Tuesday, October 30, 2018

एक खुदा ने मुझको पत्थर से सनम बनाया था ,मैंने उसके बेटे को आला इंसान बना दिया


शेष नारायण सिंह  

आज हमारे दोस्त डाक्टर एस बी सिंह का जन्मदिन है . उनको मैंने फेसबुक पर 'जन्मदिन मुबारक ' कह दिया है . डाक्टर साहेब का पूरा नाम समर बहादुर सिंह है लेकिन इलाहाबाद में उनको उनके अंग्रेज़ी नाम से ही आम तौर पर जाना जाता है . इस सन्दर्भ में एक संस्मरण का उल्लेख करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ . हुआ यह कि मेरे हाई स्कूल के सहपाठी , राम अभिलाख वर्मा को १९७४ में बैंक आफ इण्डिया में बड़ी सरकारी नौकरी मिल गयी . कानपूर में तैनाती हुयी . उनके काका इत्तफाक से कानपुर गए तो सोचा कि भतीजे से मिल लें . पता लिखा हुआ था सो पंहुंच गए. बैंक में जाकर गार्ड से पूछा कि राम अभिलाख वर्मा से मिलना है . उसने कहा कि इस नाम का यहाँ कोई नहीं है . निराश हुए . लौट रहे थे कि एकाएक वर्मा साहेब दिख गए . उन्होंने गार्ड से कहा कि वो सामने तो खड़े हैं और तुम मना कर रहे हो . गार्ड ने कहा कि उनका नाम तो आर ए वर्मा है. बहरहाल वे मिले और चाय पीते वक़्त उनसे पूछा कि ," कहो भईया नोकरिया पाए के बाद तोहार नाव भी बदल ग का ?" .
इसलिए आज डॉ एस बी सिंह को उनके जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई . समर बहादुर सिंह को उनके जन्मदिन की बधाई . डाक्टर साहब भारत के चोटी के होमियोपैथिक फिजीशियन हैं , इलाहाबाद में विराजते हैं और महंगाई के इस दौर में आज भी उनकी फीस बहुत कम है . बेहद लोकप्रिय हैं , इसके बावजूद भी डाक्टरी सलाह और दवाइयों की कीमत बहुत कम रखी हुयी है . इलाहाबाद में कई जगहों पर उनकी क्लिनिक है . बहुत नाम है , उनकी सफलता और लम्बी उम्र के लिए मैं दुआ करता हूँ .
आज उनके जन्मदिन पर पिछले पचपन वर्षों की तरह तरह की तस्वीरें सामने से गुज़र रही हैं . मेरे गाँव के बगल का गाँव है उनका . आज भी यह गाँव ऐसे गाँवों में शुमार होता है जिसके पास से विकास बचकर निकल गया है . उनके गाँव के अन्दर अभी तक पक्की सड़क नहीं गयी है . पिछली कई सरकारों में कई मंत्री उनके मित्र रहे हैं लेकिन गाँव की तिकड़मी राजनीति ने सड़क नहीं बनने दिया .आज भी जिले के कलेक्टर साहेब उनके दोस्त हैं लेकिन गाँव के घुरहू प्रसाद या निरवाहू राम के आगे किसी की नहीं चलती .
उनके पिताजी ठाकुर केश नारायण सिंह अंग्रेजों के ज़माने के अंग्रेज़ी मास्टर थे . सुल्तानपुर जिले के एक नामी मिडिल स्कूल , लम्भुआ में उन्होंने कई पीढ़ियों को अंग्रेज़ी पढ़ाया था . उस ग्रामीण अंचल में जिसने भी उनसे ध्यान से अंग्रेज़ी पढ़ ली , वह आज भी अंग्रेज़ी बोलता मिल जाएगा . अपने पिता जी की साइकिल पर बैठकर अपने डाक्टर साहेब लम्भुआ पढने जाया करते थे . मुझसे तीन साल छोटे हैं . मैंने हाई स्कूल के बाद जौनपुर के टी डी कालेज में इंटरमीडिएट में नाम लिखाया था . हमारे गाँव से बहुत दूर था लेकिन कालेज अच्छा था . मास्टर साहेब ने अपने बेटे को भी नवीं कक्षा में वहीं दाखिल करवा दिया और मुझको उनका गार्जियन तैनात कर दिया . तब से आज तक मैं उनका गार्जियन हूँ . कई बार सभा समाज में मेरी इज्ज़त बहुत बढ़ जाती है जब लोगों को पता लगता है कि मैं डाक्टर एस बी सिंह को जानता हूँ .
हाँ मैं इस बेहतरीन इंसान को जानता हूँ . मैं भगवान राम से उनकी तुलना तो कभी नहीं करूंगा लेकिन एक गुण जो तुलसीदास ने वर्णन किया है , वह उनमें है. हर्ष या विषाद की स्थितियों में यह डाक्टर बिलकुल सामान्य रहता हैं . ऐश में यादे खुदा रखते हैं और तैश में खौफे-खुदा रखते हैं . कभी भी किसी का नुक्सान नहीं करते . समर बहादुर में जो इच्छा शक्ति है वह लाजवाब है . हमारे इलाके में लड़कियों की शिक्षा को उतना महत्व नहीं दिया जाता था जितना लड़कों की शिक्षा को . उनकी पत्नी हाई स्कूल पास करके आई थीं . अपने डाक्टर ने मुझसे बताया कि आगे इनकी पढाई जारी रखना है . काफी दिक्क़तें आईं लेकिन उन्होंने अपने पिता जी से यह कहकर अनुमति ले ली कि जितना खर्च मेरी पढाई पर आप कर रहे हैं, उतने में ही हम दोनों पढ़ लेंगें . इलाहाबाद के राजापुर में घर लिया और दोनों ने उच्च शिक्षा पाई . उनकी पत्नी ने दर्शन शास्त्र में पी एच डी किया और एक बहुत अच्छे शिक्षा संस्थान से रिटायर हुयी हैं . राजापुर का उनका घर बहुत लोगों की शरणस्थली भी रह चुका है . जिन मित्रों को इलाहाबाद आने पर कहीं ठिकाना न मिला वे वहीं पधार जाया करते थे. हालांकि मैं इसका बहुत बुरा मानता था और कई बार जब इलाहाबाद जाने पर उनके घर को धर्मशाला के रूप में देखता था तो तकलीफ होती थी . उनकी पत्नी सबके लिए भोजन आदि की व्यवस्था कर रही होती थीं. लेकिन दोनों ही उसकी अन्य व्यवस्था होने तक उसको साथ रखते थे .
डॉ एस भी सिंह के बारे में जब मैं सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि इनका नाम हिम्मत माई होना चाहिए था . यह इंसान मेरी नज़र में इच्छाशक्ति का मानवीकृत रूप है . उल्टी से उल्टी परिस्थिति में इस आदमी को मैंने हिम्मत हारते नहीं देखा . उनकी इच्छा शक्ति ही थी कि अपने बच्चों को इलाहाबाद में रहते हुए लन्दन तक पढ़ाया और आज सभी बच्चे अपने अपने क्षेत्र में जमे हुए हैं . बड़ा बेटा बैंकर है , बेटी वैज्ञानिक है और छोटा बेटा सुप्रीम कोर्ट में वकील है . बाप का पुण्य सभी बच्चों की शख्सियत पर नज़र आता है .
मैं तुम्हारे जन्मदिन पर भावुक हो गया हूँ डाक्टर. लम्बी ,बहुत लम्बी उम्र की दुआ करता हूँ . जैसे ग़ालिब ने रानी विक्टोरिया की लम्बी उम्र की दुआ की थी. उनका ही शे'र आपकी नज़र है ,
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

Saturday, October 27, 2018

पिंजरे के तोता काण्ड के बाद सी बी आई सबसे बड़ा सवालिया निशान



शेष नारायण सिंह 

सी बी आई की विश्वसनीयता पर ज़बरदस्त सवालिया  निशान लग गया है . संस्था के  दूसरे नम्बर पर पदासीन अधिकारी राकेश अस्थाना के उपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं और उनपर एफ आई आर भी  दर्ज हो गयी है . उनकी  टीम के एक सदस्य को सी बी आई ने  गिरफ्तार या कोर्ट ने भी गंभीर पाया है इसलिए उनको  हफ्ते भर के लिए   सी बी आई की हिरासत में दे दिया है . राकेश अस्थाना को भी डर था  कि कहीं वे भी गिरफ्तार न हो जाएँ इसलिए वे दिल्ली हाई कोर्ट में अर्जी लेकर पंहुंच गए और गिरफ्तारी पर एक हफ्ते की रोक लगवाने में सफल हो गए .  अस्थाना ने भी अपने बॉस अलोक वर्मा पर गंभीर आरोप लगाए हैं  लेकिन उनके आरोप अभी एफ आई आर में नहीं बदले गए हैं . उन्होंने  कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखकर अपनी शिकायतों से अवगत कराया है . उन्होंने अपनी शिकायती  चिट्ठी में यह भी आरोप लगाया है कि उनके  करीबी कुछ व्यापारियों और उद्योगपतियों के यहाँ वड़ोदरा में ,वैमनस्य के चलते सी बी आई निदेशक,आलोक वर्मा  ने दबिश दिलवाई है और उनकी जांच करवा रहे हैं . जबकि सी बी आई का कहना है कि वह दबिश जांच का हिस्सा  है क्योंकि जांच में पता चला है कि  राकेश  अस्थाना ने उन व्यापारियों से  अपनी बेटी की शादी में आर्थिक मदद ली है जो कि भ्रष्टाचार के दायरे में आता है .हाई  कोर्ट से राकेश अस्थाना अपने खिलाफ दायर एफ आई आर को रद्द करवाने में तो सफल नहीं हुए लेकिन उनकी गिरफ्तारी की संभावना को देखते हुए हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी पर एक  हफ्ते  की लगा दी लेकिन जाँच जारी रहेगी . सी बी आई ने राकेश अस्थाना से उनके काम को तो तभी छीन लिया जब उनके खिलाफ एफ आई आर दर्ज की गयी थी .

देश की सबसे विश्वसनीय ,आपराधिक जांच संस्था में इस तरह के माहौल  से  सरकार की छवि को ज़बरदस्त नुक्सान हुआ है . नुक्सान  को कुछ कम करने की कोशिश सरकार की तरफ से हो रही है . राकेश अस्थाना तो अब अभियुक्त हो गए हैं , निदेशक आलोक वर्मा भी विवाद के घेरे में आ गए हैं . शायद इसीलिये सरकार ने उनको भी कुछ दिन आराम करने को कह दिया है . और उनके मातहत काम करने वाले एक अतिरिक्त  निदेशक,. एम नागेश्वर राव को सी बी आई के निदेशक का काम देखने के लिए आदेश जारी  कर दिया  है . इसके पहले सी बी आई ने बहुत ही संक्षिप्त आदेश में कहा  था  कि विशेष निदेशक श्री राकेश अस्थाना को उनके सुपर्वाइज़री काम से तुरंत
मुक्त किया जाता है . श्री अस्थाना १९८४  बीच के गुजरात कैडर के अधिकारी हैं और सरकार को उनकी योग्यता पर बहुत भरोसा था . शायद इसीलिये उनके  पास राजनीतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील मामलों की जांच का ज़िम्मा था .अब वे उन सब कार्यों से अलग कर दिए गए हैं. आगस्टा वेस्टलैंड हेलीकाप्टर केस,विजय  मल्लया केस, कोयला घोटाले से सम्बंधित केस, राबर्ट वाड्रा केस,भूपिंदर हुड्डा केस और दयानिधि मारण केस जैसे  मामलों की जांच  उनकी ही निगरानी में हो रही थी. अब वह सब कुछ खतम हो गया है क्योंकि इतने गंभीर आरोपों के बाद वह सारी जांच किसी अन्य अधिकारी को सौंपी जा सकती है . .

इसके पहले विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने  जो आरोप लगाए थे वे भी अगर सच हुए तो बहुत ही गंभीर माने जायेंगे . उन्होंने  कोई  कानूनी प्रक्रिया दर्ज नहीं कराई थी लेकिन  कैबिनेट सचिव को एक शिकायती पत्र लिखा था . वह पत्र टाप सीक्रेट था और उसमें भी कुछ तो वही मामले थे जिनकी जाँच में वे खुद फंस गए हैं . २४ अगस्त को कैबिनेट सचिव प्रदीप कुमार सिन्हा को लिखे गए अपने पत्र में राकेश  अस्थाना ने लिखा था कि उनके पास सी बी आई निदेशक के बारे में बहुत ही गंभीर जानकारी  है . लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि उनकी जांच मैं कर सकूं इसलिए सारी सूचना मैं आप तक पंहुचा रहा हूँ . उन्होंने आरोप लगाया कि लालू यादव केस में उनके ऊपर दबाव बनाया गया था . करीब एक दर्ज़न मामलों में उन्होंने अपने बॉस को लपेटने की कोशिश उस  चिट्ठी में  की थी लेकिन शायद अस्थाना को मालूम नहीं था कि उनके खिलाफ बाकायदा जांच चल रही थी और सी बी आई ने उनके कथित कदाचार के बारे में   मजिस्ट्रेट के सामने बयान भी करवा दिया था . उनके ऊपर पांच करोड़ रूपये की रिश्वत मांगने का आरोप  है जिसमें से  करीब तीन करोड़ तो उनके लोगों को दिया भी जा चुका है. उनके मातहत काम करने वाले  डिप्टी एस पी के ऊपर उनको बचाने के लिए अभियुक्त का बयान  बदलने के लिए दबाव डालने का भी आरोप था  ऐसी हालत में एक बात बिलकुल साफ़ है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण जांच एजेंसी सी बी आई की ख्याति पूरी तरह से शक में आच्छादित है . कांग्रेस मौजूदा सरकार पर  संस्थाओं  को खतम करने के आरोप लगाती रही है . इस काण्ड ने उनके आरोप को निश्चित रूप से  सही साबित कारने की दिशा में स्पष्ट संकेत दे दिया  है .   यह देखना दिलचस्प होगा कि जिस सी बी आई के दबाव का इस्तेमाल करके विपक्षी राजनेताओं को मजबूर  किये जाने के आरोप लगते रहे हैं ,वह अपने अधिकारियों के भ्रष्टाचार  के आरोपों के बादल से कैसे बाहर आती है.
सी बी आई   के जीवन काल में कई बार ऐसे विवाद आये हैं जब वह  बहुत ही  परेशानी में पड़ती रही है. कर्नल स्लीमन ने ठगों का अंत करने के लिए जिस संस्था की बुनियाद अंग्रेजों के समय में डाली थी बाद में वही सी बी आई की पूर्ववर्ती संस्था बनी. सी बी आई की  विश्वसनीयता पर कभी भी कोई आंच  नहीं आई थी लेकिन इमरजेंसी में सत्तर के  दशक में इसके पहले दुरुपयोग की कहानियाँ सामने आनी शुरू हुईं. बाद में तो संजय गांधी ने सन अस्सी में कांग्रेस की दुबारा वापसी के बाद उन अफसरों के खिलाफ जांच करवाई ,उनको प्रताड़ित किया और अन्य  तरीकों से भी कष्ट दिया जिन्होंने जनता पार्टी के समय में उनकी इमरजेंसी की  कारस्तानियों की जांच की थी.
 सी बी आई के दुरुपयोग के आरोप सरकारों पर अक्सर  लगते रहे हैं लेकिन गंभीर फटकार कभी नहीं पडती थी. पहली बार सी बी आई की ख्याति को ज़बरदस्त झटका तब लगा जब २०१३ में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सी बी आई को पिंजरे का तोता कह दिया . केंद्र में डॉ मनमोहन सिंह की सरकार थी . सी बी आई ने कोयला घोटाले की जांच को कानून  मंत्री अश्विनी कुमार को दिखा दिया था . प्रधानमंत्री कार्यालय के दो अफसरों को भी रिपोर्ट दिखाई गयी थी . उसके बादसुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि सरकारी अफसरों ने कोयला घोटाले की जांच रिपोर्ट की आत्मा बदल दी. जस्टिस आर एम लोढ़ा, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ की पीठ ने सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रंजीत सिन्हा के हलफनामे पर गौर करने के बाद कोयला घोटाले की जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाया था. .कोर्ट ने कहा था कि  सीबीआई का काम जांच करना है और सच सामने लाना है . उसको मंत्रियों और अफसरों की  जी  हुजूरी नहीं करना चाहिए उसी मुक़दमे की सुनवाई के दौरान   सरकार से यह भी पूछा गया कि सरकार  क्या वो सीबीआई को स्वतंत्र करने के लिए क्या कोई कानून बना रही है। क्योंकि अगर ऐसा न किया गया तो  अदालत ही  दखल देगी। इस मामले में तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सी बी आई निदेशक और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अपने पद पर बने रहने के मामले में भी कई सख्त  सवाल उठा दिए थे.
अब तक सी बी आई की विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों पर यह आरोप सबसे बड़ा मना जाता रहा है .उस दौर में  मुख्य विपक्षी पार्टी , बीजेपी हुआ  करती थी..  सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद बीजेपी के नेता हर मंच से इस बात को उठाया करते थे . यह मई की घटना है ,उसके चार महीने बाद ही नरेंद्र मोदी को  बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया था . उन्होंने भी अपने भाषणों में सी बी आई पर कई बार  हमला किया . उन्होंने भरोसा भी दिलाया था कि सी बी आई को बिलकुल बेदाग़ संस्था के रूप में स्थापित कर देंगे लेकिन सी बी आई के मौजूदा हालात  देखने से यह तो साफ़ लग रहा है कि सी बी आई एक बेदाग़ संस्था नहीं है .उसके अपने ही  अफसर भ्रष्टाचार की जांच की ज़द में हैं .एक और बात देखें में आ रही है कि  इस बीच सी बी आई के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप विपक्षी पार्टियां कुछ ज़्यादा ही उठा रही हैं .डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी सी बी आई का राजनीतिक इस्तेमाल करके विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस को राजनीतिक मदद देने के आरोप लगते रहे हैं लेकिन अब तो कांग्रेस ऐलानियाँ आरोप लगा रही है कि चुनावों में उम्मीदवार उतारने के बारे में भी सरकार सी बी आई की धमकी देती रहती है .सबसे ताज़ा आरोप है कि छतीसगढ़ में चुनावी  समीकरण को प्रभावित करने के लिये भी सी बी आई के डंडे का इस्तेमाल हुआ है . हालांकि आम तौर पर सी बी आई की छवि को ध्यान में रखते हुए इन बातों पर विश्वास नहीं किया जाता  था लेकिन पिछले एक  हफ्ते में  सी बी आई के बारे में जो ख़बरें टीवी ख़बरों में आ रही हैं उनको देखते हुए तो यही लगता है किसरकार इस संस्था से कुछ भी करवा सकती है . अगर यह सच है तो देश की राजनीति और कानून के राज के लिए चिंता का विषय है . 

Tuesday, October 23, 2018

सरदार पटेल ने आर एस एस पर कभी भरोसा नहीं किया


शेष नारायण सिंह
सरदार पटेल की बहुत बड़ी मूर्ति नर्मदा जिले के केवड़िया में लग चुकी है . ३१ अक्टूबर को उनके जन्मदिन के मौके पर उसको पब्लिक के देखने के लिए खोल दिया जाएगा . चीन से बनकर आयी मूर्ति अमरीका की स्टेचू आफ लिबर्टी से भी ऊंची है .सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इस मूर्ति में सरदार पटेल की शक्ल किसी और की लगती है . लेकिन उससे मूर्ति स्थापित करने वालों को बहुत फर्क नहीं पड़ता ..  सरदार पटेल देश की आजादी की लड़ाई के प्रमुख योद्धा थे जबकि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के मूल संगठन , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई भी नेता १९२० से १९४७ तक चले देश की आजादी के आन्दोलन में शामिल नहीं था .उस दौर के उनके दो बड़े नेता, के बी हेडगेवार और एम एस गोलवलकर कभी भी  आज़ादी की कोशिश कर रहे  किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए ,कभी जेल नहीं गए , कभी अंग्रेजों के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया और जब देश आज़ाद हो गया तो उसकी भी आलोचना की .लेकिन देश आज़ाद हुआ और महात्मा गांधी उस आज़ादी की लड़ाई के सर्वमान्य नेता था. महात्मा गांधी कांग्रेस के नेता थे और १९२५ में कांग्रेस के बेलगाम कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके थे . लेकिन देश की सत्ता में आने के बाद तो अपने किसी ऐसे नेता की ज़रूरत होती ही है  जो आज़ादी की लड़ाई का हीरो रहा हो. शायद  इसलिए जब बीजेपी पहली बार सत्ता में आई तो पार्टी ने पूरी गंभीरता से काबिल पुरखों की तालश शुरू कर दी .  हालांकि एक बार पहले भी  महात्मा गांधी को अपनाने की कोशिश की गयी थी. भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के साथ ही पार्टी ने मुंबई में 28 दिसंबर 1980 को आयोजित अपने पहले ही अधिवेशन में अपने पांच आदर्शों में से एक गांधियन सोशलिज्म  को निर्धारित किया था .लेकिन जब बीजेपी 1985 में लोकसभा की दो सीटों पर सिमट गयी तो गांधी जी से अपने आपको दूर  कर लिया गया . १९९८ में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आने के बाद तो महात्मा गांधी को पूरी तरह से अपना लेने का कार्यक्रम फोकस में आ गया . महात्मा गांधी और आर एस एस के बीच इतनी  दूरियां  थीं जिनको कि महात्मा जी के जीवन काल और उसके बाद भी  भरा नहीं जा सका।अंग्रेज़ी  राज  के  बारे में महात्मा गांधी और आर एस एस में बहुत भारी मतभेद था। 1925 से लेकर 1947 तक आर एस एस को अंग्रेजों के सहयोगी के रूप में देखा जाता है . शायद इसीलिये जब 1942 में भारत छोडो का नारा देने के बाद देश के सभी नेता जेलों में ठूंस दिए गए थे तो आर एस एस के सरसंघचालक एम एस गोलवलकर सहित उनके सभी नेता जेलों के बाहर थे और  अपना सांस्कृतिक काम चला रहे थे . फिर भी  दोबारा महात्मा गांधी को अपनाने की कोशिश आर एस एस ने पूरी गंभीरता के साथ 1997 को 2 अक्टूबर  को शुरू किया . 2 अक्टूबर की एक सभा में आर एस एस के तत्कालीन सरसंघचालक  , प्रो.राजेन्द्र सिंह( रज्जू भैया) ने महात्मा गांधी की बहुत तारीफ़ की . उस सभा में बीजेपी के तत्कालीन दोनों बड़े नेता, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी भी मौजूद थे। राजेन्द्र सिंह ने कहा कि  गांधीजी भारतमाता  के चमकते हुए नवरत्नों में से एक थे और अफ़सोस जताया कि  उनको सरकार ने भारत रत्न की उपाधि तो नहीं दी लेकिन  वे लोगों की नज़र में सम्मान के पात्र थे। सार्वजनिक मंच से महात्मा गांधी की  प्रशंसा का जो यह सिलसिला शुरू हुआ ,वह आजतक जारी है.

महात्मा गांधी की विरासत का वारिस बनने  की  संघ की  मुहिम  के बीच कुछ ऐसे भी मुकाम आये  जिस से उनके अभियान को भारी घाटा हुआ। आडवानी समेत सभी बड़े नेताओं ने बार बार यह कहा था कि जब महात्मा गांधी की हत्या हुयी तो नाथूराम गोडसे आर एस एस का सदस्य नहीं था .यह बात तकनीकी आधार पर सही है लेकिन गांधी जी  की हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सज़ा  काट कर लौटे  नाथू राम गोडसे के भाई ,गोपाल गोडसे ने दूसरी बात बताकर उनकी मंशा फेल कर दिया . उन्होंने अंग्रेज़ी पत्रिका " फ्रंटलाइन " को दिए गए एक इंटरव्यू में बताया कि आडवानी  और बीजेपी के अन्य नेता उनसे दूरी  नहीं  बना सकते। . उन्होंने कहा कि " हम सभी भाई आर एस एस में थे। नाथूराम, दत्तात्रेय , मैं और गोविन्द सभी आर एस एस में थे। आप कह सकते हैं  की हमारा पालन पोषण अपने घर में न होकर आर एस एस में हुआ। . वह हमारे लिए एक परिवार जैसा था।  . नाथूराम आर एस एस के बौद्धिक कार्यवाह बन गए थे।। उन्होंने ( नाथूराम ने ) अपने बयान में यह कहा था कि  उन्होंने आर एस एस छोड़ दिया था . ऐसा उन्होंने  इसलिए कहा क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या के बाद गोलवलकर और आर एस एस वाले बहुत परेशानी  में पड़  गए थे। लेकिन उन्होंने कभी भी आर एस एस छोड़ा नहीं था "
अपने संगठन को गांधी का करीबी बताने के चक्कर में नवम्बर 1990 में बीजेपी के तत्कालीन महासचिव कृष्ण लाल शर्मा ने प्रधानमंत्री चन्द्र शेखर को एक पत्र लिखकर बताया कि  27 जुलाई 1937 को हरिजन सेवक  में एक लेख लिखा था जिसमें महात्मा गांधी ने रामजन्म भूमि के बारे में उन्हीं बातों को सही ठहराया था जिसको अब आर एस एस सही बताता  है . उन्होंने यह भी दावा किया कि महात्मा गांधी के हिंदी साप्ताहिक की वह प्रति उन्होंने देखी थी जिसमें यह बात लिखी गयी थी। . यह खबर अंग्रेज़ी अखबार टाइम्स आफ इण्डिया में छपी भी थी . लेकिन कुछ दिन बाद टाइम्स आफ इण्डिया की रिसर्च टीम ने यह  खबर छापी कि  कृष्ण लाल शर्मा का बयान सही नहीं है क्योंकि महात्मा गांधी ने ऐसा कोई  लेख लिखा ही नहीं था . सच्चाई यह है की 27 जुलाई 1937 को हरिजन सेवक का कोई अंक ही नहीं छपा था . 1937 में उस साप्ताहिक अखबार का अंक 24 जुलाई और 31 जुलाई को छपा था। 
सरदार पटेल को अपना बनाने की कोशिश तब  शुरू हुयी जब लाल कृष्ण आडवानी ने अपने आपको लौहपुरुष कहलवाना शुरू किया . लेकिन इतिहास को मालूम है कि  सरदार पटेल आर.एस.एस. और उसके तत्कालीन मुखिया गोलवलकर को बिलकुल नापसंद करते थे। यहां तक कि गांधी जी की हत्या के मुकदमे के बाद गिरफ्तार किए गए एम.एस. गोलवलकर को सरदार पटेल ने तब रिहा किया जब उन्होंने एक अंडरटेकिंग दी कि आगे से वे और उनका संगठन हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे।
उस अंडरटेकिंग के मुख्य बिंदु ये हैं:-आर.एस.एस. एक लिखित संविधान बनाएगा जो प्रकाशित किया जायेगा, हिंसा और रहस्यात्मकता को छोड़ना होगा, सांस्कृतिक काम तक ही सीमित रहेगा, भारत के संविधान और तिरंगे झंडे के प्रति वफादारी रखेगा और अपने संगठन का लोकतंत्रीकरण करेगा। (पटेल -ए-लाइफ पृष्ठ 497, लेखक राजमोहन गांधी प्रकाशक-नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, 2001) आर.एस.एस. वाले अब इस अंडरटेकिंग को माफीनामा नहीं मानते लेकिन उन दिनों सब यही जानते थे कि गोलवलकर की रिहाई माफी मांगने के बाद ही हुई थी।बहरहाल हम इसे अंडरटेकिंग ही कहेंगे। इस अंडरटेकिंग को देकर सरदार पटेल से रिहाई मांगने वाला संगठन यह दावा कैसे कर सकता है कि सरदार उसके अपने बंदे थे। सरदार पटेल को अपनाने की कोशिशों को उस वक्त भी बड़ा झटका लगा जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री बने और उन्होंने वे कागजात देखे जिसमें बहुत सारी ऐसी सूचनाएं दर्ज हैं जो अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। जब 1947 में सरदार पटेल ने गृहमंत्री के रूप में काम करना शुरू किया तो उन्होंने कुछ लोगों की पहचान अंग्रेजों के मित्र के रूप में की थी। इसमें कम्युनिस्ट थे जो कि 1942 में अंग्रेजों के खैरख्वाह बन गए थे।सरदार पटेल इन्हें शक की निगाह से देखते थे। लिहाजा इन पर उनके विशेष आदेश पर इंटेलीजेंस ब्यूरो की ओर से सर्विलांस रखा जा रहा था। पूरे देश में बहुत सारे ऐसे लोग थे जिनकी अंग्रेज भक्ति की वजह से सरदार पटेल उन पर नजर रख रहे थे। कम्युनिस्टों के अलावा इसमें अंग्रेजों के वफादार राजे महाराजे थे। लेकिन सबसे बड़ी संख्या आर.एस.एस. वालों की थी, जो शक के घेरे में आए लोगों की कुल संख्या का 40 प्रतिशत थे।
गौर करने की बात यह है कि महात्मा जी की हत्या के पहले ही, सरदार पटेल आर.एस.एस. को भरोसे लायक संगठन मानने को तैयार नहीं थे। लेकिन आजकल तो बीजेपी के नेता ऐसा कहते हैं जैसे सरदार पटेल उनकी अपनी पार्टी के सदस्य थे . अहमदाबाद में उनकी मूर्ति लगना उसी कार्यक्रम का एक हिस्सा हो सकता है.

Sunday, October 21, 2018

ताकि सनद रहे


दूसरा युद्ध समाप्त होने के बाद जर्मन, जापान और इटली के सभी सैनिक बतौर युद्धबंदी पकड़ लिए गए थे. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज के सभी अफसर और सैनिक भी बर्मा, मलाया, सिंगापुर आदि जगहों से युद्धबंदी बना लिए गए थे. उन सैनिकों के ऊपर अंग्रेजों ने बाकायदा मुक़दमा चलाया . भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने INA डिफेंस कमेटी बनाकर इन युद्धबंदियों की मदद की . जब उन पर मुक़दमा चला तो कांग्रेस की इस कमेटी की ओर से आज़ाद हिन्द फौज के सैनकों की पैरवी करने के लिए जो बड़े वकील को पेश हुए उनमें भूलाभाई देसाई , जवाहरलाल नेहरू, आसफ अली ,कैलाश नाथ काटजू और तेज़ बहादुर सप्रू प्रमुख थे . जवाहरलाल नेहरू ने आज़ाद हिन्द फौज के युद्धबंदियों के पक्ष में वकील के रूप में भी काम किया और एक राजनेता के रूप में भी अपने भाषणों में बार बार अँगरेज़ सरकार को चेतावनी दी कि आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की तरह व्यवहार किया जाए क्योंकि वे अपने देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे जबकि जर्मनी, जापान आदि की सेनायें अन्य देशों पर हमला करने के लिए लड़ रही थीं. बाकी लोग तो वकील का काम करते रहे थे लेकिन जवाहरलाल ने वकालत का काम १९२६ में ही छोड़ दिया था और उसके बीस साल बाद लाल किले में अपने दोस्त सुभाष चन्द्र बोस के साथियों के बचाव पक्ष के वकील के रूप में पेश हुए थे.
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Friday, October 19, 2018

धर्म का उद्देश्य सबका कल्याण है , धर्म में परपीड़ा की कोई जगह नहीं



शेष नारायण सिंह
नौ दिन के नवरात्र बीत गए . आसपास का पूरा माहौल धर्ममय था . चारों तरफ श्रद्धा और आस्था का माहौल था .. दुर्गा जी के अलग अलग रूपों की पूजा अर्चना होती रही . बच्चे बूढ़े सभी भक्ति में सराबोर रहे. मेरे जैसे लोग भी बच्चों के साथ  पूजा पंडाल में जाते रहे . विद्वान पत्रकार और अग्रणी साहित्यकार विष्णु नागर ने अपनी दुर्गापूजा की अनुभूतियों को बहुत ही दिव्य भाषा में लिखा : "आज इस अधार्मिक व्यक्ति ने धर्म का लाभ उठाने में चूक नहीं की,बिल्कुल नेताओं की तरह।हमारे इलाके में बांग्लाभाषी बड़ी संख्या में हैं और दुर्गा पूजा एकदम आसपास के इलाके में तीन जगह होती है।आज सप्तमी को खिचड़ी और लाबड़ा(मिक्स सब्जी) बनता है।कुछ साल पहले यहाँ की कालीबाड़ी में बेटा -बहू और पोते समेत रौनक और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने गये तो वहाँ खिचड़ी और लाबड़ा वितरण चल रहा था। शायद दिन का बच गया था।खाया तो खूब आनंद आया।फिर पता चला कि सप्तमी को दिन में बाकायदा भोजन मिलता है।अगले साल से जाने लगे और खिचड़ी का स्वर्गिक आनंद लेने लगे।यहाँ लाइन में लगकर थाली लेना चाहें तो वह व्यवस्था भी है और बाकायदा बैंच और टेबल पर खाना चाहें तो वह भी।हमने आज सभ्यता का चोलाधारण कर भोजन ग्रहण किया।खिचड़ी,लाबड़ा, पत्तागोभी की सब्जी भरपेट खाई और फिर खीर और गुलाबजामुन प्राप्त किया।सब उत्कृष्ट।डटकर खाया।सोचा कि जब देवी के नाम पर इतनी बढ़िया खिचड़ी का भोजन किया है तो देवी को नमस्कार भी कर दें,सो मानवी मानकर वह भी कर दिया।कल पास में हमारे पड़ोस की एक बच्ची का कथक नृत्य देखने जाना था तो दुर्गा कथा का भी लाभ मिल गया।क्या तैयारी और क्या सामूहिक गायन था।इतना सुदीर्घ न होता तो इसके संगीत पक्ष का आनंद और अधिक ले पाता।नवमी तक हमारे इलाके में जैसी रौनक शाम- रात को होती है,वैसी सालभर तक कभी देखने को नहीं मिलती।"
धर्म का अर्थ वास्तव में मानव जीवन में आनंद की स्थिति उत्पन्न करना है . नास्तिक और अधार्मिक होते ही भी विष्णु जी ने अपने बच्चों के साथ अपने सामजिक परिवेश में धार्मिक माहौल का आनंद लिया . धर्म के और भी बहुत सारे उद्देश्य होंगें लेकिन यह भी एक महत्वपूर्ण  उद्देश्य है.  अपने देश में बहुत सारे ऐसे दर्शन हैं जिनमें ईश्वर की अवधारणा ही  नहीं है . ज़ाहिर है उन दर्शनों पर  आधारित धर्मों में में ईश्वर की पूजा का कोई विधान नहीं होगा. देश में नास्तिकों की भी बहुत बड़ी संख्या है . उनके लिए भी किसी देवी देवता का पूजन बेमतलब है . लेकिन सामाजिक स्तर पर धार्मिक गतिविधियां होती रहती हैं और  नास्तिक भी उसमें शामिल होते हैं .  ऐसा इसलिए होता  है कि अपनी मूल डिजाइन में कोई भी धर्म समावेशी होता है , वह अधिकतम संख्या को अपने आप में शामिल करने में विश्वास करता है .
धर्म के सम्बन्ध में बहस राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में भी चली थी. उस दौर में राष्ट्रीय आन्दोलन के अंदर जो प्रगतिशील आन्दोलन की धारा थी उसके लिए धर्म की  मार्क्सवादी व्याख्या को भारतीय   सन्दर्भ में समायोजित करने की  चुनौती थी . आखिर में  तय हुआ कि धर्म का जो सांगठनिक पक्ष है वह तो कर्मकांडी लोगों का ही क्षेत्र है लेकिन धर्म से  जुडी जो  सांस्कृतिक गतिविधियाँ हैं उनका धर्म के कर्मकांड से कोई लेना देना नहीं है .वह वास्तव में जनसंस्कृति का हिस्सा है . ऐसा इसलिए भी  है कि पूजा पद्धति में वर्णित पूजा विधियां तो लगभग सभी जगह  एक ही होती हैं और उनका निष्पादन धार्मिक कार्य करने वाले करते हैं . यह सभी धर्मों में  अपने अपने तरह से संपादित किया जाता  है लेकिन उसके साथ वे कार्य जिसमें आम जनता पहल करती है और शामिल होती है वह जनभावना होती है .उसमें मुकामी संस्कृति अपने  रूप में प्रकट होती है .बंगाल में दुर्गापूजा तो धार्मिक जीवन का हिस्सा है लेकिन उसी स्तर पर वह लोकजीवन का भी  हिस्सा है . पूजा पंडालों  में देश -काल के हवाले से हमेशा ही बदलाव होते रहते हैं . उसी तरह से पूजा के अवसर पर होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम भी  हालाँकि धार्मिक होते हैं लेकिन उनका स्थाई और संचारी भाव लोकजीवन और क्षेत्रीय संस्कृति से  जुड़ा हुआ होता  है .
पश्चिम बंगाल में जब १९७७ में लेफ्ट फ्रंट की सरकार बनी तो  विचारधारा के स्तर पर यह चर्चा एक बार फिर हुयी और यही सही पाया गया कि संस्कृति की रक्षा अगर करनी है तो उससे जुड़े  आम आदमी के काम को महत्व देना ही होगा .जहां तक धर्म के शुद्ध रूप की बात है उसमें भी किसी तरह के झगड़े का स्पेस नहीं होता .दर्शन शास्त्र के लगभग सभी विद्वानों ने धर्म को परिभाषित करने का प्रयास किया है। धर्म दर्शन के बड़े ज्ञाता गैलोबे की परिभाषा लगभग सभी ईश्वरवादी धर्मों पर लागू होती है। उनका कहना है कि -''धर्म अपने से परे किसी शक्ति में श्रद्धा है जिसके द्वारा वह अपनी भावात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और जीवन में स्थिरता प्राप्त करना है और जिसे वह उपासना और सेवा में व्यक्त करता है। इसी से मिलती जुलती परिभाषा ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी दी गयी है जिसके अनुसार ''धर्म व्यक्ति का ऐसा उच्चतर अदृश्य शक्ति पर विश्वास है जो उसके भविष्य का नियंत्रण करती है जो उसकी आज्ञाकारिता, शील, सम्मान और आराधना का विषय है।"

भारत में भी कुछ ऐसे धर्म हैं जो सैद्धांतिक रूप से ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। जैन धर्म में तो ईश्वर की सत्ता के विरुद्ध तर्क भी दिए गये हैं। बौद्ध धर्म में प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत को माना गया है जिसके अनुसार प्रत्येक कार्य का कोई कारण होता है और यह संसार कार्य-कारण की अनन्त श्रंखला है। इसी के आधार पर दुख के कारण स्वरूप बारह कडिय़ों की व्याख्या की गयी है। जिन्हें द्वादश निदान का नाम दिया गया है।इसीलिए धर्म वह अभिवृत्ति है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को, प्रत्येक क्रिया को प्रभावित करती है। इस अभिवृत्ति का आधार एक सर्वव्यापक विषय के प्रति आस्था है। यह विषय जैन धर्म का कर्म-नियम, बौद्धों का प्रतीत्य समुत्पाद का सिद्धांत  या वैष्णवों, ईसाइयों और मुसलमानों का ईश्वर हो सकता है। आस्था और विश्वास में अंतर है। विश्वास तर्क और सामान्य प्रेक्षण पर आधारित होता है लेकिन आस्था तर्क से परे की स्थिति है। पाश्चात्य  दार्शनिक इमैनुअल  कांट ने आस्था की परिभाषा की है। उनके अनुसार ''आस्था वह है जिसमें आत्मनिष्ठ रूप से पर्याप्त लेकिन वस्तुनिष्ठ रूप से अपर्याप्त ज्ञान हो।"आस्था का विषय बुद्धि  या तर्क के बिल्कुल विपरीत नहीं होता लेकिन उसे तर्क की कसौटी पर कसने की कोशिश भी नहीं की जानी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि जो धार्मिक मान्यताएं बुद्धि के विपरीत हों, वे स्वीकार्य नहीं। धार्मिक आस्था तर्कातीत है तर्क विपरीत नहीं। सच्चाई यह है कि धार्मिक आस्था का आधार अनुभूति है। यह अनुभूति सामान्य अनुभूतियों से भिन्न है। इसी अनुभूति को रहस्यात्मक अनुभूति या समाधिजन्य अनुभूति कहा सा सकता  है। धार्मिक मान्यता है कि यह अनुभूति सबको नहीं होती केवल उनको ही होती है जो अपने आपको इसके लिए तैयार करते हैं।


इस अनुभूति को प्राप्त करने के लिए धर्म में साधना का मार्ग बताया गया है। इस साधना की पहली शर्त है अहंकार का त्याग करना। जब तक व्यक्ति तेरे-मेरे के भाव से मुक्त नहीं होगा, तब तक चित्त निर्मल नहीं होगा और दिव्य अनुभूति प्राप्त नहीं होगी। इस अनुभूति का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि इस अनुभूति के वक्त ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान की त्रिपुरी नहीं रहती। कोई भी साधक जब इस अनुभूति का वर्णन करता है तो वह वर्णन अपूर्ण रहता है। इसीलिए संतों और साधकों ने इसके वर्णन के लिए प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीक उसी परिवेश के लिए जाते हैं, जिसमें साधक रहता है इसीलिए अलग-अलग साधकों के वर्णन अलग-अलग होते हैं, अनुभूति की एकरूपता नहीं रहती।
लेकिन इस बात में बहस नहीं है कि इस दिव्य अनुभूति का प्रभाव सभी देशों में रहने वाले साधकों पर एक सा पड़ता है। यही नहीं यह सर्वकालिक भी है .
आध्यात्मिक अनुभूति की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि सन्त चरित्र है। सभी धर्मों के संतों का चरित्र एक सा रहता है। सन्तों का जीवन के प्रति दृष्टिïकोण बदल जाता है, ऐसे सन्तों की भाषा सदैव प्रतीकात्मक होती है। इसका उद्देश्य किसी वस्तुसत्ता का वर्णन करना न होकर, जिज्ञासुओं तथा साधकों में ऊंची भावनाएं जागृत करना होता है। सन्तों में भौतिक सुखों के प्रति उदासीनता का भाव पाया जाता है। लेकिन यह उदासीनता नकारात्मक नहीं होती। पतंजलि ने साफ साफ कहा है कि योग साधक के मन में मैत्री, करुणा एवं मुदिता अर्थात दूसरों के सुख में संतोष के गुण होने चाहिये।
धर्म की बुलंदी यह  है कि जो वास्तव में धार्मिक होते हैं वे मानवीय तकलीफों के प्रति उदासीन नहीं होते। रामचरित मानस के अरण्यकांड के अंत मे संत तुलसीदास ने सन्तों के स्वभाव की विवेचना की है। कहते हैं-संत सबके सहज मित्र होते हैं-श्रदधा , क्षमा, मैत्री और करुणा उनके स्वाभाविक गुण होते हैं। मैत्री, करुणा, मुदिता और सांसारिक भावों के प्रति उपेक्षा ही संत का लक्षण है .किसी भी धर्म की सर्वोच्च उपलब्धि सन्त का चरित्र ही है।
धर्म के किसी भी कार्य में संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं होती . जब घोषित रूप से धर्म का उद्देश्य ' दूसरों के सुख में संतोष' ही है तो धर्म के नाम पर हिंसा तो किसी तरह से धर्म का काम हो ही नहीं सकती . इसलिए वर्तमान धार्मिक नेताओं और धर्म के नाम अपर राजनीति करने वाले राजनीतिक नेताओं को यह तय करना पडेगा कि जब धर्म में ' मैत्री, करुणा एवं मुदिता' सबसे ज़रूरी शर्त है तो अपने समर्थकों को हिंसक गतिविधियों से दूर रहने की प्रेरणा दें . यह बात सबरीमाला में भी लागू होनी चाहिए और अयोध्या में भी . संत तुलसीदास ने भी कह दिया है :' परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई ' पाकिस्तान में बैठे जो लोग धर्म के नाम पर देश की एक बड़ी आबादी को  अधार्मिक काम करने को प्रेरित कर रहें ,उनको नियम कानून के हिसाब से दण्डित किया जाना चाहिए .  

Thursday, October 18, 2018

नारायण दत्त तिवारी होने का मतलब ,अलविदा तिवाड़ी जी




नारायण  दत्त तिवारी नहीं रहे.  93 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी . एक ज्योतिषी मित्र ने बताया था उनकी कुण्डली में एकावली योग था . एकावली के बारे में उन्होंने बताया कि यदि लग्न से अथवा किसी भी भाव से आरम्भ करके सातों ग्रह क्रमशः सातों भावों में स्थित हो तो ”एकावली योग” बनता है .इस योग में जन्म लेने वाला जातक महाराजा अथवा मुख्यमन्त्री या फिर राज्यपाल आदि होता है . बहरहाल उनका यह तथाकथित एकावली योग तो मुझे बहुत प्रभावित नहीं करता लेकिन उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने जो काम किया है उस पर किसी को भी गर्व हो सकता है .  तीन मुख्यमंत्रियों ने उनकी राजनीति और वक्तृता की धार देखी थी. 1952 में तिवारी जी नैनीताल  क्षेत्र से प्रसोपा ( प्रजा सोशलिस्ट पार्टी-झोपड़ी निशान ) से चुनकर आये थे . गोविन्द वल्लभ पन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. कुछ दिन बाद पन्त जी केंद्र सरकार में चले गए और डॉ संपूर्णानंद मुख्यमंत्री हुए . जिस तरह से पहाड़ की और किसानों की समस्यायों को उन्होंने विधानसभा में उठाया , सरकार को उसके बारे में विचार करने को मजबूर होना पड़ा. १९५७ में भी वह  नैनीताल से ही चुनकर आये . उनकी पार्टी के के नेता त्रिलोकी सिंह विरोधी दल के भी नेता थे.  नारायण दत्त तिवारी प्रसोपा के उपनेता थे. गन्ना किसानों की समस्याओं को जिस धज से तिवारी जी ने उत्तर प्रदेश सरकार का एजेंडा बनाया ,वह किसी भी संसदविद का सपना हो सकता है. उनके हस्तक्षेप के कारण ही उत्तर प्रदेश में गन्ना विभाग में बहुत काम हुआ . बहुत सारे विभाग आदि बने .उस दौर में चंद्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री थे और उन्होंने विपक्ष से आने वाली सही बातों को सरकार के कार्यक्रमों में शामिल किया . गुप्त जी मूल रूप से  डेमोक्रेट थे. आज जिस उत्तर  प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री लोग सरकारी मकान पर क़ब्ज़ा करने के लिए तरह तरह के तिकड़म करते देखे गए हैं उसी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में चंद्रभानु गुप्त अपने पानदरीबा वाले पुराने मकान में ही जीवन भर रहे  और वे विपक्षी नेता के रूप में नारायणदत्त तिवारी का लोहा मानते थे .
1963 में नारायण दत्त ने पार्टी बदल दी . जब जवाहरलाल नेहरू ने सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी को सरकार और कांग्रेस का लक्ष्य  बताया और समाजवादियों को कांग्रेस में शामिल होने का आवाहन किया तो  बहुत सारे सोशलिस्ट नेता कांग्रेस में शामिल हो गए . अशोक मेहता जैसे राष्ट्रीय नेता की अगुवाई में  जो लोग कांगेस में गए उसमें उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख सोशलिस्ट थे. नारायण दत्त तिवारी और चन्द्र शेखर. कांग्रेस में तो उनको बहुत सारे पद-वद मिले . दो राज्यों के मुख्यमंत्री , केंद्रीय मंत्री ,राज्यपाल वगैरह भी रहे लेकिन मुझे उनकी शुरुआती राजनीति हमेशा ही प्रभावित करती रही  है . 1963 का वह काल उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्ण काल है .

धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट , आपने पटाखे बंद करके गरीब को सम्मान दिया है

A gacebook post from October 18, 2017 

उसके गाँव में दीवाली के दिन दाल भरी पूरियां, सूरन की मसलही तरकारी ,बखीर और कचौरी का भोजन हुआ करता था. माई सुबह से ही यह सब बनाने में जुट जाती थीं. गुड में सोंठ डालकर भरन बनायी जाती थी, जो गुझिया में डाल कर बहुत ही स्वादिष्ट हो जाती थी.
शाम को रोंघई कोंहार के यहाँ से आया दिया जलाकर ,घूर पर , खेत में , बैलों के खूंटे पर , जुआठ और हल पर , घर में हर कोने में , आँगन में रखा जाता था.
घर की बड़ी बूढ़ी दिया जलाती थीं ,जिसको बच्चे ले जाकर सही जगह पर रखते थे. जहाँ पूजा होती थी, वह जगह सबसे पवित्र होती थी. सारे दिए बस कुछ मिनटों में बुझ जाते थे. घर में एक दिया बड़ा वाला जलाया जाता था , जो शुद्ध घी का होता था और रात भर प्रकाशमान रहता था.
सुबह सुबह उठकर बच्चे गाँव भर में घूमकर दिया बटोरते थे जो घर के बहुत छोटे बच्चों के खिलौने के रूप में संभालकर रख लिया जाता था . पूरे गाँव में ,हर परिवार में दीवाली का यही तरीका होता था .
कहीं कोई पटाखे नहीं, कोई मोमबती नहीं, कोई झालर नहीं . गाँव में सभी परिवार खुश रहते थे ,किसी को गरीब होने का अहसास नहीं होता था , हालांकि उसके गाँव में सभी गरीब थे .
एक परिवार के कुछ लोग सरकारी नौकरी में चले गए तो उनके यहाँ दीवाली के दिन मोमबती आ गयी . लेकिन वे लोग किसी भी परिवार को हीनभावना नहीं दिला सके.
बुजुर्गों ने उस परिवार के लोगों को ललगंड़िया कहकर निपटा दिया , यानी कुछ पैसे क्या आ गए नक्शेबाजी करने लगे. अब वहां भी सब बदल गया है. शहर की नक़ल करने के चक्कर में गाँव को लुटाया जा रहा है.
सोलह साल की उम्र में दसवीं पास करके वह शहर के कालेज में दाखिल हो गया . वहां भी छात्रावास की दीवाली में कुछ ख़ास नहीं होता था . बल्कि दीवाली की छुट्टियों में हास्टल सूना हो जाता था, सब लड़के अपने अपने गाँव चले जाते थे .
उसको शहर की दीवाली का अनुभव दिल्ली में हुआ. वहां हल, बैल,खेत आदि तो था नहीं इसलिए नार्थ एवेन्यू की उस बरसाती के एक कमरे के उसके घर में दाल भरी पूरी , सूरन की सब्जी बन गयी .
शाम को जब किसी दोस्त की बहन अपने बच्चों के साथ आई तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि यह लोग दीवाली क्यों नहीं मना रहे है.जब उसको बताया गया तो शहर में पली बढ़ी महिला की समझ में बात तुरंत आ गयी.
पहाड़गंज जाकर उन्होंने कुछ खील बताशे, कुछ मोमबत्तियां, आधा किलो मिठाई , लक्ष्मी-गणेश की छोटी मूर्ति खरीद कर हमारी दीवाली को शहरी बना दिया .
जब पड़ोसियों के बच्चे पटाखे चलाने लगे और उसके बच्चे टुकुर टुकुर ताकने लगे तब उसको लगा कि हमसे कुछ गलती हो गयी है , अब वह शहर में आ चुका है .
शहर हर इंसान को हीन भावना का शिकार बना देता है .
दूसरों के बच्चों को पटाखे चलाते देखते हुए बच्चों के चेहरे पर जो भाव थे , वे उसको हर पल गरीब बना रहे थे .
अगले साल वह सफदरजंग एन्क्लेव में किराए के मकान में रहने चला गया . वहां शहरी हिसाब से पटाखे आदि लाये गए, मोमबती लगाई गयी , पूजा हुयी, मिठाई आयी लेकिन पड़ोसियों के बच्चों के पटाखों की संख्या बहुत ज्यादा थी, सब गड़बड़ा गया .
बच्चे इस बार भी अपने को कमतर पा रहे थे. अगले साल ज़्यादा पटाखे आये लेकिन तब तक हज़ार ,दो हज़ार, दस हज़ार पटाखों वाली लड़ी बाज़ार में आ चुकी थी.
व्यापारियों का मोहल्ला था, रात ग्यारह बजे के बाद जब सेठ लोग दूकान बंद करके आये तो उन्होंने घंटों पटाखे चलाये और पटाखों की धौंस का मतलब उसकी समझ में आया.
इस साल जब सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाया तो उसने सोचा कि अगर सन अस्सी में यह काम हो गया होता तो वह अपने बच्चों की बेचारगी देखने से बच गया होता .
सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद कि उन्होंने दिल्ली शहर में रह रहे लाखों लाचार लोगों को हीनभावना का शिकार होने से बचा लिया .