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Wednesday, July 16, 2014

अलविदा ,नादिन गार्डिमर


शेष नारायण सिंह 


साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखिका , नादिन गार्डिमर नहीं रहीं . ९० साल की उम्र में हुयी उनकी मौत का साथ ही दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी और रंगभेद की नीतियों के खिलाफ हुए संघर्ष की एक महान योद्धा के जीवन का अंत हो गया .उनकी मौत के साथ साथ ही अफ्रीकी देशों में आज़ादी के सबसे बड़े नायक नेल्सन मंडेला की एक घनिष्ठ कामरेड के जीवन का अंत हो गया .नादिन गार्डिमर रंगभेद के खिलाफ चले आन्दोलन के हरावल दस्ते के अगली कतार की नेता थीं .उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ चले संघर्ष में ज़बरदस्त भूमिका निभाई . नेल्सन मंडेला के १९६२ वाले मुक़दमे में वे बहुत ही सक्रियता के साथ रंगभेदी सरकार के खिलाफ बने मोर्चे में सक्रिय थीं . उस केस में नेल्सन मंडेला ने अपने बचाव के लिए जो बयान दिया था ,वह आज़ादी की लड़ाई का एक बहुत ही अहम दस्तावेज़ है . उस बयान को नादिन गार्डिमर ने ही तैयार किया था . बाद मे “ आई एम प्रेपेयर्ड टू डाई “ नाम से उस मंडेला के बयान को पुस्तक के रूप में छापा गया . दुनिया की बहुत सारी भाषाओं में उसका अनुवाद हो चुका है . नादिन गार्डिमर  अफ्रीकी आन्दोलन की इतनी बड़ी नेता थीं कि जब नेल्सन मंडेला को जेल से छोड़ा गया तो मंडेला ने रिहाई के बाद सबसे पहले उनसे मिलने की इच्छा जताई थी.  अफ्रीका में रंगभेद की नीतियों के बारे में बाकी दुनिया को जानकारी नादिन गार्डिमर  की किताबों से ही मिली. उन्होंने ही दुनिया को बताया कि दक्षिण अफ्रीका में किस तरह से शरीर के रंग की वजह से काबिल लोगों को समाज के विकासक्रम में सबसे पीछे डाल दिया जाता है . अमरीका और ब्रिटेन की अफ्रीका नीति के पोल भी सबसे पहले नादिन गार्डिमर  ने ही खोली थी . उन्होने ही सारी दुनिया को बताया था कि लोकशाही के समर्थन का दावा करने वाली पश्चिमी देशों की सरकारें किस तरह से दक्षिण अफ्रीका में हो रहे रंगभेद के अन्याय के तांडव का समर्थन करती हैं . उन्होने ही बताया कि दक्षिण अफ्रीका में आधी रात को भी कोई भी पुलिस वाला किसी भी काले आदमी के घर पर दस्तक दे सकता है और उसके परिवार के बच्चों और महिलाओं को अपमानित कर सकता है . उनकी साहित्यिक कृतियों से ही अंग्रेज़ी पढने वाली दुनिया को पता लगा कि दक्षिण अफ्रीका में आज़ादी की बात सोचना भी असंभव है  . नादिन गार्डिमर  की किताबों में ही लिखा हुआ है कि जब वहाँ की कोर्ट से जब कोई काला आदमी जेल से रिहा हो जाता है तो जेल के गेट के बाहर ही उसको फिर किसी ऐसे  जुर्म का फर्जी आरोप लगाकर पकड़ लिया जाता है जो उसने कभी किया ही नहीं था . इस तरह से कोर्ट की न्याय के स्वांग की प्रक्रिया के बीच दक्षिण अफ्रीका का आम आदमी कुछ मिनटों के लिए ही आज़ादी की हवा में सांस ले सकता है . उनकी साहित्यिक रचनाओं के बारे में दुनिया भर के नामी आलोचकों और समाजशास्त्रियों की राय है कि वह साहित्य कम और सामाजिक इतिहास ज़्यादा है . उनका कहना है कि उन्होंने इतिहास नहीं लिखा लेकिन किसी भी साहित्यिक रचना में उन्होने जो डिटेल शामिल किया है , वास्तव में उसको उस कालखंड का इतिहास माना जा  सकता है . नादिन गार्डिमर ने आत्मकथा नहीं लिखी है लेकिन अक्सर कहा जाता है कि उनकी कई रचनाओं में जो सन्दर्भ में वे उनके भोगे हुए यथार्थ के टुकड़े हैं . हर रचना में सच्चाई बहुत ही साफ़ तरीके से दर्ज है . बहुत सारे आलोचकों ने अक्सर दावा किया है कि उनकी कुछ रचनाएं आत्मकथात्मक हैं . उनकी साहित्यिक रचनाओं के बारे में कहा जाता है कि उनकी हर किताब में साफ़ साफ़ इतिहास  लिखा हुआ है . बस उसमें नाम और तारीख सच नहीं होती बाकी सब कुछ सच्चाई होती है . उन्होंने पचीसों किताबें लिखी . १९४९ में उनकी पहली किताब  ‘ फेस टू फेस ‘ छपी थी . उनका सबसे महत्वपूर्ण शाहकार “ टेलिंग टाइम्स --- राइटिंग एंड लिविंग १९५४-२००८ “ है . मैं इसको इंसानी बुलंदी का सबसे अहम दस्तावेज़ मानता हूँ . यह साहित्य नहीं है यह उनकी गैर साहित्यिक रचनाओं का संकलन है .इस किताब में उनकी वह रचनाएं हैं जिनमें अफ्रीकी अवाम की लड़ाई के ३५ वर्षों और नेल्सन मंडेला की रिहाई के बाद के वर्षों की राजकाज और सामाजिक सामंजस्य की दुविधाओं को रेखांकित किया गया है . उनके तीन उपन्यासों को रंगभेदी सरकार ने प्रतिबंधित भी कर रखा था  लेकिन वे किताबें  बाकी दुनिया में हमेशा उपलब्ध रहीं .

नादिन गार्डिमर एक युगद्रष्टा रचनाकार थीं . उनकी १९८१ में छपी किताब ‘ जुलाई पीपुल “ को पढकर लगता है कि जैसे वे एक नए देश की जीत और उसके लोगों के सपनों को पूरा होने की कहानी बता रही हों . लगता है कि वह दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी के बाद  की घटनाएं हैं .जबकि दक्षिण अफ्रीका को आज़ादी की उम्मीद इस किताब के छपने के दस साल बाद नज़र आनी शुरू हुयी थी .उस दौर तो में किसी को उम्मीद भी नहीं थी कि दस साल बाद नेल्सन मंडेला रिहा हो जायेगें और एक नए राष्ट्र का जन्म होगा जिसमें रंगभेद नहीं होगा . नादिन गार्डिमर को इतने सम्मान मिले हैं कि गिनवाना बहुत ही मुश्किल है. उनको १९७४ में बुकर प्राइज़ मिला था और १९९१ में उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला . यह दक्षिण अफ्रीका के खाते का पहला  नोबेल सम्मान था . इसके अलावा कामनवेल्थ और  पुरानी ब्रिटिश कालोनियों में जो भी सम्मान होते हैं ,सब उनको मिल चुके हैं .  बेझिझक कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी के संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़नबीस ने दुनिया से अलविदा कह दिया है .

Saturday, June 22, 2013

नेल्सन मंडेला अब मौत को चुनौती दे रहे हैं


शेष नारायण सिंह

अगले महीने नेल्सन मंडेला ९५ साल के हो जायेगें .उनकी तबियत बहुत खराब है .अस्पताल में आठ जून को भर्ती किये गए थे और तब से ही उनका स्वास्थ्य “स्थिर लेकिन गंभीर” बना हुआ है .२०११ के बाद से तो वे अक्सर अस्पताल में भर्ती होते रहे हैं .वैसे सार्वजनिक रूप से उनको बाहर निकले करीब तीन साल हो गए हैं . २०१० के फीफा वर्ल्ड कप के समय वे गोल्फ कार्ट में बैठकर आये थे . उस समय भी बहुत कमज़ोर थे, हाथ  उठाने में भी दिक्कत हो रही थी. उनकी बीमारी दक्षिण अफ्रीका में चिंता का विषय बनी हुई है . एक दक्षिण अफ्रीकी अखबार ने तो बैनर हेडलाइन लगा दी थी कि , “लेट हिम गो “ यानी अब उन्हें जाने दिया जाए.

दस साल पहले नेल्सन मंडेला ने राजनीति से संन्यास ले लिया था . उसके  बाद से वे सार्वजनिक रूप से बहुत कम देखे गए हैं .उनको फेफड़े की बीमारी है और वह शायद उनकी बहुत लंबी गिरफ्तारी के समय से ही है . अपनी गिरफ्तारी के दौरान वे पत्थर की खान में काम करने के लिए भेजे जाते थे  . जानकार बताते हैं कि पत्थर की खान में जितने भी कैदियों को भेजा जाता था सभी फेफड़े की बीमारी का शिकार हुए . उनमें से ज़्यादातर तो अब जीवित नहीं हैं लेकिन एक एन्ड्रयू म्लान्गेनी जिंदा हैं और उन्होंने मंडेला के परिवार से कहा है कि अब उनको जाने दीजिए जिस से ईश्वर उनको अपनी हिफाज़त में ले ले. उनके साथी और  अफ्रीका में आज़ादी के बहुत बड़े नेता डेसमंड टूटू ने कहा है उनको अपना जीवन सम्मान और मर्यादा के साथ बिताना चाहिए. पूरे अफ्रीका में लोग दुआ कर रहे हैं कि मदीबा जल्दी ठीक हो जाएँ .अफ्रीका में लोग मुहब्बत से मंडेला को मदीबा ही  कहते हैं , जैसे महात्मा गांधी को अपने यहाँ लोग बापू कहते थे . उनके अस्पताल के बाहर मीडिया के लोग दिनरात मौजूद हैं और किसी खबर ,शायद उनकी मौत की खबर का इंतज़ार कर रहे हैं. वे प्रिटोरिया के मेडीक्लिनिक हार्ट हास्पिटल में दाखिल कराये गए हैं . उनके स्वास्थ्य की जानकारी दक्षिण अफ्रीका में अति विशिष्ट जानकारी मानी जाते  है और उस पर देश के राष्ट्रपति के दफ्तर का कंट्रोल है . सरकारी कंट्रोल से बहुत कम खबर बाहर निकलती है लेकिन इतना तय है कि मदीबा की तबियत बहुत खराब है .
आज भी  दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला एक राजनीतिक पूंजी हैं . अगले साल आम चुनाव होने हैं .सत्ताधारी अफ्रीकन नैशनल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल , डेमोक्रेटिक अलायंस , दोनों की ही नज़रें उनके नाम पर चुनाव अभियान चलाने की है . उनकी कामना है कि आज़ादी का यह महानायक तब तक अस्पताल में ही सही ,जिंदा रहे . उनके नाती पोते भी मंडेला की दीर्घायु की कामना कर  रहे हैं . उनमें से कई मंडेला के नाम पर धंधे कर रहे हैं और कुछ के ऊपर तो अदालतों में मुक़दमें चल रहे  हैं . वे भी नहीं चाहते कि मंडेला  को मुक्ति मिले. हालांकि अब उनकी आँखें बहुत कमज़ोर हैं ,  फेफड़े मशीन के सहारे ही काम कर रहे हैं और उनकी याददाश्त भी बहुत कमज़ोर हो गयी है लेकिन जिजीविषा का यह महानायक अभी भी  मौत को चुनौती दिए जा रहा है , दिए जा रहा है .