शेष नारायण सिंह
बीजेपी में शीर्ष स्तर पर गडबडी के संकेत साफ़ नज़र आने लगे हैं . मुख्य सतर्कता आयुक्त के मसले पर लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जो कुछ भी किया उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्ववास रखने वालों को संतोष ही होगा . सुषमा स्वराज ने सी वी सी की नियुक्ति के मामले में जो भी काम किया है वह शुरू से अंत तक मर्यादा की मिसाल है . जानकार बताते हैं कि अगर उनका आचरण ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले वक़्त में वे एक स्टेट्समैन राजनेता के रूप में स्थापित हो जायेगीं . संविधान में दी गयी व्यवस्था के तहत लोकसभा में विपक्ष की नेता ,सुषमा स्वराज उस सेलेक्शन कमेटी की सदस्य हैं जो सी वी सी का चुनाव करती है . जब चुनाव करने के लिए बैठक हुई तो तो सुषमा स्वराज ने विरोध किया और कहा कि एक भ्रष्ट आदमी को भ्रष्टाचार पर काबू करने वाले पद पर नहीं तैनात किया जाना चाहिए . उनके अलावा उस कमेटी में प्रधान मंत्री और गृह मंत्री भी सदस्य थे. उनके विरोध को दरकिनार करके सरकारी पक्ष ने पी जे टामस को नियुक्त कर दिया . लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने टामस की नियुक्ति को रद कर दिया तो सरकार की भारी किरकिरी हुई और प्रधानमंत्री को संसद में अपनी गलती माननी पड़ी .ज़ाहिर है कि अब एक नया सी वी सी तैनात किया जाएगा और सरकारी काम अपने ढर्रे से चलेगा . सुषमा स्वराज ने लोकतांत्रिक और उदारता की परम्पराओं को ध्यान में रख कर अपने ट्विटर पर बयान दे दिया कि ' मैं समझती हूँ कि इतना काफी है और अब बात यहीं ख़त्म कर डी जानी चाहिए और अब आगे बढ़ जाना चाहिए '. सुषमा स्वराज का यह बयान ऐसा है जिस पर किसी भी लोकतांत्रिक मूल्यों के कद्रदान को गर्व होगा . लेकिन उनके इस बयान के बाद बीजेपी का असली चेहरा सामने आ गया . नागपुर शहर के बीजेपी नेता और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपनी हनक स्थापित करने का मौक़ा देखा और ऐलान कर दिया कि सुषमा जो कह रही हैं वह बीजेपी की पार्टी लाइन नहीं है . बीजेपी वाले इस चक्कर में हैं कि प्रधानमंत्री को एक गलत काम करते पकड़ लिया है तो उस से अधिकतम राजनीतिक लाभ लिया जाना चाहिए . राज्यसभा में आज का अरुण केतली का बयान भी इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए. उन्होंने राज्य सभा में आज एक तरह से सुषमा स्वराज की लाइन को रद्द करते हुए कहा कि सी वी सी की नियुक्ति और उस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनज़र, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को राष्ट्र को पूरी तरह से जवाब देना चाहिए. इसका मतलब यह हुआ कि एक बहुत ही साधारण से मामले को लेकर बीजेपी के आपसी मतभेद पूरी तरह से सामने आ गए हैं . यह मतभेद कोई एक स्तर पर नहीं हैं . इसकी कई परते हैं . सबसे बड़ी बात तो यही है कि बीजेपी में नागपुर लाइन वाले कभी भी किसी ऐसे नेता को राष्ट्रीय स्तर पर मह्त्व नहीं लेने देगें जो आर एस एस का "तपा तपाया "कार्यकर्ता न हो . यह भेद बहुत शुरू से चला आ रहा है .ताज़ा मिसाल यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह और शत्रुघ्न सिन्हा की है . बीजेपी के गैर आर एस एस नेता लोग अक्सर मौक़ा चूक जाते हैं . क्योंकि बीजेपी में जो लोग भी ऊपर पंहुचे हैं और संघी ट्रेनिंग लिए बिना पार्टी में आये हैं ,उन्हें 'तपे तपाये ' भाजपाइयों से नीची श्रेणी में रखा जाता है . इस पैमाने पर सुषमा स्वराज बिलकुल फेल हो जाती हैं . जहां तक यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह का सवाल है , वे तो सरकारी नौकर थे . उनके खिलाफ कुछ भी नही है लेकिन सुषमा स्वराज तो समाजवादी रही हैं. वे एस वाई एस की सदस्य भी रह चुकी हैं , इमरजेंसी के खिलाफ इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ लाठी भी भांज चुकी हैं और समाजवादी कोटे से जनता पार्टी में १९७७ में शामिल हुई थीं . बडौदा डायनामाईट केस में जब वे जार्ज फर्नांडीज़ की वकील बनीं तो दुनिया ने उनकी हिम्मत का लोहा माना था .जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वे मंत्री भी बनीं , हरियाणा में सबसे कम उम्र की मंत्री रहने का सौभाग्य भी उन्हें मिल चुका है . वे मूल रूप से समाजवादी सोच की नेता हैं और शायद इसीलिये वे लोकत्रांत्रिक मूल्यों के प्रति ज्यादा सजग हैं . लेकिन यह बात संघ के "तपे तपाये " लोगों के गले नहीं उतरती है . इस बात में दो राय नहीं है कि बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद सुषमा सबसे कद्दावर नेता हैं . बीजे पी का मौजूदा झगडा शायद इसी वैचारिक मतभेद के कारण ही एक मामूली से मुद्दे पर उबल पड़ा और आर एस एस की ओर से आये लगभग सभी नेता सुषमा स्वराज के खिलाफ जुट पड़े हैं . बीजेपी जैसी पुरुषप्रधान मानसिकता वाली पार्टी में किसी महिला के लिए सबसे ऊंचे पद पर पंहुचना वैसे भी बहुत मुश्किल माना जाता है . ऊपर से सुषमा स्वराज 'तपे तपाये' कटेगरी की नहीं हैं ,वे समाजवादी बैकग्राउंड से आई हैं . उनके लिए और भी मुश्किल होगा .
Friday, March 11, 2011
Thursday, March 10, 2011
वे शिक्षकों को मारते क्यों हैं ?
शेष नारायण सिंह
मध्यप्रदेश में खंडवा के गवर्नमेंट कालेज के एक प्रोफेसर को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्यों ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा. उसका चेहरा काला किया और उसे लात घूंसों और जूतों से मारा . जान बचाने के लिए जब वह अध्यापक भाग कर प्रिंसिपल के आफिस में छुप गया तो वहां से भी घसीट कर बाहर लाये और उसको अधमरा कर दिया . संतोष की बात यह है कि वह अभी जिंदा है वरना इसी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् यानी ए बी वी पी के सदस्यों ने कुछ वर्ष पहले इंदौर में एक प्रोफ़ेसर को पीट पीट कर मार डाला था. इस में कुछ भी नया नहीं है . ए बी वी पी की मालिक संस्था आर एस एस है और वहां मतवैभिन्य के लिए कोई स्पेस नहीं होता . उज्जैन के एक कालेज में २००६ में छात्रसंघ चुनावों के विवाद में ए बी वी पी वालों ने अपने ही कालेज के शिक्षकों को घेर कर मारा जिसमें राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर , सभरवाल की मृत्यु हो गयी.उज्जैन में उस वक़्त तैनात जिलाधिकारी, नीरज मंगलोई ने कहा था कि पुलिस और प्रशासन उस मामले की छानबीन कर रहा है . बाद में पुलिस ने अदालत में इतना कमज़ोर केस प्रस्तुत किया कि सभी अभियुक्त बरी हो गए . मौजूदा केस में भी खंडवा के पुलिस अधीक्षक , आर के शिवहरे ने कहा है कि बुधवार को प्रो. चौधरी ने एक शिकायत की जिसमें उन्होंने कहा कि ए बी वी पी के सदस्यों ने उन्हें मारा पीटा . उन्होंने कहा कि मामला दर्ज हो गया है और जांच के बाद ज्यादा जानकारी दी जा सकेगी. इस पुलिस वाले के बयान और २००६ में उज्जैन के कलेक्टर के बयान में भारी समानता है . इसी तरह के बयान गुजरात में भी लगभग हर जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान ने फरवरी २००२ में दिया था जहां मोदी के गिरोह के लोगों ने मुसलमानों को घेर घेर कर मारा था .मध्य प्रदेश से लगातार इस तरह की शिकायतें मिल रही हैं . ज़्यादातर मामले तो पुलिस तक पंहुचते ही नहीं लेकिन जो थोड़े बहुत पंहुचते हैं उन्हें देखकर लगता है वहां भी हालात गुजरात जैसे ही हो गए हैं . गुजरात में तो नरेंद्र मोदी के गैंग के लोग दावा करने लगे हैं कि राज्य का मुसलमान मोदी जी को अपना असली नेता मानने लगा है . ज़ाहिर है कि वहां इतनी दहशत है कि किसी की हिम्मत नहीं है कि वह मुख्यमंत्री के खिलाफ अपने लोकतांत्रिक विरोध को व्यक्त कर सके . गुजरात की तरह ही मध्य प्रदेश में भी में ए बी वी पी के लोग बहुत ही मनबढ़ हो गए हैं . उनका अपना बंदा राज्य का मुख्यमंत्री है , ज़ाहिर है वह भी ए बी वी पी वालों के साथ वैसा ही आचरण करता है जैसा गुजरात में आर एस एस के प्रमुख संगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ नरेंद्र मोदी करते हैं . खंडवा की घटना में भी ए बी वी पी के छात्रों ने लगभग वैसा ही आचरण किया जैसा गुजरात में वी एच पी और बजरंग दल वालों ने फरवरी २००२ में किया था जब गोधरा के ट्रेन हादसे के बाद उन लोगों ने पूरे राज्य में मुसलमानों को अपमानित किया था और उनकी सामूहिक हत्या की थी.
मध्य प्रदेश की यह घटना भी किसी योजना का हिस्सा लगती है .पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में कई प्रोफेसरों पर हमले किये गए. शिक्षा संस्थाओं पर भी खूब हमले हो रहे हैं .उजैन के प्रोफ़ेसर सभरवाल की हत्या का मामला बहुत ज्यादा चर्चा में आ गया था . यहाँ तक कि ऊपरी अदालतों के आदेश के बाद मामला मध्य प्रदेश के बाहर नागपुर ले जाया गया था लेकिन शुरुआत इंदौर में ही राज्य सरकार के दबाव में पुलिस ने केस को इतना कमज़ोर कर दिया था कि सभी अभियुक्त बरी हो गए थे.. जुलाई २००९ में ए बी वी पी वालों ने जबलपुर के एक निजी संस्थान पर हमला किया और जान माल को नुकसान पंहुचाया . आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलों के खिलाफ आन्दोलन कर रहे ए बी वी पी के भाई लोग इस संस्थान में पंहुच गए और अपना गुस्सा उतारा. मतभेद को मारपीट से हल करने का जो तरीका है उसको ही राजनीतिशास्त्र में तानाशाही कहते हैं . दुनिया जानती है कि आर एस एस की राजनीति मूल रूप से तानाशाही की राजनीति है जो नीत्शे और माज़िनी के दर्शनशास्त्र पर आधारित है . हिटलर ने इसी सिद्धांत को अपनाया था . आर एस एस ने हमेशा ही हिटलर को सम्मान की नज़र से देखा है . आर एस एस के तत्कालीन सर संघचालक , माधव सदाशिव गोलवलकर की नागपुर के भारत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित किताब, " वी ,आर अवर नेशनहुड डिफाइंड " के 1939 संस्करण के पृष्ठ 37 पर श्री गोलवलकर ने लिखा है कि हिटलर एक महान व्यक्ति है और उसके काम से हिन्दुस्तान को बहुत कुछ सीखना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए . दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में हिटलर को अपना पूर्वज बताकर कोई भी गर्व नहीं कर सकता . लेकिन आर एस एस के लिए हिटलर आदर्श पुरुष हैं . इसलिए मध्य प्रदेश में छात्रों की असहिष्णुता आर एस एस की मूल राजनीतिक सोच पर ही आधारित मानी जायेगी. इसी विचार धारा को १९३० के दशक में मुसोलिनी ने इटली में लागू किया था. माज़िनी ने वी डी सावरकर बहुत प्रभावित हुए थे और उसकी किताब न्यू इटली को ही उन्होंने अपनी किताब " हिन्दुत्व " का आदर्श बनाया . उनकी किताब हिंदुत्व को लागू करने के लिए जिन पांच लोगों ने १९२५ में नागपुर में आर एस एस की स्थापना की वे सभी सावरकर से बहुत प्रभावित थे और उनके विचारों को लागू करने के लिए ही आर एस एस की स्थापना की गयी. ऐसी तानाशाही बुनियाद वाले संगठनों से और कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए . इनका केवल एक ही इलाज है कि संघी विचारधारा का वैचारिक स्तर पर हर जगह विरोध किया जाए . अगर इस काम को फ़ौरन शुरू न कर दिया गया तो देश धीरे धीरे हिटलरशाही सत्ता की तरफ बढ़ जाये़या .सभी जानते हैं कि एक बार हिटलरशाही के कायम हो जाने के बाद उसे हटा पाना बहुत मुश्किल होता है
मध्यप्रदेश में खंडवा के गवर्नमेंट कालेज के एक प्रोफेसर को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्यों ने दौड़ा दौड़ा कर पीटा. उसका चेहरा काला किया और उसे लात घूंसों और जूतों से मारा . जान बचाने के लिए जब वह अध्यापक भाग कर प्रिंसिपल के आफिस में छुप गया तो वहां से भी घसीट कर बाहर लाये और उसको अधमरा कर दिया . संतोष की बात यह है कि वह अभी जिंदा है वरना इसी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् यानी ए बी वी पी के सदस्यों ने कुछ वर्ष पहले इंदौर में एक प्रोफ़ेसर को पीट पीट कर मार डाला था. इस में कुछ भी नया नहीं है . ए बी वी पी की मालिक संस्था आर एस एस है और वहां मतवैभिन्य के लिए कोई स्पेस नहीं होता . उज्जैन के एक कालेज में २००६ में छात्रसंघ चुनावों के विवाद में ए बी वी पी वालों ने अपने ही कालेज के शिक्षकों को घेर कर मारा जिसमें राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर , सभरवाल की मृत्यु हो गयी.उज्जैन में उस वक़्त तैनात जिलाधिकारी, नीरज मंगलोई ने कहा था कि पुलिस और प्रशासन उस मामले की छानबीन कर रहा है . बाद में पुलिस ने अदालत में इतना कमज़ोर केस प्रस्तुत किया कि सभी अभियुक्त बरी हो गए . मौजूदा केस में भी खंडवा के पुलिस अधीक्षक , आर के शिवहरे ने कहा है कि बुधवार को प्रो. चौधरी ने एक शिकायत की जिसमें उन्होंने कहा कि ए बी वी पी के सदस्यों ने उन्हें मारा पीटा . उन्होंने कहा कि मामला दर्ज हो गया है और जांच के बाद ज्यादा जानकारी दी जा सकेगी. इस पुलिस वाले के बयान और २००६ में उज्जैन के कलेक्टर के बयान में भारी समानता है . इसी तरह के बयान गुजरात में भी लगभग हर जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान ने फरवरी २००२ में दिया था जहां मोदी के गिरोह के लोगों ने मुसलमानों को घेर घेर कर मारा था .मध्य प्रदेश से लगातार इस तरह की शिकायतें मिल रही हैं . ज़्यादातर मामले तो पुलिस तक पंहुचते ही नहीं लेकिन जो थोड़े बहुत पंहुचते हैं उन्हें देखकर लगता है वहां भी हालात गुजरात जैसे ही हो गए हैं . गुजरात में तो नरेंद्र मोदी के गैंग के लोग दावा करने लगे हैं कि राज्य का मुसलमान मोदी जी को अपना असली नेता मानने लगा है . ज़ाहिर है कि वहां इतनी दहशत है कि किसी की हिम्मत नहीं है कि वह मुख्यमंत्री के खिलाफ अपने लोकतांत्रिक विरोध को व्यक्त कर सके . गुजरात की तरह ही मध्य प्रदेश में भी में ए बी वी पी के लोग बहुत ही मनबढ़ हो गए हैं . उनका अपना बंदा राज्य का मुख्यमंत्री है , ज़ाहिर है वह भी ए बी वी पी वालों के साथ वैसा ही आचरण करता है जैसा गुजरात में आर एस एस के प्रमुख संगठनों के कार्यकर्ताओं के साथ नरेंद्र मोदी करते हैं . खंडवा की घटना में भी ए बी वी पी के छात्रों ने लगभग वैसा ही आचरण किया जैसा गुजरात में वी एच पी और बजरंग दल वालों ने फरवरी २००२ में किया था जब गोधरा के ट्रेन हादसे के बाद उन लोगों ने पूरे राज्य में मुसलमानों को अपमानित किया था और उनकी सामूहिक हत्या की थी.
मध्य प्रदेश की यह घटना भी किसी योजना का हिस्सा लगती है .पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में कई प्रोफेसरों पर हमले किये गए. शिक्षा संस्थाओं पर भी खूब हमले हो रहे हैं .उजैन के प्रोफ़ेसर सभरवाल की हत्या का मामला बहुत ज्यादा चर्चा में आ गया था . यहाँ तक कि ऊपरी अदालतों के आदेश के बाद मामला मध्य प्रदेश के बाहर नागपुर ले जाया गया था लेकिन शुरुआत इंदौर में ही राज्य सरकार के दबाव में पुलिस ने केस को इतना कमज़ोर कर दिया था कि सभी अभियुक्त बरी हो गए थे.. जुलाई २००९ में ए बी वी पी वालों ने जबलपुर के एक निजी संस्थान पर हमला किया और जान माल को नुकसान पंहुचाया . आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलों के खिलाफ आन्दोलन कर रहे ए बी वी पी के भाई लोग इस संस्थान में पंहुच गए और अपना गुस्सा उतारा. मतभेद को मारपीट से हल करने का जो तरीका है उसको ही राजनीतिशास्त्र में तानाशाही कहते हैं . दुनिया जानती है कि आर एस एस की राजनीति मूल रूप से तानाशाही की राजनीति है जो नीत्शे और माज़िनी के दर्शनशास्त्र पर आधारित है . हिटलर ने इसी सिद्धांत को अपनाया था . आर एस एस ने हमेशा ही हिटलर को सम्मान की नज़र से देखा है . आर एस एस के तत्कालीन सर संघचालक , माधव सदाशिव गोलवलकर की नागपुर के भारत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित किताब, " वी ,आर अवर नेशनहुड डिफाइंड " के 1939 संस्करण के पृष्ठ 37 पर श्री गोलवलकर ने लिखा है कि हिटलर एक महान व्यक्ति है और उसके काम से हिन्दुस्तान को बहुत कुछ सीखना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए . दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में हिटलर को अपना पूर्वज बताकर कोई भी गर्व नहीं कर सकता . लेकिन आर एस एस के लिए हिटलर आदर्श पुरुष हैं . इसलिए मध्य प्रदेश में छात्रों की असहिष्णुता आर एस एस की मूल राजनीतिक सोच पर ही आधारित मानी जायेगी. इसी विचार धारा को १९३० के दशक में मुसोलिनी ने इटली में लागू किया था. माज़िनी ने वी डी सावरकर बहुत प्रभावित हुए थे और उसकी किताब न्यू इटली को ही उन्होंने अपनी किताब " हिन्दुत्व " का आदर्श बनाया . उनकी किताब हिंदुत्व को लागू करने के लिए जिन पांच लोगों ने १९२५ में नागपुर में आर एस एस की स्थापना की वे सभी सावरकर से बहुत प्रभावित थे और उनके विचारों को लागू करने के लिए ही आर एस एस की स्थापना की गयी. ऐसी तानाशाही बुनियाद वाले संगठनों से और कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए . इनका केवल एक ही इलाज है कि संघी विचारधारा का वैचारिक स्तर पर हर जगह विरोध किया जाए . अगर इस काम को फ़ौरन शुरू न कर दिया गया तो देश धीरे धीरे हिटलरशाही सत्ता की तरफ बढ़ जाये़या .सभी जानते हैं कि एक बार हिटलरशाही के कायम हो जाने के बाद उसे हटा पाना बहुत मुश्किल होता है
Wednesday, March 9, 2011
कांग्रेस ने बनाया दिल्ली को अपराध की राजधानी
शेष नारायण सिंह
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा की उसके कालेज के सामने ही सरे आम गोली मार कर हत्या कर दी गयी .इस घटना ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित कर दिया है कि दिल्ली भारत की राजनीतिक राजधानी होने के साथ साथ आपराधिक राजधानी भी है . दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मामले में पीड़ित परिवार के घर जाकर राजनीतिक पेशबंदी शुरू कर दी है . आज उन्होंने मारी गयी लड़की के परिवार को दिलासा दिलाई और भरोसा दिया कि वे परिवार को न्याय दिलायेगीं . इसके पहले, कल उन्होंने इस घटना पर बहुत दुख व्यक्त किया था और बताया था कि दिल्ली में महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है. . शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और उनका मौक़े पर पंहुचना बिलकुल सही है . लेकिन पिछले दो दिन से इस विषय पर चल रहे उनके बयान बहुत अजीब लगते हैं . सवाल पैदा होता है कि जब वे खुद दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी की ही केंद्र में सरकार है तो एक राजनेता के रूप में क्या उनके पास इस बात का नैतिक अधिकार है कि वे पीड़ित के परिवार वालों के घर जाएँ और वहां राजनीतिक स्कोर बढायें. सच्ची बात यह है कि उनको अपनी पार्टी की बड़ी नेता सोनिया गाँधी के पास जाना चाहिए था और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए थी कि जिस दिल्ली की वे मुख्यमंत्री हैं , उसे सुरक्षित करवाने में उनका साथ दें . केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास दिल्ली पुलिस का ज़िम्मा है . राज्य में कानून व्यवस्था का सारा काम दिल्ली पुलिस के पास ही है . शीला दीक्षित को चाहिए कि वे सोनिया गांधी से कहें वे कांग्रेस नेता और देश के गृहमंत्री, पी चिदंबरम को सुझाव दें कि दिल्ली वालों की ज़िंदगी से दहशत की मात्रा थोडा कम कर दें . यह काम केंद्र सरकार का है जो उसे चलाने वाली कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक ज़िम्मा है . मारी गई लडकी के घर जाकर शीला दीक्षित इस बुनियादी ज़िम्मेदारी को टाल नहीं सकतीं . शीला दीक्षित ने कल ही कहा था कि दिल्ली में महिलायें सुरक्षित नहीं है . यह कह देने से उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं होती. दिल्ली शहर में कानून व्यवस्था की हालत बहुत खराब है . आज हेही खबर आई है कि एक प्रसिद्द वकील की माँ को बदमाशों ने मार डाला . आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में लगभग रोज़ ही किसी न किसी महिला का क़त्ल होता है , आये दिन बच्चियों के रेप की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं . सरकारी तंत्र के बाबू लोग हर हालात से बेखबर अपनी ज़िंदगी जीते रहते हैं . दिल्ली में लगभग रोज़ ही सडकों पर मार पीट और क़त्ल की खबरें आती रहती हैं . दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता इस समस्या को हल करने की दिशा में कोई कारगर क़दम नहीं उठाते.
जिस बच्ची की हत्या के बारे में उसके मातापिता से मिलने शीला दीक्षित गयी थीं , उसकी हत्या के मामले को आज लोक सभा में बीजेपी के नेता शाहनवाज़ हुसैन ने भी उठाया .उन्होंने कहा कि दिल्ली अपराध की राजधानी बन गयी है और उनकी पार्टी के नेताओं ने शेम शेम के नारे लगाए . सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में चारों तरफ फैले हुए अपराध को इस तरह से संभाला जा सकता है . क्या अपराध पर राजनीतिक बयान बाज़ी का सहारा लेकर काबू किया जा सकता है .ज़ाहिर है राजनीतिक स्कोर कार्ड में नंबर बढाने की नेताओं की आदत से दिल्ली का कुछ भी नहीं बनने वाला है . इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए और वह राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों ही मुख्य पार्टियों की ओर से आनी चाहिए . यह समस्या वास्तव में अब राजनीतिक समस्या नहीं रही . दिल्ली के अपराध अब बाकायदा सामाजिक मुद्दा बन चुका है . आजकल पूरे देश में अपराध करना फैशन हो गया है . इसका कारण शायद यह है कि भारी बेकारी का शिकार नौजवान जब देखता है कि उसके साथ ही काम करने वाला कोई आदमी राजनीति में प्रवेश करके बहुत संपन्न बन गया तो वह भी राजनीति की तरफ आगे बढ़ता है . दिल्ली में संगठित राजनीतिक अपराध १९८४ के सिख विरोधी दंगों के दौरान शुरू हुआ . सिखों के नरसंहार में दिल्ली की तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेता शामिल थे . एच के एल भगत, सज्जन कुमार , जगदीश टाइटलर, धर्म दास शास्त्री , अर्जुन दास, ललित माकन आदि ने अपने अपने इलाकोंमें सिखों की हत्या की योजना को सुपरवाईज़ किया था और बाद में सभी लोग कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता बने रहे . कुछ तो संसद सदस्य या विधायक बने , कुछ मंत्री बने और जब तक कांग्रेस सत्ता में रही इन लोगों के खिलाफ कोई जांच नहीं हुई . दिल्ली में रहने वाले वे लड़के जिन्होंने १९८४ में इन नेताओं को लोगों को मारते और ह्त्या के लिए अपने कार्यकर्ताओं को उकसाते देखा है , उन्हें शायद लगा हो कि अपराध करने से फायदा होता है. १९८५ से १९८९ तक जब तक कांग्रेस का राज रहा यह सारे अपराधी नेता ताक़तवर बने रहे . .लगता है कि दिल्ली में अपराधी मानसिकता को बढ़ावा देने में इस दौर का सबसे बड़ा योगदान है . १९८४ के बाद दिल्ली में ज़्यादातर अपराधी कांग्रेस में भर्ती हो गए थे . बाद में जब बीजेपी सत्ता में आई तो यह सभी लोग बीजेपी की तरफ चले गए थे और अपने आपराधिक इतिहास की कमाई की रोटी खाने लगे थे . हालांकि आजकल १९८४ के अपराधियों के खिलाफ कुछ कार्रवाई होती दिख रही है लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है . ज़्यादातर लोग या तो मर गए हैं या पूरे पचीस साल तक सत्ता का सुख भोग चुके हैं . इसलिए अगर दिल्ली को पूरी तरह से अपराधमुक्त करना है तो शीला दीक्षित को चाहिए कि दिल्ली विश्वविद्यालय की उस बच्ची की मौत से राजनीतिक लाभ लेने की इच्छा को दफ़न कर दें और दिल्ली राज्य को अपराधियों से मुक्त करने की कोई कारगर योजना बनाएं और अपनी पार्टी के लोगों से कहें वे उसमें उनका सहयोग करें जिस से दिल्ली में अपराधहीन राजनीतिक तंत्र की स्थापना के लिए पहल की जा सके.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन दिल्ली विश्वविद्यालय की एक छात्रा की उसके कालेज के सामने ही सरे आम गोली मार कर हत्या कर दी गयी .इस घटना ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित कर दिया है कि दिल्ली भारत की राजनीतिक राजधानी होने के साथ साथ आपराधिक राजधानी भी है . दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मामले में पीड़ित परिवार के घर जाकर राजनीतिक पेशबंदी शुरू कर दी है . आज उन्होंने मारी गयी लड़की के परिवार को दिलासा दिलाई और भरोसा दिया कि वे परिवार को न्याय दिलायेगीं . इसके पहले, कल उन्होंने इस घटना पर बहुत दुख व्यक्त किया था और बताया था कि दिल्ली में महिलाओं की आबरू सुरक्षित नहीं है. . शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और उनका मौक़े पर पंहुचना बिलकुल सही है . लेकिन पिछले दो दिन से इस विषय पर चल रहे उनके बयान बहुत अजीब लगते हैं . सवाल पैदा होता है कि जब वे खुद दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं और उनकी पार्टी की ही केंद्र में सरकार है तो एक राजनेता के रूप में क्या उनके पास इस बात का नैतिक अधिकार है कि वे पीड़ित के परिवार वालों के घर जाएँ और वहां राजनीतिक स्कोर बढायें. सच्ची बात यह है कि उनको अपनी पार्टी की बड़ी नेता सोनिया गाँधी के पास जाना चाहिए था और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए थी कि जिस दिल्ली की वे मुख्यमंत्री हैं , उसे सुरक्षित करवाने में उनका साथ दें . केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास दिल्ली पुलिस का ज़िम्मा है . राज्य में कानून व्यवस्था का सारा काम दिल्ली पुलिस के पास ही है . शीला दीक्षित को चाहिए कि वे सोनिया गांधी से कहें वे कांग्रेस नेता और देश के गृहमंत्री, पी चिदंबरम को सुझाव दें कि दिल्ली वालों की ज़िंदगी से दहशत की मात्रा थोडा कम कर दें . यह काम केंद्र सरकार का है जो उसे चलाने वाली कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक ज़िम्मा है . मारी गई लडकी के घर जाकर शीला दीक्षित इस बुनियादी ज़िम्मेदारी को टाल नहीं सकतीं . शीला दीक्षित ने कल ही कहा था कि दिल्ली में महिलायें सुरक्षित नहीं है . यह कह देने से उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं होती. दिल्ली शहर में कानून व्यवस्था की हालत बहुत खराब है . आज हेही खबर आई है कि एक प्रसिद्द वकील की माँ को बदमाशों ने मार डाला . आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में लगभग रोज़ ही किसी न किसी महिला का क़त्ल होता है , आये दिन बच्चियों के रेप की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं . सरकारी तंत्र के बाबू लोग हर हालात से बेखबर अपनी ज़िंदगी जीते रहते हैं . दिल्ली में लगभग रोज़ ही सडकों पर मार पीट और क़त्ल की खबरें आती रहती हैं . दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता इस समस्या को हल करने की दिशा में कोई कारगर क़दम नहीं उठाते.
जिस बच्ची की हत्या के बारे में उसके मातापिता से मिलने शीला दीक्षित गयी थीं , उसकी हत्या के मामले को आज लोक सभा में बीजेपी के नेता शाहनवाज़ हुसैन ने भी उठाया .उन्होंने कहा कि दिल्ली अपराध की राजधानी बन गयी है और उनकी पार्टी के नेताओं ने शेम शेम के नारे लगाए . सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में चारों तरफ फैले हुए अपराध को इस तरह से संभाला जा सकता है . क्या अपराध पर राजनीतिक बयान बाज़ी का सहारा लेकर काबू किया जा सकता है .ज़ाहिर है राजनीतिक स्कोर कार्ड में नंबर बढाने की नेताओं की आदत से दिल्ली का कुछ भी नहीं बनने वाला है . इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए और वह राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों ही मुख्य पार्टियों की ओर से आनी चाहिए . यह समस्या वास्तव में अब राजनीतिक समस्या नहीं रही . दिल्ली के अपराध अब बाकायदा सामाजिक मुद्दा बन चुका है . आजकल पूरे देश में अपराध करना फैशन हो गया है . इसका कारण शायद यह है कि भारी बेकारी का शिकार नौजवान जब देखता है कि उसके साथ ही काम करने वाला कोई आदमी राजनीति में प्रवेश करके बहुत संपन्न बन गया तो वह भी राजनीति की तरफ आगे बढ़ता है . दिल्ली में संगठित राजनीतिक अपराध १९८४ के सिख विरोधी दंगों के दौरान शुरू हुआ . सिखों के नरसंहार में दिल्ली की तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेता शामिल थे . एच के एल भगत, सज्जन कुमार , जगदीश टाइटलर, धर्म दास शास्त्री , अर्जुन दास, ललित माकन आदि ने अपने अपने इलाकोंमें सिखों की हत्या की योजना को सुपरवाईज़ किया था और बाद में सभी लोग कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता बने रहे . कुछ तो संसद सदस्य या विधायक बने , कुछ मंत्री बने और जब तक कांग्रेस सत्ता में रही इन लोगों के खिलाफ कोई जांच नहीं हुई . दिल्ली में रहने वाले वे लड़के जिन्होंने १९८४ में इन नेताओं को लोगों को मारते और ह्त्या के लिए अपने कार्यकर्ताओं को उकसाते देखा है , उन्हें शायद लगा हो कि अपराध करने से फायदा होता है. १९८५ से १९८९ तक जब तक कांग्रेस का राज रहा यह सारे अपराधी नेता ताक़तवर बने रहे . .लगता है कि दिल्ली में अपराधी मानसिकता को बढ़ावा देने में इस दौर का सबसे बड़ा योगदान है . १९८४ के बाद दिल्ली में ज़्यादातर अपराधी कांग्रेस में भर्ती हो गए थे . बाद में जब बीजेपी सत्ता में आई तो यह सभी लोग बीजेपी की तरफ चले गए थे और अपने आपराधिक इतिहास की कमाई की रोटी खाने लगे थे . हालांकि आजकल १९८४ के अपराधियों के खिलाफ कुछ कार्रवाई होती दिख रही है लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है . ज़्यादातर लोग या तो मर गए हैं या पूरे पचीस साल तक सत्ता का सुख भोग चुके हैं . इसलिए अगर दिल्ली को पूरी तरह से अपराधमुक्त करना है तो शीला दीक्षित को चाहिए कि दिल्ली विश्वविद्यालय की उस बच्ची की मौत से राजनीतिक लाभ लेने की इच्छा को दफ़न कर दें और दिल्ली राज्य को अपराधियों से मुक्त करने की कोई कारगर योजना बनाएं और अपनी पार्टी के लोगों से कहें वे उसमें उनका सहयोग करें जिस से दिल्ली में अपराधहीन राजनीतिक तंत्र की स्थापना के लिए पहल की जा सके.
Tuesday, March 8, 2011
करूणानिधि को धमकाने के लिए कांग्रेस ने 2जी घोटाले की तलवार का इस्तेमाल किया
शेष नारायण सिंह
तमिलनाडु की पार्टी ,द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम से पिंड छुडाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिश ने दिल्ली में राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी है . शुरू में तो डी एम के वालों को लगा कि मामला आसानी से धमकी वगैरह देकर संभाला जा सकता है लेकिन बात गंभीर थी और कांग्रेस ने डी एम के को अपनी शतरें मानने के लिए मजबूर कर दिया . कांग्रेस को अब तमिलनाडु विधान सभा में ६३ सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिलेगा लेकिन कांग्रेस का रुख देख कर लगता है कि वह आगे भी डी एम के को दौन्दियाती रहेगी. यू पी ए २ के गठन के साथ ही कांग्रेस ने डी एम के को औकात बताना शुरू कर दिया था लेकिन बात गठबंधन की थी इसलिए खींच खांच कर संभाला गया और किसी तरह सरकार चल निकली . लेकिन यू पी ए के बाकी घटकों और कांग्रेसी मंत्रियों की तरह ही डी एम के वालों ने भी लूट खसोट शुरू कर दिया बाकी लोग तो बच निकले लेकिन डी एम के के नेता और संचार मंत्री ,ए राजा पकडे गए . उनके चक्कर में बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने डॉ मनमोहन सिंह को ही घेरना शूरू कर दिया . कुल मिलाकर डी एम के ने ऐसी मुसीबत खडी कर दी कि कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति की लड़ाई में हारती नज़र आने लगी. राजा को हटाया गया लेकिन राजा बेचारा तो एक मोहरा था. भ्रष्टाचार के असली इंचार्ज तो करुणानिधि ही थे. उनकी दूसरी पत्नी और बेटी भी सी बी आई की पूछ ताछ के घेरे में आने लगे. तमिलनाडु में डी एम के की हालत बहुत खराब है लेकिन करूणानिधि को मुगालता है कि वे अभी राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं . लिहाजा उन्होंने कांग्रेस को विधान सभा चुनावो के नाम पर धमकाने की राजनीति खेल दी .कांग्रेस ने मौक़ा लपक लिया . कांग्रेस को मालूम है कि डी एम के के साथ मिलकर इस बार तमिलनाडु में कोई चुनावी लाभ नहीं होने वाला है . इसलिए उसने सीट के बँटवारे को मुद्दा बना कर डी एम के को रास्ता दिखाने का फैसला कर लिया लेकिन डी एम के को गलती का अहसास हो गया और अब फिर से सुलह की बात शुरू हो गयी . डी एम के के नेता अभी सोच रहे है कि कुछ विधान सभा की अतिरिक्त सीटें देकर कांग्रेस से करूणानिधि के परिवार के लोगों के खिलाफ सी बी आई का शिकंजा ढीला करवाया जा सकता है . लेकिन खेल इतना आसान नहीं है . कांग्रेस ने बहुत ही प्रभावी तरीके से करूणानिधि एंड कंपनी को औकात बोध करा दिया है . उत्तर प्रदेश के २२ संसद सदस्यों वाले दल के नेता मुलायम सिंह यादव ने ऐलान कर दिया है कि वे कांग्रेस को अंदर से समर्थन करने को तैयार हैं . यह अलग बात है कि कांग्रेस को उनके समर्थन की न तो ज़रुरत है और न ही उसने मुलायम सिंह यादव से समर्थन माँगा है . लेकिन मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी एकजुट रखने के लिए कहीं भी सत्ता के करीब नज़र आना है . सो उन्होंने वक़्त का सही इस्तेमाल करने का फैसला किया . कांग्रेस की अगुवायी वाली सरकार को २१ सदस्यों वाली बहुजन समाज पार्टी का समर्थन भी बाहर से मिल रहा है जयललिता भी करूणानिधि को बेघर करने के लिए यू पी ए को समर्थन देने को तैयार है . ऐसी हालत में कांग्रेस और डी एम के सम्बन्ध निश्चित रूप से राजनीति की चर्चा की सीमा पर कर गए हैं और प्रहसन के मुकाम पर पंहुच गए हैं .
तमिलनाडु की पार्टी ,द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम से पिंड छुडाने की कांग्रेस पार्टी की कोशिश ने दिल्ली में राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी है . शुरू में तो डी एम के वालों को लगा कि मामला आसानी से धमकी वगैरह देकर संभाला जा सकता है लेकिन बात गंभीर थी और कांग्रेस ने डी एम के को अपनी शतरें मानने के लिए मजबूर कर दिया . कांग्रेस को अब तमिलनाडु विधान सभा में ६३ सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिलेगा लेकिन कांग्रेस का रुख देख कर लगता है कि वह आगे भी डी एम के को दौन्दियाती रहेगी. यू पी ए २ के गठन के साथ ही कांग्रेस ने डी एम के को औकात बताना शुरू कर दिया था लेकिन बात गठबंधन की थी इसलिए खींच खांच कर संभाला गया और किसी तरह सरकार चल निकली . लेकिन यू पी ए के बाकी घटकों और कांग्रेसी मंत्रियों की तरह ही डी एम के वालों ने भी लूट खसोट शुरू कर दिया बाकी लोग तो बच निकले लेकिन डी एम के के नेता और संचार मंत्री ,ए राजा पकडे गए . उनके चक्कर में बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने डॉ मनमोहन सिंह को ही घेरना शूरू कर दिया . कुल मिलाकर डी एम के ने ऐसी मुसीबत खडी कर दी कि कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति की लड़ाई में हारती नज़र आने लगी. राजा को हटाया गया लेकिन राजा बेचारा तो एक मोहरा था. भ्रष्टाचार के असली इंचार्ज तो करुणानिधि ही थे. उनकी दूसरी पत्नी और बेटी भी सी बी आई की पूछ ताछ के घेरे में आने लगे. तमिलनाडु में डी एम के की हालत बहुत खराब है लेकिन करूणानिधि को मुगालता है कि वे अभी राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं . लिहाजा उन्होंने कांग्रेस को विधान सभा चुनावो के नाम पर धमकाने की राजनीति खेल दी .कांग्रेस ने मौक़ा लपक लिया . कांग्रेस को मालूम है कि डी एम के के साथ मिलकर इस बार तमिलनाडु में कोई चुनावी लाभ नहीं होने वाला है . इसलिए उसने सीट के बँटवारे को मुद्दा बना कर डी एम के को रास्ता दिखाने का फैसला कर लिया लेकिन डी एम के को गलती का अहसास हो गया और अब फिर से सुलह की बात शुरू हो गयी . डी एम के के नेता अभी सोच रहे है कि कुछ विधान सभा की अतिरिक्त सीटें देकर कांग्रेस से करूणानिधि के परिवार के लोगों के खिलाफ सी बी आई का शिकंजा ढीला करवाया जा सकता है . लेकिन खेल इतना आसान नहीं है . कांग्रेस ने बहुत ही प्रभावी तरीके से करूणानिधि एंड कंपनी को औकात बोध करा दिया है . उत्तर प्रदेश के २२ संसद सदस्यों वाले दल के नेता मुलायम सिंह यादव ने ऐलान कर दिया है कि वे कांग्रेस को अंदर से समर्थन करने को तैयार हैं . यह अलग बात है कि कांग्रेस को उनके समर्थन की न तो ज़रुरत है और न ही उसने मुलायम सिंह यादव से समर्थन माँगा है . लेकिन मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी एकजुट रखने के लिए कहीं भी सत्ता के करीब नज़र आना है . सो उन्होंने वक़्त का सही इस्तेमाल करने का फैसला किया . कांग्रेस की अगुवायी वाली सरकार को २१ सदस्यों वाली बहुजन समाज पार्टी का समर्थन भी बाहर से मिल रहा है जयललिता भी करूणानिधि को बेघर करने के लिए यू पी ए को समर्थन देने को तैयार है . ऐसी हालत में कांग्रेस और डी एम के सम्बन्ध निश्चित रूप से राजनीति की चर्चा की सीमा पर कर गए हैं और प्रहसन के मुकाम पर पंहुच गए हैं .
Thursday, March 3, 2011
दिल्ली उर्दू अकादमी की ओर से एक औरत के अज़्म को सम्मान
शेष नारायण सिंह
दिल्ली सरकार की उर्दू अकादमी की ओर से आज एक ऐसी महिला का सम्मान किया जा रहा है,जिन्होंने मुसीबतों को हर मोड़ पर चुनौती दी है. दिल्ली के समाज के निर्माण में उनका खुद का और उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान है .कमर आज़ाद हाशमी का जन्म ४ मार्च १९२६ को झांसी में हुआ था.उनके पिता अज़हर अली आज़ाद उर्दू और फारसी के विद्वान थे.उनकी माँ जुबैदा खातून, दहेज़ के खिलाफ सक्रिय थीं कई भाषाओं की जानकार थीं, घुड़सवारी करती थीं और राइफल चलाना जानती थीं. उनकी ससुराल के लोग दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे. उनके पति की माँ , बेगम हाशमी नैशनल फेडरेशन आफ इन्डियन वीमेन की संस्थापक अध्यक्ष थीं. मुल्क के बँटवारे के वक़्त ऐसे हालात बने के कमर आज़ाद हाशमी को अपने माता पिता के साथ पाकिस्तान जाना पड़ा. वहां वे पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव , सज्जाद ज़हीर से मिलीं. सज्जाद ज़हीर को कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान भेजा था जहां उन्हें पार्टी का गठन करना था . उन्हने मालूम था कि कमर की शादी हनीफ हाशमी से होने वाली थी. उन्होंने कमर को कहा कि वापस जाओ और हनीफ से शादी करके उसे भी पाकिस्तान लाओ जिस से वहां वामपंथी आन्दोलन को ताक़त दी जा सके. कमर आज़ाद हाशमी जब दिल्ली आयीं तो शादी तो उन्होंने हनीफ हाशमी से कर ली लेकिन वापस जाने की बात ख़त्म कर दी. बाद में स्व सज्जाद ज़हीर भी वापस हिन्दुस्तान आ गये.
कमर आज़ाद हाशमी ने अपनी पहली किताब ६९ साल की उम्र में लिखी . अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी पढाई पर ब्रेक लग गयी थी क्योंकि १९४७ के तकसीम ए मुल्क ने सब कुछ बदल दिया था .उन्होंने सत्तर साल की उम्र में एम ए करने का फैसला किया और किया भी. मजदूरों के हक के लिए लड़ते हुए उनके ३४ साल के बेटे को दिल्ली के पास साहिबाबाद में गुंडों ने मार डाला लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी . उस दिन उन्होंने दुःख में डूबे उसके साथियों का हौसला बढ़ाया था और कहा कि साथियो उठ खड़े हो और रोशनी फैलाने का काम जारी रखो क्योंकि अँधेरे के परदे को रोशनी से ही खत्म किया जा सकता है .उनके बेटे का नाम सफ़दर हाशमी था और आज उसे पूरी दुनिया में लोग जानते हैं . कमर आज़ाद हाशमी के सफ़दर के अलावा चार और बच्चे हैं. इन्होने अपने सभी बच्चों के अंदर पता नहीं क्या भर दिया है कि उनमें से कोई भी अन्याय के खिलाफ मोर्चा संभालने में एक मिनट नहीं लगाता . इनकी सबसे छोटी औलाद शबनम हाशमी हैं जिन्होंने गुजरात नरसंहार २००२ के बाद दर्द की तूफ़ान को झेल रहे हर गुजराती मुसलमान को ढाढस बंधाया और उसके साथ खडी रहीं.शबनम ने बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद संघी ताक़तों का मुकाबला किया और देश में सेकुलर जमातों को एकजुट किया. इनके बड़े बेटे सुहेल हाशमी हैं जो दिल्ली की विरासत के सबसे बड़े जानकारों में गिने जाते हैं . जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक रूप को स्थापित करने में सुहेल का बड़ा योगदान है .इनकी दो और बेटियाँ हैं जिन्होंने स्कूल टीचर के रूप में दिल्ली के दो नामी स्कूलों में काम किया और अपने विषय को बहुत ही लोकप्रिय बनाया . अपने बच्चों को कमर आज़ाद हाशमी ने बेहतर इंसान बनने की ट्रेनिंग अच्छी तरह से दे रखी है .दिल्ली में नर्सरी शिक्षा को एक सम्मानजनक मुकाम तक पंहुचाने में कमर आज़ाद हाशमी का ख़ास योगदान है .
मुल्क के बँटवारे के बाद से दिल्ली और अलीगढ के बीच उन्होंने वक़्त की हर मार को झेला और अपने बच्चों को मज़बूत इंसान बनाया. उनके छोटे बेटे सफ़दर को १९८९ में मार डाला गया . उसकी याद में ही सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक हस्तक्षेप का मंच ,सहमत बनाया गया . शुरू में सहमत का संचालन उनकी छोटी बेटी शबनम हाशमी ने किया . बाद में शबनम ने अनहद का गठन किया जो शोषित पीड़ित जनता की लड़ाई का एक प्रमुख मोर्चा है . सहमत और अनहद से जुड़े ज़्यादातर लोग कमर आज़ाद हाशमी को अम्माजी कहते हैं .सफ़दर को विषय बनाकर अम्माजी ने एक किताब भी लिखी जिसका नाम है "पांचवां चिराग़ " . यह किताब कई भाषाओं में छप चुकी है . घोषित रूप से तो यह सफ़दर की जीवनी है लेकिन वास्तव में यह बीसवीं सदी में हो रहे बदलाव का एक आइना है . यह किताब उस औरत के अज़्म की कहानी है जिसका जवान बेटा राजनीतिक कारणों से शहीद कर दिया गया था,. इस किताब में चारों तरफ बिखरे हुए सपने पड़े हैं ,उम्मीदें हैं और हौसले हैं . इस किताब को पढने के बाद लगता है कि एक औरत अगर तय कर ले तो मुसीबतें कहीं नहीं ठहरेगीं. अम्माजी को बहुत सारे सम्मान मिले हैं और आज भी काम करने का ज़ज्बा ऐसा है कि अगले बीस साल तक के लिए प्लान बना चुकी हैं .
आजकल दिल्ली में अपनी छोटी बेटी शबनम हाशमी के साथ रहती हैं और अनहद के काम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं . अपने वालिद की फारसी ग़ज़लों और नज्मों का एक संकलन प्रकाशित कर चुकी है और दूसरे संकलन के बारे में काम चल रहा है.आज भी उनके पास बैठने पर लगता है कि काम करने का अगर हौसला हो तो बाकी चीज़ें अपने आप दुरुस्त हो जायेगीं.
दिल्ली सरकार की उर्दू अकादमी की ओर से आज एक ऐसी महिला का सम्मान किया जा रहा है,जिन्होंने मुसीबतों को हर मोड़ पर चुनौती दी है. दिल्ली के समाज के निर्माण में उनका खुद का और उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान है .कमर आज़ाद हाशमी का जन्म ४ मार्च १९२६ को झांसी में हुआ था.उनके पिता अज़हर अली आज़ाद उर्दू और फारसी के विद्वान थे.उनकी माँ जुबैदा खातून, दहेज़ के खिलाफ सक्रिय थीं कई भाषाओं की जानकार थीं, घुड़सवारी करती थीं और राइफल चलाना जानती थीं. उनकी ससुराल के लोग दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे. उनके पति की माँ , बेगम हाशमी नैशनल फेडरेशन आफ इन्डियन वीमेन की संस्थापक अध्यक्ष थीं. मुल्क के बँटवारे के वक़्त ऐसे हालात बने के कमर आज़ाद हाशमी को अपने माता पिता के साथ पाकिस्तान जाना पड़ा. वहां वे पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव , सज्जाद ज़हीर से मिलीं. सज्जाद ज़हीर को कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान भेजा था जहां उन्हें पार्टी का गठन करना था . उन्हने मालूम था कि कमर की शादी हनीफ हाशमी से होने वाली थी. उन्होंने कमर को कहा कि वापस जाओ और हनीफ से शादी करके उसे भी पाकिस्तान लाओ जिस से वहां वामपंथी आन्दोलन को ताक़त दी जा सके. कमर आज़ाद हाशमी जब दिल्ली आयीं तो शादी तो उन्होंने हनीफ हाशमी से कर ली लेकिन वापस जाने की बात ख़त्म कर दी. बाद में स्व सज्जाद ज़हीर भी वापस हिन्दुस्तान आ गये.
कमर आज़ाद हाशमी ने अपनी पहली किताब ६९ साल की उम्र में लिखी . अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी पढाई पर ब्रेक लग गयी थी क्योंकि १९४७ के तकसीम ए मुल्क ने सब कुछ बदल दिया था .उन्होंने सत्तर साल की उम्र में एम ए करने का फैसला किया और किया भी. मजदूरों के हक के लिए लड़ते हुए उनके ३४ साल के बेटे को दिल्ली के पास साहिबाबाद में गुंडों ने मार डाला लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी . उस दिन उन्होंने दुःख में डूबे उसके साथियों का हौसला बढ़ाया था और कहा कि साथियो उठ खड़े हो और रोशनी फैलाने का काम जारी रखो क्योंकि अँधेरे के परदे को रोशनी से ही खत्म किया जा सकता है .उनके बेटे का नाम सफ़दर हाशमी था और आज उसे पूरी दुनिया में लोग जानते हैं . कमर आज़ाद हाशमी के सफ़दर के अलावा चार और बच्चे हैं. इन्होने अपने सभी बच्चों के अंदर पता नहीं क्या भर दिया है कि उनमें से कोई भी अन्याय के खिलाफ मोर्चा संभालने में एक मिनट नहीं लगाता . इनकी सबसे छोटी औलाद शबनम हाशमी हैं जिन्होंने गुजरात नरसंहार २००२ के बाद दर्द की तूफ़ान को झेल रहे हर गुजराती मुसलमान को ढाढस बंधाया और उसके साथ खडी रहीं.शबनम ने बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद संघी ताक़तों का मुकाबला किया और देश में सेकुलर जमातों को एकजुट किया. इनके बड़े बेटे सुहेल हाशमी हैं जो दिल्ली की विरासत के सबसे बड़े जानकारों में गिने जाते हैं . जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक रूप को स्थापित करने में सुहेल का बड़ा योगदान है .इनकी दो और बेटियाँ हैं जिन्होंने स्कूल टीचर के रूप में दिल्ली के दो नामी स्कूलों में काम किया और अपने विषय को बहुत ही लोकप्रिय बनाया . अपने बच्चों को कमर आज़ाद हाशमी ने बेहतर इंसान बनने की ट्रेनिंग अच्छी तरह से दे रखी है .दिल्ली में नर्सरी शिक्षा को एक सम्मानजनक मुकाम तक पंहुचाने में कमर आज़ाद हाशमी का ख़ास योगदान है .
मुल्क के बँटवारे के बाद से दिल्ली और अलीगढ के बीच उन्होंने वक़्त की हर मार को झेला और अपने बच्चों को मज़बूत इंसान बनाया. उनके छोटे बेटे सफ़दर को १९८९ में मार डाला गया . उसकी याद में ही सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक हस्तक्षेप का मंच ,सहमत बनाया गया . शुरू में सहमत का संचालन उनकी छोटी बेटी शबनम हाशमी ने किया . बाद में शबनम ने अनहद का गठन किया जो शोषित पीड़ित जनता की लड़ाई का एक प्रमुख मोर्चा है . सहमत और अनहद से जुड़े ज़्यादातर लोग कमर आज़ाद हाशमी को अम्माजी कहते हैं .सफ़दर को विषय बनाकर अम्माजी ने एक किताब भी लिखी जिसका नाम है "पांचवां चिराग़ " . यह किताब कई भाषाओं में छप चुकी है . घोषित रूप से तो यह सफ़दर की जीवनी है लेकिन वास्तव में यह बीसवीं सदी में हो रहे बदलाव का एक आइना है . यह किताब उस औरत के अज़्म की कहानी है जिसका जवान बेटा राजनीतिक कारणों से शहीद कर दिया गया था,. इस किताब में चारों तरफ बिखरे हुए सपने पड़े हैं ,उम्मीदें हैं और हौसले हैं . इस किताब को पढने के बाद लगता है कि एक औरत अगर तय कर ले तो मुसीबतें कहीं नहीं ठहरेगीं. अम्माजी को बहुत सारे सम्मान मिले हैं और आज भी काम करने का ज़ज्बा ऐसा है कि अगले बीस साल तक के लिए प्लान बना चुकी हैं .
आजकल दिल्ली में अपनी छोटी बेटी शबनम हाशमी के साथ रहती हैं और अनहद के काम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं . अपने वालिद की फारसी ग़ज़लों और नज्मों का एक संकलन प्रकाशित कर चुकी है और दूसरे संकलन के बारे में काम चल रहा है.आज भी उनके पास बैठने पर लगता है कि काम करने का अगर हौसला हो तो बाकी चीज़ें अपने आप दुरुस्त हो जायेगीं.
Wednesday, March 2, 2011
नरेंद्र मोदी और भागवत ने फिर किया महात्मा गाँधी की विरासत पर दावा
शेष नारायण सिंह
नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर महात्मा गाँधी का नाम लिया और उन्हें दूरदर्शी और मौलिक चिन्तक बताया .उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने महात्मा गाँधी के कुछ सपनों को पूरा कर दिया है . गोधरा की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में आर एस एस के मुखिया मोहन भागवत की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि अगर गाँधी जी होते तो इस बात से बहुत खुश होते कि गुजरात के हर गाँव में बिजली पंहुच चुकी है .मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि महात्मा गाँधी की मूल किताबों को पढने की ज़रुरत है.संक्षिप्त संस्करण पढने से पूरा ज्ञान नहीं मिलता. हालांकि महात्मा गाँधी का जीवन और काम ऐसा है जिसकी कसौटी पर कसने पर नरेंद्र मोदी का हर आचरण फेल हो जाएगा लेकिन आर एस एस और बीजेपी के इतिहास में किसी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के के न होने के दर्द को झेल रहे संघी संगठनों को महात्मा गाँधी को अपना लेने की जल्दी पड़ी रहती है . महात्मा गाँधी की पार्टी , कांग्रेस के लोग आजकल एक अन्य गाँधी को महान बनाने के अभियान में लगे रहते हैं इसलिए भी आर एस एस को महात्मा गाँधी की विरासत को अपना लेने में आसानी होती नज़र आने लगी है . यह शायद इसलिए होता है कि हर संगठन को अपने इतिहास में ऐसे लोगों की ज़रुरत पड़ती है जिनके काम पर गर्व किया जा सके. आर एस एस के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके ऊपर आज़ादी की लड़ाई के हवाले से गर्व किया जा सके. उनकी स्थापना 1925 में हुई थी. इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि आर एस एस की स्थापना अंग्रेजों के आशीर्वाद से हुई थी और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1920 के आन्दोलन में जो हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम हुई थी ,उसी को तोड़ने के लिए इस संगठन की स्थापना करवाई गयी थी. आर एस एस की विचारधारा वी डी सावरकर की किताब, " हिंदुत्व " को आधार मानती है . यह किताब भी सावरकर ने आर एस एस की स्थापना के एक साल पहले लिखी थी . आर एस एस के संस्थापक डॉ हेडगेवार ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व वाले 1920 के आन्दोलन में में हिस्सा लिया था और जेल भी गए थे .कलकत्ता में अपनी डाक्टरी की पढाई के दौरान उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया था लेकिन जब वे वी डी सावरकर के संपर्क में आये तो उनकी हिन्दुत्व की विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए और राजनीतिक हिंदुत्व के ज़रिये सत्ता हासिल करने की सावरकर की कोशिश के साथ चल पड़े. . इटली के फासिस्ट राजनीतिक चिन्तक ,माज़िनी की किताब " न्यू इटली "के बहुत सारे तर्क सावरकर की किताब 'हिंदुत्व " में मौजूद . जानकार कहते हैं कि जब 1920 में अंग्रेजों ने सावरकर को माफी दी थी तो उनसे एक अंडरटेकिंग लिखवा ली थी कि वे माफी मिलने के बाद ब्रिटिश इम्पायर के हित में ही काम करेगें . भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता को खंडित करना ऐसा ही एक काम था . लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध तक बात बदल चुकी थी . आर एस एस के लोग देश में चल रही आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे . हाँ अंग्रेजों का कोई विरोध भी नहीं कर रहे थे. जबकि महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरा देश आज़ादी की बात कर रहा था. जिन्ना के साथी और आर एस एस वाले गाँधी के आन्दोलन के खिलाफ थे. 1930 और 1940 के दशक भारत की आज़ादी के लिहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. इस दौर में आज़ादी के पक्षधर सभी नेता जेलों में थे लेकिन मुस्लिम लीग के जिन्ना के सभी साथी और आर एस एस के एम एस गोलवलकर और उनके सभी साथी एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए. ज़ाहिर है कि आर एस एस और उसकी राजनीति के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए आज़ादी के लड़ाई में अपने हीरो तलाशना बहुत ही मुश्किल काम है . महात्मा गाँधी की विरासत को अपनाने की कोशिश इसी समस्या के हल के रूप में की जाती है . लेकिन बात बनती नहीं क्योंकि जैसे ही आर एस एस वाले महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश करते हैं, कहीं से कोई आदमी आर एस एस के तत्कालीन सर संघचालक , माधव सदाशिव गोलवलकर की नागपुर के भारत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित किताब, " वी ,आर अवर नेशनहुड डिफाइंड " के 1939 संस्करण के पृष्ठ 37 का अनुवाद छाप देता है जिसमें श्री गोलवलकर ने लिखा है कि हिटलर एक महान व्यक्ति है और उसके काम से हिन्दुस्तान को बहुत कुछ सीखना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए . ज़ाहिर है कि दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में हिटलर के प्रशंसकों को अपना पूर्वज बताकर कोई भी गर्व नहीं कर सकता . महात्मा गाँधी को अपनाने की नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की कोशिश को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. आर एस एस ने इसके पहले भी इस तरह की कोशिश की है . एक बार तो सरदार भगत सिंह को ही अपना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन जब पता लगा कि सरदार भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे तो वह कार्यक्रम बंद किया गया . वी.डी. सावरकर को आजादी की लड़ाई का हीरो बनाने की कोशिश की गई, जब संघ परिवार की केंद्र में सरकार बनी तो सावरकर की तस्वीर संसद के सेंट्रल हाल में लगाने में सफलता भी हासिल की गई लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि 1910 तक के सावरकर और ब्रिटिश साम्राज्य से मांगी गई माफी के बाद आजाद हुए सावरकर में बहुत फर्क है और पब्लिक तो सब जानती है.सावरकर को राष्ट्रीय हीरो बनाने की बीजेपी की कोशिश मुंह के बल गिरी . इस अभियान का नुकसान बीजेपी को बहुत हुआ क्योंकि जो लोग नहीं भी जानते थे, उन्हें पता लग गया कि वी.डी. सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी और ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा करने का वचन दिया था . जब संसद में सावरकर की तस्वीर लगाने के मामले पर एन.डी.ए. सरकार की पूरी तरह से दुर्दशा हो गई तो सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश शुरू की गई. वैसे सरदार पटेल को अपनाने की आर.एस.एस. की हिम्मत की दाद देनी पडे़गी क्योंकि आर.एस.एस. को अपमानित करने वालों की अगर कोई लिस्ट बने तो उसमें सरदार पटेल का नाम सबसे ऊपर आएगा .सरदार पटेल ने ही महात्मा गांधी की हत्या वाले केस में आर.एस.एस. पर पाबंदी लगाई थी और उसके मुखिया गोलवलकर को गिरफ्तार करवाया था . जब हत्या में गोलवलकर का रोल सिद्ध नहीं हो सका तो उन्हें छोड़ देना चाहिए था लेकिन सरदार ने कहा कि तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक वह अंडरटेकिंग न दें. आर एस एस ने एक बार गुजराती होने के हवाले से महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश शुरू कर दी है . महात्मा गाँधी आज दुनिया भर में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं , उन्हें गुजरात की सीमा में सीमित करना बहुत ही संकीर्णता होगी
नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर महात्मा गाँधी का नाम लिया और उन्हें दूरदर्शी और मौलिक चिन्तक बताया .उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने महात्मा गाँधी के कुछ सपनों को पूरा कर दिया है . गोधरा की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में आर एस एस के मुखिया मोहन भागवत की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि अगर गाँधी जी होते तो इस बात से बहुत खुश होते कि गुजरात के हर गाँव में बिजली पंहुच चुकी है .मोदी ने लोगों से आग्रह किया कि महात्मा गाँधी की मूल किताबों को पढने की ज़रुरत है.संक्षिप्त संस्करण पढने से पूरा ज्ञान नहीं मिलता. हालांकि महात्मा गाँधी का जीवन और काम ऐसा है जिसकी कसौटी पर कसने पर नरेंद्र मोदी का हर आचरण फेल हो जाएगा लेकिन आर एस एस और बीजेपी के इतिहास में किसी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के के न होने के दर्द को झेल रहे संघी संगठनों को महात्मा गाँधी को अपना लेने की जल्दी पड़ी रहती है . महात्मा गाँधी की पार्टी , कांग्रेस के लोग आजकल एक अन्य गाँधी को महान बनाने के अभियान में लगे रहते हैं इसलिए भी आर एस एस को महात्मा गाँधी की विरासत को अपना लेने में आसानी होती नज़र आने लगी है . यह शायद इसलिए होता है कि हर संगठन को अपने इतिहास में ऐसे लोगों की ज़रुरत पड़ती है जिनके काम पर गर्व किया जा सके. आर एस एस के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके ऊपर आज़ादी की लड़ाई के हवाले से गर्व किया जा सके. उनकी स्थापना 1925 में हुई थी. इतिहासकारों का एक वर्ग मानता है कि आर एस एस की स्थापना अंग्रेजों के आशीर्वाद से हुई थी और महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1920 के आन्दोलन में जो हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम हुई थी ,उसी को तोड़ने के लिए इस संगठन की स्थापना करवाई गयी थी. आर एस एस की विचारधारा वी डी सावरकर की किताब, " हिंदुत्व " को आधार मानती है . यह किताब भी सावरकर ने आर एस एस की स्थापना के एक साल पहले लिखी थी . आर एस एस के संस्थापक डॉ हेडगेवार ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व वाले 1920 के आन्दोलन में में हिस्सा लिया था और जेल भी गए थे .कलकत्ता में अपनी डाक्टरी की पढाई के दौरान उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया था लेकिन जब वे वी डी सावरकर के संपर्क में आये तो उनकी हिन्दुत्व की विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए और राजनीतिक हिंदुत्व के ज़रिये सत्ता हासिल करने की सावरकर की कोशिश के साथ चल पड़े. . इटली के फासिस्ट राजनीतिक चिन्तक ,माज़िनी की किताब " न्यू इटली "के बहुत सारे तर्क सावरकर की किताब 'हिंदुत्व " में मौजूद . जानकार कहते हैं कि जब 1920 में अंग्रेजों ने सावरकर को माफी दी थी तो उनसे एक अंडरटेकिंग लिखवा ली थी कि वे माफी मिलने के बाद ब्रिटिश इम्पायर के हित में ही काम करेगें . भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता को खंडित करना ऐसा ही एक काम था . लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध तक बात बदल चुकी थी . आर एस एस के लोग देश में चल रही आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे . हाँ अंग्रेजों का कोई विरोध भी नहीं कर रहे थे. जबकि महात्मा गांधी के नेतृत्व में पूरा देश आज़ादी की बात कर रहा था. जिन्ना के साथी और आर एस एस वाले गाँधी के आन्दोलन के खिलाफ थे. 1930 और 1940 के दशक भारत की आज़ादी के लिहाज़ से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. इस दौर में आज़ादी के पक्षधर सभी नेता जेलों में थे लेकिन मुस्लिम लीग के जिन्ना के सभी साथी और आर एस एस के एम एस गोलवलकर और उनके सभी साथी एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए. ज़ाहिर है कि आर एस एस और उसकी राजनीति के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए आज़ादी के लड़ाई में अपने हीरो तलाशना बहुत ही मुश्किल काम है . महात्मा गाँधी की विरासत को अपनाने की कोशिश इसी समस्या के हल के रूप में की जाती है . लेकिन बात बनती नहीं क्योंकि जैसे ही आर एस एस वाले महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश करते हैं, कहीं से कोई आदमी आर एस एस के तत्कालीन सर संघचालक , माधव सदाशिव गोलवलकर की नागपुर के भारत पब्लिकेशन्स से प्रकाशित किताब, " वी ,आर अवर नेशनहुड डिफाइंड " के 1939 संस्करण के पृष्ठ 37 का अनुवाद छाप देता है जिसमें श्री गोलवलकर ने लिखा है कि हिटलर एक महान व्यक्ति है और उसके काम से हिन्दुस्तान को बहुत कुछ सीखना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए . ज़ाहिर है कि दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में हिटलर के प्रशंसकों को अपना पूर्वज बताकर कोई भी गर्व नहीं कर सकता . महात्मा गाँधी को अपनाने की नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की कोशिश को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए. आर एस एस ने इसके पहले भी इस तरह की कोशिश की है . एक बार तो सरदार भगत सिंह को ही अपना बनाने की कोशिश की गयी लेकिन जब पता लगा कि सरदार भगत सिंह तो कम्युनिस्ट थे तो वह कार्यक्रम बंद किया गया . वी.डी. सावरकर को आजादी की लड़ाई का हीरो बनाने की कोशिश की गई, जब संघ परिवार की केंद्र में सरकार बनी तो सावरकर की तस्वीर संसद के सेंट्रल हाल में लगाने में सफलता भी हासिल की गई लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि 1910 तक के सावरकर और ब्रिटिश साम्राज्य से मांगी गई माफी के बाद आजाद हुए सावरकर में बहुत फर्क है और पब्लिक तो सब जानती है.सावरकर को राष्ट्रीय हीरो बनाने की बीजेपी की कोशिश मुंह के बल गिरी . इस अभियान का नुकसान बीजेपी को बहुत हुआ क्योंकि जो लोग नहीं भी जानते थे, उन्हें पता लग गया कि वी.डी. सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी और ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा करने का वचन दिया था . जब संसद में सावरकर की तस्वीर लगाने के मामले पर एन.डी.ए. सरकार की पूरी तरह से दुर्दशा हो गई तो सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश शुरू की गई. वैसे सरदार पटेल को अपनाने की आर.एस.एस. की हिम्मत की दाद देनी पडे़गी क्योंकि आर.एस.एस. को अपमानित करने वालों की अगर कोई लिस्ट बने तो उसमें सरदार पटेल का नाम सबसे ऊपर आएगा .सरदार पटेल ने ही महात्मा गांधी की हत्या वाले केस में आर.एस.एस. पर पाबंदी लगाई थी और उसके मुखिया गोलवलकर को गिरफ्तार करवाया था . जब हत्या में गोलवलकर का रोल सिद्ध नहीं हो सका तो उन्हें छोड़ देना चाहिए था लेकिन सरदार ने कहा कि तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक वह अंडरटेकिंग न दें. आर एस एस ने एक बार गुजराती होने के हवाले से महात्मा गाँधी को अपनाने की कोशिश शुरू कर दी है . महात्मा गाँधी आज दुनिया भर में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं , उन्हें गुजरात की सीमा में सीमित करना बहुत ही संकीर्णता होगी
गोधरा ट्रेन हादसे की सी बी आई जांच की मांग , फैसले के खिलाफ माहौल बनना शुरू
शेष नारायण सिंह
गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बारे में जो फैसला आया है उससे सिविल सोसाइटी के लोग बहुत नाराज़ हैं मुंबई के विद्वान् और धर्मनिरपेक्ष चिन्तक, असगर अली इंजीनियर ने कहा है कि केस की जांच सही तरीके से नहीं हुई है लिहाज़ा इसकी जांच सी बी आई से करवाई जाए . अनहद की संयोजक और गुजरात में मुसलमानों को न्याय दिलवाने के लिए बड़े पैमाने पर सक्रिय ,शबनम हाशमी ने कहा है कि कि गुजरात पुलिस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से तैनात सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अगुवाई में एस आई टी ने जो जांच की है वह गड़बड़ है ,मामले की जांच सी बी आई से करवाई जानी चाहिए क्योंकि इस मामले में राघवन कमेटी ने भी एक तरह से गुजरात पुलिस की बात को ही सही ठहराकर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म को पूरा कर दिया है . उनका आरोप है कि राघवन ने इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की है . उनका कहना है कि निष्पक्ष जांच के बाद हो सकता है इस मामले की साज़िश में प्रवीण तोगड़िया ही शामिल पाए जाँए.
फरवरी २००२ में अयोध्या से वापस अहमदाबाद जाती हुई साबरमती एक्सप्रेस के एस-६ कोच में आग लग गयी थी और उसमें सवार सभी लोग मारे गए थे.गुजरात के पंचमहल जिले के गोधरा जंक्शन के पास यह हादसा हुआ था. एक ख़ास राजनीतिक बिरादरी के लोगों ने गोधरा कस्बे के मुसलमानों पर तुरंत आरोप लगाना शुरू कर दिया और भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार गुजरात के मुसलमानों ने झेला . ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बाद गुजरात के मुसलमानों पर भारी कहर बरपा हुआ . अब नौ साल बाद गोधरा का फैसला आया है .एक डिब्बे में आग लगाने के आरोप में पुलिस ने ९० से ज्यादा लोगों को अभियुक्त बनाया था जिसमें से अदालत ने ६३ लोगों को बरी कर दिया . ३१ लोगों को दोषी पाया गया था. अब सज़ा का फैसला आया है कि अभियुक्तों में से ११ लोगों को फांसी होगी और २० लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गयी है ..जानकार बताते हैं कि किसी भी मामले में ११ लोगों को फांसी की सज़ा देने का यह फैसला अपने आप में एक ख़ास घटना है . आम तौर पर इतने ज्यादा लोगों को फांसी की सज़ा नहीं होती. बहरहाल मामला अब अपील में जाएगा . विश्व हिन्दू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने जिन ६३ लोगों को बरी किया है , वह गलत है . उसके खिलाफ अपील की जायेगी.जिन लोगों को फांसी दी गयी है वह तो ठीक है लेकिन जिन्हें आजीवन कारावास की सज़ा मिली है,उसके खिलाफ भी अपील की जायेगी.और सब को फांसी दिलाई जाईए . प्रवीण तोगड़िया की बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत है.वह गुजरात की वर्तमान सरकार की विचारधारा के बहुत करीबी हैं और गुजरात के ज़्यादातर मामलों में उनकी राय का मह्त्व रहता है .
साबरमती एक्सप्रेस के एस -६ कोच में लगी आग एक दुखद घटना थी . अगर उसमें किसी साज़िश का पता लगता है तो वह और भी दुखद है . लेकिन गोधरा के अपराध के लिए किसी एक समुदाय को ज़िम्मेदार मानकर ,उसके लोगों को घेर घेर कर मारना और भी दुखद है . आने वाली नस्लें इस सारे काम के लिए उन लोगों को माफ़ नहीं करेगीं , जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. इसलिए गोधरा और उसके बाद हुए नरसंहार के हर मामले की बहुत ही गंभीरता से जांच होनी चाहिए थी . लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि गोधरा में ट्रेन में लगी आग की जांच शुरू से ही शक़ के दायरे में रही है. गुजरात पुलिस की जांच पर पीड़ितों को और अभियुक्तों को भरोसा नहीं था . न्याय की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट में फ़रियाद की गयी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मार्च २००८ में विशेष जांच टीम बना दी गयी जिसका मुखिया सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन को बनाया गया . राघवन ने शुरू में ही एक ऐसा फैसला ले लिया जिसकी वजह से बहुत ज्यादा हो हल्ला मच गया .उन्होंने नोएल परमार नाम के उस पुलिस अधिकारी को मुख्य जांच अधिकारी बना दिया कथित रूप से जिसके पक्षपात पूर्ण रवैय्ये की वजह से लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की गुहार की थी . बाद में उसे हटा दिया गया लेकिन उसकी जगह पर उसी परमार के एक ख़ास आदमी को रख लिया . मोटे तौर पर राघवन कमेटी ने गुजरात पुलिस की जांच को ही आगे बढ़ाया . सच्चाई यह है कि वे महीने में तीन बार गुजरात जाते थे और गुजरात पुलिस के अधिकारियों को ही जांच में इस्तेमाल करते थे . मुसलमानों और सामाजिक संगठनों ने कई बार मांग की कि गुजरात पुलिस के बाहर के लोगों को जांच के काम में लगाया जाय लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब गोधरा में ट्रेन में लगी आग के मामले में साज़िश की बात करन एवालों के खिलाफ माहौल बन रहा है और उम्मीद है कि बहुत सारे और मामलों की तरह इस मामले की भी दोबारा जांच होगी और फिर उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष जांच और उसके बाद मिलने वाले न्याय से संतुष्ट हो जायेगें.
गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बारे में जो फैसला आया है उससे सिविल सोसाइटी के लोग बहुत नाराज़ हैं मुंबई के विद्वान् और धर्मनिरपेक्ष चिन्तक, असगर अली इंजीनियर ने कहा है कि केस की जांच सही तरीके से नहीं हुई है लिहाज़ा इसकी जांच सी बी आई से करवाई जाए . अनहद की संयोजक और गुजरात में मुसलमानों को न्याय दिलवाने के लिए बड़े पैमाने पर सक्रिय ,शबनम हाशमी ने कहा है कि कि गुजरात पुलिस और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से तैनात सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन की अगुवाई में एस आई टी ने जो जांच की है वह गड़बड़ है ,मामले की जांच सी बी आई से करवाई जानी चाहिए क्योंकि इस मामले में राघवन कमेटी ने भी एक तरह से गुजरात पुलिस की बात को ही सही ठहराकर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म को पूरा कर दिया है . उनका आरोप है कि राघवन ने इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की है . उनका कहना है कि निष्पक्ष जांच के बाद हो सकता है इस मामले की साज़िश में प्रवीण तोगड़िया ही शामिल पाए जाँए.
फरवरी २००२ में अयोध्या से वापस अहमदाबाद जाती हुई साबरमती एक्सप्रेस के एस-६ कोच में आग लग गयी थी और उसमें सवार सभी लोग मारे गए थे.गुजरात के पंचमहल जिले के गोधरा जंक्शन के पास यह हादसा हुआ था. एक ख़ास राजनीतिक बिरादरी के लोगों ने गोधरा कस्बे के मुसलमानों पर तुरंत आरोप लगाना शुरू कर दिया और भारत के इतिहास का सबसे बड़ा नरसंहार गुजरात के मुसलमानों ने झेला . ट्रेन के डिब्बे में लगी आग के बाद गुजरात के मुसलमानों पर भारी कहर बरपा हुआ . अब नौ साल बाद गोधरा का फैसला आया है .एक डिब्बे में आग लगाने के आरोप में पुलिस ने ९० से ज्यादा लोगों को अभियुक्त बनाया था जिसमें से अदालत ने ६३ लोगों को बरी कर दिया . ३१ लोगों को दोषी पाया गया था. अब सज़ा का फैसला आया है कि अभियुक्तों में से ११ लोगों को फांसी होगी और २० लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा दी गयी है ..जानकार बताते हैं कि किसी भी मामले में ११ लोगों को फांसी की सज़ा देने का यह फैसला अपने आप में एक ख़ास घटना है . आम तौर पर इतने ज्यादा लोगों को फांसी की सज़ा नहीं होती. बहरहाल मामला अब अपील में जाएगा . विश्व हिन्दू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने जिन ६३ लोगों को बरी किया है , वह गलत है . उसके खिलाफ अपील की जायेगी.जिन लोगों को फांसी दी गयी है वह तो ठीक है लेकिन जिन्हें आजीवन कारावास की सज़ा मिली है,उसके खिलाफ भी अपील की जायेगी.और सब को फांसी दिलाई जाईए . प्रवीण तोगड़िया की बात को गंभीरता से लेने की ज़रुरत है.वह गुजरात की वर्तमान सरकार की विचारधारा के बहुत करीबी हैं और गुजरात के ज़्यादातर मामलों में उनकी राय का मह्त्व रहता है .
साबरमती एक्सप्रेस के एस -६ कोच में लगी आग एक दुखद घटना थी . अगर उसमें किसी साज़िश का पता लगता है तो वह और भी दुखद है . लेकिन गोधरा के अपराध के लिए किसी एक समुदाय को ज़िम्मेदार मानकर ,उसके लोगों को घेर घेर कर मारना और भी दुखद है . आने वाली नस्लें इस सारे काम के लिए उन लोगों को माफ़ नहीं करेगीं , जो इसके लिए जिम्मेदार हैं. इसलिए गोधरा और उसके बाद हुए नरसंहार के हर मामले की बहुत ही गंभीरता से जांच होनी चाहिए थी . लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि गोधरा में ट्रेन में लगी आग की जांच शुरू से ही शक़ के दायरे में रही है. गुजरात पुलिस की जांच पर पीड़ितों को और अभियुक्तों को भरोसा नहीं था . न्याय की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट में फ़रियाद की गयी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मार्च २००८ में विशेष जांच टीम बना दी गयी जिसका मुखिया सी बी आई के पूर्व निदेशक आर के राघवन को बनाया गया . राघवन ने शुरू में ही एक ऐसा फैसला ले लिया जिसकी वजह से बहुत ज्यादा हो हल्ला मच गया .उन्होंने नोएल परमार नाम के उस पुलिस अधिकारी को मुख्य जांच अधिकारी बना दिया कथित रूप से जिसके पक्षपात पूर्ण रवैय्ये की वजह से लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की गुहार की थी . बाद में उसे हटा दिया गया लेकिन उसकी जगह पर उसी परमार के एक ख़ास आदमी को रख लिया . मोटे तौर पर राघवन कमेटी ने गुजरात पुलिस की जांच को ही आगे बढ़ाया . सच्चाई यह है कि वे महीने में तीन बार गुजरात जाते थे और गुजरात पुलिस के अधिकारियों को ही जांच में इस्तेमाल करते थे . मुसलमानों और सामाजिक संगठनों ने कई बार मांग की कि गुजरात पुलिस के बाहर के लोगों को जांच के काम में लगाया जाय लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब गोधरा में ट्रेन में लगी आग के मामले में साज़िश की बात करन एवालों के खिलाफ माहौल बन रहा है और उम्मीद है कि बहुत सारे और मामलों की तरह इस मामले की भी दोबारा जांच होगी और फिर उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी पक्ष जांच और उसके बाद मिलने वाले न्याय से संतुष्ट हो जायेगें.
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