Saturday, April 7, 2012

उदयन शर्मा ने मुझे एक मिनट के अंदर सम्पादकीय लिखना सिखाया था

शेष नारायण सिंह

११ साल हो गए ,जब उदयन शर्मा को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में दाखिल कराया गया था. बाद में उन्हें जी बी पन्त अस्पताल में लाया गया जहां उन्होंने अंतिम सांस ली. हर साल यह महीना मेरे लिए बहुत मुश्किल बीतता है . उदयन शर्मा बहुत बड़े पत्रकार थे, बेहतरीन इंसान थे, बहुत अच्छे पिता थे , बेहतरीन दोस्त थे ,. उन्होंने बहुत लोगों से दोस्ती की और बहुत लोगों ने उन्हें नापसंद किया . इसी दिल्ली शहर में ऐसे सैकड़ों लोग मिल जायेगें जो उनको बहुत अच्छी तरह जानते होंगें.अगर इन लोगों के सामने कोई अन्य व्यक्ति कह दे कि वह भी उदयन शर्मा को जानता है तो वे बुरा मान जायेगें और दावा करेगें कि सबसे अच्छे दोस्त तो उदयन शर्मा उनके ही थे. मैं ऐसे बहुत सारे लोगों को जनता हूँ जो उदयन शर्मा को बहुत अच्छी तरह जानते हैं, उनसे अच्छी तरह कोई नहीं जानता . मुझे हमेशा से लगता रहा है कि उदयन के व्यक्तित्व में वह खासियत थी कि जो भी उनसे मिलता था वह उनको अपना सबसे करीबी दोस्त मानने लगता था. उदयन शर्मा के जन्मदिन के मौके पर ११ जुलाई के दिन दिल्ली में एक कार्यक्रम होता है जिसमें उन्हें याद किया जाता है . उनकी पुण्यतिथि को याद नहीं किया जाता. सब कहते हैं कि पंडित जी की मृत्यु को याद करना ठीक नहीं है, उस से दर्द बढ़ जाता है . उनकी मृत्यु के महीने , अप्रैल में कहीं कोई कार्यक्रम नहीं होता, कहीं कोई आयोजन नहीं होता . लेकिन सच्ची बात है कि उनके चाहने वालों को वे सबसे ज्यादा अप्रैल में ही याद आते हैं . हाँ यह भी पक्का है कि कोई किसी से कहता नहीं ,कहीं उदयन का ज़िक्र नहीं होता. डर यह रहता है कि कहीं तकलीफ बढ़ न जाए. लेकिन अप्रैल के महीने में सभी लोग उदयन शर्मा को अप्रैल में बहुत मिस करते हैं. कोई किसी से कहता नहीं .सभी लोग उदयन शर्मा को अपने तरीके से याद करते रहते हैं .
मैं भी उदयन को हर साल पूरे अप्रैल निजी तौर पर याद करता हूँ . आज तक तो मैं अपने कुछ बहुत करीबी लोगों से बता दिया करता था कि मुझे उदयन की बहुत याद आती है लेकिन आज मैंने प्रतिज्ञा कर ली है अब कभी किसी से नहीं बताऊंगा कि मुझे भी उदयन शर्मा की याद आती है . पिछले ११ वर्षों में मैं ऐसे बहुत लोगों से मिला हूँ जिनको उदयन ने पत्रकारिता सिखाई है . मुझे भी उन्होंने बहुत बुरे वक़्त में नौकरी दी थी और मुझे सम्पादकीय लिखना सिखाया था. हुआ यह कि एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे कह दिया कि अब तुम रोज़ एक सम्पादकीय लिखा करोगे. मुझे तो लगा कि सांप सूंघ गया . कभी लिखा ही नहीं था सम्पादकीय . लेकिन पंडित जी ने मुझे एक मिनट में सिखा दिया . कहने लगे कि मेरे भाई , आप जिस तरह से किसी भी टापिक पर बात करते रहते हैं , उसी को कलमबंद कर दो , बस वही सम्पादकीय हो जाएगा. मैंने लिख दिया और जनाब हम एक दिन के अंदर सम्पादकीय लेखक बन गए . यह मेरे निजी विचार हैं . किसी को तकलीफ देने के लिए नहीं लिखे गए है और मेरे ब्लॉग पर रहेगें .

Thursday, April 5, 2012

" हर तानाशाह आतंकवादी होता है और हर आतंकवादी होता है तानाशाह"

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली,५ अप्रैल.अरब क्रान्ति की नेता और सबसे कम उम्र में नोबेल शान्ति पुरस्कार जीतने वाली यमन की पत्रकार तवक्कुल कारमान ने आज यहाँ कहा कि हर तानाशाह आतंकवादी होता है और हर आतंकवादी निश्चित रूप से तानाशाह होता है. वे आज यहाँ बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय संस्थान के तत्वावधान में आयोजित पांचवें स्मारक व्यख्यान के आयोजन की मुख्य वक्ता थीं. अरब स्प्रिंग रिवोल्यूशन की नेता और वीमेन जर्नलिस्ट्स विदाउट चेन्स की संयोजक तवक्कुल कार्मान ने अरब दुनिय में परिवर्तन की आंधी ला दी है . जिन अरब देशों में महिलायें बाहर नहीं निकलती थीं वहीं आज तवक्कुल की प्रेरणा से हज़ारों महिलायें सडकों पर आ कर तानाशाही का विरोध कर रही हैं . वे खुद महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानती हैं और अरब दुनिया में परिवर्तन की बहुत बड़ी समर्थक हैं .वे खुद भी अहिसंक तरीकों से चलाये जा रहे अरब देशों के परिवर्तन के आन्दोलन का नेतृत्व कर रही हैं.

बहुत ही लचर तरीके से आयोजित सरकारी कार्यक्रम में कुछ भी ठीक नहीं था . समय से करीब ४५ मिनट बात तक आयोजक तैयारी में ही लग एराहे . हद तो तब हो गयी जब मुख्य अतिथि के आ जाने के बाद भी सीटों पर आरक्षण की पट्टियां लगाई जाती रहीं . आयोजक और उनका मंत्रालय बिलकुल गाफिल थे क्योंकि सम्बंधित मंत्री ने पंजाब विधानसभा के स्पीकर को पंजाब की लोकसभा का स्पीकर बताया और अपनी गलती को सुधारने तक की परवाह नहीं की..सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की खामियों को लोकसभा की स्पीकर और बाबू जगजीवन राम की बेटी ने अपने स्वागत भाषण में बखूबी लिया . उन्होंने कहा कि वे तवक्कुल कारमान की बेख़ौफ़ पत्रकारिता का सम्मान करती हैं . मीरा कुमार ने इस अवसर पर अपने महान पिता को याद किया और कहा कि वे कहा करते थे हमारे देश के लिए लिक्तंत्र बहुत ज़रूरी है क्योंकि वह हमें बराबरी का अवसर देती है . वे कहा करते थे कि बराबरी का लक्ष्य हासिल करने के लिए लोक तंत्र ज़रूरी है लेकिन जाति प्रथा इसमें सबसे बड़ी बाधा है . बाबू जगजीवन राम कहा करते तह कि या तो जाति प्रथा अरहेई आ लोकतंत्र . क्योंकि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं . मीरा कुमार ने बताया अपने देश में लोकतंत्र और जातिप्रथा , दोनों ही साथ साथ चल रहे हैं .उन्होंने उम्मीद जताई कि हमारा लोकतंत्र जाति प्रथा को ख़त्म कर डा और बराबरी उसी रास्ते से आयेगी.

जब तवक्कुल कारमान ने माइक संभाला तो दर्शकों में कोई बहुत उत्साह नहीं था लेकिन जब उन्होंने अपना भाषण ख़त्म किया तो सभी दर्शक खड़े हो कर तालियाँ बजा रहे थे.उन्होंने कहा कि अरब दुनिया में शासक वर्गों ने अजीब तरीके अपना रखे हैं .वे देश की संपत्ति को अपनी खेती समझते हैं और अपने परिवार वालों के साथ मिलकर सारी संपदा को लूट रहे हैं . अरब देशों में हर तरफ तानाशाही का बोलबाला है लेकिन अपने देशों के नाम सभी ने इस तरह के रख छोड़े हैं कि उसमें रिपबलिक कहीं ज़रूर आ जाता है . उनके अपने देश, यमन के तानाशाह ने पूरी कोशिश की कि उनके आन्दोलन को इस्लामी आतंकवादी आन्दोलन करार दे दिया जाए.. लेकिन अरब नौजवानों ने तानाशाहों की कोशिश को सफल नहीं होने दिया. नौजवानों ने कुर्बानियां दीं क्योंकि वे अपने भविष्य को तानशाही के हवाले नहीं करना चाहते . अपनी कुर्बानियों एक बल पर अरब नौजवानों ने साबित कर दिया कि वे आतंकवादी नहीं है क्योंकि वे महात्मा गांधी के अहिंसक आन्दोलन को अपने संघर्ष का तरीका बना चुके हैं .इन नौजवानों की ताक़त संघर्ष कर सकने की क्षमता है .. अरब देशों के तानाशाह आम लोगों को उनका हक नहीं देना चाहते इसलिए वे उन्हें बदनाम करने के लिए उन पर आतंकवादी का लेबल लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन अब पूरी दुनिया को मालूम है कि अरब दुनिया बहुत बड़े बदलाव के मुहाने पर खडी है और उम्मीद से पहले ही अरब देशों में लोकशाही के स्थापना हो जायेगी.

अमरीका के भारी दबाव के बाद भी पाकिस्तान हाफ़िज़ सईद को नहीं पकड़ेगा

शेष नारायण सिंह

मुंबई हमलों की साज़िश के सरगना हाफ़िज़ मुहम्मद सईद को अब अमरीका भी आतंकवादी मानने लगा है . इसके पहले जब भारत की तरफ से कहा जाता था कि हाफ़िज़ सईद को काबू में किये बिना आतंक के खिलाफ किसी तरह की लड़ाई, कम से कम पाकिस्तान में तो नहीं लड़ी जा सकती, तो अमरीका के नेता हीला हवाला करते थे. अब अमरीका की समझ में भी आ गया है कि हाफ़िज़ सईद को पकड़ना ज़रूरी है क्योंकि उसने पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान जाने वाली फौजी सप्लाई में अडंगा डालने की कोशिश शुरू कर दिया है .अब अमरीका को लगता है कि हाफ़िज़ सईद को काबू में कर लेना चाहिए . लेकिन उसे पकड़ने के लिए अमरीकी हुकूमत ने जो तरीका अपनाया है वह बहुत ही अजीब है . अमरीका ने ऐलान कर दिया है कि जो भी हाफ़िज़ सईद को अमरीका के हवाले कर देगा उसे पचास करोड़ से ज्यादा रूपये इनाम के रूप में दिए जायेगें. लगता है कि अमरीका की पाकिस्तान नीति के संचालकों को मालूम नहीं है कि हाफ़िज़ सईद की पाकिस्तान की फौज में क्या हैसियत है . आज ही पाकिस्तानी फौज के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हमीद गुल का बयान आ गया है कि अमरीका को कोई अख्तियार नहीं है कि वह हाफ़िज़ सईद की गिरफ्तारी की बात करे. यह वही हमीद गुल हैं जो कभी आई एस आई के डाइरेक्टर हुआ करते थे और पाकिस्तान में जितने भी बड़े आतंकवादी हैं यह उन सभी के संरक्षक रह चुके हैं . लेकिन हाफ़िज़ सईद इनका भी संरक्षक रह चुका है . हाफ़िज़ सईद के अहसानों का बदला चुकाने के लिए हमीद गुल ने तो भारत के खिलाफ भी बयान देना शुरू कर दिया है . कहते हैं कि भारत को अमरीका के उस बयान का स्वागत नहीं करना चाहिए था जिसमें कहा गया है कि हाफिज़ सईद को पकड़ने वाले को भारी रक़म बतौर इनाम दी जायेगी. वे तो यहाँ तक धमकी दे रहे हैं कि अगर पाकिस्तान के राष्ट्रपति ८ अप्रैल को ख्वाजा गरीब नवाज़ की दरगाह पर हाजिरी लगाने अजमेर जाते हैं तो पाकिस्तान की सडकों और बाज़ारों में जुलूस निकाल कर उनका विरोध किया जायेगा.

यह देखना दिलचस्प होगा कि एक आतंकवादी के लिए पाकिस्तानी फौज़ और उसकी आई एस आई का निर्माता इस तरह की बात क्यों कर रहा है . यह हाफ़िज़ सईद आखिर है कौन. पाकिस्तान की सरकार में किसी की भी औकात नहीं है कि वह हाफिज़ सईद के खिलाफ कोई कार्रवाई करे... .हाफ़िज़ मुहम्मद सईद के खिलाफ कार्रवाई करना इसलिए भी मुश्किल होगा क्योंकि आज पकिस्तान में आतंक का जो भी तंत्र है , वह सब उसी सईद का बनाया हुआ है . उसकी ताक़त को समझने के लिए पिछले ३३ वर्षों के पाकिस्तानी इतिहास पर एक नज़र डालना ठीक रहेगा. पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह , जिया उल हक ने हाफिज़ सईद को महत्व देना शुरू किया था . उसका इस्तेमाल अफगानिस्तान में पूरी तरह से किया गया लेकिन बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ ने उसे कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल किया . वह पाकिस्तानी प्रशासन का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया . सब को मालूम है कि पाकिस्तान में हुकूमत ज़रदारी या गीलानी की नहीं है . सारी हुकूमत फौज की है और हाफिज़ सईद फौज का अपना बंदा है. हाफिज़ सईद की हैसियत का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जनरल जिया के वक़्त से ही वह फौज में तैनाती वगैरह के लिए सिफारिश करता रहा है और पाकिस्तान के बारे में जो लोग जानते हैं उनमें सब को मालूम है कि पकिस्तान में किसी भी सरकारी काम की सिफारिश अगर हाफिज़ सईद कर दे तो वह काम हो जाता है . यह आज भी उतना ही सच है . इसका मतलब यह हुआ कि जिन लोगों पर हाफिज़ सईद ने अगर १९८० में फौज के छोटे अफसरों के रूप में एहसान किया था, वे आज फौज और आई एस आई के करता धरता बन चुके हैं उसके अहसान के नीचे दबे हुए अफसर हाफिज़ सईद पर कोई कार्रवाई नहीं होने देंगें.


अगर पाकिस्तान पर सही अर्थों में दबाव बनाना है तो सबसे ज़रूरी यह है कि फौज में जो हाफ़िज़ सईद के चेले हैं उन्हें अर्दब में लिया जाए. इसका एक तरीका तो यह है फौज के ताम झाम को कमज़ोर किया जाए. इस मकसद को हासिल करने के लिए ज़रूरी है फौज को अमरीका से मिलने वाली मदद पर फ़ौरन रोक लगाई जाए. यह काम अमरीका कर सकता है . ऐसी हालत में अगर अमरीका की सहायता पर पल रहे पकिस्तान को अमरीकी सहायता बंद कर दी जाए तो पाकिस्तान पर दबाव बन सकता है लेकिन इस सुझाव में भी कई पेंच हैं . .पाकिस्तान के गरीब लोगों को बिना विदेशी सहायता के रोटी नहीं दी जा सकती है क्योंकि वहां पहले प्रधान मंत्री लियाकत अली के क़त्ल के बाद से विकास का काम बिलकुल नहीं हुआ है .पहली बार जनरल अयूब ने फौजी हुकूमत कायम की थी, उसके बाद से फौज ने पाकिस्तान का पीछा नहीं छोडा. आज वहां अपना कुछ नहीं है सब कुछ खैरात में मिलता है .इस सारे चक्कर में पकिस्तान का आम आदमी सबसे ज्यादा पिस रहा है. इसलिए विदेशी सहायता बंद होने की सूरत में पाकिस्तानी अवाम सबसे ज्यादा परेशानी में पड़ेगा क्योंकि ऊपर के लोग तो जो भी थोडा बहुत होगा उसे हड़प कर ही लेगें ..इस लिए यह ज़रूरी है कि पाकिस्तान को मदद करने वाले दान दाता देश साफ़ बता दें कि जो भी मदद मिलेगी, जिस काम के लिए मिलेगी उसे वहीं इस्तेमाल करना पड़ेगा. आम पाकिस्तानी के लिए मिलने वाली राशि का इस्तेमाल आतंकवाद और फौजी हुकूमत का पेट भरने के लिए नहीं किया जा सकता. अमरीका और अन्य दान दाता देशों के लिए इस तरह का फैसला लेना बहुत मुश्किल पड़ सकता है लेकिन असाधारण परिस्थतियों में असाधारण फैसले लेने पड़ते हैं . ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी रक़म को इनाम के रूप में घोषित करके अमरीका ने एक असाधारण फैसला लिया है . लेकिन यह उम्मीद करना बेकार है कि पाकिस्तान हाफ़िज़ सईद को पकड़ कर अमरीका के हवाले कर देगा . जब तक फौज को घेरे में न लिया जाएगा , हाफ़िज़ सईद का कुछ नहीं बिगड़ेगा.

Wednesday, April 4, 2012

भारत के न्यायप्रिय लोग बाबू जगजीवन राम को आदर्श मानते हैं

आज जगजीवन राम की जयंती है


शेष नारायण सिंह

जगजीवन राम इस देश के राष्ट्रीय हीरो हैं . अपनी अंतिम सांस तक उन्होंने भारत को हमेशा सबसे ऊपर रखा . सामाजिक न्याय की उनकी सोच बहुत ही व्यावहारिक थी. महात्मा गाँधी की सामाजिक बराबरी की दार्शनिक सोच को उन्होंने अमली जामा पहनाया. १९३० के दशक में वे बाकायदा राजनीति में आये . यह एक महान राजनीतिक जीवन की शुरुआत थी बाद के वर्षों में महात्मा गाँधी के साथ हमेशा खड़े रहने वाले जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन का हमेशा नेतृत्व किया . आज़ादी के बाद जब पहली सरकार बनी तो वे उसमें कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल हुए और जब तानाशाही का विरोध करने का अवसर आया तो लोकशाही की स्थापना की लड़ाई में शामिल हो गए. सब जानते हैं कि ६ फरवरी १९७७ के दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल से दिया गया उनका इस्तीफ़ा ही वह ताक़त थी जिसने इमरजेंसी के राज को ख़त्म किया. उसके बाद उन्हें इस देश ने प्रधानमंत्री नहीं बनाया क्योंकि वे दलित थे . हालांकि उनको ही प्रधान मंत्री होना चाहिए था . केंद्र में वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडलों में रहे . कृषि और खाद्य मंत्री के रूप में उन्होंने देश की खाद्य समस्या का ऐसा हल निकाला कि आज तक अनाज के लिए हमें किसी मुल्क के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ा . बंगलादेश की स्थापना के समय वे रक्षा मंत्री थे . सेना को जो नेतृत्व उन्होंने दिया वह अपने आप में एक मिसाल है . उन दिनों एक बहुत ही गैर ज़िम्मेदार आदमी अमरीका का राष्ट्रपति था , उसने भारत को धमकाने के लिए हिंद महासागर में अमरीकी सेना का परमाणु हथियारों से लैस विमानवाहक पोत , 'इंटरप्राइज़' भेज दिया था. बाबू जगजीवन राम ने ऐलान कर दिया कि अगर ' इंटरप्राइज़' बंगाल की खाड़ी में ज़रा सा भी आगे बढा तो भारत के जांबाज़ सैनिक उसे वहीं डूबा देंगें.

बाबू जगजीवन राम के योग्य नेतृत्व का ही कमाल है कि बंगला देश को स्वतंत्र करवाने की लड़ाई को बहुत ही योजनाबंद्ध तरीके से पूरा कर लिया गया . कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने हरित क्रान्ति की उपलब्धियों को देश की आर्थिक तरक्की के मिशन से जोड़ा . देश में मौजूद कृषि शोध संस्थानों की स्थापना में उनका बड़ा योगदान है . रेल मंत्री के रूप में बाबू जगजीवन राम ने बुनियादी ढांचागत सुविधाओं में क्रांतिकारी योगदान किया . एक राष्ट्र निर्माता के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जाएगा . आज अपने देश में जितने भी कानून मजदूरों के हित के लिए बनाए गए हैं उन सबको बाबू जगजीवन राम ने तब बनाया था जब वे नेहरू की कैबिनेट में मंत्री थे.लेकिन यह देश जगजीवन राम के प्रति वह सम्मान कभी नहीं व्यक्त कर पाया जिस पर उनका अधिकार है . उनके राजनीतिक जीवन में ऐसे बहुत सारे दृष्टांत हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि उन्होंने हमेशा ही राष्ट्र प्रेम और सामाजिक समरसता को मह्त्व दिया . सामाजिक न्याय की अपनी लड़ाई में उन्होंने सारे समाज को साथ रखने की कोशिश की और महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू के विश्वास पात्र बने. सारी दुनिया जानती है कि १९६९ में कांग्रेस में बँटवारे के बाद जगजीवन राम कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे और उम्मीद की जा रही थी कांग्रेस में उन्हें ही वैकल्पिक नेता के रूप में स्वीकार किया जाएगा. . १९६९ के बाद में बाबूजे एने ही इंदिरा गांधी की डूबती नैया को पार लगाया था . कांग्रेस की १९७१ की जीत में भी बाबू जगजीवन राम के कुशल नेतृत्व का भारी योगदान था . हरित क्रान्ति के ज़रिये उन्होंने देश के ग्रामीण इलाकों में सम्पन्नता को न्योता दिया था और जब कांग्रेस के उस वक़्त के बड़े नेता इंदिरा गाँधी को सबक सिखाने के चक्कर में थे . बाबू जी के नेतृत्व का जलवा था कि पूरे देश का कांग्रेस कार्यकर्ता उनकी पार्टी के साथ लगा रहा . लेकिन जब १९७२ के बाद बंगलादेश की स्थापना हो गयी तो इंदिरा गाँधी ने समझा कि सब उनकी ही कृपा से हुआ था , सब उबका ही प्रताप था. इसी सोच के तहत उन्होंने अपने छोटे बेटे को अपने विकल्प के रूप मों पेश करने की योजना पर काम कारण शुरू कर दिया . उसके बाद तो कांग्रेस में मनमानी का युग शुरू हो गया. इंदिरा गाँधी के छोटे बेटे के संगी साथी देश की राजनीतिक व्यवस्था पर हावी हो गए.कांग्रेस में उन लोगों की जय जय कार होने लगी जो किसी रूप में इंदिरा गाँधी छोटे बेटे तक पंहुच बना सकते थे. नतीजा यह हुआ कि अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई. राज नारायण की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी के लिए प्रधान मंत्री पद पर बने रहना असंभव हो गया था . अगर उस वक़्त उन्होंने कांग्रेस के सबसे बड़े नेता, बाबू जगजीवन राम को प्रधान मंत्री बना दिया होता तो कांग्रेस एक लोकतांत्रिक संगठन के रूप में बच जाती और देश को इमरजेंसी और संजय गाँधी का आतंक न झेलना पड़ता . लेकिन इन्दिरा गाँधी को अपने बेटे संजय के राजनीतिक भविष्य के सिवा कुछ भी नहीं दिखता था . नतीजा सब को मालूम है . कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में वहीं खतम हो गयी.

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी की स्थापित सत्ता के विरोधी जयप्रकाश नारायण ने कई बार कहा था कि जगजीवन राम जैसे बड़े नेताओं को इंदिरा गाँधी और संजय गांधी के विरोध में खड़े हो जाना चाहिए . वह अवसर फरवरी १९७७ में आया जब जगजीवन राम ने अपने कुछ सताहियों के साथ मिलकर कांग्रेस फार डेमोक्रेसी बना ली.एक बार कांग्रेस फिर टूट गयी और देश में लोकतंत्र की स्थापना हुई. सब को मालूम था अकी १९७७ की जीत कभी न मिलती अगर बाबू जगजीवन राम का साथ न होता . लेकिन जब प्रधान मंत्री चुनने की बात आई तो पुरातन पंथी ताक़तों ने मोरारजी देसाई को सत्ता सौंप दी. अपनी जिद और अजीबोगरीब आदतों की वजह से विख्यात मोरारजी देसाई ने देश को कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं दिया और एक बहुत बड़ा राजनीतिक प्रयोग ज़मींदोज़ हो गया . जनता पार्टी को एक बार मौक़ा मिला था कि उस वक़्त के सबसे बड़े राजनीतिक नेता को प्रधान मंत्री बनाते लेकिन जनता पार्टी नामक भानुमती के कुनबे में ऐसे लोग शामिल थे जो किसी भी हालत में आम राय से फैसले ले ही नहीं सकते थे. उनकी आपसी लड़ाई को ख़त्म करने के लिए जनता ने दोबारा इंदिरा गाँधी की वापसी का हुक्म सुना दिया.

१९७७ में जगजीवन राम को उनके हक से दूर रखने के बहुत दूरगामी नतीजे हुए. सैकड़ों वर्षों से दोयम दर्जे की ज़िंदगी जी रहे दलित समाज ने आज़ादी के बाद पहली बार समझा कि कांग्रेस या अन्य कोई भी राजनीतिक जमात उनको केवल इस्तेमाल काना चाहती है. कोई भे एराजनीतिक पार्टी दलितों को उनका हक देने के लिए तैयार नहीं है . न्याय प्रिय लोगों का एक बहुत बड़ा समुदाय आज कांग्रेस से दूर जा चुका है और उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कनाग्रेस को कोई पूछने वाला नहीं है . १९७७ के बाद से ही दलितों ने कांग्रेस से किनारा करना शुरू कर दिया और जब कांशीराम ने ऐलानियाँ दलितों की पार्टी बनायी तो दलित समुदाय के लोगों ने उसी पार्टी को अपना लिया. सच्च्ची बात यह है कि जगजीवन राम ने कभी भी दलितों की राजनीति नहीं की लेकिन कांग्रेस और उसके बाद के नेतृत्व ने उन्हें हमेशा दलित ही माना .उनकी राजनीति के केंद्र में हमेशा से ही भारत रहा है और उसी भारत के न्याय प्रिय लोग आज भी बाबू जगजीवन राम को आदर्श मानते हैं .

Sunday, April 1, 2012

हथियारों के दलाल और उनके कारिंदे जनरल के खिलाफ लामबंद हो गए हैं .

शेष नारायण सिंह

जनरल वी के सिंह के खिलाफ नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों में बहुत सारे लोग लाठी भांज रहे थे. बाद में उनकी संख्या कुछ कम हुई. जनरल वी के सिंह को हटाने के लिए दिल्ली में सक्रिय हथियार दलालों की लाबी बहुत तेज़ काम कर रही थी. राजधानी में यही लाबी सबसे ताक़तवर मानी जाती है .नई दिल्ली के हथियार दलालों ने ही कुमार नारायण नाम के हथियारों के एक दलाल को जेल में डलवा दिया था क्योंकि वह विरोधी पार्टी का था और उसके दुश्मन उससे मज़बूत थे. इस हथियार लाबी की ताक़त इतनी है कि वह किसी को भी प्रभावित कर सकती है . ज़्यादातर मामलों में तो पता भी नहीं चलता और ईमानदार आदमी भी दलालों के इस गिरोह का शिकार हो जाता है . जब मीडिया पर एकाधिकार का ज़माना था और सरकारी रेडियो और टेलिविज़न ही हुआ करते थी तो अखबारों की खबरें किसी भी हालत में हथियारों के दलालों के खिलाफ नहीं जा सकती थीं . जब से प्राइवेट टेलिविज़न चैनल आये हैं , हथियारों के दलालों के गिरोह खबरों को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं . नतीजा यह है कि इनके कारनामे सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जा रहे हैं . जनरल वी के सिंह के खिलाफ भी जो अभियान चला , वह अब खंड खंड हो रहा है. जनरल ने १४ करोड़ रूपये के घूस वाले अपने इंटरव्यू में हिन्दू अखबार की संवाददाता, विद्या सुब्रमनियम को बताया था कि फौज के नाम पर दलाली करने वाले आदर्श घोटाले वाला गिरोह उनके पीछे पडा हुआ है और उसी गैंग के लोग उन्हें बदनाम करने पर आमादा है . सवाल यह उठता है कि अगर उस गिरोह वाले जनरल के पीछे पड़े हैं तो प्रेस क्लब में लोग उनके खिलाफ इतना क्यों हैं, मेरे वे पत्रकार मित्र जिनकी ईमानदारी पर कभी कोई सवाल नहीं उठाये गए, वे क्यों जनरल के खिलाफ हैं . वे अफसर जनरल को क्यों गरिया रहे हैं जिनकी ईमानदारी की कहानियां दिल्ली में उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल की जाती हैं . वे नेता क्यों जनरल को बर्खास्त करने की बात कर रहे हैं जो आम तौर पर बहुत ही कड़क माने जाते हैं और जिनको कभी कोई भी दलाल बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता .
इन सारे सवालों का एक ही जवाब है. वह जवाब यह है कि हथियारों के दलालों ने जनरल वी के सिंह को निपटाने की योजना बहुत ही ठीक से बना रखी थी. इन लोगों ने मीडिया में अपने कुछ ख़ास लोगों के बीच बहुत दिनों से जनरल वी के सिंह के खिलाफ खुसुर पुसुर चला रखा था . जनरल को कुछ नहीं मालूम था. नौकरशाही में भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो हथियारों के दलालों के लिए काम करते हैं . तो मीडिया में मौजूद हथियार दलाल लाबी के ख़ास लोगों ने ईमानदार पत्रकारों को संभाला और उन्हें जनरल की काल्पनिक कमियों की जानकारी दी. इन ईमानदार पत्रकारों ने नेताओं को अंदर की खबर देने के चक्कर में उन्हें बता दिया कि सेना प्रमुख बिलकुल बेकार आदमी है . इस बीच प्रधानमंत्री को लिखा गया एक रूटीन पत्र इन्हीं दलालों के एजेंटों ने लीक कर दिया . ब्रिक्स सम्मेलन की टाइमिंग भी दलालों ने ही मैनेज की . और भी बहुत सारी बातें हुईं और जनरल वी के सिंह एक जिद्दी इंसान के रूप में पेश कर दिए गए. आज तो हद ही हो गयी . अखबार में एक ऐसे आदमी का बयान छपा है जो कई पीढ़ियों से सत्ता के गलियारों में सक्रिय है . यह आदमी कहता है कि जनरल को ज़बस्दस्ती छुट्टी पर भेज दो .

जानकार बताते हैं कि अगर जनरल वी के सिंह ने सेना के कुछ बड़े अफसरों द्वारा किये गए फौज की सुखना वाली ज़मीन के घोटाले का पर्दाफाश न किया होता या आदर्श घोटाले को बेनकाब न किया होता , या हथियारों की दलाली में लगे लोगों को मनमानी करने दी होती तो नई दिल्ली के पावर ब्रोकर उन्हें घेरने की कोशिश न करते. इन पावर ब्रोकरों के हाथ बहुत लम्बे होते हैं और बहुत सारे लोगों को पता भी नहीं लगता कि यह उनको कब इस्तेमाल कर लेते हैं . बहरहाल संतोष इस बात का है कि जनरल वी के सिंह ने वह काम किया जो कभी टी एन शेषन ने किया था और अपनी सुरक्षा की परवाह किये बिना दिल्ली के स्वार्थी लोगों को उनकी औकात पर ला दिया . इस दिशा में आज का विद्या सुब्रमनियम का वह लेख बहुत काम आएगा जिसमें उन्होंने लिखा है कि जनरल बेदाग़ है

Friday, March 30, 2012

अमरीकी दादागीरी के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं ब्रिक्स देश

शेष नारायण सिंह

नयी दिल्ली, २९ मार्च. ब्रिक्स देशों का चौथा शिखर सम्मलेन आज संपन्न हो गया. इस अवसर पर रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने ऐलान किया कि वे भारत , ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता देने की कोशिश का समर्थन करते हैं .. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी देश को दूसरे देश के आतंरिक मामलोंमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं दिया जा सकता है और सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करना चाहिए . उन्होंने सीरिया और अफगानिस्तान में बातचीत के ज़रिये शान्ति पूर्ण हल तलाशने की बात को भी बहुत ही जोर देकर कहा . साफ़ था कि उन्होंने ब्रिक्स देशों की उस मंशा को रेखांकित किया कि सीरिया के मामले में अमरीका को दखल नहीं देना चाहिए . भारत के प्रधान मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने शिखर सम्मलेन के सार्वजनिक सत्र की शुरुआत करते हुए कहा था कि उदारीकरण के दौर में अर्थ व्यवस्था का विकास बहुत ही संतुलित होना चाहिए . इसके लिए ज़रूरी है कि आतंकवाद को हर कीमत पर रोका जाए. . उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी समझदारी की बहुत ज़्यादा संभावनाएं हैं . उनको हर हाल में इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. . उन्होंने कहा कि भारत में अगले दस साल तक प्रति वर्ष एक करोड़ रोज़गार उपलब्ध कराना है . और भारत इस दिशा में पूरी कोशिश कर रहा है .उन्होंने सदस्य देशों से अपील की कि इस दिशा में वे अपने अनुभवों से भारत की मदद करें .डॉ मनमोहन सिंह ने ब्रिक्स देशों के लिए एक दस सूत्री कार्यक्रम की रूपरेखा भी दी.

ब्राजील की राष्ट्रपति दिलमा रूसेव ने कहा कि उनका देश बिलकुल अलग है , और उसकी समस्याएं भी अलग हैं लेकिन ब्रिक्स के मंच से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं . उन्होंने कहा कि वे अपने देश में आमदनी के न्याय पूर्ण वितरण की योजना पर काम कर रही हैं .लेकिन कुछ देशों के अनावश्यक दखल के कारण उनकी अर्थव्यवस्था पर उल्टा असर पड़ता है . उनका इशारा अमरीका की तरफ था. उन्होंने इस बार पर भी खुशी जताई कि ब्रिक्स बैंक की स्थापना के बाद आपसी कारोबार के लिए डालर के इस्तेमाल की पाबंदी ख़त्म हो जायेगी. क्योंकि यूरो और डालर मुद्रा बाज़ार में असंतुलन फैला रहे हैं और आर्थिक विस्तारवाद की नीति का पालन कर रहे हैं . . उन्होंने कहा कि ज़रूरी है ब्रिक्स देश अपने घरेलू बाज़ार का विकास करें और आर्थिक तानाशाही से बचने की दिशा में आगे बढ़ें. उन्होंने कहा कि निर्यात को कमज़ोर किये बिना अपने देशों के आतंरिक बाज़ार का विस्तार किया जाना चाहिए.. उन्होंने कहा कि इरान के परमाणु कार्यक्रम को ज़बरदस्ती नहीं रोका जाना चाहिए क्योंकि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता सभी देशों का अधिकार है और उसकी रक्षा की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि ऊजा के क्षेत्र में आत्म निर्भरता भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी कि भूख के खिलाफ चल रही जंग को जीतना .
चीन के राष्ट्रपति हु जिंताओ ने बार बार लोकतांत्रिक तरीकों की बात की और आपसी भरोसे का माहौल विकसित करने की ज़रुरत को भी महत्व दिया . दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने इस बात पर बाकी ब्रिक्स देशों का आभार जताया कि दक्षिण अफीका कोअपने संगठन का सदस्य बनाकर उन पर और अफ्रीका पर अहसान किया है . उन्होंने उम्मीद जताई कि नए आर्थिक कार्यक्रमों के लागू होने के बाद उनके देश और अन्य अफ्रीकी देशों के ढांचागत विकास को ताक़त मिलेगी.

ब्रिक्स देश विश्व बैंक की तर्ज़ पर ब्रिक्स बैंक बनायेगें

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली,२९ मार्च. ब्राज़ील,भारत,चीन ,रूस और दक्षिण अफ्रीका ने आज प्रभावी तरीके से अमरीकी डालर के आधिपत्य को चुनौती देने का फैसला कर लिया है . ब्रिक्स शिखर सम्मलेन २०१२ के अवसर पर आज यहाँ पाँचों देशों के विकास बैंकों के आला अफसरों ने ब्रिक्स शासन प्रमुखों की मौजूदगी में एक समझौते पर दस्तखत किया जिसके बाद अब ब्रिक्स देश सदस्य देशों को अपनी मुद्रा में कारोबार के अवसर प्रदान करेगें और डालर को आपसी कारोबार की सीमा से बाहर कर देगें.यह एक बड़ी बात है क्योंकि आज ही मंज़ूर किये गए दिल्ली घोषणा पत्र में विश्व बैंक की तर्ज़ पर एक विकास बैंक स्थापित करने की बात की गयी है जो इन देशों में कारोबार के लिए ज़रूरी बुनियादी ढाँचे के विकास को रफ़्तार देने का काम करेगा.
आज नई दिल्ली में ब्रिक्स दशों के शासनाध्यक्षों के शिखर के बाद दिल्ली घोषणापत्र जारी कर दिया गया. इस घोषणा पत्र के जारी होने के बाद सदस्य देशों ने यह भी ऐलान कर दिया कि अब वे दुनिया के क्षितिज पर आ चुके हैं और एक नए समूह के रूप में उनको गंभीरता से लेने के सिवा बाकी दुनिया के पास कोई रास्ता नहीं है . इस अवसर पर यह भी तय किया गया कि आने वाले दिनों में उन सभी मंचों पर ब्रिक्स देशों के प्रतिनधि सक्रिय रहेगें जहां इनकी सदस्यता है . ख़ासकर जी-२० एक ऐसा संगठन है जिसमें ब्रिक्स के सभी सदस्य देश शामिल हैं . आज तय किया गया कि जी-२० के मंच को ब्रिक्स के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बखूबी इस्तेमाल किया जाएगा. इसके अलावा आने वाल एक वर्ष में ऐसी बहुत सारी बैठकें होंगीं जिनके बाद एक संगठन के रूप में ब्रिक्स को बहुत मजबूती मिलेगी.. . संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी. जी २० की बैठक के दौरान ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के अध्यक्षों की बैठक होगी. ब्रिक्स देशों के कृषि मंत्रियों की तीसरी बैठक को बहुत ही ज्यादा तैयारी के साथ किया जाएगा. . ब्रिक्स देशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को बहुत ज्यादा प्राथमिकता देने का फैसला किया है इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिया जाएगा . ब्रिक्स देशों के बीच एक शहरीकरण फोरम की स्थापना की गयी है . इस वर्ष दिल्ली में उसका सम्मलेन होगा जसी बहुत ही गम्भीरता से लेने का फैसला किया गया . ब्रिक्स देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक का आयोजन २०१३ में किया जाएगा. . विश्व बैंक की तर्ज़ पर एक ब्रिक्स विकास बैंक स्थापित करने के लिए विशेषज्ञों की एक अहम बैठक बहुत जल्द बुलाई जायेगी. ब्रिक्स रिपोर्ट पर हुई कार्रवाई को समझने के लिए सदस्य देशों के वित्तीय जानकारों की बैठक बुलाई जायेगी.
कुछ नए क्षेत्रों में भी आपसी सहयोग बढाने के लिए सम्भावनाओं की तलाश की जायेगी. ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग,ब्रिक्स युवक नीति संवाद और जनसँख्या से सम्बंधित विषयों के बारे में भी सहयोग के लिए योजना बनाने पर विचार किया जाएगा