Thursday, January 9, 2014

प्रियंका गांधी के शामिल होने से चुनाव अभियान में नया माहौल बनेगा



शेष नारायण सिंह
प्रियंका गांधी को कांग्रेस में बड़े रोल देने की कांग्रेस की योजना पर चौतरफा चर्चा शुरू हो यी है . खबर है कि प्रियंका गांधी ने कांग्रेस पार्टी में राहुलगांधी और सोनिया गांधी के निजी सहायकों को बुलाकर उन्होंने सलाह शविरा किया .खबर है कि सोनिया गांधी के जनार्दन द्विवेदी और अहमद पटेल को राहुल गांधी के आवास पर तलब किया गया .राहुल गांधी की टीम के मधुसूदन मिस्त्री,जयराम रमेश और अजय माकन भी बुलाये गए थे . पिछले विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है ,उसके बाद कांग्रेसी हलकों में हडकंप है .विधानसभा चुनावों में हुई भारी  हार के बाद कांग्रेस को लोक सभा में अपना सूपड़ा साफ़ होते साफ़ नज़र आ रहा ही . अगर आज चुनाव हो जाएँ तो कांग्रेस को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ ,पश्चिम बंगाल ,राजस्थान ,गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा ,आंध्रप्रदेश ,तमिलनाडु, उडीसा जैसे राज्यों में बहुत कम सीटें मिलने वाली हैं . असम, कर्णाटक और एकाध और छोटे राज्यों के सहारे दिल्ली में केंद्रीय सरकार बना पाना असंभव है. यह बात विधानसभा चुनावों के बाद बिलकुल साफ़ हो गयी है .  २०१३ के विधान सभा चुनावों ने यह भी साफ़ कर दिया कि देश की राजनीति में जीतने के लिए अब चक्रवर्ती सम्राट की तरह आचरण करने  का विकल्प नहीं रह गया है . राहुल गांधी की उस राजनीति को भी नकारा जा चुका है जिसमें वे किसी से मिलते ही नहीं .अगर मिलते है तो टी वी कैमरों के ज़रिये पूरी दुनिया  को दिखाते हैं .अब जनता रियल लोगों से सीधी बातचीत करना चाहती है .इन चुनावों ने यह भी साफ़ कर दिया कि अगर तीसरा विकल्प मिल जाए तो जनता दोनों ही पडी पार्टियों को किनारे कर सकती  है . पिछले चुनावों में सबकी समझ में आ गया कि किस तरह से कांग्रेस का चुनाव अभियान कुप्रबंधन का शिकार था . राजस्थान में जिस दिन सी पी जोशी एक वोट से हारने के बाद राज्य के  मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से बाहर हुए थे ,उसी दिन से उन्होने  मुख्यमंत्री अशोक गहलौत को औकात बताने के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू का दिया था . तुर्रा यह कि दिल्ली में उनके आका , राहुल गांधी को कभी पता नहीं लगा कि जोशी जी राजस्थान में कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं . उनके बारे में राहुल गांधी को आखीर तक यह भरोसा रहा कि जोशी जी सब कुछ संभाल लेगें . इसीलिये विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनको राजस्थान का करता धरता बनाकर फिर भेज दिया . जोशी जी ने भी अशोक गहलौत को कभी माफ़ नहीं किया .पूरे चुनाव अभियान के दौरान उनकी हार की माला जपते रहे और परमात्मा की असीम अनुकम्पा से सी पी जोशी कामयाब हुए . यह अलग बात है कि अशोक गहलौत के साथ ही कांग्रेस हार गयी . अशोक गहलौत को हराने  के काम में स्व सीसराम ओला , गिरिजा व्यास और सचिन पायलट भी लगे हुए थे .सबको सफलता मिली और कांग्रेस वहां तबाह हो गयी. . दिल्ली में शीला दीक्षित ने अच्छा काम किया था लेकिन यहाँ भी अजय माकन और जयप्रकाश अग्रवाल लगातार उनके खिलाफ काम करते रहे . अजय माकन तो राहुल गांधी की कृपा से अपना काम चलाते रहे और आखीर में सफल हुए और दिल्ली में कांग्रेस उसी पोजीशन पर पंहुच गयी जिस पर १९५७ के चुनावों में जनसंघ हुआ करती थी. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत थी लेकिन वहां भी अजीत जोगी को पूरा मौक़ा दिया गया कि वे अपने मित्र और मददगार रमन सिंह की ताजपोशी फिर से करवा सकें . बताते हैं की रमन सिंह की मदद करने के चक्कर में जोगी जी ने कांग्रेस को राज्य में धूल चटाने में भारी योगदान किया . उनके सतनामी सम्प्रदाय के लोगों ने तय कर लिया था कि किसी भी सूरत में रमन सिंह को वोट नहीं देना है . ज़ाहिर है यह सारे वोट कांग्रेस को मिलते . रायपुर में चर्चा है की अजीत जोगी  के दिमाग का ही कमल था कि  सतनामी सेना बन गयी और उसके आध्यात्मिक गुरु ने हेलीकाप्टर पर सवार होकर सतनामी सम्प्रदाय के सारे वोट ले लिए . इस तरह से जो वोट कांग्रेस को मिलने थे वे कांग्रेस के खिलाफ पड़ गए और हर उस सीट पार जहां सतनामियों की मदद से कान्ग्रे सको जीतना था ,वहां बीजेपी जीत गयी. मध्य प्रदेश में भी २००८ में जब तत्कालीन कांग्रेस के आला नेत्ता सुरेश पचौरी ने टिकटों की कथित हेराफेरी करके शिवराज सिंह की जीत के लिए माहौल बनाया था तो उनको दरकिनार कर दिया गया था और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री  दिग्विजय सिंह को आगे किया गया था. हर जिले में उन्होंने कुछ लोगों को तैयार किया था लेकिन चुनाव के ठीक पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे कर दिया गया . नत्तीजा सामने है . ज्योतिरादित्य को शिवराज सिंह के आगे खड़ा कर दिया गया . वह शिवराज सिंह ,जो दिन रात मध्यप्रदेश की राजनीति में डूबे रहते है ,उनके सामने ऐसे सिंधिया जी खड़े थे जिनकी जेब में दिल्ली वापस लौटने का बोर्डिंग कार्ड नज़र आता रहता  था. आम धारणा यह बन गयी की  सिंधिया जी वहां बस तफरीह के लिए आये हैं , असल ठिकाना तो उनका दिल्ली ही है .मध्यप्रदेश में  भी कांग्रेस की दुर्दशा हो गयी .
यह तो विधान सभा चुनाव वाले राज्यों का हाल है .अन्य  महत्वपूर्ण राज्यों में भी कांग्रेस ने जिस तरह से राजनीतिक प्रबंधन किया है वह तर्क पद्धति से समझ में नहीं आता. उत्तर प्रदेश का उदाहरण दिया जा सकता है . सबसे ज़्यादा सांसद लोकसभा में भेजने वाले राज्य में कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन का ज़िम्मा मधुसूदन मिस्त्री नाम के एक व्यक्ति को दे दिया गया है . राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री बना दिए गए थे जिनका अपने जिले में कोई प्रभाव नहीं है राज्य की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है . १९८० से विधान सभा का हर चुनाव जीत रहे राज्य कांग्रेस के बड़े नेता और एक वर्ग के पत्रकारों के चहेते प्रमोद तिवारी को कोई  भूमिका नहीं दी गयी तो उन्होने  मुलायम सिंह यादव की टीम की तरफ क़दम  बढ़ाना शुरू कर दिया . आज वे मुलायम सिंह यादव की कृपा से राज्य सभा के सदस्य हैं .नतीजा यह  है कि आज उत्तर प्रदेश  में जो कांग्रेसी बच गए हैं वे भारी कन्फ्यूज़न के शिकार हैं . सबसे बड़ा कन्फ्यूज़न तो राज्य में कांग्रेस के इंचार्ज महासचिव मधुसूदन मिस्त्री को लेकर ही है . उनके बारे में तरह तरह की बातें सुनने में आती  हैं . बताया जाता है कि वे एन  जी ओ सर्किट से आते हैं ,  राहुल जी की टीम में जो हारवर्ड विश्वाविद्यालय से आये हुए लोग हैं ,उनके ख़ास बन्दे हैं . दूसरी चर्चा यह है कि वे नरेंद्र मोदी के पुराने साथी हैं , उनके साथ गुजरात में काम कर चुके हैं और नरेंद्र मोदी के ख़ास कृपापात्र हैं . एक अफवाह यह भी है की मिस्त्री जी ने ही नरेंद्र मोदी की शुरुआती राजनीति को सम्भाला था और आज मोदी कहाँ से कहाँ पंहुंच गए. उनसे राहुल जी को उम्मीद है की वे उत्तर प्रदेश में भी वही कर दिखायेगें  जो उन्होंने मोदी जी के लिये गुजरात में किया था . इस बात की पूरी संभावना है कि इन बातों में कोई भी बात सच न हो लेकिन अगर उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी सर्किल में इस तरह की बातें चल रही हैं तो यह कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं है .
कांग्रेस की इस दुर्दशा के बीच में अब प्रियंका गांधी को प्रचार की ज़िम्मेदारी देने की योजना बनायी जा रही है .इस बात में दो राय नहीं है कि प्रियंका गांधी जवाहरलाल नेहरू की मौजूदा पीढ़ी की सबसे करिश्माई नेता हैं . उनके भाई राहुल गांधी की  राजनीतिक प्रबंधन की योग्यता का नतीजा दुनिया के सामने है ,उनके चचेरे भाई वरुण गांधी की ख्याति भी एक ऐसे व्यक्ति की बन गयी है जो कई बार ऐसे बयान दे देते हैं  जिसके कारण उनको जेल की हवा खानी पड़ती है . कुछ लोगों के हाथ  काटने की धमकी और साम्प्रदायिक विद्वेष फ़ैलाने के मुक़दमों का तजुर्बा उनको है .  इंदिरा गांधी की तीसरी पीढ़ी के तीनों ही लोगों में प्रियंका गांधी का व्यक्तित्व सबसे ज़्यादा  स्वीकार्य माना जाता है लेकिन जब वे खुले आम चुनाव मैदान में आयेगीं, बीजेपी और आम आदमी पार्टी की जीत के आड़े आ रही  होंगीं तो उनको खासी परेशानियों का सामना करना पडेगा . सामान्य राजनातिक समझ का तकाज़ा है कि आम आदमी पार्टी के कुमार विशवास और ही बीजेपी की मीनाक्षी लेखी  उनके परिवार की सारी कारस्तानियों का वर्णन  करेगें . उनके पति राबर्ट वाड्रा की राजस्थान में खरीदी गयी  ज़मीनों का विषद विवेचन होगा  और बीजेपी की मौजूदा सरकार उस प्रकरण में हो रही जांच को या तो सार्वजनिक रूप से और या अखबारों में लीक करके राजनीति के अखाड़े में डालेगी . ज़ाहिर है कि  यह प्रियंका गांधी के लिए बहुत ही उपयोगी नहीं होगा. इसलिए कामनसेंस का तकाजा  है  की प्रियंका गांधी की पूरे देश में सक्रियता से कांग्रेस को कोई बहुत फायदा नहीं होने वाला है . हाँ यह पक्के तौर  पर कहा जा सकता है कि  अब से मई तक राजनीतिक परिदृश्य बहुत ही दिलचस्प बना रहेगा क्योंकि आम आदमी वाले दिल्ली सरकार के ज़रिये कांग्रेस और बीजेपी के भ्रष्टाचार की कहानियाँ पब्लिक डोमेन में डालते रहेगें, स्नूप्गेट की केंद्र सरकार की जांच की प्रगति से वे बातें पब्लिक डोमेन में लीक होती रहेगीं जिनसे कांग्रेस की सरकार यह साबित कर सके कि नरेंद्र मोदी के ख़ास सिपहसलार ,अमित शाह के साहेब किस तरह के इंसान हैं और किसी लडकी का पीछा किस हद तक करवा सकते हैं .
कुल मिलाकर प्रियंका गांधी के बड़े पैमाने पर राजनीति में सक्रिय होने से राजनीतिक माहौल बिलकुल एक नयी पिच पर पंहुच जाएगा और उम्मीद की जानी चाहिये कि  २०१४ का चुनाव बहुत ही दिलचस्प होगा .

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