैथी की प्रेक्टिस कर रहे हैं  . और देश के शीर्ष होम्योपैथिक डाक्टरों में उनकी गिनती होती है . इलाहाबाद में उनके कई  स्थानों पर क्लिनिक हैं . मुख्य ठिकाना इलाहाबाद  यूनिवर्सिटी के पास कटरा में हैं . वहां शाम को मरीजों का मेला लगता है . आम तौर पर   डाक्टरों ने फीस बढ़ा दी है लेकिन उनकी फीस अभी भी बहुत ही कम है . मैं कोशिश कर रहा हूँ कि  वे महीने में दो एक दिन नोयडा या ग्रेटर नोयडा  में भी मरीज़ देखना शुरू कर दें . उनका एक बेटा दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट में वकील है , बिटिया बायोटेक्नोलोजी की विद्वान है और दामाद निजी क्षेत्र की एक बड़ी बैंक में बड़े पद पर  है. बड़ा बेटा भोपाल में रहता है, बड़ा बैंकर है . भाई बहन , नात रिश्तेदार सबको  साकिन बहमरपुर से इलाहाबाद लाकर जमा देना उनका शौक़ था. आज सभी का परिवार आनन्द में है, सब के बच्चे ज़िंदगी में अच्छा कर रहे  हैं . एकाध रिश्तेदार का बेटा तो सिविल सर्विस  में चुन लिया गया  है और राजपूती दहेज की बाज़ार में उसकी कीमत करोड़ों के पार है .
डॉ साहब गांधीवादी मूल्यों से  ओतप्रोत हैं . हालांकि बच्चे चलने नहीं देते लेकिन उनकी चले तो स्लीपर  क्लास में ही यात्रा करना पसंद करते हैं . शिक्षा के महत्व  को अच्छी तरह  जानते   हैं इसलिए अपने गाँव में एक   बढ़िया स्कूल स्थापित कर रहे हैं. उनके पिताजी लम्भुआ मिडिल स्कूल में मेरे अंग्रेज़ी के शिक्षक थे.  उन दिनों बहुत ही अच्छे कपड़े जूते वगैरह पहनते थे . हम लोगों से बड़ी उम्र के नाक्शेबाज़ लोग उनके कपड़ों की नक़ल करते थे. सिनेमा था नहीं तो वही फैशन के मामले में  दिलीप कुमार , देवानंद की जगह पर हीरो माने  जाते थे . वक़्त के इतने पाबन्द  थे कि उनके स्कूल जाने के समय से लोग घड़ी मिला लिया करते थे. बहुत ही सख्त शिक्षक थे . इसलिए हर  क्लास में दो चार लड़के ऐसे होते थे जो उनकी सख्ती की हवा निकालने का काम करते थे. मेरी क्लास में इस तरह के लड़कों की अगुवाई मैं करता था. बाद में मुझपर उनको अटूट विश्वास था.  जब मैं टी डी  कालेज जौनपुर में पढता था तो डॉ एस बी   सिंह के पिताजी ने उनकी शिक्षा के लिए जौनपुर भेज दिया और मैं उनका लोकल गार्जियन बना दिया गया . मुझे फख्र है कि मैंने एक गार्जियन के रूप में बहुत ही  अच्छा काम किया .डाक्टर  साहब खुद भी कहते हैं कि आत्मनिर्भरता का जो  अभ्यास मैने उनको कराया था , आज वही उनका पाथेय है. उनकी पत्नी ढकवा के पास बसे मानाशाही बैस  ठाकुरों के परिवार में नगर गाँव के एक रईस बाबू साहब की बेटी हैं . शादी जल्दी हो गयी थी . उन्होंने दसवीं ही पास किया  था . शादी के बाद डॉ एस बी सिंह ने उनको इलाहाबाद  में  लाकर उच्च  शिक्षा की प्रेरणा दी और उन्होंने   एम ए , पी-एच डी की पढाई की और   शहर के एक नामी कालेज में लेक्चरर हुईं. अब मेरे दोस्त एस बी सिंह की  रेज़ीडेंट थानेदार हैं . और उनको पूरी तरह से कंट्रोल में रखती हैं . दोनों की मुहब्बत उसी तरह की है जैसी आज के अड़तालीस साल पहले थी . दीवानगी की हद तक.
आज  उन्ही डॉ एस बी सिंह का  जन्मदिन है . जन्मदिन मुबारक डाक्टर साहब .

   


Wednesday, July 22, 2020

युद्ध पर आमादा चीन को बंदूकों से नहीं उसकी अर्थव्यवस्था की तबाही की योजना से जवाब दिया जाना चाहिए


शेष नारायण सिंह 
पिछले तीन महीने  से चीन की सेना ने  लदाख में नियंत्रण रेखा ( एल ए सी ) पर छेड़खानी शुरू कर दिया है .चीन  वहां भारत की ज़मीन में घुस आना  चाहता है . उसके दुस्साहस का नतीजा यह हुआ कि जून में दोनों देशों के सैनिक बिलकुल आपने सामने आ गए और मारपीट हुयी . भारत के करीब बीस सैनिक शहीद हुए जबकि चीन के  सैनिक भी बड़ी संख्या में मारे गए .. उसके बाद से कई बार बातचीत हो चुकी है . सैनिक अफसरों की बात चीत का सिलसिला लगातार जारी  है.  कूटनीतिक प्रयास भी हुए हैं . लेकिन लगता है कि चीन अपनी बात पर अड़ा रहना चाहता है.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लदाख हो आये हैं और रक्षामंत्री का भी दो दिन का  दौरा हो चुका है .पिछले हफ्ते लदाख में उन्होंने  भारतीय सैनिकों की हौसला अफजाई की और कहा कि चीन ने जो हालात  पैदा कर दिए गए  हैं उसको हल करने की कोशिश चल रही है . रक्षामंत्री ने कहा कि इस विवाद को हल करने के लिए चीन से बातचीत का सिलसिला जारी  है . विवाद का हल निकलने की उम्मीद है लेकिन  गारंटी नहीं दी जा सकती . रक्षामंत्री ने कहा कि ,”  मैं इतना यकीन दिलाना चाहता हूं कि भारत की एक इंच जमीन  भी  दुनिया की कोई भी ताकत छू नहीं सकती ,उसपर क़ब्ज़ा नहीं का सकती .”  राजनाथ सिंह ने कहा कि , “हम शांति चाहने वाले लोग हैंअशांति नहीं चाहते . भारत ने पूरी दुनिया को शांति का संदेश दिया है. उन्होंने यह भी दावा किया कि  सीमा पर दुश्मनों की किसी भी चाल का जवाब देने के लिए भारत पूरी तरह तैयार हैं. मामला ख़ासा पेचीदा हो गया है . चीन ने  भारत के क्षेत्र में  अपनी सेना को आगे तैनात करके अपनी मंशा को साफ़ कर दिया है . भारत की सेना तैयार थी इसलिए चीनी सैनिक ज़्यादा आगे नहीं बढ़  सके . बुधवार को भी  रक्षामंत्री ने चीन को सख्त सदेश दिया . राजनाथ सिंह दिल्ली में वायुसेना के कमांडरों के सम्मलेन में बोल रहे थे . उन्होंने  कहा कि वायुसेना ने जिस तरह से एलएसी के फॉरवर्ड लोकेशन पर अपने युद्धक विमान तैनात किए हैंउससे दुश्मन  को  संदेश मिल चुका है. रक्षामंत्री ने दावा किया कि  चीन से एलएसी पर तनाव कम करने की बात चल  रही है लेकिन भारत की  वायुसेना को किसी भी हालत के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा.
जानकारों का कहना है कि चीन की नीयत साफ़ बिलकुल नहीं  है . यह बात भारत सरकार को भी पता है इसलिए देश की सेना को किसी भी संभावना का सामना करने के लिए तैयार रहना पडेगा .  चीन ने १९६२ में भी इसी तरह का माहौल बनाया था लेकिन उसकी मंशा भारत के इलाके को क़ब्ज़ा करने की थी. सेना के अवकाश प्राप्त अधिकारी  इस बात का भरोसा बार बार दिलवा रहे  हैं कि भारत  की हालत अब १९६२ वाली नहीं है .  देश की फौज तैयार है और चीन ने अगर १९६२ वाली गलती की तो उसको माकूल जवाब दिया जाएगा . पूर्व सेना प्रमुख जनरल जे जे सिंह ने  एक टेलिविज़न डिबेट में बताया कि  वुहान  से शुरू हुए कोरोना वायरस के आतंक और उसके कारण पैदा हुए माहौल के बाद दुनिया के ज्यादातर देश भारत के साथ खड़े हैं . लेकिन यह  अति आशावाद है क्योंकि युद्ध की स्थति में कोई भी देश  समर्थन तो करेगा लेकिन उसके सेनाएं युद्ध करने नहीं आयेंगी .अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी .
इस बीच भारत ने अमरीका से सामरिक संबंधों को बढाने की ज़बरदस्त पेशकश  शुरू कर दिया  है . इस बात की संभावना बहुत ज्यादा हो गयी  है कि चीन के हठधर्मी आचरण के मद्देनज़र अमरीका से सेना के स्तर पर  दोस्ती तो ज़्यादा होगी लेकिन यह बात  पक्की है कि अमरीकी सेना भारत के किसी भी सैनिक अभियान में साथ नहीं  रहेगी . अमरीकी  राष्ट्रपति ट्रंप बार बार भारत को भरोसा दे रहे हैं कि वह चीन और भारत के विवाद में भारत के पक्ष को सही मानते हैं लेकिन उनके लिए भी भारतीय सेना के साथ अपनी सेना को युद्ध में उतारना असंभव होगा . अमरीका  आर्थिक और सैनिक रूप से एक मज़बूत देश है लेकिन उनके लिए चीन के खिलाफ संभावित युद्ध में भारत के साथ मिलकर लड़ने के लिए सेना  भेजना संभव नहीं होगा. पिछले पचास वर्षों में जहां भी अमरीकी सेना गयी है कुछ साल के बाद भागने के रास्ते  तलाशना पड़ा है . वियतनाम में  चीन की हार को न तो अमरीका के नीतिनिर्धारक भूले  हैं और न ही  दुनिया ने उसको भूलने दिया है . इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता को उखाड़ने गए अमरीकी  सैनिकों को आठ साल तक वहां रखने के बाद  जिस तरह से तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने निकाला था उसको अमरीकापरस्त लोग जीत मानते हैं लेकिन वह  जीत नहीं थी . अमरीका  की सेनाओं के बार बार मुंह की खाने के कारण वहां के रक्षा व्यवस्था के करता धरता यह नहीं  चाहते कि उनकी सेना किसी लफड़े में पड़े .वैसे भी अमरीका ने कभी किसी देश के साथ सम्बन्ध ईमानदारी से सही नहीं निभाया  है . वह किसी भी देश को अपने हित में  इस्तेमाल करता  है . अगर  भारत अमरीका से कोई भी मदद लेगा तो उसकी कीमत बहुत ही भारी पड़ेगी . ज़ाहिर  है भारत अपनी विदेशनीति में ऐसा कोई बड़ा बदलाव नहीं चाहेगा जिसके चलते एशिया की सारी भू राजनीतिक परिस्थितियाँ  ही बदल जाएँ .
अमरीका के किसी सामरिक सहयोग के बिना ही भारत को  चीन से विवाद की समस्या को हल कर लेना चाहिए . आज के अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैसे भी अस्थिर चित्त के व्यक्ति हैं और उनके दुबारा राष्ट्रपति  चुने जाने की सम्भावना बहुत ही कम है . जितने भी  चुनाव पूर्व सर्वे वहां हो रहे हैं सब में ट्रंप को पिछड़ता हुआ दिखाया  जा रहा है . यहाँ तक कि उनका पालतू टीवी चैनल फॉक्स न्यूज़ भी अपने उनके हारने की भविष्यवाणी कर रहा है .उनकी ऊलजलूल  हरकतों की रोशनी में यह उम्मीद करना ठीक नहीं होगा कि  उनके किसी बड़े राजनीतिक फैसले अगला राष्ट्रपति सम्मान देगा .ऐसी हालत में चीन से समस्या के निदान के लिए कूटनीतिक तरीके ही अपनाना ठीक होगा . अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विदेशनीति को चीन विरोध के ऐसे सांचे में फिट कर दिया है कि चीन पर उनका कोई भी  नैतिक दबाव नहीं पड़ने वाला है .  चीन के विरोध की आदत  विकसित कर चुके डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के नतीजा ही है कि चीनी राष्ट्रपति , शी जिनपिंग आज एशिया के कई देशों  में  सम्मान के हकदार बन गए हैं . अगर ट्रंप की शेखचिल्ली नीतियों पर ही अमरीका चलता  रहा तो वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र, अफ्रीका और लातीनी अमरीका में अपना प्रभाव गँवा देगा . सबको मालूम है कि इन क्षेत्रों में चीन बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा  है और वहां प्रभाव जमाने के लिए प्रयत्नशील है . आज चीन अमरीका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है . उसकी  कोशिश है कि वह अमरीका को भी पीछे छोड़कर सम्पन्नता में दुनिया में नंबर एक पर पंहुच जाय . एक कम्युनिस्ट देश का पूंजीवादी दुनिया में प्रवेश और वहां मजबूती  से जमने के पीछे बड़े पैमाने पर राजनीतिक सोच में बदलाव है .इस सोच के बदलाव में डेंग श्याओपिंग की आर्थिक समझ का बड़ा योगदान है . डेंग ने १९७८ में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वोच्च पद हासिल किया था . उसी समय से वे अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव  के लिए नीतिगत फैसले  ले रहे थे .  उनकी दूरदर्शी सोच का नतीजा था  कि चीन आज अमरीका से टक्कर ले रहा  है . उन दिनों  चीन से बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था सोवियत यूनियन की थी लेकिन वह १९९० के आसपास तबाह हो गयी . सोवियत यूनियन का विघटन हो गया. पूर्वी  यूरोप के कम्युनिस्ट  देशों से कम्युनिस्ट शासन प्रणाली समाप्त हो गयी चीन एक बड़ी  अर्थव्यवस्था बनने के रास्ते पर चल पड़ा था . डेंग ने  बाकी दुनिया से निवेश के  लिए चीन के दरवाज़े खोल दिए थे. नतीजा यह है कि आज अमरीका की सबसे बड़ी कंपनियों के लिए सामान बनाने वाले कारखाने  चीन में हैं.
कोरोना के बाद चीन चीन से दुनिया का मोहभंग हो रहा है .आमतौर पर माना जा रहा है कि चीन से आया कोरोना वास्तव में चीन की रणनीति का एक हिस्सा है . कोरोना के बाद  विश्व के  सभी विकसित देश प्रभावित हुए  हैं. एशिया के देशों में भी  भारी आतंक है लेकिन चीन के वुहान प्रांत से शुरू होने वाले कोरोना से चीन में उतना नुक्सान नहीं हुआ जितना अमरीका और यूरोप में हुआ है . इस बात में दो राय  नहीं है कि कोरोना के बाद की दुनिया बिलकुल अलग  होगी. बहुत सारी  अमरीकी कम्पनियां चीन से अपने कारखाने हटाने की बात कर रही हैं .  मझोले स्तर के उद्योग तो हटाभी चुके हैं लेकिन ज़्यादातर कारपोरेट  कंपनियों ने ताइवान, वियतनाम आदि देशों में  कारखाने लगाये हैं . अभी भारत का नम्बर  नहीं आया  है. २२ जुलाई को आइडिया फॉर इण्डिया मंच पर अपने भाषण में  प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अमरीकी निवेशकों का आवाहन किया कि वे भारत में अपने कारखाने लगाएं . उन्होंने देश में हो रही आर्थिक विकास की गतिविधियों का विस्तार से  उल्लेख किया . उम्मीद की जा रही  है कि अमरीकी निवेश बड़े पैमाने पर भारत में  होगा . लेकिन विदेशी निवेश के लिए ज़रूरी है कि देश में  तनाव युक्त माहौल न रहे , चौतरफा शान्ति रहे .  भारत इस मामले में कमज़ोर है . अयोध्या आन्दोलन के नाम पर बने हुए संगठन पूरे देश में फैले हुए हैं  . वे राष्ट्रवादी नारे  लगाते हैं लेकिन विरोधियों में  आतंक फैलाते हैं . इन लोगों पर अगर कंट्रोल कर लिया जाए  तो उत्तर-कोरोना युग में  भारत में वह निवेश शिफ्ट हो सकता है .चीन से उद्योग धंधे बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं . उनका एक हिस्सा अगर   भारत में आ गया तो चीन पर  मर्मान्तक प्रहार होगा और बिना युद्ध किये  ही चीन को औकात पर लाया  जा सकेगा . अगर आर्थिक शक्ति के रूप में चीन कमज़ोर पडा तो लदाख में एल ए सी पर चीनी सेना की घुसपैठ की हिम्मत नहीं   पड़ेगी . एक कमजोर अर्थव्यवस्था वाला चीन युद्ध से बचना भी चाहेगा . युद्ध से  भारत को भी बचना चाहिए क्योंकि युद्ध हुआ तो अर्थव्यवस्था का  बड़ा  नुक्सान होगा और उससे बचना चाहिए .

Saturday, July 18, 2020

नेल्सन मंडेला का जन्मदिन आज़ादी की इच्छा रखने वालों के लिए त्यौहार का दिन है




शेष नारायण सिंह

आज  ( 18 जुलाई ) नेल्सन मंडेला का जन्मदिन है . सत्तर   के दशक में दुनिया  भर के छात्रावासों के बहुत सारे कमरों में उनका पोस्टर लगा रहता था. साउथ अफ्रीका की आज़ादी की लड़ाई के लिए वे 27 साल जेलों में रहे. उस दौर में पूरी दुनिया के नौजवान उनको हीरो मानते थे . साउथ अफ्रीका का पूरा मुल्क बहुत वर्षों तक श्वेत अल्पसंख्यकों के आतंक को झेलता रहा  था . अमरीका और ब्रिटेन की साम्राज्यवादी सत्ता की मदद से आतंक का राज कायम हुआ और चलता रहा . पूरा देश आज़ादी की मांग को लेकर मैदान में आ गया था  . उनके सर्वोच्च नेता नेल्सन मंडेला को २७ साल तक जेल में रखा गया और जब आज़ादी मिली तो पूरा मुल्क खुशी में झूम उठा . नेल्सन मंडेला शुरू में तो हिंसा की बात करते थे लेकिन बाद में  महात्मा गांधी की अहिंसा की नीति को ही अपने संघर्ष  का आधार बनाया . वे गांधी को प्रेरणा स्रोत मानते थे .

 यह आज़ादी आसानी से नहीं मिली थी . उसके पीछे अफ्रीकी अवाम का दशकों तक चला  संघर्ष था. उस आजादी के नेता निश्चित रूप से नेल्सन  मंडेला थे .मंडेला के ऊपर अफ्रीकी अस्मिता और सम्मान के लिए लड़ रहे नेताओं वॉल्टर सिसुलू और वॉल्टर एल्बरटाइन का बहुत प्रभाव पड़ा था .उन दिनों अफ्रीका में श्वेत अल्पसंख्यकों का शासन था . दक्षिण अफ्रीका की स्थति भारत से अलग थी क्योंकि  भारत में जो अँगरेज़ आये थे , वे यहाँ शासन करने के लिए नियमित रूप से आते थे और वापस  चले जाते थे लेकिन दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने बाकायदा नागरिकता ले ली थी और  उसको अपना देश मानकर  हुकूमत करते थे .  वहां के स्थानीय लोगों को श्वेत अंग्रेजों के अधीन लगभग  गुलामों की ज़िंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था . दक्षिण अफ्रीका में   रंगभेद के आधार पर राज कायम किया गया था .  इसी रंगभेद के शासन के विरोध के लिए वहां अफ्रीकी नैशनल कांग्रेस की स्थापना की गयी थी .1944 में मंडेला  अफ़्रीकन नैशनल कांग्रेस में शामिल हो गये . कांग्रेस का एक आनुषंगिक  संगठन, अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग ,बना जिसकी शुरुआत में मंडेला ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था  1947 में वे अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग के सचिव बन गए .

 1962 को उन्हें मजदूरों को हड़ताल के सिलसिले  में गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला और  1964 को उन्हें आजीवन कारावास  की सजा सुनायी गयीथी . उसी सज़ा के साथ साथ ही यह तय हो गया कि नेल्सन मंडेला की तकलीफ सह  सकने की हिम्मत अगले 27 तक श्वेत शास्स्कों को बहुत  तकलीफ देने वाली है . उनके नाम का सहारा लेकर देश में और दुनिया भर में आज़ादी पसंद अवाम दाक्षिण अफ्रीका की आज़ादी के साथ हो गयी. इंगलैंड , अमरीका सहित कुछ  साम्राज्यवादी देशों के अलावा दक्षिण अफ्रीका के  श्वेत शासकों का कहीं कोई पुछत्तर नहीं था .27 साल तक जेलों में रहने के बाद जब  1990 को उनको रिहा किया गया तो देश में आजादी की आमद की दस्तक साफ़ सुनी जा रही थी . उन्होंने सत्ता संभाली और आपसी सौहार्द्र की बुनियाद पर सत्ता चलाने की कोशिश की .उन्होंने एक लोकतान्त्रिक एवं बहुजातीय अफ्रीका की कल्पना की थी और वही दक्षिण अफ्रीका की गवर्नेंस का स्थाई मॉडल  बना .

उनकी रिहाई के बाद ही अफीका से रंगभेद ( aprathied ) के राज की  विदाई हो चुकी थी. 1994 में आम चुनाव हुए और नेल्सन मंडेला की पार्टी अफ्रीकन नैशनल कांग्रेस को  भारी बहुमत मिला. मई 1994 में मंडेला अपने देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने. 1997 में वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गये और दो वर्ष पश्चात उन्होंने 1999 में अफ्रीकी नैशनल कांग्रेस का अध्यक्ष का पद भी छोड़ दिया. दक्षिण अफ्रीका में  मंडेला को वही  सम्मान मिला जो भारत में आज़ादी के बाद महतामा गांधी को मिला था. लोग उनको  राष्ट्रपिता  मानते थे.  दक्षिण अफ्रीका में  उन्हें  ‘ मदीबा  ‘  कहते हैं.  यह वरिष्ठ लोगों के लिए आदर से लिया जाने वाला संबोधन है .  नेलसन मंडेला को दुनिया के बहुत सारे देशों ने सम्मानित किया है . उनको 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार भी दिया गया . भारत से उनको ख़ास लगाव था . उनको भारत रत्न का सम्मान भी दिया जा चुका है .
 जब राजनीतिक आज़ादी को मुक़म्मल करने के लिए सामाजिक और आर्थिक सख्ती बरती गयी तो पूरा देश राजनीतिक नेतृत्व के साथ था. आज साउथ अफ्रीका दुनिया में एक बड़े और ताक़तवर मुल्क के रूप में पहचाना जाता है . तीसरी दुनिया के मुल्कों में सबसे ऊपर उसका नाम है क्योंकि पूरी आबादी उस आज़ादी में अपना हिस्सा मानती है . बिना किसी कोशिश के आज़ादी हासिल करने वालों में पाकिस्तान का नाम सबसे ऊपर है . पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना शुरू में तो कांग्रेस के साथ रहे लेकिन बाद में वे पूरी तरह से अंग्रेजों के साथ थे और महात्मा गाँधी की आज़ादी हासिल करने की कोशिश में अडंगा डाल रहे थे. बाद में जब आज़ादी मिल गयी तो अंग्रेजों ने उन्हें पाकिस्तान की जागीर इनाम के तौर पर सौंप दी. नतीजा सामने है . कुछ ही वर्षों में पाकिस्तान आन्दोलन में जिन्ना के बाद सबसे बड़े नेता और पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री ,लियाक़त अली को मौत के घाट उतार दिया गया. बाद में राष्ट्र की सरकार को ऐशो आराम का साधन मानने वाली जमातों का क़ब्ज़ा हो गया और आज पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है. ऐसे बुत सारे उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन जिन देशों ने अपनी आज़ादी को मेहनत से जीता है उनकी अगली पीढियां अपनी आजादी की हिफाज़त बहुत ही ध्यान से करती हैं .

दक्षिण अफ्रीका की अवाम उसी बात को आगे रखकर चल रही है . आज़ादी के बाद  नेल्सन मंडेला ने खुद सत्ता की बागडोर संभाल ली थी .  वहां की श्वेत आबादी के प्रति भूमिपुत्र और भारत से गए दक्षिण अफ्रीका के नागरिकों में बहुत नाराजगी थी . एक बार तो ऐसा  लगा कि देश में   बदले की आग  सब कुछ तबाह कर देगी लेकिन मंडेला के व्यक्तित्व की  वजह से वहां शान्ति और सद्भावना का राज कायम हो गया और आज दक्षिण अफ्रीका को  दुनिया के संपन्न देशों में गिना जाता है. अफ्रीकी महाद्वीप का तो वह सर्वाद्धिक मह्त्वापून देश  माना  ही जाता है