Wednesday, November 25, 2009

भागलपुर में दंगा पीड़ितों को मदद----एक ऐतिहासिक क़दम

शेषनारायण सिंह


बीस साल पहले जब भागलपुर में दंगे हुए थे तो पूरे देश में आतंक फ़ैल गया था. मुसलमानों को चुन चुन कर मारा गया था. आर एस एस ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि उनकी मनमानी को कोई नहीं रोक सकता. बाबरी मस्जिद के खिलाफ फासिस्ट ताक़तें लामबंद हो रही थीं.. शिलापूजन का ज़माना था और बोफोर्स के चक्कर में केंद्र सरकार बैकफुट पर थी. इस पृष्ठभूमि में भागलपुर में मुसलमानों का क़त्ले-आम हुआ और १९८९ के चुनाव के बाद बी जे पी की मदद से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन गए. जैसा कि हर बार होता रहा है, दंगे में मारे गए लोगों के परिवार वालों के घाव रिसते रहे, केंद्र सरकार में किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि उनपर मरहम लगा सकता क्योंकि १९८९ में गैर कांग्रेसी सत्ता पर चारों तरफ से नागपुर की नकेल लगी हुई थी. १९८४ में सिखों के सामूहिक संहार के बाद के माहौल में कुछ हलकों से पीड़ित परिवारों के पुनर्वास की बात उठ रही थी लेकिन कोई भी इसे गंभीरता से नहीं ले रहा था. . उसके पहले देश में सैकड़ों दंगे हो चुके थे और कहीं भी किसी आर्थिक सहायता की बात नहीं हुई थी . लोग मान चुके थे कि दंगे के बाद अगर मुसलमान को शान्ति से पड़े रहने की आज़ादी मिल जाए तो वही बहुत है .

आज खबर आई है कि भागलपुर दंगों के पीड़ित परिवारों को कुछ आर्थिक सहायता मिलने वाली है. लगता है कि इस फैसले में बिहार की वर्तमान सरकार का योगदान है और उसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को श्रेय दिया जाना चाहिए... हालांकि किसी भी आर्थिक सहायता से दंगों से हुए जान माल के नुक्सान की भरपाई नहीं हो सकती लेकिन नीतीश कुमार का यह कदम सभ्य समाज में एक उम्मीद ज़रूर जगायेगा. १९८९ का भागलपुर दंगा , फासिस्ट ताक़तों की नयी तकनीक की शुरुआत माना जाता है. राम शिलापूजन के जुलूस पर किसी ने कथित रूप से बम से हमला कर दिया था . हिंदुत्व की नयी तर्ज़ पर राजनीति कर रही बी जे पी के सहयोगी संगठनों को दंगे का बहाना मिल गया और शायद पहली बार इस इलाके में दंगाई गावों में घुस कर लूटपाट करने लगे . दंगा गावों में बड़े पैमाने पर शुरू हो चुका था और संघ भावना से प्रेरित लोग खुशियाँ मना रहे थे . उनका मानना है कि अगर दंगा फैलता है तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता है और उसका फायेदा चुनाव में बी जे पी को ही होता है. १९८९ के चुनाव में भी ऐसा ही हुआ. . वी पी सिंह की सरकार बनने के बाद लाल कृष्ण अडवाणी की रथयात्रा निकली . वी पी सिंह की कोर दबी हुई थी और जहां जहां अडवाणी का रथ गया , वहां वहां दंगे हुए. आज समाज के हर वर्ग में जो साम्प्रदायिकता का आलम है उसका ज़िम्मा अडवाणी की उस रथयात्रा पर काफी हद तक है. बहरहाल दंगे फैले और आर एस एस ने उसका लाभ उठाया . अब हालात बदल रहे हैं . सूचना की क्रान्ति के चलते मीडिया की पंहुच दूर दूर तक हो चुकी है . नेताओं को भी समझ में आने लगा है कि जनमत की दिशा तय करने में मीडिया की भूमिका है . हो सकता है कि भागलपुर दंगों के पीड़ितों को इसी सोच के तहत मदद करने का फैसला किया गया हो. जो भी हो यह क़दम महत्वपूर्ण है और इसके लिए बिहार सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए. हालांकि यह भी सच है कि नीतेश कुमार बिहार की गद्दी पर बी जे पी की कृपा से ही विद्यमान हैं लेकिन ऐसा लगता है कि बी जे पी वाले नीतीश कुमार की समाजवादी सोच को दबा नहीं पा रहे हैं .

अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि बिहार सरकार के इस क़दम से सबक लें और अपने राज्यों के दंगा पीड़ितों को मदद करें. . अगर एक बात शुरू हुई है तो इसका असर दूर दूर तक जाएगा. सभ्य समाज को कोशिश करना चाहिए कि आने वाले वक़्त में दंगा करने वालों की पहचान करके उनके संगठनों को ही पीड़ितों को सहायता देने का अभियान चलायें.. अगर ऐसा हो सका तो साम्प्रदायिक संगठनों के ऊपर सज़ा का दबाव पड़ेगा और भविष्य में दंगा शुरू करने से पहले लुम्पन लोगों को कई बार सोचना पड़ेगा. अगर दगाइयों को सज़ा देने की परंपरा भी शुरू हो गयी, जैसी सिख दंगों में ह़ा है तो राजनेताओं के लिए दंगों को अंजाम देने के लिए गरीब गुंडों को इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल होगा.

1 comment:

  1. भैया शेष नारायण सिंह, इस देश का यही तो दुर्भाग्य है कि देश बहुत से जैचंदो और आस्तीन के सांपो को पाल रहा है, आज तो २६/११ को याद करने का मौका था लेकिन खैर कोई चारा भी नहीं !

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