Tuesday, November 7, 2017

पाकिस्तान:जो शाखे-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ,नापायेदार होगा

शेष नारायण सिंह

पाकिस्तानी आतंकवादी और जैशे मुहम्मद के सरगना ,मौलाना मसूद अजहर को पूरी दुनिया के सभ्य देश ग्लोबल आतंकवादी घोषित करना चाहते थे . सुरक्षा पारिषद के एक प्रस्ताव में ऐसी मंशा ज़ाहिर की गयी थी . अमरीका , फ्रांस और ब्रिटेन ने इसकी पैरवी भी की लेकिन चीन ने प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया और मसूद अजहर एक बार फिर बच निकला . मसूद अजहर का संगठन जैशे-मुहम्मद  पहले  ही प्रतिबंधित संगठनों की लिस्ट में मौजूद है . चीन ने जब इस प्रस्ताव पर वीटो लगाया तो उसका तर्क था  कि अभी मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करने के लिए देशों  में आम  राय नहीं बन पाई है जबकि सच्चाई यह है कि  पाकिस्तान के अलावा कोई भी देश उसको  बचाना नहीं चाहता .
चीन के इस रुख पर भारत ने गहरी निराशा जताई है . विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने एक  बयान  में कहा है कि ," हमें इस बात से बहुत निराशा हुयी है कि केवल एक देश ने  पूरी दुनिया के देशों  की आम राय को ब्लाक कर दिया है जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र से प्रतिबंधित एक संगठन के मुखिया,  मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकवादी घोषित किया जाना  था. यह दूरदर्शिता बहुत ही नुकसानदेह साबित हो सकती  है ." मसूद अजहर भारत की संसद  पर हुए आतंकवादी हमले का मुख्य साज़िशकर्ता तो है ही पठानकोट हमले  में भी उसका हाथ रहा  है . मसूद अजहर १९९४ में कश्मीर आया था जहां उसको गिरफ्तार कर लिया गया था .  उसको रिहा करवाने के लिए  अल फरान नाम के एक आतंकी  गिरोह ने कुछ सैलानियों का  अपहरण कर लिया था लेकिन नाकाम रहे. बाद में उसके भाई की अगुवाई  में आतंकवादियों ने नेपाल  से दिल्ली आ रहे  एक विमान को हाइजैक करके कंदहार में उतारा और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को मजबूर कर दिया कि   उसको रिहा करें. उस दौर के विदेशमंत्री जसवंत सिंह मसूद अज़हर सहित कुछ और आतंकवादियों को लेकर कंदहार गए और विमान और यात्रियों को वापस लाये . और इस तरह मसूद अजहर जेल से छूटने में सफल रहा .
भारत की जेल से छोटने के बाद से ही मसूद अजहर भारत को  तबाह करने के  सपने पाले हुये है. जहां तक भारत को तबाह करने की बात  है, वह सपना तो कभी नहीं पूरा होगा लेकिन इस मुहिम में पाकिस्तान तबाही के कगार  पर  पंहुंच गया है .आज पाकिस्तान अपने ही पैदा किये हुए आतंकवाद का शिकार हो रहा  है.
पाकिस्तान अपने ७० साल के इतिहास में सबसे भयानक मुसीबत के दौर से गुज़र रहा है. आतंकवाद का भस्मासुर उसे निगल जाने की तैयारी में है. देश के हर बड़े शहर को आतंकवादी अपने हमले का निशाना बना चुके हैं . पाकिस्तान को विखंडन हुआ तो उसके इतिहास में  बांग्लादेश की स्थापना के बाद यह सबसे बड़ा झटका माना जाएगा. अजीब बात यह है कि पड़ोसी देशों में आतंकवाद को हथियार की तरह इस्तेमाल करने के चक्कर में पाकिस्तान खुद आतंकवाद का शिकार हो गया है और अपने अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया है. पाकिस्तानी हुक्मरान को बहुत दिन तक मुगालता था कि आसपास के देशों में आतंक फैला कर वे अपनी राजनीतिक ताक़त बढा सकते थे. जब अमरीका की मदद से पाकिस्तानी तानाशाह, जनरल जिया उल हक आतंकवाद को अपनी सरकार की नीति के रूप में विकसित कर रहे थे , तभी दुनिया भर के समझदार लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि आतंकवाद की आग उनके देश को ही लपेट सकती है . लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी . जनरल जिया ने धार्मिक उन्मादियों और फौज के जिद्दी जनरलों की सलाह से देश के बेकार फिर रहे नौजवानों की एक जमात बनायी थी जिसकी मदद से उन्होंने अफगानिस्तान और भारत में आतंकवाद की खेती की थी .उसी खेती का ज़हर आज पाकिस्तान के अस्तित्व पर सवालिया निशान बन कर खडा हो गया है.. अमरीका की सुरक्षा पर भी उसी आतंकवाद का साया मंडरा रहा है जो पाकिस्तानी हुक्मरानों की मदद से स्थापित किया गया था . दुनिया जानती है कि अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मन, अल कायदा , अमरीकी पैसे से ही बनाया गया था और उसके संस्थापक ओसामा बिन लादेन अमरीका के ख़ास चेला हुआ करते थे . बाद में उन्होंने ही अमरीका पर आतंकवादी हमला करवाया और  पाकिस्तान की  हिफाज़त में आ गए जहाँ उनको अमरीका ने पाकिस्तानी  फौज की नाक के नीचे से पकड़ा और मार डाला .ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद अमरीका की विदेशनीति में पाकिस्तान  के प्रति रुख में ख़ासा बदलाव आया है .
आज  हालात यह हैं कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई में इतनी  बुरी तरह से उलझ चुका है कि उसके पास और किसी काम के लिए फुर्सत ही नहीं है. आर्थिक विकास के बारे में अब पाकिस्तान में बात ही नहीं होती .यह याद करना दिलचस्प होगा कि भारत जैसे बड़े देश से पाकिस्तान की दुश्मनी का आधार, कश्मीर है. वह कश्मीर को अपना बनाना चाहता है लेकिन आज वह इतिहास के उस मोड़ पर खडा है जहां से उसको कश्मीर पर कब्जा तो दूर , अपने चार राज्यों को बचा कर रख पाना ही टेढी खीर नज़र आ रही है.  कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी है .

पाकिस्तान की मदद करके अब अमरीका भी पछता रहा है . जब से पाकिस्तान बना है अमरीका उसे करीब पचास अरब डालर से ज्यादा का दान दे चुका है. यह शुद्ध रूप से खैरात है .अमरीका अब ऐलानियाँ कहता है कि पाकिस्तानी सेना आतंकवाद की प्रायोजक है और उसी ने हक्कानी गिरोह , जैशे-मुहम्मद और लश्कर-ए-तय्यबा को हर तरह की मदद की है . यह सभी  गिरोह अफगानिस्तान और भारत में आतंक फैला रहे हैं .  पिछले करीब  ४० वर्षों से भारत आई एस आई प्रायोजित आतंकवाद को झेल रहा  है . पंजाब और जम्मू-कश्मीर में आई एस आई प्रायोजित आतंक का सामना किया गया है . लेकिन जब भी अमरीका से कहा गया कि जो भी मदद पाकिस्तान को अमरीका तरफ से मिलती है ,उसका बड़ा हिस्सा भारत के खिलाफ इस्तेमाल होता है तो अमरीका ने उसे हंस कर टाल दिया . अब जब अमरीकी हितों पर हमला हो रहा है तो पाकिस्तान में अमरीका को कमी नज़र आने लगी है .
 पाकिस्तान का नया मददगार चीन है लेकिन वह  नक़द मदद नहीं देता . वह पाकिस्तान में बहुत सारी ढांचागत सुविधाओं की स्थापना कर रहा है ,जिससे आने वाले वक़्त में पाकिस्तानी राष्ट्र को लाभ मिल सकता है . लेकिन इन ढांचागत संस्थाओं की मालिक चीन की कम्पनियां ही रहेंगी . यानी अगर पाकिस्तान ने चीन के साथ वही किया जो उसने अमरीका के साथ  किया है तो चीन पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग पर कब्जा भी कर सकता है .


पाकिस्तानी शासक अब अमरीका से परेशान हैं लेकिन खुले आम अमरीका के खिलाफ भी नहीं  जा सकते .सच्ची बात यह है कि  पाकिस्तान के आतंरिक मामलों में अमरीका की खुली दखलंदाजी है और पाकिस्तान के शासक इस हस्तक्षेप को झेलने के लिए मजबूर हैं .एक संप्रभु देश के अंदरूनी मामलों में अमरीका की दखलंदाजी को जनतंत्र के समर्थक कभी भी सही नहीं मानते लेकिन आज पाकिस्तान जिस तरह से अपने ही बनाए दलदल में फंस चुका है, उन हालात में पाकिस्तान से किसी को हमदर्दी नहीं है . उस दलदल से निकलना पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए तो ज़रूरी है ही बाकी दुनिया के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. अमरीका पाकिस्तान कोइस हालत में पंहुचाने के लिए आंशिक रूप से ज़ेम्मेदार है और चिंतित है . शायद इसीलिये जब भी कोई अमरीकी अधिकारी या मंत्री चाहता है पाकिस्तान को हडका देता है . पिछले दिनों जब अमरीकी विदेशमंत्री रेक्स टिलरसन इस्लामाबाद गए थे तो उन्होंने साफ  फरमान जारी कर दिया कि आतंकवाद पर काबू करो वरना अमरीका खुद ही कुछ करेगा . सीधी ज़बान में इसको हमले की धमकी माना  जाएगा लेकिन अमरीकी विदेशमंत्री के सामने  पाकिस्तानी केयरटेकर प्रधानमंत्री और फौज के मुखिया जनरल बाजवा की घिग्घी बांध गयी . उनके  विदा होने के बाद अखबारों में बयान वगैरह देकर इज्ज़त बचाने की कोशिश की गयी .

पाकिस्तान के शासकों ने उसको तबाही के रास्ते पर डाल दिया   है. आज बलोचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ ज़बरदस्त आन्दोलन चल रहा है .सिंध  में भी पंजाबी आधिपत्य वाली केंद्रीय हुकूमत और फौज से बड़ी नाराजगी  है. इन  हालात में पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी वहां के सभ्य समाज और  जनतंत्र की पक्षधर जमातों की है. हालांकि इतने दिनों उनकी संख्या बहुत कम हो गयी है . मसूद अजहर,   हाफ़िज़ सईद और सैय्यद सलाहुद्दीन जैसे लोगों के चलते पाकिस्तान की छवि बाकी दुनिया में एक असफल राष्ट्र की बन चुकी है .लेकिन पाकिस्तान का बचना बहुत ज़रूरी है क्योंकि कुछ फौजियों और सियासतदानों के चक्कर में पाकिस्तानी कौम को तबाह नहीं होने देना चाहिए . इसलिए इस बात में दो राय नहीं कि पाकिस्तान को एक जनतांत्रिक राज्य के रूप में बनाए रखना पूरी दुनिया के हित में है.. यह अलग बात है कि अब तक के गैरजिम्मेदार पाकिस्तानी शासकों ने इसकी गुंजाइश बहुत कम छोडी है.
अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान में आतंकवादियों का इतना दबदबा कैसे हुआ ,यह समझना कोई मुश्किल नहीं है . पाकिस्तान की आज़ादी के कई साल बाद तक वहां संविधान नहीं तैयार किया जा सका.  पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बहुत जल्दी मौत हो गयी और सहारनपुर से गए और नए देश प्रधानमंत्री लियाक़त अली को क़त्ल कर दिया गया . उसके बाद वहां धार्मिक और फौजी लोगों की  ताकत बढ़ने लगी .नतीजा यह हुआ कि आगे चलकर जब  संविधान बना  भी तो फौज देश की राजनीतिक सत्ता पर कंट्रोल कर चुकी थी. उसके साथ साथ धार्मिक जमातों का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था. पाकिस्तान के इतिहास में एक मुकाम यह भी आया कि सरकार के मुखिया को  नए देश  को इस्लामी राज्य घोषित करना  पड़ा. पाकिस्तान में अब तक चार फौजी तानाशाह हुकूमत कर चुके हैं लेकिन पाकिस्तानी समाज और राज्य का सबसे बड़ा  नुक्सान जनरल जिया-उल-हक  ने किया . उन्होंने पाकिस्तान में फौज और धार्मिक अतिवादी गठजोड़ कायम किया जिसका  खामियाजा पाकिस्तानी  समाज और राजनीति आजतक झेल रहा है . पाकिस्तान में सक्रिय सबसे बड़ा आतंकवादी हाफ़िज़ सईद जनरल जिया की ही पैदावार है . हाफ़िज़ सईद तो मिस्र के काहिरा विश्वविद्यालय में  दीनियात का   मास्टर था . उसको वहां से लाकर जिया ने अपना धार्मिक सलाहकार नियुक्त किया . धार्मिक जमातों और फौज के बीच उसी ने सारी जुगलबंदी करवाई और आज आलम यह है कि दुनिया में कहीं भी आतंकवादी हमला हो ,शक की सुई सबसे पहले पाकिस्तान पर ही  जाती है . आज पकिस्तान  एक दहशतगर्द और असफल कौम है और आने वाले वक़्त में उसके अस्तित्व पर सवाल बार बार उठेगा

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