Thursday, September 10, 2020

अर्थव्यवस्था की बदहाली की तस्वीर कोरोना के घने संकट से निकलने के बाद साफ़ होगी .

 

शेष नारायण सिंह


आज देश आर्थिक  मंदी के भयानक दलदल में  फंस चुका है . कोरोना वायरस के चलते पूरी दुनिया के संपन्न देशों की जी डी पी  नेगेटिव में जा पंहुची है लेकिन  भारत की हालत बहुत खराब है . करीब 24 प्रतिशत नेगेटिव अर्थव्यवस्था को देश को कैसे संभाल पायेगा .अभी  तीन साल पहले तक  केंद्र सरकार और उसके  चेला अर्थशास्त्री शेखी बघारते रहते थे कि जी डी पी को  दहाई के आंकड़े में लाया जाएगा .कोरोना वायरस के प्रबंधन ने भी हमारी अर्थव्यवस्था को ज़बरदस्त चोट पंहुचाई है  हालांकि हमारी  अर्थव्यवस्था पर ग्रहण तो नोटबंदी और जी एस टी ए समय से ही लगना शुरू हो गया था.  पहले से ही मौजूद बेरोजगारों की फ़ौज में कोरोना के कारण करोड़ों लोग और जुड़ गए हैं . हालांकि कहीं कोई  रिकार्ड नहीं है लेकिन डकैती, छिनैती ,अपहरण, क़त्ल आदि की खबरों पर नज़र डालें तो लग जाएगा कि बेरोजगारों की बढ़ती फ़ौज इस सब के लिए किसी हद तक ज़िम्मेदार मानी जानी चाहिए .1991  में जब  पी वी नरसिम्हाराव  प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एक ऐसी अर्थव्यवस्था की विरासत मिली थी जो कि तबाह हो चुकी थी. देश की आर्थिक विश्वसनीयता ख़त्म थी . देश  का रिज़र्व सोना जहाज में लादकर विदेश ले  जाया  गया था और गिरवी रखा जा चुका था . पी वी नरसिम्हाराव के वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह पूंजीवादी आर्थिक चिंतन के खेमे के बड़े नाम थे .उन्होंने देश को आर्थिक विकास की ऐसी डगर पर डाल दिया जहां से हमारी अर्थव्यवस्था पर कोई भी कहीं से  भी हमला बोल सकता था . जब पी वी नरसिम्हाराव की सरकार ने मुक्त बाज़ार की अर्थव्यवस्था की बात शुरू की थी तो सही आर्थिक सोच वाले लोगों ने चेतावनी दी थी कि ऐसा करने से देश दुनिया भर के पैसे वालों के रहमो करम पर निर्भर हो  जाएगा और मध्य वर्ग को हर तरफ से पिसना पडेगा. सच्ची बात यह है कि जब बाज़ार पर आधारित अर्थव्यवस्था के विकास की योजना बना कर देश का आर्थिक विकास किया जा रहा हो तो कीमतों के बढ़ने पर सरकारी दखल की बात असंभव होती है.. एक तरह से पूंजीपति वर्ग की कृपा पर देश की जनता को छोड़ दिया गया है . अब उनकी जो भी इच्छा होगी उसे करने के लिए वे स्वतंत्र हैं .

इसे देश का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि शहरी मध्यवर्ग के लिए हर चीज़ महंगी है लेकिन इसे पैदा करने वाले किसान को उसकी वाजिब कीमत नहीं मिल रही है . आज 24 %  नेगेटिव  जी डी पी की अर्थव्यवस्था में  खेती ही वह क्षेत्र हैं जहां जी डी पी की पाजिटिव ग्रोथ हुयी है . लेकिन सरकार खेती वालों के बारे में कुछ भी करने को तैयार  नहीं है . किसानों के कल्याण के लिए हरित क्रान्ति जैसी किसी क्रांतिकारी राजनीतिक और नीतिगत हस्तक्षेप की ज़रूरत है . सप्लाई चेन को भी सही किया जाना सरकारी  एजेंडा होना चाहिए . आज हालत यह है कि किसान से जो कुछ भी सरकार खरीद रही है उसका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है .. किसान को उसकी लागत नहीं मिल रही है और शहर का उपभोक्ता कई गुना ज्यादा कीमत दे रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि बिचौलिया मज़े ले रहा है . किसान और शहरी मध्यवर्ग की मेहनत का एक बाद हिस्सा वह हड़प रहा है.और यह बिचौलिया गल्लामंडी में बैठा कोई आढ़ती नहीं है . वह बड़ा पूंजीपति भी हो सकता है और किसी भी बड़े नेता का व्यापारिक पार्टनर भी .


महंगाई की  मुसीबत को समझने के लिए हमें इतिहास में थोडा पीछे जाकर आजादी की लड़ाई के तुरंत  बाद की स्थिति पर नज़र  डालनी चाहिए . क्योंकि इसकी बुनियाद  हमारे राजनेताओं ने उसी वक़्त डाल दी थी जब उन्होंने आज़ादी के बाद महात्मा गाँधी की सलाह को नज़र अंदाज़ कर दिया था. गाँधी जी ने ग्राम स्वराज्य में लिखा है कि  स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था . आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने कहा कि आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिससे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया जा सके.. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्म निर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें . उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते ,तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता ...


लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी . देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब ढाई साल बाद सरदार पटेल चले गए.. उस वक़्त के देश के  प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू एक ऐसे नेता थे जो महात्मा गांधी की हर बात मानते थे लेकिन आर्थिक नीति के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर वे चूक  गए . गांधी जी की बात को नज़रंदाज़ कर गए .उन्होंने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी और महात्मा गाँधी के बुनियादी सिद्धांत को ही छोड़ दिया..यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट मानने का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और आज ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन है जब 1991  में पी वी नरसिंह राव की सरकार आई तो आर्थिक और औद्योगिक विकास पूरी तरह से पूंजीवादी अर्थशास्त्र की समझ पर आधारित हो गया . बाद की सरकारें उसी सोच को आगे बढाती रहीं और आज तो हालात यह हैं कि अगर दुनिया के संपन्न देशों में बैंक फेल होते हैं तो अपने देश में भी लोग तबाह होते हैं . तथाकथित खुली अर्थव्यवस्था और वैश्वीकरण के चक्कर में हमने अपने मुल्क को ऐसे मुकाम पर ला कर खड़ा कर दिया है जब हमारी राजनीतिक स्थिरता भी दुनिया के ताक़तवर पूंजीवादी देशों की मर्जी पर हो गयी है .

 देश में आर्थिक मुसीबत की एक दूसरी  समस्या है कि पिछले 40 वर्षों में राजनीति  ऐसे लोगों का ठिकाना हो चुकी है जो आमतौर पर राजनीति को एक व्यवसाय के रूप में अपनाते हैं .पहले  ऐसा नहीं था. आज़ादी की लड़ाई में   बड़े पैमाने पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल लोग राजनीति में शामिल हुए थे . १९२० से १९४२ तक भारतीय राजनीति में जो लोग शामिल हुए वे अपने क्षेत्र के बहुत ही सफल लोग थे .राजनीति में वे कुछ लाभ लेने के लिए नहीं आये थे  ,अपना सब कुछ कुर्बान  करके अपने देश की आर्थिकराजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को लोकशाही के हवाले करने का उनका जज्बा  उनको राजनीति में लाया था. बाद के समय में भी राजनीति में वे लोग सक्रिय थे जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल रह चुके थे और देश के हित में कुर्बानियां देकर आये थे . लेकिन जवाहरलाल नेहरू के जाने के  बाद जब से राजनीतिक नेताओं का नैतिक अधिकार कमज़ोर पड़ा तो राजनीति में ऐसे लोग आने लगे जिनको चापलूस कहा जा सकता है . इसी दौर में राजनीति में ‘ इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा ‘ का जयकारा लगाने वाले भी राजनीति के शिखर पर पंहुचे . वे राजनीतिक जमातें भी राजनीति में सम्मान की उम्मीद करने लगीं जिनके राजनीतिक पूर्वज या तो अंग्रेजों के साथ थे और या आज़ादी की लड़ाई में तमाशबीन की तरह शामिल हुए थे . उनको मान्यता मिली भी क्योंकि १९४७ के पहले राजनीतिक संघर्ष का जीवन जीने वाले नेता धीरे धीरे समाप्त हो रहे थे . आज दिल्ली में अगर नज़र दौडाई जाए तो साफ़ नज़र आ जाएगा कि राजनीति में ऐसे लोगों का बोलबाला है जो  राजनीति को एक पेशे के रूप में अपनाकर सत्ता के गलियारों में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं देश के उज्जवल भविष्य से उनका कोई लेना देना नहीं  है वे वर्तमान में जीने के शौक़ीन हैं और वर्तमान को राजाओं की तरह जी रहे हैं .

.यह लोग राजनीति को व्यापार समझते हैं और उसमें लाभ हानि के लिए किसी से भी समझौता कर लेते हैं . एक और बात समझ लेने की है कि दोनों ही बड़ी पार्टियों की अर्थनीति वही है डॉ मनमोहन सिंह को बेशक बीजेपी वाले दिन रात कोसते रहते  हैं लेकिन आर्थिक नीतियाँ उनकी ही लागू हो  रही है .राजनीति में सत्तर के दशक में ऐसे लोगों का आना बड़े पैमाने पर शुरू हुआ जो राजनीति को व्यापार समझते थे. यही वर्ग १९८० में सत्ता में आ गया और जब मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को विश्वबाजार के सामने पेश किया तो इस वर्ग के बहुत सारे नेता भाग्यविधाता बन  चुके थे. उन्हीं भाग्यविधाताओं ने आज देश  का यह हाल किया है और अपनी तरह के लोगों को ही राजनीति में  शामिल होने के लिए  प्रोत्साहित किया है .पिछले २० वर्षों की भारत की राजनीति ने यह साफ़ कर दिया है कि जब तक देशप्रेमी और आर्थिक भ्रष्टाचार के धुर विरोधी राजनीतिक पदों पर नहीं पंहुचते ,देश का कोई भला नहीं होने वाला है . इसी शून्य को भरने की कोशिश आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने की थी और जनता  ने उनको सर आँखों पर बिठाया लेकिन उद्योगपतियों की सभा में उन्होंने भी साफ़ कह दिया है कि वे पूंजीवादी राजनीति के समर्थक हैं . यानी उन्होंने भी ऐलान कर दिया कि अन्य पार्टियों की तरह वे भी चाकर पूंजी के लिए काम करेगें और कर रहे हैं .उसी तरह से देश का भला करेगें  जैसा बाकी सत्ताधारी पार्टियों ने किया है . केवल महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक प्रमुखता  के दौर में देश के आम आदमी के हित की राजनीति हुई है बाकी तो चाकर पूंजी की सेवा ही चल रही है .

 

आज हमारी अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर पंहुच चुकी है उसको अगर डॉ  धर्मवीर भारती के शब्दों को उधार लेकर कहें तो ‘बंद गली के आख़िरी मकान ‘ पर पंहुच गयी है . यहाँ से कैसे मुक्ति  मिलेगी और आम आदमी की खुशहाली कब अर्थव्यवस्था की बुनियाद बनेगी , मौजूदा हालात में कुछ  नहीं कहा  जा सकता है . कोरोना  के कारण आई अनिश्चितता के बाद जन  मुसीबत के घने बादल छंटेंगे ,तब तस्वीर साफ़ होगी .

राज्यसभा के उपसभापति पद का चुनाव : बिहार के दो समाजवादियों के बीच मुकाबला


शेष नारायण सिंह

 

राज्यसभा के उपसभापति पद के चुनाव के लिए तलवारें खिंच गयी हैं .पूर्व उपसभापति हरिवंश को एन डी ए ने फिर अपना उम्मीदवार बना दिया है . आम तौर माना जा रहा है कि एन डी ए के स्पष्ट बहुमत के मद्देनज़र उनकी जीत  निश्चित है लेकिन विपक्ष ने बीजेपी को वाकओवर न देने के इरादे से  विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार आगे लाने का  फैसला किया है  .खबर है कि लालू प्रसाद यादव की पार्टी के नेता और दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्वान प्रोफेसर  डॉ मनोज  झा को विपक्ष का साझा उमीदवार बनाया जाएगा . अगर  डॉ मनोज झा मैदान में उतरे तो 14 सितम्बर को मतदान होगा और मामला फरिया जाएगा.

 सदन के नेता थावरचंद  गहलौत  और नरेश गुजराल के साथ जाकर हरिवंश ने अपना पर्चा भर दिया  है  . उनके  प्रस्तावकों में  लोक जनशक्ति पार्टी के  सांसद राम विलास पासवान भी हैं जबकि उनके   पुत्र और पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान बिहार में जे डी ( यू ) से नाराज़ हैं और आगामी विधानसभा चुनावों में जे डी ( यू ) के खिलाफ जाकर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं .

245 सदस्यों के सदन में बीजेपी के 87 सदस्य हैं  जबकि एन डी ए के  सदस्यों की संख्या 113 है .245 सदस्यों के सदन में जीत के लिए एन डी ए को 123 वोट चाहिए .एन डी ए कि नेताओं को उम्मीद है कि वे आराम से 140 सदस्यों का समर्थन हासिल कर लेंगें .इस  ज़मीनी  सच्चाई की रोशनी में  बीजेपी को मालूम  है कि उसके उम्मीदवार को विपक्ष शिकस्त देने की सोच ही नहीं रहा है .विपक्ष डॉ मनोज झा को आगे करके कुछ ऐसी पार्टियों को साथ लेने की कोशिश कर रहा है जो औपचारिक रूप से एन डी ए के सदस्य नहीं है लेकिन हर मौके पर वोट बीजेपी के पक्ष में ही देते हैं . विपक्ष के निशाने पर बीजू जनता दल वाई एस आर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियां हैं  . कांग्रेस के एक  नेता ने बताया कि बीजू जनता दल के नौ राज्यसभा सदस्य हैं .अगर उनको  अपने साथ लिया  जा सका तो मुकाबला बहुत ही दिलचस्प हो जाएगा  लेकिन इन पार्टियों का अब तक जो इतिहास है उसपर नज़र डालने से तस्वीर साफ़ हो जायेगी . हालांकि यह सभी पार्टियां  लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार उतारती हैं लेकिन जब किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद में वोट देने की बात आती है तो यह सब बीजेपी के  पक्ष में वोट करती हैं .

 ऐसे माहौल में लगता है कि विपक्ष के उम्मीदवार डॉ मनोज झा  को भी नतीजे मालूम है . वे विद्वान हैं , अच्छे वक्ता  हैं , टीवी की  बहसों में अपना निश्चित स्थान बना चुके  हैं लेकिन उनका हाल भी वही हो सकता है जो  1974 के राष्ट्रपति पद के चुनाव में आर एस पी के नेता त्रिदिब कुमार  चौधरी का हुआ था .  त्रिदिब  दा बहुत ही गंभीर  सांसद थे , विद्वान थे, कलकत्ता विश्वविद्यालय के बहुत   ही कुशाग्रबुद्धि  छात्र रह चुके थे . वे मधु लिमये, इन्द्रजीत गुप्ता, ज्योतिर्मय बसु, अटल बिहारी वाजपेयी, पीलू मोदी , जार्ज फर्नांडीज़ जैसे दिग्गजों के उम्मीदवार थे . लेकिन सच्चाई यह थी कि कांग्रेस के पास लोकसभा और  बहुत सारी विधानसभाओं में हाहाकार बहुमत था . उन दौर  में कांग्रेस में भी बहुत ही ऊंचे स्तर के नेताओं का जमावड़ा था . विपक्ष में भी बहुत बड़े लोग थे . सत्ता पक्ष और विपक्ष ,दोनों तरफ आज़ादी की लड़ाई में शामिल नेताओं का प्रभाव था. लेकिन संख्या बल कांग्रेस के पक्ष में और  त्रिदिब कुमार चौधरी की हार निश्चित थी लेकिन उन्होंने विपक्षी  एकता के नाम पर बलि का बकरा  बनना स्वीकार कर लिया था .नतीजा वही हुआ जो होना था. विपक्ष की एकता बनी लेकिन जीत सत्तापक्ष के उम्मीदवार फखरुद्दीन अली अहमद की ही  हुई.

 

 इस बात में तो राय  नहीं है कि आज के राजनेताओं के लिहाज से मनोज झा का स्तर बहुत ऊंचा है . वे एक गंभीर शोधकर्ता के रूप में  भी जाने जाते  हैं. राजनीतिक अर्थशास्त्र , सामाजिक आन्दोलन, साम्प्रदायिक सम्बन्ध और तनाव जैसे विषयों के वे अधिकारी विद्वान हैं . उनका मुकाबला जे डी ( यू )  के  नेता हरिवंश से है .  जो एक मूर्धन्य पत्रकार होने के साथ साथ एक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी भी हैं .सही बात यह है कि इन दोनों ही नेताओं का जन्म  राजनीति में जाने के लिए नहीं हुआ था . पत्रकार के रूप में हरिवंश  तो जीवन  भर पार्टियों के  नेताओं की नुक्ताचीनी करते रहे  हैं. दोनों समाजवादी हैं . मनोज झा लालू प्रसाद यादव के विश्वास भाजन हैं तो किसी ज़माने में हरिवंश भी लालू जी की नज़र में बहुत ही  आदरणीय  पत्रकार के रूप में  जाने जाते थे . उनका जन्म उसी  गाँव में हुआ था जहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण का  जन्म हुआ था .यह सिताब दियारा गंगा और घाघरा के बीच टापू के शक्ल  में है

 

उन्होंने वाराणसी के  उदयप्रताप कॉलेज से  इंटर पास किया उसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय अर्थशास्त्र में एम ए किया और वहीं से पत्रकारिता में भी पढ़ाई की .बीएचयू में जब पढ़ाई के दौरान ही जेपी  आंदोलन शुरू हो गया था उसमें शामिल हो गये और इमरजेंसी लगने पर  भूमिगत हो गए . पोस्टर चिपकानेबांटने का काम भी किया. जेपी आंदोलन के दौरान छात्र राजनीति का असरपढ़नेलिखने की ऐसी आदत लगी कि उसी से प्रेरित व प्रभावित होकर पत्रकारिता में जाने का मन बना लिया .पत्रकारिता के अपने करीब चार दशक तक सक्रिय रहे .उन्होंने जयप्रकाश नारायण के अलावा गणेश  मंत्री धर्मवीर भारती जैसे पत्रकारों के साथ काम किया टाइम्स आफ इंडिया समूह में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में चुने गए और हिंदी पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उप-संपादक के रूप में 1977 में काम शुरू किया बाद में हिंदी पत्रिका ‘रविवार’ में सहायक संपादक रहे 1989 में रांची से प्रकाशित अखबार ‘प्रभात खबर’ में गए और वहीं रहते हुए पत्रकारिता के बहुत सारे प्रतिमान स्थापित किये

हरिवंश ने 2014 में राजनीति में दाखिला लिया और जनता दल यू की ओर से बिहार से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए . बाद में राज्यसभा के उपसभापति बन गए .पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की नज़र में हरिवंश के बेहतरीन पत्रकार थे . हालांकि उनको यह इमकान बिलकुल नहीं था कि एक दिन वे भी राजनीति की उसी मंजिल की तलाश में चल पड़ेंगें जिसके शिखर पर  चन्द्र शेखर विराजते थे .चंद्रशेखर जी के बारे में उन्होंने कई किताबें भी लिखी  हैं.

चीन की सीमा पर हालात गंभीर हैं लेकिन विदेशनीति के कुशल प्रबंधन से समस्या का हल निकल सकता है.


शेष नारायण सिंह

 

लदाख में भारत और चीन के विवाद बढ़ने के संकेत साफ़ नज़र आने लगे  हैं .  विदेशमंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि एल ए सी के पास हालात बहुत ही गंभीर हैं .इसके हल के लिए बहुत ही गहरी राजनीतिक समझ के साथ बीतचीत की ज़रूरत है .  पिछले हफ्ते भारतीय  सैनिकों ने चीन की सेना की कुछ टुकड़ियों की आगे बढ़ने की कोशिश को नाकाम कर दिया था .केवल इतना ही नहीं पेंगांग झील के  दक्षिण में कुछ चोटियों पर क़ब्ज़ा भी कर लिया था . बताया गया था कि यह चोटियाँ सामरिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वहां मौजूद भारतीय सैनिक   घाटी में चीनी सेना की गतिविधियों पर नज़र  रख सकते हैं . लेकिन इसके बाद तो चीन में बौखलाहट का आलम देखा  जा रहा है . चीन के सरकारी  अखबार ग्लोबल टाइम्स में छपे एक लेख में चीन ने भारत को चेतावनी  ही दे डाली है . अखबार लिखता है कि भारत ने सीमा  पर जो  व्यवहार किया है वह चीन को मंज़ूर नहीं है . चीन को इस बात पर एतराज़ है कि भारत में जनमत चीन के इरादों पर बार बार सवाल  उठा रहा है . चीन का कहना है कि भारत ने जो किया है वह दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का उन्ल्लंघन है . भारत का जवाब चीन को देना पडेगा जिससे सीमा पैर हालात को स्थिर किया जा सके .

 चीन के धमकी भरे बयानों के बावजूद भारत राजनयिक दायरे में रहकर ही बात करना चाहता है  . विदेश मंत्री एस जयशंकर ने  इंडियन  एक्सप्रेस अखबार  के एक कार्यक्रम में बताया कि पिछले तीस वर्षों के भारत चीन संबंधों पर अगर गौर किया जाय तो सीमा पर आम तौर पर  शान्ति रही है . थोड़ी बहुत समस्याएं भी रही हैं लेकिन मुख्य रूप से शान्ति ही रही है . जिसके कारण अन्य संबंधों में भी विकास हुआ  है. विदेशमंत्री का इशारा साफ़ तौर पर भारत और चीन के बीच  व्यापार को लेकर था. पिछले तीस  वर्षों में भारत में चीन के  औद्योगिक उत्पादों की भारी खपत हुई है . चीनी कंपनियों को बहुत बड़े बड़े ठेके मिले हैं .  इस सब में चीन को खूब लाभ हुआ है . चीन की अर्थव्यवस्था आज विश्व में  अमरीका के बाद सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है . यह सफलता चीन इसलिए हासिल कर सका क्योंकि भारत के साथ उसके शान्ति के सम्बन्ध थे . विदेशमंत्री ने स्पष्ट  कहा कि ‘ सीमा पर शान्ति रखना ज़रूरी है .अगर शान्ति नहीं रहेगी तो अन्य  सम्बन्ध भी सही नहीं रहेंगे ‘ .भारत में पब्लिक की राय यह बन रही है कि अगर चीन ने सीमा पर अपनी विस्तारवादी नीतियों को जारी रखा को भारत को उसको मिल रहे अवसरों पर लगाम लगानी पड़ेगी . यह नहीं हो सकता  कि आप सीमा पर हमारे सैनिकों को मारते पीटते रहें . थोडा थोडा करके हमारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते रहें और हम आपके देश की आर्थिक प्रगति में योगदान करते रहें .

चीन को इस मानसिकता से  बाहर आना पडेगा . विदेशमंत्री एस जयशंकर ने बताया कि 1993 से अब तक चीन के साथ  सीमा प्रबंधन के बारे में कई समझौते हुए  हैं. जिनके अनुसार यह तय कर दिया गया है कि  एल ए सी पर दोनों ही देश कम से  कम सैनिक तैनात करेंगें  . दोनों देशों के बीच हुए समझौतों में सैनिकों के आचरण और उनके अनुशासन के बारे में भी बाकायदा नियम तय कर दिए गए हैं . लेकिन मई के बाद से चीन इन समझौतों की परवाह नहीं कर रहा  है .जिसके चलते हालात गंभीर  हैं और विदेशमंत्री ने दावा किया कि  स्थिति को ढर्रे पर  लाने के लिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक स्तर पर बहुत ही गंभीर बातचीत होनी चाहिए . मास्को में इसी हफ्ते होने वाली शंघाई सहयोग संगठन ( एस सी ओ ) की बैठक में जब  विदेश मंत्री चीन के मंत्री से मिलेंगे तो इसी बुनियाद के आधार पर बातचीत होने की संभावना है .विदेशमंत्री ने साफ़ कहा कि व्यावहारिकता का तकाज़ा है कि चीन के साथ विवाद को घटाने के लिए बातचीत की जाय

लेकिन इस बीच चीन का रुख गैरजिम्मेदाराना  है .ग्लोबल  टाइम्स में लिखा है कि,” हम भारत को गंभीर चेतवानी देते हैं.  आपने  रेखा पार की है . आपकी सेना ने रेखा पार की है .आपकी राष्ट्रवादी पब्लिक ओपिनियन ने रेखा पार की है आपकी चीन नीति ने रेखा पार की है .आप अति आत्मविश्वास के कारण पी एल ए ( चीनी सेना ) और चीनी अवाम को चुनौती  दे रहे हैं .”

चीन की यह भाषा किसी भी स्वाभिमानी देश को स्वीकार नहीं  होगी लेकिन लगता  है कि यह चीनी विदेशनीति के प्रबंधकों ने अपनी जनता को संबोधित किया है . विदेशमंत्री के रुख से लगता है कि जब दोनों देशों के मंत्री मास्को में आमने सामने होंगे तो भावनात्मक मुद्दों पर बात नहीं होगी बल्कि गंभीर कूटनीतिक भाषा और शैली में बात की जायेगी .चीन का यह भी आरोप है कि अपनी पब्लिक ओपिनियन को  भारत टीवी समाचारों के ज़रिये चीन के लोगों के खिलाफ भड़काता रहता है . राष्ट्रवाद  की जो धारा टीवी समाचारों में बहती  रहती है उससे दोनों देशों का नुक्सान होता है . ग्लोबल टाइम्स के लेख में सवाल किया  गया है कि पेंगांग झील के पास  किसी चोटी पर अगर  क़ब्ज़ा कर लिया  गया है तो इसका आधुनिक सैनिक संघर्ष में क्या फायदा होगा . उसका दावा है कि चीन के पास भारत से ज्यादा मारक हथियार हैं . अगर समझौतों के बाहर का रास्ता अख्तियार किया गया तो स्थिति बिगड़ जायेगी . चीन ने  भारत की राष्ट्रवादी ताक़तों को संबोधित करते हुए कहा है कि अगर भारत और चीन की सेनायें समझौतों से हटकर कोई काम करेंगीं तो नतीजे ठीक  नहीं होंगे.

चीन की बहुत सारी कम्पनियां भारत में काम कर रही हैं .  पब्लिक ओपिनियन के दबाव में उनके करीब तीन सौ एप्प बंद कर दिए  गए हैं . ज़ाहिर है कि चीन को इससे आर्थिक घाटा हो रहा है इसलिए उसके निशाने पर राष्ट्रवादी जनमत के दबाव को हवा देने वाले टीवी न्यूज़ चैनल हैं. लेकिन भारत को भी यह सोचना पडेगा कि अगर दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति बनती है तो सबका नुक्सान होगा .इसलिए विदेशनीति का प्रबंधन विदेशमंत्रालय और सरकार को ही करना चाहिए . समाचार संगठनों को दोनों देशों के बीच के तनाव को बढ़ाने की स्थिति पैदा करने से बचना चाहिए .

Saturday, September 5, 2020

सुलतानपुर जिले के सबसे पुराने प्राइमरी स्कूल में मैंने पढ़ाई की


शेष नारायण सिंह

सुल्तानपुर जिले के पूर्व में शहर से करीब २० किलोमीटर पर गोमती के किनारे के गाँव नरेन्द्रपुर में मेरा पहला स्कूल है . प्राथमिक पाठशाला है . यह जिले के तीन चार प्राचीनतम प्राइमरी स्कूलों में एक है . ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दिनों में भारत के ग्रामीण इलाकों में कहीं कोई सरकारी स्कूल नहीं था .स्कूल आदि तो मुगलों ने भी नहीं खुलवाये थे . जो भी स्कूल थे उस समय के समाज सुधारकों या राजाओं नवाबों ने खुलवाये थे . लेकिन हमारे जिले में कहीं कुछ नहीं था . महाराष्ट्र में पेशवा की राजधानी पुणे में तो महात्मा ज्योतिराव फुले ने 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खुलवा दिया था . वे मनीषी थे , दूरद्रष्टा थे .भविष्य देख सकते थे. ऐसे ही स्कूल देश के अन्य भागों में भी थे . हमारा जिला उस मामले में भाग्यशाली नहीं था. मुग़ल साम्राज्य के अवध सूबे का हिस्सा रहा और यहाँ के जितने भी नवाब थे सभी ऐशोआराम और रियाया से लूट खसोट की ज़िंदगी जीते थे . इसलिए जब 1857 में कम्पनी के राज का विरोध हुआ तो जनता ने नवाबों का साथ नहीं दिया . लकिन कंपनी का साथ भी नहीं दिया .जहां संभव हुआ विरोध ही किया . इसलिए जब 1857 में कंपनी के भारतीय सैनिकों और ज़मींदारों ने अवध की हुकूमत पर क़ब्ज़ा करने के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के फैसले के खिलाफ हथियार उठाया तो जनता आम तौर पर ‘ कोऊ नृप होई हमैं का हानी ‘ की मानसिकता में ही थी . बहरहाल 1857 के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने ईस्ट इण्डिया कंपनी को बेदखल करके भारत को अपने डायरेक्ट कब्जे में ले लिया और भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बना .उसके साथ ही भारत में कम्पनी का राज खत्म हुआ .अंग्रेजों ने अपना राज स्थापित करने के सिलसिले में ही भारत में स्कूलों की स्थापना शुरू की थी . ध्यान यह रखा गया कि जहां ब्रिटिश हुकूमत के वफादार लोग थे उन स्थानों को प्राथमिकता दी गयी . वे स्थान ख़ास माने गए जहां 1857 की बगावत के दौरान कुछ ऐसे लोग थे जिन्होंने अंगेरजी सेना से वफादारी की थी. जिन ज़मींदारों और ताल्लुकेदारों अंग्रेजों के विरोध में झंडा उठाया था उनको और उनके साथियों को पेड़ों से लटका दिया गया था . अपने वफादार लोगों को बाग़ी ज़मींदारों की रियासतें और ज़मीन्दारियां बख्श दी गईं थीं . बताते हैं कि नरेंद्रपुर गाँव के एक ठाकुर साहब अंग्रेज़ी फौज में मुलाजिम थे . उन्होंने विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की बहुत सेवा की थी . उनको कोई ज़मींदारी तो नहीं दी गयी लेकिन उनके गाँव में एक सरकारी स्कूल खुलवा दिया और जिले के कई गांवों में उनको ज़मीन आदि भी दे दी गयी . ब्रिटिश साम्राज्य के उसी फैसले का नतीजा है कि नरेंद्रपुर में एक प्राइमरी स्कूल खुलवा दिया गया . सरकारी रिकार्ड के मुताबिक़ यह स्कूल 1885 में खुला था.उन दिनों इस स्कूल में चहारुम ( चौथी क्लास ) तक की पढ़ाई होती थी.चहारुम के बाद हमारे बाबा सुल्तानपुर के माडल स्कूल में मिडिल की पढ़ाई करने गए थे . उनके चचेरे छोटे भाई ठाकुर टुनकी सिंह भी सुल्तानपुर ही मिडिल पढने गए थे . उनके दो और सहपाठी साथ गए थे. ठाकुर राम अवध सिंह और काली सहाय सिंह .यह लोग घर से सारा राशन ,लकड़ी आदि लेकर जाते थे . वहीं सुल्तानपुर में खाना बनता था . केवल मसाला और नमक वहां शहर में खरीदा जाता था . वहां से आकर महीने के आखिर में खर्च का हिसाब देना होता था . एक बार खर्च का हिसाब सही नहीं बैठ रहा था . तो इन लोगों ने लिख दिया कि दो आने का नमक खरीद लिया था . दो आने का नमक यानी दस सेर नमक . राम अवध सिंह के पिताजी हिसाब देख रहे थे . फिरंट हो गए कि इतना नमक क्यों खा रहे हो हो तुम लोग ? खूब डांट पड़ी . वास्तव में हुआ यह था कि यह लोग घर से हुक्का चिलम तो ले गए थे लेकिन उस बार तमाखू ले जाना भूल गए थे . दो आने का तमाखू खरीद लिया गया था.काफी सख्त चेतवानी मिली और तमाखू न पीने की हिदायत के साथ अगले महीने का खर्च मंज़ूर हुआ विषयांतर हो गया .बहरहाल यह सारी विभूतियाँ नरेन्द्रपुर के इसी स्कूल के पूर्व छात्र के रूप में पहचानी जाती थीं . इसी स्कूल में मेरे बाबू ,बाबा , उनके बाबा यानी सभी लोग पढ़ाई करने जाते थे . इसी स्कूल में हमारे गाँव के चन्द्रमणि तिवारी भी पढ़ने गए थे . वे मेरे बाबू के हम उम्र पं राम नवाज तेवारी के छोटे भाई थे .मेरे बाबू के दोस्त और मेरे गाँव के बहादुर इंसान ठाकुर राम किशोर सिंह भी इसी स्कूल में पढने गए थे . राम किशोर सिंह से करीब आठ साल छोटे पंडित चंद्रमणि ने उनसे एक बार कह दिया कि भइया जब आप चहारुम ( चौथी जमात ) में रहे होंगे तब मैंने नरेन्द्रपुर जाना शुरू किया था .राम किशोर सिंह ने बेसाख्ता जवाब दिया कि ,” अह्या डपोरै, हम ग्यारह साल नरेंदापुर में पढ़े , अव्वल ( दर्जा एक ) पास ही नहीं हुए तो ,चहारुम कब पंहुच गए “ बाद में उन्होंने बताया कि वे मास्टर आद्या सिंह के बहुत प्रिय शिष्य थे . उनकी घोडी को खिलाते थे, उसका खरहरा करते थे , उनका हुक्का भरते थे और इन्हीं कामों में लगे रहते थे . जब ग्यारह साल की पढ़ाई के बाद उनकी शादी हो गयी तब स्कूल छोड़कर घर गिरस्ती में लग गए.आजकल मेरे चचेरे भाई रमेश कुमार सिंह इस स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं .

इसी स्कूल में १९५७ में मैं पहली बार पढने गया था . उम्र छः साल की हो गयी थी लेकिन मेरी आजा ( मेरे पिता जी की फुआ ) स्कूल नहीं जाने देना चाहती थीं. उनकी नज़र में मैं बहुत छोटा था और नारा पार कर के नरेन्द्रपुर स्कूल जाने में खतरा बहुत था .( मेरे गाँव और नरेन्द्रपुर के बीच में एक नाला है जो बरसात में उफना जाता है ) . मुझसे उम्र में दो चार महीने बड़े रघुराज और बद्दू सिंह स्कूल नहीं जाते थे . उन दिनों दूसरी जमात में पढने वाले मेरे ही गाँव के नन्हकऊ सिंह मुझे चुप्पे से स्कूल ले गए . गाँव से करीब दो किलोमीटर दूर है यह स्कूल . मैं खेलने के लिए निकला था और नन्हकऊ सिंह मुझे स्कूल लेकर चले गए . बाद में पता चला कि सभी लड़कों को कम से कम एक नया विद्यार्थी लाने का टारगेट दिया गया था . उन्होंने मुझे ही ले जाने का फैसला किया . मेरी मां और बहिन बाद में बताती थीं जब मैं घर के आसपास नहीं मिला तो हेरवा पड़ गया . हर कुआं इनार ढूँढा गया , तारा इनारा झाँका गया . आखिर में परिवार के क़रीबी लोगों को आसपास के गाँवों में भेजा गया .बाकी लोग तो थक हार कर लौट आये . क्योंकि मैं किसी और गाँव में था ही नहीं . मेरी तलाश में मेरे बाबू के दोस्त ठाकुर बब्बन सिंह भी गए थे . उन्होंने मुझे स्कूल में देखा लेकिन पकड़ा नहीं . तब तक मेरा नाम लिखा जा चुका था. मेरे गाँव के स्व. बब्बन सिंह शिक्षा के पक्षधर थे . उन्होंने घर आकर बता दिया कि पढने गए हैं , खेलि कूदि के चले आयेंगें किहू का परेशान होई क ज़रूरत नायं बा.

लेकिन आजा कहाँ मानने वाली थीं . वे घर की बेटी थीं . बुज़ुर्ग थीं . सरुवार में ब्याही गयी थीं लेकिन उनके पति की मृत्यु हो गयी थी . उसके बाद वे अपने घर चली आईं . उनके बाबू काका सब जिंदा थे . उनको वापस नहीं भेजा . नैहर में ही रहीं शान से ज़िंदगी बिताई . 1953 में जब उनके बाबू ( यानी मेरे बाबू के बाबा ) की मृत्यु हो गयीं तो वे ही अपने भतीजे यानी मेरे पिताजी की गार्जियन थीं . जब मेरे नरेन्र्बपुर में पाए जाने की खबर मिली तो घर से दूध, दही , खाने के लिए और कुछ सामान लेकर मेरी आजा और मेरी बहिन स्कूल गए और वहीं पास में एक पेड़ के नीचे बैठे रहे . जब स्कूल में छुट्टी हुई तो वहीं बैठकर खिलाया और साथ लेकर घर आयीं . बाद में तो खैर मैं नन्हकऊ सिंह के साथ रोज़ ही स्कूल जाने लगा. यह सब यादें बहुत धुंधली हैं . इनको मेरे लेक्चरर होने के बाद जब मेरी पहली जमात के शिक्षक पंडित कामता प्रसाद दुबे ने बताया तो बाइस्कोप नज़र के सामने घूम गया था. कभी कभी सोचता हूँ कि अगर नन्हकऊ सिंह हमको स्कूल न ले गए होते तो मैं भी शायद आठ नौ साल की उम्र में बद्दू और रघुराज के साथ ही भेजा गया होता . जब यह लोग स्कूल गए तो मैं तीसरी जमात में था. आज सोचता हूँ कि अगर ठाकुर बब्बन सिंह हमको ढूँढने न गए होते तो शायद मेरी पढ़ाई वहीं रुक जाती . वे प्रगतिशील विचारों के थे. मेरे बाबू के घनिष्ठ मित्र पुदई सिंह , राम कलप सिंह और परमेस्सर पाण्डेय भी मुझे ढूँढने सितम्बर के उस दिन निकले थे .यह लोग अन्य गाँवों में गए थे . इनमें से कोई भी अगर मुझको पकड़ पाते तो लाकर आजा के सामने हाज़िर कर देते .शायद तब पढ़ाई दूसरे तरीके की हुयी होती . अपनी उम्र का अपने गाँव का मैं अपनी क्लास में अकेला विद्यार्थी था. राजमुनि सिंह भी मेरी क्लास में थे लेकिन वे मुझे दो-तीन साल बड़े थे . उनसे दोस्ती कभी नहीं हुयी.इस प्रकार से अपना पहला शिक्षक ठाकुर नन्हकऊ सिंह को ही मानता हूँ . और पहला गार्जियन स्व ठाकुर बब्बन सिंह को मानता हँे और उनको ही प्रणाम करता हूँ .
उसी प्राइमरी स्कूल में स्व पंडित कामता प्रसाद दुबे एक अलावा मेरे शिक्षक थे श्री राज बहदुर गुप्ता, श्री वीरेन्द्र सिंह , श्री राममणि पाण्डेय और श्री अवध नारायाण सिंह भी थे. इन लोगों की ओई ऐसी यादें नहीं हैं जिनका उल्लेख किया जा सके . बाद में लम्भुआ जाने पर मिडिल स्कूल में शिक्षकों स्व केश नारायण सिंह , नन्द किशोर सिंह , राम अवध पाण्डेय ,हाई स्कूल के शिक्षकों , हरिश्चन्द्र शुक्ल ,माताप्रसाद पाण्डेय , क्षमानाथ पाण्डेय , शिव बरन मिश्र , मान बहादुर सिंह ,कमला प्रसाद शुक्ल की यादें हैं.

बाद में तो जौनपुर चला गया . इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान सही अर्थों में आज के पब्लिक स्कूलों जैसा माहौल मिला और बाद की ज़िंदगी में काम आने वाले संस्कार मिले.वहीं पर डॉ अरुण कुमार सिंह से मिला जिनके कारण विश्वदृष्टि में नए आयाम जुड़े.
आज शिक्षक दिवस पर अपने सारे शिक्षकों को सादर नमन .

मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल----सन्दर्भ :सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु



शेष नारायण सिंह

अपराधों के राष्ट्रीय रिकार्ड ब्यूरो ( एन सी आर बी ) के ताज़ा आंकड़े आ गए हैं .2019 में देश में 140,000 लोगों ने आत्महत्या की थी . इनमें से एक तिहाई लोगों ने पारिवारिक समस्याओं के दबाव में यह क़दम उठाया. करीब 23 प्रतिशत लोगों ने बीमारी या नशाखोरी के कारण आत्महत्या की .आठ प्रतिशत लोगों ने गरीबी, क़र्ज़, बेरोज़गारी और दिवालियापन से परेशान होकर अपनी जान ले ली. आत्महत्या करने वालों में दक्षिणी राज्यों के लोग सबसे ज़्यादा थे . इनमें आधे से ज़्यादा संख्या महाराष्ट्र ,तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक के थे . उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे कम आत्महत्याएं होती हैं . खेती किसानी के काम में लगे लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में भारी कमी आई है . दुर्घटना और आत्महत्या के आंकड़ों केअनुसार 2016 में करीब 11 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने की मृत्यु हुई थी जबकि 2019 में यह संख्या 10 से थोडा ज्यादा रह गयी है . इस तरह 2019 में आत्महत्या से मरने वालों की संख्या में 10 प्रतिशत की कमी आयी है . आत्महत्या वास्तव में सभ्यता , मानवीय जिजीविषा , सामाजिक समरसता की हार है . अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या करने का फैसला करता है तो उसके लिए वह खुद तो ज़िम्मेदार है ही ,उसका परिवार ,उसके यार दोस्त ,उसके आसपास के लोग और समाज भी कम ज़िम्मेदार नहीं है .

आत्महत्या के कारणों पर दुनिया भर में बात होती रहती है . आम तौर पर वे लोग ही आत्महत्या करते हैं जिनको अपना जीवन बेमतलब लगने लगता है . काल्पनिक या वास्तविक दुःख को बहुत बड़ा बनाकर आंकना ,अपनों से निराशा मिलना , अपनों की उम्मीदों पर खरा न उतरने का डर ,अपनी महत्वाकांक्षा को हासिल न कर सकने का भय ,प्यार में धोखा , आर्थिक तंगी आदि कुछ बातें हैं जिनके कारण लोग आत्महत्या करते हैं . कुछ आत्महत्याएं बीमारी के कारण भी होती हैं . अवसाद के मरीजों में यह प्रवृत्ति ज्यादा पाई जाती है . अवसाद के मरीजों के रिश्तेदारों को चाहिए कि अपने प्रिय जन को यह विश्वास दिलाते रहें कि उनका जीवन महत्वपूर्ण है उसकी समाज को आवश्यकता है .

पिछले दिनों मुंबई में एक फिल्म अभिनेता की मृत्यु के बाद उसकी आत्महत्या या हत्या राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई है . अभिनेता नौजवान था, कुछ सफल फिल्मों में काम कर चुका था , भविष्य में भी उससे सिनेमा उद्योग और दर्शकों को उम्मीदें थीं . मुंबई के उपनगर बांद्रा के उसके घर में एक दिन उसका शव फांसी पर लटकता हुआ मिला . पुलिस ने उसको आत्महत्या मानकर जांच करना शुरू कर दिया . बड़े अभिनेता की मृत्यु का मामला था इसलिए मीडिया में भी खबर आयी . टीवी चैनल भी सक्रिय हो गए .उसी बीच कुछ टीवी चैनलों ने उनकी मृत्यु को अपना कारोबार बढाने के लिए इस्तेमाल करने का फैसला कर लिया . सुबह शाम वही खबर, दिन भर वही खबर , उसी पर बहस , उसी का विश्लेषण यानी टीवी पत्रकारिता के जितने भी पक्ष हैं सब उसी पर केन्द्रित हो गए. अपने देश में सिनेमा से जुड़े लोगों के बारे में बड़ी आबादी में उत्सुकता रहती है . जबसे सिनेमा शुरू हुआ है तब से ही फ़िल्मी चटखारेदार ख़बरें महत्व पाती रही हैं . फ़िल्मी गपबाजी को केंद्र में रख कर कई पत्रिकाएँ भी निकाली गयीं और बहुत बड़ा कारोबार खड़ा कर लिया .ज़ाहिर है फ़िल्मी लोगों के निजी जीवन को चटखारे लेकर सुनाना एक बड़ा कारोबार है . टीवी पत्रकारिता के कुछ स्वनामधन्य संपादकों ने मुंबई के फ़िल्मी अभिनेता स्व सुशांत सिंह राजपूत के जीवन और उनकी मृत्यु से जुडी खबरों को जिस मुकाम पर लाकर छोड़ दिया है ,वह पत्रकारिता तो किसी तरह से नहीं कही जा सकती . देश तरह तरह के संकट से जूझ रहा है . कोरोना की महामारी पूरी दुनिया को चपेट में लिए हुए है . उसके कारण दुनिया भर में आर्थिक मंदी है , लोगों की नौकारियाँ जा रही हैं . अपनी अर्थव्यवस्था भारी संकट के भंवर में है. शहरों में लोग भीख मांगने के लिए अभिशप्त हैं . शहरों से भागकर गावों में गए लोगों को सरकारी वायदों के बावजूद कहीं कोई काम नहीं मिल रहा है . लदाख में चीन की कारस्तानी राष्ट्रीय चिंता का विषय बनी हुई है . इन सारे विषयों पर देश की जनता को सही खबर और विश्लेषण पंहुचाना मीडिया का कर्तव्य है लेकिन यह सब पीछे चला गया है . सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की खबरों को कई टीवी चैनलों ने स्थाई खबर बना दिया है .पत्रकारिता से जुड़े लोगों के लिए यह चिंता की बात है .

बिहार के एक संपन्न परिवार का बेटा , मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में अपनी क़िस्मत आजमाने के उद्देश्य से गया था .उच्च शिक्षा प्राप्त इस नवयुवक के सामने रोजी रोटी के बहुत सारे अवसर थे लेकिन उसने फिल्म का रास्ता चुना और उसें सफलता भी पाई . किन्हीं कारणों से उनकी मृत्यु हो गयी .शव लटका हुआ मिला था अकाल मृत्यु की घटना पुलिस की जांच का विषय होती है . मुंबई की पुलिस ने जांच शुरू की लेकिन बाद में पता चला कि पुलिस ने कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफ आई आर )दर्ज किये बिना ही जांच शुरू कर दिया था . यह बहुत ही गैरजिम्मेदार काम है . एफ आई आर दर्ज किये बिना जांच का कोई मतलब नहीं है . मुंबई पुलिस ने एक इन्क्वेस्ट लिखकर जांच शुरू कर दिया था . इन्क्वेस्ट का शब्दकोशी मतलब भी “अप्रत्याशित मृत्यु के कारणों की जाँच “ ही है लेकिन मुक़दमा चलाने के लिए तो एफ आई आर ज़रूरी होता है . मुंबई पुलिस की जांच पर शक तब शुरू हुआ जब उसने उन लोगों को पकड़ पकड़ कर पूछताछ शुरू कर दिया जिन्होंने कभी सुशांत सिंह राजपूत को फिल्म में काम करने का वायदा किया था लेकिन बाद में मुकर गए थे . यह भी जांच शुरू हो गयी कि मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में परिवारवाद बहुत ज़यादा है . साधारण व्यक्ति को भी लगने लगा कि जांच को भटकाया जा रहा है . परिवार को लगा कि मुंबई पुलिस जांच को सही दिशा में नहीं ले जा रही है . सुशांत के एक जीजा बहुत बड़े पुलिस अधिकारी हैं , एक अन्य जीजा बहुत ही बड़े वकील हैं . जाहिर है बिना एफ आई आर की जाँच का हश्र उन लोगों को मालूम था . परिवार ने स्व सुशांत के राज्य बिहार की राजधानी पटना में एक एफ आई आर दर्ज करवा दिया . उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस की जांच सही दिशा में नहीं जा रही है इसलिए उनको पटना में एफ आई आर लिखवाना पड़ा .इस बीच यह भी चर्चा शुरू हो गयी कि महाराष्ट्र के एक राजनीतिक परिवार का भी उनकी मृत्यु से कुछ लेना देना हो सकता है .अब तक पूरे देश के कल्याण का ठेका ले चुके कुछ टीवी चैनल मैदान ले चुके थे .उनको एक विलेन की ज़रूरत थी तो उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत के साथ कुछ महीनों तक लिव-इन के रूप में रह चुकी एक अभिनेत्री को विलेन बनाया और मीडिया ट्रायल शुरू हो गया . मुंबई के राजनीतिक परिवार की मिलीभगत के मद्देनज़र उस परिवार की पार्टी के विरोधी राजनेता भी आग में घी डालने लगे .बात बहुत आगे तक बढ़ गयी और सुशांत की दोस्त अभिनेत्री की मौजूदगी के कारण स्त्री विरोधी मानसिकता वाले कुंठित लोगों को रोज़ की खुराक मिलने लगी. इस बीच सुशांत सिंह के पिताजी ने पुलिस को बताया कि उनके बेटे से उस की लिव-इन दोस्त ने करीब पन्द्रह करोड़ रूपये ठग लिए हैं. सुशांत सिंह के बैंक खातों में इस रक़म का कोई उल्लेख नहीं था . ज़ाहिर है यह धन नम्बर दो का रहा होगा. सीधा सीधा कालेधन का केस बनता है . लिहाजा ई डी ( प्रवर्तन निदेशालय ) ने भी जांच शुरू कर दी. कहीं से पता चला कि कुछ नशीली दवाओं का भी इस्तेमाल हुआ था . यह नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का विषय है , वह भी जांच में जुट गए . विपक्ष ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि बिहार के इसी साल होने वाले चुनावों के मद्दे नज़र बिहार के लोगों की सहानुभूति बटोरने के चक्कर में केंद्र सरकार ने सभी एजेंसियों को लगा रखा है . महाराष्ट्र में इस समय जिस पार्टी की सरकार है उसपर आरोप है कि उसने केंद्र सरकार में राज करने वाली पार्टी को धोखा दिया है .आरोप लगने लगे कि सरकार से बदला लेने के लिए केंद्र सरकार ने अभियान चला रखा है और एक हत्या या आत्महत्या के मामले को राजनीतिक कारणों से अपने वफादार टीवी चनैलों की मार्फ़त हवा दी जा रही है .

इस सारी प्रक्रिया में अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती और उसके परिवार वालों को ठेकदार टाइप चैनलों ने सूली पर चढाने का पूरा बंदोबस्त कर रखा था . नेटवर्क 18 के चैनलों ने संतुलित खबर देने का फैसला ले रखा था तो इस पूरे प्रकरण के दौरान उनकी टी आर पी गिर रही थी . ज़ाहिर है देश की जनता चटखारेदार खबरों को पसंद कर रही थी . लेकिन इस बीच ठेकेदार चैनल की योजना में एक बड़ा खलल पैदा हो गया . एक प्रतिद्वंदी चैनल ने विलेन के रूप में स्थापित की जा चुकी रिया चक्रवर्ती का पौने दो घंटे का इंटरव्यू प्रसारित कर दिया . उस इंटरव्यू में अभिनेत्री ने कुछ ऐसे सवाल पूछे जिनका जवाब जांच एजेंसियों को अपनी जांच आगे बढाने के लिए ज़रूरी होगा .मसलन उसने पूछा कि सुशांत की मृत्यु के छः दिन पहले उसने उनका घर छोड़ दिया था . जो लोग उन छः दिनों तक उसके साथ रहे उनसे सवाल क्यों नहीं पूछे जा रहे हैं . उसने परिवार के लोगों के व्यवहार पर बहुत सारे सवाल उछाल दिए . उसको विलेन बनाकर जांच के पहले ही उसको अपराधी साबित करने वाली बिरादरी के हाथ से तोते उड़ गए . परिवार के लिए भी मुश्किल पैदा हो गयी क्योंकि रिया चक्रवर्ती के सुशांत का घर छोड़ने के बाद उनकी एक बहन उनके साथ उनकी देखभाल करने के लिए रही थी . शिकारी टीवी चैनलों और परिवार वालों ने माहौल बना रखा था कि रिया के कारण की सुशांत को अवसाद की बीमारी हुयी थी लेकिन एक अन्य बड़े अखबार ने उनकी बहनों का वह बयान छाप दिया जिससे पता चलता है कि परिवार को मालूम था कि सुशांत को अवसाद ( डिप्रेशन ) 2013 से ही था और वे बाकायदा दवा ले रहे थे .यह सारी जानकारी अब सी बी आई के पास है . उम्मीद की जानी चाहिए कि न्याय होगा , सही और निष्पक्ष जांच होगी और किसी के लाभ के लिए किसी निर्दोष को सूली पर नहीं चढ़ा दिया जाएगा

Tuesday, September 1, 2020

बाबा आजमी की फिल्म “ मी रक्सम “ का पैगाम है ,” रक्स करना है तो पाँव की जंजीर न देख .”


                                                                       

 

 

शेष नारायण सिंह 

 

 

  बीसवीं सदी की कुछ  बेहतरीन फ़िल्में कैफ़ी आजमी के नाम से पहचानी जाती हैं .हीर रांझा में चेतन आनंद ने सारे संवाद  कविता में पेश करना चाहा और कैफ़ी ने उसे लिखा. राजकुमार हीरो थे ..भारत-चीन युद्ध की फिल्म ‘ हकीकत ‘  भी कैफ़ी की फिल्म है और ‘ गरम हवा ‘  भी . कागज़  के फूल , मंथन, कोहरा, सात हिन्दुस्तानी, बावर्ची  , पाकीज़ा ,हँसते ज़ख्म ,अर्थ ,रज़िया सुलतान जैसी फिल्मों को भी कैफ़ी ने अमर कर दिया .उनकी बड़ी  इच्छा थी कि आज़मगढ़ जिले के उनके गाँव मिजवां को केंद्र में रखकर कोई  फिल्म बनाई जाए  लेकिन किसी ने नहीं बनाया . आज उनके जाने के अट्ठारह साल बाद उनके बेटे बाबा आजमी ने मिजवां में  रहकर एक  फिल्म बनायी  है. फिल्म का नाम है  “ मी  रक्सम  “ .  करीब डेढ़  घंटे की यह फिल्म देखने के बाद लगता  है कि  कैफ़ी आजमी ऐसी ही फिल्म बनवाना चाहते  रहे होंगें .  फिल्म की कहानी का स्थाई भाव है अपनी बेटी के सपने साकार करने में मदद करता एक गरीब आदमी . उसकी बेटी भरतनाट्यम सीखना चाहती है . दरजी का काम करने वाले गरीब बाप ने गाँव में ही नृत्य सिखाने वाली एक महिला के स्कूल में लडकी का दाखिला करवा दिया . कठमुल्ले आ गए और विरोध शुरू हो गया . उनका एतराज इस बात पर था कि  मुसलमान के घर में पैदा हुई बेटी भरतनाट्यम कैसे सीख सकती है . उसमें तो हिन्दू धर्म के बहुत  सारे प्रतीक इस्तेमाल होते हैं .वैसे भी मुस्लिम समाज में नृत्य सीखना सही नहीं माना जाता . मुस्लिम समाज के ठेकेदार मैदान ले  लेते हैं और संगीत सीखने  वाली लडकी , मरियम के परिवार का बहिष्कार शुरू  हो   जाता है . एक संवाद नश्तर की तरह चुभ जाता है . मरियम अपने  अब्बू से पूछती है कि ,’ अब्बू ईद आने वाली है लेकिन आपके पास कोई काम नहीं है .’ ईद के दिन नए कपड़ों का रिवाज़ है. दूसरा संवाद जो इस फिल्म का बैनर बन सकता है उसमें गरीब दरजी  जब चौतरफा घिर जाने के बाद भी अपनी  बिटिया को  भरतनाट्यम   स्कूल भेजना बंद नहीं करता और मौलवी साहब  बाहुबली के साथ उसके घर आकर धमकाते हैं  कि नृत्य करना इस्लाम के खिलाफ है . तो दरजी का  जवाब काबिले गौर है . वह  कहते हैं कि ,”  हमारा इस्लाम इतना कमज़ोर नहीं है कि एक  लडकी के डांस करने से उसका नुक्सान हो जाय “ . दूसरी तरफ   भारतनाट्यम स्कूल का संरक्षक भी है जो दावा करता है कि भारतनाट्यम जैसे “ हिन्दू “ नृत्य को एक मुस्लिम लडकी को सिखाकर इस्लाम पर हिन्दू धर्म की जीत संकेत दे  रहा   है.  वह यह नहीं चाहता कि मरियम  फिल्म के अंत में होने वाले    नृत्य के मुकाबले में  विजयी हो .अडंगा  डालने की कोशिश में संगीत ही चुप्पे से बंद करवा देता है लेकिन उसी की बेटी अपने मोबाइल फोन से एक सूफी गाने के ज़रिये  नृत्य के संगीत का  इंतज़ाम कर देती है और मरियम जीत का सेहरा अपने सर कर लेती है .यही कैफ़ी आज़मी की असली सोच है .  अपने अंदर की ताकत से आगे बढ़ती लडकियां ,उनको समर्थन देते हुए उनके अपने परिवार के लोग , धर्म का बंधन तोड़ते हुए प्रगतिशील  लोगों की एकता  ,कैफ़ी की  ज़िंदगी का मिशन रहा है . अपने गाँव मिजवां में उन्होंने तालीम के रास्ते लड़कियों की  तरक्की का आन्दोलन शुरू  किया था , यह फिल्म उसी मुहिम की एक कड़ी की के रूप में देखा जा सकता  है . कैफ़ी के बच्चों के अलावा फिल्म में नसीरुदीन शाह ने मुफ्त में काम किया है . दरजी के  रोल में दानिश हुसैन ने बहुत ही  अच्छा काम  किया  है .

फिल्म को देखते हुए कैफ़ी आजमी की कालजयी नज़्म “ औरत “ की बार बार याद आती रही . चालीस के  दशक में आजादी के पहले लिखी गयी इस नज़्म में जब वे कहते  हैं कि, “ उठ मिरी  जान ,मेरे साथ ही चलना है  तुझे “ तो लगता है कि नौजवान कैफ़ी आजमी अपनी भावी ज़िन्दगी के एजेंडे का ऐलान कर रहे  हैं ..मेरे  दोस्त  स्व खुर्शीद अनवर ने एक बार लिखा था कि कैफ़ी ने  "उठ मिरी जान  मिरे साथ ही चलना है तुझे " कह कर लगाम अपने  हाथ में ले ली थी.  आज के सन्दर्भ में उनकी बात बिकुल सही है . सवाल उठता है कि भाई आप के साथ क्यों चलना  है . औरत खुद ही चली जायेगी लेकिन जब यह नज़्म चालीस के दशक में लिखी गयी तो उस वक़्त की क्रांतिकारी नज्मों में से एक थी. अगर कोई समाज  औरत को मर्द के बराबर का दर्ज़ा देता  था तो वह भी  बहुत बड़ी बात थी .

कैफ़ी  बहुत ही संवेदनशील इंसान थे , बचपन से ही .. कैफ़ी बहुत बड़े शायर थे . अपने भाई की ग़ज़ल को पूरा करने के लिए उन्होंने शायद १२ साल की उम्र में जो ग़ज़ल कही वह अमर हो गयी. बाद में उसी ग़ज़ल को बेग़म अख्तर ने आवाज़ दी और " इतना तो ज़िंदगी में किसी की ख़लल पड़े , हंसाने से हो सुकून न रोने से कल पड़े ."  अपने  अब्बा के घर में हुए एक मुशायरे में अपने बड़े भाई की सिफारिश से अतहर हुसैन रिज़वी ने यह ग़ज़ल पढी थी. जब इनके भाई ने लोगों को बताया कि ग़ज़ल अतहर  मियाँ की ही है , तो लोगों  ने सोचा कि छोटे भाई का दिल रखने के लिए बड़े भाई ने अपनी ग़ज़ल छोटे भाई से पढ़वा दी है . लेकिन बाद में लोगों को  लगा कि नहीं  बात सच थी क्योंकि यही अतहर मियाँ  आगे चलकर कैफ़ी आज़मी बनने वाले थे .

 

कैफ़ी आजमी इस मामले में बहुत भाग्यशाली रहे कि उन्हें दोस्त हमेशा ही अच्छे  मिले.  मुंबई में इप्टा के दिनों में उनके दोस्तों  में जो लोग शामिल थे वे बाद में बहुत बड़े  और नामी कलाकार के रूप में जाने गए . इप्टा में ही  होमी भाभा, क्रिशन चंदर ,मजरूह सुल्तानपुरी , साहिर लुधियानवी ,बलराज साहनी ,मोहन सहगल, मुल्क राज आनंद, रोमेश थापर, शैलेन्द्र ,प्रेम धवन ,इस्मत चुगताई, .ए के हंगल, हेमंत कुमार , अदी मर्जबान,सलिल चौधरी जैसे कलाकारों के साथ उन्होंने काम किया . प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन  के संस्थापक , सज्जाद ज़हीर  के ड्राइंग रूम में मुंबई में उनकी शादी हुई थी. उनकी जीवन साथी , शौकत कैफ़ी ने उन्हें इसलिए पसंद किया था कि कैफ़ी आज़मी बहुत बड़े शायर थे . १९४६ में भी शौकत कैफ़ी के तेवर इन्क़लाबी थे और अपनी माँ की मर्जी के खिलाफ अपने प्रगतिशील पिता के साथ औरंगाबाद से मुंबई आकर उन्होंने कैफ़ी से शादी कर ली थी. शादी के बाद  शौकत और कैफ़ी ने बड़े पापड़ बेले . मुंबई में  रोटी का  जुगाड़ भी मुश्किल से हो रहा था . आजमगढ़ के अपने गाँव , मिजवां चले गए जहां एक बेटा पैदा हुआ,शबाना आज़मी का बड़ा भाई . एक साल का भी नहीं  हो पाया था कि उसकी मौत हो गयी . फिर लखनऊ चले गए . शुरुआत में भी लखनऊ रह चुके थे, दीनी तालीम के लिए  गए थे लेकिन इंसाफ़ की लड़ाई शुरू कर दी और मदरसे से निकाल दिए गए थे. लखनऊ में ही कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर के रूप में रहने का इरादा था लेकिन 1950 की शुरुआत के दिनों में ही उनकी उनकी पत्नी शौकत कैफ़ी गर्भवती हो  गयीं . पार्टी ने फरमान सुना दिया कि एबार्शन कराओ  , कैफ़ी अंडरग्राउंड थे  और पार्टी को लगता था कि  बच्चे का खर्च कहाँ से आएगा.  शौकत कैफ़ी अपनी माँ के  पास हैदराबाद चली गयीं. वहीं शबाना आज़मी का जन्म हुआ. उस वक़्त की मुफलिसी के दौर में इस्मत चुगताई और उनके पति शाहिद लतीफ़ ने एक हज़ार रूपये भिजवाये थे . यह खैरात नहीं थी , फिल्म निर्माण के काम में लगे शाहिद  लतीफ़ ने अपनी फिल्म में कैफ़ी  के लिखे दो गीत इस्तेमाल किये थे .लेकिन शौकत कैफ़ी अब तक उस बात का ज़िक्र करती रहती हैं . अगर कम्युनिस्ट पार्टी के हुक्म को मान लिया गया होता तो देश को शबाना आज़मी  जैसी अभिनेत्री न मिलती लेकिन  विधाता तो वज्र के हाथों भविष्यत लिखता है ,उसने लिखा और  इसी सितम्बर  में शबाना आज़मी 70 साल की हो रही हैं .शबाना के जन्म के बाद फिर मुंबई की राह ली और वहीं सामूहिक कम्यून में  ज़िंदगी की  नए सिरे से शुरुआत हुई.

 

मुंबई आकर शौकत कैफ़ी ने तो  बाकायदा पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर में नौकरी कर ली और इस तरह से परिवार को हर माह एक नियमित आमदनी का ज़रिया बना .कैफ़ी आजमी अपने बच्चों  से बेपनाह प्यार करते थे . जब कभी ऐसा होता था कि शौकत आपा पृथ्वी थियेटर के अपने काम के  सिलसिले में शहर से बाहर चली जाती थीं तो शबाना और बाबा आजमी को लेकर वे मुशायरों में भी जाते थे . मंच पर जहां शायर बैठे  होते थे उसी के  पीछे  दोनों बच्चे बैठे रहते थे ..जीरो आमदनी वाले कम्युनिस्ट पार्टी के होल टाइमर कैफ़ी आजमी को जब पता लगा  कि उनकी बेटी अपने स्कूल से खुश नहीं थी और वह किसी दूसरे स्कूल में जाना चाहती थी जिसकी फीस तीस रूपये माहवार थी , तो कैफ़ी आजमी ने उसे उसी स्कूल में भेज दिया . बाद में अतिरिक्त  काम करके अपनी बेटी के लिए 30 रूपये महीने का इंतज़ाम किया 

एक बार  शबाना आजमी की किसी फिल्म को  प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह ( Cannes Film Festival ) में दिखाया जाना था .शबाना बड़ी एक्ट्रेस थीं . मीडिया का ध्यान उन पर हमेशा रहता था . समारोह के लिए उनको कान जाना था . इस बीच उनको  पता लगा कि मुंबई के एक गरीब  इलाके के लोगों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही हैं तो शबाना आज़मी ने कान जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया और झोपड़ियां बचाने के लिए  भूख हड़ताल पर बैठ गयीं. भयानक गर्मी और ज़मीन पर बैठ कर हड़ताल करती शबाना आज़मी का बी पी बढ़ गया. बीमार हो गयीं .सारे रिश्तेदार परेशान हो गए . कैफ़ी आजमी ,शहर से कहीं बाहर गए हुए थे .लोगों ने सोचा कि उनसे  कहा जाए तो वे शायद इस जिद्दी लड़की को समझा दें. उनके अब्बा , कैफ़ी आजमी बहुत बड़े शायर थे ,अपनी बेटी  शबाना के सबसे अच्छे दोस्त भी  थे. लोगों की अपील पर शबाना के नाम  उनका टेलीग्राम आया . लिखा था," बेस्ट ऑफ़ लक कॉमरेड." शबाना की बुलंदी में उनके प्रगतिशील पिता की सोच का बहुत ज्यादा योगदान है .

बाबा आजमी की फिल्म ,” मी  रक्सम “ के हर फ्रेम में स्त्री के  प्रति  कैफ़ी आजमी की इसी सोच को देखा जा सकता है . हालांकि फिल्म के आखिर में “ दम अली अली ,“  और   ” है आज सफीना बीच भंवर में “ वाले गाने  के साथ भरतनाट्यम करवा के  धार्मिक एकता का सन्देश भी देने की  कोशिश की गयी है लेकिन उसकी कोई ज़रूरत नहीं  थी. फिल्म  कैफ़ी आजमी की मुक़म्मल सोच का आइना  है .

डॉ राही मासूम रज़ा ने फ़रमाया ," आत्महत्या सभ्यता की हार है “


शेष नारायण सिंह


1975 में जब इमरजेंसी लगी तो बहुत लोगों को सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि क्या हो गया .. देश का समझदार तबका भौंचक था . इसी वर्ग में साकिन गंगौली, जिला ग़ाज़ीपुर ,हाल मुकाम बांद्रा ,मुंबई के डॉ राही मासूम रजा भी थे. राही इने उसके पहले कई उपन्यास लिखे थे और भी बहुत कुछ लिखा था लेकिन इमरजेंसी की ज्यादतियों को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास ,” कटरा बी आर्ज़ू “ हिंदी साहित्य की समकालीन इतिहास की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी अमर कृति है .उसी उपन्यास में डॉ राही मासूम रज़ा लिखते हैं :-

”उजाला दूर - दूर कहीं नहीं था । गंदे बदबूदार कुहरे की एक मोटी तह जैसे हर चीज पर जम गई थी । कोई चीज साफ नहीं दिखाई दे रही थी । विधानसभा, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट । गांधी जी की समाधि, मौलाना आजाद की कब्र , तिलक और गोखले के स्टैच्यू यूनिवर्सिटियां , प्रेस...... गरज कि हर चीज पर अंधेरे की एक मोटी तह जमी हुई थी......... यह अंधेरा अजीब था मगर । आम तौर से किसी को दिखाई ही नहीं दे रहा था । बहुत - से बुद्धजीवी भी इसे न देख पाए । ख़्वाजा अहमद अब्बास , अली सरदार जाफ़री , डा एस ए डांगे, राजेश्वर राव , हिरेन मुखर्जी , डाक्टर नूरुल हसन , कृश्नचंद्र , कमलेश्वर , चित्रकार हुसैन ........... हज़ारों नाम हैं । इन लोगों ने अंधेरे को उजाला कहा और उसका स्वागत किया । यह सिर जो अंग्रेज़ के सामने नहीं झुके थे, रास्ते - भर सज्दा करते हुए नंबर - 1 सफ़दरजंग तक जा पहुंचे और जिन सिरों ने झुकने से और जिन ज़बानों ने क़सीदा पढ़ने से इनकार किया वह............ बहुत बुरी गुज़री उन पर । हमारा देश जिसके बारे में जहाँगीर ने कहा था कि जन्नत यही है, एक खंडहर बन गया, जिस पर कूड़े की तरह कटे हुए सिर और कटी हुई ज़बानों का ढेर लग गया और इस ढेर पर एक कुकुरमुत्ता उगा जिसका नाम संजय गांधी था ।..........यह ज़माना है वी सी शुक्ल ,ओम मेहता, और बंसीलाल जैसे लोगों के उरूज़ का .यह ज़माना है बाबू जगजीवन राम ,बहुगुणा , चौहाण ( वाई बी चह्वाण) जैसे लोगों के चुप रह जाने का .यह ज़माना है चंद्रशेखर,मोहन धारिया जैसे लोगों के सच बोलने की सज़ा भुगतने का .” (कटरा बी आर्जू पृष्ठ - - 153 ).
राही मासूम रज़ा कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे इसलिए उन्होंने अपने कामरेडों । ख़्वाजा अहमद अब्बास , अली सरदार जाफ़री , डा एस ए डांगे, राजेश्वर राव , हिरेन मुखर्जी , डाक्टर नूरुल हसन के प्रति नरमी का रवैया अपनाया है . और लिख दिया है कि यह लोग वक़्त को भांप नहीं पाए जबकि सच यह है कि इन लोगों का योगदान इमरजेंसी के लागू होने और चलाने में वी सी शुक्ल, बंसीलाल आदि से कम नहीं था .

बहरहाल इमरजेंसी के आतंक को जिस दर्द के साथ कटरा बी आर्ज़ू में डॉ राही मासूम रज़ा ने रेखांकित किया है वह एक नश्तर की तरह आज भी चुभ जाता है . उन्होंने हिंदी में एक से एक उपन्यास लिखे , आधा गाँव, हिम्मत जौनपुरी,टोपी शुक्ला , कटरा बी आर्ज़ू ,ओस की एक बूँद, दिल एक सादा कागज़ आदि . हिंदी-उर्दू का महाकाव्य , “अठारह सौ सत्तावन “ भी उनके नाम है . उनके अपने जिले गाजीपुर के रत्न, परमवीर अब्दुल हमीद की जीवनी ‘ छोटे आदमी की बड़ी कहानी ‘ भी उनके उल्लेखनीय शाहकार हैं लेकिन देश की एक बहुत बड़ी आबादी उनको आज से करीब बत्तीस साल पहले आये टीवी धारावाहिक महाभारत के संवाद लेखक के रूप में याद करती है . उस सीरियल में जिस तरह से भाषा के कारण चरित्रों को लगभग वास्तविक बना दिया गया है वह राही माजूम रज़ा की कलम से ही संभव था .
उन्हीं डॉ राही मासूम रज़ा का आज ( 1 सितंबर) जन्मदिन है . डॉ राही मासूम रज़ा का साहित्य पढने का अवसर मुझे 1974 में मिला . हुआ यह था कि उसी साल जोधपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आंचलिक उपन्यास के अध्ययन के कोर्स में डॉ राही मासूम रज़ा का ' आधा गाँव ' लगा दिया गया . बड़ा हो हल्ला हुआ . छात्रों के एक गुट ने आसमान सर पर उठा लिया और किताब को हटवाने के लिए आन्दोलन करने लगे . उपन्यास में कुछ ऐसी बातें लिखी थीं जिनको गाली देने के लिए प्रयोग किया जाता है .कुछ लोगों ने किताब हटवाने के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया . डॉ नामवर सिंह वहां हिंदी के विभागाध्यक्ष थे . जोधपुर वालों का आन्दोलन दिल्ली विश्वविद्यालय में भी शुरू हो गया . डॉ नामवर सिंह ने जोधपुर विश्वविद्यालय की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.. इसी विवाद के बाद मैंने ‘आधा गाँव खरीद कर पढ़ा . उसके बाद तो लगभग हर वह चीज़ पढ़ी जिसपर लेखक के रूप में डॉ राही मासूम रज़ा का नाम दर्ज है . हर किताब अपने आप में बेजोड़ है . .
उनका उपन्यास दिल एक सादा कागज़ एक ऐसा ग्रन्थ है जो बार बार हार जाने के बाद भी जिंदा रहने की जिद की कहानी है , समझौतों की कहानी है . आज़ादी के पहले और उसके बाद के नकलीपन को रेखांकित करने की कहानी है . सिस्टम का हिस्सा बनकर जिंदा रहने की कोशिश की कहानी है . इसी उपन्यास से पता लगता है कि केवल शिक्षा की पूंजी लेकर ,दिमाग की पूंजी लेकर चल रहे लोगों को समझौते करने पड़ते हैं . इस उपन्यास का मुख्य पात्र ,रफ्फन है . राही लिखते हैं ," रफ्फन उस पल इस नतीजे पर पंहुचा कि जन्नत ( उसकी बीवी ) दुनिया की सबसे ज़्यादा खूबसूरत औरत है और उसी पल वह अपनी जन्नत और जन्नत बाजी को अलग-अलग करके देखने में पहली बार सफल भी हुआ .और उसने अपने आपको बेच देने के जुर्म पर अपने आपको क्षमा कर दिया "
अलीगढ़ से एम ए करने के बाद ही उनको वहां नौकरी मिल गयी थी लेकिन हालात ऐसे बने कि कुछ अरसा बाद उनको वहां से से निकाल दिया गया था . अलीगढ की कठमुल्ला सोच वाली बिरादरी ने उनके ऊपर इश्क करने का संगीन जुर्म साबित कर दिया था .अलीगढ से नौकरी से निकाले जाने के बाद उनके साथ खड़ा होने को कोई भी तैयार नहीं था ,तब राजकमल प्रकाशन की मालकिन और स्वनामधन्य बुद्धिजीवी , स्व.शीला संधू ने उनको मानसिक सहारा दिया था . यह उपन्यास राही ने उनको ही समर्पित किया है. समर्पण करते हुए लिखते हैं ,


" शीला जी ,आपने मुझे एक ख़त में लिखा है : " फिल्मों में ज्यादा मत फंसियेगा.यह भूल भुलैया है .इसमें लोग खो जाते हैं .......आशा है ,आप खैरियत से होंगे."

मैं खैरियत से नहीं हूँ

' दिल एल सादा कागज़ मेरी जीवनी भी हो सकता था .पर यह मेरी जीवनी नहीं है . इसके पन्नों में उदासी-सी जो कोई चीज़ है ,उसे स्वीकार कीजिये . इसलिए स्वीकार कीजिये कि मेरी नई ज़िंदगी की दस्तावेज़ पर पहला दस्तखत आप ही का है .

सात साल के बाद आपको वह दोपहर याद दिलवा रहा हूँ जिसमें मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था . मैं नय्यर के साथ बिलकुल अकेला था और तब आपने कहा था : " फ़िक्र क्यों करते हो . मैं तुम लोगों के साथ हूँ ."उसी बेदर्द और बेमुरव्वत दोपहर की याद में यह उपन्यास आपकी नज़र है .

राही मासूम रजा
१५-९-७३”
अपने उपन्यास ‘टोपी शुक्ला ‘ की भूमिका में वे लिखते हैं ,’ मुझे यह उपन्यास लिखकर कोई ख़ास खुशी नहीं हुई क्योंकि आत्महत्या सभ्यता की हार है . परन्तु टोपी के सामने कोई और रास्ता नहीं था. यह टोपी मैं भी हूँ और मेरे जैसे बहुत से लोग भी हैं . हम लोगों में और टोपी में केवल एक अंतर है .हम कहीं न कहीं ,किसी न किसी अवसर पर कम्प्रोमाइज़ करते हैं . और इसीलिये हम लोग जी रहे हैं . टोपी कोई देवता या पैगम्बर नहीं था किंतु उसने कम्प्रोमाइज़ नहीं किया .और इसीलिये आत्महत्या कर ली. .परन्तु आधा गाँव के तरह ही यह किसी एक आदमी या कई कई आदमियों की कहानी नहीं है ..यह कहानी भी समय की है . इस कहानी का हीरो भी समय है . समय के सिवा कोई इस लायक नहीं होता कि उसे किसी कहानी का हीरो बनाया जाय. .
आधा गाँव में बेशुमार गालियाँ थीं . मौलाना ‘टोपी शुक्ला ‘ में एक भी गाली नहीं है .परन्तु शायद यह पूरा एक गंदी गाली है .और यह गाली मैं डंके की चोट बक रहा हूँ . यह उपन्यास अश्लील है जीवन की तरह ‘”
सच को सच कह देने की बेमिसाल क्षमता थी राही की शख्सियत में .अपने उन्पन्यासों मंू जिन नामों का ज़िक्र वे करते थे वे सब वास्तव में होते थे ,. काल्पनिक नामों का प्रयोग उन्होंने बहुत कम किया है . हालांकि वे लगभग हर किताब में कानून के मदेनजर ऐलान करते हैं कि ,’इसके पात्र झूठे हैं, जगहों के नाम गलत हैं . घटनाएँ गढ़ी हुई हैं . पारन्तु यह झूठ बोलने पर मैं शर्मिंदा नहीं हूँ “

डॉ राही मासूम रज़ा ने महाभारत सीरियल को ज़बान दी थी और उसके लिए उनको बहुत लोग याद करते हैं . लेकिन मैं उनको इसलिए याद करता हूँ कि उस आदमी के दिल में मुहब्बत का स्थाई पता था, वे अपने गाँव गंगौली से बहुत मुहब्बत करते थे, वे गाजीपुर के दीवाने थे और वहां बहने वाली नदी गंगा को अपनी मां मानते थे . अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को भी वे अपनी मां मानते थे . अलीगढ़ को वे शहरे तमन्ना कहते थे .अपने उसी शहरे तमन्ना को उन्होंने इस नज़्म में याद किया है . .
कुछ उस शहरे-तमन्ना की कहो
ओस की बूंद से क्या करती है अब सुबह सुलूक
वह मेरे साथ के सब तश्ना दहां कैसे हैं
उड़ती-पड़ती ये सुनी थी कि परेशान हैं लोग
अपने ख्वाबों से परेशान हैं लोग
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जिस गली ने मुझे सिखलाए थे आदाबे-जुनूं
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं
शहरे रुसवाई में चलती हैं हवायें कैसी
इन दिनों मश्गलए-जुल्फे परीशां क्या है
साख कैसी है जुनूं वालों की
कीमते चाके गरीबां क्या है
****
कौन आया है मियां खां की जगह
चाय में कौन मिलाता है मुहब्बत का नमक
सुबह के बाल में कंघी करने
कौन आता है वहां
सुबह होती है कहां
शाम कहां ढ़लती है
शोबए-उर्दू में अब किसकी ग़ज़ल चलती है
****
चांद तो अब भी निकलता होगा
मार्च की चांदनी अब लेती है किन लोगों के नाम
किनके सर लगता है अब इश्क का संगीन इल्जाम
सुबह है किनके बगल की जीनत
किनके पहलू में है शाम
किन पे जीना है हराम
जो भी हों वह
तो हैं मेरे ही कबीले वाले
उस तरफ हो जो गुजर
उनसे ये कहना
कि मैंने उन्हें भेजा है सलाम
बाद के दिनों में मुसलमानों के प्रति नफ़रत जब एक कारोबार की शक्ल ले चुका तो राही मासूम रज़ा को बहुत तकलीफ हुयी थी . उनको इस बात पर बहुत फख्र होता था कि उनकी रगों में गंगा का पानी भी खून में मिलाकर बहता था . अपनी गंगा के बारे में उनका दर्द देखिए:
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
मेरे उस कमरे को लूटो
जिस में मेरी बयाज़ें जाग रही हैं
और मैं जिस में तुलसी की रामायण से सरगोशी कर के
कालिदास के मेघदूत से ये कहता हूँ
मेरा भी एक सन्देशा है
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो।
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है,
मेरे लहु से चुल्लु भर कर
महादेव के मूँह पर फ़ैंको,
और उस जोगी से ये कह दो
महादेव! अपनी इस गंगा को वापस ले लो,
ये हम ज़लील तुर्कों के बदन में
गाढा, गर्म लहु बन बन के दौड़ रही है।
राही मासूम रज़ा की हर किताब में उस समय के समकालीन भारत का इतिहास भी है और साहित्य भी . ज़मीन से जुड़े इस आदमी को जब मौक़ा मिला तो उन्होंने इस देश की सच्चाई को बहुत ही साफगोई से पेश कर दिया . महाभारत धारवाहिक के लिए जो काम उन्होंने किया वह फ़िल्मी लेखन की दुनिया में भी उनको दैवी मुकाम कर पंहुचा देता है . महात्मा विदुर के जो संवाद हैं वह कोई भी बड़ा राजनीतिक चिन्तक बोलकर धन्य हो जाएगा .महाभारत के सभी चरित्रों के लिए जो संवाद लिखे वह उस दौर के लेखकों में किसी के बस का नहीं था.
डॉ राही मासूम रज़ा को मेरा सम्मान