Thursday, September 18, 2014

जब तक सभी दलितों की हालत नहीं सुधरेगी , सामाजिक बराबरी का सपना बेमतलब है



शेष नारायण सिंह 

उसके गाँव में सबसे गरीब दलित बस्ती में रहने वाले लोग होते थे .चमार शब्द का उपयोग किसी को गाली देने के लिए किया जाता था .और हिदायत थी कि चमार को छूना नहीं है . वह भी बचपन में ऐसे ही करता था . लेकिन जब प्राइमरी स्कूल में गया तो दलितों के बच्चों के साथ टाट पर बैठना शुरू हो गया . हर साल गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने मामा के यहाँ चला जाता था ,जौनपुर शहर से लगा हुआ गाँव . कई बार छुट्टी शुरू होने के पहले स्कूल की परवाह किये बिना अप्रैल में ही जाना पैड जाता था क्योंकि अगर कोई शादी ब्याह अप्रैल में पड़ गया तो स्कूल की छुट्टियों का इंतज़ार थोड़े ही किया जाएगा .मामा के गाँव में उसकी दोस्ती एक दलित लडके से हो गयी. शहर से लगे हुए उस गाँव में दलितों के साथ उतना अत्याचार नहीं होता था जितना उसके गाँव में .उसके अपने गाँव में गाली और अपमान के ज़्यादातर सन्दर्भ ऐसे थे जिसमें चमार शब्द का इस्तेमाल होता था. जब वह आठवी में था तो उसकी मुलाक़ात किसी समाजवादी नेता से हो गयी .  वे गाँव में ही किसी के दूर के रिश्तेदार थे . इस रिश्तेदार ने उसकी दुनिया में तूफ़ान ला दिया. उसको पता चला कि चमार भी उसकी तरह के ही इंसान होते हैं . उसने अपने बाबू की दलितों संबंधी जानकारी को गलत मानना शुरू कर दिया .बाबू के उस तर्क को उसने खारिज करना शुरू कर दिया जिसमें शूद्र को पीटने की बात को ज़मींदार का कर्त्तव्य बताया जाता था. उसके बाबू पढ़ाई लिखाई के भी खिलाफ थे . उनका कहना था कि पढ़ लिख कर लडके किसी काम के नहीं रह जाते . दसवीं के बाद उसकी पढ़ाई पर रोक लग गयी थी  लेकिन उसकी माँ ने जिद करके अपने मायके ले जाकर जौनपुर में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए नाम लिखवा दिया .वह जौनपुर गया तो उसके बचपन के दलित साथी ने पढ़ाई छोड़ दी थी, उसका गौना आ गया था और वह किसी का हलवाहा बन गया था. उसने अपने बचपन के साथी से सम्बन्ध बनाए रखा. उसके अपने गाँव में दलितों के बच्चों के नाम ऐसे होते थे जो ठाकुरों ब्राह्मणों के नाम से अलग लगते थे . ढिलढिल ,फेरे, मतन, बुतन्नी, बग्गड़ ,मतई ,दूलम,दुक्छोर, बरखू, हरखू आदि . अगर किसी दलित बच्चे का नाम ठाकुरों के बच्चों से मिलता जुलता रख दिया जाता था तो व्यंग्य में कहा जाता था कि बिटिया चमैनी कै नाउ राजरनियाँ. यह कहावत उसके दिमाग में घुसी हुई थी . और जब उसके मामा के गाँव के हलवाहे और उसके बचपन के मित्र के घर बेटी पैदा हुई तो उसने उसका नाम राजरानी रखवा दिया. यह बात जब उसके बाबू को पता चली तो वे बहुत खफा हुए और परंपरा तोड़ने का आरोप लगा कर अपने ही बेटे को अपमानित किया , मारा पीटा .

बात आई गयी हो गयी . राजरानी को अफसर बनने लायक शिक्षा दिलवाने में उसने बहुत पापड़ बेले . तरह तरह के लोगों ने विरोध किया लेकिन लड़की कुशाग्रबुद्धि थी , पढ़ लिख गयी . और पुलिस में सब इन्स्पेक्टर हो गयी . ट्रेनिंग पर गयी और तैनाती सुल्तानपुर जिले में ही हो गयी . जब उसने अपने पिता के मित्र के बाबू जी के घर जाकर उनसे मुलाक़ात की तो वे सन्न रह गए और कहा कि मैं तो पहले ही कहता था कि यह लड़की बहुत ऊंचे मुकाम तक जायेगी. हालांकि यह बात उन्होंने कभी नहीं कही थी . वे तो उसको गाली ही देते रहते थे .सच्चाई यह है कि उन बाबू साहेब और उन जैसी सामंती मानसिकता वालों की सोच की मुखालफत के बावजूद लडकी ने तरक्की की थी . अगर माकूल माहौल मिला होता तो शायद और ऊंचे पद पर जाती. इस कहानी की चर्चा करने का उद्देश्य यह है कि इस बात का मुगालता नहीं होना चाहिए कि अर्ध शिक्षित और अशिक्षित सामन्तों की मानसिकता कभी नहीं बदलेगी. यहाँ उन अर्द्धशिक्षितों को भी शामिल करना होगा जो डिग्रीधारी हैं . देश में तथाकथित शिक्षितों का एक वर्ग लड़कियों की शिक्षा का हमेशा विरोध करता रहा  है .  अगर सामाजिक बराबरी की लड़ाई लड़ने वाले लड़कियों की शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान दें तो मकसद को हासिल करना ज्यादा आसान होगा . महात्मा फुले ने लड़कियों की ,खासका दलित लड़कियों की शिक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी और उनके बाद के महाराष्ट्र में यह सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक बना था .
ज़रुरत इस बात की है कि दलित लड़कियों के लिए अलग से आरक्षण दिया जाना चाहिए . अजीब बात है कि इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो रहा है . शायद ऐसा इस्सलिये कि पुरुष प्रधान भारतीय समाज में दलित हित की बात करने वाले नेताओं की मूल सोच भी सामंती संस्कारों से ठस्स है .महिलाओं को अफरमेटिव एक्शन के ज़रिय बराबरी पर लाने की बात भी होती रही है .  इस बीच महिलाओं के लिए लोक सभा और विधान मंडलों में सीटें रिज़र्व करने की बहस में बहुत सारे आयाम जुड़ गए हैं.. संविधान लागू होने के ६४ साल बाद भी दलितों को उनका हक नहीं मिल पाया है जबकि संविधान के निर्माताओं को उम्मीद थी कि आरक्षण की व्यवस्था को दस साल तक ही रखना होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिन लोगों के हाथों में सत्ता का कंट्रोल आया उनकी सोच जालिमाना और सामंती थी . शायद इसी लिए दलितों को उनका हक नहीं मिला. शिक्षा, न्याय, प्रशासन, राजनीति ,व्यापार , पत्रकारिता आदि जैसे जितने भी सत्ता के आले थे ,जहां सब पर दलित विरोधियों का क़ब्ज़ा था. जाति व्यवस्था का सबसे क्रूर पहलू दलितों के लिए ही आरक्षित था . उनके लिए संविधान के तहत जो अवसर मुहैया कराये गए थे , उन अवसरों को लागू करने वाले तंत्र पर भी पर भी जाति व्यवस्था का सांप कुण्डली मार कर बैठा हुआ था . डॉ अंबेडकर और डॉ लोहिया ने जाति व्यवस्था की बंदिश को तोड़ने की जो कोशिश की उसका भी वह नतीजा नहीं निकला जो निकलना चाहिए था . आरक्षण की वजह से जो दलित लोग उस चक्रव्यूह से बाहर आये उनमें से काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो शहरी मध्य वर्ग के सदस्य बन गए और उनकी भी सोच सामंती हो गयी. उन्होंने सामाजिक परिवर्तन और बराबरी के लिए वह नहीं किया जो उनको करना चाहिए था. आज ज़रुरत इस बात की है कि मनुवादी व्यवस्था के वारिसों को तो दलित अधिकारों की चेतना से अवगत कराया ही जाए लेकिन दलित परिवारों से आये भाग्य विधाता नेताओं और नौकरशाहों को भी चेताया जाये कि जब तक सभी दलितों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरेगी सामाजिक बराबरी का सपना देखना भी बेमतलब है . अगर ऐसा हुआ तो नयी पीढी की राजरानी सब इन्स्पेक्टर नहीं होगी, वह सीधे आई पी एस में भर्ती होगी.


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