Saturday, July 25, 2009

शेखचिल्ली के वारिस

अगर शेखचिल्ली जिंदा होते तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना गुरू मान लेते। सोनिया गांधी गुजरात के चुनावी दौरे पर जाने वाली हैं और नरेंद्र मोदी ने उन्हें चेतावनी दी है कि गुजरात संभलकर आएं। गोया गुजरात मोदी साहब की जागीर है और अगर कोई वहां जाता है तो उसे मोदी से अनुमति लेनी होगी।

पहले वास्तविकता पर गौर कर लेना चाहिए। नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं और जिस सोनिया गांधी के लिए कठोर शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, उनके खिलाफ मोदी की पार्टी पिछले दस वर्षों से नफरत की राजनीति कर रही है। जिस प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के राष्टï्रीय नेता, लालकृष्ण आडवाणी गली-गली घूम रहे हैं, उसी प्रधानमंत्री पद को सोनिया गांधी ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। 2004 के चुनावों में बीजेपी और उसके साथ सत्ता का सुख भोग रही पार्टियों ने सारी ताकत झोंक दी थी लेकिन सोनिया गांधी की पार्टी ने केन्द्र में सरकार बना ली थी। यह साफ कर देना जरूरी है कि सोनिया गांधी या उनकी पार्टी दूध के धुले नहीं हैं। पंजाब, असम और तमिलनाडु में आतंकवाद को बढ़ावा देने में उनकी पार्टी और उनके परिवार का योगदान कम नहीं है।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के समय, केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार थी, प्रधानमंत्री पद पर कांग्रेस का कब्ज़ा था, लेकिन उत्तरप्रदेश के उस वक्त के भाजपाई मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट को अंधेरे में रखकर बाबरी मसजिद ढहा दी। देश में भ्रष्टाचार की जो परंपरा है उसमें कांग्रेसी नेता भी भाजपा के नेताओं से कम नहीं है। इस सबके बावजूद भी राजनीतिक रूप से मोदी की वह औकात नहीं है कि वह सोनिया गांधी को धमकाएं। मोदी और उनकी पार्टी के ऊपर दंगों को भड़काने वाली पार्टी होने का आरोप लगता रहा है। देश में 1927 के नागपुर दंगे के बाद हुए ज्यादातर दंगों में आरएसएस के लोग शामिल रहे हैं। गुजरात में 2002 में जो कारनामा मोदी ने किया, उसकी वजह से दुनिया भर के सामने भारत का सिर नीचा हो गया और जब मोदी पर बड़बोलेपन का दौरा पड़ता है तो वह सब कुछ भूल जाते हैं।

जिस विकास की बात मोदी कर रहे है वह गुजरात में हमेशा से ही रहा है। गुजरात के नेताओं हितेंद्र देसाई और मोरारजी देसाई के समय में गुजरात में जो विकास हुआ था, मोदी का विकास उसके सामने कुछ नहीं है। लेकिन सोनिया गांधी को दी गई नरेंद्र मोदी की धमकी को गंभीरता से लेने की जरूरत है। सोनिया की प्रस्तावित यात्रा के नतीजों से मोदी डर गए हैं और आशंका यह है कि वे सोनिया गांधी की सभा में अपने कुछ लोगों को भेजकर सवाल पूछने के बहाने उत्पात करने को कह सकते है। इसलिए कांग्रेस, सोनिया गांधी और केंद्र सरकार को चौकन्ना रहने की जरूरत है। मोदी एक बहुत ही शातिर दिमाग के मालिक हैं और वह कोई भी शरारत करवा सकते है।

बटला हाउस चुनावी नहीं इंसानी मुद्दा

जामिया मिल्लिया इसलामिया के करीब बटला हाउस का इलाका पिछले साल चर्चा में आ गया जब दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि वहां एक घर में छुपे हुए आतंकवादियों को पुलिस ने घेर लिया, दो लडक़ों को मार गिराया और बाकी भाग निकले। इस कथित मुठभेड़ में पुलिस का एक इंस्पेक्टर भी मारा गया। परिस्थितियां ऐसी थीं कि पुलिस की बात पर सहसा विश्वास नहीं हुआ। मारे गए लडक़े उत्तरप्रदेश के आज़म गढ़ जिले के थे और उनके रिश्तेदारों के अनुसार वे दिल्ली में पढ़ाई करने आए थे।
हर मुसलमान को आतंकवादी करार देने के लिए व्याकुल बीजेपी इस कांड को मुद्दा बनाने में जुट गई और दिल्ली पुलिस के उस इंस्पेक्टर को हिंदुत्व का हीरो बनाने की कोशिश शुरू कर दी जिसे बीजेपी का कोई नेता जानता तक नहीं था। बीजेपी की इस कोशिश को लगाम तब लगी जब इंस्पेक्टर के परिवार वालों ने बी जे पी इन कोशिशों को $गलत बताया लेकिन राजनीति चलती रही। आज़मगढ़ के मूल निवासी और समाजवादी पार्टी के महासचिव, अमर सिंह ने भी रुचि लेना शुरू कर दिया। जब बटला हाउस गए तो लोगों ने उनसे जो बताया उससे वे चिंतित हुए। दूध का दूध और पानी का पानी कर देने की गरज़ से घटना की न्यायिक जांच की मांग कर दी।

उन्होंने यह भी कहा कि यह इसलिए ज़रूरी है कि ओखला, आज़मगढ़ और पूरे देश के अल्प संख्यकों में यह भरोसा पैदा करना ज़रूरी है कि उनके साथ न्याय हो रहा है। सारी दुनिया के संघी, अमर सिंह पर टूट पड़े और उनको बिलकुल घेर लिया। हिन्दुओं के दुश्मन के रूप में पेश करने की कोशिश की और एक पुलिस ज्यादती की घटना को हिंदू बनाम मुसलमान रंग देने की कोशिश की। अमर सिंह ने सफाई दी कि वह बटला हाउस के इनकांउन्टर को अभी फर्जी नहीं बता रहे हैं। लेकिन उस वारदात की वजह से अल्पसंख्यकों में जो असुरक्षा का भाव आया है, उसे कम करने की कोशिश की जानी चाहिए। अमर सिंह ने साफ किया कि बीजेपी के नेताओं के आरोप बेबुनियाद है कि वे वोट बैंक राजनीतिक कर रहे हैं।

उनका कहना था कि आज़मगढ़ के दो नौजवानों और पुलिस के एक अफसर की हत्या के बारे में पुलिस द्वारा दी जा रही कहानी किसी के गले के नीचे नहीं उतर रही है और न्याय का तकाजा है कि इस मामले की न्यायिक जांच की जाय। इसके बाद हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में अमर सिंह ने अपने इस रुख पर वोट लेने की कोशिश नहीं की ओर साफ कर दिया कि बटला हाउस मामले पर उनका रुख इंसानी फर्ज था, वोट बैंक राजनीति नहीं। संघी राजनीति में किसी भी मुद्दे को तब तक जिंदा रखा जाता है जब तक उसमें जान रहे। दिल्ली के सत्ता के गलियारों और मीडिया के दफ्तरों में आजकल बटला हाउस के हत्याकांड को हलका करने की कोशिश चल रही है। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा प्रेमी पत्रकार एकजुट हैं।

एक बड़े अखबार में ख़बर छप गई है कि जामिया नगर और ओखला के इला$के में रहने वाले मुसलमानों के लिए बटला हाउस कोई मुद्दा नहीं है, उन्हें तो बिजली, सडक़ पानी के मुद्दो को ध्यान में रखकर वोट देना है। इस तरह का रुख मानवीय संवेदनाओं के साथ छिछोरापन है और इस पर रोक लगनी चाहिए। निर्दोष मुसलमानों को मारकर बिजली, सडक़ और पानी की रिश्वत देने की कोशिश हर स्तर पर विरोध होना चाहिए।

प्रधानमंत्री कौन? मोदी या आडवाणी

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी बहुत बुरे फंस गये हैं। पिछले पांच साल से मनमोहन सिंह को कमजोर और अपने को बहुत भारी सूरमा बताने वाले प्रधानमंत्री इन वेटिंग बेचारे अपनों की नजर में ही गिर गए हैं। कांग्रेस और मनमोहन सिंह पर अपनी कल्पना शक्ति की ताकत के आधार पर तरह-तरह के आरोपों से विभूषित कर रहे, आडवाणी पर पिछले एक महीने से कांग्रेस ने हमले तेज कर दिए।

कांग्रेसी हमलों की खासियत यह थी, कि वह सचाई पर आधारित थे। कंदहार में आडवाणी की पार्टी की सरकार का शर्मनाक कारनामा, संसद पर हुआ आतंकी हमला और लाल किले पर हुए हमले पर जब कांग्रेसी नेताओं ने विस्तार से चर्चा करनी शुरू की तो आडवाणी और उनकी पार्टी के सामने बगलें झांकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। मीडिया में नौकरी करने वाले संघ के कार्यकर्ताओं तक के लिए मुश्किल पैदा हो गयी कि आडवाणी जैसे कमजोर आदमी का पक्ष कैसे लिया जाय। मजबूत नेता के रूप में आडवाणी की पेश करने के चक्कर में जो अरबों रूपए विज्ञापनों पर खर्च किये गए हैं उस पर पानी फिर गया।

सचाई यह है कि कांग्रेसी हमलों को मीडिया ने जिस तरह की कवरेज दी, उससे आडवाणी का व्यक्ति एक बहुत ही कमजोर आदमी के रूप में उभर कर आई। और उनको फोकस में रखकर चुनाव अभियान चलाने की बीजेपी कोशिश ज़मींदोज़ हो गई। इस सचाई का इमकान होने के बाद बीजेपी के चुनाव प्रबंधकों में हडक़ंप मच गया। बीजेपी के प्रचार की कमान का संचालन कर रहे तथाकथित वार रूम की ओर से काफी सोच विचार के बाद नया शिगूफा डिजाइन किया गया और मोदी के नाम को आगे करने की कवायद शुरू हो गई।

काफी सोच विचार के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आगे बढ़ाया गया। हालांकि उसके साथ यह भी कहा जा रहा है कि आडवाणी के बाद मोदी प्रधानमंत्री के पद के उम्मीदवार होंगे। बीजेपी के अधिकारिक प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने दिल्ली में पत्रकारों को बताया कि मोदी में प्रधानमंत्री पद बनने के सारे गुण हैं और आडवाणी के बाद पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री बनाने पर विचार कर सकती है। यहां यह बात अपने आप में हास्यास्पद है कि जिस पार्टी का जनाधार लगातार गिर रहा है और जिसे 16 मई के दिन 100 की संख्या पार करना पहाड़ हो जायेगा, वह प्रधानमंत्री पद पर आडवाणी को बैठाने के बाद मोदी को लादने की योजना बना रही है।

अजीब बात यह है कि चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री पद के अगले दावेदार की चर्चा क्यों शुरू कर दी गई। इस बात पर गौर करने पर बीजेपी की उस मानसिकता के बारे में जानकारी मिल जायेगी, जिसे हारे हुए इंसान की मानसिकता के नाम से जाना जाता है। दो दौर के चुनावों के बाद जो संकेत आ रहे हैं, उससे अंदाज लग गया है कि बीजेपी की सीटें घट रही हैं। एक हताश सेना की तरह बीजेपी ने लड़ाई के दौरान सिपहसालार बदलने की कोशिश की है। बाकी कोई मुद्दा तो चला नहीं, मंहगाई, आतंकवाद जैसे मुद्दों को चलने की कोशिश तो बीजेपी ने की लेकिन इन दोनों के घेरे में वे ही फंस गए।

मालेगांव के आतंकवादी हमले के लिए बीजेपी के ही सदस्य पकड़ लिए गए। आतंकवाद से लडऩे की बीजेपी की क्षमता की भी धज्जियां उड़ गईं जब कंदहार का अपमान, संसद का हमला और लाल किले का हमला सीधे-सीधे आडवाणी के गले की माला बन गया। बीजेपी मैनेजमेंट ने आडवाणी से जान छुड़ाना ही बेहतर समझा और मोदी को आगे कर दिया। रणनीति में इस बदलाव का सीधा असर लालकृष्ण आडवाणी पर भी पड़ा और वे पिछले दो दिनों से कहते पाए जा रहे हैं कि इस चुनाव के बाद सन्यास ले लूंगा।

भारत का मित्र नहीं अमेरिका

इस सूचना से उत्साहित होने से बचा जाना चाहिए कि लंदन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने वाली बातचीत हुई। नि:संदेह भारत-अमेरिका के संबंध दिन-प्रतिदिन और प्रगाढ़ होने के प्रबल आसार हैं, क्योंकि दोनों स्वाभाविक मित्र हैं तथा दोनों को एक-दूसरे के सहयोग की आवश्यकता है, लेकिन पाकिस्तान में पोषित हो रहे आतंकवाद के संदर्भ में अमेरिकी प्रशासन ने जैसा रवैया अपना रखा है वह भारतीय हितों के अनुकूल नहीं है।

भले ही मनमोहन सिंह और बराक ओबामा की मुलाकात को इस रूप में रेखांकित किया जा रहा हो कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के मामले में भारत एवं अमेरिका एकजुट हैं, लेकिन इस शाब्दिक एकजुटता से पाकिस्तान की सेहत पर कोई असर पडऩे वाला नहीं है। इसका ताजा प्रमाण पाकिस्तान का यह बयान है कि वह रुकी पड़ी शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए कोई शर्त स्वीकार नहीं करेगा।

यह बयान मनमोहन सिंह के इस कथन के जवाब में आया है कि संवाद शुरू करने के लिए पहले पाकिस्तान मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को दंडित करने का काम करे। स्पष्ट है कि भारत यह मानकर संतुष्ट नहीं हो सकता कि अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है, क्योंकि पाकिस्तानी शासक एक बार फिर दुष्प्रचार का सहारा लेकर यह साबित करने की कोशिश में हैं कि भारत उनसे बातचीत करने के मामले में उन पर शर्ते थोप रहा है।

इससे भी अधिक चिंताजनक बराक ओबामा का यह सुझाव है कि जब दोनों देशों की सबसे बड़ी शत्रु गरीबी है तब भारत-पाकिस्तान के बीच प्रभावशाली संवाद आवश्यक है। क्या ऐसे किसी सुझाव का तब कोई मतलब हो सकता है जब पाकिस्तान उन तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में नित-नए बहाने बना रहा हो जो भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं? यह सही समय है जब भारत इस अमेरिकी रट के खिलाफ दृढ़ता का परिचय दे कि उसे पाकिस्तान से बातचीत करनी चाहिए, क्योंकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बराक ओबामा के बयान के बाद पाकिस्तान इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि अमेरिकी प्रशासन तो उसका पक्ष ले रहा है।

भारत इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकता कि ओबामा प्रशासन पाकिस्तान में बेकाबू हो रहे आतंकवाद के संदर्भ में लगभग उसी नीति पर चल रहा है जिस पर बुश प्रशासन चल रहा था। मौजूदा अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान और अफगानिस्तान में कथित उदार आतंकियों की भी तलाश कर रहा है। इसके अतिरिक्त वह यह मानकर भी चल रहा है कि पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देकर वहां पनप रहे आतंकवाद को आसानी से समाप्त किया जा सकता है।

नि:संदेह पाकिस्तान को आर्थिक मदद की जरूरत है, लेकिन तभी जब वह उसका उपयोग आतंकी संगठनों से लडऩे में करे। अमेरिका का कुछ भी मानना हो, लेकिन पाकिस्तान के मौजूदा सत्ता तंत्र की एक मात्र कोशिश आतंकी संगठनों की गतिविधियों पर पर्दा डालने की है। इसके लिए वह विश्व समुदाय की आंखों में धूल झोंक रहा है, लेकिन अमेरिका असलियत समझने से इनकार कर रहा है।

आडवाणी की हिमाक़त

भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री पद की उम्मीद में बैठे लाल कृष्ण आडवाणी ने वरुण गांधी की तुलना जय प्रकाश नारायण से की है उनके इस बयान पर उन लोगों ने काफी नाराजगी जाहिर की है जिन्होंने इमरजेंसी के उन्नीस महीनों में उस वक्त की कांग्रेसी हुकूमत के हाथों भयानक तकलीफें उठाई हैं।

आडवाणी के इस बयान के बाद उन बातों पर फिर यकीन होने लगा है जिनमें बताया जाता है कि भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के सपने सजाने वाले व्यक्ति की याददाश्त में कुछ दिक्कतें पेश आने लगी हैं। क्योंकि संजय गांधी के बेटे को संपूर्ण क्रांति के नायक जय प्रकाश नारायण के बराबर खड़ा करने वाले व्यक्ति की समझदारी पर सवाल उठना लाजमी है।

लाल कृष्ण आडवाणी ने वरुण गांधी की गिरफ्तारी पर दिए गए अपने बयान में कहा कि इस गिरफ्तारी से उनको इमरजेंसी की याद आ गई। वे शायद यह भूल गए या जान बूझकर भूल गए कि इमरजेंसी के सबसे बड़े खलनायक इन्ही वरुण गांधी के पिता स्व. संजय गांधी ही थे। उस वक्त की राजनीति को समझने वाला कोई भी व्यक्ति बता देगा कि इमरजेंसी के सारे अत्याचार संजय गांधी ने ही करवाएथे दिल्ली के तुर्कमान गेट पर जो गोलियां चली थीं, उसका आदेश संजय गांधी के ही चहेते पुलिस अफसर भिंडर ने दिया था और तुर्कमान गेट इलाके में जो लाखों लोग बेघर हुए थे वह भी संजय गांधी की राजनीति का ही नतीजा था।

उस वक्त के डीडीए के सेर्वसर्वा जगमोहन ने अपनी निगरानी में तुर्कमान गेट पर तबाही मचाई थी। उस अभियान में लाखों लोगों के घर तबाह हो गए थे और इनके घर ढहाए गए थे, उनमें से ज्यादातर मुसलमान थे। संजय गांधी के ही इशारों पर ही पूरे हिंदुस्तान में नसबंदी का जगरदस्त अभियान चलाया गया था। उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम बुहत इलाकों में संजय गांधी का आतंक आज तक लोग नहीं भूले हैं। यह भी इत्तफाक ही है कि इमरजेंसी के सबसे खुंखार व्यक्ति का परिवार आज भाजपा में है।

संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी ने इमरजेंसी में मनमानेपन की कई मिसाले कायम की थीं। दिल्ली में संजय गांधी के आतंक को अमली जामा देने का काम उस वक्त के डीडीए के उपाध्यक्ष जगमोहन ने किया था। आज कल वह भी भाजपा की सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इमरजेंसी और उसके बाद के समकालीन इतिहास के जानकार यह भी बता सकेंगे कि इमरजेंसी खत्म होने के बाद जब जनता पार्टी का राज आया तो आर.एस.एस. के नेता लोग संजय गांधी को अपनाने की फिराक में थे जब 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार दूबारा बनी तो कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति शुरू की थी।

जानकार मानते है कि यह काम भी आरएसएस की प्ररेणा से ही शुरू हुआ था। गरज़ यह है कि अपने आखरी दिनों में संजय गांधी का आरएसएस की तरफ झुकाव बिल्कुल साफ हो गया था। एक दुर्भाग्य पूर्ण दुर्घटना में संजय गांधी को मृत्यु हो गई। बहरहाल उनके बाद उनकी पत्नी और बेटे ने आक्रमण हिंदुत्व का झंडा बुलंद कर रखा है। इस तर्क से इतना तो साफ है। कि आडवाणी और नागपुर में बैठे हुए उनके नेताओं को संजय गांधी के परिवार में बहुत अच्छाइयां दिखती है।

लेकिन जब संपूर्ण क्रांति के नायक जय प्रकारश नारायण से वरुण गांधी जैसे खूंखार हिंदुवादी नेता की तुलना की जाती है तो इमरजेंसी में मुसीबतें झेल चुके लोगों को लगता है कि कोई घाव पर नमक मल रहा है प्रधानमंत्री पद का सपना संजो कर बैठे व्यक्ति को देश के नागरिक एक बड़े वर्ग के पुराने घावों पर नमक नहीं मलना चाहिए।

आने वाले वक़्त की परेशानी

राज्य में उच्च शिक्षा पर अनिश्चितता हावी होती जा रही है। सरकार हालात से वाकिफ होने के बावजूद इस मामले में लापरवाही बरत रही है। इससे छात्र-छात्राओं के भविष्य पर सवालिया निशान लग रहा है। राजधानी दून समेत राज्य के बड़े हिस्से में उच्च, व्यावसायिक व रोजगारपरक शिक्षा से जुड़े निजी, सरकारी व सहायताप्राप्त अशासकीय शिक्षण संस्थाएं नए संकट से जूझ रही हैं।

इसकी वजह गढ़वाल विवि के केंद्रीय विवि बनने के बाद उससे जुड़े करीब पौने दो सौ से ज्यादा शिक्षण संस्थाओं को अगले सत्र में संबद्धता के मामले में स्थिति का खुलासा नहीं होना है। विवि प्रशासन ने तमाम संस्थानों को पत्र जारी कर अगले सत्र में प्रवेश रोकने को कहा है।

इस मुद्दे पर नीति निर्धारण नहीं किया गया है। विवि प्रशासन जानता है कि शिक्षण संस्थाओं ने मौजूदा रवैया अगले सत्र में जारी रखा तो उसके समक्ष भी परेशानी खड़ी हो सकती है। केंद्रीय विवि को स्तरीय उच्च शिक्षण संस्थान के तौर पर देखा जाता है। यह माना भी जा रहा है कि गढ़वाल विवि की कार्यप्रणाली में अब बदलाव आएगा।

हालांकि, केंद्रीय विवि की घोषणा के बाद ही उसके एक्ट में इस सत्र में तमाम संस्थानों की संबद्धता जारी रखी गई है पर भविष्य में बड़ी तादाद में इन संस्थानों को विवि अपने साथ रखेगा, ऐसी उम्मीद कम ही है। शासन के आला अफसरों और उच्च शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाल रहे मुख्यमंत्री का इन हालात से परिचित होना लाजिमी है।

इसके बावजूद समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाने से हालत और बिगडऩे के आसार हैं। यही नहीं, गुणवत्ता को विवि अब ज्यादा देर तक नजरअंदाज नहीं कर सकेगा, यह पैरामेडिकल शिक्षण संस्थानों के मामले में अपनाए गए रवैये से भी साफ हो गया है।

मानकों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों के प्रवेश फार्म आखिरी तारीख बीतने के बाद भी स्वीकार नहीं किए गए हैं। चुनाव के मौके पर नीतिगत फैसले नहीं लेने की बाध्यता सरकार भले ही महसूस करे पर सैकड़ों छात्र-छात्राओं को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आना लाजिमी है।

स्वाइन फलू और मीडिया की भूमिका

एक बहुत ही खतरनाक बीमारी इंसानियत के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है। दक्षिण अमरीका के देश मेक्सिको से चली यह बीमारी पूरी दुनिया के सामने चुनौती बनी हुई है। सुअर इंफलुएंजा या के नाम से इस बीमारी की पहचान की गई है और बताया गया है कि इसके वायरस हवा में फैल जाते हैं और किसी भी इंसान को पकड़ लेते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वाइन फलू के बारे में पूरी दुनिया की सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को चेताया है कि इस बीमारी को रोकने की हर संभव कोशिश की जाय। स्वाइन फलू का वायरस एक बहुत ही जटिल किस्म का वायरस है, इसमें साधारण फलू और सुअर के शरीर में मौजूद विषाणु के आपसी रिएक्शन से बना हुआ वायरस होता है जो बहुत ही खतरनाक होता है।

अभी तक इसके इलाज के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है और इस बीमारी के लग जाने की संभावना बहुत ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी की गई चेतावनी पांचवें स्तर की है। $गौरतलब है कि भयानक महामारी की चेतावनी छठवें स्तर पर दी आती है। यानी स्वाइन फलू एक भयानक महामारी का रूप ले सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की महानिदेशक मारगे्रट चान ने बताया कि हर नई बीमारी की तरह इस के बारे में भी समझदारी का अभाव है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास केवल 35 लाख खुराक दवा है, यानी हालात बहुत ही चिंता जनक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पांचवें स्तर की चेतावनी देकर दुनिया भर की सरकारों और दवा कंपनियों को युद्घ स्तर पर सक्रिय होने का निर्देश दे दिया है।

स्वाइन फलू के इलाज और कंट्रोल की फौरन व्यवस्था की जानी चाहिय। सचाई यह है कि यह बीमारी एड्स से भी ज्यादा ख़तरनाक है। अभी तक यह भी एड्स की तरह लाइलाज है। एड्स के केस में कम से कम सावधानी बरते जाने का विकल्प है क्योंकि उसका वायरस शारीरीक संपर्क या खून से फैलता है जबकि स्वाइन फलू वायरस हवा के रास्ते इंसानों को बीमार कर सकता है। एच 1 एन 1 वायरस इस बीमारी का वाहक है, के कंट्रोल के तरी$के मिलने क पहले खतरा बना रहेगा। मेक्सिको से शुरू हुई यह बीमारी बा$की दुनिया में फैलनी शुरू हो चुकी है।

अमरीका में भी कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है यानी वायरस अमरीका भी पहुंच चुका है। अमरीका एक विकसित देश है और वहां इस संभावित महामारी से लडऩे के लिए युद्घ स्तर पर कोशिश की जाएगी। मुसीबत तो गरीब देशों में बसने वाली इंसानियत की होगी, जहां स्वास्थ्य और चिकित्सा की बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो सभी संबंधित व्यक्तियों को चेतावनी दे दी है लेकिन पश्चिमी देशों में इसके खतरों को कमतर करके पेश करने की कोशिश चल रही है।

इंगलैंड में बीबीसी और गार्जियन जैसे संगठन स्वाइन फलू के बारे में दुनिया भर में शुरू हुए खतरे को बर्ड फलू जैसी बीमारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश में जुट गए हैं। मीडिया की इस कोशिश का नतीजा यह है कि यूरोप में मीडिया की विश्वसनीयता के सवाल पर फिर से बहस शुरू हो गई है। प्रसिद्घ ब्रिटिश अखबार गार्जियन में बैड साइंस नाम का कालम लिखने वाले डाक्टर बेन गोल्डेकर ने लिखा है कि उन्हें बीबीसी से कई बार बुलावा आया है कि वहां जाकर वह कह दें कि मामला इतना गंभीर नहीं है, महज मीडिया इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश कर रहा है।

डा गोल्डेकर का कहना है कि हो सकता है कि बीबीसी वाले स्टोरी को बैलेंस करने की गरज़ से ऐसा कह रहे हों। जो भी हो मशीन की तरह स्टोरी का बैलेंस करने की कोशिश बात को खराब तो करती ही है और सवाल मीडिया की जवाबदेही पर उठता है। सच्चाई यह है कि मीडिया को एक संभावित महामारी की खबरों को कमतर करके पेश करने का अधिकार नहीं है। हां ऐसा भी न होकर खबरों की वजह से आतंक फैल जाए।