शेष नारायण सिंह
नीरा राडिया के टेलीफोन के शिकार हुए लोगों की नयी किश्त बाज़ार में आ गयी है .पहली किश्त में तो अंग्रेज़ी वाले पत्रकार और दिल्ली के काकटेल सर्किट वालों की इज्ज़त की धज्जियां उडी थीं . उनमें से दो को तो उनके संगठनों ने निपटा दिया . वीर संघवी और प्रभु चावला को निकाल दिया गया है लेकिन बरखा दत्त वाले लोग अभी डटे हुए हैं , मानने को तैयार नहीं हैं कि बरखा दत्त गलती भी कर सकती हैं . आउटलुक और भड़ास वालों की कृपा से सारी दुनिया को औपचारिक तौर पर मालूम हो गया है कि पत्रकारिता के टाप पर बैठे कुछ लोग दलाली भी करते थे .हालांकि दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर लोगों को मालूम है कि खेल होता था लेकिन किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उसके बारे में बात कर सके .नयी खेप में नीरा राडिया की वास्तविक हैसियत का पता चलता है जहां वह पी टी आई जैसी ताक़तवर न्यूज़ एजेंसी को ब्लैक लिस्ट करने की बात करती हैं . हिन्दी के सबसे बड़े अखबारों को सेट करने की बात करती हैं और हिन्दी ,उर्दू और अंग्रेज़ी में काम कारने वाले एक मीडिया हाउस के मुख्य अधिकारी को लाईन में लेने की बात करती हैं . इसी टेप में उनका कारिन्दा बताता है कि देश के एक बड़े मीडिया हाउस का रिपोर्टर उसके पास बैठा है जिसने अनिल अम्बानी के खिलाफ सारी जानकारी उपलब्ध करवाई है . पुरानी किश्तों के पब्लिक होने के बाद वीर संघवी नाम के पत्रकार किसी टी वी चैनल पर नमूदार हुए थे और उपदेश देते हुए बता रहे थे कि पत्रकार को तरह तरह के लोगों से बात करके खबरें जुटानी पड़ती हैं . और उन्होंने नीरा राडिया से खबरें ही जुटाने की कोशिश की थी. हालांकि उस बार भी साफ़ नज़र आ रहा था कि वे राडिया दलाली काण्ड के ख़ास सिपहसलार थे लेकिन नयी खेप से साफ़ पता चल रहा है कि वे न केवल राडिया के हुक्म से लिखते थे बल्कि अपना कालम छपने के पहले नीरा राडिया को फोन करके सुनाते थे और उस से मंजूरी लेते थे. इस बार के टेपों से पता चला है कि राडिया गैंग की एक और लठैत, बरखा दत्त भी जो कुछ कर रही थीं, वह पत्रकारिता तो नहीं थी. नीरा राडिया अपने किसी चेले को बताती सुनी जा रही हैं कि बरखा दत्त ने कांग्रेस से कहकर एक बयान जारी करवा दिया है . तुर्रा यह कि बरखा दत्त अभी पिछले दिनों अपने चैनल पर कहती पायी गयी थीं कि वे राडिया की सूचना का इस्तेमाल ख़बरों के लिए कर रही थीं. उनका दलाली से कोई लेना देना नहीं था .
नयी खेप में उन लोगों के नंगा होने का काम भी शुरू हो गया है जो काकटेल सर्किट में नहीं आते हैं . हिन्दी पत्रकारों के बारे में अपने किसी कारिंदे को जिस तरह से राडिया समझा रही हैं उस से कहानी की बहुत सारी बारीक परतें भी खुलना शुरू हो गयी हैं . देश के सबसे बड़े हिन्दी अखबारों का नाम जिस तरह से राडिया जी के श्रीमुख से निकल रहा है उसे सुनकर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं रह गया है कि आने वाले दिनों में बड़े बड़े सूरमा राडिया के टेपों की ज़द में आ जायेगें . लेकिन दिल्ली में सक्रिय ज़्यादातर दलालों की पोल खुल जाने का एक ख़तरा भी है . इनमें से ज़्यादातर लोग मीडिया में बहुत ही ताक़तवर नाम हैं . इसलिए इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह सारे लोग लामबंद हो जाएँ और उन लोगों के खिलाफ ही मोर्चा खोल दें जो राडिया काण्ड में शामिल नहीं हैं . राडिया गैंग के लोग यह भी अभियान शुरू कर सकते है कि जो लोग राडिया के लिए काम नहीं कर रहे हैं वे बेकार के पत्रकार हैं . इसका भावार्थ यह हुआ कि जिन लोगों के नाम राडिया की लिस्ट में नहीं हैं , उनकी नौकरी ख़त्म हो सकती है . इसका एक अंदाज़ कल देखने को मिला जब देश के एक बहुत बड़े पत्रकार ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि देश का बड़े से बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है . जिस से वे बात कर रहे थे उन्होंने कहा कि टाटा जैसा बड़ा उद्योगपति विदेशों में जा रहा है क्योंकि उसे अपने देश में धंधा करने की छूट नहीं है यह वही टाटा हैं जिनका इस्तेमाल इसी स्वनामधन्य पत्रकार ने कुछ दिन पहले राडिया टेप में फंसे पत्रकारों के बचाव के लिए किया था . बाद में संविधान का हवाला देकर टाटा जी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि राडिया से उनकी बातचीत बहुत ही व्यक्तिगत है लिहाज़ा उसके प्रसारण को रोक दिया जाना चाहिए . सुप्रीम कोर्ट ने स्टे देने से इनकार कर दिया था . ऐसी हालत में लगता है कि जो भी ताक़तवर लोग हैं ,चाहे वे राजनीति में हों , मीडिया में हों या सरकारी अफसरतंत्र का हिस्सा हों , राडिया के गिरोह के संभावित सदस्य हो सकते हैं . यह लोग अगर एकजुट हो गए तो देश की नीति को प्रभावित कर सकते हैं . ऐसी हालत में केवल वेब मीडिया के जांबाज़ पत्रकार ही बचेगें जो पुरानी नैतिकता की लड़ाई लड़ रहे होंगें .लेकिन उनकी आर्थिक क्षमता सीमित होगी . लगता है कि अब रास्ते रोज़ ही सिमटते जा रहे हैं और अवाम को ही कुछ करना पड़ेगा जिस से दिल्ली दरबार के हर कोने में घात लगाए बैठी बे-ईमानी को घेरा जा सके..
Saturday, December 11, 2010
Thursday, December 9, 2010
सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए शासक वर्ग ने टाटा को मैदान में उतारा
शेष नारायण सिंह
टेलीकाम घोटाले ने सुखराम युग की याद ताज़ा कर दी .उस बार भी करीब ३७ दिन तक बीजेपी ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दिया था. पी वी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे और सुखराम ने हिमाचल फ्यूचरिस्टिक नाम की किसी कंपनी को नाजायज़ लाभ पंहुचा कर हेराफेरी की थी. बाद में वही सुखराम बीजेपी के आदरणीय सदस्य बन गए थे . आज भी जब बीजेपी के नेताओं की पत्रकार वार्ताओं में सुखराम शब्द का ज़िक्र आता है ,वे खिसिया जाते हैं . लगता है कि मौजूदा टेलीकाम घोटाले के बाद भी बीजीपी का वही हाल होने वाला है . क्योंकि १९९९ से लेकर २००४ तक बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की आँखों के तारे रहे रतन टाटा ने बीजेपी की पोल खोलने का काम शुरू कर दिया है . अपने मुल्क में टाटा को बहुत ही पवित्र पूंजीपति मानने का फैशन है . बीजेपी वालों ने भी अब तक टाटा को बहुत ही पवित्र आत्मा बताने की बार बार कोशिश की है . आज भी आरोप लगाया जाता है कि कि बीजेपी की सरकार ने विदेश सचार निगम जैसी संपन्न कंपनी को टाटा के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया था. बताते हैं कि विदेश संचार निगम के पास जितनी ज़मीन दिल्ली में है ,उसके १ प्रतिशत से ही १२०० करोड़ निकाला जा सकता है . आरोप है कि बीजेपी के राज में जो भी भाई संचार मंत्री था, उसने खेल कर दिया था और सरकारी कंपनी को सस्ते दाम पर बेच कर नंबर दो में रक़म अपनी अंटी में डाल लिया था . उन्हीं टाटा महोदय ने बीजेपी की कृपा से एम पी बने एक उद्योगपति की चिट्ठी के जवाब में साफ़ लिख दिया है कि संचार के क्षेत्र में हेराफेरी बीजेपी के राज में भी हुई थी. टाटा की इस चिट्ठी के बाद काकटेल सर्किट में हडकंप मच गया है. इस चिट्ठी के पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि २००१ से शुरू कर के संचार और २ जी स्पेक्ट्रम घोटालों की जांच की जानी चाहिए . बीजेपी वाले फ़ौरन रक्षात्मक मुद्रा में आ गए और कहने लगे कि हम तो तैयार हैं . अब उन्हें कौन बताये कि भाई आपके तैयार होने का कोई मतलब नहीं है . अब तो सुप्रीम कोर्ट का संकेत आ गया है और अब तो जांच शुरू हो जायेगी. आप लोगों को चाहिए कि अब अपने आप को बचाने की कोशिश शुरू कर दें .टाटा के मैदान ले लेने के बाद लगता है कि अब संचार घोटाले की जांच सही तरीके से नहीं होगी और फिल्म 'जाने भी दो यारों 'की तर्ज़ पर लीपा पोती कर दी जायेगी . यह काम दिल्ली की काकटेल सर्किट के नेता जैन हवाला काण्ड के दौरान कर चुके हैं . जैन हवाला काण्ड में भी बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी, जे डी यू के शरद यादव , कांग्रेस के अरुण नेहरू और सतीश शर्मा पर जे के एल एफ के हवाले से पैसा लेने का आरोप लगा था ,जांच भी बैठाई गयी थी लेकिन उस जांच का नतीजा पता नहीं इतिहास के किस डस्टबिन में दफ़न हो गया .कामनवेल्थ खेलों में भी हज़ारों करोड़ की लूट मचाई गयी थी लेकिन जब दोनों की मुख्य पार्टियों के सूरमाओं के नाम आने लगे तो उसके भी दफ़न की तैयारी कर दी गयी. अब जब टाटा ने बीजेपी की पोल भी खोलना शुरू कर दिया है तो लगता है कि २जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच का भी वही हस्र होगा जो जैन हवाला काण्ड की जांच का हुआ था. पूंजीपतियों के सबसे प्रिय चैनल ने जिस जोशो खरोश से टाटा की चिट्ठी के हवाले से मामले को तूल देना शुरू किया है ,उस से तो साफ़ ज़ाहिर है कि टाटा की चिट्ठी सोची समझी नीति के तहत लिखी गयी है जिस से संचार के अरबों रूपये के घोटालों पर पूरी तरह से पर्दा डाला जा सके. ऐसा लगता है कि टाटा ने यह चिट्ठी ऐसे लोगों से सलाह करके लिखा है जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के साथ धंधा करते हैं .दुनिया जानती है कि टाटा ग्रुप के लोग कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही बहुत क़रीबी हैं . आखिर अभी कल की बात है जब यू पी ए की रेल मंत्री ममता बनर्जी ने टाटा को सिंगुर से खदेड़ा था ,तो बीजेपी के सबसे ताक़तवर नेता , नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने राज्य में सम्मान सहित स्थापित किया था और रतन टाटा ने भी नरेंद्र मोदी की तारीफ़ में गीत गाये थे. इसलिए टाटा को बीजेपी का दुश्मन बताने की कोशिश तो बिलकुल नहीं की जानी चाहिए , वे दोनों ही पूंजीवादी पार्टियों के अपने बन्दे हैं . जानकार बता रहे हैं कि टाटा के हस्तक्षेप को सोच समझ कर करवाया गया है जिस से जनता की जो संपत्ति लूटी गयी है उसको जांच के दायरे से बाहर लाया जा सके. दुर्भाग्य यह है कि इस देश में लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस पूंजीवादी व्यवस्था के सेवक हैं और सब चाहते हैं कि शासक वर्गों की पार्टियां मौज करती रहें और गरीब आदमी जिसके विकास के लिए सरकारी नीतियाँ बनायी जानी चाहिए वह परेशानी के कुचक्र में डूबता उतराता रहे.
जो भी हो टाटा के नए बयान से कम से कम पवित्रता की चादर ओढ़ कर बाकी दुनिया को भ्रष्ट कह रहे हर टी वी चैनल पर प्रकट होने वाले बीजेपी के नेताओं की वाणी में थोड़ी विनम्रता की झलक देखने को मिलेगी. अब बात समझ में आने लगी है कि कि क्यों बीजेपी वाले आपराधिक जांच का विरोध करते रहे हैं .आपराधिक जांच का काम पुलिस का पावर रखने वाली एजेंसियों की तरफ से होने की वजह से जांच का काम पूरा होते ही अपने आप मुक़दमा चल जाता है यानी अगर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कोई जांच होती है तो अगर अपराध साबित हुआ तो अपने आप आपराधिक मुक़दमा चल पडेगा . अन्य किसी जांच के बाद सी बी आई या किसी अन्य पुलिस एजेंसी को एफ आई आर लिख कर जांच करके तब मुक़दमा चलाने की बात होती है .मसलन अब अगर २००१ से लेकर अब तक के दूरसंचार के घोटालों की जांच करवाई जायेगी तो जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ आपराधिक मुक़दमा चल पड़ेगा. ऐसी हालत बीजेपी को सूट नहीं करती और कांग्रेस को मज़ा आ रहा है क्योंकि अगर ए राजा पकड़ा भी जाता है तो वह कांग्रेस का सदस्य तो है नहीं जबकि बीजेपी के राज में जो भी मंत्री थे सब बीजेपी वालों के सदस्य थे . जिन लोगों ने उस दौर में रिपोर्ट किया है उन्हें याद होगा कि स्व प्रमोद महाजन इस बात का बहुत बुरा मानते थे जब दूरसंचार जैसा मलाईदार विभाग किसी सहयोगी पार्टी के पास जाने की बाद की जाती थी. बहरहाल अब जनता की ओर से पत्रकारिता कर रहे लोगों को चाहिए कि ए राजा और २००१ की हेराफेरी की जांच के लिए दबाव बनाये रखें वरना जो एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ राजा ने डकारे हैं और २५ जनवरी की एक रात को एन डी ए के राज में जो मुफ्त स्पेक्ट्रम देकर लाखों करोड़ डकारे गए थे सब की जांच अधूरी रह जायेगी
टेलीकाम घोटाले ने सुखराम युग की याद ताज़ा कर दी .उस बार भी करीब ३७ दिन तक बीजेपी ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दिया था. पी वी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे और सुखराम ने हिमाचल फ्यूचरिस्टिक नाम की किसी कंपनी को नाजायज़ लाभ पंहुचा कर हेराफेरी की थी. बाद में वही सुखराम बीजेपी के आदरणीय सदस्य बन गए थे . आज भी जब बीजेपी के नेताओं की पत्रकार वार्ताओं में सुखराम शब्द का ज़िक्र आता है ,वे खिसिया जाते हैं . लगता है कि मौजूदा टेलीकाम घोटाले के बाद भी बीजीपी का वही हाल होने वाला है . क्योंकि १९९९ से लेकर २००४ तक बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की आँखों के तारे रहे रतन टाटा ने बीजेपी की पोल खोलने का काम शुरू कर दिया है . अपने मुल्क में टाटा को बहुत ही पवित्र पूंजीपति मानने का फैशन है . बीजेपी वालों ने भी अब तक टाटा को बहुत ही पवित्र आत्मा बताने की बार बार कोशिश की है . आज भी आरोप लगाया जाता है कि कि बीजेपी की सरकार ने विदेश सचार निगम जैसी संपन्न कंपनी को टाटा के हाथों कौड़ियों के मोल बेच दिया था. बताते हैं कि विदेश संचार निगम के पास जितनी ज़मीन दिल्ली में है ,उसके १ प्रतिशत से ही १२०० करोड़ निकाला जा सकता है . आरोप है कि बीजेपी के राज में जो भी भाई संचार मंत्री था, उसने खेल कर दिया था और सरकारी कंपनी को सस्ते दाम पर बेच कर नंबर दो में रक़म अपनी अंटी में डाल लिया था . उन्हीं टाटा महोदय ने बीजेपी की कृपा से एम पी बने एक उद्योगपति की चिट्ठी के जवाब में साफ़ लिख दिया है कि संचार के क्षेत्र में हेराफेरी बीजेपी के राज में भी हुई थी. टाटा की इस चिट्ठी के बाद काकटेल सर्किट में हडकंप मच गया है. इस चिट्ठी के पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि २००१ से शुरू कर के संचार और २ जी स्पेक्ट्रम घोटालों की जांच की जानी चाहिए . बीजेपी वाले फ़ौरन रक्षात्मक मुद्रा में आ गए और कहने लगे कि हम तो तैयार हैं . अब उन्हें कौन बताये कि भाई आपके तैयार होने का कोई मतलब नहीं है . अब तो सुप्रीम कोर्ट का संकेत आ गया है और अब तो जांच शुरू हो जायेगी. आप लोगों को चाहिए कि अब अपने आप को बचाने की कोशिश शुरू कर दें .टाटा के मैदान ले लेने के बाद लगता है कि अब संचार घोटाले की जांच सही तरीके से नहीं होगी और फिल्म 'जाने भी दो यारों 'की तर्ज़ पर लीपा पोती कर दी जायेगी . यह काम दिल्ली की काकटेल सर्किट के नेता जैन हवाला काण्ड के दौरान कर चुके हैं . जैन हवाला काण्ड में भी बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी, जे डी यू के शरद यादव , कांग्रेस के अरुण नेहरू और सतीश शर्मा पर जे के एल एफ के हवाले से पैसा लेने का आरोप लगा था ,जांच भी बैठाई गयी थी लेकिन उस जांच का नतीजा पता नहीं इतिहास के किस डस्टबिन में दफ़न हो गया .कामनवेल्थ खेलों में भी हज़ारों करोड़ की लूट मचाई गयी थी लेकिन जब दोनों की मुख्य पार्टियों के सूरमाओं के नाम आने लगे तो उसके भी दफ़न की तैयारी कर दी गयी. अब जब टाटा ने बीजेपी की पोल भी खोलना शुरू कर दिया है तो लगता है कि २जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच का भी वही हस्र होगा जो जैन हवाला काण्ड की जांच का हुआ था. पूंजीपतियों के सबसे प्रिय चैनल ने जिस जोशो खरोश से टाटा की चिट्ठी के हवाले से मामले को तूल देना शुरू किया है ,उस से तो साफ़ ज़ाहिर है कि टाटा की चिट्ठी सोची समझी नीति के तहत लिखी गयी है जिस से संचार के अरबों रूपये के घोटालों पर पूरी तरह से पर्दा डाला जा सके. ऐसा लगता है कि टाटा ने यह चिट्ठी ऐसे लोगों से सलाह करके लिखा है जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के साथ धंधा करते हैं .दुनिया जानती है कि टाटा ग्रुप के लोग कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही बहुत क़रीबी हैं . आखिर अभी कल की बात है जब यू पी ए की रेल मंत्री ममता बनर्जी ने टाटा को सिंगुर से खदेड़ा था ,तो बीजेपी के सबसे ताक़तवर नेता , नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपने राज्य में सम्मान सहित स्थापित किया था और रतन टाटा ने भी नरेंद्र मोदी की तारीफ़ में गीत गाये थे. इसलिए टाटा को बीजेपी का दुश्मन बताने की कोशिश तो बिलकुल नहीं की जानी चाहिए , वे दोनों ही पूंजीवादी पार्टियों के अपने बन्दे हैं . जानकार बता रहे हैं कि टाटा के हस्तक्षेप को सोच समझ कर करवाया गया है जिस से जनता की जो संपत्ति लूटी गयी है उसको जांच के दायरे से बाहर लाया जा सके. दुर्भाग्य यह है कि इस देश में लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस पूंजीवादी व्यवस्था के सेवक हैं और सब चाहते हैं कि शासक वर्गों की पार्टियां मौज करती रहें और गरीब आदमी जिसके विकास के लिए सरकारी नीतियाँ बनायी जानी चाहिए वह परेशानी के कुचक्र में डूबता उतराता रहे.
जो भी हो टाटा के नए बयान से कम से कम पवित्रता की चादर ओढ़ कर बाकी दुनिया को भ्रष्ट कह रहे हर टी वी चैनल पर प्रकट होने वाले बीजेपी के नेताओं की वाणी में थोड़ी विनम्रता की झलक देखने को मिलेगी. अब बात समझ में आने लगी है कि कि क्यों बीजेपी वाले आपराधिक जांच का विरोध करते रहे हैं .आपराधिक जांच का काम पुलिस का पावर रखने वाली एजेंसियों की तरफ से होने की वजह से जांच का काम पूरा होते ही अपने आप मुक़दमा चल जाता है यानी अगर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में कोई जांच होती है तो अगर अपराध साबित हुआ तो अपने आप आपराधिक मुक़दमा चल पडेगा . अन्य किसी जांच के बाद सी बी आई या किसी अन्य पुलिस एजेंसी को एफ आई आर लिख कर जांच करके तब मुक़दमा चलाने की बात होती है .मसलन अब अगर २००१ से लेकर अब तक के दूरसंचार के घोटालों की जांच करवाई जायेगी तो जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ आपराधिक मुक़दमा चल पड़ेगा. ऐसी हालत बीजेपी को सूट नहीं करती और कांग्रेस को मज़ा आ रहा है क्योंकि अगर ए राजा पकड़ा भी जाता है तो वह कांग्रेस का सदस्य तो है नहीं जबकि बीजेपी के राज में जो भी मंत्री थे सब बीजेपी वालों के सदस्य थे . जिन लोगों ने उस दौर में रिपोर्ट किया है उन्हें याद होगा कि स्व प्रमोद महाजन इस बात का बहुत बुरा मानते थे जब दूरसंचार जैसा मलाईदार विभाग किसी सहयोगी पार्टी के पास जाने की बाद की जाती थी. बहरहाल अब जनता की ओर से पत्रकारिता कर रहे लोगों को चाहिए कि ए राजा और २००१ की हेराफेरी की जांच के लिए दबाव बनाये रखें वरना जो एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ राजा ने डकारे हैं और २५ जनवरी की एक रात को एन डी ए के राज में जो मुफ्त स्पेक्ट्रम देकर लाखों करोड़ डकारे गए थे सब की जांच अधूरी रह जायेगी
Monday, December 6, 2010
बाबासाहेब अंबेडकर की याद में लगा मुंबई में मेला
शेष नारायण सिंह
दिल्ली में रहने वालों को महान नेताओं की समाधियों के बारे में खासी जानकारी रहती है. लगभग हर महीने ही सरकारी तौर पर समाधियों पर फूल माला चढ़ती रहती है . यह अलग बात है कि महात्मा गाँधी के अलावा और किसी समाधि पर आम आदमी शायद ही कभी जाता हो . अवाम की श्रद्धा के स्थान के रूप में महात्मा जी की समाधि तो स्थापित हो चुकी है लेकिन बाकी सब कुछ सरकारी स्तर पर ही है . करीब ३५ साल से दिल्ली में रह रहे अवध के एक गाँव से आये हुए इंसान के लिए यह सब उत्सुकता नहीं पैदा करता. बचपन में पढ़ा था कि शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगने वाले थे लेकिन महत्मा गाँधी जैसे शहीद की मजार पर वैसा मेला कभी नहीं दिखा जैसा कि हमारे गाँव के आसपास के सालाना मेलों के अवसर पर लगता है .हाँ यह सच है कि गाँधी जी की समाधि पर दिल्ली आने वाले ज़्यादातर लोग जाते ज़रूर हैं ,वे चाहे आम जन हों या किसी देश के शासक .कई बार सोचता था कि शायद शहादत को बढ़ावा देने के लिए ऐसा कह दिया गया था, मेला वेला कहीं नहीं लगने वाला था . लेकिन इस सोच को इस बार ज़बरदस्त झटका लगा . इस साल बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के मौके पर मुंबई में मौजूद रहने का मौक़ा मिला. बात बिलकुल समझ में आ गयी कि जिन लोगों ने भी कहा था कि शहीदों की मजारों पर लगेगें हर बरस मेले, वह सच कह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की चैत्यभूमि पर इस साल छः दिसम्बर को मेला लगा था . मैंने अपनी आँखों से देखा . जिन लोगों से वहां मुलाक़ात हुई उन्होंने बताया कि यहाँ इसी तरह का मेला हर साल लगता है . लाखों लोग पूरे महाराष्ट्र से छः दिसंबर को मुंबई के दादर की चौपाटी पर आते हैं और बाबासाहेब की स्मृति में सिर झुकाते हैं .
इस साल भी दादर स्थित बाबासाहेब के स्मारक, चैत्यभूमि पर कई लाख लोग आये, एक दिन पहले से ही लाइन लगने लगी थी .दादर की चौपाटी की तरफ जाने वाली हर सड़क पर इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा था. २ किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी . जब मैं वरली पंहुचा तो लाइन में लगा हुआ आख़िरी व्यक्ति वहीं था . वरली की दूरी दादर के स्मारक से करीब २ किलोमीटर है . जानकारों ने बताया कि आम तौर पर छ से सात घंटे लाइन में लगकर ही बाबासाहेब की समाधि तक पंहुचा जा सकता है .५ दिसंबर से ही लाइन में लगे लोग ६ दिसंबर को शिवाजी पार्क में सार्वजनिक सभा में उतनी ही खुशी से शामिल होते हैं .. लोगों के चेहरों पर जो उत्साह दिखता है ,जिसने उसे नहीं देखा ,उसे मालूम ही नहीं कि उत्साह होती क्या चीज़ है . .बहुत ही पतली गलियों से होकर चैत्यभूमि का रास्ता गुज़रता है. पुलिस का बहुत ही ज़बरदस्त इंतज़ाम था . इसलिए ज़्यादातर लोगों को मालूम था कि वे वहां तक नहीं पंहुच पायेगें . लेकिन उन्हने चिंता नहीं थी .लोग दादर की चौपाटी पर गीली रेत से उत्साही लग बाबासाहेब का स्मारक बना लेते हैं और उसी स्मारक के सामने अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित कर देते हैं .रेत के बने इन स्मारकों पर भी बहुत सारे पुष्प चढ़ाए गए थे ,मोमबत्तियां लगी हुई थीं और अगरबत्तियां सुलग रही थीं .दादर से लेकर परेल तक सडकों पर बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो अंबेडकर साहित्य बेच रहे थे.अंबेडकर की तस्वीरें भी बिक रही थीं ,उनकी मूर्तियों का भी बहुत बड़ा ज़खीएर था और बहुत सारे लोग अपने हाथ पर अंबेडकर की तस्वीर का टैटू गुदवा रहे थे.
औरंगाबाद से आये एक परिवार से पता लगा कि वे हर साल छः दिसंबर को दादर आते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि चैत्यभूमि तक नहीं पंहुचते . फिर भी कोई परवाह नहीं . जब चलते हैं और वापस जाने के एक हफ्ते तक उनके घर का माहौल अंबेडकरमय रहता है .उत्तर प्रदेश के रहने वाले आदमी को लगता है कि डॉ अंबेडकर से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम दलितों के आकर्षण की ही चीज़ है लेकिन मुंबई की सडकों पर छः दिसंबर को घूमते हुए इस धारणा के परखचे उड़ गए. दादर के आसपास ऐसे बहुत सारे लोग मिले जो दलित नहीं थे. उनके पूर्वज दलितों के शोषक रह चुके थे लेकिन वे अब पूरी तरह से बाबासाहेब की सामाजिक न्याय की लड़ाई में शामिल हैं . ऐसा शायद इसलिए होता है कि महाराष्ट्र में सामाजिक बराबरी के संघर्ष का एक मज़बूत इतिहास है . डॉ अंबेडकर के पहले इसी महाराष्ट्र में महात्मा फुले ने भी सामाजिक बराबरी के संघर्ष को एक स्वरुप दिया था और अपने माता पिता के विरोध के बावजूद १८४८ में पूना में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोल दिया था . उन्हें अपने घरवालों की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी लेकिन आन्दोलन चलता रहा था.डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा समय से चल रहे बराबरी के आन्दोलन के नतीजे की ताक़त तब समझ में आई जब दादर की चैत्य भूमि में अंबेडकर के भक्तों का हुजूम देखा. और लगा कि जिसने भी कहा था कि शहीदों की याद में हर बरस मेले लगेगें , उसने गलत नहीं कहा था
दिल्ली में रहने वालों को महान नेताओं की समाधियों के बारे में खासी जानकारी रहती है. लगभग हर महीने ही सरकारी तौर पर समाधियों पर फूल माला चढ़ती रहती है . यह अलग बात है कि महात्मा गाँधी के अलावा और किसी समाधि पर आम आदमी शायद ही कभी जाता हो . अवाम की श्रद्धा के स्थान के रूप में महात्मा जी की समाधि तो स्थापित हो चुकी है लेकिन बाकी सब कुछ सरकारी स्तर पर ही है . करीब ३५ साल से दिल्ली में रह रहे अवध के एक गाँव से आये हुए इंसान के लिए यह सब उत्सुकता नहीं पैदा करता. बचपन में पढ़ा था कि शहीदों की मजारों पर हर बरस मेले लगने वाले थे लेकिन महत्मा गाँधी जैसे शहीद की मजार पर वैसा मेला कभी नहीं दिखा जैसा कि हमारे गाँव के आसपास के सालाना मेलों के अवसर पर लगता है .हाँ यह सच है कि गाँधी जी की समाधि पर दिल्ली आने वाले ज़्यादातर लोग जाते ज़रूर हैं ,वे चाहे आम जन हों या किसी देश के शासक .कई बार सोचता था कि शायद शहादत को बढ़ावा देने के लिए ऐसा कह दिया गया था, मेला वेला कहीं नहीं लगने वाला था . लेकिन इस सोच को इस बार ज़बरदस्त झटका लगा . इस साल बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के मौके पर मुंबई में मौजूद रहने का मौक़ा मिला. बात बिलकुल समझ में आ गयी कि जिन लोगों ने भी कहा था कि शहीदों की मजारों पर लगेगें हर बरस मेले, वह सच कह रहा था. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की चैत्यभूमि पर इस साल छः दिसम्बर को मेला लगा था . मैंने अपनी आँखों से देखा . जिन लोगों से वहां मुलाक़ात हुई उन्होंने बताया कि यहाँ इसी तरह का मेला हर साल लगता है . लाखों लोग पूरे महाराष्ट्र से छः दिसंबर को मुंबई के दादर की चौपाटी पर आते हैं और बाबासाहेब की स्मृति में सिर झुकाते हैं .
इस साल भी दादर स्थित बाबासाहेब के स्मारक, चैत्यभूमि पर कई लाख लोग आये, एक दिन पहले से ही लाइन लगने लगी थी .दादर की चौपाटी की तरफ जाने वाली हर सड़क पर इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा था. २ किलोमीटर लम्बी लाइन लगी थी . जब मैं वरली पंहुचा तो लाइन में लगा हुआ आख़िरी व्यक्ति वहीं था . वरली की दूरी दादर के स्मारक से करीब २ किलोमीटर है . जानकारों ने बताया कि आम तौर पर छ से सात घंटे लाइन में लगकर ही बाबासाहेब की समाधि तक पंहुचा जा सकता है .५ दिसंबर से ही लाइन में लगे लोग ६ दिसंबर को शिवाजी पार्क में सार्वजनिक सभा में उतनी ही खुशी से शामिल होते हैं .. लोगों के चेहरों पर जो उत्साह दिखता है ,जिसने उसे नहीं देखा ,उसे मालूम ही नहीं कि उत्साह होती क्या चीज़ है . .बहुत ही पतली गलियों से होकर चैत्यभूमि का रास्ता गुज़रता है. पुलिस का बहुत ही ज़बरदस्त इंतज़ाम था . इसलिए ज़्यादातर लोगों को मालूम था कि वे वहां तक नहीं पंहुच पायेगें . लेकिन उन्हने चिंता नहीं थी .लोग दादर की चौपाटी पर गीली रेत से उत्साही लग बाबासाहेब का स्मारक बना लेते हैं और उसी स्मारक के सामने अपनी श्रद्धा के फूल अर्पित कर देते हैं .रेत के बने इन स्मारकों पर भी बहुत सारे पुष्प चढ़ाए गए थे ,मोमबत्तियां लगी हुई थीं और अगरबत्तियां सुलग रही थीं .दादर से लेकर परेल तक सडकों पर बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जो अंबेडकर साहित्य बेच रहे थे.अंबेडकर की तस्वीरें भी बिक रही थीं ,उनकी मूर्तियों का भी बहुत बड़ा ज़खीएर था और बहुत सारे लोग अपने हाथ पर अंबेडकर की तस्वीर का टैटू गुदवा रहे थे.
औरंगाबाद से आये एक परिवार से पता लगा कि वे हर साल छः दिसंबर को दादर आते हैं लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि चैत्यभूमि तक नहीं पंहुचते . फिर भी कोई परवाह नहीं . जब चलते हैं और वापस जाने के एक हफ्ते तक उनके घर का माहौल अंबेडकरमय रहता है .उत्तर प्रदेश के रहने वाले आदमी को लगता है कि डॉ अंबेडकर से जुड़ा कोई भी कार्यक्रम दलितों के आकर्षण की ही चीज़ है लेकिन मुंबई की सडकों पर छः दिसंबर को घूमते हुए इस धारणा के परखचे उड़ गए. दादर के आसपास ऐसे बहुत सारे लोग मिले जो दलित नहीं थे. उनके पूर्वज दलितों के शोषक रह चुके थे लेकिन वे अब पूरी तरह से बाबासाहेब की सामाजिक न्याय की लड़ाई में शामिल हैं . ऐसा शायद इसलिए होता है कि महाराष्ट्र में सामाजिक बराबरी के संघर्ष का एक मज़बूत इतिहास है . डॉ अंबेडकर के पहले इसी महाराष्ट्र में महात्मा फुले ने भी सामाजिक बराबरी के संघर्ष को एक स्वरुप दिया था और अपने माता पिता के विरोध के बावजूद १८४८ में पूना में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोल दिया था . उन्हें अपने घरवालों की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी लेकिन आन्दोलन चलता रहा था.डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा समय से चल रहे बराबरी के आन्दोलन के नतीजे की ताक़त तब समझ में आई जब दादर की चैत्य भूमि में अंबेडकर के भक्तों का हुजूम देखा. और लगा कि जिसने भी कहा था कि शहीदों की याद में हर बरस मेले लगेगें , उसने गलत नहीं कहा था
Wednesday, December 1, 2010
पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता में फर्क है
शेष नारायण सिंह
१९७३ में जब मैंने शिक्षक के रूप में काम शुरू किया तो एक गुरू ने मन्त्र दिया था कि जो भी ताक़तवर होगा उसे पूंजीपति अपने कब्जे में ले लेगा . गंवई माहौल में बात कही गयी थी. वहां सबसे बड़ा पूंजीपति गावं का वह साहूकार ही होता था जो लोगों को कुछ पैसे कौड़ी उधार दे देता था.शादी व्याह में मदद कर देता था ,क़र्ज़ दे देता था . इलाके के सबसे गरीब आदमी टिहूरी का बेटा जब तहसील में बाबू हो गया तो सेठ ने उसे अपना आदमी घोषित कर दिया. कुछ कपड़ा लत्ता बनवा दिया जिसे पहन कर वह दफ्तर जा सके. सबको लगा कि ठीक ही है . सामाजिक आर्थिक स्थिति में बहुत फर्क नहीं था इसलिए गैप ज्यादा बड़ा नहीं दिखा . दिल्ली आने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन आदि क्रांतिकारियों से मुलाक़ात हुई जो मानते थे कि पिछली सदी के अंत तक भारत में इन्किलाब आ जाएगा. ज़ाहिर है कि यह विचार ख्याली पुलाव भर था . लेकिन जब धीरे धीरे उन्हीं क्रांतिकारियों को सिस्टम का हिस्सा बनते देखा तो बात समझ में आनी शुरू हुई कि गाँव में जिसे कॉमरेड शीतला गुप्ता ने पूंजीपति कहा था वह वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था थी . दिल्ली में देखा कि पूंजीवादी व्यवस्था ने राजनीति , नौकरशाही ,मीडिया सबको काबू में कर रखा है . अखबारों में नौकरी शुरू की और जब ज़रा सीनियर लेवल पर पंहुचे तो ऊपर से हिदायत आ जाती थी कि कुछ लोगों के खिलाफ खबर नहीं लिखना है . नीचे वालों को समझाया जाता था लेकिन तरीका ऐसा अपनाया जाता था कि उन्हें यह मुगालता बना रहे कि वे प्रेस की तथाकथित आज़ादी का लाभ उठा रहे हैं . जब टेलीविज़न में काम करने का अवसर मिला तो शुरुआती दौर दिलचस्प था .अपने देश में २४ घंटे की टी वी ख़बरों का वह आदिकाल था . अखबार से आये एक व्यक्ति के लिए बहुत मजेदार स्थिति थी . जो खबर जहां हुई ,अगर उसकी बाईट और शाट हाथ आ गए तो उन्हें लगाकर सही बात रखने में मज़ा बहुत आता था. लेकिन छः महीने के अन्दर पूंजीवादी व्यवस्था ने ऐसा सिस्टम बना दिया कि वही खबरें जाने लगीं जो संस्थान के हित में रहती थी. पीपली लाइव के अनुषा रिज़वी और महमूद फारूकी उन्हीं दिनों उसी न्यूज़ रूप में इस विकासमान व्यवस्था को देख रहे थे. पीपली लाइव की स्क्रिप्ट को उनके उस दौर के अनुभव से सीधे जोड़कर देखा जा सकता है . उसी संस्थान में बहुत सारे बहुत मामूली स्तर के लोगों को महान बनाने की कार्यशाला भी चल रही थी . और टेलिविज़न की चकाचौंध के शिकार ज़्यादातर लोगों को वही मीडियाकर लोग सर्वज्ञ बनाकर पेश कर दिए गए. दलाल शिरोमणि नीरा राडिया ने जो खेल किया है यह उसी पूंजीवादी प्रक्रिया का नतीजा है. अपने को भाग्यविधाता समझ बैठे पत्रकारों के उस मुगालते को हवा देकर नीरा राडिया अपना धंधा डंके की चोट पर चला रही थीं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी . सरकार में बैठे किसी ईमानदार अफसर ने सिस्टम का ही फायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता की गलियों में घूम रहे सत्ता के दलालों को पब्लिक डोमेन में ला दिया . . आज पत्रकारिता के चोले में अपना अन्य धंधा चला रहे दिल्ली के पावर ब्रोकर बेनकाब खड़े हैं. अपनी बिरादरी को बचाने की बड़े पैमाने पर कोशिश चल रही है . कोई ट्वीट पर अपनी बात कह रहा है ,तो कोई टेलिविज़न के कार्यक्रमों के तमाशे की मार्फ़त कौम को समझा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के ताक़तवर माध्यम में इन दलालनुमा पत्रकारों ने दाग तो लगाया ही है . पत्रकारिता से जुड़े लोगों और लोकशाही की पक्षधर जमातों के लिए भी चुनौती है कि पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता के बीच जो बहुत बारीक लाइन है उसको बड़ी दीवार बनाने की मुहिम चलायें वरना इस देश के विकासमान लोकतंत्र का बहुत नुकसान हो जाएगा
१९७३ में जब मैंने शिक्षक के रूप में काम शुरू किया तो एक गुरू ने मन्त्र दिया था कि जो भी ताक़तवर होगा उसे पूंजीपति अपने कब्जे में ले लेगा . गंवई माहौल में बात कही गयी थी. वहां सबसे बड़ा पूंजीपति गावं का वह साहूकार ही होता था जो लोगों को कुछ पैसे कौड़ी उधार दे देता था.शादी व्याह में मदद कर देता था ,क़र्ज़ दे देता था . इलाके के सबसे गरीब आदमी टिहूरी का बेटा जब तहसील में बाबू हो गया तो सेठ ने उसे अपना आदमी घोषित कर दिया. कुछ कपड़ा लत्ता बनवा दिया जिसे पहन कर वह दफ्तर जा सके. सबको लगा कि ठीक ही है . सामाजिक आर्थिक स्थिति में बहुत फर्क नहीं था इसलिए गैप ज्यादा बड़ा नहीं दिखा . दिल्ली आने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उन आदि क्रांतिकारियों से मुलाक़ात हुई जो मानते थे कि पिछली सदी के अंत तक भारत में इन्किलाब आ जाएगा. ज़ाहिर है कि यह विचार ख्याली पुलाव भर था . लेकिन जब धीरे धीरे उन्हीं क्रांतिकारियों को सिस्टम का हिस्सा बनते देखा तो बात समझ में आनी शुरू हुई कि गाँव में जिसे कॉमरेड शीतला गुप्ता ने पूंजीपति कहा था वह वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था थी . दिल्ली में देखा कि पूंजीवादी व्यवस्था ने राजनीति , नौकरशाही ,मीडिया सबको काबू में कर रखा है . अखबारों में नौकरी शुरू की और जब ज़रा सीनियर लेवल पर पंहुचे तो ऊपर से हिदायत आ जाती थी कि कुछ लोगों के खिलाफ खबर नहीं लिखना है . नीचे वालों को समझाया जाता था लेकिन तरीका ऐसा अपनाया जाता था कि उन्हें यह मुगालता बना रहे कि वे प्रेस की तथाकथित आज़ादी का लाभ उठा रहे हैं . जब टेलीविज़न में काम करने का अवसर मिला तो शुरुआती दौर दिलचस्प था .अपने देश में २४ घंटे की टी वी ख़बरों का वह आदिकाल था . अखबार से आये एक व्यक्ति के लिए बहुत मजेदार स्थिति थी . जो खबर जहां हुई ,अगर उसकी बाईट और शाट हाथ आ गए तो उन्हें लगाकर सही बात रखने में मज़ा बहुत आता था. लेकिन छः महीने के अन्दर पूंजीवादी व्यवस्था ने ऐसा सिस्टम बना दिया कि वही खबरें जाने लगीं जो संस्थान के हित में रहती थी. पीपली लाइव के अनुषा रिज़वी और महमूद फारूकी उन्हीं दिनों उसी न्यूज़ रूप में इस विकासमान व्यवस्था को देख रहे थे. पीपली लाइव की स्क्रिप्ट को उनके उस दौर के अनुभव से सीधे जोड़कर देखा जा सकता है . उसी संस्थान में बहुत सारे बहुत मामूली स्तर के लोगों को महान बनाने की कार्यशाला भी चल रही थी . और टेलिविज़न की चकाचौंध के शिकार ज़्यादातर लोगों को वही मीडियाकर लोग सर्वज्ञ बनाकर पेश कर दिए गए. दलाल शिरोमणि नीरा राडिया ने जो खेल किया है यह उसी पूंजीवादी प्रक्रिया का नतीजा है. अपने को भाग्यविधाता समझ बैठे पत्रकारों के उस मुगालते को हवा देकर नीरा राडिया अपना धंधा डंके की चोट पर चला रही थीं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी . सरकार में बैठे किसी ईमानदार अफसर ने सिस्टम का ही फायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता की गलियों में घूम रहे सत्ता के दलालों को पब्लिक डोमेन में ला दिया . . आज पत्रकारिता के चोले में अपना अन्य धंधा चला रहे दिल्ली के पावर ब्रोकर बेनकाब खड़े हैं. अपनी बिरादरी को बचाने की बड़े पैमाने पर कोशिश चल रही है . कोई ट्वीट पर अपनी बात कह रहा है ,तो कोई टेलिविज़न के कार्यक्रमों के तमाशे की मार्फ़त कौम को समझा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि पत्रकारिता के ताक़तवर माध्यम में इन दलालनुमा पत्रकारों ने दाग तो लगाया ही है . पत्रकारिता से जुड़े लोगों और लोकशाही की पक्षधर जमातों के लिए भी चुनौती है कि पूंजीवाद की सेवक पत्रकारिता और जन पक्षधरता की पत्रकारिता के बीच जो बहुत बारीक लाइन है उसको बड़ी दीवार बनाने की मुहिम चलायें वरना इस देश के विकासमान लोकतंत्र का बहुत नुकसान हो जाएगा
Tuesday, November 30, 2010
काकटेल सर्किट के एक बुद्धिजीवी के जवाहरलाल नेहरू के बराबर बनने के सपने
शेष नारायण सिंह
बचपन में एक कहानी सुनी थी . एक बार जवाहरलाल नेहरू मानसिक रोगों के एक अस्पताल के मुआइने पर गए . वहां के एक मरीज़ ने पूछा कि आप कौन हैं भाई . नेहरू ने कहा कि मैं जवाहरलाल नेहरू हूँ . वह मरीज़ हंसा और बोला कि बेटा धीरे धीरे ठीक हो जाओगे . जब मैं भर्ती हुआ था , तो मैं भी अपने आपको जवाहरलाल नेहरू ही समझता था. अब ठीक हूँ . दिल्ली में पिछले दिनों ऐसा की एक ही दृश्य नज़र आया . जब सामाजिक कार्यकर्ता , अरुंधती रॉय ने अपनी तुलना जवाहरलाल नेहरू से कर दी. अरुंधती जी ने कश्मीर पर कोई बयान दिया और कुछ लोगों को लगा कि उन्होंने जो बयान दिया है उसमें देशद्रोह की मात्रा बहुत ज्यादा है . दिल्ली में हर समय में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी सक्रिय रहते हैं जो कुछ उल जलूल कह कर ख़बरों में बने रहना चाहते हैं . अरुंधती राय उसी श्रेणी की बुद्धिजीवी हैं . उनके बारे में कहा जाता है कि गद्य बहुत अच्छा लिखती हैं . दिल्ली के काकटेल सर्किट में उनके बहुत सारे प्रशंसक हैं इसलिए जो कुछ भी वे कहती हैं उसे एक वर्ग के लोग बहुत पसंद करते हैं लेकिन सच्ची बात यह है कि उनको इतिहास के बारे में जो भी जानकारी है उसमें बहुत कुछ जोड़े जाने की ज़रुरत है . आजकल थोड़ी घबराई हुई हैं क्योंकि उनके ऊपर अगर देशद्रोह का मुक़दमा चला तो उन्हें जेल में रहना पड़ेगा जहां उनके प्रशंसक नहीं रहते .अपने बचाव में उन्होंने जो ताज़ा राग अलापा है वह बहुत ही अज्ञान से भरा है . फरमाती हैं कि जो बयान उन्होंने दिया है , वैसा ही बयान जवाहरलाल नेहरू भी दिया करते थे . यानी वे यह कहना चाहती हैं कि वे कुछ गलत नहीं कह रही हैं . उनके ऊपर मुक़दमा दायर करना वैसा ही होगा जैसे जवाहरलाल नेहरू के ऊपर मरणोपरांत मुक़दमा चलाया जाय. अपने बचाव में वे नेहरू की सन्दर्भ को इस्तेमाल करके यह साबित कर दे रही हैं कि उनको इतिहास की जानकारी बिल्कुल नहीं है. सच्चाई यह है कि सितम्बर १९४७ में जब जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत में अपने राज्य के विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत किया था तो पूरा राज्य शेख अब्दुल्ला के साथ था . और जम्मू-कश्मीर का हर नागरिक भारत के साथ विलय का पक्षधर था . महात्मा गाँधी ,जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला ने ही जोर दिया था कि राज्य की जनता की राय लेना ज़रूरी है लेकिन जिस पाकिस्तान के लिए अरुंधती राय लाठी भांज रही हैं , वह जनता की राय लेने के खिलाफ था . पाकिस्तान ने हर मोर्चे पर पाकिस्तानी जनता की बात को न मानने का खेल रचा था . लेकिन ६३ साल पहले की और आज की स्थिति में बहुत फर्क है . अब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में अपने एजेंट छोड़ रखे हैं जिन्होंने वहां पर माहौल को बिलकुल बिगाड़ रखा है .बहुत बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी घुसपैठ हुई है . इसलिए पाकिस्तानी सेना की मर्जी से वहां जनमत संग्रह कराने की बात करना बेवकूफी होगी. ऐसी हालत में साफ़ समझा जा सकता है कि अपने आपको जवाहरलाल नेहरू की बात से जोड़ कर अरुंधती रॉय अपने अज्ञान का ही परिचय दे रही हैं .
देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिएकश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडे, पेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.
ऐसी हालत में राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. . नतीजा यह हुआ कि उनके प्रधान मंत्री मेहर चंद महाजन को कराची बुलाया गया. जहां जाकर उन्होंने अपने ख्याली पुलाव पकाए. महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए , स्वतंत्र देश हो और भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बहुत ही दोस्ताना सम्बन्ध रहे. लेकिन पाकिस्तान को कल्पना की इस उड़ान में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा . इधर २१ अक्टोबर १९४७ के दिन राजा ने अगली चाल चल दी. उन्होंने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चंद को नियुक्त कर दिया कि वे कश्मीर का नया संविधान बनाने का काम शुरू कर दें.पाकिस्तान को यह स्वतंत्र देश बनाए रखने का महाराजा का आइडिया पसंद नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले की शुरुआत कर दी. राजा मुगालते में था और पाकिस्तान की फौज़ कबायलियों को आगे करके श्रीनगर की तरफ बढ़ रही थी. लेकिन बात चीत का सिलसिला भी जारी था . पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव मेजर ,ए एस बी शाह श्रीनगर में थे और प्रधान मंत्री समेत बाकी अधिकारियों से मिल जुल रहे थे. जिनाह की उस बात को सच करने की तैयारी थी कि जब उन्होंने फरमाया था कि , " कश्मीर मेरी जेब में है."
कश्मीर को उस अक्टूबर में गुलाम होने से बचाया इस लिए जा सका कि घाटी के नेताओं ने फ़ौरन रियासत के विलय के बारे में फैसला ले लिया. कश्मीरी नेताओं के एक राय से लिए गए फैसले के पीछे कुछ बात है जो कश्मीर को एक ख़ास इलाका बनाती है जो बाकी राज्यों से भिन्न है. कश्मीर के यह खासियत जिसे कश्मीरियत भी कहा जाता है , पिछले पांच हज़ार वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति का नतीजा है. कश्मीर हमेशा से ही बहुत सारी संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है . इसीलिये कश्मीरियत में महात्मा बुद्ध की शख्सियत , वेदान्त की शिक्षा और इस्लाम का सूफी मत समाहित है. बाकी दुनिया से जो भी आता रहा वह इसी कश्मीरियत में शामिल होता रहा .. कश्मीर मामलों के बड़े इतिहासकार मुहम्मद दीन फौक का कहना है कि अरब, इरान,अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से जो लोग छ सात सौ साल पहले आये थे , वे सब कश्मीरी मुस्लिम बन चुके हैं .उन की एक ही पहचान है और वह है कश्मीरी इसी तरह से कश्मीरी भाषा भी बिलकुल अलग है . और कश्मीरी अवाम किसी भी बाहरी शासन को बर्दाश्त नहीं करता.
कश्मीर को मुग़ल सम्राट अकबर ने १५८६ में अपने राज्य में मिला लिया था . उसी दिन से कश्मीरी अपने को गुलाम मानता था. और जब ३६१ साल बाद कश्मीर का भारत में अक्टूबर १९४७ में विलय हुआ तो मुसलमान और हिन्दू कश्मीरियों ने अपने आपको आज़ाद माना. इस बीच मुसलमानों, सिखों और हिन्दू राजाओं का कश्मीर में शासन रहा लेकिन कश्मीरी उन सबको विदेशी शासक मानता रहा.अंतिम हिन्दू राजा, हरी सिंह के खिलाफ आज़ादीकी जो लड़ाई शुरू हुयी उसके नेता, शेख अब्दुल्ला थे. . शेख ने आज़ादी के पहले कश्मीर छोडो का नारा दिया.इस आन्दोलन को जिनाह ने गुंडों का आन्दोलन कहा था क्योंकि वे राजा के बड़े खैर ख्वाह थे जबकि जवाहर लाल नेहरू कश्मीर छोडो आन्दोलन में शामिल हुए और शेख अब्दुल्ला के कंधे से कंधे मिला कर खड़े हुए . इसलिए कश्मीर में हिन्दू या मुस्लिम का सवाल कभी नहीं था .वहां तो गैर कश्मीरी और कश्मीरी शासक का सवाल था और उस दौर में शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के इकलौते नेता थे. लेकिन राजा भी कम जिद्दी नहीं थे . उन्होंने शेख अब्दुल्ला के ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया . और शेख के वकील थे इलाहाबाद के बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू .. १ अगस्त १९४७ को महात्मा गांधी कश्मीर गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि जिस अमृतसर समझौते को आधार बनाकर हरि सिंह कश्मीर पर राज कर रहे हैं वह वास्तव में एक बैनामा है . और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उस गैर कानूनी बैनामे का कोई महत्व नहीं है . गाँधी जी ने एक और बात कहीं जो सबको बहुत अच्छी लगी. उन्होंने कहा कि सता का असली हक़दार कश्मीरी अवाम हैं जबकि जिन्नाह कहते रहते थे कि देशी राजाओं की सत्ता को उनसे छीना नहीं जा सकता .राजा के खिलाफ संघर्ष कर रहे कश्मीरी अवाम को यह बात बहुत अच्छी लगी. जबकि राजा सब कुछ लुट जाने के बाद भी अपने आप को सर्वोच्च्च मानते रहे. इसीलिये देश द्रोह के मुक़दमे में फंसाए गए शेख अद्बुल्ला को रिहा करने में देरी हुई क्योंकि राजा उनसे लिखवा लेना चाहता था कि वे आगे से उसके प्रति वफादार रहेगें. शेख कश्मीरी अवाम के हीरो थे . उन्होंने इन् बातों की कोई परवाह नहीं की. कश्मीरी अवाम के हित के लिए उन्होंने भारत और पाकिस्तान से बात चीत का सिलसिला जारी रखा अपने दो साथियों, बख्शी गुलाम मुहम्मद और गुलाम मुहम्मद सादिक को तो कराची भेज दिया और खुद दिल्ली चले गए . वहां वे जवाहरलाल नेहरू के घर पर रुके. कराची गए शेख के नुमाइंदों से न तो जिन्ना मिले और न ही लियाक़त अली. शेख ने अपनी आत्म कथा में लिखा है कि कश्मीरी अवाम के नेता वहां दूसरे दर्जे के पाकिस्तानी नेताओं से बात कर रहे थे और इधर कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के साथ बढ़ रहे कबायली कश्मीर की ज़मीन और कश्मीरी अधिकारों को अपने बूटों तले रौंद रहे थे. तेज़ी से बढ़ रहे कबायलियों को रोकना डोगरा सेना के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के बस की बात नहीं थी. . पाकिस्तान के इस हमले के कारण कश्मीरी अवाम पाकिस्तान के खिलाफ हो गया . क्योंकि महत्मा गांधी और नेहरू तो जनता की सत्ता की बात करते हैं जबकि पाकिस्तान उनकी आज़ादी पर ही हमला कर रहा था. इस के बाद कश्मीर के राजा के पास भारत से मदद माँगने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.. महाराजा के प्रधान मंत्री, मेहर चंद महाजन २६ अक्टूबर को दिल्ली भागे. उन्होंने नेहरू से कहा कि महाराजा भारत के साथ विलय करना चाहते हैं . लेकिन एक शर्त भी थी. वह यह कि भारत की सेना आज ही कश्मीर पंहुच जाए और पाकिस्तानी हमले से उनकी रक्षा करे वरना वे पाकिस्तान से बात चीत शुरू कर देगें. नेहरू आग बबूला हो गए और महाजन से कहा '" गेट आउट " बगल के कमरे में शेख अब्दुल्ला आराम कर रहे थे. बाहर आये और नेहरू का गुस्सा शांत कराया . . इसके बाद महाराजा ने विलय के कागज़ात पर दस्तखत किया और उसे २७ अक्टूबर को भारत सरकार ने मंज़ूर कर लिया. भारत की फौज़ को तुरंत रवाना किया गया और कश्मीर से पाकिस्तानी शह पर आये कबायलियों को हटा दिया गया .कश्मीरी अवाम ने कहा कि भारत हमारी आज़ादी की रक्षा के लिए आया है जबकि पाकिस्तान ने फौजी हमला करके हमारी आजादी को रौंदने की कोशिश की थी. उस दौर में आज़ादी का मतलब भारत से दोस्ती हुआ करती थी लेकिन अब वह बात नहीं है.
कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने मेंबहुत सारे कारण हैं.बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयी, और शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता था, ने हालात को बहुत बिगाड़ा . अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया जिसे लिखा , कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने था . शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था . वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे.. नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा.. शेख गए . और २७ मई १९६४ के ,दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थे, जवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. नेहरू के मरने के बाद तो हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .
कश्मीर के सन्दर्भ में आज़ादी का मतलब भी भारत में विलय ही था . यह देश का दुर्भाग्य है कि जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसे नेता आये जिन्होंने मामले को खराब करने में योगदान किया लेकिन हालात इतने भी खराब नहीं हैं कि अरुंधती राय जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी अपने को नेहरू के स्तर का चिन्तक बताने का दुस्साहस करें .
बचपन में एक कहानी सुनी थी . एक बार जवाहरलाल नेहरू मानसिक रोगों के एक अस्पताल के मुआइने पर गए . वहां के एक मरीज़ ने पूछा कि आप कौन हैं भाई . नेहरू ने कहा कि मैं जवाहरलाल नेहरू हूँ . वह मरीज़ हंसा और बोला कि बेटा धीरे धीरे ठीक हो जाओगे . जब मैं भर्ती हुआ था , तो मैं भी अपने आपको जवाहरलाल नेहरू ही समझता था. अब ठीक हूँ . दिल्ली में पिछले दिनों ऐसा की एक ही दृश्य नज़र आया . जब सामाजिक कार्यकर्ता , अरुंधती रॉय ने अपनी तुलना जवाहरलाल नेहरू से कर दी. अरुंधती जी ने कश्मीर पर कोई बयान दिया और कुछ लोगों को लगा कि उन्होंने जो बयान दिया है उसमें देशद्रोह की मात्रा बहुत ज्यादा है . दिल्ली में हर समय में कुछ ऐसे बुद्धिजीवी सक्रिय रहते हैं जो कुछ उल जलूल कह कर ख़बरों में बने रहना चाहते हैं . अरुंधती राय उसी श्रेणी की बुद्धिजीवी हैं . उनके बारे में कहा जाता है कि गद्य बहुत अच्छा लिखती हैं . दिल्ली के काकटेल सर्किट में उनके बहुत सारे प्रशंसक हैं इसलिए जो कुछ भी वे कहती हैं उसे एक वर्ग के लोग बहुत पसंद करते हैं लेकिन सच्ची बात यह है कि उनको इतिहास के बारे में जो भी जानकारी है उसमें बहुत कुछ जोड़े जाने की ज़रुरत है . आजकल थोड़ी घबराई हुई हैं क्योंकि उनके ऊपर अगर देशद्रोह का मुक़दमा चला तो उन्हें जेल में रहना पड़ेगा जहां उनके प्रशंसक नहीं रहते .अपने बचाव में उन्होंने जो ताज़ा राग अलापा है वह बहुत ही अज्ञान से भरा है . फरमाती हैं कि जो बयान उन्होंने दिया है , वैसा ही बयान जवाहरलाल नेहरू भी दिया करते थे . यानी वे यह कहना चाहती हैं कि वे कुछ गलत नहीं कह रही हैं . उनके ऊपर मुक़दमा दायर करना वैसा ही होगा जैसे जवाहरलाल नेहरू के ऊपर मरणोपरांत मुक़दमा चलाया जाय. अपने बचाव में वे नेहरू की सन्दर्भ को इस्तेमाल करके यह साबित कर दे रही हैं कि उनको इतिहास की जानकारी बिल्कुल नहीं है. सच्चाई यह है कि सितम्बर १९४७ में जब जम्मू-कश्मीर के राजा ने भारत में अपने राज्य के विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत किया था तो पूरा राज्य शेख अब्दुल्ला के साथ था . और जम्मू-कश्मीर का हर नागरिक भारत के साथ विलय का पक्षधर था . महात्मा गाँधी ,जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला ने ही जोर दिया था कि राज्य की जनता की राय लेना ज़रूरी है लेकिन जिस पाकिस्तान के लिए अरुंधती राय लाठी भांज रही हैं , वह जनता की राय लेने के खिलाफ था . पाकिस्तान ने हर मोर्चे पर पाकिस्तानी जनता की बात को न मानने का खेल रचा था . लेकिन ६३ साल पहले की और आज की स्थिति में बहुत फर्क है . अब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में अपने एजेंट छोड़ रखे हैं जिन्होंने वहां पर माहौल को बिलकुल बिगाड़ रखा है .बहुत बड़े पैमाने पर पाकिस्तानी घुसपैठ हुई है . इसलिए पाकिस्तानी सेना की मर्जी से वहां जनमत संग्रह कराने की बात करना बेवकूफी होगी. ऐसी हालत में साफ़ समझा जा सकता है कि अपने आपको जवाहरलाल नेहरू की बात से जोड़ कर अरुंधती रॉय अपने अज्ञान का ही परिचय दे रही हैं .
देश के बँटवारे के वक़्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आज़ादी दी थी. बहुत ही पेचीदा मामला था . ज़्यादातर देशी राजा तो भारत के साथ मिल गए लेकिन जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में बना रहा . कश्मीर में ज़्यादातर लोग तो आज़ादी के पक्ष में थे . कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ लेकिन अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखें. इस बीच महाराजा हरि सिंह के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केंद्रीय विभाग पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करेगें . १५ अगस्त को पाकिस्तान की सरकार ने जम्मू-कश्मीर के महाराजा के स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जिसके बाद पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे . भारत सरकार को इस से चिंता हुई और जवाहर लाल नेहरू ने अपनी चिंता का इज़हार इन शब्दों में किया."पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा से ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की ." नेहरू ने सरदार पटेल को एक पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वह नेशनल कान्फरेन्स और शेख अब्दुल्ला से मदद मागेगा और भारत के साथ विलय कर लेगा.अगर ऐसा हो गया गया तो पाकिस्तान के लिएकश्मीर पर किसी तरह का हमला करना इस लिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पडेगा.अगर राजा ने इस सलाह को मान लिया होता तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता..इस बीच जम्मू में साम्प्रदायिक दंगें भड़क उठे थे . बात अक्टूबर तक बहुत बिगड़ गयी और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढाने के लिए लाहौर से आने वाली कपडे, पेट्रोल और राशन की सप्प्लाई रोक दी. संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गयी थी. उसमें भी भारी अड़चन डाली गयी.. हालात तेज़ी से बिगड़ रहे थे और लगने लगा था कि अक्टूबर १९४६ में की गयी महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जायेगी. महात्मा ने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज़ नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना संदिग्ध हो जाएगा.
ऐसी हालत में राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. . नतीजा यह हुआ कि उनके प्रधान मंत्री मेहर चंद महाजन को कराची बुलाया गया. जहां जाकर उन्होंने अपने ख्याली पुलाव पकाए. महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए , स्वतंत्र देश हो और भारत और पाकिस्तान दोनों से ही बहुत ही दोस्ताना सम्बन्ध रहे. लेकिन पाकिस्तान को कल्पना की इस उड़ान में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा . इधर २१ अक्टोबर १९४७ के दिन राजा ने अगली चाल चल दी. उन्होंने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चंद को नियुक्त कर दिया कि वे कश्मीर का नया संविधान बनाने का काम शुरू कर दें.पाकिस्तान को यह स्वतंत्र देश बनाए रखने का महाराजा का आइडिया पसंद नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले की शुरुआत कर दी. राजा मुगालते में था और पाकिस्तान की फौज़ कबायलियों को आगे करके श्रीनगर की तरफ बढ़ रही थी. लेकिन बात चीत का सिलसिला भी जारी था . पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव मेजर ,ए एस बी शाह श्रीनगर में थे और प्रधान मंत्री समेत बाकी अधिकारियों से मिल जुल रहे थे. जिनाह की उस बात को सच करने की तैयारी थी कि जब उन्होंने फरमाया था कि , " कश्मीर मेरी जेब में है."
कश्मीर को उस अक्टूबर में गुलाम होने से बचाया इस लिए जा सका कि घाटी के नेताओं ने फ़ौरन रियासत के विलय के बारे में फैसला ले लिया. कश्मीरी नेताओं के एक राय से लिए गए फैसले के पीछे कुछ बात है जो कश्मीर को एक ख़ास इलाका बनाती है जो बाकी राज्यों से भिन्न है. कश्मीर के यह खासियत जिसे कश्मीरियत भी कहा जाता है , पिछले पांच हज़ार वर्षों की सांस्कृतिक प्रगति का नतीजा है. कश्मीर हमेशा से ही बहुत सारी संस्कृतियों का मिलन स्थल रहा है . इसीलिये कश्मीरियत में महात्मा बुद्ध की शख्सियत , वेदान्त की शिक्षा और इस्लाम का सूफी मत समाहित है. बाकी दुनिया से जो भी आता रहा वह इसी कश्मीरियत में शामिल होता रहा .. कश्मीर मामलों के बड़े इतिहासकार मुहम्मद दीन फौक का कहना है कि अरब, इरान,अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से जो लोग छ सात सौ साल पहले आये थे , वे सब कश्मीरी मुस्लिम बन चुके हैं .उन की एक ही पहचान है और वह है कश्मीरी इसी तरह से कश्मीरी भाषा भी बिलकुल अलग है . और कश्मीरी अवाम किसी भी बाहरी शासन को बर्दाश्त नहीं करता.
कश्मीर को मुग़ल सम्राट अकबर ने १५८६ में अपने राज्य में मिला लिया था . उसी दिन से कश्मीरी अपने को गुलाम मानता था. और जब ३६१ साल बाद कश्मीर का भारत में अक्टूबर १९४७ में विलय हुआ तो मुसलमान और हिन्दू कश्मीरियों ने अपने आपको आज़ाद माना. इस बीच मुसलमानों, सिखों और हिन्दू राजाओं का कश्मीर में शासन रहा लेकिन कश्मीरी उन सबको विदेशी शासक मानता रहा.अंतिम हिन्दू राजा, हरी सिंह के खिलाफ आज़ादीकी जो लड़ाई शुरू हुयी उसके नेता, शेख अब्दुल्ला थे. . शेख ने आज़ादी के पहले कश्मीर छोडो का नारा दिया.इस आन्दोलन को जिनाह ने गुंडों का आन्दोलन कहा था क्योंकि वे राजा के बड़े खैर ख्वाह थे जबकि जवाहर लाल नेहरू कश्मीर छोडो आन्दोलन में शामिल हुए और शेख अब्दुल्ला के कंधे से कंधे मिला कर खड़े हुए . इसलिए कश्मीर में हिन्दू या मुस्लिम का सवाल कभी नहीं था .वहां तो गैर कश्मीरी और कश्मीरी शासक का सवाल था और उस दौर में शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के इकलौते नेता थे. लेकिन राजा भी कम जिद्दी नहीं थे . उन्होंने शेख अब्दुल्ला के ऊपर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया . और शेख के वकील थे इलाहाबाद के बैरिस्टर जवाहर लाल नेहरू .. १ अगस्त १९४७ को महात्मा गांधी कश्मीर गए और उन्होंने घोषणा कर दी कि जिस अमृतसर समझौते को आधार बनाकर हरि सिंह कश्मीर पर राज कर रहे हैं वह वास्तव में एक बैनामा है . और अंग्रेजों के चले जाने के बाद उस गैर कानूनी बैनामे का कोई महत्व नहीं है . गाँधी जी ने एक और बात कहीं जो सबको बहुत अच्छी लगी. उन्होंने कहा कि सता का असली हक़दार कश्मीरी अवाम हैं जबकि जिन्नाह कहते रहते थे कि देशी राजाओं की सत्ता को उनसे छीना नहीं जा सकता .राजा के खिलाफ संघर्ष कर रहे कश्मीरी अवाम को यह बात बहुत अच्छी लगी. जबकि राजा सब कुछ लुट जाने के बाद भी अपने आप को सर्वोच्च्च मानते रहे. इसीलिये देश द्रोह के मुक़दमे में फंसाए गए शेख अद्बुल्ला को रिहा करने में देरी हुई क्योंकि राजा उनसे लिखवा लेना चाहता था कि वे आगे से उसके प्रति वफादार रहेगें. शेख कश्मीरी अवाम के हीरो थे . उन्होंने इन् बातों की कोई परवाह नहीं की. कश्मीरी अवाम के हित के लिए उन्होंने भारत और पाकिस्तान से बात चीत का सिलसिला जारी रखा अपने दो साथियों, बख्शी गुलाम मुहम्मद और गुलाम मुहम्मद सादिक को तो कराची भेज दिया और खुद दिल्ली चले गए . वहां वे जवाहरलाल नेहरू के घर पर रुके. कराची गए शेख के नुमाइंदों से न तो जिन्ना मिले और न ही लियाक़त अली. शेख ने अपनी आत्म कथा में लिखा है कि कश्मीरी अवाम के नेता वहां दूसरे दर्जे के पाकिस्तानी नेताओं से बात कर रहे थे और इधर कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के साथ बढ़ रहे कबायली कश्मीर की ज़मीन और कश्मीरी अधिकारों को अपने बूटों तले रौंद रहे थे. तेज़ी से बढ़ रहे कबायलियों को रोकना डोगरा सेना के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह के बस की बात नहीं थी. . पाकिस्तान के इस हमले के कारण कश्मीरी अवाम पाकिस्तान के खिलाफ हो गया . क्योंकि महत्मा गांधी और नेहरू तो जनता की सत्ता की बात करते हैं जबकि पाकिस्तान उनकी आज़ादी पर ही हमला कर रहा था. इस के बाद कश्मीर के राजा के पास भारत से मदद माँगने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.. महाराजा के प्रधान मंत्री, मेहर चंद महाजन २६ अक्टूबर को दिल्ली भागे. उन्होंने नेहरू से कहा कि महाराजा भारत के साथ विलय करना चाहते हैं . लेकिन एक शर्त भी थी. वह यह कि भारत की सेना आज ही कश्मीर पंहुच जाए और पाकिस्तानी हमले से उनकी रक्षा करे वरना वे पाकिस्तान से बात चीत शुरू कर देगें. नेहरू आग बबूला हो गए और महाजन से कहा '" गेट आउट " बगल के कमरे में शेख अब्दुल्ला आराम कर रहे थे. बाहर आये और नेहरू का गुस्सा शांत कराया . . इसके बाद महाराजा ने विलय के कागज़ात पर दस्तखत किया और उसे २७ अक्टूबर को भारत सरकार ने मंज़ूर कर लिया. भारत की फौज़ को तुरंत रवाना किया गया और कश्मीर से पाकिस्तानी शह पर आये कबायलियों को हटा दिया गया .कश्मीरी अवाम ने कहा कि भारत हमारी आज़ादी की रक्षा के लिए आया है जबकि पाकिस्तान ने फौजी हमला करके हमारी आजादी को रौंदने की कोशिश की थी. उस दौर में आज़ादी का मतलब भारत से दोस्ती हुआ करती थी लेकिन अब वह बात नहीं है.
कश्मीर का मसला बाद में संयुक्त राष्ट्र में ले जाया गया और उसके बाद बहुत सारे ऐसे काम हुए कि अक्टूबर १९४७ वाली बात नहीं रही. संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पास हुआ कि कश्मीरी जनता से पूछ कर तय किया जाय कि वे किधर जाना चाहते हैं . भारत ने इस प्रस्ताव का खुले दिल से समर्थन किया लेकिन पाकिस्तान वाले भागते रहे , शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के हीरो थे और वे जिधर चाहते उधर ही कश्मीर जाता . लेकिन १९५३ के बाद यह हालात भी बदल गए. . बाद में पाकिस्तान जनमत संग्रह के पक्ष में हो गया और भारत उस से पीछा छुडाने लगा . इन हालात के पैदा होने मेंबहुत सारे कारण हैं.बात यहाँ तक बिगड़ गयी कि शेख अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त की गयी, और शेख अब्दुल्ला को ९ अगस्त १९५३ के दिन गिरफ्तार कर लिया गया.उसके बाद तो फिर वह बात कभी नहीं रही. बीच में राजा के वफादार नेताओं की टोली जिसे प्रजा परिषद् के नाम से जाना जाता था, ने हालात को बहुत बिगाड़ा . अपने अंतिम दिनों में जवाहर लाल ने शेख अब्दुल्ला से बात करके स्थिति को दुरुस्त करने की कोशिश फिर से शुरू कर दिया था. ६ अप्रैल १९६४ को शेख अब्दुल्ला को जम्मू जेल से रिहा किया गया और नेहरू से उनकी मुलाक़ात हुई. शेख अब्दुल्ला ने एक बयान दिया जिसे लिखा , कश्मीरी मामलों के जानकार बलराज पुरी ने था . शेख ने कहा कि उनके नेतृत्व में ही जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ था . वे हर उस बात को अपनी बात मानते हैं जो उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के पहले ८ अगस्त १९५३ तक कहा था. नेहरू भी पाकिस्तान से बात करना चाहते थे और किसी तरह से समस्या को हल करना चाहते थे.. नेहरू ने इसी सिलसिले में शेख अब्दुल्ला को पाकिस्तान जाकर संभावना तलाशने का काम सौंपा.. शेख गए . और २७ मई १९६४ के ,दिन जब पाक अधिकृत कश्मीर के मुज़फ्फराबाद में उनके लिए दोपहर के भोजन के लिए की गयी व्यवस्था में उनके पुराने दोस्त मौजूद थे, जवाहरलाल नेहरू की मौत की खबर आई. बताते हैं कि खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट फूट कर रोये थे. नेहरू के मरने के बाद तो हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ने लगे . कश्मीर के मामलों में नेहरू के बाद के नेताओं ने कानूनी हस्तक्षेप की तैयारी शुरू कर दी,..वहां संविधान की धारा ३५६ और ३५७ लागू कर दी गयी. इसके बाद शेख अब्दुल्ला को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया. इस बीच पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर पर हमला करके उसे कब्जाने की कोशिश की लेकिन पाकिस्तानी फौज ने मुंह की खाई और ताशकेंत में जाकर रूसी दखल से सुलह हुई. .
कश्मीर के सन्दर्भ में आज़ादी का मतलब भी भारत में विलय ही था . यह देश का दुर्भाग्य है कि जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसे नेता आये जिन्होंने मामले को खराब करने में योगदान किया लेकिन हालात इतने भी खराब नहीं हैं कि अरुंधती राय जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी अपने को नेहरू के स्तर का चिन्तक बताने का दुस्साहस करें .
Wednesday, November 24, 2010
बिहार में नीतीश की जीत वंशवादी राजनीति के अंत की शुरुआत है
शेष नारायण सिंह
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा के लिए हुए चुनाव नतीजे आ जाने के बाद ऐलान किया कि यह जीत बिहार की जनता की है . यह अलग बात है कि उनके साथ चुनाव लड़ने वाली बीजेपी इसे अपनी जीत मान रही है . और एन डी ए की नीतियों का डंका पीट रही है लेकिन सच्चाई नीतीश कुमार के बयान से साफ़ नज़र आ रही है . राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह जीत न तो जे डी यू की है और न ही एन डी ए की , यह साफ़तौर पर नीतीश कुमार की जीत है . उनके साथ जो भी खड़ा था वह जीत गया .चाहे वह बीजेपी जैसी पार्टी ही क्यों न हो . एक और सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए . वह यह कि खुद नीतीश कुमार को भी नहीं अंदाज़ था कि बिहार की जनता उनके साथ इतने बड़े पैमाने पर जुड़ चुकी है . अगर ऐसा होता तो इस बात की पूरी संभावना है कि बीजेपी से ऊब चुके नीतीश कुमार चुनाव के पहले अकेले ही जाने का फैसला कर लेते और दिल्ली से ले कर पटना तक नीतीश की जीत को अपनी जीत बता रही बीजेपी भी उसी हस्र को पंहुच गयी होती जिसको, लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और कांग्रेस के लोग पंहुचे हैं . बिहार के चुनावों में पासवान की तरफ से प्रेस मैनेज कर रहे एक श्रीमानजी से जब पूछा गया था कि क्या राम विलास जी की पार्टी को कुछ सम्मानजनक सीटें मिल जायेगीं ,तो उन्होंने लगभग नाराज़ होते हुए कह दिया था कि २४ नवम्बर को गिनती के बाद देखिएगा, लालू जी के साथ मिलकर पासवान जी सरकार बनायेगें . उसी तरह , लालू भी मुगालते में थे. शायद इसीलिये उन्होंने नतीजों को विस्मयकारी बताया . कांग्रेस के लोग भी राहुल गाँधी की सभाओं में आ रहे लोगों की संख्या को वास्तविक मान रहे थे और उम्मीद कर रहे थे कि इस बार कांग्रेस की किस्मत सुधरेगी. लेकिन नतीजे आने के बाद बिलकुल साफ़ हो गया है कि सब लोग मुगालते में थे . किसी को भनक भी नहीं थी कि जनता क्या फैसला करने वाली है. जनता ने फैसला सुना दिया है और उसने नीतीश कुमार की हर बात का विश्वास किया है .फैसला इस बात का ऐलान है कि बिहार के लोग नीतीश के साथ हैं .
अपनी आदत के मुताबिक नीतीश कुमार ने जनता के फैसले को सिर झुका कर स्वीकार किया है और साफ़ कहा है कि उनके पास जादू की कोई छडी नहीं है जिसको घुमा कर वे हालात को तुरंत बदल दें लेकिन लोगों के लिए काम करने की इच्छाशक्ति है . यही बात सबसे अहम है . किसी के पास जादू की छडी नहीं होती लेकिन कुछ लोग बातें बड़ी बड़ी करते हैं . मौजूदा बिहार का सौभाग्य है कि वहां आज के युग में नीतीश कुमार जैसा व्यक्ति मौजूद है लेकिन राज्य की बदकिसमती यह है कि उसके नेताओं में नीतीश कुमार के अलावा ज़्यादातर ऐसे हैं जो बातें बड़ी बड़ी कर रहे हैं . लालू प्रसाद ने जिस तरह से चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया दी है वह निराशाजनक है , बीजेपी ने जिस तरह से जीत का दावा करना शुरू किया है वह भी बहुत ही अजीब है . यह किसी पार्टी की जीत नहीं है ,यह शुद्ध रूप से नीतीश कुमार की जीत है . और यह अंतिम सत्य है .
बिहार विधान सभा के लिए हुए २०१० के चुनावों के भारतीय राजनीति में बहुत सारी पुरानी मान्यताओं के खँडहर ढह जायेगें . सबसे बड़ा किला तो जातिवाद का ढह गया है . लालू प्रसाद और राम विलास पासवान ने तय कर लिया था उनकी अपनी जातियों के वोट के साथ जब मुसलमानों का वोट मिला दिया जाएगा तो बिहार में एक अजेय गठबंधन बन जाएगा . लेकिन ऐसा कहीं कुछ नहीं हुआ . उनके अपने सबसे प्रिय लोग चुनाव हार गए. राम विलास पासवान के दो भाई चुनाव हार गए . लालू प्रसाद की पत्नी दो सीटों से चुनाव हार गयीं . जाति के गणित के हिसाब से बहुत ही भरोसेमंद सीटों पर चुनाव लड़ रहे इन लोगों की हार जहां जाति के किले को नेस्तनाबूद करती है , वहीं राजनीति में घुस चुके परिवारबाद के सांप को भी पूरी तरह से कुचल देने की शुरुआत कर चुकी है . पूरे देश में और लगभग हर पार्टी में परिवारवाद का ज़हर फैल चुका है . इस चुनाव ने यह साफ़ संकेत दे दिया है कि अपने परिवार के बाहर देखना लोकतांत्रिक राजनीति का ज़रूरी हिस्सा है और बाकी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को भी अपने परिवार के बाहर टैलेंट तलाशने की कोशिश करनी चाहिए . यह चुनाव साम्प्रदायिक ताक़तों की भी हार है .अपने देश में साम्प्रदायिक वहशत के पर्याय बन चुके , नरेंद्र मोदी को जिस तरह से नीतीश कुमार ने बिहार आने से रोका , वह सेकुलर जमातों को अच्छा लगा और इन चुनावों में सेकुलर बिरादरी को महसूस हो गया कि सत्ता की राजनीति के मजबूरी में भले ही नीतीश कुमार बीजेपी को ढो रहे हैं लेकिन मूल रूप से वे बीजेपी-आर एस एस की साम्प्रदायिक राजनीति के पक्षधर नहीं हैं . शायद इसी समझ का नतीजा है कि इस बार मुसलमानों ने बड़ी संख्या नीतीश कुमार की बात का विश्वास किया और उनके उम्मीदवारों को जिताया . बिहार के विधानसभा चुनावों के बाद एक और ज़बरदस्त सन्देश आया है . इस बार अवाम ने गुंडों को नकार दिया है .हाँ ,एकाध गुंडे जो नीतीश कुमार के साथ थे वे जीत गए हैं .लेकिन नीतीश कुमार के पिछले पांच साल के गुंडा विनाश के प्रोजेक्ट को जिन लोगों ने देखा है उन्हें मालूम है अब हुकूमत में गुंडों का दखल बहुत कम हो जाएगा . नीतीश कुमार के सत्ता में आने के पहले के पंद्रह वर्षों में जिस तरह से बिहार में गुंडा राज कायम हुआ था और अपहरण एक उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका था, उसके हवाले से देखने पर साफ़ समझ में आ जाएगा कि गुंडा लालू प्रसाद के परिवार के राज में प्रशासन का स्थायी हिस्सा बन चुका था. पिछले पांच वर्षों में नीतीश ने उसे बहुत कमज़ोर कर दिया .जिसकी वजह से ही इस बार बड़े बड़े गुंडे और उनेक घर वाले चुनाव हार गए हैं. बिहार में नीतीश के राज में गुंडों का आतंक घटा है .
बीजेपी वाले नीतीश की जीत को गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत के सांचे में रखकर देखने के चक्कर में हैं .कई नेता यह कहते पाए जा रहे हैं कि कि एन डी ए का नारा विकास है और वे लोग नीतीश कुमार को भी अपने बन्दे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं . लेकिन बात इतनी आसान नहीं है . एक तो तथाकथित एन डी ए का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है. गुजरात में भी नहीं . वहां शुद्ध रूप से मोदी के ब्रैंड की राजनीति चल रही है जिसका लक्ष्य हिन्दूराज कायम करना है . २००२ में शुरू करके पिछले गुजरात विधान सभा चुनाओं तक गुजरात के मुसलमानों में मोदी ने इतना आतंक फैला दिया था कि मुसलमान वहां दहशत में है और कई इलाकों में तो वह दर के मारे नरेंद्र मोदी के उम्मीदवारों को वोट भी दे रहा है . गुजरात में मुसलमान अब दबा कुचला वर्ग है और कोई भी राजनीतिक जमात उसके लिए किसी तरह की कोई लड़ाई लड़ सकने की स्थिति में नहीं है . इसके साथ साथ मोदी ने राज्य के औद्योगिक विकास को सरकारी तौर पर प्राथमिकता की सूची में डाल दिया है जिस से साम्प्रदायिक हो चुके समाज को संतुष्ट किया जा रहा है . गुजरात में भी बीजेपी या एन डी ए का कुछ नहीं है , वह नरेंद्र मोदी छाप राजनीति है जो मोदी को सरकार में बनाए हुए है . अपने आप को लूप में रखने के चक्कर में बीजेपी गुजरात से बिहार की तुलना करने की जो जल्दबाजी कर रही है ,उस से बचने की ज़रूरत है . बिहार में नीतीश की जो जीत है उसका गुजरात से कोई लेना देना नहीं है . हाँ अगर कोई बात तलाशी जा सकती है तो वह यह है कि बिहार में नरेंद्र मोदी को फटकार दिया गया था और नरेंद्र मोदी को डांट डपट कर नीतीश ने बिहार में एक बड़े वर्ग को अपने साथ कर लिया था .
बिहार ने एक बार फिर देश की राजनीति को दिशा दी है . इस बार वहां न तो जातिवाद चला और न ही परिवारवाद . अपने असफल बच्चों को राजनीति में उतारने की नेताओं की कोशिश को भी ज़बरदस्त झटका लगा है . उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी राज्यों में भी जातिवाद और परिवारवाद को इसी तरह का झटका लगेगा. इस बार एक और दिलचस्प बात हुई है . बीजेपी के बावजूद मुसलमानों ने नीतीश कुमार का विश्वास किया और लालू प्रसाद के मुसलमानों के रहनुमा बनने के मुगालते को ठीक किया. बाबरी मस्जिद के फैसले के बाद कांग्रेस से दूर खिंच रहे मुसलमान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर नीयत में ईमानदारी नहीं है तो वह बीजेपी के साथी नीतीश को तो वोट दे सकता है लेकिन अंदर ही अन्दर की दगाबाजी उसे बर्दाश्त नहीं है
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा के लिए हुए चुनाव नतीजे आ जाने के बाद ऐलान किया कि यह जीत बिहार की जनता की है . यह अलग बात है कि उनके साथ चुनाव लड़ने वाली बीजेपी इसे अपनी जीत मान रही है . और एन डी ए की नीतियों का डंका पीट रही है लेकिन सच्चाई नीतीश कुमार के बयान से साफ़ नज़र आ रही है . राजनीति के जानकार कहते हैं कि यह जीत न तो जे डी यू की है और न ही एन डी ए की , यह साफ़तौर पर नीतीश कुमार की जीत है . उनके साथ जो भी खड़ा था वह जीत गया .चाहे वह बीजेपी जैसी पार्टी ही क्यों न हो . एक और सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए . वह यह कि खुद नीतीश कुमार को भी नहीं अंदाज़ था कि बिहार की जनता उनके साथ इतने बड़े पैमाने पर जुड़ चुकी है . अगर ऐसा होता तो इस बात की पूरी संभावना है कि बीजेपी से ऊब चुके नीतीश कुमार चुनाव के पहले अकेले ही जाने का फैसला कर लेते और दिल्ली से ले कर पटना तक नीतीश की जीत को अपनी जीत बता रही बीजेपी भी उसी हस्र को पंहुच गयी होती जिसको, लालू प्रसाद, राम विलास पासवान और कांग्रेस के लोग पंहुचे हैं . बिहार के चुनावों में पासवान की तरफ से प्रेस मैनेज कर रहे एक श्रीमानजी से जब पूछा गया था कि क्या राम विलास जी की पार्टी को कुछ सम्मानजनक सीटें मिल जायेगीं ,तो उन्होंने लगभग नाराज़ होते हुए कह दिया था कि २४ नवम्बर को गिनती के बाद देखिएगा, लालू जी के साथ मिलकर पासवान जी सरकार बनायेगें . उसी तरह , लालू भी मुगालते में थे. शायद इसीलिये उन्होंने नतीजों को विस्मयकारी बताया . कांग्रेस के लोग भी राहुल गाँधी की सभाओं में आ रहे लोगों की संख्या को वास्तविक मान रहे थे और उम्मीद कर रहे थे कि इस बार कांग्रेस की किस्मत सुधरेगी. लेकिन नतीजे आने के बाद बिलकुल साफ़ हो गया है कि सब लोग मुगालते में थे . किसी को भनक भी नहीं थी कि जनता क्या फैसला करने वाली है. जनता ने फैसला सुना दिया है और उसने नीतीश कुमार की हर बात का विश्वास किया है .फैसला इस बात का ऐलान है कि बिहार के लोग नीतीश के साथ हैं .
अपनी आदत के मुताबिक नीतीश कुमार ने जनता के फैसले को सिर झुका कर स्वीकार किया है और साफ़ कहा है कि उनके पास जादू की कोई छडी नहीं है जिसको घुमा कर वे हालात को तुरंत बदल दें लेकिन लोगों के लिए काम करने की इच्छाशक्ति है . यही बात सबसे अहम है . किसी के पास जादू की छडी नहीं होती लेकिन कुछ लोग बातें बड़ी बड़ी करते हैं . मौजूदा बिहार का सौभाग्य है कि वहां आज के युग में नीतीश कुमार जैसा व्यक्ति मौजूद है लेकिन राज्य की बदकिसमती यह है कि उसके नेताओं में नीतीश कुमार के अलावा ज़्यादातर ऐसे हैं जो बातें बड़ी बड़ी कर रहे हैं . लालू प्रसाद ने जिस तरह से चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया दी है वह निराशाजनक है , बीजेपी ने जिस तरह से जीत का दावा करना शुरू किया है वह भी बहुत ही अजीब है . यह किसी पार्टी की जीत नहीं है ,यह शुद्ध रूप से नीतीश कुमार की जीत है . और यह अंतिम सत्य है .
बिहार विधान सभा के लिए हुए २०१० के चुनावों के भारतीय राजनीति में बहुत सारी पुरानी मान्यताओं के खँडहर ढह जायेगें . सबसे बड़ा किला तो जातिवाद का ढह गया है . लालू प्रसाद और राम विलास पासवान ने तय कर लिया था उनकी अपनी जातियों के वोट के साथ जब मुसलमानों का वोट मिला दिया जाएगा तो बिहार में एक अजेय गठबंधन बन जाएगा . लेकिन ऐसा कहीं कुछ नहीं हुआ . उनके अपने सबसे प्रिय लोग चुनाव हार गए. राम विलास पासवान के दो भाई चुनाव हार गए . लालू प्रसाद की पत्नी दो सीटों से चुनाव हार गयीं . जाति के गणित के हिसाब से बहुत ही भरोसेमंद सीटों पर चुनाव लड़ रहे इन लोगों की हार जहां जाति के किले को नेस्तनाबूद करती है , वहीं राजनीति में घुस चुके परिवारबाद के सांप को भी पूरी तरह से कुचल देने की शुरुआत कर चुकी है . पूरे देश में और लगभग हर पार्टी में परिवारवाद का ज़हर फैल चुका है . इस चुनाव ने यह साफ़ संकेत दे दिया है कि अपने परिवार के बाहर देखना लोकतांत्रिक राजनीति का ज़रूरी हिस्सा है और बाकी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को भी अपने परिवार के बाहर टैलेंट तलाशने की कोशिश करनी चाहिए . यह चुनाव साम्प्रदायिक ताक़तों की भी हार है .अपने देश में साम्प्रदायिक वहशत के पर्याय बन चुके , नरेंद्र मोदी को जिस तरह से नीतीश कुमार ने बिहार आने से रोका , वह सेकुलर जमातों को अच्छा लगा और इन चुनावों में सेकुलर बिरादरी को महसूस हो गया कि सत्ता की राजनीति के मजबूरी में भले ही नीतीश कुमार बीजेपी को ढो रहे हैं लेकिन मूल रूप से वे बीजेपी-आर एस एस की साम्प्रदायिक राजनीति के पक्षधर नहीं हैं . शायद इसी समझ का नतीजा है कि इस बार मुसलमानों ने बड़ी संख्या नीतीश कुमार की बात का विश्वास किया और उनके उम्मीदवारों को जिताया . बिहार के विधानसभा चुनावों के बाद एक और ज़बरदस्त सन्देश आया है . इस बार अवाम ने गुंडों को नकार दिया है .हाँ ,एकाध गुंडे जो नीतीश कुमार के साथ थे वे जीत गए हैं .लेकिन नीतीश कुमार के पिछले पांच साल के गुंडा विनाश के प्रोजेक्ट को जिन लोगों ने देखा है उन्हें मालूम है अब हुकूमत में गुंडों का दखल बहुत कम हो जाएगा . नीतीश कुमार के सत्ता में आने के पहले के पंद्रह वर्षों में जिस तरह से बिहार में गुंडा राज कायम हुआ था और अपहरण एक उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुका था, उसके हवाले से देखने पर साफ़ समझ में आ जाएगा कि गुंडा लालू प्रसाद के परिवार के राज में प्रशासन का स्थायी हिस्सा बन चुका था. पिछले पांच वर्षों में नीतीश ने उसे बहुत कमज़ोर कर दिया .जिसकी वजह से ही इस बार बड़े बड़े गुंडे और उनेक घर वाले चुनाव हार गए हैं. बिहार में नीतीश के राज में गुंडों का आतंक घटा है .
बीजेपी वाले नीतीश की जीत को गुजरात में नरेंद्र मोदी की जीत के सांचे में रखकर देखने के चक्कर में हैं .कई नेता यह कहते पाए जा रहे हैं कि कि एन डी ए का नारा विकास है और वे लोग नीतीश कुमार को भी अपने बन्दे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं . लेकिन बात इतनी आसान नहीं है . एक तो तथाकथित एन डी ए का कहीं कोई अस्तित्व नहीं है. गुजरात में भी नहीं . वहां शुद्ध रूप से मोदी के ब्रैंड की राजनीति चल रही है जिसका लक्ष्य हिन्दूराज कायम करना है . २००२ में शुरू करके पिछले गुजरात विधान सभा चुनाओं तक गुजरात के मुसलमानों में मोदी ने इतना आतंक फैला दिया था कि मुसलमान वहां दहशत में है और कई इलाकों में तो वह दर के मारे नरेंद्र मोदी के उम्मीदवारों को वोट भी दे रहा है . गुजरात में मुसलमान अब दबा कुचला वर्ग है और कोई भी राजनीतिक जमात उसके लिए किसी तरह की कोई लड़ाई लड़ सकने की स्थिति में नहीं है . इसके साथ साथ मोदी ने राज्य के औद्योगिक विकास को सरकारी तौर पर प्राथमिकता की सूची में डाल दिया है जिस से साम्प्रदायिक हो चुके समाज को संतुष्ट किया जा रहा है . गुजरात में भी बीजेपी या एन डी ए का कुछ नहीं है , वह नरेंद्र मोदी छाप राजनीति है जो मोदी को सरकार में बनाए हुए है . अपने आप को लूप में रखने के चक्कर में बीजेपी गुजरात से बिहार की तुलना करने की जो जल्दबाजी कर रही है ,उस से बचने की ज़रूरत है . बिहार में नीतीश की जो जीत है उसका गुजरात से कोई लेना देना नहीं है . हाँ अगर कोई बात तलाशी जा सकती है तो वह यह है कि बिहार में नरेंद्र मोदी को फटकार दिया गया था और नरेंद्र मोदी को डांट डपट कर नीतीश ने बिहार में एक बड़े वर्ग को अपने साथ कर लिया था .
बिहार ने एक बार फिर देश की राजनीति को दिशा दी है . इस बार वहां न तो जातिवाद चला और न ही परिवारवाद . अपने असफल बच्चों को राजनीति में उतारने की नेताओं की कोशिश को भी ज़बरदस्त झटका लगा है . उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी राज्यों में भी जातिवाद और परिवारवाद को इसी तरह का झटका लगेगा. इस बार एक और दिलचस्प बात हुई है . बीजेपी के बावजूद मुसलमानों ने नीतीश कुमार का विश्वास किया और लालू प्रसाद के मुसलमानों के रहनुमा बनने के मुगालते को ठीक किया. बाबरी मस्जिद के फैसले के बाद कांग्रेस से दूर खिंच रहे मुसलमान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर नीयत में ईमानदारी नहीं है तो वह बीजेपी के साथी नीतीश को तो वोट दे सकता है लेकिन अंदर ही अन्दर की दगाबाजी उसे बर्दाश्त नहीं है
Tuesday, November 23, 2010
*टेलीविज़न की खबरें - कहीं पे हकीकत, कहीं पे निशाना*
धर्मेश शुक्ल
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद एशिया का कूटनीतिक
माहौल बदलना तय है। नए समीकरण उभरेगें और शक्ति का संतुलन बदलेगा। अमरीका
की इस इलाके में बढ़ती ताक़त को बैलेंस करने के लिए चीन ने भी अमरीका
विरोधियों का एक खेमा तैयार करना शुरू कर दिया है। म्यांमार और इरान के
प्रति अमरीकी चिढ का उल्लेख कर के ओबामा ने साफ़ संकेत दे दिया है।
वे भारत की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ा रहे हैं उसमें बहुत सारी शर्तें
नत्थी हैं ।अपने देश का सौभाग्य है कि यहाँ प्रिंट मीडिया में कुछ बहुत
ही समझदार किस्म के पत्रकार नौकरी कर रहे हैं। जिसकी वजह से घटना के अगले
दिन सही खबर का पता चलता रहा। वरना टेलिविज़न की ख़बरों वाले तो सच्चाई
को इतनी मुहब्बत से और बिलकुल अपने दिल की बात समझ कर पेशकर रहे थे कि
लगता था सब उल्टा पुल्टा हो रहा था। लेकिन जब अगले दिन अखबारों में खबरें
पढी जाती थीं तो सारी बात सही सन्दर्भ में पता लग जाती थी। टेलिविज़न
वालों की एक अच्छाई को मानना पडेगा कि जब अखबार पढ़कर उन्हें भी सच्चाई
का पता चलता था तो वे भी बिना किसी संकोच के अखबार में छपी खबर को सच
मानकर नयी बात कहने लगते थे। एक दिन पहले की अपनी ही खबर को गलत बताते
टेलिविज़न वालों की छटा अवर्णनीय होती थी।
सबसे मजेदार बात वह थी जब मुंबई में एक दिन की यात्रा पूरी होने के बाद
टी वी वालों ने कहना शुरू कर दिया कि ओबामा ने भारत की उम्मीदों पर पानी
फेर दिया ,काम की कोई बात नहीं की। जब उन्हें बताया गया कि अभी तो
राजनीतिक यात्रा शुरू होने वाली है ,तब तक इंतज़ार कर लेते। तो सब ने कुछ
और राग अलापना शुरू कर दिया. पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीट
को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया कि लगने लगा कि सब कुछ इन्हीं दो
मूद्दों पर आधारित था। दिल्ली में जब राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान और
सुरक्षा परिषद् दोनों की बात कर दी तो भाई लोग खुश हो गए और जय जय कार
करने लगे। वह तो जब लगभग हर चैनल पर अवकाश प्राप्त राजनयिकों ने सच्चाई
को सही सन्दर्भ में रखा तब जा कर के टी वी पत्रकारिता के महान विचारकों
ने कुछ समझदारी की बात करना शुरू किया. अब सब कुछ ठीक है। ओबामा जा चुके
हैं और सारी बात अखबारों में छप चुकी है। टी वी वालों को भी सब कुछ पता
चल चुका है। लेकिन एक विचार मन में बार बार आता है कि ओबामा से यह
निवेदन किया जाना चाहिए था कि हमारे टी वी पत्रकारों को भी अपने टी वी
वालों की तरह बनाने की ट्रेनिंग दिलवाने का कोई प्रस्ताव रख देते।
ओबामा की भारत यात्रा के कूटनीतिक घटना थी। कूटनीति का पहला सिद्धांत है
कि वह अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रख कर संचालित की जाती है। ओबामा
ने भी वही किया उनके दिमाग में अमरीकी राष्ट्रीय हित था। जब उन्होंने
मुंबई में करीब दस अरब डालर के अमरीकी निर्यात की बात को पुख्ता किया तो
उनके मन में सौ फीसदी अमरीकी हित काम कर रहा था। दिल्ली आ कर उन्होंने
पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद् की बात भी कर दी। यहाँ भी वे शुद्ध रूप से
अमरीकी राष्ट्र हित को ध्यान में रख कर काम कर रहे थे। हाँ इस बात में दो
राय नहीं हो सकती कि अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत की चार दिन की यात्रा
करके और उसके नेताओं के कान में संगीत का असर देने वाली बातें कह कर
माहौल को बहुत ही खुशनुमा बना दिया। भारत में मीडिया और राजनीतिक नेताओं
का एक वर्ग है जो पाकिस्तान का नाम लेकर अपने आपको जिंदा रख रहा है लेकिन
सच्चाई यह है कि पाकिस्तान एक गरीब मुल्क है और अब भारत की विकास यात्रा
में उसका कोई महत्व नहीं है। पाकिस्तान अब अमरीका का भी मित्र नहीं है।
वह अब अमरीका के ठेकेदार के रूप में काम कर रहा है . अमरीका ने उसकी फौज
को ठेका दिया है कि वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमरीकी हितों की
रक्षा करे. इसके लिए उसे बाकायदा मजदूरी दी जा रही है। अमरीका से उसका
बराबरी के धरातल पर कोई सम्बन्ध नहीं है। जबकि भारत के साथ अमरीका को अलग
तरह से सम्बन्ध रखना पड़ रहा है। भारत को अब अमरीका एक पूंजीवादी देश के
रूप में अपना मित्र मानता है।
अमरीका की कोशिश है कि भारत में समाजवाद शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल
करवाया जाय। उसके लिए हालांकि काम शुरू से ही चल रहा था लेकिन १९९१ में
जब पी वी नरसिम्हाराव की सरकार आई तो अमरीका ने उस दिशा में ज़बरदस्त दखल
दिया। वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के
किसी भी पैरोकार के सपनों की ताबीर के रूप में देखे जा सकते हैं। जब
वित्त मंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह ने काम संभाला था तो अपने
छात्रों की एक बड़ी टीम को महत्वपूर्ण जगहों पर स्थापित कर दिया था।
उनके प्रधान मंत्री बन जाने के बाद तो सब कुछ पूंजीवादी तरीके से चल
निकला। निजी जीवन में बहुत ही ईमानदार प्रधान मंत्री ने मुल्क पर ऐसी
अर्थव्यवस्था को लागू कर दिया जो मूल रूप से आम आदमी के विरोध में ही काम
करती है।
आज भारत पूरी तरह से अमरीकी डिजाइन का पूंजीवादी देश है और अमरीकी
राष्ट्रपति ऐसे देशों का आक़ा होता है। ओबामा की यात्रा को इस सन्दर्भ
में देखा जाय तो बात सही समझ में आ जाती है। पाकिस्तान संघी राजनीति की
जीवनदायिनी शक्ति है इसलिए दक्षिण पंथी मीडिया ख़बरों के डोमेन से
पाकिस्तान को मरने नहीं देगा . और सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीट के लिए
सभी पार्टियां बराबर की मशक्क़त कर रही थीं क्योंकि इस तरह की सजावटी
बातों की वजह से ही जनता का ध्यान गरीबी और अन्य ज़रूरी मुद्दों से
हटाया जा सकता है। इस तरह साफ़ नज़र आता है कि अमरीकी राष्ट्रपति की भारत
यात्रा के नतीजों के अन्दर बहुत सारी अंतर्कथाएँ हैं। जो भी हो अब
पूंजीवादी राजनीतिक का अनुयायी , भारत सही अर्थों में अमरीका का मित्र
है और वह एशिया में अपने दुशमनों के खिलाफ भारत का इस्तेमाल करना चाहता
है। उसके लिए जो भी ज़रूरी होगा अमरीकी हुकूमत करेगी।
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद एशिया का कूटनीतिक
माहौल बदलना तय है। नए समीकरण उभरेगें और शक्ति का संतुलन बदलेगा। अमरीका
की इस इलाके में बढ़ती ताक़त को बैलेंस करने के लिए चीन ने भी अमरीका
विरोधियों का एक खेमा तैयार करना शुरू कर दिया है। म्यांमार और इरान के
प्रति अमरीकी चिढ का उल्लेख कर के ओबामा ने साफ़ संकेत दे दिया है।
वे भारत की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ा रहे हैं उसमें बहुत सारी शर्तें
नत्थी हैं ।अपने देश का सौभाग्य है कि यहाँ प्रिंट मीडिया में कुछ बहुत
ही समझदार किस्म के पत्रकार नौकरी कर रहे हैं। जिसकी वजह से घटना के अगले
दिन सही खबर का पता चलता रहा। वरना टेलिविज़न की ख़बरों वाले तो सच्चाई
को इतनी मुहब्बत से और बिलकुल अपने दिल की बात समझ कर पेशकर रहे थे कि
लगता था सब उल्टा पुल्टा हो रहा था। लेकिन जब अगले दिन अखबारों में खबरें
पढी जाती थीं तो सारी बात सही सन्दर्भ में पता लग जाती थी। टेलिविज़न
वालों की एक अच्छाई को मानना पडेगा कि जब अखबार पढ़कर उन्हें भी सच्चाई
का पता चलता था तो वे भी बिना किसी संकोच के अखबार में छपी खबर को सच
मानकर नयी बात कहने लगते थे। एक दिन पहले की अपनी ही खबर को गलत बताते
टेलिविज़न वालों की छटा अवर्णनीय होती थी।
सबसे मजेदार बात वह थी जब मुंबई में एक दिन की यात्रा पूरी होने के बाद
टी वी वालों ने कहना शुरू कर दिया कि ओबामा ने भारत की उम्मीदों पर पानी
फेर दिया ,काम की कोई बात नहीं की। जब उन्हें बताया गया कि अभी तो
राजनीतिक यात्रा शुरू होने वाली है ,तब तक इंतज़ार कर लेते। तो सब ने कुछ
और राग अलापना शुरू कर दिया. पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीट
को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया कि लगने लगा कि सब कुछ इन्हीं दो
मूद्दों पर आधारित था। दिल्ली में जब राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान और
सुरक्षा परिषद् दोनों की बात कर दी तो भाई लोग खुश हो गए और जय जय कार
करने लगे। वह तो जब लगभग हर चैनल पर अवकाश प्राप्त राजनयिकों ने सच्चाई
को सही सन्दर्भ में रखा तब जा कर के टी वी पत्रकारिता के महान विचारकों
ने कुछ समझदारी की बात करना शुरू किया. अब सब कुछ ठीक है। ओबामा जा चुके
हैं और सारी बात अखबारों में छप चुकी है। टी वी वालों को भी सब कुछ पता
चल चुका है। लेकिन एक विचार मन में बार बार आता है कि ओबामा से यह
निवेदन किया जाना चाहिए था कि हमारे टी वी पत्रकारों को भी अपने टी वी
वालों की तरह बनाने की ट्रेनिंग दिलवाने का कोई प्रस्ताव रख देते।
ओबामा की भारत यात्रा के कूटनीतिक घटना थी। कूटनीति का पहला सिद्धांत है
कि वह अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रख कर संचालित की जाती है। ओबामा
ने भी वही किया उनके दिमाग में अमरीकी राष्ट्रीय हित था। जब उन्होंने
मुंबई में करीब दस अरब डालर के अमरीकी निर्यात की बात को पुख्ता किया तो
उनके मन में सौ फीसदी अमरीकी हित काम कर रहा था। दिल्ली आ कर उन्होंने
पाकिस्तान और सुरक्षा परिषद् की बात भी कर दी। यहाँ भी वे शुद्ध रूप से
अमरीकी राष्ट्र हित को ध्यान में रख कर काम कर रहे थे। हाँ इस बात में दो
राय नहीं हो सकती कि अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत की चार दिन की यात्रा
करके और उसके नेताओं के कान में संगीत का असर देने वाली बातें कह कर
माहौल को बहुत ही खुशनुमा बना दिया। भारत में मीडिया और राजनीतिक नेताओं
का एक वर्ग है जो पाकिस्तान का नाम लेकर अपने आपको जिंदा रख रहा है लेकिन
सच्चाई यह है कि पाकिस्तान एक गरीब मुल्क है और अब भारत की विकास यात्रा
में उसका कोई महत्व नहीं है। पाकिस्तान अब अमरीका का भी मित्र नहीं है।
वह अब अमरीका के ठेकेदार के रूप में काम कर रहा है . अमरीका ने उसकी फौज
को ठेका दिया है कि वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमरीकी हितों की
रक्षा करे. इसके लिए उसे बाकायदा मजदूरी दी जा रही है। अमरीका से उसका
बराबरी के धरातल पर कोई सम्बन्ध नहीं है। जबकि भारत के साथ अमरीका को अलग
तरह से सम्बन्ध रखना पड़ रहा है। भारत को अब अमरीका एक पूंजीवादी देश के
रूप में अपना मित्र मानता है।
अमरीका की कोशिश है कि भारत में समाजवाद शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल
करवाया जाय। उसके लिए हालांकि काम शुरू से ही चल रहा था लेकिन १९९१ में
जब पी वी नरसिम्हाराव की सरकार आई तो अमरीका ने उस दिशा में ज़बरदस्त दखल
दिया। वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के
किसी भी पैरोकार के सपनों की ताबीर के रूप में देखे जा सकते हैं। जब
वित्त मंत्री के रूप में डॉ मनमोहन सिंह ने काम संभाला था तो अपने
छात्रों की एक बड़ी टीम को महत्वपूर्ण जगहों पर स्थापित कर दिया था।
उनके प्रधान मंत्री बन जाने के बाद तो सब कुछ पूंजीवादी तरीके से चल
निकला। निजी जीवन में बहुत ही ईमानदार प्रधान मंत्री ने मुल्क पर ऐसी
अर्थव्यवस्था को लागू कर दिया जो मूल रूप से आम आदमी के विरोध में ही काम
करती है।
आज भारत पूरी तरह से अमरीकी डिजाइन का पूंजीवादी देश है और अमरीकी
राष्ट्रपति ऐसे देशों का आक़ा होता है। ओबामा की यात्रा को इस सन्दर्भ
में देखा जाय तो बात सही समझ में आ जाती है। पाकिस्तान संघी राजनीति की
जीवनदायिनी शक्ति है इसलिए दक्षिण पंथी मीडिया ख़बरों के डोमेन से
पाकिस्तान को मरने नहीं देगा . और सुरक्षा परिषद् की स्थायी सीट के लिए
सभी पार्टियां बराबर की मशक्क़त कर रही थीं क्योंकि इस तरह की सजावटी
बातों की वजह से ही जनता का ध्यान गरीबी और अन्य ज़रूरी मुद्दों से
हटाया जा सकता है। इस तरह साफ़ नज़र आता है कि अमरीकी राष्ट्रपति की भारत
यात्रा के नतीजों के अन्दर बहुत सारी अंतर्कथाएँ हैं। जो भी हो अब
पूंजीवादी राजनीतिक का अनुयायी , भारत सही अर्थों में अमरीका का मित्र
है और वह एशिया में अपने दुशमनों के खिलाफ भारत का इस्तेमाल करना चाहता
है। उसके लिए जो भी ज़रूरी होगा अमरीकी हुकूमत करेगी।
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