Saturday, November 12, 2011

अब कांग्रेस और बीजेपी ओ बी सी राजनीति के चक्कर में है

शेष नारायण सिंह

कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों की दस्तक के साथ ही राजनीतिक मुद्दों की तलाश में भटक रही पार्टियां खासे हबड़ तबड में हैं . ताज़ा राजनीतिक संकेतों से साफ़ लगने लगा है कि कांग्रेस और बीजेपी वाले इस बार अपने लिए तो कुछ नया नहीं ढूंढ पायेगें लेकिन अपने विरोधियों की राजनीति को कमज़ोर करने की योजना को ज़रूर ताक़त देगें .मंडल कमीशन लागू होने के बाद देश की राजनीति में लगभग सभी समीकरण बदल गए थे. पिछले बीस वर्षों में यह साफ़ हो गया है कि पिछड़े वर्गों में दो तीन जातियों के लोग ही सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ ले रहे हैं . नतीजा यह हुआ है कि अपेक्षाकृत संपन्न पिछड़ी जातियों के लोग बहुत ही ताक़त र हो गए हैं . उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद की राजनीतिक ताक़त के पीछे इन्हीं जातियों के समर्थन को माना जा रहा है .लेकिन अब यह सब गडबडाने वाला है . योजना आयोग ने एक ऐसा प्रस्ताव तैयार किया है कि जिसके बाद पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण से मिलने वाले लाभ के हक़दार वे लोग भी होंगें जो अभी तक टुकटुकी लगाए बैठे हैं .

योजना आयोग की एक कमेटी ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वह ऐसे कानून बनाए या कानून में ऐसा सुधार करे जिसके चलते अन्य पिछड़े वर्गों में शामिल सभी जातियों को सरकारी नौकरियों में फायदा मिल सके.योजना आयोग की सलाह है कि ओ बी सी को पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों में बाँट कर २७ प्रतिशत के कोटे में अति पिछड़ों के लिए अलग से आरक्षण का इंतज़ाम किया जाए. अभी यह केवल सुझाव मात्र है लेकिन यह राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक बड़ा साधन बन सकने की क्षमता रखता है .योजना आयोग की यह धारणा अभी सरकारी नीति तो बनेगी नहीं लेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होने लगेगी .योजना आयोग के सुझाव को अगर केंद्र सरकार सैद्धांतिक रूप से स्वीकार कर लेती है तो अगले कुछ वर्षों में ओ बी सी की राजनीति करने वालों को बैकफुट पर जाना पड़ सकता है . योजना आयोग के पहले ही नैशनल बैकवर्ड कास्ट कमीशन के अध्यक्ष एम एन राव भी इसी तरह की बात कर चुके हैं. कहते हैं कि ओ बी सी के मौजूदा आरक्षण के निजाम से सही मायनों में सामाजिक न्याय नहीं मिल पा रहा है . पिछड़ों की प्रभावशाली जातियां ही सारा फायदा उठा रही हैं . अति पिछड़े अभी भी अति पिछड़े रहने के लिए अभिशप्त हैं .

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को इसका सबसे ज्यादा नुकसान होगा. समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता , मोहन सिंह ने बताया कि यह ओ बी सी जातियों में फूट डालने के उद्देश्य से किया जा रहा है . जब उनको बताया गया कि अभी तो पिछड़ों के सारे आरक्षण पर एक ख़ास जाति के लोग क़ब्ज़ा करते पाए जा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि यह गलत बात है . यह शुद्ध रूप से पिछड़ी जातियों को कमज़ोर करने की साज़िश है . जहां तक अति पिछड़े वर्गों का सवाल है वह समय की गति के साथ ओ बी सी की मुख्य धारा में शामिल हो रहे हैं और कुछ समय बाद वह भी उतने की सक्षम हो जायेगें जितने सक्षम अन्य जातियों के लोग हैं . उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े वर्गों की मुख्य पार्टी को केंद्र सरकार की यह योजना सही नहीं लग रही है . समाजवादी पार्टी की चिंता है कि इस तरह के राजनीतिक प्रस्तावों से पिछड़े वर्गों की एकता खंडित होगी .

केंद्र सरकार, योजना आयोग और नैशनल बैकवर्ड कास्ट कमीशन की बातें तो अभी फाइलों में हैं या नीति के स्तर पर बहस के दायरे में हैं . लेकिन उत्तर प्रदेश में तो पिछड़े वर्गों की राजनीति में एक तूफ़ान आने वाला है . बीजेपी ने २०१२ के विधान सभा चुनावों के दौरान इस मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में डालने का मन बना लिया है . कांग्रेस भी योजना आयोग के सुझाव को अपना बनाकर पेश करने से बाज़ नहीं आयेगी. इस तरह की बात से राजनीतिक समीकरण निश्चित रूप से बदलेगें.. बीजेपी वालों ने पिछड़ी और दलित जातियों को खंडित करने की योजना पर पहले भी काम किया है . राजनाथ सिंह के मुख्य मंत्री बनने के बाद पार्टी ने सरकारी तौर पर अति दलितों और अति पिछड़ों के नाम पर एस सी और ओ बी सी कोटे के अंदर कोटे की व्यवस्था कर दी थी. इस तरह का कानून भी बना दिया था, कुछ भर्तियाँ भी हो गयी थीं लेकिन जब बीजेपी के बाद मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने उस आदेश को रद्द कर दिया था. राजनाथ सिंह की सरकार ने अपनी सरकार के एक मंत्री हुकुम सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाकर दलित और पिछड़ी जातियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आकलन करवाया था. उन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों में अति दलित और अति पिछड़ों को चिन्हित किया था .उस समिति की रिपोर्ट से कुछ दिलचस्प आंकड़े सामने आये. देखा गया कि ७९ पिछड़ी जातियों में कुछ जातियां लगभग सारा लाभ ले रही हैं . ऐसी जातियों में यादव, कुर्मी, जाट आदि शामिल हैं जबकि मल्लाह ,कुम्हार ,कहार , राजभर आदि जातियां नौकरियों में अपना सही हिस्सा नहीं पा रही थीं . राजनाथ सिंह की सरकार ने पिछड़ी जातियों को तीन श्रेणियों में बाँट दिया . पिछड़ी जाति में केवल एक जाति ,यादव रखा और २८ प्रतिशत के कोटे में उनके लिए ५ प्रतिशत का रिज़र्वेशन दे दिया. अति पिछड़ी जातियों में आठ जातियों को रखा और उन्हें ९ प्रतिशत का रिज़र्वेशन दे दिया. बाकी सत्तर जातियों को अत्यधिक पिछड़ी जातियों की श्रेणी में रख दिया और उन्हें १४ प्रतिशत का रिज़र्वेशन दे दिया . अगर यह व्यवस्था लागू हो जाती तो उत्तर प्रदेश में मूल रूप से यादवों के कल्याण में लगी हुई समाजवादी पार्टी को भारी नुकसान होता लेकिन मुलायम सिंह यादव का सौभाग्य ही था कि राजनाथ सिंह के बाद मायवाती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री बनीं और उन्होंने राजनाथ सिंह के मंसूबों पर पानी फेर दिया . अब विधान सभा चुनावों के मद्दे नज़र राजनाथ सिंह ने एक बार इस प्रस्ताव को फिर से ज़िन्दा करने की कोशिश शुरू कर दी है . ज़ाहिर है उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वालों के सामने कुछ मुश्किलें ज़रूर पेश आयेगीं.हालांकि इसका एक नतीजा यह भी हो सकता है कि जो सवर्ण जातियां बीजेपी की तरफ खिंच रही हीब वे इस तरह की चर्चा से नाराज़ भी हो सकती हैं.

उतर प्रदेश में तो इसे नहीं लागू कर सके लेकिन बिहार में बीजेपी के सहयोगी दल के नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों के आरक्षण की राजनीति के सहारे लालू यादव को एक जाति का नेता बनाने में पक्की सफलता हासिल कर ली और राज्य में अपनी राजनीतिक हैसियत को बढ़ा लिया .अब इस खेल में केंद्र सरकार के योजना आयोग के शामिल होने के बाद बहस राष्ट्रीय स्तर पर चलेगी . ज़ाहिर है सामाजिक न्याय का विमर्श आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनने वाला है .

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