Wednesday, July 5, 2017

दास्तान-ए-पाकिस्तान : अमरीका से गिरा ,चीन पर अंटका



शेष नारायण सिंह  
प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी की ताज़ा अमरीका यात्रा को भारत में आम तौर पर एक ऐसी यात्रा के रूप में देखा जा रहा है  जिसके बाद अमरीकी अर्थव्यवस्था को तो तो फायदा हुआ  है लेकिन भारत को उम्मीद से बहुत कम मिला है .  लेकिन सरहद के पर पाकिस्तान में उनकी यात्रा से पाकिस्तानी नीति निर्धारकों में घबडाहट है .व्हाइट हाउस में मोदी-ट्रंप मुलाक़ात के दौरान जिस तरह से  प्रधानमंत्री ने अमरीकी राष्ट्रपति को गले लगाया उसके बाद पाकिस्तानी विदेश नीति के हलकों में खासी चिंता देखी जा रही है . हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद सलाहुद्दीन को  अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित किये जाने से भी पाकिस्तान को परेशानी हो रही है क्योंकि वहां सलाहुद्दीन को सरकारी तबकों में इज्ज़त की निगाह से देखा जाता है . पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ तो उसको पीर साहेब कहते थे .भारत और अमरीका की बढ़ती दोस्ती का एक नतीजा यह भी है कि अब  पाकिस्तान लगभग पूरी तरह से चीन की  भारत नीति का एक पुर्जा होता जा रहा है . जिस तरह से  पहले ज़माने में वह दक्षिण एशिया में अमरीकी  विदेश नीति के लक्ष्यों को पूरा करने  का मुख्य एजेंट हुआ करता था  ,उतनी ही वफादारी से अब पाकिस्तान चीन की हित साधना का यंत्र बन गया है . साथ ही  पाकिस्तान में इस बात पर भी चिंता जताई जा रही है कि अमरीका अब भारत की तरफ  ज़्यादा खिंच रहा है . जिसका भावार्थ यह  है कि अब वह पाकिस्तान  से पहले से अधिक दूरी बना लेगा. जो पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के साथ से ही  अमरीका का बहुत ही प्रिय देश रहा हो और  भारत  के खिलाफ अमरीका से  मदद भी लेता रहा हो उसको भारत का दोस्त बनते देख पाकिस्तान सरकार में चिंता बढ़ रही है  और वह मीडिया के ज़रिये साफ़ नज़र आ  रही है और पाकिस्तान की राजनीति पैर नज़र रखने वाले किसी भी व्यक्ति को बिलकुल साफ़ तौर पर दिख रही  है ..
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा और उसके बाद जारी हुए संयुक्त बयान के बाद स्पष्ट हो गया है कि   राष्ट्रपति ट्रंप भारत-पाक संबंधों के मामले में भारतीय  पक्ष को महत्व दे रहे हैं . पिछले सत्तर वर्षों में पाकिस्तानी हुक्मरान ने ऐसा माहौल बना रखा है कि जैसे कश्मीर पर पाकिस्तान का अधिकार स्थापित करना ही पाकिस्तानी राजनीति का प्रमुख आधार हो . उनके इस अभियान में अमरीका की  मदद भी मिलती रही है . लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अमरीका की भारत से  दोस्ती बढना शुरू हो गयी है  और जब  मोदी-ट्रंप बातचीत के बाद तस्वीर  सामने आयी तो ऐसा लगने लगा कि अब अमरीका   क्षेत्रीय आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की बात को ज़्यादा सही मान रहा है .
पाकिस्तान की सरकार की वह उम्मीद भी अब ख़त्म हो गयी है जिसके तहत वह अपने लोगों को यह बताता रहता था  कि कश्मीर के मामले में  अमरीका बिचौलिए की भूमिका निभाएगा . यहाँ  तक कि जब अमरीका ने पाकिस्तानी  कश्मीर नीति के ख़ास हिस्सा बन चुके ,सैयद सलाहुद्दीन को अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित किया तो कुछ पाकिस्तानी पत्रकारों ने कहना शुरू कर दिया कि इसी बहाने अमरीका  भारत और कश्मीर के बीच सुलह कराने के लिए बिचौलिया बनना चाहता है. लेकिन  वक़्त बीत रहा है और  तस्वीर और ज्यादा साफ़ होती जा रही  है . पाकिस्तानी अखबारों में अब अमरीका की बात बहुत ही साफ़ शब्दों  में छपने लगी है . अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता  का वह बयान भी प्रमुखता से छपा है जिसमें कहा गया  है कि  "  कश्मीर पर किसी भी बातचीत की रफ़्तार स्कोप और उसका चरित्र दोनों  ही पक्षों को तय करना है लेकिन हम ( अमरीका ) हर उस सकारात्मक क़दम का समर्थन करते हैं जो दोनों पक्ष अच्छे रिश्ते बनाने की दिशा में बढाते हैं " . यह बयान पाकिस्तानी पत्रकारों के सवाल के उस सवाल के जवाब में मिला है जो उन्होंने अमरीकी प्रवक्ता से पूछा था . ज़ाहिर है कि अमरीका या  किसी भी देश  को कश्मीर मामले में दखल देने  के लिए तैयार करने की पाकिस्तानी कोशिश को ज़बरदस्त झटका  एक बार फिर लग गया   है और दुनिया भर में भारत  के  दृष्टिकोण को ही मान्यता मिल रही है क्योंकि भारत मानता  है कि कश्मीर समस्या  के हल के लिए किसी की भी मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है . हालांकि शिमला समझौते में पाकिस्तान ने भी माना था कि आपसी बातचीत से ही द्विपक्षीय  समस्याओं का हल निकला जाएगा लेकिन उसके बाद से उसकी सभी   सरकारों ने शिमला समझौते का उल्लंघन किया  है .
अमरीका के भारत की तरफ झुक जाने का नतीजा  है कि पाकिस्तानी सरकार अब चीन पर पूरी तरह से निर्भर होती जा रही है . विदेश नीति का  बहुत पुराना मंडल सिद्धांत है  कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है.  पाकिस्तान की मौजूदा विदेश नीति भारत और चीन के बीच कथित दुश्मनी की बुनियाद पर ही टिकी है . शायद इसीलिये चीन के विदेश मंत्री के स्वागत के मौके पर पाकिस्तान के विदेशी मामलों के मुख्य सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने कहा कि " पाकिस्तान का चीन  से जो सम्बन्ध  है वह हमारी विदेशनीति का मुख्य स्तम्भ है ." उनके इस बयान के बाद अमरीकी मीडिया ने इस बात को मुकम्मल तरीके से घोषित कर दिया है  कि एशिया में पाकिस्तान की नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव  आ चुका है .
अब पाकिस्तान के नेता  चीन की हर बात मानने के लिए अभिशप्त नज़र आते हैं लेकिन उनको  भारत के खिलाफ अपने अभियान में चीन से बहुत उम्मीद नहीं करना चाहिए .इसलिए पाकिस्तानी हुक्मरान ,खासकर फौज को वह बेवकूफी नहीं करनी चाहिए जो१९६५ में जनरल अयूब ने की थी . १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पहले उनको लगता था कि जब वे भारत पर हमला कर देगें तो चीन भी भारत पर हमला कर देगा क्योंकि तीन साल पहले ही भारत और चीन केबीच सीमा पर संघर्ष हो चुका था. जनरल को उम्मीद थी कि उसके बाद  भारत कश्मीर उन्हें दे देगा. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और पाकिस्तानी फौज़ लगभग तबाह हो गयी. भारत के खिलाफ किसी भी देश से मदद मिलने की उम्मीद करना पाकिस्तानी फौज की बहुत बड़ी भूल होगी. लेकिन सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी फौज़ के सन इकहत्तर की लड़ाई के हारे हुए अफसर बदले की आग में जल रहे हैं वहां की तथाकथित सिविलियन सरकार पूरी तरह से फौज के सामने नतमस्तक है . कश्मीर में आई एस आई ने हालात को बहुत खराब कर दिया है .  हालांकि यह भी सच है कि चीन अपने व्यापारिक हितों के लिए  पाकिस्तान का इस्स्तेमाल कर रहा  है . हिन्द महासागर में अपनी सीधी पंहुंच बनाना चीन का  हमेशा से सपना रहा है और अब पाकिस्तान ने  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के रास्ते ,अपने कब्जे वाले बलोचिस्तान तक सड़क बनाने और समुद्र पर बंदरगाह बनाने की अनुमति दे कर उसका वह सपना पूरा कर   दिया  है . जानकार बताते हैं कि अब पाकिस्तान के लिए चीन से पिंड छुड़ाना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि पश्चिम एशिया और हिन्द महासागर क्षेत्र में में चीनी मंसूबों को पूरा करने के लिए इस बंदरगाह का बहुत ही अधिक महत्व है .
चीन की तरफ इस्लामाबाद की बढ़ती मुहब्बत से किसी को कोई ताज्जुब नहीं हो रहा  है. पाकिस्तान सरकार में कई महीनों से इस बात की चिंता बढ़ रही थी कि अमरीका कहीं उसको आतंक का प्रायोजक देश न घोषित कर दे क्योंकि अफगानिस्तान  की तरफ से इस तरह की मांग लगातार उठ रही है . इस डर का कारण यह है कि अफगानिस्तान में मौजूद अमरीकी सेना के बड़े अफसर ,  पाकिस्तान में रूचि लेने वाले अमरीकी नेता और अफगान सरकार इस बात को जोर देकर कहते रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार की  ओर से  अफगानिस्तान विरोधी आतंकवादियों को बढ़ावा दिया जा रहा  है  और उनको पाकिस्तान के अन्दर मौजूद आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग भी दी जा रही है.
इस बात में दो राय नहीं है कि पाकिस्तान  सरकार  अब चीन की विदेश नीति  में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखती है . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात से जो दोस्ती के संकेत निकल रहे थे उससे  पाकिस्तानी   हुकूमत में  जो  चिंता थी उसको कम करके पेश करने की लगातार कोशिश चल रही  है . चीन के विदेशमंत्री की  पाकिस्तान यात्रा और उनकी सेवा में पूरी सरकार का लग जाना  भारत-अमरीका  दोस्ती  के असर से मुक्त होने की कोशिश भी है .  पाकिस्तानी विदेश विभाग ने साफ़ कहा है कि अगर अमरीका भारत से दोस्ती बढाता  है तो दक्षिण एशिया में शान्ति की कोशिशों को नुक्सान होगा .. पाकिस्तान इस बात से बहुत  नाराज़  है कि नरेंद्र मोदी और दोंल्ड ट्रंप ने  क्षेत्रीय आतंकवाद पर काबू करने की बात पर जोर दिया . दक्षिण एशिया में  क्षेत्रीय आतंकवाद को पाकिस्तानी  संरक्षण में  पल रहे आतंकवाद को ही कहा जाता है . पाकिस्तान में यह भी माना जा रहा है कि सलाहुद्दीन को आतंकी घोषित करना  भी भारत को खुश करने के लिए किया जा रहा है . पाकिस्तान के आतंरिक   मालों के मंत्री  चौधरी निसार अली खान ने कहा है कि संयुक्त राज्य ने " भारत की ज़बान बोलना शुरू कर दिया है ." पाकिस्तान ने अपनी नाराजगी को अमरीकी अधिकारियों के सामने जता भी दिया है . उसको शिकायत है कि १९६० से अब तक अमरीका ने भारत पर हुए हर आक्रमण में पाकिस्तानी सेना की मदद की है लेकिन इस  बार उसने भारत को ड्रोन और अन्य हाथियार दे दिया है जो हर हाल में पाकिस्तान के  खिलाफ ही इस्तेमाल होगा.
पाकिस्तानी अखबारों में इस बात पर भी चिंता  जताई जा रही है कि पाकिस्तान आर्थिक  मामलों में चीन पर बहुत ही अधिक निर्भर होता जा रहा है और उससे बहुत जयादा उम्मीदें पाल रखी  हैं . जबकि चीन पाकिस्तान में केवल लाभकारी  पूंजी निवेश कर रहा है और विश्व में अपने को ताक़तवर दिखाने के लिए पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति   का फायदा ले रहा है . अफगानिस्तान में पाकिस्तान की हनक को  बढ़ाने की पाकिस्तानी फौज की कोशिश को चीन कोई तवज्जो नहीं दे रहा है  . कुल मिलाकर  कभी अमरीका का कारिन्दा रहा पाकिस्तान अब चीन की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन उसको वहां भी कोई महत्व नहीं  मिल रहा है जबकि  अमरीका अब भारत का करीबी होता जा रहा है .

Sunday, July 2, 2017

सलाहुद्दीन के बहाने अमरीका कश्मीर में बिचौलिया बनने की फ़िराक में तो नहीं है .



शेष नारायण सिंह


पाकिस्तान में आतंकवाद  पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ   है . यूरोप में   हुए आतंकी हमलों में ज्यादातर के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए होते हैं . इस  हफ्ते पाकिस्तान और आतंक के हवाले से दो बड़ी घटनाएं हुईं . एक  तो अमरीका ने पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठन , हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया.  अपने मुल्क में इसके बाद बड़ी खुशियाँ मनाई जा रही हैं . लेकिन इसमें बहुत खुश होने की बात नहीं है क्योंकि यह भी संभव है कि अमरीका इसी बहाने कश्मीर के मामले में बिचौलिया बनने के अपने सपने को  साकार करने की कोशिश करना चाह  रहा हो . इस अनुमान का आधार यह है कि सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान में अमरीकी प्रशासन का बहुत ही लाड़ला रह  चुका है .  अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक बार सलाहुद्दीन को भारत  के खिलाफ आतंकी  हमले बंद करने के लिए तैयार भी कर लिया था . वैसे भी  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करके अमरीका ने केवल भारत को लालीपाप ही थमाया है . इस  घोषणा का मतलब यह है कि अब सलाहुद्दीन अमरीका की यात्रा नहीं कर सकता और अमरीका में कोई बैंक अकाउंट या कोई अन्य संपत्ति नहीं रख सकता . अगर ऐसी कोई संपत्ति वहां होगी तो वह ज़ब्त कर ली जायेगी  .  पाकिस्तान और कश्मीर में रूचि रकने वाले सभी लोगों  को मालूम है कि सलाहुद्दीन का आतंक का धंधा अमरीकी की मदद के बिना भी चलता रहेगा .   

दूसरी घटना यह है कि चीन पाकिस्तान के साथ एक बार फिर खड़ा हो  गया है .. एक सरकारी बयान में चीन की तरफ से कहा गया है कि ' चीन का विचार है कि आतंकवाद  के  खिलाफ सहयोग को बढाया जाना चाहिए . अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस  सम्बन्ध में पाकिस्तान की कोशिशों को मान्यता देना चाहिए और उसको समर्थन करना चाहिए. चीन मानता है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ चल रहे युद्ध में पकिस्तान अगले दस्ते में खडा है और इस दिशा में प्रयास कर रहा है '. चीन के बयान का लुब्बो लुबाब यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थक नहीं बल्कि वह आतंकवाद से पीड़ित है.

 चीन का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साझा बयान के बाद या यों कहें कि उसको बेअसर करने के लिए आया है . साझा बयान में कहा गया था कि ' आतंकवाद को ख़त्म करना हमारी ( भारत और अमरीका की  ) सबसे  बड़ी प्राथमिकता है . हमने आतंकवाद , अतिवाद और बुनियादी धार्मिक  ध्रुवीकरण के बारे में बात की . हमारे सहयोग का  प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद से युद्ध ,  आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों  और आतंकी अभयारण्यों को ख़त्म करना  भी है .' यह  संयुक्त बयान आतंकवाद और पाकिस्तान को जोड़ता हुआ दिखता है . ज़ाहिर है अब अमरीका भी  पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद का शिकार है , वरना एक दौर वह भी था जब पाकिस्तान में आतंकवाद  को पालना अमरीकी विदेश नीति का हिस्सा हुआ  करता था और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जिया उल हक १९८० के दशक में आतंकवाद को हवा देने के अमरीकी प्रोजक्ट के  मुख्य एजेंट हुआ करते थे .
 आतंकवाद को पाकिस्तान में सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करने के सिलसिला १९८० के दशक में फौजी तानाशाह और चीफ  मार्शल लॉ प्रशासक ज़नरल जिया उल हक ने शुरू  किया था. उसने आतंकियों की एक बड़ी फौज बनाई थी जो अमरीकी  पैसे से तैयार की गयी थी .  अमरीका को अफगानिस्तान में मौजूद रूसी सैनकों  से लड़ाई के लिए बन्दे चाहिए थे . पाकिस्तान  ने अपनी सेना की शाखा आई  एस आई के ज़रिये बड़ी संख्या में पाकिस्तानी बेरोजगार नौजवानों को  ट्रेनिंग दे कर अफगानिस्तान में  भेज दिया था . जब अफगानिस्तान में  अमरीका की रूचि नहीं रही तो  पाकिस्तान  की आई एस आई ने इनको ही भारत  में आतंक फैलाने के लिए लगा दिया .  सोवियत रूस के विघटन के बाद आतंकवादियों की यह फौज कश्मीर में लग गयी . सलाहुद्दीन उसी दौर की पैदाइश  है .कश्मीर में युसूफ शाह नाम से  चुनाव लड़कर हारने के  बाद वह पाकिस्तान चला गया था और वहां उसको अफगान आतंकी गुलबुद्दीन हिकमतयार ने ट्रेनिंग दी थी. हिकमतयार अल  कायदा वाले ओसामा बिन लादेन का ख़ास आदमी हुआ करता था. शुरू में इसका संगठन जमाते इस्लामी का सहयोगी हुआ करता था लेकिन बाद में सलाहुद्दीन ने अपना  स्वतंत्र संगठन बना लिया.  

 चीन के  ताज़ा बयान को अगर इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो बात समझ में आती है क्योंकि आज पाकिस्तान  में भी खूब आतंकी हमले  हो  रहे हैं . लेकिन यह भी सच है  कि जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाहजिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी. लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जिसके तामझाम को अमरीका ने ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मनअल कायदा अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे .आज बात बदल गयी है . आज अमरीका में पाकिस्तान को आतंक के मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है . जो अमरीका कभी  पाकिस्तानी आतंकवाद का फाइनेंसर हुआ करता था  वही आज उसके एक सरगना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर चुका है .और भारत सरकार के प्रधानमंत्री को यह बताने की  कोशिश कर रहा है कि वह कश्मीर के मामले में भारत का सहयोगी बनने को तैयार है .

अब कश्मीर का मसला बहुत जटिल हो गया  है . पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा  कि वहां की समस्या हल हो.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है क्योंकि १९४८ में जब जिनाह की सरपरस्ती में कश्मीर पर कबायली हमला हुआ था उसके बाद से ही भारत के प्रति नफरत के पाकिस्तानी अभियान में कश्मीर विवाद का  भारी योगदान रहा है अगर पाकिस्तान के हुक्मरान उसको ही ख़त्म कर देंगें तो उनके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी.

पाकिस्तान की एक देश में स्थापना ही एक तिकड़म का परिणाम है. वहां की एक बड़ी आबादी के रिश्तेदार और आधा परिवार भारत में है .उनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत में हैं लेकिन धर्म  के आधार पर बने पाकिस्तान में रहने को अभिशप्त हैं .  शुरू से ही पाकिस्तानी शासकों ने धर्म के सहारे अवाम को इकठ्ठा रखने की कोशिश की . अब उनको पता चल गया है कि ऐसा सोचना उनकी बहुत बड़ी गलती थी. जब भी धर्म को राज काज में दखल देने की आज़ादी दी जायेगी राष्ट्र का वही हाल होगा जो आज पाकिस्तान का हो रहा है .इसलिए धर्म और गाय के नाम पर  चल रहे खूनी खेल की अनदेखी  करने वाले भारतीय नेताओं को  भी सावधान होने की ज़रूरत  है क्योंकि जब अर्धशिक्षित और लोकतंत्र से अनभिज्ञ धार्मिक नेता  राजसत्ता को अपने इशारे पर नचाने लगते हैं  तो वही होता है जो पाकिस्तान का हाल हो रहा है.   धर्म को राजकाज का मुख्य आधार बनाकर चलने वालों में १९८९ के बाद के इरान  को भी  देखा जा सकता है . ईरान जो कभी आधुनिकता की दौड़ में बहुत आगे हुआ करता था , धार्मिक कठमुल्लों की  ताक़त बढ़ने के बाद आज दुनिया में अलग थलग पड़ गया है .

 आजकल पाकिस्तान की  दोस्ती चीन से बहुत ज़्यादा है लेकिन अभी कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान में रहने वाला आम आदमी अमरीकी और साउदी  अरब की  खैरात पर जिंदा था.  उन दिनों पाकिस्तान पर अमरीका की ख़ास मेहरबानी हुआ करती थी. आज अमरीकी दोस्ती का  हाथ भारत की तरफ बढ़ चुका है  और चीन के बढ़ते क़दम को रोकने के  लिए अमरीका भारत से अच्छे   सम्बन्ध बनाने की फ़िराक में है .आज पाकिस्तान पूरी तरह  से अस्थिरता के कगार पर खड़ा है . कभी भारत और  बाद  में अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों की   जमातें तैयार करने वाला पाकिस्तान   आज अपनी एकता को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है . अमरीका से दोस्ती और धार्मिक उन्माद को राजनीति की मुख्य धारा में लाकर पाकिस्तान का यह हाल हुआ है . भारत को भी  समकालीन इतिहास के इस पक्ष पर नज़र रखनी चाहिए कि कहीं अपने महान देश की हालत अपने शासकों की अदूरदर्शिता के कारण पाकिस्तान जैसी न  हो जाए. पाकिस्तान को अमरीका ने   इस इलाके में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिये इस्तेमाल किया  था , कहीं भारत उसी जाल में न फंस जाए. पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है.और उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अब बहुत मुश्किल है .  उसकी मजबूरी का फायदा अब  चीन उठा रहा है . पाकिस्तान में चीन भारी विनिवेश कर रहा है . ज़ाहिर है वह पाकिस्तान को उसी तरह की कूटनीतिक मदद कर रहा  है जैसी कभी अमरीका किया करता था. १९७१ की बांग्लादेश  की लड़ाई  में पाकिस्तान ने भारत की सेना को धमकाने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े  के युद्धक विमान वाहक जहाज़ ,इंटरप्राइज़ को भेज  दिया  था. भारत के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर ,१९७१ में वह  पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने के  लिए हथियार दे रहा था . एक बड़ा सवाल है कि क्या भारत को अमरीका उसी तरह का सहायक बनना चाहिए जैसा कभी पाकिस्तान हुआ करता था. भारत के राजनयिकों को इस बात को गंभीरता से समझना पडेगा कि कहीं अमरीका  सलाहुद्दीन को   अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करके कश्मीर में हस्तक्षेप  करने की भूमिका तो नहीं बना रहा है . सलाहुद्दीन  के बहाने अमरीका कश्मीर में बिचौलिया बनने की फ़िराक में तो नहीं है .

शेष नारायण सिंह


पाकिस्तान में आतंकवाद  पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ   है . यूरोप में   हुए आतंकी हमलों में ज्यादातर के सूत्र पाकिस्तान से जुड़े हुए होते हैं . इस  हफ्ते पाकिस्तान और आतंक के हवाले से दो बड़ी घटनाएं हुईं . एक  तो अमरीका ने पाकिस्तान से चलने वाले आतंकवादी संगठन , हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया सैयद  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया.  अपने मुल्क में इसके बाद बड़ी खुशियाँ मनाई जा रही हैं . लेकिन इसमें बहुत खुश होने की बात नहीं है क्योंकि यह भी संभव है कि अमरीका इसी बहाने कश्मीर के मामले में बिचौलिया बनने के अपने सपने को  साकार करने की कोशिश करना चाह  रहा हो . इस अनुमान का आधार यह है कि सैयद सलाहुद्दीन पाकिस्तान में अमरीकी प्रशासन का बहुत ही लाड़ला रह  चुका है .  अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने एक बार सलाहुद्दीन को भारत  के खिलाफ आतंकी  हमले बंद करने के लिए तैयार भी कर लिया था . वैसे भी  सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करके अमरीका ने केवल भारत को लालीपाप ही थमाया है . इस  घोषणा का मतलब यह है कि अब सलाहुद्दीन अमरीका की यात्रा नहीं कर सकता और अमरीका में कोई बैंक अकाउंट या कोई अन्य संपत्ति नहीं रख सकता . अगर ऐसी कोई संपत्ति वहां होगी तो वह ज़ब्त कर ली जायेगी  .  पाकिस्तान और कश्मीर में रूचि रकने वाले सभी लोगों  को मालूम है कि सलाहुद्दीन का आतंक का धंधा अमरीकी की मदद के बिना भी चलता रहेगा .   

दूसरी घटना यह है कि चीन पाकिस्तान के साथ एक बार फिर खड़ा हो  गया है .. एक सरकारी बयान में चीन की तरफ से कहा गया है कि ' चीन का विचार है कि आतंकवाद  के  खिलाफ सहयोग को बढाया जाना चाहिए . अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को इस  सम्बन्ध में पाकिस्तान की कोशिशों को मान्यता देना चाहिए और उसको समर्थन करना चाहिए. चीन मानता है कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ चल रहे युद्ध में पकिस्तान अगले दस्ते में खडा है और इस दिशा में प्रयास कर रहा है '. चीन के बयान का लुब्बो लुबाब यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद का समर्थक नहीं बल्कि वह आतंकवाद से पीड़ित है.

 चीन का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साझा बयान के बाद या यों कहें कि उसको बेअसर करने के लिए आया है . साझा बयान में कहा गया था कि ' आतंकवाद को ख़त्म करना हमारी ( भारत और अमरीका की  ) सबसे  बड़ी प्राथमिकता है . हमने आतंकवाद , अतिवाद और बुनियादी धार्मिक  ध्रुवीकरण के बारे में बात की . हमारे सहयोग का  प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद से युद्ध ,  आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों  और आतंकी अभयारण्यों को ख़त्म करना  भी है .' यह  संयुक्त बयान आतंकवाद और पाकिस्तान को जोड़ता हुआ दिखता है . ज़ाहिर है अब अमरीका भी  पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद का शिकार है , वरना एक दौर वह भी था जब पाकिस्तान में आतंकवाद  को पालना अमरीकी विदेश नीति का हिस्सा हुआ  करता था और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  जिया उल हक १९८० के दशक में आतंकवाद को हवा देने के अमरीकी प्रोजक्ट के  मुख्य एजेंट हुआ करते थे .
 आतंकवाद को पाकिस्तान में सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करने के सिलसिला १९८० के दशक में फौजी तानाशाह और चीफ  मार्शल लॉ प्रशासक ज़नरल जिया उल हक ने शुरू  किया था. उसने आतंकियों की एक बड़ी फौज बनाई थी जो अमरीकी  पैसे से तैयार की गयी थी .  अमरीका को अफगानिस्तान में मौजूद रूसी सैनकों  से लड़ाई के लिए बन्दे चाहिए थे . पाकिस्तान  ने अपनी सेना की शाखा आई  एस आई के ज़रिये बड़ी संख्या में पाकिस्तानी बेरोजगार नौजवानों को  ट्रेनिंग दे कर अफगानिस्तान में  भेज दिया था . जब अफगानिस्तान में  अमरीका की रूचि नहीं रही तो  पाकिस्तान  की आई एस आई ने इनको ही भारत  में आतंक फैलाने के लिए लगा दिया .  सोवियत रूस के विघटन के बाद आतंकवादियों की यह फौज कश्मीर में लग गयी . सलाहुद्दीन उसी दौर की पैदाइश  है .कश्मीर में युसूफ शाह नाम से  चुनाव लड़कर हारने के  बाद वह पाकिस्तान चला गया था और वहां उसको अफगान आतंकी गुलबुद्दीन हिकमतयार ने ट्रेनिंग दी थी. हिकमतयार अल  कायदा वाले ओसामा बिन लादेन का ख़ास आदमी हुआ करता था. शुरू में इसका संगठन जमाते इस्लामी का सहयोगी हुआ करता था लेकिन बाद में सलाहुद्दीन ने अपना  स्वतंत्र संगठन बना लिया.  

 चीन के  ताज़ा बयान को अगर इस पृष्ठभूमि में देखा जाए तो बात समझ में आती है क्योंकि आज पाकिस्तान  में भी खूब आतंकी हमले  हो  रहे हैं . लेकिन यह भी सच है  कि जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाहजिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी. लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जिसके तामझाम को अमरीका ने ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मनअल कायदा अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे .आज बात बदल गयी है . आज अमरीका में पाकिस्तान को आतंक के मुख्य क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है . जो अमरीका कभी  पाकिस्तानी आतंकवाद का फाइनेंसर हुआ करता था  वही आज उसके एक सरगना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर चुका है .और भारत सरकार के प्रधानमंत्री को यह बताने की  कोशिश कर रहा है कि वह कश्मीर के मामले में भारत का सहयोगी बनने को तैयार है .

अब कश्मीर का मसला बहुत जटिल हो गया  है . पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा  कि वहां की समस्या हल हो.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है क्योंकि १९४८ में जब जिनाह की सरपरस्ती में कश्मीर पर कबायली हमला हुआ था उसके बाद से ही भारत के प्रति नफरत के पाकिस्तानी अभियान में कश्मीर विवाद का  भारी योगदान रहा है अगर पाकिस्तान के हुक्मरान उसको ही ख़त्म कर देंगें तो उनके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी.

पाकिस्तान की एक देश में स्थापना ही एक तिकड़म का परिणाम है. वहां की एक बड़ी आबादी के रिश्तेदार और आधा परिवार भारत में है .उनकी सांस्कृतिक जड़ें भारत में हैं लेकिन धर्म  के आधार पर बने पाकिस्तान में रहने को अभिशप्त हैं .  शुरू से ही पाकिस्तानी शासकों ने धर्म के सहारे अवाम को इकठ्ठा रखने की कोशिश की . अब उनको पता चल गया है कि ऐसा सोचना उनकी बहुत बड़ी गलती थी. जब भी धर्म को राज काज में दखल देने की आज़ादी दी जायेगी राष्ट्र का वही हाल होगा जो आज पाकिस्तान का हो रहा है .इसलिए धर्म और गाय के नाम पर  चल रहे खूनी खेल की अनदेखी  करने वाले भारतीय नेताओं को  भी सावधान होने की ज़रूरत  है क्योंकि जब अर्धशिक्षित और लोकतंत्र से अनभिज्ञ धार्मिक नेता  राजसत्ता को अपने इशारे पर नचाने लगते हैं  तो वही होता है जो पाकिस्तान का हाल हो रहा है.   धर्म को राजकाज का मुख्य आधार बनाकर चलने वालों में १९८९ के बाद के इरान  को भी  देखा जा सकता है . ईरान जो कभी आधुनिकता की दौड़ में बहुत आगे हुआ करता था , धार्मिक कठमुल्लों की  ताक़त बढ़ने के बाद आज दुनिया में अलग थलग पड़ गया है .

 आजकल पाकिस्तान की  दोस्ती चीन से बहुत ज़्यादा है लेकिन अभी कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान में रहने वाला आम आदमी अमरीकी और साउदी  अरब की  खैरात पर जिंदा था.  उन दिनों पाकिस्तान पर अमरीका की ख़ास मेहरबानी हुआ करती थी. आज अमरीकी दोस्ती का  हाथ भारत की तरफ बढ़ चुका है  और चीन के बढ़ते क़दम को रोकने के  लिए अमरीका भारत से अच्छे   सम्बन्ध बनाने की फ़िराक में है .आज पाकिस्तान पूरी तरह  से अस्थिरता के कगार पर खड़ा है . कभी भारत और  बाद  में अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकवादियों की   जमातें तैयार करने वाला पाकिस्तान   आज अपनी एकता को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है . अमरीका से दोस्ती और धार्मिक उन्माद को राजनीति की मुख्य धारा में लाकर पाकिस्तान का यह हाल हुआ है . भारत को भी  समकालीन इतिहास के इस पक्ष पर नज़र रखनी चाहिए कि कहीं अपने महान देश की हालत अपने शासकों की अदूरदर्शिता के कारण पाकिस्तान जैसी न  हो जाए. पाकिस्तान को अमरीका ने   इस इलाके में अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिये इस्तेमाल किया  था , कहीं भारत उसी जाल में न फंस जाए. पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है.और उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अब बहुत मुश्किल है .  उसकी मजबूरी का फायदा अब  चीन उठा रहा है . पाकिस्तान में चीन भारी विनिवेश कर रहा है . ज़ाहिर है वह पाकिस्तान को उसी तरह की कूटनीतिक मदद कर रहा  है जैसी कभी अमरीका किया करता था. १९७१ की बांग्लादेश  की लड़ाई  में पाकिस्तान ने भारत की सेना को धमकाने के लिए बंगाल की खाड़ी में अपने सातवें बेड़े  के युद्धक विमान वाहक जहाज़ ,इंटरप्राइज़ को भेज  दिया  था. भारत के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर ,१९७१ में वह  पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने के  लिए हथियार दे रहा था . एक बड़ा सवाल है कि क्या भारत को अमरीका उसी तरह का सहायक बनना चाहिए जैसा कभी पाकिस्तान हुआ करता था. भारत के राजनयिकों को इस बात को गंभीरता से समझना पडेगा कि कहीं अमरीका  सलाहुद्दीन को   अंतर राष्ट्रीय आतंकी घोषित करके कश्मीर में हस्तक्षेप  करने की भूमिका तो नहीं बना रहा है . 

Friday, June 23, 2017

१९७५ की इमरजेंसी देश की राजनीति का काला और क्रूर अध्याय है



शेष नारायण सिंह 

४२ साल पहले अपनी सत्ता बचाए  रखने के लिए  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दिया था.  संविधान में लोकतंत्र के  लिए बनाए गए सभी प्रावधानों को सस्पेंड कर दिया  गया था और देश में तानाशाही निजाम  कायम कर दिया गया  था. राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी के लिए इमरजेंसी की घटनाओं को समझना हमेशा से ही बहुत ही दिलचस्प  कार्य रहा है . इमरजेंसी के बारे में पिछले  ४० वर्षों में बहुत कुछ लिखा पढ़ा  गया है लेकिन एक विषय के रूप में इसकी उत्सुकता कभी कम नहीं होती.  १९७५ के जून में इमरजेंसी इसलिए लगाई गयी थी कि इंदिरा गांधी को लग गया था की जनता का गुस्सा उनके खिलाफ फूट पड़ा है और उसको रोका नहीं जा सकता  . इसके बहुत सारे कारक थे लेकिन जब १९७४ में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने  लोकसभा की सदस्य के रूप में उनके चुनाव को ही खारिज कर दिया तो हालात बहुत जल्दी से इंदिरा गांधी के खिलाफ बन गए . इमरजेंसी वास्तव में स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता की आवाज़ को दबाने के लिए किया  गया एक असंवैधानिक प्रयास था जिसको जनता के समर्थन से इकठ्ठा हुए राजनीतिक विपक्ष की क्षमता  ने सफल नहीं होने दिया .१९७१ में हुए मध्यावधि चुनाव में  इंदिरा गांधी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिल गया था. लेकिन चार साल के अन्दर ही उनको  इमरजेंसी  लगाकर अपनी सत्ता बचानी  पडी,यह राजनीति का बहुत ही दिलचस्प आख्यान है . आज इमरजेंसी की बरसी पर इसी  गुत्थी को समझने की कोशिश की जायेगी .

१९७१ में भारी बहुमत से जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने इस इरादे से काम करना शुरू कर दिया था कि अब उनके राज को कोई हटाने वाला नहीं है. बहुमत की सरकार बन जाने के बाद उन्होने जो सबसे बड़ा काम किया वह था , पाकिस्तान के  पूर्वी भाग को एक अलग देश के रूप  में मान्यता दिलवा देना.
बंगलादेश की आज़ादी में भारत का योगदान  बहुत की अधिक है . पकिस्तान के साथ भारत की सेना की जीत का श्रेय इंदिरा गांधी को मिला  जोकि जायज़ भी है क्योंकि उन्होंने उसका कुशल नेतृत्व किया था .  बंगलादेश में पाकिस्तान को ज़बरदस्त शिकस्त देने के बाद इंदिरा गांधी की पार्टी  के सामने  विपक्ष की कोई हैसियत नहीं थी , जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी  ने तो उनको दुर्गा तक कह दिया था . शास्त्री जी द्वारा शुरू की गयी हरित क्रान्ति को  इंदिरा गांधी ने बुलंदी तक पंहुचाया था , इसलिए ग्रामीण भारत में  भी थोड़ी बहुत सम्पन्नता आ गयी थी.  कुल मिलाकर १९७२-७३ में माहौल इंदिरा गांधी के पक्ष  में था . लेकिन १९७४   आते आते  सब कुछ  गड़बड़ाने लगा .  और इसी गुत्थी को  समझने में इंदिरा गांधी की राजनीतिक विफलता और इमरजेंसी की समस्या  का हल छुपा हुआ है .
 इसी दौर में इंदिरा गांधी के दोनों बेटे बड़े हो गए थे . बड़े बेटे  राजीव गांधी थे जिनको इन्डियन एयरलाइंस में पाइलट की नौकरी मिल गयी थी और वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ  संतुष्टि का जीवन बिता रहे थे . छोटे बेटे संजय गांधी थे जिनकी पढाई लिखाई ठीक से  नहीं  हो पाई थी और वे पूरी तरह से माता पर ही  निर्भर थे . इस बीच उनकी शादी भी हो गयी थी . कोई काम नहीं था . इंदिरा जी के एक दरबारी  बंसी लाल थे जो हरियाणा के  मुख्यमंत्री थे. उन्होंने संजय गांधी को एक छोटी कार कंपनी शुरू करने की प्रेरणा दी. मारुति लिमिटेड नाम की इस कंपनी को उन्होंने दिल्ली से सटे  गुडगाँव में ज़मीन अलाट कर दी .संजय गाँधी की शुरुआती योजना यह थी कि उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के बाद राजनीति का रुख किया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ . मारुति के  कारोबार में वे बुरी तरह से असफल रहे. उसी दौर में दिल्ली के उस वक़्त के काकटेल सर्किट में सक्रिय लोगों ने उनसे मित्रता कर ली .संजय  गांधी के नए  मित्रों ने उन्हें कमीशन खोरी के धंधे में लगा दिया .इस सिलसिले में वे इंदिरा गाँधी के कुछ चेला टाइप अफसरों के सम्पर्क में आये और नेता बन गए. भारतीय राजनीति का सबसे काला अध्याय संजय गाँधी के साथ ही शुरू होता है. इसी के साथ ही इमरजेंसी  की भूमिका बनी और संविधान को दरकिनार करके इमरजेंसी लगा दी गयी .

इमरजेंसी के राज में बहुत ज्यादतियां हुईं नतीजा यह  हुआ कि १९७७ का चुनाव कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी .  कांग्रेस ने बार बार इमर्जेंसी की ज्यादतियों के लिए माफी माँगी लेकिन इमरजेंसी को सही ठहराने से बाज़ नहीं आये . २०१० में  कांग्रेस के 125 पूरा करने के बाद इमरजेंसी को गलत कहते हुए कांग्रेस ने दावा किया कि  उसके लिए संजय गाँधी ज़िम्मेदार थे इंदिरा गाँधी नहीं .  ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है कि संजय गांधी के परिवार के  लोग आजकल बीजेपी में हैं .  उनकी पत्नी तो केंद्रीय मंत्री  हैं जबकि बेटा भी सांसद है और पार्टी के  महामंत्री पद भी रह चुका  है .जहां तक इमरजेंसी का सवाल है ,उसके लिए मुख्य रूप से इंदिरा गाँधी ही ज़िम्मेदार हैं और इतिहास यही मानेगा . इमरजेंसी को लगवाने और उस दौर में अत्याचार करने के लिए संजय गाँधी इंदिरा से कम ज़िम्मेदार नहीं है लेकिन यह ज़िम्मेदारी उनकी अकेले की नहीं है . वे गुनाह में इंदिरा गाँधी के पार्टनर हैं .यह इतिहास का तथ्य है . अब इतिहास की फिर से व्याख्या करने की कोशिश न केवल हास्यास्पद है बल्कि अब्सर्ड भी है .

 नरेंद्र मोदी के आने के बाद तो खैर विमर्श की भाषा बदल गेई है और संजय गांधी के पक्ष  या विपक्ष में  कोई ख़ास तर्क वितर्क नहीं दिए जाते लेकिन इसके पहले अडवाणी युग में संजय गांधी को इमर्जेंसी के अपराधों से मुक्त करने की कोशिश बहुत   ही गंभीरता से चल रही थी.  इसको विडंबना ही माना जाएगा क्योंकि  दुनिया जानती है कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन को उन प्रदेशों में ही सबसे ज्यादा ताक़त मिली थी जहां आर एस एस का संगठन मज़बूत था . आज की बीजेपी को उन दिनों जनसंघ के नाम से जाना जाता था. इमरजेंसी की प्रताड़ना के शिकार आज की बीजेपी वाले ही हुए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ,लालकृष्ण आडवाणी , अरुण जेटली आदि  बीजेपी नेता  जेल में थे . यह सज़ा उन्हें संजय गाँधी की कृपा से ही मिली थी. यह बात बिलकुल सच है और इसे कोई भी नहीं झुठला सकता . बाद में  लाल कृष्ण आडवानी के नेतृव में बीजेपी वालों ने संजय गाँधी को इमरजेंसी की बदमाशी से बरी करने की कोशिश बड़े पैमाने पर की थी. लाल कृष्ण आडवाणी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इमरजेंसी अपराधों के लिए संजय गाँधी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है ..अपने बयान में आडवाणी ने कहा था कि , 'अपने मंत्रिमंडल या यहां तक कि अपने कानून मंत्री और गृहमंत्री से संपर्क किए बगैर उन्होंने [इंदिरा गांधी ने] लोकतंत्र को अनिश्चितकाल तक निलंबन में रखने के लिए राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से अनुच्छेद 352 लगवाया।उनका कहना है कि इंदिरा गांधी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पचा नहीं पाईं और उन्होंने आपातकाल लगा दिया।

 इमरजेंसी  में सारे नागरिक अधिकारों को ख़त्म कर दिया गया था . जेल में डाले गए लोगों की संख्या एक लाख 10 हजार आठ सौ छह थी। उनमें से 34 हजार 988 आतंरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए लेकिन कैदी को उसका कोई आधार नहीं बताया जाता था . पिछले ४२ वर्षों में इमरजेंसी , उसकी ज्यादतियों और उसके पक्ष और  विपक्ष में बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका है . बीजेपी की योजना है कि कांग्रेस मुक्त भारत के अपने  सपने को पूरा  करने के लिए पार्टी पूरी तरह से  राहुल गांधी की दादी की इतनी कमियाँ  गिनाएगी कि जनता इन्दिरा गांधी को ही इमर्जेंसी  की ज़िम्मेदार माने . जनता और इतिहास उनको ज़िम्मेदार मानता है लेकिन इमरजेंसी की बात जब भी होगी इंदिरा गांधी के साथ संजय गांधी का नाम जरूर लिया जाएगा. अब  संजय गांधी का परिवार बीजेपी में बड़े  पदों पर  है तो उनके खिलाफ  बोलने से बीजेपी वाले कैसे बच सकेंगे

इमरजेंसी का सबक यह है कि चाहे जितना भारी बहुमत हो अगर केवल नारों का सहारा लिया जाएगा तो जनता १९७१ की भारी जीत और बांग्लादेश  की विजय के तमगे को भी नज़रंदाज़ कर देती है. इमरजेंसी के बाद जब जनता पार्टी आई तो वह किसी पार्टी की जीत  नहीं थी. वह जनता की ताक़त थी जिसने आपस में  लड़ रहे विपक्ष को एक साथ खड़े होने को मजबूर कर दिया , उनकी नई पार्टी को   जिता दिया, सरकार बनवा दी  और जनता के  साथ किए गए वायदों को पूरा न करने की सज़ा इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को दे दी. सच्ची बात यह  है कि जब  जनता पार्टी की जीत हुयी थी तब तक पार्टी भी नहीं बनी थी और १९७७ के दौरान जिस चुनाव निशान से  जनता  पार्टी के लोग चुनाव जीत कर आये थे वह चौधरी चरण सिंह   की भारतीय लोकदल का चुनाव निशान, " हलधर किसान " था. इमरजेंसी का सबसे बड़ा सबक यही  है , जनता को गरीबी हटाने के वायदा करके इंदिरा गांधी ने १९७१ में  भारी बहुमत पाया था और जब उन्होंने  वायदा पूरा करने की कोशिश   भी नहीं की और अलग तरह से देश की अवाम को प्राभावित करने की  कोशिश की तो खंडित विपक्ष के बावजूद भी देश ने राजनीति संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को सन्यास से बाहर आने को मजबूर किया और  इंदिरा गांधी की स्थापित सत्ता के खिलाफ एक मज़बूत  विपक्ष  तैयार कर दिया 

Tuesday, June 20, 2017

किसान आन्दोलन और विपक्षी एकता तय करेगी भावी राजनीति की दिशा



शेष नारायण सिंह


देश की राजनीति में ज़बरदस्त गतिविधियाँ चल रही हैं , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता के तीन साल पूरे होने पर उनकी पार्टी पूरे  देश में मोदी फेस्ट नाम से त्यौहार मना रही है . मीडिया में प्रधानमंत्री को समर्थन खूब मिल रहा है , सभी सरकारी विभाग भी मोदी फेस्ट में अपना योगदान कर रहे हैं . जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं वहां भी  मोदी जी का त्यौहार  मनाया जा  रहा  है. इसी बीच राष्ट्रपति का कार्यकाल ख़त्म होने वाला है सो नए राष्ट्रपति के चुनाव  के लिए नई दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गयीं हैं .  राष्ट्रपति के चुनाव के लिए जो एलेक्टोरल कालेज है  उसमें सत्ताधारी गठबंधन  का बहुमत है इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिसको चाहेंगे , वह आराम से राष्ट्रपति पद की कुर्सी पर २५ जुलाई को बैठ जाएगा लेकिन विपक्षी पार्टियों से सहमति बनाने के लिए बीजेपी अध्यक्ष ने  तीन केन्द्रीय मंत्रियों की एक समिति बना दी है जो विपक्षी दलों से बातचीत करके राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध  कराने की कोशिश में जुट गई है .तीन साल पूरे होने पर नरेंद्र मोदी के पक्ष में ख़ासा माहौल है . बीजेपी का दावा  है कि यह नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण है , पार्टी के समर्थक और  कुछ मीडिया संस्थान  भी यही मानते हैं . आमतौर पर माना जा रहा  है कि जिन लोगों ने २०१४ में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए वोट दिया था , वे अभी भी उनके समर्थन में हैं . उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  उनकी पार्टी को जो सफलता मिली  है वह भी इसी तरफ संकेत करती है . थोक महंगाई की दर भी बहुत कम हो गयी है और टेलिविज़न चैनलों पर  बीजेपी प्रवक्ता इसको बहुत ही करीने से देश दुनिया को समझा रहे हैं . लेकिन जानकार बता रहे हैं कि थोक बाज़ार में सब्जियों के दाम  बहुत ही नीचे आ  गए हैं और किसानों को औने पौने दामों पर बेचना पड़ रहा है . इसलिए थोक दाम बहुत ही नीचे आ गए हैं .
दर असल बीजेपी के त्योहारी माहौल को किसानों के आन्दोलन वाली की  मुसीबतें  बहुत ही मुश्किल में डाल रही हैं .चुनाव के दौरान किसानों की भलाई के  लिए नरेंद्र मोदी ने बहुत ही आकर्षक वायदे किये थे . यह वायदे २०१३-१४ के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी किये गए थे और उसके बाद हुए राज्यों के चुनावों में भी किये गये . उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने तो क़र्ज़ माफी वाला मोदी जी का वायदा पूरा  करने की दिशा में बहुत ही महत्वपूर्ण क़दम भी उठा लिया है . मंत्रिमंडल की बैठक में  फैसला ले लिया गया है कि किसानों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. प्रधानमंत्री के वायदों  का लुब्बो लुबाब यह था कि किसानों की आमदनी डेढ़ गुना कर दी जायेगी और उनके क़र्ज़ माफ़ कर दिए जायेगें . तीन साल तक तो  इस  मुद्दे पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी लेकिन जब उत्तर प्रदेश में  किसानों की क़र्ज़ माफी की घोषणा हो गयी तो कई राज्यों में  किसानों का आन्दोलन शुरू हो गया . तमिलनाडु में तो आन्दोलन पत्तर प्रदेश की क़र्ज़ माफी  की घोषणा के पहले  ही से चल रहा था और उस को  पूरी दुनिया का मीडिया कवर भी  कर रहा था. उत्तर प्रदेश के फैसले के बाद तो महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में ज़बरदस्त आन्दोलन शुरू हो गया . महाराष्ट्र में करीब दो हफ्ते तक चले आन्दोलन के बाद जब राज्य सरकार को समझ में आ गया कि इस बार किसान कुछ लेकर ही जायेगें तो वहां भी आंशिक क़र्ज़ माफी की दिशा में  एक कमेटी बना कर पहला क़दम उठा  लिया  गया . हालांकि कई जानकार मानते हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने   मामले को थोडा टालने के  लिए यह क़दम उठाया है . यह ऐसा मुद्दा है जिसपर आने वाले समय  में तय होगा कि सरकार की नीयत क्या थी. जब वक़्त आयेगा तो उसकी भी व्याख्या कर ली जायेगी . बहरहाल अभी समस्या यह  है कि प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी को जिस सबसे बड़े वर्ग ने उनके वायदों पर विश्वास करके वोट दिया था वह अभी नाराज़ है और आन्दोलन के   रास्ते पर है .  किसानों  का आन्दोलन समकालीन भारत के राजनीतिक इतिहास की बहुत बड़ी  घटना बन गया  है क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने मंदसौर के  आन्दोलन को बहुत बिगाड़ दिया . शुरू में उनके गृहमंत्री ने बयान दे दिया कि जिन किसानों की मंदसौर में मौत हुयी है , उनको पुलिस ने गोली नहीं मारी  . बाद में गृहमंत्री  महोदय ने बयान बदला और यह कहा कि पुलिस   ने ही  किसानों की   हत्या की  लेकिन साथ  ही  यह भी प्रचार होने लगा कि जो लोग मरे हैं वे ठीक आदमी नहीं थे . उनकी इस  बात को भी बेमतलब सरकार ने ही साबित कर दिया जब  सरकार ने मरे हुए किसानों के परिवार के लिए एक-एक करोड़ रूपये की सहायता की घोषणा कर दी .  बाद में मुख्यमंत्री जी अनशन पर भी बैठ गए .वहीं  अनशन स्थल पर ही किसानों ने भी धरना दे दिया लेकिन शिवराज सिंह चौहान की वीरता की तारीफ़ करनी होगी  इस माहौल में  ही उसी  उपवास वाले  महंगे और भारी पंडाल में अपनी  पत्नी का जन्मदिन भी मनाया . कुल मिलाकर मध्यप्रदेश में  किसानों के आन्दोलन की समस्या को शिवराज सिंह चौहान ने इतना खराब कर दिया कि केंद्रीय नेतृत्व उनसे खासा   नाराज़ बताया जा रहा है . मध्य प्रदेश के किसान आन्दोलन से होने वाले नुक्सान को शिवराज सिंह ने काबू में करना तो दूर , उसको बढ़ने के लिए बहुत सारे अवसर उपलब्ध कराये .  यह तो उनकी  क़िस्मत अच्छी थी कि जितना नुक्सान होना था वह नहीं हुआ क्योंकि मध्य प्रदेश की मुख्य  विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने किसानों के आन्दोलन से मिलने वाली पूंजी को तितर बितर  कर दिया . पार्टी के आला नेता राहुल गांधी के सबसे  करीबी दोस्त और मध्य  प्रदेश में उनके आघोषित  प्रतिनिधि , ज्योतिरादित्य सिंधिया उसी दिन अमरीका चले गए . जब राज्य कांग्रेस की चिंता करने वाले  उनके कुछ करीबी लोगों ने कहा कि आपको इस वक़्त मंदसौर में होना चाहिए क्योंकि वहां जनता मुसीबत में है तो  बताते हैं कि उन्होंने कहा कि उनका अमरीका जाना बहुत ज़रूरी है . उसके बाद राहुल  गांधी  मंदसौर गए लेकिन वहां से जल्दी जल्दी  वापस आ  गए . उनके करीबी सचिन पाइलट ने उनको समझा दिया कि मंदसौर में रुकना ठीक नहीं है  जबकि जे डी ( यू ) के बड़े नेता शरद यादव भी साथ गए थे और वे आन्दोलन में शामिल होने के मूड में थे .वहां से आकर राहुल गांधी विदेश यात्रा पर  चले गए जिसको कुछ मीडिया संगठन बड़ा मुद्दा  बना रहे हैं . जो भी हो राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की निष्क्रियता के कारण बीजेपी की वह दुर्दशा होने से बच गयी जो कि इतने बड़े आन्दोलन के बाद हो सकती थी.
किसान आन्दोलन के राजनीतिक परिणाम अभी नहीं आये हैं , अभी समय लगेगा . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  किसानों को जो वायदे किये थे उनकी लिस्ट बड़ी  है लेकिन जो मुख्य मुद्दे   हैं वे  खेती करने वालों की आमदनी को डेढ़ गुना  करना और क़र्ज़ माफी मुख्य  हैं . जहां तक क़र्ज़ माफी का सवाल है उसपर तो सरकार के लिए  खासी  मुश्किल आने वाली है .  पूरे देश में किसानों पर बारह लाख  साठ हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ है जिसमें से अभी उत्तर प्रदेश  सरकार ने ३६ हज़ार करोड़ की कर्जमाफी की दिशा में पहल   शुरू कर दी है. यह अलग बात है कि उसके लिए केंद्र से कोई सहायता नहीं मिलने वाली है . राज्य के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ दिल्ली आये थे . उनको वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  बता दिया कि क़र्ज़ माफी के  लिए उनको केंद्र सरकार से कोई मदद नहीं मिलने वाली है . उत्तर प्रदेश सरकार ने बांड जारी करके धन का इंतज़ाम करने की कोशिश की जिसके लिए रिज़र्व बैंक ने अनुमति ही नहीं  दिया . इसका मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश में भी  किसानों की क़र्ज़ माफी  को विपक्षी राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं . यहाँ का विपक्ष मध्यप्रदेश जैसी हालत में नहीं है. यहाँ अखिलेश यादव विपक्ष के  मुख्य नेता हैं और वे मौके की तलाश में बैठे हैं . उन्होंने एक प्रेस वार्ता में भी कहा था कि जब सरकार गलती करेगी तो जनता का पक्ष वे राजनीतिक बहस के  दायरे में लाने में संकोच नहीं करगें . अखिलेश यादव ने अपने परिवार की मुख्य विरोधी , बसपा नेता मायावती की तरफ भी समझौते का हाथ बढ़ा दिया है . उनके चाचा और पार्टी के बड़े नेता  शिवपाल सिंह यादव भी अब समाजवादी पार्टी में हाशिये पर हैं . दर असल मायावती को अपमानित करने के लिए शिवपाल यादव की अगुवाई में ही करीब २२ साल पहले गेस्ट हाउस काण्ड हुआ था . लगता है कि अखिलेश यादव मायावती को गेस्ट हाउस काण्ड की यादों की तकलीफ से बाहर  लाने की कोशिश कर रहे हैं . अगर इन दोनों की एकता हो जाती है और किसानों की क़र्ज़ माफी के मुद्दे पर योगी सरकार की परेशानियां कम  नहीं होतीं तो बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से मुश्किलें पेश आना शुरू हो  जायेंगीं.
बीजेपी को मंडल कमीशन से लाभ पाने वाली जातियों की एकता हमेशा परेशान करती रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में अपने तब के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र  मोदी को बीजेपी ने सफलता पूर्वक ओबीसी के रूप में पेश कर दिया था जिसका राजनीतिक लाभ उनको मिला . अगर किसी  राजनीतिक परिस्थिति में ओबीसी जातियों की एकता हो जाती  है तो बीजेपी का मोदी फेस्ट वह राजनीतिक फायदा नहीं ला पायेगा जिसकी उम्मीद में इतना बड़ा आयोजन किया गया है. ओबीसी एकता के राजनीतिक नुक्सान से बीजेपी का आला नेतृव वाकिफ है .  सबको मालूम है कि इस राजनीतिक एकता के सबसे बड़े  शिल्पी लालू प्रसाद यादव ही हैं . हालांकि आजकल उनके परिवार के ऊपर कई तरह की जांच चल रही है  ,  मीडिया में भी उनकी बहुत सारी कमियों को हाईलाईट किया जा रहा है लेकिन जो लालू यादव को जानते हैं , उनको मालूम है कि राजनीतिक पार्टियों की एकता के सबसे बड़े अलमबरदार लालू यादव ही हैं .
ऐसे माहौल में जब बहुत सारी राजनीति माहौल में विद्यमान है तो आने वाले दो साल बहुत ही  दिलचस्प होने वाले हैं .ऐसा लगता है  कि  राष्ट्रपति चुनाव के हवाले अगले एक महीने में ही आने वाले दो वर्षों की राजनीति की रूप रेखा तय हो जायेगी . किसान आन्दोलन और  विपक्षी पार्टियों की एकता  देश की दो साल की राजनीति में  अहम भूमिका निभाने वाली है .

Friday, June 9, 2017

विकास के शोषण के रास्ते को नकार कर गांधी के रास्ते चलना होगा.



शेष नारायण सिंह


मध्य प्रदेश में  किसानों के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन पर सरकार ने गोलियां चलाकर कम से कम पांच किसानों को मार डाला है , अभी घायल लोग अपनी ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं .राज्य के  मुख्यमंत्री ने बताया है कि जिन लोगों को मारा गया है वे कांग्रेसी कार्यकर्ता थे. जिन को मारा गया है उनके परिवार वालों  को एक एक कारोड़ रूपये की सरकारी सहायता भी देने की घोषणा की गयी है .  सत्ताधारी पार्टी के नेता लोग दावा कर रहे हैं कि मरने वाले गुंडे थे . सरकार की तरफ से इस दिशाभ्रम पर बहुत सारे सवाल पैदा होते हैं और वे पूछे जाने चाहिए . विपक्ष की कहीं कोई खबर नहीं आ रही है . कांग्रेस के ऊपर तोड़ फोड़ का आरोप बीजेपी वाले ऐलानियाँ लगा रहे हैं लेकिन कांग्रेस की तरफ से कोई राजनीतिक बयान नहीं आया है . आमतौर पर जो कुछ भी कांग्रेसी नेता लोग कह रहे हैं उसको प्रतिक्रिया  की  श्रेणी में  रखा जा सकता है . मध्य प्रदेश की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव बादल सरोज का बयान आया है और उन्होंने राज्य में  किसानों समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों को लामबंद करना शुरू कर दिया है . सी पी एम के बयान में कहा गया है कि "  पीपल्या मंडी जिला मंदसौर में जैन मंदिर के सामनेबही पार्श्वनाथ फंटा (तिराहा) पर आंदोलनरत किसानों पर भीषण गोलीचालन की खबर विचलित कर देने वाला समाचार  है।  पुलिस द्वारा की गयी इस गोलीबारी  में अपुष्ट समाचारों के अनुसार तीन किसान मारे गए हैं तथा कोई दर्जन भर घायल हुए हैं। 
सीपीएम बेहद शर्मनाक मानती है कि जिस सरकार के मुख्यमंत्री ने इतने दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलनरत किसानों से कोई संवाद तक करना जरूरी नहीं समझा उलटे उन्हें अपमानित और लांछित करने वाली बयानबाजी करते रहे - उसी सरकार के गृह मंत्री द्वारा इस गोलीबारी पर कथित रूप से बयान दिया है कि किसानों ने खुद ही गोली मार ली होगी।  यह संवेदनहीनता और अशिष्टता की पराकाष्ठा है। ऐसे गृहमंत्री को बर्खास्त किया जाना चाहिए। 
किसान का बेटा होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री में  ज़रा भी नैतिकता है तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। " इसके बाद शिवराज सरकार का राजनीतिक विरोध शुरू हो गया  है . खबर है कि कांग्रेस वाले भी कुछ कर रहे  हैं .

मध्यप्रदेश में तो  गोली चल गयी तो बड़ी खबर बन गयी लेकिन देश के कई  राज्यों में सरकारों के खिलाफ किसानों का आन्दोलन चल रहा है . महाराष्ट्र में तो एक दिन खबर आई कि आन्दोलन में समझौता हो गया है और किसानों ने अपना संघर्ष वापस ले लिया है . बाद में पता चला कि वह खबर गलत थी. हुआ यों था कि बीजेपी के सहयोगी एक किसान संगठन के लोग भी आन्दोलन में शामिल हो गए थे और जब  संघर्ष जोर पकड़ने लगा तो उन  लोगों ने सरकार से समझौता कर लिया . जब असली आन्दोलन के नेताओं को पता चला तो समझौता करने वाले नेताओं को अलग करके फिर से संघर्ष  शुरू हुआ.  संघर्ष जारी है .इसके पहले महाराष्ट्र के किसान आन्दोलन में सत्ताधारी पार्टी के प्रिय , अन्ना  हजारे भी शामिल होने के  फ़िराक में थे लेकिन उनको भी भगाया गया क्योंकि  किसानों को मालूम है  अन्ना हजारे  बीजेपी के बहुत करीबी माने जाते हैं .उनको यह भी पता है कि जो भी मिलेगा,  संघर्ष से ही मिलेगा क्योंकि १९९१ के बाद से डॉ मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी विकास के पक्ष में खड़ा कर दिया है और उसके बाद से देश की सरकारें कल्याणकारी राज्य की  सीमा से  बाहर हो गयी हैं और बड़ी पूंजी की  पोषक सरकारें बन गयी हैं .  हर   सरकार का घोषित उद्देश्य बड़े औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना है क्योंकि उनकी समझ  में औद्योगीकरण को विकास की मुख्य    धारा में रखने से ही देश और अर्थव्यवस्था ढर्रे पर चलेगी. पूंजीवादी विकास में गरीब आदमी या ग्रामीण आदमी की भूमिका केवल उपभोक्ता की होती है .किसान  खेती से जो भी उत्पादन करता है उसपर पूंजी का पूरी तरह नियंत्रण होता है और ग्रामीण इंसान औद्योगिक विकास का कच्चा माल भर होता है .  यहाँ यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इस सांचे के बाहर नहीं जा सकता .  हां यह ज़रूर है कि किसान और गरीब का  नाम लोकसभा या  विधानसभा में बहुमत हासिल करने के लिए किया जाता है क्योंकि १२५ करोड़ लोगों  में उनका बहुत है और वे सरकार बनाने लायक बहुमत दे  सकते हैं . इसीलिये  किसानों की मुख्य समस्याएं चुनाव  अभियान के दौरान विमर्श का मुख्य विषय होती हैं और  चुनाव के बाद उनको टाल दिया जाता है . शिवराज सिंह  या नरेंद्र मोदी की  सरकार के लिए वे प्राथमिकता सूची से  बाहर रहती हैं क्योंकि किसानों  के कल्याण की योजनायें केवल  जुमला होती हैं , मनमोहन सिंह के आर्थिक दर्शन की अनुयाई कोई भी पार्टी  किसानों के भले के लिए कोई आर्थिक नीति बना ही नहीं सकती. चुनावी शिकंजे में किसान की बहुसंख्यक  वोट शक्ति को  फंसाने के लिए किसान की भलाई के नारे लगाए जाते हैं .

वास्तव में आज किसान जिस दुर्दशा  को झेल रहा है , महात्मा गांधी को उसका अनुमान शुरू से था. उन्होंने  देखा था कि किस तरह से ब्रिटिश साम्राज्य ग्रामीण क्षेत्रों और वहां रहने वालों का शोषण कर रहा था. सारी सरकारी स्कीमें बड़े और आद्योगिक शहरों या अंग्रेजों की सैरगाहों के लिए होती थीं. ऐसा इसलिए होता था कि औद्योगिक उत्पादन अंग्रेजों की शोषण की बुनियादी अवधारणा थी. इसीलिये गाँधी जी ने बताया था कि स्वतंत्र भारत में विकास की यूनिट गावों को रखा जाएगा. उसके लिए सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा परंपरागत ढांचा उपलब्ध था . आज की तरह ही गावों में उन दिनों भी गरीबी थी .गाँधी जी ने अपनी किताब ग्राम स्वराज्य में लिखा है कि   " आर्थिक विकास की ऐसी तरकीबें ईजाद की जाएँ जिस से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक दशा सुधारी जा सके और उनकी गरीबी को ख़त्म करके उन्हें संपन्न बनाया सके.. अगर ऐसा हो गया तो गाँव आत्मनिर्भर भी हो जायेंगें और राष्ट्र की संपत्ति और उसके विकास में बड़े पैमाने पर योगदान भी करेंगें . " उनका यह दृढ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गाँव स्वतंत्र ,शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर राष्ट्र के सम्पूर्ण जीवन में पूरा भाग नहीं लेते ,तब तक भारत का भावी उज्जवल हो ही नहीं सकता ....

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महात्मा गाँधी की सोच को राजकाज की शैली बनाने की सबसे ज्यादा योग्यता सरदार पटेल में थी . देश की बदकिस्मती ही कही जायेगी कि आज़ादी के कुछ महीने बाद ही महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी और करीब २ साल बाद सरदार पटेल चले गए.. उस वक़्त के देश के नेता और प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु ने देश के आर्थिक विकास की नीति ऐसी बनायी जिसमें गावों को भी शहर बना देने का सपना था. उन्होंने ब्लाक को विकास की यूनिट बना दी.यहीं से गलती का सिलसिला शुरू हो गया..ब्लाक को विकास की यूनिट बनाने  का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि गाँव का विकास गाँव वालों की सोच और मर्जी की सीमा से बाहर चला गया और सरकारी अफसर ग्रामीणों का भाग्यविधाता बन गया. फिर शुरू हुआ रिश्वत का खेल और ग्रामीण विकास के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी रक़म ही राज्यों के अफसरों की रिश्वत का सबसे बड़ा साधन बन गयी जो आज तक जारी है . नेहरू के बाद की सरकारें भी उसी रास्ते चलती रहीं लेकिन नेहरू की आर्थिक विकास की सोच में बड़े उद्योगों पर सरकारी नियंत्रण को प्रमुखता दी गयी थी. जिससे मुकामी पूंजीवादी उद्योगपति देश के आर्थिक विकास का लाभ तो ले सकते थे लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल नहीं कर सकते थे.
डॉ मनमोहन सिंह ने जिस आर्थिक विकास की बुनियाद रखी उसके बाद बड़ी पूंजी के मालिकों  को अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने के बहुत   अधिक अवसर मिल गए. आज जब लोग कुछ उद्योगपतियों द्वारा लाखों करोड़ रूपया डकार जाने की बात करते हैं तो उनको पता होना चाहिए कि पूंजीवादी आर्थिक विकास में  धन का मालिक औद्योगिक विकास पर तो नियंत्रण रखता है ,वह यह भी सुनिश्चित करता  है कि जो भी सरकारें जहां भी हों वे केवल और केवल उसके  हित में काम करें. मध्यप्रदेश , तमिलनाडु ,महाराष्ट्र, कर्नाटक,  राजस्थान, छतीसगढ़ आदि के सरकारें पूंजीपति वर्ग के हित में काम  कर रही हैं और वह अपनी तथाकथित विकास की नीतियों को लागू कर रही हैं . और जब उस मार्ग में कोई भी वर्ग बाधा डालने की कोशिश  करेगा तो उसको दण्डित किया जाएगा. मध्य प्रदेश के पीपल्या में सरकारी गोली  से हुयी किसानों की हत्या उसी पूंजीवादी अर्थशास्त्र को लागू करने की कोशिश है . जब तक लोगों की समझ में यह नहीं आयेगा कि सरकारें पूंजीवादी ताक़तों के हित में काम करती हैं तब तक किसी बदलाव की उम्मीद करना बहुत मतलब नहीं रखता.
जिस तरह की सरकारों  की स्थापना १९९२ के बाद इस देश में होना शुरू हुयी है ,उनका उद्देश्य ही पूंजी पर आधारित विकास को बढ़ावा देना  है, औद्योगीकरण के विकास के लिए धन  और अवसर उपलब्ध कराना है . और  हर सरकार वही कर रही है . अगर इस   रास्ते से देश को बचाना होगा तो वैकल्पिक आर्थिक विकास  की बात करनी होगी जिसमें किसान और खेती को विकास की बुनियाद माना जाए, विकास का कच्चा माल नहीं . इसके लिए फिर से गांधी के  रास्ते पर लौटना होगा. ज़ाहिर है न्यस्त स्वार्थ ऐसा होने नहीं देगें लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद भी तो गांधी को वह नहीं करने देना चाहता था . लेकिन  गांधी  की बात मानी गयी और अंग्रेजों को जाना पड़ा . ऐसा इसलिए संभव हुआ कि महात्मा गांधी के साथ आम आदमी की ताकत थी . गांधी के   रास्ते पर दुबारा आर्थिक विकास को लाने के लिए गांधी का रास्ता ही अपनाना पडेगा .

Tuesday, June 6, 2017

२०१८ में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव की पेशबंदी शुरू




शेष नारायण सिंह


कर्णाटक विधान सभा का चुनाव मई २०१८  में होने की संभावना है . लेकिन राज्य में  अभी से चुनाव की तैयारी  पूरी शिद्दत से शुरू ही गयी है . बीजेपी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद  तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटा दिया था  लेकिन अब उनको फिर वापस लाकर राज्य में पार्टी की कमान थमा दिया है . पार्टी में भारी मतभेद हैं  लेकिन  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उम्मीद का दिया जला दिया है . अमित शाह मूल रूप से आशावादी हैं . उन्होंने आशा की किरण तो  त्रिपुरा और केरल में भी दिखाना शुरू कर दिया है , कर्नाटक में तो खैर उनकी अपनी सरकार थी.अब बीजेपी को राजनीतिक जीवन में शुचिता भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए क्योंकि हाल के यू पी और उत्तराखंड के  विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के उन नेताओं को टिकट दिया और मंत्री बनाया जिनके खिलाफ बीजेपी के ही प्रवक्ता गण गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं . गोवा और मणिपुर में भी जिस स्टाइल में सरकारें बनायी  गयीं, वह भी बीजेपी की पुरानी वाली शुचिता की राजनीति से बहुत दूर माना जा रहा है . इस पृष्ठभूमि में जब दोबारा येदुरप्पा को कर्नाटक की पार्टी सौंपने का  फैसला आया तो कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी.कर्नाटक की प्रभावशाली जाति लिंगायत से आने वाले  येदुरप्पा का प्रभाव राज्य में है . यह बात और साफ़ हो गयी थी जब उन्होंने बीजेपी से  अलग होने के बाद अपनी पार्टी बनाकर चुनाव को ज़बरदस्त तरीके से प्रभावित किया था . बीजेपी को उम्मीद है कि लिंगायत समूह का साथ तो मिल ही जाएगा और अगर पार्टी के अन्य बड़े नेता ईश्वरप्पा का जातिगत असर चल गया तो अच्छी संख्या में समर्थन मिल जाएगा  . यह देखना दिलचस्प कि कुरुबा जाति के ईश्वरप्पा  की ही बिरादरी के मुख्यमंत्री सिद्दिरामैया भी हैं . उनकी जाति की संख्या खासी है . ज़ाहिर है सिद्दिरमैया को कमज़ोर करने के लिए यह बाज़ी चली गयी है .

जानकार बताते हैं कि कर्णाटक के वर्तमान मुख्यमंत्री को  कमज़ोर करके आंकने  की ज़रुरत नहीं है . कांग्रेसी आलाकमान की संस्कृति में  उनका मुख्यमंत्री के रूप में बचे रहना उनकी राजनीतिक  क्षमता का ही एक संकेत है . जब उनको २०१३ में मुख्यमंत्री बनाया गया तो कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र में सरकार थी. उस वक़्त कर्णाटक के  इंचार्ज महामंत्री दिग्विजय सिंह थे . ऐसा माहौल बना कि कांग्रेस की सरकार बन गयी और बड़े बड़े कांग्रेसी वफादारों को दरकिनार करके सिद्दिरमैया ने सत्ता हासिल कर ली . उनके साथ बहुत सारे नेगेटिव भी थे . मसलन वे समाजवादी पृष्ठभूमि से आये थे और कांग्रेस की धुर विरोधी जनता पार्टी के सदस्य रह चुके थे लेकिन वफादार कांग्रेसियों के विरोध के बावजूद जमे रहे और आज तक जमे हुए हैं . अब बेंगलूरू में जो चर्चा है उसके अनुसार कांग्रेस के दिल्ली के नेताओं  में अब हिम्मत नहीं  है कि चुनाव के  पहले उनको हटा दिया जाए .
२०१८ के मई महीने में संभावित विधान सभा चुनावों की तैयारी सिद्दिरमैया ने बहुत पहले से शुरू कर दी थी  . इस हफ्ते उन्होंने एक ऐसा फैसला किया है जो  निश्चित रूप से चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेगा . दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं . अब उनको और बढ़ा दिया गया है .इन नयी योजनाओं की जानकारी मीडिया को इसी २ जून को दी गयी . मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने घोषणा की कि  दलितों के लिए बहुत सारी योजनायें तुरंत प्रभाव से लागू की जा रही हैं . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था , अब  निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों को भी यह सुविधा दी जायेगी . अभी दलित छात्रों को बस में चौथाई कीमत पर बस पास मिलते हैं . अब  बस पास  बिलकुल मुफ्त में मिलेगा  . दलित जाति के लोगों अभी तक ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  पाते थे अब वह तीन लाख कर दिया गया है . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों , पौरकार्मिकों, को अब तक रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था ,अब उसे चार लाख कर दिया गया है .  इसी साल करीब एक हज़ार दलित किसानों को  विदेश यात्रा पर ले जाने के लिए समाज कल्याण और कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं .  दलितों के कल्याण के लिए पिछले चार वर्षों में करीब पचपन हज़ार करोड़ रूपये खर्च किये जा  चुके हैं . इस साल के लिए  करीब अट्ठाईस हज़ार करोड़ रूपये की अतिरिक्त  व्यवस्था कर दी गयी है . जो दक्षिण भारत की राजनीति को समझता है उसे मालूम है कि कांग्रेसी मुख्यमंत्री चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए ही सारे क़दम उठा रहे हैं .

यह सारा कार्य योजनाबद्ध तरीके से हो रहा  है . अब तक माना जाता था कि कर्णाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत, संख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . . लेकिन चुनाव के नतीजों पर यह नज़र नहीं आता था.  सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन पिछले साल अप्रैल  में कुछ पत्रकारों ने जानकारी सार्वजनिक कर दी . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी . इसी वजह से यह चर्चा भी शुरू हो गयी कि मुख्यमंत्री के दफ्तर से ही जानकारी लीक की गयी थी . बहरहाल लीक किसी ने  किया हो लेकिन जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्णाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत , मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .
अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था लेकिन यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदलेगें, इसमें दो राय नहीं है .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान , दलित और  सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .दलितों के लिए बहुत बड़ी योजनाओं के पीछे यही नए आंकड़े काम कर रहे बताये जा रहे हैं  .
इन आंकड़ों का कर्णाटक की ताक़तवर जातियां विरोध कर रही हैं . बहुत ही प्रभावशाली लिंगायत मठों से भी इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जा रहे हैं  .वे कहते हैं कि इससे समाज में बंटवारा और बढेगा . यह सारी चिंता शायद इसलिए है कि संख्या के बल  पर राजनीतिक सत्ता को खिसकते देख कर शासक वर्गों को परेशानी तो  हो ही रही है

अगले साल जनवरी में चुनाव अभियान शुरू होगा लेकिन कर्णाटक में अभी से किलेबंदी शुरू हो गयी है . इस  चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा की पार्टी का ज़िक्र नहीं आया है . उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी मज़बूत नेता रहे हैं , मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन अब लगता है कि अमित शाह के पूरे समर्थन से मैदान में आये येदुरप्पा और कांग्रेस की अकेली उम्मीद सिद्दिरमैया के बीच होने जा रहे चुनाव में वे या तो वोटकटवा साबित होंगें या किसी के साथ मिल जायेगें , क्योंकि देश की राजनीति की तरह ही कर्णाटक का चुनाव स्वार्थ की स्थाई धरा की मुख्य प्रेरणा से लड़ा जायेगा .