Monday, March 3, 2014



आज स्वर्गीय क़मर आज़ाद हाशमी का जन्मदिन हैं . उनेक पिछले ३७ वर्षों से मैं अम्मा जी के रूप में जानता आया हूँ . हालांकि वे सबीहा ,सुहेल, शेहला ,सफदर और शबनम की अम्मा हैं लेकिन उनके पाँचों बच्चों के  सभी दोस्त उनको अम्मा जी ही कहते थे .अम्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी शान कायम है और रहेगी भी . दिल्ली की बाएं बाजू की सियासी और अदबी ज़िंदगी को जानने वाले जानते हैं की अम्मा कौन हैं . हमारी पीढ़ी का  जो भी इंसान उनसे मिलता था ,उनको अम्मा ही कहने लगता था. मेरी मुलाक़ात उनसे १९७६ में हुयी थी. इमरजेंसी के खिलाफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जो प्रतिरोध चल रहा था ,उसकी अगुवाई उनके बेटे ,सुहेल हाशमी कर रहे थे . वे जे एन यू यूनिट के सेक्रेटरी थे . छात्रसंघ के अध्यक्ष देवी प्रसाद त्रिपाठी जेल में थे , और भी बहुत सारे साथी जेलों में थे . राजेन्द्र शर्मा के कमरे में साइक्लोस्टाइल करने की मशीन लगी थी जिस से इमरजेंसी के खिलाफ पम्फलेट आदि छापे जाते थे . मैं फरवरी १९७६ में दिल्ली आया था और आन्दोलन के साथी के रूप में  मेरी पहचान जे एन यू में डी पी त्रिपाठी और घनश्याम मिश्र ने करवा दी थी.  जहां आज संसद मार्ग  थाना है वहीं एक कोर्ट हुआ करती थी जिसमें जेल में बंद डी पी त्रिपाठी को पेशी के लिए लाया जाता था . वहीं मेरी मुलाक़ात पीरू विजयन और उषा मेनन से डी पी  त्रिपाठी ने करवाई थी.  अम्मा से उनके लोदी एस्टेट वाले प्राइमरी स्कूल के घर में मैं पीरू विजयन के साथ गया था . वहीं  मुझे अशोकलता जैन मिली थीं . उसके बाद तो लगने लगा कि हम भी उनके घर के सदस्य हो गए . वहां उस वक़्त के जे एन यू के एस एफ आई से जुड़े हुए बहुत सारे लोग मिल  जाते थे जो भूखे होते थे . सुहेल के दोस्तों के लिए वहां पेटपूजा के लिए कुछ न कुछ ज़रूर मिल जाता था .

२०११ में जब उनके जन्मदिन के मौके पर उर्दू अकादमी ने उनको सम्मानित करने  का फैसला किया था तो मैंने एक मजमून लिख कर उनके प्रति सामान व्यक्त किया था . उसमें लिखी गयी बातें आज भी उतनी ही सच  हैं जितनी तीन साल पहले थीं ,या आने वाले बहुत सारे वर्षों में सच रहेगीं . यह मजमून उस दिन उर्दू और हिंदी के अखबारों में छपा भी था.आज वही मजमून फिर से पोस्ट कर रहा हूँ ,स्पेलिंग की गलतियों सहित ;

दिल्ली सरकार की उर्दू अकादमी की ओर से आज एक ऐसी महिला का सम्मान किया जा रहा है,जिन्होंने मुसीबतों को हर मोड़ पर चुनौती दी है. दिल्ली के समाज के निर्माण में उनका खुद का और उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान है .कमर आज़ाद हाशमी का जन्म ४ मार्च १९२६ को झांसी में हुआ था.उनके पिता अज़हर अली आज़ाद उर्दू और फारसी के विद्वान थे.उनकी माँ जुबैदा खातून, दहेज़ के खिलाफ सक्रिय थीं कई भाषाओं की जानकार थीं, घुड़सवारी करती थीं और राइफल चलाना जानती थीं. उनकी ससुराल के लोग दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे. उनके पति की माँ , बेगम हाशमी नैशनल फेडरेशन आफ इन्डियन वीमेन की संस्थापक अध्यक्ष थीं. मुल्क के बँटवारे के वक़्त ऐसे हालात बने के कमर आज़ाद हाशमी को अपने माता पिता के साथ पाकिस्तान जाना पड़ा. वहां वे पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव , सज्जाद ज़हीर से मिलीं. सज्जाद ज़हीर को कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान भेजा था जहां उन्हें पार्टी का गठन करना था . उन्हने मालूम था कि कमर की शादी हनीफ हाशमी से होने वाली थी. उन्होंने कमर को कहा कि वापस जाओ और हनीफ से शादी करके उसे भी पाकिस्तान लाओ जिस से वहां वामपंथी आन्दोलन को ताक़त दी जा सके. कमर आज़ाद हाशमी जब दिल्ली आयीं तो शादी तो उन्होंने हनीफ हाशमी से कर ली लेकिन वापस जाने की बात ख़त्म कर दी. बाद में स्व सज्जाद ज़हीर भी वापस हिन्दुस्तान आ गये. 
कमर आज़ाद हाशमी ने अपनी पहली किताब ६९ साल की उम्र में लिखी . अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी पढाई पर ब्रेक लग गयी थी क्योंकि १९४७ के तकसीम ए मुल्क ने सब कुछ बदल दिया था .उन्होंने सत्तर साल की उम्र में एम ए करने का फैसला किया और किया भी. मजदूरों के हक के लिए लड़ते हुए उनके ३४ साल के बेटे को दिल्ली के पास साहिबाबाद में गुंडों ने मार डाला लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी . उस दिन उन्होंने दुःख में डूबे उसके साथियों का हौसला बढ़ाया था और कहा कि साथियो उठ खड़े हो और रोशनी फैलाने का काम जारी रखो क्योंकि अँधेरे के परदे को रोशनी से ही खत्म किया जा सकता है .उनके बेटे का नाम सफ़दर हाशमी था और आज उसे पूरी दुनिया में लोग जानते हैं . कमर आज़ाद हाशमी के सफ़दर के अलावा चार और बच्चे हैं. इन्होने अपने सभी बच्चों के अंदर पता नहीं क्या भर दिया है कि उनमें से कोई भी अन्याय के खिलाफ मोर्चा संभालने में एक मिनट नहीं लगाता . इनकी सबसे छोटी औलाद शबनम हाशमी हैं जिन्होंने गुजरात नरसंहार २००२ के बाद दर्द की तूफ़ान को झेल रहे हर गुजराती मुसलमान को ढाढस बंधाया और उसके साथ खडी रहीं.शबनम ने बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद संघी ताक़तों का मुकाबला किया और देश में सेकुलर जमातों को एकजुट किया. इनके बड़े बेटे सुहेल हाशमी हैं जो दिल्ली की विरासत के सबसे बड़े जानकारों में गिने जाते हैं . जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक रूप को स्थापित करने में सुहेल का बड़ा योगदान है .इनकी दो और बेटियाँ हैं जिन्होंने स्कूल टीचर के रूप में दिल्ली के दो नामी स्कूलों में काम किया और अपने विषय को बहुत ही लोकप्रिय बनाया . अपने बच्चों को कमर आज़ाद हाशमी ने बेहतर इंसान बनने की ट्रेनिंग अच्छी तरह से दे रखी है .दिल्ली में नर्सरी शिक्षा को एक सम्मानजनक मुकाम तक पंहुचाने में कमर आज़ाद हाशमी का ख़ास योगदान है .

मुल्क के बँटवारे के बाद से दिल्ली और अलीगढ के बीच उन्होंने वक़्त की हर मार को झेला और अपने बच्चों को मज़बूत इंसान बनाया. उनके छोटे बेटे सफ़दर को १९८९ में मार डाला गया . उसकी याद में ही सामाजिक बदलाव और सांस्कृतिक हस्तक्षेप का मंच ,सहमत बनाया गया . शुरू में सहमत का संचालन उनकी छोटी बेटी शबनम हाशमी ने किया . बाद में शबनम ने अनहद का गठन किया जो शोषित पीड़ित जनता की लड़ाई का एक प्रमुख मोर्चा है . सहमत और अनहद से जुड़े ज़्यादातर लोग कमर आज़ाद हाशमी को अम्माजी कहते हैं .सफ़दर को विषय बनाकर अम्माजी ने एक किताब भी लिखी जिसका नाम है "पांचवां चिराग़ " . यह किताब कई भाषाओं में छप चुकी है . घोषित रूप से तो यह सफ़दर की जीवनी है लेकिन वास्तव में यह बीसवीं सदी में हो रहे बदलाव का एक आइना है . यह किताब उस औरत के अज़्म की कहानी है जिसका जवान बेटा राजनीतिक कारणों से शहीद कर दिया गया था,. इस किताब में चारों तरफ बिखरे हुए सपने पड़े हैं ,उम्मीदें हैं और हौसले हैं . इस किताब को पढने के बाद लगता है कि एक औरत अगर तय कर ले तो मुसीबतें कहीं नहीं ठहरेगीं. अम्माजी को बहुत सारे सम्मान मिले हैं और आज भी काम करने का ज़ज्बा ऐसा है कि अगले बीस साल तक के लिए प्लान बना चुकी हैं . 
आजकल दिल्ली में अपनी छोटी बेटी शबनम हाशमी के साथ रहती हैं और अनहद के काम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं . अपने वालिद की फारसी ग़ज़लों और नज्मों का एक संकलन प्रकाशित कर चुकी है और दूसरे संकलन के बारे में काम चल रहा है.आज भी उनके पास बैठने पर लगता है कि काम करने का अगर हौसला हो तो बाकी चीज़ें अपने आप दुरुस्त हो जायेगीं.

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