Thursday, January 9, 2020

दिल्ली में भी अगर बीजेपी का रथ रुका तो केंद्र में विकल्प की चर्चा शुरू हो जायेगी


शेष नारायण  सिंह

झारखण्ड विधान सभा चुनाव के नतीजों ने निर्णायक रूप से साबित कर दिया है कि किसी भी  सत्ता को चुनौती दी जा सकती है ,बस राजनीतिक सूझबूझ और हौसला होना चाहिए . झारखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष  अमित शाह ने पूरी मेहनत से प्रचार किया , लगभग हर जिले में उन लोगों की औसत दो दो सभाएं  हुईं .  गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भी झारखण्ड में बहुत ही अच्छा प्रभाव है. उन्होंने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी लेकिन उनकी पार्टी विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हार गयी.  अब वहां विपक्ष की सरकार है . पिछले पांच वर्षों में हुए ज्यादातर चुनावों की तरह झारखण्ड में भी भावनात्मक मुद्दों की खूब वर्षा की गयी. बालाकोट, पाकिस्तान ,तीन तलाक  आदि आजमाए  गए मुद्दों के अलावा , राम मंदिर , ३७०,  नागरिकता कानून और एन आर सी जैसे ताज़ा विभाजनकारी मुद्दे पर बहस के दायरे में  लाये. मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में कुछ अति वफादार टीवी चैनलों ने भी ज़रूरी सहयोग दिया . विपक्ष के नेता लोग आजकल टीवी चैनलों की बहस का बहिष्कार कर रहे हैं तो उनके समर्थक नाम की ' विचारकों ' की एक नई प्रजाति का आविष्कार  हो गया है .जिनको स्टूडियो में बुलाकर कांग्रेस , सपा, बसपा आदि की धुनाई की जाती है . फ़ारसी शब्दों के नाम वाले कुछ दाढ़ी टोपी धारी लोगों को बुला लिया जाता है जो  देश के  सभी मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करते हैं और उनकी  जहालत को देश के सभी मुसलमानों की जहालत बताकर  पूरी बिरादरी को राष्ट्रद्रोही साबित करने की कोशिश की जाती है . बीजेपी के  प्रवक्ता लोग तो खैर नियमित रूप से राहुल गांधी और उनके खानदान की कमियों को गिनाते ही रहते  हैं . जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब तक के उनके खानदान को लोगों को देशहित की  भावना के खिलाफ बताते हैं . राम  विलास पासवान, नीतीश कुमार ,सुदेश महतो और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टियों ने भी बीजेपी विरोधी वोटों को छिन्न भिन्न करने में भूमिका निभाई . इन  सारी चुनाव जिताने वाली तरकीबों का  प्रयोग  झारखण्ड के चुनाव में भी खूब किया गया .सारी कोशिशों के बाद भी  केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को   राज्य विधानसभा में  बहुमत तो नहीं ही मिला, सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का तमगा भी हाथ  नहीं आया .  मतों की  गिनती चल  रही थी और बीजेपी के उम्मीदवार निर्णायक हार की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन  पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी जीत और सरकार दोबारा बनाने का दावा कर रहे थे . बहरहाल आज वहां हेमंत सोरेन की अगुवाई में  कांग्रेस और लालू यादव की पार्टी के सहयोग से  विपक्ष की सरकार बन गयी है .
झारखण्ड विधानसभा में कुल विधायकों की संख्या केवल ८१ है . इसलिए संख्या के हिसाब से उसको  उतना महत्वपूर्ण न मानने की बीजेपी नेताओं की बात पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन  पिछले एक साल में हुए  विधानसभा चुनावों  में  बीजेपी को हो रहे नुक्सान को मिलाकर देखा जाये तो यह पार्टी के विजय रथ पर लगी एक ज़बरदस्त ब्रेक है . गौर करने की बात यह  है कि इसी कालखंड में लोकसभा के चुनाव भी हुए जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी को वह वाला बहुमत मिला जो प्रधानमंत्री की रूप में चुनाव लड़ने वाले जवाहरलाल नेहरू , राजीव गांधी और इंदिरा गांधी के नाम दर्ज है . २०१४ और २०१९ में लगातार दो बार लोकसभा में  चुनाव जीतकर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आपको उस कतार में खड़ा करने की दिशा में क़दम बढ़ा  दिया है  जिसमें जवाहरलाल नेहरू विराजते हैं . नेहरू देश के अब तक के इकलौते प्रधानमंत्री हैं जिनके नाम पर देश  में  तीन लोकसभा चुनाव हुए और वे लगातार तीनों में विजयी  रहे. हाँ यह भी सच है कि नेहरू के समय में   हुए विधानसभा चुनावों में भी केरल के अलावा हर विधान सभा में उनकी पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ चुनाव  जीतती थी .लेकिन नरेंद्र मोदी की विजय यात्रा अब केवल लोकसभा चुनावों तक की सीमित हो गयी है .

बीजेपी की सहयोगी पार्टी ,जनता दल ( यू ) के महामंत्री और नीतीश के कुमार के भरोसेमंद नेता के सी त्यागी का कहना है कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व को गठबन्धन धर्म निभाना नहीं आता . बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी से गठबंधन धर्म निभाने की कला सीखनी  चाहिए . के सी त्यागी का यह बयान झारखण्ड विधानसभा के चुनाव नतीजों के बाद आया है . इसके राजनीतिक तत्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता . दिल्ली के सत्ता के गलियारों में चलने वाली गपबाजी की शास्वत  परम्परा पर नज़र डालें तो साफ नज़र आ जाएगा कि नीतीश कुमार की भावी रणनीति अब बहस की ज़द में आ गयी है. कई भरोसेमंद लोग कह  रहे हैं कि कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के कारण आयी स्थिरता के  कारण  कई  विपक्षी  पार्टियां अब कांग्रेस की तरफ  देखने लगी हैं. तेलंगाना के मुख्यमंत्री जगन  रेड्डी ने  नागरिकता क़ानून के खिलाफ जो आवाज़ उठाई है उसमें भी सोनिया इफेक्ट को साफ़ देखा जा सकता है . दिल्ली में विराजने वाले कई नेताओं , पत्रकारों को पता है कि  तेलंगाना विधानसभा चुनाव के पहले  जगन रेड्डी ने कांग्रेस के सहयोग की पहल की थी लेकिन राहुल गांधी की अन्यमनस्कता के कारण बात बनी नहीं .उनके करीबी लोगों के कहना है कि सोनिया गांधी के प्रति उनकी वही भावना अब भी है जो उनके स्वर्गीय पिता के समय में हुआ करती थी.

झारखण्ड चुनाव में मिली हार को बीजेपी के नेता भी  गंभीरता से ले  रहे हैं .उनको मालूम है कि यह ८१ सीटों की विधानसभा की इकलौती हार ही नहीं  है यह , हार का एक सिलसिला है  . अब  बीजेपी का  भ्रष्टाचार विरोध का नारा  बैक बर्नर पर आ गया है. हरियाणा में जिस  अजय चौटाला  के भ्रष्टाचार के विरोध में भाषण करके भ्रष्टाचार विरोध का माहौल बनाया  गया था उन्हीं के बेटे  के सहयोग से आज हरियाणा में पार्टी की सत्ता है . महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में उनके सहयोगी उद्धव ठाकरे ने  कांगेस का दामन थाम लिया है और शरद पवार जैसा राजनीति का आचार्य महाराष्ट्र की बीजेपी विरोधी  सरकार की रक्षा का  बीड़ा उठाये हुए है. सही बात यह है कि त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में ज़बरदस्त जीत के बार बीजेपी को किसी विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है . अभी दो साल पहले देश के ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकारें हुआ करती थीं लेकिन आज कर्णाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश  जैसे बड़े राज्यों के अलावा उनकी सरकार या तो छोटे राज्यों में है, या पूर्वोत्तर के राज्यों में . वहां भी असम और त्रिपुरा के अलावा उनकी सरकारें उन राज्यों में हैं  जहां उनकी राजनीतिक   मौजूदगी कोई ख़ास नहीं है . जोड़तोड़ कर बनाई गयी सरकारें हैं . पूर्वोत्तर के नेताओं की राजनीति का स्थाई भाव यह है कि जो भी केंद्र सरकार में सत्ता में रहता है ,   वहां के नेता उसी के साथ हो लेते हैं .

झारखण्ड के बाद दिल्ली विधानसभा का महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला है . दिल्ली  प्रदेश की सभी सातों लोकसभा सीटें  बीजेपी के पास हैं . अगर कैंटोनमेंट और नई दिल्ली नगरपालिका को मिला दिया जाए तो  दिल्ली में  पांच नगरपालिकाएं हैं  और सभी पर बीजेपी का नियंत्रण है. इसलिए साधारण तर्क बुद्धि के  हिसाब  से तो पार्टी को विधानसभा चुनाव भी जीत जाना  चाहिए लेकिन ऐसा  है नहीं.  २०१५ के विधानसभा चुनावों में भी यही स्थिति थी लेकिन बीजेपी को ७० सीटों की विधानसभा में केवल तीन सीटें मिलीं . इस बार भी दिल्ली की गरीब बस्तियों में मुख्यमंत्री अरविन्द  केजरीवाल के काम की चर्चा है . उनके स्वास्थय और शिक्षा के क्षेत्र में किये गए काम दिल्ली के कई इलाकों में उनके पक्ष में माहौल बना रहे हैं . बिजली और पानी के बिलों में पिछले कई वर्षों से हुयी कमी भी उनकी लोकप्रियता  बढ़ा रही हैं . इसलिए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में बीजेपी को अरविन्द केजरीवाल के रूप में एक मज़बूत चुनौती मिलने की बात सभी कर रहे  हैं .दूसरी बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई की अंदरूनी लडाइयां भी हैं . हालांकि अमित शाह  ने मनोज तिवारी को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर दिल्ली के पुराने गुटों को बराबर की  हैसियत में रखने की कोशिश की है लेकिन दिल्ली के पुराने नेता मनोज को अपना नेता ही नहीं मानते .पुराने  दिल्ली  वालों में  पुरबियों के प्रति जो एक अजीब सा भाव अभी कुछ साल पहले तक हुआ करता था ,  बीजेपी के ए  नेता , मनोज तिवारी को उसी भाव से देखते   हैं .  जबकि सच्चाई यह है , मनोज तिवारी का पूरे  प्रदेश के  एक वर्ग में सम्मान है . ज्यादातर इलाकों में यह वही वर्ग है जहाँ अरविन्द केजरीवाल की जीत की संभावना बताई जा रही है .लेकिन दिल्ली के स्थापित नेता तो मनोज तिवारी का वही हाल करने पर  आमादा  नज़र आ आ रहे हैं , जो इन लोगों ने कभी किरण बेदी का किया था. इसलिए दिल्ली की लड़ाई बीजेपी के लिए मुश्किल मानी जा रही है
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अगर दिल्ली विधानसभा में भी बीजेपी का वही  हाल हुआ जो  झारखण्ड में हुआ है तो निश्चित रूप से केंद्र में बीजेपी के विकल्प की बात चल निकलेगी .२०१४ के लोकसभा चुनावों के पहले अन्ना हजारे के प्रायोजित भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के बाद जब अन्ना के सबसे महत्वपूर्ण शिष्य अरविन्द केजरीवाल ने आन्दोलन के प्रायोजकों की मर्जी के खिलाफ अपनी पार्टी बना ली तो देश में कांग्रेस की निश्चित हार के मद्देनजर  विकल्प की बात  शुरू हो गयी थी. अन्ना हजारे की रामलीला मैदान वाली लीला का आयोजन जिन लोगों ने किया था , उनकी इच्छा थी कि २०१४ के चुनाव में उस आन्दोलन वाले भी वैसा ही काम करें जैसा रामदेव ने किया लेकिन अरविन्द केजरीवाल तो वाराणसी सीट पर ही चुनौती देने पंहुंच  गए . उसके बाद राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कांग्रेस और  बीजेपी के विकल्प के  रूप में अरविन्द केजरीवाल को देखना शुरू कर दिया था .अन्ना आन्दोलन में देश के बेहतरीन लोगों का जमावड़ा था .  बाद में उनमें से ज्यादातर एक कहते  पाए गए कि उनको मालूम ही नहीं था कि अन्ना किसकी शह पर काम  कर रहे थे वरना वे उनके साथ न जाते .बाद में एक एक करके सभी चले गए .लेकिन अरविन्द केजरीवाल  अपने क़रीबी दोस्तों के साथ पार्टी में जमे रहे और दिल्ली   और पंजाब  में सम्मानजनक मुकाम बनाया .
अगर दिल्ली में  इस बार फिर अरविन्द केजरीवाल दुबारा  सरकार बनाने में सफल हो जाते हैं तो बीजेपी की जीत का जो रथ हरियाणा ,  महाराष्ट्र , झारखण्ड आदि राज्यों में रोका  गया है वह केंद्र की राजनीति में विकल्प की चर्चा को अवसर देगा और उस चर्चा के दूरगामी राजनीतिक पारिणाम होंगें . 

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