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Saturday, August 10, 2013

छत्तीसगढ़ ,मध्यप्रदेश,दिल्ली और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार की संभावना

  
शेष नारायण सिंह

उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले के एक कांग्रेस नेता  का बयान अखबार में पढकर अजीब लगा .लगा कि या तो कांग्रेस की  संस्कृति में कोई भारी बदलाव आया है और या मुकामी कांग्रेसियों को पता लग गया है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं के खिलाफ बोलने से कोई नुक्सान नहीं होने वाला है . नोएडा डेटलाइन की इस खबर में लिखा है कि जिले से पी सी सी सदस्य चौधरी अख्तर खान ने अपनी पार्टी के प्रदेश प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री पर आर  एस एस और विश्व हिंदू परिषद जैसी सोच रखने का आरोप लगाया .उन्होंने कहा कि श्री मिस्त्री  कांग्रेस का प्रभारी बनकर भी नरेन्द्र मोदी के लिए काम कर रहे हैं और उनको प्रधानमंत्री बनवाना चाह रहे हैं .खान का कहना  है कि मधुसूदन मिस्त्री इस बहाने गुजरात में अपनी घर वापसी की जगह तलाश रहे हैं . जो लोग कांग्रेस की कल्चर को समझते हैं उनके लिए यह खबर बहुत ही महत्वपूर्ण  है . मधुसूदन  मिस्त्री राहुल गांधी के बहुत करीबी माने जाते हैं. उनके खिलाफ इस तरह का बयान देने के पहले कांग्रेस के जिला स्तर के नेता ने सौ बार सोचा होगा क्योंकि मधुसूदन मिस्त्री को नाराज़ करने का मतलब कांग्रेस से पत्ता साफ़ होना माना जाता है . उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के कुछ और नेताओं ने भी बताया कि मधुसूदन मिस्त्री नरेंद्र मोदी के पुराने साथी हैं . शंकर सिंह वाघेला जब १९७७ में कपड़वंज लोकसभा सीट से चुनकर आये थे और नार्थ एवेन्यू के १०७ नंबर के फ़्लैट में रहते थे तो नरेंद्र मोदी और मधुसूदन मिस्त्री उनके सबसे करीबी शिष्य माने जाते थे . नरेंद्र मोदी और मधुसूदन मिस्त्री  हमेशा साथ साथ रहते थे और नार्थ एवेन्यू के साथ लगे हुए प्रेसिडेंट एस्टेट के ढाबे में साथ साथ खाना खाते थे . इन खबरों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अब शंकर सिंह वाघेला कांग्रेस के बड़े नेता हैं और नरेंद्र मोदी के खिलाफ काम कर  रहे  हैं  .

लेकिन इन खबरों का महत्व यह है कि आम तौर पर कांग्रेस में बड़े नेता की पसंद के किसी भी कांग्रेसी की तारीफ़ करने की संस्कृति के बावजूद इस तरह की बातें होना कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत  नहीं है . उत्तर प्रदेश जैसी हालत अन्य राज्यों की भी है .जिन चार महत्वपूर्ण राज्यों में इस साल विधान सभा के चुनाव होने हैं उनकी हालत भी कांग्रेस के अदूरदर्शी फैसलों के कारण खराब है . साफ़ नज़र आ  रहा है कि अगर कांग्रेस ने फ़ौरन सुधारात्मक कार्रवाई नहीं किया  तो इन चारों ही राज्यों में कांग्रेस के लिए मुश्किल होगी. यह  बात सभी जानते हैं कि अगर २०१३ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार बड़ी संख्या में हार गए तो नरेंद्र मोदी की लहर बन जायेगी और फिर बीजेपी को रोक पाना कांग्रेस के बस की बात नहीं रह जायेगी .नवंबर २०१३ में विधानसभा चुनाव वाले राज्यों  की राजनीतिक पड़ताल करना दिलचस्प हो सकता  है .
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव बी के हरिप्रसाद हैं . उनको भी राहुल गांधी का नामिनी माना जाता है लेकिन रायपुर में ही एक सार्वजनिक मंच पर  छतीस गढ़ के कांग्रेसी नेता ,अजीत जोगी ने उनको  हडका लिया था और कांग्रेस आलाकमान के नुमाइंदे कुछ नहीं कर पाए थे . दिल्ली में अपने  कमरे में बैठकर अपने प्रिय पत्रकारों के सामने अजीत जोगी को कांग्रेस से निकलवा देने की बातचीत के अलावा उन्होंने कोई एक्शन नहीं सुझाया था . इस बात में दो राय  नहीं है कि अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के सबसे ताक़तवर नेता हैं और उनको नाराज़ करके कांग्रेस को  भारी घाटा होगा .  जब कांग्रेस के छतीसगढ़ अध्यक्ष समेत राज्य के कई बड़े नेता माओवादी हमले में मारे गए थे तो कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर थी लेकिन रायपुर में रहने वाले उन कांग्रेसियों के कारण आज कांग्रेस की स्थिति फिर वही हो गयी है जो पहले थी . अपने छोटे मोटे काम के लिए कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री रमन सिंह के दरबारी बन जाते हैं और टिकट के लिए अजीत जोगी के अलावा छत्तीस गढ़ का कांग्रेसी किसी पर भरोसा नहीं कर रहा है . दिल्ली से भेजे गए बी के हरिप्रसाद और जयराम रमेश  आलाकमान के प्रतिनिधि तो हैं लेकिन उनको भी मालूम है कि अगर अजीत जोगी नाराज़ हो गए तो  बहुत मुश्किल होगी और जिन दस सीटों पर अजीत जोगी कांग्रेस को हरा सकते हैं वे बीजेपी के खाते में चली जायेगीं .
  कांग्रेस की हालत राजस्थान में भी अच्छी नहीं है . वहाँ अशोक गहलौत मुख्यमंत्री हैं . दिल्ली में कांग्रेस के जितने भी बड़े नेता हैं सब उनके खिलाफ  हैं . सी पी जोशी, गिरिजा व्यास , सीसराम ओला और सचिन पाइलट अशोक गहलौत को हटवाना  चाहते हैं  लेकिन अशोक गहलौत को आलाकमान का आशीर्वाद मिला हुआ  है इसलिए वे हटाये नहीं जा रहे हैं. केन्द्र में मौजूद कांग्रेसियों के गुस्से को कम करने के लिए गिरिजा व्यास और सीसराम ओला को केन्द्र में मंत्री बना दिया गया , सी पी जोशी को संगठन में बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी गयी लेकिन इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा है . राजस्थान में अशोक  गहलौत के खिलाफ दिल्ली में मौजूद नेता मीडिया के ज़रिये अभियान चला रहे हैं . उधर कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए व्याकुल वसुंधरा राजे को कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. वे अशोक गहलौत की असफलता गिनाने के लिए निकल पडी हैं . जहां भी जा रही हैं जनता उनका स्वागत कर रही है .अब वसुंधरा राजे को उनकी पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का पूरा समर्थन मिल गया है ,हालांकि इसके पहले भारी नाराजगी थी . राजनाथ सिंह बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मामूली और निजी नाराजगियों को दरकिनार करने की नीति पर  काम कर रहे हैं  .वसुंधरा राजे जाति के गणित में भी वे जाटों और राजपूतों में अपनी नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं .राजनाथ सिंह के कारण पूरे उत्तर भारत में राजपूतों का झुकाव बीजेपी की तरफ है उसका फायदा भी उनको मिल रहा है .जाटों की राजनीति का अजीब हिसाब है .कांग्रेस ने जाटों को साथ लेने के लिए उसी बिरादरी का अध्यक्ष बना दिया है लेकिन उनकी वजह से कांग्रेस की तरफ उनकी जाति का वोट नहीं जा रहा है . बल्कि उससे कांग्रेस को नुक्सान ही हो रहा है . परंपरागत रूप से बीजेपी के मतदाता रहने वाले जाटों को राज्य कांग्रेस के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिए जाने के बाद राज्य के राजपूत नेताओं में भारी नाराज़गी है . मुख्यमंत्री अशोक गहलौत की राजनीति इस तरह से डिजाइन की गयी है जिससे राज्य में कांग्रेस की हार को सुनिश्चित किया जा सके. दिल्ली में ज़्यादातर कांग्रेस नेता यह मानकर चल रहे हैं कि अशोक गहलौत अकेले ही चलना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी के ज़्यादातर केंद्रीय मंत्रियों को नाराज कर रखा है .सी पी जोशी,सचिन पाइलट,भंवर जीतेंद्र सिंह और लाल सिंह कटारिया उनको कोई समर्थन नहीं दे रहे हैं . महिपाल मदेरणाज्योति मिर्धा और शीशराम ओला भी उनसे नाराज़ हैं .लेकिन फिर भी आलाकमान की नज़र में अशोक गहलौत का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं . यह एक सवाल है .इस सवाल का जवाब तलाशने में कांग्रेस अध्यक्ष के रिश्तेदारों के व्यापारिक कारोबार पर ध्यान जाता है और अशोक गहलौत की कुर्सी की स्थिरता की पहेली समझ में आने लगती है . जहां तक रिश्तेदारों की बात है मुख्यमंत्री ने अपने रिश्तेदारों को भी सत्ता से मिलने वाले लाभ को पंहुचाने में संकोच नहीं किया है .जयपुर के स्टेच्यू सर्किल की एक ज़मीन का ज़िक्र बार बार उठ जाता  है जहां बन रहे फ्लैटों की कीमत आठ करोड रूपये से ज्यादा बतायी जा रही है और खबर यह है कि गहलौत जी के बहुत करीबी लोग उसमें लाभार्थी हैं . एक नेता जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि जिस कम्पनी की संस्थागत ज़मीन का लैंडयूज बदल कर इतनी मंहगी प्रापर्टी बना दिया गया है उसमें मुख्यमंत्री गहलौत का बेटा ही डाइरेक्टर है . पत्थर की खदानों का घोटाला भी  राजस्थान के मुख्यमंत्री के नाम पर दर्ज है . उस घोटाले को तो टी वी चैनलों  ने भी उजागर किया था. बताते हैं कि इस घोटाले में २१ खानें एलाट की गयी थीं जिनमें से १८ मुख्यमंत्री जी के क़रीबी लोगो और रिश्तेदारों को दे दी गयी थीं .
 इस साल विधानचुनाव वाले दो अन्य राज्य हैं  मध्य प्रदेश और  दिल्ली . दिल्ली में कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने विकास का काम किया है . लेकिन कांग्रेस आलाकमान के फैसलों की रंगत देखिये कि उनको ही कमज़ोर कर दिया गया . कांग्रेस की संचार टीम के प्रमुख अजय माकन कभी शीला दीक्षित के बहुत करीबी माने जाते थे लेकिन अब वे शीला दीक्षित के भारी  विरोधी हैं . अजय माकन अब शीला दीक्षित की कुर्सी खुद ही संभालना चाहते हैं . उनको नए  संगठनात्मक फेरबदल में  बहुत ही अधिक महत्व दे दिया गया है.  नतीजा  यह हुआ है कि दिल्ली में कांग्रेस के कार्यकर्ता अब निजी लाभ और टिकट आदि के लिए अजय माकन का दरबार करने लगे हैं . यह माना जा रहा है कि शीला दीक्षित का कार्यकाल अपने अंतिम दौर में है . हालांकि यह बात समझ में नहीं आयी कि कांग्रेस आलाकमान ने शीला दीक्षित को कमज़ोर करने की योजना क्यों बनायी जब कि  दिल्ली में पिछले बार की कांग्रेस की जीत के पीछे शीला दीक्षित के पहल से हुए विकास कार्य ही सबसे बड़ा कारण थे . आज दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी की सारी ताकत लगी हुई है, लेकिन कांग्रेस ने अपने उस राज्य को जहां उसे जीत मिल सकती थी, हार की लाइन में लगा दिया है .
  मध्यप्रदेश में कांग्रेस को वैसे भी कोई उम्मीद नहीं है . बीजेपी नेता और मुख्यमंत्री शिवराज चौहान वहाँ अच्छा काम कर  रहे हैं. हर स्तर पर उनकी सरकार की पहल नज़र आती है . अपने सुसराल वालों के कारण और कुछ कुख्यात दलालों से निकटता के कारण उनकी किरकिरी हो चुकी है लेकिन कांग्रेस से उनको कोई चुनौती नहीं मिल रही है . आर एस एस वाले  भी शिवराज सिंह चौहान से नाराज़ बताए जाते हैं क्योंकि उन्होंने पूर्व वित्तमंत्री राघवजी के साथ जिस तरह का व्यवहार किया उसे नागपुर वाले पसंद नहीं कर रहे हैं . शिवराज सिंह चौहान नरेंद्र मोदी को भी इतना महान नहीं मानते जितना आर एस एस वाले मनवाना  चाहते हैं  लेकिन उनकी भाग्य का कमाल देखिये कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेता एकजुट नहीं हैं . कहीं कमल नाथ  हैं तो कहीं  अजय सिंह हैं . ग्वालियर संभाग में सिंधिया परिवार का प्रभाव माना जाता है लेकिन कमल नाथ अपने आपको सबसे बड़ा कांग्रेसी मानते हैं . वे इमरजेंसी में संजय गांधी के बहुत करीब थे. जनता पार्टी की सरकार गिराने में  १९७८-८९ में उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी . राज नारायण को लालच देकर उन्होंने ही चौधरी चरण सिंह को कुछ महीनों  के लिए  प्रधानमंत्री  बनवाकर १९८०  में कांग्रेस की वापसी का रास्ता  साफ़ किया था . उनके ऊपर आर्थिक गडबडियों की तरह तरह की चर्चा रहती है .लेकिन सबको मालूम  है कि आज की सत्ता की राजनीति करने वाली पार्टियों में आर्थिक गडबडी का बुरा नहीं माना जाता . अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं और उन्होंने अपने पिताजी की विरासत को सम्भाला है लेकिन ज्योतिरादिय सिंधिया की महत्वाकांक्षा और  राहुल गांधी से उनकी दोस्ती अजय सिंह को आगे नहीं बढ़ने देगी . राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने २००३ में मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने के बाद दस साल के संन्यास की घोषणा की थी और वह दस साल नवम्बर में विधानसभा चुनाव के बाद पूरा होगा . शायद इसीलिये वे राज्य की राजनीति में सीधा हस्तक्षेप नहीं कर रहे  हैं . मध्य प्रदेश में भी कुल मिलाकर कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है .
ज़ाहिर है अगर कांग्रेस को बीजेपी की बढ़ रही रफ्तार को रोकना है तो इन चार राज्यों में उसे सही फैसले और सही लोगों  को आगे लाना होगा . अगर अपने आपको भाग्यविधाता ही मानते रहे तो और इन चारों राज्यों में हार गए तो कांग्रेस के सामने मजबूरी होगी कि वह लोकसभा २०१४ में बीजेपी से छोटी पार्टी बन जायेगी . यह बात समझ में बिलकुल नहीं आती कि कोई सत्ताधारी पार्टी इस सारी जानकारी से अनजान है लेकिन अगर जानबूझ कर कांग्रेस अपनी हार का ताना बाना बुन रही है तो उसको इलाज़  किसी के पास नहीं है .

Saturday, August 3, 2013

तेलंगाना के फैसले पर बीजेपी वाले कांग्रेस का समर्थन करने के लिए मजबूर है


शेष नारायण सिंह
विन्ध्य के उस पार , अपने पुराने वायदे को कांग्रेस ने पूरा कर दिया है .तेलंगाना का अलग राज्य बनाने के लिए राजनीतिक फैसला लेकर प्रशासनिक काम आगे बढ़ा दिया है.  अब सरकार  और संसद का ज़िम्मा है कि इस राजनीतिक फैसले को अमली जामा पहनाये. आंध्र प्रदेश के कुछ नेताओं और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा इस फैसले  का कोई विरोध नहीं है . विरोध के लिए विरोध करने वाली राजनीतिक जमात , बीजेपी , ने तो  पहले ही अपने आप को तेलंगाना का पक्षधर घोषित कर रखा था . उनको उम्मीद थी कि कांग्रेस इस फैसले को टालती रहेगी और बीजेपी के नेता कांग्रेस को ढुलमुल काम करने वाली पार्टी के रूप में पेश करते रहेगें  लेकिन सब कुछ उलट गया . कांग्रेस ने तेलंगाना के पक्ष में वोट डाल दिया . अब बीजेपी के सामने विरोध का मौक़ा नहीं है . उसे भी कम स कम एक मुद्दे पर कांग्रेस के साथ जाना पड़ रहा है . तेलंगाना के इलाके में खुशी की लहर है .यह उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सपनों की ताबीर है . सीमान्ध्र और रायलसीमा के नेता लोग परेशान हैं . उनकी राजनीतिक ब्लैकमेल की ताक़त कम हो रही है . अलग तेलंगाना राज्य की अवधारणा १९५३ में ही कर ली गयी थी और  भाषा के आधार पर जब राज्यों का गठन हुआ तप १९५६ में ही  तेलंगाना को अलग राज्य बन जाना चाहिए था लेकिन सीमान्ध्र और रायलसीमा में भी वही भाषा बोली जाती थी जो तेलंगाना की है ,इसलिए भाषाई आधार पर राज्य को अलग नहीं किया जा सका .हाँ एक जेंटिलमैन एग्रीमेंट तेलंगाना के लोगो के हाथ आया जो  बार बार तोडा गया .तेलंगाना  के लिए १९६९ और १९७२ में बहुत ही हिंसक आंदोलन भी हुआ.  इस इलाके के लोगों के दिमागों में यह बात घर कर गयी कि उनको बेवकूफ बनाया जाता रहेगा लेकिन राज्य का गठन कभी नहीं होगा.  
कांग्रेस वर्किंग कमेटी के फैसले में ऐसी बातें हैं जिस से तेलंगाना और बाकी आंध्र प्रदेश के लोगों के साथ न्याय होगा . सबसे बड़ी बात तो यह है कि तेलंगाना को भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के अंदर रखने के प्रस्ताव का जवाहरलाल नेहरू ने उस समय भी विरोध किया था जब १९५६ में आंध्र प्रदेश के ताक़तवर राजनेताओं ने हैदराबाद समेत बाकी तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में रखने का  फैसला करवा लिया था . उन्होने कहा था कि यह शादी बेमेल थी और इसमें तलाक की गुंजाइश थी . आज वह तलाक़  हो गया है केवल कागज़ी काम होना बाकी है . जवाहर लाल नेहरू की इच्छा को उनकी पार्टी ने पूरा कर दिया है . इस बात में दो राय नहीं है कि मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी  कांग्रेस की नेहरूवादी परम्परा को आगे बढ़ा रही हैं . निष्पक्ष और पारदर्शी राजनीतिक फैसलों की परम्परा कायम कर रही हैं . अभी दस साल तक बाकी आंध्र प्रदेश की राजधानी भी हैदराबाद में ही रहेगी . प्रस्ताव में लिखा है कि आंध्र प्रदेश को अपनी नई राजधानी बनाने के काम में केन्द्र से सहायता मिलेगी.. कानून व्यवस्था की हालत बिगड न जाए इसकी जिम्मेदारी भी फिलहाल केन्द्र सरकार की होगी . इस फैसले से कांग्रेस ने हैदराबाद की स्थिति के बारे में भी स्थायी हल तलाश लिया है .  हैदराबाद से राजधानी  हटाने के लिए आंध्र प्रदेश को जो रकम मिलेगी ,उससे एक बहुत ही आधुनिक राजधानी का विकास संभव है . पोलावरम सिंचाई परियोजना को केंद्रीय प्रोजेक्ट बनाकर कांग्रेस ने दूरदर्शिता  का परिचय दिया है .अभी प्रस्ताव में दस जिलों वाले तेलंगाना की बात की गयी है . ज़ाहिर है कि कुरनूल और अनंत पुर जिलों के बारे में अभी संसद या सरकारी विचार विमर्श में विधिवत चर्चा की जायेगी .
 तेलंगाना के गठन के कांग्रेस और यू पी ए के राजनीतिक फैसले के बाद टी वी चैनलों ने गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड आदि राज्यों के गठन की मांग को सूचना के विमर्श का मुख्य विषय बना दिया है . इस से बीजेपी के नेता बहुत नाराज़ हैं . उनका आरोप है कि जिन न्यूज़ चैनलों पर लगातार मोदीपुराण चलता रहता है , वहाँ तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों की चर्चा को लाकर न्यूज़ चैनल और कांग्रेस ने बीजेपी का बहुत नुक्सान किया है . टी वी चैनलों की कृपा से चर्चा में बने रहने की बीजेपी की रणनीति को इस नए राजनीतिक विकासक्रम से भारी घाटा हुआ है .इस तरह से साफ़ समझ में आ रहा है कि कांग्रेस ने यह फैसला लेकर बीजेपी को रक्षात्मक खेल के लिए मजबूर कर दिया है . जानकार बताते हैं कि इस फैसले को एक निश्चित दिशा देने के लिए कांग्रेस के आंध्र प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ज़िम्मेदार हैं . आमतौर पर बीजेपी की राजनीति की हवा निकालने के लिए विख्यात दिग्विजय सिंह ने इस बार राजनीतिक शतरंज की बिसात पर ऐसी चल चली है कि बीजेपी को बिना शह का मौक़ा दिए मात की तरफ बढ़ना पड़ सकता है .

Wednesday, July 31, 2013

मुंबई में लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर से कांग्रेस को लाभ लेकिन शरद पवार से नुक्सान की उम्मीद

  

शेष नारायण सिंह

मुंबई, २९ जुलाई . बीजेपी के प्रचार प्रमुख के रूप में नरेंद्र मोदी की तैनाती के बाद बीजेपी के प्रभाव वाले राज्यों में राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं . महाराष्ट्र में भी राजनीति में नए आयाम जुड गए हैं .कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की प्रभुता वाली विधान सभा  और सरकार के बावजूद मुंबई महानगर पालिका में शिव सेना का दबदबा इस बार भी बना रहा था . महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के गठन के बाद से ही राज्य की राजनीति में उसका असर साफ़ नज़र आने लगा था  लेकिन इस बार कई  सीटें जीतकर उसने अपने आपको राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर  दिया है . इस बार बीजेपी की कोशिश है कि  किसी तरह से राज ठाकरे को अपना लिया जाये लेकिन यह राजनीतिक रूप से असंभव माना जा रहा है क्योंकि उद्धव ठाकरे ने नरेंद्र मोदी को साफ़ बता दिया है कि अगर  मोदी राज ठाकरे के साथ जाते हैं तो उनको शिवसेना का साथ छोड़ना पडेगा . ज़ाहिर है यह बीजेपी के लिए बिलकुल घाटे का सौदा होगा क्योंकि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उसको कोई सीट नहीं जिता सकती जबकि  अगर शिवसेना ने बीजेपी से अलग होने का फैसला कर लिया तो बीजेपी को सीटों का भारी घाटा होगा . दुविधा की इस राजनीति के चलते  कांग्रेस की जीत की संभावना बनी हुई  है ,हालांकि कांग्रेस ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिस से राजनीतिक लाभ की उम्मीद कर सके. मौजूदा मुख्यमंत्री की ऐसी ख्याति बन गयी है कि कुछ व्यापारियों को वे सब कुछ मानकर चल रहे हैं और अपनी पार्टी के उन नेताओं को नाराज़ कर रहे हैं जिनके बल पर ज़मीनी लड़ाई को मजबूती मिल सकती थी. मुख्यमंत्री के कार्यालय में शिवसेना और कांग्रेस विरोधी पार्टियों के नेताओं की  खूब चलती है जबकि कांग्रेसियों के काम आम तौर पर टाल दिए जाते है . इससे भी कांग्रेस को रोज ही नुक्सान हो रहा है .
 महाराष्ट्र की राजनीतिक सच्चाई से मुंबई और थाणे की राजनेति थोड़ी अलग होती है . अब तक माना जाता  था कि   मुंबई महानगर में दलित, मुस्लिम , उत्तर भारतीय और झोपडपट्टी में रहने वालों की मदद से कांग्रेस जीत जाती है . इस बार की राजनीति ऐसी है कि  केवल झोपडपट्टी वाले वोटों पर तो कांग्रेस की मजबूती मानी जा रही है ,बाकी सारे समीकरण उलटे पड़ सकते हैं . झोपडपट्टी में कांग्रेस की लोकप्रियता का कारण यह है कि  कांग्रेसी आम तौर पार आला कमान तक शिकायत पंहुचने के डर से हफ्ता वसूली में ढीले रहते हैं जबकि अन्य दादा लोग इस काम को अपना मुख्य धंधा मानते हैं . कांग्रेस को इस बार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से भी घाटा होने की उम्मीद है  क्योंकि  पिछले चुनावों के नतीजों के बाद शरद पवार की पार्टी पूरी तरह से अपने आपको बड़ी पार्टी बनाने  का प्रयास कर रही है . शरद पवार मुंबई की राजनीति की रग रग से वाकिफ हैं और उनके ही प्रयासों से मुम्बई कांग्रेस के उन उत्तर भारतीय नेताओं के खिलाफ तरह तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं जो चुनाव जिताने की ताक़त रखते हैं . मुंबई में प्रभावशाली हो रहे उत्तर भारतीय नेताओं को कमज़ोर करने के लिए मुंबई कांग्रेस के कुछ मुकामी नेता भी शरद पवार की राजनीति को हवा दे रहे हैं . जानकार बताते हैं कि इस रणनीति से कांग्रेस को पक्का नुक्सान होगा.
अब तक मुसलमानों के वोटों पर कांग्रेस का एकाधिकार माना जाता था लेकिन इस बार ऐसा  नहीं है . मुसलमानों की राजनीति करने वाले कांग्रेसी नेताओं ने अपने इलाकों में मेहनत की है जिसके कारण उनको अपनी सीट जीतने की उम्मीद तो है लेकिन वे अन्य उम्मीदवारों के पक्ष में मुसलमानों को नहीं  मोड सकते . इस बीच समाजवादी पार्टी  का प्रभाव मुसलमानों के बीच बढ़ रहा है क्योंकि उनके प्रदेश अध्यक्ष ,अबू आसिम आज़मी अपने को  मुंबई, थाणे और भिवंडी के मुसलमानों के  नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने में सफल माने जा रहे हैं . मुसलमान वोटों के बारे में समाजवादी पार्टी की दावेदारी तो है लेकिन अभी उसे पक्का नहीं माना जा सकता.  नरेंद्र मोदी के प्रादुर्भाव के बाद उत्तर प्रदेश में भी मुसलमान की कोशिश होगी कि वह बीजेपी को हर हाल में सत्ता हासिल करने से रोके . इमकान है कि इसी सोच के तहत मुसलमान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ भी जा सकता है जैसा उसने २००९ के लोकसभा चुनावों में किया था . अगर यू पी में मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिलता है तो मुंबई में भी उसे आराम से कांग्रेस के खाते में माना जा सकता  है .
 कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवारों की जीत में सबसे बड़ा फैक्टर  राज ठाकरे की मजबूती  को ही माना जा रहा है . मुंबई के प्रसिद्ध लोढा बिल्डर्स ने यह बात तो लगभग मुकम्मल कर लिया है कि दक्षिण मुंबई की सीट पर वह कांग्रेसी उम्मीदवार को हरा देगा. शिवसेना से उनकी बात चीत हो गयी है और उनके परिवार का ही कोई  आदमी उम्मीदवार भी  हो सकता  है.  प्रिया दत्त , गुरुदास कामत,  और दादर की सीट पर भी कांग्रेस तभी जीतेगी जब राज ठाकरे की पार्टी का उम्मीदवार ठीक से लड़ेगा. इसलिए इन सभी नेताओं और कांग्रेस को स्व विलास राव देशमुख का आभार जताना चाहिए क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति  का कोई भी जानकार बता देगा कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना राज ठाकरे ने विलासराव देशमुख की प्रेरणा से ही किया था.
मुंबई में काँग्रेस की कमजोरी का एक कारण यह भी है कि यहाँ के सभी नेता अपने बच्चों को राजनीतिक के अखाड़े में उतारना चाहते हैं . पिछली बार मुंबई महानगर निगम के  चुनाव में कांग्रेस के उन्नीस एम एल ए लोगों ने अपने बच्चों को टिकट दिलवा दिया था . उनमें से अट्ठारह हार गए केवल एक उम्मीदवार जीत सका लेकिन उसमें भी कांग्रेस की कोई वाह वाही नहीं है . ठाकुर विलेज के मालिकों के परिवार के जिस सदस्य ने नगर निगम का चुनाव में जीत दर्ज की है उसके पिता भी एम एल ए का चुनाव निजी कारणों से ही जीतते हैं . उन लोगों का वहाँ ख़ासा प्रभाव माना जाता है .
 इस बार के राजनीतिक माहौल में सबसे दिलचस्प मराठी वोटों की दिशा है , मुंबई महानगर में जो सीनियर  और अपेक्षाकृत संपन्न लोग हैं वे तो कांग्रेस की तरफ हैं  लेकिन सम्पन्नता के दूसरे और तीसरे पायदान पर मौजूद लोग बंटे हुए हैं . कुछ शिवसेना की तरफ जा रहे हैं और कुछ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के समर्थक हैं . ऐसी हालत में अगर अगर कांग्रेस के लोग शरद पवार की राजनीतिक गतिविधियों से बच सके तो यहाँ भी उनकी  संख्या बढ़ सकती है. इन चुनावोंमें मोदी के आ जाने एक कारण कांग्रेस को फायदा तो हो सकता है लेकिन शरद पवार कब कहाँ वार कर देगें कोई नहीं जानता .   

Friday, June 28, 2013

धर्मनिरपेक्ष राजनीति , कांग्रेस से मुहब्बत और नीतीश कुमार का नया पैंतरा



शेष नारायण सिंह

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बहुत ही दिलचस्प बयान दिया है . उन्होंने कहा है कि फेडरल फ्रंट को राजनीतिक गठबंधन नहीं बनेगा ,वह तो केवल आर्थिक मुद्दों तक केंद्रित रहेगा यानी अगर ममता बनर्जी, नवीन पटनायक या अन्य कुछ नेताओं के सुझाव पर आधारित किसी फ्रंट का गठन होता है तो वह शुद्ध रूप से राज्यों के हितों को आर्थिक रूप से मज़बूत कारने के  लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा. अपने इस बयान से नीतीश कुमार यह सन्देश देना चाह रहे थे कि वे यू पी ए या कांग्रेस के खिलाफ या उससे हटकर किसी राजनीतिक मुहिम का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं है .सत्रह साल तक बीजेपी के साथ रहने के बाद राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए नीतीश कुमार अपने आपको सेकुलर साबित करने के प्रोजेक्ट में पूरी तरह से जुटे हुए  हैं. यह बिलकुल सच है कि आज की राजनीतिक जमातों को अपने आपको सेकुलर सिद्ध करने के लिए या तो वामपंथी पार्टियों के मित्र के रूप में अपनी छवि को पेश करना पड़ता है या फिर उन्हें यह बताना पड़ता है  कि वे कांग्रेस के विरोधी नहीं हैं . जहां तक वामपंथी पार्टियों की बात है उनको मालूम है कि नीतीश कुमार सेकुलर नहीं हैं . वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टियों के बड़े नेताओं को मालूम है कि नीतीश कुमार के मन में सेकुलर राजनीति के प्रति जो मोह उमड़ा है उसके पीछे नरेंद्र मोदी और बीजेपी के सहयोगी होने का जो तमगा लग गया है उस से जान बचाना है .इसलिए उनको वामपंथी  पार्टियां सेकुलर होने का सर्टिफिकेट देने के लिए राजी होती नहीं नज़र आतीं . देश में जिस दूसरी जमात के साथ खड़े होने के बाद राजनीतिक दल अपने आपको सेकुलर कहने लगते हैं , उसका नाम कांग्रेस है . कांग्रेस ने देश की आज़ादी की लड़ाई की अगुवाई की थी, महात्मा  गांधी के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने जेलों की हवा खाई थी और १९२० से १९४७ तक की मेहनत के बाद आज़ादी हासिल की थी. इस बीच साम्प्रदायिक जमातों के नेता मौज कर रहे थे . मुसलमानों और हिंदुओं में फर्क करने वाली जमातों के सबसे बड़े  नेता , मुहम्मद अली जिन्ना एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए . उसी तरह से आधुनिक भारत की कुछ ऐसी जमातों के नेता भी अंग्रेजों की वफादारी की राजनीति में शामिल थे जिनके अनुयायी आजकल कुछ राज्यों में  सरकारों में हैं या रह चुके हैं. आज़ादी की लड़ाई में अपनी इस  धर्मनिरपेक्ष भूमिका के लिए ही कांग्रेस को हमेशा से ही सेकुलर माना जाता  रहा है . इसलिए अपने आपको सेकुलर साबित करने के लिए नीतीश कुमार अपनी पार्टी को कांग्रेस विरोधी के रूप में नहीं पेश कर सकते. कांग्रेस के खिलाफ जो राजनीतिक गठबंधन स्वरूप ले रहा है ,उससे अपने आपको केवल आर्थिक मुद्दों पर साझी करके नीतीश कुमार एक खास सन्देश देना चाह रहे है . यह अपने देश की राजनीतिक सच्चाई है कि कांग्रेस को आम तौर पर सेकुलर माना जाता है . शायद इसीलिये नीतीश कुमार जैसा राजनीति का जानकार नेता सेकुलर बनने के लिए एक तरफ तो अपने आपको बीजेपी और उसके सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी से दूर करता है और दूसरी तरफ  यह सन्देश भी देता है कि वह कांग्रेस के खिलाफ बन रहे किसी फोरम के में राजनीतिक रूप से शामिल नहीं है वह तो उसकी आर्थिक विकास और हक की लड़ाई का एक तरीका मात्र है .
भारत में राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि राजनीतिक पार्टियां अपने आपको सेकुलर बनाए रखें . मुस्लिम लीग के बाद सबसे ज़्यादा साम्प्रदायिक मानी जाने वाली पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भी जब सरकार बनाने का मौक़ा मिला  तो उन्होंने भी अपनी पार्टी के उन कार्यक्रमों को  सरकार  के कार्यक्रमों से अलग कर दिया जिनके कारण उनकी पहचान एक साम्प्रदायिक  पार्टी की बनी थी. राजनीतिक शक्ति हासिल करने के लिए साम्प्रदायिक एजेंडा को भुला देने की कोशिश कर रही बीजेपी को कभी भी सेकुलर राजनीति के वाहक के रूप में नहीं पहचाना गया . वह पहले भी एक साम्प्रदायिक जमात थी और आज भी साम्प्रदायिक जमात है . दूसरी तरफ कांग्रेस की पहचान हमेशा ही एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी के रूप में होती रही है . हालांकि यह भी सच है कि कांग्रेस में बीच बीच में ऐसे दौर बार बार आये जब वह साम्प्रदायिक राजनीति के पक्षधर के रूप में देखी गयी.आज़ादी के बाद भी एक समय आया था जब कांग्रेस के अंदर मौजूद हिंदू साम्प्रदायिक शक्तियां भारी पड़ने की कोशिश में लगी रहीं लेकिन जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक हैसियत के सामने आजादी के आंदोलन की मूल भावना  और महात्मा गांधी की विरासत को कोई चुनौती नहीं दे सका और कांग्रेस अपने धर्मनिरपेक्ष आधार से अलग नहीं हुई .  यह भी सच है कि जब भी कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने धार्मिकता को बढ़ावा देने  की कोशिश की वे सत्ता से बेदखल ज़रूर हुए . कांग्रेस के इंदिरा युग में जब उनके छोटे पुत्र संजय गांधी ने पार्टी और सरकार के फैसले लेने शुरू किये तो आर एस एस के उस वक़्त के सबसे बड़े नेता ने उनसे संपर्क किया था और उनको यह बताने की कोशिश की थी कि आर एस एस संजय गांधी में विश्वास करता है और उनको राजनीतिक समर्थन दिया जा सकता है .ऐसा करने के लिए उस वक़्त की अपनी पार्टी जनसंघ को भुलाया भी जा सकता है . बाद में पता चला था कि संजय गांधी ने उस प्रस्ताव को बहुत गंभीरता से लिया और उस पर काम करना भी शुरू कर दिया था . संजय गांधी की उसी सोच का नतीजा है कि दिल्ली के तुर्कमान गेट सहित बहुत सारे इलाकों में मुसलमानों पर अत्याचार किये  गए. इमरजेंसी का आतंक झेलने वालों में मुसलमानों की संख्या सबसे ज्यादा थी . हालांकि उस दौर में जो लोग भी  संजय गांधी और  इंदिरा गांधी की  इमरजेंसी के खिलाफ थे सबको  जेलों में ठूंस दिया गया था लेकिन मुसलमानों को तो पूरे उत्तर भारत में बहुत परेशान किया गया . अमेठी के रनके डीह जैसे इलाकों में तो मुसलमानों को टारगेट करके गोलियाँ भी चलाई गयीं और मुसलमानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा .
जब भी कांग्रेस पार्टी ने साम्प्रदायिक राजनीति की है उसे सत्ता से हटना पड़ा है . समकालीन राजनीति और इतिहास का कोई भी जानकार बता देगा कि १९७७ में जब इंदिरा गांधी की सत्ता गयी तो उनके खिलाफ वे सभी जमातें थीं जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ थीं. १९८९ में भी जब काँग्रेस की सत्ता  छिनी तो राजीव गांधी के युग में  साफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर काम चल रहा था.राजीव गांधी के सलाहकार अरुण नेहरू और बूटा सिंह कहीं बाबरी मस्ज्दि का ताला खुलवा  रहे थे तो  दूसरी तरफ राम मंदिर का शिलान्यास करवा रहे थे . १९९१ में गठबंधन के ज़रिये कांग्रेस सत्ता में आ तो गयी लेकिन १९९२ में बाबरी मसजिद के ढहाने में शामिल होकर एक बार फिर अपने आपको कहीं का नहीं छोड़ा , सत्ता तो गयी  ही देश की आबादी के एक बड़े हिस्से का विश्वास  हमेशा के लिए खो दिया . शायद  इसीलिये जब १९९६ में चुनाव हुआ तो मुस्लिम बहुल   इलाकोंमें कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी के रूप में बहुत कमज़ोर  हो गयी. लेकिन यह भी सच है सेकुलर जमातों और सभी धर्मों के अनुयायियों के समर्थन के बिना कांग्रेस को सत्ता कभी नहीं मिली. इमरजेंसी में संजय गांधी और उनके साथियों की कृपा से जो साम्प्रदायिकता का तमगा मिला था उसको इंदिरा गांधी ने १९७८ से धर्मनिरपेक्ष राजनीति की  अलम्बरदार बनकर दूर किया . जब उन्होंने कहा कि  वे धर्म निरपेक्ष राजनीति के बाहर कभी नहीं जायेगीं तो जनता ने उनका विश्वास किया. जब उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बात करना शुरू कर दिया तो जनता पार्टी में मौजूद समाजवादियों ने मधु लिमये के नेतृत्व में जनता पार्टी के जनसंघ  घटक के नेताओं पर दबाव बनाना  शुरू कर दिया और मांग की कि जनता पार्टी के सदस्य किसी अन्य पार्टी के सदस्य नहीं रह सकते . उन्होने साबित कर दिया कि आर एस एस  भी एक राजनीतिक पार्टी है हालांकि वह चुनाव में डायरेक्ट हिस्सा नहीं लेता . इस दबाव का नतीजा था कि जनता पार्टी टूट गयी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति की विचारधारा के बल पर इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आयीं .यह अलग बात है १९८०  के बाद भी इंदिरा  गांधी की कांग्रेस ने अपने इतिहास की सबसे कारगर विचारधारा , धर्मनिरपेक्षता, को  सही अर्थों में पालन नहीं किया . आर एस एस और उसकी मातहत पार्टियों को कमज़ोर करने के उद्देश्य से उन्होने भी हिंदू आधिपत्य की राजनीति शुरू कर दी. इसी राजनीतिक सोच का नतीजा था कि सिखों और तमिलों के प्रति उनकी राजनीति में बहुत भारी खामियां आयीं . हालांकि १९८४ में उनकी हत्या के बाद उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला लेकिन विचारधारा के स्तर पर कांग्रेस ढलान पर ही रही . धर्मनिरपेक्ष राजनीति को तिलांजलि देने के कारण ही कांग्रेस को बाद के चुनावों में वह दर्ज़ा कभी नहीं  मिल सका जो पहले हुआ करता था .१९९७ तक  कांग्रेस एक दिशाहीन राजनीतिक जमात बन चुकी थी . पार्टी के सबसे कमज़ोर नेता , सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था और साफ़ नज़र आ रहा था कि अब कांग्रेस एक ऐतिहासिक धरोहर बन जायेगी . जब  लगभग तय हो चुका था  कि उसके बाद के चुनावों में कांग्रेस हाशिए की पार्टी के रूप में ही  काम करेगी तो  कांग्रेस के बड़े नेताओं को पता नहीं कहाँ से इलहाम हुआ कि पार्टी को बचाने के लिए सोनिया गांधी को पार्टी की कमान देना चाहिए और उन्होने सोनिया गांधी को पार्टी का काम सम्भालने के लिए राजी कर लिया .
सोनिया गांधी को मामूली साबित  करने के प्रयास हर स्तर पर हुए . उनकी पार्टी के लोगों ने उनके विदेशी मूल को मुद्दा बनाकर पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश की . बीजेपी के नेताओं ने यह साबित करने की कोशिश की कि वे उसी स्तर की नेता हैं जैसी उमा भारती या सुषमा स्वराज हैं .लेकिन सारे अभियान खत्म हो गए क्योंकि सोनिया गांधी ने धर्मनिरपेक्ष राजनीति को अपनी सोच का स्थायी भाव बना दिया था . सबको मालूम है कि २००४ का चुनाव साम्प्रदायिक राजनीतिक पार्टियों की राजनीतिक पराजय का वर्ष है जब इस देश की जनता ने उस पार्टी को हरा दिया था जिसने २००२ में नरसंहार करवाया था. उसके बाद  भी कांग्रेस पार्टी में  साम्प्रदायिक शक्तियों ने  बार बार मुंह उठाया है .जब कांग्रेस में मौजूद बाबा रामदेव और अन्ना  हजारे के समर्थकों ने राजनीति को हाइजैक करने की कोशिश की तो सोनिया गांधी ने उसे पसंद नहीं किया . जानकार बताते हैं कि दिग्विजय सिंह और मनीष तिवारी ने  बाबा रामदेव और अन्ना हजारे  की आर एस एस के समर्थन  से की जा  रही राजनीति को जिस तरह से बेनकाब किया उस योजना को कांग्रेस अध्यक्ष की धर्मनिरपेक्ष सोच का समर्थन मिला हुआ था .आज यह साबित हो चुका है कि  बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और उनके  साथी  आर एस एस के लिए काम कर रहे थे . शायद  इसीलिये बीजेपी के नेता आजकल अरविन्द केजरीवाल का विरोध बहुत ज्यादा कर रहे है क्योंकि वे भी अब आर एस एस और बीजेपी के मित्र अन्ना हजारे को गच्चा देकर अपनी नई पार्टी बना चुके हैं . अरविन्द केजरीवाल को भी मालूम है कि अगर इस देश में सत्ता की राजनीति  करनी है तो उनको बीजेपी से दूर रहकर सेकुलर राजनीति करनी पड़ेगी . अरविन्द केजरीवाल भाग्यशाली  हैं क्यंकि वे कभी भी ऐलानियाँ बीजेपी के साथ कभी नहीं थे लेकिन नीतीश कुमार को १७ साल तक साथ रहने के अपराधबोध से मुक्त होने के लिए कांग्रेस के पास जाना पड़ रहा  है .

Wednesday, June 19, 2013

मुख्यमंत्री सिद्दरमैया का इंटरव्यू , "कर्नाटक की जनता ने जाति के मिथक को तोड़ दिया है ".


कर्नाटक के मुख्यमंत्री  , सिद्दरमैया  ने  जाति को प्राथामिकता देने की  मुख्यमंत्रियों की रिवायत  से साफ़ मना दिया है . उन्होंने अपनी जाति  के किसी भी आदमी को अपने निजी स्टाफ में जगह नहीं देने की घोषणा कर दी है . अपने मंत्रियों को भी उन्होंने सलाह दी है की जाती के शिकंजे से बाहर  आने की कोशिश करें  . पुराने  समाजवादी रहे सिद्दरमैया के इस एक फैसले ने उनको अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री , राम कृष्ण हेगड़े की कतार में खडा कर दिया है , उन्होंने एक बातचीत में बताया की भारत सब का है और आज़ादी के लड़ाई का जो इतिहास है उसके इथास के बाहर जाने  का कोई मतलब नहीं है . अगर अपने निजी स्टाफ की  भर्ती में ही नेता जातिवादी हो जायेगा तो वह जातिवाद को ख़त्म  करने के अपने मकसद में कैसे कामयाब होगा.  हालांकि  राजनीतिक प्रबंधन के काम में सिद्दरमैया जातियों के महत्व  को कम  नहीं मानते . उन्होंने  अहिन्दा की  राजनीति को अपनी जीत की धुरी  बनाया है . अ यानी अल्पसंख्यक, हिन्दुलिगा यानी ओबीसी और दा  यानी दलित . इन तीनों वर्गों के नेता के रूप में अगर उनको मान्यता मिल गयी तो कर्णाटक  में जीत के लिए लिंगायत या वोक्कालिगा होने की जो परंपरा है वह ख़त्म हो जायेगी . कर्नाटक विधान सभा के चुनावों में कांग्रेस को मिले स्पष्ट बहुमत  ने दक्षिण भारत से बीजेपी की राजनीति को ख़त्म कर दिया था . कांग्रेस को इस राज्य में मिली जीत  के बाद लोकसभा २०१४ के लिए भी हौसला अफजाई हुयी थी  . उत्तर भारत में रहने वालों के लिए इस नई इबारत को समझना थोडा मुश्किल माना जाता है . इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री , सिद्दरमैया से एक ख़ास बातचीत  की  गयी  . सिद्दरमैया कांग्रेस की राजनीति में थोडा नए हैं . इसलिए उनसे यह समझने की कोशिश भी  की गयी की किस तरह से उन्होंने न केवल बीजेपी की सत्ता को बेदखल किया बल्कि कांग्रेस के अन्दर मौजूद बड़े नताओं की इच्छा के खिलाफ  कांग्रेस आलाकमान की मंजूरी हासिल की और मुख्यमंत्री  बने. पत्रकार शेष नारायण सिंह के साथ हुयी बातचीत के कुछ ख़ास अंश 

सवाल. कर्नाटक में बीजेपी का शासन मजबूती से कायम हुआ था . बी एस येदुरप्पा बहुत ही ज्यादा मजबूती से जमे हुए थे . बीजेपी से हटकर आपके पक्ष में कब महौल बनना शुरू हुआ.  ?

जवाब .जब  जनता दल ( एस ) और बीजेपी की संयुक्त सरकार  बनी थी तो बीस बीस महीने के लिए सत्ता के बंटवारे की बात हुयी थी . एच डी  देवेगौडा ने अपने बेटे कुमारस्वामी को तो मुख्यमंत्री बनवा दिया लेकिन जब बी एस येदुरप्पा का नंबर आया तो तिकड़म करके उनको सत्ता से दूर रखा. उसके बाद जनता की सहानुभूति  येदुरप्पा के साथ हो गयी . जब दोबारा चुनाव हुआ तो बीजेपी को सरकार बनाने का अवसर मिला. लोगों की सहानुभूति येदुरप्पा के साथ थी  . और उसी सहानुभूति के बल पर वे जीत गए लेकिन सत्ता में आते ही येदुरप्पा ने भ्रष्टाचार का राज स्थापित कर दिया और जनता से पूरी तरह से कट गये.  बेल्लारी में रेड्डी भाइयों ने खनिज सम्पदा की लूट मचा दी, येदुरप्पा खुद भी उस से होने वाले लाभ में शामिल थे . यहाँ तक की केंद्र में भी बीजेपी के कुछ नेताओं तक लाभ पंहुच रहा था. कर्नाटक में  भ्रष्टाचार के शासन के खिलाफ माहौल बन रहा था . इसी बीच लोकायुक्त की रिपोर्ट  आ गयी जिसके बाद  सारी दुनिया को मालूम हो गया की येदुरप्पा एक भ्रष्ट मुख्यमंत्री थे  . सुप्रीम कोर्ट ने  भी भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए संविधान में प्रदत्त तरीकों का इस्तेमाल किया . नतीजा यह हुआ कि  बीजेपी और येदुरप्पा भ्रष्टाचार के  पर्यायवाची   बन गए . . चारों तरफ से येदुरप्पा के इस्तीफे की मांग हो रही थी लेकिन दिल्ली में बैठे बीजेपी के वे नेता जिनको खनिज माफिया से लाभ  मिलता था,मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई भी ऐक्शन लेने को तैयार ही नहीं थे.  . उसी के बाद हमने विधान सभा के अन्दर धरना दिया . मीडिया ने इस धरने को रिपोर्ट किया . हम सी बी आई जांच की मांग कर रहे थे .  जनार्दन रेड्डी ने धमकाया कि अगर हिम्मत है तो बेल्लारी  आइये . उसी के बाद मैने  बंगलूरू से बेल्लारी की  पदयात्रा कॆ.  ३२५ किलोमीटर  की  यह दूरी सोलह दिन में तय की गयी और खनन माफिया और  उनके  समर्थक मुख्यमंत्री और  बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के खिलाफ माहौल बनना शुरू हो गया .उसके बाद मैंने राज्य के अन्य इलाकों में भी यात्राएं की .हिंदुत्व की प्रयोग्शाला कहे जाने वाले इलाके तटीय कर्नाटक में भी  यात्रा की और बीजेपी के  भ्रष्ट शासन के खिलाफ माहौल बना तो भ्रष्टाचार की प्रतिनिधि सरकार के जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. 

सवाल- आप पुराने समाजवादी हैं . कांग्रेस की आलाकमान कल्चर में न आप का कैसे एडजस्टमेंट  हो गया . कांग्रेस के स्थापित नेताओं ने आपको कैसे स्वीकार किया ?

जवाब-- हमारी पार्टी की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी हैं . उनकी  इच्छा थी की कर्णाटक  को भ्रष्टाचार से मुक्त किया जाये. इसीलिये उन्होंने मुझे कांग्रेस में शामिल किया था .  जब राहुल गांधी ने जयपुर  चिंतन शिविर में कहा कि ईमानदार पार्टी कार्यकर्ताओं को आगे महत्व दिया जायेगा तो मुझे अंदाज़ लाग गया था कि आने वाले समय में कांग्रेस में  मेरे जैसे मेहनत करने वाले लोगों को महत्व मिलेगा  .

सवाल  . क्या आपको वादा किया गया था कि  अगर कांग्रेस को सत्ता मिलेगी तो आपको मुख्यमंत्री बनाया जायेगा. ?

जवाब . बिलकुल नहीं . लेकिन विपक्ष के नेता के रूप में मुझे कम करने का मौक़ा देकर  कांग्रेस आलाकमान ने मुझे पर्याप्त सम्मान दे दिया था . जहां तक मुख्यमंत्री पद की बात  है मैंने उसके बारे  में सोचकर कोई काम नहीं किया था. हाँ यह पक्का था कि  सोनिया गांधी और राहुल गांधी  ने देश के सामने जिस तरह की कांग्रेस  की राजनीति का वादा किया था  उसमें मेहनत  करने वाले  को अपने आप बढ़त  मिल  जाती है .

सवाल .. कर्नाटक की राजनीति में जातियों की बहुत प्रमुखता रही है . आपने  वोक्कालिगा और लिगायत न होते हुए भी किस तरह से जातियों के जंगल से निकल कर सफलता पायी . ?

जवाब --कर्नाटक  विधानसभा के चुनावों ने इस बार साबित कर दिया है कि जनता जातियों के बंधन से बाहर निकल चुकी है .इस चुनाव में कांग्रेस को सभी जातियों के वोट मिले हैं और सभी जातियों  के नेता कांग्रेस में महत्वपूर्ण पदों पर मौजूद हैं .  इन चुनावों में लिंगायत जाति के  पचास विधायक जीतकर आये हैं जिनमें से २९  कांग्रेस के हैं , बीजेपी में केवल  दस विधायक लिंगायत हैं . बी एस येदुरप्पा की  पार्टी के केवल  ६ विधायक चुने गए हैं . वोक्कालिगा जाति  के ५३  विधायक हैं। जिनमें से बीस कांग्रेस के पास हैं . अपने आपको वोक्कालिगा नेता बताने वाले देवेगौडा की पार्टी में  केवल १८ विधायक वोक्कालिगा है . अनुसूचित जाति के  ३५ विधायकों में से  १७  कांग्रेस में हैं . अनुसूचित जनजाति के १९ विधायकों में से ११ कांग्रेस में हैं  . ओबीसी विधायकों के संख्या  ३६ है जिनमें से २७ कांग्रेस में हैं  , ११ मुसलमान जीतकर आये हैं जिनमें से ९ कांग्रेस में हैं .  ईसाई ,जैन और वैश्य समुदाय के सभी विधायक कांग्रेस के साथ हैं .इस तरह से किसी ख़ास जाति  का नेता  बनने की राजनीति करने वालों को कर्नाटक की जनता ने कोई महत्व नहीं दिया है .  

सवाल.  विधानसभा  में  कांग्रेस को मिली जीत , बीजेपी और येदुरप्पा के खिलाफ नेगेटिव वोट है . ऐसा बहुत सारे लोग कहते रहते हैं . क्या इस जीत  को आप लोकसभा के अगले साल होने वाले चुनावो में भी जारी रख सकेगें .?

जवाब....यह नेगेटिव वोट नहीं है . हम इसको आगे भी जारी रखेगें  और लोकसभा चुनाव २०१४ में कम से कम बीस सीटें जीतेगें .


सवाल. अपनी जीत से आगे  भी राजनीतिक जीत सुनिश्चित करने  के लिए क्या  आप  कुछ ज़रूरी क़दम उठायेगें  ?

जवाब ... हम उठा चुके हैं .  विधान सभा में दिए गए अपने पहले भाषण में ही मैं ऐलान कर दिया कि अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के सारे क़र्ज़ माफ़ कर दिए गए हैं . यह वह क़र्ज़ है जो इन समुदायों  के लिए बनाए गए सरकारी कारपोरेशन की और से इन लोगों पर बकाया था.  मेरे ऊपर आरोप लगा  कि  इस तरह से तो सरकारी खज़ाना ही खाली हो जाएगा  लेकिन मैंने साफ़ कह दिया की कोई भी इंसान शौकिया क़र्ज़ नहीं लेता. मेरे एक साथी ने कह दिया कि जब बड़ी बड़ी कंपनियों को इनकम टैक्स में हज़ारों करोड़ की छूट दी जाती है तो वह भी तो सरकारी खजाने से ही जाती है  लेकिन उसके खिलाफ कोई नहीं लिखता . इसी तरह से जब मैंने  फैसला किया की राज्य के ९८ लाख बी पी एल परिवारों को एक रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से प्रति महीने  के  हिसाब से ३० किलो चावल दिया जाएगा तो बीजेपी ने हल्ला मचाया .  . मीडिया ने भी कहा कि करीब ४ हज़ार करोड़ रूपये सालाना का  जो नुक्सान होगा उसकी  भरपाई कहाँ से होगी . मेरा मानना है कि  कर्णाटक का बजट एक लाख बीस हज़ार करोड़ का है . और अगर उस में से चार हज़ार करोड़ गरीब भी भूख मिटाने  की लिए दे दिया जाएगा तो उसमें कोई परेशानी नहीं होने चाहिए  

Thursday, June 6, 2013

राजस्थान में कांग्रेस की हालत बहुत खराब है


शेष नारायण सिंह

ई दिल्ली,४ जून. लोकसभा चुनाव २०१४ की तैयारियां हर पार्टी शुरू कर  चुकी है . कांग्रेस ने कर्नाटक में बीजेपी को हराकर एक ज़बरदस्त संकेत दिया है . छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं पर हुए माओवादी हमले के बाद दो और राज्यों में भी बीजेपी की हालत डावांडोल हो चुकी है . मुख्यमंत्री रमन सिंह के राज्य में कानून-व्यवस्था की हालत बहुत ही दयनीय मुकाम पर पायी जा रही है जबकि बीजेपी सुशासन और सुराज के नारे के बल पर केन्द्र की सत्ता में वापसी चाहती है . मध्यप्रदेश में भी लाल कृष्ण आडवानी ने मुख्यमंत्री की तारीफ़ के पुल बाँधने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है लेकिन वहाँ बीजेपी के कई बड़े नेता राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पैदल करने में  चक्कर में बीजेपी को ही झटका देने पर आमादा हैं . हाँ राजस्थान में बीजेपी की हालत मज़बूत बतायी जा रही है . मिजोरम और दिल्ली के अलावा इन तीनों राज्यों में भी विधानसभा चुनाव २०१३ में होंगे और २०१४ के पहले जो माहौल बनने वाला है उसमें इनके नतीजों की भारी भूमिका होगी. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों पर बस्तर में हुए कांग्रेसी नेताओं के संहार का असर ज़रूर पडेगा . सुरक्षा की खामी उसमें मुख्य मुद्दा है . यह अलग बात है कि बीजेपी वाले उस नरसंहार की जिम्मेदारी कांग्रेस की आपसी सिरफुटव्वल पर मढने की पूरी कोशिश कर रहे हैं . इसी योजना के तहत कुछ वफादार टीवी चैनलों पर खबर भी चलवा दी गयी लेकिन राजनीतिक हलकों में यह बात हंसी में टाल दी गयी , किसी ने भी इन बातों पर विश्वास नहीं किया . अभी तक स्थिति यह है कि बीजेपी में सुकमा के जंगलों में हुए हत्याकांड में सरकारी असफलता की बात को काटने में नाकामयाब रही  है . हालांकि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह की अपनी पार्टी के अंदर उनको चुनौती देने वाले बीजेपी नेता नहीं है लेकिन उनको कांग्रेस और अपनी नाकामयाबी की ज़बरदस्त चुनौती मिल  रही है .

राजस्थान में भी  सत्ताधारी पार्टी की नाकामयाबियाँ विधानसभा चुनाव का मुद्दा बन चुकी हैं . मुख्यमंत्री अशोक गहलौत की असफलता गिनाने के लिए बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निकल पडी हैं . जहां भी जा रही हैं जनता उनका स्वागत कर रही है .वसुंधरा राजे को उनकी पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह का पूरा समर्थन हासिल है ,हालांकि इसके पहले भारी नाराजगी थी . जाति के गणित में भी वे जाटों और राजपूतों में अपनी नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं .राजनाथ सिंह के कारण पूरे उत्तर भारत में राजपूतों का झुकाव बीजेपी की तरफ है उसका फायदा भी उनको मिल रहा है .जाटों की राजनीति का अजीब हिसाब है .कांग्रेस ने जाटों को साथ लेने के लिए उसी बिरादरी का अध्यक्ष बना दिया है लेकिन उनकी वजह से कांग्रेस की  तरफ उनकी जाति का वोट नहीं जा रहा है . बल्कि उससे कांग्रेस को नुक्सान ही हो रहा है . परंपरागत रूप से बीजेपी के मतदाता रहने वाले जाटों को राज्य कांग्रेस के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिए जाने के बाद राज्य के राजपूत नेताओं में भारी नाराज़गी है . मुख्यमंत्री अशोक गहलौत की राजनीति इस तरह से डिजाइन की गयी है जिससे राज्य में कांग्रेस की हार को सुनिश्चित किया जा सके. दिल्ली में ज़्यादातर कांग्रेस नेता यह मानकर चल रहे हैं कि अशोक गहलौत अकेले ही चलना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी पार्टी के ज़्यादातर केंद्रीय मंत्रियों को नाराज कर रखा है. अशोक गहलौत ने ऐसा माहौल बना रखा  कि केंद्रीय मंत्री सी पी जोशी,सचिन पाइलट,भंवर जीतेंद्र सिंह और लाल सिंह कटारिया उनको पूरा समर्थन नहीं दे रहे हैं . महिपाल मदेरणा, ज्योति मिर्धा और शीशराम ओला भी उनसे नाराज़ बताए जा रहे  हैं .जब पूछा गया कि अगर राज्य के सभी केंद्रीय नेता उनसे नाराज़ हैं तो वे चल क्यों रहे हैं .जवाब मिला कि मुख्यमंत्री ने पता नहीं क्या कर रखा है कि दस जनपथ का उन्हें पूरा समर्थन मिल रहा  है . इस सूचना के मिलते ही कांग्रेस अध्यक्ष के रिश्तेदारों के व्यापारिक कारोबार पर बरबस ही ध्यान चला जाता है और अशोक गहलौत की कुर्सी की स्थिरता की पहेली समझ में आने लगती है . जहां तक रिश्तेदारों की बात है मुख्यमंत्री ने अपने रिश्तेदारों को भी सत्ता से मिलने वाले लाभ को पंहुचाने में संकोच नहीं किया है .जयपुर के स्टेच्यू सर्किल के एक ज़मीन का ज़िक्र बार बार उठ जाता  है जहां बन रहे फ्लैटों की कीमत आठ करोड रूपये से ज्यादा बतायी जा रही है और खबर यह है कि गहलौत जी के बहुत करीबी लोग उसमें लाभार्थी हैं . एक नेता जी ने तो यहाँ तक कह दिया कि जिस कम्पनी की संस्थागत ज़मीन का लैंड यूज बदल कर इतनी मंहगी प्रापर्टी बना दिया गया है उसमें मुख्यमंत्री का बेटा ही डाइरेक्टर है . पत्थर की खदानों का घोटाला भी  राजस्थान के मुख्यमंत्री के नाम पर दर्ज है . उस घोटाले को तो टी वी चैनलों  ने भी उजागर किया था. बताते हैं कि इस घोटाले में २१ खानें एलाट की गयी थीं जिनमें से १८ मुख्यमंत्री जी के क़रीबी लोगो और रिश्तेदारों को दे दी गयी थीं .

राजस्थान में कांग्रेस की मुश्किलें बहुजन समाज पार्टी भी बढाने वाली है क्योंकि राज्य के कुछ क्षेत्रों में उसकी प्रभावशाली उपस्थिति है .पिछले चुनाव में ६ सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी इस बार दस का टारगेट लेकर चल रही  है . बी एस पी को मिलने वाला हर वोट कांग्रेस का संभावित  वोट माना जाता है इसलिए बी एस पी भी कांग्रेस को नुक्सान पंहुचायेगी .इस चुनाव में वसुन्धरा राजे संचार के आधुनिक तरीकों का भी पूरा इस्तेमाल कर रही हैं जबकि मुख्यमंत्री उस मैदान में भी पीछे हैं , किसी शुभचिंतक ने उनका ट्विटर एकाउंट खोल दिया था  . लेकिन उसमें वही दर्ज़न भर ट्वीट हैं जो जिस दिन खाता बनाया गया था उस दिन ट्रायल के तौर पर दर्ज किया गया था जबकि  वसुंधरा राजे के फालोवर बीस हज़ार से ज्यादा हैं , हालांकि चुनावों में इन चोचलों से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपनी यात्रा के दौरान आने वाली भीड़ को देख कर अशोक गहलौत तो निराश हो ही रहे हैं ,उनके साथ जाने वाले केंद्रीय नेता भी बहुत खुश नहीं हैं . उधर वसुंधरा राजे ने ऐसा माहौल बना दिया है कि उनकी सभाओं में जाना और उनको सुनना अब राजस्थानी अवाम के लिए एक ज़रूरी काम माना जाने लगा है .ऐसी स्थिति में लगता  है कि राजस्थान में कांग्रेस को पैदल होना पड़ेगा .यह अलग बात है कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करके कांग्रेस २०१४ के लिए अपने कार्यकर्ताओं के हौसले बढ़ाने  में कामयाब हो जायेगी . कर्नाटक और  हिमाचल प्रदेश में यह कारनामा पहले ही अंजाम दिया जा चुका है .

Sunday, April 7, 2013

मुलायम सिंह यादव के खिलाफ सख्त बयान देकर बेनी बाबू कांग्रेस का वोटबैंक बना रहे हैं



शेष नारायण सिंह

शुरू में कई दिन तक यह बात समझ में नहीं आई कि जब लोकसभा में मुलायम सिंह यादव के पास जाकर सोनिया गांधी ने बेनी प्रसाद वर्मा के बयान से उपजी  खटास को कम करने के लिए बात कर ली थी ,उसके बाद भी बेनी बाबू मुलायम सिंह के खिलाफ क्यों बयान पर बयान दिए जा रहे हैं .लेकिन जब बात को थोडा अंदर से समझने की कोशिश की गयी तो तस्वीर खुलती चली गयी. पता यह लगा कि कांग्रेस पार्टी यह कोशिश कर रही है कि एक ऐसी जाति की तलाश की जाये जिसका वोट उसे समर्पित भाव से मिल जाए . कांग्रेस के जीत के दौर में उसको दलितों और मुसलमानों के वोट पक्के तौर पर मिलते थे . उम्मीदवार की जाति या कोई और समीकरण बनकर कांग्रेस पार्टी की सीटें हमेशा बहुत बड़ी संख्या में होती थीं . लेकिन अब ज़माना बदल गया है . अब उत्तर प्रदेश में दलित मायावती के पक्ष में वोट करने लगे हैं और मुसलमान किसी ऐसे उम्मीदवार को वोट देने लगे हैं जो बीजेपी को बहुमत हासिल करने से रोक सके. विधान सभा में तो यह काम समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी कर लेती है . जहां तक बहुजन समाज पार्टी का सवाल है उसकी नेता कई बार बीजेपी को रोकने के नाम पर सीटें बटोरकर बीजेपी की मदद से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं लेकिन मुलायम सिंह यादव ने कभी बीजेपी के सहयोग से सत्ता नहीं ली . इसलिए मुसलमान उनके साथ वोट करते हैं . यह अलग बात है कि केन्द्र में सरकार बनवाने के लिए मुसलमानों ने बड़ी संख्या में कांग्रेस को उन सीटों पर वोट दिया था जहां कांग्रेस के उम्मीदवार के जीतने की संभावना थी. इसी चक्कर में कांग्रेस को बाकी पार्टियों के बराबर सीटें मिल गयी थीं . कहा यह जाता है कि बेनी प्रसाद वर्मा के सुझाव पर कुर्मी बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस के जीतने की चर्चा शुरू हो गयी थी . उन क्षेत्रों  में मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया और कांग्रेस की सीटें भी सम्मानजनक हो गयीं . यह बात राहुल गांधी की समझ में आ गयी थी और उन्होंने बेनी प्रसाद वर्मा को कुर्मियों के सर्वस्वीकार्य नेता के रूप में स्थापित करने के प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया था . हालांकि विधानसभा चुनाव में बेनी  प्रसाद वर्मा कोई  असर नहीं दिखा सके लेकिन राहुल गांधी ने उनके ऊपर भरोसा किया और कुर्मी वोटबैंक को अपनी पार्टी की बेसिक जाति बनाने की जिम्मेदारी बेनी प्रसाद वर्मा को सौंप दी . मुलायम सिंह के खिलाफ कुर्मियों को लामबंद करने की कोशिश में ही बेनी प्रसाद वर्मा सारा काम कर रहे  हैं . और अगर कुर्मी जाति के नेता के रूप  में बेनी प्रसाद वर्मा को कांग्रेस सम्मान देती है तो कांग्रेस के पास भी एक जाति का पक्का समर्थन हो जाएगा. यहाँ यह भी समझ लेने की ज़रूरत है कि अगर बेनी बाबू की बिरादरी वालों को पता लग गया कि कांग्रेस हर हाल में बेनी प्रसाद वर्मा को समर्थन देगी तो कुर्मियों के नेता के रूप में बेनी बाबू  कांग्रेस को एक जाति का एकमुश्त समर्थन थमा देगें .
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी नतीजे अब सिद्धांतों के आधार पर नहीं तय होते. वहाँ जातियों का योगदान सबसे ज्यादा है . जातियों की भूल भुलैया में फंसी उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल तीन जातियों के वोट पक्के माने जाते हैं . समाजवादी पार्टी के साथ राज्य भर के यादव पूरी तरह से लगे गए हैं . उसके अलावा पिछड़ी जातियों के लोग भी समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ते हैं लेकिन बेनी प्रसाद वर्मा के अलग होने के बाद अब कुर्मी कांग्रेस की तरफ बढ़ रहे हैं .दलित वर्ग की एक जाति के लोग पूरी तरह से मायावती के साथ रहते हैं . मायावती की लोकप्रियता अपनी जाति के मतदाताओं में बहुत ज्यादा है और वे अपने उम्मीदवारों के पक्ष में तो वोट  दिलवा सकती हैं , वे वोट ट्रांसफर भी करवा सकती हैं. यानी अगर मायावती ने अपने समर्थकों को आदेश दे दिया कि उनकी पार्टी के अलावा भी किसी को वोट देना है तो वह संभव हो सकता है .इसके अलावा मुसलमानों का वोट भी  लगभग एकमुश्त पड़ता है.  राज्य में मुस्लिम वोट अब केवल बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के उद्देश्य से पड़ता है . उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए ही चुनाव में २०१२ में मुसलमानों ने मुलायम सिंह यादव को एकमुश्त वोट किया था   लेकिन राज्य में जनाधार पूरी तरह से खो चुकी कांग्रेस को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बराबर  सीटें २००९ में मिल गयी थीं. कांग्रेस की उन सीटों में मुसलमानों के वोट का सबसे  ज्यादा योगदान था क्योंकि उन्हें मालूम था कि केन्द्र की राजनीति में बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने का काम केवल कांग्रेस कर सकती है . लेकिन यह भी दिलचस्प है कि मुसलमानों ने कांग्रेस को उन्हीं सीटों पर वोट दिया जहां उनके उम्मीदवार की जीत  की संभावना बन सकती थी .अपने वोट को खराब नहीं किया . जहां समाजवादी पार्टी मज़बूत थी, वहाँ समाजवादी पार्टी को वोट दिया और जहां बहुजन समाज पार्टी का उम्मीदवार जीतने की स्थिति में था , वहाँ मुसलमान बीजेपी के साथ चला गया . नतीजा यह हुआ कि बीजेपी के अलावा सभी पार्टियां २० के आस पास सीटें पाकर खुश हो गयीं.
जातियों की वफादारी सुनिश्चित करके मुलायम सिंह यादव और मायावती राज्य के हरेक जिले में अपनी पार्टी की मौजूदगी सुनिश्चित करते हैं . अन्य किसी पार्टी के पास कोई भी समर्पित जाति नहीं है .शायद इसीलिये उत्तर प्रदेश की राजनीति में लड़ाई बसपा और सपा के बीच ही नज़र आती है .लेकिन इस बार कुछ बदलाव के संकेत मिल रहे हैं .बीजेपी की तरफ से नरेंद्र मोदी के आ जाने के बाद माहौल बदल रहा है .इस बात में तो राय नहीं है कि समाजवादी पार्टी के शासन के एक साल पूरा होने के बाद लोगों ने समाजवादी पार्टी के साल भर के काम का आकलन किया है . २०१२ में समाजवादी पार्टी की जीत में यादवों और मुसलमानों के अलावा उन लोगों की भी बड़ी संख्या थी जो मायावती के पांच साल के राज से परेशान थे और कोई भी परिवर्तन चाहते थे. लेकिन जिन जिलों में कुर्मी प्रभावशाली भूमिका में थे वहाँ कांग्रेस को जीतेने की उम्मीद थी और मुसलमान उनके साथ जुड गए  और कांग्रेस जीत गयी .इसी काम के लिए बेनी प्रसाद वर्मा को खुली छूट दे दी गयी है कि वे मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जो चाहें बयान दें , कांग्रेस  उनको महत्व देती रहेगी .
बेनी प्रसाद वर्मा इस कला के पुराने ज्ञाता हैं .जब १९८६ में अजित सिंह राजनीति में शामिल हुए तो उन्होंने अपने आपको स्व चौधरी चरण सिंह  का उत्तारधिकारी घोषित कर दिया . लेकिन यह सच्चाई नहीं थी . वास्तव में उत्तर प्रदेश की सभी पिछड़ी जातियां चरण सिंह को अपना नेता मानती थीं. पश्चिम में जाट उनके साथ थे . मध्य और पूर्वी  उत्तर प्रदेश में यादव और कुर्मी प्रभावशाली  जातियां थीं . यह सभी चरण सिंह के साथ थीं. अपने जीवनकाल में चरण सिंह मुलायम सिंह के ऊपर बहुत भरोसा भी करते थे और आमतौर पर माना जाता था कि उनकी विरासत  मुलायम सिंह ही संभालेगें . मुलायम सिंह को चरण सिंह का मानसपुत्र भी कहा जाता था लेकिन अजीत सिंह ने मुलायम सिंह को हाशिए पर डालने की कोशिश शुरू कर दी . बेनी प्रसाद वर्मा के बारे में मशहूर था कि वे मुलायम सिंह यादव को अपना बड़ा भाई मानते थे.  मुलायम सिंह उनसे करीब डेढ़ साल बड़े हैं . दोनों ही समाजवादी थे और राम सेवक यादव के समर्थक रह चुके थे . बताते हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा ने  मुलायम सिंह यादव को समझाया कि चौधरी चरण सिंह पूरे उत्तर प्रदेश के पिछडों के नेता इसलिए बने थे कि इन दोनों ने कुर्मी और यादव जातियों को उनके साथ जोड़ दिया था . अगर कुर्मी और यादव उनसे अलग हो जाएँ तो अजित सिंह केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता बन कर रहे जायेगें . यही हुआ . मुलायम सिंह यादव रथ लेकर निकल पड़े और हर जिले में जाकर प्रचार किया और अजीत सिंह का प्रभाव सिमट गया .  पिछड़े वर्ग की दो ताक़तवर जातियां मुलायम सिंह यादव के साथ जुड गयीं  और वे पिछड़े वर्ग के बड़े नेता हो गए. इस काम में हर क़दम पर उनको बेनी प्रसाद वर्मा का सहयोग मिला.
अब बेनी प्रसाद वर्मा यही काम कर रहे हैं . अगर उन्होने समाजवादी पार्टी से कुर्मियों को दूर कर दिया तो और भी जातियां उनके साथ आ सकती हैं . एक जाति का बुनियादी सहारा लेकर कांग्रेस के पास एक ऐसी पूंजी बन सकती है जिसके बाद वह चुनाव में मुसलमानों को भरोसे के साथ समझा सकती है कि अगर उनका समर्थन मिला तो नतीजे बीजेपी के खिलाफ जायेगें. बेनी प्रसाद वर्मा और राहुल गांधी के इस प्रोजेक्ट में समाजवादी पार्टी के कुछ नेता भी मदद कर रहे हैं . जब शिवपाल यादव बेनी बाबू को नशेड़ी और अफीम का तस्कर कहते  हैं तो कुर्मियों को लगता है कि उनके नेता को अपमानित किया जा रहा है . और वे और  मजबूती से उनके साथ जुड़ते हैं . अगर चुनाव तक कांग्रेस ने बेनी बाबू को वही  इज्ज़त दी जो अब तक दे रही है तो इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस के पास  कम से कम एक जाति की पूंजी होगी और नरेंद्र मोदी को रोकने के प्रयास में मुसलमानो के वोट कांग्रेस की झोली में जा सकते हैं.

Saturday, November 3, 2012

मध्यप्रदेश के किसानों के खिलाफ कांग्रेस और बीजेपी एक साथ , डॉ सुनीलम को साजिशन सज़ा दी गयी




शेष नारायण सिंह 

नयी दिल्ली, 2 नवम्बर . किसान  संघर्ष समिति के अध्यक्ष और मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक डॉ सुनीलम को मुलताई मामले में हुयी सज़ा का चारों तरफ विरोध हो रहा है . मानवाधिकार नेता , चितरंजन सिंह ने बताया की पटना में 11 नवम्बर को जुलूस निकाल कर विरोध किया जाएगा जबकि मुंबई और दिल्ली में नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ता आंदोलित  हैं और अपने तरीकों से विरोध कर रहे हैं . आज  यहाँ सोशलिस्ट फ्रंट के बैनर  तले  एक प्रेस वार्ता का आयोजन करके डॉ सुनीलम और उनके साथ  दो किसानों को हुयी सज़ा को गलत बताया  गया। इस अवसर पर जस्टिस राजिंदर सच्चर, चितरंजन सिंह , पी यूं सी एल के नए महासचिव डॉ वी सुरेश , किसान नेता  विनोद सिंह आदि ने अपनी बात रखी। 

जस्टिस राजिंदर सच्चर ने  कहा की 12 जनवरी 1998  के दिन पुलिस फायरिंग में हुयी 24 किसानों  और एक पुलिस कर्मी की हत्या में डॉ सुनीलम को जो सजा हुयी है ,वह न्याय की कसौटी पर  सही नहीं है .उसमें बहुत  सारी गलतियाँ हैं . उन्होंने कहा  कि एक किसान  ने मरने के  पहले एक बयान दिया था।  मौत के समय दिए गए बयान को न्याय प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है लेकिन अजीब बात है की कोर्ट ने उसके बयान को साक्ष्य नहीं माना . उन्होंने कहा कि मुलताई केस को देखने से लगता है की बीजेपी और कांग्रेस में कोई विवाद नहीं है।खासकर जब गरीब आदमी के अधिकारों को छीन कर पूंजीपतियों को  खुश करना होता है . उन्होने कहा की जब मुलताई में गोली चली थी तो कांग्रेस नेता ,दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उसके बाद बीजेपी के कई नेता मुख्यमंत्री बने लेकिन मध्य प्रदेश सरकार का रुख वही बना रहा .उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया  कि  24 किसानों को उस दिन मार डाला गया था लेकिन किसी भी न्यायिक जांच के आदेश नहीं दिए गए . पुलिस ने मनमानी करके केस  बनाया और साजिशन डॉ सुनीलम और दो किसानों को सज़ा दिलवा दी। . उन्होंने कहा क़ानून का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि इस केस में किसी भी हालत में सज़ा नहीं होनी चाहिए थी लेकिन लगता है कि न्याय प्रक्रिया किसी दबाव के तहत काम कर रही थी।

Friday, August 10, 2012

रामदेव का उपवास उल्लासपूर्ण माहौल में शुरू,कांग्रेस को दिक्क़त नहीं



शेष नारायण सिंह 
नई दिल्ली,९ अगस्त. योग शिक्षक  रामदेव  का तीन दिन का  उपवास आज रामलीला मैदान में पूरे जोश खरोश के साथ शुरू हो गया. तीन दिन के  इस उपवास में उनके करीब २० हज़ार समर्थक सवेरे ही रामलीला मैदान पंहुच चुके थे. खबर है कि उनके बहुत सारे समर्थक भी उनके साथ उपवास कर रहे हैं . राम लीला मैदान में रामदेव के भाषण के  बाद माहौल बहुत ही उल्लासपूर्ण  था क्योंकि  अब समर्थकों को भरोसा हो गया है कि  पिछली बार की तरह इस बार रामलीला मैदान में  पुलिस की लाठियां नहीं चलेगीं.  शुक्रवार को जन्माष्टमी है . उस दिन लोग वैसे भी व्रत रखते हैं और शनिवार को तीन दिन पूरे हो जायेगें. रामदेव ने इस बार  बहुत ही चतुराई  से अपने आपको अन्ना हजारे की टीम से अलग  कर दिया  है.. उन्होंने मंच से ऐलान किया कि उनका आन्दोलन किसी  भी पार्टी के  खिलाफ नहीं है और वे काले धन को वापस लाने के अलावा अब एक मज़बूत लोकपाल के लिए भी संघर्ष  कर रहे हैं .रामदेव ने साफ़ कहा कि वे उसी लोकपाल को पास करवाने  की माग कर रहे हैं जिसे  लोक सभा में  पास किया जा चुका है. उन्होंने कहा  वे सी बी आई के निदेशक , सी ए जी, मुख्य  विजिलेंस  कमिशनर , और  चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को पारदर्शी  बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं . 
रामदेव ने अपने भाषण में साफ़ किया कि वे किसी भी नेता के खिलाफ कुछ नहीं बोलेगें. अन्ना हजारे की टीम वालों की तरह वे किसी भी मंत्री के खिलाफ कुछ नहीं बोलेगें. उन्होंने यह भी कहा कि अगर लोकसभा में पास हुए लोकपाल में कुछ कमियाँ हैं और वह ९८ प्रतिशत सही है तो उसे पास करवा लेना चाहिए , बाकी २ प्रतिशत की जो कमी रह जायेगी उसे बाद  में ठीक करवा लिया जाएगा  लेकिन एक मज़बूत लोकपाल पास होना बहुत ज़रूरी है .बाबा के इस नरम रुख के बाद उनके समर्थको में  बहुत उत्साह है . कांग्रेस पार्टी ने भी  राहत की साँस ली है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी रामदेव के पाँव छुए और रामदेव ने गुजरात जाकर  अपने भाषण में नरेंद्र मोदी  को महान बताया  तो कांग्रेस पार्टी में  दहशत थी लेकिन आज कांग्रेसी बहुत खुश हैं .  कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नता  ने बताया कि रामदेव जिन मुद्दों पर आन्दोलन कर रहे हैं उन पर तो कांग्रेस का भी भरोसा है . ज़ाहिर है कि कांग्रेस में इस आन्दोलन को लेकर अब कोई चिंता नहीं  है .  रामदेव की तरफ पार्टी न बनाने जाने के फैसले से बीजेपी भी खुश है . यह अलग बात है कि कांग्रेस के प्रति नरम हो जाने एक बाद बीजेपी के नेता अभी निजी  बातचीत में रामदेव के प्रति नाराज़गी जाता रहे हैं .

Saturday, January 7, 2012

मुलायम सिंह को मुसलमानों के दिल से निकाल देगी कांग्रेस

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली ,२८ दिसंबर.केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्गों के रिज़र्वेशन के २७ प्रतिशत के कोटे से साढ़े चार प्रतिशत निकाल कर पिछड़े मुसलमानों को रिजर्वेशन देने के अपने फैसले को बिलकुल पुख्ता कर दिया है . उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव घोषित होने के ठीक पहले सरकार की तरफ से आये इस आदेश को अब अमली जामा पहना दिया गया है.अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने आज लोक सभा में विस्तार से बताया कि इस तरह के आरक्षण का औचित्य क्या है .इस व्यवस्था को तुरंत से लागू कर दिया गया है . यह रिज़र्वेशन सरकारी नौकरियों में होगा और शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश लेने वाले पिछड़े मुसलमानों को मिलेगा. लोक सभा में बताया गया कि इस सन्दर्भ मानव संसाधन विकास मंत्रालय और कार्मिक , लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय की ओर से बाकायदा प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है . इस साढ़े चार प्रतिशत के आरक्षण के लिए मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध और पारसी धर्मों की ओबीसी जातियों के लोग योग्य माने गए हैं .
केंद्र सरकार की ओर से आज बताया गया कि मंडल कमीशन की सिफारिशें १९९० में ही लागू कर दी गयी थीं लेकिन उसमें मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों की पिछड़ी जातियों के लोगों को शामिल नहीं किया गया था. मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में सही आकलन करने के लिए डॉ मनमोहन सिंह सरकार ने २००४ में ही रंग नाथ मिश्रा आयोग का गठन कर दिया था .इस कमीशन को धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को चिन्हित करने का काम सौंप दिया गया था इस आयोग ने मई २००७ में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी. इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में दिसंबर २००९ में रख दिया गया था . उन्होंने मुसलमानों के लिए १० प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए ५ प्रतिशत आरक्षण की बात की थी . उन्होंने यह भी कहा था इस सिफारिश को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद १६ ( ४ ) में संशोधन करना पडेगा . मनमोहन सिंह की सरकार ने २००५ में सच्चर कमेटी का गठन किया था जिसका काम मुस्लिम समुदायों की सामाजिक ,आर्थिक,और शैक्षिक स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करना था . सच्चर कमेटी ने पाया था कि मुस्लिम समुदाय देश के सबसे पिछड़े वर्गों में से एक है . .इसलिए इस समुदाय पर ख़ास ध्यान दिया जाना चाहिए . मुसलमानों को रिज़र्वेशन देने के लिए केंद्र सरकार ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार वाले सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि सरकार के पास कोटे के अंदर कोटा करके रिज़र्वेशन देने का अधिकार है .इसलिए यह रिज़र्वेशन कानून की कसौटी पर बिलकुल सही है .उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस आरक्षण से सबसे ज्यादा प्रभावित समाजवादी पार्टी होगी. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि मुसलमानों को उनकी आबादी के आधार पर रिज़र्वेशन देना चाहिए और उनको १८ प्रतिशत रिज़र्वेशन मिलना चाहिए. मुलायम सिंह यादव के इस बयान का राजनीतिक अर्थ है . ज़ाहिर है वे मुसलमानों के प्रिय नेता का अपना मुकाम आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं हैं

Sunday, December 25, 2011

लोकपाल बिल लोकसभा में पेश करके कांग्रेस का जीत का दावा

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली ,२२ दिसंबर . आज लोकसभा में लोकपाल और लोकायुक्त बिल २०११ पेश कर दिया गया. सदन में ४ अगस्त को इसी विषय पर पेश किया गया बिल वापस ले लिया गया है. लोकपाल बिल को संसद में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायणसामी ने पाइलट किया. अध्यक्ष के आसन पर फ्रांसिस्को सरदिन्हा मौजूद थे. बिल को पेश करने में ही जो दिक्क़तें आयीं उनसे साफ लगता है कि लोकपाल बिल पास होने में खासी मुश्किल होगी. बहस की शुरुआत सदन की नेता, सुषमा स्वराज ने किया. उन्होंने कुछ कारणों से बिल को आज पेश किये जाने का विरोध किया . उन्होंने कहा कि यह बिल भारत के संघीय ढांचे पर हमला करता है . सुषमा स्वराज ने कहा कि संविधान में यह व्यवस्था है और सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश हैं कि रिज़र्वेशन किसी भी हालत में ५० प्रतिशत से ज्यादा नहीं किया जा सकता है .लेकिन इस बिल में कहा गया है कि रिज़र्वेशन ५० प्रतिशत से कम नहीं होगा. यानी यह ९ सदस्यों के लोकपाल में कम से कम ५ सदस्यों को रिज़र्वेशन देने की बात कही गयी है . उनको इस बात पर भी एतराज़ था कि इसमें अल्पसंख्यकों को रिज़र्वेशन दिया गया है .उनका कहना था कि जब संविधान में धार्मिक आधार पर रिज़र्वेशन नहीं दिया गया है तो संविधान का विरोध करके क्यों ऐसा कानून बनाया जा रहा है जो सुप्रीम कोर्ट में जाकर फेल हो जाए. बहस के आखिर में सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है . और अगर ऐसा है भी तो उसे जब इस बिल पर २७ दिसम्बर से सिलसिलेवार बहस होगी तब ठीक कर लिया जाये़या.
आज दिन में सदन शुरू में स्थगित करना पड़ा लेकिन जब साढ़े तीन बजे सदन की बैठक दुबारा शुरू हुई तो बिल को पेश करने के स्तर पर ही खासी लम्बी बहस हो गयी. समाजवादी पार्टी के नेता, मुलायम सिंह यादव ने इस बात पर आपत्ति की लोकपाल की संस्था ऐसी बनने जा रही है जो किसी के प्रति ज़िम्मेदार नहीं होगा. उन्होंने कहा कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ हैं वे दूध के धुले नहीं है . इस बात का डर है कि लोकपाल भी भ्रष्टाचार के एक नए केंद्र के रूप में स्थापित हो जाये़या . वह सब को ब्लैकमेल करेगा. इसके बाद राजद के नेता, लालू प्रसाद यादव ने बहुत ज़ोरदार तरीके से अपने बात रखी . उन्होंने इस बात पर सख्त एतराज़ किया किया कि कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयंभू नेता बन गए हैं और संसद सदस्यों को अपमानित कर रहे हैं .उन्होंने कहा कि किसी भी आन्दोलन की धमकी के बाद सरकार को कोई भी कानून नहीं बनाया जाना चाहिए. इसमें जल्दी मचाने के ज़रुरत नहीं है उन्होंने भी इस बात को जोर देकर कहा कि प्रधान मंत्री को इसके दायरे से बाहर रखा जाये .जनता दल यू के शरद यादव , आल इण्डिया अन्ना द्रमुक के थाम्बी दुराई , सी पी एम के बासुदेव आचार्य ने संघीय ढाँचे को तोड़ने के किसी भी कोशिश का विरोध किया . बीजेपी के यशवंत सिन्हा ने भी ज़ोरदार विरोध किया कि सरकार अल्पसंख्यकों को रिज़र्वेशन देने की कोशिश कर रही हैं .
शिवसेना ने लोकपाल का ज़बरस्त विरोध किया और अन्ना हजारे और उनकी टीम को गैरज़िम्मेदार बताया. पार्टी के सदस्य ने कहा कि उनकी पार्टी के नेता, बाल ठाकरे को इस बात की आशंका है कि इस लोकपाल को इतना ताक़तवर बना कर कहीं देश तानाशाही की तरफ तो नहीं बढ़ रहा है .सी पी आई के गुरुदास दासगुप्ता ने कहा कि कुछ लोगों को इस बात का हक नहीं है कि वे संसद को धमकाएं लेकिन उनकी इस बात पर सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने उन्हें याद दिलाया कि वे अपने पार्टी के नेता को समझाएं कि वे जन्तर मंतर के धरनामंच पर न जाएँ. कानून बनाने का काम संसद को ही करने दें . बहरहाल बिल लोकसभा में पेश हो गया और कांग्रेस इस बात पर बहुत खुश है कि उसने २७ अगस्त को सदन में पास हुए प्रस्ताव की रोशनी में वह बिल पेश कर दिया जिसका उन्होंने वायदा किया था.
बिल को पास करने या न करने के लिए लोकसभा की बैठक २७ से २९ दिसंबर तक होगी . अभी बिल के पास होने के बारे में कोई बात नहीं कही जा सकती है क्योंकि जो पार्टियां पहले अन्ना हजारे के साथ थीं वे भी आज पेश किये गए बिल को कमज़ोर बताकर उस से बच निकलने के चक्कर में हैं .

Tuesday, November 15, 2011

क्या नेहरू के नाम पर यू पी में कांग्रेस की डूबती नैया पार होगी

शेष नारायण सिंह

कांग्रेस के सरताज राहुल गांधी जवाहरलाल नेहरू के चुनाव क्षेत्र ,फूलपुर से उत्तरप्रदेश विधान सभा के २०१२ के चुनाव अभियान की शुरुआत कर चुके हैं . अपने पिताजी के नाना से अपने नाम को जोड़ने के चक्कर में राहुल गांधी, जवाहरलाल नेहरू की विरासत को केवल अपने परिवार तक सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं . यह सच नहीं है. जवाहरलाल नेहरू को इंदिरा गाँधी के पिता के रूप में ही प्रस्तुत करना देश की आज़ादी की लड़ाई के संघर्ष के साथ मजाक है . यह भी वैसी ही कोशिश है जिसके तहत एक राजनीतिक पार्टी के लोग हर गलती के लिए जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराते पाए जाए हैं . आजकल तो इस प्रजाति के लोग अखबारों में भी खासी संख्या में पंहुच गए हैं और वे कहते रहते हैं कि कश्मीर समस्या सहित देश की सभी बड़ी समस्याएं नेहरू की देन हैं . समकालीन इतिहास की इससे बड़ी अज्ञानतापूर्ण समझ हो ही नहीं सकती. सच्ची बात यह है कि अगर महात्मा गाँधी ,जवाहरलाल नेहरू , सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला ने राजनीतिक बुलंदी न दिखाई होती तो राजा हरि सिंह और मुहम्मद अली जिन्ना ने तो जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिला ही दिया था. लेकिन सरदार पटेल और शेख अब्दुल्ला की संयुक्त कोशिश का नतीजा था कि कश्मीर आज भारत का हिस्सा है .समकालीन इतिहास के इस सच को जनता तक पंहुचाने का काम किसी राजनीतिक विश्लेशक का नहीं है . यह काम तो कांग्रेस पार्टी का है लेकिन उसने सच्चाई को पब्लिक डोमेन में लाने का काम कभी नहीं किया . नतीजा यह है कि आज की पीढी के एक बहुत बड़े वर्ग को अब भी यही बताया जा रहा है कि जवाहरलाल नेहरू ने देश को कमज़ोर किया . शायद इसका करण यह है कि कांग्रेस पार्टी वाले नेहरू के वंशजों की जय जय कार में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें नेहरू की विरासत को याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा है .आज कांग्रेसी नेता यह कोशिश करते देखे जा रहे हैं कि राहुल गांधी भी उतने ही दूरदर्शी नेता हैं ,जितने कि जवाहरलाल नेहरू थे.. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि जवाहरलाल नेहरू का वंशज होकर कोई उन जैसा नहीं बन जाता . कल्पना कीजिये कि अगर जवाहरलाल नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री की प्रधानमंत्री के रूप में असमय मृत्यु न हो गयी होती और उस दौर के कांग्रेसी चापलूस, जिसमें कामराज सर्वोपरि थे, ने इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री न बनवा दिया होता तो आज राहुल गांधी और वरुण गांधी जैसे अजूबे कहाँ होते. वास्तव में राहुल गांधी और वरुण गांधी टाइप नेताओं को अपने आप को जवाहरलाल नेहरू का वारिस कहना ही नहीं चाहिए . में यह सब तो इंदिरा गाँधी के वारिस हैं . वही इंदिरा गाँधी जिन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए लोकतंत्र का सर्वनाश करने की गरज से इमरजेंसी लगाई थी, विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया था, प्रेस का गला घोंट दिया था और इस देश के लगभग सभी नेताओं को यह प्रोत्साहन दिया था कि वे अपने वंशजों को राजनीति में बढ़ावा दें और जनता के धन की लूट के अभियान में शामिल हों. आज हर पार्टी का नेता अपने बच्चों को राजनीति में शामिल करवा रहा है और उनको भी वैसी ही चोरी करने की प्रेरणा दे रहा है जिसके चलते वह खुद करोडपति या अरबपति बन गया है.
बहरहाल अब कोई जवाहरलाल नेहरू का अभिनय करना चाहे तो उसे कोई रोक नहीं सकता है इसलिए आज फूलपुर में राहुल गांधी का भाषण उसी तर्ज़ पर हो गया जैसा फिल्म्स डिवीज़न के आर्काइव्ज़ में जवाहरलाल नेहरू का भाषण देखा जाता है . लेकिन यह समझ लेना ज़रूरी है कि फूलपुर में जवाहरलाल नेहरू इसलिए जीत जाते थे कि उनको कहीं से भी मज़बूत विरोध नहीं मिल रहा था. एक बार तो उनके खिलाफ स्वामी करपात्री जी लड़े थे और एकाध बार स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने उन्हें चुनौती दी थी. जवाहरलाल नेहरू देश को प्रगति के रास्ते पर ले जा रहे थे तो सभी चाहते थे कि उन्हें कोई चुनावी चुनौती न मिले . लेकिन जब उन्हें चुनौती मिली तो जीत बहुत आसान नहीं रह गयी थी. १९६२ के चुनाव में फूलपुर में जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टी से डॉ. राम मनोहर लोहिया उम्मीदवार थे . डॉ लोहिया भी आज़ादी के लड़ाई के महान नेता थे. कांग्रेस से अलग होने के पहले वे नेहरू के समाजवादी विचारों के बड़े समर्थक रह चुके थे. बाद में भी एक डेमोक्रेट के रूप में वे नेहरू जी की बहुत इज्ज़त करते थे . लेकिन जब आज़ादी के एक दशक बाद यह साफ़ हो गया कि जवाहरलाल नेहरू भी समाजवादी कवर के अंदर देश में पूंजीवादी निजाम कायम कर रहे हैं तो डॉ लोहिया ने जवाहरलाल को आगाह किया था . तब तक जवाहरलाल पूरी तरह से नौकरशाही और पुरातनपंथी लोगों से घिर चुके थे. नतीजा यह हुआ कि डॉ राम मनोहर लोहिया ने फूलपुर चुनाव में पर्चा दाखिल कर दिया . ऐसा लगता है कि डॉ लोहिया भी जवाहरलाल नेहरू को हराना नहीं चाहते थे क्योंकि उन्होंने फूलपुर चुनाव क्षेत्र में केवल दो सभाएं कीं . स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र ने बताया था कि जहां भी डॉ लोहिया गए और उन्होंने नेहरू की अगुवाई वाली सरकार की कमियाँ गिनाई तो जनता की समझ में बात आ गयी. जनेश्वर मिश्रा का कहना था कि जिन इलाकों में लोहिया ने सभाएं की थीं वहां नेहरू को बहुत कम वोट मिले थे. मसलन कोटवा नाम के पोलिंग स्टेशन पर डॉ लोहिया को ७५० वोट मिले थे तो जवाहरलाल नेहरू के नाम पर केवल २ वोट पड़े थे. इसी तरह से हरिसेन गंज में लोहिया को ३७५ वोट मिले तो जवाहरलाल को ३ वोट मिले.राहुल गांधी और उनकी मंडली के लोगों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि जवाहर लाल नेहरू की तरह चुनाव लड़ने का अभिनय करके बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है . उत्तर प्रदेश या देश के किसी भी हिस्से में जवाहरलाल नेहरू की तरह सफल होने के लिए राजनीतिक छुटपन से बाहर निकलना होगा और देश की समस्यायों को सही सन्दर्भ में समझना होगा . अगर ऐसा न हुआ तो जवाहरलाल नेहरू की बेटी का पौत्र बनकर राजनीतिक सफलता हासिल कर पाना आसान नहीं होगा .

Thursday, September 29, 2011

कांग्रेस ने बीजेपी की खिल्ली उडाई

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली,२८ सितम्बर .बीजेपी ने आज दोपहर कांग्रेस और प्रधानमंत्री पर राजनीतिक हमला किया था. शाम को कांग्रेस ने उसका तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे दिया. आज यहाँ कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी के प्रवक्ता, अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बीजेपी के नेता यह स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि इनके इंडिया शाइनिंग नारे के बावजूद २००४ में उनके हाथ से सत्ता खिसक गयी थी. उसके बाद से हे वे समय समय पर कांग्रेस के सरकार के पतन के बारे में भविष्यवाणी करते रहते हैं . कांग्रेस ने आज २ जी मामले में भे बीजेपी के उस आरोप का ज़बरदस्त जवाब दिया जिसमें कहा जाता है कि कैश फार वोट के मामले में अमर सिंह के काम से फायदा यू पी ए की सरकार को हुआ था . इसलिए कांग्रेस के ऊपर भी जांच बैठाई जानी चाहिए . कांग्रेस ने कहा कि यह आरोप बिलकुल गलत है .कांग्रेस ने पलटवार किया और कहा कि सच्चाई यह है कि बीजेपी को मालूम था कि कांग्रेस ने परमाणु नीति के बारे में एक सही स्टैंड लिया है . जिसमें लोक सभा में उसकी जीत निश्चित है .सत्ता की लालच में बैठे हुए बीजेपी के बड़े नेता को इससे बहुत निराशा हुई और पार्टी ने उस जीत को शक़ के घेरे में फंसाने के उद्देश्य से कैश फार वोट का खेल कर दिया . कांग्रेस का दावा है कि कैश फार वोट का फायदा बीजेपी को ही होने वाला था लेकिन पकडे जाने की वजह से उनका खेल बिगड़ गया. २ जी घोटाले के बारे में कांग्रेस ने कहा कि वित्त मंत्रालय के जिस नोट की बात करके बीजेपी पी चिदंबरम को कटघरे में खड़ा करना चाहती है उसमें नया कुछ भी नहीं है . वह केवल जो कुछ हुआ था उसका ब्योरेवार वर्णन है . उसमें एक अफसर ने जजमेंटल होने की कोशिश की है . क्या किसी अफसर के दोषी करार देने से कोई दोषी हो जाएगा.

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बीजेपी की खिल्ली उड़ाने के अंदाज़ में कहा कि बीजेपी के सारे आरोप झूठे हैं .जब उनके बारे में कोई सही बात की जाती है तो वे बौखला जाते हैं और बेबुनियाद और झूठे आरोप लगाने लगते हैं . उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी बीजेपी से सौदा करने को तैयार है . उन्होंने कहा कि सौदा यह है कि अगर बीजेपी कांग्रेस के बारे में झूठ बोलना बंद कर दे तो कांग्रेस बीजेपी ke बारे में सच बोलना बंद कर देगी.जब उनको याद दिलाया गया कि बीजेपी का कहना है कि लाल कृष्ण आडवाणी के पूर्व सहायक ,सुधीन्द्र कुलकर्णी ने तो कैश फार वोट के मामले में कांग्रेस को एक्सपोज करने का काम किया था तो उन्होंने कहा कि यह बातें बीजेपी को शोभा नहीं देतीं. उन्होंने सवाल किया कि १९९८ से २००४ तक जब तक बीजेपी सत्ता में थी उन्होंने न तो कभी काले धन का ज़िक्र किया और न ही कभी किसी अपराध का भंडाफोड़ किया . कैश फार वोट शुद्ध रूप से बीजेपी की राजनीतिक डिजाइन का कार्यक्रम था जब उन्हें बताया गया कि अमर सिंह तो आपके लिए काम कर रहे थे तो सिंघवी ने कहा कि अमर सिंह की पार्टी लोकसभा में यू पी ए के सिद्धांत पर आधारित कार्यक्रम का समर्थन कर रही थी.कैश फार वोट केस में कांग्रेस को शामिल बताकर बीजेपी राष्ट्र को गुमराह करने के कोशिश कर रही है .कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आज जो विज्ञप्ति बीजेपी की तरफ से बांटी गयी है वह डॉ सुब्रमन्यम स्वामी के आरोपों का सारांश मात्र है . अभी उस केस में पर सुनवाई चल रही है . अभी सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई आदेश नहीं दिया है लेकिन तकलीफ की बात है कि बीजेपी ने उसको अपनी तरफ से प्रेस कानफरेंस में बाँट दिया है .और आदेश सुना दिया है कि कांग्रेस दोषी है . यह ठीक नहीं है . कांग्रेस ने इस बात का भी बुरा माना है कि जब प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर हों तो उनपर राजनीतिक हमला न करने की परम्परा को बीजेपी बार बार तोड़ रही है . यही उन्होंने बंगलादेश की यात्रा के समय भी किया था और अब अमरीका के यात्रा के समय भी यही किया.

बीजेपी ने कांग्रेस को घेरने की पूरी पेशबंदी की

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली,२८ सितम्बर.बीजेपी ने कांग्रेस की सरकार को घेरने के लिए सारी ताक़तों को आगे कर दीया है . आज संसद में दोनों सदनों के नेताओं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने प्रेस को संबोधित किया और कहा कि कांग्रेस की सरकार के सामने विश्वसनीयता का संकट है और वह अपने ही विरोधाभासों के नीचे बुरी तरह से दब चुकी है . बीजेपी ने प्रधान मंत्री के उस बयान को गलत बताया जिसमें उन्होंने कहा है कि बीजेपी समेत विपक्ष की कुछ पार्टियां सरकार क स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं . प्रधान मंत्री ने अपनी विदेश यात्रा से लौटते समय यह आरोप लगाया था कि विपक्ष की कोशिश है कि देश में जल्दी ही चुनाव हो जाएँ जबकि अभी सरकार का कार्यकाल पूरा होने में करीब ढाई साल बाकी हैं . बीजेपी ने पी चिदंबरम को बचाने के मामले में प्रधान मंत्री को दोषी ठहराया लेकिन प्रधान मंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं की जबकि अरुण जेटली ने साफ़ कहा कि प्रधान मंत्री को मालूम था कि २००८ में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम और ए राजा मिलकर २ जी घोटाला कर रहे थे.
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लोक सभा में विपक्ष की नेता,सुषमा स्वराज ने कहा कि बीजेपी अभी चुनाव के लिए दबाव नहीं डाल रही है . अगर मध्यावधि चुनाव होता है तो उसके लिए कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाली सरकार का गलत काम ही ज़िम्मेदार होंगें . दोनों नेताओं ने गृह मंत्री पी चिदंबरम को भ्रष्ट बाताया और मांग की कि उनकी जांच की जानी चाहिए. बीजेपी ने दावा किया है कि जब यू पी ए सरकार में शामिल गैर कांग्रेस पार्टियों के नेता किसी गलती में पकडे जाते हैं तो कांग्रेस नेतृत्व और प्रधान मंत्री उन्हें अपने हाल पर छोड़ देते हैं ./ उन्होंने २ जी मामले में ए राजा को जेल में भेजने का ज़िक्र किया . सुषमा स्वराज ने कहा कि जब मंहगाई के बढ़ने की बात आती है तो एन सी पी के शरद पवार को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है . इसी तरह जब एयर इंडिया में भ्रष्टाचार की बात आती है तो एन सी पी के प्रफुल पटेल का नाम ले लिया जाता है लेकिन जब कांग्रेस के पी चिदंबरम पर बात आती है तो कांग्रेस उनके बचाव में आ जाती है . अरुण जेटली ने प्रधान मंत्री पर आरोप लगाया कि वे पी चिदंबरम का बचाव करके भ्रष्टाचार को शह दे रहे हैं ..उन्होंने कहा कि पी चिदंबरम दागी हैं और उन पर अगर भरोसा करते रहे तो प्रधान मंत्री देश का भरोसा बहुत जल्द खो देगें.बीजेपी ने अब कैश फार वोट मामले में फंसे अपने सदस्यों का बचाव करने का फैसला कर लिया है . कल सुषमा स्वराज जेल में बंद अपनी पार्टी के कैश फार वोट के अभियुक्तों से मिल कर आई हैं और आज अरुण जेटली और आडवानी से सुधीन्द्र कुलकर्णी और अन्य दो पूर्व सांसदों से मिलने जा रहे हैं . जब पूछा गया कि अब कैश फार वोट के केस से आप लोग अपनी पार्टी को कैसे बचायेगें तो अरुण जेटली ने कहा कि उनकी पार्टी के लोग तो भ्रष्टाचार को एक्सपोज कर रहे थे . वे अपराधी नहीं हैं .

Saturday, September 24, 2011

पी चिदंबरम को बचाने की डगर पर बार बार फिसल रही है कांग्रेस

शेष नारायण सिंह


नई दिल्ली,२३ सितम्बर.पी चिदंबरम के बचाव के मामले में कांग्रेस पूरी तरह से बैकफुट पर है .प्रणब मुखर्जी के उस नोट ने ज़रूरी तूफान मचा दिया है . बीजेपी ने पी चिदंबरम के २ जी मामले में कथित रूप से शामिल होने की बात को राजनीति और मीडिया के एजेंडे पर लाने में कोई कसर नहीं छोडी है . हर संभावित मंच पर आज बीजेपी ने पी चिदंबरम के माले को परवान चढाने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी के पास मामले में तकनीकी तौर पर बचाव करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. कांग्रेस प्रवक्ता लगभग गिडगिडाते हुए बोले कि बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों ने कांग्रेस की मुसीबत में उसे परेशान करने का अभियान शुरू कर दिया है जो ठीक नहीं है .
बीजेपी ने आज पी चिदंबरम के मामले में पूरी तरह से हमलावर रुख अपनाते हुए कहा कि २ जी मामले में प्रधान मंत्री की हर बात को नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने पहले तो ए राजा को भी निर्दोष बताया था लकिन बाद में उनकी सरकार की एजेंसियों ने जांच में उन्हें घोटाले में लिप्त पाया और आजकल वे जेल में हैं .बीजेपी का दावा है कि २ जी घोटाला देश का सबसे बड़ा घोटाला है औत्र उसकी पारदर्शी जांच ज़रूरी है . बीजेपी के प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद ने आज पार्टी मुख्यालय की अपनी नियमित ब्रीफिंग में कहा कि पी चिदंबरम को क्या इस लिए बचाया जा रहा है कि कहीं २ जी घोटाले की जांच की लपटें प्रधान मंत्री कार्यालय तक न पंहुच जाएँ . इस ब्रीफिंग में बीजेपी प्रवक्ता ने सी बी आई की भूमिका को भी विवाद के दायरे में लेने की कोशिश की. बीजेपी ने प्रधान मंत्री से मांग की कि पी चिदंबरम को क्लीन चिट देने से बात ख़त्म नहीं हो जायेगी. उन्हें चाहिए वे चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई करे. मामले को कोर्ट में बता कर बचने की सरकार की कोशिश अपराध पर पर्दा डालने की कोशिश है और इसका हर स्तर पर विरोध किया जाएगा.
कांग्रेस प्रवक्ता के पास बीजेपी के आरोपों का कोई जवाब नहीं था . आज कांग्रेस के तरफ से मोर्चा संभाल रहे मनीष तिवारी ने बीजेपी के राज के दौरान हुए दूरसंचार घोटालों का बार बार उल्लेख किया और दावा किया कि मौजूदा २ जी घोटाले के बीज अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्री रहते हुए लाई गयी दूरसंचार पालिसी १९९९ में मौजूद थे. उन्होंने ने साफ़ कहा कि एन दी ए सरकार के दौरान भी दूरसंचार पालिसी का बार उल्लंघन हुआ . उन्होंने कहा कि बीजेपी को चाहिए कि अपने गिरेबान में झाँक कर देखे और उसके बाद कांग्रेस की आलोचना करे . जब उनको बताया गया कि जब ए राजा की अगुवाई में २ जी घोटाला हो रहा था उसी दौर में वित्त मंत्रालय के ने आपत्ति की थी .क्या कारण है कि उस waqt के वित्त मंत्री ने नौअक्र्शाही के आदेश को ओवर रूल l करके ए राजा को घोटाला करने दिया, तो कांग्रेस प्रवक्ता ने फिर वही संयुक्त संसदीय समिति के अंदर विचार होने की बात करके मामले को टालने की कोशिश की. जब पूछा गया कि तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि जब तक संयुक्त संसदीय समिति की जांच के नतीजे न आ जाएँ तब तक इस मामले में कोई खबर न लिखी जाए तो वे मामले को और भी बहुत लम्बे दायरे में घेरकर पेश करने की कोशिश करते नज़र आये .

Thursday, September 22, 2011

योजना आयोग और कांग्रेस के बीच गरीबी रेखा पर मतभेद

शेष नारायण सिंह

नई दिल्ली,२१ सितम्बर.बीजेपी ने आज सरकार के उस हलफनामे की सख्त निंदा की जिसमें कथित रूप से गरीबों की संख्या घटाने की साज़िश की गयी है . बीजेपी ने एक बयान जारी करके कहा कि यह उस गरीब व्यक्ति का अपमान है जो बढ़ती मंहगाई और भ्रष्टाचार का शिकार हो रहा है.गरीब को गरीबी रेखा से ऊपर उठाने के बजाय सरकार ने तथ्य को नकारने और गरीब व्यक्तियों की संख्या छिपाने का रास्ता चुना यह गरीबी दूर करना नहीं बल्कि गरीब को गरीब न मानना है. बीजेपी कांग्रेस के नेतृत्व वाली यू पी ए सरकार के इस गरीब विरोधी रवैये का सभी उपलब्ध मंचों पर विरोध करेगी. हालांकि कांग्रेस ने इस हलफनामे को अंतिम सत्य मानने से इनकार कर दिया और कहा कि योजना आयोग के पास इस मामले में सुझाव दिए जायेगें . कांग्रेस का दावा है कि यह सुझाव कोई भी दे सकता है . एक सीधे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी भी योजना आयोग को सकारात्मक सुझाव देगी.लगता है कि अर्थशात्र के विद्वान् योजना आयोग के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने कांग्रेस के पार्टी से गरीबी की रेखा की परिभाषा तय करने के पहले हरी झंडी नहीं ली थी.

योजना आयोग ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल करके कहा था कि देश के शहरी इलाकों में रह रहे लोग अगर ९६५ रूपये प्रति माह अपने परिवार के रख रखाव पर खर्च करते हैं तो वे गरीबी रेखा कि उपर मानेजायेगें जबकि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले पारिवारों के पास अगर ७८१ रूपये खर्च करने के लिए उपलब्ध है तो वे गरीब नहीं माने जायेगें. बीजेपी का कहना है कि यह सरकार की गैर ज़िम्मेदार कोशिश है . बीजेपी का दावा है कि यह दिमागी दिवालियापन है और इस प्रकार का हलफनामा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम की विफलता का प्रतीक है .

खाद्य सुरक्षा का कानून बनाकर गरीब आदमी के बीच लोकप्रिय बनने की कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए योजना आयोग़ का यह हलफ़नामा बहुत मुश्किलें पैदा कर रहा है . आज जब कांग्रेस प्रवक्ता से इस बारे में जब सवाल किया गया तो तो उन्होंने साफ़ कहा कि अभी इस हलफनामे में सुधार किया जायेगा . हालांकि बात को बहुत घुमावदार तरीके से पेश किया गया लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता की बात से साफ़ था कि योजना आयोग ने उसके लिए मुश्किल पेश कर दी है . उनका कहना है कि बहुत ही सोच विचार के बाद यह आंकड़े उपलब्ध हुए हैं और योजना आयोग के बहुत ही काबिल लोगों ने इस हलफ नामे पर काम किया है . इसलिए इस पर सोच विचार के बाद कोई फैसला लिया जायेगा. कांगेस के सूत्रों का दावा है कि यह हलफनामा पार्टी को मुश्किल में डालने वाला है और बिना राजनीतिक क्लियरेंस के इसे सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दिया गया है .

Sunday, September 18, 2011

महंगाई के मुद्दे पर सरकार पर चौतरफा हमला , भ्रष्टाचार और बढ़ती कीमतों की लपटों में झुलस रही है कांग्रेस

शेष नारायण सिंह
महंगाई के सवाल पर आज केंद्र सरकार बहुत बुरी तरह घिर गयी है . कांग्रेस के दफ्तर का माहौल देखने पर लगता है कि वहां किसी बड़े चुनाव में हार जाने के बाद वाली मुर्दनी छाई हुई है .सरकार में भी सन्नाटा है . केन्द्रीय वित्तमंत्री ने आज एक बयान दिया कि केंद्र सरकार ने नहीं ,पेट्रोल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमतें बढ़ाई हैं . उनके इस बयान का सरकार के बाहर और अंदर बैठे लोग मजाक उड़ा रहे हैं . जानकार बताते हैं कि पिछले दो दशकों में केंद्र सरकार इतनी लाचार कभी नहीं देखी गयी थी. पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि,बैंक की ब्याज दरों में बढ़ोतरी और मुद्रास्फीति की छलांग लगाती दर के कारण मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दे रही पार्टियों ने सरकार की लाचारी को निशाने में लिया और दिल्ली की राजनीतिक हवा में आज यह संकेत साफ़ नज़र आने लगे कि लोकसभा का अगला आम चुनाव २०१४ में बताने वाले राजनीतिक तूफ़ान की रफ्तार को पहचान नहीं पा रहे हैं . यू पी ए समर्थकों तक को दर लगन एलागा है कि कहेने सरकार की छुट्टी न हो जाए. बीजेपी ने आज दिल्ली के हर मंच पर सरकार को नाकारा और भ्रष्ट साबित करने का अभियान चला रखा है . जहां तक बीजेपी का सवाल है उसके किसी भी राजनीतिक रुख से केंद्र सरकार की स्थिरता और लोकसभा के चुनाव पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है . लेकिन यू पी ए में शामिल राजनीतिक पार्टियों के आज के रुख से बिलकुल साफ़ संकेत मिल रहा है कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गयी है . केंद्र सरकार में कांग्रेस सबसे बड़ा दल है लेकिन सरकार बनी रहने में अंदर से समर्थन दे रही तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम का योगदान सबसे ज्यादा है . सरकार में शामिल बाकी राजनीतिक पार्टियों की संख्या बहुत मामूली है . आज पहली बार डी एम के और तृणमूल कांग्रेस ने सरकार की महंगाई रोक सकने की नीति की सख्त आलोचना की . बाहर से समर्थन दे रही दो बड़ी पार्टियों,बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी , ने भी आज कांग्रेस की आम आदमी विरोधी नीतियों का ज़बरदस्त विरोध किया. बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की जमकर आलोचना की और साफ़ कर दिया कि अगर सरकार पर बुरा वक़्त आता है तो यह पार्टियां कांग्रेस के संकटमोचक के रूप में नहीं खडी होंगीं. हालांकि अब तक ऐसे कई मौके आये हैं जब इन दोनों पार्टियों ने केंद्र सरकार को तृणमूल और डी एम के की मनमानी से बच निकलने में मदद की है लेकिन इस बार लगता है कि अब कोई भी पार्टी कांग्रेस का साथ देने को तैयार नहीं है ,कम से कम आज दिल्ली में राजनीतिक गलियारों से तो यह साफ़ नज़र आ रहा है. आज दिल्ली में चारों तरफ से मनमोहन सिंह की सरकार की निंदा की आवाजें उठ रही हैं .

यू पी ए सरकार की सबसे ज्यादा कड़ी आलोचना पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के सवाल पर हो रही है .बीजेपी ने आरोप लगाया है कि यू पी ए के सात साल के शासनकाल में पेट्रोल की कीमतों में २५ रूपये की वृद्धि हुई है . बीजेपी के प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन ने बताया कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सरकार को चार्ज दिया था तो पेट्रोल की कीमत ४० रूपये से भी कम थी जबकि अब अवह सत्तर पार कर गयी है . बीजेपी ने मांग की है कि सरकार को फ़ौरन पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतें वापस लेनी होंगीं .अगर ऐसा न हुआ तो पूरे देश में आन्दोलन शुरू कर दिया जाएगा. किसी भी विपक्षी पार्टी के लिए आम आदमी के खिलाफ खडी किसी भी सरकार को घेरने का यह बेहतरीन मौक़ा है और बीजेपी उसका इस्तेमाल कर रही है . सरकार की परेशानी तृणमूल कांग्रेस के रुख से है . उसने मांग कर डी है कि पेट्रोल के बढे हुए दाम फ़ौरन वापस लिए जाएं . तृणमूल कांग्रेस के नेता और रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने आज एक प्रेस कानफरेंस में कहा कि सरकार ने पेट्रोल की कीमतें बढाने के पहले उनकी पार्टी से सलाह नहीं किया था. तृणमूल कांग्रेस की नाराज़गी केंद्र सरकार के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर सकती है . मनमोहन सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहन सिंह ने कहा कि पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि का कोई आर्थिक कारण नहीं है . यह शुद्ध रूप से भ्रष्टाचार के कारण हुआ है . उन्होंने आरोप लगाया भ्रष्टाचार और महंगाई दोनों का बहुत करीबी साथ है . केंद्र की सरकार भ्रष्ट है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है . ज़खीरेबाज़ और बड़े पूंजीपति सरकार को पाल रहे हैं और वे ही सरकार की लचर नीतियों का फायदा उठाकर हर चीज़ के दाम बढ़ा रहे हैं . और सरकार मुनाफाखोरों के साथ खडी है . केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों की कोई दिशा नहीं है . सब कुछ आकस्मिक तरीके से हो रहा है . इस लिए मंहगाई बढ़ रही है .
पेट्रोल और खाने की चीज़ों की बढ़ती कीमतों के बाद आज केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाले रिज़र्व बैंक ने भी मध्य वर्ग को झकझोर दिया . आज ही ब्याज दर में वृद्धि की घोषणा कर दी गयी . अब मकान , कार ओर स्कूटर के लिए लिया गया क़र्ज़ और महंगा हो गया . यह खबर टेलिविज़न पर लगातार दिखाई जा रही है जिसके चलते लगता है कि केंद्र सरकार और उसके मध्यवर्गीय समर्थक और भी दबाव में आ जायेगें