Thursday, August 22, 2013

नार्वे के राष्ट्रीय चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन की दस्तक

शेष नारायण सिंह
ओस्लो,२२ अगस्त . नार्वे के संसद , स्तूर्तिंग, के लिए चुनाव प्रचार जोर शोर से चल रहा है . मौजूदा लेबर प्रधानमंत्री , येंस स्तूलतेनबर्ग को कंज़रवेटिव पार्टी के गठ्बंधन से चुनावी चुनौती मिल रही है . पार्टी का चुनावी नारा , अल्ले स्कल में यानी सब साथ रहेगें बहुत असर नहीं दिखा पा रहा है क्योंकि अब तक के चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में उनकी पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का  गठबंधन पीछे चल रहा है . यहाँ संसद का टर्म चार साल का होता है . और इस बार का वोट  देश के १५८वी संसद का चुनाव करेगा .९ सितम्बर को पूरे देश में १६९ सदस्यों वाली संसद के लिए सदस्यों के चुनाव के लिए वोट डाले जायेगें . नार्वे में पार्टियों के लिए वोट डाले जाते हैं और  मिले हुए वोटों के प्रतिशत के हिसाब से उनके हिस्से में सदस्यों की संख्या आती है . भारत की तरह यहाँ हर चुनाव क्षेत्र में एक दूसरे के खिलाफ पार्टियों के उम्मीदवार नहीं खड़े होते. पार्टियों के चुनावी वायदे होते हैं उनके कार्यक्रम होते हैं और अपने कार्यकर्ताओं की उनकी अपनी लिस्ट होती है जो चुनाव के पहले ही दाखिल की जा चुकी होती  है . बाद में उनको मिले ही वोटों केअनुपात में हर पार्टी के सदस्यों की संख्या घोषित कर दी जाती है .

  निवर्तमान संसद में प्रधानमंत्री येंस स्तूलतेनबर्ग की लेबर पार्टी के ६४ सदस्य हैं . उनको सोशालिस्ट पार्टी के ११ और सेंटर पार्टी के ११ सदस्यों के सहयोग से बहुमत मिल गया था उसके बाद जब चार साल पहले सरकार बनाने की बात आई तो कुछ छोटी पार्टियों का समर्थन भी मिल गया. कंज़रवेटिव पार्टी को अभी तक के सर्वे के हिसाब से चुनावी बढ़त मिली हुई है . माहौल ऐसा  है कि लगता है कि इस बार आठ वर्षों से चली आ रही लेबर पार्टी की अगुवाई वाली येंस स्तूल्तेनबर्ग सरकार की विदाई हो जायेगी.
नार्वे के नामी टी वी चैनल  टी वी २ ने २१ अगस्त की रात राष्ट्रीय नेताओं  का टी वी डिबेट आयोजित किया .  यहाँ के चुनावों में इस बार मुख्य मुद्दा स्वास्थ्य सेवाओं का प्रशासन है .इसी विषय पर  टी वी २ चैनल का एक सर्वे भी आया है . उसी सर्वे को विषय बनाकर डिबेट आयोजित किया गया .बहस में यह बात साफ़ उभर कर आयी कि प्रधानमंत्री येंस स्तूल्तेनबर्ग  ने इस महत्वपूर्ण समस्या को पिछले आठ वर्षों में ज़रूरी गंभीरता से नहीं लिया है . होयरे पार्टी ( कंज़रवेटिव ) की अर्ना सूल्बर्ग ने बात को इस तरह से पेश किया कि  सरकार के  दावे विश्वास के लायक नहीं लगे और श्रीमती सूल्बर्ग की लोकप्रियता में इजाफा होता नज़र आया.  नार्वे पहला देश है जिसने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया था . इस साल नार्वे में उस ऐतिहासिक फैसले के सौ साल भी मनाये जा रहे हैं. लगता है कि इस चुनाव में जनता ने पुरुष प्रधानमंत्री को बेदखल करके होयरे पार्टी की अर्ना सूल्बर्ग और प्रोग्रेस पार्टी की सीव येन्सेन की संयुक्त टीम को सत्ता सौंपने का मन बना लिया है .टीवी के डिबेट यहाँ की चुनाव प्रक्रिया में एक अति महत्वपूर्ण भूमिका आदा करता है और उसके नतीजों से ४५ लाख की आबादी वाले इस देश की चुनावी दिशा का अंदाज़ लग जाता है . यह भी सच है कि विकसित दुनिया में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आमदनी वाले संपन्न देश में  चुनावी माहौल बनता बिगड़ता रहता  अहि और ९ सितमबर को होने वाले चुनाव तक तस्वीर बदल भी सकती है .
लेबर पार्टी के चुनाव प्रचार को करीब से देखने का मौक़ा मिला. एक व्यापारिक सेंटर पर पार्टी के कार्यकर्ता इकट्ठा हुए . दो दो कार्यकर्ताओं की टोली एक ट्राली में गुलाब के फूल लेकर चल पडी. इलाके के हर घर में गए , जो मिला उससे बात की और लेबर को  वोट देने के लिए कहा . जो नहीं मिला उसके घर के सामने गुलाब का फूल रख दिया और अपना चुनावी पर्चा छोड़ दिया . निजी संपर्क का यह तरीका अपने देश के चुनावों से बिलकुल अलग और सभ्य लगा .अभी और भी टी वी  डिबेट आयोजित किये जायेगें और जनता को अपने फैसले लेने का मौक़ा मिलेगा  . नार्वे के चुनावों में लेबर के येंस स्तूल्तेनबर्ग को आठ साल में पहली बार निर्णायक चुनौती मिल रही है लेकिन ४५ लाख आबादी वाले इस देश में चुनाव का माहौल आख़री दिन तक बदलता है और अगली रिपोर्टों में बात को साफ़ करने की कोशिश की जायेगी.

मेरी पहली विदेश यात्रा ---- दिल्ली से ओस्लो




शेष नारायण सिंह 
ओस्लो,२२ अगस्त. नार्वे की राजधानी ओस्लो पंहुचने पर सुखद अनुभवों का सिलसिला शुरू हो गया. वहाँ मेरी बेटी के एक दिन पहले पैदा हुए बेटे को देखा ,अपने मित्र और मेरी बेटी के ससुर तरुण मित्र के साथ शहर की बुनियादी खासियतों का अंदाज़ लिया . अगले दिन भारतीय मूल के नार्वेजियन पत्रकार सुरेश चन्द्र शुक्ल से भेंट हुई और उन्होंने देश के राष्ट्रीय चुनाव के प्रचार अभियान से शुरुआती परिचय करवा दिया . भारत की पवित्र भूमि के बाहर जाने का यह मेरा पहला मौक़ा है ,इसलिए मित्रों ने बहुत समझाया था,संभावित परेशानियों के हल सुझाए गए थे क्योंकि आम तौर पर यह मानकर चला जाता है कि विदेश यात्रा में परेशानियां होंगीं . बहुत सारे साधारण लोगों की विदेश यात्राओं के बारे में सुन रखा था . सबकी तकलीफों के बारे में विस्तार से जानकारी थी. इसलिए यात्रा की मुसीबतों  को लेकर मन में बहुत सारी आशंकाएं थीं . लगता है कि इस बार मैं भाग्यशाली रहा कि मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. दिल्ली हवाई अड्डे पर सारी औपचारिकताएं ऐसे बीत गयीं जैसे हर काउंटर पर बैठा हर अधिकारी हमारा ही इंतज़ार कर रहा था. मेरी पत्नी अब पूरी तरह से गदगद और आश्वस्त हो चुकी थीं कि चिंता की बात नहीं है. लुफ्थांसा की हवाई सेवा का अच्छा नाम है और वह सही साबित हुआ .बहुत ही आराम से विमान में सीट मिली और विमान में यात्रियों की सहायता करने वाले स्टाफ में कुछ जर्मन नागरिक थे और कुछ लडकियां भारतीय थीं. विमान में बैठते ही एक भारतीय लड़की ने मुझे पहचान लिया . वह टाइम्स नाउ के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी की बहुत बड़ी फैन है और उसने मुझे भी उसी चैनल में हो रही किसी बहस में कभी देखा था. उसने बताया कि उसके घर में टाइम्स नाउ ज़रूर देखा जाता है .बस फिर क्या था ,लड़की अपनी शुभचिंतक बन चुकी थी . हस्बे मामूल मेरी एक बेटी और जन्म ले चुकी थी .इस लडकी ने हमारे बारे में पता नहीं क्या क्या तारीफ़ के पुल बांधे होंगें कि जब हम साढ़े सात घंटे की फ्लाईट के बात म्यूनिख पंहुचे तो वहाँ विमान कंपनी की एक अधिकारी हमारा इंतज़ार कर रही थी. दिल्ली से म्यूनिख तक का टाइम ऐसे बीत गया जैसे जौनपुर में बैठे डॉ अरुण कुमार सिंह से गप मार रहे हों . जर्मनी के शहर म्यूनिख की ख्याति पूरी दुनिया में है. नार्वे और जर्मनी,दोनों देश ,यूरोपियन युनियन के सदस्य हैं इसलिए हमारे शेंगेन वीजा की इमीग्रेशन की औपचारिकता म्यूनिख में ही होनी थी क्योंकि यूरोपियन युनियन में हम वहीं से प्रवेश कर रहे थे . पूरी दुनिया में इमीग्रेशन अधिकारियों की ख्याति लोगों से मुश्किल सवाल पूछने की है . म्यूनिख  में मुझसे जो सवाल पूछा  गया उसके बाद अपनी दिल्ली-म्यूनिख फ्लाईट की  बेटी द्वारा  की गयी प्रशस्ति गाथा का मुझे मामूली सा अंदाज़ लग गया . इमीग्रेशन काउंटर पर शीशे के पीछे  बैठे हज़रत ने सवाल दागा कि मैं क्यों मानूं कि आप पत्रकार हैं . मुझे लगता है कि उनको बता दिया गया था कि मैं कौन हूँ . म्यूनिख में विमान से उतरते ही मुझे और मेरी पत्नी को विशेष गोल्फ कार्ट दे दी गयी. उसी गाड़ी से हम इमीग्रेशन अधिकारी के सामने पेश किये गए थे . उस खिड़की पर हमारे  अलावा कोई और नहीं था . अब अपने आपको  पत्रकार साबित करने के लिए मेरे पास और कोई जरिया नहीं था . मैं कहने ही वाला था कि  दिल्ली –म्यूनिख फ्लाईट की एयर होस्टेस से पूछ लीजिए लेकिन तब तक मेरे पर्स में मेरा पी आई बी कार्ड दिख गया . उसे दिखाया और सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकार को उस सख्त चेहरे वाले इमीग्रेशन अधिकारी ने मुस्कराहट के साथ विदा किया .यह बात दिलचस्प लगी कि कि पी आई बी की मान्यता कहाँ खाना काम आ सकती है . बात करते करते उसने हमारे पासपोर्ट पर ज़रूरी मुहर भी लगा दी .बहुत ही सम्मानपूर्वक हम म्यूनिख से ओस्लो जाने वाले विमान के प्रतीक्षा लाउंज में बैठा दिए गए.  म्यूनिख से ओस्लो की दो घंटे की यह यात्रा भी बहुत ही सुखद रही . ओस्लो हवाई अड्डे पर हमारे दामाद अनिरबान हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे . दिन डूबने के पहले हम ओस्लो के अपने बच्चों के घर पंहुच गए..एक दिन आराम करने के बाद हमने शहर में अपने मित्रों को अपने आने की जानकारी दे दी .उसी दिन ओस्लो के साहित्यकार और नार्वेजियन पत्रकार सुरेशचंद्र शुक्ल  से मुलाक़ात हो गयी . उनका साहित्यिक नाम शरद आलोक है और वे एक बहुत ही दिलचस्प इंसान हैं . मेरी इच्छा  है कि उनके बारे में पूरा एक आलेख लिखूं जो इसके बाद ही लिखने की तमन्ना है . 

Monday, August 19, 2013

एक गाँव जहां औरतें मजदूरी करके अपनी लड़कियों का मुस्तकबिल बदल रही हैं



शेष नारायण सिंह

मागड़ी तहसील के इस गाँव में जो बहुएं बेटा नहीं पैदा करतीं उनकी ज़िंदगी में मुसीबत की शुरुआत हो जाती  है . वैसे भी उनकी ज़िंदगी बहुत खूबसूरत नहीं होती क्योंकि इस गाँव में भी महिलाओं को पुरुषों से इन्फीरियर माना जाता है .गाँव के ज़्यादातर लड़के शराब पीते हैं और उनके घर की औरतें काम करती हैं . बेंगलूरू शहर से इस गाँव की दूरी करीब तीस किलोमीटर है लेकिन आई टी की राजधानी कहे जाने वाले शहर की प्रगति का कोई भी असर इस गाँव में  नहीं पंहुचा है . यहाँ ३५ परिवार रहते हैं . जिनमें से ३३ मराठे हैं और दो वोक्कालिगा  हैं . वोक्कालिगा परिवार के लोग ही  पंचायत से लेकर राज्य की राजनीति के अन्य क्षेत्रों में पहचाने जाते हैं . यहाँ रहने वाले मराठों को शिवाजी के किसी अभियान के दौरान यहाँ लाया गया था . शायद एकाध परिवार ही आया था लेकिन तीन सौ साल बाद उसी परिवार की इतने शाखें बन गयी हैं कि पूरा गाँव बस गया है . गाँव में विधवाएं बहुत ज्यादा हैं क्योंकि जो नौजवान शराब पीकर वाहन चलाते हैं वे हमेशा खतरे से जूझ रहे होते हैं .वैसे भी गाँव के बाहर जाने  वाली सड़क पर ट्रैफिक इतना तेज है कि अगर शराब के नशे में पैदल चल रहा कोई आदमी ज़रा सा भी गाफिल हो गया तो वह मौत का शिकार हो जाता हैं .बिना कंट्रोल चल रही  गाडियां किसी को भी रौंद देने में मिनट नहीं लगातीं . पहले तो गाँव के बाहर की सड़क पर स्पीडब्रेकर भी नहीं था लेकिन करीब आठ महीने पहले स्पीडब्रेकर लग गया है  . स्पीडब्रेकर लगने के बाद से यहाँ ऐसा कोई हादसा नहीं हुआ जिसमें किसी की जान चली जाए. इस गाँव से कुछ दूरी पर एक प्राइमरी स्कूल है इसलिए गाँव के बहुत सारे बच्चे पांचवीं पास हैं लेकिन उसके बाद बच्चों की पढाई पर ब्रेक लग जाती है क्योंकि उसके ऊपर की जमातों के स्कूल मागड़ी या अन्य दूर के कस्बों में हैं और बेंगलूरू से मागड़ी जाने वाली बसों के ड्राइवर इस गाँव में बस नहीं रोकते . ऑटोरिक्शा से भी वहाँ जाया जा सकता है लेकिन आमतौर पर मजदूरी करने वाली महिलाओं के परिवार ऑटो रिक्शा का किराया नहीं दे सकते.लिहाजा पढाई छूट जाती है .
यह कहानी बंगलूरू से लगे हुए रामनगरम जिले के मागड़ी तालुका के ज्योतिपाल्या गाँव की है लेकिन यही कहानी  कर्नाटक के  बहुत सारे गाँवों की भी हो सकती है. एक दिन यहाँ अजीब मुसीबत खड़ी हो गयी . यहाँ के एक किसान, छत्रपति राव का दामाद उसकी बेटी को घर छोड़ गया . साथ में सन्देश भी है कि दो लाख रूपया भेज दो ,तो बेटी भी साथ जायेगी वरना अब संभालो अपनी बेटी. अभी साल भर पहले इस बेटी की शादी करने के लिए , छत्रपति ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक टुकड़ा बेच दिया था. अब अगर बेटी को उसके पति के पास भेजना है तो उसे बाकी ज़मीन भी बेचनी पड़ेगी . इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है . छत्रपति को उसकी बेटी ने बताया कि उसे उसके सास ससुर पैसा लाने के लिए परेशान करते हैं और मारपीट भी करते हैं . यह बदकिस्मत किसान बहुत ही गैरजिम्मेदार इंसान हैं या यों कहिए कि पुरुष रूप में पशु हैं . अपनी पत्नी और बेटियों को इसलिए अपमानित करते रहते हैं कि वे स्त्रियाँ हैं .
 इसी गाँव में प्रेमा रहती है जो सरकार के एक ऐसे कार्यक्रम में काम करती है जो अपने कर्मचारियों से कम तनखाह पर काम करवाता है .उसके पति ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया है और उसके ऊपर तलाक का मुकदमा दायर कर रखा है . उसके ऊपर भी सारी मुसीबत इसलिए आयी है कि उसकी कोख से दो लडकियां पैदा हो गयीं . वह सरकारी काम के साथ साथ घर की मजूरी भी करती थी लेकिन  लडकियां पैदा करने का इस इलाके का सबसे बड़ा अपराध कर बैठी . उसके आदमी को जब किसी ने समझाया कि, भाई लडकियां या लड़के पैदा करने में औरत और मर्द का बराबर का ज़िम्मा है तो उस अहंकारी पुरुष ने समझाने वाले को ही अपमानित कर दिया .
यहाँ पड़ोस के गाँव से आकर एक महिला रहती है . अपने खाने के लिए वह लोगों से भीख मांगती है . उसके अपने गाँव में उसके घर वाले रहते हैं , उसके नाम ज़मीन भी है जिसपर  घर वालों ने कब्जा कर रखा  है . बताया गया है कि उसके घर वाले अक्सर आकर देख जाते हैं कि वह जिंदा है कि नहीं . क्योंकि जब वह मर जायेगी तो उसकी लाश का अंतिम संस्कार कर देगें और इस इलाके के पुरुषप्रधान समाज के लोग उनको उस महिला की ज़मीन का कानूनी मालिक घोषित करवा देगें . यहाँ के समाज में अभी भी लड़की को बोझ माना जाता है . शादी के लिए कोई भी हमउम्र लड़का तलाशा जाता है , चाहे जितना नाकारा हो .लड़की के लिए योग्य वर की तलाश की अवधारणा अभी यहाँ नहीं है . लड़कियों की शिक्षा के बारे में सरकार ने भी बहुत ध्यान नहीं दिया है . सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत देखकर लगता ही नहीं कि यह उत्तर प्रदेश या बिहार के सरकारी प्राइमरी स्कूलों से अलग  है .

इतिहास की कोख में सो गए इस गाँव में भी महिलाओं के दृढ निश्चय के सामने परिवर्तन की जुम्बिश साफ़ नज़र आने लगी है .खेत में दिन भर मजदूरी करने वाली एक  विधवा महिला की बच्चियां पास के चित्रकूट कालेज में पढ़ने जाने लगी हैं . यह बच्चियां अंग्रेज़ी में कमज़ोर हैं  लेकिन चित्रकूट के संस्थापक भी फुल जिद्दी आइटम हैं , उन्होंने तय कर लिया है कि बिना किसी अतिरिक्त फीस के इन बच्चियों को अंग्रेज़ी सिखायेगें और उनको भी बाकी बच्चियों और लड़कों के बराबर खडा कर देगें . लेकिन फीस तो देना ही पडेगा . खेत में मजदूरी करने वाली माहिला इतनी फीस भी कहाँ से देगी . ऐसी और भी महिलायें हैं जो अपनी औकात से ज़्यादा पैसा लड़कियों की फीस के लिए देने के लिए आमादा देखी गयीं .इन महिलाओं के दृढ निश्चय की पड़ताल की कोशिश की जाए तो तस्वीर के कुछ आयाम समझ में आने लगते हैं . जहां महिलायें सदियों से अपनी नियत का अनुसरण करने के  लिए अभिशप्त थीं वहाँ की तलाकशुदा, विधवा ,परित्यक्ता महिलाओं ने अपनी बेटियों के भविष्य को बदलने के लिए शिक्षा का सहारा लेने का फैसला कैसे ले लिया . खासतौर से जब वे पुरुष भी जो अपनी लड़कियों की भलाई के बारे में  सजग हैं , वह भी शिक्षा को महत्व नहीं देते . पता चला कि कुछ महीने पहले यहाँ बंगलोर के एक स्कूल में फाइन आर्ट की टीचर महिला ने अपना घर  बनाने का फैसला किया था . जब उन्होंने यहाँ आकर लड़कियों और महिलाओं की ज़िंदगी की मुसीबतें देखीं तो वे सन्नाटे में आ गयीं .  उन्होंने बताया कि समझ में ही नहीं आया कि शिक्षा के बल पर आसमान छू लेने की कोशिश कर रही युवतियों और युवकों के शहर बंगलोर के इतना करीब यह क्या हो रहा था. शुरू में तो यहाँ आकार उनके बस जाने की वजह से कुछ नाराज़गी थी लेकिन जब धीरे धीरे लोगों को मालूम चला कि वे तो सबकी भलाई के लिए काम कर रही हैं तो वे पूरे गाँव की अज्जी हो गयीं .कर्नाटक के इस इलाके में दादी को अज्जी कहते हैं और सफ़ेद बालों और करीब ४० साल  तक पब्लिक स्कूलों में  टीचर के रूप में काम करके उन्होंने कई पीढ़ियों की अज्जी होने का  तजुर्बा हासिल कर लिया  है .
इन अज्जी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है . दिल्ली के कश्मीरी गेट और अलीगढ में इनका बचपन बीता . इनकी माता जी ने चालीस के दशक में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों को अपने अधिकारों के बारे में बताना शुरू कर दिया था और कई बार ज्यादतियों के खिलाफ उनको लामबंद भी किया था. इनके परिवार के लोग आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए थे ,इनके पिता जी ने १९४६-४७ में हिंदू कालेज के छात्र के रूप में दिल्ली शहर में मुस्लिम लीग के फैलाए हुए दंगे के खिलाफ मोर्चा लिया था . अज्जी के सभी  भाई बहन अन्याय के खिलाफ मोर्चा लेने में कभी संकोच नहीं करते . दिल्ली के एक बहुत ही नामी पब्लिक स्कूल में  सीनियर टीचर के रूप में काम करते हुए इन्होने बहुत सारे कारनामे किए हैं .स्कूल की इनकी लैब में चपरासी के रूप में काम कर रहे एक दलित लड़के को इन्होने इतना उकसाया किया कि इनको खुश करने के लिए उसने बी ए का पत्राचार का कोर्स किया और बैंक में अफसर का इम्तहान दिया और आज किसी बैंक में मैनेजर है . अपने भाई के एक दोस्त के बच्चों को इन्होने ऐसी दिशा पर डाल दिया कि आज वे सभी मध्यवर्ग की ऊंची पायदान पर विराजमान हैं और जीवन यापन कर रहे हैं . हालांकि यह दोस्त उत्तर प्रदेश के उस इलाके का रहने वाला है जहां अभी बहुत पिछडापन है .यह सब उन्होंने शिक्षा के महत्व का वर्णन करके किया . कई ऐसे केस हैं जहां उन्होने किसी के भी बच्चों की पढाई के लिए ज़रूरी इंतजामात कर दिए थे .उन्होंने रामनगरम जिले के ज्योतिपालया गाँव में देखा कि शिक्षा की कमी के चलते महिलाओं का शोषण हो रहा है तो उन्हें मिशन मिल गया और आज वे इस गाँव में परिवर्तन के लिए जुट पडी हैं . मानसिक रूप से परेशान कुछ पुरुषों के अलावा अब  यहाँ लड़कियों की  शिक्षा का विरोध करने वाले बहुत कम हैं और लगता है कि धीरे धीरे सब कुछ बदल जाएगा क्योंकि अगर लडकी की शिक्षा का सही इंतज़ाम होगा तो असली सामाजिक बदलाव आएगा .



Wednesday, August 7, 2013

पाकिस्तानी फौज, दाऊद इब्राहीम और हाफ़िज़ सईद नहीं चाहते कि भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति कायम हो

 शेष नारायण सिंह
१९८९ में जब मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी और महबूबा मुफ्ती की बहन रुबैय्या सईद का अपहरण हुआ तो पाकिस्तानी आतंकवादी निजाम को लगा था कि भारत की सरकार को मजबूर किया जा सकता है .  तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी को छुडाने के लिए सरकार ने बहुत सारे समझौते किये जिसके बाद  पाकिस्तानी आतंकवादियों  के हौसले बढ़ गए थे . नियंत्रण रेखा के रास्ते और अन्य रास्तों से आतंकवादी आते रहे , वारदात को अंजाम  देते रहे और सीमा के दोनों तरफ शान्ति को झटका लगता रहा .  उसके बाद सीमावर्ती इलाकों में रहने वालों की जिन्दगी बहुत ही मुश्किल हो गयी.  छिटपुट आतंक की घटनाओं का सिलसिला जारी रहा और आखिर में २००३ के नवम्बर महीने में भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर का समझौता हुआ . इलाके के किसानों से कोई पूछकर देखे तो पता लग जाएगा कि सीजफायर समझौते के पहले बार्डर के गावों में जिंदा रहना कितना मुश्किल हुआ करता था. सीजफायर लाइन के दोनों तरफ के गाँव वालों की ज़िंदगी बारूद के ढेर पर ही मानी जाती थी . दोनों तरफ के गाँव वालों को पता है कि लगातार होने वाली गोलीबारी में कभी किसी का घर तबाह हो जाता था ,तो कभी कोई किसान मौत का शिकार हो जाता था. लेकिन नवंबर २००३ के बाद सीमावर्ती इलाकों के सैकड़ों गांवों में शान्ति है .सीमा पर कंटीले तार लगे हुए हैं और इन रास्तों से अब कोई आतंकवादी भारत में प्रवेश नहीं करता . सीजफायर समझौते के बाद यहाँ के गांवों में जो शान्ति का माहौल बना है उसे जारी रखने की दुआ इस इलाके के हर घर में होती ,हर गाँव में लोग यही प्रार्थना करते हैं कि सीमावर्ती इलाकों में फिर से झगडा न शुरू हो जाये जाए .

लेकिन दिल्ली और इसलामाबाद में रहकर सत्ता का सुख भोगने वाले एक वर्ग को इन गावं वालों से कोई मतलब नहीं है . उनको तो हर हाल में झगडे की स्थिति चाहिए क्योंकि संघस्ढ़ की स्थिति में मीडिया की दुकानें भी चलती हैं और सियासत का कारोबार भी  परवाना चढता है  . पाकिस्तान में जब भी नवाज़  शरीफ की सरकार बनती है तो पाकिस्तानी फौज में मौजूद उनके पुराने साथियों को लगता है कि अब मनमानी की जा सकेगी लेकिन नवाज शरीफ दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के सपने देखने लगते हैं. नवाज शरीफ की इस कोशिश को आई एस आई और फौज में मौजूद उनके साथी धोखा मानते हैं .पाकिस्तान की राजनीति में नवाज़ शरीफ को स्थापित करने के श्रेय पाकिस्तान के पूर्व फौजी तानाशाह, जनरल जिया उल हक को जाता है . नवाजशरीफ अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में जनरल जिया के बहुत बड़े  चेले हुआ करते थे .पाकिस्तानी फौज में भी आजकल टाप पर वही लोग बैठे हैं जो जनरल जिया के वक़्त में नौजवान अफसर होते थे. पाकिस्तानी सेना और समाज का इस्लामीकरण करने की अपनी मुहिम में इन अफसरों का जिया ने पूरी तरह से इस्तेमाल किया था . आज के पाकिस्तानी  सेना के अध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी और उनके जूनियर जनरलों ने भारत के हाथों पाकितान को १९७१ में बुरी तरह से हारते देखा है . जब १९७१ में भारत की सैनिक क्षमता के सामने पाकिस्तानी फौज ने घुटने टेके थे ,उसी साल जनरल अशफाक परवेज़ कयानी ने लेफ्टीनेंट के रूप में नौकरी शुरू की थी. उन्होंने बार बार यह स्वीकार किया है कि वे १९७१ का बदला लेना चाहते हैं लेकिन उनकी इस जिद का नतीजा दुनिया के लिए जो भी होउनके अपने देश को भी तबाह कर सकता है . यह बात जनरल अशफाक कयानी को मालूम है कि अगर उन्होंने परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की गलती कर दी तो अगले कुछ घंटों में भारत उनकी सारी सैनिक क्षमता को तबाह कर सकता है . अगर ऐसा हुआ तो वह विश्वशान्ति के लिए बहुत ही खतरनाक संकेत होगा . शायद इसीलिये वे कोशिश करते रहते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सूरत में रिश्ते सुधरने न पायें और उनको भारत को तबाह करने  के अपने सपने को जिंदा रखने में मदद मिलती रहे .पाकिस्तानी फौजी लीडरशिप की इसी ज़हनियत की वजह से १९९० के बाद से जब भी कोई सिविलियन सरकार दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की बात करती है तो पाकिस्तानी फौज या तो आतंकवादियों के ज़रिये और या आई एस आई के ज़रिये कोई ऐसा काम कर देती है जिस से सामान्य होने की दिशा में चल पड़े रिश्ते तबाह हो जाएँ या उस प्रक्रिया में पक्के तौर पर अड़चन ज़रूर आ जाए .जब  तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस में बैठकर लाहौर गए थे तो पाकिस्तानी फौज ने कारगिल शुरू कर दिया था . अब तो सबको मालूम है कि कारगिल में जो भी हुआ उसके लिए शुद्ध रूप से उस वक़्त के सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ ज़िम्मेदार थे , प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को तो पता  भी नहीं था. लेकिन उस घटना के बहुत सारी राजनीतिक नतीजे  निकले थे . नवाज़ शरीफ की  गद्दी चली गयी थी, मुशर्रफ ने सत्ता  हथिया ली थी, कारगिल की लड़ाई हुई थी, भारत ने कारगिल के इलाके से पाकिस्तानी फौज को खदेड़ दिया था और अटल बिहारी वाजपेयी १९९९ के चुनावों विजेता के रूप में  प्रचार  करते हुए पांच साल तक राज करने का जनादेश लाये थे.
जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में पांच भारतीय सैनिकों के मारे जाने की घटना को भी जल्दबाजी में पाकिस्तानी हमला मान लेना ठीक नहीं होगा . इस बात की पूरी संभावना है कि पाकिस्तानी फौज ने नई नवाज़ शरीफ सरकार को भारत की तरफ दोस्ती का हाथ बढाने से रोकने के लिए यह काम किया हो . इस  बात में तो शक नहीं हो सकता पाकिस्तानी फौज ने ही भारतीय सैनिकों की जघन्य ह्त्या करवाई है लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि पाकिस्तान की सिविलियन सरकार भी इसमें शामिल हो .इसे मुशर्रफ के उस एडवेंचर से मिलाकर देखना चाहिए जब लाहौर बस यात्रा से पैदा हुए माहौल को खराब करने के लिए मुशर्रफ की पाकिस्तानी फौज ने कारगिल कर दिया था.
पुंछ सेक्टर की ताज़ा घटना  भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की परीक्षा लेने के लिए तैयार है . पाकिस्तानी आई एस आई और हाफ़िज़ सईद के अधीन काम करनेवाले आतंकवादी संगठन कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगें कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तरह के सामान्य सम्बन्ध  कायम हों .  इसका एक नतीजा यह भी  होगा कि मुंबई हमलों के गुनाहगार  हाफ़िज़ सईद को पाकिस्तान भारत के हवाले भी कर सकता है .अगर दोनों देशों में दोस्ती  हो गयी तो भारत दाऊद इब्राहीम के प्रत्यर्पण की मांग भी कर सकता है. सबको मालूम है कि दाऊद इब्राहीम और हाफ़िज़ सईद पाकिस्तानी हुक्मरान की नज़र में कितने ताक़तवर हैं . इसलिए यह दोनों अपराधी किसी भी सूरत में दोनों देशों के बीच  दोस्ती नहीं कायम होने देगें .अजीब बात यह है कि भारत में पब्लिक ओपिनियन के करता धरता भी पाकिस्तानी  आतंकवाद के सूत्रधारों के जाल में फंसते जा रहे हैं .भारत के टेलिविज़न चैनलों की चले तो वे आज ही पाकिस्तान पर भारतीय फौजों से हमला करवा दें . विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का रवैया भी पुंछ में  हुई भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या के बाद ऐसा है कि वे पाकिस्तानी आतंकवादियों की मंशा  को पूरी करते नज़र आ रहे हैं . बीजेपी के एक नेता ने लोकसभा में कह दिया कि कि भारत के पास ताक़त है ,भारतीय सेना के पास ताक़त है ,भारतीय संसद के पास ताक़त है  कि पाकिस्तान को उसी भाषा में जवाब दिया जाए जो उसकी समझ में आती है .इस तरह की बयानबाजी से दोनों देशों के बीच के रिश्ते और खराब होंगें ,पाकिस्तानी सेना में मौजूद वे लोग मज़बूत होंगें जो भारत से हर हाल में दुश्मनी रखना चाहते हैं और पाकिस्तान में रहकर भारत के खिलाफ काम करने वाला आतंक का तंत्र बहुत मज़बूत होगा. इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि भारत का मीडिया और राजनीतिक बिरादरी पाकिस्तानी आतंकवादियों के जाल में न फंसे और उनके मंसूबों  को नाकाम करने की कोशिश करे . इस मिशन में पाकिस्तानी सिविलियन  सरकार की विश्वसनीयता बढाने की कोशिश भी की जानी चाहिए .
भारत के रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने संसद में बताया कि भारी हथियारों से लैस करीब बीस आतंकवादियों और पाकिस्तानी सेना की वर्दी पहने कुछ लोगों ने पुंछ के इलाके में हमला किया  और पांच भारतीय सैनिकों की जानें गयीं . यू पी ए की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि भारत को इस तरह के धोखेबाजी के तरीकों से परेशान नहीं किया जा सकता. पाकिस्तान की सरकार ने कहा है कि भारतीय मीडिया ने आरोप लगाया है कि पुंछ की घटना में पाकिस्तान की सेना का हाथ है जिसे पाकिस्तानी सरकार खारिज करती है . पाकिस्तान सरकार की तरफ से जो बयान आया है उसके मुताबिक सीमा पर ऐसा कोई भी काम नहीं हुआ जिसके कारण दोनों देशों के बीच में तनाव  आये.  यह बयान सच्चाई को छुपाता है लेकिन फिर भी यह युद्ध की तरफ बढ़ने वाली कूटनीति को लगाम देने में इस्तेमाल किया जा सकता है . भारत के विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि इस घटना से दोनों देशों के बीच सामान्य हो रहे रिश्तों में बाधा ज़रूर पड़ेगी  .पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ की सरकार आने के बाद उम्मीद बढ़ी थी कि रिश्ते सामान्य होंगें . इसी साल जनवरी में एक भारतीय सैनिक का सिर काटे जाने के बाद रिश्तों में बहुत तल्खी आ गयी थी लेकिन पाकिस्तान में आम चुनाव के बाद आयी नवाज़ शरीफ की नई सरकार आने के बाद उम्मीदें थोडा बढ़ी थीं . सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र के सम्मलेन के बहाने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात की संभावना है लेकिन लगता है कि आई एस आई , पाकिस्तानी फौज और पाकिस्तानी आतंकवादियों की साज़िश के बाद मामला बिगड सकता है . अगर ऐसा हुआ तो इसे पाकिस्तानी ज़मीन पर रहकर ,पाकिस्तानी सरकार की परवाह किये बिना  भारत से रिश्ते खराब करने वालों के मंसूबों की जीत माना जायेगा . ज़ाहिर है इससे  सीमा के दोनों तरफ रहने वाले शान्तिप्रेमी लोगों इच्छाओं को ज़बरदस्त धक्का लगेगा

अमरीकी फेडरल रिज़र्व की मुखिया किसी महिला को बनाने के चर्चा से मर्दवादी परेशान


शेष नारायण सिंह

अमरीका के फेडरल रिज़र्व के अध्यक्ष के रूप में उसके गवर्नारों के बोर्ड की मौजूदा उपाध्यक्ष जेनेट येलेन की  तैनाती की चर्चा है , वे महिला हैं और किसी भी पुरुष से ज़्यादा योग्य हैं लेकिन अमरीकी समाज में पिछडापन की हद ही कही जायेगी कि उनके खिलाफ आभियान चलाया जा रहा है कि वे देश की सबसे बड़ी वित्तीय संस्था की अध्यक्ष न बन जाएँ. एक फटीचर अमरीकी अखबार में उनके महिला होने के कारण फेडरल रिज़र्व के अध्यक्ष पद पर तैनाती के खिलाफ सम्पादकीय लिख दिया गया . अजीब बात है कि देश के बड़े आर्थिक अखबार , वाल स्ट्रीट जर्नल में भी उसी संपादकीय के हवाले से चर्चा कर दी गयी और इस अखबार की मर्दवादी सोच को सही ठहरा दिया गया .

भारत में  लोग नहीं जानते होंगें लेकिन अमरीका में सबसे  बड़े वित्तीय प्रबंधक के रूप में जेनेट येलेन की पहचान है .उन्होंने अमरीका के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शिक्षा पायी है . ब्राउन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने येल विश्वविद्यालय से पी. एचडी किया था. हार्वर्ड विश्वाविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में उन्होंने नौकरी शुरू की और १९७६ तक हार्वर्ड में रहीं . १९७७-७८ में वे इसी फेडरल रिज़र्व में इकानामिस्ट के रूप  में काम किया जिसकी आजकल उपाध्यक्ष हैं  . १९८० में उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय ,बर्कले के बिजिनेस स्कूल में मैक्रो इकनामिक्स की शिक्षक रहीं .डॉ येलेन बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति काल में आर्थिक सलाहकारों की परिषद की अध्यक्ष रहीं . वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय और लन्दन स्कूल आफ इकानामिक्स में प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं . अमरीका की सबसे प्रतिष्ठित अर्थशास्त्र के विद्वानों की संस्था अमेरिकन इकनामिक एसोशियेशन की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं .  फेडरल रिज़र्व सिस्टम के मौजूदा अध्यक्ष  बेन  बर्नान्के को अगर २००९ में फिर से अध्यक्ष न बना दिया गया होता तो उस वक़्त में उनके गंभीर उताराधिकारियों में जेनेट येलेन का नाम  लिया जा रहा था . लेकिन अमरीकी अर्थव्यवस्था का नुक्सान होना था तो पता नहीं किस रौ में बराक ओबामा ने बर्नान्के को फिर से एक और कार्यकाल बख्श दिया .और पांच साल के लिए फेडरल रिज़र्व की मुख्य कुर्सी पर बैठा दिया .

इस बात की पूरी संभावना है कि इतनी काबिल महिला को इस बार फेडरल रिज़र्व सिस्टम का अध्यक्ष बना दिया जाएगा लेकिन अमरीकी समाज में मौजूद पुरातनपंथी और पोंगापंथी राजनेता  और लाबी ग्रुप के लोग उनका विरोध कर रहे हैं . यह विरोध दो स्तरों पर हो रहा है . एक तो घटिया दर्जे की मानसिकता वाले पब्लिक ओपिनियन लीडर लोग कुछ फटीचर और मर्दवादी अखबारों में लिख रहे हैं .जबकि सच्चाई यह है कि आज की तारीख में अमरीका में अगर कोई इस नौकरी लायक है तो उसमें सबसे ऊपर जेनेट येलेन का ही नाम आता है . कुछ ऐसे लोग जो  मर्दवादी तो हैं लेकिन ऐलानियाँ विरोध करने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ती , वे येलेन के खिलाफ निंदा अभियान गुप्त रूप से चला रहे हैं .

पिछले हफ्ते  सन अखबार ने उनके खिलाफ एक सम्पादकीय लिखा जिसका  शीर्षक था “ द फीमेल डालर “ .इस सम्पादकीय ने बहुत ही बेशर्मी से ऐलान किया कि पिछले पचास साल से फेडरल रिज़र्व ने ऐसी मुद्रानीति का पालन किया है  जिस से मुद्रास्फीति बढती है और अगर किसी महिला को  फेडरल रिज़र्व का काम सौंप दिया गया तो यह और खराब हो जाएगा. इस सम्पादकीय लेखक को यह भी पता नहीं है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में इस साल की मुद्रास्फीति  पचास वर्षों में सबसे नीचे हैं .सन अखबार का कोई मतलब नहीं होता क्योंकि उसकी कोई औकात नहीं है .अगर अन्य दक्षिणपंथी अखबारों ने इस लाइन को आगे न बढ़ाया होता तो कोई भी परवाह न करता  . लेकिन वाल स्ट्रीट जर्नल समेत कुछ नामी अखबारों ने भी अभियान शुरू कर दिया . जिसकी निंदा की जानी चाहिए .
सवाल यह है कि अगर जेनेट येलेन पुरुष होतीं और जितना दमदार उनका बायोडाटा है तो किसी भी अमरीकी पुरातनपंथी मर्दवादी नेता और बुद्धिजीवी ने उनका विरोध न किया होता .लेकिन ऐसा हो रहा है और इसकी निंदा की जानी चाहिए और राष्ट्रपति बराक ओबामा को चाहिए कि २००९ की गलती न दोहराएँ और जैनेट येलेन को इस बार फेडरल रिज़र्व सिस्टम का अध्यक्ष बनाने में संकोच न करें .

Monday, August 5, 2013

जन्मदिन मुबारक मेरे बेटे





शेष नारायण सिंह

आज हमारे बेटे का जन्मदिन है . इमरजेंसी लगने के करीब डेढ़ महीने बाद सुल्तानपुर जिले के मेरे गाँव में ६ अगस्त के दिन इनका जन्म हुआ. कई साल बाद उनके जन्मदिन के दो दिन पहले मुंबई के उनके घर में साथ थे ,उनकी अम्मा ने कहा कि चलो एक बहुत अच्छी कमीज़ खरीद कर लाते हैं . बातों बातों में मेरे मुंह से निकल गया तो उन्होंने कहा कि मेरे जन्मदिन पर कपडे तो कभी नहीं आये . उनकी इस बात के बाद ऐसा लगा कि पिछले अडतीस साल का एक एक दिन नज़रों के सामने से गुज़र गया . आज वे एक बड़ी विदेशी बैंक में बड़े पद पर काम करते हैं ,उच्च मध्य वर्ग की अच्छी ज़िंदगी जीते  हैं , एक बहुत ही ज़हीन लड़की उनकी पत्नी है और एक निहायत ही काबिल लड़का उनका बेटा है . स्कूल जाता है और बहुत बड़ा पाटी करता है ,बाबा  को उसे साफ़ करने का मौक़ा देता है और  अपनी दादी को बुलाने के लिए सप्तम सुर में दादी दादी कहकर आवाज़ लगाता है .अगर अच्छे मूड में होता है तो दादी को भी पाटी देखने का मौक़ा देता है . उनकी दादी धन्य हो जाती हैं .
अपने बेटे के लिए पहली बार जन्मदिन का गिफ्ट लेने हम १९८१ में गए थे . उसके पहले गाँव में  रहते थे ,किसी को पता भी नहीं होता था कि जन्मदिन क्या होता है लेकिन दिल्ली में जब यह स्कूल गए तो हर महीने कुछ बच्चों का जन्मदिन होता था, लिहाजा इनका जन्मदिन भी  इनकी क्लास में और घर में सबको पता लगा . जन्मदिन का गिफ्ट लेने के चक्कर में कई दुकानों में गए लेकिन समझ में कुछ नहीं आया . जिस गिफ्ट पर भी हाथ डाला ,वह खरीद की सीमा के बाहर था . शाम तक वापस आ गए . अगले दिन जे एन यू जाना हुआ और गीता बुक सेंटर पर खड़े हुए दूकान के मालिक दादा से भी ज़िक्र कर दिया . उसके बाद तो लगा कि सारी राहें आसान हो गयीं . दादा ने प्रगति प्रकाशन मास्को की कई किताबें पैक कर दीं और कहा कि जब तक बच्चा बड़ा न हो जाए उसे हर साल किताब ही देते रहना .  वह सारा गिफ्ट दस रूपये में आया था. उसके बाद जब तक हम साथ रहे हर साल किताबों का गिफ्ट देते रहे. उनके जन्मदिन पर दी  गयी किताबों ने उनकी ज़िंदगी को खूबसूरत बनाने में अहम  भूमिका निभाई वर्ना एक अनिश्चित आमदनी वाले माँ बाप के बच्चों की जिन्दगी में वह स्थिरता नहीं होती जो इनकी ज़िंदगी में है और इनकी बहनों की जिन्दगी में है . जन्मदिन की किताबें खरीदने के लिए हम कई बार गोलचा सिनेमा के पास बिकने वाली पुरानी किताबों को देखने फुटपाथ पर भी गए ,कई बार बुक आफ नालेज लाये और कई बार डिक्शनरियां लाये .किताबों के प्रति उनके मन में आज भी बहुत सम्मान है और जब भी कहीं टाइम पास करना होता है किताबें खरीद लेते हैं .

आज जब पीछे  मुड़कर देखता हूँ तो लगता  है कि दादा की सलाह ने मेरे और और मेरे बच्चों के भविष्य को बदल दिया . मैं जानता हूँ  कि हमारा बेटा जहां भी होता है उसको लोग बहुत सम्मान देते हैं , पढ़ा लिखा इंसान माना जाता  है. आमतौर पर शांत रहने वाला हमारा यह बेटा एक बेहतरीन पति और बहुत अच्छा बाप है . मुझे मालूम है कि वह अपनी अम्मा को बहुत सम्मान करता  है और मेरी हर परेशानी को समझता है लेकिन मेरे सिद्धार्थ ने मुझे कभी बेचारा नहीं माना . जैसे ही  हमारी किसी  परेशानी का पता चलता है मेरा बेटा उसको हल करने के लिए तड़प उठता है लेकिन जब तक हम कह न दें कोई पहल नहीं करता . जन्मदिन मुबारक मेरे बेटे अम्मा की तरफ से भी और पापा की तरफ से भी .

उत्तर प्रदेश ने हमेशा ही देश की राजनीति को दिशा दी है


शेष नारायण सिंह

उत्तर प्रदेश में आज अराजकता का माहौल है ,कानून व्यवस्था की हालत बहुत खराब है लेकिन राजनीतिक रूप से राज्य की ताक़त कभी कम नहीं हुई ,आज भी राजनीतिक हैसियत कम नहीं है . गंगा नदी के प्रवाह के इस मुख्य क्षेत्र में हमेशा से भारतीय राजनीति की दिशा तय होती रही है . आज़ादी के लिए पहली  बार जब इस देश की जनता उठ खड़ी हुई थी तो मई १८५७ की मुख्य लड़ाइयां उत्तर प्रदेश में ही लड़ी गयी थीं.  महात्मा गांधी के नेतृत्व में भी आधुनिक भारत की स्थापना और अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता की जो लड़ाई लड़ी गयी उसमें उत्तर प्रदेश का महत्वपूर्ण स्थान है . १९२० में आज़ादी की इच्छा रखने वाला हर भारतवासी महात्मा गांधी के साथ था, केवल अंग्रेजों के कुछ खास लोग उनके खिलाफ थे .आज़ादी  की लड़ाई में एक ऐतिहासिक मुकाम तब आया जब चौरीचौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया . उस वक़्त के हर बड़े नेता ने महात्मा गांधी से आन्दोलन जारी रखने का आग्रह किया लेकिन महात्माजी ने साफ़ कह दिया कि भारतीयों की सबसे बड़ी ताक़त अहिंसा थी .  सच भी है कि अगर हिंसक  रास्ते अपनाए जाते तो अंग्रेजों ने तो़प खोल दिया होता और जनता की  महत्वाकांक्षाओं की वही दुर्दशा होती जो १८५७ में हुई थी. १९२९ और १९३० में जब जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तो लाहौर की कांग्रेस में पूर्ण स्वराज का नारा दिया गया . १९२९ में  कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के हाथ आया तो वह कभी नहीं हटा. ११९३० के दशक में भारत में जो राजनीतिक परिवर्तन हुए वे किसी भी देश के लिए पूरा इतिहास हो सकते हैं . गवर्नमेंट आफ इन्डिया एक्ट १९३५ के  बाद की अंग्रेज़ी साजिशों का सारा पर्दाफाश  यहीं  हुआ. १९३७ में लखनऊ में  हुए मुस्लिम  लीग के सम्मेलन में ही मुहम्मद अली जिन्ना ने अंग्रेजों की शह पर द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन किया और  तुरंत से ही उसका विरोध शुरू हो गया . उस वक़्त के मज़बूत संगठन ,हिंदू महासभा के  राष्ट्रीय अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकार ने भी अहमदाबाद में हुए अपने वार्षिक अधिवेशन में द्विराष्ट्र सिद्धांत का नारा दे दिया  लेकिन उत्तर प्रदेश में उसी साल हुए चुनावों में इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ चुकी थीं क्योंकि  यहाँ की जनता ने सन्देश दे दिया था कि भारत एक है और वहाँ दो राष्ट्र वाले  सिद्धांत के लिए कोई जगह  नहीं है . मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा को चुनावों में  जनता ने नकार दिया था . कांग्रेस के अंदर जो समाजवादी रुझान शुरू हुई और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के ज़रिये आतंरिक लोकतंत्र को और मजबूती देने की जो कोशिश की गयी उसके दोनों बड़े नेता आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया उत्तर प्रदेश के ही मूल निवासी थे .  
भारतीय राजनीति में  कांग्रेस के विकल्प को तलाशने की  कोशिश भी यहीं शुरू हुई . जब डॉ  राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद की अपनी राजनीतिक सोच को अमली जामा पहनाया तो तीन बड़े नेताओं ने उत्तर प्रदेश के कन्नौज, मुरादाबाद और जौनपुर में १९६३ के लोकसभा के उपचुनावों में हिस्सा लिया . डॉ लोहिया  कन्नौज ,आचार्य जे बी कृपलानी मुरादाबाद और दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से गैर कांग्रेसवाद के उम्मीदवार बने . इसी प्रयोग के बाद  गैरकांग्रेसवाद ने एक शकल हासिल की और १९६७ में हुए आम चुनावों में अमृतसर से कोलकता तक के  इलाके में वह कांग्रेस चुनाव हार गयी और  विपक्षी पार्टी बन  गयी जिसे जवाहर लाल  नेहरू के जीवनकाल में अजेय माना जाता रहा था . १९६७ में संविद सरकारों का जो प्रयोग हुआ उसे शासन  पद्धति का को बहुत बड़ा उदाहरण तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह पक्का है कि उसके बाद से ही यह बात आम  जहनियत का हिस्सा बन गयी कि कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया जा सकता है . सभी मानते हैं कि देश में लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हैसियत बनायी जाए. अगर उत्तर प्रदेश में किसी राजनीतिक पार्टी की ताक़त नहीं है तो दिल्ली में सरकार बना पाना असंभव माना जाता है .
अब तक की सच्चाई यही है कि जो भी केन्द्र में सरकार बनाएगा उसे उत्तर प्रदेश में जीत दर्ज करना ज़रूरी है . जो उत्तर प्रदेश में हार गया उसे दिल्ली में सरकार बनाने  का हक भी साथ साथ छोड़ना पड़ता है . १९७७ में पहली बार केन्द्र में गैरकांग्रेस सरकार बनी थी . इस सरकार में उत्तर प्रदेश में जीती गयी जनता पार्टी की ८५ सीटों  का मुख्य योगदान था .उस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के सभी उम्मीदवार उत्तर प्रदेश में चुनाव हार गए थे ,प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद चुनाव हार गयी थीं . लेकिन जब १९८० में हुए चनाव में काँग्रेस ने लगभग सभी सीटें जीत लीं  तो उनकी सरकार बन गयी और इंदिरा गांधी  फिर प्रधानमंत्री बनीं.  राजनीतिक पार्टियों के भाग्योदय में  भी उत्तर प्रदेश की राजनीति एक मानदंड का काम करती है . आज का मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी है . लेकिन १९८४ में हुए लोकसभा चुनाव में उसे उत्तर प्रदेश में नकार दिया गया था . नतीजा  हुआ कि पार्टी पूरे देश में केवल दो सीटों पर सिमट गयी थी. लेकिन जब उत्तर प्रदेश में उसे सफलता मिली तो १९८९ में बीजेपी एक महत्वपूर्ण पार्टी बनी और उसे  केन्द्र में वी पी सिंह की सरकार को बनवाने का मौका मिला . बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में ही बाबरी मसजिद-रामजन्म भूमि विवाद को राजनीतिक स्वरूप दिया और उसी के बल पर केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी . अयोध्या  के विवाद को फिर से मुख्यधारा में लाने की चर्चा आजकल भी है और जानकार बताते हैं  कि २०१४ में बीजेपी , अगर सत्ता में आने में सफल होती है तो उसमें उत्तर प्रदेश का सबसे ज़्यादा योगदान होगा . शायद इसीलिये बीजेपी में  राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद के सबसे महत्वपूर्ण नेता और मुख्य चुनाव प्रचारक नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा ध्यान दिया है . उन्हें मालूम है कि अगर दिल्ली में राज करना  है तो उत्तर प्रदेश में मजबूती के साथ आना होगा . इसीलिये नरेंद्र मोदी ने अपने सबसे भरोसेमंद साथी ,अमित शाह को बीजेपी की तरफ से उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनवाया है . बताते हैं कि गुजरात में  नरेंद्र मोदी के चुनाव का सारा प्रबंध अमित शाह ही करते हैं  . बीच में कुछ दिनों के लिए वे गुजरात के राजनीतिक पटल से हटे थे जब उनको  कोर्ट के आदेश पर गुजरात में घुसने से मना कर दिया गया था .
केन्द्र की मौजूदा सरकार  हो या अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ,उसे उत्तर प्रदेश के  नेताओं ने ही जीवनदायिनी शक्ति बख्शी है . केन्द्र की मौजूदा सरकार का अस्तित्व केवल इसलिए बचा है कि उसे मुलायम सिंह यादव और मायावती का समर्थन हर बुरे वक़्त में मिल  जाता है . मायावती जी ने अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को बचा रखा था और जब उनकी सरकार के मंत्री जगमोहन ने ताज कारिडोर मामला शुरू किया तो मायावती की धमकी के बाद बीजेपी के राजनीतिक प्रबंधकों को बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ा था .
इसलिए उत्तर प्रदेश के राजनीतिक महत्व को कभी भी कमतर करके नहीं आँका जा सकता . दिल्ली की सरकार का हर रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही गुज़रता है शायद इसी लिए २०१४ के लोकसभा चुनाव के लिए भी दोनों ही मुख्य पार्टियां उत्तर प्रदेश को बहुत गंभीरता से ले  रही हैं . मुलायम सिंह यादव और मायावती भी सारी ताक़त के साथ जुटे हैं कि अगर केन्द्र की सरकार में महत्वपूर्ण बने रहना है तो अपने राज्य में उन्हें मजबूती से जीतना पडेगा .

( नवभारत टाइम्स से साभार )