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शेष नारायण सिंह
अपने देश में रेलों में सुरक्षा की हालत दिन बा दिन बिगडती जा रही है लेकिन रेलवे के अफसरों को कहीं से भी जिमेदार नहीं ठहराया जा सक रहा है . यह रहस्य बना हुआ था लेकिन रेलवे सुरक्षा आयुक्त के कामकाज से सम्बंधित संसद की एक स्थायी समिति की रपोर्ट आने के बाद अब बात समझ में आने लगी है . रेल सुरक्षा के लिए केन्द्र सरकार ने रेलवे एक्ट के तहत रेलवे सुरक्षा आयुक्त के संगठन का गठन किया गया था . एक्ट में इस संगठन का काम बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया था. इस संगठन के जिम्मे रेलवे के हर साजो-सामान का निरीक्षण भी था. एक्ट में यह व्यवस्था थी की अगर कभी कहीं कोई रेल दुर्घटना हो तो रेलवे सुरक्षा आयुक्त को जांच करना था .इसमें कहीं भी किसी आदेश का इंतज़ार करने की व्यवस्था नहीं थी.इस संगठन की आज़ादी को बनाए रखने के लिए रेलवे सुरक्षा आयुक्त को रेल मंत्रालय के कंट्रोल के बाहर रखा गया था. इसे नागरिक उड्डयन मंत्रालय के प्रशासनिक कंट्रोल में रखा गया था. इसके सारे नियम कानून रेलवे एक्ट के प्रावधानों के तहत बनाए गए थे .लेकिन रेल मंत्रालय के अधिकारियों ने १९५३ में एक एक्जीक्यूटिव आर्डर जारी करके यह अधिकार वापस ले लिया. यानी निरीक्षण का जो महत्वपूर्ण काम रेलवे सुरक्षा आयुक्त को करना था वह वापस ले लिया गया . संसद की इस विभाग से सम्बंधित स्थायी समिति ने सवाल किया है कि जो अधिकार किसी भी संगठन को संसद के किसी एक्ट के कारण मिला है उसे किसी एक्जीक्यूटिव आर्डर के ज़रिये कैसे वापस लिया जा सकता है . इसके अलावा हमेशा से ही रेल मंत्रालय का रवैया ऐसा रहा है कि रेलवे सुरक्षा आयुक्त का दफ्तर पूरी तरह से रेल मंत्रालय के अधिकारियों की कृपा पर बना रहे. मसलन संसद ने रेलवे सुरक्षा आयुक्त की आटोनामी को सुनिश्चित करने के लिए इसे रेल मंत्रालय से हटकार सिविल एविएशन मंत्रालय के जिम्मे किया था लेकिन रेलवे बोर्ड के ताक़तवर अधिकारियों ने इस आर्डर जारी कर दिया और नियम बना दिया कि रेलवे सुरक्षा आयुक्त का ज़ोन स्तर पर तैनात बड़ा अफसर वहाँ के जनरल मैनेजर के अधीन काम करेगा. इस आदेश एक बाद सब कुछ ऐसे ही चलता रहा और रेलवे सुरक्षा आयुक्त पूरी तरह से सफ़ेद हाथी के रूप में काम करता रहा. देश भर में रेल में दुर्घटनाएं होती रहीं और रेल मंत्रालय के अफसरों की सुविधा के हिसाब से रिपोर्ट आती रही. जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने रेलवे सुरक्षा का जो भरोसेमंद ताम झाम तैयार किया था , उस रेलवे सुरक्षा आयुक्त के संगठन को कुछ रेलवे अधिकारियों ने दो एक्जीक्यूटिव आर्डर जारी करके छीन लिया . और संसद को बहुत दिन तक इस हेराफेरी का पता भी नहीं चला.
अब बात पब्लिक डोमेन में आ गयी है . यातायात,पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संसद की स्थायी समिति ने सारी गडबडी को पकड़ लिया है और अपनी १८८वीं रिपोर्ट में संसद को सब कुछ बता दिया है .रिपोर्ट में बताया गया है कि रेलवे सुरक्षा आयुक्त में कमांड का दोहरापन है .रेलवे एक्ट में इसे नागरिक उड्डयन मंत्रालय के जिम्मे किया गया है .दुर्घटना के इन्वेस्टीगेशन के नियम तो नागरिक उड्डयन मंत्रालय की तरफ से बनाए जाते हैं जबकि दुर्घटना के इन्क्वायरी से सम्बंधित नियम रेल मंत्रालय से आते हैं . कमेटी को यह बात बहुत अजीब लगी क्योंकि इस तरह से कुछ शब्दों के उलटफेर के बाद जनहित का काम बहुत बुरी तरह से प्रभावित होता है. नतीजा यह होता है कि सुरक्षा के जो कोड बनाए जाते हैं , रेलवे सुरक्षा आयुक्त को उसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती. सरकारी कायदा यह है कि अगर किसी फैसले में दो मंत्रालय शामिल हैं तो जब तक तो दोनों ही मंत्रालय सहमत न हों कोई फैसला न लिया जाए लेकिन रेलवे सुरक्षा आयुक्त के अधिकार के फैसले रेलवे मंत्रालय वाले बड़े मौज से लेते रहते हैं .रेलवे एक्ट में एक टर्म “ सेन्ट्रल गवर्नमेंट “ लिखा हुआ है . इसी टर्म के कवर में रेल मंत्रालय के अफसर मनमानी करते रहते हैं .कमेटी ने सुझाव दिया है कि इस दुविधा को दूर करने के लिए रेलवे एक्ट में ही ज़रूरी सुधार कर दिया जाना चाहिए .
मौजूदा सिस्टम में रेलवे मंत्रालय की मनमानी चलती है क्योंकि रेलवे सुरक्षा आयुक्त को अपना काम करने के लिए रेल मंत्रालय पर निर्भर करना पडता है . उसके पास अपने एक्सपर्ट नहीं होते और रेल मंत्रालय उनको एक्सपर्ट देता नहीं . कमेटी का विचार है कि सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसके बाद रेलवे सुरक्षा आयुक्त को अपनी एक्सपर्ट सीधे भर्ती करने के अधिकार मिल जाएँ . वर्ना आज तो रेलवे सुरक्षा आयुक्त पूरी तरह से रेल मंत्रालय के अधीन ही काम करने के लिए अभिशप्त है . नागरिक उड्डयन मंत्रालय वाले केवल कुर्सी मेज़ आदि के इंतजाम तक ही सीमित हैं . अभी रेलवे सुरक्षा आयुक्त सभी दुर्घटनाओं की जांच नहीं कर पाता क्योंकि क्योंकि रेल मंत्रालय सभी दुर्घटनाओं की नोटिफिकेशन नहीं जारी करता . नतीजा यह होता है कि रेल मंत्रालय वाले खुद ही जांच करके मामले को रफा दफा कर देते हैं. रेलवे सुरक्षा आयुक्त को रेलवे की सुरक्षा के मानकों को बदलने के पहले भरोसे में लेना ज़रूरी है लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है . रेल अफसर जब चाहते हैं रेलवे सुरक्षा आयुक्त को बताए बिना मानकों में परिवर्तन कर देते हैं .
इस सारी दुर्दशा से बचने के लिए कमेटी ने सुझाव दिया है रेलवे सुरक्षा आयुक्त को किसी भी मंत्रालय के अधीन कर दिया जाए उससे कोई फर्क नहीं पडेगा लेकिन ज़रूरी है कि संसद एक अलग एक्ट पास करके रेलवे सुरक्षा आयुक्त के अधिकार ,कर्तव्य और जिम्मेवारियों को विधिवत कानून की सीमा में लाने की व्यवस्था करे . वरना दुर्घटनाएं होती रहेगीं और रेलवे के अधिकारी अपनी मर्जी के हिसाब से रिपोर्ट बनवाते रहेगें.
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