Thursday, September 18, 2014

उम्मीदों की बहन ,सियासत को नफरत समझ बैठे, उपचुनाव हार गए .


शेष नारायण सिंह 
लोकसभा चुनाव २०१४ में शानदार जीत के बाद हुए उपचुनावों में बीजेपी को वह आनंद नहीं आ रहा है जो उसने १६ मई २०१४ को अनुभव किया था . लगातार झटके लग रहे हैं . ताज़ा उपचुनाव में उत्तर प्रदेश और राजस्थान से  आ रहे  संकेत ऐसे नहीं हैं जिन्हें बीजेपी वाले पसंद करेगें . दोनों ही राज्यों में बीजेपी के उम्मीदवार उन सीटों पर हारे है जहां इसके पहले हुए चुनावों में बीजेपी को जीत हासिल हुयी थी. उत्तर प्रदेश में तो वे सीटें हैं जहां २०१२ के उस चुनाव में  बीजेपी ने इन सीटों को जीता था जब राज्य में पूरी बीजेपी पचास सीटों में सिमट गयी थी. बीजेपी वालों को भी पता है कि हार गैरमामूली है और  मुकम्मल है . लेकिन एक बात और भी सच है कि यह नतीजे समाजवादी पार्टी की जीत भी नहीं है. यह अलग बात है  कि समाजवादी पार्टी के आला नेता मुलायम सिंह यादव इसको अपनी जीत बता रहे हैं . लेकिन यह उनकी जीत बिलकुल नहीं है . उनकी पार्टी के उम्मीदवार केवल इसलिये जीते क्योंकि बीजेपी की राजनीति को नकारने का मन बना चुकी जनता के सामने कोई और विकल्प नहीं था. यह इस बात का भी सबूत है कि अगर जनता मन बना ले तो राजनीतिक पार्टियों को ज़रूरी सबक सिखाती ज़रूर है  हालात चाहे  जो भी हों . मसलन बिहार में लालू और नीतीश एक हो गए तो जनता ने बीजेपी को औकात बता दी. उत्तर प्रदेश में बीजेपी के रणनीतिकार मानकर चल रहे थे कि उसके खिलाफ पड़ने  वाले वोट कांग्रेस ,बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के बीच बंट जायेगें लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस चुनाव में वोटों की ठेकेदारी करने वाली जमातों को भी झटका ज़रूर लगा होगा क्योंकि मुज़फ्फरनगर के दंगों के बाद हुए लोकसभा चुनाव में दलितों ने उस इलाके में बीजेपी को वोट दिया था . इस बार बीजेपी के रणनीतिकारों को यही मुगालता था कि दलित वोट किसी भी कीमत पर मुलायम सिंह  यादव को नहीं मिल सकते क्योंकि उनकी मानी हुयी नेता  मायावती ने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं . उनको इमकान था कि मायावती की पार्टी चुनाव मैदान में है नहीं तो दलित बीजेपी को वोट देगें . लेकिन ऐसा नहीं हुआ . समाजवादी पार्टी के राज से परेशान और उसके मुकामी कार्यकर्ताओं से दहशत में रहने वाले दलित वर्गों ने भी बीजेपी के खिलाफ वोट दिया . हालांकि उनका वोट समाजवादी  पार्टी की राजनीति चमकाने में काम आ गया. ऐसा लगता है की उत्तर प्रदेश की जनता ने बीजेपी के  उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी और गोरखपुर के संसद सदस्य महंत आदित्यनाथ की राजनीति को धता बताने के लिए  कुछ भी करने का मन बना लिया था . और उसने  वह कर  भी दिया .
 बीजेपी की हार का मुख्य कारण यह है कि वह  आइडिया आफ इण्डिया को तोड़ मरोड़ कर पेश करती है . वह भारत को बहुमतवाद की तरफ घसीट रही है  और भारत को उसी ढर्रे पर डालने की कोशिश कर रही है जिसपर मुहम्मद अली जिन्नाह की मौत के बाद शासक वर्गों ने पाकिस्तान  को डाल दिया था था. धार्मिक प्रभुतावादी और अधिसंख्यावादी लोकतंत्र के खतरों को पाकिस्तान के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है . मौजूदा उपचुनाव  के नतीजों को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए . सितम्बर २०१४ के उपचुनावों में बीजेपी हार गयी है लेकिन जो पार्टियां जीती हैं उनसे लोकतंत्र के हित में कोई बहुत उम्मीद नहीं बनती . उत्तर प्रदेश में   जीत समाजवादी पार्टी की हुई है . समाजवादी पार्टी कोई बहुत लोकतांत्रिक पार्टी नहीं है . उसमें परिवारवाद बहुत ही गंभीर किस्म का है . राजस्थान में भी परिवारवाद से पहचानी जाने वाली पार्टी , कांग्रेस के लोग ही जीते  हैं . लेकिन जनता को बीजेपी को अपनी राजनीति सुधारने की चेतावनी देनी थी ,उसने दे दिया . इन  चुनावों के नतीजों से सबक लेकर अगर बीजेपी अपनी मनमानी की राजनीति से बाज़ आ जाती है तो वह देश के लिए हितकर होगा क्योंकि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के रूप में उसके पास कुछ भी कर गुजरने की राजनीतिक ताक़त मौजूद है . अगर उसको बेलगाम छोड़ दिया गया तो लोकशाही के लिए मुश्किल पेश आ सकती है .
बीजेपी की इस हार को उत्तर प्रदेश के हवाले से समझने की कोशिश की जायेगी . उत्तर प्रदेश में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी और महंत आदित्यनाथ ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत की राजनीति के बल पर जीत हासिल करने की कोशिश की थी. इस काम के लिए लव जिहाद का नया फार्मूला तलाश लिया गया था . लव जिहाद को इतना बड़ा कर दिया गया था की बाकी कोई भी मुद्दा चर्चा में आ ही नहीं पाया . अपने लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत सारे ऐसे वायदे किये थे जो सौ दिन में पूरे होने थे, मंहगाई और बेरोजगारी पर ज़बरदस्त हमला  होना था , भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जाना था, पाकिस्तान को उसकी औकात बता देनी थी, चीन  को बता देना था कि सीमा पर खामखाह का तनाव न पैदा करे . लेकिन इन  मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुयी  क्योंकि महंगाई ,बेरोजगारी,भ्रष्टाचार आदि तो ज्यों के त्यों बने हुए हैं , पाकिस्तान भी पहले की तरह की बदस्तूर सीमा पर गड़बड़ी कर रहा  है , और चीन से प्रधानमंत्री का अपनापा बनाने का अभियान चल रहा है . हमारा  मानना है कि चीन और पाकिस्तान से भारत को वैसे ही सम्बन्ध रखने चाहिए जैसे कि मौजूदा सरकार रख रही  है लेकिन फिर सवाल उठता है कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार भी तो वैसे ही सम्बन्ध रख रही थी. चुनाव अभियान के दौरान इतना हल्ला गुल्ला क्यों किया गया था. जहां तक नौजवानों को नौकरियाँ देने की बात है , वह सपना तो पचासों वर्षों से सत्ता हासिल करने के  लिए राजनीतिक पार्टियां दिखाती रही  हैं , अब भी दिखाती रहेगीं .ऐसी  हालात में लगता है की सरकार की सौ दिन की नाकामियों के खिलाफ जनता के गुस्से को कंट्रोल करने के लिए यह लव जिहाद वाला शिगूफा ईजाद किया गया था और इस बात की पूरी संभावना है कि इस चुनाव में मनमाफिक नतीजे न दे पाने के कारण अब इसको भुला दिया जाएगा .
दरअसल इस चुनाव का सबसे ज़रूरी सबक यह है की धार्मिक समुदायों में नफ़रत फैलाकर चुनाव नहीं जीता जा सकता .इन नतीजों को  बीजेपी में मौजूद दो राजनीतिक धाराओं के टकराव को  समझने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस बात में कोई विवाद नहीं है कि बीजेपी और आर एस एस की संस्थापक संस्था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना १९२५ में वी डी सावरकर की किताब "हिंदुत्व " को आधार बनाकर की गयी थी लेकिन महात्मा गांधी की हत्या के बाद आर एस एस के नेताओं ने सावरकरवादी हिंदुत्व को नकारना शुरू कर दिया था . सावरकर की पार्टी ,हिन्दू महासभा में भी मतभेद पैदा हो गए थे. नफरत की राजनीति का विरोध कर रहे हिन्दू महासभा के नेता , डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने एक नयी पार्टी की स्थापना करने का मन बनाया . उन्होंने अपना मंतव्य आर एस एस के प्रमुख एम एस गोलवलकर को बताया जिन्होंने डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को सहयोग देने का वचन दिया . वचन ही नहीं दिया बल्कि एक अपेक्षाकृत उदार सोच के प्रचारक स्व दीन दयाल उपाध्याय को  डॉ मुखर्जी के सहयोग के लिए भेज भी दिया . नतीजा यह हुआ कि सावरकर की राजनीतिक सोच से अलग राजनीति को आधार बनाकर  १९५१-५२ में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई . भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार आर एस एस के हिन्दुराष्ट्र के सिद्धांत को बुनियाद बनाकर  १९५२ के चुनाव में शामिल भी हुए और पश्चिम बंगाल में सफलता भी मिली . उसके बाद से हिन्दू महासभा को कट्टर हिंदुत्व की पार्टी का स्पेस खाली करने को मजबूर होना पडा और बाद में तो वह पूरी तरह से हाशिये पर आ गयी . आर एस एस और बीजेपी मूल रूप से हिंदुत्व की राजनीति के पैरोकार बने जो आज तक कायम है . जनसंघ और बीजेपी के अन्दर हमेशा से   सावरकर वादियों की मौजूदगी रही है और वे समय समय पर  हुंकार भरते रहे हैं . मौजूदा लव जिहाद में जो नफरत का तडका है वह उसी राजनीति का परिणाम है . स्व दीन दयाल उपाध्याय और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीतिक लाइन के सबसे बड़े पोषक अटल बिहारी वाजपेयी रहे हैं और उनके सक्रिय रहते  कभी भी सावरकर वादियों को प्रमुखता नहीं मिली लेकिन आजकल बीजेपी की वैचारिक सोच पर कब्जे की लड़ाई बार बार मुंह उठाती है .  मौजूदा दौर भी उसी में से एक है .
    
 लोकसभा २०१४ के पहले भी बीजेपी और आर एस एस के बड़े नेताओं की एक मीटिंग में हिंदुत्व की नयी परिभाषा को सावरकर वादी  सांचे में फिट करने की कोशिश की गयी थी . मीटिंग में शामिल लोगों ने बताया कि बीजेपी के नेता आर एस एस–बीजेपी के सावरकरवादी हिंदुत्व के एजेंडे को २०१४ के चुनावी उद्घोष के रूप में पेश करने से बच रहे हैं . इस बैठक में शामिल बीजेपी नेताओं ने कहा कि जब कांग्रेस शुद्ध रूप से राजनीतिक मुद्दों पर चुनाव के मैदान में जा आ रही है और बीजेपी को ऐलानियाँ एक साम्प्रदायिक पार्टी की छवि में  लपेट रही है तो सावरकरवादी हिंदुत्व को राजनीतिक आधार बनाकर चुनाव में जाने की गलती नहीं की जानी चाहिए . १२ फरवरी की बैठक में आर एस एस वालों ने बीजेपी नेताओं को साफ़ हिदायत दी कि उनको हिंदुओं की पक्षधर पार्टी के रूप में चुनाव मैदान में जाने की ज़रूरत है .जबकि बीजेपी का कहना है कि अब सरस्वती शिशु मंदिर से पढकर आये कुछ पत्रकारों के अलावा कोई भी सावरकरवादी हिंदुत्व को गंभीरता से नहीं लेता. बीजेपी वालों का आग्रह है कि ऐसे मुद्दे आने चाहिए जिसमें उनकी पार्टी देश के नौजवानों की समस्याओं को संबोधित कर सके.इस बैठक से जब बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह बाहर आये तो उन्होंने बताया कि अपनी पार्टी की भावी रणनीति के बारे में विस्तार से चर्चा हुई .
बीजेपी ने जब १९८६ के बाद से सावरकरवादी हिंदुत्व को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाया उसके बाद से ही उनको उम्मीद रहती थी कि जैसे ही किसी ऐसे मुद्दे पर चर्चा की जायेगी जिसमें इतिहास के किसी मुकाम पर हिंदू-मुस्लिम  विवाद रहा हो तो माहौल गरम हो जाएगा .अयोध्या की बाबरी  मसजिद और राम जन्म भूमि विवाद इसी रणनीति का हिस्सा था.  बहुत ही भावनात्मक मुद्दे के नाम पर आर एस एस ने काम किया और जो बीजेपी १९८४ के चुनावों में २ सीटों वाली पार्टी बन गयी  उसकी संख्या इतनी बढ़ गयी कि वह जोड़ तोड़ कर सरकार बनाने के मुकाम पर पंहुच गयी . आर एस एस में मौजूद एक वर्ग की यही सोच  है  कि अगर चुनाव धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को मुद्दा बनाकर लड़ा गया तो बहुत फायदा होगा .लव जिहाद भी बीजेपी के अन्दर चल रहे वैचारिक मंथन का एक शिगूफा मात्र है और इसको उसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए लेकिन इन उपचुनावों के नतीजे के बाद बीजेपी में वैचारिक चिंतन के बार फिर जोर मारेगा . उम्मीद की जानी चाहिए कि दक्षिणपंथी ही सही लिबरल डेमोक्रेसी कायम रहेगी .
  

Monday, September 15, 2014

अमरीकी विदेशनीति की दुर्दशा और नेहरू की विदेशनीति की विरासत


शेष नारायण सिंह

पश्चिम एशिया ,खासकर इराक और  सीरिया में अमरीकी विदेशनीति को बहुत ही कठिन दौर से गुजरना पड़ रहा है . अभी कुछ अरसा पहले  इराक के युद्ध से अपने देश को अलग कर चुके अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को फिर इराक में सैनिक कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है .  कई साल पहले अमरीकी शहरों पर ११  सितम्बर को आतंकवादी हमले के बाद से सभी अमरीकी राष्ट्रपतियों ने इराक पर हमले किये हैं . बड़े तामझाम के साथ बराक ओबामा ने इराक में युद्ध खत्म करने की घोषणा की थी लेकिन इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया की सैनिक कार्रवाई के मद्देनज़र उनको भी वहाँ शामिल होना पड़ गया. जनवरी ९१ में बुश सीनियर ने , दिसंबर ९८ में बिल क्लिंटन ने और मार्च २००३ में बुश जूनियर ने इराक पर सैनिक कार्रवाई शुरू किया था . अब सितम्बर २०१४ में बराक ओबामा ने भी इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया के आतंक के राज को सीमित करने की मंसूबाबंदी कर ली है .बराक ओबामा का मामला थोडा अलग है .उन्होने जब इराक में अमरीकी सैनिक कार्रवाई खत्म करने की घोषणा की थी तो कहा था कि अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में उनकी जिम्मेदारी है कि वे अमरीकी अवाम के जान-ओ-माल की हिफाज़त करें . अब दोबारा इराक पर सैनिक कार्रवाई करने के पहले वे फिर यही कह रहे हैं कि अमरीकी  जिंदगियों की रक्षा के लिए  वे यह काम कर  रहे हैं . हालांकि दोनों दावों के सन्दर्भ अलग हैं और दोनों के मायने भी बिलकुल अलग हैं .अभी कुछ दिन पहले बराक ओबामा ने कहा  था कि इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया से अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है . लेकिन उन्होने  साथ साथ यह भी कह दिया कि उनके राज में कोई अगर अमरीका को धमकी देगा तो उसे बचने के लिए कहीं कोई जगह नहीं मिलेगी. हर बार जब भी अमरीका ने इराक पर हमला किया है तो सभे एराष्ट्रपति किसी न किसी रूप में अंतर राष्ट्रीय सहयोग की बात करते थे . सीनियर बुध और बिल क्लिंटन ने तो पूरी दुनिया को शामिल करने की  कोशिश की थी और अपने मुवक्किल देशों  को उस लड़ाई में झोंकने में भी कामयाब रहे थे लेकिन बराक ओबमा की बात से यह नहीं लगता कि वे कोई उस तरह की कोशिश भी कर रहे हैं . ओबामा और उनकी मंडली के और लोग यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि यह वाली लड़ाई पुराने अफगानिस्तान या इराक वाली लड़ाइयों जैसी नहीं होगी. इस बार कुछ सोमालिया या यमन जैसी गुपचुप हमलों टाइप ही  बात रखी जायेगी . हालांकि उनको मालूम है कि यह लड़ाई केवल हवाई हमलों से ही नहीं जीती जा सकती, ज़मीनी सेना भी चाहिए और ओबामा की योजना है कि ज़मीनी सेना का जुगाड इराक और सीरिया में मौजूद उन लड़ाकों से किया जाएगा जो इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया के खिलाफ लड़ रहे हैं . यह बहुत ही विरोधाभासी सोच है . इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया के खिलाफ जो लोग सीरिया में लड़ रहे हैं ,उनमें सबसे महत्वपूर्ण तो सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ही हैं और उनको तबाह करने के लिए अमरीका और नैटो के सदस्य देश सुन्नी बागियों को मदद कर रहे हैं . उन सुन्नी बागियों में से एक बड़ी संख्या इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया वालों के हमदर्द हैं .

अमरीकी विदेशनीति में एक नई तरह की सोच पैदा हो रही है . इस नई सोच का अमरीकी विदेशनीति पर बहुत ही भारी असर पड़ने वाला है और यह भी तय है  कि यह असर बहुत ही दूर तलक जाएगा .अभी तक माना  जाता रहा है कि पश्चिम  एशिया में अमरीका सउदी अरब और इरान के बीच जारी प्राक्सी लड़ाई को ही बैलेंस करता रहा है . वह कहीं सुन्नी को मदद करता है तो कहीं शिया को . लेकिन अब इस सोच में बुनियादी बदलाव हो रहा है . अब अमरीकी विदेशनीति के नियामक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया के विरोधाभासी झगड़े के चलते अब इस्लाम वाले सभी राज्यों से दूरी बना ली जाए . अगर ऐसा हुआ तो अमरीकी विदेश नीति एक बार फिर बुरी तरह से असफल होगी और सिर के बल खड़ी  नज़र आयेगी. इस्लामी और गैर इस्लामी के आधार पर अगर अमरीका अपनी भावी नीति तय करता है तो खासी उलटवांसी होगी क्योंकि एक तरफ तो इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया और मुस्लिम ब्रदरहुड है और दूसरी तरफ इरान ,सीरिया की सरकारें हैं और शिया मिलिशिया संगठन हेज़बोल्ला और असीब अहल अल हक़ है .इसमें से सभी आतंकवादी नहीं हैं लेकिन इनकी राष्ट्रीय पहचान गौड़ है और इस्लामी पहचान मुख्य है . यानी इन सभी संगठनों के सदस्य अपने आपको मुसलमान पहले मानते हैं और किसी देश या संगठन का सदस्य या शिया और सुन्नी बाद में .पश्चिम एशिया या अन्य इस्लामी देशों में अमरीका के प्रति जो नफरत का भाव है उसके चलते अब अमरीका में नीति निर्धारक हर तरह के इस्लाम को अपना दुश्मन  मानकर चलने की रणनीति पर काम करने की योजना बना  रहे है .और यह आने वाले समय में  बहुत ही  खतरनाक हो सकता है ..
अमरीकी विदेशनीति में अक्सर इस तरह के हिचकोले आते रहते  हैं .इसका कारण यह है कि उनकी विदेशनीति के निर्धारकों ने आम तौर पर फौरी नतीजों को ध्यानमें रख कर सारा काम किया था. दूरदृष्टि का कहीं दूर दूर तक पता नहीं है . अमरीकी की शेखचिल्ली विदेशनीति की तुलना भारत की विदेशनीति से करना दिलचस्प होगा जो अब तक कहीं भी फेल नहीं हुई. उसका कारण यह है कि इस नीति के मुख्य निर्माता जवाहरलाल नेहरू ने बहुत ही सोच विचार के बाद इस नीति को अमली जामा पहनाया था . लेकिन अजीब बात है कि आजकल नेहरू की विदेशनीति के बारे में बहस का सिलसिला शुरू हो गया है और वे लोग जिनकी पार्टियां आज़ादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों की मददगार थीं, नेहरू को बहुत ही मामूली नेता बताने की दौड़ में शामिल हो गए हैं ..कुछ टेलिविज़न चैनल भी इस लड़ाई में कूद पड़े हैं . दिल्ली के काकटेल सर्किट में होने वाली गपबाज़ी से इतिहास और राजनीति की जानकारी ग्रहण करने वाले कुछ पत्रकार भी १९४७ के पहले और बाद के अंग्रेजों के वफादार बुद्धिजीवियों की जमात की मदद से जवाहरलाल नेहरू को बौना बताने की कोशिश में जुट गए हैं लेकिन सच्चाई यह है कि नेहरू की दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि आज भारत एक महान देश माना जाता है और ठीक उसी दिन आज़ादी पाने वाला पाकिस्तान आज एक बहुत ही पिछड़ा मुल्क है. तथाकथित बुद्धिजीवियो का एक ऐसा वर्ग भी देश में मौजूद है जो यह बताना अपना फ़र्ज़ समझता है कि अगर आज़ादी मिलने के बाद भारत ने अमरीका का साथ पकड़ लिया होता तो बहुत अच्छी विदेशनीति बनती . ज़ाहिर है इस तरह के लोगों को गंभीरता से लेने की ज़रुरत नहीं है . लेकिन जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति की बुनियाद को समझना ज़रूरी है ..१९४६ में जब कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया, उसी वक़्त जवाहरलाल ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत की विदेशनीति विश्व के मामलों में दखल रखने की कोशिश करेगी , स्वतंत्र विदेशनीति होगी और अपने राष्ट्रहित को सर्वोपरि महत्व देगी .. यह बात भी गौर करने की है कि किसी नवस्वतंत्र देश की विदेशनीति एक दिन में नहीं विकसित होती. जब विदेशनीति के मामले में नेहरू ने काम शुरू किया तो बहुत सारी अडचनें आयीं लेकिन वे जुटे रहे और एक एक करके सारे मानदंड तय कर दिया. भारत की विदेशनीति उन्ही आदर्शों का विस्तार है जिनके आधार पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गयी थी और आज़ादी की लड़ाई को एक महात्मा ने नेतृत्व प्रदान किया था जिनकी सदिच्छा और दूरदर्शिता में उनके दुश्मनों को भी पूरा भरोसा रहता था. आज़ादी के बाद भारत की आर्थिक और राजनयिक क्षमता बहुत ज्यादा थी लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में ताक़त कुछ नहीं थी. जब भारत को आज़ादी मिली तो शीतयुद्ध शुरू हो चुका था और ब्रितानी साम्राज्यवाद के भक्तगण नहीं चाहते थे कि भारत एक मज़बूत ताक़त बने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी आवाज़ सुनी जाए . जबकि जवाहरलाल नेहरू की विदेशनीति का यही लक्ष्य था. अमरीका के पास परमाणु हथियार थे लेकिन उसे इस बात से डर लगा रहता था कि कोई नया देश उसके खिलाफ न हो जाए जबकि सोविएत रूस के नेता स्टालिन और उनके साथी हर उस देश को शक की नज़र से देखते थे जो पूरी तरह उनके साथ नहीं था. नेहरू से दोनों ही देश नाराज़ थे क्योंकि वे किसी के साथ जाने को तैयार नहीं थे, भारत को किसी गुट में शामिल करना जवाहरलाल की नीति का हिस्सा कभी नहीं रहा . दोनों ही महाशक्तियों को नेहरू भरोसा दे रहे थे कि भारत उनमें से न किसी के गुट में शामिल होगा और न ही किसी का विरोध करेगा. यह बात दोनों महाशक्तियों को बुरी लगती थी. जवाहरलाल नेहरू ने अमरीकियों को कुछ इन शब्दों में फटकारा था . उन्होंने कहा कि ,'यह हैरतअंगेज़ है कि अपनी विदेशनीति को अमरीकी सरकार किस बचकाने पन से चलाती है .वे अपनी ताक़त और पैसे के बल पर काम चला रहे हैं , उनके पास न तो अक्ल है और न ही कोई और चीज़.' शुरुआती दिनों में सोवियत रूस ने हमेशा नेहरू के गुटनिरपेक्ष विदेशनीति का विरोध किया और आरोप लगाया कि वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समर्थन देने का एक मंच है ..सोवियत रूस ने कश्मीर के मसले पर भारत की कोई मदद नहीं की और उनकी कोशिश रही कि भारत उनके साथ शामिल हो जाए . जवाहरलाल ने कहा कि  “ भारत रूस से दोस्ती चाहता है लेकिन हम बहुत ही संवेदंशील लोग हैं . हमें यह बर्दाश्त नहीं होगा कि कोई हमें गाली दे या हमारा अपमान करे. रूस को यह मुगालता है कि भारत में कुछ नहीं बदला है और हम अभी भी ब्रिटेन के साथी है . यह बहुत ही अहमकाना सोच है ..और अगर इस सोच की बिना पर कोई नीति बनायेगें तो वह गलत ही होगी जहां तक भारत का सवाल है वह अपने रास्ते पर चलता रहेगा.” जो लोग समकालीन इतिहास की मामूली समझ भी रखते हैं उन्हें मालूम है कि कितनी मुश्किलों से भारत की आज़ादी के बाद की नाव को भंवर से निकाल कर जवाहरलाल लाये थे और आज जो अमरीका परस्त लोग अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर टी वी चैनलों पर बैठ कर मूर्खतापूर्ण प्रलाप करते हैं उन पर कोई भी केवल दया ही कर सकता है. उन्हें अपने दिल्ली और वाशिंगटन में बैठे अपने आकाओं को  बता देना चाहिए अगर नेहरू की तरह सोच विचार कर अमरीका ने विदेशनीति को संचालित किया होता तो आज उसे पश्चिम एशिया में यह दुर्दशा न झेलनी पड़ती 

Tuesday, September 9, 2014

भारतीय लोकतंत्र में आई खामियों को दुरुस्त किये बिना न्याय और समानता का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा

( मेरा यह लेख अब भंग किये जा चुके योजना आयोग की हिंदी पत्रिका योजना के अंतिम अंक में छपा था )

शेष नारायण सिंह

पूरी दुनिया में लोकतंत्र के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं . दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही अमरीका ने प्रचार कर रखा था कि शीत युद्ध के खात्मे  के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन शीत युद्ध में अमरीकी जीत के दावे के बावजूद भी आज लोकतंत्र के बुनियादी लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका है . गरीब और अविकसित देशों की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है , सच्चाई  यह है कि अतिविकसित देशों में भी मानवाधिकारों के  रक्षक के रूप में लोकतंत्र उतना सफल नहीं हो सका है जितनी उम्मीद की जा रही थी. यूरोप और अमरीका के बहुत सारे  संगठनों ने रिसर्च के बाद तय किया है कि एक अवधारणा के रूप में लोकतंत्र को रिक्लेम करने की ज़रुरत है . शीत युद्ध के बाद भविष्यवाणी की गयी थी कि एक राजनीतिक विधा के रूप में लोकतंत्र सबसे बड़ा,कारगर और सफल व्यवस्था  बना  रहेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ . आज लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती न्याय और अधिकार की डिलीवरी की है . इंसानी मूल्यों के पोषक और रक्षक के रूप में राज्य और सरकार की उपयोगिता  पर सवाल उठ रहे  हैं . सबको मालूम है कि  मनुष्य और मानवता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोकतंत्र सबसे ज़रूरी और उपयोगी साधन है लेकिन आज जो चुनौतियां हैं वे इसी बात को रेखांकित कर रही हैं कि लोकतंत्र विकास की तरकीबों में सुधार और गैरबराबरी की हालात को कम करने में नाकाम पाया जा  रहा है . दुनिया के हर इलाके में हिंसक संघर्ष हो रहे हैं . हिंसक संघर्षों को कम करना मानवता के अस्तित्व के सवाल से जुडा हुआ मुद्दा है .हमें मालूम है कि हिंसक संघर्ष का मुख्य कारण असुरक्षा  होती है . असुरक्षा तब होती है जब समाज के एक वर्ग या कुछ वर्गों को यह अहसास हो जाए कि  वे मुख्यधारा से अलग कर दिए गए हैं , या उनको ऐसा भरोसा हो जाए कि उपलब्ध तरीकों से  वे बाकी लोगों के साथ बराबरी नहीं कर सकते . हिंसक संघर्ष के कारणों में वंचना भी एक अहम् कारण है . जब किसी वर्ग को ऐसा शक हो जाए कि वह  संसाधनों से वंचित कर दिया गया है या उसे यह आभास हो जाए कि लोकतंत्र में जो राजनीतिक शक्ति उसकी वजह से राज्य को मिलती है वह एक व्यक्ति या  समाज के रूप में उस से वंचित रह गया है तो उसे परेशानी होती है और वह हिंसा को एक विकल्प के रूप में सोचने के लिए मजबूर हो जाता है . लोकतंत्र को इस खामी को ठीक करने की कोशिश करनी पड़ेगी .


लोकतंत्र की स्थापना और संचालन में संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है लेकिन यह मानी हुयी बात है कि लोकतंत्र का संचालन पूरी तरह से संस्थाओं के ज़रिये ही नहीं किया जा सकता . यह भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र की संस्थाओं  को टिकाऊ बनाने के लिए प्रयास किये जाएँ . इन संस्थाओं  को न्याय के वाहक के रूप में  विकसित करने  के लिए ज़रूरी है कि लोकतंत्र की संस्कृति को संस्थागत रूप देने की कोशिश की जाए .लोकतंत्र की संस्थाओं से जो अधिकार मिलते हैं उनका प्रयोग न्याय और बराबरी का निजाम कायम करने के लिए किया जाय , लोकशाही की संस्थाओं को शक्तिशाली बनाने का सबसे प्रभावशाली  तरीका यह है कि उसमें अधिकतर लोगों को शामिल करने की प्रक्रिया पर जोर दिया जाय और उसको लागू करने की कोशिश की जाए. एक समाज और देश  के रूप में हमको याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र को मजबूती देने का काम राजनीतिक काम है , उसे केवल किसी फारमूले या नियम क़ानून के बल पर नहीं बनाया जा सकता . इसके लिए ज़रूरी है कि सभी नागरिकों के आत्मसम्मान को महत्व दिया जाए , संसाधनों के मालिकाना हक तय करते वक़्त स्थानीय लोगों को शामिल किया जाए , नीति बनाते वक़्त हर स्तर पर  सब से संवाद की स्थिति पैदा की जाए. यह सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि सबको न्याय मिले और यह दिखे भी कि न्याय हो रहा है . यानी नीति निर्धारण, उसके परिपालन और उसके प्रभाव में हर तरह की  पारदर्शिता लाना किसी भी अधिकारप्राप्त संस्था का मकसद होना चाहिए . सही बात यह  है कि लोकतंत्र राजनीतिक शक्ति हासिल करने का सबसे  मानवीय तरीका है . इसकी सफलता के लिए ज़रूरी शर्त यह है कि इस राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल सकारात्मक तरीके से किया जाय . यह काम न्यायसंगत होना चाहिए और सबको यह पता होना चाहिए की वे भी राजनीतिक ताक़त  के इस्तेमाल की प्रक्रिया में शामिल हैं . लोकतंत्र या किसी भी राजव्यवस्था का मकसद और उसकी बुनियादी ज़रुरत इंसानी सुरक्षा  है . अब तक पाया गया है की इंसानी सुरक्षा के नाम पर हासिल की गयी शक्ति में कुछ ऐसी विसंगतियां आ जाती हैं जो लोकतंत्र को जड़ से कमज़ोर करती हैं . लोकतंत्र की सभी संस्थाओं में जांच और नियंत्रण की प्रक्रिया को स्थाई रूप से शामिल किया जाना चाहिए .लोकतंत्र के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान की कई शोध परियोजनाओं से यह बातें खुलकर सामने आयी हैं .

 इस पर्चे में लोकतंत्र से सम्बंधित इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की जायेगी. हमारे देश में लोकतंत्र अपेक्षाकृत बहुत ही नयी राजनीतिक व्यवस्था है . कुल बासठ साल पुरानी व्यवस्था में हर मुकाम पर अडचनें आती रही हैं . सबसे बड़ी दिक्क़त तो यही रही है की राजवंश व्यवस्था के तत्व  लोकशाही में घुस गए थे. जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री ने सत्ता संभाली तो शायद आनंद भवन , और नेहरू परिवार के पुराने संबंधों की मुरव्वत के  कारण उन्होंने नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को अपनी मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया था . स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की एक चूक को देश अब तक भोग रहा है . क्योंकि उसके बाद इंदिरा गांधी ने देश की सत्ता की राजनीति को वस्तुतः वंशानुगत बना दिया था .  अपने जीवनकाल में ही उन्होंने अपने छोटे बेटे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बना दिया था. बहुत ही दुखद परिस्थितियों में उनके  छोटे बेटे की मृत्यु हो गयी .उसके बाद उन्होंने अपने अनमने बड़े बेटे को सत्ता  सौंपने का फैसला किया . इंदिरा जी की मृत्यु भी बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद हालात में हुयी थी . तब तक उनकी पार्टी के ज़्यादातर नेता कांग्रेस को एक राजवंशी पार्टी  के रूप में स्वीकार कर चुके थे लिहाज़ा इंदिरा जी की मृत्यु के बाद उनके  बड़े बेटे को सत्ता सौंप दी गयी. और इस तरह से एक  वंशानुगत सत्ता की व्यवस्था स्थापित हो गयी .इंदिरा जी के परिवार का देश की केंद्रीय सत्ता पर वर्चस्व कायम हो  गया था और एक समय तो ऐसा लगने लगा  था की भारत की लोकशाही का  भविष्य खतरे में  हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार , हरियाणा , पंजाब, जम्मू-कश्मीर , तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी राजवंशीय परमपरा कायम हुयी .लेकिन २०१३ में एक ऐसी प्रक्रिया शुरू हो गयी जिसके बाद स्पष्ट हो गया कि देश में राजनीति की और व्यवस्थाएं मज़बूत हों  चाहे न हों ,वंशानुगत राजनीति की परम्परा तो ख़त्म होने वाली है . गुजरात के किसी गाँव वडनगर से आये एक व्यक्ति ने केंद्रीय स्तर पर वंशवाद की राजनीति को चुनौती दी और हरियाणा के किसी गांव से आये एक अन्य व्यक्ति ने राजनीतिक अभियान में अधिक से अधिक लोगों को शामिल करने की गांधीवादी पद्धति का फिर से सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया .  बाद में हमने देखा कि आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल की चुनाव प्रचार की तरकीब को बड़ी पार्टियों ने भी अपनाया . उनकी पार्टी मे फैसला लेने की पद्धति पर बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं लेकिन यहाँ मकसद लोकतंत्र में चुनाव अभियान की महत्ता पर चर्चा करना मात्र है , आम आदमी पार्टी या उसके नेता अरविन्द केजरीवाल की बात का केवल तर्क को एक ठोस रूप देने के लिए इस्तेमाल किया गया है .उनकी पार्टी के गुण दोष का विवेचन करना नहीं . अरविन्द केजेरीवाल और उनकी पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया और उसके ज़रिये शक्ति हासिल करने के व्याकरण को फिर से स्थापित किया ,लोकतंत्र के विकास में यह उनका महत्वपूर्ण योगदान है . लेकिन वंशवाद की राजनीति में वे कुछ भी नहीं कर पाए .

वंशवाद को चुनौती देने  का काम निर्णायक रूप से गुजरात के वडनगर से आये व्यक्ति ने किया . पूरे चुनाव अभियान  के दौरान इस व्यक्ति ने वंशवाद को कभी भी फ़ोकस से नहीं  हटने दिया .  कांग्रेस के प्रथम परिवार के बारे में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के  संबोधनों के बारे में तरह तरह के सवाल उठाये गए लेकिन उन्होंने मुद्दे को ठंडा नहीं पड़ने दिया . आज देश में एक ऐसी सरकार है जिसके प्रधानमंत्री के पूर्वजों के बारे में उतनी ही जानकारी है जितनी कि सरकारी कागजों में होती है , इतिहास में उनके परिवार के किसी व्यक्ति का नाम कहीं नहीं  आता . लोकतंत्र को प्रभावशाली बनाने में वंशवाद सबसे बड़ी बाधा है और फिलहाल लगता है की सत्ता के शीर्ष पर अब इस तरह की कोई व्यवस्था प्रभावशाली नहीं होने वाली है . केंद्र में तो यह कमज़ोर हो ही गयी है राज्यों में भी अब इसके खिलाफ माहौल बनना शुरू हो जाएगा .अपने लोकतंत्र में इस बुराई के आने की जड़ में भी शायद आज़ादी के बाद की परिस्थितियाँ ज़िम्मेदार हैं . क्योंकि जवाहरलाल नेहरू का परिवार यानी उनकी बेटी और उसके दो  बच्चे उनके साथ ही रहते रहे और नेहरू के करीब रहने वाले लोगों ने पूरे परिवार को राजनीतिक रंग में परवरिश देने के काम किया . इसके पलट सरदार पटेल  का राजनीतिक आचरण सामने रखकर देखें तो तस्वीर ज़्यादा साफ़ हो जायेगी . सरदार पटेल की बेटी भी उनके साथ ही रहती थीं क्योंकि  बुढापे में सरदार का ख्याल रखने के लिए और कोई नहीं था . मणिबहन की भूमिका सरदार पटेल के घर तक ही सीमित थी . एक बार जब उनके बेटे डाह्याभाई दिल्ली आये तो सरदार को अजीब लगा . डाह्याभाई पटेल उन दिनों मुंबई  में काम करते थे और किसी कम्पनी में अधिकारी थे. कंपनी के किसी काम से आये थे . सरदार पटेल ने उनको शाम को समझाया कि जब तक मैं यहाँ सरकार में काम कर रहा  हूँ तब तक दिल्ली आओ तो मेरे घर मत आओ . खुशी की बात यह  है कि अभी अभी देश में वंशवाद की राजशाही परम्परा को ध्वस्त करने वाला व्यक्ति भी अपने परिवार के किसी व्यक्ति को राजकाज में शामिल करने के खिलाफ है . हो सकता है कि उनकी पार्टी के लोग भी उनसे प्रेरणा लें और लोकतंत्र को अपनी जागीर बनाने की गलती न करें .  वंशवाद का खात्मा केवल इंदिरा गांधी के  वंशजों को सत्ता से  बेदखल करने से नहीं  होगा क्योंकि सभी पार्टियों में बड़े नेताओं ने अपने परिवार के लोगों को महत्व दे रखा है जिसके कारण लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा प्राभावित होती है . अगर लोकतंत्र की रक्षा होनी है तो हर पार्टी में मौजूद राजशाही के तत्वों को कमज़ोर करना पडेगा .

लोकतंत्र के बहाने वंश को स्थापित करने की कोशिश एक बड़ी समस्या है . जैसा कि इस पर्चे की शुरुआत में कहा गया है कि लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती न्याय और अधिकार की डिलीवरी की है . इस डिलीवरी को पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए . राजनीतिक विकास का  सामंती और वंशवादी तरीका लोकतंत्र के लक्ष्यों का सबसे बड़ा दुश्मन है . वास्तव में सामंतशाही और वंशवाद को ख़त्म करके ही तो लोकतंत्र की अवधारणा का विकास हुआ था . आज भारत में यही दो रिवाज़ लोकतंत्र के विकास में सबसे बड़े बाधक हैं . संतोष की बात यह है कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक खानदान के आधिपत्य पर लोकसभा चुनाव ने ज़बरदस्त असर डाला है . अब ज़रूरत इस बात की है कि अन्य पार्टियों में के अलावा खुद सत्ताधारी पार्टी में जो परिवारवाद की जड़ें हैं उनको ख़त्म किया जाए .यह लोकतंत्र के विकास की सबसे बड़ी शर्त है .

 लोकतंत्र के विकास के लिये ख़त्म तो सामंती सोच के तरीकों को भी करना पडेगा .आम तौर पर देखा गया है कि चुनाव की प्रक्रिया ख़त्म होते ही जो व्यक्ति निर्वाचित होते हैं , उनमें से कुछ लोग अपने आपको राजा समझने लगते हैं . इस रिवाज़ को  भी खत्म करना पडेगा .इस पर्चे की शुरुआत में जो प्रतिस्थापना की  गयी है कि  मनुष्य और मानवता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लोकतंत्र सबसे ज़रूरी और उपयोगी साधन है लेकिन आज जो चुनौतियां हैं वे इसी बात को रेखांकित कर रही हैं कि लोकतंत्र की संस्था , विकास की तरकीबों में सुधार और गैरबराबरी  की हालात को कम करने में नाकाम पाई जा  रही है .इस तरह की हालात के पैदा होने और उनके नासूर की हद तक नुक्सान कर सकने की क्षमता हासिल कर सकने का कारण यह है कि निर्वाचित लोग लोकतंत्रीय तरीकों से चुनकर आते हैं लेकिन फैसलों में मनमानी करने लगते हैं . फैसलों में न्याय की कमी का सबसे बड़ा कारण है कि जनप्रतिनिधि  लोकतंत्रीय तरीके से स्थापित की गयी संस्थाओं  को नज़रअंदाज़ करते है और सामन्ती तरीके से फैसले लेते हैं .इस कमी के कारण न्याय की डिलीवरी नहीं हो पाती . ज़रूरी है कि सबकुछ नए तरीके से कर सकने के जनादेश के साथ आये प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी अपने लोकतंत्र में घुस चुकी राजकाज की इस सामंती प्रवृत्ति का खात्मा करने की योजना  को गंभीरता से लें . हालांकि सरसरी तौर पर देखने से लगता  है कि उसकी शुरुआत हो चुकी  है . पिछली सरकार में अगर मनमानी करने की संस्कृति को रोक लिया गया होता तो जिस तरह से  दूरसंचार घोटाले को अंजाम दिया गया , शायद वह न हो पाता . पिछले दिनों हर मंत्रालय के इंचार्ज अफसरों को निर्णय प्रक्रिया के सुचारू सञ्चालन की ज़िम्मेदारी देकर मौजूदा सरकार के प्रधानमंत्री ने यह पक्का कर दिया है कि अब  दूरसंचार घोटाला जैसा कोई घोटाला करने के पहले मंत्री अपनी सीट गंवाने का ख़तरा मोल ले रहा होगा. ज़रुरत इस बात की है कि सामंती और  मनमानी फैसलों की कुछ निर्वाचित प्रतिनिधियों की आदतों पर रोक लगाई  जाए.

राजनीति शास्त्र के विख्यात प्रोफ़ेसर आशुतोष  वार्ष्णेय ने अपनी ताज़ा किताब " बैटिल्स हाफ वन : इंडियाज़ इम्प्राबेबिल डेमोक्रेसी " में  लिखा है कि भारत की आज़ादी के बाद तीन परियोजनाएं सबसे महत्वपूर्ण थीं जिनको कि नए लोकतंत्र को हासिल करना था. पहली , राष्ट्रीय एकता को सुरक्षित करना ,दूसरी सामाजिक व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर मौजूद भारतीयों के लिए न्याय सुनिश्चित करना और उनको गरिमापूर्ण जीवन देना  और तीसरी परियोजना थी कि चारों  तरफ फैली हुयी गरीबी को ख़त्म करना . सभी राष्ट्रों के लिए इस तरह के लक्ष्य रखना सामान्य बात है . हमारे संस्थापकों ने मंसूबा बनाया था कि आज़ादी का लाभ सबको मिल सके. और उसी जद्दोजहद में शुरू से ही हमारा लोकतंत्र लगा हुआ है . पिछले साठ वर्षों के सफ़र में  बहुत सारी अडचनें आयी हैं जिनमें से कुछ को इस पर्चे में गिनाया भी गया  है .भारत की लोकशाही की  खासियत है कि समय  समय पर उनको  दुरुस्त करने की कोशिश भी होती रहती है लेकिन सच्ची बात यह  है कि अभी सही लोकतंत्र की स्थापना  के लिए बहुत अधिक प्रयास किये जाने हैं .

Saturday, September 6, 2014

प्रधानमंत्री जी , नेहरू की राह पर चलकर ही सफलता हासिल होगी



शेष नारायण सिंह  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा को मीडिया बहुत ही सफल यात्रा के रूप में पेश कर रहा है . सरकार की तरफ से भी यही बताया जा रहा है . विदेश मंत्रालय में जो अफसर भर्ती होते हैं वे आई ए एस वालों से भी ज़्यादा काबिल  होते हैं और उनको इस काम में महारत हासिल होती है लेकिन सही बात यह है कि प्रधानमंत्री की जापान यात्रा को सफल किसी तरह से भी नहीं कहा जा सकता . जिस जापानी  निवेश को बार बार चर्चा का विषय बनाया जा रहा है वह तो भारत में आ ही रहा था. भारत में जापानी  निवेश  कोई नई बात नहीं है .वैसे भी जापान के  निवेशक पाकिस्तान और पश्चिम एशिया की  खतरनाक राजनीति के माहौल से बचकर भारत में कुछ  ऐसा निवेश करना चाहते हैं जिसमें सब कुछ तबाह होने का खतरा न हो . इस तरह से जापान को जो बेलगाम निवेश के मौके दिए गए हैं उसमें भारत से ज़्यादा जापान का हित है .
एक बात जो भारत के हित में हो सकती थी वह है भारत और जापान के बीच में गैरसैनिक परमाणु समझौता . इसकी चर्चा कहीं नहीं हो रही है .तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 1998 में भारत ने राजस्थान के पोखरण क्षेत्र में परमाणु परीक्षण किया था . उसके बाद से जापान भारत से नाराज़ हो गया था. तब से ही भारत सरकार की कोशिश रही है  कारण परमाणु नीतियों को लेकर दोनों देशों में मतैक्य स्थापित हो जाए लेकिन वह अभी नहीं हो पाया है . असैन्य परमाणु करार और सैन्य  समझौते पर इस बार कोई एकमत नहीं बना पाया जिसका कि कहीं ज़िक्र नहीं हो रहा है . भारत की विदेशनीति और ऊर्जा नीति के प्रबंधकों को मालूम है कि अगर बिजली पैदा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की की टेक्नालोजी जापान दे दे तो भारत का बिजली संकट बहुत हद तक ठीक किया जा सकता है .नरेंद्र मोदी को भारत में शुरू से ही एक ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है जो जापान को बहुत महत्व देता है , गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने जापानी उद्योगों को महत्व दिया था. अब जापान जाकर तो उन्होंने वाराणसी को वहाँ के एक शहर की नकल पर बना देने का मंसूबा बना लिया है . यह सब मीडिया में चर्चा में रहने के लिए सही है लेकिन इस यात्रा को बहुत सफल बताने वालों को फिर से विचार करना चाहिए . यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि जापान को सज़ा देने के उद्देश्य से जब अमरीका और ब्रिटेन से उसपर दबाव बनाया था तो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उसका विरोध किया था. आज भी जापान के विदेश नीति के प्रबंधक उसको याद रखते हैं .
भारत और जापान के संबंधों में जिन तीन लोगों को जापान कभी भी नहीं भुला सकता ,उनमें जवाहरलाल नेहरू , सुभाष चन्द्र बोस और जस्टिस राधाबिनोद पाल का नाम है . सुभाष चन्द्र बोस ने जापानियों के साथ दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सहयोग किया था. जापान के प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि जापान में जस्टिस राधाबिनोद पाल को सभी जानते हैं . ताज्जुब है कि एक ऐसे व्यक्ति के बारे में प्रधानमंत्री के सलाहकारों ने उनको कुछ नहीं बताया था  जो भारतीय है और जिसको जापान में सभी जानते हैं . जापान के कई प्रसिद्ध मठों में जिनके स्मारक बने हुए हैं और जो भारत-जापान संबंधों की सबसे मज़बूत कड़ी हैं .
राधाबिनोद पाल ने टोक्यो मुकदमों की सुनवाई के दौरान जज के रूप में काम किया था .१९४६ में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद टोक्यो ट्रायल के लिए उनको भारत सरकार ने जज बनाकर भेजा था   उन्होंने वहाँ पर जो फैसला दिया उसी के आधार पर जापान को एक राष्ट्र के रूप में फिर से पहचान बनाने का मौक़ा लगा . अमरीका सहित विजेता देशों की इच्छा थी कि कानून का सहारा लेकर जापान को युद्ध अपराधों का दोषी साबित कर दिया जाए और उसकी तबाही को सुनिश्चित कर दिया जाय  लेकिन राधाबिनोद पाल ने इस फैसले में असहमति का नोट लगा दिए और जापान  बच गया . विजेता सहयोगी देशों में विश्वयुद्ध जीत लेने के  बाद युद्ध अपराधों की एक श्रेणी बनाई थी जिसमें हारे हुए देश का कोई पक्ष नहीं था. जस्टिस राधाबिनोद पाल ने कहा कि यह सही नहीं है . उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान जापान ने कुछ ऐसे काम  किये हैं जो मानवता के खिलाफ अपराध हैं लेकिन  अभियुक्त को अपनी बात कहने की आज़ादी दिए बिना न्याय नहीं हो सकता . उन्होंने उस ट्राईबुनल की वैधता पर ही सवालिया निशान लगा दिया . उन्होंने कहा कि अमरीका समेत विजेता देश बदले की भावना को सही ठहराने के लिए कानून का सहारा ले रहे हैं . इस तरह से न्याय तो  कभी नहीं हो सकता . उनके एक हज़ार से ज़्यादा पृष्ठों के  फैसले को अमरीका ने प्रतिबंधित कर दिया . ब्रिटेन में भी वे फैसले कभी नहीं छप सके लेकिन जापानी नेताओं ने बाद के वर्षों में इस फैसले को सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्तेमाल किया और अपने राष्ट्र की इज्ज़त को बहाल करने की कोशिश की . अजीब बात है कि जापान के प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री को जस्टिस पाल के बारे में बताया जबकि जो भी भारतीय नेता जापान जाता है वह जस्टिस राधाबिनोद पाल का नाम ज़रूर लेता है . जापान के सम्राट ने जस्टिस पाल को अपने देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दिया  था और जापान के मौजूदा प्रधानमंत्री ने ही कोलकता जाकर  जस्टिस पाल के बेटे प्रणब कुमार पाल से मुलाकात की थी . जस्टिस पाल के दामाद देबी प्रसाद पाल भारत की पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त राज्य मंत्री थे और डॉ मनमोहन सिंह के सहयोगी थे . लेकिन प्रधानमंत्री ने इस सबका ज़िक्र नहीं किया . ज़ाहिर है कि उनके लोगों ने उनको सही जानकारी समय पर नहीं दी थी .
भारत जापान संबंधों में जवाहरलाल नेहरू भी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किये जाते हैं जो जापानियों के दुर्दिन के साथी थे. दूसरे  विश्वयुद्ध के बाद जब जापान हार गया  तो अमरीका ने हर तरह से उसको अपमानित करने के मन बनाया . जस्टिस राधाबिनोद पाल ने न्याय के मैदान में सत्य की पक्षधरता दिखाकर जापानियों को  उपकृत किया तो राजनीति के मैदान में जवाहरलाल नेहरू का सहयोग जापान में सबसे अधिक याद किया जाता है, हुआ यह कि जापान को और नीचा दिखाने के लिए अमरीका ने १९५१ में  सान  फ्रांसिस्को पीस कान्फरेंस का आयोजन किया . जवाहरलाल ने साफ़ मना कर दिया कि भारत इस तथाकथित शान्ति सम्मेलन में शामिल नहीं होगा. उन्होंने कहा कि इस सम्मलेन का उद्देश्य जापान की संप्रभुता और राष्ट्रीय स्वतंत्रता पर लगाम लगाना है . और बाद में न्यायप्रिय दिखने के लिए जब जापान की संप्रभुता को अमरीका ने बख्श दिया तब जवाहरलाल नेहरू ने एक संप्रभु जापान राष्ट्र के साथ अलग से शान्ति समझौता किया और उसके बाद औपचारिक रूप से स्वतन्त्र संप्रभु जापान के साथ  अप्रैल १९५२ में  राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किया .  दूसरे विश्व द्ध के खत्म होने के बाद जब कोई देश जापान के साथ खड़ा नहीं होना चाहता था , भारत ने उसको संप्रभु देश मानकर समझौता किया और बाद में सभी देशों की लाइन लग गयी . यह मान्यता भी जापान में आभार के साथ याद की जाती है .
बीजेपी वालों की नेहरू विरोधी राजनीति से मौजूदा सरकार के मंत्री इतने प्रभावित  हैं कि उनको नेहरू का वह योगदान भी नहीं याद रहता जिसकी  वजह से दुनिया भर के देशों में भारत की इज्ज़त होती है .लगता है नरेंद्र मोदी को भी उनके सलाहकार डर के मारे सही बात बताने के कतराते हैं . अब जब नरेंद्र मोदी ने  विदेश नीति के संचालन में जवाहरलाल नेहरू के तौर  तरीके का अनुसरण करना शुरू कर दिया है तो उनको विदेश नीति के नेहरू माडल से परहेज़ नहीं करना चाहिए . जवाहरलाल नेहरू ने भी विदेश नीति के संचालन में किसी विदेशमंत्री को साथ नहीं रखा , वे खुद ही विदेश मंत्रालय का काम देखते थे . मौजूदा सरकार में सुषमा स्वराज को विदेशमंत्री के रूप में तैनात तो कर  दिया है लेकिन विदेश यात्राओं में या विदेशनीति के संचालन में उनकी भूमिका कहीं नहीं नज़र आती .  संतोष की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जवाहरलाल नेहरू का अनुकरण इस मामले में कर रहे हैं . सही बात यह है कि किसी भी प्रधानमंत्री को देश के सबसे महान प्रधानमन्त्री  से  प्रेरणा लेते रहना चाहिए . यह देशहित में रहेगा . इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की बात करना तो ज्यादती होगी क्योंकि उन लोगों को गद्दी नेहरू  के वंशज होने की वजह से मिली थी लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने तो १९४६ तक का जीवन संघर्ष में बिताया था , अंग्रेजों की जेलों में रहकर महात्मा गांधी की अगुवाई में देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी और आर्थिक आज़ादी की मज़बूत नींव डाली थी .

 विदेशनीति के अलावा मौजूदा प्रधानमंत्री अगर कश्मीर नीति के बारे में भी जवाहरलाल को ही  आदर्श मानें तो गलातियों की संभावना बहुत कम हो जायेगी . जैसे उन्होने अपनी पार्टी की बहुत सारी मान्यताओं को  तिलांजलि दी है अगर उसी तरह कश्मीर नीति के बारे में भी बीजेपी की पुरानी नीति को अलविदा कह दें तो उनकी राजनीतिक छवि को ताकत मिलेगी ..जो लोग नेहरू की नीति को कश्मीर के मामले में गलत मानते हैं उनको इतिहास की जानकारी बिल्कुल नहीं है.  कश्मीर आज भारत का हिस्सा इसलिए है कि सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने मिलकर काम किया था. सितम्बर १९४७ में जब जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत में अपने राज्य के विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत किया था तो पूरा राज्य शेख अब्दुल्ला के साथ था . और जम्मू-कश्मीर का हर नागरिक भारत के साथ विलय का पक्षधर था . जिस जनमत संग्रह का आजकल विरोध किया  जाता है वह उन दिनों भारत के पक्ष में था. महात्मा गाँधी ,जवाहरलाल नेहरू सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला ने ही जोर दिया था कि राज्य की जनता की राय लेना ज़रूरी है लेकिन पाकिस्तान जनता की राय लेने के खिलाफ था . लेकिन जवाहरलाल नेहरू को पाकिस्तान की नीयत पर भरोसा नहीं था .उन्होंने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इसलिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडेपेट्रोल और राशन की सप्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.  सच्ची बात यह  है कि कश्मीर को उस अक्टूबर में गुलाम होने से बचाया इस लिए जा सका कि घाटी के नेताओं ने फ़ौरन रियासत के विलय के बारे में फैसला ले लिया.
आज जापान से भारत के अच्छे संबंधों में जस्टिस राधोगोबिंद पाल और जवाहरलाल नेहरू का सबसे ज्यादा योगदान है . आज की सरकार उसी ढर्रे पर चल रही है . ज़रूरी है कि नेहरू को आजादी के  संघर्ष का हीरो  माना जाए और उनकी नीतियों को देशहित में प्रयोग किया जाए.


Friday, September 5, 2014

राम तजूं पर गुरू न बिसारूँ


शेष नारायण सिंह
शिक्षक दिवस पर  मुझे अपने केवल एक शिक्षक की याद आती है. बी ए में उन्होंने मुझे दर्शन शास्त्र पढ़ाया था. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के तिलकधारी पोस्ट ग्रेजुएट कालेज में आज से ४५ साल पहले मैंने बी ए के पहले साल में नाम लिखाया था. वहाँ दर्शनशास्त्र के लेक्चरर डॉ अरुण कुमार सिंह थे. दो साल पहले ही उनकी नियुक्ति हुई थी . इंटरमीडियेट में मैंने तर्कशास्त्र की पढाई की थी लिहाजा प्रवेश के फ़ार्म में दर्शनशास्त्र भी एक विषय के रूप में भर दिया .  तिलकधारी कालेज उन दिनों उस इलाके का सबसे अच्छा कालेज माना जाता था. आसपास के कई जिलों के बच्चे वहाँ पढ़ने आते थे . हम लोगों का जलवा थोडा ज्यादा था क्योंकि हमने तिलकधारी सिंह इंटरमीडियेट कालेज से बारहवीं पास किया था. तब तक शिक्षक के बारे में हमारी राय बहुत अच्छी नहीं होती थी . हाँ, तिलकधारी सिंह इंटरमीडियेट कालेज के हमारे प्रिंसिपल बाबू प्रेम बहादुर सिंह एक भले इंसान थे. खेलकूद , वादविवाद  और नाटक का बहुत अच्छा माहौल बना रखा था .उनकी प्रेरणा से ही इंटरमीडियेट कालेज सेक्शन के छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर जयशंकर प्रसाद का नाटक स्कंदगुप्त खेला था जो बाद के कई वर्षों तक चर्चा में बना रहा था. वे ही शिक्षकों को आदेश देते थे कि बच्चों को वादविवाद प्रतियोगिताओं में ले जाओ . जिसके चलते मुझे बहुत दूर दूर तक के कालेजों में डिबेट में शामिल होने का मौक़ा मिला था . लेकिन वे प्रिंसिपल थे , शिक्षक नहीं . बहरहाल जब हम मुकामी छात्र डिग्री कालेज में जाते थे तो थोडा ठसका रहता था .उसी ठसके के चक्कर में मैंने दर्शनशास्त्र के शिक्षक से सवाल पूछ दिया .मैंने पूछा था कि दर्शनशास्त्र की पढाई की ज़रूरत क्या है . सवाल तफरीहन पूछा गया था लेकिन डॉ अरुण कुमार सिंह ने जिस गंभीरता से जवाब दिया , उस से मैं बहुत ही असहज हो गया. वहीं पर पहली बार सुना कि हर विषय अंत में जाकर दर्शनशास्त्र हो जाता  है . सारे धर्म , सारा विज्ञान, सारी कायनात एक फिलासफी की बुनियाद पर बनी है . बहुत देर तक बात करते रहे . उन्होंने बताया कि फिजिक्स और गणित भी अंत में दर्शनशास्त्र हो जाते हैं . बहरहाल जब क्लास खत्म हुई तो  साथियों ने मेरी खासी धुलाई की कि बेवकूफ ने ऐसा सवाल पूछ दिया कि उसका जवाब ही नहीं खत्म होने वाला है . लेकिन जब अगले दिन की क्लास में भी उन्होंने  अपने पिछले लेक्चर से ही शुरू किया और दर्शनशास्त्र की महत्ता पर चर्चा करते रहे तो हमें लग गया कि शिक्षकों की किसी नई प्रजाति से आमना सामना हो गया है . स्कालरशिप की जो शुरुआत 1969 की जुलाई में उनकी इस क्लास में हुई थी वह आज तक कायम है और आज भी पढाई लिखाई की किसी बात को समझने के लिए उन्हीं डॉ अरुण कुमार सिंह की याद करता हूँ .  कालेज की नौकरी करते हुए उन्होंने बहुत सम्मानित जीवन बिताया , कालेज के प्रिंसिपल बने और अब वहीं जौनपुर में रिटायर्ड जीवन बिता रहे हैं . मैंने जो कुछ भी पढ़ा है या पढता हूँ उनको ज़रूर बताता हूँ. जब हम बी ए में भर्ती हुए थे तो जितना भी प्रेमचंद मैंने पढ़ा है , एक बार पढ़ चुका था. मैंने ताराशंकर बंद्योपाध्याय का भारतीय ज्ञानपीठ से विभूषित उपन्यास गणदेवता पढ़ रखा था. डॉ धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता, वृंदावनलाल वर्मा की मृगनयनी  ,जयशंकर प्रसाद ,निराला, आदि हिंदी के बहुत सारे साहित्य में चंचुप्रवेश था . कबीर , रहीम , मीरा, रसखान आदि को भी तोडा बहुत पढ़ रखा था . किसी भी नार्मल शिक्षक को घुमा देने भर की शेखी अपने पास थी  लेकिन अब हमें साफ़ अंदाज़ लग गया था कि अरुण कुमार सिंह जैसे जिज्ञासु से , सीखने के अलावा  कोई रास्ता नहीं बचा था  . धीरे धीरे मेरी क्लास के कुछ बच्चे उनके साथ किताबों पर चर्चा  करने लगे थे . इस बीच कोर्स में बौद्ध दर्शन का अध्ययन शुरू हो चुका था. उसका कार्य कारण सिद्धांत बिलकुल वैज्ञानिक तरीके से हम समझ रहे थे . कोर्स के अलावा किसी भी विषय पर उनसे बात  की जा सकती थी और  अगर किसी विषय पर उनकी जानकारी ऐसी होती थी जिसपर उनको  भरोसा न हो तो बेलौस कहते थे कि भाई कल बतायेगें , पढकर आयेगें  तब बात होगी . अंग्रेज़ी , समाजशास्त्र , इतिहास , धर्मशास्त्र ,मनोविज्ञान सभी विषयों के वे विद्यार्थी थे और जो भी पढते थे , उसकी चर्चा की परम्परा मेरे इसी शिक्षक ने शुरू कर दी.  हम नियमित रूप से उनके स्टूडेंट केवल दो साल रहे लेकिन उनके शिक्षकपन के इतने मुरीद हो गए कि आज भी मैं उनको शिक्षक मानता हूँ .  उन्होंने मुझे कई बार बताया है कि कुछ विषयों में मेरी जानकारी उनसे ज़्यादा है  लेकिन आज तक मैंने अपनी हर नई जानकारी को तभी पब्लिक डोमेन में डाला है जब अपने गुरु से उसकी  तस्दीक करने के बाद संतुष्ट हो गया हूँ .
पिछले चालीस वर्षों में मैंने बहुत किताबें पढ़ी हैं , बहुत सारी विचारधाराओं पर चर्चा की है . लेकिन अपने इकलौते शिक्षक के हवाले के बिना मैंने किसी भी विचार को फाइनल नहीं किया ,उसपर बहस नहीं की. उनकी कृपा से ही मैंने सार्त्र को पढ़ने की कोशिश की , अस्तित्ववाद के दर्शन को समझने की कोशिश की, अरविंद को पढ़ा , बर्गसां को पढ़ा ,सारे दार्शानिक उनकी वजह से ही पढ़ा . बर्ट्रेंड रसेल की शिक्षा , विवाह और नैतिकता को झकझोर देने वाली मान्यताएं मैंने बी ए के  छात्र के रूप में पढ़ लिया  था. Will Durant की किताब स्टोरी आफ फिलासफी मैंने बी ए पास करने के बाद उनकी निजी लाइब्रेरी से लेकर पढ़ा था.  .दर्शनशास्त्र को इतने बेहतरीन गद्य में मैंने और कहीं नहीं पढ़ा  है . बाद में उनको सीरीज़ स्टोरी आफ सिविलाइजेशन को पूरी के पूरी खरीद लिया था .चंद्रधर  शर्मा की पाश्चात्य दर्शन की हिंदी किताब को भी इसी श्रेणी में रखना चाहता हूँ . उन्होंने ही सिखाया था कि अच्छे शिक्षक का मिशन अपने छात्रों में सही सवाल पूछने की कला को सिखाना होना चाहिए . अगर सवाल सही है तो जवाब तो कहीं भी मिल जाएगा . स्पिरिट आफ इन्क्वायरी को जगाना अच्छे शिक्षक की  सबसे महत्वपूर्ण खासियत होनी चाहिए . किसी भी मान्यता को चुनौती देकर ,अगर कहीं गलती हो रही है तो अपनी गलती स्वीकार करने की तमीज डॉ अरुण कुमार सिंह ने ही मुझको सिखाया था .उस वक़्त जो सीखा था, वह आदत बन गयी , जो आज तक बनी हुई है . उसका लाभ यह है कि कभी खिसियाना नहीं पड़ता . पाश्चात्य दर्शन के पर्चे में देकार्त के बारे में जो जानकारी उन्होने दी , वह उस पर्चे को पढ़ने वाले सभी  छात्रों को हर कालेज में मिलती होगी लेकिन अपनी बात कुछ अलाग थी . हमने देकार्त के तर्क काजिटो अर्गो सम को बौद्धिक इन्क्वायारी के एक हथियार के रूप में अपनाने की प्रेरणा पाई और आजतक उसका प्रयोग करके  ज्ञान के सूत्र तक पंहुंचने की कोशिश करते हैं . उनकी कृपा से ही मैंने किताबें खरीदने की आदत डाली . मेरे घर में कई बार बुनियादी ज़रूरतों की भी किल्लत रहती थी लेकिन पढ़ने के प्रति जो उत्सुकता मन में है उसके चलते किताबें खरीदने से बाज़ नहीं आते थे .
मैंने अपने जीवन के साथ बहुत सारे प्रयोग किये हैं  लेकिन इस गुरु का ही जलवा है कि आज पूरे विश्व में कोई एक इंसान नहीं मिलेगा जो कह सके कि शेष नारायण सिंह नाम के आदमी ने उसके साथ अन्याय किया है या धोखा दिया है . मेरा गुरु ऐसा है कि आज भी मुझे कुछ न कुछ सिखाता है . जब मैं कुछ लिखता हूँ तो उसकी समीक्षा करता है , टेलीविज़न पर अगर कोई बात ऐसी कह दी जो मूर्खतापूर्ण है तो आज भी फोन आ जाता है और मैं भी अगले अवसर पर उसको सुधार लेता हूँ .आज मैं भी पूरे देश के विद्यार्थियों के साथ अपने शिक्षक को  बारम्बार प्रणाम करता हूँ .







Thursday, September 4, 2014

चार सितंबर आर एन डी का जन्मदिन है


शेष नारायण सिंह


आज ( ४ सितम्बर  ) आर एन द्विवेदी का जन्मदिन है . करीब डेढ़ दशक पूर्व हुए अपने स्वर्गवास के समय तक वे लखनऊ में समाचार एजेंसी यू एन आई के ब्यूरो चीफ थे . उनको उत्तर प्रदेश में नेता और पत्रकार आर एन डी कहकर संबोधित करते थे . उन दिनों टी वी  वालों का ज़माना नहीं था. प्रिंट के लोग ही होते थे.  आज के बहुत बड़े बड़े अखबार उन दिनों मामूली हैसियत के संगठन थे . आज यू एन आई एक खस्ताहाल एजेंसी के रूप में पंहुच चुकी है लेकिन उन दिनों यू एन आई और पी टी आई का वही जलवा होता था जो आजकल एबीपी न्यूज़ और आजतक का माना जाता है . मैंने उनको पहली बार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री  स्व वीर बहादुर सिंह के यहाँ देखा था.  मुख्यमंत्री आवास पर कोई प्रेस कान्फरेंस थी.   पत्रकार वार्ता के घोषित समय के हिसाब से सभी पत्रकार और अफसर आ  चुके थे लेकिन वीर बहादुर सिंह इधर उधर की बातें कर रहे थे. कुछ देर बाद आर एन द्विवेदी आये और मुख्यमंत्री ने पत्रकार वार्ता में बोलना शुरू कर दिया . बाद में मैंने वीर बहादुर सिंह से पूछा कि किसका  इंतज़ार कर रहे थे .इतनी देर क्यों की? तो उन्होंने  रहस्य बताया . कहने लगे कि  बाकी अखबार वालों को कुछ नहीं पता . अगर यू एन आई नहीं लिखेगा तो कोई  नहीं छापेगा . यू एन आई की खबर हिंदी अंग्रेज़ी सब छापते हैं .वहीं मेरा उनसे औपचारिक परिचय हुआ था अ लेकिन एक बड़े पत्रकार से मुलाक़ात भर थी वह .

उसके बाद से मैं जब भी लखनऊ गया , उनसे मुलाक़ात हुई . किसी के साथ प्रेस क्लब जाना  होता तह और उनसे  दुआ सलाम हो जाती थी. आर एन डी को देखकर मुझे हमेशा लगता था कि  कितने भले आदमी थे वे. उनके पिता जी मध्य प्रदेश सरकार में बड़े अफसर थे, उनके ताऊ , पं मन्नू लाल द्विवेदी , जवाहरलाल नेहरू के साथ पहली,  दूसरी और तीसरी लोकसभा के सदस्य रह चुके थे . आर एन डी खुद भी  बी टेक पास  थे यानी क्वालीफाइड इंजीनियर . उन्होंने अच्छे पैसे वाली अफसरी की नौकरी को न करके पत्रकारिता का वरण किया था. उन दिनों , आज की तरह हर गली मोहल्ले में इंजीनियरिंग कालेज नहीं होते थे . बाक़ायदा मेहनत करके कठिन परीक्षा देकर बी टेक में एडमिशन मिलता  था. लेकिन उनके व्यक्तित्व में कहीं भी आभिजात्य का ठसका नहीं था. मेरे बहुत सारे दोस्त उनको बहुत सम्मान देते हैं . जब भी लखनऊ गया  उनसे  मुलाक़ात का मौक़ा लगा तो ज़रूर मिला. हिसाम सिद्दीकी, सुरेश बहादुर सिंह , अमान अब्बास , ज्ञानेंद्र शर्मा, कमर वहीद नकवी  , शैलेश जिस से भी उनकी चर्चा शुरू होती  है , सभी लोग  एक बेहतीन इंसान का ज़िक्र शुरू कर देते हैं . शायद यही वजह थी कि जब २००७ में जब हमारी दोस्त सलमा जैदी ने  बीबीसी के दिल्ली दफतर में   यह संभावना बताई कि उनकी बेटी से हमारे बेटे की शादी हो सकती है तो मुझे बहुत खुशी हुई. आर एन डी के बारे में सलमा जी ने जिस तरह से बातें कीं मुझे लगा कि इस दुनिया को छोड़  चुके अच्छे इंसान के बारे में उनके साथी कितनी मुहब्बत से बात करते हैं .   आर एन डी की बिटिया उन दिनों बीबीसी के दिल्ली कार्यालय मे काम करती थी और इंडिया बिजनेस हेड के पद पर तैनात थी .

 उत्तर प्रदेश के जिन नेताओं से भी उनका ज़िक्र हुआ सबने अच्छी बातें ही कीं . कल्याण सिंह ,मुलायम सिंह यादव , राजनाथ सिंह सभी उनको बहुत सम्मान देते थे. लेकिन इस आदमी ने सत्ता का कहीं भी लाभ नहीं लिया . अपनी दोनों बच्चियों की शादी के लिए चिंतित ज़रूर रहते थे लेकिन  उनके पुण्य का कमाल ही है कि उनके चले जाने के बाद भी दोनों ही लड़कियों की शादी बहुत अच्छे लड़कों से हो गयी है . एक लड़का आई आई एम का एम बी ए  है तो दूसरा आई आई टी का बी टेक.  उनके सद्कर्मों का फल है .

जब अपने दोस्त और उर्दू अखबार , सहाफत , के मालिक  अमान अब्बास की शादी के जश्न में शामिल होने के लिए लखनऊ गया तो  जो भी  बड़ा पत्रकार मिला सबने आर एन डी की बात की . उनकी याद की. उनके चाहने वाले आर एन डी की याद में कोई ऐसा काम करना चाह रहे हैं जो आने वाली पीढियां याद  रखेगीं . उनके कद के पत्रकार के लिए यह बिल्कल सही श्रद्धांजलि होगी . 

Tuesday, September 2, 2014

एक बेहतरीन चैनल की स्थापना करके चल पड़े शैलेश अपनी अगली मंजिल पर


शेष नारायण सिंह

न्यूज़ नेशन एक बेहतरीन चैनल है . बहुत कम समय में देश के गंभीर हिंदी चैनलों में उसका शुमार होने लगा  है .  न्यूज़ नेशन आज जहां है उसको वहाँ तक पंहुचाने में  कुशाग्रबुद्धि पत्रकार शैलेश की भूमिका सबसे ज़्यादा रही है . बहुत कम समय में इस टी वी चैनल को  एक ऐसे समाचार संगठन के रूप में पहचाना जाता है जिसकी विश्वसनीयता पर किसी तरह का सवाल नहीं उठाया जा सकता . इस ख्याति को हासिल करने के लिए शैलेश ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था . पत्रकारिता के अपने तीन दशक के अनुभव का एक एक सूत्र उन्होंने न्यूज़ नेशन में डाल दिया था. चैनल की योजना के समय से ही मेरी उनसे बात होती रही थी. पत्रकारिता की दुनिया के किसी सूरमा को वे बहुत भाव नहीं देने वाले थे . टेलीविज़न में कौन किस लायक है ,उनको अच्छी तरह से मालूम था. शायद ऐसा इसलिए भी था कि वे आज तक न्यूज़ चैनल में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल थे. ज़्यादातर चैनलों में आजकल लोग वहीं से गए हैं . देश के बहुत सारे बड़े टी वी पत्रकार शैलेश के साथ काम कर चुके हैं . उनको सब मालूम है .
लेकिन लगता है कि न्यूज़ नेशन टी वी चैनल अब  बुलंदी की अपनी पारी पूरी कर चुका है . खबर है कि शैलेश ने न्यूज़ नेशन से इस्तीफा दे दिया है और अब संपादकीय की मुख्य जिम्मेदारी मालिक के परिवार के संजय कुलश्रेष्ठ संभालेगे .हालांकि अभी लीपापोती वाली खबर भी चल रही है कि सम्बन्ध बना रहेगा . यह अजीब विडम्बना है कि समाचार  संगठन चलाने वाला मालिक समझने लगता है कि उसके पैसे के कारण ही सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है . पैसा दिया जाए तो कोई भी चला लेगा . दूसरी विडम्बना यह है कि उसको सच्चाई का पता तब चलता है जब उसकी अपनी कारगुजारियों के कारण सब कुछ तबाह हो जाता है .
शैलेश ने जिस तरह न्यूज़ नेशन को बहुत अच्छा समाचार सोर्स बनाया था, उस तरीके को मैंने विजिटर्स गैलरी की अगली सीट पर बैठकर देखा है . किस तरह से भांति भांति के लोगों को जोड़ा था, मुझे मालूम है . मुझसे एक बार कहा कि कुछ अच्छे लोगों को भेजो लेकिन ध्यान रखना कि नौकरी की तलाश वाले नहीं होने चाहिए . एक अच्छे एंकर को मैंने भेजा ,उसने तनखाह बहुत ज्यादा मांग लिया . उसको उम्मीद थी कि भाव ताव करके कम कर दिया जाएगा लेकिन उसका मौका ही नहीं लगा .बाद में शैलेश जी ने मुझे बताया कि जो बहुत फंटास्टिक बात करता है ,वह खबरों में भी फंटास्टिक रुख अपनाएगा . जाने दो . ज़ाहिर है कि कबीरपंथी ईमानदारी से उन्होंने काम शुरू किया और निभाया . लेकिन अब फ़कीर अलविदा कह चुका है .
अब संपादकीय कार्य की जिम्मेदारी संजय कुलश्रेष्ठ ने ली है. शैलेश ने संजय  जी के  बारे में मुझे जो बताया था , उसके आधार पर मैं बता सकता हूँ कि संजय कुलश्रेष्ठ एक अच्छे इंसान हैं लेकिन हिंदी टेलीविज़न पत्रकारिता की भूल भुलैया में वे  कहाँ जाकर किनारे लगेगें , कोई नहीं बता सकता . लेकिन वक़्त सब की परीक्षा लेता है . शैलेश तो  जस की तस चदरिया रख कर चल पड़े अपने अगले किले की तरफ लेकिन न्यूज़ नेशन जैसा बेहतरीन चैनल कैसे चलेगा ,उसपर नज़र रहेगी . मेरी इच्छा है कि संजय कुलश्रेष्ठ सफल हों लेकिन मेरी इच्छा की क्या औकात है जब शैलेश के अज्म की नहीं चली.