Saturday, July 26, 2014

यूक्रेन पर कब्जे की लड़ाई अब मानवता की दुश्मन बन चुकी है



शेष नारायण सिंह
 ( इस लेख को लिखने में मेरे सम्पादक ,श्री राजीव रंजन श्रीवास्तव से बड़ी मदद मिली है )

पूर्वी यूक्रेन के आसमान पर मलयेशिया एयरलाइंस जिस विमान को मार गिराया गया उसमें करीब  तीन सौ लोग सवार थे और सब मारे गए. अजीब बात यह है कि एक सवारी विमान को मार  गिराया गया जिसमें ऐसे लोग सवार थे जिनका यूक्रेन और रूस की लड़ाई से कोई लेना देना नहीं है . जिनको पता भी नहीं होगा कि उस  इलाके के लिए अमरीका और रूस के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है . इतनी बात बिलकुल सच है . इस सच्चाई को आधार बनाकर अब रूस और अमरीका के साथी अपनी सुविधानुसार सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश करने में जुट गए है . मलयेशिया एयरलाइंस का सवारी विमान जिस इलाके में मार गिराया वह मौजूदा यूक्रेनी सरकार के मठाधीशों के खिलाफ काम कर रहे  बागी  सैनिकों के कब्जे में है . राजधानी में जो सरकार है उसका प्रधानमंत्री अमरीका की कठपुतली के रूप में काम करता है जबकि उसका विरोध कर रहे तथाकथित बागी रूसी कठपुतलियाँ हैं . दरअसल कोल्ड वार के ख़त्म होने के बाद रूस और अमरीका के बीच आपसी खींचतान का यह सबसे बड़ा उदाहरण है .



विमान के मार गिराए जाने की खबर की पुष्टि भी नहीं हो पाई थी कि यूक्रेनी अफसरों ने रूस पर आरोप लगाना शुरू कर दिया . उन्होंने कहा कि मलयेशिया एयरलाइंस का  बोईंग किसी ऐसे मिसाइल से मारा गया है जो रूस में बना हुआ अहै और बहुत ही आधुनिक टेक्नोलजी से बनाया गया है .इन अफसर ने मीडिया में खाबें देना शुरू कर दिया कि बागियों के हाथ यह मिसाइल पिछले दिनों ही लगा था . रात में एक प्रेस कान्फरेंस में यूकेन के आतंरिक सुरक्षा  विभाग के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि उन्होंने कुछ फोन वार्ताएं इंटरसेप्ट की हैं जिसके  आधार पर वे पक्के तौर पर कह सकते हैं कि हमला बागियों की ही करामात है . ज़ाहिर है कि बागियों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहरा देने के बाद रूस पर  हमले के आरोप बिलकुल फिट बैठ जायेगें . यूक्रेन पर कब्ज़ा करने के प्राक्सी युद्ध में लगे अमरीका और रूस के बीच  यह अब तक का सबसे घिनौना अध्याय है .

 जिसने भी यह कारनामा किया है उसको यूक्रेन के कब्जे की लड़ाई को अंतर राष्ट्रीय बना देने की ज़बरदस्त इच्छा होगी क्योंकि अन्यथा इतने निर्दोष लोगों को बेमौत मार देना कहाँ की  बहादुरी  है . यूक्रेन पर कब्जे की लड़ाई में कभी अमरीका का पलड़ा भारी होता है तो कभी रूस का .  अभी रूस बागियों की तरफ है लेकिन अभी कुछ दिन पहले तक अमरीका बागियों की मदद का रहा था अ. अब अमरीकी बागी सत्ता में हैं जबकि रूस के साथी पुराने राष्ट्रपति की टोली वाले बागी  हो गये हैं . दरअसलनवम्बर 2013 में यूरोपीय संघ और यूक्रेन के बीच दूरगामी राजनीतिक और मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर होने वाले थे। जिसके बाद यूक्रेन भी 28 देशों  के यूरोपीय संघ का सदस्य बन जाता।  इस समझौते के लिए यूरोपीय संघ के कुछ देश खासकर-जर्मनीकई वर्षों से प्रयासरत थे।  परन्तु ऐन वक्त पर राष्ट्रपति यानुकोविच का पलट जाना और इसके बदले रूस से 15 अरब डॉलर की  सहायता प्राप्त करना विपक्ष तथा यूरोपीय संघ के हिमायतियों को नागवार गुजरापरिणामस्वरूप सरकार विरोधी आंदोलन की शुरुआत हुई। कीव  की सड़कों पर प्रदर्शनकारी उतर आए। आंदोलनकारियों ने इस आंदोलन को ''यूरोमैदान "' नाम दिया है। इसी बीच सरकार ने राजधानी में हो रहे प्रदर्शन पर लगाम कसने के लिए सख्त कानून लागू कर दियाजिसके अंतर्गतसरकारी काम-काज में बाधा डालने या सरकारी इमारतों तक जाने का रास्ता रोकने पर जेल की सजा का प्रावधान कर दिया गया। प्रदर्शन के दौरान हेलमेट या मास्क पहनने पर भी रोक लगा दी गई। लेकिन आंदोलनकारियों का सरकार विरोधी प्रदर्शन जारी रहा। 19 व 20 फरवरी 2014 को पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों में झड़प हुई जिसमें 70 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 500 घायल हो गए। इस घटना के बाद 23  फरवरी को यूक्रेन की संसद ने महाभियोग लगाकर राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को सत्ता से बेदखल कर दिया और उन्हें देश छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा। इधर ''यूरोमैदान'' का आंदोलन जारी ही था कि रूस के समर्थकों और सैनिकों ने क्रीमिया की सरकारी इमारतोंसंसदहवाई अड्डे और बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। बहुसंख्यक रूसी भाषी क्रीमिया अब रूस के कब्जे में है। रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के इस कदम से दुनिया भर में चिंता छा गई और कई देशों के राजनयिक हरकत में आ गए। रूस के कदम को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाने लगा। ''यूरोमैदान'' का आंदोलन अब क्रीमिया और रूस के बीच फंसकर रह गया है।  

सन् 1954 से पहले क्रीमिया रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराय का अंग था और उस समय सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव निकिता ख्रुश्चेव थे जो यूक्रेनी थे।  उन्होंने फरवरी 1954में क्रीमिया को यूक्रेनी सोवियत समाजवादी गणराय के अधीन कर दिया। चूँकि रूस और यूक्रेन सोवियत संघ के ही अंग थे इसलिए ख्रुश्चेव के इस निर्णय से किसी को तकलीफ नहीं हुई।  वह दौर सोवियत संघ के मजबूत संगठन और सदस्य गणरायों के विकास का था।  सोवियत संघ के गणराय आर्थिकराजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से सामान अधिकार रखते थे इसलिए भी उस समय क्रीमिया का यूक्रेन के साथ मिल जाने का विरोध औचित्यहीन था। 1991 में सोवियत संघ से अलग होकर जब यूक्रेन स्वतंत्र देश बना तब क्रीमिया ने उसके साथ ही रहने का निर्णय लिया। यूक्रेन भाषाई आधार पर रूस से बिलकुल अलग देश बन गया। यहां 78 प्रतिशत यूक्रेनी भाषा बोलने वाले और 17 प्रतिशत रूसी भाषा बोलने वालों की जनसंख्या है। जबकि क्रीमिया प्रांत में लगभग 59 प्रतिशत रुसी मूल के बहुसंख्यक रुसी भाषी हैं। यूक्रेन का भाग होने के बावजूद क्रीमिया को स्वायत्त गणराय का दर्जा प्राप्त है। भाषायी आधार पर भिन्न होने के कारण यह दक्षिण पूर्वी प्रान्त अपने आप को यूक्रेन से दूर और रूस के करीब मानता आया है। इसका महत्वपूर्ण कारण पिछले 15 वर्षों से यूक्रेन में पैर पसार रहे दक्षिण पंथी और नाज् ाी (निओ-नाज् ाी)  विचार वाले चरम पंथी हैं।  जो चाहते हैं कि यूक्रेन पूर्ण रूप से यूक्रेनी भाषा बोलने वाले लोगों का देश बने और दूसरी भाषा वाले यहाँ से अपने मूल स्थान चले जाएँ। वे अन्य भाषी लोगों को यूक्रेनी नागरिक मानने से इंकार करते हैं। यह विडम्बना ही मानी जायेगी कि पूर्व सोवियत संघ से अलग हुए कई गणरायों में इस समय भाषायी आधार पर देश की रक्षा करने वाले अतिवादी सक्रिय हैं। 
सोवियत संघ के समय सामाजिक और आर्थिक समरूपता के लिए प्रान्तीय आधार पर कल-कारखानों की स्थापना की गई थी।  यूक्रेन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है। यहाँ गेहूं की पैदावार प्रचुर मात्रा में होती है। ब्लैक सी अर्थात काला सागर के तट से लगा होने के कारण यहाँ औद्योगिक विकास भी बहुत हुए। विनिर्माण क्षेत्र में एयरोस्पेसऔद्योगिक उपकरणरेल आदि के आने से यूक्रेन रूस के बाद सोवियत संघ का दूसरा सबसे बड़ा गणराय बन गया था। दरअसल,  सोवियत संघ के बुनियादी ढांचे को तैयार करते वक्त हर गणराय को वहाँ की प्रचुरता के स्वरूप बांटा गया था। संघ के सभी गणराय एक-दूसरे के लिए उपयोगी और एक-दूसरे पर आश्रित होते थे। यूक्रेन में प्राकृतिक गैस की कमी हैजिसे रूस पूरा करता आया है।  इसी प्रकार यूक्रेनी गेहूं रुसियों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रुसी अंतरिक्ष अभियान के विकास में भी यूक्रेन का'एअरोस्पेसमहत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। 
यूक्रेन के स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बाद से काला सागर को लेकर रूस और यूक्रेन के बीच खींच-तान चलती रही। रूस अपने नौसैनिकों के लिए काला सागर में एक स्थायी ठिकाना चाहता था।  अंतत: 1997 में रूस और यूक्रेन के बीच हुई एक संधि में काला सागर के 81 प्रतिशत भाग को रुसी नौसैनिकों के उपयोग के लिए दे दिया गया।  इस संधि से एक तरफ जहाँ रूस अपने मिशन ''काला सागर'' में कामयाब हो गया वहीं यूक्रेन को सब्सिडी के तहत प्राकृतिक गैस तथा अन्य आर्थिक सहायता प्राप्त होने लगीं। आगामी वर्षों में तात्कालीन यूक्रेनी सरकार का रूस के प्रति झुकाव बढ़ता जा रहा था कि सन् 2004 में पश्चिम की नुमाइंदगी करने वाली विपक्ष की नेता यूलिया तिमोशेंको के नेतृत्व में ऑरेंज रेवोल्युशन का आगाज हो गया। नारंगी क्रांति का मुख्य उद्देश्य सत्तारूढ़ सरकार को उखाड़ फेंकनासंवैधानिक सुधार करना और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार का गठन करना था। लगभग दो साल के बाद तिमोशेंको यूक्रेन की प्रधानमंत्री चुनी गईं।  चार वर्षों के शासनकाल में तिमोशेंको का ''पश्चिमी'' एजेंडा चलता रहा। यूक्रेन को रूस से अलग कर यूरोपीय संघ के देशों के साथ आर्थिक-व्यापारिक समझौते की रूपरेखा तैयार की गई। इसी बीच यूक्रेन में भाषायी मतभेद भी उभरकर आने लगे। रूस के साथ सम्बन्धों में फिर से खटास आ गई। सन् 2008  में रूस ने गैस की सप्लाई रोक दी जिस कारण यूक्रेन आर्थिक मंदी में चला गया। देश की हालत खराब हो गई।  तिमोशेंको पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। मुसीबतों से घिरी तिमोशेंको सन् 2010 के चुनाव में हार गईं और विक्टर यानुकोविच राष्ट्रपति चुन लिए गए। नई सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में तिमोशेंको के खिलाफ मुकदमा चला दिया और अंतत: तिमोशेंको को 7साल की कैद की सजा हो गई। परन्तुविपक्ष और दक्षिणवादी चरम पंथियों ने यूक्रेन की सरकार पर यूरोपीय संघ के साथ समझौते का दबाव बनाये रखा।  जिसे नवम्बर 2013 में फलीभूत होना थापरन्तु सोवियत संघ के जमाने से रूस के समर्थक और नजदीकी माने-जाने वाले राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने न सिर्फ यूरोपीय संघ के साथ किसी भी प्रकार के समझौते और गठबंधन से  इंकार कर दिया बल्कि रूस के साथ कारोबारी संधि कीजिसके बाद यूक्रेन में प्रदर्शन शुरू हो गए। 
 उन्हीं प्रदर्शनों के बाद आज की जो सरकार  है उसको मौक़ा मिला और यह पूरी तरह से अमरीका की पिट्ठू सरकार है . रूस को बदनाम करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है लेकिन एक सवारी विमान को मार कर करीन तीन सौर लोगों की जान ले लेना कायरता है और इसके लिए जो भी ज़िम्मेदार हो उसकी निन्दा अकी जानी चाहिए . इस विमान पर नीदरलैंड के  १५४ लोग थे और २७ आस्ट्रेलियाई थे. मलयेशिया के २८ पैसेंजर थे जबकि चालक दल के  सभी १५ सदस्य मलयेशिया के ही थे. सवारियों में कई चोटी के वैज्ञानिक थे जो मेलबोर्न में हो रही २०वें  एड्स सम्मलेन में भाग लेने जा रहे थे .  दुखद  घटना के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने मौजूदा यूक्रेनी सरकार पर परोक्ष रूप से आरोप लगा दिया है . उन्होंने संकेत दिया कि यूक्रेन के पूर्वी इलाके पर क़ब्ज़ा कर चुके जो बागी अपने मुल्क को अमरीकी कठपुतली राष्ट्रपति से मुक्त कराने की लड़ाई लड़ रहे  हैं उनको बदनाम करने के लिए यह कारनामा किया गया है .जबकि पश्चिमी देशों ने रूस पर आरोप लगाया है किवह बागियों को आधुनिक हथिय्यार देकर युद्ध को खूंखार बना रहा है .

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