Thursday, January 1, 2015

विपक्ष के स्पेस पर कब्जे की लड़ाई, मुलायम के नेतृत्व में जनता परिवार की एकजुटता का आगाज़



शेष नारायण सिंह
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के  बाद महाराष्ट्र और हरियाणा की जिन दो विधान सभाओं के चुनाव हुए हैं , वहां प्रधानमंत्री की पार्टी, बीजेपी की भूमिका हमेशा से ही मामूली रही  हैं . लेकिन इस बार दोनों ही विधान सभाओं में बीजेपी सबसे मज़बूत पार्टी है और दोनों ही राज्यों में  बीजेपी की सरकारें हैं . अब लगने लगा है कि में सत्ताधारी पार्टी का तमगा तो अब लगभग मुकम्मल तरीके से बीजेपी को ही मिलने वाला है .  विधानसभा चुनावों का दूसरा मुख्य सबक यह है कि जहां कांग्रेस की सरकारें थीं वहां अब कांग्रेस बुरी तरह से हार चुकी है और तीसरे मुकाम पर पंहुंच चुकी है . जिन तीन अन्य विधानसभाओं के चुनाव होने हैं ,वहां भी कांग्रेस की हालत खराब है . दिल्ली में वह बहुत ही कमज़ोर तीसरी पार्टी है , जम्मू-कश्मीर में पिछले कई वर्षों से एक ऐसे मुख्यमंत्री को समर्थन देती रही है जिसकी विश्वसनीयता पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है और झारखण्ड में भी ऐसे नेताओं के सहारे राजनेति चल रही है जिनकी राज्य और समाज में कोई इज्ज़त नहीं है . ऐसी हालत में लगता  है कि आज़ादी के बाद से अब तक सबसे ज़्यादा समय तक सत्ता में रही पार्टी और जब सत्ता में नहीं रही तो सबसे मज़बूत विपक्षी पार्टी  का रुतबा रखने वाली कांग्रेस और धीरे धीरे मुख्य विपक्षी पार्टी के रोल से भी  बाहर हो  जायेगी . भारत की मौजूदा  राजनीति और भावी संकेतों का कोई भी जानकार बता देगा की संसदीय लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष की भूमिका भी सरकार से कम  नहीं होता  है . देश की राजनीति में बीजेपी वही मुकाम हासिल करने की कोशिश कर रही है जो कभी कांग्रेस के लिए आरक्षित हुआ करता था. और अभी फिलहाल ऐसा नहीं लग रहा है कि कोई नरेंद्र मोदी की पार्टी को चुनौती देकर पार पाने की स्थिति में है .

ज़ाहिर है देश में विपक्ष की राजनीति का जो स्पेस है वह भी कांग्रेस को उपलब्ध होता नज़रनहीं आताकांग्रेस में एक अजीब जड़ता की राजनीति हावी हो रही है .कांग्रेस पार्टी केमहानायकों महात्मा गांधी और सरदार पटेल की विरासत को बीजेपी के नेता और प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी लगभग अपना चुके हैं . अब तो यह भी लगने लगा है कि सत्ताधारी पार्टी , बीजेपी ,जवाहरलाल नेहरू की भी अच्छी बातों को राष्ट्र की धरोहर बताकर नेहरू की विरासत से भीकांग्रेस को बेदखल कर देगी . वैसे भी  राहुल गांधी की कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू कोसम्मान देने की परम्परा ख़त्म होती नज़र  रही है . कांग्रेस पार्टी ने नेहरू की १२५वीं जयन्ती मनाने के लिए जो कमेटी बनाई है उसको नेहरू की विचारधारा का विरोध करने वालोंसे भर दिया है और नेहरू के वास्तविक समर्थकों और नेहरू की विचारधारा के जानकारोंमणिशंकर अय्यर और दिग्विजय सिंह को उसमें शामिल ही नहीं किया गया है . बहरहाल मुद्दायह है कि कांग्रेस को विपक्षी पार्टी के रूप में सामान मिलना बंद होने वाला है . ऐसी स्थिति मेंमुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में राजनीतिक स्पेस घेरने के लिए नए नए गठबंधन और गठजोड़हो रहे हैं .इस पृष्ठभूमि में दिल्ली में उन पुराने नेताओं की बैठक हुयी जो १९८९ में राजीवगांधी को चुनौती देकर इकठ्ठा हुए थे . और अपने आपको जनता दल के नाम से लामबंदकिया था इस बैठक में पूर्वप्रधानमंत्री देवेगौडा, मुलायम सिंह यादव,लालू यादव, शरद यादव ,कमल मोरारका, नीतीश कुमार , ओम प्रकाश चौटाला के पौत्रआदि शामिल हुए . कोशिश एकता की थी लेकिन अभी फिलहाल उन मुद्दों पर चर्चा की गयी जिनके आधार पर संयुक्त संघर्ष चलाया जा सके. कुल मिलाकर कोशिश यही है कि विपक्ष में रहते हुए देश की राजनीति में गैर कांग्रेसी  ,गैर बीजेपी विकल्प की तलाश की जाय और लिए ताथाकथित समाजवादी ताक़तों को एकजुट किया जाए.  इस जनता परिवार के नेताओं को लगता है कि समाजवादी राजनीति के राष्ट्र की मुख्य धारा में सशक्त हस्तक्षेप का समय आ गया है .हर आइडिया का समय होता है समय के पहले कोई भी आइडिया परवान नहीं चढती . भारत की राजनीति में कांग्रेस का उदय भी एक आइडिया ही था . महात्मा गांधी ने १९२० में कांग्रेस को जन संगठन बनाने में अहम भूमिका निभाई . उसके पहले कांग्रेस का काम अंग्रेजों के उदारवाद के एजेंट के रूप में काम करना भर था .बाद में कांग्रेस ने आज़ादी की लड़ाई में देश का नेतृत्व किया. महात्मा गांधी खुद चाहते थे  कि आजादी मिलने के बाद कांग्रेस को चुनावी राजनीति से अलग करके जनान्दोलन  चलाने वाले संगठन के रूप में ही रखा जाए . चुनाव में शामिल होने के इच्छुक राजनेता अपनी अपनी पार्टियां बनाकर चुनाव  लड़ें लेकिन कांग्रेस के उस वक़्त के बड़े नेताओं ने ऐसा नहीं होने दिया .उन्होंने कांग्रेस को जिंदा रखा और आज़ादी के बाद के कई वर्षों तक राज  किया. बाद में जब डॉ राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेस वाद की  राजनीति के प्रयोग शुरू किये तो कांग्रेस को बार बार सत्ता से  बेदखल होना पड़ा. १९८९ में  गैर कांग्रेसवाद की भी पोल खुल गयी जब बाबरी मस्जिद के  विध्वंस के लिए चले आंदोलन में कांग्रेस और बीजेपी साथ  साथ खड़े नज़र आये. १९९२ में अशोक सिंहल,कल्याण सिंह और पी वी  नरसिम्हाराव के संयुक्त प्रयास से बाबरी मस्जिद ढहाई गयी लेकिन उसके पहले ही बीजेपी और कांग्रेस  का वर्गचरित्र सामने आ गया था. पूर्व प्रधान मंत्री चन्द्र शेखर ने लोक सभा के अपने ७ नवंबर १९९० के भाषण में इस बात का विधिवत पर्दाफ़ाश कर दिया था. उस भाषण में चन्द्रशेखर जी ने कहा कि धर्म निरपेक्षता मानव संवेदना की पहली परख है .  जिसमें मानव संवेदना नहीं है उसमें धर्मनिरपेक्षता नहीं हो सकती.इसी भाषण में चन्द्र शेखर जी ने बीजेपी की राजनीति को आड़े हाथों लिया था .  उन्होंने कहा कि मैं आडवाणी जी से ग्यारह महीनों से एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि   बाबरी मसजिद  के बारे में सुझाव देने  के लिए एक समिति बनायी गयीउस समिति से भारत के गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को हटा दिया जाता है . बताते चलें  कि  उस वक़्त गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव थे. चन्द्र शेखर जी ने आरोप लगाया कि इन लोगों को इस लिए हटाया गया क्योंकि विश्व हिन्दू परिषद् के कुछ नेता उनकी सूरत नहीं देखना चाहते.क्या इस  तरह से देश को चलाना है . उन्होंने सरकार सहित बीजेपी -आर एस एस की राजनीति को भी घेरे में ले लिया और बुलंद आवाज़ में पूछा कि क्यों हटाये गए मुलायम सिंह क्यों हटाये गए मुफ्ती मुहम्मद सईद ,उस दिन किसने समझौता किया था ? " 


इसी भाषण के बाद से बीजेपी ,कांग्रेस या कांग्रेस से अलग होकर आये लोगों की अपने आपको आम आदमी का पक्षधर बताने की हिम्मत नहीं पडी .बाद में जब १९९६ में गैर कांग्रेस गैर बीजेपी सरकार की बात चली तो एच डी देवे गौड़ा को प्रधान मंत्री बनाने वाली पार्टियों के गठबंधन को तीसरा मोर्चा नाम दे दिया गया था.लेकिन कोई ऐसी राजनीतिक शक्ति नहीं बनी थी जिसे तीसरे मोर्चे के रूप में पहचाना जा सके. लेकिन यह आइडिया भी कोई आकार नहीं ले पा रहा था. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में माहौल  बदल रहा है. करीब दो साल पहले स्व मधु लिमये के करीबी सहयोगी  रह चुके  राजनीतिक चिन्तक और लोहिया की राजनीति के मर्मज्ञ ,मस्तराम कपूर के प्रयास से दिल्ली में  गैर कांग्रेस गैर बीजेपी राजनेताओं और जन आंदोलन के कुछ बड़े नेताओं का जमावड़ा हुआ था जिसमें समाजवादी राजनीति की लोहिया की समझ को बुनियाद बनाकर एक   कार्यक्रम  पेश किया गया था. इस सभा की अध्यक्षता लोहिया की राजनीति के सबसे प्रमुख  उत्तराधिकारी मुलायम सिंह यादव ने किया था,.
इस बैठक में ही तीसरे मोर्चे का एजेंडा भी पेश किया गया था. योजना यह थी कि समाजवादी राजनीति की बुनियादी बातों के नाम पर एकजुटता की अपील की जायेगी . अपील की भी गयी .  विदेशी पूंजी का विरोधबिजली ,पानीईंधन और ज़रूरी खाद्य पदार्थों के निजीकरण का विरोधखेती की ज़मीन के अधिग्रहण का विरोध ,अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों  के निर्धारण पर सामाजिक नियंत्रण ,कम से कम और अधिक  से अधिक आमदनी में अनुपात  का निर्धारण  आदि शामिल हैं . राजनीतिक सुधार के कार्यक्रम भी एजेंडे में शामिल किये गए थे . मुख्य सतर्कता आयुक्त को लोकपाल की शक्तियां देकर भ्रष्टाचार नियंत्रण में सक्षम बनाना,साम्प्रदायिक दंगों और अल्पसंख्यकों के ऊपर होने वाले अपराधों के निपटारे के लिए विशेष अदालतों का  गठन ,सरकारी फिजूलखर्ची पर पाबंदी विधायक और सांसद निधि का खात्मा,दल बदल विरोधी कानून में परिवर्तन जिस से असहमति के आधिकार की रक्षा की जा सके,ग्राम सभाओं के ज़रिये सविधान के ७३वे और ७४वे संशोधन के रास्ते पंचायती राज को मज़बूत करना ,सरकारी काम में भारतीय भाषाओं के प्रयोग  जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं .इसके अलावा चुनाव प्रणाली में सुधार ,शिक्षा और संस्कृति  संबंधी कार्यक्रम और राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को मज़बूत  करने वाले कार्यक्रम शामिल किये गए थे.  . 

सम्मलेन की आयोजकों को उम्मीद थी कि तीसरे मोर्चे को एक शक्ल देने की ऐतिहासिक ज़रूरत को यह सम्मलेन  एक दिशा अवश्य देगा . सम्मलेन में कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े  नेता ए बी बर्धन ने साफ़ कहा कि वे गैर कांग्रेस गैर बीजेपी  विकल्प की तैयारी के लिए मुलायम सिंह यादव को नेता  मानने को तैयार भी हैं लेकिन कुछ नहीं हुआ. बात आगे नहीं बढ़ी . यह चुनाव के पहले की बात थी और अगर सब लोग एक ही गए होते तो शायद आज की राजनीतिक परिस्थिति बिलकुल अलग होती . लेकिन अब बीजेपी के अलावा सभी पार्टियां चुनाव हार चुकी हैं . एक बार फिर से नए सिरे से गैर कांग्रेसी राजनीतिक विपक्षे को बनाने की कोशिश तेज़ हो गयी है . देखना यह होगा कि क्या विपक्षी एकता कोई स्वरुप लेती है या पिछले पचास साल से चल रही  विपक्षी एकता जैसी ही कोई घटना होकर नहीं रह जाती .

कैप्टन अब्बास अली --- राजनीति में नैतिकता के मानदंड थे



शेष नारायण सिंह

कैप्टन अब्बास अली ९४  साल की उम्र अलविदा कह गए. कप्तान साहेब एक बेहतरीन इन्सान थे. आज़ाद हिन्द फौज का यह कप्तान जब अपनी बुलंदी पर था तो उसने किसी तरह का समझौता नहीं किया . और यह बुलंदी उनकी ज़िंदगी में हमेशा बनी रही .उनकी एक ही तमन्ना थी कि ज़िंदगी भर किसी पर आश्रित न हों . उम्र के नब्बे साल पूरे होने पर उनकी आत्मकथा को दिल्ली में प्रकाशित किया गया था . शायद इस किताब का शीर्षक यही सोच कर रखा गया होगा .शीर्षक है, " न रहूँ किसी का दस्तनिगर "  और ११ अक्टूबर को कप्तान साहेब ने आख़िरी सांस ली उसके एक दिन पहले तक अपने हाथ पाँव स चलते रहे और शान से चले गए. ९४ साल की उम्र में कप्तान साहेब जब गए तो किसी के सहारे नहीं रहे. उनके बेटे कुर्बान अली हमेशा उनको अपने साथ दिल्ली में रखना चाहते थे लेकिन कप्तान साहेब अपनी कर्मभूमि अलीगढ और बुलंदशहर को कभी  नहीं भूलते थे. मौक़ा लगते ही अलीगढ चले जाते थे. उनकी ज़िंदगी के बारे में शायद बहुत कुछ नहीं लिखा जाएगा क्योंकि वे डॉ राम मनोहर लोहिया की उस राजनीतिक परंपरा के अलमबरदार थे जिसमें सरकारी ओहदे के लिए राजनेता को कोशिश न करने की हिदायत है .लेकिन इस बहादुर इंसान की ज़िंदगी को कलमबंद होना चाहिए ताकि आने वाली नस्लों को मालूम रहे कि खुर्जा कस्बे के पास के गाँव कलंदर गढ़ी में एक ऐसा इंसान भी रहता था जिसने मानवीय आचरण की हर बुलंदी को नापा था.

समाजवादी विचारक स्वर्गीय मधु लिमये उनकी बहुत इज्ज़त करते थे. १९८८ में पहली बार मधु लिमये के पंडारा रोड वाले फ़्लैट में कप्तान साहेब से मुलाक़ात हुयी थी . राजीव गांधी का राज था और विश्वनाथ प्रताप सिंह उनको चुनौती दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में सब कुछ कांग्रेसमय था , कांग्रेस के विरोध के नाम पर कुछ  नहीं था लेकिन कप्तान साहेब को  भरोसा था कि सब कुछ बदल जाएगा  . कांग्रेस की हार की इबारत उनको साफ़ नज़र आ रही थी. कैप्टन अब्बास अली को एक ऐसे इंसान के रूप में याद किया जाना चाहिए जिसने कभी भी उम्मीद नहीं छोडी और उसी रास्ते पर चले जिसको सही समझते रहे. शायद इसी लिए उन्होंने नौजवानों से अपील की थी.  अब्बास अली को नौजवान पीढी से बहुत उम्मीदें थीं .आपने फरमाया था  ," बचपन से ही अपने इस अजीम मुल्क को आजाद व खुशहाल देखने की तमन्ना थी, जिसमें जाति-बिरादरी, मजहब व जबान या रंग के नाम पर किसी तरह का शोषण न हो। जहां हर हिंदुस्तानी सिर ऊंचा करके चल सके। जहां अमीर-गरीब के नाम पर कोई भेद-भाव न हो। हमारा पांच हजार साल का इतिहास जाति-मजहब के नाम पर शोषण का इतिहास रहा है। अपनी जिंदगी में अपनी आंखों के सामने अपने इस अजीम मुल्क को आजाद होते हुए देखने की ख्वाहिश तो पूरी हो गई, लेकिन अब भी समाज में गैरबराबरी, भ्रष्टाचार, ज़ुल्म-ज्यादती व फिरकापरस्ती का जो नासूर फैला हुआ है, उसे देखकर बेहद तकलीफ होती है। दोस्तों, उम्र के इस पड़ाव पर हम तो चिराग-ए-सहरी (सुबह का चिराग ) हैं, न जाने कब बुझ जाएं। आपसे और आने वाली नस्लों से यही गुजारिश और उम्मीद है कि सच्चाई व ईमानदारी का जो रास्ता हमने अपने बुजुर्गों से सीखा, उसकी मशाल अब तुम्हारे हाथों में है। इस मशाल को कभी बुझने मत देना।" डॉ राम मनोहर लोहिया ने एक बार कप्तान साहेब से कहा था कि " कैप्टन,आने वाली नस्लों के लिए खाद बनो " उन्होंने पूरी ज़िंदगी इस बात को पकडे रखा . शायद इसीलिये जब इमरजेंसी के बाद वे जेल से बाहर आये और चौधरी चरण सिंह ने कहा की बुलंदशहर से लोकसभा चुनाव लड़ जाओ तो उन्होंने मना कर दिया क्योंकि उनको तो औरों को लड़ाना था और जिताना था. १९७७ में कप्तान साहेब उत्तर प्रदेश जनता पार्टी के अध्यक्ष थे.

उनकी उम्र के आख़िरी पड़ाव पर जब भी उनसे मुलाकात हुयी एक बात बिलकुल साफ़ समझ में आती थी कि उनको नौजवानों से बहुत उम्मीद थी. जब वे खुद नौजवान थे और गुलाम देश के नागरिक थे तब भी उन्होंने इन्हीं सपनों के साथ ज़िंदगी जीने का फैसला किया था . मार्च १९३१ में जब सरदार भगत सिंह को अंग्रेजों ने लाहौर में फांसी दे दी तो पूरे देश में उसकी राजनीतिक धमक महसूस की गयी थी . बालक अब्बास अली उन दिनों खुर्जा में पढ़ते थे . खुर्जा में भी सरदार भगत सिंह की फांसी पर लोगों ने अपने गम-ओ-गुस्से का इज़हार किया था और जुलूस निकाला था . ९ साल के अब्बास अली उस जुलूस में शामिल हो गए . और मन में मुल्क को आज़ाद कराने का सपना पाल लिया . बाद में वे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढने गए जहां उनकी मुलाक़ात कम्युनिस्ट नेताओं से हुयी .उस दौर के मशहूर कम्युनिस्ट नेता कुंवर मोहम्मद अशरफ से मुलाकात हुयी . वहीं पर साम्राज्यवाद के विरोध की ट्रेनिंग ली और कुंवर साहेब की प्रेरणा से १९३९ में फौज में भर्ती हो गए. दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था . ब्रिटिश इन्डियन आर्मी के अधिकारी के रूप में उनकी तैनाती मलाया में हुयी . मलाया में तैनाती के समय जापानियों द्वारा युद्धबंदी बनाए गए . बाद में जब जनरल मोहन सिंह ने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया तो उसमें शामिल हो गए और अंग्रेज़ी हुकूमत को चुनौती देने के अभियान में लग गए .ऐसा करने के लिए उन्होंने  ब्रिटिश सेना से बगावत की और आजाद-हिन्द-फौज के अधिकारी बन गए. जब दूसरा युद्ध खत्म हुआ तो अंग्रेजों ने इन लोगों को युद्ध बंदी बना लिया और देशद्रोह का केस बनाया जबकि सच्चाई यह है कि आज़ाद हिन्द फौज के लोग देशद्रोही तो कतई नहीं थे . हाँ उनको ब्रिटश साम्राज्यवाद का द्रोही ज़रूर कहा जा सकता है .बहरहाल ब्रितानी फौज ने उनको १९४६ युद्धबंदी बनाया और पंजाब के मुल्तान ( अब पाकिस्त्तान ) के किले में बंदी बनाकर रखा . ब्रिटिश सेना द्वारा कोर्टमार्शल किया गया और सजा-ए-मौत सुनाई गई। लेकिन इस बीच देश आज़ाद हो गया और 1947 में देश का विभाजन होने के बाद जेल से रिहा किए गए। लेकिन इस बहादुर इंसान की ज़िंदगी में मुसीबतों ने डेरा डाल दिया था . भारत के बंटवारे के साथ साथ उनका परिवार भी बंट गया. उनके पिताजी,मां,भाई और बहन पाकिस्तान चले गए . उनपर भी दबाव था कि पाकिस्तान जाएँ लेकिन उन्होंने कहा कि अपना देश नहीं छोडूंगा क्योंकि इसकी आज़ादी के लिए हमारी पीढी ने कुर्बानी दी है और अपना गाँव नहीं छोडूंगा क्योंकि यहाँ हमारे बुजुर्गो की हड्डियां दफ़न हैं और मैं उनकी हिफाज़त के लिए मैं ज़िम्मेदार हूँ  और यह कर्त्तव्य भी पूरा करूंगा . परिवार बिखर चुका था  लेकिन कैप्टन अब्बास अली टूटे नहीं . ज़िंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया . आधे परिवार के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद अपनी जन्मभूमि भारत में ही रहना पसंद किया .

1948 में जब आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया ने कांग्रेस पार्टी छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया तो अब्बास अली उसके संस्थापक सदस्य के रूप में उस पार्टी में शामिल हो गए . डॉ लोहिया के बहुत करीबी दोस्त के रूप में काम करते रहे . अंगेज़ तो चले गए थे लेकिन 1948 से लेकर 1 मई 1977 तक सोशलिस्ट पार्टी में रहते हुए पचास से ज्यादा बार सिविल नाफरमानी आंदोलनों के तहत कांग्रेसी हुकूमत की जेलों की हवा खाई .जून 1975 में आपातकाल लगने के बाद मीसा के तहत बंदी बनाए गए और बुलंदशहर, बरेली तथा नैनी सेंट्रल जेल में 19 माह तक रहे। 1966 और 1974 में दो बार उत्तर प्रदेश संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी के राज्य सचिव चुने गए. 1967 में संयुक्त विधायक दल का गठन किया. चौधरी चरण सिंह उन दिनों कांग्रेस पार्टी के विधायक हुआ करते थे. चौधरी चरण सिंह को तोड़कर उन्हें उत्तर प्रदेश का पहला गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनवाया. इस प्रोजेक्ट में कैप्टन अब्बास अली की खासी बड़ी भूमिका थी.

1977 में लोकसभा चुनावों के दौरान जनता पार्टी ने बुलंदशहर से आपको अपना उम्मीदवार बनाना चाहा, लेकिन मना कर दिया। इसी वर्ष आप उत्तर प्रदेश जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बनाए गए। 1978 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए। 1984 में विधान परिषद से रिटायर हुए .आज़ाद भारत में कैप्टन अब्बास अली ने अगर कांग्रेस का साथ पकड़ लिया होता तो सरकारी पदों  ओहदों की भरमार हो जाती लेकिन उन्होंने डॉ राम मनोहर लोहिया का साथ किया और उसको ज़िंदगी भर निभाया . डॉ राम मनोहर लोहिया के वे निजी मित्र भी थे और राजनीतिक मित्र भी थे. डॉ लोहिया की तरह कैप्टन अब्बास अली भी अपनी राजनीति कभी नहीं छोडते थे. एक बार इलाहाबाद के हिन्दू महासभा के नेता प्रभुदत्त  ब्रह्मचारी मथुरा जेल में बंद थे . जेल में उन्होंने आमरण अनशन का फैसला किया .वे जवाहरलाल नेहरू के घोर विरोधी थे . १९५७ में फूलपुर से नेहरू के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके थे . उनके अनशन को सरकार ने कोई तवज्जो नहीं दी. प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने कहा वे अनशन तभी तोड़ेगें जब डॉ राम मनोहर लोहिया उनको  मुसम्मी का जूस पिलायेगें . डॉ लोहिया पंहुंच गए लेकिन उन्होएँ शर्त लगा दी कि किसी मुसलमान के हाथ से जूस पिलाऊँगा . कैप्टन अब्बास अली उनके साथ  थे.  इन दोनों ही नेताओं में राजनीतिक सिद्धांतों को ज़मीन पर लागू करने की अजीब बेचैनी थी.
अब्बास अली  जीवन  भर इंसानी बुलंदी और सामाजिक बराबरी की लडाई लड़ते रहे. उनका अपना परिवार राजपूतों की उस  परम्परा से ताल्लुक रखता था जिसकी जड़ें अयोध्या के राजा रामचंद्र तक जाती थीं . उनके पालन पोषण सामन्ती माहौल में हुआ था. उनके अपने गाँव कलंदर गढ़ी में भी बहुत अधिक खेती थी लेकिन उन्होंने समाजवाद की लड़ाई का मन बनाया और आखीर तक उसी मुहिम में शामिल रहे . लेकिन उनकी राजनीतिक ज़िंदगी में सामन्ती संस्कारों के लिए कोई जगह नहीं थी. कप्तान साहेब में राजनीतिक टैलेंट के पहचान की लाजवाब क्षमता थी. एक ही उदाहरण काफी होगा . १९६७ में कप्तान साहेब अपनी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के सेक्रेटरी थे. उन दिनों सेक्रेटरी के पास ही पार्टी के  महत्वपूर्ण फैसले लेने की शक्ति होती थी. आजकल की तरह राजनीतिक पार्टियों में सैकड़ों की तादाद में सेक्रेटरी नहीं होते थे . टिकट देने का काम भी सेक्रेटरी को ही करना होता था .  १९६७ में इटावा में मुलायम सिंह यादव नाम के एक मामूली कार्यकर्ता को उन्होंने बरगद निशान  वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ( संसोपा ) का टिकट दे दिया और अपने साथी राजनेताओं को बताया कि इस लड़के में वह चिंगारी है जो समाजवाद को आगे  ले जायेगी. सभी जानते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी के सभी हमलों में मुलायम सिंह यादव लड़ते रहे . कहीं  हारे तो दूसरी जगह जीते लेकिन समाजवादी झंडे को हमेशा ऊंचा रखा .
इतने बुलंद इंसान के जाने के बाद आम आदमी की बराबरी की लड़ाई में एक खालीपन तो ज़रूर  आया है . यह देखना दिलचस्प होगा कि वक़्त उसको कब पूरा करता है.  

Friday, November 7, 2014

३० साल तक पाकिस्तान परस्त अफसर को आस्तीन की साँप की तरह पाला अमरीका ने 

शेष नारायण सिंह 

१९९० के दशक के शुरुआती वर्षों  में नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की उच्चाधिकारी राबिन राफेल ने भारत के खिलाफ बहुत माहौल बना रखा था. हालांकि वे अमरीकी अफसर थीं लेकिन पाकिस्तानी एजेंट के रूप में काम करती थीं . उनका पाकिस्तान से बहुत ही अपनेपन का सम्बन्ध रहा है . उनके पति  अस्सी के दशक में पाकिस्तान में अमरीकी  राजदूत थे और जिस विमान हादसे में तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक की मौत हुयी थी, उसमें अमरीकी राजदूत भी मारे  गए थे. दिल्ली में जब राबिन राफेल तैनात थीं तो उनके घनिष्ठ निजी मित्र शफ़क़त काकाखेल नई दिल्ली स्थित  पाकिस्तानी   दूतावास में बड़े पद पर तैनात कर दिए गए थे . इन दोनों ने मिलकर भारत के खिलाफ भयानक माहौल बनाया था और भारत-अमरीकी संबंध बिलकुल तबाह हो गए थे. इन्हीं  मोहतरमा की कृपा से अमरीकी विदेश नीति में  भारतीय उप महाद्वीप की जगह दक्षिण एशिया जूमला प्रयोग होने लगा था. इनके और शफ़क़त काकाखेल के अन्तरंग क्षणों की बहुत सारी तस्वीरें  उन दिनों दिल्ली के काकटेल सर्किट में देखी जा सकती थीं . मैंने जब १९९४ में राबिब राफेल की समझ के कारण इस इलाके में फ़ैल रही तबाही का ज़िक्र अपने साप्ताहिक कालम में किया था तो  राष्ट्रीय सहारा में छपे उस लेख पर बहुत चर्चा हुयी थी . बाद में जब २००९ में ओबामा ने उनको विदेश विभाग में  दक्षिण एशिया  डेस्क पर तैनात किया तो मैंने निम्नलिखित लेख लिखा था जो मेरे ब्लॉग पर भी मौजूद है . कई अखबारों ने इसे  छापा भी था. आज खबर आयी है कि अमरीकी जांच संस्था एफ बी आई ने उनके खिलाफ आपराधिक जांच शुरू कर दिया है , अमरीकी  विदेश मंत्रालय  की उनकी पोस्ट रिटायरमेंट नौकरी ख़त्म कर दी है तो मुझे लगा कि इस लेख को फिर से जस का तस शेयर करना चाहिए .

प्रस्तुत है एक पुराना लेख . 



Sunday, November 15, 2009


ओबामा ने पाकिस्तान परस्त अफसर को तैनात करके गलती की

- शेष नारायण सिंह
अमरीकी राष्ट्रपति, बराक हुसैन ओबामा ने दक्षिण एशिया में गलतियाँ करना शुरू कर दिया है..उन्होंने पाकिस्तान को अमरीका से मिलने वाली आर्थिक सहायता के एक हिस्से की निगरानी का काम रोबिन राफेल को दे दिया है . यह हिस्सा गैर सैनिक सहायता का है. जब अमरीका ने केरी-लुगर एक्ट के तहत पाकिस्तान को करीब डेढ़ अरब डालर प्रति वर्ष की आर्थिक सहायता देने की बात की थी और उसमें बड़ी बड़ी शर्तें लगाई थीं जिसके मुताबिक अमरीका की मदद के एक एक पैसे का हिसाब रखा जाना था और पाकिस्तानी फौजियों पर सिविलियन सरकार की निगरानी रखी जानी थी तो लोगों ने उम्मीद बांधी थी कि अब अमरीका सुधर रहा है. अमरीकी टैक्सपेयर का पैसा पाकिस्तान की मनमानी के हवाले न करके , ऐसा इन्तेजाम कर दिया है कि उसका इस्तेमाल पाकिस्तानी अवाम के लिए होगा . लेकिन इन उम्मीदों पर हमेशा के लिए पानी फेर दिया गया है. अमरीकी गैर सैनिक सहायता की निगरानी का काम अमरीकी सरकार की रिटायर अफसर , रोबिन राफेल के जिम्मे कर दिया गया है. यह तेज़ तर्रार महिला अफसर काबिल तो बहुत हैं लेकिन यह पाकिस्तानी फौज, शासक वर्ग और उनकी खुफिया एजेंसियों से बहुत ही घुली मिली हैं. इनकी तैनाती का मतलब यह है कि पाकिस्तानी फौज जिस तरह से भी चाहे अमरीकी आर्थिक सहायता का इस्तेमाल कर सकती है. रोबिन राफेल को किसी भी कागज़ पर दस्तखत कर देने में कोई दिक्क़त नहीं होगी. लगता है के केरी-लुगर के आर्थिक सहायता वाले कानून के असर को पाकिस्तानी फौज के लिए बहुत उपयोगी बनाने की गरज से यह नियुक्ति की गयी है. यह वास्तव में अमरीकी फौज को दी गयी एक रियायत है.. जो लोग अमरीकी अफसर रोबिन राफेल को नहीं जानते , उनके लिए इस पहली को समझना थोडा मुश्किल होगा लेकिन दक्षिण एशिया के कूटनीतिक हलकों में इनका इतना नाम है कि कूटनीति का मामूली जानकार भी सारी बात को बहुत आसानी से समझ सकता है . आप ९० के दशक के शुरुआती वर्षों में अमरीकी प्रशासन में दक्षिण एशिया से सम्बंधित मामलों की सहायक सचिव थीं और हर मामले में अमरीकी रुख को भारत के खिलाफ करती रहती थीं. इन्होने ने कश्मीर को अमरीकी विदेशनीति की किताबों में "विवादित क्षेत्र" घोषित करवाया था. जब ये सहायक सचिव के रूप में तैनात थीं, तो पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र में अमरीकी विदेश नीति को सही दिशा में चलाने में मदद देना इनका मुख्य काम था लेकिन इन्होने अपने को पाकिस्तान के दोस्त के रूप में पेश करना ही ठीक समझा . इनके पक्षपात पूर्ण रुख का फायदा , बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ ने उठाया. उस दौर में भारत और अमरीका के आपसी रिश्तों में जो ज़हर इन्होने घोला था, बाद के अमरीकी राष्ट्रपतियों ने उसको साफ़ करने में बहुत मेहनत की .इस पृष्ठभूमि में यह समझ में नहीं आ रहा है कि बराक ओबामा जैसे सुलझे हुए राष्ट्रपति ने पाकिस्तान और अमरीका के बीच ऐसे किसी इंसान को क्यों आने दिया जिसका पाकिस्तान प्रेम इस हद तक जाता है कि वह भारत की दुश्मनी की भी परवाह नहीं करता.

रोबिन राफेल के पाकिस्तान प्रेम के कुछ भावात्मक कारण भी हैं . सबसे महत्वपूर्ण तो शायद यह है कि इनके पति आर्नाल्ड राफेल , पूर्व पाकिस्तानी तानाशाह , जनरल जिया उल हक के करीबी दोस्त थे . १७ अगस्त १९८८ को जिस विमान हादसे में जिया की मौत हुई, उसी विमान में रोबिन राफेल के पति आर्नाल्ड राफेल भी सवार थे. ज़ाहिर है वह दौर अमरीका और पाकिस्तान की दोस्ती का सबसे बेहतरीन दौर है. उसी दौर में अमरीका ने पाकिस्तान के लिए थैलियाँ खोल दी थीं क्योंकि पाकिस्तानी फौज आज के अपने दुश्मन ,,इन्हीं तालिबान और ओसामा बिल लादेन के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रही थी और अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को भगाने का काम चल रहा था. भारत उन दिनों अमरीका का दुश्मन माना जाता था क्योंकि उसकी दोस्ती सोवियत रूस से थी और पाकिस्तानी हुक्मरान अमरीका की मदद से भारत को तबाह करने पर आमादा थे. भारतीय पंजाब में पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी , आई एस आई के आर्शीवाद से आतंकवाद पूरी बुलंदी पर था और कश्मीर में आतंकवाद की तैयारियों में पाकिस्तानी खाद पड़ रही थी. ज़ाहिर है पाकिस्तान से कूटनीतिक सम्बन्ध बनांये रखने के लिए अमरीका अपने बहुत ही अधिक भरोसे के अफसर को वहां राजदूत बनाएगा. और पाकिस्तानी राष्ट्रपति का निजी विश्वास भी उस अफसर पर था , इसीलिए , अपने सबसे ज्यादा भरोसे के अफसरों के साथ किसी सैनिक विमान में यात्रा करते वक़्त , जिया उल हक ने एक विदेशी को साथ ले जाने का फैसला किया . और वह राजदूत इन रोबिन राफेल साहिबा का पति था. पाकिस्तान के मामलों में इनकी दिलचस्पी की यही व्याख्या बताते हैं . पाकिस्तान में बहुत सारे परिवारों में रोबिन राफेल के घरेलू ताल्लुकात भी हैं . पाकिस्तानी राजनयिक, शफ़क़त काकाखेल का परिवार भी ऐसा ही एक परिवार है. शफ़क़त काकाखेल ९० के दशक में दिल्ली के पाकिस्तानी दूतावास में एक बड़े पद पर तैनात थे. उन दिनों के कूटनीतिक हलकों के जानकारों को मालूम है कि श्री काकाखेल जिस तरह से चाहें , अमरीकी नीति को मोड़ सकते थे. वैसे यह बात बिलकुल सच है कि रोबिन राफेल और शफ़क़त काकाखेल की जोड़ी ने भारत के खिलाफ अमरीका का खूब जमकर इस्तेमाल किया और आज भी उन दिनों हुए नुक्सान को संभालने की कोशिश की अमरीकी राजनयिक करते रहते हैं ..

अमरीकी सरकार की सेवा से रिटायर होने के बाद भी रोबिन राफेल साहिबा अमरीका में पाकिस्तान के लिए लाबी करने का काम करती रही हैं ..उनके कुछ ताज़ा काम ऐसे हैं जो कि उनकी निष्पक्षता पर सवाल पैदा कर देते हैं. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अमरीका के लिए जमकर लाबीइंग की है. और पाकिस्तान से रक़म भी बतौर फीस वसूल पायी है . . पाकिस्तान में अमरीकी खैरात का हिसाब रखने के लिए की गयी उनकी तैनाती ऐसी ही है जैसे कहीं किसी खदान से हो रही चोरी को रोकने के लिए मधु कोडा को तैनात कर दिया जाए ..अमरीकी प्रशासन, ख़ास कर राष्ट्रपति ओबामा को चाहिए कि रोबिन राफेल की नियुक्ति को फ़ौरन रद्द कर दें वरना पूरी दुनिया जान जायेगी कि अमरीका पाकिस्तानी फौज के अफसरों के सामने घुटने टेक चुका है

Wednesday, October 8, 2014

कांग्रेस की हताशा के चलते महाराष्ट्र में बीजेपी को बढ़त



शेष नारायण सिंह
महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के पहले और लोकसभा चुनाव २०१४  के तीन महीने बाद राज्य में साफ़ नज़र आ रहा था कि वहां अब लोग नरेंद्र मोदी को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं जैसा लोकसभा चुनाव के समय ले रहे थे . कांग्रेस एन और सी पी मुगालते के शिकार हो गए .गठबंधन तोड़ने पर आमादा हो गए और जब गठबंधन टूट गया तो कांग्रेस ने हार मान ली, बीजेपी को उसी तरह से वाक् ओवर देने का मन बना लिया जैसे लोकसभा चुनाव के दौरान बनाया था नतीजा यह हुआ कि    महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव एक बहुत ही दिलचस्प दौर में पंहुंच गया है. शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद  लगने लगा था कि कांग्रेस और एन सी पी को लाभ होगा लेकिन वह गठबंधन भी लगभग साथ साथ ही टूट गया. बीजेपी की हालत कमज़ोर हो गयी लेकिन पार्टी ने तुरंत अपने सबसे बड़े आकर्षण और प्रचारक नरेंद्र मोदी को प्रचार कार्य में उतार दिया . अब नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र में धुआंधार प्रचार कर रहे हैं और कई बार तो ऐसा लगता है कि वे प्रधानमंत्री नहीं ,अपनी पार्टी के मुख्य प्रचारक ही हैं और उसके सिवा कुछ नहीं हैं . उनके प्रचार का असर पड़ा है और लोकसभा चुनाव में मोदी के पक्ष में जो माहौल बना था उसको कैश करने का अभियान तेज़ी से चल पड़ा है.  अगर बीजेपी के प्रवक्ता और सेफोलाजिस्ट जी वी एल नरसिम्हा राव की मानें तो बीजेपी को अपने बल बूते पर महाराष्ट्र में स्पष्ट बहुमत मिल रहा है .
शिवसेना से रिश्ता खत्म हो जाने के बाद बीजेपी के सामने . सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की भी दिक्कत थी . शिवसेना बीजेपी गठबंधन में जो  छोटी पार्टियां थीं, उनको बीजेपी ने शिवसेना के साथ नहीं जाने दिया ,अपने साथ ही रखा .उनको करीब ३१ सीटें देकर बीजेपी ने २५७ सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया .  जी वी एल नरसिम्हा राव का  दावा है कि उनके गठबंधन को १५२ सीटें मिलेगीं . हालांकि गठबंधन में शामिल अन्य छोटी पार्टियों की राजनीतिक हैस्किया जीतने की नहीं हैं लेकिन वे तीनों पार्टियां अगर अपनी जातियों के वोट बीजेपी के पक्ष में  ट्रांसफर कर सकीं तो बीजेपी की जीत का संभावना बढ़ जायेगी .
बीजेपी का दावा है कि कांग्रेस और शिवसेना में दूसरे नंबर पर आने के लिए मुकाबला  है . बीजेपी के प्रवक्ता , जी वी एल नरसिम्हा राव ,जो चुनाव सर्वे के जानकार भी हैं , बताते हैं कि कांग्रेस को ४४ और शिवसेना को ३८ सीटें मिलेगीं . महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और एन सी पी चौथे नंबर पर आने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं . जानकार बता रहे हैं कि महाराष्ट्र में जिस पार्टी को भी २७ प्रतिशत  सीटें मिलेगीं वह स्पष्ट बहुमत पाने में सफल हो जाएगा. बीजेपी के सेफोलाजिस्ट का दावा है कि उनकी पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन को २८ प्रतिशत  वोट मिलेगा जबकि कांग्रेस को २२ प्रतिशत ,शिवसेना को १७ प्रतिशत और एन सी पी को १५ प्रतिशत वोटों से संतुष्ट होना पडेगा . महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को करीब ६ प्रतिशत वोट मिलेगें .
लोकसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन बहुत बड़ी सफलता के साथ मैदान मारने में सफल रहा था . उसी से उत्साहित हो कर बीजेपी वालों ने वहाँ शिवसेना का बड़ा भाई होने का मन बनाया लेकिन शिवसेना ने दबाव की राजनीति का विरोध किया और गठबंधन ही तोड़ दिया . नई राजनीतिक सच्चाई को देखकर लगता है कि १९ अक्टूबर को जब नतीजे आयेगें तो  शिवसेना को अपने फैसले के लिए अफ़सोस होगा . इस बात में दो राय नहीं है कि  महाराष्ट्र के ग्रामीण  इलाकों में मोदी के पक्ष में माहौल है और मुंबई, थाणे , नवी मुंबई और पालघर में उत्तर भारतीय मतदाता भी शिवसेना से अलग होने के बाद बीजेपी की तरफ खिंच रहे हैं . बीजेपी के पास कार्यकर्ताओं की कमी थी लेकिन अब आर एस एस ने महाराष्ट्र में कार्यकर्ताओं की फौज झोंक दिया है  जिसके कारण कार्यकर्ताओं की कमी की बात भी खत्म हो गयी है . ऐसे माहौल में जी वी एल नरसिम्हा राव के सर्वे  पर विश्वास करने के लिए पर्याप्त कारण हैं . हालांकि यह भी सच है कि उनकी बहुत सारी भविष्यवाणियां पिछले कई वर्षों से गलत साबित होती रहीं हैं लेकिन आज कांग्रेस के अंदर जिस तरह से हताशा का माहौल है , वह लग्न्हाग हार मान चुकी है और किसी भी तरह से बीजेपी को चुनौती  देने के लिए तैयार नहीं हैं . इस कठोर सच्चाई के मद्दे नज़र लगता है कि महाराष्ट्र में बीजेपी की खासी बढ़त है .यह सर्वे १ और ६ अक्टूबर के बीच किए गया और इसमें ३९ विधासभा क्षेत्रों में ३२८० लोगों से सवाल पूछे गए. 

Wednesday, October 1, 2014

महात्मा गांधी के स्वराज्य में सत्य और अहिंसा स्थाई भाव थे


शेष नारायण सिंह 

अपनी अमरीका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाया।  महात्मा गांधी का दुनिया भर में सम्मान है।  आज उनकी जन्मतिथि है जिसे  नई सरकार ने बहुत बड़े उत्सव  के रूप में मनाने का फैसला किया है।  सारे सरकारी अफसर और मंत्री महात्मा गांधी की याद में सफाई अभियान शुरू करेगें, झाड़ू लेकर फोटो खिंचाएगें ।  अमरीका में अपनी सबसे बड़ी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सवाल  किया था कि  जिन महात्मा गांधी ने देश को आज़ादी दी ,उन  गांधी को हम कुछ नहीं दे रहे हैं।  उन्होंने वहीं ऐलान किया था की वह महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर एक स्वच्छ भारत देगें। यह बहुत खुशी की बात है कि  कांग्रेस  पार्टी के नेता रह चुके महात्मा गांधी को बीजेपी सरकार भी वही सम्मान दे रही है जो किसी राष्ट्रीय नेता को दिया जाना चाहिए।  प्रधानमंत्री ने अमरीका में घोषणा की थी कि  वे छोटे छोटे आदमियों के लिए बहुत बड़े  काम करना चाहते हैं।  महात्मा गांधी के जीवन और दर्शन के प्रति वर्तमान प्रधानमंत्री की यह सोच अहम है।  सरदार पटेल को  वे पहले से ही बहुत सम्मान करते हैं।  उम्मीद की जानी चाहिए कि  वे महत्मा गांधी के राजनीतिक वारिस जवाहरलाल नेहरू को भी वही सम्मान देगें जो आज़ादी की लड़ाई के शामिल रहे कांग्रेस के महान नेताओं के  प्रति आजकल करते नज़र  रहे हैं। महात्मा गांधी ने एक बहुत ही काम पृष्ठों वाली किताब , हिन्द स्वराज १९०९ में  लिखी थी जो हमारी आज़ादी की लड़ाई का बुनियादी दस्तावेज़ माना जाता है।   जयंती पर उसी किताब के बारे में कुछ मूलभूत मुद्दों पर चर्चा करना समीचीन होगा. 

 गुजरात के सौराष्ट्र इलाक़े के एक उच्चवर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ था और परिवार की महत्वाकांक्षाएं भी वही थीं जो तत्कालीन गुजरात के संपन्न परिवारों में होती थीं। वकालत की शिक्षा के लिए इंगलैंड गए और जब लौटकर आए तो अच्छे पैसे की उम्मीद में घर वालों ने दक्षिण अफ्रीका में बसे गुजराती व्यापारियों का मुकदमा लडऩे के लिए भेज दिया। अब तक उनकी जिंदगी में सब कुछ सामान्य था जैसा एक महत्वाकांक्षी परिवार के होनहार नौजवान के मामले में होता है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिसकी वजह से सब कुछ बदल गया। एटार्नी एम.के. गांधी की अजेय यात्रा की शुरूआत हुई और उनका पाथेय था सत्याग्रह। सत्याग्रह के इस महान योद्घा ने निहत्थे ही अपनी यात्रा शुरू की। इस यात्रा में उनके जीवन में बहुत सारे मुकाम आए। गांधीजी का हर पड़ाव भावी इतिहास को दिशा देने की क्षमता रखता है।
चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराज' की रचना की। 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं। अपनी रचना के सौ साल बाद भी यह उतना ही उपयोगी है जितना कि आजादी की लड़ाई के दौरान था। इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था। उनका उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का था। उन्होंने भूमिका में ही लिख दिया था कि अगर उनके विचार गलत साबित हों, तो उन्हें पकड़ कर रखना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक आचरण करें। उनकी भावना थी कि ऐसा करना देश के भले के लिए होगा।
अपने प्रकाशन के समय से ही हिंद स्वराज की देश निर्माण और सामाजिक उत्थान के कार्यकर्ताओं के लिए एक बीजक की तरह इस्तेमाल हो रही है। इसमें बताए गए सिद्घांतों को विकसित करके ही 1920 और 1930 के स्वतंत्रता के आंदोलनों का संचालन किया गया। 1921 में यह सिद्घांत सफल नहीं हुए थे लेकिन 1930 में पूरी तरह सफल रहे। हिंद स्वराज के आलोचक भी बहुत सारे थे। उनमें सबसे आदरणीय नाम गोपाल कृष्ण गोखले का है। गोखले जी 1912 में जब दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने मूल गुजराती किताब का अंग्रेजी अनुवाद देखा था। उन्हें उसका मजमून इतना अनगढ़ लगा कि उन्होंने भविष्यवाणी की कि गांधी जी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही उस पुस्तक का नाश कर देंगे। महादेव भाई देसाई ने लिखा है कि गोखले जी की वह भविष्यवाणी सही नहीं निकली। 1921 में किताब फिर छपी और महात्मागांधी ने पुस्तक के बारे में लिखा कि "वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। उसमें से मैंने सिर्फ एक शब्द रद्द किया है। उसे छोड़कर कुछ भी फेरबदल नहीं किया है। यह किताब 1909 में लिखी गई थी। इसमें जो मैंने मान्यता प्रकट की है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है।"
महादेव भाई देसाई ने किताब की 1938 की भूमिका में लिखा है कि '1938 में भी गांधी जी को कुछ जगहों पर भाषा बदलने के सिवा और कुछ फेरबदल करने जैसा नहीं लगाÓ। हिंद स्वराज एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की शुरुआती रचना है जिसे आगे चलकर भारत की आजादी को सुनिश्चित करना था और सत्य और अहिंसा जैसे दो औजार मानवता को देना था जो भविष्य की सभ्यताओं को संभाल सकेंगे। किताब की 1921 की प्रस्तावना में महात्मा गांधी ने साफ लिख दिया था कि 'ऐसा न मान लें कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की है, वैसा स्वराज्य कायम करने के लिए मेरी कोशिशें चल रही हैं, मैं जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है।..... लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज की मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पालियामेंटरी ढंग का स्वराज्य पाना है।"
इसका मतलब यह हुआ कि 1921 तक महात्मागांधी इस बात के लिए मन बना चुके थे कि भारत को संसदीय ढंग का स्वराज्य हासिल करना है। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि आजकल देश में एक नई तरह की तानाशाही सोच के कुछ राजनेता यह साबित करने के चक्कर में हैं कि महात्मा गांधी तो संसदीय जनतंत्र की अवधारणा के खिलाफ थे। इसमें दो राय नहीं कि 1909 वाली किताब में महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बांझ और बेसवा कहा था (हिंद स्वराज पृष्ठ 13)। लेकिन यह संदर्भ ब्रिटेन की पार्लियामेंट के उस वक्त के नकारापन के हवाले से कहा गया था। बाद के पृष्ठों में पार्लियामेंट के असली कर्तव्य के बारे में बात करके महात्मा जी ने बात को सही परिप्रेक्ष्य में रख दिया था और 1921 में तो साफ कह दिया था कि उनका प्रयास संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर आजादी हासिल करने का है। यहां महात्मा गांधी के 30 अप्रैल 1933 के हरिजन बंधु के अंक में लिखे गए लेख का उल्लेख करना जरूरी है। लिखा है, ''सत्य की अपनी खोज में मैंने बहुत से विचारों को छोड़ा है और अनेक नई बातें सीखा भी हूं। उमर में भले ही मैं बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आतंरिक विकास होना बंद हो गया है।.... इसलिए जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगे, तब अगर उसे मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।" इसका मतलब यह हुआ कि महात्मा जी ने अपने विचार में किसी सांचाबद्घ सोच को स्थान देने की सारी संभावनाओं को शुरू में ही समाप्त कर दिया था।
उन्होंने सुनिश्चित कर लिया था कि उनका दर्शन एक सतत विकासमान विचार है और उसे हमेशा मानवता के हित में संदर्भ के साथ विकसित किया जाता रहेगा।
महात्मा गांधी के पूरे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास। चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था। इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थें। उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगा, वह सही नहीं है। महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यहां हिंद स्वराज का स्थाई भाव है। लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में है, उतना ही साधन और साध्य के बीच में है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है। उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खडूग, बिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे।
हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने भारत की भावी राजनीति की बुनियाद के रूप में हिंदू और मुसलमान की एकता को स्थापित कर दिया था। उन्होंने साफ कह दिया कि, ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए।.... मुझे झगड़ा न करना हो, तो मुसलमान क्या करेगा? और मुसलमान को झगड़ा न करना हो, तो मैं क्या कर सकता हूं? हवा में हाथ उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों व मुल्लाओं को बीच में न आने दें, तो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला रहेगा।ÓÓ (हिंद स्वराज, पृष्ठ 31 और 35) यानी अगर स्वार्थी तत्वों की बात न मानकर इस देश के हिंदू मुसलमान अपने धर्म की मूल भावनाओं को समझें और पालन करें तो आज भी देश में अमन चैन कायम रह सकता है और प्रगति का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
इस तरह हम देखते है कि आज से ठीक सौ वर्ष पहले राजनीतिक और सामाजिक आचरण का जो बीजक महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज के रूप में लिखा था, वह आने वाली सभ्यताओं को अमन चैन की जिंदगी जीने की प्रेरणा देता रहेगा।

Tuesday, September 30, 2014

महाराष्ट्र में सारे गठबंधन टूटे, नए रिश्ते बन रहे हैं.


शेष नारायण सिंह

महाराष्ट्र में सत्ता को बाँट लेने की राजनीतिक पार्टियों की कोशिश को ज़बरदस्त झटका लगा है . बीजेपी और शिव सेना की करीब तीस साल से चली आ रही चुनावी दोस्ती ख़त्म हो गयी है . हालांकि बीजेपी और शिव सेना के नेता बार बार कह रहे हैं कि उनका समझौता २५ साल पुराना है लेकिन सब जानते हैं कि १९८४ का लोकसभा चुनाव भी बीजेपी और शिव सेना ने साथ साथ लड़ा था . उस चुनाव में राजीव  गांधी की वैसी ही आंधी चल रही थी जैसी लोकसभा २०१४ में नरेंद्र मोदी की चली थी . नतीजा यह हुआ था कि बीजेपी को भारी नुक्सान हुआ था और पार्टी शून्य पर पंहुंच गयी थी लेकिन जब बीजेपी ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद को राम मंदिर बताकर हिंदुत्व के आधार पर राजनीतिक अभियान शुरू किया तो १९८९ में फिर दोनों पार्टियां एक हो गयी थीं. यह एकता चुनावी लाभ के लिए थी .इसके बाद के हर चुनाव के सीज़न में बीजेपी शिवसेना एक होती रहीं . बीजेपी शिव सेना गठबंधन को १९९५ में एक बार सत्ता भी मिल गयी थी . शिव सेना  के नेता मनोहर जोशी मुख्यमंत्री  बन गए थे . लेकिन उसके से अब तक राज्य सरकार  बनाने का मौक़ा इस गठबंधन को नहीं मिला. हां  इस गठबंधन को मुंबई नगर निगम में सफलता मिलती रही . जानकार जानते हैं कि मुंबई महानगर की नगरपालिका की सत्ता  कोई मामूली सत्ता नहीं है . सारा मुंबई उसके दायरे में आता है ।इस तरह से सत्ता की सीमेंट इन दोनों ही पार्टियों को एकता के सूत्र में बांधे  रखने में सफल रही . लेकिन अब सब टूट गया है . बीजेपी और शिव सेना एक दूसरे के खिलाफ विधान सभा चुनाव मैदान में हैं और दीपावली के पूर्व ही पता लग जाएगा कि कौन कितने पानी में है.
बीजेपी शिवसेना गठबंधन के टूटने की राजनीति का स्थाई भाव सत्ता का लोभ है ।सत्ता की पक्की उम्मीद का कारण यह है कि दोनों ही पार्टियों को मालूम है कि सत्ताधारी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस बहुत कमज़ोर पड़ गयी हैं . लोकसभा चुनावों में सारी तस्वीर साफ़ हो चुकी  है . ज़ाहिर है कि उनकी सत्ता ख़त्म होने वाली है . बीजेपी को लगता है कि नरेंद्र मोदी के नाम पर लोकसभा २०१४ का चुनाव जीता गया है इसलिए शिवसेना को उसका एहसान मानना चाहिए और उसे ज़्यादा सीटें देनी चाहिए  लेकिन शिवसेना के नेताओं का कहना  है कि पुराना वाला इंतज़ाम सही था जहां बीजेपी से करीब डेढ़ गुनी ज़्यादा सीटें शिव सेना के पास हुआ करती थीं . शिवसेना के नए अध्यक्ष उद्धव ठाकरे मानते हैं कि उनके स्वर्गीय पिता बालासाहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र में बीजेपी को ज़मीन दी और प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को उनके बुरे वक़्त में मदद की । शायद यही सब सोच कर उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बना दिया है जबकि बीजेपी चाहती है कि जिसकी सीटें ज़्यादा आयें वही मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाए. लोकसभा चुनाव में सफलता के बाद बीजेपी ने दावा शुरू कर दिया कि २८८ सीटों वाली विधानसभा में उसको १४४ सीटें मिलनी चाहिए जिसे बाद में सौदेबाजी के दौरान कम कर दिया गया . बहरहाल कई दिनों तक दोनों पार्टियों के नेता सीटों की गिनती के सवाल पर बात करते रहे और गठबंधन के टूटने में सीटों की मांग एक महत्वपूर्ण कारण है . लेकिन जो सबसे बड़ा कारण है वह दोनों ही पार्टियों के नेताओं की तरफ से अपनी बात को ऊपर रखने की जिद है .
महाराष्ट्र में गठबंधन की राजनीति को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह बात दिमाग में मजबूती से बैठा ली जाए कि १९८९ में जब स्वर्गीय बाल ठाकरे और स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने गठबंधन किया था तो सबसे बड़ा कारण हिंदुत्व की राजनीति पर दोनों ही पार्टियों की समान सोच थी . बाबरी मस्जिद के खिलाफ आर एस एस के आन्दोलन में शिव सेना ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था और शिव सेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे और बीजेपी के नौजवान नेता प्रमोद महाजन के बीच अच्छे सम्बन्ध थे . दोनों ही एक दुसरे के निजी और संगठनात्मक आत्मसम्मान का ख्याल रखते थे . कांग्रेस की सत्ता को ख़त्म करने के लिए आतुर भी थे . जहां तक शिवसेना का प्रश्न है बाल ठाकरे उसके सर्वे सर्वा थे और प्रमोद महाजन को भी बीजेपी के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी का आशीर्वाद प्राप्त था . उन दिनों मुंबई में चारों तरफ शिव सेना का दबदबा था और बीजेपी की कोई ख़ास मौजूदगी नहीं थी. समझौता हो गया और अब तक चलता  रहा  . बीजेपी को छोटे भाई के रोल में रहने में कोई दिक्कत नहीं थी . लेकिन अब हालात बदल गए हैं . बीजेपी अब देश की सबसे बड़ी पार्टी है ,उसके सबसे बड़े नेता ने देश को कांग्रेस मुक्त करने का वायदा कर रखा है और कहीं भी अब उसे छोटे भाई की भूमिका स्वीकार नहीं है .ऐसे माहौल में इस बार के सीट के बंटवारे के बारे में समझौते की बात शुरू हुयी . स्व बालासाहेब ठाकरे की जगह पर उनके पुत्र उद्धव ठाकरे अब पार्टी के अध्यक्ष हैं . उनका राजनीतिक क़द वह नहीं है जो उनके पिता का हुआ करता था . उनकी अपनी  पार्टी में ही उनकी वह पोजीशन नहीं है जो पूर्व अध्यक्ष की थी.  उनसे बातचीत करने के लिए बीजेपी ने राजीव प्रताप रूडी को अधिकृत कर दिया  जो पार्टी के महत्वपूर्ण नेता हैं और ऊंचे पद पर हैं . लेकिन  उद्धव ठाकरे ने इसका बुरा माना . उनको लगा कि शिव सेना प्रमुख से पहले अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी चर्चा किया करते थे और अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह तो कहीं हैं नहीं एक मामूली नेता को भेज दिया गया  है. उन्होंने अपने हिसाब से इसका जवाब दिया और अपने बेटे आदित्य ठाकरे को बीजेपी के बड़े  नेता ओम माथुर के पास बातचीत करने के लिए भेज दिया . बीजेपी ने इसका बुरा मना और उसके बाद से रिश्ते लगातार बिगड़ते रहे . सीटों के तालमेल के बारे में बीजेपी ने लचीला रुख अपनाया लेकिन शिव सेना १५० से नीचे आने को तैयार नहीं थी . जब पर्चा दाखिल करने की अंतिम तारीख बिलकुल करीब आ पंहुची तो बीजेपी ने समझौते के खात्मे  का ऐलान कर दिया .
इसके लगभग तुरंत बाद ही कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का समझौता भी टूट गया .वहां भी  सीटों के तालमेल को ही कारण बताया गया . लेकिन लगता है कि कांग्रेस को एबीपी न्यूज़ पर दिखाए गए चुनाव  पूर्व सर्वे ने भी प्रभावित किया जिसमें बताया गया था कि अगर कांग्रेस पार्टी यह तय कर ले कि राष्ट्रवादी कांग्रेस से अलग रहकर चुनाव लड़ना है तो कांग्रेस को फ़ायदा होगा . पंद्रह साल से महाराष्ट्र में कांग्रेस-एन सी पी गठबंधन की सरकार है . उसके खिलाफ आम तौर पर माहौल बना हुआ है .पूरे देश में बीजेपी का डंका बज रहा है .  महाराष्ट्र में भी लोकसभा चुनाव में  अभी कुछ महीने पहले  बीजेपी की ताक़त देखी गयी है . उस चुनाव में मौजूदा सरकार पर तरह तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए . जो आरोप सबसे ज़्यादा  चर्चा में रहा , वह  सिंचाई मंत्री अजित पवार के घोटालों से सम्बंधित रहा . कांग्रेस को लग रहा है कि अगर अजित पवार के खिलाफ बोलने का मौक़ा ठीक से मिल जाए तो वह अपनी सरकार के भ्रष्टाचार का ठीकरा राष्ट्रवादी कांग्रेस के मत्थे मढ़ने में सफल हो जायेगी और कम सीटें हारेगी . जबकि  राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेताओं को लगता है की जो एंटी इनकम्बेंसी है वह कांग्रेस को ज़्यादा नुकसान पंहुचायेगी लिहाजा कांग्रेस से पिंड छुडा लेना ही ठीक है .
दोनों ही गठबन्धनों के टूट जाने के बाद अब महाराष्ट्र में चुनाव बहुत ही दिलचस्प दौर  में पंहुच गया है और अब सारा ध्यान चुनाव के बाद  के गणित पर टिक गया है .बड़ी चर्चा है कि बीजेपी या शिव सेना को अगर ज़रुरत पडी तो चुनाव बाद वह शरद पवार से बात करके सरकार बना सकते हैं . जहां तक शरद पवार का सवाल है वे सत्ता  शीर्ष पर बैठे ज़्यादातर नेताओं से अच्छे सम्बन्ध रखते हैं .  और ज़रूरत पड़ने पर उनके  ऊपर कोई भी पार्टी भरोसा कर सकती है . उनके सन्दर्भ में अभी नतीजे आने तक अनिश्चितता बनी रहेगी . इस बीच एक और अनिश्चितता भी चुनावी अखाड़े में शामिल हो गयी . उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे भी चुनाव में अचानक महत्वपूर्ण हो गए हैं . २००९ के विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी ने सीटें तो ज्यादा नहीं  हासिल कीं लेकिन बहुत सारी सीटों पर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को हराने में अहम् भूमिका निभाई थी. लगता है कि वही माहौल फिर बन रहा है . दूसरी दिलचस्प बात यह है कि पिछले दिनों हुए उपचुनावों में साफ़ समझ में आ गया है कि नरेंद्र मोदी की वह हवा नहीं है जैसी लोकसभा चुनाव के दौरान थी . उत्तर प्रदेश, बिहार , महाराष्ट्र ,उत्तराखंड समेत सभी राज्यों में बीजेपी के उम्मीदवार धडाधड  हारे हैं . इसलिए अब जब चुनाव बहुकोणीय हो गया है तो पक्के तौर पर कुछ भी नहीं कहा  जा सकता . उधर खबर है कि गठबंधन तोड़ कर कांग्रेस वाले मुकामी तौर पर  समाजवादी पार्टी के साथ समझौता कर सकते हैं . समाजवादी पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता से बात करने पर पता चला कि महाराष्ट्र के चुनाव में वहां के अध्यक्ष अबू आसिम   आजमी को सारे अधिकार दे दिए गए हैं  और चुनावी गठजोड़ आदि के बारे में वही फैसला लेगें . अगर कांग्रेस और समाजवादी में कोई समझौता हो जाता है तो  दोनों ही पार्टियों को फ़ायदा होगा. सबसे दिलचस्प बात यह होगी कि इन पार्टियों का अगर सही समझौता हो गया तो मुंबई और थाणे में ऐसी बहुत सारी सीटें होंगीं जहां शिवसेना और बीजेपी के उम्मीदवारों को मुश्किल पेश आ सकती है . मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के वोट हैं . दोनों पार्टियां जब अलग अलग लडती हैं  तो उनके सामने भारी  दुविधा आती है .लेकिन एकता हो जाने पर  मुसलमानों के वोट को एकमुश्त करना आसान होगा. शिवसेना से अलग होने पर बीजेपी को भी  उत्तर  भारतीयों के कुछ वोट मिल सकेगें क्योंकि जहां से वे आते हैं उन राज्यों में  बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में बहुत अच्छा किया है . लेकिन शिवसेना के परप्रांतीयों के खिलाफ अभियान के चलते  उत्तर प्रदेश, बिहार , मध्य प्रदेश और राजस्थान से आये हुए लोग  मुंबई में बीजेपी से दूर ही रहते हैं . अब बीजेपी का चुनाव शिवसेना के बैगेज से मुक्त है तो हिंदी भाषी राज्यों से आये लोग उसकी ओर  आकर्षित हो सकते हैं .
कुल मिलाकर महाराष्ट्र का चुनाव बहुत ही दिलचस्प मोड़ तक पंहुंच गया है . देखना यह है कि दीपावली के दिन किन पार्टियों के यहाँ  चरागाँ होगा और किसके यहाँ मातम मनाया जायेगा . 

Thursday, September 18, 2014

जब तक सभी दलितों की हालत नहीं सुधरेगी , सामाजिक बराबरी का सपना बेमतलब है



शेष नारायण सिंह 

उसके गाँव में सबसे गरीब दलित बस्ती में रहने वाले लोग होते थे .चमार शब्द का उपयोग किसी को गाली देने के लिए किया जाता था .और हिदायत थी कि चमार को छूना नहीं है . वह भी बचपन में ऐसे ही करता था . लेकिन जब प्राइमरी स्कूल में गया तो दलितों के बच्चों के साथ टाट पर बैठना शुरू हो गया . हर साल गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने मामा के यहाँ चला जाता था ,जौनपुर शहर से लगा हुआ गाँव . कई बार छुट्टी शुरू होने के पहले स्कूल की परवाह किये बिना अप्रैल में ही जाना पैड जाता था क्योंकि अगर कोई शादी ब्याह अप्रैल में पड़ गया तो स्कूल की छुट्टियों का इंतज़ार थोड़े ही किया जाएगा .मामा के गाँव में उसकी दोस्ती एक दलित लडके से हो गयी. शहर से लगे हुए उस गाँव में दलितों के साथ उतना अत्याचार नहीं होता था जितना उसके गाँव में .उसके अपने गाँव में गाली और अपमान के ज़्यादातर सन्दर्भ ऐसे थे जिसमें चमार शब्द का इस्तेमाल होता था. जब वह आठवी में था तो उसकी मुलाक़ात किसी समाजवादी नेता से हो गयी .  वे गाँव में ही किसी के दूर के रिश्तेदार थे . इस रिश्तेदार ने उसकी दुनिया में तूफ़ान ला दिया. उसको पता चला कि चमार भी उसकी तरह के ही इंसान होते हैं . उसने अपने बाबू की दलितों संबंधी जानकारी को गलत मानना शुरू कर दिया .बाबू के उस तर्क को उसने खारिज करना शुरू कर दिया जिसमें शूद्र को पीटने की बात को ज़मींदार का कर्त्तव्य बताया जाता था. उसके बाबू पढ़ाई लिखाई के भी खिलाफ थे . उनका कहना था कि पढ़ लिख कर लडके किसी काम के नहीं रह जाते . दसवीं के बाद उसकी पढ़ाई पर रोक लग गयी थी  लेकिन उसकी माँ ने जिद करके अपने मायके ले जाकर जौनपुर में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए नाम लिखवा दिया .वह जौनपुर गया तो उसके बचपन के दलित साथी ने पढ़ाई छोड़ दी थी, उसका गौना आ गया था और वह किसी का हलवाहा बन गया था. उसने अपने बचपन के साथी से सम्बन्ध बनाए रखा. उसके अपने गाँव में दलितों के बच्चों के नाम ऐसे होते थे जो ठाकुरों ब्राह्मणों के नाम से अलग लगते थे . ढिलढिल ,फेरे, मतन, बुतन्नी, बग्गड़ ,मतई ,दूलम,दुक्छोर, बरखू, हरखू आदि . अगर किसी दलित बच्चे का नाम ठाकुरों के बच्चों से मिलता जुलता रख दिया जाता था तो व्यंग्य में कहा जाता था कि बिटिया चमैनी कै नाउ राजरनियाँ. यह कहावत उसके दिमाग में घुसी हुई थी . और जब उसके मामा के गाँव के हलवाहे और उसके बचपन के मित्र के घर बेटी पैदा हुई तो उसने उसका नाम राजरानी रखवा दिया. यह बात जब उसके बाबू को पता चली तो वे बहुत खफा हुए और परंपरा तोड़ने का आरोप लगा कर अपने ही बेटे को अपमानित किया , मारा पीटा .

बात आई गयी हो गयी . राजरानी को अफसर बनने लायक शिक्षा दिलवाने में उसने बहुत पापड़ बेले . तरह तरह के लोगों ने विरोध किया लेकिन लड़की कुशाग्रबुद्धि थी , पढ़ लिख गयी . और पुलिस में सब इन्स्पेक्टर हो गयी . ट्रेनिंग पर गयी और तैनाती सुल्तानपुर जिले में ही हो गयी . जब उसने अपने पिता के मित्र के बाबू जी के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की तो वे सन्न रह गए और कहा कि मैं तो पहले ही कहता था कि यह लड़की बहुत ऊंचे मुकाम तक जायेगी. हालांकि यह बात उन्होंने कभी नहीं कही थी . वे तो उसको गाली ही देते रहते थे .सच्चाई यह है कि उन बाबू साहेब और उन जैसी सामंती मानसिकता वालों की सोच की मुखालफत के बावजूद लडकी ने तरक्की की थी . अगर माकूल माहौल मिला होता तो शायद और ऊंचे पद पर जाती. इस कहानी की चर्चा करने का उद्देश्य यह है कि इस बात का मुगालता नहीं होना चाहिए कि अर्ध शिक्षित और अशिक्षित सामन्तों की मानसिकता कभी नहीं बदलेगी. यहाँ उन अर्द्धशिक्षितों को भी शामिल करना होगा जो डिग्रीधारी हैं . देश में तथाकथित शिक्षितों का एक वर्ग लड़कियों की शिक्षा का हमेशा विरोध करता रहा  है .  अगर सामाजिक बराबरी की लड़ाई लड़ने वाले लड़कियों की शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दें तो मकसद को हासिल करना ज्यादा आसान होगा . महात्मा फुले ने लड़कियों की ,खासका दलित लड़कियों की शिक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी और उनके बाद के महाराष्ट्र में यह सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक बना था .
ज़रुरत इस बात की है कि दलित लड़कियों के लिए अलग से आरक्षण दिया जाना चाहिए . अजीब बात है कि इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो रहा है . शायद ऐसा इस्सलिये कि पुरुष प्रधान भारतीय समाज में दलित हित की बात करने वाले नेताओं की मूल सोच भी सामंती संस्कारों से ठस्स है .महिलाओं को अफरमेटिव एक्शन के ज़रिय बराबरी पर लाने की बात भी होती रही है .  इस बीच महिलाओं के लिए लोक सभा और विधान मंडलों में सीटें रिज़र्व करने की बहस में बहुत सारे आयाम जुड़ गए हैं.. संविधान लागू होने के ६४ साल बाद भी दलितों को उनका हक नहीं मिल पाया है जबकि संविधान के निर्माताओं को उम्मीद थी कि आरक्षण की व्यवस्था को दस साल तक ही रखना होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिन लोगों के हाथों में सत्ता का कंट्रोल आया उनकी सोच जालिमाना और सामंती थी . शायद इसी लिए दलितों को उनका हक नहीं मिला. शिक्षा, न्याय, प्रशासन, राजनीति ,व्यापार , पत्रकारिता आदि जैसे जितने भी सत्ता के आले थे ,जहां सब पर दलित विरोधियों का क़ब्ज़ा था. जाति व्यवस्था का सबसे क्रूर पहलू दलितों के लिए ही आरक्षित था . उनके लिए संविधान के तहत जो अवसर मुहैया कराये गए थे , उन अवसरों को लागू करने वाले तंत्र पर भी पर भी जाति व्यवस्था का सांप कुण्डली मार कर बैठा हुआ था . डॉ अंबेडकर और डॉ लोहिया ने जाति व्यवस्था की बंदिश को तोड़ने की जो कोशिश की उसका भी वह नतीजा नहीं निकला जो निकलना चाहिए था . आरक्षण की वजह से जो दलित लोग उस चक्रव्यूह से बाहर आये उनमें से काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो शहरी मध्य वर्ग के सदस्य बन गए और उनकी भी सोच सामंती हो गयी. उन्होंने सामाजिक परिवर्तन और बराबरी के लिए वह नहीं किया जो उनको करना चाहिए था. आज ज़रुरत इस बात की है कि मनुवादी व्यवस्था के वारिसों को तो दलित अधिकारों की चेतना से अवगत कराया ही जाए लेकिन दलित परिवारों से आये भाग्य विधाता नेताओं और नौकरशाहों को भी चेताया जाये कि जब तक सभी दलितों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरेगी सामाजिक बराबरी का सपना देखना भी बेमतलब है . अगर ऐसा हुआ तो नयी पीढी की राजरानी सब इन्स्पेक्टर नहीं होगी, वह सीधे आई पी एस में भर्ती होगी.