Thursday, September 8, 2011
बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने फिर किया रथयात्रा का ऐलान .
शेष नारायण सिंह २००८ में लोक सभा में वोट के बदले नोट काण्ड में पकडे गए बीजेपी के सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा को जेल भेजे जाने से नाराज़ बीजेपी ने रथ यात्रा का ऐलान कर दिया है . आज संसद भवन में आयोजित के पत्रकार वार्ता में बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि उनको फग्गन सिंह कुलस्ते, महावीर सिंह भगोरा और अशोक अर्गल के पैसे लेकर वोट देने की घटना की पूरी जानकारी थी . उन्होंने सरकार को आगाह किया कि उनकी पार्टी के सांसद वास्तव में भ्रष्टाचार की पोल खोलने का काम कर रहे थे . उन्हें अभियुक्त बनाना सरासर गलत है . श्री आडवाणी ने कहा कि अगर उनकी पार्टी के सांसदों को जेल भेजा गया है तो सरकार को चाहिए कि उन्हें भी जेल भेजे दे क्योंकि उन्हें पूरे काण्ड की जानकारी थी . इस मामले की जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि श्री आडवाणी को भी उनके इस इक़बालिया बयान के लिए उसी धारा में बुक किया जा सकता है जिसमें उनके साथी जेल भेजे गए हैं . लेकिन आडवानी की गिरफ्तारी की किसी संभावना से अधिकारी इनकार कर रहे हिं क्योंकि उनका दावा है लाल कृष्ण आडवाणी उस काम में शामिल नहीं थे . पुलिस के पास ऐसे कोई सबूत नहीं है न. हालांकि उनके ख़ास सहायक सुधीन्द्र कुलकर्णी को उसी मामले में चार्ज शीट किया जा चुका है . वे दरअसल अपनी पार्टी के सदस्यों को नैतिक समर्थन देने के उद्देश्य से अपने शामिल होने की बात कर रहे हैं . आडवाणी की प्रस्तावित रथ यात्रा से केंद्र सरकार के आला अधिकारियों में चिंता नज़र आई . श्री आडवाणी ने बताया कि उनके नई रथ यात्रा भी उनकी पुरानी सोमनाथ से अयोध्या वाली यात्रा जैसी ही होगी.लेकिन इस बार मुद्दा भ्रष्टाचार, स्वच्छ राजनीति और जनतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा होगा .उन्होंने कहा कि यात्रा के एजेंडे में विदेशों में जमा ब्लैकमनी को वापस लाने की बात भी करेगें . अपनी प्रेस वार्ता में श्री आडवाणी ने एक से अधिक बार कहा उनकी पार्टी के अध्यक्ष से इस सम्बन्ध में बात हो चुकी है . यह यात्रा नवम्बर के पहले ही की जा सकती है क्योंकि लोक सभा के शीतकालीन सत्र के पहले वे यह काम निपटा लेना चाहते हैं . जब उनसे पूछा गया कि क्या वे अपनी पार्टी के भ्रष्टाचार के केन्द्रों बेल्लारी और अहमदाबाद भी जायेगें तो उन्होंने सकुचा कर कहा कि इस बात को वे सुझाव की तरह मान रहे हैं और इस पर विचार किया जाएगा. जानकार बताते हैं कि इस यात्रा में शायद वह बीजेपी के भ्रष्टाचार के कारनामों को बचाना चाहें क्योंकि वे बेल्लारी और अहमदाबाद के बारे में दुविधा की बात करके कई तरह की शंकाओं को जन्म दे रहे हैं. लाल कृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा देश की राजनीति में हलचल लाने के लिए काफी इमानी जा रही है . अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की वजह से देश में आजकल भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़बरदस्त माहौल है . ज़ाहिर है भ्रष्टाचार से ऊब चुकी जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी मुहिम को समर्थन दे सकती है .लेकिन कांग्रेसी सूत्र बताते हैं कि आडवाणी की यह यात्रा अन्ना हजारे के आन्दोलन को अपना लेने की है लेकिन अन्ना हजारे कभी भी अपने आन्दोलन को बीजेपी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को हासिल करने के लिए कुरबान नहीं करेगें . हालांकि बी जे पी वालों का भी मानना है कि इस यात्रा से लाल कृष्ण आडवाणी अपनी पार्टी में एक बार फिर सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित हो जायेगें अगर ऐसा हुआ तो नितिन गडकरी को निश्चित रूप से राजनीतिक नुकसान होगा क्योंकि जब तक श्री आडवाणी की रथ यात्रा चलेगी ,तब तक बीजेपी की मीडिया प्रबंधन की सारी मशीनरी उसी में लगी रहेगी. और गडकरी अखबारों की सुर्ख़ियों से उस दौर में हटने के लिए मजबूर हो जायेगे,.
इस बार दिल्ली पुलिस को बलि का बकरा बनाने की कोशिश
शेष नारायण सिंह नई दिल्ली ,७ सितम्बर .दिल्ली हाई कोर्ट के गेट नंबर ५ पर हुए धमाके ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं .धमाके के कारणों और अन्य बातों की जानकारे धीरे धीरे आये गी लेकिन एक बात लगभग पक्की है कि हाई कोर्ट पर हुआ धमाका सरकारी अलगरजी के कारण हुआ है .दिल्ली की सुरक्षा से सम्बंधित जिन लोगों से भी बात हुई ,सब का कहना है कि यह पूरी तरह से सरकारी असफलता का नमूना है .दिल्ली पुलिस को बलि का बकरा बनाने की तैयारी उसी वक़्त शुरू हो गयी जब गृहमंत्री ने लोकसभा में बयान दे दिया कि दिल्ली पुलिस को जुलाई में संभावित धमाके के बारे में बता दिया गया था . उसके बाद कई हलकों से यह खबर प्लांट करने की कोशिश की जा रही है कि हाई कोर्ट की पार्किंग में साढ़े तीन महीने हुए पहले धमाके के बाद दिल्ली पुलिस को सी सी टीवी और कैमरे लगाने को कहा गया था लेकिन उसने कोई परवाह नहीं की. दिल्ली पुलिस के एक ज़िम्मेदार सूत्र का दावा है कि दोनों ही बातें गलत हैं. लेकिन देश के गृहमंत्री के बयान को उनके अधीन काम करने वाला कोई भी अधिकारी ऐलानियाँ गलत नहीं बता सकता .ऐसा करने पर उसकी नौकरी जायेगी . लेकिन सच्चाई को बताने के लिए दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारियों ने नया तरीका निकाला है. सरकार ने दिल्ली पुलिस को जांच के दायरे से बाहर कर दिया है और एन आई ए को जांच का ज़िम्मा दे दिया है . पुलिस सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्री पी चिदंबरम का लोकसभा में दिया गया बयान बिलकुल सही नहीं है . गृह मंत्री ने दिल्ली पुलिस को दी गयी जिस चेतावनी की बात लोकसभा में की वह केंद्रीय खुफिया विभाग, आई बी से हर महीने आने वाली एक रूटीन चेतावनी मात्र है . जिसमें कहा गया था कि दिल्ली पुलिस को बहुत चौकन्ना रहना पड़ेगा क्योंकि सितम्बर में महत्वपूर्ण ठिकानों पर आतंकी हमले हो सकते हैं . अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की चेतावनी अमरीका पर हुए ११ सितम्बर २००१ के हमलों के बाद हर साल आती है . आई बी ने हाई कोर्ट पर हमले के बारे में कोई विशेष आशंका नहीं जताई थी. सी सी टी वी और कैमरों की बात पर दिल्ली पुलिस का कहना है कि हाई कोर्ट के रजिस्टार जनरल ने पी डब्ल्यू डी विभाग को मई के विस्फोट के तुरंत बाद ही दिल्ली पुलिस के सुझाव पर सी सी टी वी कैमरे लगाने के लिए कह दिया था. जब कि पी डब्ल्यू डी वालों का कहना है कि हाई कोर्ट में सी सी टी वी कैमरे लगाने के लिए टेंडर के ज़रिये प्रक्रिया शुरू कर दी गयी थी. और एक हफ्ते के अंदर कैमरे लग जायेगें.उनके अनुसार वे नियमानुसार ही काम कर सकते हैं . उनके पास कोई भी सामान बाज़ार से जाकर खरीद कर लाने के पावर नहीं है . हाँ अगर सरकार किसी काम को अर्जेंट समझती है तो वह वह विशेष पावर दे सकती है . मिसाल के तौर पर कामनवेल्थ गेम्स में सभी सरकारी विभागों एक पास अर्जेंट आधार पर खरीद करने के पावर थे . अधिकारियों को शक़ है कि गृहमंत्री का बयान आई बी वालों ने तैयार करके उन्हें दे दिया था . वह बयान आई बी एके किसी अफसर का बयान लग रहा था , देश के गृहमंत्री का तो बिलकुल नहीं . गृहमंत्री ने कुछ देर बाद जो बयान दिए वे मामले की गंभीरता के अनुरूप थे. उन्होंने कहा कि जांच का काम अब दिल्ली पुलिस के पास नहीं है , अब आतंकवादी मामलो की जांच के लिए बनाए गए ख़ास संगठन एन आई ए को जांच का ज़िम्मा दे दिया गया है . लगभग तुरंत ही एन आई ए के निदेशक, एस सी सिन्हा ने बताया कि उन्होंने जांच के लिए विशेष टीम बना दी है जिसका कमांड डी आई जी रैंक का एक आई पी एस अफसर करेगा. इस काम में सब की मदद ली जायेगी. उधर दिल्ली पुलिस के मौजूदा कमिश्नर की नेतृत्व क्षमता पर तरह तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं दिल्ली में फैले अपराधतंत्र का वे कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहे हैं. अन्ना हजारे और राम देव के मामले में भी उनकी लीडरशिप को बहुत ही लचर पाया गया था . वैसे भी दिल्ली में आजकल की पुलिस व्यवस्था बहुत ही कमज़ोर है , अपराधी बेलगाम हैं . चारों तरफ से सवालों में घिर चुकी दिल्ली पुलिस के अफसरों के आफ द रिकार्ड बयान केंद्र सरकार को बहुत ही मुश्किल में डाल सकते हैं .इस बीच हरकत-उल-जिहाद नाम के एक संगठन ने धमाके की ज़िम्मेदारी ली है लेकिन उसकी मेल जो अखबारों के दफ्तरों में आई है वह उसकी विश्वसनीयता पर शंका पैदा करती है . एक तो इस नाम का कोई आतंकवादी संगठन अब तक नोटिस में पूरी दुनिया में कहीं नहीं आया. वैसे इसका नाम हरकत-उल-जिहादे इस्लामी से मिलता जुलता है लेकिन ई मेल भेजने वाले का बिलकुल अलग है . साइबर पुलिस उसके सर्वर की जांच कर रही है .अफसरों को शक़ है कि कहीं यह ई मेल जांच से ध्यान हटाने के लिए तो नहीं भेज दिया गया . बहरहाल एन आई के निदेशक ने कहा है कि इस ई मेल को बहुत ही गम्भीरता से लिया जा रहा है . जांच करते वक़्त आतंक के हर पहलू पर गौर किया जा रहा है .
Monday, September 5, 2011
मेरे बच्चे मुझसे अच्छे हैं
शेष नारायण सिंह मुझे जीवन में करीब पांच साल शिक्षक के रूप में काम करने का मौक़ा मिला. पहली बार १९७३ में जब मैं एक डिग्री कालेज में इतिहास मास्टर था . दो साल बाद निराश होकर वहां से भाग खड़ा हुआ . वहां बी ए के बच्चों को इतिहास पढ़ाया था मैंने . वे बच्चे मेरी ही उम्र के थे. कुछ उम्र के लिहाज़ से मेरे सीनियर भी रहे होंगें . लेकिन आज तक हर साल ५ सितम्बर के दिन वे बच्चे मुझे याद करते हैं . कुछ तो टेलीफोन भी कर देते हैं . दुबारा २००५ में फिर एक बार शिक्षक बना . इस बार पत्रकारिता पढाता था. तीन बैच के बच्चे मेरे विद्यार्थी हुए . यह दौर मेरे लिए बहुत उपयोगी था. पत्रकारिता का जो सैद्धांतिक पक्ष है उसके बारे में बहुत जानकारी मुझको मिली. अपनें विद्यार्थियों के साथ साथ मैं भी नई बातें सीखता रहा . तीन साल बाद नौकरी से अलग हो गया . शायद वहां मेरा काम पूरा हो चुका था . लेकिन इन वर्षों में मैंने जिन बच्चों को पढ़ाया उन पर मुझे गर्व है . समय की परेशानियों के चलते उन बच्चों को वैसी नौकरी नहीं मिली जैसी मिलनी चाहिए थी . लेकिन मुझे मालूम है कि वे अपने दौर के बेतरीन पत्रकार हैं .अगर उन्हें मौक़ा मिला तो वे अपने संगठन को बुलंदियों पर ले जायेगें. मेरी इच्छा है कि कुछ संगठन आगे आयें और उन बच्चों को मौक़ा दें , जो लोग मुझे अच्छा पत्रकार मानते हैं मैं उनसे अपील करता हूँ कि वे मेरे बच्चों पर नज़र डालें . वे सब मुझसे बेहतर पत्रकार हैं . आज बहुत से बच्चों नें मुझे याद किया है . मैं भी उन सबसे कहना चाहता हूँ मुझेभी तुम्हारी बहुत याद आती है मेरे बच्चो. देर हो रही है लेकिन तुम सब पत्रकारिता की बुलंदियों तक जाओगे. ठोकर खाकर कभी नहीं परेशान होना . मैं जानता हूँ कि तुम लोग हर हाल में बहुत ऊंचाई तक जाओगे.
Sunday, September 4, 2011
अब पता चला कि मुंबई के राजपूत लीक से हटकर क्यों हैं
शेष नारायण सिंह मुंबई में इस बार मुझे एक बहुत ही अजीब बात समझ में आई. आमतौर पर अपनी बिरादरी की पक्षधरता से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढी के लिए यह अजूबा ही रहा हाई कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा है . हालांकि शोषण राजपूत तालुकेदारों और राजओंने किया होगा लेकिन शोषक का तमगा सब पर थोप दिया जाता रहा है .. आम राजपूत तो अन्य जातियों के लोगों की तरह गरीब ही है . मैंने अपने बचपन में देखा है कि मेरे अपने गांव में राजपूत बच्चे भूख से तडपते थे.मेरे अपने घर में भी मेरे बचपन में भोजन की बहुत किल्लत रहती थी. इसलिए राजपूतों को एक वर्ग के रूप में शोषक मानना मेरी समझ में कभी नहीं आया. लेकिन सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी और बाद में वामपंथी सोच के कारण कभी इस मुद्दे पर गौर नहीं किया . संकोच लगता था . मेरे बचपन में मेरे गाँव में राजपूतों के करीब १६ परिवार रहते थे .अब वही लोग अलग विलग होकर करीब ४० परिवारों में बँट गए हैं . मेरे परिवार के अलावा कोई भी ज़मींदार नहीं था . सब के पास बहुत मामूली ज़मीन थी. कई लोगों एक हिस्से में तो एक एकड़ से भी कम ज़मीन थी. तालाब और कुओं से सिचाई होती थी और किसी भी किसान के घर साल भर का खाना नहीं पूरा पड़ता था . पूस और माघ के महीने आम तौर पर भूख से तड़पने के महीने माने जाते थे. जिसके घर पूरा भी पड़ता था उसके यहाँ चने के साग और भात को मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर लिया गया था. मेरे गांवमें कुछ लोग सरकारी नौकरी भी करते थे हालांकि अपने अपने महकमों में सबसे छोटे पद पर ही थे. रेलवे में एक स्टेशन मास्टर ,तहसील में एक लेखपाल और ग्राम सेवक और एक गाँव पंचायत के सेक्रेटरी . तीन चार परिवारों के लोग फौज में सिपाही थे . सरकार में बहुत मामूली नौकरी करने वाले इन लोगों के घर से भूखे सो जाने की बातें नहीं सुनी जाती थीं . बाकी लोग जो खेती पर ही निर्भर थे उनकी हालत खस्ता रहती थी . लेकिन जब हम बड़े हुए और डॉ लोहिया की समाजवादी सोच से प्रभावित हुए तो मेरी समझ में आया कि राजपूत तो शोषक होते हैं ,लेकिन जब मैं अपने गाँव के राजपूतों को देखता था तो मुझे लगता था कि मेरे गाँव के लोग भी तो राजपूत हैं लेकिन शोषक होना तो दूर की बात ,वे तो शोषण के शिकार थे. बाद में समझ में आया कि चुनावी राजनीति में कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करने के उद्देश्य से राजनीतिक बिरादरी ने कुछ ऐसी जातियां मार्क कर दी थीं जिनके खिलाफ पिछड़ी और दलित जातियों को संगठित किया जा सके. हालांकि उस काममें वे सफल नहीं हुए .सवर्ण जातियों को गरिया कर पिछड़ी जातियों के वोट तो हाथ आ गए लेकिन बाद में मायावती और कांशी राम के नेतृत्व में उन्हीं पिछड़ी जातियों के खिलाफ दलित जातियों ने मोर्चा खोला और आज उत्तर प्रदेश में सबसे ऊंची ब्राहमण जाति के लोग मायावती के साथ हैं जबकि राजपूत वोट बैंक के रूप में विकसित हो चुका है और उसे अपनी तरफ खींचने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां कोशिश कर रही हैं .आज राजपूतों के एक बहुत बड़े वर्ग के लोग गरीबी की रेखा के बहुत नीचे रह रहे हैं . हालांकि यह भी सच है कि इसी बिरादरी से आने वाले बहुत सारे लोगों ने उत्तर प्रदेश में राजनीति का सहारा लेकर अच्छी खासी ताक़त अर्जित कर ली है . लेकिन वे माइनारिटी में हैं .उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में स्थित अपने गांव के हवाले से हमेशा बात को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे इंसान के लिए यह बात हमेशा पहेली बनी रही कि सबसे गरीब लोगों की जमात में खड़ा हुआ मेरे गाँव का राजपूत शोषक क्यों करार दिया जाता रहा है . मेरे गाँव के राजपूत परिवारों में कई ऐसे थे जो पड़ोस के गाँव के कुछ दलित परिवारों से पूस माघ में खाने का अनाज भी उधार लाते थे . लेकिन शोषक वही माने जाते थे. बाद में समझ में आया कि मेरे गाँव के राजपूतों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा की उपेक्षा रही है . जिन घरों के लोग पढ़ लिख गए वे आराम से रहने लगे थे . वरना पिछड़ेपन का आलम तो यह है कि इस साल राज्य सरकार ने जब सफाईकर्मी भर्ती करने का फैसला किया तो मेरे गाँव के कुछ राजपूत लड़कों ने दरखास्त दिया था. जब गाँव से बाहर निकल कर देखा तो एक और बात नज़र आई कि हमारे इलाके में जिन परिवारों के लोग मुंबई में रहते थे उनके यहाँ सम्पन्नता थी. मेरे गाँव के भी एकाध लोग मुंबई में कमाने गए थे .वे भी काम तो मजूरी का ही करते थे लेकिन मनी आर्डर के सहारे घर के लोग दो जून की रोटी खाते थे . मेरे ननिहाल में लगभग सभी संपन्न राजपूतों के परिवार मुंबई की ही कमाई से आराम का जीवन बिताते थे.ननिहाल जौनपुर जिले में है. २००४ में जब मुझे मुंबई जाकर नौकारी करने का प्रस्ताव आया तो जौनपुर में पैदा हुई मेरी माँ ने खुशी जताई और कहा कि भइया चले जाओ , बम्बई लक्ष्मी का नइहर है . बात समझ में नहीं आई . जब मुंबई में आकर एक अधेड़ पत्रकार के रूप में अपने आपको संगठित करने की कोशिश शुरू की तो देखा कि यहाँ बहुत सारे सम्पन्न राजपूत रहते हैं . देश के सभी अरबपति ठाकुरों की लिस्ट बनायी जाय तो पता लगेगा कि सबसे ज्यादा संख्या मुंबई में ही है . दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर लोगों के गाँव तत्कालीन बनारस और गोरखपुर कमिश्नरियों में ही हैं .कभी इस मसले पर गौर नहीं किया था. इस बार की मुंबई यात्रा के दौरान कांदिवली के ठाकुर विलेज में एक कालेज के समारोह में जाने का मौक़ा मिला . वहां राष्ट्रीय राजपूत संघ के तत्वावधान में उन बच्चों के सामान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिनको २०११ की परीक्षाओं में बहुत अच्छे नंबर मिले थे. बहुत बड़ी संख्या में ७० प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की लाइन लगी हुई थी और राजपूत समाज के ही सफल,संपन्न और वारिष्ठ लोगों के हाथों बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. वहां जो भाषण दिए गए उसे सुनकर समझ में आया कि मामला क्या है . उस सभा में मुंबई में राजपूतों के सबसे आदरणीय और संपन्न लोग मौजूद थे.उस कार्यक्रम में जो भाषण दिए गए उनसे मेरी समझ में आया कि माजरा क्या है . मुम्बई में आने वाले शुरुआती राजपूतों ने देखा कि मुंबई में काम करने के अवसर खूब हैं . उन्होंने बिना किसी संकोच के हर वह काम शुरू कर दिया जिसमें मेहनत की अधिकतम कीमत मिल सकती थी. और मेहनत की इज्ज़त थी .शुरुआत में तबेले का काम करने वाले यह लोग अपने समाज के अगुवा साबित हुए. उन दिनों माहिम तक सिमटी मुंबई के लोगों को दूध पंहुचाने कम इन लोगों ने हाथ में ले लिया . जो भी गाँव जवार से आया सबको इसी काम में लगाते गए. आज उन्हीं शुरुआती उद्यमियों के वंशज मुंबई की सम्पन्नता में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है . साठ और सत्तर के दशक में जो लोग मुंबई किसी मामूली नौकरी की तलाश में आये ,उन्होंने भी सही वक़्त पर अवसर को पकड़ा और अपनी दिशा में बुलंदियों की तरफ आगे चल पड़े,. आज शिक्षा का ज़माना है . प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने बारम्बार कहा है कि भारत को शिक्षा के एक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. मुंबई के राजपूत नेताओं ने इस बयान के आतंरिक तत्व को पहचान लिया और आज उत्तर प्रदेश से आने वाले राजपूतों ने शिक्षा के काम में अपनी उद्यमिता को केन्द्रित कर रखा है .उत्तरी मुंबई में कांदिवली के ठाकुर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशनस की गिनती भारत के शीर्ष समूहों में होती है . इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे राजपूत नेताओं को मैं जानता हूँ जिन्होंने शिक्षा को अपने उद्योग के केंद्र में रखने का फैसला कर लिया है . लगता है कि अब यह लोग शिक्षा के माध्यम से उद्यम के क्षेत्र में भी सफलता हासिल करेगें और आने वाली पीढ़ियों को भी आगे ले जायेगें .बहरहाल मेरे लिए यह यात्रा बहुत शिक्षाप्रद रही क्योंकि भारतीय सामाजिक जीवन के एक अहम पहलू पर बिना किसी अपराधबोध के दौर से गुजरे हुए मैंने एक सच्चाई लिख मारी .
Friday, September 2, 2011
अन्ना की टीम के किसी बन्दे को भ्रष्ट कहने वाले अच्छे लोग नहीं हैं .
शेष नारायण सिंह नई दिल्ली,२ सितम्बर.अन्ना हजारे की टीम के ख़ास सदस्यों को घेरने की केंद्र सरकार की नीति को आज अरविंद केजरीवाल ने आड़े हाथों लिया .उन्होंने कहा कि अन्ना हजारे के आन्दोलन की धार को कमज़ोर करने के लिए कांग्रेस पार्टी के हुकुम के बाद उनके पुराने विभाग़ ने सक्रियता दिखाई है . उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अन्ना हजारे की कोर टीम को दौंदियाने की कोशिश कर रही है . उनका दावा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मैदान ले चुकी इस देश की जनता सरकार की इस कोस्शिश को कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगी. अरविंद केजरीवाल आज प्रेस से मुखातिब थे . उनके साथ उनके ख़ास साथी प्रशांत भूषण और किरण बेदी भी मौजूद थे. उधर सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि उनकी टीम के दिल्ली के सदस्यों के दागदार साबित होने के बाद अन्ना हजारे इन लोगों को अपने साथ नहीं रखेगें. सरकार को भरोसा है कि अन्ना की छवि बिलकुल साफ़ है और वे जब भी उनके साथी दागदार पाए जाते हैं , वे उन्हें अपनी टीम से ड्राप कर देते हैं . ऐसा वे महाराष्ट्र में चलाए गए अपने हर आन्दोलन के बाद कर चुके हैं . केंद्र सरकार ने अरविंद केजरीवाल को घेरने की कवायद शुरू कर दी है . जब वे इनकम टैक्स विभाग में अफसर थे ,उस समय की कुछ गड़बड़ियों को कल सरकार की तरफ से मीडिया के फोकस में लाया गया था. केजरीवाल ने आज केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और कहा कि जिस नोटिस को आज हर अखबार ने प्रमुखता से छापा है वह सरकार की उस योजना का नमूना है जिसके तहत वह अन्ना हजारे की टीम के ख़ास लोगों शक़ के दायरे में लेने की कोशिश कर रही है . उन्होंने कहा कि उनके ऊपर जो ९ लाख रूपये की गड़बड़ी का आरोप लगाया गया है वह बेबुनियाद है . अरविंद केजरीवाल की बात पर कोई भी सरकारी अधिकारी बयान देने को तैयार नहीं है लेकिन खुसुर पुसुर अभियान पूरी तरह से चल रहा है . इसके पहले प्रशांत भूषण के पिता शान्ति भूषण की सी डी के मामले को भी प्रेस को लीक कर दिया गया था . उस सी डी को अमर सिंह ने प्रशांत भूषण और शान्ति भूषण को भ्रष्ट साबित करने के लिए अदालत में पेश किया था . दिल्ली पुलिस अन्ना हजारे के अनशन के ख़त्म होने के बाद उस सी डी के बारे में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल कर दिया .. यानी पुलिस मानती है कि उस मामले को साबित करने के बारे वह गंभीर नहीं है लेकिन उस सी डी के असली होने की बात को पब्लिक कर दी गयी . सच्चाई यह है कि सी डी को जिसने सुना है उसके मन में शान्ति भूषण और प्रशांत भूषण के बारे में शक़ होना स्वाभाविक है क्योंकि मुलायम सिंह यादव से जो बातचीत उसमें सुनायी पड़ रही है वह पूरी तरह से स्पष्ट है और शान्ति भूषण प्रशांत की उस क्षमता का ज़िक्र कर रहे हैं जिसके अनुसार वे जजों को मैनेज कर सकते हैं . . इस सी डी का मकसद भी अन्ना की टीम के दो ताक़तवर लोगों को धूमिल करने की कोशिश ही नज़र आती है . आज दिल्ली विकास प्राधिकरण के एक अधिकारी से बात करने पर पता लगा कि सरकार अन्ना की टीम की एक अन्य सदस्य किरण बेदी की एन जी ओ जुडी कुछ बातों को पब्लिक डोमेन में डालने की बात कर रही है . डी डी ए में चर्चा है कि किरण बेदी ने अपने एन जी ओ के लिए कुछ मकान अनाधिकृत तरीके से लेने की कोशिश की थी. इसका मतलब यह हुआ कि किरण बेदी को भी शक़ के दायरे में लाने की कोशिश शुरू हो गयी है . किरण बेदी की ख्याति बहुत ही ईमानदार अफसर की रही है लेकिन सरकार उनको भी घेरने की कोशिश कर रही है . जब सरकार की हताशा के ज़िक्र सत्तापक्ष के एक बड़े नेता से किया गया तो उनका कहना था कि इन आरोपों के बाद अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण की छवि निश्चित रूप से धूमिल होगी और जो लोग अन्ना हजारे को जानते हैं उनका दावा है कि अपने साथ किसी भी दागदार आदमी को कभी न रखने वाले अन्ना हजारे अपनी टीम में फेरबदल भी कर सकते हैं .
अन्ना हजारे को सबसे बड़ा ब्रैंड बनाने वाले पत्रकार थे या कोई और ?
शेष नारायण सिंह
अपना अनशन समाप्त करने के बाद गुडगाँव के एक अस्पताल में २-३ दिन तक स्वास्थ्य लाभ करके अन्ना हजारे वापस अपने गाँव चले गए. यह खबर आज देश के हिन्दी के सबसे बड़े अखबार में पहले पेज पर छपी है .खबर गुडगाँव के संवाददाता की है और ,एक कालम की यह खबर करीब १०० शब्दों में निपटा दी गयी है . देश के सबसे बड़े अंग्रेज़ी अखबार में भी यह खबर पहले पेज पर संक्षिप्त छापी गयी है .यानी अब प्रिंट मीडिया को अन्ना हजारे और उनकी राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं बची है . लेकिन टेलिविज़न मीडिया ने कल शाम को जब अन्ना हजारे अस्पताल से निकले तो उस विदाई को मीडिया इवेंट बनाने की पूरी कोशिश की . कुछ चैनलों पर अन्ना हजारे की अस्पताल से विदाई की खबरों को देखने का मौका मुझे भी मिला. हेडलाइन थी कि अन्ना हजारे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी है . एक कार में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ कर अन्ना हजारे को जाते हुए दिखाया गया था. वही सफ़ेद गांधी टोपी, वही सफ़ेद कुरता और वही सौम्य मुस्कान . . करीब ३ सेकण्ड का यह शाट बार बार दिखाया गया . साथ में न्यूज़ रीडर की आवाज़ भी कानों में पंहुच रही थी कि अन्ना हजारे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी है . उसी शाट को करीब २५ मिनट तक लगातार दिखाया गया और एक ही वाक्य को न्यूज़रीडर तरह तरह से बोलता रहा. कभी कहता कि अन्ना हजारे को असपताल से छुट्टी दे दी गयी है . और वे कहीं जा रहे हैं . . फिर कहता कि हम आपको इस बारे में पल पल की जानकारी दे रहे हैं . अब हम गुडगाँव से चलते हैं जहां हमारे संवाद दाता मिस्टर अमुक लाइव जुड़ रहे हैं . और अब वे पल पल की जानकारी देंगें . लाइव संवाददाता भी वही वाक्य कुछ फेर बदल करके सुनाते और कहते कि अभी पता नहीं है कि अन्ना को कहाँ ले जाया जा रहा है . यह भी नहीं पता कि उनके साथ कौन कौन हैं . यह भी नहीं पता कि वे कहाँ जा रहे हैं . यानी करीब ७ वाक्य ऐसे होते थे कि लाइव संवाद दाता को पता ही नहीं कि खबर क्या है लेकिन टेलिविज़न पर हैं तो कुछ न कुछ तो बोलते ही रहना है लिहाजा कुछ ऐसे वाक्य बोलते रहे जिन वाक्यों को न्यूज़ रीडर और लाइव संवाददाता ने मिलकर २५ मिनटों में सैकड़ों बार बोला होगा. बार बार लगता था कि बीच में यह न्यूज़ रीडर थोडा समय निकाल कर उन खबरों के बारे में भी बता देगा जिससे देश को पता चलता कि उत्तर भारत के बहुत सारे इलाकों में भारी बाढ़ आई हुई है . कुछ इलाकों में लोग पेड़ों पर रह रहे हैं , कुछ इलाकों में लोग बाढ़ की वजह से पूरी तरह से अलग थलग पड़ गए हैं और भूख से तड़प रहे हैं . लेकिन ऐसा कहीं होता नहीं दिखा . शाम को भी कुछ चैनलों को देखने का मौक़ा मिला . वहां भी कुछ ऐसी बहसें चल रही थीं जिनको देख कर लगता ही नहीं था कि असली भारत किन मुसीबतों से जूझ रहा है. राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी और अफज़ल गुरु की फांसी की राजनीतिक विवेचना भी कुछ चैनलों पर नज़र आई. लेकिन इन खबरों को आज अखबारों ने वह इज्ज़त नहीं दी है जो रुतबा इन का कल के टी वी चैनलों पर देखने को मिला .
ज़ाहिर है कि भारतीय मीडिया की प्राथमिकताएं खबर की औकात से नहीं किसी अन्य कारण से तय होती हैं . कुछ कठोर आलोचक टी वी न्यूज़ की प्राथमिकता को तय करने का पैमाना टी आर पी को बता कर टी वी चैनलों को बहुत ही स्वार्थी संगठन के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं . उस तर्क से तो टी वी चैनल इंसान की कमजोरी का बौद्धिक शोषण करने वाले संगठन के रूप में मान लिए जायेगें . आम तौर पर इंसान की यह कमजोरी होती है कि वह अपने बारे में खबर देख कर बहुत खुश होता है .हालांकि कई ज्ञानी टी वी संपादक इस बात को सेमिनारों आदि में इस बात को खुद स्वीकार करते पाए जाते हैं लेकिन उन्हें शायद मालूम ही नहीं है कि वे क्या स्वीकार कर रहे हैं . टी आर पी के दबाव में खबरों को प्रस्तुत करने की बात को कुछ हद तक तो स्वीकार किया जा सकता है लेकिन यह पूरी तरह से सच नहीं है .भारत में टेलिविज़न की बहुत सारी खबरों ने इतिहास रचा है . उन सबको यहाँ दुहराना समीचीन नहीं होगा लेकिन समकालीन भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ ऐसी खबरें ज़रूर हैं जिनके कारण बहुत बड़े बड़े घोटाले पब्लिक डोमेन में आये. कामनवेल्थ खेलों के घोटाले, २ जी स्पेट्रम के घोटाले आदि ऐसे उदाहरण हैं जिनको फोकस में लाने में टेलिविज़न चैनलों का भारी योगदान है . बंगारू लक्ष्मण नाम के नेता को नोटों के बण्डल संभालते दिखाकर टेलिविज़न ने भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग में एक संगमील स्थापित किया था . लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है इस तरह की खबरें उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं . कामनवेल्थ खेल और २ जी वाला घोटाला तो देश के राजनीतिक विकास में भारी योगदान कर रहा है . कांग्रेस को एक भ्रष्ट पार्टी के रूप में चिन्हित करने में इन खबरों का बहुत बड़ा योगदान है . लेकिन जब टेलिविज़न एक व्यक्ति के अनशन को राष्ट्रीय एजेंडा पर लाने की कोशिश करता है तो बात अजीब लगती है . टेलिविज़न की कृपा से ही ब्रैंड अन्ना अगस्त के दूसरे पखवाड़े के समय काल में १० दिनों का विज्ञापन की दुनिया का सबसे बड़ा भारतीय ब्रैंड बन सका . विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोगों का कहना है किसी एक आदमी को १५ दिन के अंदर देश का टाप ब्रैंड बनाना कोई मामूली सफलता नहीं है . उसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर प्लानिंग की ज़रूरत होती है . देश के आम आदमी को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि किसी को ब्रैंड बनाने के लिए कितनी प्लानिंग की गयी और कितनी नहीं की गयी. लेकिन उसे इस बात से ज़रूर मतलब है कि वह टेलिविज़न पर ऐसी ख़बरों को देखे जिस से उसकी जानकारी बढे. यहाँ कम्युनिकेशन थियरी के महान विद्वानों मार्शल मैक्लुहान और रेमंड विलियम्स के विचारों का हवाला देकर कोई प्वाइंट स्कोर करने की मंशा नहीं है लेकिन आम आदमी की उस जिज्ञासा को ज़रूर रेखांकित किया जाना चाहिए कि वह उन खबरों को ही देखे जो उसकी जानकारी में वृद्धि करें. अगर जानकारी में वृद्धि करने के बाद कोई खबर बार बार श्रोता के सर पर हथौड़े की तरह काम कर रही है तो उसे विज्ञापन कहा जायेगा. यहाँ इस बहस में भी जाने की ज़रुरत नहीं है कि पंद्रह दिनों तक टेलिविज़न पर अन्ना हजारे की जो ब्रैंड बिल्डिंग की गयी उसका उद्देश्य क्या था और उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए टेलिविज़न टाइम कौन मुहैया करवा रहा था लेकिन यह बात सच है कि समाचार की जितनी भी परिभाषाएं अब तक जानकारी में आई हैं उनके अनुसार १५ दिन तक टेलिविज़न पर चला अन्ना हजारे का अभियान किसी भी सूरत में खबर की श्रेणी में नहीं आता . हाँ अगर यह मान लिया जाय कि वह ब्रैंड बिल्डिंग का एक आयोजन था तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी. आज के अखबारों में छपी अन्ना हजारे से सम्बंधित ख़बरों को जो मामूली ट्रीटमेंट हुआ है उसे देख कर समझ में आ जाता है कि पत्रकार बिरादरी तो अन्ना हजारे वाली ख़बरों को सही समझ रही थी लेकिन जो नज़र आ रहा था वह पत्रकारों के कारण नहीं नज़र आ रहा था. बार बार सवाल उठता है कि कहीं वह ब्रैंड मैनेजरों का काम तो नहीं था.
Thursday, September 1, 2011
ताकि सड़क पर कोई मासूम घायल न हो
शेष नारायण सिंह
नोयडा,१ सितम्बर . शहर में बढ़ रहे वाहनों और बेलगाम ड्राइवरों से घबडा कर शहर में सडक दुर्घटना रोकने का एक नागरिक प्रयास चल रहा है .' राही ' नाम की एक स्वयंसेवी संस्था ने सड़क दुर्घटना रोकने को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक अहम क़दम उठाया है . संगठन की कोशिश है कि आने वाले कुछ महीनों में नोयडा में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाए जहां सड़क दुर्घटना को रोकने के तरीकों पर तरह तरह के आयोजन किये जायेगें. फिलहाल अभी शहर में छठवीं, सातवीं और आठवीं के बच्चों को सड़क दुर्घटना रोकने और उस से बचने के लिए जनजागरण की योजना को बहुत ही मामूली स्तर पर चलाया जा रहा है .
' राही ' की निगरानी में रोड एक्सीडेंट प्रिवेंशन इंस्टीटयूट शुरू करने की योजना क अंतिम रूप दिया जा चुका है , जहां सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने की कोशिश को बहुत ही गंभीर सामाजिक और मेडिकल समस्या के रूप में उठाया जाएगा . शहर के तीन डाक्टरों , श्रीमती ( डॉ) गुंजन धारी ,डॉ वी पी सिंह और डॉ इब्राहीम ने मिलकर शुरुआती योजना २००४ में बनायी थी . आर्थिक उदारीकरण के बाद शहर में वाहनों की संख्या में हो रही बेलगाम वृद्धि और उसकी वजह से हो रही दुर्घटनाओं से यह लोग विचलित थे . वाहनों की संख्या या ड्राइवरों के आचरण पर काबू पाना तो बहुत ही कठिन काम है . इन लोगों ने सोचा कि सड़क को दुर्घटनामुक्त करने की कोशिश की जाए. उसी संकल्प के नतीजे के रूप में इस संगठन ने जन्म लिया .सड़क दुर्घटना के शिकार होने वालों में सबसे ज्यादा संख्या में बच्चों की होती है . इस लिए अभी कम उम्र के बच्चों को की टार्गेट किया गया है . दिल्ली और आस पास के शहरों में बहुत तेज़ कार चलाने वालों में बहुत बड़ी तादाद १८ से २५ साल के नौजवानों की होती है . ' राही ' की कोशिश है कि जब १० से १४ साल के बच्चे कार चलाने की उम्र में पंहुचें तो वे सड़क हादसों की भयावहता से पूरी तरह से परिचित हों. मकसद साफ़ है . वे चाहते हैं कि सड़क पर बच्चे न तो मरें, न ही अपाहिज हों और न ही घायल हों . अगर दुर्घटना हो ही गयी तो हादसे के शिकार लोगों की समुचित चिकत्सा हो सके .
सड़क पर बच्चों की सुरक्षा के बारे में उनके माता पिता को भी जागृत किया जायेगा. इस काम में लीफलेट, पोस्टर आदि के ज़रिये जनजागरण की योजना पर काम हो रहा है. अभी इन डाक्टरों ने किसी से कुछ भी आर्थिक सहायता नहीं ली है . अपने १०० मित्रों और रिश्तेदारों की एक लिस्ट बना रखी है जिनसे हर महीने ११०० रूपये लिया जाता है . उसी धनराशि से शुरुआती काम चल रहा है . एक बातचीत में राही की संस्थापक ,डॉ गुंजन ने बताया कि काम फैला तो समाज के अन्य वर्गों को इस प्रयास में शामिल किया जायेगा.इनकी कोशिश है कि साल के अंत तक इस अभियान के बारे में पूरी तरह से जागरूकता का प्रचार कर दिया जाए. इस काम के लिए इच्छुक नागरिकों की एक फ़ोर्स तैयार करने की भी योजना है . . हर इलाके में ' राही ' के प्रयास से मंडलियाँ बनायी जा रही है जो अपने स्तर पर सड़क से हादसे को दूर रखने के लिए प्रयास कर रही हैं . संगठन की कोशिश है कि आने वाले वर्षों में उन संगठनों का एक सम्मलेन बुलाया जाय जो सड़क दुर्घटना के खतरों को कम करने के लिए प्रयास कर रहे हैं .
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