Thursday, August 9, 2018

इलाहाबाद में लड़कियों पर पुलिस लाठी चार्ज पर मेरी टिप्पणी

  
श्वेता यादव, नेहा यादव, ऋचा सिंह ,पूजा शुक्ला आज के नाम हैं. इन्हीं विश्वविद्यालयों में हमारे समय में देवब्रत मजुमदार, मार्कंडेय सिंह , चंचल, सत्यपाल मलिक, आरिफ मुहम्मद खान ,अतुल अंजान, मोहन सिंह, बृज भूषण तिवारी ,जनेश्वर मिश्र के नाम लिए जाते थे . मुझे लगता है कि यथास्थितिवादी शक्तियां चाहे जितना कोशिश करें, लड़कियों को रोका नहीं जा सकता . हां एक फर्क ज़रूर पड़ा है --पहले जब राजनेताओं का विरोध होता था तो नेता लोग उन छात्र नेताओं से ज़बान से बात करते थे लेकिन अब सब कुछ बदल गया है .अब नेता नहीं सत्ता बात करती है और ज़बान से नहीं लाठी गोली से.
यानी पिछले चालीस साल में बहुत कुछ बदल गया है . छात्र राजनीति की बाग़ अब महिलाओं के पास है ,देश की सियासत की कयादत अब लड़कियों के पास आने वाली है . इस नई सुबह का इंतज़ार किया जाएगा . नेहरू-लोहिया-जयप्रकाश की विरोध संस्कृति की मशाल अब इन्हीं बहादुर लड़कियों के हाथ में हैं. मुझे भरोसा है कि हमारा मुस्तकबिल रोशन रहेगा .( २९ जुलाई,२०१८ )

No comments:

Post a Comment