Sunday, January 30, 2011

मिस्र में अब ताज उछाले जायेगें ,तख़्त गिराए जायेगें .

शेष नारायण सिंह

मिस्र के राष्ट्रपति ,होस्नी मुबारक की विदाई का वक़्त करीब आ पंहुचा है . लगता है अब वहां ज़ुल्मो-सितम के कोहे गिरां रूई की तरह उड़ जायेगें . विपक्ष की आवाज़ बन चुके , संयुक्त राष्ट्र के पूर्व उच्च अधिकारी मुहम्मद अल बरदेई ने साफ़ कह दिया है कि होस्नी मुबारक को फ़ौरन गद्दी छोडनी होगी और चुनाव के पहले एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना भी करनी होगी. पिछले तीस साल से अमरीका की कृपा से इस अरब देश में राज कर रहे मुबारक को मुगालता हो गया था कि वह हमेशा के लिए हुकूमत में आ चुके हैं . लेकिन अब अमरीका को भी अंदाज़ लग गया है कि कि होस्नी मुबारक को मिस्र की जनता अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है . तहरीर चौक पर जुट रहे लोगों को अब किसी का डर नहीं है . राष्ट्रपति मुबारक, फौज के सहारे राज करते आ रहे हैं लेकिन लगता है कि अब फौज भी उनके साथ नहीं है . तहरीर चौक में कई बार ऐसा देखा गया कि अवाम फौजी अफसरों को हाथों हाथ ले रही है .यह इस बात का संकेत है कि अब फौज समेत पूरा देश बदलाव चाहता है .इस बीच अमरीका हीला हवाली का अपना राग अलाप रहा है .अमरीकी विदेश मंत्री , हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि सत्ता परिवर्तन तो होना चाहिए लेकिन मौजूदा सत्ता को उखाड़ फेंकना ठीक नहीं है . अमरीका के इस रुख से चारों तरफ बहुत सख्त नाराज़गी है . मिस्र में तो लोग नाराज़ हैं ही , अमरीकी जनमत भी ओबामा सरकार से निराश हो रहा है . अमरीका के चोटी के विद्वानों ने राष्ट्रपति ओबामा को एक पत्र लिखकर मांग की है कि मिस्र में लोकशाही की स्थापना में मदद करें, उसमें अडंगा न लगाएं . इन विद्वानों में अमरीकी विश्वविद्यालयों में काम कर रहे राजनीतिशास्त्र और इतिहास के वे प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने अरब देशों की राजनीति का गंभीर अध्ययन किया है . इन लोगों ने राष्ट्रपति ओबामा से अपील की है मिस्र में चल रहे लोकतांत्रिक आन्दोलन ने उन्हें एक अवसर दिया है जिसका उन्हें तुरंत इस्तेमाल करना चाहिए . उन विद्वानों ने कहा है कि अमरीकी नागरिक के रूप में वे उम्मीद करते हैं कि उनका राष्ट्रपति लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आयेगा. पिछले तीस वर्षों से अमरीकी सरकार ने मिस्र में अरबों डालर कर खर्च करके वह व्यवस्था लागू करने की कोशिश की जिसे अब वहां की जनता ख़त्म करना चाहती है . मिस्र के लाखों नागरिक सडकों पर हैं और मांग कार रहे हैं कि राष्ट्रपति मुबारक फ़ौरन इस्तीफ़ा दें और एक ऐसी सरकार बने जो उनके और उनके पारिवार के प्रभाव से मुक्त हो . अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा था कि मिस्र की जनता की महत्वाकांक्षाओं को ध्यान में रख कर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सुधार किये जाने चाहिए . राष्ट्रपति ओबामा से मांग की गयी है कि वे अपनी सरकार को हिदायत दें कि वह इस बात का ऐलान करे कि इस तरह के सुधार होस्नी मुबारक के बूते की बात नहीं हैं.अमरीकी जनमत को प्रभावित कर सकने वाले इन लोगों ने कहा है कि मिस्र के मौजूदा संकट से अमरीका को भी सबक लेने की ज़रुरत है . अमरीकी सरकार को चाहिए कि वह मिस्र की जनता का साथ आशा और लोकशाही के मूल्यों के आधार पर दे . जैसा कि आम तौर पर होता है वहां अब भौगोलिक रणनीति को आधार बनाकर काम करने की ज़रूरत नहीं है.ओबामा को उन्हीं की बात याद दिलाई गयी है जब उन्होंने पिछले शुक्रवार को कहा था कि विचारों को दबा देने से उन्हें ख़त्म नहीं किया जा सकता. ओबामा से अपील की गयी है कि मिस्र में उन नीतियों को अब त्याग दें जिनकी वजह से यह हाल हुआ है . और एक नयी राह पर चलें . अमरीकी विदेश नीति में बहुत कमियाँ हैं . मिस्र ने एक अवसर दिया है कि उन कमियों को दूर किया जाए,

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित ,मुहम्मद अल बरदेई की मिस्र में बहुत इज्ज़त है . उन्होंने जनता से कहा है कि आप ही इस क्रान्ति के मालिक हैं आप ही इस क्रान्ति का भविष्य हैं . हमारी मांग है कि मौजूदा हुकूमत फ़ौरन ख़त्म हो और एक नयी सरकार कायम की जाए जहां मिस्र का हर नागरिक सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीवन बिता सके. लेकिन मुहम्मद अल बरदेई के आ जाने के बाद मिस्र के ही कुछ हलकों में परेशानी नज़र आने लगी है . इस तरह के लोगों का कहना है कि वे मिस्र के बारे में कुछ नहीं जानते क्योंकि वे बहुत दिनों से संयुक्त राष्ट्र की अपनी नौकरी के चक्कर में विदेशों में ही रह रहे हैं . अन्य किसी राजनीतिक संगठन के न होने के कारण शायद मुस्लिम ब्रदरहुड नाम का एक संगठन आन्दोलन का नेतृत्व करता नज़र आ रहा था .इस संगठन की कोशिश है कि मिस्र में इस्लामी राज्य स्थापित किया जाए. लेकिन अब लगता है कि उनकी भी कुछ ख़ास नहीं चलने वाली है क्योंकि मिस्र में अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक मूल्यों को ज्यादा महत्व दिया जाता रहा है . यह मुबारक भी उन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर ही सत्ता में आये थे लेकिन धीरे धीरे तानाशाही प्रवृत्तियों के शिकार हो गए. इसके लिए अमरीकी नीतियाँ ही ज्यादा ज़िम्मेदार हैं क्योंकि देखा गया है कि अमरीका को अगर उस इलाके की चौकी दारी करने वाला कोई तानाशाह मिल जाए तो उसे इस बात की कोई परवाह नहीं रहती कि उस देश में लोकतंत्र की स्थापना की कोशिश की जाये. पाकिस्तान में पिछले तीस वर्षों में अमरीका ने दो तानाशाहों को समर्थन दिया है . इसी तरह से बाकी देशों का भी हाल है . बहर हाल अब लगता है कि अमरीका के लिए भी मिस्र में होस्नी मुबारक की बेकार हो चुकी सरकार को संभाल पाना संभव नहीं होगा . इस बात के संकेत साफ़ नज़र आने लगे हैं कि अब अमरीका मुबारक को डंप करके किसी नए इंतज़ाम को अपनाने के चक्कर में है . दुनिया को मालूम है कि मिस्र की सरकार अमरीका की कठपुतली सरकार है .इसलिए वहां किसी भी बद्लाव की उम्मीद अमरीका के सक्रिय हस्तक्षेप के बिना नहीं की जानी चाहिए

अंत में उनका शरीर मंदिर बन गया था .

शेष नारायण सिंह

आज से ठीक तिरसठ साल पहले एक धार्मिक आतंकवादी की गोलियों से महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी थी. कुछ लोगों को उनकी हत्या के आरोप में सज़ा भी हुई लेकिन साज़िश की परतों से पर्दा कभी नहीं उठ सका . खुद महात्मा जी अपनी हत्या से लापरवाह थे. जब २० जनवरी को उसी गिरोह ने उन्हें मारने की कोशिश की जिसने ३० जनवरी को असल में मारा तो सरकार चौकन्नी हो गयी थी लेकिन महत्मा गाँधी ने सुरक्षा का कोई भारी बंदोबस्त नहीं होने दिया . ऐसा लगता था कि महात्मा गाँधी इसी तरह की मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे.इंसानी मुहब्बत के लिए आख़िरी साँसे लेना उनका सपना भी था. जब १९२६ में एक धार्मिक उन्मादी ने स्वामी श्रद्धानंद जी महराज को मार डाला तो गाँधी जी को तकलीफ तो बहुत हुई लेकिन उन्होंने उनके मृत्यु के दूसरे पक्ष को देखा. २४ दिसंबर १९२६ को आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में गाँधी जी ने कहा कि " स्वामी श्रद्धानंद जी की मृत्यु मेरे लिए असहनीय है .लेकिन मेरा दिल शोक माने से साफ़ इनकार कर रहा है. उलटे यह प्रार्थना कर रहा है कि हम सबको इसी तरह की मौत मिले.( कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी अंक ३२ ) .अपनी खुद की मृत्यु के कुछ दिन पहले पाकिस्तान से आये कुछ शरणार्थियों के सामने उन्होंने सवाल किया था " क्या बेहतर है ? अपने होंठों पर ईश्वर का नाम लेते हुए अपने विश्वास के लिए मर जाना या बीमारी , फालिज या वृद्धावस्था का शिकार होकर मरना . जहां तक मेरा सवाल है मैं तो पहली वाली मौत का ही वरण करूंगा " ( प्यारेलाल के संस्मरण )
महात्मा जी की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू का वह भाषण तो दुनिया जानती है जो उन्होंने रेडियो पर देश वासियों को संबोधित करते हुए दिया था . उसी भाषण में उन्होंने कहा था कि हमारी ज़िंदगी से प्रकाश चला गया है . लेकिन उन्होंने हरिजन ( १५ फरवरी १९४८ ) में जो लिखा ,वह महात्मा जी को सही श्रद्धांजलि है . लिखते हैं कि ' उम्र बढ़ने के साथ साथ ऐसा लगता था कि उनका शरीर उनकी शक्तिशाली आत्मा का वाहन हो गया था,. उनको देखने या सुनने के वक़्त उनके शरीर का ध्यान ही नहीं रहता था , लगता था कि जहां वे बैठे होते थे ,वह जगह एक मंदिर बन गयी है '

अपनी मृत्यु के दिन भी महात्मा गाँधी ने भारत के लोगों के लिए दिन भर काम किया था . लेकिन एक धर्माध आतंकी ने उन्हें मार डाला .

Saturday, January 29, 2011

सावधान ! महंगाई डायन अब सरकारें खा रही है

शेष नारायण सिंह

अपने देश में चारों तरफ मंहगाई का हाहाकार है . खाने के सामान की मंहगाई को केंद्र सरकार वाले नेता गंभीरता से नहीं ले रहे हैं. यह उनका मुगालता है . जो प्याज कभी ९० रूपये की एक किलो बिक चुकी थी, पंद्रह दिन के अन्दर वही प्याज नाशिक मंडी में घटकर चार रूपये किलो तक पंहुच गयी.मंडी में नीलामी रोकनी पड़ी जिस से कि किसानों को बहुत ज्यादा नुकसान न हो .हालांकि जानकार बताते हैं कि इस सरकार को किसानों के हित से कोई लेना देना नहीं है , मंडी में कारोबार इसलिए रोका गया था कि जमाखोरों को बहुत बड़ा घाटा न हो जाए . आखिर जमाखोर ही तो राजनीतिक दलों की झोली में धन डालता है जिसकी वजह से चुनावों में बेहिसाब खर्च होता है. प्याज के अलावा भी खाने की हर चीज़ की कीमत बेतहाशा बढ़ गयी है और सरकार अलगर्ज़ है . दिल्ली दरबार में सबसे ऊपर बैठे लोगों को अफ्रीकी देश ,मिस्र में चल रहे जन आन्दोलन पर नज़र डाल लेनी चाहिए . वहां की जनता सडकों पर है और तीस साल से अमरीका की मदद से तानाशाही हुकूमत चला रहे राष्ट्रपति, होस्नी मुबारक की हालात खस्ता है . फौज के सहारे राज करने की कोशिश कर रहे मुबारक को अब कोई नहीं बचा सकता . यह जान लेना ज़रूरी है कि उनका पतन किन कारणों से हुआ है . ब्रिटिश अखबार फाइनेशियल टाइम्स लिखता है कि खाने की चीज़ों की आसमान छूती कीमतें ,बेरोजगारी और गरीब-अमीर के बीच बहुत तेज़ी से बढ़ रही खाईं के कारण मिस्र में जनता ने सरकार के खिलाफ मैदान लिया है.. अगर इन कारणों से जनता सड़क पर आ सकती है तो हमारे हुक्मरान को क्या कान में तेल डाल कर सोते रहने का मौका है ? क्या यही हालात भारत के हर गली कूचे में नहीं हैं . सच्ची बात यह है कि यह चेतावनी है कि दुनिया में जहां भी मंहगाई हो, बेरोजगारी हो और अमीर गरीब के बीच खाईं बहुत ज़्यादा हो ,वहां की सरकारों को संभल जाना चाहिए क्योंकि भूख से तड़प रहे आदमी की बर्दाश्त की कोई हद नहीं होती है .जब वह झूम के उठता है तो फौज - फाटे के तिनकों की औकात नहीं कि वह उस तूफान को रोक सके. मिस्र में आजकल वही तूफ़ान है . राजधानी काहिरा में फौज की एक नहीं चल रही हाई . पिरामिडों के शहर गिज़ा में थाने जलाए गए हैं . देश के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेक्सांद्रिया में चारों तरफ जनता ही जनता है .होस्नी मुबारक की सत्ताधारी पार्टी ,नैशनल डेमोक्रेटिक पार्टी के काहिरा के मुख्यालय को लोगों ने आग के हवाले कर दिया है . यहाँ यह भी समझ लेने की ज़रुरत है कि इस आन्दोलन की अगली कतार में मुस्लिम ब्रदरहुड है जिसको आम तौर पर दक्षिण पंथी ताक़त के रूप में जाना जाता है . उस की कोई साख नहीं है लेकिन देश का हर आमो-ख़ास उसके साथ है . होस्नी मुबारक की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है . आम आदमी को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि आन्दोलन की अगुवाई कौन कर रहा है , वह तो महगाई की सरकार के खिलाफ लामबंद है . हमारे हुक्मरान को भी इस बात पर गौर करना चाहिए कि अगर जनता की पक्षधर पार्टियां सरकार के खिलाफ आन्दोलन में कमज़ोर पायी गयीं तो यहाँ की जनता भी दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ उसके खिलाफ सडकों पर आने में संकोच नहीं करेगी. .

पूरी अरब दुनिया में मंहगाई के खिलाफ जनता मैदान ले रही है . अभी कुछ दिन पहले ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति, ज़ैनुल आबिदीन बेन अली की सरकार को जनता ने ज़मींदोज़ किया है . और अब अरब देश मिस्र का वही हाल होने वाला है . ट्यूनीशिया में भी जनता की बगावत का कारण वही था जो मिस्र सहित बाकी अरब देशों में है . ट्यूनीशिया में जनता सडकों पर महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ अपनी नाराजगी व्यक्त करने आई थी . आन्दोलन पूरी तरह से खाद्य सामग्री की बढ़ी हुई कीमतों और बेरोजगारी के खिलाफ था लेकिन सरकार की शह पर देश के साहूकार वर्ग ने फलों और सब्जियों की कीमत भी बढ़ा दी . समझ लेने की ज़रुरत है कि वहां खेती लगभग पूरी तरह से कारपोरेट सेक्टर के कब्जे में है . जैसे आजकल अपने यहाँ केंद्र सरकार ऐसी नीतियाँ बना रही है जिस से बड़े पूंजीपति घराने खेती पर क़ब्ज़ा कर लें . उसी तरह ट्यूनीशिया में भी आज से करीब १५ साल पहले हुआ था . यानी खाने पीने की चीजोंकी कीमत पर काबू करने के आम आदमी के आन्दोलन ने वह शक्ल अख्तियार कर लिया जिसकी वजह से सरकार को ही जाना पड़ा . मिस्र में भी ट्यूनीशिया की कार्बन कापी जैसा ही आन्दोलन चल रहा है . जानकार बताते हैं कि होस्नी मुबारक की सरकार का बच पाना भी लगभग नामुमकिन है . ट्यूनीशिया और मिस्र की तरह ही अल्जीरिया में भी महंगाई के खिलाफ आन्दोलन शुरू हो रहा है . हालांकि खबर है कि अल्जीयर्स की सरकार ने ब्रेड की कीमतों में भारी कटौती की है . ध्यान रहे कि यह कटौती किसी सूझबूझ की वजह से नहीं ,अपनी सरकार बचाने के लिए की गयी है . इस बीच अरब देश मारीतानिया में भी महंगाई के खिलाफ ज्वालामुखी धधकना शुरू हो गया है . वहां भी कुछ लोगों ने मिस्र,ट्यूनीशिया और अल्जीरिया की तरह आत्मदाह कर लिया है . वहां भी आन्दोलन कभी भी भड़क सकता है . इस बीच खबर है कि मोरक्को, लीबिया और जार्डन के शासकों ने तूफ़ान की आहट को भांप लिया है .और खाने के सामान पर सब्सिडी का भारी प्रावधान किया है . गरीब देशों के अलावा खाने की चीज़ों की महंगाई यूरोप के देशों में भी खतरे की घंटी बज रही है . फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी ने विश्व बैंक से आग्रह किया है कि इस बात की जांच की जाए कि खाने की चीजों में महंगाई का जो मामला है वह क्यों इतना खतरनाक होता जा रहा है .
खाने के सामान की मंहगाई हमेशा से ही सत्ताधारी जमातों के लिए खतरे की घंटी हुआ करती थी लेकिन अब यह तेज़ रफ़्तार से चलती है और सरकारें बदल देती है . ट्यूनीशिया और मिस्र की घटनाएं इसका ताज़ा उदाहरण हैं . साठ के दशक में भी अफ्रीकी देशों में खाद्य दंगे हो चुके हैं लेकिन इस बार की तरह इतनी तेज़ी से फैले नहीं थे . उन दिनों सूचना की आवाजाही की व्यवस्था इतनी ज्यादा नहीं थी . अब जो कुछ भी एक जगह होता है उसे पूरी दुनिया देखती है . जिसकी वजह से जागरूकता बढ़ती है और सरकारें गिरती हैं . ज़ाहिर है कि हमारी सरकार को भी पूंजीपतियों के हित से थोडा सा ध्यान हटाकर जनता की परेशानियों की तरफ नज़र डालनी चाहिए वरना जब जनता झूम के उठेगी तो हुकूमत के तिनके कुछ नहीं कर पायेगें.

हिंदी आजकल फल फूल रही है

सुमेधा वर्मा ओझा


सुमेधा वर्मा ओझा की यह टिप्पणी मेरे फेसबुक पर बीबीसी वाले लेख के बारे में थी. इसे यहाँ भी डाल दे रहा हूँ.

शेष नारायण सिंह जी मैं आपका दुःख समझ नहीं पा रही हूँ और ना ही आपका बीबीसी का गुण गान . यह इस देश के लिए बड़े ही दुर्भाग्य की बात थी और केवल अपनी ग़ुलाम मानसिकता का प्रदर्शन कि आपको एक दुसरे देश की किसी रेडियो सेवा पर इतना भरोसा था . आज बीबीसी की हिंदी या अंग्रेजी या किसी भी भाषा की सेवा की ऐसी कोई मान्यता नहीं है जिसे आप इतने प्यार से याद कर रहे हैं . इन्ही सेवाओं के द्वारा बड़े देश अपने उपनिवेशों में अपनी विचार धारा को फैला कर लोगों पर एक मानसिक पकड़ बनाये रहते थे. हमारे देश के रेडियो अखबार वगैरह उतने ही अच्छे या बुरे हैं जितने की किसी और देश के फिर हमें विदेशी सेवा की मृत्यु पर दुखी होने की क्या ज़रुरत है? हिंदी आपकी दुआ से आजकल फल फूल रही है , उसे बीबीसी की कोई ज़रुरत नहीं है

Friday, January 28, 2011

रोमांस को हर मोड़ पर आवाज़ दी नक्श लायलपुरी के गीतों ने .

शेष नारायण सिंह

गीतकार नक्श लायलपुरी की नज्मों का एक संकलन आया है .'आँगन आँगन बरसे गीत' नाम की यह किताब उर्दू में है.पिछले ५० से भी ज्यादा बरसों से हिन्दी फिल्मों में उर्दू के गीत लिख रहे नक्श लायलपुरी एक अच्छे शायर हैं. कविता को पूरी तरह से समझते हैं लेकन जीवनयापन के लिए फ़िल्मी गीत लिखने का का काम शुरू कर देने के बाद उसी दुनिया के होकर रह गए.रस्मे उल्फत निभाते रहे और हर मोड़ पर सदा देते रहे. उनकी कुछ नज्मों के टुकड़े तो आम बोलचाल में मुहावरों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं .नक्श लायलपुरी ने भारत के बँटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था .१९४७ में वे शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में पैदल दाखिल हुए थे. कुछ दिन रिश्तेदारों के यहाँ जालंधर में रहे लेकिन वहां दाना पानी नहीं लिखा था . उनके पिता जी इंजीनियर थे . लखनऊ में किसी इंजीनियर दोस्त से संपर्क किया तो उसने कहा कि लखनऊ आ जाओ .वहीं ऐशबाग़ में एक सरकारी प्लाट मिल गया . सड़क की तरफ तो कारखाना बना लिया गया और पीछे की तरफ रहने का इंतज़ाम कर लिया गया . इसी लखनऊ शहर से भाग कर नक्श लायलपुरी मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने आये थे . हालांकि उन्होंने अपना पहला फ़िल्मी गाना निर्माता जगदीश सेठी की फिल्म के लिए १९५१ में लिखा था लेकिन वह फिल्म रिलीज़ नहीं हुई .१९५२ में दूसरी फिल जग्गू के लिए गाने लिखे जो पसंद किये गए. उन्हें गीतकार के रूप में पहचान फिल्म 'तेरी तलाश में ' नाम की फिल्म से मिली. इस फिल्म में आशा भोंसले ने उनके गीत गाये थे. एक बार नाम हो गया तो काम मिलने लगा और गाडी चल पड़ी. उर्दू के जानकार नक्श लायलपुरी को खुशी है कि उनको ऐसे संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला जो उर्दू ज़बान को जानते थे .ऐसे संगीतकारों में वे नौशाद का नाम बहुत इज्ज़त से लेते हैं . नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रूप में उन्हें बुलंदी बी आर इशारा की फिल्म 'चेतना ' से मिली और उसमें उनकी नज़्म 'मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा ' बहुत ही सराही गयी . जिन लोगों ने रेहाना सुलतान की चेतना और दस्तक देखी है उन्हें मालूम है कि बेहतरीन अदाकारी किसी कहते हैं . रेहाना सुलतान की परंपरा को ही स्मिता पाटिल ने आगे बढ़ाया था . नक्श लायलपुरी के फ़िल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही लेकिन आजकल वह बात नहीं है . फिल्म संगीत की दिशा में बहुत सारे प्रयोग हो रहे हैं और नए नए लोग सामने आ रहे हैं . लेकिन वे आज भी टेलीविज़न सीरियलों के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं.

हिन्दी फिल्मों के इस शायर की यात्रा बहुत ही मुश्किल थी. सबसे बड़ी मुसीबत तो तब आई जब उन्होंने अपने बचपन में सआदत हसन मंटो की किसी कहानी में पढ़ा कि जब पंजाबी इंसान उर्दू बोलता है तो लगता है कि कोई झूठ बोल रहा है . शायद मंटो साहेब ने उच्चारण के तरीके अलग होने की वजह से यह बात कही हो .नक्श लायलपुरी पंजाबी हैं और उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वे उर्दू ही बोलेगें ,झूठ कभी नहीं बोलेगें. .उर्दू पढने और बोलने में उन्होंने मेहनत की और उर्दू के नामवर शायर बन गए. मुंबई में उनके संघर्ष का शुरुआती दौर भी मामूली नहीं है . घर से भाग कर मुंबई आये थे और जब कल्याण स्टेशन पर उतरे तो जेब में एक चवन्नी बची थी . उन दिनों कोयले के इंजन से चलने वाली गाड़ियां होती थीं .लखनऊ से दिल्ली तक की तीन दिन की यात्रा में कपडे एकदम काले हो गए थे . दिमाग में कहीं से यह बैठा था कि जब किसी शहर में रोज़गार की तलाश में जाओ तो खाली पेट नहीं जाना चाहिए, भूख भी लगी थी ,दिन के १२ बजे थे, उन दिनों कल्याण स्टेशन के प्लेटफार्म पर छत नहीं थी . चार आने की पूरियां खरीद लीं और ज्यों ही पहला निवाला मुंह में डालने के लिए उठाया कि हाथ का दोना चील झपट कर ले गयी. भूखे ही शहर में दाखिल हुए . दादर स्टेशन के पास खस्ता हाल टहल रहे थे कि सामने से एक बुज़ुर्ग सरदार जी आते नज़र आये . उनसे पूछ लिया कि यहाँ को धर्मशाला है क्या ? उन्हीं कोयले से सने कपड़ों और भूखे नौजवान को देख कर शायद उन्हें तरस आ गयी और उन्होंने माटुंगा के गुरुद्वारे का पता बता दिया . लेकिन वहां सिर्फ आठ दिन रह सकते थे . वहीं एक सिख नौजवान था जब उस को पता लगा कि यह खस्ता हाल इंसान शायर है तो वह प्रभावित हुआ और उसने साबुन और लुंगी दी और कहा कि अपने कपडे तो धो लो . जाते वक्त उसने बीस रूपये भी दिए . मना करने पर उसने कहा कि जब हो जाएँ तो वापस दे देना. वह क़र्ज़ आज तक बाकी है . किस्मत ने पल्टा खाया और सडक पर लाहौर के पुराने परिचत दीपक आशा मिल गए. वे एक्टर थे और अब मुंबई में ही रह रहे थे. अपने घर ले गए और फिर किसी शरणार्थी कैम्प में रहने का इंतज़ाम करवा दिया . उसके बाद अपना यह शायर मानवीय संवेदनाओं को गीतों एक माध्यम से सिनेमा के दर्शकों तक पंहुचाता रहा . आज बुज़ुर्ग हैं लेकिन शान से अपना बुढापा बिता रहे हैं . आज भी उनके छाने वालों का एक वर्ग उन्हें मिलता जुलता रहता है

Thursday, January 27, 2011

अब कोई नहीं कहेगा कि यह बीबीसी लन्दन है

शेष नारायण सिंह



ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन के कई सेक्शन बंद किये जा रहे हैं . दुर्भाग्य की बात यह है कि हिन्दी सर्विस में भी बंदी का ऐलान कर दिया गया है.इसका मतलब यह हुआ कि बीबीसी रेडियो की हिंदी सर्विस को मार्च के अंत में बंद कर दिया जाएगा. बीबीसी की हिन्दी सेवा का बंद होना केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं है . यह संस्कृति को प्रभावित करने वाला इतिहास का ऐसा मुकाम है जिसकी धमक बहुत दिनों तक महसूस की जायेगी. हालांकि इस बात में भी दो राय नहीं है कि बीबीसी की हिंदी सर्विस ने अपना वह मुकाम खो दिया है जो उसको पहले हासिल था.. पहले के दौर में बीबीसी की ख़बरों का भारत में बहुत सम्मान किया जाता था .१९७५ में जब इमरजेंसी लगी और भारत की आकाशवाणी और दूरदर्शन इंदिरा सरकार की ढपली बजाने लगे तो जो कुछ भी सही खबरें इस देश के आम आदमी के पास पंहुचीं वे सब बीबीसी की कृपा से ही पंहुचती थीं . इसके अलावा भी देश के हिन्दी भाषी इलाकों में रेडियों के श्रोताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बीबीसी रेडियो पर हिन्दी खबरें सुनना एक ज़रूरी काम की तरह है . उत्तर प्रदेश और बिहार में पढ़े लिखे लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए कोई भी सूचना खबर नहीं बनती जब तक कि उसे बीबीसी पर न सुन लिया जाए. इस तरह की संस्था का बंद होना निश्चित रूप से इस देश के लिए दुःख की बात है . पता चला है कि बीबीसी हिन्दी की वेब खबरों का सिलसिला जारी रहेगा . लेकिन अभी वेब का नाम उतना नहीं है कि वह लोगों की आदात में शुमार हो सके.अपने देश में बीबीसी की विश्वसनीयता बहुत ज्यादा थी. . हालांकि बाद के दिनों में यह थोड़ी कम हो गयी थी लेकिन पत्रकारिता के सर्वोच्च मानदंडों का वहां हमेशा ख्याल रखा जाता था .मैंने अपने बचपन में देखा था कि जब दो लोग बहस कर रहे हों और बात सहमति पर न पंहुच रही हो तो कोई एक पक्ष बीबीसी का नाम लेकर बहस को समाप्त कर देता था . अगर आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं और मैं कह दूं कि मैंने यह बात बीबीसी पर सुनी है तो अगले की हिम्मत नहीं पड़ती थी को बहस को आगे बढाए. पहले के ज़माने में चुनाव पूर्व सर्वे या एक्सिट पोल नहीं होते थे . ज़्यादातर अखबार अपने आकलन देते थे और बीबीसी ने अगर कभी कोई आकलन दे दिया तो उस पर सबको विश्वास हो जाता था. बीबीसी का इस्तेमाल आर एस एस ने भी खूब किया . १९९१ में जब मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए जुटी भीड़ पर गोलियां चलवा दी थीं तो आर एस एस के प्रिय अखबारों ने खबर दी कि अयोध्या में सरजू नदी में इतना खून बह गया था कि वह लाल हो गयी थी तो उन खबरों का तब तक विश्वास नहीं किया गया जब तक कि उन खबरों एक साथ साथ यह अफवाह फैलाने वालों क नहीं लगाया गया .भाइयों ने अफवाह फैला दी कि यह खबर बीबीसी पर सुनी गयी थी. पूरा देश तो बीबीसी सुनता नहीं लेकिन बीबीसी के नाम पर इस देश का आम आदमी झूठ पर भी विश्वास कर लेता था. नेताओंने कई बार देश में दंगे फैलाने के लिए बीबीसी का इस्तेमाल किया है . अफवाह फैला दी जाती थी कि फलां खबर बीबीसी पर सुनी है बस फिर क्या था. उस खबर को सच मान कर प्रतिक्रिया होती थी और कई बार तो दंगे भी शुरू हो जाते थे. इंदिरा गाँधी की मौत की खबर सबसे पहेल बीबीसी ने ही दी थी और उसके बाद जो सिखों का क़त्ले आम कांग्रेस के दिल्ली वाले नेताओं ने करवाया उसमें भी बीबीसी का इस्तेमाल किया गया . हुआ यह कि दुष्टों ने प्रचार करवा दिया कि बीबीसी में खबर आई है कि कुछ इलाकों में सिखों ने इंदिरा गाँधी के क़त्ल के बाद मिठाई बांटी . ऐसा बीबीसी ने कभी नहीं कहा था लेकिन उस पर लोगों का भरोसा इतना था कि बात फैल गयी. यहाँ इन बातों को बताने का उद्देश्य केवल इतना है कि कि बीबीसी इस देश में हमेशा ही एक भरोसेमंद संवाद का सोर्स रहा है और अब उसके बंद हो जाने पर ग्रामीण भारत में खबरें सुनने और विश्वास करने का फैशन बदल जाएगा. एक व्यक्तिगत अनुभव भी है.. मेरी आवाज़ बीबीसी के सुबह के प्रोग्राम में कई साल तक सुनी जाती रही थी . कई बार ऐसा हुआ कि जब भी मैंने किसी ट्रेन में या किसी पूछताछ दफ्तर में बात की तो लोगों ने आवाज़ पहचान ली और सम्मान दिया . यह मेरा निजी सम्मान नहीं होता था . यह बीबीसी की विश्वसनीयता पर आम आदमी के भरोसे की मुहर लगती थी. अब वह सब नहीं होगा . अप्रैल के बाद से बीबीसी की हिन्दी सर्विस इतिहास के कोख में जा छुपेगी . हालांकि बीबीसी के एफ एम रेडियो पर हिन्दी बोली तो जायेगी लेकिन बीबीसी हिन्दी के खबरें अब इस देश के हिन्दी जानने वाले के लिए सपना हो जायेगीं. ,इतिहास हो जायेगीं

Monday, January 24, 2011

आर एस एस ने १९४८ में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था.

शेष नारायण सिंह

श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की बीजेपी की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है . बीजेपी की अगुवाई वाले एन डी ए के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं ,अब बिहार के मुख्य मंत्री और बीजेपी के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है . शरद यादव ने तो साफ़ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमज़ोर करने के लिए की जा रही बीजेपी की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं . नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फ़ौरन रोक दे .सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्यवर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना बीजेपी की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है , वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है . . बीजेपी की मालिक आर एस एस के मुख्यालय पर २००३ तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था. वो तो जब २००४ में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ साथ उमा भारती को नागपुर के आर एस एस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए .,तब जाकर आर एस एस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया . २००४ के विवाद के दौरान भी उतनी ही हडकंप मची थी जितनी आज मची हुई है लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें इतनी विकसित नहीं थी इसलिए बीजेपी की धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी कि आजकल हो रही है . तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे जा रहे हैं. अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आर एस एस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें . रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से क्यों चिढी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था. जब उमा भारती ने २००४ हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान् इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार ,हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था .उन्होंने सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है . खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ पार्टी , आर एस एस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था .१९३० और १९४० के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आर एस एस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया , आर एस एस वालों ने कभी उसे सल्यूट तक नहीं किया .आर एस एस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया .३० जनवरी १९४८ को जब महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि आर एस एस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे . यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं .आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आर एस एस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी . उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे . २४ फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीडा को व्यक्त किया था . उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आर एस एस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं .. उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं

यह तिरंगा हमारी आज़ादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है जबकि आर एस एस वालों ने आज़ादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था. तिरंगे की अवधारना पूरी तरह से कांग्रेस की देन है . तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी १९१८ और १९२१ के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे . महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए . गाँधी जी की बात को ध्यान में रहकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा . महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया .उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा. अगस्त १९३१ में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया . वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था . उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी . उसके बाद सफ़ेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया . चरखा बीच में सफ़ेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया . महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है .

आज़ादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया . संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक़्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है लेकिन अब देश सब का है . उन लोगों का भी जो आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे . इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया . जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ . बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है . इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं है . लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया . इस तिरंगे की यात्रा में बीजेपी या उसकी मालिक आर एस एस का कोई योगदान नहीं है लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नज़र आ रही है . अजीब बात यह है कि कांग्रेसी अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं . अगर वे अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो बीजेपी और आर एस एस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है .