शेष नारायण सिंह
प्रोफ़ेसर काशी नाथ सिंह हिन्दी के बेहतरीन लेखक हैं . ज़रुरत से ज्यादा ईमानदार हैं और लेखन में अपने गाँव जीयनपुर की माटी की खुशबू के पुट देने से बाज नहीं आते. हिन्दी साहित्य के बहुत बड़े भाई के सबसे छोटे भाई हैं . उनके भईया का नाम दुनिया भर में इज्ज़त से लिया जाता है. और स्कूल से लेकर आज तक हमेशा अपने भइया से उनकी तुलना होती रही है .उनके भइया को उनकी कोई भी कहानी पसंद नहीं आई , अपना मोर्चा जैसा कालजयी उपन्यास भी नहीं . यह अलग बात है कि उस उपन्यास का नाम दुनिया भर में है . कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ' साठ और सत्तर के दशक की छात्र राजनीति पर लिखा गया वह सबसे अच्छा उपन्यास है . काशीनाथ सिंह फरमाते हैं कि शायद ही उनकी कोई ऐसी कहानी हो जो भइया को पसंद हो लेकिन ऐसा संस्मरण और कथा-रिपोर्ताज भी शायद ही हो जो उन्हें नापसंद हो . शायद इसीलिये काशीनाथ सिंह जैसा समर्थ लेखक कहानी से संस्मरण और फिर संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की तरफ गया . उनके भइया भी कोई लल्लू पंजू नहीं , हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष , डॉ नामवर सिंह हैं . नामवर सिंह ने काशी में आठ आने रोज़ पर भी ज़िंदगी बसर की है और इतना ही खर्च करके हिन्दी साहित्य को बहुत बड़ा योगदान दिया है. काशीनाथ सिंह ने बताया है कि उनके भईया ने ज़िंदगी में बहुत कम समझौते किये हैं , हम यह भी जानते हैं कि उनके भइया की आदर्शवादी जिद के कारण परिवार को और काशीनाथ सिंह को बहुत कुछ झेलना पड़ा . काशीनाथ सिंह के लिए तो सबसे बड़ी मुसीबत यही थी कि जाने अनजाने वे जीवन भर नामवर सिंह के बरक्स नापे जाते रहे .जो लोग नामवर सिंह को जानते हैं , उन्हें मालूम है कि किसी भी सभा सोसाइटी में नामवर सिंह का ज़िक्र आ जाने के बाद बाकी कार्यवाही उनके इर्द गिर्द ही घूमती रहती है . मैं यह बात १९७६ से देख रहा हूँ . नामवर सिंह का विरोध करने पर मैंने कुछ लोगों को पिटते भी देखा है . इमरजेंसी के तुरंत बाद ३५ फिरोजशाह रोड , नयी दिल्ली में एक सम्मलेन हुआ था . उस वक़्त की एक बड़ी पत्रिका के सम्पादक का एक चेला मय लाव लश्कर मुंबई से दिल्ली पंहुचा था. बहुत कुछ पैसा कौड़ी बटोर रखा था उसने और नामवर सिंह के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रहा था . जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने उस धतेंगड़ की विधिवत पिटाई कर दी थी . पीटने वालों में वे लोग भी थे जो आज के बहुत बड़े कवि और लेखक हैं .उस पहलवान को दो चार ठूंसा मैंने भी लगाया था , . बाद में जब मैंने भाई लोगों से पूछा कि जे एन यू की परंपरा तो बहस की है , इस बेचारे को शारीरिक कष्ट क्यों दिया जा रहा है , तो आज के एक बड़े कवि ने बताया कि भैंस के आगे बीन बजाने की स्वतंत्रता तो सब को है लेकिन उसको समझा सकना हमेशा से असंभव रहा है .इसलिए अगर पशुनुमा साहित्यकार को कुछ समझाना हो तो यही विधि समीचीन मानी गयी है .
मुराद यह है कि काशीनाथ सिंह इस तरह के नामवर इंसान के छोटे भाई हैं . आज भी जब नामवर सिंह उनको "काशीनाथ जी" कहते हैं तो आम तौर पर काशी कहे जाने वाले बाबू साहेब असहज हो जाते हैं. आम तौर पर लेखकों को कुछ भी लिखते समय आलोचक की दहशत नहीं होती लेकिन काशीनाथ सिंह को तो कुछ लिखना शुरू करने से पहले से ही देश के सबसे बड़े आलोचक का आतंक रहता है . एक तो बाघ दुसरे बन्दूक बांधे. लेकिन इन्हीं हालात में डॉ काशीनाथ सिंह ने हिन्दी को बेहतरीन साहित्य दिया है .' घोआस' जैसा नाटक, 'आलोचना भी रचना है ' जैसी समीक्षा ,'अपना मोर्चा 'और ' काशी का अस्सी 'जैसा उपन्यास डॉ काशीनाथ सिंह ने इन्हीं परिस्थितियों में लिखा है. 'अपना मोर्चा ' विश्व साहित्य में अपना मुकाम बना चुका है . और अब पता चला है कि उनके उपन्यास " काशी का अस्सी " को आधार बनाकर एक फिल्म बन रही है . इस फिल्म का निर्माण हिन्दी सिनेमा के चाणक्य , डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी कर रहे हैं .अपने नामी धारावाहिक " चाणक्य " की वजह से दुनिया भर में पहचाने जाने वाले डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने जब अमृता प्रीतम की कहानी के आधार पर फिल्म ' पिंजर ' बनाई थी तो भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के दौरान पंजाब में दर्द का जो तांडव हुआ था ,वह सिनेमा के परदे पर जिंदा हो उठा था . छत्तोआनी और रत्तोवाल नाम के गावों के हवाले से जो भी दुनिया ने देखा था , उस से लोग सिहर उठे थे . जिन लोगों ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन को नहीं देखा उनकी समझ में कुछ बात आई थी और जिन्होंने देखा था उनका दर्द फिर से ताज़ा हो गया था. मैंने उस फिल्म को अपनी पत्नी के साथ सिनेमा हाल में जाकर देखा था,. मेरी पत्नी फिल्म की वस्तुपरक सच्चाई से सिहर उठी थीं .बाद में मैंने कई ऐसी बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ भी फिल्म " पिंजर " को देखा जो १९४७ में १५ से २५ साल के बीच की उम्र की रही होंगीं . उन लोगों के भी आंसू रोके नहीं रुक रहे थे . फिल्म बहुत ही रियल थी. लेकिन उसे व्यापारिक सफलता नहीं मिली.
" पिंजर " का बाक्स आफिस पर धूम न मचा पाना मेरे लिए एक पहेली थी . मैंने बार बार फिल्म के माध्यम को समझने वालों से इसके बारे में पूछा .किसी के पास कोई जवाब नहीं था . अब जाकर बात समझ में आई जब मैं यह सवाल डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी से ही पूछ दिया . उनका कहना है शायद अवसाद को बहुत देर तक झेल पाना इंसानी प्रकृति में नहीं है .दूसरी बात यह कि फिल्म के विज़ुअल कला पक्ष को बहुत ही आथेंटिक बनाने के चक्कर में पूरी फिल्म में धूसर रंग ही हावी रहा .तीसरी बात जो उन्होंने बतायी वह यह कि फिल्म लम्बी हो गयी, तीन घंटे तक दर्द के बीच रहना बहुत कठिन काम है . मुझे लगता है कि डॉ साहब की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ . ऐतिहासिक फिल्म बनाना ही बहुत रिस्की सौदा है और उसमें दर्द को ईमानदारी से प्रस्तुत करके तो शायद आग से खेलने जैसा है , लेकिन अपने चाणक्य जी ने वह खेल कर दिखाया उनकी आर्थिक स्थिति तो शायद इस फिल्म के बाद खासी पतली हो गयी. लेकिन उन्होंने हिन्दी सिनेमा को एक ऐसी फिल्म दे दी जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सन्दर्भ विन्दु का काम करेगी,.
पता चला है कि डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने काशी नाथ सिंह के उपन्यास " काशी के अस्सी " के आधार पर फिल्म बनाने का मंसूबा बना लिया है . पिछली गलतियों से बचना तो इंसान का स्वभाव है . कहानी के पात्रों के साथ ईमानदारी के लिए विख्यात डॉ द्विवेदी से उम्मीद की जानी चाहिए कि बनारस की ज़िंदगी की बारीक समझ पर आधारित काशीनाथ सिंह के उपन्यास के डॉ गया सिंह , उपाध्याय जी , केदार , उप्धाइन वगैरह पूरी दुनिया के सामने नज़र आयेगें . हालांकि इस कथानक में भी दर्द की बहुत सारी गठरियाँ हैं लेकिन बनारसी मस्ती भी है . अवसाद को " पिंजर " का स्थायी भाव बना कर हाथ जला चुके चाणक्य से उम्मीद की जानी चाहिये कि इस बार वे मस्ती को ही कहानी का स्थायी भाव बनायेगें , दर्द का छौंक ही रहेगा . व्यापारिक सफलता की बात तो हम नहीं कर सकते , क्योंकि वह विधा अपनी समझ में नहीं आती लेकिन चाणक्य और पिंजर के हर फ्रेम को देखने के बाद यह भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि हिन्दी के एक बेहतरीन उपन्यास पर आधारित एक बहुत अच्छी फिल्म बाज़ार में आने वाली है . इस उपन्यास में बनारसी गालियाँ भी हैं लेकिन मुझे भरोसा है कि यह गालियाँ फिल्म में वैसी ही लगेगीं जैसी शादी ब्याह के अवसर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाये जाने वाले मंगल गीत .
Thursday, December 16, 2010
Tuesday, December 14, 2010
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कीमों का फायदा लेने वालों को बीजेपी में भर्ती किया जाएगा
शेष नारायण सिंह
मध्य प्रदेश में बीजेपी का सदस्यता अभियान जोर शोर से चल रहा है . हर जिले में पार्टी के कार्यकर्ता ऐसे लोगों को तलाश रहे हैं जो पार्टी की सदस्यता स्वीकार कर लें और राज्य में बीजेपी का बहुत ही मज़बूत जनाधार बन जाय.इसके लिए बीजेपी ने जो तरीका अपनाया है वह लोकतंत्र के बुनियादी नियमों के खिलाफ है.एक बहुत ही सम्मानित अखबार में छपा है कि बीजेपी के जिला स्तर के कार्यकर्ता उन लोगों की लिस्ट लेकर घूम रहे हैं जिन्हें केंद्र और राज्य सरकार की स्कीमों से फायदा मिला है. ग्वालियर जिले में बीजेपी के एक नेता ने बताया कि जिन लोगों की लिस्ट बनायी गयी है ,उन्हें मजबूर नहीं किया जा रहा है . उनसे निवेदन किया जा रहा है कि बीजेपी बहुत अच्छी पार्टी है और उसका सदस्य बनने से बहुत लाभ होगा . उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों की सामाजिक संरचना को समझने वाले जानते हैं कि इस निवेदन का क्या भावार्थ है . एक उदाहरण से बात को समझने की कोशिश की जायेगी . एक बार उत्तर प्रदेश पुलिस का शिष्टाचार सप्ताह मनाया गया था .ऊपर से आदेश दिया गया कि सभी पुलिस वाले किसी को भी श्रीमान जी कहकर संबोधित करेगें और डांट फटकार की भाषा में किसी को संबोधित नहीं करेगें . थाने में तैनात सिपाहियों ने लोगों से बदतमीजी करना तो जारी रखा लेकिन संबोधन श्रीमान जी का ही होता था . मसलन जब किसी रिक्शे वाले को बिना अकिराया दिए कहेने ले जाना होता था तो उसे श्रीमानजी कहकर ही संबोधित किया जाता था . सरकारी पार्टी के निवेदन को भी इस हवाले से समझने में आसानी होगी.
सरकारी स्कीमों के लाभार्थियों की लिस्ट में से दस लाख लोगों को बीजेपी का सदस्य बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे बीजेपी के जिला स्तर के कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह है .पार्टी को भरोसा है कि २०१३ में जब विधान सभा के चुनाव होंगें तो इन दस लाख कार्यकर्ताओं की मदद से विपक्षी कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा हो जायेगी. मध्य प्रदेश में सरकार की बहुत सारी स्कीमें हैं. लाडली लक्ष्मी , मुख्यमंत्री कन्यादान ,जननी सुरक्षा आदि ऐसी स्कीमें हैं जिनकी वजह से ग्रामीण इलाकों के लोग सरकार के अहसानमंद हैं और सरकार चलाने वाली पार्टी उसी एहसान के बदले लोगों को अपनी पार्टी में भर्ती कर रही है . भारत के ग्रामीण इलाकों में लडकी की शादी जैसी जिम्मेवारी हर माता पिता के लिए एक ऐसी ज़िम्मेवारी होती है जिसमें मदद करने वालों का अहसान सभी मानते हैं . शिवराज सिंह सरकार की उस अहसान के बदले लोगों को पार्टी में शामिल करने की मुहिम से निश्चित रूप से बड़ी संख्या में लोग पार्टी में शामिल होंगें लेकिन सरकारी स्कीमों के सहारे और उनका अपने हित में इस्तेमाल करके लोगों को साथ लेना निश्चित रूप से सही राजनीतिक आचरण नहीं है . हालांकि इसमें कानूनी तौर पर कोई गलती नहीं निकाली जा सकती क्योंकि सदस्यता अभियान में किसी सरकारी कर्मचारी का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को इन सवालों का जवाब देना होगा . वैसे इस तरह के कुराजनीतिक आचरण को रोकने का ज़िम्मा तो मुख्य रूप से मध्य प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का है लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि वहां के ज्यादातर कांग्रेसी नेता राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं . उनके पास राज्य के लिए समय नहीं है. बीजेपी का यह अभियान जिन जिलों में चल रहा है उसमें ग्वालियर प्रमुख है लेकिन ग्वालियर से कांग्रेस की अगुवाई करने वाले लोग सामंत हैं और पिछले डेढ़ सौ वर्षों से दिल्ली में राज करने वालों की वफादारी के बल पर सत्ता में बने रहते हैं .ज़ाहिर है उनकी राजनीति का मुख्य आधार ग्वालियर की जनता नहीं, दिल्ली और कलकत्ता में राज करने वाले लोग रहते हैं . इसी तरह से एक मामूली रियासत के राजा भी हैं जो मध्य प्रदेश कांग्रेस में शीर्ष तक पंहुच कर आजकल बीमारी की हालत में पड़े हुए हैं . उनेक परिवार के लोग वफादारी के इनाम के चक्कर में दिल्ली दरबार में हमेशा सक्रिय रहते हैं . इन बीमार सामंती कांग्रेसी नेता के एक शिष्य आजकल राष्ट्रीय राजनीति में इतने तल्लीन हैं कि उन्हें मध्य प्रदेश की चिंता ही नहीं है . ऐसी हालत में बीजेपी नेतृत्व का गैर लोकतांत्रिक तरीकों से सदस्यता अभियान चलाने के काम को बेलगाम छोड़ दिया गया है जिस से लोकशाही के निजाम को पक्के तौर पर नुकसान होगा .बीजेपी वाले मौजूदा सदस्यता अभियान के बाद इंदौर में 'नवीन कार्यकर्ता सम्मान समारोह' का आयोजन करेगें जिसके बाद कांग्रेस के लोग हाथ मलते रह जायेगें और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों पर एक और कुठाराघात हो चुका होगा
मध्य प्रदेश में बीजेपी का सदस्यता अभियान जोर शोर से चल रहा है . हर जिले में पार्टी के कार्यकर्ता ऐसे लोगों को तलाश रहे हैं जो पार्टी की सदस्यता स्वीकार कर लें और राज्य में बीजेपी का बहुत ही मज़बूत जनाधार बन जाय.इसके लिए बीजेपी ने जो तरीका अपनाया है वह लोकतंत्र के बुनियादी नियमों के खिलाफ है.एक बहुत ही सम्मानित अखबार में छपा है कि बीजेपी के जिला स्तर के कार्यकर्ता उन लोगों की लिस्ट लेकर घूम रहे हैं जिन्हें केंद्र और राज्य सरकार की स्कीमों से फायदा मिला है. ग्वालियर जिले में बीजेपी के एक नेता ने बताया कि जिन लोगों की लिस्ट बनायी गयी है ,उन्हें मजबूर नहीं किया जा रहा है . उनसे निवेदन किया जा रहा है कि बीजेपी बहुत अच्छी पार्टी है और उसका सदस्य बनने से बहुत लाभ होगा . उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों की सामाजिक संरचना को समझने वाले जानते हैं कि इस निवेदन का क्या भावार्थ है . एक उदाहरण से बात को समझने की कोशिश की जायेगी . एक बार उत्तर प्रदेश पुलिस का शिष्टाचार सप्ताह मनाया गया था .ऊपर से आदेश दिया गया कि सभी पुलिस वाले किसी को भी श्रीमान जी कहकर संबोधित करेगें और डांट फटकार की भाषा में किसी को संबोधित नहीं करेगें . थाने में तैनात सिपाहियों ने लोगों से बदतमीजी करना तो जारी रखा लेकिन संबोधन श्रीमान जी का ही होता था . मसलन जब किसी रिक्शे वाले को बिना अकिराया दिए कहेने ले जाना होता था तो उसे श्रीमानजी कहकर ही संबोधित किया जाता था . सरकारी पार्टी के निवेदन को भी इस हवाले से समझने में आसानी होगी.
सरकारी स्कीमों के लाभार्थियों की लिस्ट में से दस लाख लोगों को बीजेपी का सदस्य बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे बीजेपी के जिला स्तर के कार्यकर्ताओं में बहुत उत्साह है .पार्टी को भरोसा है कि २०१३ में जब विधान सभा के चुनाव होंगें तो इन दस लाख कार्यकर्ताओं की मदद से विपक्षी कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा हो जायेगी. मध्य प्रदेश में सरकार की बहुत सारी स्कीमें हैं. लाडली लक्ष्मी , मुख्यमंत्री कन्यादान ,जननी सुरक्षा आदि ऐसी स्कीमें हैं जिनकी वजह से ग्रामीण इलाकों के लोग सरकार के अहसानमंद हैं और सरकार चलाने वाली पार्टी उसी एहसान के बदले लोगों को अपनी पार्टी में भर्ती कर रही है . भारत के ग्रामीण इलाकों में लडकी की शादी जैसी जिम्मेवारी हर माता पिता के लिए एक ऐसी ज़िम्मेवारी होती है जिसमें मदद करने वालों का अहसान सभी मानते हैं . शिवराज सिंह सरकार की उस अहसान के बदले लोगों को पार्टी में शामिल करने की मुहिम से निश्चित रूप से बड़ी संख्या में लोग पार्टी में शामिल होंगें लेकिन सरकारी स्कीमों के सहारे और उनका अपने हित में इस्तेमाल करके लोगों को साथ लेना निश्चित रूप से सही राजनीतिक आचरण नहीं है . हालांकि इसमें कानूनी तौर पर कोई गलती नहीं निकाली जा सकती क्योंकि सदस्यता अभियान में किसी सरकारी कर्मचारी का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को इन सवालों का जवाब देना होगा . वैसे इस तरह के कुराजनीतिक आचरण को रोकने का ज़िम्मा तो मुख्य रूप से मध्य प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का है लेकिन मध्य प्रदेश कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि वहां के ज्यादातर कांग्रेसी नेता राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं . उनके पास राज्य के लिए समय नहीं है. बीजेपी का यह अभियान जिन जिलों में चल रहा है उसमें ग्वालियर प्रमुख है लेकिन ग्वालियर से कांग्रेस की अगुवाई करने वाले लोग सामंत हैं और पिछले डेढ़ सौ वर्षों से दिल्ली में राज करने वालों की वफादारी के बल पर सत्ता में बने रहते हैं .ज़ाहिर है उनकी राजनीति का मुख्य आधार ग्वालियर की जनता नहीं, दिल्ली और कलकत्ता में राज करने वाले लोग रहते हैं . इसी तरह से एक मामूली रियासत के राजा भी हैं जो मध्य प्रदेश कांग्रेस में शीर्ष तक पंहुच कर आजकल बीमारी की हालत में पड़े हुए हैं . उनेक परिवार के लोग वफादारी के इनाम के चक्कर में दिल्ली दरबार में हमेशा सक्रिय रहते हैं . इन बीमार सामंती कांग्रेसी नेता के एक शिष्य आजकल राष्ट्रीय राजनीति में इतने तल्लीन हैं कि उन्हें मध्य प्रदेश की चिंता ही नहीं है . ऐसी हालत में बीजेपी नेतृत्व का गैर लोकतांत्रिक तरीकों से सदस्यता अभियान चलाने के काम को बेलगाम छोड़ दिया गया है जिस से लोकशाही के निजाम को पक्के तौर पर नुकसान होगा .बीजेपी वाले मौजूदा सदस्यता अभियान के बाद इंदौर में 'नवीन कार्यकर्ता सम्मान समारोह' का आयोजन करेगें जिसके बाद कांग्रेस के लोग हाथ मलते रह जायेगें और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों पर एक और कुठाराघात हो चुका होगा
Sunday, December 12, 2010
नीतीश और शिवराज की पहल की इज्ज़त की जानी चाहिए
शेष नारायण सिंह
भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में बुरी तरह से घुस चुका है . घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है . अंग्रेजों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया . आज़ादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था . नेता जब घूसखोर होगा तो अफसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है.घूस में मिली रक़म के बल पर लोग ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर करते हैं और कहीं चूँ नहीं होती. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ऐसे लोग मुख्य सचिव बना दिए जाते हैं जिनको महाभ्रष्ट के रूप में मान्यता मिल चुकी होती है. नेताओं के बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं और कोई नहीं पूछता कि यह पैसा कहाँ से आया . अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है जो पकड़ लिया जाय और मुक़दमा कायम हो जाय. आम तौर पर इन मुक़दमों में अभियुक्त बच ही निकलता है . भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती . लेकिन अब हालात बदल रहे हैं .बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहला क़दम उठा लिया है . उन्होंने बिहार स्पेशल कोर्ट्स एक्ट २०१० के तहत अफसरों की उन संपत्तियों को ज़ब्त करना शुरू कर दिया है जो घूस की कमाई से खरीदी गयी हैं .इस मामले में पहला शिकार पकड़ा भी जा चुका है और उसकी ४४ लाख रूपये की संपत्ति सरकारी कब्जे में ली जा चुकी है . ज़ाहिर है कि अगर अफसरों में यह डर समा गया कि घूस से बनायी गई संपत्ति बाद में भी सरकारी कब्जे में आ जायेगी तो घूस के प्रति मोह कम होगा. अगर उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का काम शुरू हो जाय तो भ्रष्टाचार पर निर्णायक काबू पाने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है . नीतीश कुमार ने दूसरा अहम काम भी किया है .उन्होंने विधायकों को मिलने वाली उस रक़म को भी रद्द करने का फैसला कर लिया है जो विधायक निधि के नाम पर क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है . इसी रक़म से विधायक लोग अपने चेलों को पालते हैं, विधायक निधि से कमीशन लेते हैं और भ्रष्टाचार का माहौल बनांते हैं . उसी निधि से अफसर भी अपना हिस्सा लेते हैं और सरकारी पैसे को पूरी तरह से नंबर दो का बना देते हैं . कुछ सम्मान जनक अपवाद भी हैं . एक उदाहरण तो अरुण शोरी का ही है . उत्तर प्रदेश से राज्य सभा का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सरकार से अनुमति मांग कर अपनी सांसद निधि को आई आई टी कानपुर में एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बनाने के लिए दे दिया . ६ साल के कार्यकाल में उन्हें १२ करोड़ रूपये मिलने थे ,कुछ सरकारी मदद लेकर एक संस्था की स्थापना हो गयी लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं . ज़्यादातर लोग तो विकास निधि को अपनी नंबर दो की कमाई ही मानते हैं . इसकी उत्पत्ति भी बहुत ही अजीब तरीके से हुई थी. सांसदों को अपने साथ रखने के चक्कर में भ्रष्ट प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने सांसद निधि को शुरू किया था . बाद में विधायकों के लिए भी राज्य सरकारों ने व्यवस्था कर दी .अब तो भ्रष्टाचार का माहौल बनाने में इसी निधि का सबसे अहम योगदान है . बिहार में इस घूस की जननी को ख़त्म करने की शुरुआत हुई है . उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी देश में भी यह उदाहरण लागू किया जायेगा. एक अन्य मुख्य मंत्री ने भी भ्रष्टाचार की जड़ों में मट्ठा डालने की एक आइडिया का ज़िक्र किया है . भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए आयोजित एक बैठक में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री , शिवराज सिंह ने बहुत बुनियादी बात कही. उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है , वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है . देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं . शराब के व्यापारी ,सत्ता के दलाल , अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है. आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं.शिवराज सिंह ने कहा कि राज्य सभा को ही ख़त्म कर देना चाहिए . लोक सभा जनहित और राष्ट्र हित के सभी फैसले लेने के लिए सक्षम है . ज़ाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताक़त रखता है . इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक पहल के एज़रूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें . लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जायेगी.
भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में बुरी तरह से घुस चुका है . घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है . अंग्रेजों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया . आज़ादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था . नेता जब घूसखोर होगा तो अफसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है.घूस में मिली रक़म के बल पर लोग ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर करते हैं और कहीं चूँ नहीं होती. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ऐसे लोग मुख्य सचिव बना दिए जाते हैं जिनको महाभ्रष्ट के रूप में मान्यता मिल चुकी होती है. नेताओं के बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं और कोई नहीं पूछता कि यह पैसा कहाँ से आया . अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है जो पकड़ लिया जाय और मुक़दमा कायम हो जाय. आम तौर पर इन मुक़दमों में अभियुक्त बच ही निकलता है . भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती . लेकिन अब हालात बदल रहे हैं .बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहला क़दम उठा लिया है . उन्होंने बिहार स्पेशल कोर्ट्स एक्ट २०१० के तहत अफसरों की उन संपत्तियों को ज़ब्त करना शुरू कर दिया है जो घूस की कमाई से खरीदी गयी हैं .इस मामले में पहला शिकार पकड़ा भी जा चुका है और उसकी ४४ लाख रूपये की संपत्ति सरकारी कब्जे में ली जा चुकी है . ज़ाहिर है कि अगर अफसरों में यह डर समा गया कि घूस से बनायी गई संपत्ति बाद में भी सरकारी कब्जे में आ जायेगी तो घूस के प्रति मोह कम होगा. अगर उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का काम शुरू हो जाय तो भ्रष्टाचार पर निर्णायक काबू पाने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है . नीतीश कुमार ने दूसरा अहम काम भी किया है .उन्होंने विधायकों को मिलने वाली उस रक़म को भी रद्द करने का फैसला कर लिया है जो विधायक निधि के नाम पर क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है . इसी रक़म से विधायक लोग अपने चेलों को पालते हैं, विधायक निधि से कमीशन लेते हैं और भ्रष्टाचार का माहौल बनांते हैं . उसी निधि से अफसर भी अपना हिस्सा लेते हैं और सरकारी पैसे को पूरी तरह से नंबर दो का बना देते हैं . कुछ सम्मान जनक अपवाद भी हैं . एक उदाहरण तो अरुण शोरी का ही है . उत्तर प्रदेश से राज्य सभा का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सरकार से अनुमति मांग कर अपनी सांसद निधि को आई आई टी कानपुर में एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बनाने के लिए दे दिया . ६ साल के कार्यकाल में उन्हें १२ करोड़ रूपये मिलने थे ,कुछ सरकारी मदद लेकर एक संस्था की स्थापना हो गयी लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं . ज़्यादातर लोग तो विकास निधि को अपनी नंबर दो की कमाई ही मानते हैं . इसकी उत्पत्ति भी बहुत ही अजीब तरीके से हुई थी. सांसदों को अपने साथ रखने के चक्कर में भ्रष्ट प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने सांसद निधि को शुरू किया था . बाद में विधायकों के लिए भी राज्य सरकारों ने व्यवस्था कर दी .अब तो भ्रष्टाचार का माहौल बनाने में इसी निधि का सबसे अहम योगदान है . बिहार में इस घूस की जननी को ख़त्म करने की शुरुआत हुई है . उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी देश में भी यह उदाहरण लागू किया जायेगा. एक अन्य मुख्य मंत्री ने भी भ्रष्टाचार की जड़ों में मट्ठा डालने की एक आइडिया का ज़िक्र किया है . भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए आयोजित एक बैठक में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री , शिवराज सिंह ने बहुत बुनियादी बात कही. उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है , वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है . देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं . शराब के व्यापारी ,सत्ता के दलाल , अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है. आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं.शिवराज सिंह ने कहा कि राज्य सभा को ही ख़त्म कर देना चाहिए . लोक सभा जनहित और राष्ट्र हित के सभी फैसले लेने के लिए सक्षम है . ज़ाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताक़त रखता है . इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक पहल के एज़रूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें . लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जायेगी.
Saturday, December 11, 2010
राडिया गैंग की ताक़त के सामने घिघियाते पत्रकार और वेब मीडिया
शेष नारायण सिंह
नीरा राडिया के टेलीफोन के शिकार हुए लोगों की नयी किश्त बाज़ार में आ गयी है .पहली किश्त में तो अंग्रेज़ी वाले पत्रकार और दिल्ली के काकटेल सर्किट वालों की इज्ज़त की धज्जियां उडी थीं . उनमें से दो को तो उनके संगठनों ने निपटा दिया . वीर संघवी और प्रभु चावला को निकाल दिया गया है लेकिन बरखा दत्त वाले लोग अभी डटे हुए हैं , मानने को तैयार नहीं हैं कि बरखा दत्त गलती भी कर सकती हैं . आउटलुक और भड़ास वालों की कृपा से सारी दुनिया को औपचारिक तौर पर मालूम हो गया है कि पत्रकारिता के टाप पर बैठे कुछ लोग दलाली भी करते थे .हालांकि दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर लोगों को मालूम है कि खेल होता था लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उसके बारे में बात कर सके .नयी खेप में नीरा राडिया की वास्तविक हैसियत का पता चलता है जहां वह पी टी आई जैसी ताक़तवर न्यूज़ एजेंसी को ब्लैक लिस्ट करने की बात करती हैं . हिन्दी के सबसे बड़े अखबारों को सेट करने की बात करती हैं और हिन्दी ,उर्दू और अंग्रेज़ी में काम कारने वाले एक मीडिया हाउस के मुख्य अधिकारी को लाईन में लेने की बात करती हैं . इसी टेप में उनका कारिन्दा बताता है कि देश के एक बड़े मीडिया हाउस का रिपोर्टर उसके पास बैठा है जिसने अनिल अम्बानी के खिलाफ सारी जानकारी उपलब्ध करवाई है . पुरानी किश्तों के पब्लिक होने के बाद वीर संघवी नाम के पत्रकार किसी टी वी चैनल पर नमूदार हुए थे और उपदेश देते हुए बता रहे थे कि पत्रकार को तरह तरह के लोगों से बात करके खबरें जुटानी पड़ती हैं . और उन्होंने नीरा राडिया से खबरें ही जुटाने की कोशिश की थी. हालांकि उस बार भी साफ़ नज़र आ रहा था कि वे राडिया दलाली काण्ड के ख़ास सिपहसलार थे लेकिन नयी खेप से साफ़ पता चल रहा है कि वे न केवल राडिया के हुक्म से लिखते थे बल्कि अपना कालम छपने के पहले नीरा राडिया को फोन करके सुनाते थे और उस से मंजूरी लेते थे. इस बार के टेपों से पता चला है कि राडिया गैंग की एक और लठैत, बरखा दत्त भी जो कुछ कर रही थीं, वह पत्रकारिता तो नहीं थी. नीरा राडिया अपने किसी चेले को बताती सुनी जा रही हैं कि बरखा दत्त ने कांग्रेस से कहकर एक बयान जारी करवा दिया है . तुर्रा यह कि बरखा दत्त अभी पिछले दिनों अपने चैनल पर कहती पायी गयी थीं कि वे राडिया की सूचना का इस्तेमाल ख़बरों के लिए कर रही थीं. उनका दलाली से कोई लेना देना नहीं था .
नयी खेप में उन लोगों के नंगा होने का काम भी शुरू हो गया है जो काकटेल सर्किट में नहीं आते हैं . हिन्दी पत्रकारों के बारे में अपने किसी कारिंदे को जिस तरह से राडिया समझा रही हैं उस से कहानी की बहुत सारी बारीक परतें भी खुलना शुरू हो गयी हैं . देश के सबसे बड़े हिन्दी अखबारों का नाम जिस तरह से राडिया जी के श्रीमुख से निकल रहा है उसे सुनकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रह गया है कि आने वाले दिनों में बड़े बड़े सूरमा राडिया के टेपों की ज़द में आ जायेगें . लेकिन दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर दलालों की पोल खुल जाने का एक ख़तरा भी है . इनमें से ज़्यादातर लोग मीडिया में बहुत ही ताक़तवर नाम हैं . इसलिए इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह सारे लोग लामबंद हो जाएँ और उन लोगों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दें जो राडिया काण्ड में शामिल नहीं हैं . राडिया गैंग के लोग यह भी अभियान शुरू कर सकते है कि जो लोग राडिया के लिए काम नहीं कर रहे हैं वे बेकार के पत्रकार हैं . इसका भावार्थ यह हुआ कि जिन लोगों के नाम राडिया की लिस्ट में नहीं हैं , उनकी नौकरी ख़त्म हो सकती है . इसका एक अंदाज़ कल देखने को मिला जब देश के एक बहुत बड़े पत्रकार ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि देश का बड़े से बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है . जिस से वे बात कर रहे थे उन्होंने कहा कि टाटा जैसा बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है क्योंकि उसे अपने देश में धंधा करने की छूट नहीं है यह वही टाटा हैं जिनका इस्तेमाल इसी स्वनामधन्य पत्रकार ने कुछ दिन पहले राडिया टेप में फंसे पत्रकारों के बचाव के लिए किया था . बाद में संविधान का हवाला देकर टाटा जी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि राडिया से उनकी बातचीत बहुत ही व्यक्तिगत है लिहाज़ा उसके प्रसारण को रोक दिया जाना चाहिए . सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से इनकार कर दिया था . ऐसी हालत में लगता है कि जो भी ताक़तवर लोग हैं ,चाहे वे राजनीति में हों , मीडिया में हों या सरकारी अफसरतंत्र का हिस्सा हों , राडिया के गिरोह के संभावित सदस्य हो सकते हैं . यह लोग अगर एकजुट हो गए तो देश की नीति को प्रभावित कर सकते हैं . ऐसी हालत में केवल वेब मीडिया के जांबाज़ पत्रकार ही बचेगें जो पुरानी नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे होंगें .लेकिन उनकी आर्थिक क्षमता सीमित होगी . लगता है कि अब रास्ते रोज़ ही सिमटते जा रहे हैं और अवाम को ही कुछ करना पड़ेगा जिस से दिल्ली दरबार के हर कोने में घात लगाए बैठी बे-ईमानी को घेरा जा सके..
नीरा राडिया के टेलीफोन के शिकार हुए लोगों की नयी किश्त बाज़ार में आ गयी है .पहली किश्त में तो अंग्रेज़ी वाले पत्रकार और दिल्ली के काकटेल सर्किट वालों की इज्ज़त की धज्जियां उडी थीं . उनमें से दो को तो उनके संगठनों ने निपटा दिया . वीर संघवी और प्रभु चावला को निकाल दिया गया है लेकिन बरखा दत्त वाले लोग अभी डटे हुए हैं , मानने को तैयार नहीं हैं कि बरखा दत्त गलती भी कर सकती हैं . आउटलुक और भड़ास वालों की कृपा से सारी दुनिया को औपचारिक तौर पर मालूम हो गया है कि पत्रकारिता के टाप पर बैठे कुछ लोग दलाली भी करते थे .हालांकि दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर लोगों को मालूम है कि खेल होता था लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उसके बारे में बात कर सके .नयी खेप में नीरा राडिया की वास्तविक हैसियत का पता चलता है जहां वह पी टी आई जैसी ताक़तवर न्यूज़ एजेंसी को ब्लैक लिस्ट करने की बात करती हैं . हिन्दी के सबसे बड़े अखबारों को सेट करने की बात करती हैं और हिन्दी ,उर्दू और अंग्रेज़ी में काम कारने वाले एक मीडिया हाउस के मुख्य अधिकारी को लाईन में लेने की बात करती हैं . इसी टेप में उनका कारिन्दा बताता है कि देश के एक बड़े मीडिया हाउस का रिपोर्टर उसके पास बैठा है जिसने अनिल अम्बानी के खिलाफ सारी जानकारी उपलब्ध करवाई है . पुरानी किश्तों के पब्लिक होने के बाद वीर संघवी नाम के पत्रकार किसी टी वी चैनल पर नमूदार हुए थे और उपदेश देते हुए बता रहे थे कि पत्रकार को तरह तरह के लोगों से बात करके खबरें जुटानी पड़ती हैं . और उन्होंने नीरा राडिया से खबरें ही जुटाने की कोशिश की थी. हालांकि उस बार भी साफ़ नज़र आ रहा था कि वे राडिया दलाली काण्ड के ख़ास सिपहसलार थे लेकिन नयी खेप से साफ़ पता चल रहा है कि वे न केवल राडिया के हुक्म से लिखते थे बल्कि अपना कालम छपने के पहले नीरा राडिया को फोन करके सुनाते थे और उस से मंजूरी लेते थे. इस बार के टेपों से पता चला है कि राडिया गैंग की एक और लठैत, बरखा दत्त भी जो कुछ कर रही थीं, वह पत्रकारिता तो नहीं थी. नीरा राडिया अपने किसी चेले को बताती सुनी जा रही हैं कि बरखा दत्त ने कांग्रेस से कहकर एक बयान जारी करवा दिया है . तुर्रा यह कि बरखा दत्त अभी पिछले दिनों अपने चैनल पर कहती पायी गयी थीं कि वे राडिया की सूचना का इस्तेमाल ख़बरों के लिए कर रही थीं. उनका दलाली से कोई लेना देना नहीं था .
नयी खेप में उन लोगों के नंगा होने का काम भी शुरू हो गया है जो काकटेल सर्किट में नहीं आते हैं . हिन्दी पत्रकारों के बारे में अपने किसी कारिंदे को जिस तरह से राडिया समझा रही हैं उस से कहानी की बहुत सारी बारीक परतें भी खुलना शुरू हो गयी हैं . देश के सबसे बड़े हिन्दी अखबारों का नाम जिस तरह से राडिया जी के श्रीमुख से निकल रहा है उसे सुनकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रह गया है कि आने वाले दिनों में बड़े बड़े सूरमा राडिया के टेपों की ज़द में आ जायेगें . लेकिन दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर दलालों की पोल खुल जाने का एक ख़तरा भी है . इनमें से ज़्यादातर लोग मीडिया में बहुत ही ताक़तवर नाम हैं . इसलिए इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह सारे लोग लामबंद हो जाएँ और उन लोगों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दें जो राडिया काण्ड में शामिल नहीं हैं . राडिया गैंग के लोग यह भी अभियान शुरू कर सकते है कि जो लोग राडिया के लिए काम नहीं कर रहे हैं वे बेकार के पत्रकार हैं . इसका भावार्थ यह हुआ कि जिन लोगों के नाम राडिया की लिस्ट में नहीं हैं , उनकी नौकरी ख़त्म हो सकती है . इसका एक अंदाज़ कल देखने को मिला जब देश के एक बहुत बड़े पत्रकार ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि देश का बड़े से बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है . जिस से वे बात कर रहे थे उन्होंने कहा कि टाटा जैसा बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है क्योंकि उसे अपने देश में धंधा करने की छूट नहीं है यह वही टाटा हैं जिनका इस्तेमाल इसी स्वनामधन्य पत्रकार ने कुछ दिन पहले राडिया टेप में फंसे पत्रकारों के बचाव के लिए किया था . बाद में संविधान का हवाला देकर टाटा जी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि राडिया से उनकी बातचीत बहुत ही व्यक्तिगत है लिहाज़ा उसके प्रसारण को रोक दिया जाना चाहिए . सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से इनकार कर दिया था . ऐसी हालत में लगता है कि जो भी ताक़तवर लोग हैं ,चाहे वे राजनीति में हों , मीडिया में हों या सरकारी अफसरतंत्र का हिस्सा हों , राडिया के गिरोह के संभावित सदस्य हो सकते हैं . यह लोग अगर एकजुट हो गए तो देश की नीति को प्रभावित कर सकते हैं . ऐसी हालत में केवल वेब मीडिया के जांबाज़ पत्रकार ही बचेगें जो पुरानी नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे होंगें .लेकिन उनकी आर्थिक क्षमता सीमित होगी . लगता है कि अब रास्ते रोज़ ही सिमटते जा रहे हैं और अवाम को ही कुछ करना पड़ेगा जिस से दिल्ली दरबार के हर कोने में घात लगाए बैठी बे-ईमानी को घेरा जा सके..
Thursday, December 9, 2010
सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए शासक वर्ग ने टाटा को मैदान में उतारा
शेष नारायण सिंह
टेलीकाम घोटाले ने सुखराम युग की याद ताज़ा कर दी .उस बार भी करीब ३७ दिन तक बीजेपी ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दिया था. पी वी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे और सुखराम ने हिमाचल फ्यूचरिस्टिक नाम की किसी कंपनी को नाजायज़ लाभ पंहुचा कर हेराफेरी की थी. बाद में वही सुखराम बीजेपी के आदरणीय सदस्य बन गए थे . आज भी जब बीजेपी के नेताओं की पत्रकार वार्ताओं में सुखराम शब्द का ज़िक्र आता है ,वे खिसिया जाते हैं . लगता है कि मौजूदा टेलीकाम घोटाले के बाद भी बीजीपी का वही हाल होने वाला है . क्योंकि १९९९ से लेकर २००४ तक बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की आँखों के तारे रहे रतन टाटा ने बीजेपी की पोल खोलने का काम शुरू कर दिया है . अपने मुल्क में टाटा को बहुत ही पवित्र पूंजीपति मानने का फैशन है . बीजेपी वालों ने भी अब तक टाटा को बहुत ही पवित्र आत्मा बताने की बार बार कोशिश की है . आज भी आरोप लगाया जाता है कि कि बीजेपी की सरकार ने विदेश सचार निगम जैसी संपन्न कंपनी को टाटा के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया था. बताते हैं कि विदेश संचार निगम के पास जितनी ज़मीन दिल्ली में है ,उसके १ प्रतिशत से ही १२०० करोड़ निकाला जा सकता है . आरोप है कि बीजेपी के राज में जो भी भाई संचार मंत्री था, उसने खेल कर दिया था और सरकारी कंपनी को सस्ते दाम पर बेच कर नंबर दो में रक़म अपनी अंटी में डाल लिया था . उन्हीं टाटा महोदय ने बीजेपी की कृपा से एम पी बने एक उद्योगपति की चिट्ठी के जवाब में साफ़ लिख दिया है कि संचार के क्षेत्र में हेराफेरी बीजेपी के राज में भी हुई थी. टाटा की इस चिट्ठी के बाद काकटेल सर्किट में हडकंप मच गया है. इस चिट्ठी के पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि २००१ से शुरू कर के संचार और २ जी स्पेक्ट्रम घोटालों की जांच की जानी चाहिए . बीजेपी वाले फ़ौरन रक्षात्मक मुद्रा में आ गए और कहने लगे कि हम तो तैयार हैं . अब उन्हें कौन बताये कि भाई आपके तैयार होने का कोई मतलब नहीं है . अब तो सुप्रीम कोर्ट का संकेत आ गया है और अब तो जांच शुरू हो जायेगी. आप लोगों को चाहिए कि अब अपने आप को बचाने की कोशिश शुरू कर दें .टाटा के मैदान ले लेने के बाद लगता है कि अब संचार घोटाले की जांच सही तरीके से नहीं होगी और फिल्म 'जाने भी दो यारों 'की तर्ज़ पर लीपा पोती कर दी जायेगी . यह काम दिल्ली की काकटेल सर्किट के नेता जैन हवाला काण्ड के दौरान कर चुके हैं . जैन हवाला काण्ड में भी बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी, जे डी यू के शरद यादव , कांग्रेस के अरुण नेहरू और सतीश शर्मा पर जे के एल एफ के हवाले से पैसा लेने का आरोप लगा था ,जांच भी बैठाई गयी थी लेकिन उस जांच का नतीजा पता नहीं इतिहास के किस डस्टबिन में दफ़न हो गया .कामनवेल्थ खेलों में भी हज़ारों करोड़ की लूट मचाई गयी थी लेकिन जब दोनों की मुख्य पार्टियों के सूरमाओं के नाम आने लगे तो उसके भी दफ़न की तैयारी कर दी गयी. अब जब टाटा ने बीजेपी की पोल भी खोलना शुरू कर दिया है तो लगता है कि २जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच का भी वही हस्र होगा जो जैन हवाला काण्ड की जांच का हुआ था. पूंजीपतियों के सबसे प्रिय चैनल ने जिस जोशो खरोश से टाटा की चिट्ठी के हवाले से मामले को तूल देना शुरू किया है ,उस से तो साफ़ ज़ाहिर है कि टाटा की चिट्ठी सोची समझी नीति के तहत लिखी गयी है जिस से संचार के अरबों रूपये के घोटालों पर पूरी तरह से पर्दा डाला जा सके. ऐसा लगता है कि टाटा ने यह चिट्ठी ऐसे लोगों से सलाह करके लिखा है जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के साथ धंधा करते हैं .दुनिया जानती है कि टाटा ग्रुप के लोग कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही बहुत क़रीबी हैं . आखिर अभी कल की बात है जब यू पी ए की रेल मंत्री ममता बनर्जी ने टाटा को सिंगुर से खदेड़ा था ,तो बीजेपी के सबसे ताक़तवर नेता , नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने राज्य में सम्मान सहित स्थापित किया था और रतन टाटा ने भी नरेंद्र मोदी की तारीफ़ में गीत गाये थे. इसलिए टाटा को बीजेपी का दुश्मन बताने की कोशिश तो बिलकुल नहीं की जानी चाहिए , वे दोनों ही पूंजीवादी पार्टियों के अपने बन्दे हैं . जानकार बता रहे हैं कि टाटा के हस्तक्षेप को सोच समझ कर करवाया गया है जिस से जनता की जो संपत्ति लूटी गयी है उसको जांच के दायरे से बाहर लाया जा सके. दुर्भाग्य यह है कि इस देश में लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस पूंजीवादी व्यवस्था के सेवक हैं और सब चाहते हैं कि शासक वर्गों की पार्टियां मौज करती रहें और गरीब आदमी जिसके विकास के लिए सरकारी नीतियाँ बनायी जानी चाहिए वह परेशानी के कुचक्र में डूबता उतराता रहे.
जो भी हो टाटा के नए बयान से कम से कम पवित्रता की चादर ओढ़ कर बाकी दुनिया को भ्रष्ट कह रहे हर टी वी चैनल पर प्रकट होने वाले बीजेपी के नेताओं की वाणी में थोड़ी विनम्रता की झलक देखने को मिलेगी. अब बात समझ में आने लगी है कि कि क्यों बीजेपी वाले आपराधिक जांच का विरोध करते रहे हैं .आपराधिक जांच का काम पुलिस का पावर रखने वाली एजेंसियों की तरफ से होने की वजह से जांच का काम पूरा होते ही अपने आप मुक़दमा चल जाता है यानी अगर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कोई जांच होती है तो अगर अपराध साबित हुआ तो अपने आप आपराधिक मुक़दमा चल पडेगा . अन्य किसी जांच के बाद सी बी आई या किसी अन्य पुलिस एजेंसी को एफ आई आर लिख कर जांच करके तब मुक़दमा चलाने की बात होती है .मसलन अब अगर २००१ से लेकर अब तक के दूरसंचार के घोटालों की जांच करवाई जायेगी तो जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ आपराधिक मुक़दमा चल पड़ेगा. ऐसी हालत बीजेपी को सूट नहीं करती और कांग्रेस को मज़ा आ रहा है क्योंकि अगर ए राजा पकड़ा भी जाता है तो वह कांग्रेस का सदस्य तो है नहीं जबकि बीजेपी के राज में जो भी मंत्री थे सब बीजेपी वालों के सदस्य थे . जिन लोगों ने उस दौर में रिपोर्ट किया है उन्हें याद होगा कि स्व प्रमोद महाजन इस बात का बहुत बुरा मानते थे जब दूरसंचार जैसा मलाईदार विभाग किसी सहयोगी पार्टी के पास जाने की बाद की जाती थी. बहरहाल अब जनता की ओर से पत्रकारिता कर रहे लोगों को चाहिए कि ए राजा और २००१ की हेराफेरी की जांच के लिए दबाव बनाये रखें वरना जो एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ राजा ने डकारे हैं और २५ जनवरी की एक रात को एन डी ए के राज में जो मुफ्त स्पेक्ट्रम देकर लाखों करोड़ डकारे गए थे सब की जांच अधूरी रह जायेगी
टेलीकाम घोटाले ने सुखराम युग की याद ताज़ा कर दी .उस बार भी करीब ३७ दिन तक बीजेपी ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दिया था. पी वी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे और सुखराम ने हिमाचल फ्यूचरिस्टिक नाम की किसी कंपनी को नाजायज़ लाभ पंहुचा कर हेराफेरी की थी. बाद में वही सुखराम बीजेपी के आदरणीय सदस्य बन गए थे . आज भी जब बीजेपी के नेताओं की पत्रकार वार्ताओं में सुखराम शब्द का ज़िक्र आता है ,वे खिसिया जाते हैं . लगता है कि मौजूदा टेलीकाम घोटाले के बाद भी बीजीपी का वही हाल होने वाला है . क्योंकि १९९९ से लेकर २००४ तक बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की आँखों के तारे रहे रतन टाटा ने बीजेपी की पोल खोलने का काम शुरू कर दिया है . अपने मुल्क में टाटा को बहुत ही पवित्र पूंजीपति मानने का फैशन है . बीजेपी वालों ने भी अब तक टाटा को बहुत ही पवित्र आत्मा बताने की बार बार कोशिश की है . आज भी आरोप लगाया जाता है कि कि बीजेपी की सरकार ने विदेश सचार निगम जैसी संपन्न कंपनी को टाटा के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया था. बताते हैं कि विदेश संचार निगम के पास जितनी ज़मीन दिल्ली में है ,उसके १ प्रतिशत से ही १२०० करोड़ निकाला जा सकता है . आरोप है कि बीजेपी के राज में जो भी भाई संचार मंत्री था, उसने खेल कर दिया था और सरकारी कंपनी को सस्ते दाम पर बेच कर नंबर दो में रक़म अपनी अंटी में डाल लिया था . उन्हीं टाटा महोदय ने बीजेपी की कृपा से एम पी बने एक उद्योगपति की चिट्ठी के जवाब में साफ़ लिख दिया है कि संचार के क्षेत्र में हेराफेरी बीजेपी के राज में भी हुई थी. टाटा की इस चिट्ठी के बाद काकटेल सर्किट में हडकंप मच गया है. इस चिट्ठी के पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि २००१ से शुरू कर के संचार और २ जी स्पेक्ट्रम घोटालों की जांच की जानी चाहिए . बीजेपी वाले फ़ौरन रक्षात्मक मुद्रा में आ गए और कहने लगे कि हम तो तैयार हैं . अब उन्हें कौन बताये कि भाई आपके तैयार होने का कोई मतलब नहीं है . अब तो सुप्रीम कोर्ट का संकेत आ गया है और अब तो जांच शुरू हो जायेगी. आप लोगों को चाहिए कि अब अपने आप को बचाने की कोशिश शुरू कर दें .टाटा के मैदान ले लेने के बाद लगता है कि अब संचार घोटाले की जांच सही तरीके से नहीं होगी और फिल्म 'जाने भी दो यारों 'की तर्ज़ पर लीपा पोती कर दी जायेगी . यह काम दिल्ली की काकटेल सर्किट के नेता जैन हवाला काण्ड के दौरान कर चुके हैं . जैन हवाला काण्ड में भी बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी, जे डी यू के शरद यादव , कांग्रेस के अरुण नेहरू और सतीश शर्मा पर जे के एल एफ के हवाले से पैसा लेने का आरोप लगा था ,जांच भी बैठाई गयी थी लेकिन उस जांच का नतीजा पता नहीं इतिहास के किस डस्टबिन में दफ़न हो गया .कामनवेल्थ खेलों में भी हज़ारों करोड़ की लूट मचाई गयी थी लेकिन जब दोनों की मुख्य पार्टियों के सूरमाओं के नाम आने लगे तो उसके भी दफ़न की तैयारी कर दी गयी. अब जब टाटा ने बीजेपी की पोल भी खोलना शुरू कर दिया है तो लगता है कि २जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच का भी वही हस्र होगा जो जैन हवाला काण्ड की जांच का हुआ था. पूंजीपतियों के सबसे प्रिय चैनल ने जिस जोशो खरोश से टाटा की चिट्ठी के हवाले से मामले को तूल देना शुरू किया है ,उस से तो साफ़ ज़ाहिर है कि टाटा की चिट्ठी सोची समझी नीति के तहत लिखी गयी है जिस से संचार के अरबों रूपये के घोटालों पर पूरी तरह से पर्दा डाला जा सके. ऐसा लगता है कि टाटा ने यह चिट्ठी ऐसे लोगों से सलाह करके लिखा है जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के साथ धंधा करते हैं .दुनिया जानती है कि टाटा ग्रुप के लोग कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही बहुत क़रीबी हैं . आखिर अभी कल की बात है जब यू पी ए की रेल मंत्री ममता बनर्जी ने टाटा को सिंगुर से खदेड़ा था ,तो बीजेपी के सबसे ताक़तवर नेता , नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने राज्य में सम्मान सहित स्थापित किया था और रतन टाटा ने भी नरेंद्र मोदी की तारीफ़ में गीत गाये थे. इसलिए टाटा को बीजेपी का दुश्मन बताने की कोशिश तो बिलकुल नहीं की जानी चाहिए , वे दोनों ही पूंजीवादी पार्टियों के अपने बन्दे हैं . जानकार बता रहे हैं कि टाटा के हस्तक्षेप को सोच समझ कर करवाया गया है जिस से जनता की जो संपत्ति लूटी गयी है उसको जांच के दायरे से बाहर लाया जा सके. दुर्भाग्य यह है कि इस देश में लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस पूंजीवादी व्यवस्था के सेवक हैं और सब चाहते हैं कि शासक वर्गों की पार्टियां मौज करती रहें और गरीब आदमी जिसके विकास के लिए सरकारी नीतियाँ बनायी जानी चाहिए वह परेशानी के कुचक्र में डूबता उतराता रहे.
जो भी हो टाटा के नए बयान से कम से कम पवित्रता की चादर ओढ़ कर बाकी दुनिया को भ्रष्ट कह रहे हर टी वी चैनल पर प्रकट होने वाले बीजेपी के नेताओं की वाणी में थोड़ी विनम्रता की झलक देखने को मिलेगी. अब बात समझ में आने लगी है कि कि क्यों बीजेपी वाले आपराधिक जांच का विरोध करते रहे हैं .आपराधिक जांच का काम पुलिस का पावर रखने वाली एजेंसियों की तरफ से होने की वजह से जांच का काम पूरा होते ही अपने आप मुक़दमा चल जाता है यानी अगर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कोई जांच होती है तो अगर अपराध साबित हुआ तो अपने आप आपराधिक मुक़दमा चल पडेगा . अन्य किसी जांच के बाद सी बी आई या किसी अन्य पुलिस एजेंसी को एफ आई आर लिख कर जांच करके तब मुक़दमा चलाने की बात होती है .मसलन अब अगर २००१ से लेकर अब तक के दूरसंचार के घोटालों की जांच करवाई जायेगी तो जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ आपराधिक मुक़दमा चल पड़ेगा. ऐसी हालत बीजेपी को सूट नहीं करती और कांग्रेस को मज़ा आ रहा है क्योंकि अगर ए राजा पकड़ा भी जाता है तो वह कांग्रेस का सदस्य तो है नहीं जबकि बीजेपी के राज में जो भी मंत्री थे सब बीजेपी वालों के सदस्य थे . जिन लोगों ने उस दौर में रिपोर्ट किया है उन्हें याद होगा कि स्व प्रमोद महाजन इस बात का बहुत बुरा मानते थे जब दूरसंचार जैसा मलाईदार विभाग किसी सहयोगी पार्टी के पास जाने की बाद की जाती थी. बहरहाल अब जनता की ओर से पत्रकारिता कर रहे लोगों को चाहिए कि ए राजा और २००१ की हेराफेरी की जांच के लिए दबाव बनाये रखें वरना जो एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ राजा ने डकारे हैं और २५ जनवरी की एक रात को एन डी ए के राज में जो मुफ्त स्पेक्ट्रम देकर लाखों करोड़ डकारे गए थे सब की जांच अधूरी रह जायेगी
Monday, December 6, 2010
बाबासाहेब अंबेडकर की याद में लगा मुंबई में मेला
शेष नारायण सिंह
दिल्ली में रहने वालों को महान नेताओं की समाधियों के बारे में खासी जानकारी रहती है. लगभग हर महीने ही सरकारी तौर पर समाधियों पर फूल माला चढ़ती रहती है . यह अलग बात है कि महात्मा गाँधी के अलावा और किसी समाधि पर आम आदमी शायद ही कभी जाता हो . अवाम की श्रद्धा के स्थान के रूप में महात्मा जी की समाधि तो स्थापित हो चुकी है लेकिन बाकी सब कुछ सरकारी स्तर पर ही है . करीब ३५ साल से दिल्ली में रह रहे अवध के एक गाँव से आये हुए इंसान के लिए यह सब उत्सुकता नहीं पैदा करता. बचपन में पढ़ा था कि शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगने वाले थे लेकिन महत्मा गाँधी जैसे शहीद की मजार पर वैसा मेला कभी नहीं दिखा जैसा कि हमारे गाँव के आसपास के सालाना मेलों के अवसर पर लगता है .हाँ यह सच है कि गाँधी जी की समाधि पर दिल्ली आने वाले ज़्यादातर लोग जाते ज़रूर हैं ,वे चाहे आम जन हों या किसी देश के शासक .कई बार सोचता था कि शायद शहादत को बढ़ावा देने के लिए ऐसा कह दिया गया था, मेला वेला कहीं नहीं लगने वाला था . लेकिन इस सोच को इस बार ज़बरदस्त झटका लगा . इस साल बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के मौके पर मुंबई में मौजूद रहने का मौक़ा मिला. बात बिलकुल समझ में आ गयी कि जिन लोगों ने भी कहा था कि शहीदों की मजारों पर लगेगें हर बरस मेले, वह सच कह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की चैत्यभूमि पर इस साल छः दिसम्बर को मेला लगा था . मैंने अपनी आँखों से देखा . जिन लोगों से वहां मुलाक़ात हुई उन्होंने बताया कि यहाँ इसी तरह का मेला हर साल लगता है . लाखों लोग पूरे महाराष्ट्र से छः दिसंबर को मुंबई के दादर की चौपाटी पर आते हैं और बाबासाहेब की स्मृति में सिर झुकाते हैं .
इस साल भी दादर स्थित बाबासाहेब के स्मारक, चैत्यभूमि पर कई लाख लोग आये, एक दिन पहले से ही लाइन लगने लगी थी .दादर की चौपाटी की तरफ जाने वाली हर सड़क पर इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा था. २ किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी . जब मैं वरली पंहुचा तो लाइन में लगा हुआ आख़िरी व्यक्ति वहीं था . वरली की दूरी दादर के स्मारक से करीब २ किलोमीटर है . जानकारों ने बताया कि आम तौर पर छ से सात घंटे लाइन में लगकर ही बाबासाहेब की समाधि तक पंहुचा जा सकता है .५ दिसंबर से ही लाइन में लगे लोग ६ दिसंबर को शिवाजी पार्क में सार्वजनिक सभा में उतनी ही खुशी से शामिल होते हैं .. लोगों के चेहरों पर जो उत्साह दिखता है ,जिसने उसे नहीं देखा ,उसे मालूम ही नहीं कि उत्साह होती क्या चीज़ है . .बहुत ही पतली गलियों से होकर चैत्यभूमि का रास्ता गुज़रता है. पुलिस का बहुत ही ज़बरदस्त इंतज़ाम था . इसलिए ज़्यादातर लोगों को मालूम था कि वे वहां तक नहीं पंहुच पायेगें . लेकिन उन्हने चिंता नहीं थी .लोग दादर की चौपाटी पर गीली रेत से उत्साही लग बाबासाहेब का स्मारक बना लेते हैं और उसी स्मारक के सामने अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित कर देते हैं .रेत के बने इन स्मारकों पर भी बहुत सारे पुष्प चढ़ाए गए थे ,मोमबत्तियां लगी हुई थीं और अगरबत्तियां सुलग रही थीं .दादर से लेकर परेल तक सडकों पर बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो अंबेडकर साहित्य बेच रहे थे.अंबेडकर की तस्वीरें भी बिक रही थीं ,उनकी मूर्तियों का भी बहुत बड़ा ज़खीएर था और बहुत सारे लोग अपने हाथ पर अंबेडकर की तस्वीर का टैटू गुदवा रहे थे.
औरंगाबाद से आये एक परिवार से पता लगा कि वे हर साल छः दिसंबर को दादर आते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि चैत्यभूमि तक नहीं पंहुचते . फिर भी कोई परवाह नहीं . जब चलते हैं और वापस जाने के एक हफ्ते तक उनके घर का माहौल अंबेडकरमय रहता है .उत्तर प्रदेश के रहने वाले आदमी को लगता है कि डॉ अंबेडकर से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम दलितों के आकर्षण की ही चीज़ है लेकिन मुंबई की सडकों पर छः दिसंबर को घूमते हुए इस धारणा के परखचे उड़ गए. दादर के आसपास ऐसे बहुत सारे लोग मिले जो दलित नहीं थे. उनके पूर्वज दलितों के शोषक रह चुके थे लेकिन वे अब पूरी तरह से बाबासाहेब की सामाजिक न्याय की लड़ाई में शामिल हैं . ऐसा शायद इसलिए होता है कि महाराष्ट्र में सामाजिक बराबरी के संघर्ष का एक मज़बूत इतिहास है . डॉ अंबेडकर के पहले इसी महाराष्ट्र में महात्मा फुले ने भी सामाजिक बराबरी के संघर्ष को एक स्वरुप दिया था और अपने माता पिता के विरोध के बावजूद १८४८ में पूना में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोल दिया था . उन्हें अपने घरवालों की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी लेकिन आन्दोलन चलता रहा था.डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा समय से चल रहे बराबरी के आन्दोलन के नतीजे की ताक़त तब समझ में आई जब दादर की चैत्य भूमि में अंबेडकर के भक्तों का हुजूम देखा. और लगा कि जिसने भी कहा था कि शहीदों की याद में हर बरस मेले लगेगें , उसने गलत नहीं कहा था
दिल्ली में रहने वालों को महान नेताओं की समाधियों के बारे में खासी जानकारी रहती है. लगभग हर महीने ही सरकारी तौर पर समाधियों पर फूल माला चढ़ती रहती है . यह अलग बात है कि महात्मा गाँधी के अलावा और किसी समाधि पर आम आदमी शायद ही कभी जाता हो . अवाम की श्रद्धा के स्थान के रूप में महात्मा जी की समाधि तो स्थापित हो चुकी है लेकिन बाकी सब कुछ सरकारी स्तर पर ही है . करीब ३५ साल से दिल्ली में रह रहे अवध के एक गाँव से आये हुए इंसान के लिए यह सब उत्सुकता नहीं पैदा करता. बचपन में पढ़ा था कि शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगने वाले थे लेकिन महत्मा गाँधी जैसे शहीद की मजार पर वैसा मेला कभी नहीं दिखा जैसा कि हमारे गाँव के आसपास के सालाना मेलों के अवसर पर लगता है .हाँ यह सच है कि गाँधी जी की समाधि पर दिल्ली आने वाले ज़्यादातर लोग जाते ज़रूर हैं ,वे चाहे आम जन हों या किसी देश के शासक .कई बार सोचता था कि शायद शहादत को बढ़ावा देने के लिए ऐसा कह दिया गया था, मेला वेला कहीं नहीं लगने वाला था . लेकिन इस सोच को इस बार ज़बरदस्त झटका लगा . इस साल बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के मौके पर मुंबई में मौजूद रहने का मौक़ा मिला. बात बिलकुल समझ में आ गयी कि जिन लोगों ने भी कहा था कि शहीदों की मजारों पर लगेगें हर बरस मेले, वह सच कह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की चैत्यभूमि पर इस साल छः दिसम्बर को मेला लगा था . मैंने अपनी आँखों से देखा . जिन लोगों से वहां मुलाक़ात हुई उन्होंने बताया कि यहाँ इसी तरह का मेला हर साल लगता है . लाखों लोग पूरे महाराष्ट्र से छः दिसंबर को मुंबई के दादर की चौपाटी पर आते हैं और बाबासाहेब की स्मृति में सिर झुकाते हैं .
इस साल भी दादर स्थित बाबासाहेब के स्मारक, चैत्यभूमि पर कई लाख लोग आये, एक दिन पहले से ही लाइन लगने लगी थी .दादर की चौपाटी की तरफ जाने वाली हर सड़क पर इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा था. २ किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी . जब मैं वरली पंहुचा तो लाइन में लगा हुआ आख़िरी व्यक्ति वहीं था . वरली की दूरी दादर के स्मारक से करीब २ किलोमीटर है . जानकारों ने बताया कि आम तौर पर छ से सात घंटे लाइन में लगकर ही बाबासाहेब की समाधि तक पंहुचा जा सकता है .५ दिसंबर से ही लाइन में लगे लोग ६ दिसंबर को शिवाजी पार्क में सार्वजनिक सभा में उतनी ही खुशी से शामिल होते हैं .. लोगों के चेहरों पर जो उत्साह दिखता है ,जिसने उसे नहीं देखा ,उसे मालूम ही नहीं कि उत्साह होती क्या चीज़ है . .बहुत ही पतली गलियों से होकर चैत्यभूमि का रास्ता गुज़रता है. पुलिस का बहुत ही ज़बरदस्त इंतज़ाम था . इसलिए ज़्यादातर लोगों को मालूम था कि वे वहां तक नहीं पंहुच पायेगें . लेकिन उन्हने चिंता नहीं थी .लोग दादर की चौपाटी पर गीली रेत से उत्साही लग बाबासाहेब का स्मारक बना लेते हैं और उसी स्मारक के सामने अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित कर देते हैं .रेत के बने इन स्मारकों पर भी बहुत सारे पुष्प चढ़ाए गए थे ,मोमबत्तियां लगी हुई थीं और अगरबत्तियां सुलग रही थीं .दादर से लेकर परेल तक सडकों पर बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो अंबेडकर साहित्य बेच रहे थे.अंबेडकर की तस्वीरें भी बिक रही थीं ,उनकी मूर्तियों का भी बहुत बड़ा ज़खीएर था और बहुत सारे लोग अपने हाथ पर अंबेडकर की तस्वीर का टैटू गुदवा रहे थे.
औरंगाबाद से आये एक परिवार से पता लगा कि वे हर साल छः दिसंबर को दादर आते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि चैत्यभूमि तक नहीं पंहुचते . फिर भी कोई परवाह नहीं . जब चलते हैं और वापस जाने के एक हफ्ते तक उनके घर का माहौल अंबेडकरमय रहता है .उत्तर प्रदेश के रहने वाले आदमी को लगता है कि डॉ अंबेडकर से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम दलितों के आकर्षण की ही चीज़ है लेकिन मुंबई की सडकों पर छः दिसंबर को घूमते हुए इस धारणा के परखचे उड़ गए. दादर के आसपास ऐसे बहुत सारे लोग मिले जो दलित नहीं थे. उनके पूर्वज दलितों के शोषक रह चुके थे लेकिन वे अब पूरी तरह से बाबासाहेब की सामाजिक न्याय की लड़ाई में शामिल हैं . ऐसा शायद इसलिए होता है कि महाराष्ट्र में सामाजिक बराबरी के संघर्ष का एक मज़बूत इतिहास है . डॉ अंबेडकर के पहले इसी महाराष्ट्र में महात्मा फुले ने भी सामाजिक बराबरी के संघर्ष को एक स्वरुप दिया था और अपने माता पिता के विरोध के बावजूद १८४८ में पूना में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोल दिया था . उन्हें अपने घरवालों की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी लेकिन आन्दोलन चलता रहा था.डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा समय से चल रहे बराबरी के आन्दोलन के नतीजे की ताक़त तब समझ में आई जब दादर की चैत्य भूमि में अंबेडकर के भक्तों का हुजूम देखा. और लगा कि जिसने भी कहा था कि शहीदों की याद में हर बरस मेले लगेगें , उसने गलत नहीं कहा था
Wednesday, December 1, 2010
पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता में फर्क है
शेष नारायण सिंह
१९७३ में जब मैंने शिक्षक के रूप में काम शुरू किया तो एक गुरू ने मन्त्र दिया था कि जो भी ताक़तवर होगा उसे पूंजीपति अपने कब्जे में ले लेगा . गंवई माहौल में बात कही गयी थी. वहां सबसे बड़ा पूंजीपति गावं का वह साहूकार ही होता था जो लोगों को कुछ पैसे कौड़ी उधार दे देता था.शादी व्याह में मदद कर देता था ,क़र्ज़ दे देता था . इलाके के सबसे गरीब आदमी टिहूरी का बेटा जब तहसील में बाबू हो गया तो सेठ ने उसे अपना आदमी घोषित कर दिया. कुछ कपड़ा लत्ता बनवा दिया जिसे पहन कर वह दफ्तर जा सके. सबको लगा कि ठीक ही है . सामाजिक आर्थिक स्थिति में बहुत फर्क नहीं था इसलिए गैप ज्यादा बड़ा नहीं दिखा . दिल्ली आने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन आदि क्रांतिकारियों से मुलाक़ात हुई जो मानते थे कि पिछली सदी के अंत तक भारत में इन्किलाब आ जाएगा. ज़ाहिर है कि यह विचार ख्याली पुलाव भर था . लेकिन जब धीरे धीरे उन्हीं क्रांतिकारियों को सिस्टम का हिस्सा बनते देखा तो बात समझ में आनी शुरू हुई कि गाँव में जिसे कॉमरेड शीतला गुप्ता ने पूंजीपति कहा था वह वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था थी . दिल्ली में देखा कि पूंजीवादी व्यवस्था ने राजनीति , नौकरशाही ,मीडिया सबको काबू में कर रखा है . अखबारों में नौकरी शुरू की और जब ज़रा सीनियर लेवल पर पंहुचे तो ऊपर से हिदायत आ जाती थी कि कुछ लोगों के खिलाफ खबर नहीं लिखना है . नीचे वालों को समझाया जाता था लेकिन तरीका ऐसा अपनाया जाता था कि उन्हें यह मुगालता बना रहे कि वे प्रेस की तथाकथित आज़ादी का लाभ उठा रहे हैं . जब टेलीविज़न में काम करने का अवसर मिला तो शुरुआती दौर दिलचस्प था .अपने देश में २४ घंटे की टी वी ख़बरों का वह आदिकाल था . अखबार से आये एक व्यक्ति के लिए बहुत मजेदार स्थिति थी . जो खबर जहां हुई ,अगर उसकी बाईट और शाट हाथ आ गए तो उन्हें लगाकर सही बात रखने में मज़ा बहुत आता था. लेकिन छः महीने के अन्दर पूंजीवादी व्यवस्था ने ऐसा सिस्टम बना दिया कि वही खबरें जाने लगीं जो संस्थान के हित में रहती थी. पीपली लाइव के अनुषा रिज़वी और महमूद फारूकी उन्हीं दिनों उसी न्यूज़ रूप में इस विकासमान व्यवस्था को देख रहे थे. पीपली लाइव की स्क्रिप्ट को उनके उस दौर के अनुभव से सीधे जोड़कर देखा जा सकता है . उसी संस्थान में बहुत सारे बहुत मामूली स्तर के लोगों को महान बनाने की कार्यशाला भी चल रही थी . और टेलिविज़न की चकाचौंध के शिकार ज़्यादातर लोगों को वही मीडियाकर लोग सर्वज्ञ बनाकर पेश कर दिए गए. दलाल शिरोमणि नीरा राडिया ने जो खेल किया है यह उसी पूंजीवादी प्रक्रिया का नतीजा है. अपने को भाग्यविधाता समझ बैठे पत्रकारों के उस मुगालते को हवा देकर नीरा राडिया अपना धंधा डंके की चोट पर चला रही थीं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी . सरकार में बैठे किसी ईमानदार अफसर ने सिस्टम का ही फायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता की गलियों में घूम रहे सत्ता के दलालों को पब्लिक डोमेन में ला दिया . . आज पत्रकारिता के चोले में अपना अन्य धंधा चला रहे दिल्ली के पावर ब्रोकर बेनकाब खड़े हैं. अपनी बिरादरी को बचाने की बड़े पैमाने पर कोशिश चल रही है . कोई ट्वीट पर अपनी बात कह रहा है ,तो कोई टेलिविज़न के कार्यक्रमों के तमाशे की मार्फ़त कौम को समझा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के ताक़तवर माध्यम में इन दलालनुमा पत्रकारों ने दाग तो लगाया ही है . पत्रकारिता से जुड़े लोगों और लोकशाही की पक्षधर जमातों के लिए भी चुनौती है कि पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता के बीच जो बहुत बारीक लाइन है उसको बड़ी दीवार बनाने की मुहिम चलायें वरना इस देश के विकासमान लोकतंत्र का बहुत नुकसान हो जाएगा
१९७३ में जब मैंने शिक्षक के रूप में काम शुरू किया तो एक गुरू ने मन्त्र दिया था कि जो भी ताक़तवर होगा उसे पूंजीपति अपने कब्जे में ले लेगा . गंवई माहौल में बात कही गयी थी. वहां सबसे बड़ा पूंजीपति गावं का वह साहूकार ही होता था जो लोगों को कुछ पैसे कौड़ी उधार दे देता था.शादी व्याह में मदद कर देता था ,क़र्ज़ दे देता था . इलाके के सबसे गरीब आदमी टिहूरी का बेटा जब तहसील में बाबू हो गया तो सेठ ने उसे अपना आदमी घोषित कर दिया. कुछ कपड़ा लत्ता बनवा दिया जिसे पहन कर वह दफ्तर जा सके. सबको लगा कि ठीक ही है . सामाजिक आर्थिक स्थिति में बहुत फर्क नहीं था इसलिए गैप ज्यादा बड़ा नहीं दिखा . दिल्ली आने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन आदि क्रांतिकारियों से मुलाक़ात हुई जो मानते थे कि पिछली सदी के अंत तक भारत में इन्किलाब आ जाएगा. ज़ाहिर है कि यह विचार ख्याली पुलाव भर था . लेकिन जब धीरे धीरे उन्हीं क्रांतिकारियों को सिस्टम का हिस्सा बनते देखा तो बात समझ में आनी शुरू हुई कि गाँव में जिसे कॉमरेड शीतला गुप्ता ने पूंजीपति कहा था वह वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था थी . दिल्ली में देखा कि पूंजीवादी व्यवस्था ने राजनीति , नौकरशाही ,मीडिया सबको काबू में कर रखा है . अखबारों में नौकरी शुरू की और जब ज़रा सीनियर लेवल पर पंहुचे तो ऊपर से हिदायत आ जाती थी कि कुछ लोगों के खिलाफ खबर नहीं लिखना है . नीचे वालों को समझाया जाता था लेकिन तरीका ऐसा अपनाया जाता था कि उन्हें यह मुगालता बना रहे कि वे प्रेस की तथाकथित आज़ादी का लाभ उठा रहे हैं . जब टेलीविज़न में काम करने का अवसर मिला तो शुरुआती दौर दिलचस्प था .अपने देश में २४ घंटे की टी वी ख़बरों का वह आदिकाल था . अखबार से आये एक व्यक्ति के लिए बहुत मजेदार स्थिति थी . जो खबर जहां हुई ,अगर उसकी बाईट और शाट हाथ आ गए तो उन्हें लगाकर सही बात रखने में मज़ा बहुत आता था. लेकिन छः महीने के अन्दर पूंजीवादी व्यवस्था ने ऐसा सिस्टम बना दिया कि वही खबरें जाने लगीं जो संस्थान के हित में रहती थी. पीपली लाइव के अनुषा रिज़वी और महमूद फारूकी उन्हीं दिनों उसी न्यूज़ रूप में इस विकासमान व्यवस्था को देख रहे थे. पीपली लाइव की स्क्रिप्ट को उनके उस दौर के अनुभव से सीधे जोड़कर देखा जा सकता है . उसी संस्थान में बहुत सारे बहुत मामूली स्तर के लोगों को महान बनाने की कार्यशाला भी चल रही थी . और टेलिविज़न की चकाचौंध के शिकार ज़्यादातर लोगों को वही मीडियाकर लोग सर्वज्ञ बनाकर पेश कर दिए गए. दलाल शिरोमणि नीरा राडिया ने जो खेल किया है यह उसी पूंजीवादी प्रक्रिया का नतीजा है. अपने को भाग्यविधाता समझ बैठे पत्रकारों के उस मुगालते को हवा देकर नीरा राडिया अपना धंधा डंके की चोट पर चला रही थीं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी . सरकार में बैठे किसी ईमानदार अफसर ने सिस्टम का ही फायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता की गलियों में घूम रहे सत्ता के दलालों को पब्लिक डोमेन में ला दिया . . आज पत्रकारिता के चोले में अपना अन्य धंधा चला रहे दिल्ली के पावर ब्रोकर बेनकाब खड़े हैं. अपनी बिरादरी को बचाने की बड़े पैमाने पर कोशिश चल रही है . कोई ट्वीट पर अपनी बात कह रहा है ,तो कोई टेलिविज़न के कार्यक्रमों के तमाशे की मार्फ़त कौम को समझा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के ताक़तवर माध्यम में इन दलालनुमा पत्रकारों ने दाग तो लगाया ही है . पत्रकारिता से जुड़े लोगों और लोकशाही की पक्षधर जमातों के लिए भी चुनौती है कि पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता के बीच जो बहुत बारीक लाइन है उसको बड़ी दीवार बनाने की मुहिम चलायें वरना इस देश के विकासमान लोकतंत्र का बहुत नुकसान हो जाएगा
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